महायोग: धारावाहिक उपन्यास, भाग-23

अब तक की कथा 

भविष्य के तानोंबानों में लिपटी दिया अपने घर पहुंच गई थी, जहां अनेक अनसुलझे प्रश्न उस के समक्ष मुंहबाए खड़े थे. दादी अतिउत्साहित थीं परंतु दिया किसी से भी बात नहीं करना चाहती थी. वह सीधे अपने कमरे में आराम करने चली गई थी.

अब आगे…

‘अरे, ऐसी भी क्या नींद हो गई, लड़की सीधे मुंह बात भी नहीं कर रही है,’ स्वभावानुसार दादी ने बड़बड़ करनी शुरू कर दी थी.कामिनी 3 बार दिया के कमरे में  झांक आई थी. हर बार दिया उसे गहरी नींद में सोती हुई दिखाई दी. चाय के समय उस से रहा नहीं गया. सुबह से बच्ची ने कुछ भी नहीं खाया था. आखिर दिया को नीचे उतरते देख दीप चहका, ‘‘क्या महारानी, जल्दी आओ न, कितना इंतजार करवाओगी?’’ दीप वातावरण को सहज करना चाहता था. आखिर कहीं न कहीं से, किसी को तो बात शुरू करनी ही होगी. दिया चुपचाप टेबल पर बैठ गई.

‘‘महाराज, फटाफट चाय लगाइए. देख दिया, कैसे करारे गरमागरम समोसे उतारे हैं महाराज ने,’’ दीप ने गरम समोसा हाथ में उठाया फिर एकदम प्लेट में छोड़ कर अपनी उंगलियों पर जोकर की तरह फूफू करने लगा. दिया के चेहरे पर भाई की हरकत देख कर पहली बार मुसकराहट उभरी. आदत के अनुसार, दीप की बकबक शुरू हो गई और दिया की मुसकराहट गहरी होती गई. भरे दिल और नम आंखों से उस ने सोचा, ‘यह है मेरा घर.’

‘‘सुबह मंगवाई थी रसमलाई तेरे लिए. अभी तक किसी ने छुई भी नहीं…दीनू, निकाल के तो ला फ्रिज से,’’ दादी के प्यार का तरीका यही था.

‘‘अब बता कैसी है तेरी ससुराल? और हां, फोन खराब है क्या? कई दिनों से कोई फोन ही नहीं उठा रहा था. कहीं घूमनेवूमने निकल गए थे क्या सब के सब? तेरी सास और नील तो ठीक हैं न? अभी तो रहेगी न? और हां, तेरा सामान कहां है?’’

दादी ने एक बड़े से बाउल में दिया के सामने 5-7 रसमलाई रख दीं और दिया को उस ओर देखने का समय दिए बिना ही अपनी प्रश्नोंभरी बंदूक उस की ओर तान दी.

‘‘मां, पहले उस के पेट में कुछ जाने दें. सुबह से कुछ भी नहीं खाया उस ने,’’ यश ने बिटिया पर दृष्टि गड़ा रखी थी.

‘‘ले, इतना कुछ सामने है, खाती जा बात करती जा. लड़की बात ही नहीं बता रही अपनी ससुराल की.’’

‘‘क्या चाहती हैं आप? क्या बताऊं?’’ दिया बोली, ‘‘जब आप ने मेरे ग्रहों को मिलवाने और उन को ठीक करवाने में इतनी मशक्कत की है तो सब बढि़या ही होगा न? फिर जानना क्या चाहती हैं आप?’’ दिया गुस्से में बोल उठी थी.

‘‘अरे, देखो तो, लड़की है या…’’

दादी अपना वाक्य पूरा कर पातीं इस से पहले ही दीनू तेजी से अंदर आया, ‘‘साब, गहलौत साब आए हैं. मेमसाब भी हैं. पुलिस की गाड़ी वाले…’’

‘‘क्या? डीआईजी गहलौत?’’ स्वदीप ने दोहराया और उठ कर बाहर की ओर चल दिया.

डीआईजी गहलौत शर्मा परिवार से अच्छी प्रकार परिचित थे. कुछ ही क्षणों में गहलौत साहब और उन की पत्नी बरामदे में पहुंच गए थे. अभिवादन के बाद दीनू को ड्राइंगरूम खोलने का आदेश मिला. ‘‘अरे नहीं, गहलौत साहब यहीं बैठेंगे,’’ उन्होंने एक कुरसी सरका ली और पत्नी को भी बैठने का इशारा किया.

‘‘हैलो दिया, कैसी हो बेटी?’’

‘‘जी, ठीक हूं अंकल, थैंक्स,’’ दिया ने गहलौत अंकल का अभिवादन किया.

गहलौत साहब इधरउधर की बातें करने लगे. कामिनी को उन का इस समय आना बहुत अजीब लग रहा था. शायद किसी काम से आए हों परंतु…

‘‘आज इधर की तरफ कैसे गहलौत साहब?’’ यशेंदु भी उन के आने के बारे में हिसाबकिताब लगा रहे थे.

गहलौत साहब ने बड़ी स्पष्टता से अपनी बात कह दी फिर दिया की ओर उन्मुख हो गए, ‘‘तुम बताओ, तुम कैसी हो, बेटा? कब पहुंचीं? टाइम पर पहुंच गई थी फ्लाइट? इस समय हम तुम से ही मिलने आए हैं,’’ उन्होंने भी कई सारे प्रश्न एकसाथ ही दिया के समक्ष परोस दिए.

दिया कुछ भी उत्तर नहीं दे पाई. हां, घर के सभी सदस्यों के मन में गहलौत साहब ने और कुतूहल पैदा कर दिया.‘‘आप की बेटी बड़ी हिम्मती है, यशजी. इंगलैंड के भारतीय दूतावास में इतनी प्रशंसा की जा रही है कि बस…मैं जानता हूं आप सब लोग कुतूहल से भर गए हैं कि मैं यह सब…दरअसल, वहीं से हमारे डिपार्टमैंट में खबर आई है. बात मेरे पास आई तो मैं ने कहा कि भई, वह तो हमारी ही बेटी है. हम उस से मिलने जाएंगे. मिसेज गहलौत भी बिटिया से मिलना चाहती थीं. बस…’’ गहलौत साहब की गोलगोल बात अब भी सब के सिर पर से हो कर गुजर रही थी. खूब बोलने वाले व्यक्ति थे गहलौत साहब, साथ ही स्पष्ट भी परंतु इस समय तो वे बिलकुल उल झे हुए लग रहे थे, उन की बातें एकदम अस्पष्ट.

‘‘अरे, पर ऐसे क्या  झंडे गाड़ कर आई है यह. कुछ बोल भी नहीं रही लड़की. इस की ससुराल कितनी बार फोन किया, कोई फोन भी नहीं उठाता. अब आप?’’ दादी कहां चुप रहने वाली थीं.

‘‘कौन उठाएगा ससुराल में फोन, 2 लोग ही तो हैं. और दोनों ही सरकारी ससुराल में,’’ गहलौत साहब दादी की ओर देख कर मुसकराए.

‘‘सरकारी ससुराल में?’’ दादी कुछ सम झ नहीं पाईं.

‘‘माताजी, सरकारी ससुराल यानी जेल.’’

