Famous Hindi Stories : बाउंसर – हवलदार को देख क्यों सूखने लगी झुमकी की जान

Famous Hindi Stories :  रेलवेस्टेशन के गर्भ से नाल की तरह निकल कर पतली सी कमर सा नेताजी सुभाष मार्ग दुलकी चाल से चलता शहर के बीचोंबीच से गुजरने वाले जीटी रोड को जिस स्थान पर लंबवत क्रौस करता आगे बढ़ जाता है, वह शहर के व्यस्ततम चौराहे में तबदील हो गया है-प्रेमचंद चौक. चौक के ऐन केंद्र में कलात्मकता से तराशा, फूलपौधों की क्यारियों से सजा छोटा सा वृत्ताकार उपवन है. उपवन के मध्य में छहफुटिया वेदी के ऊपर ब्लैकस्टोन पर उकेरी मुंशी प्रेमचंद की स्कंध प्रतिमा. स्टेशन से जीटी रोड तक के पतले, ऊबड़खाबड़ नेताजी सुभाष मार्ग के सहारेसहारे दोनों ओर ग्रामीण कसबाई परिवेश से कदमताल मिलाते सब्जियों, फल, जूस, सस्ते रैडिमेड वस्त्र, पुरानी पत्रिकाओं, सैक्स साहित्य और मर्दानगी की जड़ीबूड़ी बेचते फुटकर विक्रेताओं की छोटीछोटी गुमटियां व ठेलों की कतारें सजी हुई थीं. स्टेशन वाले इसी मार्ग के कसबाई कुरुक्षेत्र में झुमकी भी किसी दुर्दांत योद्धा की तरह भीख की तलवार भांजती सारे दिन एक छोर से दूसरे छोर तक मंडराती रहती. 9 साल की कच्ची उम्र. दुबलीपतली, मरगिल्ली काया. मटमैला रंग. दयनीयता औैर निरीहता का रोगन पुता मासूम चेहरा.

झुमकी ने स्टेशन के कंगूरे पर टंगी घड़ी की ओर तिरछी निगाहों से देखा, ढाई बज रहे थे. अयं, ढाई बज गए? इतनी जल्दी? वाह, झुमकी मन ही मन मुसकराई. ढाई बज गए और अभी तक भूख का एहसास ही नहीं हुआ. कभीकभी ऐसा हो जाता है, ड्यूटी में वह इस कदर मगन हो जाती है कि उसे भूख की सुध ही नहीं रहती.

खैर, अब घर लौटने का समय हो गया है. वहां जो भी रूखासूखा मां ने बना कर रखा होगा, जल्दीजल्दी उसे पेट के अंदर पहुंचाएगी. उस ने लौटने के लिए कदम आगे बढ़ा दिए. 4 बजे वापस फिर ड्यूटी पर लौटना भी तो है. दोपहर के वक्त बाजार में आवाजाही कम हो जाती है. अधिकांश ठेले और गुमटियां खालीखाली थीं. चलते हुए उस ने फ्रौक की जेब में हाथ डाल कर सिक्कों को टटोला. चेहरे पर आश्वस्ति की चमक बिखर गई. उड़ती नजरों से बाबा प्रेमचंद का धन्यवाद अदा किया- सब आप ही का प्रताप है, महाराज.

तभी, पांडेजी के ठेले पर एक ग्राहक दिख गया. उस की आंखों में फुरती ठुंस गई. आम का खरीदार, संभ्रांत वेशभूषा. झुमकी तेजतेज चल कर ठेले के पास तक आ गई और एक दूरी बना कर उस पल का इंतजार करने लगी जब ग्राहक आम ले चुकने के बाद भुगतान करने के लिए जेब से पर्स निकालेगा. इंतजार के उन्हीं कुछ बेचैन क्षणों के दौरान नजरें ठेले के एक कोने में रखे कुछेक आमों पर जा पड़ीं जो लगभग खराब हो चुके थे. इन का रंग काला पड़ गया था. त्वचा पिलपिली हो चुकी थी. ये भद्र लोगों के खाने लायक नहीं रह गए थे. पांडेजी इन आमों को संभवतया इस उम्मीद में रखे हुए थे कि कोई निम्नवर्ग का कोलियरी मजदूर या श्रमिक ग्राहक ऐसा मिल ही जाएगा जो इन्हें खरीद ले. इस तरह तो भरपाई हो सकेगी क्षति की. झुमकी की नजरें इन पिलपिले आमों पर चिपक गईं. पहले ऐसा हो चुका है कि काफी इंतजार के बाद भी जब ऐसे बेकार से आमों के ग्राहक नहीं मिल पाते तो पांडेजी खुद ही इन्हें झुमकी को दे देते. देते हुए उन के अंदाज में शाही ठुनक घुली होती, ‘तू भी क्या याद करेगी कि कोई दिलदार पांडे मिले थे.’

झुमकी ने इन आमों का खूब करीबी से मुआयना किया. अब कोई नहीं खरीदने वाला इन्हें. न हो तो ग्राहक के विदा हो जाने के बाद वह खुद ही पांडेजी से इन आमों को मांग लेगी. आम पा जाने की क्षणिक सी उम्मीद जगते ही आंखों में एकमुश्त जुगनुओं की चमक भर गई. इन की पिलपिली, काली त्वचा को और भीतर से रिस कर आती कसैली बू को अनदेखा कर दिया जाए तो ये आम ‘पके और गोरे’ लंगड़ा आमों जैसी ही तृप्ति देते हैं. उस के कंठ से तृप्ति की किलकारी निकलतेनिकलते बची.

ग्राहक को आम तोले जा चुके थे. उस ने जेब से पर्स निकाला और पांडेजी को पैसे देने लगा. उसी क्षण झुमकी लपक कर ग्राहक के पास जा पहुंची और छोटी सी हथेली को उस के आगे फैला दिया. ‘‘क्या है रे?’’ ग्राहक ने उस को ऊपर से नीचे तक निहारा. निहारने में दुत्कार नहीं, सहानुभूति का पुट घुला था, ‘‘भीख चाहिए?’’

झुमकी ने हां में सिर हिला दिया. हथेली फैला देने का मतलब नहीं समझ में आ रहा है हुजूर को. ‘‘ठीक है,’’ ग्राहक भी संभवतया फुरसत में था. उस से चुहल करने में मजा लेने लगा, ‘‘बोल, भीख में पैसे चाहिए या आम?’’

आम की बात सुन कर झुमकी के मन में लालसा फुफकार उठी. दिल जोरजोर से धड़कने लगा. कल्पना में आम का रसीला स्वाद उतर आया. उस ने डरते हुए तर्जनी उठा कर ठेले के कोने में पड़े परित्यक्त आमों की ओर संकेत कर दिया. ‘मुंह से बोल न रे, छोरी.’ ग्राहक हंसा, ‘क्या गूंगी की तरह इशारे में बतिया रही है.’’

झुमकी चुप रही. ‘‘अरे बोल न, क्या लेगी-आम या पैसे?’’

झुमकी ने फिर भी मौन साधे रखा और डरती हुई पहले की तरह ही उन आमों की ओर संकेत कर दिया. ‘‘जब तक मुंह से नहीं बोलेगी, कुछ नहीं देंगे,’’ ग्राहक झुंझला उठा. झुमकी सहम गई. ऐसे क्षणों में जबान तालू से चिपक जाती है तो वह क्या करे भला? चाह कर भी बोल नहीं फूट रहे थे. सो, फिर से मौनी बाबा की तरह वही संकेत.

‘‘धत तेरे की,’’ ग्राहक फनफनाते हुए दमक पड़ा, ‘‘सरकार ससुर दलितों, गरीबों और अन्त्यजों की पूजाआरती उतारने में बावली हुई जा रही है. उन्हें हक और जमीर के लिए लड़ने को उकसा रही है. पकड़पकड़ कर जबरदस्ती सरकारी कुरसियों पर बैठा रही है. इ छोरी है कि सरकार बहादुर की नाक कटवाने पर तुली हुई है, हुंह. अरे, अब तो अपना रवैया बदल तू लोग. रिरियाना छोड़ कर हक से मांगना सीख.’’ ‘‘हां रे झुमकी, साहब ठीक ही तो कह रहे हैं. मुंह से बोल दे न, आम चाहिए या पैसा,’’ पांडेजी उसे प्रोत्साहित करते हुए हिनहिना दिए. ग्राहक की बेतरतीब टिप्पणियों से झुमकी का दिमाग झनझना उठा. क्षणभर में संन्यासी मोड़ वाले स्कूल के पास का ‘सर्व शिक्षा अभियान’ का बोर्ड और बोर्ड में चित्रित खिलखिलाते बच्चे आंखों के आगे आ गए. ग्राहक या तो सनकी है या अत्यधिक वाचाल. क्या इस को पता नहीं कि सरकार बहादुर की गरीबोंदलितों के पक्ष में की जा रही सारी पूजाआरती सिर्फ कागजकलम पर हवाहवाई हो कर रह जाती है.

