BIGG BOSS 14: कविता और एजाज की लड़ाई पर सलमान को आया गुस्सा, औडियंस ने कही ये बात

कलर्स के रियलिटी शो ‘बिग बॉस 14’ इन दिनों टीआरपी रेस में पीछे हो रहा है, जिसके चलते मेकर्स शो में कई नए सदस्यों की एंट्री कर रहे हैं. वहीं शो में मौजूद कंटेस्टेंट की लड़ाई फैंस को स्क्रिप्ट का हिस्सा लग रही हैं, जिसके चलते शो सोशलमीडिया पर काफी ट्रोलिंग का शिकार हो रहा है. आइए आपको बताते हैं क्या है पूरा मामला…

वीकेंड पर बरसा सलमान का गुस्सा

इस वीकेंड के वार में सलमान खान के गुस्से का शिकार राहुल वैद्य, जैस्मिन भसीन और रुबीना दिलाइक के बाद कविता कौशिक को होना पड़ा. बीते एपिसोड में कविता कौशिक एजाज खान पर गंभीर आरोप लगाती दिखीं. दरअसल, कविता कौशिक कहती नजरआईं कि उन्होंने लॉकडाउन में एजाज खान के लिए खाना बनाया है लेकिन वह उनकी दोस्त नहीं हैं. वहीं आगे कविता कौशिक ने कहा कि एजाज खान से हुई दोस्ती की वजह से उनकी ‘बिग बॉस 14’ के घर में बहुत बेज्जती हो रही है. एजाज खान से हुई दोस्ती को कविता कौशिक ने अपनी जिंदगी सबसे बड़ी गलती बताया.

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सलमान ने छोड़ा स्टेज

एक बहस के दौरान कविता कौशिक ने कहा कि ‘बिग बॉस 14’ के घर में एजाज खान ने उनको अपना दोस्त बताकर इस्तेमाल किया है. कविता कौशिक की ये बात सुनकर सलमान खान उनको समझाने की कोशिश करेंगे कि एजाज खान इंडस्ट्री के लोगों से दोस्ती नहीं करता लेकिन उसने अदाकारा को अपना करीबी माना है. वहीं कविता कौशिक सलमान खान को अनसुना करके अपनी ही बात पर अड़ी रहीं. जिसके बाद सलमान खान को गुस्सा आया और वो ‘बिग बॉस 14’ का स्टेज छोड़कर चले गए.

फैंस ने कही ये बात

‘बिग बॉस 14’ के घर में एजाज खान की बेइज्जती देखकर जहां फैंस का गुस्सा भड़क गया. तो वहीं फैंस ने कविता कौशिक के दिमाग खराब होने की बात कही है और कहा है कि वह फुटेज पाने के लिए एजाज खान से लड़ाई कर रही है. हालांकि कुछ ट्रोलर्स ने पूरे शो को स्किप्टेड बताया. और कहा कि एजाज खान और कविता कौशिक की लड़ाई फेक है और मेकर्स एजाज खान की अच्छी इमेज बनाने के लिए ऐसा कर रहे हैं ताकि वह विनर बन सके.

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बता दें, शो में आज यानी 2 अक्टूबर को डबल एलिमनेशन होने वाले हैं. वहीं खबरें हैं कि निशांत मलकानी और कविता कौशिक एलिमनेट हो जाएंगे. हालांकि अभी ये कंफर्म नही किया गया है.

बा के लिए क्या वनराज को माफ कर देगी ‘अनुपमा’? जाने क्या होगा आने वाला ट्विस्ट

स्टार प्लस का सीरियल ‘अनुपमा’ (Anupama) इन दिनों औडियंस को एंटरटेन करने में कोई कसर नही छोड़ रहा है. जहां सीरियल में अनुपमा का बदला हुआ रूप फैंस को पसंद आ रहा है तो वहीं वनराज और काव्या को साथ देखकर फैंस गुस्से में हैं. हालांकि शो में जल्द कई नए ट्विस्ट देखने को मिलने वाले हैं. आइए आपको बताते हैं क्या होगा शो में आगे….

मां को नई शुरूआत के लिए कहता है समर

जहां बीते एपिसोड में आपने देखा कि वनराज के अफेयर का पता चलते ही जहां समर गुस्से में उससे पिता होने के सारे हक छीन लेता है. वहीं अपनी मां अनुपमा से समर सबकुछ भूलकर एक नयी शुरूआत करने के लिए कहता है. लेकिन अनुपमा उसे कहती है कि सबकुछ भूलने के लिए बहुत कुछ पीछे छोड़ना पड़ता है और मैं अपने परिवार को पीछे नहीं छोड़ सकती.

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अनुपमा से डरी काव्या

वनराज का सच जानने के बाद जहां अनुपमा गुस्से में है तो वहीं काव्या की तरफ उसका व्यवहार काव्या को डरा रहा है, जिसके कारण वह वनराज से अनुपमा को छोड़ने की बात कहती है.

बेटे को माफ करने के लिए कहेगी बा


अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि देविका, अनुपमा के साथ कुछ समय बिताने के लिए आएगी, क्योंकि वह बहुत अच्छी तरह से जानती है कि अनुपमा नरम दिल की है और वह कभी कोई कठोर कदम नहीं उठा सकती. इसीलिए वह वनराज को परेशान करना शुरू कर देती है. इसी बीच समर के कारण वह वनराज के अफेयर का सच भी जान जाएगी, हालांकि परिवार की खातिर वह अनुपमा के सामने वनराज को माफ करने की बात कहेंगी.

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बता दें, अब काव्या के ड्रामे के बाद ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या अनुपमा को वनराज अपनी जिंदगी से दूर कर देगा. वहीं इस मामले में अनुपमा का अगला कदम क्या होगा?

स्वास्थ्य व जिंदगी से खेलना खतरनाक

आयुष मंत्रालय द्वारा जारी सरकारी विज्ञप्ति जिसे  हुक्मनामा कहा जा सकता है, कोविड-19 के इलाज में अंधविश्वास और पाखंड से भरा प्रोटोकौल जारी किया है. जो आयुर्वेदाचार्य व योगाचार्य की डिगरी गले में लटकाए फिरते हैं. उन के कोविड-19 को रोकने में मंत्र, यंत्र, षड्यंत्र काम में नहीं आए और यज्ञों, हवनों, कीर्तनों पर लोगों ने सामूहिक रूप से भरोसा नहीं जताया, तो आयुष मंत्रालय ने कोविड-19 ग्रस्त रोगियों के ठीक होने पर वाहवाही लूटने के लिए यह हुक्म जारी किया है ताकि भगवा ब्रिगेड का पैसा बनता रहे. जैसा हमेशा होता है, 8 ठीकठाक बातें तो की जाती हैं पर उन में 4 अपने मतलब की जोड़ दी जाती हैं.

सितंबर में जारी उस हुक्मनामे के बचाव में पहले ही कह दिया कि कोविड-19 से ठीक हुए मरीजों का न कोविड-19 ठीक होगा न रुकेगा. फिर हैल्थ मंत्रालय के मंत्री डाक्टर हर्षवर्धन इस हुक्मनामे का हल्ला क्यों मचा रहे हैं इसलिए इस सरकारी राय में कुछ के लिए आय के स्रोत हैं.