‘‘क्या, जेल में? क्यों? आप क्यों ऐसी बातें कर रहे हैं? हमारी भी समाज में कोई इज्जत है. जब यह बात समाज में फैलेगी तो…’’ दादी रोनेबिलखने लगी थीं.

दादी के अतिरिक्त घर के सभी सदस्यों के मुख पर मुर्दनी फैल गई थी. जिस प्रकार दिया आई थी उस से कुछ गड़बड़ी का आभास तो सब को ही हो गया था परंतु…यह पहेली अभी भी सम झ से बाहर थी. अचानक दिया ने मानो बिजली का नंगा तार पकड़ लिया था.

‘‘क्या समाज…समाज…किस समाज की बात कर रही हैं, दादी? उस समाज की जिसे आप के दिग्गज पंडितों ने तैयार किया है या उस समाज की जिसे कुछ पता ही नहीं है कि मैं ने क्या  झेला है? क्या…है क्या समाज? मैं समाज नहीं हूं क्या? मैं अपनेआप में एक पूरा समाज हूं.’’

दिया बुरी तरह फट पड़ी थी और फूटफूट कर रोने लगी थी.

‘‘हाय रे! इस की तो अक्ल पर पत्थर पड़ गए हैं. क्या कर के आई है वहां जो सास और आदमी को जेल हो गई? हमेशा कहती थी, यश, बेटा, लड़की की जात है, जरा संभाल कर रखो. पर इन्हें तो आजादी देने का नशा चढ़ा हुआ था. अब भुगतो…अरे, मैं तभी सोचूं, यह सुबह से ऐसा बरताव क्यों कर रही है.’’

‘‘माताजी, शांत हो जाइए और मेरी बात शांति से सुनिए. आप की पोती कुछ गलत कर के नहीं आई है बल्कि ऐसा काम कर के आई है जो आज तक कोई नहीं कर सका. यश जी, आप को कुछ नहीं बताया क्या बिटिया ने?’’ गहलौत साहब ने आश्चर्य से पूछा.

यह सच था कि उसे सब का सामना भी करना ही था. यह तो अच्छा अवसर था, उसे अपनेआप कुछ कहने की जरूरत ही नहीं. वह शांति से गहलौत अंकल की बातें सुनती रही.

‘‘आप लोगों ने ब्रिटेन का वह कांड नहीं देखा टीवी पर जिस में ईश्वरानंद नाम के एक संन्यासी का परदाफाश किया गया था? 3-4 दिन पहले ही तो यह ‘ब्रेकिंग न्यूज’ हर चैनल पर दिखाई गई थी.’’

‘‘जी, देखा था न अंकल. किसी इंडियन लड़की ने ही उस संन्यासी का भंडाफोड़ किया है,’’ दीप बहुत उत्साह से बोला था.

‘‘हां, हां, वही केस. उस का भंडाफोड़ और किसी ने नहीं, तुम्हारी बहन ने किया है. न जाने यह कैसेकैसे वहां से बच कर निकल पाई है,’’ इतनी देर के बाद अब निशा गहलौत पहली बार बोली थीं.

‘‘वी औल आर प्राउड औफ यू, दिया,’’ निशा गहलौत ने पास में बैठी हुई दिया का हाथ अपने हाथ में ले लिया था. दिया टुकुरटुकुर उन्हें नापने का प्रयास करने लगी.

‘‘मु झे भी तो बताओ कोई, क्या भंडाफोड़ किया? कैसे भंडाफोड़ किया? और नील को किस बात की सजा दिलवा कर आई है यह? हाय, पति के बिना आखिर एक औरत की जगह ही क्या रह जाती है समाज में?’’ दादी फिर से टसुए बहाने लगीं.

‘‘किस पति की बात कर रही हैं आप, दादी? क्या पति को भी मालूम है कि वह पति है? या पति, बस सात फेरों की जंजीर गले में फंसा कर लड़की को अपने हिसाब से नचाने में बन जाता है? शायद दादी तभी खुश होतीं जब इन की पोती महायोग के कुंड में अपनी आहुति दे देती, उसी में स्वाहा हो जाती, लौट कर इन्हें अपना मुंह न दिखाती.’’ दिया के शब्दों में उस के भीतर का दर्द स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा था.‘‘पर बेटा, कम से कम हमें बताती तो सही. हम तुम्हारे लिए कुछ नहीं रह गए थे क्या?’’ दिया की बात जान कर यशेंदु बस इतना ही कह पाए. उन की आंखों से आंसू टपकते रहे. कई बार सशक्त आदमी भी कितना लाचार हो जाता है.‘‘लगता है, दिया उन दर्दभरी बातों को दोहराना नहीं चाहती, ठीक भी है. इस की शादी का सारा खेल उस ढोंगी ईश्वरानंद का ही रचाया हुआ था. नील और उस की मां भी उस में शामिल थे…’’ डीआईजी गहलौत ने थोड़ी देर में सब के सामने पूरी कहानी बयान कर दी. दिया फिर भी चुप ही बनी रही.

‘‘ब्रिटेन के सब अखबारों में ईश्वरानंद और उस के चेलेचेलियों की तसवीरें छपी हैं. दिया की बहुत प्रशंसा हो रही है. अगर दिया हिम्मत न करती तो बरसों से यह सब चल ही रहा था. दिया बेटा, तुम्हें सैल्यूट करने का दिल होता है,’’ गहलौत साहब दिया से बात करना चाहते थे.

‘‘मैं ने किसी के लिए कुछ नहीं किया, अंकल. मैं तो बस अपनी फंसी हुई गरदन को निकालने की कोशिश कर रही थी.’’

‘‘तुम ने कभी नहीं सोचा कि अपने मम्मीडैडी को सबकुछ बता दो?’’ गहलौत आंटी ने दिया से पूछा.

‘‘आप लोग पापा की हालत तो देख ही रहे हैं. यह भी तो मेरी वजह से ही हुई है. सवाल यह है कि यह सब हुआ क्यों?’’ दिया ने सजल  नेत्रों से गहलौत आंटी की ओर देखते हुए प्रतिप्रश्न किया.

‘‘हां, हुआ क्यों?’’ बात निशा गहलौत के मुंह में ही रह गई.

‘‘ईश्वरानंद के पैर धर्म तक ही नहीं फैले हैं, उस की जड़ें बहुत गहरी हैं. वह डाकुओं के दल का सरगना भी है और नाम व काम बदलता हुआ दुनियाभर में घूमता रहता है. उस के साथ और भी 4 मुख्य लोग पकड़ लिए गए हैं, जो टैरेरिस्ट ग्रुप से जुड़े हुए हैं. ये लोग किस चीज में माहिर नहीं हैं? कभी धर्म के बहाने जुड़ते हैं तो कभी किसी और बहाने. ईश्वरानंद सब का गुरु है, सब को अलगअलग कामों में फंसा कर स्वयं मस्ती करता रहता है. उस का काम ही है अलगअलग बहानों से लोगों को फंसाना,’’ डीआईजी गहलौत एक सांस में अपनेआप को खाली कर देना चाहते थे.

‘‘और…माफ करिएगा माताजी, जिस नील से आप ने अपनी पोती के गुण मिलवाए थे वह तो पहले से ही किसी जरमन लड़की के चक्कर में फंसा हुआ था. आप ने उस के सारे गुण ही दिया से मिलवा दिए?’’ गहलौत साहब ने दिया की दादी से कहा जो गालों पर बहते आंसुओं को बिना पोंछे ही मुंह खोले उन की सब बातें सुन रही थीं.