‘‘हम तो चले पांडेजी,’’ ग्राहक खीझता हुआ आम वाले लिफाफे को उठा कर चलने को मुड़ गया. झुमकी धक से रह गई. सिर पर चिरकाल से पड़ी कुंठा और लाचारगी की भारीभरकम शिला को पूरा जोर लगा कर थोड़ा सा खिसकाया तो कंठ की फांक से एक महीन किंकियाहट गुगली की तरह उछल कर बाहर आई, ‘आम…’ अधमरी बेजान सी आवाज. ग्राहक वापस दुकान पर आ गया. उस के होंठों पर विजयी मुसकान चस्पा हो गई, ‘‘यह हुई न बात.’’ ‘‘दोष इन लोगों का भी नहीं न है साहेब,’’ पांडेजी मुसकराए, ‘‘सदियों से चली आ रही स्थिति को बदलने में वक्त तो लगेगा ही.’’

ग्राहक ने अपने लिफाफे से एक आम निकाल कर उस की ओर बढ़ा दिया, ‘‘ले, खा ले.’’ ग्राहक के बढ़े हाथ को देख कर झुमकी स्तब्ध रह गई. ताजा और साबुत लंगड़ा आम दे रहा है ग्राहक बाबू. मजाक तो नहीं कर रहा? एक पल के लिए मौन रखने के बाद इनकार में सिर हिलाते हुए उस ने तर्जनी से उन परित्यक्त आमों की ओर संकेत कर दिया. ‘‘छी…’’ ग्राहक खिलखिला कर हंस पड़ा, अरे, ‘‘पूरे समकालीन साहित्य के दलित स्त्री विमर्श की नायिका है तू. बदबूदार आम तुझे शोभा देंगे? न, न, ये ले ले.’’

ग्राहक की व्यंग्योक्ति में चुटकीभर हंसी पांडेजी भी मिलाए बिना नहीं रह सके. झुमकी ने फिर भी इनकार में सिर हिला दिया. तर्जनी उन्हीं आमों की तरफ उठी रही, मुंह से बोल न फूटे.

‘‘अजीब खब्ती लड़की है रे तू,’’ ग्राहक झुंझला उठा. झुमकी का रिरियाना और ऐसी शैली में बतियाना ग्राहक की खीझ को बढ़ा रहा था. उसे उम्मीद थी कि अच्छा आम पा कर लड़की एकदम से खिल उठेगी. पर यहां तो वही मुरगे की डेढ़ टांग. झिड़की में पुचकार का छौंक डालते हुए फनफनाया, ‘‘अरे हम अपनी मरजी से न दे रहे हैं यह आम. इतनीइतनी सरकारी योजनाएं, इतनेइतने फंड, इतनेइतने अनुदान…सारी कवायदें तुम लोगों को ऊपर उठाने के लिए ही न हो रही हैं? इन सरकारी कवायदों में एक छोटा सा सहयोग हमारा भी, बस.’’

झुमकी कभी आम को और कभी ग्राहक के चेहरे को टुकुरटुकुर ताकती रही. आंखों में भय सिमटा हुआ था. भीतर के बिखरेदरके साहस को केंद्रीभूत करती आखिरकार मिमियायी, ‘‘नहीं सर, इ आम नहीं, ऊ वाला आम दे दो.’’ ‘‘क्यों? जब हम खुद दे रहे हैं तो लेने में क्या हर्ज है रे, अयं?’’

‘‘हम भिखारी हैं, सर. अच्छा आम हमारे तकदीर में नहीं लिखा. ऊहे आम ठीक लगता है.’’ पूरे एपिसोड में पहली बार लड़की के मुंह से इतना लंबा वाक्य फूटा था. ‘‘देखा पांडेजी?’’

‘‘एक बात है, सर,’’ हथेली पर खैनी मसलते हुए पांडेजी ने कहा, ‘दलितों के लिए सरकारी सारे अनुदान, योजना वगैरावगैरा राजधानी से ऐसे कार्टून में भर कर लादान किया जाता है जिस के तल में बड़ा सा छेद बना होता. सारा कुछ ससुर रस्ते में ही रिस जाता है और कार्टून जब इन लोगन के दरवाजे आ कर लगता है तो पूरा का पूरा छूछा. हा, हा, हा.’’ ‘‘कुछ हद तक ठीक है आप की बात, पांडेजी,’’ ग्राहक भी हंसे बिना नहीं रह सका, ‘‘पर इस में सारा दोष सरकार को देना भी ठीक नहीं. कुछ दोष इन लोग का भी है. इन लोगों को भी तो अपना हक बूझना होगा, उस को पाने के लिए हाथपांव चलाना होगा. मतलब, पहल तो इन लोगों को ही न करना है. एक बार तन कर देखें तो. सारे हक मिलते चले जाते हैं कि नहीं? सब से पहले तो रिरियाना छोड़ना होगा.’’

‘‘हां साहब, ठीक कह रहे हैं आप. माओवादी लड़ाई कुछकुछ हक के प्रति सचेत हो जाने का परिणाम ही तो है,’’ पांडे ने कहा और फिर झुमकी की ओर मुखाबित होते हुए बोले, ‘लेले रे, लेले. साहब और तेरे बीच कोई बिचौलिया नहीं है न. साहब के हाथ से सीधे तेरे हाथ में आ रहा है इ अनुदान.’’

ग्राहक आगे बढ़ा और आम को झुमकी की हथेली में ठूंसते हुए हिनहिनाया, ‘‘तकदीर, मुकद्दर और भाग्य, सब बेकार बातें हैं, रे. जरूरी है हक बचाने के लिए लड़ाई की पहल. देख, इस आम की मालकिन अब तू हुई. यह पूरी तरह तेरा है. अब इस पर तेरा हक है. तकदीर तेरी मुट्ठी में कैद हो गई कि नहीं?’’ आम थामे झुमकी की हथेली थरथरा रही थी. आम की साफ पुखराजी रंगत और खरगोश सा मुलायम स्पर्श रोमांचित कर रहा था. पर आंखों में अविश्वास और डर अभी भी दुबका हुआ था.

‘‘बाबू, इ आम हम नहीं ले सकते. हम को उहे आम दिला दें,’’ फिर से लिजलिजी गिड़गिड़ाहट. ‘‘भाग सुसरी,’’ ग्राहक इस बात से उखड़ गया, ‘‘भाग, नहीं तो दू थप्पड़ लगा देंगे.’’

झुमकी चुपचाप पांडेजी की गुमटी से उतर आई और धीरेधीरे घर को जाने वाली राह पर आगे बढ़ने लगी. उसे अभी भी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि हथेली में ताजा गोराचिट्टा लंगड़ा आम दुबका हुआ है. चलतेचलते अचानक रुकी और एक ओर खड़ी हो कर आम को भरपूर नजरों से निहारने लगी. उस निहार में एकसाथ आश्वस्ति, प्यार और तृप्ति के कईकई रंग घुले हुए थे. इतने करीब से इस तरह के साबुत आम को पहली बार देख रही है. आज तक जितने भी ग्राहक मिले, भीख में या तो एकाध सिक्का दिया या फिर परित्यक्त आमों में से एकाध दिला दिया. ताजा व पक्का आम पहली बार झोली में आया है. लग रहा था जैसे दलितों के लिए घोषित असंख्य सरकारी अनुदानों में से एक अनुदान एकदम मूर्त हो कर उस की झोंपड़ी के भीतर आ टपका हो. वह मन ही मन आम के रसीले स्वाद की कल्पना में खोने लगी. कदम तेजी से बस्ती की ओर बढ़ चले. स्टेशन लांघ कर कदम कब लाइन पार आ गए और देखतेदेखते संन्यासी मोड़ भी कब आ पहुंचा, झुमकी को पता ही नहीं चला. तंद्रा टूटी तो सामने स्कूल का गेट दिखा. गेट बंद था. पीछे का ग्राउंड सूना. कक्षाएं समाप्त हो चुकी थीं न. झुमकी के पांव एक पल को गेट के पास थम गए. नजरें पखेरु सी उड़ती हुई पेड़ पर टंगे ‘सर्व शिक्षा अभियान’ के बोर्ड पर जा बैठीं. बोर्ड में चित्रित निश्ंिचत मुसकराहटों को देख कर मन कचोट से भर गया. वह आगे बढ़ने को उद्यत हुई ही थी कि सामने वाली पतली गली से निकल कर हवलदार निमाई बाबू प्रकट हो गए. खाकी वरदी, हाथ में रूल, आंखों में लोमड़ सी चमक. खाकी वरदी देख कर न जाने क्यों झुमकी की जान सूखने लगती है. मन में एक किस्म का डर रेंग जाता है. इस बार भी वही हुआ. भीतर ही भीतर कलेजा धकधक करने लगा. आसपास निपट सन्नाटा. दूरदूर तक कोई भी नहीं. एहतियात बरतते हुए आम वाली हथेली को पीछे ले जा कर फ्रौक के भीतर कर लिया.

‘का रे झुमकी?’ निमाई बाबू ने खींसें निपोर दिए, ‘धंधा से लौट रही?’ ‘हां सर, एही वक्त तो लौटते हैं रोज,’ झुमकी मन ही मन फनफना उठी. हमरे काम को धंधा कहते हैं. खुद बाजार की दुकानों से और बस्ती वालों से वसूली करते हैं, वह धंधा नहीं है?

