Skin Care : साबुन से चेहरा धोने से मेरा फेस ड्राई हो गया है… क्या करूंं?

Skin Care :  अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल-

मैं काफी समय से साबुन से चेहरा धोती हूं, पर इधर कुछ दिनों से चेहरे पर रुखापन दिखाई देने लगा है. मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब-

शरीर के अन्य हिस्सों की अपेक्षा चेहरे की त्वचा बहुत नाजुक होती है, इसलिए अपनी त्वचा की जरूरत और किस्म के मुताबिक फेस वाश का इस्तेमाल करें. आप घरेलू उपचार के तौर पर यह अपना सकती हैं- एक बाउल में 4 बड़े चम्मच बेसन और 1 छोटा चम्मच ताजा मलाई मिलाएं. गाढ़ा पेस्ट तैयार कर उसे त्वचा पर लगाएं. 20 मिनट बाद चेहरे को कुनकुने पानी से धो लें.

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औयली स्किन हो या ड्राई स्किन फेसवौश की जरूरत हर किसी को पड़ती है. आजकल के पौल्यूशन में फेस न धोयें तो यह स्किन को नुकसान पहुंचाता है और अगर किसी नौर्मल साबुन से फेस धोएं तो यह स्किन को डैमेज भी कर सकता है. इसलिए फेस के लिए फेसवौश जरूरी है. पर मार्केट में कई तरह के फेसवौश आ गए हैं, जो स्किन के लिए तो अच्छे होते हैं, लेकिन महंगे होते हैं. आज हम आपको कुछ सस्ते और अच्छे फेसवौश के बारे में बताएंगे जिसे आप मार्केट या औनलाइन खरीद सकते हैं.

1. हिमालया मौइस्चराइजिंग एलोवेरा फेसवौश

एंजाइम, पौलीसेकेराइड और पोषक तत्वों से भरपूर, यह फेसवौश स्किन को इफेक्टिव रूप से साफ, पोषण और मौइस्चराइज करने का काम करता है. मार्केट में 200 मि.ली. का हिमालय मौइस्चराइजिंग एलोवेरा फेस वौश आपको 128 रूपए में मिल जाएगा.

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Pots and Pans Unveils the Ultimate in Culinary Innovation

Introducing the Meyer Presta Tri-Ply Pressure Cooker Collection

Pots and Pans, India’s premier destination for international-grade cookware, proudly introduces a bold new chapter in Indian kitchens, the Meyer Presta Tri-Ply Pressure Cooker Collection.

This is a reinvention of a staple found in nearly every Indian home. As India’s pressure cooker market is poised to grow from USD 338.3 million in 2024 to USD 611.3 million by 2031, innovation in this space is timely and transformative.

pressure cooker

A Kitchen Essential, Reinvented

In Indian households, the pressure cooker is a symbol of tradition, speed, and everyday convenience. From aromatic dals to one-pot biryanis, it’s the silent workhorse behind countless family meals.

The Meyer Presta Collection elevates this beloved classic with:

  • Tri-ply stainless steel for uniform heat distribution
  • Three times the strength of conventional cookware
  • A sleek, modern aesthetic that complements every kitchen

Performance Meets Safety and Style

Every detail of the Presta Collection is engineered for elegance, efficiency, and everyday reliability. This isn’t just cookware — it’s a statement of thoughtful design.

Key Features:

  • ISI Certification for trusted safety
  • A traditional whistle combined with an advanced safety valve
  • GRS (Gasket Release System) for controlled steam release
  • Step-lid design with vapour storage — retains flavour, prevents spillage
  • Cool-touch phenolic handles for safe handling
  • Smooth-locking mechanism for intuitive use
  • Internal measurement markings for precise cooking
  • Compatible with all cooktops – gas, induction, ceramic, and electric

Sized for Every Household

Whether you’re cooking for one or feeding a full table, the Meyer Presta adapts to your needs:

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Cook With Confidence, Cook With Heart

The Meyer Presta Pressure Cooker brings together heritage techniques and modern demands. It’s a tribute to the meals that bring people together, and a promise of safe, stylish, and soulful cooking.

In every whistle lies a story. With Meyer Presta, make it a story worth sharing.

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Pahalgam Attack के बाद इन पाकिस्तानी ऐक्टरों के साथ क्या हुआ, यहां जानिए

Pahalgam Attack 2025 : जम्मू कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल, 2025 को निहत्थे पर्यटकों पर आतंकवादियों द्वारा अचानक हुए हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. पर्यटकों में कई मासूम लोगों की मौत से पूरे भारत की जनता सकते में आ गई, क्योंकि यह हमला पाकिस्तानी आतंकवादियों की वजह से अमल में आया था. इसलिए एक बार फिर हिंदुस्तान पाकिस्तान के बीच न सिर्फ रिश्ते खराब हो गए बल्कि काफी समय के लिए दूरियां भी आ गईं.

अब इस का असर फिल्म इंडस्ट्री पर भी पड़ा है. पाकिस्तान के कई ऐक्टर्स जो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े हुए हैं और हिंदी फिल्मों में काम कर भी रहे हैं, इस हादसे के बाद उन पर सब से ज्यादा बुरा असर पड़ा क्योंकि सारे पाकिस्तानी ऐक्टरों को भारत में काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया. इस के अलावा गरमाते माहौल के चलते बौलीवुड के कई मशहूर सितारों ने न सिर्फ अपने शोज कैंसिल किए, बल्कि रिलीज होने वाली फिल्मों को भी आगे बढ़ा दिया.

पाकिस्तानी ऐक्टरों पर बैन

22 अप्रैल, 2025 को पहलगाम अटैक का सब से सीधा और बुरा असर पाकिस्तानी ऐक्टरों पर पड़ा और वहां के सारे ऐक्टरों को बौलीवुड इंडस्ट्री में बैन कर दिया गया. इतना ही नहीं, पाकिस्तानी ऐक्टरों के इंस्टाग्राम अकाउंट भी भारत में बैन कर दिए गए जिस के चलते वे सभी ऐक्टर्स जो बौलीवुड की हिंदी फिल्मों में काम करने की कोशिश में जुटे थे उन सभी पर पाकिस्तान कलाकारों की उम्मीदों पर पानी फिर गया.

आलिया भट्ट कहलाई जाने वाली पाकिस्तानी ऐक्ट्रैस हानिया अमीर जो दिलजीत दोसांझ की पंजाबी फिल्म ‘सरदार जी 3’ में खास भूमिका निभाने वाली थीं, अब वे इस फिल्म को नहीं कर पाएंगी.

इस के अलावा हानिया अमीर भारत में कदम जमाने के लिए अपनी पीआर टीम के जरीए वरुण धवन के साथ फोटो सेशन, बादशाह रैपर के साथ खास रिश्तों की चर्चा कर के हिंदी फिल्मों में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही थीं.

इतना ही नहीं, हानिया अमीर ने इंडियन ड्रैस और बिंदी लगा कर इंस्टाग्राम में कई सारी रील्स हिंदी फिल्मी गानों पर भी बनाई थीं, ताकि वे हिंदी फिल्मों में काम करने की शुरुआत कर सकें.

आगे क्या होगा

हानिया अमीर के अलावा पाकिस्तान के कई ऐक्टर्स व सिंगर्स जो पहले भी फिल्मों से जुड़ चुके हैं जैसे फवाद खान, आतिफ असलम, माहिरा खान, राहत फतेह अली खान आदि सभी कलाकारों पर हिंदी फिल्मों में काम करने पर रोक लगा दी गई है.

पाकिस्तानी ऐक्टर फवाद खान और अभिनेत्री वाणी कपूर की फिल्म अबीर गुलाल जो 9 मई, 2025 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली थी, वह अब पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत में नहीं रिलीज होगी.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब 2016 में उरी अटैक के बाद भी पाकिस्तानी ऐक्टरों पर बैन लगाया गया था और काफी सालों तक यह बैन पाकिस्तानी ऐक्टरों पर बरकरार था. लेकिन बाद में पाकिस्तानी ऐक्टर्स धीरेधीरे फिर से हिंदी फिल्मों में आने लगे थे.

लेकिन इस बार मामला कुछ ज्यादा ही खराब हो चुका है. इस बार बौलीवुड ऐक्टरों ने भी जैसे सलमान, शाहरुख, अक्षय कुमार, करीना कपूर ने ट्वीट कर के इस आतंकी हमले की निंदा की है और अपना गुस्सा जाहिर किया. इस के बाद अब लग रहा है कि पाकिस्तानी ऐक्टरों का बौलीवुड इंडस्ट्री में काम करना आसान नहीं होगा.

बुरे दौर में बौलीवुड फिल्म इंडस्ट्री

इस के अलावा हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के हालात भी कुछ खास ठीक नहीं चल रहे हैं. ज्यादातर फिल्मों को असफलता का मुंह देखना पड़ रहा है. ऐसे में, भारत पाकिस्तान के युद्ध की खबरों ने दर्शकों को और भी ज्यादा घर में रुकने पर मजबूर कर दिया.

हालांकि अब हालत काफी हद तक कंट्रोल में है लेकिन शोक का माहौल और देश पर आए खतरे के चलते फिल्म इंडस्ट्री अपने कदम पीछे ले रही है. जहां एक ओर कई कलाकारों ने अपने विदेशी टूर कैंसिल किए हैं, वहीं दूसरी ओर जल्द ही रिलीज होने वाली हिंदी फिल्मों में भी फेरबदल होना शुरू हो गया है.

राजकुमार राव की फिल्म ‘भूलचूक माफ’ जिस का प्रमोशन काफी समय से चल रहा है, यह फिल्म जो एक कौमेडी और पारिवारिक फिल्म है, 9 मई, 2025 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली थी. लेकिन पहलगाम में आतंकी हमले के बाद अचानक ही इस फिल्म को ओटीटी पर रिलीज करने का फैसला ले लिया गया, जिस के चलते फिल्म के निर्माता ने घोषणा की कि ‘भूलचूक माफ’ अब 16 मई को सीधे ओटीटी पर ही रिलीज होगी.

लेकिन पीवीआर आइनौक्स द्वारा ऐग्रीमैंट उल्लंघन का मुकदमा करने के बाद और ‘भूलचूक माफ’ के मेकर्स द्वारा मुकदमा हारने के बाद अब फिल्म को 23 मई को फिर से सिनेमाघरों में ही रिलीज किया जाएगा.

वहीं शाहरुख खान अभिनीत और आर्यन खान निर्देशित 6 एपिसोड की वैब सीरीज ‘स्टारडम’ जो नैटफ्लिक्स पर आने वाली है फिलहाल स्टारडम वैब सीरीज नैटफ्लिक्स पर कब रिलीज होगी इस की कोई घोषणा नहीं है क्योंकि नैटफ्लिक्स ने भी आतंकी हमले के बाद अपने कुछ वैब सीरीज की रिलीज डेट को आगे बढ़ा दिया है. ऐसी स्थिति में शाहरुख खान अभिनीत और आर्यन खान निर्देशित स्टारडम नैटफ्लिक्स पर कब रिलीज होगी फिलहाल इस की कोई जानकारी नहीं है.

शाहरुख खान की फिल्म ‘किंग’ की शूटिंग शुरू होने वाली थी वह भी अब कुछ समय के लिए रुक गई है. सलमान खान की फिल्म ‘बजरंगी भाईजान 2’ जिस की शूटिंग जल्द ही शुरू होने वाली थी, वह भी अब कुछ समय के लिए रोक दी गई है.

विदेशी टूर भी स्थगित

सलमान खान का यूके टूर, जो बौलीवुड के कई कलाकारों के साथ होने वाला था और यूके के कई स्थानों पर सलमान बौलीवुड सितारों के साथ शो परफौर्म करने वाले थे, फिलहाल कैंसिल है.

भारत पाकिस्तान टैंशन की वजह से शाहरुख खान ने लंदन में होने वाले सब से बड़े इवैंट को कैंसिल कर दिया. लंदन के फेमस लेजिस्टर स्क्वायर में शाहरुख खान और काजोल की फेमस फिल्म ‘दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे’ के पोज के स्टैच्यू का अनावरण होना था, फिलहाल कैंसिल है.

फ्लौप फिल्मों की लंबी कतार के चलते बौलीवुड पहले से ही बुरे दौर से गुजर रहा है, ऐसे में कश्मीर में पाकिस्तानी द्वारा हमला बौलीवुड के लिए और नुकसानदेह साबित हुआ है.

Menstrual Hygiene : पीरियड किट में हाइजीन के लिए क्या रखें, जरूर जानें

Menstrual Hygiene :  पीरियड्स के दौरान साफसफाई बनाए रखने की बहुत जरूरत होती है, क्योंकि इस दौरान की गई लापरवाही स्त्रियों में इन्फैक्शन, जैनिटल पार्ट से जुड़ी बीमारी होने का खतरा रहता है, जिस का असर बाद में सेहत पर पड़ता है.

ऐसा देखा गया है कि जब लड़कियां रीप्रोडकटिव एज में आती हैं, तो उन्हें पीरियड्स से जुड़ी हाइजीन के बारे में बहुत कम जानकारी होती है, क्योंकि घर की वयस्क स्त्रियां भी खुल कर उन से बात नहीं करतीं, क्योंकि वे कई सारी मान्यताएं और भ्रम की शिकार होती हैं और छिपछिप कर बात करने में विश्वास रखती हैं, जिस से लड़कियां कई जरूरी बातों से अनभिज्ञ रह जाती हैं. इस से कम उम्र में ही वे वैजाइनल इन्फैक्शन और यूटरस संबंधी बीमारियों से घिर जाती हैं. कई बार ये बीमारियां गंभीर रूप भी ले लेती हैं, जिस का असर गर्भाशय पर पड़ता है.

क्या कहते हैं आंकड़े

नैशनल फैमिली हैल्थ के अनुसार, भारत में 15 से 24 साल की उम्र वाली लड़कियां 50% स्वच्छता के मामले पीछे हैं और अभी भी वे कपड़ों का प्रयोग पीरियड्स के दौरान करती हैं जबकि ऐक्सपर्ट हमेशा इन दिनों हाइजीन बनाए रखने की बात करते हैं, जिसे लड़कियों द्वारा नजरअंदाज करना कई बार भरी पड़ सकता है.

बदली है सोच

आज की अधिकतर लड़कियां स्टडी करने वाली या वर्किंग हैं. महीने के इन दिनों में वे छुट्टी ले कर घर बैठ नहीं सकतीं और न ही वे बैठना चाहती हैं. ऐसे में उन्हें काम के साथसाथ उन दिनों की साफसफाई और हाइजीन पर भी ध्यान देना पड़ता है, ताकि इस की कमी से वे किसी प्रकार की बीमारी की शिकार न हो जाएं.

ऐसे में पीरियड्स के दौरान साफसफाई के अलावा एक पीरियड किट भी साथ में रख लेने की खास आवश्यकता होती है, जिसे जान लेना जरूरी है. इसे वे घर पर खुद तैयार कर सकती हैं या औनलाइन शौपिंग भी कर सकती हैं. कुछ सुझाव निम्न हैं :

● आजकल सैनिटरी पैड, टैंपोन या मैंस्ट्रुअल कप रक्त को अवशोषित या इकट्ठा करने के लिए होते हैं, जिसे लड़कियां आसानी से प्रयोग कर सकती है. ये बाजार में अलगअलग प्रकार के मिलते हैं, जिन्हें लड़कियां अपने ब्लड फ्लो के अनुसार चुन सकती हैं. ऐक्स्ट्रा एक जोड़ी पैड, टैंपोन या मैंस्ट्रुअल कप अपने पास किट में अवश्य रखें, ताकि आप जरूरत के अनुसार इसे बदल सकें.

● अगर आप पीरियड्स के दौरान बाहर सफर कर रही हैं या काम पर जा रही हैं, तो आप को एक अतिरिक्‍त जोड़ी अंडरवियर जरूर रखनी चाहिए, अगर आप की अंडरवियर में दाग लग जाता है, तो आप इसे बदल सकती हैं. आप को बता दें कि गंदी और दाग लगी अंडरवियर को पहने रखना हाइजीनिक नहीं है.

● इन दिनों हाथ पोंछने के लिए, खासकर अगर स्नान की सुविधा नहीं है, तो एक छोटा तौलिया अपने पास अवश्य रखें. इस के साथसाथ एक फ्लैशलाइट अपने पास रखें, ताकि कम रोशनी में आप टौयलेट की हाइजीन को देखने की समस्या से बच सकें.

