Zoya Akhtar : फिल्मी दुनिया में कैसे बनाई अलग पहचान

Zoya Akhtar :  जोया अख्तर जब बचपन के बारे में सोचती हैं तो उन्हें उस वक्त देखी गई फिल्मों का ही खयाल आता है. जिस घर में उन का बचपन बीता उसे अकसर एक अस्थाई थिएटर में बदल दिया जाता था. वहां एक बड़ा सा प्रोजैक्टर हुआ करता था. एक दीवार थी जो स्क्रीन का काम करती थी और हर 20 मिनट में होने वाला एक ब्रेक.

ब्रेक में प्रोजैक्टर पर चल रही फिल्म की रील बदली जाती थी. यहीं पर जोया ने पहली बार शम्मी कपूर द्वारा निर्देशित फैंटेसी कौमेडी फिल्म ‘बंडल बाज’ देखी थी. यह 1976 में उन के जन्म के कुछ साल बाद रिलीज हुई थी. इसी घर में एक नन्ही जोया ने झपकी लेते हुए अमेरिका की क्लासिक गैंगस्टर फिल्म ‘द गौडफादर’ देखी थी. यह फिल्म अमेरिका में रिलीज होने के आधे दशक बाद भारत में रिलीज की गई थी.

बचपन में जोया इस स्क्रीनिंग की अहमियत नहीं समझ पाई थीं. इस की अहमियत का पता उन्हें बहुत बाद में चला, जब उन के पिता ने उन्हें दोबारा रूबरू कराया. उन के पिता यानी गीतकार और फिल्मों में पटकथा लेखक जावेद अख्तर. जिस रात इस फिल्म की कौपी मुंबई पहुंची उस के अगले दिन फिल्म में कट लगाए जाने थे ताकि उसे थिएटर में रिलीज किया जा सके.

फिल्म के रिलीज के लिए जिस व्यक्ति को इस की कौपी मिली थी उस ने उसे सीधे जावेद अख्तर के घर भेज दिया. जावेद और हनी ने अपने दोस्तों को घर बुलाया. जगह कम न हो इस के लिए घर का फर्नीचर तक हटा दिया. उस रात यह फिल्म 2 बार देखी गई. इस की वजह यह थी कि अगले दिन फिल्म में कट लग जाने के बाद वह अपने मूल रूप में नहीं रहने वाली थी.

जावेद अख्तर और फरहान अख्तर, 1 मई 2007, फोटो : मनोज पाटिल / एचटी फोटो
जावेद अख्तर और फरहान अख्तर, 1 मई 2007, फोटो : मनोज पाटिल / एचटी फोटो

सिनेमा की दुनिया

एक बच्चे के लिए इस फिल्म को समझ पाना बहुत मुश्किल था. उसे देखते हुए जोया सो भी गई थीं. 5 दशक बाद मैं और जोया समुद्र की तरफ मुंह किए उसी बंगले में बैठे थे जिस में ‘द गौडफादर’ की पहली स्क्रीनिंग हुई थी. उस के बाद उन्होंने यह फिल्म लाखों बार देखी.

जोया के लिए सिनेमा की दुनिया बहुत अनजान नहीं थी. उन्होंने इसे केवल एक दर्शक के तौर पर ही नहीं देखा था बल्कि वे खुद इस का हिस्सा थीं. उन की मां अभिनेत्री और पटकथा लेखक हनी ईरानी और उन के पिता जावेद अख्तर खुद प्रसिद्ध कलाकार थे जो उस समय सिनेमा उद्योग में काफी मशहूर शख्सियतों में शामिल माने जाते थे.

जोया के मातापिता उन्हें अकसर फिल्मों की शूटिंग पर ले जाते थे. ‘दोस्ताना’ (1980) इन्हीं फिल्मों में से एक थी. इसे जावेद ने उस समय साथी रहे सलीम खान के साथ लिखा था. सलीमजावेद हिंदी फिल्म उद्योग की वह मशहूर जोड़ी है जिस ने भारतीय सिनेमा को कई बेहतरीन और हिट फिल्में दीं. ‘दोस्ताना’ में जीनत अमान, अमिताभ बच्चन और शत्रुघ्न सिन्हा ने अभिनय किया था. जोया ने बताया कि उन्हें इस के सैट पर ‘दिल्लगी ने दी हवा…’ गाने की शूटिंग अच्छी तरह से याद है. वे ‘बसेरा’ (1986) की शूटिंग पर भी गई थीं, जिस में हनी ईरानी ने सहायक निर्देशक के रूप में काम किया था. जोया का जीवन फिल्मों के सैट पर ही बीता है. वे कहती हैं, ‘‘सैट मेरा घर है, यह मेरे खेल का मैदान है.’’

बदलती रहती है भूमिका

कुछ ही दशकों में जोया ने अपने दर्शकों को तरहतरह की फिल्में और वैब सीरीज दी हैं. इन के जरीए वे दर्शकों को स्पेन की सड़क यात्रा पर, भूमध्य सागर में एक क्रूज शिप पर, मुंबई की झुग्गी बस्ती धारावी में और दिल्ली की भव्य और खूबसूरत हवेली में ले कर गई हैं. वे अकसर बड़े कलाकारों के साथ काम करती हैं. उन की कहानियां अनगिनत चरित्रों के बीच की उलझनों से पैदा होती नजर आती हैं. उन के प्रशंसक जिंदगी न मिलेगी दोबारा’ (2011), ‘दिल धड़कने दो’ (2015) और ‘गली बौय’ (2019) के उदाहरण दिया करते हैं. वहीं आलोचकों ने ‘द आर्चीज’ (2023) पर नाराजगी भी जताई.

'गली बौय' 2019 में बनी म्यूजिकल ड्रामा फिल्म है
‘गली बौय’ 2019 में बनी म्यूजिकल ड्रामा फिल्म है
टाइगर बेबी फिल्मस
टाइगर बेबी फिल्म्स

जोया की खुद की प्रोडक्शन कंपनी ‘टाइगर बेबी फिल्म्स’ में उन की भूमिका बदलती रहती है. इस में वे लेखिका, निर्माता और निर्देशक के तौर पर अलगअलग काम करती हुई दिखती हैं. यह कंपनी उन्होंने लंबे समय से अपनी सहयोगी रहीं रीमा कागती के साथ मिल कर बनाई है. भले ही फिल्मों का सैट जोया का घर हो, लेकिन उन्होंने उसे अपना कार्यक्षेत्र भी बना लिया है.

कुछ अलग थी मेरी मां

हनी ईरानी, फिल्म मेकर और बौलीवुड में हिंदी फिल्मों की अवार्ड विनिंग स्क्रीन राइटर. फोटो साभार : फौजान हुसैन/ द इंडिया टुडे ग्रुप/ गैटी इमेजेज
हनी ईरानी, फिल्म मेकर और बौलीवुड में हिंदी फिल्मों की अवार्ड विनिंग स्क्रीन राइटर. फोटो साभार : फौजान हुसैन/ द इंडिया टुडे ग्रुप/ गैटी इमेजेज

अपनी मां हनी ईरानी पर बात करते हुए जोया बताती हैं, ‘‘1950 के दशक के आखिर में जब हनी ईरानी ढाई साल की थीं, तब उन्हें फिल्मों में कैरियर बनाने के लिए प्रेरित किया गया. उस के बाद उन्होंने 70 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया. 1972 में रिलीज हुई फिल्म ‘सीता और गीता’ के सैट पर उन की मुलाकात जावेद अख्तर से हुई. उन्होंने जल्द ही एकदूसरे से शादी कर ली. शादी के बाद हनी ने फिल्मों में अभिनय करना छोड़ दिया. 1985 में हनी और जावेद का तलाक हो गया.

जोया अपनी मां को ‘बेहद आजाद आत्मा’ के तौर पर परिभाषित करती हैं. वे कहती हैं, ‘‘मेरी मां की शादी बहुत जल्दी हो गई, बच्चे भी बहुत जल्दी हो गए और तलाक भी बहुत जल्दी हो गया. मैं और मेरे बड़े भाई फरहान अख्तर (फिल्म निर्माता और अभिनेता) मां के साथ ही रहते थे. जब मेरी उम्र 10 साल की थीं, मम्मी 28 साल की थीं. वे मुझ से बहुत ज्यादा बड़ी नहीं थीं. वे एक युवा और मजेदार मां थीं.

जोया बताती हैं, ‘‘उन्होंने हम भाईबहन को आजादी और छूट तो दी लेकिन साथ ही उन्होंने इस पर भी जोर दिया कि हम दयालु बनें और काम को ले कर मजबूत सिद्धांतों का पालन करें. वे हमारे गलत व्यवहार को बरदाश्त नहीं करती थीं.’’

निर्देशक रीमा कागती और जोया अख्तर, मुंबई 23 अगस्त 2023
निर्देशक रीमा कागती और जोया अख्तर, मुंबई 23 अगस्त 2023. फोटो : मंदार देवधर / द इंडिया टुडे ग्रुप / गैटी इमेेजेज

बाल कलाकार के तौर पर जल्दी काम शुरू करने और फिल्मों को ही कैरियर बनाने के फैसले की वजह से हनी ईरानी को औपचारिक शिक्षा के लिए बहुत कम समय मिला पाया. जब उन के बच्चे बड़े हो रहे थे, तब उन्होंने पुणे में सरकार द्वारा संचालित भारतीय फिल्म और टैलीविजन संस्थान के फिल्म प्रशंसा कोर्स में दाखिला लिया. जोया और फरहान भी उन के साथ जाते थे. वहीं पर उन दोनों ने सिनेमा के प्रति अपनी मां के प्रेम को आत्मसात किया.

जोया बताती हैं, ‘‘हम ने संस्थान में बहुत समय बिताया. वहां उन्होंने हमारे साथ विश्व सिनेमा की बहुत सारी फिल्में देखीं.’’

कोर्स पूरा करने के बाद ईरानी फिल्म इंडस्ट्री में वापस लौंटी लेकिन अभिनेत्री बन कर नहीं बल्कि एक पटकथा लेखक के तौर पर. बदले हुए रूप में जल्द ही उन्होंने खुद को स्थापित करना शुरू कर दिया. उन्होंने ‘लम्हे’ (1991), ‘डर’ (1993), ‘क्या कहना’ (2000), ‘कहो ना प्यार है’ (2000), ‘कोई मिल गया’ (2003) और ‘कृष’ (2006) जैसी प्रसिद्ध फिल्मों में पटकथा लेखक के तौर पर काम किया.

फिल्मी माहौल

जोया के घर का माहौल फिल्मी था. फिल्मों को ले कर उन के घर पर खूब बात होती थी. पूरा परिवार एकसाथ फिल्मों पर चर्चा करता था. किसी खास फिल्म में अभिनय की छोटीछोटी बारीकियों पर बहस होती थी. स्क्रिप्ट कैसे बेहतर हो सकती थी, इस के तमाम पहलुओं पर आलोचनात्मक चर्चा होती थी.

जोया ने बचपन से ही अपने मातापिता को लगातार लिखते हुए देखा है. इस तरह काम करने की ऊर्जा संक्रामक हुई है. वे बताती हैं, ‘‘हमारे घर में हम बस लिखना शुरू कर देते थे, चाहे वह कोई कविता हो, गाना हो या फिर कोई निबंध. इसे किसी खास काम की तरह नहीं समझ जाता था. घर का माहौल ही ऐसा था कि लिखना अपनेआप हमारा एक हिस्सा बन जाता था.’’

एक आखिरी बात जो जोया के दिमाग में थी, वह थी फिल्में बनाना और यह लंबे समय तक रही. जोया कहती हैं, ‘‘उस समय हिंदी फिल्म उद्योग उतना लोकप्रिय भी नहीं था. मुझे याद है कि जब मैं स्कूल या कालेज जाती थी, उस समय लोग हिंदी फिल्मों में बहुत दिलचस्पी नहीं लेते थे. इस में काम करने वालों को सर्कस का हिस्सा माना जाता था, जबकि आज स्थिति बिलकुल अलग है.’’

आंखें खोलने वाला अनुभव

जोया ने स्नातक की पढ़ाई के बाद, फिल्मों में काम करने की जगह विज्ञापनों में काम करना चुना. इसी दौरान उन के जीवन में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ आया, जब उन्होंने मीरा नायर की पहली फिल्म ‘सलाम बांबे’ (1988) देखी. उस में मुंबई की सड़कों पर रहने वाले एक युवा लड़के की कहानी दिखाई गई थी. हालांकि जोया इस से पहले मृणाल सेन, सत्यजीत रे और श्याम बेनेगल जैसे निर्देशकों की फिल्में देख चुकी थीं.

जोया कहती हैं, ‘‘उस तरह की फिल्में बनाना भी मुश्किल माना जाता था. मेरे लिए ‘सलाम बांबे’ में वह सबकुछ था, जो मैं फिल्में बनाते हुए करने का सोचती थी. यह मेरी आंखें खोलने वाला अनुभव था. मुझे हकीकत समझ आई कि हम किसी भी तरह की कहानी दिखा सकते हैं.’’

‘सलाम बांबे’ के कुछ साल बाद जोया को अपने 20वें साल में मीरा नायर के साथ ‘कामसूत्र ए टेल औफ लव’ में सहायक निर्देशक के तौर पर काम करने का मौका मिला. यह उन के लिए किसी सपने के सच होने जैसा था.

कुछ लोगों की नाराजगी

इस से अलग फिल्म के सैट पर होना जोया के लिए नया अनुभव नहीं था लेकिन उस फिल्म पर काम करते हुए उन्हें लगा कि वे काम करने के एकदम नए तरीके में डाल दी गई.

‘कामसूत्र’ अमेरिकी फिल्म थी. फिल्म निर्माण से जुड़े इस के 70त्न प्रमुख लोग भी अमेरिकन ही थे. इस के अलावा, अमेरिकी और भारतीय फिल्म उद्योग में बहुत सारे तकनीकी पहलुओं का भी अंतर था. जैसेकि सिंक्रनाइज्ड साउंड का इस्तेमाल करना, जिस से औडियो को फिल्म की शूटिंग के समय ही रिकौर्ड किया जा सकता था. उस समय पूरे बौलीवुड में इस तरह की तकनीक ज्यादातर इस्तेमाल नहीं की जा रही थी. जोया बताती हैं कि इस फिल्म से उन्होंने बहुत कुछ सीखा और इस के जरीए उन के कुछ बहुत अच्छे दोस्त बने जो आज तक उन के संपर्क में हैं.

1997 में विदेशों में रिलीज हुई इस फिल्म में बचपन की सहेलियों, 2 युवा महिलाओं की सैक्स लाइफ को परदे पर दिखाया गया था. फिल्म के रिलीज होते ही विदेश में भी इस पर समाज के कुछ तबकों ने नाराजगी जताई. भारत में भी इसे रिलीज करने की अनुमति नहीं मिली. बाद में भारतीय सैंसर बोर्ड ने फिल्म के कुछ दृश्य हटा कर और ‘ए’ सर्टिफिकेट के साथ इसे रिलीज करने की अनुमति दी.

भारत में इस सर्टिफिकेट का मतलब है कि इसे सिनेमाघरों में केवल वयस्क ही देख सकते हैं. हालांकि जोया के लिए फिल्म में काम करने का फैसला बहुत सहज था. वे कहती हैं, ‘‘मैं ने अपने मातापिता से कहा कि मैं 6 महीनों के लिए खजुराहो और जयपुर जा रही हूं. वहीं इस फिल्म की शूटिंग हो रही थी. इस के बाद मैं ने अपना बैग उठाया और निकल गई.’’

जोया ऐसी अकेली फिल्म निर्माता नहीं थीं जिन के काम करने का पेशेवर तरीका ‘सलाम बांबे’ देखने के बाद बदल गया हो. ठीक उसी समय एक और महिला इसे देख कर प्रभावित हुई थीं और उसी तरह का काम करना चाहती थीं लेकिन अभी तक ये दोनों एकदूसरे से अनजान थीं. जोया की तरह उन्होंने भी ‘सलाम बांबे’ देखने के बाद फिल्म निर्देशक बनने का फैसला कर लिया था. उन का का नाम था, रीमा कागती.