निमाई बाबू भी पोस्टमौर्टमी नजरें न जाने किस चीज की तलाश में उस के बदन का नखशिख मुआयना करने लगीं. निस्तेज चेहरा, सपाट छाती और किसी पुतले की सी पतलीपतली जांघें.

‘‘तोर काछे किच्छू नेई रे? (तेरे पास कुछ भी नहीं है रे?)’’ होंठों पर लिजलिजी हंसी उभर आई और आगे बढ़ कर रूल को उस की बांह पर 2-3 बार ठकठका दिया. रूल का स्पर्श होना था कि बांह थरथरा गई और हथेली से फिसल कर आम जमीन पर आ गिरा. ‘‘अयं…?’’ निमाई बाबू की आंखें विस्मय से फैल गईं, झुक कर आम को झट से उठा लिया, ‘‘इ आम कहां से मिला रे?’’

‘‘एगो साहब भीख में दिया, सर,’’ सफाई देती हुई झुमकी की जबान अनायास ही लड़खड़ा गई. निमाई बाबू की आंखों में अविश्वास सिमट आया. एक पल को झुमकी की आंखों के भीतर ताकते रहे, निर्निमेष, फिर हाहा कर के हंस पड़े, ‘‘एतना सुंदर आम भीख में? असंभव. सचसच बता, भीख में मिला या किसी दुकान से पार किया?’’ ‘‘नहीं सर,’’ झुमकी की सांसें रुकनेरुकने को हो रही थीं, ‘‘पांडेजी की दुकान पर मिला. एक ग्राहक ने दिया. उन से पूछ लें.’’

हवलदार निमाई ने आम का एकदम करीब से अवलोकन किया. नाक के पास ले जा कर भरपूर सांस खींची तो नथुनों के भीतर महक अलौकिक सी महसूस हुई. ऐसा लगा जैसे इस महक में लंगड़ा आम की महक के अलावा भी एक अन्य सनसना देने वाली महक शामिल है. स्मृति में खलबली मच गई. ऊफ, याद क्यों नहीं आ रहा कि यह दूसरी महक कौन सी है? एकदम आत्मीय और जानीपहचानी. उत्तेजना के ये कुछेक पल बड़ी मुश्किल से ही कटे कि तभी आंखों में जुगनुओं की एकमुश्त चमक भर गई. अरे, यह महक शतप्रतिशत वही महक तो है जो दलितों के लिए घोषित मलाईदार सरकारी योजनाओं और अनुदानों से निकला करती है. खूब, ऐसी महक का स्वाद तो उन के जबान में गहराई से रचाबसा है. तभी तो… ‘‘ए,’’ निर्णय लेने में एक पल ही लगा, ‘‘ऐसा सुंदर और पका आम तुम लोग कैसे खा सकता है, रे? फिर सभ्य समाज का क्या होगा? यह आम तुझे नहीं मिल सकता.’’

‘‘हम को भीख में मिला, सर,’’ झुमकी किंकिया ही तो उठी. ‘‘हर चोर पकड़े जाने पर ऐसी ही सफाई देता. यह भीख का नहीं, चोरी का माल है,’’ निमाई बाबू के लहजे से हिकारत चू रही थी. ठीठ हिकारत.

‘‘हम सफाई नहीं दे रहे, सर. सच बोल रहे हैं. आप पांडेजी से पूछ लें.’’ ‘‘पूछने की कोईर् जरूरत नहीं. यह चोरी का ही माल है. थाना में जमा होगा,’’ निमाई बाबू की आंखों में लोलुप चमक चिलक रही थी.

‘‘हम चोरी नहीं किए,’’ झुमकी के हौसले पस्त होते जा रहे थे. ‘‘चोप्प, जबान लड़ा रही? जब हम कह रहे हैं कि चोरी का माल है तो, बस, है.’’

‘‘हमारा यकीन करें, सर.’’ ‘‘बोला न, चोप्प. एक शब्द भी बोला तो लौकअप में ले जा कर बंद कर देगा, समझी? प्रमाण लाना होगा. प्रमाण ले कर आओ, तब मिलेगा.’’

झुमकी स्तब्ध खड़ी रही. प्रमाण? हंह, भीख का प्रमाण मांग रहे? बाजार की दुकानों से और बस्ती से दैनिक वसूली करते हैं, उस का प्रमाण मांगा जाए तो…? तो दे सकेंगे? ग्राहक बाबू से कितना बोली थी कि ऐसे सुंदर आम उस जैसों के लिए नहीं होते. उन्होंने नहीं माना. बहादुरी में सरकारी योजनाओं और अनुदानों के बड़ेबड़े हवाले दे डाले. अरे, कोई भी सरकारी योजना या अनुदान सहीसलामत उन तक पहुंचता भी है? हंह, सब फुस हो गया न. उस के चेहरे पर स्याह मायूसी पुत गई. उसे महसूस हुआ जैसे हमेशा की तरह आज भी, कोई अनुदान मुट्ठी में आ जाने के बाद भी रेत की तरह फिसल कर अदृश्य हो गया है.

तभी उस की आंखें धुआंने लगीं. क्या वाकई सबकुछ इतनी आसानी से फुस हो जाने दे? ग्राहक बाबू ने कहा था न कि हक को पाने और बचाने के लिए चौकन्ना रहने के साथसाथ हाथपांव चलाते हुए संघर्ष की पहल करनी भी जरूरी है. पहल..? इस मौजूदा स्थिति में पहले के क्या विकल्प हैं, भला? वह नन्हीं जान, लंबेतगड़े निमाई बाबू से हाथापाई कर के जीत सकती है? आम छीन कर दौड़ भी पड़े तो निमाई बाबू लपक कर पकड़ लेंगे. आम तो जाएगा ही, भरपूर पिटाई भी खूब होगी. तब?

उस का छोटा सा दिमाग तेजी से कईकई विकल्पों का जायजा ले रहा था. कोईर् तो पहल करनी ही होगी हक बचाने के लिए. एकदम आसानी से सबकुछ फुस नहीं होने देगी वह. अचानक भीतर एक कौंध हुई. आंखें चमत्कृत रह गईं. कलेजा धकधक करने लगा. निमाई बाबू आम पा जाने की खुशी में चूर होते तनिक असावधान तो थे ही, झुमकी ने चीते की तरह लपक कर उन के हाथों से आम को कब्जे में लिया और पूरी ताकत से उस आम पर दांत गड़ा दिए.

Best Hindi Stories : कराटे वाला चाणक्य – क्यों विनय बन गया पूरा कालेज का चहेता

Best Hindi Stories :  विनय शरीर से दुबलापतला था. मगर उसे देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह भीतर से बहुत मजबूत है. कराटे सीखने के इरादे ने ही उसे भीतर से भी काफी मजबूत बना दिया था. मन और बुद्धि का भी वह धनी था. ‘‘सर,’’ कमरे में प्रवेश कर विनय राजन सर से बोला.

‘‘कहो, कौन हो तुम? क्या चाहते हो,’’ राजन सर ने पूछा. प्रश्नों की इस बौछार से जरा भी विचलित हुए बिना विनय बोला, ‘‘सर, मैं कराटे सीखना चाहता हूं.’’

‘‘क्या कहा, कराटे? यह शरीर ले कर तुम कराटे सीखना चाहते हो,’’ राजन सर मजाकिया मूड में हंस कर बोले. ‘‘हां, सर. क्या मैं कराटे नहीं सीख सकता?’’ विनय ने पूछा.

‘‘नहीं, पहले खापी कर अपने शरीर को मजबूत बनाओ, तब आना. अभी तो एक बच्चा भी तुम्हें गिरा सकता है,’’ कह कर राजन सर अखबार पढ़ने लगे. ‘‘सर, मैं इतना कमजोर भी नहीं हूं,’’ विनय बोला.

‘‘कैसे मान लूं?’’ यह सुनते ही विनय ने अपने एक हाथ की मुट्ठी बांध ली और फिर बोला, ‘‘सर, मेरी इस मुट्ठी को खोलिए.’’

सुन कर राजन सर मुसकराए मगर कुछ ही देर में उन की मुसकराहट गायब हो गई. विनय की मुट्ठी खोलने में उन के पसीने छूटने लगे. तब कुछ ही क्षणों बाद विनय ने खुद ही अपनी मुट्ठी खोल ली. राजन सर के मुंह से केवल इतना ही निकला, ‘‘वंडरफुल, तुम कल से टे्रनिंग सैंटर पर आ सकते हो लेकिन इस ढीलीढाली धोती में नहीं. अच्छा होगा कि तुम पाजामा पहन कर आओ.’’

विनय ने झुक कर उन के पैर छुए, फिर बाहर निकल आया. राजन सर चकित हो कर जाते हुए विनय को देखते रहे. विनय नियमित रूप से राजन सर के यहां आने लगा. कालेज में किसी को इस की भनक तक नहीं लगी. अब भी वह उन के लिए एक कार्टून मात्र था, क्योंकि जब वह पहले दिन कालेज आया तो उस का हुलिया कुछ ऐसा ही था. सिर पर छोटे बालों के बीच गांठ लगी एक लंबी सी चुटिया, ढीलाढाला कुरता पैरों में मोटर टायर की देसी चप्पल.