‘‘माताजी. जो धर्म हमें अंधविश्वास में घसीट ले, जो हमें शक्ति न दे, बल न दे, वह धर्म हो ही नहीं सकता.’’

सब लोग दिया की ओर एकटक निहार रहे थे. कुछ बोले तो सही, सब कुछ न कुछ पूछना चाहते थे. निशा आंटी ने दिया को सहारा दिया, ‘‘यह इतने लंबे समय तक किस तकलीफदेह वातावरण से जूझ कर आई है. शरीर की तकलीफ तो किसी तरह बरदाश्त हो जाती है पर मन की तकलीफ को दूर करने में बहुत लंबा समय लगता है,’’ सब के चेहरे दुख और विस्मय से भर उठे थे. दादी मुंहबाए कुछ समझने की चेष्टा में लगी थीं.

‘‘पर…अब क्या होगा इस लड़की का? ब्याही लड़की घर में बैठी रहेगी. कौन पकड़ेगा इस का हाथ? मुझे क्या पता था कि इतने अच्छे ग्रह मिलने के बाद भी…’’ अब भी वे ग्रहों को रो रही थीं.दिया ने आंखें खोल कर दुख से दादी की ओर देखा, बोली कुछ नहीं. ‘‘मां…आप क्या कह रही हैं? बच्ची है मेरी. सात फेरे क्या करवा दिए, बस, मांबाप का कर्तव्य पूरा हो गया. और फेरे भी किस से? कितना कहा था मैं ने पर आप…’’ यशेंदु को मां पर बहुत गुस्सा आ रहा था. दादी अब भी बच्ची के बारे में न सोच कर समाज के बारे में ही चिंतित हो रही थीं. आखिर क्यों?

कामिनी के आंसुओं ने तो एक स्रोत ही बहा दिया था. वह बारबार स्वयं को ही कोस रही थी, ‘‘यह सब मेरी वजह से ही हुआ है. मैं एक शिक्षित और जागृत मां हूं. मैं ही अगर अपनी बेटी को नहीं बचा सकी तो उन अशिक्षित लोगों के बारे में क्या सोचा जा सकता है जो अपने दिमाग से चल ही नहीं सकते. चलते हैं तो केवल पंडितों और तथाकथित गुरुओं के दिखाए व सु झाए गए ग्रहों के हिसाब से. आखिर क्यों मैं उस समय अड़ नहीं सकी? अड़ जाती तो क्या होता? ज्यादा से ज्यादा मां और यशेंदु मुझ से नाराज हो जाते. समर्थ थी मैं, छोड़ देती बेटी को ले कर घर. उस के जीवन से इस प्रकार खिलवाड़ तो न होता.’’ न जाने कैसे आज कामिनी के मुख से ये शब्द निकल गए थे. उस की आंखों से आंसू नहीं लावा प्रवाहित हो रहा था. सास के समक्ष सदा आंखें  झुका कर हर बात को स्वीकार करने वाली कामिनी की सास ने जब ये सब बातें सुनीं तो चुप न रह सकीं.

‘‘हां, तो छोड़ देतीं. जैसे ये बिना कन्यादान किए ऊपर चले गए थे, ऐसे ही हम भी चले जाते. तुम्हारे मुंह से सब के सामने ये अपमान तो न  झेलना पड़ता,’’ थोड़ी देर में ही उन के रुके हुए आंसुओं का स्रोत फिर से उमड़ने लगा.

#lockdown: सोशल डिस्टेंस रखे, मेंटल डिस्टेंस नहीं 

मुंबई के एक सोसाइटी में रहने वाली 60 वर्षीय संध्या और 70 वर्षीय सुबोध के बेटी और बेटे विदेश में रहते है, दोनों अकेले रहते है. संध्या घर पर कोचिंग क्लास चलाती है और सुबोध बाहर के काम काज निपटाते है, मसलन बैंक में जाना, मार्केटिंग करना आदि, लेकिन लॉक डाउन ने दोनों की जिंदगी में जो भी रफ़्तार थी उस पर ब्रेक लगा दी है. आज संध्या आज सुबह से परेशान थी, उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. अपने आप को असहाय और मजबूर समझ रही थी. आखिर करें तो क्या करें? लॉक डाउन के चलते वह किसी से न तो मिल नहीं पाती है और न ही कोचिंग क्लास चला पाती है. सोसाइटी में भी घूमना मना है, क्योंकि सोसाइटी ने पूरी तरह से लॉक डाउन किया हुआ है, किसी को भी सोसाइटी से बाहर जाने और आने से मना है, ऐसे में वे घर में कैद है और इस लॉक डाउन के ख़त्म होने का इंतज़ार कर रहे है. ये केवल मुंबई में ही नहीं हर बड़े शहर में वयस्कों की यही कहानी है. जहाँ वयस्क अकेले एक कमरे या दो कमरे के अपार्टमेंट में रहने के लिए मजबूर है और उनके बच्चें विदेश में काम कर रहे है. खासकर मुंबई की भागती जिंदगी, जहाँ की रात भी सोती नहीं है. अब पूरा शहर सुनसान पड़ा है. कोविड 19 ने पूरे शहर को शांत कर दिया है. इस बीमारी में सोशल डिस्टेंस जरुरी है और इसे मुंबई वासी इसे पालन कर भी कर रहे है, लेकिन वयस्कों को इससे मुश्किलें आ रही है, कम जगह और फ्लैट में रहने के साथ-साथ खाने-पीने की सामानों की आपूर्ति करना, घर की साफ़ सफाई आदि सबकुछ करना उनके लिए भारी पड़ रहा है.

इस बारें में मनोचिकित्सक डॉ. हरीश शेट्टी कहते है कि ये सही है कि सीनियर सिटिज़न को इस लॉक डाउन में बाहर निकलना मना है और उन्हें समस्या आ रही है, लेकिन कर्फ्यू बाहर है, अंदर नहीं, सोशल डिस्टेंस जरुरी है, मेंटल डिस्टेंस नहीं. कुछ टिप्स निम्न है,

  • कमरे की खिड़की से नीले आकाश को देखना,
  • घर के अंदर वाक करना,
  • जोक्स जो दोस्तों के साथ करते थे उसे वीडियो कॉल पर करना,
  • जिंदगी को बंद नहीं चालू रखना,
  • जो शौक आपको है, उसे बनाये रखना,जिसमें किताब पढना, लिखना.

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  • बच्चे अगर बाहर है तो वीडियो कालिंग कर उनके साथ समय बिताना,
  • अगर जरुरत है, तो किसी की सलाह लेने से न कतराना,
  • पुरानी बातों की चर्चा करना,
  • अकेले न बैठना,
  • नींद पूरी करना और समय पर संतुलित आहार लेना.
  • इसके अलावा दवाइयों का सेवन नियमित करना, उदासी आने पर शुरू से ही फॅमिली डॉक्टर की सलाह लेना आदि इससे आप अपने आप में तरोताजा महसूस करेंगे और ये लॉक डाउन आपके लिए भारी नहीं लगेगा.