इस हुक्मनामे में कहा गया है कि ठीक हुए मरीजों को योगासान, प्राणायाम और मैडिटेशन करना चाहिए. उन के लिए स्वाभाविक है कि गुरु की जरूरत होगी जो भगवा रेशमी कपड़े पहने मिल जाएंगे. आजकल पैसे दे कर औनलाइन क्लास भी जौइन कर सकते हैं.

सांस लेने व व्यायाम के भी उपाय अपने डाक्टर से पूछ कर करें, यह भी हुक्म है. अगर प्राणायाम और मैडिटेशन काफी हैं तो डाक्टर की सलाह क्यों? ताकि बाद में कुछ गलत हो जाए तो ठीकरा डाक्टर के सिर पर फोड़ा जा सके.

आगे हुक्म है कि डाक्टर की दवाएं तो लें ही, जड़ीबूटियों के अर्क भी लें. इस बारे में आयुष विशेषज्ञ को पैसे दे कर पूछें साथ में डाक्टर को भी बता दें.

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धर्म गुरुओं से विनती करें  कि वे अच्छीअच्छी बातें सुनाएं. अब वे मुफ्त में तो प्रवचन सुनाएंगे नहीं, चढ़ावा तो देना होगा ही. सरकारी आदेश भी अब तो उन का साथ देगा इसलिए भाव भी बढ़ जाएगा. उन से राय लेने की सलाह भी दी गई है. योगा और मैडिटेशन के बारे में कई बार दोहराया गया है, क्योंकि उन के खुद घोषित गुरु पिछले महीनों कुछ खाली थे और उन की आय बढ़ाना धार्मिक सरकार का कर्तव्य है न.

जिन दवाओं का उल्लेख है उन में आयुषवर्धा, वसामिनीबटी, गिलोय पाउडर, अश्वगंधा पाउडर, आंवला, च्यवनप्राश आदि वैद्य की सलाह के अनुसार लेने का आदेश है.

इन सब के बारे में क्या कोविड रोगियों पर कोई अनुसंधान हुआ है? कितनों के इन बातों को अपनाने से कोविड दोबारा नहीं हुआ? कितनों का डाटा तैयार नहीं हुआ? कितनों का डाटा जमा किया गया? रिपोर्ट कहां है? यह सब नहीं है तभी इस के बारे में इंडियन मैडिकल असोशिएशन ने गंभीर आपत्ति जताई है कि सरकार का आदेश गुमराह करने वाला है.

मैडिकल असोशिएशन के अनुसार मरीजों को केवल डाक्टरों की सलाह माननी चाहिए और सैल्फ मैडिकेशन नहीं करनी चाहिए.

हमारे देश में यह परंपरा है कि कोई बीमार हुआ नहीं 10 जने अपना चिकित्सा ज्ञान जो पंडोंपुजारियों और वैद्यों की देन ही होता है बघारने लगते हैं. कई बार तो वे जबरन काढ़ा, गोली, पत्ते, कंदमूल खिला जाते हैं. केंद्रीय मंत्री डाक्टर हर्षवर्धन उसे सरकारी संरक्षण दे रहे हैं, वह भी पैसे ले कर.

केंद्र सरकार ने कोविड-19 के बाद कहीं भी सरकारी आयुर्वेद अस्पताल नहीं खोले, कहीं योगाचार्यों को मरीजों के कैंपों में नहीं भेजा, कहीं पंडितों, शास्त्रियों को हवनों से मरीजों को सामूहिक रूप से ठीक कराने के अखंड कीर्तन नहीं कराए, क्योंकि वे जानते हैं कि ये ढकोसले तो वोट बैंक बनाए रखने के लिए घरों में घुसपैठ करने के हैं. बेचारी असहाय मांएं और पत्नियां सही जानकारी न मिल पाने के कारण इन उपायों को मानने को मजबूर हो जाती हैं और फिर उन्हें भरोसा हो जाता है कि यही ठीक है.

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सरकारें गुमराह करती हैं, यह पुरानी बात है पर वे कोविड-19 के मामले में स्वास्थ्य व जिंदगी से खेलें, यह खतरनाक है.???

डायबिटीज में रहें इन 6 सब्जियों से दूर

डायबिटीज आजकल लोगों में होने वाली आम समस्या है, लेकिन कईं बार केवल दवाई खाने के बावजूद आपका डायबिटीज कंट्रोल नही होता. डायबिटीज कंट्रोल न होने के कई कारण है, जिनमें रोजाना खाने वाला फूड भी है. अक्सर हम डायबिटीज होने के बावजूद कई ऐसी सब्जियां खा लेते हैं, जो आपकी हेल्थ को ज्यादा खराब कर देती है. इसीलिए आज हम आपको डायबिटीज की प्रौब्लम में दूर रहने वाली सब्जियों के बारे में बताएंगे…

डायबिटीज में रहें चुकंदर से दूर

चुकंदर भले ही सलाद के रूप में एक बेहतरीन चीज मानी जाती है लेकिन डायबिटीज रोगी के लिए यह सही नहीं. ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें मिठास ज्यादा होती है. ऐसा नहीं कि आप चुकंदर एकदम नहीं खा सकते लेकिन इसकी मात्रा बहुत कम या वीक में एक बार हो सकती है.

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बींस को बिना उबाले न खाएं

बींस भले ही मीठा न होता हो लेकिन ये स्टार्च से भरा होता है. डायबिटीज में मीठा ही नहीं स्टार्च भी खाना मना होता है. ऐसे में ये हरी सब्जी भले ही हो लेकिन स्टार्च ज्यादा होने के कारण इसे भी खाने से बचना चाहिए। अगर बहुत पसंद हो बीन्स तो आप इसे उबाल कर खा सकते हैं.

टमाटर और कौर्न से भी रहें दूर

टमाटर सिट्रिक एसिड सेभरा होता है लेकिन मीठा भी. ऐसे में इसे भी खाने से बचना बहुत जरूरी है. स्वीट कौर्न भी मीठास से भरा होता है साथ ही इसमें स्टार्च भी भरपूर होता है. ऐसे में ये किसी भी रूप में ये हेल्थ के लिए सही नहीं होता. खास कर डायबिटीज मरीजों के लिए तो बिलकुल नहीं.

सूरन और अरबी

आलू की प्रजाति का होने के कारण अरबी और सूरन भी स्टार्च युक्त सब्जी होती है. मीठा भी ये काफी होता है, इसलिए डायबिटीज रोगी को इससे दूर रहना चाहिए.

आलू या शकरकंदी

आलू और शंकरकंदी स्टार्च और मीठास से भरा होता है. इसे भी खाने से डायबिटीज रोगियों को परहेज करना चाहिए। उबाला हुआ कभी कभार खाया जा सकता है.

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कद्दू से बचना है जरूरी

कद्दू भी बेहद मीठास से भरा होता है ऐसे में पका कद्दू मो बिलकुल भी डायबिटीज रोगियों को नहीं खाना चाहिए. हरा कद्दू कभी कभार खाया जा सकता है. इन सब्जियों से दूर रहकर आप अपने आप को डायबिटीज से होने वाली खतरनाक बीमारियों से दूर रह पाएंगे. साथ ही एक हेल्दी लाइफ बिना किसी टेंशन के जी पाएंगे.