● हाथों को साफ करने के लिए, खासकर जब साबुन और पानी उपलब्ध न हो, तो एक सैनिटाइजर अपने पास रखें.

● सैनिटरी पैड और टैंपोन को सुरक्षित तरीके से डिस्पोज औफ किया जाना चाहिए. इस के लिए एक जोड़ी पैड के रैपर या टौयलेट पेपर अपने किट में रखें, ताकि यूज्ड पैड को एक पैड रैपर या टौयलेट पेपर में लपेट कर डस्टबिन में फेंक दें, जो इस की गंध को रोकने और बैक्टीरिया को फैलने से रोकने में मदद करता है.

● कुछ लड़कियों को पीरियड्स के दौरान पेट के निचले हिस्से में दर्द होता है. ऐंठन और दर्द को कम करने के लिए अपने पास दर्द निवारक दवाइयां डाक्टर की सलाह से अवश्य रख लें.

रैडीमेड मैंस्ट्रुअल किट

आजकल मार्केट में या औनलाइन कई प्रकार के रैडीमेड मैंस्ट्रुअल हाइजीन केयर किट मिल जाते हैं, जिसे लड़कियां आसानी से खरीद कर रख सकती हैं, जिस में 100 फीसदी डिस्पोजेबल सौफ्ट और्गेनिक 12 कौटन पैड्स, रियूजेबल पैड्स, 10 टैंपोन, जिस में 5 रैगुलर और 5 सुपर ऐबजौर्ब करने वाली टैंपोन और मैंस्ट्रुअल कप होते हैं. हर किट में ऐक्स्ट्रा डिस्पोजेबल पैड्स भी होते हैं ताकि रियूजेबल पैड्स को यूज करने में हो रही परेशानियों से बचा जा सकें. इस के अलावा हैंड सैनिटाइजर, 4 ट्रेश बैग्स, वेट टिशू पैकेट औफ 10, बाथ साइज सोप, वन पैक औफ फ्लशेबल वाइप्स, 6 फ्रैगरेंस फ्री लाऊंड्री शीट्स, जिसे जिपलौग बैग में रखा गया हो आदि मिलते हैं, जो किसी भी लड़की के लिए पीरियड के दौरान अच्छी और हाइजीन को बनाए रखने में सहायक होती हैं.

सिलाई शौक भी ऐक्सरसाइज भी, जानें इसके फायदे

Tailoring Benefits : हाथों से सिलाई करना एक अच्छी स्किल है जिसे सीख कर आप भी इस कला में निपुण हो सकती हैं. वैसे भी कढ़ाई, बुनाई और सिलाई भारत की पारंपरिक कलाएं हैं, जिस में अधिकतर लड़कियां निपुण होती थीं. कुछ को तो बचपन से ही सिलाई, कढ़ाई व बुनाई की शिक्षा दी जाती थी, तो कुछ अपने शौक से सीखती थीं, जहां वे अपने कपड़ों को उस समय के फैशन व ट्रैंड को देखते हुए खुद से डिजाइन करती थीं.

हालांकि अब लोग रैडीमेड कपड़े ज्यादा खरीदने लगे हैं क्योंकि वे ज्यादा फैशनेबल होते हैं और उन की फिटिंग भी ज्यादा अच्छी होती है. लेकिन आजकल रील्स बनाने के इस दौर में लोग अपनी पुरानी साड़ी और लहंगों का मेकओवर खुद से कर एक नई ड्रैस तैयार कर लेते हैं, जिसे देख हर हाउसवाइफ का मन मचल जाता है कि काश, हमें भी सिलाई आती तो हम भी अपनी पुरानी ड्रैस से नई ड्रैस तैयार कर लेते.

सिलाई टाइमपास करने का भी एक अच्छा तरीका है. बस, सुई और धागे से आप कपड़े के 2 पीस को एकसाथ सिल सकती हैं, छेद को पैच कर सकती हैं और अलगअलग पैटर्न और यूनिक डिजाइंस भी तैयार कर सकती हैं. इसे सीखना बहुत आसान है और मजेदार भी. इसे हरकोई सीख सकता है.

इस के आलावा भी सिलाई करने के बहुत से फायदे हैं जैसेकि सिलाई करना एक ऐक्सरसाइज भी है. सिलाई के दौरान हाथों और उंगलियों की गति को नियंत्रित करना, धागे को खींचना और सुई को चलाना एक प्रकार की ऐक्सरसाइज है जो हाथों और कलाई की मसल्स को मजबूत बनाता है. इसलिए आइए, जानें सिलाई का काम और इस के फायदे :

सिलाई करने से कई लाभ हो सकते हैं

हाथों की मसल्स को मजबूत बनाना : सिलाई के दौरान हाथों और उंगलियों की गति को नियंत्रित करना एक प्रकार का ऐक्सरसाइज है जो हाथों और कलाई की मसल्स को मजबूत बनाता है.

उंगलियों की गतिशीलता में सुधार : सिलाई करने से उंगलियों की गतिशीलता में सुधार होता है, जिस से वे अधिक आसानी से और सटीक रूप से काम कर सकती हैं.

अध्ययनों से पता चला है कि जो लोग गठिया से पीड़ित हैं उन्हें भी सिलाई करने पर आराम मिलता है, क्योंकि बारबार उंगलियों से सिलाई करने पर जोड़ें नरम हो जाती हैं. जिस से जोड़ों के आसपास की मसल्स मजबूत होती हैं. इस से जोड़ों की सूजन और दर्द को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है.

हाथों और आंखों के कोऔर्डिनेशन को अच्छा बनाता है : सिलाई में सीधी और घुमावदार रेखाओं के साथ काटना और मशीन के काम करते समय कपड़े को संभालना शामिल है, इसलिए आप का फोकस भी अच्छा होता है. इस के अतिरिक्त यदि आप हाथ से कुछ सिलाई कर रही हैं, तो आप को अपने काम के साथ और भी अधिक तालमेल बैठाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, क्योंकि आप को इस बात की अतिरिक्त जानकारी होगी कि सुई को कहां रखना है और कपड़े के माध्यम से सुई को आगे बढ़ाने के लिए हाथों को एकसाथ काम करना होगा. जितना अधिक आप सिलाई करेंगी, उतना ही आप का हाथ और आंखों का समन्वय बेहतर हो सकेगा.

सिलाई के लिए जरूरी चीजें

सिलाई की चीजें : इंची टेप, कैंची टेलर, चौक, बुकरम सुई और धागे, स्केल, नोटबुक और पेन, प्रेस,
टेबल, कुरसी या स्टूल, रैक, कैंची, पिनकुशन और पिन, थिंबल, फैब्रिक, सिलाई मशीन वगैरह.

कैसे करें सिलाई

अगर आप चाहती हैं कि आप को कपड़े की कटिंग व सिलाई आनी चाहिए, तो आप कोर्स कर सकती हैं. कोर्स की अवधि 3 महीने से 6 महीने तक की है. किसीकिसी कालेज में 2 साल तक की अवधि का कोर्स भी है. आप पार्ट टाइम कोर्स भी कर सकती हैं या फिर चाहे तो आप औनलाइन भी सिलाई सीख सकती हैं. इस से आप को कपड़े की कटिंग, नपाई व सिलाई का अच्छा ज्ञान हो जाएगा. साथ ही आप कपड़ों में जो मैटीरियल लगा रही हैं उस के बारे में भी जानकारी मिल जाएगी. बस, आप को फैशन व ट्रैंड के प्रति अपडेट रहना आना चाहिए.

फटे कपड़े ऐसे सिलें

कटे या फटे भाग को सिलना ज्यादा मुश्किल नहीं है. बस, छेद के दोनों सिरों को एकसाथ अंदर की तरफ (उलटी साइड पर) दबाएं. एक सिलाई में किनारों को एकसाथ सिलें. छोटे टांके का इस्तेमाल करें (टांकों के बीच में कोई जगह न रखें) ताकि वे खुलें नहीं.

Family Love : दामाद भी बचा सकता है बिखरता परिवार

Family Love :  जब हम अपने आसपास या रिश्तेदारी में डिवोर्स जैसी कोई खबर सुनते हैं, तो उस रिश्ते को टूटने का जिम्मेदार लड़की को मानते हैं. अकसर बेटियों से उम्मीद की जाती है कि वे शादी के बाद 2 घरों को जोड़ें रखें, लेकिन क्या आप ने कभी सोचा है कि लड़की ही क्यों लड़का क्यों नहीं इस जिम्मेदारी को निभा सकता है?

अगर लड़का एक अच्छा दामाद बन जाए तो वह ससुराल के लिए सिर्फ रिश्ते से जुड़ा नहीं, बल्कि मन से जुड़ा बेटा बन जाता है. ऐसे रिश्ते समय की कसौटी पर खरे उतरते हैं और परिवारों को बिखरने से बचा लेते हैं.

दामाद की भूमिका केवल रिश्तों तक सीमित नहीं

जब एक पुरुष शादी करता है, तो वह केवल पति ही नहीं बनता, बल्कि परिवार का दामाद भी बन जाता है और अपने ससुराल के दुखसुख में भागीदार बनता है, तो धीरेधीरे वह दामाद नहीं, एक ‘बेटा’ बन जाता है. यही सोच आप की शादी में मजबूती लाती है.

घर टूटता है जब रिश्तों में दूरी आती है

अकसर देखा गया है कि विवाह के कुछ सालों बाद पतिपत्नी के बीच मतभेद बढ़ने लगते हैं. कई बार यह मतभेद परिवारों की वजह से भी होते हैं. ऐसे में अगर पति यानी दामाद समझदारी दिखाए और लड़की के मांबाप को अपने पेरैंट्स जैसा ट्रीटमैंट दे, तो पत्नी के मन में सम्मान और विश्वास बढ़ता है, जिस से रिश्ते मजबूत होते हैं और घर टूटने से बचता है.

बेटा नहीं बेटे जैसा बन कर निभाएं रिश्ता

एक दामाद यदि अपने ससुराल में बेटा बन कर जिम्मेदारी निभाए, मातापिता की तरह ससुरसास का खयाल रखे, तो यह रिश्ता और गहरा हो जाता है. जब बेटी देखती है कि उस का पति उस के मातापिता के लिए भी आदर रखता है, तो वह अपने रिश्ते को और अधिक संजोती है.

घर टूटते हैं जब ईगो हावी हो जाता है

दामाद अगर ईगो या बाहरीपन का भाव छोड़ कर स्नेह और समझदारी से पेश आए, तो पत्नी और उस के परिवार के साथ उस का संबंध और गहरा होता है. यही भावनात्मक जुड़ाव एक टूटते हुए घर को फिर से जोड़ सकता है.

संवाद और समझदारी है समाधान

हर रिश्ते में मतभेद होते हैं, लेकिन उन्हें कैसे संभाला जाए, यही मायने रखता है. एक दामाद अगर ससुराल में बोलचाल की पहल करता है, सलाह देता है, सहयोग करता है, तो यह ससुराल के सदस्यों के लिए भी प्रेरणादायक होता है. दामाद न केवल अपने ससुराल को जोड़ सकता है, बल्कि अपनी पत्नी के साथ अपने वैवाहिक जीवन को भी संभाल सकता है. दामाद अगर अपने रोल को समझे और निभाए, तो रिश्तों की डोर और भी मजबूत हो सकती है.

दामाद का दिल बड़ा हो तो ससुराल उस का घर बन जाता है

एक समझदार दामाद वह होता है जो सिर्फ पत्नी से प्रेम ही नहीं करता, बल्कि उस की जड़ों, उस के परिवार, उस की भावनाओं और उस के मातापिता से भी आत्मीयता रखता है. जब वह ससुराल के लोगों को अपनेपन से देखता है, तो रिश्तों में मिठास आ जाती है.

अहं से नहीं, अपनत्व से बनता है रिश्ता

अकसर रिश्ते इसलिए बिगड़ते हैं क्योंकि उन में अपनापन नहीं, अपेक्षाएं हावी होती हैं. लेकिन जब दामाद बिना किसी स्वार्थ के अपने ससुराल वालों से स्नेह करता है, तो वे भी उसे अपने बेटे की तरह अपनाते हैं. यही भावनात्मक संतुलन घर को टूटने से बचा सकता है.

दामाद का संवेदनशील होना है सब से बड़ी ताकत

एक भावुक लेकिन मजबूत पुरुष जो पत्नी के मातापिता की चिंता करता है, उन के सुखदुख में साथ खड़ा रहता है, वह दरअसल परिवार का एक अनमोल सदस्य बन जाता है. उस की यह संवेदनशीलता पत्नी को भी भावनात्मक सुरक्षा देती है, जिस से विवाह मजबूत होता है.

दामाद को समझनी होगी अपनी भूमिका

यह जरूरी है कि दामाद अपने रिश्ते की गंभीरता को समझे. अगर वह सिर्फ पति की भूमिका में सीमित रहेगा, तो रिश्ते अधूरे रहेंगे. लेकिन अगर वह बेटी से बढ़ कर रिश्ते निभाए, तो एक टूटता परिवार भी फिर से जुड़ सकता है.

Hindi Story Collection : मुक्ति

Hindi Story Collection :  अचानक जया की नींद टूटी और वह हड़बड़ा कर उठी. घड़ी का अलार्म शायद बजबज कर थक चुका था. आज तो सोती रह गई वह. साढ़े 6 बज रहे थे. सुबह का आधा समय तो यों ही हाथ से निकल गया था.

वह उठी और तेजी से गेट की ओर चल पड़ी. दूध का पैकेट जाने कितनी देर से वैसे ही पड़ा था. अखबार भी अनाथों की तरह उसे अपने समीप बुला रहा था.

cookery

उस का दिल धक से रह गया. यानी आज भी गंगा नहीं आएगी. आ जाती तो अब तक एक प्याली गरम चाय की उसे नसीब हो गई होती और वह अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाती. उसे अपनी काम वाली बाई गंगा पर बहुत जोर से खीज हो आई. अब तक वह कई बार गंगा को हिदायत दे चुकी थी कि छुट्टी करनी हो तो पहले बता दे. कम से कम इस तरह की हबड़तबड़ तो नहीं रहेगी.

वह झट से किचन में गई और चाय का पानी रख कर बच्चों को उठाने लगी. दिमाग में खयाल आया कि हर कोई थोड़ाथोड़ा अपना काम निबटाएगा तब जा कर सब को समय पर स्कूल व दफ्तर जाने को मिलेगा.

नल खोला तो पाया कि पानी लो प्रेशर में दम तोड़ रहा?था. उस ने मन ही मन हिसाब लगाया तो टंकी को पूरा भरे 7 दिन हो गए थे. अब इस जल्दी के समय में टैंकर को भी बुलाना होगा.  उस ने झंझोड़ते हुए पति गणेश को जगाया, ‘‘अब उठो भी, यह चाय पकड़ो और जरा मेरी मदद कर दो. आज गंगा नहीं आएगी. बच्चों को तैयार कर दो जल्दी से. उन की बस आती ही होगी.’’

पति गणेश उठे और उठते ही नित्य कर्मों से निबटने चले गए तो पीछे से जया ने आवाज दी, ‘‘और हां, टैंकर के लिए भी जरा फोन कर दो. इधर पानी खत्म हुआ जा रहा है.’’

‘‘तुम्हीं कर दो न. कितनी देर लगती है. आज मुझे आफिस जल्दी जाना है,’’ वह झुंझलाए.

‘‘जैसे मुझे तो कहीं जाना ही नहीं है,’’ उस का रोमरोम गुस्से से भर गया. पति के साथ पत्नी भले ही दफ्तर जाए तब भी सब घरेलू काम उसी की झोली में आ गिरेंगे. पुरुष तो बेचारा थकहार कर दफ्तर से लौटता है. औरतें तो आफिस में काम ही नहीं करतीं सिवा स्वेटर बुनने के. यही तो जबतब उलाहना देते हैं गणेश.

कितनी बार जया मिन्नतें कर चुकी थी कि बच्चों के गृहकार्य में मदद कर दीजिए पर पति टस से मस नहीं होते थे, ऊपर से कहते, ‘‘जया यार, हम से यह सब नहीं होता. तुम मल्टी टास्किंग कर लेती हो, मैं नहीं,’’ और वह फिर बासी खबरों को पढ़ने में मशगूल हो जाते.

मनमसोस कर रह जाती जया. गणेश ने उस की शिकायतों को कुछ इस तरह लेना शुरू कर दिया?था जैसे कोई धार्मिक प्रवचन हों. ऊपर से उलटी पट्टी पढ़ाता था उन का पड़ोसी नाथन जो गणेश से भी दो कदम आगे था. दोनों की बातचीत सुन कर तो जया का खून ही खौल उठता था.