ये सही है कि कोरोना के रोज के बढ़ते आंकड़ों की वजह से वयस्कों को उदासी अधिक घेर रही है और वे डर रहे है कि कही उन्हें ये बीमारी उन्हें न घेर ले. हर न्यूज़ चैनल में भी कोरोना से सम्बंधित डराने वाले आंकड़े ही दिखाए जा रहे है, ऐसे में डॉक्टर हरीश आगे कहते है कि 24 घंटे कोरोना के बारें में बात न करें और दिन में केवल एक बार न्यूज़ देखें. जिंदगी को आनंदमय तरीके से बिताने की कोशिश करें, डर को सबके साथ बांटे.

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काउंसलर राशीदा कपाडिया  जो अभी खाना खुद बना रही है और ब्लॉग लिख रही है. इस बारें में कहती है कि जब वयस्क अकेले रहते है तो उन्हें इस बात का डर हमेशा लगा रहता है कि उनका शरीर ख़राब होने या कुछ समस्या आने पर उनकी देखभाल कैसे होगी, ऐसी परिस्थिति में सोसायटी के कुछ लोग या वोलेंटिएर्स को उनकी नियमित खोज खबर रखने की जरुरत है. इसके अलावा इन लोगों के बच्चे दूर रहने की वजह से उनकी चिंता भी सताती रहती है. वे इस हालात में किसी से मिल नहीं पाते और अपनी बात शेयर नहीं कर पाते, ऐसे में बच्चों को दूर से ही उनकी हिम्मत को बनाएं रखने के लिए नियमित कॉल कर उनकी हौसलाअफजाई करने की जरुरत है. मैडिटेशन और हल्का फुल्का व्यायाम करने से आपको अच्छा लगेगा. इसके अलावा तकनीक की कुछ जानकारी होने पर आप मोबाइल पर काफी समय बिता सकते है, जिसमें, संगीत सुनना , फिल्में देखना और कोई गेम खेलना आदि कर सकते है. अपनी आवाज में गाने गाकर अपने दोस्तों को भेजकर उन्हें ख़ुशी दे सकते है. घर का काम अभी सब कर रहे है ऐसे में समय निकलना अधिक मुश्किल नहीं होता. इन सबसे लाइफ थोड़ी आसान भी हो जाती है और आपको अपनी जिंदगी कैद नहीं लगेगी.

महायोग: धारावाहिक उपन्यास, भाग-13

अब तक की कथा :

मानसिक तनाव, शारीरिक थकान तथा अंधकारमय भविष्य की कल्पना ने दिया की सोचनेसमझने की शक्ति कमजोर कर दी थी. घुटन के अतिरिक्त उस के पास अपना कहने के लिए कोई नहीं था. सास के साथ मंदिर जाने पर वहां उस को एक साजिश का सुराग मिला. वह अपने साथ घटित होने वाले हादसों के रहस्य को समझने की अनथक चेष्टा करने लगी.

अब आगे…

यह वही नील था जो दिया डार्लिंग और दिया हनी जैसे शब्दों से दिया को पुकारता था. उस के मस्तिष्क ने मानो कुछ भी सोचने से इनकार कर दिया और अपने सारे शरीर को रजाई में बंद कर लिया. यौवन की गरमाहट, उत्साह, उमंग, चाव, आशा सबकुछ ही तो ठंडेपन में तबदील होता जा रहा था. पूरे परिवार की प्यारी, लाड़ली दिया आज हजारों मील दूर सूनेपन और एकाकीपन से जूझते हुए अपने बहुमूल्य यौवन के चमकीले दिनों पर अंधेरे की स्याही बिखरते हुए पलपल देख रही है. घर से फोन आते थे, दिया बात करती पर अपनी आवाज में जरा सा भी कंपन न आने देती. वह जानती थी कि उस की परेशानी से उस के घर वालों पर क्या बीतेगी. इसीलिए वह बिना कुछ कहेसुने चुपचाप उस वातावरण में स्वयं को ढालने का प्रयास करती. मांबेटे दोनों का स्वभाव उस की समझ से परे था.

नील लगभग सवेरे 8 बजे निकल जाता और रात को 8 बजे आता. एक अजीब प्रकार का रहस्य सा पूरे वातावरण में छाया रहता. कभीकभी रेशमी श्वेत वस्त्रों से सज्जित एक लंबे से महंतनुमा व्यक्ति की काया उस घर में प्रवेश करती. दिया को उन के चरणस्पर्श करने का आदेश मिलता. फिर वे नील की मां के साथ ऊपर उन के कमरे में समा जाते. घंटेडेढ़ घंटे के बाद नीचे उतर कर अपनी तीक्ष्ण दृष्टि से उसे घूरते हुए वे घर से निकल कर सड़क पर खड़ी अपनी गाड़ी में समा जाते. दिया का कभी उन से परिचय नहीं कराया गया था परंतु वह जानती थी कि वे सज्जन जानते हैं कि वह दिया है, नील की तथाकथित पत्नी. उन की दृष्टि ही उसे सबकुछ कह जाती थी. वह चुपचाप दृष्टि झुकाए रहती. न जाने क्यों उसे उन महानुभाव की दृष्टि में कुछ अजीब सा भाव दृष्टिगोचर होता था जिसे वह बिना किसी प्रयास के भी समझ जाती थी. सब अपनेअपने कमरों में व्यस्त रहते. दिया को शुरूशुरू में तो बहुत अटपटा लगा, रोई भी परंतु बाद में अभ्यस्त हो गई. लगा, यही कालकोठरी सा जीवन ही उस का प्रारब्ध है.

‘‘दिया, यहां बिजली बहुत महंगी है,’’ एक दिन अचानक ही सास ने दिया से कहा.

वह क्या उत्तर देती. चुपचाप आंखें उठा कर उस ने सास के चेहरे पर चिपका दीं.

‘‘तुम तो नीचे सोती हो न. दरअसल, सुबह 5 बजे तक बिजली का भाव बिलकुल आधा रहता है…’’

दिया की समझ में अब भी कुछ नहीं आया. अनमनी सी वह इधरउधर देखती रही. ‘क्या कहना चाह रही हैं वे?’ यह वह मन में सोच रही थी. ‘‘मैं समझती हूं, रात में अगर तुम वाशिंगमशीन चालू कर दो तो बिजली के बिल में बहुत बचत हो जाएगी.’’ वह फिर भी चुप रही. कुछ समझ नहीं पा रही थी क्या उत्तर दे.

2 मिनट रुक कर वे फिर बोलीं, ‘‘और हां, खास ध्यान रखना, अपने कपड़े मत डाल देना मशीन में. और जब भी टाइम मिले, लौन की घास मशीन से जरूर काट देना.’’

दिया बदहवास सी खड़ी रह गई, यह औरत आखिर उसे बना कर क्या लाई है? उस से बरतन साफ नहीं हो रहे थे, खाना बनाने में वह पस्त हो जाती थी और अब यह सब. दिया की सुंदर काया सूख कर कृशकाय हो गई थी. पेट भरने के लिए उस में कुछ तो डालना ही पड़ता है. दिया भी थोड़ाबहुत कुछ पेट में डाल लेती थी. हर समय उस की आंखों में आंसू भरे रहते. ‘‘अब इस तरह रोने से कुछ नहीं होगा दिया. सब को पता है यहां पर इंडिया की तरह नौकर तो मिलते नहीं हैं. हम ने तो सोचा था कि तुम इतनी स्मार्ट हो तो…पर तुम्हें तो कुछ भी नहीं आता. आजकल की लड़कियां कितनी ‘कुकरी क्लासेज’ करती हैं, तुम ने तो लगता है कि कुछ सीखने की कोशिश ही नहीं की,’’ उन के मुख पर व्यंग्य पसरा हुआ था.