पहली मुलाकात और दोस्ती

रीमा और जोया की पहली मुलाकात फिल्म निर्माता कैजाद गुस्ताद की ‘बांबे बौयज’ (1998) के सैट पर हुई. वे दोनों इस फिल्म में युवा सहायक निर्देशक के रूप में काम कर रही थीं. पहली मुलाकात के बाद दोनों अच्छी दोस्त बन गईं. अगले कई सालों तक दोनों ने स्वतंत्र रूप से सहायक निर्देशक के रूप में अलगअलग निर्देशकों के साथ काम किया. उन की इस सोच के पीछे तर्क था कि वे एक निर्देशक के अधीन रह कर प्रशिक्षु बनने के बजाय फिल्म निर्देशन की अलगअलग विधाओं को जानें. भारतीय सिनेमा उद्योग में उन दिनों यह असामान्य बात थी. इसी के साथ उन की लंबे समय तक चलने वाली सा?ोदारी की शुरुआत भी हुई थी.

रीमा कागती को अपनी पहली फिल्म बनाने के लिए 2007 तक का इंतजार करना पड़ा, जब उन्होंने फीचर फिल्म ‘हनीमून ट्रैवल्स लिमिटेड’ फिल्म लिखी और निर्देशित की. यह कौमेडी ड्रामा फिल्म 6 नए शादीशुदा जोड़ों की कहानी है जो शादी के बाद मुंबई से गोवा की यात्रा पर जाते हैं. जोया इस फिल्म में कार्यकारी निर्माता के तौर पर रीमा का साथ दे रही थीं. फरहान फिल्म के निर्माताओं में से एक थे. रीमा के निर्देशक बनने के 2 साल बाद, जोया ने ‘लक बाय चांस’ फिल्म के निर्देशन के साथ अपनी निर्देशक की भूमिका की औपचारिक शुरुआत की.

यह फिल्म शायद कभी बनती ही नहीं क्योंकि फिल्म के नायक ‘विक्रम’ की भूमिका निभाने के लिए उस समय 7 प्रमुख अभिनेताओं ने मना कर दिया था. आखिर में फरहान इस किरदार को निभाने के लिए तैयार हुए. तब जा कर यह फिल्म बननी शुरू हुई. फिल्म की कहानी यह थी कि एक महत्त्वाकांक्षी अभिनेता का, जो फिल्म उद्योग में बहुत सफल है, इस सफलता को पाने के लिए लगातार नैतिक पतन होता जा रहा है.

लिंगभेद और भाईभतीजावाद

जोया की पसंदीदा फिल्मों में से एक ‘दीवार’ (1975) है, जो 2 भाइयों की कहानी है. इन में से एक पुलिस वाला बनता है और दूसरा गैंगस्टर. इस फिल्म को ले कर जोया कहती हैं, ‘‘इस में जो पापी आत्मा (गैंगस्टर) है वह मुझे बहुत आकर्षित करता है.’’

वे कहती हैं कि वही पतित आत्मा मुझे अपनी फिल्म ‘लक बाय चांस’ में भी दिखाई देती है. बौलीवुड के बारे में एक बौलीवुड फिल्म ‘लक बाय चांस’ फिल्म उद्योग के अनियमित फिल्म निर्माण, लिंगभेद और भाईभतीजावाद पर चुटीले अंदाज में मजाकिया टिप्पणियां करती है. इस की कहानी जोया और संवाद जावेद अख्तर ने लिखी थी. यह फिल्म उद्योग की अनिश्चितताओं को अंदरूनी तौर पर दिखाती है.

जोया कहती हैं, ‘‘आज अगर मैं ‘लक बाय चांस’ बनाना चाहती तो यह आसानी से बन सकती थी. अब मानसिकता बदल गई है. फिल्मों को ले कर लोगों का स्वाद बदल गया है. उस समय यह बहुत क्लासिक थी. नायक और खलनायक के बारे में थी.’’

2012 में आई फिल्म ‘तलाश’ के तौर पर, जोया अख्तर और रीमा कागती ने सह लेखक के रूप में औपचारिक रूप से अपनी पहली सस्पैंस ड्रामा फिल्म बनाई. इस का निर्देशन रीमा कागती ने किया. इस की कहानी मुंबई शहर पर आधारित है, जहां व्यक्तिगत नुकसान से परेशान एक पुलिस अधिकारी एक बड़े कद के अभिनेता की मौत की जांच करता है.

इस जोड़ी की पहली बड़ी हिट फिल्म है ‘जिंदगी न मिलेगी दोबारा,’ जो 2011 में रिलीज हुई थी. इस का निर्देशन जोया ने किया और कहानी रीमा और जोया ने मिल कर लिखी. फिल्म 3 दोस्तों की कहानी है, जो कमजोर पड़ती पुरानी दोस्ती को दोबारा जिंदा करने के लिए स्पेन की यात्रा की योजना बनाते हैं. वहां पहुंचने के बाद वे स्पेन घूमने निकलते हैं.

उन में से एक को वहीं प्यार होता है और वहीं ब्रेकअप हो जाता है. दूसरा दोस्त पहले अपने मातापिता को पाता है, फिर खो देता है. तीसरे को बैलों से डर लगता है और उस का डर दूर करने के लिए वे सभी वहां ‘बुल रन’ में भाग लेते हैं. इस तरह हंसीमजाक करते हुए वे अपनी कमजोर होती दोस्ती को फिर से जिंदा करते हैं.

हिट रही फिल्म

फिल्म काफी सफल रही. दर्शकों को उम्मीद थी कि इस का अगला भाग भी आएगा, लेकिन डेढ़ दशक बाद भी जोया इस को ले कर बहुत उत्साहित नहीं हैं. इस मसले पर उन से पूछने पर वे कहती हैं, ‘‘मैं सिर्फ पैसा कमाने के लिए कुछ भी नहीं करना चाहती. अगर मुझे बनाने लायक कोई कहानी मिलती है तो मैं इसे जरूर बनाऊंगी, नहीं तो ऐसे ही ठीक है.’’

जोया द्वारा निर्देशित की गई अगली फिल्म थी ‘दिल धड़कने दो,’ जो 2015 में रिलीज हुई थी. इसे उन्होंने कागती और फरहान के साथ मिल कर लिखा था. फिल्म की कहानी एक धनी परिवार की कमियों पर है, जिसे व्यंग्य और हास्य के साथ जहाज पर हो रहे उत्सव के दौरान होने वाली घटनाओं के जरीए दिखाया जाता है. यह फिल्म भी बौक्स औफिस पर हिट रही.

यही वह समय था जब जोया अख्तर और रीमा कागती ने ‘टाइगर बेबी फिल्म्स’ नाम की प्रोडक्शन कंपनी बनाई. जोया कहती हैं, ‘‘हम ने पहले से इस की कोई योजना नहीं बनाई थी. यह सब स्वाभाविक रूप से होता गया. सब से पहले तो हम ने एकसाथ लिखना शुरू किया और यह हमारे लिए काम कर गया. बाद में भी हम दोनों साथ में लिखते रहे. कंपनी के बनने की कहानी के पीछे अपने काम का स्वामित्व लेना था.

बड़े पैमाने पर प्रशंसा

टाइगर बेबी फिल्म्स की पहली और आधिकारिक फिल्म जोया द्वारा निर्देशित ‘गली बौय’ थी जो 2019 में रिलीज हुई. इस में मुंबई के स्लम एरिया धारावी के एक युवा मुसलिम रैपर की विजयी यात्रा का वर्णन है. फिल्म का किरदार अपने पारिवारिक संघर्ष और आर्थिक बो?ा से जू?ाते हुए अपनी कलात्मक प्यास को पूरा करने में लगा हुआ है. फिल्म को उस की कहानी और उस के कहने के आकर्षक अंदाज के लिए बड़े पैमाने पर प्रशंसा मिली. लेकिन इस में दिखाई गई संगीत शैली में राजनीतिक तत्त्व को कम कर के दिखाए जाने को ले कर इस की खूब आलोचना भी हुई. 2020 के औस्कर पुरस्कारों के लिए भारत की तरफ से ‘गली बौय’ को आधिकारिक रूप से भेजा गया था.

इसे अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म के तौर पर नामांकित कराया गया था. हालांकि यह अंतिम चयन में अपनी जगह नहीं बना पाई. यह 2019 की सब से ज्यादा कमाई करने वाली हिंदी फिल्मों में से एक थी. जोया कहती हैं, ‘‘अपने काम के लिए हर बार जब मैं ने किसी दूसरी शैली को आजमाना चाहा, वह सफल रही. भले ही स्क्रिप्ट देख कर लगा हो कि मेरी फिल्म को बेचना मुश्किल हो सकता है. इस मामले में मैं खुश हूं. एक वाकेया को याद करते हुए वे फिल्म निर्माता करण जौहर की बात बताती हैं कि करण ने ‘गली बौय’ को ले कर कहा था कि पता नहीं कि मैं इस फिल्म (गली बौय) को एक निर्माता के रूप में चुनना पसंद करूंगा या नहीं.’’

टाइगर बेबी की परियोजनाएं इमर्सिव लोकेशंस बनाने के लिए जानी जाती हैं. जैसाकि जोया इसे ‘वर्ल्ड बिल्डिंग’ कहती हैं. वे लगातार ‘विजुअल फील और फ्लेवर’ को फिर से खोजने के तरीकों के बारे में सोचती रहती हैं. विविधता की निरंतर खोज भी उन की अपनी खोज का हिस्सा है. साक्षात्कारों में वे अकसर इस बारे में बात करती हैं कि वे न तो आर्टहाउस हैं और न ही कमर्शियल बल्कि वे खुद को वैकल्पिक और मुख्यधारा के बीच कहीं रखती हैं.

बेहतरीन निर्देशन

जोया बताती हैं, ‘‘हम हमेशा फिल्म बनाने के अलगअलग तरीकों के साथ खेल रहे होते हैं. मैं ने और रीमा ने रोमांस के और पारिवारिक नाटक भी सफलता के साथ बनाए हैं. अमेजन प्राइम पर दिखाई जा रही ‘मेड इन हैवन’ ऐसी ही एक सीरीज है, जिस पर उन्होंने कई लेखकों और निर्देशकों के साथ काम किया है. यह सीरीज वैडिंग प्लानिंग का व्यापार कर रहे 2 दोस्तों पर आधारित है जो काम को ले कर बहुत सारे मुद्दों पर एकदूसरे से झगड़ा करते हैं.

जोया और कागती को अपराध वाला सिनेमा भी खूब पसंद है. इसी से प्रेरित हो कर उन्होंने 2023 में एक बैव सीरीज ‘दहाड़’ बनाई जो राजस्थान के एक गांव मंडावा की कहानी है. इसे उन्होंने रितेश शाह और जिथिन के साथ मिल कर लिखा था. यह बैव सीरीज एक सीरियल किलर के बड़े और गंभीर षड्यंत्र को उजागर करती है, जिस में वह कमजोर और हाशिए पर रहने वाली महिलाओं को शादी का वादा कर के अपने जाल में फंसाता है और फिर साइनाइड खिला कर उन की हत्या कर देता है.

‘दहाड़’ को शहरों पर केंद्रित कहानियों से एक प्रस्थान के रूप में देखा जा सकता है, जिन पर आमतौर पर टाइगर बेबी के ज्यादातर निर्माण आधारित होते हैं. जोया ‘दहाड़’ को ‘तलाश’ के विस्तार के तौर पर भी देखती हैं. वे कहती हैं, ‘‘दोनों के केंद्र में महिला के लापता होने की समस्या है. एक महिला गायब हो जाती है और इस से किसी को फर्क नहीं पड़ता.’’

जोया का मानना है कि ऐसा करना मिलीभगत वाले एक समाज द्वारा ही संभव हो सकता है जो महिलाओं पर तरहतरह के दबाव डाल कर उन्हें गंभीर खतरे में डालता है. यह मु?ो पागल कर देता है.

‘दहाड़’ में कहानी में किरदार को महिला प्रधान रचा गया है. इस में सोनाक्षी सिन्हा एक दलित पुलिस अधिकारी की भूमिका निभाती हैं. लैंगिक और जातिगत भेदभाव से लड़ते हुए वे खुद को एक पुलिस अफसर के तौर पर स्थापित करती हैं. इस में सोनाक्षी के बौस बने गुलशन देवैया, एक समर्पित पिता और खड़ूस पति के तौर पर दिखाई देते हैं. फिल्म के एक दृश्य में वे अपनी बेटी को ‘झांसी की रानी’ कह कर बुलाते हैं. ऐसा करते हुए वे बताते हैं कि वे अपने भाई से किसी भी तरह से कम नहीं हैं.

जोया इस दृश्य के बारे में कहती हैं, ‘‘मैं और रीमा इसी तरह के माहौल में बड़े हुए हैं. हमारे घरों में लड़का और लड़की में कोई अंतर नहीं था. हमारी मांएं मजबूत हैं, वहीं हमारे पास बेहद सुरक्षित पिता भी हैं. मु?ो लगता है कि इस से बहुत बड़ा फर्क पड़ता है.’’

दुनिया को अलग नजरिए से देखना

एक महिला फिल्मनिर्माता होने के नाते बौलीवुड में महिला दृष्टिकोण लाने को ले कर जोया का मानना है कि ये दोनों बातें आपस में जुड़ी हुई हैं. वे कहती हैं, ‘‘एक निर्धारित लिंग  वाले व्यक्ति के रूप में मैं दुनिया को अलग तरह से देखती हूं. मुझे दुनिया भी उसी तरह से देखती है. आप के साथ होने वाला व्यवहार भी इस तरह ही तय होता है. जब मैं अपनी कहानी बताती हूं तो मेरा अनुभव उस कहानी में आएगा ही और यह इस पर निर्भर करता है कि दुनिया ने मेरे साथ कैसा व्यवहार किय या मेरा व्यवहार कैसा रहा.’’

इस का मतलब मजबूत, दृढ़ इच्छाशक्ति वाली महिला पात्रों को लिखना हो सकता है. इस का मतलब नर्म, कोमल हृदय वाले पुरुष पात्रों को लिखना भी हो सकता है. भले ही यह मात्र कोरी कल्पना हो.

जोया से अकसर सवाल पूछा जाता है कि वे और ज्यादा महिला केंद्रित फिल्में क्यों नहीं बनाती हैं? इस पर वे कहती हैं, ‘‘मुझे ऐसी ही फिल्में क्यों बनानी चाहिए? मुझे वह काम करना चाहिए जो मैं करना चाहती हूं. स्वतंत्र होने का यही तो मतलब है कि वह काम कर पाना जिस में आप सक्षम हों या फिर वह जो आप करना चाहते हैं. एक खांचे में बंध कर रहते हुए कभी दूसरे में जाने की कोशिश न करना, स्वतंत्र होना तो नहीं है.’’

बौलीवुड हमेशा से ऐसे पुरुषों का गढ़ रहा है जो फिल्म की स्क्रीन के साथ बाहर भी अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. जब से जोया ने अपने कैरियर की शुरुआत की है, तब से फिल्म जगत में काफी बदलाव आया है. पहले से ज्यादा महिलाएं फिल्में निर्देशित कर रही हैं, कहानियां लिख रही हैं और अपनी पहचान बना रही हैं. वे कहती हैं कि उन के समय में कुछ पुरुषों ने भी मजबूत महिला किरदारों को गढ़ा है.

जब जोया से पूछा कि उन्हें महिलाओं की मित्रता पर बनी कौन सी हिंदी फिल्में सब से ज्यादा पसंद हैं तो उन्होंने श्याम बेनेगल की ‘मंडी’ (1983) और शशांका घोष द्वारा निर्देशित ‘वीरे दी वैडिंग’ (2018) आदि नाम बताए.

मातापिता को मेरा काम पसंद है

जोया अपने काम में जावेद और फरहान को भी काफी शामिल कर के रखती हैं. जब भी वे कोई स्क्रिप्ट लिखती हैं तो सब से पहले उन का परिवार उसे पढ़ता है. उस पर पहली प्रतिक्रिया भी परिवार से ही आती है. फिल्म के रफ कट भी सब से पहले परिवार के लोग ही देखते हैं. वे कहती हैं, ‘‘मुझे लगता है कि प्रतिक्रिया देते समय मेरा भाई सब से ज्यादा दयालु होता है. मेरे मातापिता इस काम को इतनी बार कर चुके हैं कि उन की प्रतिक्रिया में उस तरह का दयाभाव नहीं होता. जैसेकि मेरे पिता जावेद का पंसदीदा तरीका यह कहना है- ठीक है, मैं अच्छी बातों के बारे में बात नहीं करूंगा क्योंकि वे तो वैसे भी अच्छी हैं. चलो, उन बातों के बारे में बात करते हैं, जिन्हें सुधारने की जरूरत है.’’