‘‘अरे, यार, जैसे दफ्तर में बौस की डांट नहीं सुनते हो, वैसे ही बीवी की भी सुन लिया करो. यह भी तो यार एक व्यावसायिक संकट ही है,’’ और दोनों के ठहाके से पूरा गलियारा गूंज उठा?था.

जया के तनबदन में आग लग आई थी. क्या बीवीबच्चों के साथ रहना भी महज कामकाज लगता?था इन मर्दों को. तब औरतों को तो न जाने दिन में कितनी बार ऐसा ही प्रतीत होना चाहिए. घर संभालो, बच्चों को देखो, पति की फरमाइशों को पूरा करो, खटो दिनरात अरे, आक्यूपेशन तो महिलाओं के लिए है. बेचारी शिकायत भी नहीं करतीं.

जैसेतैसे 4 दिन इसी तरह गुजर गए. गंगा अब तक नहीं लौटी थी. वह पूछताछ करने ही वाली थी कि रानी ने कालबेल बजाते हुए घर में प्रवेश किया.

‘‘बीबीजी, गंगा ने आप को खबर करने के लिए मुझ से कहा था,’’ रानी बोली, ‘‘वह कुछ दिन अभी और नहीं आ पाएगी. उस की तबीयत बहुत खराब है.’’

रानी से गंगा का हाल सुना तो जया उद्वेलित हो उठी.  यह कैसी जिंदगी थी बेचारी गंगा की. शराबी पति घर की जिम्मेदारियां संभालना तो दूर, निरंतर खटती गंगा को जानवरों की तरह पीटता रहता और मार खाखा कर वह अधमरी सी हो गई थी.

‘‘छोड़ क्यों नहीं देती गंगा उसे. यह भी कोई जिंदगी है?’’ जया बोली.

माथे पर ढेर सारी सलवटें ले कर हाथ का काम छोड़ कर रानी ने एकबारगी जया को देखा और कहने लगी, ‘‘छोड़ कर जाएगी कहां वह बीबीजी? कम से कम कहने के लिए तो एक पति है न उस के पास. उसे भी अलग कर दे तो कौन करेगा रखवाली उस की? आप नहीं जानतीं मेमसाहब, हम लोग टिन की चादरों से बनी छतों के नीचे झुग्गियों में रहते हैं. हमारे पति हैं तो हम बुरी नजर से बचे हुए हैं. गले में मंगलसूत्र पड़ा हो तो पराए मर्द ज्यादा ताकझांक नहीं करते.’’

अजीब विडंबना थी. क्या सचमुच गरीब औरतों के पति सिर्फ एक सुरक्षा कवच भर ?हैं. विवाह के क्या अब यही माने रह गए? शायद हां, अब तो औरतें भी इस बंधन को महज एक व्यवसाय जैसा ही महसूस करने लगी हैं.

गंगा की हालत ने जया को विचलित कर दिया था. कितनी समझदार व सीधी है गंगा. उसे चुपचाप काम करते हुए, कुशलतापूर्वक कार्यों को अंजाम देते हुए जया ने पाया था. यही वजह थी कि उस की लगातार छुट्टियों के बाद भी उसे छोड़ने का खयाल वह नहीं कर पाई.

रानी लगातार बोले जा रही थी. उस की बातों से साफ झलक रहा?था कि गंगा की यह गाथा उस के पासपड़ोस वालों के लिए चिरपरिचित थी. इसीलिए तो उन्हें बिलकुल अचरज नहीं हो रहा था गंगा की हालत पर.

जया के मन में अचानक यह विचार कौंध आया कि क्या वह स्वयं अपने पति को गंगा की परिस्थितियों में छोड़ पाती? कोई जवाब न सूझा.

‘‘यार, एक कप चाय तो दे दो,’’ पति ने आवाज दी तो उस का खून खौल उठा.

जनाब देख रहे हैं कि अकेली घर के कामों से जूझ रही हूं फिर भी फरमाइश पर फरमाइश करे जा रहे हैं. यह समझ में नहीं आता कि अपनी फरमाइश थोड़ी कम कर लें.

जया का मन रहरह कर विद्रोह कर रहा था. उसे लगा कि अब तक जिम्मेदारियों के निर्वाह में शायद वही सब से अधिक योगदान दिए जा रही थी. गणेश तो मासिक आय ला कर बस उस के हाथ में धर देता और निजात पा जाता. दफ्तर जाते हुए वह रास्ते भर इन्हीं घटनाक्रमों पर विचार करती रही. उसे लग रहा था कि स्त्री जाति के साथ इतना अन्याय शायद ही किसी और देश में होता हो.

दोपहर को जब वह लंच के लिए उठने लगी तो फोन की घंटी बज उठी. दूसरी ओर सहेली पद्मा थी. वह भी गंगा के काम पर न आने से परेशान थी. जैसेतैसे संक्षेप में जया ने उसे गंगा की समस्या बयान की तो पद्मा तैश में आ गई, ‘‘उस राक्षस को तो जिंदा गाड़ देना चाहिए. मैं तो कहती हूं कि हम उसे पुलिस में पकड़वा देते हैं. बेचारी गंगा को कुछ दिन तो राहत मिलेगी. उस से भी अच्छा होगा यदि हम उसे तलाक दिलवा कर छुड़वा लें. गंगा के लिए हम सबकुछ सोच लेंगे. एक टेलरिंग यूनिट खोल देंगे,’’ पद्मा फोन पर लगातार बोले जा रही थी.

पद्मा के पति ने नौकरी से स्वैच्छिक अवकाश प्राप्त कर लिया था और घर से ही ‘कंसलटेंसी’ का काम कर रहे थे. न तो पद्मा को काम वाली का अभाव इतनी बुरी तरह खलता था, न ही उसे इस बात की चिंता?थी कि सिंक में पड़े बर्तनों को कौन साफ करेगा. पति घर के काम में पद्मा का पूरापूरा हाथ बंटाते थे. वह भी निश्चिंत हो अपने दफ्तर के काम में लगी रहती. वह आला दर्जे की पत्रकार थी. बढि़या बंगला, ऐशोआराम और फिर बैठेबिठाए घर में एक अदद पति मैनसर्वेंट हो तो भला पद्मा को कौन सी दिक्कत होगी.

वह कहते हैं न कि जब आदमी का पेट भरा हो तो वह दूसरे की भूख के बारे में भी सोच सकता?है. तभी तो वह इतने चाव से गंगा को अलग करवाने की योजना बना रही थी.

पद्मा अपनी ही रौ में सुझाव पर सुझाव दिए जा रही थी. महिला क्लब की एक खास सदस्य होने के नाते वह ऐसे तमाम रास्ते जया को बताए जा रही थी जिस से गंगा का उद्धार हो सके.

जया अचंभित थी. मात्र 4 घंटों के अंतराल में उसे इस विषय पर दो अलगअलग प्रतिक्रियाएं मिली थीं. कहां तो पद्मा तलाक की बात कर रही?थी और उधर सुबह ही रानी के मुंह से उस ने सुना था कि गंगा अपने ‘सुरक्षाकवच’ की तिलांजलि देने को कतई तैयार नहीं होगी. स्वयं गंगा का इस बारे में क्या कहना होगा, इस के बारे में वह कोई फैसला नहीं कर पाई.

जब जया ने अपना शक जाहिर किया तो पद्मा बिफर उठी, ‘‘क्या तुम ऐसे दमघोंटू बंधन में रह पाओगी? छोड़ नहीं दोगी अपने पति को?’’

जया बस, सोचती रह गई. हां, इतना जरूर तय था कि पद्मा को एक ताजातरीन स्टोरी अवश्य मिल गई थी.

महिला क्लब के सभी सदस्यों को पद्मा का सुझाव कुछ ज्यादा ही भा गया सिवा एकदो को छोड़ कर, जिन्हें इस योजना में खामियां नजर आ रही थीं. जया ने ज्यादातर के चेहरों पर एक अजब उत्सुकता देखी. आखिर कोई भी क्यों ऐसा मौका गंवाएगा, जिस में जनता की वाहवाही लूटने का भरपूर मसाला हो.

प्रस्ताव शतप्रतिशत मतों से पारित हो गया. तय हुआ कि महिला क्लब की ओर से पद्मा व जया गंगा के घर जाएंगी व उसे समझाबुझा कर राजी करेंगी.

गंगा अब तक काम पर नहीं लौटी थी. रानी आ तो रही?थी, पर उस का आना महज भरपाई भर था. जया को घर का सारा काम स्वयं ही करना पड़ रहा था. आज तो उस की तबीयत ही नहीं कर रही थी कि वह घर का काम करे. उस ने निश्चय किया कि वह दफ्तर से छुट्टी लेगी. थोड़ा आराम करेगी व पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार पद्मा को साथ ले कर गंगा के घर जाएगी, उस का हालचाल पूछने. यह बात उस ने पति को नहीं बताई. इस डर से कि कहीं गणेश उसे 2-3 बाहर के काम भी न बता दें.

रानी से बातों ही बातों में उस ने गंगा के घर का पता पूछ लिया. जब से महिला मंडली की बैठक हुई थी, रानी तो मानो सभी मैडमों से नाराज थी, ‘‘आप पढ़ीलिखी औरतों का तो दिमाग चल गया है. अरे, क्या एक औरत अपने बसेबसाए घर व पति को छोड़ सकती है? और वैसे भी क्या आप लोग उस के आदमी को कोई सजा दे रहे हो? अरे, वह तो मजे से दूसरी ले आएगा और गंगा रह जाएगी बेघर और बेआसरा.’’

40 साल की रानी को हाईसोसाइटी की इन औरतों पर निहायत ही क्रोध आ रहा था.

Hindi Moral Tales : स्मिता तुम फिक्र मत करो – क्या वापस लौटी खुशियां

Hindi Moral Tales : दिल्ली की ऐसी पौश आवासीय सोसाइटी जहां लोग एकदूसरे से ज्यादा मतलब नहीं रखते. पड़ोसियों का कभी एकदूसरे से सामना हो जाता है तो आधुनिकता का लबादा ओढ़े लेडीज, ‘हाय, हाऊ आर यू’ कहती हुई आगे निकल जाती हैं. जैंट्स को तो वैसे भी आसपड़ोस से ज्यादा कुछ लेनादेना नहीं होता. सुबह घर से काम के लिए निकलते हैं तो शाम तक, यदि बिजनैसमैन हुए तो रात तक, घर लौटते हैं. घर की जिम्मेदारी उन की पत्नियां उठाती हैं. मतलब, घर उन्हीं की देखरेख में चल रहा होता है.

10 साल बीत चुके थे स्मिता को शादी कर दिल्ली की इस हाई सोसाइटी में रहते हुए. आज सुबह से सोसाइटी में सुगबुगाहट थी. सोसाइटी के व्हाट्सऐप ग्रुप में स्मिता के पति सुमित की मौत की खबर सब को मिल चुकी थी. ज्यादातर लोग सुमित और स्मिता को जानते थे.
वक्त की किताब के पन्ने उलटें, तो अभी की बात लगती है.

स्मार्ट, पढ़ीलिखी, सुंदर स्मिता चंड़ीगढ़ में पैदा हुई. वहीं उस ने अपनी पढ़ाई पूरी की. फैशन के मामले में चंड़ीगढ़ की लड़कियां दिल्ली की लड़कियों से पीछे नहीं हैं. छोटे शहरों में लड़कियां खूब स्कूटी चलाती हैं क्योंकि वहां दिल्ली की तरह यातायात के साधन खास नहीं होते. एक तरह से वे पूरी तरह सैल्फ इंडिपैंडैंट होती हैं, इतनी तो दिल्ली की लड़कियां भी तेज नहीं होतीं. मतलब इस सब का यही है कि स्मिता आत्मविश्वास से भरी, लोगों से मेलमिलाप रखने वाली, खुशमिजाज लड़की थी जब उस की शादी सुमित से हुई थी.

सुमित तो जैसे दीवाना ही हो गया था स्मिता को देख कर जब पहली बार उन की मुलाकात हुई थी. हुआ यों था कि सुमित के दोस्तों के ग्रुप में उदय की शादी सब से पहले तय हुई थी. सब के लिए बरात में जाने, डांस करने, मस्ती मारने का अच्छा मौका था. और बरात जा रही थी चंड़ीगढ़.

एकदूसरे से सुमित और स्मिता वहीं मिले थे. शीना स्मिता की बैस्ट फ्रैंड थी. शीना ने स्मिता से पहले ही बोल दिया था कि शादी के एक हफ्ते पहले ही वह अपना ताम झाम ले कर उस के घर आ जाएगी और शादी होने के बाद ही घर वापस जाएगी. स्मिता भी कम उत्साहित नहीं थी शीना के विवाह को ले कर. स्मिता शीना का पूरा हाथ बंटा रही थी शादी की खरीदारी करने में. शीना की बात मानते हुए वह एक हफ्ते पहले ही शीना के घर रहने आ गई थी. दोनों सहेलियां रात में शादी के बाद हनीमून और उदय को ले कर खूब मस्ती, छेड़छाड़भरी बातें करतीं.

वह दिन भी आ गया जब बरात द्वार पर खड़ी थी. स्मिता कई सहेलियों के साथ द्वार पर दूल्हे से रिबन कटवाने के लिए खड़ी थी.

‘जीजाजी, इतनी भी क्या जल्दी है, फटाफट से 10 हजार रुपए का नेग दीजिए, रिबन काटिए, और फिर अंदर आइए. और हां, शीना से मिलने की इतनी जल्दी है तो नेग डबल कर दीजिए. हम हैं न, शौर्टकट से सब मामला सैट कर देंगे.’

‘उस की कोई जरूरत नहीं, वो देखिए, सामने से अंकलआंटी और सब आ रहे हैं. खुद ही हमें प्यार से अंदर ले जाएंगे,’ उस तरफ से सुमित बोला. और वाकई अंकलआंटी ने आते ही कहा, ‘अरे बेटा, क्यों रोक रखा है दूल्हेराजा को?’

‘अंकलजी, बिना नेग लिए ये अंदर कैसे आ सकते हैं?’ स्मिता इठलाते हुए बोली.‘बेटा, नेग क्या कहीं भागा जा रहा है. पहले ही बहुत देर हो गई. सब को आने दो. चलो, सब साइड हो जाओ. तुम्हारी आंटी को दूल्हे का तिलक करना है.’

दूल्हा और उस के दोस्त बड़ी शान से अंदर आए और सुमित ने साइड में खड़ी स्मिता को आंख मार दी. इस से स्मिता और भी  झल्ला गई.इस के बाद तो पूरी शादी और विदाई होने तक स्मिता और सुमित की नोक झोंक चलती रही. बरात दुलहन को ले कर वापस दिल्ली लौट रही थी, तो सारे दोस्त सुमित को छेड़ रहे थे, ‘भई, लगता है जल्दी ही दोबारा चंड़ीगढ़ बराती बन कर आना पड़ेगा.’

वाकई सुमित अपना दिल चंड़ीगढ़ में स्मिता के पास ही छोड़ आया था. मम्मी के पीछे पड़ कर उस ने स्मिता से शादी के लिए इतना जोर दिया कि एक महीने बाद स्मिता दुलहन बन कर सुमित के घर आ गई थी.
‘चट मंगनी पट ब्याह, मैं तो इसी में विश्वास रखता हूं,’ हनीमून पर सुमित स्मिता से अकसर यह बात कह उसे अपने प्यार की दीवानगी दिखाता रहा था. खुशी के दिन पंख लगा कर उड़ जाते हैं और बुरे दिन कुछ ही दिनों के लिए आते हैं लेकिन लगता है हम मानो वर्षों से उसी में जी रहे हैं. स्मिता 2 बच्चों की मां बन चुकी थी. जिंदगी का हर लमहा खुशगवार गुजर रहा था. कोई चिंता नहीं थी उसे. सुमित का अच्छाखासा बिजनैस था. पैसे की कमी का सवाल ही नहीं था.