दिया को लगा वह बुक्का फाड़ कर रो देगी, कैसी औरत है यह? औरत है भी या नहीं? मांपापा को यहां की स्थिति से अवगत करा कर वह उन्हें परेशान नहीं करना चाहती थी, फिर भी अपने लिए उसे कुछ सोचना तो होगा ही. वह सारी उम्र इस कठघरे में कैद नहीं हो सकती थी. मन और तन स्वस्थ हों तो वह कुछ सोच सकती थी परंतु उस के तो ये दोनों ही स्वस्थ नहीं थे. हर क्षण उस के मन में यही सवाल कौंधता रहता कि आखिर उसे लाया क्यों गया है यहां? क्या केवल घर की केयरटेकर बना कर? और यदि वह नील की पत्नी बन कर आई थी तो नील से अब तक उस का संबंध क्यों नहीं बन पाया था? यह सब उस की समझ से बाहर की बात थी जिस पर अब वह अधिक जोर नहीं दे रही थी क्योंकि वह भली प्रकार समझ चुकी थी कि उसे यहां से निकलने के लिए सब से पहले स्वयं को स्वस्थ रखना होगा. इसलिए वह स्वयं को सहज रखने का प्रयास करने लगी.

जैसेजैसे वह सहज होती गई उस के मस्तिष्क ने सोचना शुरू कर दिया. अचानक उसे ध्यान आया कि वह तो यहां पर ‘विजिटिंग वीजा’ पर आई हुई थी और अभी तक उस का यहां के कानून के हिसाब से कोई ‘पंजीकृत विवाह’ आदि भी नहीं कराया गया था, इसलिए कुछ तो किया जा सकेगा. इसी विचार से उस ने अपनी अटैची उतारी और उसे पलंग पर रख कर अटैची की साइड की जेबें टटोलने लगी. जैसेजैसे उस के हाथ खाली जगह पर अंदर की ओर गए, उस का मुंह फक्क पड़ने लगा. अटैची में उस का पासपोर्ट नहीं था. कहां गया होगा पासपोर्ट? उस ने सोचा और पूरी अटैची उठा कर पलंग पर उलट दी. पर पासपोर्ट फिर भी न मिला.

काफी रात हो चुकी थी. इस समय रात के 3 बजे थे और उनींदी सी दिया अपना पासपोर्ट ढूंढ़ रही थी. थकान उस के चेहरे पर पसर गई थी और पसीने व आंसुओं से चेहरा पूरी तरह तरबतर हो गया था. उस का मन हुआ, अभी दरवाजा खोल कर बाहर भाग जाए. मुख्यद्वार पर कोई ताला आदि तो लगा नहीं रहता था. परंतु जाऊंगी भी तो कहां? वह सुबकसुबक कर रोने लगी और रोतेरोते अपनी अलमारी के कपड़े निकाल कर पलंग पर फेंकने लगी. उसे अच्छी तरह से याद था कि उस ने अटैची में ही पासपोर्ट रखा था. नील और उस की मां लगभग साढ़े छह, सात बजे सो कर उठते थे. आज जब वे उठ कर नीचे आए तो दिया के कमरे की और दिया की हालत देख कर हकबका गए. दिया सिमटीसिकुड़ी सी पलंग पर फैले हुए सामान के बीच एक गठरी सी लग रही थी. मांबेटे ने एकदूसरे की ओर देखा और दोनों ने कमरे में प्रवेश किया. कमरे में फैले हुए सामान के कारण मुश्किल से उन्हें खड़े होने भर की जगह मिली.

 

‘‘दिया,’’ नील ने आवाज दी पर दिया की ओर से कोई उत्तर नहीं आया.

‘‘दिया बेटा, उठो,’’ सास ने मानो स्वरों में चाशनी घोलने का प्रयास किया परंतु उस का भी कोई उत्तर नहीं मिला.

‘‘मौम, कहीं…’’ नील ने घबरा कर मां से कुछ कहना चाहा.

‘‘नहीं, नहीं, कुछ नहीं,’’ मां ने बड़ी बेफिक्री से उत्तर दिया. फिर दिया की ओर बढ़ीं.

‘‘दिया, उठो, यह सब क्या है?’’

इस बार दिया चरमराई, नील ने आगे बढ़ कर उसे हिला दिया, ‘‘दिया, आर यू औलराइट?’’ उस के स्वर में कुछ घबराहट सी थी.

‘‘हांहां, ठीक है. लगता है रातभर इस के दिमाग में उधेड़बुन चलती रही है. अब आंख लग गई होगी. चलो, किचन में चाय पी लेते हैं, तब तक उठ जाएगी.’’ नील पीछे घूमघूम कर देख रहा था पर मां किचन की ओर बढ़ गई थीं.

आगे पढ़ें- शायद नील के मन में कहीं न कहीं दिया के लिए…

महायोग: धारावाहिक उपन्यास, भाग-6

अब तक की कथा :

‘महायोग’ से श्रापित दिया कहने भर को सुहागिन का ठप्पा चिपका कर घूम रही थी. योग और पत्री के पागलपन ने प्राची के परिवार को भी अपनी लपेट में ले लिया था. जब दादी को पता चला कि नील ने अभी तक काम पर जाना शुरू नहीं किया है तो उन के पैरों तले जमीन खिसकने लगी. अच्छे दिनों की प्रतीक्षा में दादी और पंडितजी की मिलीभगत ने दिया व नील को दूर रखा है, जान कर यशेंदु बौखला उठे.

अब आगे…

यश के सामने उस की लाड़ली बिटिया का सुकोमल मगर उतरा हुआ मुख बारबार आ कर उपस्थित हो जाता. मानो वह बिना मुख खोले ही उस से पूछ रही हो, ‘पापा, आखिर क्या सोच कर आप ने इतनी जल्दी मुझे इस जंजाल में फंसा दिया?’ अपनी फूल सी बच्ची के भविष्य के बारे में सोच कर यश से रहा नहीं गया, नील की मां को फोन कर के शिकायत भरे लहजे में कहा, ‘‘आप ने नील की चोट के बारे में नहीं बताया?’’

कामिनी को मां का सुबहशाम आरती गा लेना, पंडितजी को बुला कर पूजाअर्चना की क्रियाएं करना, कुछ भजन और पूजा करवा कर आमंत्रित लोगों की वाहवाही लूट लेना विचलित करता था दादी कभी भी नील की मां को फोन लगा देती थीं. कामिनी के वहां से जाते ही उन्होंने दिया की सास को लंदन फोन लगा दिया.

‘‘पता चला है कि नील के पैर में चोट लग गई है? कैसे? कब? कल ही तो मेरी आप से बात हुई थी. आप ने तो कुछ नहीं बताया था इस बारे में?’’ वे लगातार बिना ब्रेक के बोले जा रही थी.