जोया से जब पूछा गया कि क्या उन्हें लगता है कि उन के अनुभवी पटकथा लेखक मातापिता उन की बनाई हर फिल्म को पसंद करेंगे तो वे कहती हैं, ‘‘मेरे मातापिता तो दर्शकों का सिर्फ एक हिस्सा हैं. मु?ो पता है कि वे मेरे काम को पसंद करेंगे. एक फिल्म निर्माता के रूप में आप चाहते हैं कि हरकोई आप के काम को पसंद करे. जब आप एक फिल्म दिखा रहे होते हैं तो आप थोड़ी घबराहट तो महसूस करते ही हैं कि वह लोगों को पसंद आएगी या नहीं.’

टाइगर बेबी फिल्म्स
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Kapil Sharma के साथ अपने झगड़े को लेकर सुमोना चक्रवर्ती ने तोड़ी चुप्पी, सच्चाई से उठाया पर्दा

Kapil Sharma : कौमेडी नाइट्स विद कपिल, कौमेडी सर्कस में कपिल की जोड़ी बनी रही सुमोना चक्रवर्ती फिलहाल नेटफ्लिक्स पर आ रहे कपिल शो से नदारत है. सुमोना चक्रवर्ती पिछले 10 सालों से कपिल शर्मा के साथ कपिल शर्मा शो में उनकी बीवी के रूप में नजर आती रही है. लेकिन जब यही जोड़ी नेटफ्लिक्स पर एक साथ नजर नहीं आई तो उनके बारे में कई सारी बातें अफवाह सोशल मीडिया पर फैलने लगी. जिसके अनुसार सुमोना चक्रवर्ती और कपिल शर्मा के बीच अब दोस्ती नहीं है, मनमुटाव चल रहा है, दोनों के बीच झगड़ा होने की वजह से सुमोना शो से बाहर हैं आदि आदि..

लेकिन हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान सुमोना चक्रवर्ती ने इस झूठी अफवाह पर से पर्दा उठाया. सुमोना ने अपने इंटरव्यू में बताया कि उनका कपिल से कोई झगड़ा या मनमुटाव नहीं है, यह अफवाहें इसलिए फैल रही हैं क्योंकि मैं नेटफ्लिक्स के कपिल शो में नहीं हूं, हमारे रिश्तों में कोई खटास नहीं है बल्कि मैं तो कपिल की आभारी हूं क्योंकि उनके शो में हुई कमाई की वजह से ही मैं मुंबई जैसे शहर में घर खरीद पाई हूं, मुंबई शहर में खुद का घर खरीदना आसान नहीं होता.

मैं बहुत ही साधारण मिडिल क्लास बंगाली फैमिली की बेटी हूं. कपिल के साथ उसके शो में मेरे 10 साल आसानी से निकल गए. पता ही नहीं चला. कपिल के शो की वजह से मुझे सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं बल्कि थाईलैंड में भी लोकप्रियता मिली है. सुमोना के अनुसार, कपिल का शो थाईलैंड में भी फेमस है इसे थाई भाषा में डब किया जाता है. मुझे यह बात तब पता चली जब मैं अपने दोस्तों के साथ थाईलैंड के एक रेस्टोरेंट में गई थी वहां पर सब लोग मेरे साथ फोटो खिंचवाने के लिए बेताब थे. उस वक्त मुझे बहुत आश्चर्य हुआ. लेकिन बाद में पता चला कपिल के शो की वजह से मैं थाईलैंड में भी फेमस हूं. ऐसे में भला मैं उससे नाराज कैसे हो सकती हूं जिसकी वजह से मुझे इतने सारे लोगों का प्यार और सम्मान मिला है.

Salman Khan ‘सिकंदर’ के प्रमोशन के दौरान घड़ी के जरिए हिंदू देवी देवता और राम जन्मभूमि का प्रचार करते नजर आए

Salman Khan :  आज के समय में नाजुक हालत को देखते हुए फिल्मी दुनिया भी फूंकफूंक कर कदम रख रही है . क्योंकि वह नहीं चाहते कि किसी भी वजह से उनकी करोड़ों में बनी फिल्म विवादों में घिर जाए और बॉक्स औफिस पर सफलता के झंडे गाड़ने के बजाय विवादों में पड़कर असफलता की ओर निकल जाए. क्योंकि आजकल हिंदुत्व का बोलबाला है और मुसलमान पर खास नजर है, इसलिए बौलीवुड वाले भी पूरी तरह चौकन्ने हैं . अपनी फिल्मों के जरिए हिंदुत्व, राम जन्मभूमि, या हिंदू देवी देवताओं का प्रचार करके अपनी फिल्म को विवादों से सुरक्षित करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.

इसी का जीता जागता उदाहरण हाल ही में सलमान खान की फिल्म सिकंदर के प्रमोशन के दौरान भी देखने को मिला. हालांकि सलमान खान मुस्लिम होते हुए भी किसी जाति बंधन से दूर है क्योंकि अगर उनके पिता मुस्लिम है तो मां महाराष्ट्रीयन है और सलमान खान दोनों धर्म का पालन भी करते हैं. बावजूद इसके सिकंदर के प्रमोशन के दौरान सलमान खान अपने हाथ में खूबसूरत घड़ी पहने नजर आए जिसकी कीमत लाखों में है.

ऐसे में प्रमोशन के दौरान सलमान की घड़ी पर लोगों का शायद ज्यादा ध्यान नहीं जाता अगर वह फिल्म पब्लिसिटी के दौरान यह नहीं कहते कि मेरी घड़ी में राम जन्मभूमि है. जब सिकंदर के प्रमोशन के दौरान सलमान खान ने अपना हाथ उठाते हुए लोगों को विश करते हुए कहा 30 मार्च को मिलते हैं सिकंदर की रिलीज पर.

इस दौरान उनकी खूबसूरत घड़ी के डायल पर सबकी नजर पड़ी तो उसमें रामजन्म भूमि और हिंदू देवी देवताओं की तस्वीरें बनी हुई थी. इसके बाद सलमान खान सोशल मीडिया पर ट्रोल होने लगे उनके कुछ प्रशंसकों ने इसे फिल्म चलाने की स्ट्रैटेजी बताया तो कुछ ने लिखा सलमान आप तो ऐसे ना थे. गौरतलब है इसमें सलमान की गलती नहीं है क्योंकि वह अपनी फिल्म का भला चाहते हैं इससे पहले अजय देवगन ने फिल्म सिंघम के दौरान अपनी फिल्म की कहानी में रामायण को जोड़कर फिल्म को प्रमोट करने की कोशिश की थी.

करोड़ों की फिल्म बनाने वाली बौलीवुड मेकर्स अपनी फिल्म बचाने के लिए अगर देवी देवताओं का सहारा ले रहे हैं तो उसमें उनकी भी गलती नहीं है क्योंकि वह तो अपनी फिल्म का भला चाहते है .

Sonu Nigam ने भयानक पीठ दर्द के चलते पूना में बीच शो से गाना छोड़ कर अस्पताल मे हुए भर्ती

Sonu Nigam : प्रसिद्ध गायक सोनू निगम अपनी हेल्थ को लेकर आजकल बुरे दौर से गुजर रहे हैं. इसके बारे में सोनू निगम ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर करके अपना हाल जाहिर किया. जिसमें सोनू निगम ने बताया कि वह पूना में लाइव शो कर रहे थे तभी उनको पीठ पर तेज दर्द उठा वह दर्द इतना भयंकर था कि सोनू निगम को लगा जैसे कोई उनकी पीठ पर सुई चुभो रहा है.

सोनू के अनुसार दर्द इतना ज्यादा था कि उनको शो छोड़कर अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. ये उनकी लाइफ के सबसे कठिन दिन थे. सोनू को जो दर्द महसूस हुआ उसे मेडिकल भाषा में Excruciating pain कहते है जिसमें असहनीय और तीव्र दर्द होता है . जिस वजह से शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से परेशानी होती है.

इसके अलावा सोनू निगम को सीफूड से एलर्जी है जिसके कारण उनको सांस लेने में तकलीफ होने लगती है और पूरा चेहरा भी सूज जाता है . इतना ही नहीं सोनू निगम के अनुसार दुबई में एक कंसर्ट के दौरान अचानक उनकी आवाज चली गई थी जिसे वापस लाने में उनको 3:30 घंटे की मशक्कत करनी पड़ी थी. सोनू निगम घुटनों के दर्द से भी पीड़ित है, जिसके तहत उन्होंने अपने घुटने की ओस्टियोट्रामी सर्जरी करवाई थी.

इस सर्जरी के ठीक होने तक उन्होंने काम से ब्रेक लिया था. फिलहाल सोनू निगम का पूरा ध्यान अपनी सेहत पर है इसलिए वह अपने कंसेंट और फिल्मी गाने बहुत कम ले रहे हैं ,ताकि वह अपनी सेहत पर ध्यान दे सके.

Couple Goals : शादी के बाद फिजिकल रिलेशनशिप के बारे में बताएं?

Couple Goals :  अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल

Couple Goals :  27 वर्षीय पुरुष हूं. जल्द ही मेरा विवाह होने वाला है. सैक्स के बारे में दोस्तों से तरह तरह की बातें सुनने को मिल रही हैं, जिन के कारण मन में कई प्रकार की दुविधाएं जाग उठी हैं. कृपया बताएं कि क्या सुहागरात के समय पहली बार शारीरिक मिलन करने पर स्त्री की योनि से रक्तस्राव होना जरूरी है?

जवाब

कुंआरी कन्या में योनिछिद्र को कुदरती झिल्ली ढांपे रहती है. इसे योनिच्छद कहते हैं. कन्या के कुंआरे बने रहने तक उस में सिर्फ एक छोटा सा छेद होता है. उस से ही मासिक रक्तस्राव होता है. यह छिद्र का व्यास हर कन्या में शुरू से ही अलग अलग होता है. कुछ में यह सूई की नोक जैसा महीन होता है तो कुछ में इतना बड़ा और खुला होता है कि उस में 2 उंगलियां तक गुजर सकती है.

यह सोचना गलत है कि हर कुंआरी कन्या में योनिच्छद अक्षत ही होगा. यह सच है कि कुछ कन्याओं का योनिच्छद इतना कोमल होता है कि वह साधारण खेलकूद में ही फट जाता है. मासिकधर्म के दिनों रक्तस्राव सोखने के लिए इंटरनल सैनिटरी पैड रखने से भी यह भंग हो सकता है. घुड़सवारी और दूसरी कई गतिविधियों में भी योनिच्छ फट सकता है.

अत: यह सोचना कि नववधू के कुंआरे होने पर पहले शारीरिक मिलन के समय योनिच्छद से हलका रक्तस्राव अवश्य होगा, बेतुका ही है. मन में इस प्रकार की गलत कसौटियां बना लेना ठीक नहीं है. इन के चलते वैवाहिक जीवन बेवजह नारकीय बन जाता है. नववधू अबोध होते हुए भी अनावश्यक संदेह के कठघरे में खड़ी हो जाती है.

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अपनी शादी की बात सुन कर दिव्या फट पड़ी. कहने लगी, ‘‘क्या एक बार मेरी जिंदगी बरबाद कर के आप सब को तसल्ली नहीं हुई जो फिर से… अरे छोड़ दो न मुझे मेरे हाल पर. जाओ, निकलो मेरे कमरे से,’’ कह कर उस ने अपने पास पड़े कुशन को दीवार पर दे मारा. नूतन आंखों में आंसू लिए कुछ न बोल कर कमरे से बाहर आ गई.

आखिर उस की इस हालत की जिम्मेदार भी तो वे ही थे. बिना जांचतड़ताल किए सिर्फ लड़के वालों की हैसियत देख कर उन्होंने अपनी इकलौती बेटी को उस हैवान के संग बांध दिया. यह भी न सोचा कि आखिर क्यों इतने पैसे वाले लोग एक साधारण परिवार की लड़की से अपने बेटे की शादी करना चाहते हैं? जरा सोचते कि कहीं दिव्या के दिल में कोई और तो नहीं बसा है… वैसे दबे मुंह ही, पर कितनी बार दिव्या ने बताना चाहा कि वह अक्षत से प्यार करती है, लेकिन शायद उस के मातापिता यह बात जानना ही नहीं चाहते थे. अक्षत और दिव्या एक ही कालेज में पढ़ते थे. दोनों अंतिम वर्ष के छात्र थे. जब कभी अक्षत दिव्या के संग दिख जाता, नूतन उसे ऐसे घूर कर देखती कि बेचारा सहम उठता. कभी उस की हिम्मत ही नहीं हुई यह बताने की कि वह दिव्या से प्यार करता है पर मन ही मन दिव्या की ही माला जपता रहता था और दिव्या भी उसी के सपने देखती रहती थी.

‘‘नीलेश अच्छा लड़का तो है ही, उस की हैसियत भी हम से ऊपर है. अरे, तुम्हें तो खुश होना चाहिए जो उन्होंने अपने बेटे के लिए तुम्हारा हाथ मांगा, वरना क्या उन के बेटे के लिए लड़कियों की कमी है इस दुनिया में?’’ दिव्या के पिता मनोहर ने उसे समझाते हुए कहा था, पर एक बार भी यह जानने की कोशिश नहीं की कि दिव्या मन से इस शादी के लिए तैयार है भी या नहीं.

Hindi Moral Tales : एक और बलात्कारी – रूपा के बारे में क्या सोच रहा था सुमेर सिंह

Hindi Moral Tales : रूपा पगडंडी के रास्ते से हो कर अपने घर की ओर लौट रही थी. उस के सिर पर घास का एक बड़ा गट्ठर भी था. उस के पैरों की पायल की ‘छनछन’ दूर खड़े बिरजू के कानों में गूंजी, तो वह पेड़ की छाया छोड़ उस पगडंडी को देखने लगा.

रूपा को पास आता देख बिरजू के दिल की धड़कनें तेज हो गईं और उस का दिल उस से मिलने को मचलने लगा.

जब रूपा उस के पास आई, तो वह चट्टान की तरह उस के रास्ते में आ कर खड़ा हो गया.

‘‘बिरजू, हट मेरे रास्ते से. गाय को चारा देना है,’’ रूपा ने बिरजू को रास्ते से हटाते हुए कहा.

‘‘गाय को तो तू रोज चारा डालती है, पर मुझे तो तू घास तक नहीं डालती. तेरे बापू किसी ऐरेगैरे से शादी कर देंगे, इस से अच्छा है कि तू मुझ से शादी कर ले. रानी बना कर रखूंगा तुझे. तू सारा दिन काम करती रहती है, मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘गांव में और भी कई लड़कियां हैं, तू उन से अपनी शादी की बात क्यों नहीं करता?’’

‘‘तू इतना भी नहीं समझती, मैं तो तुझ से प्यार करता हूं. फिर और किसी से अपनी शादी की बात क्यों करूं?’’

‘‘ये प्यारव्यार की बातें छोड़ो और मेरे रास्ते से हट जाओ, वरना घास का गट्ठर तुम्हारे ऊपर फेंक दूंगी,’’ इतना सुनते ही बिरजू एक तरफ हो लिया और रूपा अपने रास्ते बढ़ चली.

शाम को जब सुमेर सिंह की हवेली से रामदीन अपने घर लौट रहा था, तो वह अपने होश में नहीं था. गांव वालों ने रूपा को बताया कि उस का बापू नहर के पास शराब के नशे में चूर पड़ा है.

‘‘इस ने तो मेरा जीना हराम कर दिया है. मैं अभी इसे ठीक करती हूं,’’ रूपा की मां बड़बड़ाते हुए गई और थोड़ी देर में रामदीन को घर ला कर टूटीफूटी चारपाई पर पटक दिया और पास में ही चटाई बिछा कर सो गई.

सुबह होते ही रूपा की मां रामदीन पर भड़क उठी, ‘‘रोज शराब के नशे में चूर रहते हो. सारा दिन सुमेर सिंह की मजदूरी करते हो और शाम होते ही शराब में डूब जाते हो. आखिर यह सब कब तक चलता रहेगा? रूपा भी सयानी होती जा रही है, उस की भी कोई चिंता है कि नहीं?’’

रामदीन चुपचाप उस की बातें सुनता रहा, फिर मुंह फेर कर लेट गया. रामदीन कई महीनों से सुमेर सिंह के पास मजदूरी का काम करता था. खेतों की रखवाली करना और बागबगीचों में पानी देना उस का रोज का काम था.

