दुनिया की अजीबोगरीब इमारतें

दुनिया हर पल अपने रंग बदलती है. बदलते समय के साथ इंसानों ने अपने आराम और सुविधा के लिए कई चीजों का आविष्कार किया है. न तो आविष्कारों की कोई सीमा है और न ही क्रिएटीविटी की. क्रिएटीविटी का न तो कोई ओर है और न ही कोई छोर. बच्चों की चित्रकारी से लेकर आर्किटेक्ट द्वारा बनाई गई बड़ी बड़ी इमारतें, इन सबमें क्रिएटीविटी है, जरूरत है तो बस नजरिए की. इस दुनिया को कई आर्किटेक्ट ने अपने दिमाग की ऊल-जलूल कल्पनाओं से सजाया है. गौरतलब है कि यही ऊल-जलूल कल्पनाएं कि यह बहुत खूबसूरत संरचनाओं के रूप में मौजूद हैं. इनमें से कई रचनाएं ऐसी हैं जो कुछ लोगों के समझ के परे हैं.

आज हम आपको कुछ ऐसे ही क्रिएटीव बिल्डिंग के बारे में बताएंगे

1. नेशनल सेंटर फॉर द पर्फोर्मिंग आर्ट्स (एनसीपीए), चीन

एनसीपीए बीजिंग का ओपरा हाउस है और इसे बनाने में पूरे 6 साल लगे. एक आर्टिफीशियल तलाब के ऊपर बनी यह बिल्डिंग एक बड़े से अंडे जैसी है. इस इमारत को टाइटेनियम और ग्लास से बनाया गया है.

2. क्यूबिक हाउस, रौट्टरडैम, नेडरलैंड

क्यूबिक हाउस, क्यूब शेप के घर हैं जिन्हें अलग अलग ऐंगल पर बैठाया गया है. इन क्यूब्स को किसी पेड़ की तरह बनाया गया है और सारे घर एक साथ किसी जंगल के जैसे दिखते हैं. क्यूबिक हाउस को पीट ब्लोम ने डिजाइन किया था.

3. द क्रूक्ड हाउस, पोलैंड

द क्रूक्ड हाउस एक अजब डिजाइन वाली बिल्डिंग है. पोलैंड के सोपोट में स्थित इस बिल्डिंग की बनावट आम बिल्डिंग से काफी अलग है. दूर से देखने में यह किसी कार्टून फिल्म से प्रेरित लगती है. इस टेढ़े-मेढ़े बिल्डिंग को देखकर दिमाग में यह सवाल जरूर आता है कि आखिर बनाने वाले ने इसे बनाया कैसे?

4. डांसिंग हाउस, चेक रिपब्लिक

प्राग की इस बिल्डिंग को फ्रेड ऐंड जिंजर भी कहा जाता है. इस बिल्डिंग के रोमांटिक चार्म से कोई नहीं बच सकता. इस इमारत को देखकर ऐसा लगता है मानो दो इमारतें एक दूसरे को गले लगा रही हों. इस इमारत को व्लाडो मिलुनिक ने फ्रैंक गेहरी के साथ डिजाइन किया था. यह इमारत प्राग की पहचान है.

5. हैबिटाट 67, मोन्ट्रीयाल, कनाडा

यह मोन्ट्रीयाल का एक हाउसिंग कोम्प्लैक्स है. यह मोन्ट्रीयाल और कनाडा की पहचान है. इस कौम्प्लैक्स का आकार बच्चों के खेलने के क्यूब जैसा है. यह देखने में बिल्कुल असली नहीं लगती और यह यकीन करना मुश्किल है कि इस कोम्पलैक्स में लोग आराम से रहते हैं.

6. फौरेस्ट स्पाइरल, जर्मनी

यह जर्मनी का एक रेसिडेंशियल कौम्पलैक्स है. इस बिल्डिंग की छत हरियाली से ढकी है और यह स्पाइरल शेप की इमारत है. पूरी इमारत की शक्ल किसी जंगल जैसी है. कौन्क्रीट के जंगलों के बीच में एक जंगल जैसी इमारत तो होनी ही चाहिए.

7. द बास्केट बिल्डिंग, ओहायो

आपने मॉल में शॉपिंग करते हुए शॉपिंग बास्केट तो देखे ही होंगे, पर क्या आपने शॉपिंग बास्केट जैसी बिल्डिंग देखी है? अमेरिका के ओहायो स्टेट में दुनिया का सबसे बड़ा बास्केट मौजूद है. यह बास्केट जैसी बिल्डिंग असल में लौंगाबर्गर का हेडक्वार्टर है. डेव लौंगाबर्गर ने इस कंपनी की स्थापना की थी. यह कंपनी शॉपिंग और पिकनिक बास्केट बनाती है.

दुनिया में ऐसे कई अजूबे हैं, जिससे दुनिया तमाम परेशानियों के बावजूद बहुत खूबसूरत लगती है. इस जिन्दगी में एक दफा तो इनमें से किसी एक का दीदार करना जरूरी है.

“किसी भी किरदार को कैरीकेचर के रूप में पेश नहीं करूंगा”

अमित साध ने अपने करियर की शुरूआत छोटे परदे पर अभिनय करते हुए की थी. पर बाद में वह फिल्मों से जुड़ गए. लगभग 14 साल के उनके करियर पर यदि गौर किया जाए, तो एक बात उभर कर आती है कि उन्हें जिस मुकाम पर पहुंचना था, उस मुकाम तक वह नहीं पहुंच पाए. उन्होंने कई सफल फिल्में की, मगर उन फिल्मों का श्रेय दूसरे कलाकार बटोर ले गए. फिलहाल वह फिल्म ‘रनिंग शादी’ को लेकर चर्चा में हैं.