‘‘अरे रे, आप इतनी परेशान क्यों हो रही हैं, माताजी? नील के पैर में थोड़ी सी मोच आ गई है, सो उस ने अभी औफिस जौइन नहीं किया. हम ने सोचा अगर आप को पता चलेगा तो आप परेशान हो जाएंगी. सो, बेकार ही…’’ दिया की सास भी कम खिलाड़ी नहीं थीं. न जाने घाटघाट का पानी पी कर कितनी उस्ताद बन गई थीं, पटाने में तो वह माहिर थीं ही.

‘‘अरे, मैं परेशान कैसे न होऊं? नील ने खुद दिया को बताया, दिया ने कामिनी को. कामिनी मेरे पास आई थी. अब मुझे ही कुछ पता नहीं है तो मैं क्या उसे बताऊं? मेरी और आप की बात हो जाती है पर लगता है मुझे पूरी बात पता नहीं चल पाती. उधर, यह चोट की खबर. आखिर पता तो चले, बात क्या है? मैं ही किसी को कुछ जवाब देने की हालत में नहीं हूं. आप ठीकठीक बताइए, क्या बात है? हम ने तो सोचा था कि नील के पास छुट्टी नहीं है. सो, उस समय हम ने ज्यादा कुछ सोचा भी नहीं और अब…नहीं, आप ठीक से बताइए सबकुछ खोल कर और हां, दिया के जो भी पेपरवेपर हों वे सब कब तक पहुंच रहे हैं? मैं ने ब्याह जरूर जल्दी कर दिया है पर मैं अपनी पोती को ऐसी हालत में नहीं देख सकती,’’ एक ही सांस में दिया की दादी उस की सास से बोलती जा रही थीं.

‘‘आप परेशान मत होइए, माताजी. नील का पैर थोड़ा सा मुड़ गया था. उस पर प्लास्टर लगा है. डाक्टर का कहना है कि एकाध हफ्ते में उतर जाएगा. फिर जो भी फौरमैलिटीज होंगी, वह कर लेगा. मैं अपने पंडितजी से पूछ कर दिया को बुलाने के टाइम के बारे में बता दूंगी.’’

उन्होंने दिया की दादी की दुखती रग पर मानो मलहम चुपड़ दिया परंतु दादी को कहां इस से तृप्ति होने वाली थी. शाम को ही पंडितजी को बुला भेजा.

‘‘पंडितजी, जन्मपत्री ठीकठाक देखी न दिया की?’’ पंडित के आते ही दादी बरस पड़ीं.

‘‘क्या हुआ, माताजी?’’ पंडितजी ने बड़े भोलेपन से दादी से पूछा, ‘‘सबकुछ ठीकठाक है न?’’

‘‘सबकुछ ठीकठाक होता तो आप को क्यों बुलाती? अब ठीक से बताइए, जन्मपत्री ठीक है न दिया की?’’

‘‘हां जी, बिलकुल. क्यों, क्या हुआ?’’

‘‘क्या हुआ? हुआ यह कि आप तो कह रहे थे कि शादी के बाद 10-15 दिन दिया अपने पति से दूर रहे तो अच्छा रहेगा. उस की ससुराल जाने की तिथि भी अभी तक आप ने नहीं निकाली. सब ठीक तो है या फिर आप के पतरेवतरे बस खेल ही हैं?’’ दादी पर तो क्रोध बुरी तरह से सवार था.

‘‘कैसी बातें कर रही हैं, माताजी? कितने बरसों से हमारे पिताजी आप के परिवार की सेवा कर रहे हैं. फिर भी आप को विश्वास नहीं है हम पर?’’ पंडितजी बड़े नाटकीय अंदाज में दादीजी को भावनाओं की लपेट में लेने का प्रयास करने लगे.

‘‘पिताजी सेवा कर रहे थे, तभी तो आप पर विश्वास कर के मैं इस घर के सब कामकाज आप से करवाती हूं. आप से पत्री बंचवाए बिना मैं एक भी कदम उठाती हूं क्या? समझ में नहीं आ रहा है क्या चक्कर है. वहां, लंदन में उन के पंडितजी क्या कहते हैं, देखो,’’ दादी बिलकुल बुझ सी रही थीं. असमंजस में कुछ भी समझ नहीं पा रही थीं कि इस स्थिति से कैसे निबटें.

‘‘वैसे चिंता की कोई बात नहीं दिखाई देती,’’ पंडितजी ने दिया की पत्री इधर से उधर घुमाते हुए कहा.

‘‘वे ग्रह ठीक हो गए जब दिया को नील से अलग रहना था?’’

‘‘हां जी, बिलकुल. वे तो कुछ दिनों के ही ग्रह थे. अब तो सब ठीक है,’’ पंडितजी ने बड़े विश्वासपूर्वक दिया का भविष्य बांच दिया.

‘‘यह क्या मां…दिया के ब्याह के बाद ग्रह खराब थे?’’ पता नहीं कहां से यश और कामिनी सिटिंगरूम के दरवाजे पर आ कर खड़े हो गए थे.

‘‘अरे, वे तो कुछ ही दिन थे, बस. इसीलिए पंडितजी से सलाह कर के दिया को केरल जाने से रोक लिया था,’’ दादी ने हिचकिचा कर बेटे को उत्तर दिया.

‘‘इतनी बड़ी बात आप ने कैसे छिपा ली, मां?’’ यश का मूड खराब होने लगा. कामिनी आंखों में आंसू लिए चुपचाप पति के पास ही खड़ी थी.

‘‘मां, आप ने पंडित से सलाह करना ठीक समझा पर घर वालों से सलाह करने की कोई जरूरत नहीं समझी?’’ यश को अब मां पर चिढ़ सी लगने लगी.

कामिनी ने उसे कितना समझाने की कोशिश की थी परंतु उस पर मां का प्रभाव इतना अधिक था कि उस ने कभी अपनी पत्नी की बातों पर ध्यान देने की जरूरत ही नहीं समझी. वैसे भी घटना घट जाने के बाद उस की लकीर पीटने से कोई लाभ नहीं होता है. पहले मां, पिता की आखिरी इच्छा का गाना गाती रहती थीं, अब उन्होंने अपनी इच्छा का गाना शुरू कर दिया था. यश ने मां की बात स्वीकार की भी परंतु अब वह स्वयं असहज होने लगा था. कामिनी से भी आंख मिलाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था वह. आखिर मां ने उस से यह बात क्यों छिपाई होगी? देखा जाए तो मां की दृष्टि में इतनी बड़ी बात थी नहीं यह. परंतु उस की फूल सी बच्ची का भविष्य उसी बात पर टिका था. बिना कुछ और कहेसुने वह वहां से चला आया. पीछेपीछे कामिनी भी आ गई.

कमरे में आ कर वह धम्म से पलंग पर बैठ गया. उस के मस्तिष्क ने मानो काम करना बंद कर दिया था. उस की लाड़ली बिटिया का सुकोमल मगर उतरा हुआ मुख उस के सामने बारबार आ कर उपस्थित हो जाता. मानो वह बिना मुख खोले ही उस से पूछ रही हो, ‘पापा, आखिर क्या सोच कर आप ने इतनी जल्दी मुझे इस जंजाल में फंसा दिया?’