जब गपशप की लत लगे…

कभीकभी गपशप करने से बहुतकुछ सहज सा लगने लगता है. एक सुलझी हुई गपशप आपसी संबंधों को मजबूत करने में सहायक है. गपशप करना हमारे सामाजिक होने का सुबूत भी है. हलकीफुलकी गपशप हमें तरोताजा रखती है.

मनोवैज्ञानिक तो आजकल निराशा, अवसाद या उदासी के उपाय के रूप में गपशप की तकनीक आजमाने की सलाह देते हैं. कोई पराक्रम नहीं, बल्कि मीठी गपशप बहुत सारे गिलेशिकवे दूर कर देती है.

मगर एक कहावत है कि अति हर चीज की बुरी होती है. वीनू को यही लत लग गई थी. कालेज में हर समय हर किसी के साथ उस का बहुत सारा समय इसी तरह की गपशप में निकल रहा था. पहलेपहल तो सब को ही उस की गपशप अच्छी लगती थी, मगर बाकी कालेज मेट्स की पढ़ाई खराब हो रही थी. अब वे सब वीनू से कटेकटे से रहने लगे.

वीनू जब बहुत दिनों तक ऐसे ही अकेली रह गई, तो उस को अपना वही खराब बचपन याद आने लगा.

बड़ी बहन वीनू से 7 साल बड़ी थी और बहुत सुंदर थी. वह कभी भी वीनू को अपनी बात नहीं कहने देती थी.

“वीनू, तुम अभी बच्ची हो. खामोश रहो,” ऐसा कह कर उस का मुंह बंद कर देती थी.

जब वीनू कालेज में आई, तो अपनी बात दोस्तों के सामने खुल कर रखने लगी थी, पर… आज तो वीनू के साथी भी ऐसे हो गए.

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मगर वीनू ने एक दिन अपनी आदतों पर गौर किया. उसे तुरंत ही समस्या का हल मिल गया. अब उस ने यह आदत सुधार ली और परिणाम सकारात्मक रहे. उस के मित्रों का सर्कल फिर से बढ़ गया.

यहां वीनू तो समय पर सतर्क हो गई, मगर दिमाग चाट देने वाली गपशप करने की समस्या ज्यादातर लोगों को होने वाली आम समस्याओं में से एक है. ज्यादा अकेलापन, तनाव, चिंता, कोई घुटन, किसी से नाराजगी, अपने को बढ़ाचढ़ा कर बारबार पेश करना आदि यह सब गपशप की लत पड़ने की खास वजहों में शामिल हैं.
हर समय बोलने की आदत न केवल नैतिक तौर पर आप का पतन करती है, बल्कि मानसिक और शारीरिक सेहत के लिए भी नुकसानदायक हो सकती है.

अगर मनोवैज्ञानिकों की मानें तो जो लोग बहुत अधिक बोलते हैं, उन्हें तनाव और अवसाद जैसी मानसिक समस्याओं के अलावा गला खराब होने या सिरदर्द जैसी शारीरिक समस्याएं भी हो सकती हैं. बहुत बोलने की प्रवृत्ति और इस से सेहत के संबंध के विषय पर सोचना जरूर चाहिए कि कहीं गपशप ऐसी न हो कि आप अपनी पसंद के विषय पर बिना रुके चपड़चपड़
बोलते ही चले जाएं और सामने वाला प्रताड़ित हो रहा हो. अगर गपशप हो तो ऐसी, जो सामने वाले को सुहाती हो. उस को अच्छा लग रहा हो, वो भी लगातार बोलने और सुनने में रुचि ले. हमें दोस्तों से बोलनाबतियाना जरूर चाहिए, मगर कब और किस तरह इस बात को भी गहराई से सोचनेसमझने की जरूरत है.

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि कई लोगों की आदत होती है कि वे मौका मिला और तपाक से बातों का सिलसिला शुरू कर देते हैं. कोई अगर एक छोटी सी जानकारी के लिए कुछ पूछ रहा है, तो इस पर ध्यान देना चाहिए कि संक्षिप्त बात की जरूरत है, मगर कुछ लोग यह गौर करने के बजाय उन के मन में जोजो किस्से तुरंत आते हैं, वो बस धारा प्रवाह बोल देते हैं. सब का साथ निभाना अच्छा है, मगर शिष्टता का प्रयोग भी जरूरी है. दोस्ताना या आत्मीय रिश्ते में किसी का प्यार से खूब सारा समय ले लेना अलग बात है, पर आप को अधिक कड़वा अनुभव हो सकता है. अगर लोग कन्नी काटने लगें.

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हम सब सामाजिक प्राणी हैं और बात करना यानी संवाद करना किसी से जुड़ने का प्रतीक है. इस में कोई दो राय नहीं.

कुछ लोग तो थोड़े समय बोल कर चुप हो जाते हैं, जबकि कुछ इतना बोलते और बतियाते हैं कि सुनने वाले को वहां से भागने पर मजबूर कर देते हैं.

हमें याद रखना चाहिए कि दूसरे का समय कितना उपयोगी है. समय का सम्मान करें, अपने शब्दों का भी.

वीकैंड मस्ती: अब कल की बात

मेघा और सचिन दोनों ही निजी कंपनी में काम करते हैं. दोनों ही रोज लगभग एक ही समय घर से निकलते थे. शाम को मेघा जल्दी आ जाती थी और सचिन 8 बजे तक आता था. दोनों अपने लिए समय नहीं निकाल पाते थे. ढंग से खाना भी नहीं हो पाता था. उन की किचन में खाना बनाने का सामान कम और औनलाइन खाना भेजने वाली साइटों के फोन नंबर अधिक लिखे होते थे. वे स्वाद को बदलने के लिए साइट बदलबदल कर खाना मंगाते थे. उन के लिए वीकैंड ही सब से खुशहाल भरा होता था. शनिवार और रविवार सब से बड़ी खुशी लाता था.

मेघा कहती है, ‘‘शनिवार की सुबह देर तक सोने का मौका मिलता था तो लगता था कि जीवन की सारी खुशियां मिल गई हों. वीकैंड में ही हम मनपसंद खाना बनाते थे.’’

शालिनी और रमेश दोनों ही मल्टीनैशल कंपनी में काम करते थे. दोनों की नई शादी हुई थी. 1 साल बीत गया. बढ़ती उम्र में शादी हुई थी तो घर वालों को लग रहा था कि बच्चा जल्दी हो जाना चाहिए नहीं तो आगे दिक्कत हो सकती है. घर वालों का दबाव पड़ रहा था. शालिनी और रमेश घर वालों के दबाव में डाक्टर को दिखाने गए. डाक्टर ने पतिपत्नी के वर्किंग स्टाइल को सम झा और देखा कि दोनों कितना समय साथ गुजारते हैं. डाक्टर ने दोनों को सलाह दी कि तनावमुक्त हो कर कुछ वीकैंड साथ बिताएं. कुछ दिनों में उन के घर खुशियां आ गईं.