सब से पहले उस का सामना कालेज के एक शरारती छात्र राजेंद्र से हुआ. उस ने इन शब्दों से उस का स्वागत किया, ‘‘कहिए, मिस्टर चाणक्य, यहां नंद वंश का कौन है जो इस लंबी चुटिया में गांठ लगा कर आए हो? गांठ खोलो तो लहराती चुटिया और भी अच्छी लगेगी.’’ सुनते ही उस के पीछे खड़ी छात्रछात्राओं की भीड़ ठठा कर हंस पड़ी. विनय ने कोई उत्तर नहीं दिया. केवल मुसकरा कर रह गया. यह जरूर हुआ कि उस दिन से सभी शरारती छात्रछात्राओं को उसे मिस्टर चाणक्य कहने में मजा आने लगा.

वैसे धीरेधीरे विनय ने खुद को वहां के माहौल में ढाल लिया. सिर पर गांठ लगी चुटिया के कारण उस का नया नाम चाणक्य पड़ गया. विनय की क्लास में अधिकतर छात्रछात्राएं बड़े घरों से थे. कैंटीन में उन का नाश्ता मिठाई, समोसे, कौफी आदि से होता था. उन के कपड़े भी मौडर्न और सुपर स्टाइल के होते थे. मामूली कपड़ों वाला विनय तो सिर्फ चाय पी कर ही उठ जाता था. इसीलिए लड़केलड़कियां उस के पास बैठने में अपनी तौहीन समझते थे. विशेष रूप से वीणा और शीला को तो उस से बात तक करने में शर्म आती थी. मगर विनय इन सब से दूर पता नहीं किस दुनिया में खोया रहता था.

राजेंद्र, नरेश, वीणा और शीला की दोस्ती पूरे कालेज में मशहूर थी. राजेंद्र और नरेश भी संपन्न घरों से थे. वे कालेज की कैंटीन यहां तक कि बाहर भी अकसर वे साथसाथ घूमतेफिरते थे. उस दिन परीक्षा के फौर्म और फीस जमा हो रही थी, नाम पुकारे जाने पर विनय भी फौर्म व फीस ले कर पहुंचा. क्लर्क ने पैसे गिनने के बाद विनय से पूछा, ‘‘यह क्या, डेढ़ सौ रुपए कम क्यों हैं? क्या तुम ने नोटिस बोर्ड पर कल बढ़ी हुई फीस के बारे में नहीं पढ़ा?’’

‘‘नहीं सर, मेरी मां की तबीयत ठीक नहीं है इसलिए मैं जल्दी घर चला गया था. इसी कारण मैं नोटिस बोर्ड नहीं पढ़ पाया. सौरी सर,’’ विनय बोला. ‘‘देखो, मैं इतना कर सकता हूं कि फौर्म और पैसे तो अभी रख लेता हूं, लेकिन कल बाकी पैसे जमा कर देना वरना तुम्हारा फौर्म रुक जाएगा,’’ क्लर्क ने चेतावनी भरे स्वर में विनय से कहा.

वीणा शीला के कान में फुसफुसाई, ‘‘यार, तेरे पर्स में तो पैसे हैं, इसे देदे तो आज ही इस का फौर्म जमा हो जाएगा.’’ शीला बोली, ‘‘क्यों दे दूं? 10-20 रुपए की बात होती तो दे भी देती, डेढ़ सौ रुपए की उधारी यह चाणक्य महाशय चुकता कर भी पाएंगे,’’ वीणा चुप लगा गई.

विनय शाम को भारी मन से कालेज से बाहर निकला, कल कहां से आएंगे डेढ़ सौ रुपए, घर में तो मां की दवा के लिए ही मुश्किल आन खड़ी होती है. कभी यह भी सोचता कि क्यों कराटे सीखने में उस ने इतने पैसे बरबाद कर दिए. इसी सोच में डूबा विनय यह भी भूल गया कि वह साइकिल पकड़े पैदल ही चल रहा है. तभी एक स्कूटी पर वीणा और शीला उस की बगल से गुजरीं. दोनों स्कूटी पर कालेज आयाजाया करती थीं. विनय ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया.

मगर तुरंत ही वह चौंक पड़ा. एक बाइक पर सवार 3 आवारा लड़के अश्लील हरकतें करते हुए वीणा व शीला का पीछा कर रहे थे. किसी अनिष्ट की आशंका से वह साइकिल से उन का पीछा करने लगा. उस ने देखा, वे दोनों उन आवारा लड़कों से पीछा छुड़ाने के लिए स्कूटी की रफ्तार बढ़ाती जा रही थीं. मगर वे भी बाइक की रफ्तार उसी तरह बढ़ा रहे थे. उस रफ्तार में साइकिल से उन का पीछा करना मुश्किल था फिर भी वह जीजान से उन के पीछे लगा रहा.

इत्तफाक से एक जगह जाम लगा हुआ था. इस से बाइक की रफ्तार कुछ धीमी हो गई. यह देखते ही विनय ने साइकिल और तेज कर दी. वह सोच चुका था कि अब उसे क्या करना है. करीब पहुंचते ही उस ने साइकिल से बाइक पर एक जोरदार टक्कर मारी. बाइक तुरंत लड़खड़ा कर गिर पड़ी, उसी के साथ वे तीनों भी नीचे जमीन पर गिर गए. ‘‘सौरी, भाईसाहब. अचानक मेरी साइकिल के बे्रक फेल हो गए,’’ विनय बोला. मगर तभी उन्होंने विनय को लड़कियों को हाथ से भाग जाने का इशारा करते देख लिया. वे उस की चालाकी समझ गए. उन्होंने अपने एक साथी को विनय से निबटने के लिए छोड़ उन लड़कियों को घेर लिया.

विनय के लिए अब काम आसान हो गया था. उस ने कराटे के दोएक वार में ही युवक को इस तरह चित्त कर दिया कि वह फिर उठने लायक ही नहीं रहा. उधर विनय जब उन लोगों के पास पहुंचा तो देखा कि वहां भारी भीड़ इकट्ठी हो गई थी. उन आवारा लड़कों ने वीणा और शीला के दुपट्टे फाड़ कर फेंक दिए थे. वे दोनों चीख रही थीं. मगर भीड़ मूकदर्शक बनी खड़ी थी. गुंडों के भय से कोई आगे आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. कहीं उन के पास हथियार हुए तो? तभी विनय की नजर भीड़ में खड़े राजेंद्र और नरेश पर पड़ी. इस समय वे भी भीड़ का हिस्सा बने हुए थे जैसे कि वे वीणा और शीला को पहचानते ही न हों.

विनय के लिए अब खुद को रोकना मुश्किल हो गया. वह ललकारता हुआ बाइकर्स पर टूट पड़ा. एक मामूली से लड़के के इस साहस से प्रभावित हो कर भीड़ में मौजूद लोग भी उन पर टूट पड़े और उन की अच्छीखासी पिटाई करने के बाद तीनों को पुलिस को सौंप दिया. विनय ने एक नजर वीणा और शीला पर डाली तो उन की आंखों में कृतज्ञता के आंसू झलक रहे थे. मगर विनय वहां एक मिनट के लिए भी नहीं रुका, क्योंकि उसे मां के लिए दवा भी तो ले जानी थी. अगले दिन न चाहते हुए भी मां की दवा के लिए रखे पैसों में से विनय ने डेढ़ सौ रुपए निकाल लिए. विनय के कालेज पहुंचने से पहले ही उस के इस साहसिक कारनामे की सूचना पूरे कालेज को लग चुकी थी. मगर सब से पहले वह फीस के बाकी पैसे ले कर औफिस में गया, लेकिन वह चकित रह गया जब क्लर्क ने उसे बताया, ‘‘नहीं, इन्हें और कल दिए हुए पैसों को भी वापस रख लो. तुम्हारी पूरी फीस किसी और ने जमा कर दी है.’’

‘‘मगर सर, किस ने?’’ ‘‘जमा करने वाले ने नाम न बताने की शर्त पर ऐसा किया है.’’

विनय समझ गया. उस ने शीला और वीणा की ओर देखा. उन की आंखें नीचे झुकी हुई थीं. पहले तो उस ने सारे पैसे उन्हें लौटाने की बात सोची, मगर फिर मां की बीमारी का खयाल कर फिलहाल उस ने चुप रहना ही ठीक समझा. प्रिंसिपल के नोटिस पर मध्यावकाश में 10 मिनट के लिए कालेज के सभी छात्र और टीचर हौल में पहुंचे. प्रिंसिपल बोले, ‘‘आप लोग यहां बुलाए जाने का उद्देश्य तो समझ ही रहे होंगे. मैं चाहता हूं कि आप सब के सामने उस छात्र को उपस्थित करूं जिस ने इस कालेज का नाम रोशन किया है. आप ने व्यंग्य से उसे चाणक्य नाम दिया है. इतिहास में एक ही चाणक्य पैदा हुआ है. मगर विनय ने कल जिस साहस का परिचय दिया, वह किसी चाणक्य से कम नहीं है. इतिहास का चाणक्य कूटनीति में पारंगत था और हमारा चाणक्य बेमिसाल साहस का धनी है. उस का कराटे का ज्ञान कल खूब काम आया. आओ विनय, लोग तुम्हारे मुख से भी दो शब्द सुनना चाहते हैं.’’