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#lockdown: quarantine में सीखें ये 7 Skills

कोरोना वायरस के चलते हम सभी को क्वरंटीन में रहना पड़ रहा है और इस से हमें कई तरह की परेशानियां भी हो रहीं हैं लेकिन, इस क्वरंटीन ने हमें अत्यधिक खाली समय भी दिया है जो हमें अपनी रोजमर्रा की ज़िंदगी में नहीं मिल रहा है. घर तो हम सभी को कुछ दिन बैठना ही है लेकिन यह हमारे ऊपर है कि हम इस मौके का फायदा उठा पाते हैं या नहीं. दिनभर बोरे होने से बेहतर है हम कोई नई स्किल सीखें और उस में पारंगत हों जिस से हमें आने वाले समय में फायदा भी मिले और साथ ही हम क्वरंटीन में रहते हुए कुछ प्रौडक्टिव भी कर सकें. निम्नलिखित ऐसी 7 स्किल्स हैं जिन्हें आप क्वरंटीन में रहते हुए सीख सकते हैं:

1. ओरिगामी

कागज से अलगअलग चीजें बनाना, सुंदर आकृतियों के छोटेछोटे नमूने बनाना सचमुच मजेदार है. यूट्यूब से आसानी से आप पेपर ओरिगामी सीख सकते हैं.

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2. विदेशी भाषा

डूओलिंगों या इस जैसी किसी और ऐप को डाउनलोड कर आप विदेशी भाषा सीखने की कोशिश कर सकते हैं. हालांकि, किसी भाषा को सीखने एकदम आसान नहीं है लेकिन आप काफी कुछ तो सीख ही जाएंगे.

3. Instrument बजाना

इस से बेहतर समय क्या होगा किसी Instrument को सीखने का. अपने पुराने पड़े गिटार या कीबोर्ड से धूल साफ कीजिए और यूट्यूब की मदद से लग जाइए सीखने में.

4. कैलिग्राफी

पेपर पर सुंदर शब्द उकेरना कौन नहीं चाहता. कैलिग्राफी सीख आप बेसिक चीजों को भी एक्सट्रा दिखा सकते हैं, अपने दोस्तों को सुंदर कार्ड्स बना कर दे सकते हैं व अपने कमरे के लिए पोस्टर्स बना सकते हैं.

5. सिलाई, कढ़ाई, बुनाई

ये काम सुनने में बेहद सादे लगते हैं लेकिन हैं नहीं. आप अगर इन में स्किल्ड होंगे तो न केवल आप अपने वौर्डरोब को बेहतर कर सकते हैं बल्कि यह आप के स्टाइल और अपीरिएंस को निखारने में भी मदद करेगा.

6. डांस स्टाइल

आप डांस के शौकीन है तो किसी डांस फोर्म को सीखने की कोशिश कर सकते हैं. आप के हेक्टिक रूटीन के कारण आप को समय नहीं मिलता होगा पर अब आप के पास पूरा समय है अपने शौक पूरे करने का.

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7. पेंटिंग

पेंटिंग आप हौबी के तौर पर भी कर सकते हैं और सीखने के मकसद से भी. आर्ट की कै विधाएं जिन में से एक में भी पारंगत होना आसान काम नहीं है पर आप कोशिश तो कर ही सकते हैं. वौटर कलर, ओयल, पेंसिल, स्केटचिंग आदि में से अपनी पसंद की आर्ट आप सीख सकते हैं.

#lockdown: ऐसा देश जिसे कोरोनावायरस की चिंता नहीं

यूरोप आजकल कोरोनावायरस के फैलाव का केन्द्र बना हुआ है. लेकिन इसी यूरोप में एक ऐसा देश भी है जिसे कोरोना के फैलाव की चिंता बिल्कुल नहीं है, लेकिन इसकी वजह  लापरवाही बिल्कुल नहीं है.

बेलारूस, यूरोप का वह एकमात्र देश है जहां के अधिकारी अपने देश की जनता को कोरोना की वजह से असामान्य स्थिति में डालने के इच्छुक नहीं हैं.

बेलारूस कई पहलुओं से एक असाधारण देश है, शायद यही वजह है कि उसने कोरोना से मुक़ाबले के लिए भी अपने बेहद निकटवर्ती पड़ोसियों, रूस और यूक्रेन से भी हट कर नया रास्ता अपनाया है.

यूक्रेन में किसी भी समय अपातकाल की घोषणा की जा सकती है जबकि रूस ने‌ स्कूल बंद किए, सार्वाजनिक  कार्यक्रम रद्द किए और सभी  उड़ानें रोक कर कोरोना वायरस से मुक़ाबले की तैयारी कर ली है. लेकिन बेलारूस में कई पहलुओं से जन जीवन सामान्य है, सीमाएं खुली हुई हैं, लोग काम पर जा रहे हैं और कोई भी डर की वजह से टॉयलेट पेपर का भंडारण नहीं कर रहा.

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बेलारूस के राष्ट्रपति एलेक्ज़ेंडर लोकान्शो का कहना है कि उनके देश को कोरोना वायरस से नहीं डरना चाहिए और न ही उनके देश को कोरोना से बचाव के लिए इतनी अधिक सतर्कता की ज़रूे चीनी राजदूत के साथ एक बैठक में कहा कि ” यह सब होता रहता है , महत्वपूर्ण बात यह है कि हम डरें न.”

बेलारूस की सरकार ने सेनेमा हॉल बंद नहीं किये, थियेटर भी खुले हैं और सार्वाजिनक कार्यक्रमों पर भी कोई प्रतिबंध नहीं है. बेलारूस दुनिया के उन गिनेचुने देशों में है जहां आज भी फुटबाल मैच हो रहे हैं. बेलारूस की फुटबॉल लीग यथावत चल रही है और पड़ोस में रूस के फुटबालप्रेमी भी  उसके मैचों से आनंद उठा रहे हैं.

राष्टृपति ने कहा कि ” ट्रेक्टर कोरोना की समस्या को खत्म करेगा”. उनके इस बयान में बाद सोशल मीडिया पर उनका काफी मज़ाक़ भी उड़ाया गया. उनका आशय यह था कि खेतों में कड़ी मेहनत करने से कोरोना वायरस से बचा जा सकता है. उन्होंने यह  भी सलाह दी कि वोदका शराब की कुछ घूंट भी कोरोना से बचा सकती है हालांकि उन्होंने कहा कि वे शराब नहीं पीते.

बेलारूस से बाहर कोरोना के फैलाव और उसके बाद विभिन्न देशों की हालत देख कर हालांकि इस देश में भी कुछ लोग चिंतित हैं और उन्होंने सरकार से मांग की है कि वह बचाव का उपाय करे लेकिन बेलारूस के राष्ट्रपति का कहना है कि चिंता की ज़रूरत नहीं क्योंकि बेलारूस में घुसने वाले हर यात्री का पहले कोरोना का टेस्ट लिया जाता है.

उन्होंने बताया कि पूरे दिन के टेस्ट में दो या तीन लोग पौजिटिव पाए जाते हैं जिन्हें आइसोलेट किया जाता है और फिर एकदो हफ्ते में हम उन्हें छोड़ देते हैं.

बेलारूस के राष्ट्रपति ने बौखलाहट और चिंता को कोरोना वायरस से अधिक खतरनाक बताया है. उन्होंने खुफिया एजेन्सी को आदेश दिया है कि वह देशवासियों को डराने वालों को पकड़े और सख्त सज़ा दे.