सोमा काकी बरसों से उन के घर पर काम कर रही थीं. एक तरह से वे घर में खानेपीने की व्यवस्था, रखरखाव, घर में आनेजाने वालों पर अपनी पूरी नजर रखती थीं. इसलिए, स्मिता घर की तरफ से बेफिक्र थी और घर के ड्राइवर शामू काका ने तो अपनी पूरी जवानी ही इस घर में गुजार दी थी. सुमित के पापा के समय के ड्राइवर थे शामू काका. पापा के गुजर जाने के बाद भी पूरी निष्ठा से इस घर की सेवा की. मम्मी को शामू पर पूरा भरोसा था. रातबेरात कहीं आनाजाना हो तो शामू के साथ कार में जाने में उन्हें पूरी तरह सुरक्षित महसूस होता था. सुमित ने बचपन से शामू काका को देखा था. स्कूल से लाना ले जाना, ट्यूशन से घर ले जाना, घर का सारा राशनपानी लाना, यहां तक कि फैक्ट्री के सामान को पूरी तरह से सुरक्षित रूप से क्लाइंट तक पहुंचाने का काम भी शामू काका बहुत निपुणता से करते.

स्मिता बहुत खुश थी अपनी जिंदगी से. शायद अपनी खुशियों पर उस की खुद की नजर लग गई थी. सुबह के 8 बज गए थे, लेकिन मम्मीजी के कमरे का दरवाजा अभी तक बंद था. ऐसा तो कभी नहीं होता. बच्चों को स्कूल के लिए तैयार कर के जब वह ऊपर अपने बैडरूम से नीचे आती थी तो मम्मीजी अकसर गार्डन में चेयर पर बैठी अखबार पढ़ती दिखतीं या फिर गार्डन में चहलकदमी करती बच्चों को बायबाय कर उन्हें प्यार से निहारती थीं. लेकिन आज क्या हुआ. बच्चों को शामू काका के साथ कार में बैठा कर स्मिता ने अंदर मम्मी के कमरे का दरवाजा धकेला तो वह खुल गया. सामने बैड पर मम्मी औंधेमुंह लेटी थीं और हाथ नीचे लटका हुआ था. यह देख कर स्मिता की घुटी चीख निकल गई. ‘सुमित….सुमित…,’ चिल्लाने लगी, ‘सुमित, देखो मम्मीजी को क्या हो गया.’ रात में मम्मीजी को दिल का दौरा पड़ा था. उठने की कोशिश की होगी शायद लेकिन औंधेमुंह पलंग पर गिर गईं.

मम्मीजी की जीवनडोर टूट चुकी थी. उन का इस तरह अचानक से चले जाना स्मिता और सुमित के लिए  झटके से कम नहीं था. सुमित तो जैसे पूरी तरह से टूट गया था. मां से बहुत ज्यादा लगाव था. वैसे भी, जब वह 10वीं में गया ही था, पापा की ब्रेन हैमरेज से मौत हो गई थी. मम्मीजी ने अकेले उसे पालापोसा था, फैक्ट्री का काम संभाला था और इतने बड़े घर को संजो कर रखा था.

एक तरह से आज वह जो भी था, मम्मी के हाथों गड़ा मजबूत व्यक्तित्व था. उन के जाने से वह भीतर से टूट गया था.

फैक्ट्री का काम तो उस ने बीबीए की पढ़ाई के बाद ही संभाल लिया था लेकिन मम्मी के होते बिजनैस की ओर से वह ब्रेफिक्र था क्योंकि इंपौर्टेंट डिसीजन तो वही लेती थीं.

खैर, वक्त के साथसाथ सब सामान्य हो जाएगा, यह सोच कर स्मिता सुमित को हर तरह से खुश रखने की कोशिश करती. सुमित एक शाम फैक्ट्री से आया तो हलका बुखार महसूस कर रहा था.

स्मिता घबरा सी गई. पिछले महीने से पूरे देश में मंडराती कोरोना वायरस की महामारी ने सभी को दहशत में डाल दिया था.

सरकार द्वारा लोगों को पूरी एहतियात बरतने की सलाह दी जा रही थी. टीवी चैनलों में यही न्यूज छाई हुई थी. मानव से मानव में होने वाली इस बीमारी की चपेट में पूरा विश्व आ गया था.

बच्चों के स्कूल तो बंद हो गए थे. स्मिता ने सुमित को फैक्ट्री जाने से मना किया था. लेकिन सुमित का कहना था कि हो सकता है देशभर में लौकडाउन की स्थिति बन जाए, इसलिए वह फैक्ट्री का काम काफी हद तक समेटना चाहता है ताकि आगे दिक्कत न हो, लेकिन इंसान अपनेआप को कितना ही बचा ले, प्रकृति के आगे उस की एक नहीं चलती.

दिल्ली में जैसे ही लौकडाउन का ऐलान हुआ, उस से एक दिन पहले सुमित कोरोना वायरस की चपेट में आ चुका था.

स्मिता ने बच्चों को ऊपर के फ्लोर में ही रहने की हिदायत दे दी थी. सोमा काकी थीं, तो स्मिता को बच्चों की फिक्र करने की जरूरत नहीं थी. सुमित की बिगड़ती हालत देखते हुए उसे अस्पताल में भरती करा दिया गया.

अस्पताल जाने से पहले सुमित बोला था, ‘सुमि, लगता है अब तुम्हें, बच्चों को, इस घर को दोबारा नहीं देख पाऊंगा. सुमि, मैं तुम से, बच्चों से, इस घर से बहुत प्यार करता हूं. मु झे मरना नहीं है, प्लीज, मु झे बचा लो. मैं तुम सब को छोड़ कर जाना नहीं चाहता. सुमि, मु झे लग रहा है मौत मु झे बुला रही है. नहीं सुमि, नहीं, मु झे नहीं छोड़ना तुम्हारा साथ.’

स्मिता का रोरो कर बुरा हाल था. सुमित की यह हालत उस से भी नहीं देखी जा रही थी. लेकिन करती भी क्या वह, उस के हाथ में हो तो अपनी जिंदगी उस के नाम लिख देती.

अस्पताल में एक बार मरीज को भरती कराने के बाद उस से मिलना मुश्किल था. सुमित के साथ वहां अस्पताल में क्या हो रहा है, कुछ दिनों तक तो पता ही नहीं चला. टीवी पर अस्पताल के बुरे हालात, मरीज के साथ बरती जाने वाली लापरवाही और मरीजों की मौत के बाद उन के शरीर के साथ अमानवीयता देख स्मिता सिहर उठती थी. फोन की हर घंटी किसी आशंका का संकेत देती थी और वाकई उस की आशंका सच में बदल गई. सुमित नहीं बच पाया था. यह सुनते ही स्मिता जैसे पत्थर हो गई थी. सोमा काकी न होतीं तो शायद आज वह भी जिंदा न होती.

मम्मीजी की मौत को 2 महीने भी नहीं हुए थे, और सुमित का उसे यों अचानक छोड़ कर चले जाना. ऊपर से लौकडाउन की वजह से कोई घर नहीं आ सकता था. कोई पास आ कर उसे गले नहीं लगा सकता था. कोई पास नहीं था कि वह उस के कंधे पर सिर रख कर रो सके. बस, एक सोमा चाची थीं जिन की गोद में वह सिर रख सकती थी. वे ममता की मूरत बन स्मिता को संभाले हुए थीं. बच्चे तो कुछ सम झ नहीं पा रहे थे कि सब क्या हो रहा है. 8 साल का अवि कुछकुछ सम झ रहा था लेकिन 2 साल की परी तो अभी नादान थी.
अस्पताल से सुमित के पार्थिव शरीर को ले कर अंतिम संस्कार करना था. शामू काका स्मिता के साथ थे, वरना अभी तक तो स्मिता की हिम्मत टूट चुकी थी. कोई अपना सगासंबंधी नहीं था. लौकडाउन की हालत में चंड़ीगढ़ से किसी का आना मुश्किल था. अड़ोसीपड़ोसी फोन पर ही अफसोस जता रहे थे. सुमित का दोस्त उदय जरूर काफी मदद कर रहा था. सुमित उस का बचपन का दोस्त था, वह स्मिता को क्या दिलासा देता, उस के भी आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे.

स्मिता असहाय महसूस कर रही थी अपने को. सामान्य दाहसंस्कार तो दूर की बात थी, स्मिता सुमित के शरीर को छू भी नहीं सकती थी, वह सुमित जिस के बिना वह जीने की कल्पना नहीं कर सकती थी. कितनी बेबस थी वह, चीखचीख कर रोना चाहती थी, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं था. किसी तरह शवदाहगृह में क्रियाकर्म हुआ. अचानक सब क्या हो गया था. स्मिता की तो दुनिया ही बदल गई थी.

3 महीने गुजर गए थे सुमित को गुजरे हुए लेकिन स्मिता सदमे से उबरी नहीं थी. अवि और परी उस के पास आते और कहते, ‘मम्मी, खेलो न हमारे साथ,’ तो स्मिता खोईखोई आंखों से, बस, उन्हें देख कर सिर पर हाथ फेर फिर न जाने कहां खो जाती.

कोशिश कर रही वह खुद को संभालने की, लेकिन हो नहीं पा रहा था. ऐसे में सोमा काकी ही एक मां की तरह उसे संभाल रही थीं. गांव से तो उन का नाता कब का टूट गया था. पति की मौत के बाद ससुराल वालों ने उन्हें एक तरह से घर से निकाल दिया था. आस न आलौद. शहर आईं तो इस घर में उन्हें ऐसा आसरा मिला, कि यहीं की हो कर रह गईं.

रोज चंड़ीगढ़ से मम्मीपापा का फोन आता था. मम्मी रोतीं उसे तसल्ली देतीं. मम्मी के पैरों में दर्द रहता था और पापा की हार्टसर्जरी हो चुकी थी, इसलिए स्मिता ने उन्हें सख्त मना कर दिया कि कोई जरूरत नहीं दिल्ली आने की. अपनी सेहत का खयाल रखो. आ कर भी अब क्या हो जाएगा, सुमित वापस तो नहीं आ जाएगा.

स्मिता ने अब कभीकभी फैक्ट्री जाना शुरू कर दिया था. अनलौक की प्रक्रिया काफी हद तक शुरू हो गई थी. उन का टेप का बिजनैस था. छोटी से ले कर बड़ी हर तरह की टेप बनती थी उन की फैक्ट्री में. कोरोनाकाल में पीपीई किट के लिए टेप का इस्तेमाल होता है. फैक्टी का मैनेजर विशाल बिजनैस माइंडेड इंसान था.

टेप तो फैक्ट्री में बन ही रही है क्यों न पीपीई किट खुद ही अपनी फैक्ट्री में बनाई जाए. बस, काम चल पड़ा था. विशाल ने स्मिता को सजेशन दिया कि मार्केटिंग के लिए कोई नया व्यक्ति चुन लिया जाए, क्योंकि यह काम पहले सुमित देखता था.

स्मिता ने यह काम विशाल को सौंप दिया और सबकुछ देखभाल कर रजत को मार्केटिंग हैड नियुक्त किया गया. रजत ने काफी अच्छी तरह से काम संभाल लिया था. स्मिता कभीकभी फैक्ट्री जाती थी पैसों का हिसाबकिताब देखने. स्मिता ने कौमर्स पढ़ा था इसलिए अकाउंट्स वह देख लेती थी.
स्मिता नोट कर रही थी कि जब भी वह फैक्ट्री जाती रजत किसी न किसी बहाने से उस के नजदीक आने की कोशिश करता. वैसे रजत बुरा इंसान नहीं था लेकिन इस का ऐसा बरताव स्मिता को कुछ अटपटा लगता.

रात के 8 बज रहे थे. दरवाजे की घंटी बजी तो सोमा काकी ने दरवाजा खोला.
‘‘स्मिता मैडम हैं?’’ रजत 2-3 फाइल हाथ में पकड़े खड़ा था.
‘‘हां, लेकिन आप?’’ सोमा काकी ने पूछा.

‘‘मैं रजत, फैक्ट्री का न्यू मार्केटिंग हैड’’ रजत अपना परिचय दे ही रहा था तब तक स्मिता दरवाजे तक आ गई.
‘‘आप, इस वक्त, क्या बात है?’’ स्मिता ने आश्चर्य से पूछा.
‘‘मैडम, जरूरी कागज पर साइन चाहिए थे. क्लाइंट से बात हो चुकी है. बस आप के अप्रूवल की जरूरत थी.’’

‘‘आइए, बैठिए, लाइए पेपर दीजिए,’’ स्मिता ने रजत से पेपर ले लिए.
रजत की आंखें घर का मुआयना कर  रही थीं. साइड टेबल पर फ्रेम में अवि और परी की फोटो देख कर बोला, ‘‘बहुत प्यारे बच्चे हैं आप के मैडम.’’

‘‘हूं,’’ स्मिता बात को आगे नहीं बढ़ाना चाहती थी. पेपर साइन कर के रजत की ओर बढ़ा दिए.

सोमा काकी को रजत की आंखों में लालच नजर आया था. शामू काका से सोमा काकी को पता तो चला था कि फैक्ट्री में नया आदमी आया है और काफी अच्छा काम कर रहा है. आज देख भी लिया, लेकिन रजत सोमा को कुछ ठीक सा नहीं लगा. इंसान को देख कर पहचान लेती थीं वे. जिंदगी ने इतनी ठोकरें दी थीं कि अच्छेबुरे की पहचान कर सकती थीं.

‘‘नहींनहीं, स्मिता बिटिया को इस से बचाना होगा,’’ सोमा काकी के दिमाग में एक उपाय सू झा.
घर के पीछे बने गैराज में गईं. शामू काका वहीं रहते थे. खानापीना, नहानाधोना सब इंतजाम कर रखे थे उन के लिए.
‘‘क्या बात है, इस वक्त यहां?’’ शामू काका दूध गरम कर रहे थे. खाना तो उन्हें घर से मिल ही जाता था.
‘‘शामू, तु झे फैक्ट्री में आए नए आदमी… क्या नाम है… हां, रजत उस पर नजर रखनी है. मु झे उस के इरादे ठीक नहीं लग रहे.’’

‘‘हूं… कभीकभी मु झे भी ऐसा लगता है. जिस तरह से वह स्मिता बिटिया को देखता है मु झे बुरा लगता है. फैक्ट्री में कितने आदमी हैं लेकिन यह बिटिया के आसपास मंडराता रहता है.’’
अगले दिन जब रजत फैक्ट्री से निकला, शामू काका ने गाड़ी उस के गाड़ी के पीछे लगा दी. उस ने गाड़ी मौल की पार्किंग में खड़ी कर दी. शामू काका भी गाड़ी पार्क कर उस के पीछे हो लिए. शामू काका ने अपना हुलिया बदला हुआ था. रजत उन्हें आसानी से पहचान नहीं सकता था.
रजत मौल के फूड कोर्ट में पहुंचा. वहां कोने की टेबल पर एक लड़की उस का इंतजार कर रही थी.
‘‘मिल आए अपनी स्मिता मैडम से?’’ लड़की ने ताना देते हुए कहा.
‘‘यार, तुम भी न. सब अपने और तुम्हारे लिए तो कर रहा हूं. हाथ में आ गई तो वारेन्यारे हो जाएंगे. तुम बस मेरा कमाल देखती जाओ.’’
शामू काका एक टेबल छोड़ कर बैठे थे. लेकिन उन के कान पीछे लगे थे. अब रजत की असलियत सामने थी.
शामू ने सोमा के सामने घर पहुंचते ही रजत का फरेब सामने रख दिया.
सोमा काकी ने भी स्मिता को रजत का कमीनापन बताने में देर नहीं लगाई.
स्मिता को रजत की हरकतों पर पहले ही शक था. शामू काका की बात पर यकीन न करने का सवाल ही नहीं उठता था.

अगले ही दिन स्मिता ने मैनेजर विशाल से बात कर के एक प्लान के तहत रजत का फैक्ट्री से हिसाब ऐसे किया कि उसे यह पता नहीं चला कि स्मिता को उस की सचाई पता चल चुकी है.
स्मिता जान चुकी थी कि अब उसे कदमकदम पर फरेब करने वाले,  झूठी हमदर्दी दिखा कर अपनेपन का दिखावा करने वाले और प्यार करने का दावा करने वाले लोग मिलेंगे. उसे हर कदम फूंकफूंक कर उठाना है.

शामू काका और सोमा काकी ने भी यह ठान लिया था कि स्मिता की, इस घर की और बच्चों की हर हाल में रखवाली करेंगे. खून का न सही, दिल का रिश्ता जुड़ा था उन का इन सब से.

रजत की तरह ही स्मिता को काम के सिलसिले में ऐसे लोग मिल जाते थे जिन्हें स्मिता की धनदौलत से बेशक मतलब न था लेकिन उस जैसी सुंदर, स्मार्ट, अकेली औरत को देख कर उसे पाने की उन्होंने कोशिशें कीं कि शायद दांव लग जाए. लेकिन स्मिता ने अपने दिल में सुमित को बैठा रखा था. कोई दूसरा उस में घुस नहीं सकता था.