दरअसल, कुछ महीने पहले रामदीन का छोटा बेटा निमोनिया का शिकार हो गया था. पूरा शरीर पीला पड़ चुका था. गरीबी और तंगहाली के चलते वह उस का सही इलाज नहीं करा पा रहा था. एक दिन उस के छोटे बेटे को दौरा पड़ा, तो रामदीन फौरन उसे अस्पताल ले गया.

डाक्टर ने उस से कहा कि बच्चे के शरीर में खून व पानी की कमी हो गई है. इस का तुरंत इलाज करना होगा. इस में 10 हजार रुपए तक का खर्चा आ सकता है.

किसी तरह उसे अस्पताल में भरती करा कर रामदीन पैसे जुटाने में लग गया. पासपड़ोस से मदद मांगी, पर किसी ने उस की मदद नहीं की.

आखिरकार वह सुमेर सिंह के पास पहुंचा और उस से मदद मांगी, ‘‘हुजूर, मेरा छोटा बेटा बहुत बीमार है. उसे निमोनिया हो गया था. मुझे अभी 10 हजार रुपए की जरूरत है. मैं मजदूरी कर के आप की पाईपाई चुका दूंगा. बस, आप मुझे अभी रुपए दे दीजिए.’’

‘‘मैं तुम्हें अभी रुपए दिए दे देता हूं, लेकिन अगर समय पर रुपए नहीं लौटा सके, तो मजदूरी की एक फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा. बोलो, मंजूर है?’’

‘‘हां हुजूर, मुझे सब मंजूर है,’’ अपने बच्चे की जान की खातिर उस ने सबकुछ कबूल कर लिया.

पहले तो रामदीन कभीकभार ही अपनी थकावट दूर करने के लिए शराब पीता था, लेकिन सुमेर सिंह उसे रोज शराब के अड्डे पर ले जाता था और उसे मुफ्त में शराब पिलाता था. लेकिन अब तो शराब पीना एक आदत सी बन गई थी. शराब तो उसे मुफ्त में मिल जाती थी, लेकिन उस की मेहनत के पैसे सुमेर सिंह हजम कर जाता था. इस से उस के घर में गरीबी और तंगहाली और भी बढ़ती गई.

रामदीन शराब के नशे में यह भी भूल जाता था कि उस के ऊपर कितनी जिम्मेदारियां हैं. दिन पर दिन उस पर कर्ज भी बढ़ता जा रहा था. इस तरह कई महीने बीत गए. जब रामदीन ज्यादा नशे में होता, तो रूपा ही सुमेर सिंह का काम निबटा देती.

एक सुबह रामदीन सुमेर सिंह के पास पहुंचा, तो सुमेर सिंह ने हुक्का गुड़गुड़ाते हुए कहा, ‘‘रामदीन, आज तुम हमारे पास बैठो. हमें तुम से कुछ जरूरी बात करनी है.’’

‘‘हुजूर, आज कुछ खास काम है क्या?’’ रामदीन कहते हुए उस के पास बैठ गए.

‘‘देखो रामदीन, आज मैं तुम से घुमाफिरा कर बात नहीं करूंगा. तुम ने मुझ से जो कर्जा लिया है, वह तुम मुझे कब तक लौटा रहे हो? दिन पर दिन ब्याज भी तो बढ़ता जा रहा है. कुलमिला कर अब तक 15 हजार रुपए से भी ज्यादा हो गए हैं.’’

‘‘मेरी माली हालत तो बदतर है. आप की ही गुलामी करता हूं हुजूर, आप ही बताइए कि मैं क्या करूं?’’

सुमेर सिंह हुक्का गुड़गुड़ाते हुए कुछ सोचने लगा. फिर बोला, ‘‘देख रामदीन, तू जितनी मेरी मजदूरी करता है, उस से कहीं ज्यादा शराब पी जाता है. फिर बीचबीच में तुझे राशनपानी देता ही रहता हूं. इस तरह तो तुम जिंदगीभर मेरा कर्जा उतार नहीं पाओगे, इसलिए मैं ने फैसला किया है कि अब अपनी जोरू को भी काम पर भेजना शुरू कर दे.’’

‘‘लेकिन हुजूर, मेरी जोरू यहां आ कर करेगी क्या?’’ रामदीन ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

‘‘मुझे एक नौकरानी की जरूरत है. सुबहशाम यहां झाड़ूपोंछा करेगी. घर के कपड़ेलत्ते साफ करेगी. उस के महीने के हजार रुपए दूंगा. उस में से 5 सौ रुपए काट कर हर महीने तेरा कर्जा वसूल करूंगा.

‘‘अगर तुम यह भी न कर सके, तो तुम मुझे जानते ही हो कि मैं जोरू और जमीन सबकुछ अपने कब्जे में ले लूंगा.’’

‘‘लेकिन हुजूर, मेरी जोरू पेट से है और उस की कमर में भी हमेशा दर्द रहता है.’’

‘‘बच्चे पैदा करना नहीं भूलते, पर मेरे पैसे देना जरूर भूल जाते हो. ठीक है, जोरू न सही, तू अपनी बड़ी बेटी रूपा को ही भेज देना.

‘‘रूपा सुबहशाम यहां झाड़ूपोंछा करेगी और दोपहर को हमारे खेतों से जानवरों के लिए चारा लाएगी. घर जा कर उसे सारे काम समझा देना. फिर दोबारा तुझे ऐसा मौका नहीं दूंगा.’’

अब रामदीन को ऐसा लगने लगा था, जैसे वह उस के भंवर में धंसता चला जा रहा है. सुमेर सिंह की शर्त न मानने के अलावा उस के पास कोई चारा भी नहीं बचा था.

शाम को रामदीन अपने घर लौटा, तो उस ने सुमेर सिंह की सारी बातें अपने बीवीबच्चों को सुनाईं.

यह सुन कर बीवी भड़क उठी, ‘‘रूपा सुमेर सिंह की हवेली पर बिलकुल नहीं जाएगी. आप तो जानते ही हैं. वह पहले भी कई औरतों की इज्जत के साथ खिलवाड़ कर चुका है. मैं खुद सुमेर सिंह की हवेली पर जाऊंगी.’’

‘‘नहीं मां, तुम ऐसी हालत में कहीं नहीं जाओगी. जिंदगीभर की गुलामी से अच्छा है कि कुछ महीने उस की गुलामी कर के सारे कर्ज उतार दूं,’’ रूपा ने अपनी बेचैनी दिखाई.

दूसरे दिन से ही रूपा ने सुमेर सिंह की हवेली पर काम करना शुरू कर दिया. वह सुबहशाम उस की हवेली पर झाड़ूपोंछा करती और दोपहर में जानवरों के लिए चारा लाने चली जाती.

अब सुमेर सिंह की तिरछी निगाहें हमेशा रूपा पर ही होती थीं. उस की मदहोश कर देनी वाली जवानी सुमेर सिंह के सोए हुए शैतान को जगा रही थी. रूपा के सामने तो उस की अपनी बीवी उसे फीकी लगने लगी थी.

सुमेर सिंह की हवेली पर सारा दिन लोगों का जमावड़ा लगा रहता था, लेकिन शाम को उस की निगाहें रूपा पर ही टिकी होती थीं.

रूपा के जिस्म में गजब की फुरती थी. शाम को जल्दीजल्दी सारे काम निबटा कर अपने घर जाने के लिए तैयार रहती थी. लेकिन सुमेर सिंह देर शाम तक कुछ और छोटेमोटे कामों में उसे हमेशा उलझाए रखता था. एक दोपहर जब रूपा पगडंडी के रास्ते अपने गांव की ओर बढ़ रही थी, तभी उस के सामने बिरजू आ धमका. उसे देखते ही रूपा ने अपना मुंह फेर लिया.

बिरजू उस से कहने लगा, ‘‘मैं जब भी तेरे सामने आता हूं, तू अपना मुंह क्यों फेर लेती है?’’

‘‘तो मैं क्या करूं? तुम्हें सीने से लगा लूं? मैं तुम जैसे आवारागर्दों के मुंह नहीं लगना चाहती,’’ रूपा ने दोटूक जवाब दिया.

‘‘देख रूपा, तू भले ही मुझ से नफरत कर ले, लेकिन मैं तो तुझ को प्यार करता ही रहूंगा. आजकल तो मैं ने सुना है, तू ने सुमेर सिंह की हवेली पर काम करना शुरू कर दिया है. शायद तुझे सुमेर सिंह की हैवानियत के बारे में पता नहीं. वह बिलकुल अजगर की तरह है. वह कब शिकारी को अपने चंगुल में फंसा कर निगल जाए, यह किसी को पता नहीं.

‘‘मुझे तो अब यह भी डर सताने लगा है कि कहीं वह तुम्हें नौकरानी से रखैल न बना ले, इसलिए अभी भी कहता हूं, तू मुझ से शादी कर ले.’’ यह सुन कर रूपा का मन हुआ कि वह बिरजू को 2-4 झापड़ जड़ दे, पर फिर लगा कि कहीं न कहीं इस की बातों में सचाई भी हो सकती है.

रूपा पहले भी कई लोगों से सुमेर सिंह की हैवानियत के बारे में सुन चुकी थी. इस के बावजूद वह सुमेर सिंह की गुलामी के अलावा कर भी क्या सकती थी. इधर सुमेर सिंह रूपा की जवानी का रसपान करने के लिए बेचैन हो रहा था, लेकिन रूपा उस के झांसे में आसानी से आने वाली नहीं थी.

सुमेर सिंह के लिए रूपा कोई बड़ी मछली नहीं थी, जिस के लिए उसे जाल बुनना पड़े.

एक दिन सुमेर सिंह ने रूपा को अपने पास बुलाया और कहा, ‘‘देखो रूपा, तुम कई दिनों से मेरे यहां काम कर रही हो, लेकिन महीने के 5 सौ रुपए से मेरा कर्जा इतनी जल्दी उतरने वाला नहीं है, जितना तुम सोच रही हो. इस में तो कई साल लग सकते हैं.

‘‘मेरे पास एक सुझाव है. तुम अगर चाहो, तो कुछ ही दिनों में मेरा सारा कर्जा उतार सकती हो. तेरी उम्र अभी पढ़नेलिखने और कुछ करने की है, मेरी गुलामी करने की नहीं,’’ सुमेर सिंह के शब्दों में जैसे एक मीठा जहर था.

‘‘मैं आप की बात समझी नहीं?’’ रूपा ने सवालिया नजरों से उसे देखा.

सुमेर सिंह की निगाहें रूपा के जिस्म को भेदने लगीं. फिर वह कुछ सोच कर बोला, ‘‘मैं तुम से घुमाफिरा कर बात नहीं करूंगा. तुम्हें आज ही एक सौदा करना होगा. अगर तुम्हें मेरा सौदा मंजूर होगा, तो मैं तुम्हारा सारा कर्जा माफ कर दूंगा और इतना ही नहीं, तेरी शादी तक का खर्चा मैं ही दूंगा.’’

रूपा बोली, ‘‘मुझे क्या सौदा करना होगा?’’

‘‘बस, तू कुछ दिनों तक अपनी जवानी का रसपान मुझे करा दे. अगर तुम ने मेरी इच्छा पूरी की, तो मैं भी अपना वादा जरूर निभाऊंगा,’’ सुमेर सिंह के तीखे शब्दों ने जैसे रूपा के जिस्म में आग लगा दी थी.

‘‘आप को मेरे साथ ऐसी गंदी बातें करते हुए शर्म नहीं आई,’’ रूपा गुस्से में आते हुए बोली.

‘‘शर्म की बातें छोड़ और मेरा कहा मान ले. तू क्या समझती है, तेरा बापू तेरी शादी धूमधाम से कर पाएगा? कतई नहीं, क्योंकि तेरी शादी के लिए वह मुझ से ही उधार लेगा.

‘‘इस बार तो मैं तेरे पूरे परिवार को गुलाम बनाऊंगा. अगर ब्याह के बाद तू मदद के लिए दोबारा मेरे पास आई भी तो मैं तुझे रखैल तक नहीं बनाऊंगा. अच्छी तरह सोच ले. मैं तुझे इस बारे में सोचने के लिए कुछ दिन की मुहलत भी देता हूं. अगर इस के बावजूद भी तू ने मेरी बात नहीं मानी, तो मुझे दूसरा रास्ता भी अपनाना आता है.’’

सुमेर सिंह की कही गई हर बात रूपा के जिस्म में कांटों की तरह चुभती चली गई. सुमेर सिंह की नीयत का आभास तो उसे पहले से ही था, लेकिन वह इतना बदमाश भी हो सकता है, यह उसे बिलकुल नहीं पता था.

रूपा को अब बिरजू की बातें याद आने लगीं. अब उस के मन में बिरजू के लिए कोई शिकायत नहीं थी.

रूपा ने यह बात किसी को बताना ठीक नहीं समझा. रात को तो वह बिलकुल सो नहीं पाई. सारी रात अपने वजूद के बारे में ही वह सोचती रही.

रूपा को सुमेर सिंह की बातों पर तनिक भी भरोसा नहीं था. उसे इस बात की ज्यादा चिंता होने लगी थी कि अगर अपना तन उसे सौंप भी दिया, तो क्या वह भी अपना वादा पूरा करेगा? अगर ऐसा नहीं हुआ, तो अपना सबकुछ गंवा कर भी बदनामी के अलावा उसे कुछ नहीं मिलेगा.

इधर सुमेर सिंह भी रूपा की जवानी का रसपान करने के लिए उतावला हो रहा था. उसे तो बस रूपा की हां का इंतजार था. धीरेधीरे वक्त गुजर रहा था. लेकिन रूपा ने उसे अब तक कोई संकेत नहीं दिया था. सुमेर सिंह ने मन ही मन कुछ और सोच लिया था.

यह सोच कर रूपा की भी बेचैनी बढ़ती जा रही थी. उसे खुद को सुमेर सिंह से बचा पाना मुश्किल लग रहा था. एक दोपहर जब रूपा सुमेर सिंह के खेतों में जानवरों के लिए चारा लाने गई, तो सब से पहले उस की निगाहें बिरजू को तलाशने लगीं, पर बिरजू का कोई अतापता नहीं था. फिर वह अपने काम में लग गई. तभी किसी ने उस के मुंह पर पीछे से हाथ रख दिया.

रूपा को लगा शायद बिरजू होगा, लेकिन जब वह पीछे की ओर मुड़ी, तो दंग रह गई. वह कोई और नहीं, बल्कि सुमेर सिंह था. उस की आंखों में वासना की भूख नजर आ रही थी.

तभी सुमेर सिंह ने रूपा को अपनी मजबूत बांहों में जकड़ते हुए कहा, ‘‘हुं, आज तुझे मुझ से कोई बचाने वाला नहीं है. अब तेरा इंतजार भी करना बेकार है.’’

‘‘मैं तो बस आज रात आप के पास आने ही वाली थी. अभी आप मुझे छोड़ दीजिए, वरना मैं शोर मचाऊंगी,’’ रूपा ने उस के चंगुल से छूटने की नाकाम कोशिश की.

पर सुमेर सिंह के हौसले बुलंद थे. उस ने रूपा की एक न सुनी और घास की झाड़ी में उसे पूरी तरह से दबोच लिया.

रूपा ने उस से छूटने की भरपूर कोशिश की, पर रूपा की नाजुक कलाइयां उस के सामने कुछ खास कमाल न कर सकीं.

अब सुमेर सिंह का भारीभरकम बदन रूपा के जिस्म पर लोट रहा था, फिर धीरेधीरे उस ने रूपा के कपड़े फाड़ने शुरू किए.

जब रूपा ने शोर मचाने की कोशिश की, तो उस ने उस का मुंह उसी के दुपट्टे से बांध दिया, ताकि वह शोर भी न मचा सके.

अब तो रूपा पूरी तरह से सुमेर सिंह के शिकंजे में थी. वह आदमखोर की तरह उस पर झपट पड़ा. इस से पहले वह रूपा को अपनी हवस का शिकार बना पाता, तभी किसी ने उस के सिर पर किसी मजबूत डंडे से ताबड़तोड़ वार करना शुरू कर दिया. कुछ ही देर में वह ढेर हो गया.

रूपा ने जब गौर से देखा, तो वह कोई और नहीं, बल्कि बिरजू था. तभी वह उठ खड़ी हुई और बिरजू से लिपट गई. उस की आंखों में एक जीत नजर आ रही थी.

बिरजू ने उसे हौसला दिया और कहा, ‘‘तुम्हें अब डरने की कोई जरूरत नहीं है. मैं इसी तरह तेरी हिफाजत जिंदगीभर करता रहूंगा.’’ रूपा ने बिरजू का हाथ थाम लिया और अपने गांव की ओर चल दी.