कोरोना काल में ‘वर्क फ्रौम होम’ और ‘क्वारंटाइन’ शनिवार और रविवार की वीकैंड मस्ती को पूरी तरह से खत्म कर चुके हैं. इस वजह से घरों में तनाव बढ़ने लगा हैं. लोगों में मानसिक बीमारियां फैलने लगी हैं, जो लोग वीकैंड और छुट्टियों का इंतजार करते थे आज वे इन के खत्म होने और फिर से औफिस वर्किंग का इंतजार कर रहे हैं. अब घर में रहना उन को कैद सा लगने लगा है. परिवार में आपस में तनाव का माहौल बढ़ रहा है. संयुक्त परिवार होने से यह बात और भी बिगड़ रही है. अकेले परिवारों की भी परेशानियां कम नहीं हैं.

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वीकैंड का क्रेज

वीकैंड यानी शनिवार और रविवार की छुट्टी का क्रेज कुछ साल पहले तक बहुत होता था. शनिवार और रविवार की छुट्टी को वीकैंड बना कर एक पैकेज की तरह पेश किया गया था. मल्टीनैशनल कंपनियों के इस चलन को देशी कंपनियों के कर्मचारी बहुत ललचाई नजरों से देखते थे. उन को लगता था कि मल्टीनैशनल कंपनियां अपने कर्मचारियों का बहुत ध्यान रखती हैं. मल्टीनैशनल कंपनियों ने भी वीकैंड के इस क्रेज को ऐसे प्रचारित किया था कि वेतन से अधिक इस का लालच कर्मचारियों को हो गया था. नए लोग जब मल्टीनैशनल कंपनी में जौब करते थे तो अपने साथियों को फख्र के साथ बताते थे कि हमारे यहां ‘फाइव डे वीक’ होता है. 2 दिन की छुट्टी में वीकैंड आराम से कटता है.

नहीं रहा क्रेज

देशी कंपनियों में जहां केवल रविवार को छुट्टी मिलती थी वह ‘‘सौतिहा डाह’’ से वीकैंड मनाने वालों को देखते थे. वीकैंड का चलन धीरेधीरे तेज होने लगा. देशी कंपनियों ने भी खुद को मल्टीनैशनल बनाने के लिए वीकैंड का चलन शुरू किया. देशी कंपनियां वेतन में भले ही मल्टीनैशनल कंपनियों का मुकाबला नहीं करती थी पर वीकैंड में वे मल्टीनैशनल कंपनियों का मुकाबला करने लगीं. एक दिन की छुट्टी को ‘वर्किंग आवर’ यानी ‘काम के घंटे’ बढ़ा कर पूरा किया जाने लगा. पहले साढ़े 9 से साढ़े 5 की औफिस जौब में कर्मचारी को 8 घंटे काम करना पड़ता था. जिन जगहों में शिफ्ट में काम होता था वहां भी एक शिफ्ट 8 घंटे की होती थी.

वीकैंड देने वाली कंपनियों में ‘वर्किंग आवर’ शाम 7 बजे तक कर दिया. इस तरह से हर दिन डेढ़ घंटा कर्मचारी को ज्यादा काम करना पड़ने लगा. इस तरह से शनिवार को एक दिन छुट्टी देने के एवज में कर्मचारियों से रोज डेढ़ घंटे अधिक काम लेना शुरू हो गया. देशी कंपनियों ने एक दिन की अतिरिक्त छुट्टी के एवज में तमाम और बो झ भी कर्मचारियों पर लाद दिए. वीकैंड का यह क्रेज कुछ ही दिनों में सिर से उतरने लगा. तब तक सरकारी कर्मचारियों में भी यह सुविधा शुरू होने लगी. उत्तर प्रदेश में सब से पहले सचिवालय में काम करने वालों को ‘फाइव डे वीक’ शुरू किया गया. बैंकों में भी माह में 2 सप्ताह वीकैंड रहता है.

कोरोना ने खत्म किया क्रेज

जब भी कोई चीज जरूरत से ज्यादा मिलती है तो वह नुकसान ही करती है. यही हाल वीकैंड का भी हुआ. 2020 के मार्च माह से अगस्त माह के बीच पूरे देश में पहले 3 माह का लौकडाउन रहा. इस के बाद वीकैंड में लौकडाउन होने लगा. औफिस और दूसरे कार्यस्थल बंद हो गए. इस दौरान लोगों को घर से काम करना पड़ रहा है. आने वाले दिनों में भी जारी रहेगा. ऐसे में घर से ही ‘वर्क फ्रौम होम’ शुरू हो गया. यहां पर कामकाजी महिलाओं तक को दिक्कत आने लगी. दिक्कत की सब से बड़ी वजह यह रही कि पति का औफिस और बच्चों का स्कूल भी औनलाइन हो गया. ऐसे में एक ही घर और एक ही छत के नीचे रहते हुए भी आपस में बात करने का कोई मौका नहीं मिलता है.

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पहले जैसी बात कहां

आकांक्षा जैन बताती हैं, ‘‘औफिस से काम करने का यह लाभ था कि घर आ कर जो भी समय बचता था उस में केवल घरपरिवार की बातें होती थीं. अब वर्क फ्रौम होम में घर में रहते हुए भी घर वालों के लिए समय नहीं मिल पाता है. यहां औफिस के काम का कोई तय समय नहीं होता. 3-4 घंटे केवल जूम मीटिंग्स में निकल जाते हैं. छोटे घरों में यह दिक्कत होती है कि अगर 3 लोग वर्क फ्रौम होम करने लगे तो जगह कम पड़ने लगती है. मीटिंग के अलावा बहुत सारे काम करने पड़ते हैं. मल्टीनैशनल कंपनियों में रात के समय भी काम करने को कहा जाता है जो एक तरह से परेशानी का सबब बनने लगा है. औफिस में 7-8 घंटे काम करने के लिए जो माहौल और सुविधाएं मिलती थीं वे घर में नहीं मिल पाती हैं. ऐसे में वर्क फ्रौम होम केवल एक विकल्प है. यह औफिस का स्थान नहीं ले सकता, क्योंकि वर्क फ्रौम होम में औफिस के काम जैसी गुणवत्ता नहीं आती है.’’

शनिवाररविवार खत्म होने से नैगेटिव इंपैक्ट

औन लाइन प्रोफैशनल नैटवर्क लिंक्डइन  के एक सर्वे में यह पाया गया है कि करीब  50 फीसदी कामकाजी महिलाएं कोरोना के कारण अधिक दबाव महसूस कर रही है. वे केवल शारीरिक श्रम की वजह से ही नहीं भावनात्मक रूप से भी खुद को परेशान महसूस कर रही हैं. इस सर्वे में 47 फीसदी महिलाओं और 38 फीसदी पुरुषों ने यह बात स्वीकार की. 27 जुलाई से  23 अगस्त 2020 के बीच यह सर्वे किया गया था. इस में 25 सौ से अधिक प्रोफैशनल्स के साथ बात हुई थी. सर्वे में कामकाजी मांओं और कामकाजी महिलाओं दोनों को शामिल किया गया. कामकाजी मांओं ने कहा कि कोरोनाकाल में बच्चों की देखभाल को ले कर चुनौतियां सब से अधिक सामने आईं. वर्क फ्रौम होम में शनिवाररविवार की छुट्टी खत्म हो गई, जिस से उन के व्यवहार में नैगेटिव भाव देखने को मिलने लगे.