स्मिता की मम्मी का आएदिन फोन आता और दबी जबान में उन की यही ख्वाहिश होती थी कि बेटी अपनी जिंदगी के बारे में एक बार फिर से सोचे. अभी उम्र ही क्या थी उस की. महज 34 साल की थी. लेकिन स्मिता बात को दूसरी तरफ मोड़ देती थी.

स्मिता के पीछे पड़ने वाले भौंरों की कमी न थी. एक बड़े होलसेल डीलर, जो लाखों का और्डर देते थे, स्मिता से मिलने के बाद 2 करोड़ रुपए के माल खरीदने का और्डर दे गए और कच्चा माल उधार में दिलवा दिया अलग. वे अब हर दूसरेतीसरे दिन आने लगे, तो शामू काका को शक हुआ. उन्होंने बाहर खड़ी डीलर की गाड़ी के ड्राइवर को बुला कर चाय पिलाना शुरू कर दिया. ड्राइवर ने बताया कि साहब की पत्नी कई साल से अलग रह रही है क्योंकि ये इधरउधर मुंह मारते रहते हैं.

एक बार फिर शामू काका ने स्मिता को संकट से निकाला. शामू काका ने कहा था कि बड़े मालिक ने उन्हें 10 साल की उम्र से रखा हुआ है और अब भी उन का अपना कोई नहीं है. वे बचपन में कब अनाथ हो गए थे, उन्हें नहीं मालूम. बस, इतना मालूम है कि उन के गांव के चाचा बड़े मालिक के पास किसी पुराने कर्मचारी की सिफारिश पर छोड़ गए थे.

सोमा काकी अकसर स्मिता को अकेले में बैठी आंसू बहाते देखती थीं. वे भी चाहती थीं कि स्मिता को अपने जीवन की खुशियां मिलें, लेकिन वे क्या कर सकती थीं अपनी इस बिटिया के लिए.

‘‘मम्मी, संडे को मेरी क्लास में चिराग का बर्थडे है. उस के पापा ने पार्टी रखी है. उस ने मु झे भी इन्वाइट किया है,’’ अवि बोला.
‘‘ठीक है, शामू काका तुम्हें ले जाएंगे.’’

संडे को अवि तैयार हो कर शामू काका के साथ चिराग के घर चला गया. उसे कार में बैठा स्मिता जब घर के अंदर आई तो टीवी खोल कर बैठ गई. अचानक साइड टेबल पर नजर गई तो गिफ्ट तो वहीं रखा हुआ था. वैसे तो शामू काका को फोन कर के वापस बुला सकती थी लेकिन काफी देर हो चुकी थी और वह नहीं चाहती कि शामू काका अवि को वहां अकेला छोड़ कर आएं.

स्मिता ने सोचा, क्यों न वह ही दे आए, लौटते हुए बुटीक से अपने कपड़े भी लेती आएगी. कई बार फोन आ चुका था कि उस के सूट सिल कर रेडी हैं.

स्मिता ने फटाफट कपड़े बदले और दूसरी गाड़ी निकाल कर चिराग के घर पहुंच गई. चिराग के घर का पता उस ने शामू काका को लिख कर दिया था, इसलिए उसे याद था.

चिराग का घर वाकई खूबसूरत था. वह लौन की तरफ गई, जहां सिर्फ 10-12 बच्चे थे. बच्चों को दूरदूर बैठा कर फन एक्टिविटी कराई जा रही थी. वह नजरें घुमा कर अवि को देख रही थी कि पीछे से आवाज आई, ‘‘हैलो, आप शायद अवि की मदर हैं.’’ स्मिता ने पलट कर देखा, लगभग 35-37 वर्षीय पुरुष, जिस का व्यक्तित्व आकर्षक कहा जाए तो गलत न होगा, खड़ा था.

‘‘जी, और आप?’’ स्मिता ने पूछा.

‘‘मैं चिराग का पापा अनुराग. आप को कई बार पेरैंट्स मीटिंग में देखा है अवि के साथ.’’

‘‘अच्छा, तभी सोच रही थी, कैसे मु झे पहचाना. वह क्या है कि अवि चिराग का गिफ्ट घर पर भूल आया था, देने चली आई. इधर कुछ काम भी था, सोचा, वह भी कर लूंगी.’’

‘‘गिफ्ट कोई इतना जरूरी तो नहीं था.’’

‘‘क्यों नहीं, बर्थडे पर बच्चों को अपने गिफ्ट देखने का ही शौक होता है.’’

‘‘यह तो आप सही कह रही हैं. अब आ ही गई हैं तो केक खा कर जाइए.’’ वेटर केक रख कर ले आया था.

‘‘थैंक्स, मैं चलती हूं. अवि अभी यहीं हैं. काफी एंजौय कर रहा है.’’

‘‘लाइफ में एंजौयमैंट बहुत जरूरी है, बच्चों के लिए भी और बड़ों के लिए भी,’’ अनुराग ने कुछ गंभीर हो कर कहा तो स्मिता ने एक बार उस की तरफ देखा. आंखें जैसे कहीं शून्य में खो गई थीं.
‘‘जी?’’

‘‘जी, कुछ नहीं. आइए आप को बाहर तक छोड़ देता हूं.’’

‘‘जी शुक्रिया, आप मेहमानों को देखिए. अच्छा, नमस्ते.’’
‘‘नमस्ते.’’

अवि और चिराग वीडियो कौलिंग करते थे. कभीकभी स्कूल के असाइनमैंट वर्क को ले कर अनुराग स्मिता से बात कर लेता था. अनुराग पेशे से प्रोफैसर था. पत्नी से तलाक हो चुका था. उस की अपनी महत्त्वाकांक्षाएं थीं जिन्हें पूरा करने के लिए उस ने पति और बेटे को पीछे छोड़ दिया था. चिराग की पूरी देखभाल अनुराग के सिर थी और अनुराग की मां भी चिराग का पूरापूरा खयाल रखती थीं.

एक दिन अनुराग अपने पुत्र चिराग को अवि से मिलवाने के लिए ले कर आया था. स्मिता घर पर ही थी. अनुराग को देख उस के चेहरे पर मुसकराहट आ गई थी जिसे सोमा काकी ने पढ़ लिया था. स्मिता ने अपने भाव छिपाते हुए अनुराग को बैठने के लिए कहा. चिराग और अवि खेलने ऊपर के कमरे में चले गए थे.
‘‘आप के लिए कुछ लाऊं?’’ सोमा काकी के चेहरे पर उत्साह की  झलक थी.
‘‘जी नहीं, मैं ठीक हूं,’’ अनुराग ने जवाब दिया.

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है कि आप बिना कुछ लिए चले जाएं. मैं दोनों के लिए ही चाय बना कर लाती हूं,’’ बीच में ही सोमा काकी बड़े अधिकार से बोलीं और किचन की ओर बढ़ गईं.

‘‘आज काकी को न जाने क्या हो गया है. वे तो किसी को मेरे पास फटकने नहीं देतीं,’’ स्मिता का यह कहनाभर था कि अनुराग के चेहरे पर मुसकान आ गई, जिसे देख स्मिता को अच्छा लगा.
‘‘क्या कर रही हैं आजकल आप, कुछ नया?’’ अनुराग ने प्रश्न किया.

‘‘कुछ खास नहीं, फैक्ट्री का काम अच्छा चल ही रहा है, तो कोई दिक्कत नहीं.’’
‘‘मैं आप के बारे में पूछ रहा था फैक्ट्री के नहीं,’’ अनुराग ने स्मिता की आंखों में देखते हुए कहा.
‘‘मेरे बारे में जानने जैसा कुछ है ही नहीं,’’ स्मिता ने नजरें अनुराग के चेहरे से हटाते हुए कहा.
‘‘मु झे ऐसा नहीं लगता.’’

सोमा काकी चाय ले आईं. सोमा काकी वहीं पास खड़ी थीं और लगातार अनुराग को ताक रही थीं. उन्हें अनुराग के चेहरे पर एक अपनापन नजर आया था जो उन्होंने किसी और पुरुष के चेहरे पर नहीं देखा था. अनुराग का व्यक्तित्व उस के अच्छे इंसान होने की गवाही दे रहा था. सोमा काकी कमरे से बाहर गईं तो शामू काका से अनुराग को ले कर चर्चा करने लगीं.

‘‘प्रोफैसर साहब को ले कर तुम्हारा क्या खयाल है?’’ सोमा काकी ने पूछा.
‘‘अच्छे इंसान मालूम पड़ते हैं,’’ शामू काका ने जवाब दिया.
‘‘मु झे भी. बिटिया का चेहरा कितने दिन बाद इतना खिला हुआ दिख रहा है, है न?’’
‘‘पता नहीं, लेकिन तुम कह रही हो तो ऐसा ही होगा.’’
‘‘हां.’’

अनुराग चिराग को ले कर जाने लगा तो उस के चेहरे पर स्मिता से मिलने की चाह साफ नजर आ रही थी. अनुराग के जाते ही स्मिता सोफे पर बैठी हुई थी जब सोमा काकी उस के पास आ कर बैठ गईं.
‘‘मु झे तो प्रोफैसर साहब अच्छे लगे, और बिटिया तुम्हें?’’

‘‘हां, मु झे भी,’’ कहते ही स्मिता को खयाल आया कि उस ने अचानक क्या कह दिया. ‘‘क्या? ऐसा तो कुछ नहीं है, मेरा मतलब, हां, अच्छे व्यक्ति हैं,’’ कह कर उस ने नजरें दूसरी तरफ कर लीं.
‘‘मेरी तो हां हैं और शामू की भी,’’ कह कर सोमा काकी उठ कर जाने लगीं.
स्मिता उन की बात सुन कर  झेंप गई, बोली, ‘‘कुछ भी कहती हो आप.’’

अवि और चिराग आपस में बात करना चाहते थे तो स्मिता के फोन पर अनुराग का मैसेज आ जाता था. पर अब वह चिराग और अवि की बात कराने के लिए नहीं बल्कि खुद स्मिता से बात करने के लिए मैसेज करने लगा. धीरेधीरे अनुराग ने स्मिता से मोबाइल पर बात करनी शुरू कर दी. दो दुखी दिल, दो तन्हा इंसान ही एकदूसरे की पीड़ा सम झ सकते हैं. अनुराग ने अपनी पत्नी से तलाक के बाद दूसरी शादी के बारे में सोचा तक नहीं था. लेकिन, अपनी तरह ही स्मिता को देख वह उस के प्रति आकर्षित होने लगा था.

स्मिता और अनुराग जब बात करते थे, उन्हें लगता था उन के मन की पीड़ा कम हो गई है. दोनों एकदूसरे के अच्छे दोस्त बन गए थे. अनुराग का यह कहना, ‘स्मिता, तुम फिक्र मत करो. मैं हूं न. सब ठीक हो जाएगा,’ स्मिता की सब पीड़ा हर लेता.

सोमा काकी ने महसूस किया था जब से अनुराग स्मिता की जिंदगी में आया है, स्मिता के जीवन में आया खालीपन भरने लगा था. दोनों अपनीअपनी तकलीफ एकदूसरे से बांट कर जिंदगी की उल झनों को सुल झा रहे थे. बेशक वे एकदूसरे से दूर रहे थे लेकिन मन का जुड़ाव हो चुका था. मन से मन का मिलन कुछ कम तो नहीं होता.

दोनों की अपनीअपनी जिंदगी थी. दोनों पर अपने बच्चों की जिम्मेदारी थी. वे उन्हें अच्छी तरह निभा रहे थे. लेकिन दोनों के पास आज एकदूसरे का मानसिक संबल था जो शारीरिक संबल से भी जरूरी है. वक्त की धारा में दोनों बह रहे थे.

‘‘स्मिता बिटिया, किस सोच में हो, तुम्हारा खूबसूरत भविष्य तुम्हारा इंतजार कर रहा है. शादी के बारे में क्यों नहीं सोचतीं,’’ सोमा काकी ने एक दिन कहा. ‘‘डर लग रहा है काकी. समाज क्या कहेगा, बच्चे क्या सोचेंगे कि उन की मां को शादी की पड़ी है.’’

‘‘बच्चे छोटे हैं स्मिता, वे पिता की कमी महसूस करते हैं जो प्रोफैसर साहब पूरी कर सकते हैं. वे भी तुम से शादी करना चाहते हैं, उन की बातों से, उन की आंखों से साफ  झलकता है.’’
‘‘पूछा था अनुराग ने मु झ से, मैं ने ही मना कर दिया था.’’
शामू काका भी वहां आ चुके थे.

‘‘स्मिता बिटिया, सोमा सही कह रही है, समाज हमारे साथ ऐसा करता ही क्या है जो हम उस के बारे में सोचें, अपने दिल की सुनो बिटिया. बच्चों को पिता भी मिल जाएगा.’’

शामू काका और सोमा काकी के जाने के बाद स्मिता सोच में डूब गई. सुमित को याद करने लगी, अपने वे दिन याद करने लगी जब लोगों की नजरें उसे तारतार करने की कोशिश करती थीं. अनुराग से मिलने से पहले कितना दर्द था उस के दिल में. सब स्मिता की आंखों के आगे नाचने लगा.

स्मिता ने फोन उठाया और अनुराग को कौल किया.
‘‘हैलो, अनुराग.’’
‘‘हां स्मिता, कहो?

‘‘मैं तुम्हारा हाथ थाम कर आगे बढ़ना चाहती हूं. ऐसा लगता है कि हम साथ होंगे तो सब उलझनें सुलझ जाएंगी.’’

‘‘स्मिता, मैं तुम से वादा करता हूं कि तुम्हारी आंखों में आंसू नहीं आने दूंगा कभी.’’ अनुराग के इन शब्दों से स्मिता का रोमरोम पुलकित हो उठा था.

Latest Hindi Stories : सनक – नृपेंद्रनाथ को हुआ गलती का एहसास

Latest Hindi Stories :  धन होना अच्छी बात है, पर अधिक धन हो जाने से महत्त्वाकांक्षा इतनी बढ़ जाती है कि परिवार के लिए सिरदर्द और परिचितों के लिए हास्यास्पद हो जाती है.

सुनयना के पिता नृपेंद्रनाथ ने जो मकान बनवाया था वह काफी लंबाचौड़ा और शानदार था. लोग उस की कीमत 8 लाख रुपए के आसपास आंकते थे, पर नृपेंद्रनाथ उस की लागत दोढाई लाख ही बताते थे. मकान के अलावा बैंक में जमा धन था. गृहस्थी की हर नई से नई वस्तु मौजूद थी.

नृपेंद्रनाथ राजकीय सेवा में थे और एक विभाग में निरीक्षक थे. ऊपरी आमदनी का तो पता नहीं, पर उन के पास जो कुछ भी था, उसे मात्र वेतन से एकत्र नहीं कर सकते थे. वह कहा भी करते थे कि नौकरी तो उन्होंने शौक के लिए की है. गांव में उन के पास काफी कृषि भूमि है, बाग हैं और शानदार हवेली है. उसी की आमदनी से भरेपूरे हैं.

किसी को फुरसत न थी सुदूर गांव जा कर, अपना खर्चा कर के, नृपेंद्रनाथ की जायदाद का पता लगाए. जरूरत भी क्या थी? इस कारण नृपेंद्रनाथ की बात सच भी माननी पड़ती थी.

सुनयना उन की एकमात्र कन्या थी. 2 पुत्र भी थे. सुनयना तो किसी प्रकार स्नातक हो गई थी, पर बेटों ने शिक्षा की अधिक आवश्यकता महसूस नहीं की थी. जरूरत भी क्या थी? जब पिता के पास ढेर सारा धन हो, जायदाद हो तो शिक्षा का सिरदर्द मोल लेना उचित नहीं होता. वे दोनों भी वही सोचते थे जो आमतौर पर अपने देश में भरपूर धन और जायदाद वालों के पुत्र सोचते हैं.

सुनयना के नाकनक्श अच्छे थे. बोली भी अच्छी थी. केवल कमी थी तो यह कि रंग गहरा सांवला था. आर्थिक रूप से कमी न होने के कारण उस ने गृहकार्य सीखने की आवश्यकता नहीं समझी थी.