बेलारूस कई पहलुओं से यूरोप का अनोखा देश है. मिसाल के तौर पर बेलारूस युरोप का एकमात्र देश है जहां अब भी मृत्युदंड दिया जाता है. इसी तरह यह यूरोप का एकमात्र देश है जहां के अधिकारियों पर कोरोना वायरस की वजह से बौखलाहट नहीं छायी है.

रोचक बात तो यह है कि हर बात में सरकार और राष्ट्रपति का विरोध करने वाले कड़े सरकारविरोधी आंद्रे कीम ने भी बेलारूस के राष्ट्रपति के इन विचारों का समर्थन किया है. उन्होंने कहा कि उनका मानना है कि देश में लॉकडाउन, बेलारूस की आर्थिक मौत लिख देगा. बेलारूस वह एकमात्र देश है जहां के अधिकारी जनवाद से प्रभावित नहीं हैं और अपने देश की जनता के लिए सब से अच्छा रास्ता चुनते हैं. वे आगे कहते हैं, “ मुझे पता है कि जो मैं कह रहा हूं वह सुन कर कुछ लोग मुझे ज़िंदा ही निगल जाना चाहेंगे लेकिन मैं सार्वाजनिक पागलपन के प्रति चुप नहीं रह सकता.“

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सार्वाजनिक पागलपन से उनका आशय कोरोना से बचने के लिए पूरी दुनिया में उठाए जाने वाले कद़म थे.

#lockdown: आग से निकले कढ़ाई में गिरे, गांव पहुंचे लोग हो रहे भेदभाव का शिकार

बड़े शहरों से लौट कर अपने गांव घर पहुचने वॉले लोगो के सामने आग से निकले कढ़ाई में गिरे वॉले हालत बन गए है. गांव तक पहुचने के लिए सैकड़ो किलोमीटर पैदल चलना पड़ा, ट्रक, बस या दूसरी सवारी गाड़ियों  में जानवरों की तरह ठूंस ठूंस कर सफर करना पड़ा. भूखे प्यासे रह कर जब यह लोग गांव पहुचे तक इनके और परिवार के लोगो के बीच प्रशासन और गांव के दूसरे जागरूक लोग खड़े हो गए. कुछ लोग इनकी करोना वायरस से जांच की मांग करने लगे तो कुछ लोग इनको अस्पताल में रखने की मांग कर रहे थे . वंही कुछ लोग चाहते थे कि यह 14 दिन अपने घर मे ही अलग थलग रहे. शहरों को छोड़ अपने गांव पहुचे इन लोगो को लग रहा था कि यह अछूत जैसे हो गए है. करोना वायरस के खिलाफ जागरूकता अभियान एक डर की तरह पूरे समाज के दिलो में बैठ गया है. उसे बाहर से आने वाला हर कोई करोना का मरीज लगता है और उससे वो जान का खतरा महसूस करता है.

अजनबियों सा व्यवहार

मोहनलालगंज के टिकरा गांव में रहने वाला आलोक रावत उत्तराखंड नोकरी करने गया था. लॉक डाउन होने के बाद वो किसी तरह तमाम मुश्किलों का सामना करता 30 मार्च को अपने गांव पहुचा. गांव में घुसने के पहले ही गांव के कुछ जागरूक लोगो ने उसको रोक लिया. इसके बाद पुलिस और डायल 112 पर फोन करके पुलिस को खबर कर दी कि एक आदमी बाहर से आया है. अब आलोक को घर जाने की जगह गांव के बाहर स्कूल में ही रहना पड़ा. बाद में पुलिस डॉक्टर  आये तो लगा कि उसको कोई दिक्क्क्त नही है. इसके बाद भी आलोक को हिदायत दी गई कि 14 दिन वो अपने घर के अलग कमरे में रहे किसी से ना मिले ना जुले.

मोहनलालगंज तहसील के गनियार गांव का शुभम उड़ीसा में रहता था. वो 29 मार्च को अपने गांव आया तो गांव वालों ने इसकी सूचना पुलिस को दे दी. पुलिस समय पर नही पहुची तो पूरा दिन और एक रात शुभम को अपने गांव आने के बाद भी अपने घर जाने की जगह पर गांव के बाहर स्कूल में किसी अछूत की तरह रहना पड़ा. उसके घर के लोग चाहते थे कि वो वँहा ना रहे पर पुलिस के डर से वो लोग भी कुछ नही कर सके.

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सुल्तानपुर जिले के भवानीपुर में रहने वाला दीपक पंजाब में मजदूरी करता था. दिल्ली के रास्ते किसी तरह 3 दिन में अपने गांव पहुच गया. रात में उसे किसी ने देखा नहीं. सुबह वो अपने खेत पर काम करने गया. इसी समय गांव वालों ने उसको देख लिए और इसकी सूचना पुलिस को दे दी. पुलिस उसको पहले थाने ले गई. उसके घर वालो को बुरा भला भी बोला. 3 घण्टे थाने में बैठने के बाद डाक्टर आये तो उसको ठीक पाया गया. इसके बाद भी उसको 14 दिन घर से बाहर नहीं निकलने को कहा गया.

पुलिस का डर

असल मे कोविड 19 से बचाव के लिए प्रशासन के स्तर पर हर गांव वालों को कहा गया है कि कोई भी जब बाहर से आये तो उसकी सघन तलाशी ली जाए. उसका स्वाथ्य परीक्षण किया जाए. अगर उसको कोई सर्दी जुखाम बुखार की परेशानी नही है तो उसको 14 दिन के लिए अलग रहने को कहा जाए. अगर कोई इस बात को नही मानता है तो उसके खिलाफ संक्रमण अधिनियम का उलंघन करने के लिए मुकदमा लिखा जाए. पुलिस इसमे उन लोगो को भी जिम्मेदार मॉन रही है जो बाहर से आने वाले कि सूचना पुलिस को नही देते है.

जेल के कैदियों सी मुहर

कई जगहों पर बाहर से आने वाले लोगो के हाथ पर एक मुहर लगा दी जाती है जिसको देंखने के बाद पता चलता है कि यह आदमी किस दिन बाहर से अपने गांव आया है.

झारखंड और दूसरे प्रदेशों में यह हालत सबसे अधिक है. जिन लोगो के हाथ मे यह मुहर लगी होती है उनको किसी से मिलना जुलना नही होता और उनको अपने घर मे भी कैदियों की तरह अलग रहना पड़ता है.

पत्नी बच्चे तक दूर रहते है

प्रतापगढ़ के रहने वाले रमेश कुमार अपने घर वापस आये तो उनको उनकी पत्नी और बच्चो से दूर कर दिया गया. रमेश की पत्नी को कुछ दिन पहले ही बेटा हुआ था. बेटा होने की खुशी में वो अपने घर आया तो वँहा उस पर यह प्रतिबंध लगा दिया गया कि वो 14 दिन सबसे दूर रहेगा. रमेश  को घर के बाहर उस कमरे में रहना पड़ा जंहा जानवरो के लिए चारा रखा जाता था.

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करोना वायरस से अधिक डर पुलिस और प्रशासन का लोगो को है. वो मुकदमा कायम करने की धमकी दे कर डराते है. इसके अलावा गांव के लोग जागरूकता की आड़ में लोगो की सूचना पुलिस को देकर अपनी दुश्मनी भी निकाल रहे है.

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