प्रिंसिपल के पीछे खड़ा विनय सामने आ कर बोला, ‘‘आदरणीय गुरुजन और साथियो, मुझे आप से केवल दो बातें कहनी हैं. पहली यह कि अपनी माताबहनों के साथ आवारा लड़कों द्वारा अश्लील हरकतें करते देख चुप न रहें, भीड़ के साथ आप भी मूकदर्शक न बनें. आवारा लड़कों में कोई बल नहीं होता. आप उन्हें ललकारते हुए आगे बढ़ें. विश्वास कीजिए, आप की हिम्मत देख भीड़ भी उन्हें मजा चखाने आगे आ जाएगी. ‘‘दूसरी बात यह कि आप किसी को भी सोचसमझ कर ही अपना दोस्त बनाएं. दोस्त भरोसेमंद और संकट में काम आने वाला हो.’’

पूरे कालेज ने तालियों से विनय के इन शब्दों का स्वागत किया. परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ. विनय पूरे कालेज में अव्वल आया. उस की इस सफलता पर बधाई देने वालों में सब से पहले उस के घर पहुंचने वाली वीणा और शीला थीं. उन के भीतर आया बदलाव बिना कुछ बोले ही उन के चेहरे पर साफ झलक रहा था.

Pintu Ki Pappi के कलाकारों ने दिल्ली में किया शानदार प्रमोशन

Pintu Ki Pappi : मैथरी मूवी मेकर्स ने विधि आचार्य के वी2एस प्रोडक्शंस के साथ मिलकर रोमांटिक कौमेडी फिल्म ‘पिंटू की बनाई, जो 21 मार्च 2024 को सिनेमाघरों मशीन रिलीज होने जा रही है. शिव हरे द्वारा निर्देशित इस जीवंत और मनोरंजक फिल्म में तीन होनहार नए कलाकार- शुशांत थमके, जान्या जोशी और विधि शामिल हैं, जो अपने शानदार अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने के लिए तैयार हैं. दिल्ली के द ललित होटल में ‘पिंटू की पप्पी’ के लिए एक भव्य मीडिया कार्यक्रम आयोजित किया गया.

मीडिया से किए अनुभव शेयर

जोश और उत्साह का माहौल से भरे इस शानदार शाम का मुख्य आकर्षण प्रसिद्ध कोरियोग्राफर-अभिनेता गणेश आचार्य की उपस्थिति थी, जिन्होंने युवा मुख्य कलाकारों शुशांत थमके और जान्या जोशी के साथ इस अवसर की शोभा बढ़ाई. कार्यक्रम में फिल्म की टीम ने मीडिया से बातचीत की और फिल्म के प्रति अपने उत्साह और अनुभव को शेयर किया.

गणेश आचार्य

कार्यक्रम में गणेश आचार्य ने कहा, ‘जब मैं पुष्पा 2: द रूल’ की शूटिंग कर रहा था, तब निर्देशक शिव हरे ने ‘पिंटू की पप्पी’ की कहानी के साथ मुझसे संपर्क किया. जैसे ही मैंने इसकी कहानी सुनी, मुझे यह अवधारणा अविश्वसनीय रूप से अनूठी लगी और मैंने इस शर्त पर तुरंत इस फिल्म का हिस्सा बनने के लिए हामी भर दी कि मेरी पत्नी विधि आचार्य इस फिल्म का निर्माण करेंगी. जैसे-जैसे हमने कहानी को आगे बढ़ाया, हमें पता चला कि प्रशांत की भूमिका के लिए सुशांत एकदम सही थे, जिन्हें प्यार से ‘पिंटू’ कहा जाता है, जबकि जान्या ने प्रेरणा के चरित्र को खूबसूरती से जीवंत किया है, जिसे प्यार से ‘पप्पी’ कहा जाता है. और इस तरह हम शीर्षक पर पहुंचे- ‘पिंटू की पप्पी’.

मैथरी मूवी मेकर्स और वी2एस प्रोडक्शंस द्वारा समर्थित ‘पिंटू की पप्पी’ मस्ती, रोमांस और कौमेडी से भरपूर एक रोलरकोस्टर राइड होने का वादा करती है. फिल्म में कई बेहतरीन कलाकार हैं, जिनमें अनुभवी अभिनेता विजय राज, मुरली शर्मा, सुनील पाल, अली असगर, पूजा बनर्जी, अदिति सनवाल, रिया एस. सोनी, उर्वशी चौहान, प्यूमोरी मेहता दास, मुक्तेश्वर ओझा और खुद गणेश आचार्य भी विशेष भूमिका में नजर आएंगे.

चार चांद लगाता संगीत

इस फिल्म के आकर्षण में चार चांद लगाने वाला इसका जीवंत संगीत एलबम है, जिसे संगीतकारों की एक प्रतिभाशाली लाइनअप डॉ. निट्ज़ उर्फ नितिन ‘निट्ज़’ अरोड़ा, सन्नी केसी, प्रसाद एस, शफ़ात अली, सोनल प्रधान और अंकित शर्मा-अभिनव ठाकुर ने तैयार किया है. उम्मीद है कि इसका साउंडट्रैक एक प्रमुख आकर्षण होगा, जो कहानी में एक युवा और जोशीला माहौल लाएगा.

आकर्षक कहानी

अपनी आकर्षक कहानी, होनहार नवोदित कलाकारों और अनुभवी सहायक कलाकारों के साथ ‘पिंटू की पप्पी’ सभी उम्र के दर्शकों के लिए एक मनोरंजक फिल्म बनने के लिए तैयार है.

हेमा मालिनी की बेटी Esha Deol ने हिट करियर के दौरान फिल्मों से क्यों किया किनारा

Esha Deol : हेमा मालिनी की बेटी ईशा देओल काफी सालों बाद विक्रम भट्ट निर्देशित फिल्म तुमको मेरी कसम में अभिनय करती नजर आएंगी . इससे पहले ईशा देओल ने 2002 में अपने अभिनय करियर की शुरुआत कोई मेरे दिल से पूछे फिल्म से की थी. उसके बाद ईशा देओल ने कई सारी हिट फिल्में दी , जैसे धूम , युवा , नो एंट्री, दस ,आदि, लेकिन इन हिट फिल्मों के बावजूद ईशा देओल ने अपना करियर आगे बढ़ाने के बजाय धीरेधीरे फिल्मों से किनारा करना शुरू कर दिया और कुछ समय बाद शादी करके घर बसा लिया और फिल्में से पूरी तरह दूर हो गई.

जिसका कारण लोगों ने ईशा देओल को बड़े स्टार्स हेमा धर्मेंद्र की बेटी होने का घमंड एटीट्यूड बताया. लेकिन हाल ही में तुमको मेरी कसम के प्रमोशन के दौरान एक इंटरव्यू में ईशा देओल ने इस बात का खुलासा किया कि उन्होंने अपना फिल्मी करियर घमंड या एटीट्यूड की वजह से नहीं बल्कि अपने परिवार की इज्जत मान सम्मान और सख्ती की वजह से कई फिल्मों में काम करने से इनकार किया था.

क्योंकि उन फिल्मों में बोल्ड सीन और कुछ अलग तरह के सीन थे जिसे उनके परिवार की तरफ से करने के लिए सख्त मनाई थी. इसके अलावा ईशा देओल ने फिल्में इसलिए भी छोड़ी क्योंकि उस फिल्म में उस रोल के लिए वह अपने आप को फिट नहीं मानती थी.

इसी चक्कर में उनको कई फिल्मों का औफर ठुकराना पड़ा , जो कि बाद में सुपर डुपर हिट साबित हुई. लेकिन फिलहाल ईशा देओल अभिनय करियर में फिर से एंट्री मार चुकी हैं और अब वह फिल्मों में काम करने को लेकर गंभीर भी लगती है. इस प्रोजेक्ट के अलावा ईशा देओल के पास कुछ और फिल्में भी हैं जिसको लेकर अभी बात जारी है. फिलहाल उनकी फिल्म तुमको मेरी कसम 21 मार्च को रिलीज हो रही है. जिसका उनके प्रशंसकों को बेसब्री से इंतजार है.

Grihshobha Inspire : इंदिरा गांधी को अपनी प्रेरणा मानती हैं कैंसर सर्वाइवर एक्‍ट्रेस रोजलिन खान

Grihshobha Inspire : वूमंस डे 2025 के खास मौके पर यह सूचित करते हुए खुशी हो रही है कि सशक्‍त महिलाओं की परिभाषा गढ़ने वाली पत्रिका गृहशोभा की ओर से 20 मार्च को ‘Grihshobha Inspire Awards’ इवेंट का नई दिल्‍ली में आयोजन हो रहा है. यहां उन महिलाओं को सम्‍मानित किया जाएगा, जिनके उल्‍लेखनीय योगदान लाखों लड़कियों और महिलाओं को Inspire कर रहे हैं. एक सर्वे के माध्‍यम से हमने सैकड़ों महिलाओं से बातचीत कर यह जानने की कोशिश की है कि वे ‘किस महिला से इंस्‍पायर होती हैं’?, ‘सरकार से महिलाओं को लेकर उनकी क्‍या उम्‍मीदें हैं’ और ‘एक आम महिला को इंस्‍पायरिंंग वुमन बनने की राह में क्‍या बाधाएं आती हैं ’?