सुनयना की मां स्नेहलता तो उस के ब्याह के लिए नृपेंद्रनाथ को तभी से कोंचने लगी थी जब उस ने 18वें में कदम रखा था. यह नहीं कि नृपेंद्रनाथ को चिंता नहीं थी. थी और बहुत थी. वह जैसा चाहते थे वैसा वर नहीं दिखाई दे रहा था. जिस का भी पता लगता, वह उन की शर्तों पर खरा नहीं उतरता था.

नृपेंद्रनाथ चाहते थे कि लड़का भारतीय प्रशासनिक सेवा में हो. उच्च ब्राह्मण कुल का हो. गोश्त, प्याज, लहसुन आदि न खाता हो. शराब न छूता हो. शानदार व्यक्तित्व का मालिक हो.

ऐसे दामाद की कीमत वह डेढ़ लाख स्वयं लगा चुके थे. 2 लाख तक जा चुके थे. ऐसे लड़के का पता लगता तो दौड़े चले जाते. प्रतीक्षा सूची में लग जाते, पर अभी तक ऐसा हुआ था कि ऐसे लड़कों को 3 लाख और साढ़े 3 लाख वाले उड़ा ले जाते.

नृपेंद्रनाथ भी धुन के पक्के थे. एक वांछित शर्तों वाला लड़का हाथ से निकल जाता तो दूसरे के पीछे पड़ जाते और तब तक पीछे पड़े रहते जब तक उसे भी ऊंची कीमत वाले छीन न लेते.

सुनयना के पास करने को कोई काम नहीं था. मां ने भी कुछ करवाने की जरूरत नहीं समझी. वह खूब खाती, खूब सोती और जागते समय उपन्यास पढ़ती. मुसीबत घर के बड़ेबूढ़े की होती है और ऐसी कन्या के विवाह में कठिनाई होती है, जिस का बाप अपने को बहुत बड़ा और कुलीन समझता हो. पिता की जिद ने सुनयना को 28 वर्ष की परिधि में ला दिया. उम्र के कारण कठिनाई और बढ़ गई थी.

स्थिति यह आ गई थी कि लोग नृपेंद्रनाथ को देख कर वक्रता से मुसकरा पड़ते. कह ही डालते, ‘‘कायदे से इन्हें कोई मिनिस्टर तलाशना चाहिए जिस के आगेपीछे प्रशासनिक सेवा वाले दुम हिलाते हैं.’’

नृपेंद्रनाथ के कान में भी बात गई. कोई असर न हुआ. उत्तर दे दिया, ‘‘मंत्री अस्थायी होते हैं और प्रशासनिक सेवा वाले स्थायी होते हैं.’’

नृपेंद्रनाथ के साले चक्रपाणि ने सुझाया, ‘‘जीजाजी, हो सकता है कि लड़का अभी शराब न पीता हो, गोश्त न खाता हो, सिगरेट न पीता हो. पर शादी के बाद यह सब करने लगे तो आप क्या कर लेंगे?’’

नृपेंद्रनाथ ने कोई उत्तर न दिया. उन के कानों पर जूं भी न रेंगी. वह अपनी शर्तों से तिल भर भी अलग होने को तैयार नहीं थे.

प्रो. कैलाशनाथ मिश्र का पुत्र भारतीय प्रशासनिक सेवा में चुन लिया गया.

नृपेंद्रनाथ ने विवाह का प्रस्ताव रखा तो लड़के पंकज ने दोटूक उत्तर दे दिया, ‘‘एक मामूली इंस्पेक्टर की बेटी से विवाह? क्या हमारे स्तर के लोग देश में खत्म हो गए हैं?’’

नृपेंद्रनाथ ने उत्तर सुना. उत्तर क्या था जहर का घूंट था. जिद की सनक में उन्हें पीना ही पड़ गया, पर वह अपने उद्देश्य पर कायम रहे.

ऊब कर सुनयना की मां ने भी कह डाला, ‘‘अच्छे परिवार का ऐसा स्वस्थ लड़का देखिए जिस से दोनों की जोड़ी अच्छी लगे. इतना और ध्यान रखिए कि कामकाज से लगा हो.’’

नृपेंद्रनाथ झिड़क देते, ‘‘तुम्हें तो अक्ल आ ही नहीं सकती. जब अपने पास सबकुछ है तो इकलौती बेटी के लिए लड़का भी उच्च पद वाला ही ढूंढ़ना है.’’

जवाब मिला, ‘‘तुम्हारी सनक के कारण लड़की बूढ़ी हुई जा रही है. उस की चचेरी और ममेरी बहनें 2-2 बच्चों की मां बन गई हैं. जब खेत ही सूख गया तो वर्षा का क्या फायदा?’’

इस कटु सत्य का कोई उत्तर देने के स्थान पर नृपेंद्रनाथ टाल जाना ही उचित समझते थे. अपनी शर्तों के संबंध में झुकने को तैयार होने की बात सोच ही न सकते थे. ऐसा न था कि लड़के न थे. उच्च कुल वाले भी थे. अच्छे पदों पर भी थे. पूर्ण शाकाहारी भी थे. स्वस्थ और सुंदर थे. परंतु नृपेंद्रनाथ की सनक भारतीय प्रशासनिक सेवा वाले के लिए ही थी.

कपिलजी को रामायण याद थी. जो कुछ कहते थे उस में एक चौपाई जरूर जोड़ देते. रामायण कंठस्थ थी पर उस के कोई आदर्श चरित्र उन में न थे.

पर वह भी एक दिन बोल ही पड़े, ‘‘लिखा न विधि वैदेहि विवाहू. प्रशासनिक सेवा का शुभ धनु न टूटेगा और न नृपेंद्रनाथ भाई की पुत्री का ब्याह होगा.’’

कपिलजी की पत्नी हां में हां मिलाती हुई बोलीं, ‘‘अब सुनयना का ब्याह क्या होगा. उस का 32वां वर्ष खत्म हो रहा है. अब उस को कुंआरा वर शायद ही मिले. विधुर या तलाकशुदा ही मिल सकता है.’’

सुनयना भी ऊब सी गई थी. अपनी सहेली शिल्पा से यों ही कह गई, ‘‘पिताजी की सनक भी खूब है. जिद में पड़े हैं. क्या भारतीय प्रशासनिक सेवा वालों को छोड़ कर और अच्छे लड़के नहीं मिल सकते समाज में? अच्छा हुआ कि नानीजी ने ऐसा नहीं सोचा. नहीं तो मां भी अभी तक कुंआरी ही होतीं अथवा कुंआरी ही मर चुकी होतीं.’’

वैसे हर कन्या चाहती है कि उस का पति कमाने वाला हो, पर कमाई से भी बढ़ कर वह अच्छे स्वभाव का स्वस्थ पुरुष पसंद करती है, जिस के पास 2 भुजाएं हैं वह कमाई तो कर ही लेता है.

नृपेंद्रनाथ अब अजीब स्थिति में आ गए थे. वह जिसे पसंद करते उसे वह और उन का परिवार पसंद न आता. कभी कुछ बात बनती भी तो कन्या की उम्र और सांवलापन आड़े आ जाता.

पुत्रों को अपनी मस्ती से मतलब था. पत्नी कभीकभी भुनभुना लेती थी. रिश्तेदारों और सुहृदों ने जिक्र करना ही छोड़ दिया था.

नृपेंद्रनाथ मूर्ख नहीं थे, पर उन की सनक ने उन्हें मूर्खता की हद तक पहुंचा दिया था. उन की सनक ध्यान ही न दे पाती थी कि कन्या के विचारों में कुंठाएं घर कर चुकी हैं और शरीर की कोमलता जठरता में बदल चुकी है. किसी विवाह या अन्य समारोह में जाने पर वह अलगथलग पड़ जाती. लोग कहते कुछ न थे पर उन की निगाहें उस में एक अजीब सी सनसनाहट पैदा कर देती थीं. यही सनसनाहट एक अजीब सी ग्रंथि को जन्म दे चुकी थी.

एक बूढ़ी महिला ने सुनयना को बिना सुहाग चिह्नों के देखा तो दुखी हो कर उस की मामी से कह ही डाला, ‘‘क्या यह जवानी में ही विधवा हो गई?’’

मामी ने उस का मुंह पकड़ा, ‘‘ताईजी, अभी तो इस का विवाह ही नहीं हुआ है. इस के पिताजी इस के लिए काफी दिनों से अच्छा लड़का तलाश रहे हैं.’’

बूढ़ी का पोपला मुंह और बिगड़ गया. कुछ तो प्रकृति ने पहले से बिगाड़ दिया था, ‘‘इस का बाप तो मूर्ख लगता है. गरीब से गरीब लड़की का ब्याह हो जाता है. अगर इस के बाप के पास कुछ नहीं है तो भी एक जोड़ी कपड़े में ही किसी को कन्या का दान कर देता. बेचारी कुंआरी विधवा बन कर तो न घूमती.’’

मामी ने राज उजागर कर दिया, ‘‘इस के पिताजी गरीब नहीं हैं, पैसे वाले हैं. पैसा जब अधिक हो जाता है तो दिमाग को खराब कर देता है और आदमी औकात से बढ़ कर सोचने लगता है. इस के पिताजी अगर औकात से बढ़ कर न सोचते तो आज से वर्षों पूर्व इस का विवाह हो जाता. अब तक बालबच्चों वाली हो गई होती.’’

बूढ़ी ने आगे कहना चाहा तो सुनयना की मामी ने रोक दिया, ‘‘रहने दो, ताईजी, अगर किसी के कान में भनक पड़ गई तो अच्छा नहीं होगा.’’

बात आईगई हो गई, पर कोई बात अगर मुख से निकल जाए तो किसी न किसी प्रकार किसी न किसी कान में पहुंच ही जाती है.

कुंआरी विधवा की बात सुन कर नृपेंद्रनाथ खूब बड़बड़ाए. कहने वाली को उलटीसीधी सुनाईं. पर वह सामने न थी. लेकिन उन की सनक पर इतना असर जरूर पड़ा कि भारतीय प्रशासनिक सेवा की शर्त को प्रांतीय प्रशासनिक सेवा में बदल दिया. बाकी शर्तें पूर्ववत ही रहीं.

फिलहाल किसी में इतना दम बाकी न था कि उन्हें समझा पाए कि फसल यदि समय से न बोई जाए और उगे पौधों को समय से पानी न दिया जाए तो अच्छी जुताई और भरपूर खाद देने के बावजूद फसल पर पीलापन छा जाता है. उपज मात्र भूसा रह जाती है. दानों के लिए तरसना पड़ता है.

सुनयना अब भी कुंआरी ही है. बाप की सनक उसे जला चुकी है. रहीसही कमी भी पूरी करती जा रही है.

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Short Stories in Hindi : ट्रिन ट्रिन…फोन की घंटी बजती जा रही थी मगर इस से बेखबर आलोक टीवी पर विश्व कप फुटबाल मैच संबंधी समाचार सुनने में व्यस्त थे. तब मैं बच्चों का नाश्ता पैक करती हुई उन पर झुंझला पड़ी, ‘‘अरे बाबा, जरा फोन तो अटेंड कीजिए, मैं फ्री नहीं हूं. ये समाचार तो दिन में न जाने कितनी बार दोहराए जाएंगे.’’

आलोक चौंकते हुए उठे और अपनी स्टाइल में फोन रिसीव किया, ‘‘हैलो…आलोक एट दिस एंड.’’

स्कूल जाते नेहा और अतुल को छोड़ने मैं बाहर की ओर चल पड़ी. दोनों को रिकशे में बिठा कर लौटी तो देखा, आलोक किसी से बात करने में जुटे थे. मुझे देखते ही बोले, ‘‘रंजू, तुम्हारा फोन है. कोई मिस्टर अनुराग हैं जो सिर्फ तुम से बात करने को बेताब हैं,’’ कह कर उन्होंने रिसीवर मुझे थमा दिया और खुद अपने छूटते समाचारों की ओर दौड़ पड़े.

मुझे कुछ याद ही नहीं आ रहा था कि कौन अनुराग है जिसे मैं जानती हूं, पर बात तो करनी ही थी सो बोल पड़ी, ‘‘हैलो, मैं रंजू बोल रही हूं…क्या मैं जान सकती हूं कि आप कौन साहब बोल रहे हैं?’’

‘‘मैं अनुराग, पहचाना मुझे? जरा दिमाग पर जोर डालना पड़ेगा. इतनी जल्दी भुला दिया मुझे?’’ फोन करने वाला जब अपना परिचय न दे कर मजाक करने लगा और पहेलियां बुझाने लगा तो मुझे बहुत गुस्सा आया कि पता नहीं कौन है जो इस तरह की बातें कर रहा है, पर आवाज कुछ जानीपहचानी सी लग रही थी. इसलिए अपनी वाणी पर अंकुश लगाती हुई मैं बोली, ‘‘माफ कीजिएगा, अब भी मैं आप को पहचान नहीं पाई.’’

‘‘मेरी प्यारी बहना, अपने सौरभ भाई की आवाज भी तुम पहचान नहीं पाओगी, ऐसा तो मैं ने सोचा ही नहीं था.’’

‘‘सौरभ भाई, आप…वाह…, तो मुझे उल्लू बनाने के लिए अपना नाम अनुराग बता रहे थे,’’ खुशी से मैं इतनी जोर से चीखी कि आलोक घबरा कर मेरे पास दौड़े चले आए.

‘‘क्या हुआ? इतनी जोर से क्यों चीखीं? कहीं छिपकली दिख गई क्या?’’

मैं इनकार में सिर हिलाती हुई हंस पड़ी, क्योंकि छिपकली देख कर भी मैं डर के मारे हमेशा चीख पड़ती हूं. फिर रिसीवर में माउथपीस पर हाथ रख कर बोली, ‘‘जरा रुकिए, अभी आ कर बताती हूं,’’ तो आलोक लौट गए.

‘‘हां, अब बताइए भाई, इतने दिनों बाद बहन की याद आई? कब आए आप स्ंिगापुर से? बाकी लोग कैसे हैं?’’ मैं ने सवालों की झड़ी लगा दी.

‘‘फिलहाल किसी के बारे में मुझे कोई खबर नहीं है, क्योंकि सब से ज्यादा मुझे सिर्फ तुम्हारी याद आई, इसलिए भारत आने के बाद सब से पहले मैं ने तुम्हें फोन किया. तुम से मिलने मैं कल ही तुम्हारे घर आ रहा हूं. पूरे 2 दिन तुम्हें बोर होना पड़ेगा. इसलिए कमर कस कर तैयार हो जाओ. बाकी बातें अब तुम्हारे घर पर ही होंगी, बाय,’’ इतना कह कर भाई ने फोन काट दिया.

सौरभ भाई कल सच में हमारे घर आने वाले हैं, सोच कर मैं खुशी से झूम उठी. 10 साल हो गए थे उन्हें देखे. आखिरी बार उन्हें अपनी शादी के वक्त देखा था.

अपने मातापिता की मैं अकेली संतान थी, पर दोनों चचेरे भाई सौरभ और सौभिक मुझ पर इतना प्यार लुटाते

थे कि मुझे कभी एहसास ही न हुआ कि मेरा अपना कोई सगा भाई या बहन नहीं है. काकाकाकी की तो मैं वैसे भी लाड़ली थी.

इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि हम भुवनेश्वर में रहते थे और काका का परिवार पुरी में. हमारा लगभग हर सप्ताह ही एकदूसरे से मिलनाजुलना हो जाता था. इसलिए 60-65 किलोमीटर की दूरी हमारे लिए कोई माने नहीं रखती थी.

मेरी सौभिक भाई से उतनी नहीं पटती थी, जितनी सौरभ भाई से. मेरे प्यारे और चहेते भैया तो सौरभ भाई ही थे. उन के अलावा समुद्र का आकर्षण ही था जो प्रत्येक सप्ताह मुझे पुरी खींच लाता था.

उन दिनों मैं दर्शनशास्त्र में एम.ए. कर रही थी इसलिए सौरभ भाई की जीवनदर्शन की गहरी बातें मुझे अच्छी लगती थीं. एक दिन वह कहने लगे, ‘रंजू, अपने भाई की एक बात गांठ बांध लो, गलती स्वीकार करने में ही समझदारी होती है. जीवन कोई कोर्ट नहीं है जहां कभीकभी गलत बात को भी तर्क द्वारा सही साबित कर दिया जाता है.’