महिलाओं और पुरुषों के अलगअलग नजरिए से देखें तो पता चलता है कि 31 फीसदी महिलाओं को पूरे समय बच्चों की देखभाल करनी पड़ी. पहले स्कूल और औफिस खुलने से बच्चों का काफी समय उधर गुजर जाता था. केवल  17 फीसदी पुरुषों ने ही बच्चों को संभालने में पत्नी की मदद की. 44 फीसदी महिलाओं ने माना कि बच्चों की देखभाल करने में उन को वर्किंग आवर से अधिक काम करना पड़ा. 25 फीसदी पुरुषों ने माना कि बच्चों की देखभाल में उन को अपने वर्किंग आवर से अधिक काम करना पड़ा. 20 फीसदी महिलाओं ने माना कि बच्चों की देखभाल के लिए उन को परिवार के सदस्यों या मित्रों पर निर्भर रहना पड़ा. 32 फीसदी पुरुषों ने माना कि वे बच्चों की देखभाल के लिए दूसरों पर निर्भर रहे.

वर्क फ्रौम होम में बढ़ गए काम के घंटे

शनिवार और रविवार सहित वर्क फ्रौम होम में काम करते समय वर्किंग आवर बढ़ गए. 46 फीसदी महिलाओं ने माना कि यहां उन्हें देर तक काम करने की जरूरत होती है. ज्यादा काम करने के बाद भी काम की गुणवत्ता अच्छी नहीं होती है. 42 फीसदी महिलाओं ने माना कि बच्चों के घर में होने के कारण वे काम पर पूरी तरह से ध्यान नहीं दे पाती हैं. इन वजहों से शनिवार और रविवार की छुट्टी का अब कोई क्रेज नहीं रह गया है, बल्कि यह तनाव का कारण बन गई है. अब उन्हें इस बात का इंतजार रहता है कि कब छुट्टियां खत्म हों, वे औफिस जा सकें.

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आकांक्षा जैन कहती हैं कि सप्ताह में 2 दिन हमें औफिस जाने के लिए कहा गया है. अब  मु झे वही 2 दिन वीकैंड से लगने लगे हैं. शनिवार और रविवार का हमारे लिए कोई क्रेज नहीं रह गया है.

Diwali Special: घर लाएं ज़ीरो ट्रांसफैट वाली मिठास

लेखिका- मेघना नारायण और शौवरी मलिक (स्लर्प फार्म)

भारतीय त्योहारों की बात करें तो दीवाली के दौरान अक्सर हम ज़्यादा मिठाईयां खाते हैं. दीवाली के दौरान रिफाइन्ड चीनी से भरपूर लड्डू और ट्रांसफैट से युक्त भोजन भारतीय परिवारों में आमतौर पर देखा जाता है. अगर आप को लगता है कि त्योहारों के आहार में बदलाव लाना मुश्किल है तो आप गलत हैं.

आप सेहतमंद अवयवों के साथ दीवाली के व्यंजनों को स्वादिष्ट और पौष्टिक बना सकते हैं. आप की पसंद की मिठाई में ओर्गेनिक नट पाउडर जैसे दालचीनी, कालीमिर्च, इलायची और चीनी के बजाए ओर्गेनिक गुड़ का इस्तेमाल कर इसे ज़्यादा पौष्टिक बनाया जा सकता है.

इस दीवाली आप पोषण से भरपूर अंकुरित रागी पाउडर, रागी पैनकेक मिक्स, सेहतमंद जई पाउडर, बाजरा जई दलिया मिक्स, और आटा का इस्तेमाल कर 1000 तरह के व्यंजन बना सकते हैं जैसे वेफल्स, ब्राउनी, केक (आप इनके वेगन वर्ज़न भी बना सकते हैं), बर्फी, लड्डू, हलवा, पुडिंग, फ्रोयो, पाॅप्सिकल.

आइए जानें पारंपरिक अनाज मिलेट्स की ताकत

फाइबर, प्रोटीन, विटामिन बी एवं अन्य पोषक तत्वों से भरपूर मिलेट्स आज शहरी आहार में वापसी कर चुके हैं और लोग भोजन के सेहतमंद विकल्पों के लिए इन्हें को अपना रहे हैं. फिंगर मिलेट्स (रागी) के फायदेः

रागी में किसी भी अन्य अनाज की तुलना में कैल्शियम अधिक मात्रा में होता है. यहां तक कि दूध से भी ज़्यादा कैल्शियम इसमें पाया जाता है. यानि यह आप की हड्डियों का मजबूत बनाता है.

रागी में फाॅस्फोरस भी भरपूर मात्रा में होता है जा हड्डियों और दांतों के सेहत के लिए महत्वपूर्ण है. यह पाचन में मददगार है और शरीर में पीएच स्तर को संतुलित बनाए रखता है.

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रागी में मौजूद फाइबर से आप को लम्बे समय तक पेट भरा हुआ महसूस होता है, आप दिन भी सक्रिय रहते हैं, और आप का एनर्जी लैवल सक्रिय बना रहता है.

रागी में आयरन भी भरपूर मात्रा में होता है. यह उन लोगों के लिए फायदेमंद है जिनमें हीमोग्लोबिन का स्तर कम हो.

बच्चों को अगर शुरूआत से इस तरह के सेहतमंद आहार की आदत डाली जाए तो उन्हें जीवनशैली से जुड़ी कई बीमारियों से सुरक्षित रखा जा सकता है. आम दिनों का आहार हो या त्योहारों के दिनों के व्यंजन, अगर उन्हें अच्छी तरह से पकाया जाए तो वे स्वादिष्ट होने के साथ पौष्टिक भी हो सकते हैं. तो क्या आप स्टोर से लड्डू खरीदना चाहेंगे या घर में सेहतमंद व्यंजन बना कर अपने बच्चे के विकास को सुनिश्चित करना चाहेंगे?

सेहतमंद आहार स्वादिष्ट भी हो सकता है!

मिलेट्स सदियों से हमारे दादादादी की रसोई का मुख्य हिस्सा रहे हैं. रागी डोसा, कोडो मिलेट खिचड़ी, बाजरे की रोटी, ज्वार का उपमा, ये व्यंजन दशकों से भारतीय रसोई में पकाए जाते हैं. लेकिन यह गलत अवधारणा है कि इन मिलेट्स का उपयोग सिर्फ पारंपरिक व्यंजनों में ही किया जा सकता है. ये पारम्परिक अनाज रिफाइन्ड सफेद चावल या आटे का बेहतरीन विकल्प हैं. यानि आमतौर पर हर वह व्यंजन जिसमें आप चावल, आटे या मैदा का उपयोग करते हैं, उन्हें मिलेट्स से बनाया जा सकता है.

ये मिलेट्स सेहतमंद विकल्प हैं क्योंकि इनमें फाइबर, प्रोटीन, विटामिन, मिनरल्स और एंटीआक्सीडेन्ट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. ऐसे में ये वज़न में कमी लाने, डायबिटीज़ से बचाव, दिल की बीमारियों से बचाव के लिए बेहद फ़ायदेमंद हैं.

तो इस दीवाली अपने प्रियजनों के पका कर खिलाएं ये स्वादिष्ट और पौष्टिक व्यंजनः

ज़ीरो ट्रांस फैट वाली मिठास से भरपूर खास रागी के लड्डू

रागी के लड्डू

सामग्री

1. आधा कप रागी का आटा

2. आधा कप ओर्गेनिक गुड़ का पाउडर

3. एक कप खजूर बिना बीज के

4. एक बड़ा चम्मच घी

5. एक बड़ा चम्मच खसखस

6. आधा चम्मच तिल के बीज

7. दो बड़े चम्मच बादाम कटे/ पाउडर किए

8. दो बड़े चम्मच किशमिश कटी/ पाउडर की

9. सभी मेवे स्लर्प फार्म ओर्गेनिक नट पाउडर से लिए जा सकते हैं.