स्टेज 4 की कैंसर सर्वाइवर अभिनेत्री और यूट्यूबर रोजलिन खान के लिए कई महिलाएं इन्स्पाइयरिंग वुमन हैं. वह कहती है कि पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मैं काफी प्रेरित रही हूं. उनकी लाइफ में बहुत चुनौती थी और इन चुनौतियों से लड़ कर वह एक पावरफुल महिला के रूप में सबके सामने आईं. लोगों ने उनकी कई गलतियों को गिनाया लेकिन वह मजबूती से खड़ी रहीं . दरअसल, बाहर से जो दिखता है, रियल लाइफ में वह बिलकुल अलग होता है, जो ढेरों लोगों को पता नहीं चलता. उन्‍होंने कई ऐसे काम किए जिसकी वजह से देश उनको याद करता है. फिल्म इंडस्ट्री की बात करें, तो मैं अभिनेत्री और मिस वर्ल्ड प्रियंका चोपड़ा से बहुत अधिक इंस्‍पायर्ड हूं, क्योंकि जब बॉलीवुड ने उन्हें अचानक बाहर निकाल दिया तो उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और इंटरनेशनल लेवल पर अपनी पहचान बनाई. वह एक मजबूत महिला हैं, यही वजह है कि उन्‍होंने अपने काम की बदौलत इंटरनेशल लेवल पर अपनी पहचान कायम की.

कोई भी महिला किसी को इंस्‍पायर करने के लिए रास्ता नहीं चुनती और ना ही इसके लिए कोई कोर्स करना पड़ता है. ये खुद ब खुद होता है, जिंदगी में कई ऐसी कठिन परिस्थितियां आती है जब महिलाओं को बाधाओं को तोड़ना पड़ता है.जब वह अपने मकसद में कामयाब होती है, तो उसके बाद लोग उनकी काबिलियत को लोग सराहने लगते हैं. अगर आपमें कुछ करने का जज्‍बा होता है, तो मंजिल मिल ही जाती है. कई बार लोग आपको आगे बढ़ने नहीं देते, आपत्ति जताते है, ऐसे में उस महिला को अधिक मजबूती से टिके रहना पड़ता है, जो बहुत कठिन होता है. पर कुछ महिलाएं हार मानने में यकीन नहीं रखती है और इसलिए वह समाज के लिए प्रेरणा बन जाती हैं.

‘गृहशोभा इंस्‍पायर अवार्ड्स’ इवेंट में रजिस्‍टर करने के लिए लिंक क्लिक करें – grihshobha.in/inspire/register

Healthy Sex Life : मैरिड लाइफ से हो गए हैं बोर, तो ऐसे करें ऐंजौय

Healthy Sex Life :  आजकल की भागदौड़ वाले लाइफस्टाइल और तनाव के कारण हम कम उम्र में ही बीमारियों से घिर रहे हैं जिस का असर हमारी सैक्स लाइफ पर भी पड़ रहा है. सैक्स लाइफ जल्द ही खत्म हो रही है. यदि आप अपनी सैक्स लाइफ को लंबे समय तक कैरी करना चाहते हैं तो फरमाएं इन बातों पर गौर:

रखें खुद को स्वस्थ

एक स्वस्थ शरीर ही खुश रह सकता है. यदि हम बीमार हैं तो न ही हम खुश रह सकते हैं और न ही किसी भी चीज का मजा ले सकते हैं, फिर चाहे बात सैक्स लाइफ की ही क्यों न हो. एक अस्वस्थ शरीर सैक्स लाइफ का मजा नहीं ले सकता. इस के लिए शरीर की सही देखभाल और खुद को स्वस्थ रखना आवश्यक है ताकि लंबे समय तक अपनी सैक्स लाइफ का भरपूर मजा ले सकें. स्वस्थ रहने के लिए नियमित ऐक्सरसाइज करने के साथसाथ अपने खानपान पर नियंत्रण रखना, तनाव से दूर रहना भी आवश्यक है ताकि असमय होने वाली बीमारियों से शरीर को दूर रख सकें.

रखें शरीर को फिट ऐंड फाइन

हर कपल चाहता है कि उस का पार्टनर खूबसूरत हो या दिखे. इस के लिए शरीर को मोटापे से दूर रखना आवश्यक है ताकि शरीर सुडौल रहे. शरीर को फिट ऐंड फाइन रखना आवश्यक है ताकि आप अपनी खूबसूरती से पार्टनर को आकर्षित कर सकें और अपनी सैक्स लाइफ को लंबे समय तक जारी रख सकें. इस के लिए आप को नियमित ऐक्सरसाइज करने और अपनी डाइट पर ध्यान देने की जरूरत है. इस के लिए अपने आहार में लो कैलोरी फूड शामिल करें ताकि अपने वजन को नियंत्रण में रख सकें एवं अपने शरीर को फिट ऐंड फाइन रख सकें.

उम्र के अनुसार रखें डाइट प्लान

दांपत्य जीवन को लंबे समय तक तरोताजा रखने के लिए सैक्स लाइफ का एक अहम रोल होता है. इस के लिए सब से जरूरी है खुद को स्वस्थ एवं हमेशा ऊर्जा से भरा हुआ रखना. चाहे महिला हो या पुरुष अपना खानपान उम्र के अनुसार करना चाहिए ताकि खुद को स्वस्थ रख सके खासकर महिलाओं को अपनी डाइट को ले कर कौंशस होना चाहिए क्योंकि उन्हें घर से ले कर औफिस तक की जिम्मेदारी निभानी पड़ती है. इस के लिए आवश्यक है कि वे खुद पूरी तरह से फिट और स्ट्रौंग रहें. उन का खानपान सही एवं नूट्रियस होना अति आवश्यक है. महिलाओं को उम्र के हर पड़ाव पर अलगअलग नूट्रियस हैल्दी डाइट की आवश्यकता होती है क्योंकि 40-45 की उम्र में महिलाओं के शरीर में हारमोनल बदलाव एवं उन के इंसुलिन लैवल में भी बदलाव आता है और हड्डियों से संबंधित, मेनोपौज एवं और भी कई तरह की समस्याएं शुरू होने लगती हैं. इस उम्र में उन्हें खानपान के ऊपर विशेष ध्यान देने की आवस्यकता होती है. ज्यादा फाइबर, प्रोटीन युक्त प्रोडक्ट, हरी सब्जिया, कैल्शियम युक्त डायरी प्रोडक्ट्स, नट्स अपनी डाइट में शामिल करने चाहिए ताकि वे शरीर को स्वस्थ रख सके.

पहले एकदूसरे से करें बातचीत

आज आप रोमांटिक मूड में हैं और पार्टनर संग अच्छा समय बिताना चाहते हैं तो इस के लिए आप एकदूसरे से अपने दिल की बातचीत कर लें ताकि समय पर अपने सारे कामों को निबटा लें और पहले से ही मूड बना लें कि आज आप पार्टनर के साथ कुछ रोमांचक और प्यारभरे पल बिताने वाले हैं वरना कहीं ऐसा न हो कि आप किसी तनाव में परेशान हैं तो तब आप सैक्स का पूरा मजा नहीं ले पाएंगे.

बनाएं सुखद माहौल

सैक्स लाइफ को ऐंजौय करने के लिए माहौल का शांत और खुशनुमा होना भी बहुत ही आवश्यक है. इस के लिए सही जगह और समय का चुनाव करें. आप रूम में हलकी रोशनी जलाएं और लाइट म्यूजिक बजाएं ताकि आप रोमांटिक मूड में आ जाएं और शांति का अनुभव हो. फिर आप उन सुखद पलों का पार्टनर संग भरपूर मजा लें.

अच्छे से हों मेकओवर

हर पार्टनर की यह इच्छा होती है कि उस का साथी हमेशा खूबसूरत लगे. अत: पार्टनर की  पसंद की ड्रैस का चयन करें, सजेसंवरे और मेकअप करें ताकि आप उन्हें आकर्षित कर सकें.

शेयर करें अपनी फीलिंग्स

सैक्स के दौरान एकदूसरे से खुल कर बातचीत करना एक सुखद अनुभव हो सकता है ताकि पार्टनर को यह सम झना आसान हो कि उस के क्या करने से आप उत्तेजित हो रहे हैं या आनंद का अनुभव कर रहे हैं अथवा आप इस ऐक्टिविटी को ऐंजौय नहीं कर पा रहे हैं इसलिए सैक्स के दौरान पार्टनर संग बातचीत कर अपनी फीलिंग्स को अवश्य शेयर करें. यदि कोई परेशानी हो रही है तो बिना किसी हिचकिचाहट के खुल कर पार्टनर से कहें.

तनाव को करें कम

महिलाएं हों या पुरुष, दोनों में ही सैक्स क्षमता में कमी का कारण हारमोंस की गड़बड़ी, रोजमर्रा का तनाव और उम्र के साथ घटता ऐनर्जी लैवल है. वैसे तो सैक्स तनाव को कम करता है मगर कई बार रोजमर्रा की जिंदगी की टैंशन और तनाव दोनों आप पर इतने हावी हो जाते हैं कि आप की सैक्स लाइफ को प्रभावित करने लगते हैं. इस के लिए आप पर्याप्त नींद ले कर तनाव और चिंता को कम कर के रोजाना योग एवं ध्यान की मदद से अपनी सैक्स की इच्छा को बरकरार रख सकते हैं और अपने ऐनर्जी लैवल को बढ़ा सकते हैं.