मैं उन का मुंह ताकती रह गई तो वह आगे बोले, ‘तुम शायद ठीक से मेरी बात समझ नहीं पाईं. ठीक है, इस बात को मैं तुम्हें फिल्मी भाषा में समझाता हूं. थोड़ी देर पहले तुम ‘आनंद’ फिल्म का जिक्र कर रही थीं. मैं ने भी देख रखी है यह फिल्म. इस के एक सीन में जब अमिताभ रमेश देव से पूछता है कि तुम ने क्यों उस धनी सेठ को कोई बीमारी न होते हुए भी झूठमूठ की महंगी गोलियां दे कर एक मोटी रकम झटक ली. तो इस पर रमेश देव कहता है कि अगर ऐसे धनी लोगों को बेवकूफ बना कर मैं पैसे नहीं लूंगा तो गरीब लोगों का मुफ्त इलाज कैसे करूंगा?

‘एक नजर में रमेश देव का यह तर्क सही भी लगता है, परंतु सचाई की कसौटी पर परखा जाए तो क्या वह गलत नहीं था? अगर किसी गरीब की वह मदद करना चाहता था तो अपनी ओर से जितनी हो सके करनी चाहिए थी. इस के लिए किसी अमीर को लूटना न तो न्यायसंगत है और न ही तर्कसंगत, इसलिए ज्ञानी पुरुष गलत बात को सही साबित करने के लिए तर्क नहीं दिया करते बल्कि उस भूल को सुधारने का प्रयास करते हैं.’

एक दिन कालिज से घर लौटी तो मां एक खुशखबरी के साथ मेरा इंतजार कर रही थीं. मुझे देखते ही बोलीं, ‘सुना तू ने, तेरे काका का फोन आया था कि कल तेरे सौरभ भाई के लिए लड़की देखने कानपुर चलना है. सौरभ ने कहा है कि उसे हम सब से ज्यादा तुझ पर भरोसा है कि तू ही उस के लिए सही लड़की तलाश सकती है.’

मुझे अपनेआप पर नाज हो आया कि मेरे भाई को मुझ पर कितना यकीन है.

दूसरे दिन सौरभ भाई और सौभिक भाई के अलावा हम सब कानपुर पहुंचे तो मैं बहुत खुश थी. हम सभी को लड़की पसंद आ गई. हां, उस की उम्र जरूर मेरी मां और काकी के विचार से कुछ ज्यादा थी, पर आजकल 27 साल में शादी करना कोई खास बात नहीं होती. फिर उसे देख कर कोई 22-23 से ज्यादा की नहीं समझ सकता था.

बैठक में सब को चायनाश्ता देने और थोड़ी देर वहां बैठने के बाद जब भाभी अंदर जाने लगीं तो काकी ने मुझ से कहा, ‘रंजू, तुम अंदर जा कर संगीता के साथ बातें करो. यहां बड़ों के बीच बैठी बोर हो जाओगी. फिर हमें तो कुछ उस से पूछना है नहीं.’

मैं भी भाभी के साथ बात करना चाहती थी, इसलिए अंदर चली गई. तभी उन के  घर में भाभी के बचपन से काम करने वाली आया कमली ने उन्हें एक टेबलेट खाने को दी. मेरे कुछ पूछने से पहले की कमली बोली, ‘शायद घबराहट के मारे बेबी के सिर में कुछ दर्द सा होने लगा है. आप तो समझ ही सकती हैं क्योंकि आप भी लड़की हैं.’

इस पर मैं बोली, ‘मैं समझ सकती हूं, पर च्ंिता करने की कोई बात नहीं है. हम सब को भाभी पहले ही पसंद आ चुकी हैं.’

भाभी ने तब तल्ख स्वर में कहा था, ‘पसंद तो सभी करते हैं पर शादी कोई नहीं.’

‘पर हम तो आज सगाई भी कर के जाने वाले हैं.’ मुझे लगा कि पहले कोई रिश्ता नहीं हो पाया होगा इसलिए भाभी ऐसे बोल रही हैं.

फिर सगाई कर के ही लौटे थे. इस के 10 दिन बाद सौरभ भाई के पास एक गुमनाम फोन आया कि जिस लड़की से आप शादी करने जा रहे हैं वह एक गिरे हुए चरित्र की लड़की है. अपने स्वभाव के मुताबिक सुनीसुनाई बात पर यकीन न करते हुए भाई ने फोन करने वाले से सख्त लहजे में कहा था, ‘आप को इस विषय में च्ंिता करने की कोई आवश्यकता नहीं है. उस के चरित्र के विषय में मुझे सब पता है.’

करीब एक महीने बाद ही धूमधाम से हम सब संगीता भाभी को दुलहन बना कर घर ले आए. उन के साथ दहेज में कमली भी आई थी. हमारे घर वालों ने सोचा ससुराल में भाभी को ज्यादा परेशानी न हो इस वजह से उन के मायके वालों ने उसे साथ भेजा है.

सौरभ भाई खूबसूरत दुलहन पा कर बहुत खुश थे. दुलहन पसंद करने के एवज में मैं ने उन से लाकेट समेत सोने की खूबसूरत एक चेन और कानों की बालियां मांगी थीं जो शादी के दिन ही उन्होंने मुझे दे दी थीं.

अगले दिन जब मैं फूलों का गजरा देने भाभी के कमरे की ओर जा रही थी तो मैं ने सौभिक भाई को छिप कर भाभी के कमरे में झांकते हुए देखा. मैं ने उत्सुकतावश घूम कर दूसरी ओर की खिड़की से कमरे के अंदर देखा तो दंग रह गई. भाभी सिर्फ साया और ब्लाउज पहने घुटने मोड़ कर पलंग पर बैठी थीं. साया भी घुटने तक चढ़ा हुआ था जिस में गोरी पिंडलियां छिले हुए केले के तने जैसी उजली और सुंदर लग रही थीं. उन के गीले केशों से टपकते हुए पानी से पीछे ब्लाउज भी गीला हो रहा था. उस पर गहरे गले का ब्लाउज पुष्ट उभारों को ढकने के लिए अपर्याप्त लग रहा था. इस दशा में वह साक्षात कामदेव की रति लग रही थीं.

सहसा ही मैं स्वप्नलोक की दुनिया से यथार्थ के धरातल पर लौट आई. फिर सधे कदमों से जा कर पीछे से सौभिक भाई की पीठ थपथपा दी और अनजान सी बनती हुई बोली, ‘भाई, तुम यहां खड़े क्या कर रहे हो? बाहर काका तुम्हें तलाश रहे हैं.’

सौभिक भाई बुरी तरह झेंप गए, बोले, ‘वो…वो…मैं. सौरभ भाई को ढूंढ़ रहा था.’

वह मुझ से नजरें चुराते हुए बिजली की गति से वहां से चले गए. मैं गजरे की थाली लिए भाभी के कमरे में अंदर पहुंची. ‘यह क्या भाभी? इस तरह क्यों बैठी हो? जल्दी से साड़ी बांध कर तैयार हो जाओ, तुम्हें देखने आसपास के लोग आते ही होंगे.’

‘मुझे नहीं पता साड़ी कैसे बांधी जाती है. कमली मेरे लिए दूध लेने गई है, वही आ कर मुझे साड़ी पहनाएगी,’ भाभी का स्वर एकदम सपाट था.

‘अच्छा, लगता है, तुम सिर्फ सलवारसूट ही पहनती हो. आओ, मैं तुम्हें बताती हूं कि साड़ी कैसे बांधी जाती है. मैं तो कभीकभी घर पर शौकिया साड़ी बांध लेती हूं.’

बातें करते हुए मैं ने उन की साड़ी बांधी. फिर केशों को अच्छी तरह पोंछ कर हेयर ड्रायर से सुखा कर पोनी बना दी. फिर हेयर पिन से मोगरे का गजरा लगाया और चेहरे का भी पूरा मेकअप कर डाला. सब से अंत में मांग भरने के बाद जब मैं ने उन के माथे पर मांगटीका सजाया तो कुछ पलों तक मैं खुद उस अपूर्व सुंदरी को निहारती रह गई.

इतनी देर तक मैं उन से अकेले ही बात करती रही. उन का चेहरा एकदम निर्विकार था. पूरे शृंगार के बावजूद कुछ कमी सी लग रही थी. शायद वह कमी थी भाभी के मुखड़े पर नजर न आने वाली स्वाभाविक लज्जा, क्योंकि यही तो वह आभूषण है जो एक भारतीय दुलहन की सुंदरता में चार चांद लगा देता है. ऐसा क्यों था, मैं तब समझ नहीं पाई थी, परंतु अगली रात को रिसेप्शन पार्टी के वक्त इस का राज खुल गया.

वह रात शायद सौरभ भाई के जीवन की सब से दुख भरी रात थी.

उस दिन मौका मिलने पर जबतब मैं सौरभ भाई को भाभी का नाम ले कर छेड़ती थी. रात को रिसेप्शन पार्टी पूरे शबाब पर थी. दूल्हादुलहन को मंडप में बिठाया गया था. लोग तोहफे और बुके ले कर जब दुलहन के पास पहुंचते तो इतनी सुंदर दुलहन देख पलक झपकाना भूल जाते. हम सब खुश थे, पर हमारी खुशी पर जल्दी ही तुषारापात हो गया.

वह पूर्णिमा की रात थी. हर पूर्णिमा को ज्वारभाटे के साथ समुद्र का शोर इतना बढ़ जाता कि काका के घर तक साफ सुनाई पड़ता. उस वक्त ऐसा ही लगा था जैसे अचानक ही शांत समुद्र में इस कदर ज्वारभाटा आ गया हो जो हमारे घर के अमनचैन को तबाह और बरबाद कर डालने पर उतारू हो. मेरे मन में भी शायद समुद्र से कम ज्वारभाटे न थे.

अचानक ही दुलहन बनी भाभी अपने शरीर की हरेक वस्तु को नोंचनोंच कर फेंकने लगीं, फिर पूरे अहाते में चीखती हुई इधर से उधर दौड़ने लगीं. बड़ी मुश्किल से उन्हें काबू में किया गया. कमली ने दौड़ कर कोई दवा भाभी को खिलाई तो वह धीरेधीरे कुरसी पर बेहोश सी पड़ गईं. तब भाभी को उठा कर कमरे में लिटा दिया गया. फिर तो सभी लोगों ने कमली को कटघरे में ला खड़ा किया. उस का चेहरा सफेद पड़ चुका था. उस ने डरते और रोते हुए बताया, ‘पिछले 4 सालों से संगीता बेबी को अचानक दौरे पड़ने शुरू हो गए. रोज दवा लेने से वह कुछ ठीक रहती हैं, परंतु अगर किसी कारणवश 10-11 दिन तक दवा नहीं लें तो दौरा पड़ जाता है. यह सब जान कर कौन शादी के लिए तैयार होता? इसलिए इस बारे में कुछ न बता कर यह शादी कर दी गई.

‘मैं ने उन्हें बचपन से पाला है, इसलिए मुझे साथ भेज दिया गया ताकि उन्हें समय से दवा खिला सकूं. सब ने सोचा कि नियति ने चाहा तो किसी को पता नहीं चलेगा, पर शायद नियति को यह मंजूर नहीं था,’ कह कर कमली फूटफूट कर रोने लगी.

काकी तो यह सुन कर बेहोश हो गईं. मां ने उन्हें संभाला. घर के सभी लोग एकदम आक्रोश से भर उठे. इतने बड़े धोखे को कोई कैसे पचा सकता था. तुरंत उन के मायके वालों को फोन कर दिया कि आ कर अपनी बेटी को ले जाएं. सहसा ही मैं अपराधबोध से भर उठी थी. जिस भाई ने मुझ पर भरोसा कर के मेरी स्वीकृति मात्र से लड़की देखे बिना शादी कर ली उसी भाई का जीवन मेरी वजह से बरबादी के कगार पर पहुंच गया था. इस की टीस रहरह कर मेरे मनमस्तिष्क को विषैले दंश से घायल करती रही और मैं अंदर ही अंदर लहूलुहान होती रही.

2 दिन बाद भाभी के मातापिता आए. हमारे सारे रिश्तेदारों ने उन्हें जितना मुंह उतनी बातें कहीं. जी भर कर उन्हें लताड़ा, फटकारा और वे सिर झुकाए सबकुछ चुपचाप सुनते रहे. 2 घंटे बाद जब सभी के मन के गुबार निकल गए तो भाभी के पिता सब के सामने हाथ जोड़ कर बोले, ‘आप लोगों का गुस्सा जायज है. हम यह स्वीकार करते हैं कि हम ने आप से धोखा किया. हम अपनी बेटी को ले कर अभी चले जाएंगे.

‘परंतु जाने से पहले मैं आप लोगों से यह कहना चाहता हूं कि हमारी बेटी कोई जन्म से ऐसी मानसिक रोगी नहीं थी. उसे इस हाल में पहुंचाने वाला आप का यह बेदर्द समाज है. 7 साल पहले एक जमींदार घराने के अच्छे पद पर कार्यरत लड़के के साथ हम ने संगीता का रिश्ता तय किया था. सगाई होने तक तो वे यही कहते रहे कि आप अपनी मरजी से अपनी बेटी को जो भी देना चाहें दे सकते हैं, हमारी ओर से कोई मांग नहीं है. फिर शादी के 2 दिन पहले इतनी ज्यादा मांग कर बैठे जो किसी भी सूरत में हम पूरी नहीं कर सकते थे.

‘अंतत: हम ने इस रिश्ते को यहीं खत्म कर देना बेहतर समझा, परंतु वे इसे अपना अपमान समझ बैठे और बदला लेने पर उतारू हो गए. चूंकि वे स्थानीय लोग थे इसलिए हमारे घर जो भी रिश्ता ले कर आता उस से संगीता के चरित्र के बारे में उलटीसीधी बातें कर के रिश्ता तोड़ने लगे. इस के अलावा वे हमारे जानपहचान वालों के बीच भी संगीता की बदनामी करने लगे.

‘इन सब बातों से संगीता का आत्मविश्वास खोने लगा और वह एकदम गुमसुम हो गई. फिर धीरेधीरे मनोरोगी हो गई. इलाज के बाद भी खास फर्क नहीं पड़ा. जब आप लोग किसी की बातों में नहीं आए तो किसी तरह आप के घर रिश्ता करने में हम कामयाब हो गए.

‘मन से हम इस साध को भी मिटा न सके  कि बेटी का घर बसता हुआ देखें. हम यह भूल ही गए कि धोखा दे कर न आज तक किसी का भला हुआ है और न होगा. हो सके तो हमें माफ कर दीजिए. आप लोगों का जो अपमान हुआ और दिल को जो ठेस पहुंची उस की भरपाई तो मैं नहीं कर पाऊंगा, पर आप लोगों का जितना खर्चा हुआ है वह मैं घर पहुंचते ही ड्राफ्ट द्वारा भेज दूंगा. बस, अब हमें इजाजत दीजिए.’

फिर वह कमली से बोले, ‘जाओ कमली, संगीता को ले आओ.’

यह सुन कर एकदम सन्नाटा छा गया. तभी जाती हुई कमली को रोकते हुए सौरभ भाई बोले, ‘ठहरो, कमली, संगीता कहीं नहीं जाएगी. यह सही है कि इन लोगों ने हमें धोखा दिया और हम सब को ठेस पहुंचाई. इस के लिए इन्हें सजा भी मिलनी चाहिए, और सजा यह होगी कि आज के बाद इन से हमारा कोई संबंध नहीं होगा. परंतु इस में संगीता की कोई गलती नहीं है, क्योंकि उस की मानसिक दशा तो ऐसी है ही नहीं कि वह इन बातों को समझ सके.

‘परंतु मैं ने तो अपने पूरे होशोहवास में मनप्राण से उसे पत्नी स्वीकारा है. अग्नि को साक्षी मान कर हर दुखसुख में साथ निभाने का प्रण किया है. कहते हैं जन्म, शादी और मृत्यु सब पहले से तय होते हैं. अगर ऐसा है तो यही सही, संगीता जैसी भी है अब मेरे साथ ही रहेगी. मैं अपने सभी परिजनों से हाथ जोड़ कर विनती करता हूं

कि मुझे मेरे जीवनपथ से विचलित न करें क्योंकि मेरा निर्णय अटल है.’

सौरभ भाई के स्वभाव से हम सब वाकिफ थे. वह जो कहते उसे पूरा करने में कोई कसर न छोड़ते, इसलिए एकाएक ही मानो सभी को सांप सूंघ गया.