लेखक- मनोज मांझी भुईयां

Famous Hindi Stories : झूठ बोले कौआ काटे

प्रेम नेगी काफी चिंतित था. शहर में नौकरी तो मिल गई, मगर मकान नहीं मिल रहा था. कई जगह भटकता रहा. उसे कभी मकान पसंद आता, तो किराया ज्यादा लगता. कहीं किराया ठीक लगता, तो बस्ती और माहौल पसंद नहीं पड़ता था. कहीं किराया और मकान दोनों पसंद पड़ते, तो वह अपने कार्यस्थल से काफी दूर लगता. क्या किया जाए, समझ नहीं आ रहा था. आखिर कब तक होटल में रहता. उसे वह काफी महंगा पड़ रहा था.

यों ही एक महीना बीतने पर उस की चिंता और ज्यादा बढ़ गई. एक दोपहर लंच के समय उस ने अपने सीनियर सहकर्मचारियों से अपनी परेशानी कह दी. उस की परेशानी सुन कर वे हंस पड़े.

“बेचारा आशियाना ढूंढ़ रहा है,” एक बुजुर्ग बोल पड़े.

आखिर क्लर्क के ओहदे पर कार्यरत एक शख्स उस की मदद में आया. ओम तिवारी नाम था उस का. लंबा कद. घुंघराले बाल. मितभाषी. वह पिछले 6 साल से यहां कार्यरत था.

“शाम को मेरे साथ चलना,” वह बोला.

उस शाम ओम तिवारी उसे अपनी बाइक पर बिठा कर निकल पडा.  20 मिनट राइड करने के बाद दोनों एक भीड़भाड़ गली से गुजर कर संकरी गली में आए, जिस के दोनों ओर कचोरी, समोसे और गोलगप्पे लिए ठेले वाले खड़े थे और युवक, युवतियां और बच्चे खड़ेखड़े खाने में व्यस्त थे.

कुछ पल के बाद वे एक खुले से मैदान में आए, जहां कुछ मकान दिखाई पड़े. ट्रैफिक के शोरगुल से दूर वहां शांति थी. कुछ मकान को पार करते हुए वे एक डुप्लैक्स के सामने आ कर रुके. बरांडे का गेट खोल कर अंदर प्रवेश किया.

डोर बेल बजाते ही दरवाजा खुला और एक अधेड़ उम्र के आदमी ने उन्हें देखते ही स्वागत किया, “अरे ओम, तुम यहां…”

“चाचाजी, ये मेरे दोस्त हैं प्रेम नेगी,” उस ने तुरंत काम की बात कर डाली, “ये हाल ही में दफ्तर में कैशियर के ओहदे पर नियुक्त हुए हैं. इन्हें किराए पर मकान चाहिए. और मुझे याद आया कि आप का मकान खाली है,“ फिर प्रेम नेगी की तरफ मुड़ कर वह बोला, “ये मेरे चाचाजी हैं, कमल शर्मा. हाल ही में हाईकोर्ट में क्लर्क के ओहदे से रिटायर हुए हैं.“

चाचा कमल शर्मा ने उस छोरे को सिर से पांव तक निरखा और फिर अपने भतीजे की ओर देख कर बोला, “ठीक है, मगर एक शर्त है. आप शादीशुदा हैं तो ही मैं अपना मकान किराए पर दूंगा. वरना मेरा तजरबा है कि कई कुंवारे छोरे यहां बाजारू लड़कियों को लाना शुरू कर देते हैं.“

“लेकिन, मैं तो शादीशुदा हूं,” प्रेम नेगी तुरंत बोल पड़ा और फिर अपने दोस्त ओम तिवारी की तरफ देख कर बोला, “मैं मकान मिलते ही अपनी घरवाली को ले आऊंगा.”

“ठीक है, आइए और मकान देख लीजिए.”

मकान मालिक कमल शर्मा ने उठ कर उन्हें अपने साथ ले कर बगल में जो खाली मकान था, वह दिखा दिया. मकान में 2 कमरे, रसोई और आगे आलीशान बरांडा था. कमरों में अटैच टौयलेट बाथरूम भी थे. उसे मकान पसंद आया.

“किराया 5,000 रुपए प्रति माह,” मकान मालिक कमल शर्मा ने प्रेम नेगी को किराया बता दिया.

फिर चाचा ने अपने भतीजे की तरफ देख कर कहा, “वैसे तो 6 महीने का किराया एडवांस लेने का दस्तूर है, लेकिन क्योंकि तुम्हें मेरा भतीजा ले कर आया है, मैं तुम से सिर्फ 3 महीने का एडवांस लूंगा. बोलो, है मंजूर?”

“मंजूर है,“ प्रेम नेगी खुशी से बोल पडा.

वह अगले ही दिन किराए के मकान में रहने आ गया. उसे मकान तो मिल गया, लेकिन झूठ बोल कर. वह शादीशुदा नहीं था. मकान मालिक से उस ने झूठ बोला था. यहां तक कि ओम तिवारी भी समझ रहा था कि वह शादीशुदा था.

2 सप्ताह यों ही बीत गए, फिर एक रोज मकान मालिक कमल शर्मा ने उस से पूछ ही लिया, “कब ला रहे हो अपनी बीवी को?”

यह सुन कर वह चौंक गया. दिनरात उपाय सोचने लगा. क्या किया जाए? बीवी को कहां से लाए?

एक दोपहर लंच के समय वह खाना खा कर अपनी केबिन में आराम से कुरसी पर आंखें मूंदे बैठा था कि उसे एक लड़की की आवाज सुनाई पड़ी.

“क्या आप ही प्रेम नेगी हैं?” अपनी आंखें खोलते ही वह हैरान रह गया.

एक अत्यंत खूबसूरत लंबे कद वाली, गोल चेहरे पर बड़ी आंखें और कमर तक झुके हुए लंबे बाल, गुलाबी सलवार और हलके हरे कमीज पर सफेद दुपट्टा ओढ़े हुए लड़की उस के सामने थी.

“जी,” वह बोल पड़ा, “कहिए, क्या काम है?”

“मैं रितू कश्यप हूं. 2 दिन पहले ही औडिट सैक्शन में कंप्यूटर औपरेटर की हैसियत से ज्वौइन किया है. मैं ने सुना है कि आप ने हाल ही में अपने लिए मकान ढूंढ़ा है. क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं मकान ढूंढ़ने में?”

“जी,” वह एकदम से हड़बड़ा गया, ”आ… आप को मकान चाहिए?” इतना कह कर वह गहरी सोच में डूब गया.

उस के भीतर से आवाज आने लगी. यही मौका है, हां कर दे. इसे ही अपने साथ कमरे में रख ले झूठमूठ अपनी पत्नी बना कर. मगर क्या वह इस के लिए राजी होगी?

“शाम को दफ्तर से छूटते ही मुझे मिलना. मैं जरूर आप की मदद कर दूंगा,” उस ने लड़की को आश्वस्त करते हुए कहा.

शाम को दफ्तर से छूटते ही वह रितू को औटोरिकशा में अंबेडकर पार्क ले आया. दोनों एक बेंच पर बैठे. उस ने थोड़ी देर सोचा. बात कहां से शुरू की जाए. फिर वह बोला, “देखिए रितूजी, मैं आप से झूठ नहीं बोलूंगा. सच ही कहूंगा. मैं ने किराए का मकान झूठ बोल कर लिया है. सरासर झूठ…”

“कैसा झूठ…?“ रितू ने पूछा.

“यही कि मैं शादीशूदा हूं. वैसे, मैं अभी कुंवारा हूं.”

“लेकिन, इस से मुझे क्या…?” रितू ने पूछ लिया.

“यदि तुम्हें मेरे मकान का एक कमरा चाहिए, तो तुम्हें मेरी पत्नी बन कर रहना पड़ेगा, वरना मुझे भी वो मकान खाली करना पड़ेगा.”

“पत्नी बन कर…” वह आश्चर्यचकित रह गई. फिर लड़के को घूरती रही. दिखने में तो अच्छा है. भला भी लगता है. वह सोचने लगी. फिर कालेज में तो बहुत नाटक किए हैं. कई स्मार्ट लडकों को अपने पीछे लट्टू बना कर घुमाया है. एक और नाटक सही. देखते हैं कि कहां तक सफलता हासिल होती है.

“मंजूर है,” वह आत्मविश्वास के साथ बोली.

“क्या…?” वह हक्काबक्का सा रह गया. उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि कोई लड़की इतनी जल्दी इतना बड़ा निर्णय ले सकती है.

“क्या तुम भी मेरे साथ झूठ बोल कर रहोगी?”

“बिलकुल,” वह बोली, ”चलिए, मकान दिखाइए.”

“देखिए रितूजी, ये झूठ सिर्फ मेरे और तुम्हारे बीच ही रहेगा. हमारा मकान मालिक और दफ्तर का कोई भी इस राज को जान न पाए, ध्यान रहे… ये सिर्फ नाटक है,” उस ने चेतावनी दे कर कहा.

“आप बेफिक्र रहिए. चलिए, मकान देखते हैं.“

अगले दिन सवेरेसवेरे रितू अपना सूटकेस ले कर प्रेम के घर चली आई. उस ने मकान के कमरों का निरीक्षण किया. दोनों कमरे अलगअलग थे और दोनों में अटैच बाथरूम और टौयलेट देख कर वह हंस पड़ी.

“वाह, कमरे तो बिलकुल अलग हैं. हम दोनों आराम से अलगअलग रह सकते हैं.”

प्रेम ने मकान मालिक को बुला कर रितू का परिचय अपनी बीवी के तौर पर करवा दिया.

“रितू को यहां एक स्कूल में टीचर की नौकरी मिली है. उस का समय भी दफ्तर की तरह ही 11बजे से 5 बजे है. हम दोनों साथ ही काम पर जाएंगे और लौटेंगे.”

“ठीक ही हुआ. तुम जल्दी ही अपनी बीवी को ले आए,” मकान मालिक ने भी खुश होते हुए कहा.

और फिर नाटक शुरू हो गया.

प्रेम और रितू एकसाथ मकान में रहने लगे, मियांबीवी की तरह. दोनों का प्रवेश द्वार एक ही था, लेकिन बरांडा पार करते हुए दोनों अलगअलग कमरे में दाखिल हो जाते. दोनों साथसाथ दफ्तर जाते और छूटने के बाद बाजार में घूम कर रैस्टोरैंट में शाम का खाना खा कर ही घर लौटते. एकाध महीने बाद ही प्रेम अपने गांव से बाइक भी ले आया. फिर दोनों हमेशा बाइक पर एकसाथ नजर आने लगे. दफ्तर में किसी को जरा सा भी शक नहीं हुआ. यहां तक कि ओम तिवारी को भी नहीं.

दिन तो व्यस्तता में गुजर जाता, लेकिन रात को दोनों अलगअलग कमरे में बिस्तर में लेटे सोचने लगते. प्रेम सोचता, “क्या अजीब परिस्थिति है? कुंवारा होते हुए भी शादीशुदा होने का नाटक करना पड़ रहा है, वह भी एक खूबसूरत लड़की के साथ.”

रितू कभीकभार रात में कुछ आहट सुनते ही जाग उठती. कहीं वह बंदा मेरे कमरे में आने की कोशिश तो नहीं कर रहा? क्या भरोसा? मौका मिलते ही पतिपत्नी के नाटक को सही बना दे. वाह रितू, तू ने भी बड़ी हिम्मत की है. मर्द के साथ रात बिता रही है. यदि कोई अनहोनी हो गई तो…?

व्यस्त दुनिया में कोई क्या कर रहा है, कैसे जी रहा है, यह सोचने की किसी को तनिक भी फुरसत नहीं होती. लेकिन जहां किसी लड़केलड़की के संदिग्ध संबंधों की बात आती है, वहां झूठ ज्यादा देर तक छुपा नहीं रहता और सच सिर चढ़ कर बोलता है. भूख, बीमारी, गरीबी व गंदगी सहन करने वाला समाज यदि कोई अनैतिक संबंधों के बारे में पता चल जाए तो फिर उसे कतई सहन नहीं कर सकता. फिर यदि कुंवारे लड़कालड़की हों, तो फिर बात ही क्या है?

दफ्तर में ओम तिवारी को भी भनक लग गई.

“रितू को नकली बीवी बना कर बड़े मजे लूट रहे हो यार… कभीकभार हमें भी मौका दे दिया करो. आखिर मकान तो हम ने ही दिलवाया है. खाली भी करवा सकते हैं. समझे?“

यह सुन कर प्रेम नेगी के पांव तले जमीन सरक गई.

शाम को उस ने रितू से कहा, “हमारा झूठ पकड़ा गया है. ओम तिवारी को इस का पता चल गया है. वह हमारे मकान मालिक को जरूर बता देगा.”

रितू के चेहरे पर भी चिंता की रेखाएं उभर आईं.

उस रात प्रेम नेगी को नींद नहीं आई. उसे यकीन हो गया कि उस का झूठ अब ज्यादा चलने वाला नहीं था. फिर उसे डर था कि उस की इस मजबूरी का फायदा उठाते हुए कहीं ओम तिवारी उस के घर आ कर रितू के साथ जबरदस्ती न करने लगे. उस की नीयत ठीक नहीं थी. उसे रात भयानक लगने लगी थी. उस ने तय कर लिया कि सवेरे सबकुछ मकान मालिक को सहीसही बता देगा. उस ने अपने सेलफोन की घड़ी में देखा तो रात के साढ़े बारह बज चुके थे, तभी किसी ने उस का दरवाजा खटखटाया.

“नेगी… दरवाजा खोलो. मैं हूं शर्मा… मकान मालिक.”

“इतनी रात… मकान मालिक,“ वह हड़बड़ा गया.

कुछ पल वह सोचता रहा कि दरवाजा खोले या नहीं. खटखटाहट दोबारा हुई.

बिस्तर से उठ कर उस ने दरवाजा खोला.

“नेगीजी… बड़े मजे लूट रहे हो यार,” ओम तिवारी ने कुछ बहक कर कहा. उस ने शराब पी रखी थी और मकान मालिक कमल शर्मा मुसकरा रहा था. वह बोला, “आज की रात ओम यहीं सोएगा, तुम्हारे साथ.”

फिर वे दोनों बेझिझक अंदर घुस आए. ओम तिवारी के हाथ में शराब की बोतल थी और वह नशे में था. मकान मालिक कमल शर्मा के मुंह से भी बदबू आ रही थी. मेज पर बोतल रख कर ओम तिवारी सोफे पर बैठ गया और बहकी हुई आवाज में बोला, “कहां है तुम्हारी नकली बीवी? महबूबा… आज तो हमें उस से ही मिलना है.”

“ तिवारीजी….देखिए रितू बीमार है और अपने कमरे में सो रही है,” वह गिड़गिड़ाने लगा.

फिर उस ने मकान मालिक कमल शर्मा के सामने अत्यंत दीन हो कर कहा, “माफ कीजिए. मैं ने झूठ बोला था. रितू मेरी बीवी नहीं, बल्कि मेरे ही दफ्तर में कार्यरत है. उसे भी मकान की जरूरत थी, इसलिए मैं उसे यहां ले आया. गलती मेरी है. मैं ने झूठ बोला था. आप कहें तो हम कल ही मकान खाली कर देंगे.”

“छोड़ यार… मकान खाली करने को कौन कहता है?” ओम तिवारी नशे में बोल पड़ा, “मुझे तो सिर्फ रितू चाहिए. तुम अकेलेअकेले मजे लूटते हो. आज हमें भी उस का स्वाद चखने दो.”

ओम तिवारी लड़खड़ाता हुआ अंदर के किवाड़ की तरफ आगे बढ़ा, जहां पर रितू सोई हुई थी. उस ने जोर से धक्का दे कर दरवाजा खोलने की कोशिश की.

“दरवाजा खोल जानेमन, हम भी प्रेम के जिगरी दोस्त हैं.”

“नहीं तिवारी, तुम ऐसा नहीं कर सकते,” चीख कर प्रेम उस की ओर लपका और उसे धक्का दे कर दरवाजे से दूर धकेल दिया. मकान मालिक कमल शर्मा ने तभी उस की तरफ लपक कर उसे अपने दोनों हाथों से जकड़ लिया, फिर वहीं पर दोनों के बीच हाथापाई शुरू हो गई.