मोबाइल आदि गैजेट्स को रखें औफ

आजकल हर वक्त मोबाइल हमारे आसपास ही रहता है और फिर इस पर हर वक्त आते नोटिफिकेशन, अलर्ट और मैसेस हमें किसी काम पर एकाग्र नहीं होने देते. इस से बचने के लिए आप सैक्स के दौरान अपने मोबाइल को स्विच औफ या साइलैंट मोड कर लें ताकि बिना किसी रुकावट के पार्टनर संग सैक्स का भरपूर मजा ले सकें.

लाएं कुछ नयापन

ऐसा कहा जाता है कि नयापन लाने में ही जीवन जीने का असली मजा है इसलिए अपनी सैक्स लाइफ में भी हर बार कुछ नयापन लाएं ताकि सैक्स लाइफ में बोरियत न आए. इस के लिए अपने पार्टनर के साथसाथ नईनई पोजीशन ट्राई कर उसे सरप्राइज करें. अकसर मैरिड लाइफ में एक समय के बाद सबकुछ रूटीन जैसा ही हो जाता है फिर कुछ भी नया नहीं रहता जिस के कारण हम बोर हो जाते हैं और सैक्स लाइफ जल्द ही खत्म हो जाती है. इसलिए सैक्स लाइफ को रोमांचक बनाए रखने के लिए हर बार कुछ नया आवश्यक है ताकि लंबी सैक्स लाइफ का मजा ले सकें.

शरीर को बनाएं फ्लैक्सिबल

सैक्स का भरपूर मजा लेना हो या नईनई सैक्स पोजीशन ट्राई करनी हों इस के लिए शरीर का फ्लैक्सिबल और मांसपेशियों का मजबूत होना आवश्यक है ताकि आप सैक्स के दौरान कंफर्टेबल रहें. अत: आप योग की मदद लें और ऐक्सरसाइज को अपने डेली रूटीन का हिस्सा बनाएं. इस से आप की मांसपेशियां मजबूत रहेंगी और आप सैक्स का भरपूर मजा लेंगे.

Couple Goals : बौयफ्रेंड का प्यार अब बोझ लगने लगा है, मैं क्या करूं?

Couple Goals :  अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल-

मैं कालेज टाइम में किसी लड़के से बहुत प्यार करती थी. मगर कभी उस से अपने प्यार का इजहार नहीं कर सकी. बाद में मेरी अरेंज्ड मैरिज हो गई. पति काफी अंडरस्टैंडिंग और केयरिंग नेचर के हैं. मैं अपनी जिंदगी में काफी खुश थी, मगर एक दिन अचानक जिंदगी में तूफान आ गया. दरअसल, फेसबुक पर उसी लड़के का मैसेज आया कि वह मुझ से बात करना चाहता है. मेरे मन में दबा प्यार फिर से जाग उठा. मैं ने तुरंत उस के मैसेज का जवाब दिया. फेसबुक पर हमारी दोस्ती फिर से परवान चढ़ने लगी. मैं अपना खाली समय उस से बातें करने में गुजारने लगी. धीरेधीरे शर्म और संकोच की दीवारें गिरने लगीं. फिर एक दिन उस ने मुझे अकेले में मिलने बुलाया. मैं उस के इरादों से वाकिफ हूं, इसलिए हिम्मत नहीं हो रही कि इतना बड़ा कदम उठाऊं या नहीं. उधर मन में दबा प्यार मुझे यह कदम उठाने की जिद कर रहा है. बताएं मैं क्या करूं?

जवाब-

यह बात सच है कि पहले प्यार को इंसान कभी नहीं भूल पाता, मगर जब जिंदगी आगे बढ़ चुकी हो तो लौट कर उस राह जाना मूर्खता होगी. वैसे भी आप को कोई अपने पति से शिकायत नहीं है. ऐसे में प्रेमी से रिश्ता जोड़ कर नाहक अपनी परेशानियां न बढ़ाएं. उस लड़के को स्पष्ट रूप से ताकीद कर दें कि आप उस से केवल हैल्दी फ्रैंडशिप की उम्मीद रखती हैं, जो आप के जीवन की एकरसता दूर कर मन को सुकून और प्रेरणा दे. मगर शारीरिक रूप से जुड़ कर आप इस रिश्ते के साथसाथ अपने वैवाहिक रिश्ते के साथ भी अन्याय करेंगी. इसलिए देर न करते हुए बिना किसी तरह की दुविधा मन में लिए अपने प्रेमी से इस बारे में बात कर उसे अपना फैसला सुनाएं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें-

submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

गीतकार और लेखक Javed Akhtar ने आज की फिल्मों की तुलना की शीरीं फरहाद की लव स्टोरी से…

Javed Akhtar : 80 वर्षीय लेखक और गीतकार जावेद अख्तर का सेंस औफ ह्यूमर आज भी उतना ही पावरफुल है जितना कि आज से 40 -50 साल पहले था. इस बात का जीता जागता उदाहरण हाल ही में आमिर खान के लिए की गई उनकी फिल्मों की फिल्म फेस्टिवल प्रेस कौन्फ्रेंस में देखने को मिली. जावेद अख्तर आमिर खान के लिए बतौर गेस्ट उपस्थित हुए थे. जहां पर जावेद अख्तर से आज की फिल्में न चलने को लेकर सवाल किया गया, जिसके जवाब में जावेद अख्तर ने अपने मजाकिया अंदाज में एक मौके की बात कह दी.

जावेद अख्तर का कहना था कोई भी चीज अगर आसानी से मिल जाती है तो उसकी वैल्यू नहीं होती, जैसे कि आज अगर फिल्में थिएटर में रिलीज होती है तो कुछ हफ्ते बाद ही ओटीटी के जरिए लोगों के मोबाइल तक पहुंच जाती है . ऐसे में जब कोई चीज आसानी से मिलती है जिसको देखने के लिए कोई मेहनत मुश्शकत नहीं करनी पड़ती, भला उसकी वैल्यू कैसे बढ़ेगी जैसे कि अगर आज के जमाने में शीरीं फरहाद होते तो उनकी भी प्रेम कहानी इतनी दिलचस्प नहीं होती, क्योंकि आज के जमाने में अगर उनके पास स्मार्टफोन होता तो शीरीं को देखने के लिए फरहाद को घंटों बारिश में या धूप में भीगते और तपते शीरी का इंतजार ना करना पड़ता, बल्कि वह वीडियो कौल के जरिए आसानी से बात कर लेता.

ऐसे में शीरीं फरहाद को एक दूसरे के लिए बेचैनी या इंतजार ना होता. कहने का मतलब यह है कि आज फिल्में फिल्मों को देखने को लेकर दर्शकों के पास बहुत औप्शंस है , जिस वजह से फिल्म चाहे कितनी ही अच्छी हो या बुरी हो वह वो फिल्म आराम से देख लेते है. ओटीटी उनके लिए आसान माध्यम हो गया है. इसलिए आज फिल्में भी पहले के मुकाबले कम चलती है क्योंकि वह आसानी से देखने को मिल जाती है.

Grihshobha Inspire: आदिवासी समुदाय की द्रौपदी मूर्म के राष्‍ट्रपति बनने से इंस्‍पायर हैं संगीता चौरसिया

Grihshobha Inspire : वूमंस डे 2025 के खास मौके पर यह सूचित करते हुए खुशी हो रही है कि सशक्‍त महिलाओं की परिभाषा गढ़ने वाली पत्रिका गृहशोभा की ओर से 20 मार्च को ‘Grihshobha Inspire Awards’ इवेंट का नई दिल्‍ली में आयोजन हो रहा है. यहां उन महिलाओं को सम्‍मानित किया जाएगा, जिनके उल्‍लेखनीय योगदान लाखों लड़कियों और महिलाओं को Inspire कर रहे हैं. एक सर्वे के माध्‍यम से हमने सैकड़ों महिलाओं से बातचीत कर यह जानने की कोशिश की है कि वे ‘किस महिला से इंस्‍पायर होती हैं’?, ‘सरकार से महिलाओं को लेकर उनकी क्‍या उम्‍मीदें हैं’ और ‘एक आम महिला को इंस्‍पायरिंंग वुमन बनने की राह में क्‍या बाधाएं आती हैं ’? 49 वर्षीय संगीता चौरसिया ने अपने विचारों को कुछ इस तरह से हमारे सामने रखा.