संगीता भाभी के मातापिता सौरभ भाई को लाखों आशीष देते चले गए. बाकी वहां मौजूद सभी नातेरिश्तेदारों में से किसीकिसी ने सौरभ भाई को सनकी, बेवकूफ और पागल आदि विशेषणों से विभूषित किया और धीरेधीरे चलते बने. आजकल किसी के पास इतना वक्त ही कहां होता है कि किसी की व्यक्तिगत बातों और समस्याओं में अपना कीमती वक्त गंवाए.

भाभी के आने के बाद मैं बहुत मौजमस्ती करने की योजना मन ही मन बना चुकी थी, पर अब तो सब मन की मन ही में रही. तीसरे दिन अपने मम्मीपापा के साथ ही मैं ने लौटने का मन बना लिया.

दुखी मन से मैं भुवनेश्वर लौट आई. आने से पहले चुपके से एक रुमाल में सोने की चेन और कानों की बालियां कमली को दे आई कि मेरे जाने के बाद सौरभ भाई को दे देना. जब उन की ज्ंिदगी में बहार आई ही नहीं तो मैं कैसे उस तोहफे को कबूल कर सकती थी.

सौरभ भाई के साथ हुए हादसे को काकी झेल नहीं पाईं और एक साल के अंदर ही उन का देहांत हो गया. काकी के गम को हम अभी भुला भी नहीं पाए थे कि एक दिन नाग के डसने से कमली का सहारा भी टूट गया. बिना किसी औरत के सहारे के सौरभ भाई के लिए संगीता भाभी को संभालना मुश्किल होने लगा था, इसलिए सौरभ भाई ने कोशिश कर के अपना तबादला भुवनेश्वर करवा लिया ताकि मैं और मम्मी उन की देखभाल कर सकें.

मकान भी उन्होंने हमारे घर के करीब ही लिया था. वहां आ कर मेरी मदद से घर व्यवस्थित करने के बाद सब से पहले वह संगीता भाभी को अच्छे मनोचिकित्सक के पास ले गए. मैं भी साथ थी.

डाक्टर ने पहले एकांत में सौरभ भाई से संगीता भाभी की पूरी केस हिस्ट्री सुनी फिर जांच करने के बाद कहा कि उन्हें डिप्रेसिव साइकोसिस हो गया है. ज्यादा अवसाद की वजह से ऐसा हो जाता है. इस में रोेगी जब तक क्रोनिक अवस्था में रहता है तो किसी को जल्दी पता नहीं चल पाता कि अमुक आदमी को कोई बीमारी भी है, परंतु 10 से ज्यादा दिन तक वह दवा न ले तो फिर उस बीमारी की परिणति एक्यूट अवस्था में हो जाती है जिस में रोगी को कुछ होश नहीं रहता कि वह क्या कर रहा है. अपने बाल और कपड़े आदि नोंचनेफाड़ने जैसी हरकतें करने लगता है.

डाक्टर ने आगे बताया कि एक बार अगर यह बीमारी किसी को हो जाए तो उसे एकदम जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता, परंतु जीवनपर्यंत रोजाना इस मर्ज की दवा की एक गोली लेने से सामान्य जीवन जीया जा सकता है. दवा के साथ ही साथ साईकोथैरेपी से मरीज में आश्चर्यजनक सुधार हो सकता है और यह सिर्फ उस के परिवार वाले ही कर सकते हैं. मरीज के साथ प्यार भरा व्यवहार रखने के साथसाथ बातों और अन्य तरीकों से घर वाले उस का खोया आत्मविश्वास फिर से लौटा सकते हैं.

डाक्टर के कहे अनुसार हम ने भाभी का इलाज शुरू कर दिया. मां तो अपने घर के काम में ही व्यस्त रहती थीं, इसलिए भाई की अनुपस्थिति में भाभी के साथ रहने और उन में आत्मविश्वास जगाने के लिए मैं ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी. भाई और मैं बातोंबातों में निरंतर उन्हें यकीन दिलाने की कोशिश करते कि वह बहुत अच्छी हैं, सुंदर हैं और हरेक काम अच्छी तरह कर सकती हैं.

शुरू में वह नानुकर करती थीं, फिर धीरेधीरे मेरे साथ खुल गईं. हम तीनों मिल कर कभी लूडो खेलते, कभी बाहर घूमने चले जाते.

लगातार प्रयास से 6 महीने के अंदर संगीता भाभी में इतना परिवर्तन आ गया कि वह हंसनेमुसकराने लगीं. लोगों से बातें करने लगीं और नजदीक के बाजार तक अकेली जा कर सब्जी बगैरह खरीद कर लाने लगीं. दूसरे लोग उन्हें देख कर किसी भी तरह से असामान्य नहीं कह सकते थे. यों कहें कि वह काफी हद तक सामान्य हो चुकी थीं.

हमें आश्चर्य इस बात का हो रहा था कि इस बीच न तो काका और न ही सौभिक भाई कभी हालचाल पूछने आए, पर सब कुछ ठीक चल रहा था, इसलिए हम ने खास ध्यान नहीं दिया.

इस के 5 महीने बाद ही मेरी शादी हो गई और मैं अपनी ससुराल दिल्ली चली गई. ससुराल आ कर धीरेधीरे मेरे दिमाग से सौरभ भाई की यादें पीछे छूटने लगीं क्योंकि आलोक के अपने मातापिता के एकलौते बेटे होने के कारण वृद्ध सासससुर की पूरी जिम्मेदारी मेरे ऊपर थी. उन्हें छोड़ कर मेरा शहर से बाहर जाना मुश्किल था.

मेरे ससुराल जाने के 2 महीने बाद ही पापा ने एक दिन फोन किया कि अच्छी नौकरी मिलने के कारण सौरभ भाई संगीता भाभी के साथ सिंगापुर चले गए हैं. फिर तो सौरभ भाई मेरे जेहन में एक भूली हुई कहानी बन कर रह गए थे.

अचानक किसी के हाथ की थपथपाहट मैं ने अपने गाल पर महसूस की तो सहसा चौंक पड़ी और सामने आलोक को देख कर मुसकरा पड़ी.

‘‘कहां खोई हो, डार्ल्ंिग, कल तुम्हारे प्यारे सौरभ भाई पधार रहे हैं. उन के स्वागत की तैयारी नहीं करनी है?’’ आलोक बोले. वह सौरभ भाई के प्रति मेरे लगाव को अच्छी तरह जानते थे.

‘‘अच्छा, तो आप को पता था कि फोन सौरभ भाई का था.’’

‘‘हां, भई, पता तो है, आखिर वह हमारे साले साहब जो ठहरे. फिर मैं ने ही तो उन से पहले बात की थी.’’

दूसरे दिन सुबह जल्दी उठ कर मैं ने नहाधो कर सौरभ भाई के मनपसंद दमआलू और सूजी का हलवा बना कर रख दिया. पूरी का आटा भी गूंध कर रख दिया ताकि उन के आने के बाद जल्दी से गरमगरम पूरियां तल दूं.

आलोक उठ कर तैयार हो गए थे और बच्चे भी तैयार होने लगे थे. रविवार होने की वजह से उन्हें स्कूल तो जाना नहीं था. कोई गाड़ी घर के बाहर से गुजरती तो मैं खिड़की से झांक कर देखने लगती. आलोक मेरी अकुलाहट देख कर मंदमंद मुसकरा रहे थे.

आखिर जब तंग आ कर मैं ने देखना छोड़ दिया तो अचानक पौने 9 बजे दरवाजे की घंटी बज उठी. मैं ने दौड़ कर दरवाजा खोला तो सामने सदाबहार मुसकान लिए सौरभ भाई अटैची के साथ खड़े थे. वह तो वैसे ही थे, बस बदन पहले की अपेक्षा कुछ भर गया था और मूंछें भी रख ली थीं.

उन से पहली बार मिलने के कारण बच्चे नमस्ते करने के बाद कुछ सकुचाए से खड़े रहे. सौरभ भाई ने घुटनों के बल बैठते हुए अपनी बांहें पसार कर जब उन्हें करीब बुलाया तो दोनों बच्चे उन के गले लग गए.

मैं भाई को प्रणाम करने के बाद दरवाजा बंद करने ही वाली थी कि वह बोले, ‘‘अरे, क्या अपनी भाभी और भतीजे को अंदर नहीं आने दोगी?’’

मैं हक्कीबक्की सी उन का मुंह ताकने लगी क्योंकि उन्होंने भाभी और भतीजे के बारे में फोन पर कुछ कहा ही नहीं था. तभी भाभी ने अपने 7 वर्षीय बेटे के साथ कमरे में प्रवेश किया.

कुछ पलों तक तो मैं कमर से भी नीचे तक चोटी वाली सुंदर भाभी को देख ठगी सी खड़ी रह गई, फिर खुशी के अतिरेक में उन के गले लग गई.

सभी का एकदूसरे से मिलनेमिलाने का दौर खत्म होने और थोड़ी देर बातें करने के बाद भाभी नहाने चली गईं. फिर नाश्ते के बाद बच्चे खेलने में व्यस्त हो गए और आलोक तथा सौरभ भाई अपने कामकाज के बारे में एकदूसरे को बताने लगे.

थोड़ी देर उन के साथ बैठने के बाद जब मैं दोपहर के भोजन की तैयारी करने रसोई में गई तो मेरे मना करने के बावजूद संगीता भाभी काम में हाथ बंटाने आ गईं. सधे हाथों से सब्जी काटती हुई वह सिंगापुर में बिताए दिनों के बारे में बताती जा रही थीं. उन्होंने साफ शब्दों में स्वीकारा कि अगर सौरभ भाई जैसा पति और मेरी जैसी ननद उन्हें नहीं मिलती तो शायद वह कभी ठीक नहीं हो पातीं. भाभी को इस रूप में देख कर मेरा अपराधबोध स्वत: ही दूर हो गया.

दोपहर के भोजन के बाद भाभी ने कुछ देर लेटना चाहा. आलोक अपने आफिस के कुछ पेंडिंग काम निबटाने चले गए. बच्चे टीवी पर स्पाइडरमैन कार्टून फिल्म देखने में खो गए तो मुझे सौरभ भाई से एकांत में बातें करने का मौका मिल गया.

बहुतेरे सवाल मेरे मानसपटल पर उमड़घुमड़ रहे थे जिन का जवाब सिर्फ सौरभ भाई ही दे सकते थे. आराम से सोफे  पर पीठ टिका कर बैठती हुई मैं बोली, ‘‘अब मुझे सब कुछ जल्दी बताइए कि मेरी शादी के बाद क्या हुआ. मैं सब कुछ जानने को बेताब हूं,’’ मैं अपनी उत्सुकता रोक नहीं पा रही थी.

भैया ने लंबी सांस छोड़ते हुए कहना शुरू किया, ‘‘रंजू, तुम्हारी शादी के बाद कुछ भी ऐसा खास नहीं हुआ जो बताया जा सके. जो कुछ भी हुआ था तुम्हारी शादी से पहले हुआ था, परंतु आज तक मैं तुम्हें यह नहीं बता पाया कि पुरी से भुवनेश्वर तबादला मैं ने सिर्फ संगीता के लिए नहीं करवाया था, बल्कि इस की और भी वजह थी.’’

मैं आश्चर्य से उन का मुंह देखने लगी कि अब और किस रहस्य से परदा उठने वाला है. मैं ने पूछा, ‘‘और क्या वजह थी?’’

‘‘मां के बाद कमली किसी तरह सब संभाले हुए थी, परंतु उस के गुजरने के बाद तो मेरे लिए जैसे मुसीबतों के कई द्वार एकसाथ खुल गए. एक दिन संगीता ने मुझे बताया कि सौभिक ने आज जबरन मेरा चुंबन लिया. जब संगीता ने उस से कहा कि वह मुझ से कह देंगी तो माफी मांगते हुए सौभिक ने कहा कि यह बात भैया को नहीं बताना. फिर कभी वह ऐसा नहीं करेगा.

‘‘यह सुन कर मैं सन्न रह गया. मैं तो कभी सोच भी नहीं सकता था कि मेरा अपना भाई भी कभी ऐसी हरकत कर सकता है. बाबा को मैं इस बात की भनक भी नहीं लगने देना चाहता था, इसलिए 2-4 दिन की छुट्टियां ले कर दौड़धूप कर मैं ने हास्टल में सौभिक के रहने का इंतजाम कर दिया. बाबा के पूछने पर मैं ने कह दिया कि हमारे घर का माहौल सौभिक की पढ़ाई के लिए उपयुक्त नहीं है.

‘‘वह कुछ पूछे बिना ही हास्टल चला गया क्योंकि उस के मन में चोर था. रंजू, आगे क्या बताऊं, बात यहीं तक रहती तो गनीमत थी, पर वक्त भी शायद कभीकभी ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करता है कि अपना साया भी साथ छोड़ देता नजर आता है.

‘‘मेरी तो कहते हुए जुबान लड़खड़ा रही है पर लोगों को ऐसे काम करते लाज नहीं आती. कामांध मनुष्य रिश्तों की गरिमा तक को ताक पर रख देता है. उस के सामने जायजनाजायज में कोई फर्क नहीं होता.

‘‘एक दिन आफिस से लौटा तो अपने कमरे में घुसते ही क्या देखता हूं कि संगीता घोर निद्रा में पलंग पर सोई पड़ी है क्योंकि तब उस की दवाओं में नींद की गोलियां भी हुआ करती थीं. उस के कपड़े अस्तव्यस्त थे. सलवार के एक पैर का पायंचा घुटने तक सिमट आया था और उस के अनावृत पैर को काका की उंगलियां जिस बेशरमी से सहला रही थीं वह नजारा देखना मेरे लिए असह्य था. मेरे कानों में सीटियां सी बजने लगीं और दिल बेकाबू होने लगा.

‘‘किसी तरह दिल को संयत कर मैं यह सोच कर वापस दरवाजे की ओर मुड़ गया और बाबा को आवाज देता हुआ अंदर आया जिस से हम दोनों ही शर्मिंदा होने से बच जाएं. जब मैं दोबारा अंदर गया तो बाबा संगीता को चादर ओढ़ा रहे थे, मेरी ओर देखते हुए बोले, ‘अभीअभी सोई है.’ फिर वह कमरे से बाहर निकल गए. इन हालात में तुम ही कहो, मैं कैसे वहां रह सकता था? इसीलिए भुवनेश्वर तबादला करा लिया.’’

‘‘यकीन नहीं होता कि काका ने ऐसा किया. काकी के न रहने से शायद परिस्थितियों ने उन का विवेक ही हर लिया था जो पुत्रवधू को उन्होंने गलत नजरों से देखा,’’ कह कर शायद मैं खुद को ही झूठी दिलासा देने लगी.

भाई आगे बोले, ‘‘रिश्तों का पतन मैं अपनी आंखों से देख चुका था. जब रक्षक ही भक्षक बनने पर उतारू हो जाए तो वहां रहने का सवाल ही पैदा नहीं होता. इत्तिफाकन जल्दी ही मुझे सिंगापुर में एक अच्छी नौकरी मिल गई तो मैं संगीता को ले कर हमेशा के लिए उस घर और घर के लोगों को अलविदा कह आया ताकि दुनिया के सामने रिश्तों का झूठा परदा पड़ा रहे.

‘‘जब मुझे यकीन हो गया कि दवा लेते हुए संगीता स्वस्थ और सामान्य जीवन जी सकती है तो डाक्टर की सलाह ले कर हम ने अपना परिवार आगे बढ़ाने का विचार किया. जब मुझे स्वदेश की याद सताने लगी तो इंटरनेट के जरिए मैं ने नौकरी की तलाश जारी कर दी. इत्तिफाक से मुझे मनचाही नौकरी दिल्ली में मिल गई तो मैं चला आया और सब से पहले तुम से मिला. अब और किसी से मिलने की चाह भी नहीं है,’’ कह कर सौरभ भाई चुप हो गए.

वह 2 दिन रह कर लाजपतनगर स्थित अपने नए मकान में चले गए. मैं बहुत खुश थी कि अब फिर से सौरभ भाई से मिलना होता रहेगा. मेरे दिल से

मानो एक बोझ उतर गया था क्योंकि हो न हो मेरी ही वजह से पतझड़ में

तब्दील हो गए मेरे प्रिय और आदरणीय भाई के जीवन में भी आखिर वसंत आ ही गया.

जातेजाते भाभी ने मेरे हाथ में छोटा सा एक पैकेट थमा दिया. बाद में उसे मैं ने खोला तो उस में उन की शादी के वक्त मुझे दी गई चेन और कानों की बालियों के साथ एक जोड़ी जड़ाऊ कंगन थे, जिन्हें प्यार से मैं ने चूम लिया.

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