प्रेम नेगी ने मकान मालिक कमल शर्मा को 2-3  घूंसे जड़ दिए. उधर ओम तिवारी ने जोर से दरवाजे पर लात मारी और दरवाजा खुल गया. कमरे में अंधेरा था. ओम तिवारी ने प्रवेश किया.

“ओह,” अंदर घुसते ही वह जोर से चीखा, जैसे उस पर किसी ने करारा वार किया हो. कमल शर्मा की गिरफ्त से छूटने की कोशिश करते हुए प्रेम चिल्लाया, “रितू, यहां से भाग निकल.” तभी कमरे में लाइट जली और हाथ में टूटा हूआ गुलदस्ता लिए रितू कमरे से बाहर आई.

“छोड़ दे बदमाश, वरना इसी गुलदस्ते से तेरा भी सिर फोड़ दूंगी.”

मकान मालिक कमल शर्मा की तरफ आंखें तरेर कर रितू ने  देखा. कमल शर्मा ने सहम कर देखा, कमरे में ओम तिवारी बेहोश पड़ा हुआ है. उस ने झट से प्रेम को छोड़ दिया.

“रितू, तुम ठीक तो हो,” प्रेम उस की ओर दौड़ आया.

तभी वहां आंगन में पुलिस की जीप आ कर रुकी और तुरंत 2 पुलिस वाले और एक महिला अफसर अंदर आ पहुंचे.

“रितू कश्यप आप हैं?” महिला अफसर ने रितू की तरफ देख कर पूछा.

“ जी मैडम, ये मेरे मकान मालिक हैं- कमल शर्मा और वो जो कमरे में शराब के नशे में धुत्त पड़ा है, वो ओम तिवारी मेरे ही दफ्तर में काम करता है. इन दोनों ने हमारे घर में घुस कर मेरे पति को पीटा और मुझ पर बलात्कार करने की कोशिश की. इन्हें गिरफ्तार कीजिए. कल सुबह हम दोनों थाने आ कर रिपोर्ट लिखवा देंगे.“

“मैं… मैं बेकुसूर हूं,”  बोलतेबोलते मकान मालिक कमल शर्मा की घिग्घी बंध गई. 2 पुलिस वाले बेहोश ओम तिवारी को उठा कर ले गए और महिला अफसर ने मकान मालिक कमल शर्मा को धक्का दे कर कमरे से बाहर धकेल किया.

पुलिस की जीप के जाते ही प्रेम और रितू ने एकदूसरे की ओर बड़े प्यार से देखा.

“रितू… ये पुलिस, तुम ने बुलाई थी?” वह आश्चर्यचकित हो उठा.

“बिलकुल…” रितू ने कहा, “खतरा भांप कर मैं ने ही महिला सुरक्षा हेल्पलाइन पर अपने मोबाइल से फोन कर दिया था.”

“तुम सचमुच बहादुर हो,” कह कर प्रेम ने उस का हाथ चूम लिया.

“तुम भी तो बड़े प्यारे हो, जो मेरी खातिर अपनी जान जोखिम में डाल उन बदमाशों से भिड़ गए,” रितू ने भी प्रेम के गालों पर हलकी सी चुम्मी ले ली.

“मगर, तुम ने झूठ क्यों बोला?” प्रेम ने मुसकरा कर पूछा, “हम पतिपत्नी तो हैं नहीं, फिर कल थाने में रिपोर्ट कैसे लिखवाएंगे?”

“कोई बात नहीं,” रितू खुशी से बोल पड़ी, “कल सुबह 11 बजे हम शादी पंजीकरण के लिए अदालत जाएंगे, फिर कानूनी तौर पर पतिपत्नी बन कर पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखवाएंगे. आखिर कब तक झूठ बोलते रहेंगे? वह कहावत है न, झूठ बोले कौआ काटे. बोलो है मंजूर?”

“मंजूर है, मंजूर… बीवीजी,” प्रेम ने उसे आलिंगन में जकड़ लिया.

Moral Stories in Hindi : मौडर्न सिंड्रेला

Moral Stories in Hindi : आज मयंक ने मनाली को खूब शौपिंग करवाई थी. मनाली काफी खुश लग रही थी. उसे खुश देख कर मयंक भी अच्छा महसूस कर रहा था. वैसे वह बड़ा फ्लर्ट था, पर मनाली के लिए वह बिलकुल बदल गया था. मनाली से पहले भी उस की कई गर्लफ्रैंड्स रह चुकी थीं, पर जैसी फीलिंग उस के मन में मनाली के प्रति थी वैसी पहले किसी के लिए नहीं रही.

‘‘चलो, तुम्हें घर ड्रौप कर दूं,’’ मयंक ने कहते ही मनाली के लिए कार का दरवाजा खोल दिया.

‘‘नहीं मयंक, मुझे निमिशा दीदी का कुछ काम करना है इसलिए आप चले जाइए. मैं घर चली जाऊंगी,’’ प्यार से मुसकराते हुए मनाली निकल गई. फिर उस ने फोन कर के कोको स्टूडियो में पता किया कि कोको सर आए हैं कि नहीं. उसे आज हर हाल में फोटोशूट करवाना था. कैब बुक कर के वह कोको स्टूडियो पहुंच गई. तभी उसे याद आया, ‘आज तो ईशा मैम की क्लास है. उन की क्लास मिस करना बड़ी बात थी. वे क्लास बंक करने वाले स्टूडैंट्स को प्रैक्टिकल में बहुत कम नंबर देती थीं. तुरंत कीर्ति को फोन कर रोनी आवाज में दुखड़ा रोया, ‘‘प्लीज मेरी हाजिरी लगवा देना. चाची और निमिशा दीदी ने सुबह से जीना हराम कर रखा है.’’

‘‘ओह, तुम परेशान मत हो,’’ कीर्ति उसे दुखी नहीं देख सकती थी. वह समझती थी कि चाचाचाची मनाली को बहुत तंग करते हैं. तभी कोको सर भी आ गए. मौडलिंग की दुनिया में काफी नाम कमाया था उन्होंने. हां, थोड़े सनकी जरूर थे पर मौलिक, कल्पनाशील लोग ज्यादातर ऐसे होते ही हैं. कोको सर ने मनाली को ध्यान से देखा और उस पर बरस पड़े, ‘‘तुम्हें वजन कम करने की जरूरत है. मैं ने पहले भी तुम्हें बताया था. आज तुम्हारा फोटोशूट नहीं हो सकेगा.’’‘‘बुरा हो इस मयंक का और कालेज के अन्य दोस्तों का. जबतब जबरदस्ती कुछ न कुछ खिलाते रहते हैं,’’ मनाली आगबबूला हो कर स्टूडियो से बड़बड़ाती हुई निकली. घर पहुंची तो चाची ने चुपचाप खाना परोस दिया. चाची उस से ज्यादा बातचीत नहीं करती थीं पर उस का खयाल अवश्य रखती थीं.

उस ने खाने की प्लेट की तरफ देखा तक नहीं, क्योंकि अब उस पर डाइटिंग का भूत सवार हो चुका था. रात का खाना भी उस ने नहीं खाया तो चाचाचाची को चिंता हुई. वैसे भी वह चाचा की लाड़ली थी. वे उसे अपने तीनों बच्चों की तरह ही प्यार करते थे. मनाली के मातापिता का तलाक हो गया था. उस की मां ने एक एनआरआई डाक्टर के साथ दूसरी शादी कर ली थी और अमेरिका में ही सैटल हो गई थीं. वहीं पिता कैंसर के मरीज थे. मनाली जब 8 वर्ष की थी तभी उन की मृत्यु हो गई थी. कुछ समय बूआ के पास रहने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए उसे चंडीगढ़ चाचाचाची के पास भेजा गया. पढ़ाईलिखाई में मनाली का मन कम ही लगता था जबकि चाचा के तीनों बच्चे पढ़ने में बहुत अच्छे थे. चाची उसे भी पढ़ने को कहतीं पर मनाली पर उस का कम ही असर होता था. इंटर में गिरतेपड़ते पास हुई तो चाचा उस के अंक देख कर चकराए. ‘‘किस कालेज में दाखिला मिलेगा?’’

इस का हल भी मनाली ने सोच लिया था. वह चाचा को आते देख कर किसी न किसी काम में जुट जाती. यह देख कर चाचा चाची पर खूब नाराज होते. उस के कम अंक आने का जिम्मेदार चाचा ने चाची और बड़ी बेटी निमिशा को मान लिया था. खैर, जैसेतैसे चाचा ने मनाली का ऐडमिशन अच्छे कालेज में करा दिया था. कालेज में भी मनाली ने सब को चाची और निमिशा के अत्याचारों के बारे में बता कर सहानुभूति अर्जित कर ली थी. चाचा की छोटी बेटी अनीशा की मनाली के साथ अच्छी बनती थी. अनीशा थोड़ी बेवकूफ थी और अकसर मनाली की बातों में आ जाती थी. दोनों बाहर जातीं और देर होने पर मनाली अनीशा को आगे कर देती. बेचारी को चाचाचाची से डांट खानी पड़ती. चाची मनाली की चालाकियां खूब समझती थीं पर अनीशा मनाली का साथ छोड़ने को तैयार न थी. उस का लैपटौप, फोन, मेकअप का सामान मनाली खूब इस्तेमाल करती थी.

एक दिन अनीशा ने उसे बताया कि वह एक लड़के को पसंद करती है. पापा के दोस्त का बेटा है. उस की पार्टी में ही मुलाकात हुई थी. अनीशा ने मनाली को मयंक से मिलवाया. मयंक बहुत हैंडसम था और अमीर बाप की इकलौती संतान. मनाली ने मन ही मन निश्चय कर लिया कि वह कैसे भी मयंक को हासिल कर के रहेगी. ‘‘देखो मयंक, मैं कहना तो नहीं चाहती पर अनीशा को साइकोसिस की बीमारी है.’’ मनाली ने भोली सी सूरत बना कर कहा.

‘‘क्या?’’ मयंक तो हैरान रह गया था.

‘‘प्लीज, तुम यह बात अनीशा और उस की फैमिली से मत कहना. तुम्हें तो पता ही है न उस घर में मेरी क्या हैसियत है.’’

मयंक मनाली की बातों में आ गया. और उस ने अनीशा के प्रति अपना नजरिया बदल लिया. उधर अनीशा को मयंक का व्यवहार कुछ अलग लगने लगा. उस के फोन उठाने भी उस ने बंद कर दिए. अनीशा ने मनाली को इस बारे में बताया तो उस ने आंखें मटकाते हुए समझाया, ‘‘मयंक को मैं ने एक नामी मौडल के साथ देखा है. वह उस की गर्लफ्रैंड है. तुम उसे भूल जाओ.’’ मनाली को तसल्ली हो गई कि अनीशा के भी अंक इस बार कम ही आएंगे. अच्छा हो, दोनों ही डांट खाएं. एक दिन चाचा के बेटे मनीष ने उसे कालेज टाइम में मयंक के साथ घूमते देख लिया. घर आ कर चाचाचाची के सामने मनाली की पोल खुली. ‘‘मैं तो मयंक की खबर लेने गई थी कि उस ने अनीशा का दिल दुखाया,’’ सुबकते हुए मनाली ने कारण बताया. बात बनाना उसे खूब आता था. घर वालों को अनीशा की उदासी का कारण भी पता चला. अनीशा मनाली से नाराज होने के बजाय उस से लिपट गई, ‘‘इस घर में एक तुम ही हो, जिसे मेरी फिक्र है.’’ खैर, कड़ी मेहनत के बाद मनाली ने वजन घटा ही लिया. फोटोशूट भी हो गया और चोरीछिपे एक दो असाइनमैंट भी मिल गए.

एक दिन मयंक से उस ने साफसाफ पूछा, ‘‘मयंक, मैं चाचाचाची के पास रहते हुए तंग आ चुकी हूं. मुंबई में मेरी मौसी रहती हैं. क्या, तुम कुछ समय के लिए मेरी मदद कर सकते हो?’’ ‘‘हांहां, क्यों नहीं. मैं तुम्हारे रहने का बंदोबस्त कर देता हूं. तुम बस मुझे बताओ कि तुम्हें कितनी रकम चाहिए,’’ मयंक सोच रहा था कि मनाली मुंबई जा कर मौसी के पास रह कर अपनी पढ़ाई करना चाहती है. उस ने ढेर सारी रकम और एटीएम कार्ड मनाली को दिया और निश्चित तारीख का टिकट भी पकड़ा दिया. चाचाचाची से कालेज ट्रिप का बहाना बना कर मुंबई जाने का रास्ता मनाली ने खोज लिया था. ‘वापसी शायद अब कभी न हो,’ सोच कर मंदमंद मुसकराती मौडर्न सिंड्रेला मुंबई की उड़ान भर चुकी थी. उसे खुद पर और उस से भी ज्यादा लोगों की बेवकूफी पर भरोसा था कि वह जो चाहेगी वह पा ही लेगी.

Latest Hindi Stories : राहें जुदा जुदा – निशा और मयंक की कहानी ने कौनसा लिया नया मोड़

Latest Hindi Stories : ‘‘निशा….’’ मयंक ने आवाज दी. निशा एक शौपिंग मौल के बाहर खड़ी थी, तभी मयंक की निगाह उस पर पड़ी. निशा ने शायद सुना नहीं था, वह उसी प्रकार बिना किसी प्रतिक्रिया के खड़ी रही. ‘निशा…’ अब मयंक निशा के एकदम ही निकट आ चुका था. निशा ने पलट कर देखा तो भौचक्की हो गई. वैसे भी बेंगलुरु में इस नाम से उसे कोई पुकारता भी नहीं था. यहां तो वह मिसेज निशा वशिष्ठ थी. तो क्या यह कोई पुराना जानने वाला है. वह सोचने को मजबूर हो गई. लेकिन फौरन ही उस ने पहचान लिया. अरे, यह तो मयंक है पर यहां कैसे?

‘मयंक, तुम?’ उस ने कहना चाहा पर स्तब्ध खड़ी ही रही, जबान तालू से चिपक गई थी. स्तब्ध तो मयंक भी था. वैसे भी, जब हम किसी प्रिय को बहुत वर्षों बाद अनापेक्षित देखते हैं तो स्तब्धता आ ही जाती है. दोनों एकदूसरे के आमनेसामने खड़े थे. उन के मध्य एक शून्य पसरा पड़ा था. उन के कानों में किसी की भी आवाज नहीं सुनाई दे रही थी. ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो पूरा ब्रह्मांड ही थम गया हो, धरती स्थिर हो गई हो. दोनों ही अपलक एकदूसरे को निहार रहे थे. तभी ‘एक्सक्यूज मी,’ कहते हुए एक व्यक्ति दोनों के बीच से उन्हें घूरता हुआ निकल गया. उन की निस्तब्धता भंग हो गई. दोनों ही वर्तमान में लौट आए.

‘‘मयंक, तुम यहां कैसे? क्या यहां पोस्टेड हो?’’ निशा ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘नहीं, मेरी कंपनी की ओर से एक सैमिनार था उसी को अटैंड करने आया हूं. तुम बताओ, कैसी हो, निशा,’’ उस ने तनिक आर्द्र स्वर में पूछा.

‘‘क्यों, कैसी लग रही हूं?’’ निशा ने थोड़ा मुसकराते हुए नटखटपने से कहा.

अब मयंक थोड़ा सकुंचित हो गया. फिर अपने को संभाल कर बोला, ‘‘यहीं खड़ेखड़े सारी बातें करेंगे या कहीं बैठेंगे भी?’’

‘‘हां, क्यों नहीं, चलो इस मौल में एक रैस्टोरैंट है, वहीं चल कर बैठते हैं.’’ और मयंक को ले कर निशा अंदर चली गई. दोनों एक कौर्नर की टेबल पर बैठ गए. धूमिल अंधेरा छाया हुआ था. मंदमंद संगीत बज रहा था. वेटर को मयंक ने 2 कोल्ड कौफी विद आइसक्रीम का और्डर दिया.

‘‘तुम्हें अभी भी मेरी पसंदनापंसद याद है,’’ निशा ने तनिक मुसकराते हुए कहा.

‘‘याद की क्या बात है, याद तो उसे किया जाता है जिसे भूल जाया जाए. मैं अब भी वहीं खड़ा हूं निशा, जहां तुम मुझे छोड़ कर गई थीं,’’ मयंक का स्वर दिल की गहराइयों से आता प्रतीत हो रहा था. निशा ने उस स्वर की आर्द्रता को महसूस किया किंतु तुरंत संभल गई और एकदम ही वर्षों से बिछड़े हुए मित्रों के चोले में आ गई.