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विधि ;

एक गहरी कढ़ाई में एक बड़ा चम्मच घी गर्म करें, इसमें एक कप रागी का आटा भुनें. धीमी आंच पर 5-7 मिनट के लिए भुनें. लड्डु बनाते समय आप को एक बात ध्यान रखनी है कि रागी को अच्छी तरह भुना जाए. अगर थोड़ा भी कच्चा रह गया तो यह पेट दर्द का कारण बन सकता है.

एक साथ मिला कर पीस लें, मेवों को हल्का सा भुनें .

एक बाउल में भुना रागी, सूखे मेवे, आधा कप गुड़ पाउडर मिलाएं. दोचम्मच गर्म घी/ मक्खन मिला कर अच्छी तरह मिला लें.

अगर आ पको खुशबु पसंद है तो एक बड़ा चम्मच इलायची पाउडर मिलाएं.

अपने हाथों से बाॅल्स बनाएं. अगर बहुत सूखे हों और लड्डू न बंधे तो थोड़ा घी और मिलाएं.

रागी से बना सेहतमंद लड्डू तैयार है! सेहत की चिंता किए बिना इसका आनंद उठाइए!

कोरोना की वजह से कम से मिलें पर मेंटल हेल्थ के लिए मिलें जरुर

कोरोना आया और एक बार तो बहुत हद तक जिंदगी की रफ्तार थम गई. भय, चिंता, भविष्य से ज्यादा वर्तमान की फिक्र इंसान पर हावी हो गई. नौकरी, पढ़ाई, काम, घूमना, मौज-मस्ती, जब भी मन करे घर से निकल जाना और किसी मॉल में शॉपिंग करना या होटल में खाना खाना या कहीं यूं ही बिना योजना बनाए कार उठाकर निकल जाना. पार्टी, धमाल, दोस्तों के साथ गप्पबाजी या नाइट आउट, रिश्तेदारों व परिचितों के घर जमावाड़ा और सड़कों पर बेवजह की चहलकदमी—अचानक सब पर विराम लग गया. किसी के मिलने का मन है तो पहुंच गए उसके घर, कि चलो आज साथ मिलकर लंच या डिनर करते हैं. लॉकडाउन खुल गया, पर संक्रमण घूमता रहा और अब घर से बाहर निकलने से पहले कई बार सोचना पड़ता है, जरूरी है तभी कदम दरवाजा पार करते हैं. घबराहट, डर और घर में बैठे रहकर केवल आभासी दुनिया से जुड़े रहने से सबसे ज्यादा असर मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ा है.

मानसिक सेहत बिगड़ी

कोरोना वायरस के इस दौर में लोग मानसिक रूप से ज्यादा परेशान हुए हैं. जितना जरूरी शारीरिक स्वास्थ्य का ख्याल रखना है, उतना ही जरूरी है मानसिक सेहत को दुरुस्त रखना. इससे इंसान के सोचने, महसूस करने और काम करने की ताकत प्रभावित होती है. तनाव और अवसाद जब घेर ले तो उसका सीधा असर रिश्ते और फैसले लेने की क्षमता पर पड़ता है. जो पहले से ही मानसिक रूप से बीमार थे, 

कोरोना वायरस के बढ़ते संकट के इस दौर में उन लोगों को अधिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. लेकिन जो मानसिक रूप से स्वस्थ थे, वे भी अपनी सेहत खोने लगे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह है घर की चारदीवारी में कैद हो जाना और बाहर से सारे संपर्क टूट जाना, बेशक वीडियो कॉल पर आप जिससे चाहे बात कर सकते हैं, पर जो मजा साथ बैठकर बात कर अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में आता है, वह मोबाइल या लैपटॉप पर अंगुली चलाकर कैसे मिल सकता है.

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मिलना-जुलना सपना हो गया

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. मानसिक तौर पर स्वस्थ रहने के लिए लोगों से मिलना-जुलना जरूरी होता है. लेकिन कोरोना ने जैसे इस पर प्रतिबंध लगा दिया है. सारी मस्ती और रौनक छीन ली है. आयोजन व समारोहों में, जहां जाकर कितने सारे लोगों से मिलने का मौका मिल जाता था और एक पारिवारिक या दोस्ताना माहौल निर्मित हो जाने के कारण ढेर सारी खुशियों के पल समेटे जब लोग घर लौटा करते थे तो कितने दिनों तक उन बातों की पोटलियां खेलकर बैठ जाया करते थे जो वहां उन्होंने साझा की थीं या जी थीं. अब तो गिनती कर लोगों को बुलाने की बाध्यता है, फिर मास्क और सेनेटाइज करते रहने के बीच सारा बिंदासपन एक कोने में दुबक कर बैठ जाता है. दूर-दूर बैठकर और हाथ हिलाकर ही कुछ कहा, कुछ सुना जाता है. अपनी सुरक्षा के कारण दूसरे लोगों से खुलकर न मिल पाने की पीड़ा हर किसी को त्रस्त कर रही है. 

कैसे हो रहा है असर

 ब्रिटिश जर्नल लैंसेट साइकेट्री में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, कोरोना वायरस न सिर्फ मनुष्य को शारीरिक रूप से कमजोर कर रहा है बल्कि मानसिक तौर पर भी इस महामारी के कई सारे नकारात्मक प्रभाव देखने को मिल रहे हैं. एक अन्य शोध में यह पाया गया है कि कुछ लोगों की तंत्रिकाओं पर प्रभाव पड़ा है. मानसिक सेहत में जब लंबे समय तक सुधार नहीं हो पाता है तो वह मस्तिष्क को प्रभावित करती है. न केवल बुजुर्ग, बल्कि अकेले रहने वाले लोग, वयस्क, युगल, पुरुष, महिलाओं, बच्चों, यानी हर उम्र के लोगों को मानसिक सेहत से जूझना पड़ रहा है. 

दैनिक रूटीन से कट जाने और घर में बंद रहने की वजह से दिमाग को मिलने वाले संकेत बंद हो जाते हैं. यह संकेत घर के बाहर के वातावरण और बाहरी कारकों से मिलते हैं लेकिन लगातार घर में रहने से यह बंद हो जाता है. इन सब कारणों से अवसाद और चिंता के बढ़े मामले देखने को मिल रहे हैं. इसे सामूहिक तनाव भी कह सकते हैं. लोग अपने बच्चे के भविष्य को लेकर असमंजस में हैं,  किसी को नौकरी छूट जाने का तनाव है तो किसी को वित्तीय स्थिति ठीक करने का तनाव, घर पर बहुत समय रहने पर उकताहट होने वालों को बाहर निकलकर आजादी से न घूम पाने का तनाव है. 

 मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि इसे जीनोफोबिया‘ का शिकार होना कहा जा सकता है. इसमें लोग किसी व्यक्ति के सामने आने पर घबराने लगते हैं, बात करने से डरते हैं, आंख में आंख डालकर बात नहीं कर पाते. ऐसा कैमरे में देखने की आदत के कारण हो रहा है. डिजिटल दुनिया पर निर्भरता के कारण उपजी इस परेशानी को मनोवैज्ञानिक भाषा में जोनोफोबियायानी फीयर ऑफ ह्यूमन अथवा इंसानों से डर कहा जाता है. दिमाग चीजों को स्वीकार नहीं कर पा रहा और उसे लगने लगा है कि वीडियो पर बात करके वह सहज महसूस कर पाएगा, पर हो इसके विपरीत रहा है. 

मिलें लोगों से

सुरक्षा के सारे नियमों का ध्यान रखते हुए अपने मानसिक स्वास्थ्य को सही खुराक देने के लिए बेशक कम मिलें, पर लोगों से मिलें अवश्य. बेशक दूरी बनाकर मिलना पड़े, बेशक मास्क पहनना पड़े, पर मिलें अवश्य. घर बैठे-बैठे होने वाली ऊब कहीं मुसीबत न बन जाए. सोशल मीडिया या इंटरनेट आपको बोर नहीं करता बल्कि यह अकसर बोरियत या वास्तविक जिंदगी से पलायन का भाव होता है जो इंटरनेट की ओर धकेल देता है. इस समय बोरियत की शिकायत आम हो गई है. यदि आप भी खुशी की तलाश या जीवन के बे-अर्थ हो जाने के एहसास के कारण डिजिटल साधनों पर अंधाधुंध समय बिता रहे हैं तो यह मुसीबत बन सकता है. जब महज मनोरंजन या बोरियत भगाने के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं तो एक और परेशानी है. इस समय जरूरत है उन लोगों से मिलें जिन्हें आपकी परवाह है, जो आपसे प्यार करते हैं या जिनके साथ समय बिताने से आपको खुशी और राहत महसूस होती है. 

जरूरत है कि फिर से लोगों से जुड़ें, सामाजिक दायरा छोटा ही रखें, पर आभासी दुनिया से अलग स्वयं उनसे जाकर मिलें जरूर. आप खुद में बदलाव महसूस करेंगे, मानो बरसों का कोई बोझ उतर गया हो. खिलखिलाहटें और हंसी आपमें एक नई ऊर्जा भर जाएगी और तनाव जाता महसूस होगा. मानसिक तनाव से निकलने के लिए शराब और नशीली दवाओं का उपयोग या नींद की दवा लेने से कहीं बेहतर है कि उनसे मिलें जिनके साथ वक्त गुजारना आप में जीने की ललक पैदा करता है. 

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मानसिक स्वास्थ्य पूरी तरह से भावनात्मक आयाम पर टिका होता है. यदि हमारा सामाजिक जीवन दुरुस्त है तो हम मानसिक रूप से स्वस्थ होंगे ही और अपने संबंधों को आनंद से जी पाएंगे. तब जटिल स्थितियों का मुकाबला करने की भी शक्ति स्वतः आ जाती है. कोरोना है, रहेगा भी अभी लंबे समय तक, उसे लेकर अवसाद में जीने के बजाय खुद को फिर से तैयार करें ताकि सामाजिक जीवन जी सकें. अपने प्रियजनों, दोस्तों, रिश्तेदारों व परिचितों से मिलें, और अपने मानसिक स्वास्थ्य को दवाइयों का मोहताज बनाने के बजाय, मन की बातें शेयर कर, खुल कर हंस कर, अपने दुख-सुख बांटते हुए, कोरोना को चुनौती देने के लिए तत्पर हो जाएं. 

सुरक्षित शारीरिक संबंध बनाने के बाद भी दर्द का कारण क्या है?

सवाल

मैं 23 साल की युवती हूं. कुछ दिनों पहले अपने बौयफ्रैंड के साथ शारीरिक संबंध स्थापित किया. हालांकि इस दौरान बौयफ्रैंड ने कंडोम का प्रयोग कर सैक्स किया पर दूसरे दिन सुबह मेरे यूटरस में दर्द होने लगा और मु झे बुखार भी हो गया. अत: बताएं कि सुरक्षित संबंध बनाने के बाद भी दर्द क्यों हुआ?

जवाब-

सैक्स संबंध हमेशा सुरक्षित ही बनाना चाहिए. सैक्स क्रिया में कंडोम एक सरल व सहज गर्भनिरोधक है, जिस से अनचाहे गर्भधारण से बचा जा सकता है.

यूटरस में दर्द और बुखार होने का सुरक्षित सैक्स संबंध बनाने से कोई वास्ता नहीं है. संभव है कि आप के साथ कोई अंदरूनी वजह रही होगी. बेहतर होगा कि आप अपने डाक्टर से मिल कर सलाह लें.

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महान मनौवेज्ञानिक सिगमंड फ्रौयेड ने कहा था, ‘कोई महिला-पुरुष जब आपस में शारीरिक सम्बन्ध बनाते हैं, तो उन दोनों के दिमाग में 2 और व्यक्ति मौजूद रहते हैं. जो उसी लम्हे में हमबिस्तर हो रहे होते हैं.’ इस बात को पढ़ते हुए मैं अचरज में था कि क्या ऐसा सच में होता है? अगर होता है तो ऐसा क्यों होता है?

यह साल था 2007. मैं उस वक्त 15 साल का टीनेज था और 9वीं क्लास में पढ़ रहा था. मुझे आज भी याद है, पहली बार क्लास में मेराएक क्लासमैटएक ‘पीले साहित्य की किताब’ ले कर आया था. जिस के कवर पेज पर एक जवान नग्न महिला की तस्वीर थी. किसी महिला को इस तरह नग्न देखना शायद मेरा पहला अनुभव था. जिसे देख कर उत्तेजना के साथ घबराहट भी होने लगी थी. आज के नवयुवक पीला साहित्य से परिचित नहीं हों तो उन्हें बता दूं यह आज के विसुअल पोर्न का प्रिंटेड वर्जन था.

पूरी खबर पढ़ने के लिए- आपकी पोर्न यात्रा में रुकावट के लिए खेद है…

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

REVIEW: युवा पीढ़ी की आवाज को गहराई से प्रतिध्वनित करती वेब सीरीज ‘एक झूठी लव स्टोरी’

रेटिंगः तीन स्टार

निर्माताःप्रणव आदर्श,शैलजा केजरीवाल,अली ए रिजवी,श्रेयशी मुखर्जी,मिस वाह शफीक

निर्देशकःमेहरीन जब्बर

कलाकारःफुरकान कुरेशी,मोहम्मद अहमद,किरण हक,मोदिहा इमाम, बिलाल अब्बास खान,फवाद खान, अहमद जेब,किंजा रज्जाक, मरियम सलीम व अन्य

अवधिः 18 एपिसोड ,लगभग साढ़े नौ घंटे

ओटीटी प्लेटफार्मः 30 अक्टूबर से ‘‘जी 5’’पर

कुछ वर्ष पहले जीटीवी ने  एक मुहीम के तहत पाकिस्तानी टीवी सीरियलों को ‘जिंदगी’के तहत प्रसारित करना शुरू किया था,जिसे काफी पसंद किया गया था. अब ‘जिंदगी’ के ही तहत मौलिक पाकिस्तानी वेब सीरीज को ‘जी5’ प्रसारित किया जा रहा है. कुछ समय पहले ‘‘जी 5’’पर ‘‘चुड़ैल’’ को जबरदस्त सफलता मिली थी. अब ‘जिंदगी’ एक दूसरी मौलिक लंबी वेब सीरीज ‘‘एक झूठी लव स्टोरी’’ लेकर आया है,जिसका प्रसारण 30 अक्टूबर से ‘‘जी 5’’पर शुरू हुआ है.  26 से 47 मिनट की अवधि वाले  18 एपीसोड की यह वेब सीरीज लगभग साढ़े नौ घंटे की है. जिसका लेखन ‘जिंदगी गुलजार है’ फेम उमरा अहमद ने किया है और इसकी निर्देशक महरीन जब्बार हैं. इस दिल दहला लेने वाली खूबसूरत प्रेम कहानी को दो पाकिस्तानी कलाकारों बिलाल अब्बास खान और मदीहा इमाम ने जीवंतता प्रदान की है.