डिफेंस रिसर्च एंड डेवलमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) में कार्यरत संगीता की दुनिया उस समय पल भर को ठहर जाती है जब उन्‍हें पता चलता है तक उनके बेटे को सेलिब्रल पाल्‍सी है. बेटे की देखभाल करने के लिए संगीता को एक भारत सरकार की एक प्रतिष्ठित संस्‍था की जॉब छोड़नी पड़ती है. संगीता का कहना है कि मैंने हार मान कर जॉब नहीं छोड़ी थी, मेरे सामने एक नई चुनौती थी, जिसका सामना मुझे करना था. थोड़ी देर बातचीत करने के बाद यह महसूस होता है कि संगीता खुद ही एक इंस्पिरेशन हैं लेकिन संगीता से जब उनके इंस्पिरेशन के बारे में पूछा गया, तो उन्‍होंने बताया कि भारत की महिला राष्‍ट्रपति द्रौपदी र्मूमू उनको इंस्‍पायर करती हैं. संगीता का मानना है कि द्रौपदी मूर्मू बेहद साधारण पृष्‍ठभूमि से आती हैं, अनुसूचित जनजाति से होने के बावजूद उन्‍होंने यह साबित किया कि महिलाओं अगर चाहे, तो सर्वोच्‍च पद पर भी अपनी जगह बना सकती हैं. द्रौपदी र्मूमू के अलावा मुझे सुधा मूर्ति भी बहुत इंस्‍पायर करती हैं.

महिलाओं की राह की बाधा

महिलाओं की राह में ढेरों बाधाएं हो सकती है लेकिन अगर महिला ही महिला की सपोर्ट करे, तो वह आधी जंग जाती है. यह महिला उसकी मां, बहन, भाभी, ननद, सास, सहेली कोई भी हो सकती है. मेरे दो बेटे हैं. मैंने सोचा है कि जब मेरी बहुएं आएंगी, तो मैं भी उनके करियर को लेकर उनका खुल कर सपोर्ट करूंगी. आज बहुत सारी युवतियां शादी के बाद न्यूक्लियर फैमिली में रह रही हैं, ऐसे में वह अपने मन से निर्णय लेने को आजाद होती हैं.

सोने पे सुहागा

अगर सरकार की तरफ से महिलाओं को स्किल ट्र‍ेनिंग दी जाए, तो बहुत सारी महिलाएं अपने सपनों को पूरा कर पाएंगी और अपने पैरों पर खड़ी हो पाउंगी. स्किल ट्रेनिंग के बाद बात आती है, फाइनैंस से जुड़ी मदद की. फाइनेंशियल हेल्‍प, जरूरतमंद लड़कियों के लिए जरूरी है. कमजोर घरों की स्किल्‍ड लड़कियों के लिए यह मदद बहुत जरूरी होती है.

बोल्‍ड है आज की वुमन

आज लड़कियां काफी बोल्‍ड हो गई है और इसे मैं सकारात्‍मक अंदाज में लेती हूं. अस्‍सी के दशक की तो बात ही छोड़ दें, नब्‍बे के दशक में भी महिलाओं में समाज से लड़ने का दम नहीं था. वह फैमिली और सोसाइटी के वैल्‍यूज में जकड़ी होती थीं और इस वजह से उन्‍हें क्‍या करना है, कहां जाना है, उन्‍हें पैसे क्‍यों चाहिए जैसी बातों को अपने घरों में अपने माता पिता को भी शेयर नहीं कर पाती थी. वह हमेशा यह सोचती रहती थी कि अपने लक्ष्‍य तक पहुंचने के उनके कदम को समाज किस तरह से देखेगी? बचपन से ही वह सामाजिक मान्‍यताओं की जंजीरों में जकड़ी होती थी. आज के पेरेंट्स का नजरिया भी बदला है, वो अपनी बेटी पर रोकटोक का शिकंजा नहीं कसते. वह अपनी बेटी पर उठने वाली उंगुली का जवाब देने को तैयार हैं

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Alia Bhatt की इंस्पिरेशन हैं ऐश्वर्या राय बच्चन

Alia Bhatt : बाल कलाकार के रूप में अभिनय के क्षेत्र में आई अभिनेत्री आलिया भट्ट से कोई अपरिचित नहीं. उनका सिर्फ खूबसूरत चेहरा ही नहीं, बल्कि पिछले कुछ सालों में इस अभिनेत्री ने जो तरक्की की है, वह वाकई अविश्वसनीय है. आज वह एक मां हैं, जो काम और मातृत्व के बीच सहजता से संतुलन बनाए हुए हैं. वह एक आधुनिक भारतीय महिला का बेहतरीन उदाहरण है.

इंडस्ट्री में सदियों से चली आ रही कहावत के विपरीत उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि एक अभिनेत्री गर्भावस्था और शादी के बाद नीचे चली नहीं जाती, बल्कि फिर से आसमान छू सकती है. दिलचस्प बात यह भी है कि उनकी कुछ फिल्में उसी स्वतंत्र और उन्मुक्त लड़की का बहुत अच्छा उदाहरण पेश करती हैं, जो वह स्क्रीन के बाहर भी हैं.

उनके कुछ किरदारों को दर्शकों ने खूब सराहा है, मसलन 2 स्टेट्स में अनन्या स्वामीनाथन, बद्रीनाथ की दुल्हनियां में आशा, डियर जिंदगी में कायरा, रौकी और रानी की प्रेम कहानी में रानी चैटर्जी इन सभी भूमिका से आज की एक लड़की इन्सपायर होती है, यही वजह है कि आलिया को हर फिल्म में दर्शकों का प्यार मिला. आलिया को यहां तक पहुंचने में काफी मेहनत करनी पड़ी.

इसके आगे आलिया उन महिलाओं से अधिक प्रेरित होती है, जिन्होंने अपना रास्ता खुद चुना है और उसे वे वैश्विक स्तर पर ले गई. उन्होंने एक जगह कहा है कि मैं ऐश्वर्या राय बच्चन से प्रेरित महसूस करती हूं, जिन्होंने अपना रास्ता खुद चुना और अपनी यात्रा को ग्लोबल लेवल पर ले गईं, जब कोई इसके बारे में सोच भी नहीं रहा था. अभिनेत्री करीना कपूर खान जो हर तरह से प्रतिष्ठित हैं, उन्होंने भी मेहनत कर अपनी मुकाम खुद हासिल की है. सिंगर श्रेया घोषाल, जिनकी आवाज़ से दिए गए हर शब्द और लय, श्रोता के लिए कर्णप्रिय बन जाता है. ये सभी महिलाएं अपने सफर को मेहनत और लगन से अपना चुकी है, जिससे मैं बहुत प्रेरित होती हूं और इसी प्रामाणिकता को मैं अपने अभिनय में भी लाने की कोशिश करती हूं.

इसके अलावा आलिया मां सोनी राजदान और बहन शाहीन भट्ट से बहुत प्रेरित होती है. मां ने उन्हे हर परिस्थिति में साथ दिया है, जिसके परिणामस्वरूप वह अभिनेत्री बन सकी. बहन शाहीन के मानसिक स्वास्थ्य से जूझने के संघर्ष से प्रेरणा ले कर ही आलिया ने फिल्म डियर जिंदगी और औस्कर ड्रीम्स की कहानियों से जुड़ाव महसूस किया.

रोजलिन खान

स्टेज 4 की कैंसर सर्वाइवर अभिनेत्री और यूट्यूबर रोजलिन खान के लिए इन्स्पाइयरिंग वुमन कई है. वह कहती है कि मैं बहुत ज्यादा इंदिरा गांधी से प्रेरित हुई हूं, उनकी लाइफ में बहुत चुनौती थी, लेकिन वह एक पावरफुल महिला रही है. लोगों ने उनकी कई गलतियों को गिनाया, लेकिन वह मजबूती से खड़ी रही. बाहर से जो दिखता है, रियल में बहुत अलग होता है, जो लोगों को पता नहीं चलता. मैंने उनके हर काम को पसंद किया है. फिल्म इंडस्ट्री की बात करें, तो मैं अभिनेत्री और मिस वर्ल्ड प्रियंका चोपड़ा से बहुत अधिक इंसपायर्ड हूं, क्योंकि हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री ने जब उन्हे अचानक बाहर निकाल दिया, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और इंटरनेशनल लेवल पर अपनी पहचान बनाई. वह एक ग्रेट स्पीकर और टैलन्टिड एक्ट्रेस होने के बाद भी इंडस्ट्री ने ग्रुप बनाकर उन्हे बाहर निकाला, वह एक मजबूत महिला है, यही वजह है कि उन्होंने अपनी पहचान बनाकर आज भी अच्छा काम कर रही है.

कोई भी महिला किसी को इंस्पायर करने के लिए रास्ता नहीं चुनती, इसके लिए न तो कोई कोर्स करना पड़ता है, ये खुदबखुद होता है, जिंदगी के रास्ते में परिस्थितियां ऐसी आती है कि आपको उसमें सही रिएक्ट कर आगे बढ़ना पड़ता है, ऐसे में उनकी इस काबिलियत को लोग सराहने लगते है, क्योंकि अंत में वह अपनी मकसद में कामयाब हो जाती है. ये सारी चीजें अचानक जीवन में होती चली जाती है. कई बार लोग आपको आगे बढ़ने नहीं देते, आपत्ति जताते है, ऐसे में उस महिला को अधिक मजबूती से टिके रहना पड़ता है, जो बहुत कठिन होता है. बहुत कम ऐसी स्ट्रौंग हे महिलाएं होती हैं, जो किसी भी परिस्थिति में अपने उद्देश्यों तक पहुंच कर दम लेती है.

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