‘‘और सुनाओ मयंक, कैसे हो? कितने वर्षों बाद हम मिल रहे हैं. तुम्हारा सैमिनार कब तक चलेगा. और हां, तुम्हारी पत्नी तथा बच्चे कैसे हैं?’’ निशा ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी.

‘‘उफ, निशा थोड़ी सांस तो ले लो, लगातार बोलने वाली तुम्हारी आदत अभी तक गई नहीं,’’ मयंक ने निशा को चुप कराते हुए कहा.

‘‘अच्छा बाबा, अब कुछ नही बोलूंगी, अब तुम बोलोगे और मैं सुनूंगी,’’ निशा ने उसी नटखटपने से कहा.

मयंक देख रहा था आज 25 वर्षों बाद दोनों मिल रहे थे. उम्र बढ़ चली थी दोनों की पर 45 वर्ष की उम्र में भी निशा के चुलबुलेपन में कोई भी कमी नहीं आई थी जबकि मयंक पर अधेड़ होने की झलक स्पष्ट दिख रही थी. वह शांत दिखने का प्रयास कर रहा था किंतु उस के मन में उथलपुथल मची हुई थी. वह बहुतकुछ पूछना चाह रहा था. बहुतकुछ कहना चाह रहा था. पर जबान रुक सी गई थी.

शायद निशा ने उस के मनोभावों को पढ़ लिया था, संयत स्वर में बोली, ‘‘क्या हुआ मयंक, चुप क्यों हो? कुछ तो बोलो.’’

‘‘अ…हां,’’ मयंक जैसे सोते से जागा, ‘‘निशा, तुम बताओ क्या हालचाल हैं तुम्हारे पति व बच्चे कैसे हैं? तुम खुश तो हो न?’’

निशा थोड़ी अनमनी सी हो गई, उस की समझ में नहीं आ रहा था कि मयंक के प्रश्नों का क्या उत्तर दे. फिर अपने को स्थिर कर के बोली, ‘‘हां मयंक, मैं बहुत खुश हूं. आदित्य को पतिरूप में पा कर मैं धन्य हो गई. बेंगलुरु के एक प्रतिष्ठित, संपन्न परिवार के इकलौते पुत्र की वधू होने के कारण मेरी जिंदगी में चारचांद लग गए थे. मेरे ससुर का साउथ सिल्क की साडि़यों का एक्सपोर्ट का व्यवसाय था. कांजीवरम, साउथ सिल्क, साउथ कौटन, बेंगलौरी सिल्क मुख्य थे. एमबीए कर के आदित्य भी उसी व्यवसाय को संभालने लगे. जब मैं ससुराल में आई तो बड़ा ही लाड़दुलार मिला. सासससुर की इकलौती बहू थी, उन की आंखों का तारा थी.’’

‘‘विवाह के 15 दिनों बाद मुझे थोड़ाथोड़ा चक्कर आने लगा था और जब मुझे पहली उलटी हुई तो मेरी सासूमां ने मुझे डाक्टर को दिखाया. कुछ परीक्षणों के बाद डाक्टर ने कहा, ‘खुशखबरी है मांजी, आप दादी बनने वाली हैं. पूरे घर में उत्सव का सा माहौल छा गया था. सासूमां खुशी से फूली नहीं समा रही थीं. बस, आदित्य ही थोड़े चुपचुप से थे. रात्रि में मुझ से बोले,’ ‘निशा, मैं तुम्हारा हृदय से आभारी हूं.’

‘क्यों.’

मैं चौंक उठी.

‘क्योंकि तुम ने मेरी इज्जत रख ली. अब मैं भी पिता बन सकूंगा. कोई मुझे भी पापा कहेगा,’ आदित्य ने शांत स्वर में कहा.

‘‘मैं अपराधबोध से दबी जा रही थी क्योंकि यह बच्चा तुम्हारा ही था. आदित्य का इस में कोई भी अंश नहीं था. फिर भी मैं चुप रही. आदित्य ने तनिक रुंधी हुई आवाज में कहा, ‘निशा, मैं एक अधूरा पुरुष हूं. जब 20 साल का था तो पता चला मैं संतानोत्पत्ति में अक्षम हूं, जब दोस्त लोग लड़की के पास ले गए, अवसर तो मिला था पर उस से वहां पर कुछ ज्यादा नहीं हो सका. नहीं समझ पाता हूं कि नियति ने मेरे साथ यह गंदा मजाक क्यों किया? मांपापा को यदि यह बात पता चलती तो वे लोग जीतेजी मर जाते और मैं उन्हें खोना नहीं चाहता था. मुझ पर विवाह के लिए दबाव पड़ने लगा और मैं कुछ भी कह सकने में असमर्थ था. सोचता था, मेरी पत्नी के प्रति यह मेरा अन्याय होगा और मैं निरंतर हीनता का शिकार हो रहा था.

‘मैं ने निर्णय ले लिया था कि मैं विवाह नहीं करूंगा किंतु मातापिता पर पंडेपुजारी दबाव डाल रहे थे. उन्हें क्या पता था कि उन का बेटा उन की मनोकामना पूर्र्ण करने में असमर्थ है. और फिर मैं ने उन की इच्छा का सम्मान करते हुए विवाह के लिए हां कर दी. सोचा था कि घरवालों का तो मुंह बंद हो जाएगा. अपनी पत्नी से कुछ भी नहीं छिपाऊंगा. यदि उसे मुझ से नफरत होगी तो उसे मैं आजाद कर दूंगा. जब तुम पत्नी बन कर आई तब मुझे बहुत अच्छी लगी. तुम्हारे रूप और भोलेपन पर मैं मर मिटा.

‘हिम्मत जुटा रहा था कि तुम्हें इस कटु सत्य से अवगत करा दूं किंतु मौका ही न मिला और जब मुझे पता चला कि तुम गर्भवती हो तो मैं समझ गया कि यह शिशु विवाह के कुछ ही समय पूर्व तुम्हारे गर्भ में आया है. अवश्य ही तुम्हारा किसी अन्य से संबंध रहा होगा. जो भी रहा हो, यह बच्चा मुझे स्वीकार्य है.’ कह कर आदित्य चुप हो गए और मैं यह सोचने पर बाध्य हो गई कि मैं आदित्य की अपराधिनी हूं या उन की खुशियों का स्रोत हूं. ये किस प्रकार के इंसान हैं जिन्हें जरा भी क्रोध नहीं आया. किसी परपुरुष के बच्चे को सहर्ष अपनाने को तैयार हैं. शायद क्षणिक आवेग में किए गए मेरे पाप की यह सजा थी जो मुझे अनायास ही विधाता ने दे दी थी और मेरा सिर उन के समक्ष श्रद्धा से झुक गया.

‘‘9 माह बाद प्रसून का जन्म हुआ. आदित्य ने ही प्रसून नाम रखा था. ठीक भी था, सूर्य की किरणें पड़ते ही फूल खिल उठते हैं, उसी प्रकार आदित्य को देखते ही प्रसून खिल उठता था. हर समय वे उसे अपने सीने से लगाए रखते थे. रात्रि में यदि मैं सो जाती थी तो भी वे प्रसून की एक आहट पर जाग जाते थे. उस की नैपी बदलते थे. मुझ से कहते थे, ‘मैं प्रसून को एयरफोर्स में भेजूंगा, मेरा बेटा बहुत नाम कमाएगा.’

‘‘मेरे दिल में आदित्य के लिए सम्मान बढ़ता जा रहा था, देखतेदखते 15 वर्ष बीत चुके थे. मैं खुश थी जो आदित्य मुझे पतिरूप में मिले. लेकिन होनी को शायद कुछ और ही मंजूर था. अकस्मात एक दिन एक ट्रक से उन की गाड़ी टकराई और उन की मौके पर ही मौत हो गई. तब प्रसून 14 वर्ष का था.’’

मयंक निशब्द निशा की जीवनगाथा सुन रहा था. कुछ बोलने या पूछने की गुंजाइश ही नहीं रह गई थी. क्षणिक मौन के बाद निशा फिर बोली, ‘‘आज मैं अपने बेटे के साथ अपने ससुर का व्यवसाय संभाल रही हूं. प्रसून एयरफोर्स में जाना नहीं चाहता था, अब वह 25 वर्ष का होने वाला है. उस ने एमबीए किया और अपने पुश्तैनी व्यवसाय में मेरा हाथ बंटा रहा है या यों कहो कि अब सबकुछ वही संभाल रहा है.’’

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद मयंक ने मुंह खोला, ‘‘निशा, तुम्हें अतीत की कोई बात याद है?’’

‘‘हां, मयंक, सबकुछ याद है जब तुम ने मेरे नाम का मतलब पूछा था और मैं ने अपने नाम का अर्थ तुम्हें बताया, ‘निशा का अर्र्थ है रात्रि.’ तुम मेरे नाम का मजाक बनाने लगे तब मैं ने तुम से पूछा, ‘आप को अपने नाम का अर्थ पता है?’

‘‘तुम ने बड़े गर्व से कहा, ‘हांहां, क्यों नहीं, मेरा नाम मयंक है जिस का अर्थ है चंद्रमा, जिस की चांदनी सब को शीतलता प्रदान करती है’ बोलो याद है न?’’ निशा ने भी मयंक से प्रश्न किया.

मयंक थोड़ा मुसकरा कर बोला, ‘‘और तुम ने कहा था, ‘मयंक जी, निशा है तभी तो चंद्रमा का अस्तित्व है, वरना चांद नजर ही कहां आएगा.’ अच्छा निशा, तुम्हें वह रात याद है जब मैं तुम्हारे बुलाने पर तुम्हारे घर आया था. हमारे बीच संयम की सब दीवारें टूट चुकी थीं.’’ मयंक निशा को अतीत में भटका रहा था.

‘‘हां,’’ तभी निशा बोल पड़ी, ‘‘प्रसून उस रात्रि का ही प्रतीक है. लेकिन मयंक, अब इन बातों का क्या फायदा? इस से तो मेरी 25 वर्षों की तपस्या भंग हो जाएगी. और वैसे भी, अतीत को वर्तमान में बदलने का प्रयास न ही करो तो बेहतर होगा क्योंकि तब हम न वर्तमान के होंगे, न अतीत के, एक त्रिशंकु बन कर रह जाएंगे. मैं उस अतीत को अब याद भी नहीं करना चाहती हूं जिस से हमारा आज और हमारे अपनों का जीवन प्रभावित हो. और हां मयंक, अब मुझ से दोबारा मिलने का प्रयास मत करना.’’

‘‘क्यों निशा, ऐसा क्यों कह रही हो?’’ मयंक विचलित हो उठा.

‘‘क्योंकि तुम अपने परिवार के प्रति ही समर्पित रहो, तभी ठीक होगा. मुझे नहीं पता तुम्हारा जीवन कैसा चल रहा है पर इतना जरूर समझती हूं कि तुम्हें पा कर तुम्हारी पत्नी बहुत खुश होगी,’’ कह कर निशा उठ खड़ी हुई.

मयंक उठते हुए बोला, ‘‘मैं एक बार अपने बेटे को देखना चाहता हूं.’’

‘‘तुम्हारा बेटा? नहीं मयंक, वह आदित्य का बेटा है. यही सत्य है, और प्रसून अपने पिता को ही अपना आदर्श मानता है. वह तुम्हारा ही प्रतिरूप है, यह एक कटु सत्य है और इसे नकारा भी नहीं जा सकता किंतु मातृत्व के जिस बीज का रोपण तुम ने किया उस को पल्लवित तथा पुष्पित तो आदित्य ने ही किया. यदि वे मुझे मां नहीं बना सकते थे, तो क्या हुआ, यद्यपि वे खुद को एक अधूरा पुरुष मानते थे पर मेरे लिए तो वे परिपूर्ण थे. एक आदर्श पति की जीवनसंगिनी बन कर मैं खुद को गौरवान्वित महसूस करती हूं. मेरे अपराध को उन्होंने अपराध नहीं माना, इसलिए वे मेरी दृष्टि में सचमुच ही महान हैं.

‘‘प्रसून तुम्हारा अंश है, यह बात हम दोनों ही भूल जाएं तो ही अच्छा रहेगा. तुम्हें देख कर वह टूट जाएगा, मुझे कलंकिनी समझेगा. हजारों प्रश्न करेगा जिन का कोई भी उत्तर शायद मैं न दे सकूंगी. अपने पिता को अधूरा इंसान समझेगा. युवा है, हो  सकता है कोई गलत कदम ही उठा ले. हमारा हंसताखेलता संसार बिखर जाएगा और मैं भी कलंक के इस विष को नहीं पी सकूंगी. तुम्हें वह गीत याद है न ‘मंजिल वही है प्यार की, राही बदल गए…’

‘‘भूल जाओ कि कभी हम दो जिस्म एक जान थे, एक साथ जीनेमरने का वादा किया था. उन सब के अब कोई माने नहीं है. आज से हमारी तुम्हारी राहें जुदाजुदा हैं. हमारा आज का मिलना एक इत्तफाक है किंतु अब यह इत्तफाक दोबारा नहीं होना चाहिए,’’ कह कर उस ने अपना पर्स उठाया और रैस्टोरैंट के गेट की ओर बढ़ चली. तभी मयंक बोल उठा, ‘‘निशा…एक बात और सुनती जाओ.’’

निशा ठिठक गई.

‘‘मैं ने विवाह नहीं किया है, यह जीवन तुम्हारे ही नाम कर रखा है.’’ और वह रैस्टोरैंट से बाहर आ गया. निशा थोड़ी देर चुप खड़ी रही, फिर किसी अपरिचित की भांति रैस्टोरैंट से बाहर आ गई और दोनों 2 विपरीत दिशाओं की ओर मुड़ गए.

चलतेचलते निशा ने अंत में कहा, ‘‘मयंक, इतने जज्बाती न बनो. अगर कोई मिले तो विवाह कर लेना, मुझे शादी का कार्ड भेज देना ताकि मैं सुकून से जी सकूं.’’

शक का संक्रमण: आखिर किस वजह से दूर हो गए कृति और वैभव

‘‘मैं मैं इस घर में एक भी दिन नहीं रह सकती. मुझे बस तलाक चाहिए,’’ कृति के मुंह से निकले इन शब्दों को सुन वकील ने मौन साध लिया.

जवाब न सुन कृति का गुस्सा 7वें आसमान पर पहुंच गया, ‘‘आप बोल क्यों नहीं रहे वकील साहब? देखिए मुझे नहीं पता कि कोरोना की क्या गाइडलाइंस हैं. आप ने कहा था कि 1 महीना पूरा होते ही मेरी अर्जी पर कोर्ट फैसला दे देगा,’’ कृति के चेहरे पर परेशानी उभर आई.

‘‘देखिए कृतिजी. कोर्ट बंद हैं और अभी खुलने के आसार भी नहीं तो केस की सुनवाई तो अभी नहीं हो सकती और मैं जज नहीं जो डिसीजन दे कर आप के तलाक को मंजूर कर दूं,’’ वकील ने समझते हुए कहा.

‘‘पर मैं यहां से जाना चाहती हूं. 1 महीने के चक्कर में फंस गई हूं मैं. मुझ से उस आदमी की शक्ल नहीं देखी जा रही जिस ने मुझे धोखा दिया. मैं नहीं रह सकती वैभव के साथ.’’

कृति के शब्दों की झंझलाहट और मन में छिपे दर्द को वकील ने साफ महसूस किया. 2 पल की खामोशी के बाद वह फिर बोला, ‘‘आप अपनी मां के घर चली जाएं.’’

‘‘अरे नहीं जा सकती. इस इलाके को कारोना जोन घोषित कर दिया है. यहां से निकली तो 40 दिन के लिए क्वारंटीन कर दी जाऊंगी,’’ कृति ने हांफते हुए कहा.

‘‘तो बताओ मैं क्या कर सकता हूं?’’ वकील ने कहा.

‘‘आप बस इतना करें कि इस लौकडाउन के बाद मुझे तलाक दिला दें,’’ और कृति ने फोन काट दिया. फिर किचन की ओर मुड़ गई. उस के गले में हलका दर्द था और सिर भारी हो रहा था. एक कप चाय बनाने के लिए जैसे ही उस ने किचन के दरवाजे पर कदम रखा वैभव को अंदर देख कृति के सिर पर गुस्से का बादल जैसे फट पड़ा. पैर पटकते वापस बैडरूम में आ कर लेट गई.