कहानीः

‘‘एक झूठी लव स्टोरी’’ प्यार और एक आदर्श साथी की तलाश में सलमा(मदीहा इमाम)और सोहेल(बिलाल अब्बास खान )  की कहानी है. कहानी पाकिस्तान में रह रहे शहजाद सिद्दिकी(मो. अहमद)के परिवार की है,जिसमें शहजाद की पत्नी नुसरत जहां के अलावा तीन बेटियां शबाना(किरण हक ) ,शाजिया(मरियम सलीम)व सलमा(मदीहा इमाम)तथा एक बेटा सलाउद्दीन (फुरकान कुरेशी)हैं. शहजाद एक कंपनी में नौकरी कर रहे हैं. घर के अंदर नुसरत जहां का ही लता है. उन्हे अपने परिवार के मयार की चिंता है. वह अपनी लड़कियों के लिए सी हिसाब से लड़के तलाश कर रही हैं. वह चाहती हैं कि उनकी बेटियों की शादी पाकिस्तान की बजाय पाकिस्तानी मूल के अमरीका या इंग्लैंड में बसे उच्च शिक्षित व लखपति लड़कों से हो. इसी के चलते एक कालेज में शिक्षक शबाना 34 वर्ष,स्कूल शिक्षक शाजिया 30 वर्ष,24 वर्ष की सलमा बी ए की पढ़ाई कर रही है. जबकि सलाउद्दीन एक बैंक में एकाउंटेंट है. कालेज के प्रोफेसर जहांगीर शायरी लिखते हैं और वह शबाना के साथ रिश्ते जोड़ना चाहते हैं,मगर शबाना अपनी मां की सोच के अनुरूप उन्हे महत्व नही देती. उधर रिश्ते का भाई तंजीम हर दिन शाजिया के घर फल लेकर आता है,उसे शाजिया से प्यार है, मगर शाजिया चुप हैं. सलाउद्दीन की बैंकसहकर्मी नसीम उस पर डोरा डाल रही हैं. इधर बिजली की समस्या से निपटने के लिए एक दिन सलाउद्दीन मोहल्ले के ही सोहेल( बिलाल अब्बास खान)को यूएसपी लगाने के लिए लेकर आता है. उसके बाद सोहेल के परिवार के साथ नुसरतजहां संबंध बना लेती है,जिससे सोहेल की मां से बेटियों के लिए रिश्ते खोजने में मदद मिल जाए. सोहेल व सलमा दोनो को आदर्श साथ की तलाश है.

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इधर सलमा ने फेसबुक पर अपनी दोस्त की कजिन नतालिया ( किंजा रज्जक) की फेक आई डी बना रखी है. जबकि सोहेल ने फेशबुक पर अब अमरीका में रह रहे अपने दोस्त नोफिल तबानी(अहमद जेब)की फेक आई डी बना रखी है. अब सलमा,नतालिया के नाम से और सोहेल,नोफिल के नाम से एक दूसरे के फेशबुक फ्रेंड बन जाते हैं. धीरे धीरे दोनों में प्रेम हो जाता है. अंततःयह झूठी प्रेम कहानी का अंत हो जाता है और परिवार की तरफ से मजबूर किए जाने पर सलमा व सोहेल की शादी हो जाती है. दोनों हनीमून मून जाते हैं. अचानक एक दिन नतालिया व नोफिल की शादी का निमंत्रण मिलता है. दोनों का पुराना प्यार जीवंत हो जाता है और दोनो अलग होने फैसला कर लेते हैं. एक माह बाद पता चलता है कि नतालिया व नोफिल में तलाक का मुकदमा शुरू हो गया. तब नोफिल व नतालिया के स्वभाव का सच सामने आता है. सलमा व सोहेल अपनी गलती स्वीकार एक हो जाते हैं. शाजिया की शादी तंजीम से ,सलाउद्दीन की शादी नसीम से हो जाती है. जबकि शबाना स्कॉलरशिप मिल जाने के कारण लंदन पीएचडी करने चली जाती है.

लेखन व निर्देशनः

निर्देशक मेहरीन जब्बार सम्मोहक व विचित्र चरित्रों के साथ एक हल्की-फुल्की पारिवारिक कहानी लेकर आयी हैं, जिसमें विभिन्न प्रकार के रिश्तों का आकर्षक अन्वेषण भी हैं. यूं भी भारत हो या पाकिस्तान दोनों ही देशो में मध्यमवर्गीय परिवारों की समस्याएं व उनकी सोच ज्यों की त्यों है. यही वजह है कि इस वेब सीरीज के साथ हर दर्शक दिल के साथ जुड़ जाता है. दर्शक इसके किरदारों के साथ दुखी होता है और खुश भी होता है. लेखक निर्देशक बधाई के पात्र हैं कि वह मध्यमवर्गीय परिवार के अंदर घटित होने वाली छोटी से छोटी बात,भावनाओं आदि का इसमें यथार्थ परक चित्रण किया है. मानवीय भावनाओं का जिस तरह से चित्रण किया गया है,उससे लगता है कि यह लेखक व निर्देशक का खुद का भोगा हुआ सच हो. फेसबुक सोशल मीडिया के चलते गढ़े जा रहे झूठ को भी बेपर्दा किया गया है. इतना ही नही सलमा व सोहेल की प्रेम कहानी को पूरी तरह से जीवंतता प्रदान की गयी है. यह वेब सीरीज उस युवा पीढ़ी की आवाज को गहराई से प्रतिध्वनित करने के साथ साथ उन्हे साफ साफ संदेश देती है,जो कि एक आइडियल साथी और एक आदर्श जीवन साथी के साथ जीना चाहते हैं. इसमें जीवन की सादगी, रोजमर्रा के परिवार, पारिवारिक बंधन आदि का सटीक चित्रण है. मगर इसकी लंबाई ज्यादा हो गयी है,इसे एडीटिंग टेबल पर कसा जा सकता था.

अभिनयः

सोहेल के किरदार में बिलाल अब्बास खान और सलमा के किरदार में मोदिहा इमाम ने जानदार अभिनय किया है. दोनों के बीच की केमिस्ट्री शानदार है. फुरकान कुरेशी,मोहम्मद अहमद, किरण हक, फवाद खान, अहमद जेब,किंजा रज्जाक, मरियम सलीम भी अपने अपने किरदार को जीवंतता प्रदान की है.

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