छत पर घूमते पंखे के साथ पिछली यादें उस की आंखों के सामने तैरने लगीं…

दीयाबाती के नाम से मशहूर वैभव और कृति अपने कालेज की सब से हाट जोड़ी थी. दोनों के बीच की कैमिस्ट्री को देख कर न जाने कितने दिल जल कर खाक हुए जाते थे.

कृति के चेहरे पर मुसकान लाने के लिए वैभव रोज नए ट्रिक्स अपनाता. दोनों की दीवानगी कोई वक्ती न थी. अपने कैरियर के मुकाम पर पहुंच वैभव और कृति परिवार की रजामंदी से विवाह के बंधन में बंध गए.

सबकुछ बेहद खूबसूरत चल रहा था लेकिन वह एक शाम दोनों की जिंदगी में बिजली बन कर कौंध गई. प्रेम की मजबूत दीवार पर शक के हथौड़े का वार गहरा पड़ा. वैभव ने लाख सफाई दी कि उस का मेघना के साथ सिर्फ मित्रता का संबंध है लेकिन शक की आग में जलती कृति कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी. 15 दिन बाद दोनों की शादी को 2 साल पूरे हो जाएंगे लेकिन कृति उस से पहले ही वैभव से तलाक चाहती थी. कोर्ट ने एक बार दोबारा विचार करने के लिए दोनों को कुछ समय साथ रहने का फैसला सुनाया था.

वैभव के लाख प्रयासों के बाद भी कृति का मन नहीं बदला बल्कि वैभव की हर कोशिश उसे सफाई नजर आती. नफरत और गुस्से से वह वैभव को शब्दबाणों से घायल करती रहती. वैभव का संयम अभी टूटा नहीं था इसलिए उस ने मौन ओढ़ लिया. केस की अगली सुनवाई तक दोनों को साथ ही रहना था इसलिए मजबूरन कृति वैभव को बरदाश्त कर रही थी.

समय बीत रहा था लेकिन अचानक आए कोरोना के वायरस ने जिंदगी की रफ्तार को जैसे थाम लिया. लौकडाउन लग चुका था. चारों ओर डर और अफरातफरी का माहौल था. कृति अपने मायके जाना चाहती थी लेकिन उन की सोसायटी सील कर दी गई थी क्योंकि उस में कोरोना के केस लगातार बढ़ रहे थे. मन मार कर एक ही छत के नीचे रहती कृति अंदर ही अंदर घुल रही थी.

कृति अपने खयालों में खोई कमरे में चहलकदमी कर रही थी कि ऐंबुलैंस की तेज आवाज से उस का ध्यान भटका. वह भाग कर बालकनी की ओर भागी. सामने वाली बिल्डिंग

के नीचे ऐंबुलैंस खड़ी थी. उस के आसपास पीपीई किट पहने 4 लोग खड़े थे. कृति ने ध्यान दिया तो उसे सामने वाली बिल्डिंग के 4 नंबर फ्लैट की बालकनी में सुधा आंटी रोती नजर आई. ऐंबुलैंस के अंदर एक बौडी को डाला जा रहा था. थोड़ी देर में ऐंबुलैंस सायरन बजाते निकल गई. सुधा आंटी के रोने की आवाज अब साफ नजर आ रही थीं.

ऐंबुलैंस में उन के एकलौते बेटे रजत को ले जाया गया था.

‘‘रजत नहीं रहा,’’ बगल की बालकनी में मुंह लपेटे पारुल खड़ी थी. उस की बात सुन कर कृति का दिल धक से रह गया.

‘‘क्या बोल रही हो पारुल. यार एक ही बेटा था आंटी का… कोई नहीं है उन के पास तो… कैसे बरदाश्त करेंगी वे यह दुख,’’ कृति दुखी स्वर में बोली.

‘‘कारोना जाने कितनों को अपने साथ ले जाएगा. तुम ने मास्क नहीं पहना और तुम बाहर खड़ी हो. इतनी लापरवाही ठीक नहीं कृति,’’

कह कर पारुल अंदर चली गई और दरवाजा बंद कर लिया. घबराई कृति कमरे में आ कर अपने चेहरे और हाथों को साबुन से रगड़ने लगी. सुधा आंटी का विलाप चारों तरफ फैले सन्नाटे में डर पैदा कर रहा था. कृति अपने कमरे को सैनिटाइज कर बिस्तर पर लेट गई. सिर में दर्द और गले की खराश मन में भय की तरंगें बनाने लगी. नाक से बहता पानी मस्तिष्क को बारबार झंझड़ रहा था. लेकिन आंटी और रजत के बारे में सोचतेसोचते उसे गहरी नींद आ गई.

कृति को कमरे से बाहर न निकलते देख वैभव को चिंता हो रही थी. कृति कभी इतनी देर नहीं सोती. रात के 8 बज रहे थे और कृति 4 बजे से कमरे के अंदर थी. रजत के जाने का दुख वैभव को अंदर तक हिला गया. उस पर कृति का कमरे में बंद होना वैभव के मन में हजार आशंकाओं को जन्म दे रहा था. घड़ी की सूई बढ़ती जा रही थी. 9 बज चुके थे. अब वैभव उस के कमरे के दरवाजे के पर जा कर खड़ा हो गया.

‘‘कृति, तुम ठीक हो न? कृतिकृति,’’ दरवाजे को थपथपा कर वह बोला. लेकिन कृति की कोई आवाज नहीं आई. वैभव ने दरवाजे को हलके से धकेला तो कृति को बिस्तर पर बेसुध पाया. उस ने करीब जा कर उस के माथे को छूआ माथा तप रहा था.

‘‘कृतिकृति उठो आंखें खोलो,’’ वैभव उसे झंझड़ कर बोला.

कृति ने अपनी आंखें खोलने की कोशिश की लेकिन खोल नहीं पाई. वैभव तुरंत अपना मास्क चेहरे पर लगा कर ठंडे पानी का कटोरा ले कर उस के सिरहाने बैठ गया. ठंडे पानी की पट्टियां सिर पर रख उस की हथेलियां रगड़ने लगा.

कृति को कुछ होश आया. आंखें खोलीं तो वैभव सामने था. कृति की आंखें लाल थीं. वैभव उसे होश में आया देख तुरंत पैरासिटामोल ले आया और सहारा दे कर दवा उस के मुंह में डाल दी.

कृति को अपना शरीर बिलकुल निष्क्रिय लग रहा था. वह उठ नहीं पा रही थी.

कोरोना उस के शरीर को जकड़ चुका था लेकिन वैभव उस के करीब खड़ा था. यह देख कृति बोली, ‘‘तुम दूर रहो वैभव, मुझे कारोना… तुम भी बीमार हो जाओ,’’ और फिर खांसने लगी. उसे सांस लेने में तकलीफ महसूस हुई.

‘‘तुम शांत रहो. मुझे कुछ नहीं होगा. मैं ने मास्क और दस्ताने पहने हैं और तुम्हें बस वायरल बुखार है कारोना नहीं. घबराओ नहीं. मैं चाय लाता हूं,’’ कह वैभव रसोई में चला गया. थोड़ी देर में चाय और स्टीमर उस के साथ था. कृति को चाय दे कर वैभव ने स्टीमर का प्लग लगाया और उसे गरम करने लगा. कृति चाय पी कर स्टीम लेने लगी. वैभव वहीं खड़ा था.

‘‘तुम जाओ बीमार हो जाओगे. जाओ प्लीज,’’ कृति ने जोर दे कर कहा.

‘‘मैं ठीक हूं. सुबह कोरोना का टैस्ट होगा हमारा. तुम रिलैक्स रहना कृति,’’ वैभव उसे समझते हुए बोला.

कृति ने हां में सिर हिलाया. थोड़ी देर में वह फिर सो गई. कोरोना के लक्षण अभी इतने नहीं दिखाई दे रहे थे लेकिन वैभव डर गया. कृति के मायके फोन कर खबर देने के बाद वैभव ने सारे घर को सैनिटाइज किया. चाय का कप ले कर कृति के कमरे के बाहर ही बैठ गया.

कृति बीचबीच में खांस रही थी और बेचैनी से अपने सीने को रगड़ रही थी. अस्पताल ले जाना खतरनाक था क्योंकि अस्पताल से आती मौत की खबरों ने दहशत फैला रखी थी. वैभव की आंखों में नींद नहीं थी. वह एकटक कृति को देख रहा था. कृति बारबार अपनी गरदन पर हाथ फेर रही थी. बाहर फैला सन्नाटा कोरोना के साथ मिल कर सब के दिलों से खेल रहा था जैसे.

‘‘पा… पानी,’’ कृति के होंठ बुदबुदाए.

वैभव ने भाग कर कुनकुना पानी ला कर कृति के होंठों से लगा दिया. लिटा कर टेम्प्रेचर लेता है. बुखार कुछ कम हुआ था, लेकिन अब भी 102 पर अटका था.

रात भी जाने कितनी लंबी थी जो सरक ही नहीं रही थी. वह कृति के कमरे के बाहर दरवाजे पर टेक लगाए बैठा था. बीचबीच में पुलिस की गाड़ी की आवाज सुनाई देती.

सूरज अपने समय पर उगा. खिड़की से आती सूरज की रोशनी कृति के चेहरे पर पड़ने लगी तो वह जाग गई. शरीर में टूटन थी. सहारा

ले बिस्तर से उठ कर बाथरूम में घुस गई. वैभव दरवाजे के पास ही जमीन पर बेखबर सो रहा था. बाथरूम से बाहर आकर कृति की नजर जमीन पर लेटे वैभव पर पड़ी. वह कसमसा कर रह गई.

2 कदम चलने की हिम्मत भी कृति की नहीं हो रही थी. सांस लेने में तकलीफ होने लगी.वह वैभव को बुलाना चाहती थी लेकिन खांसी के तेज उफान से यह नहीं हो सका. उस के खांसने की आवाज से वैभव की नींद टूट गई. वह हड़बड़ा कर उठा तो देखा कि कृति बिस्तर पर सिकुड़ कर लेटी हुई है. वह अपना मास्क ठीक करता है और उस के पास जा कर उसे सीधा करता है. कृति गले में रुकावट का इशारा करती है. वैभव कुनकुना पानी उस के गले में उतार देता है. कृति को कुछ राहत महसूस होती है.

वैभव की घबराहट कृति के लिए बढ़ती जा रही थी. वह लगातार व्हाट्सऐप पर औक्सीजन सिलैंडर के इंतजाम के लिए मैसेज कर रहा था. औक्सीमीटर और्डर कर वैभव कोरोना हैल्पलाइन सैंटर में कौल कर कृति की स्थिति बताई. वहां से वैभव को कुछ निर्देश मिले. कोरोना टैस्ट के लिए पीपीई किट पहने 2 लोग आए और उन के सैंपल ले गए. मौत का भय कैसे मस्तिष्क को शून्य कर देता है यह वैभव और कृति महसूस कर रहे थे.

बिस्तर पर पड़ी कृति वैभव की उस के लिए चिंता साफ महसूस कर रही थी. प्यार जो स्याहीचूस की तरह कहीं सारी भावनाओं को चूस रहा था एक बार फिर वापस तरल होने लगा.

घर के काम और कृति की देखभाल में वैभव भूल गया था कि कृति उस के साथ बस कुछ दिनों के लिए है. औक्सीमीटर से रोज औक्सीजन नापने से ले कर कृति को नहलाने तक का काम वैभव कर रहा था और कृति उस के प्रेम को धीरेधीरे पी रही थी.

मन में अजीब सी ग्लानि महसूस कर कृति अकसर रो पड़ती. लेकिन वैभव के सामने सामान्य बनी रहती. कृति तकलीफ में थी. मन से भी और शरीर से भी. लेकिन उस के अपनों ने उस से दूरी ही रखी. शायद भय था कि कहीं

कृति उन से कोई मदद न मांग ले. वैभव कोरोना को ले कर औनलाइन सर्च करता रहता. कृति के इलाज के साथ सावधानी और उस की डाइट पर वैभव कोई लापरवाही नहीं करना चाहता था. दिन बीत रहे थे और कृति तेजी से रिकवर कर रही थी लेकिन कमजोरी इतनी थी कि वह खुद के काम करने में भी सक्षम महसूस नहीं कर रही थी. बालकनी में कुरसी पर बैठी कृति शहर के सन्नाटे को महसूस कर रही थी. आसपास के फ्लैट्स की बालकनियों के दरवाजे कस कर बंद पड़े थे शायद सब को उस का कोरोना पौजिटिव होना पता चल गया था. इंसानों के बीच आई यह दूरी कितनी पीड़ादायक थी.

कृति अपने खयालों में खोई थी कि रसोई से आती तेज आवाज से उस का ध्यान भंग हुआ. वह दीवार का सहारा ले कर कमरे से बाहर निकली. रसोई में वैभव अपना हाथ झटक रहा था. फर्श पर दूध का बरतन पड़ा था जिस में से भाप उठ रही थी. माजरा सम?ाते उसे देर न लगी.

कृति बेचैनी से चिल्लाई, ‘‘वैभव ठंडा पानी डालो हाथ पर… जल्दी करो वैभव.’’

‘‘ठीक है. लेकिन तुम जाओ आराम करो परेशान न हो,’’ वैभव ने फ्रिज खोलते हुए कहा.

‘‘मेरी चिंता न करो. मैं ठीक हूं. अपना हाथ दिखाओ,’’ वह चिल्लाई.

वैभव का हाथ लाल हो गया था.

‘‘क्या किया तुम ने यह क्या हाथ से बरतन उठा रहे थे? बरतन गरम है यह तो देख लेते?’’ कृति गुस्से से बोली.

‘‘मेरी चिंता मत करो. वैसे भी अकेले ही रहना है मुझे,’’ अपनी हथेली को कृति की हथेलियों से. छुड़ा कर वह बोला.

‘‘तो तुम क्यों चिंता कर रहे थे मेरी? रातदिन मेरे लिए दौड़ रहे थे… मेरे लिए अपनी नींद खो रहे थे… मरने देते मुझे,’’ कृति की आवाज में दर्द था.

‘‘प्यार करता हूं तुम से. तुम्हारे लिए तो जान भी दे सकता हूं,’’ वैभव न कहा.

‘‘तो क्यों नहीं मुझे रोक लेते?’’ सुबकते हुए कृति बोली.

‘‘मैं ने तो कभी तुम से दूर होने की कल्पना नहीं की. तुम ही मुझ से नफरत करती हो,’’ वैभव रसोई के फर्श पर बैठ गया.

‘‘नफरत. तुमतुम वह मेघना… मैं ने तुम्हें उस के साथ… तुम ने मुझे धोखा क्यों दिया वैभव?’’ कृति तड़प उठी.

‘‘मैं तुम्हें धोखा देने की कल्पना भी नहीं कर सकता. उस रात मेघना को अस्थमा का अटैक आया था. मैं सिर्फ उसे गोद में उठा कर पार्किंग में कार में बैठा रहा था लेकिन तुमने सिर्फ यही देख मु?ा पर शक किया. मेघना को भी अपराधी बना दिया जबकि उस समय वह खतरे में थी,’’ वैभव एक सांस में बोल गया.

कृति खामोश हो नीचे बैठ गई. उस की आंखों से बहता पानी अपनी गलती का एहसास करा रहा था. वैभव उस के गालों पर आंसू देख परेशान हो गया.

‘‘तुम रो क्यों रही हो कृति? देखो अभी तुम्हारी तबीयत पूरी तरह ठीक नहीं.

सांस लेने में दिक्कत हो जायेगी,’’ वैभव बोला.

‘‘कुछ नहीं होगा मुझे. इस कांरोना संक्रमण ने मेरे शक के संक्रमण को मार दिया है वैभव. मुझे माफ कर दो मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. तुम्हें किसी और के करीब देख मेरी चेतना शून्य हो गई थी. मैं जलन में गलती कर गई. तुम्हारा अपमान किया, तुम पर आरोप लगाए. मुझे माफ कर दो वैभव,’’ कृति हाथ जोड़ कर बिलखने लगी.

‘‘तुम्हारी आंखों में अपने लिए नफरत देख मैं कितना तड़पा हूं तुम नहीं समझ सकती. अब ऐसे रो कर मुझे और तड़पा रही हो. कैसे सोच लिया था तुम ने कि तुम्हारे बिना मैं जिंदा रह पाता. मर जाता मैं,’’ कह कर वैभव ने कृति को बांहों में भींच लिया. दोनों की आंखों से बहता पानी प्रेम के सागर को और गहरा करने लगा.

अगली तारीख पर अपना फैसला सुनाने के लिए कृति ने वैभव के सीने पर चुंबन अंकित कर दिया.

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