आपने काई पो चे, सुल्तान सहित कई बेहतरीन फिल्मों में अभिनय किया. इसके बावजूद आपके करियर में जो होना चाहिए था, जिस मुकाम पर आपको होना चाहिए था, वहां तक आप नहीं पहुंच पाए?

सबका अपना वक्त होता है. हर इंसान की जो यात्रा है और जो उसकी निर्धारित गति है, वह आपके हाथ में नहीं होती है. आपके हाथ में आपका अपना जज्बा है. आपकी शिद्दत, आपकी नियति है. फिल्म ‘काई पो चे’ के बाद मेरी कई फिल्में बनीं, पर लंबे समय तक वह प्रदर्शित नहीं हुई. मेरे हाथ में सिर्फ मैं ही था. तो मैंने अपने आपको खींच कर रखा, समेट कर रखा. मैंने अपने आपको बिखरने नहीं दिया. 2014 में मेरी कोई फिल्म प्रदर्शित नहीं हुई. 2015 में मेरी फिल्म ‘गुड्डू रंगीला’ आयी, जिसे बॉक्स ऑफिस पर सफलता नहीं मिली. यह भी मेरे हाथ में नहीं था. 2016 में सलमान खान के साथ मेरी फिल्म ‘सुल्तान’ आयी, जिसे पूरी दुनिया ने देखा. पर यह भी मेरे हाथ में नहीं था.

तो जो कुछ आपके अपने हाथ में नहीं है, उसके लिए सोच कर परेशान होना या अपनी चिंताएं बढ़ाना, अपने स्वास्थ्य को खराब करना, क्या मायने रखता है? अब 2017 में मेरी एक नहीं चार फिल्में रिलीज होने वाली हैं. इस वक्त आपने मुझे अमिताभ बच्चन के पिता हरिवंश राय बच्चन की वह लाइन गुनगुनाने के लिए प्रेरित कर दिया, जिसे आमिताभ बच्चन हमेशा गुनगुनाते हैं, ‘‘मन का हो तो अच्छा, मन का ना हो, तो ज्यादा अच्छा’’ मैंने इस पंक्ति पर सिद्धि प्राप्त कर ली है.हर दिन सुबह उठकर उपर वाले से यही प्राथना करता हूं. मैं उनसे कभी कुछ नहीं मांगता हूं. हर दिन सुबह उठकर धन्यवाद अदा करता हूं.

लेकिन आप भी एक इंसान हैं. काई पो चे सहित आपकी कुछ फिल्में रही हैं, जिनके लिए आपने काफी मेहनत की होगी. काफी उम्मीदें लगायी होंगी. फिल्म की रिलीज के बाद क्रेडिट किसी और को मिल गया. तब तो तकलीफ हुई होगी?

मैं लक्की हूं कि मैं बहुत ही ज्यादा इग्नोरेट हूं,एरोगेंट नहीं. मुझे इन सारी चीजों की कोई समझ नही है.बहुत नादान हूं इन सारी चीजों में. सच कह रहा हूं.‘कई पो चे’करने के बाद मैं स्कैटिंग करने के लिए बाहर चला गया था. मैं तो अपना बैग पैक कर कम बजट में दुनिया घूमने निकल जाता हूं. मैं सोचता हूं कि मैंने अभिनय कर लिया है, अब इसे दुनिया देखते हुए इंज्वॉय करेगी. तब तक मैं दुनिया घूमते हुए इंज्वॉय कर लेता हूं. किताबें बहुत पढ़ता हूं. मेरी सोच दूसरे कलाकारों से थोड़ी सी विपरीत है.  जिसका मुझे फल मिल रहा है. आपने मुझे जितने भी बडे़ बड़े किरदार देखे होंगे, तो उसमें मेरी मेहनत नजर आएगी. यह मेरी किस्मत है. मेरी तकदीर है. तमाम लोग मुझसे कहते हैं कि तू कभी निराश नहीं होता. मैं हमेशा कहता हूं कि मैं नकारात्मक बात नहीं सोचता. सिर्फ सकारात्मक बातें सोचता हूं. मेरा दिमाग छोटे बड़े की बात ग्रहण ही नहीं करता है. इसकी मूल वजह यह है कि मैं जहां से आया हूं, वहां का मैं खुद को हीरो मानता हूं. मैं जहां से आया हूं.वहां से तो मैं उपर ही जा रहा हूं, उससे नीचे तो जा ही नही पाउंगा. मैं लक्की हूं कि मेरी सोच ऐसी है. अन्यथा शायद मैं भी परेशान हो जाता. मैं हमेशा मन की बात बोलता हूं. सच्चा इंसान हूं. सही गलत की सोच में नहीं पड़ता. यदि मैं सच्चा इंसान नहीं होता, तो बॉलीवुड में जिस तरह का संघर्ष है, उस संघर्ष में मैं टूट जाता.

17 फरवरी को प्रदर्शित हो रही आपकी फिल्म रनिंग शादी का नाम तो पहले रनिंग शादी डॉट काम था?

जी हां! जब यह फिल्म बनी थी, तब हालात अलग थे. अब एक वेबसाइट ‘शादी डॉट काम’ मौजूद है, उसे तकलीफ न हो, इसलिए निर्माताआओं ने फिल्म का नाम ‘रनिंग शादी’ कर दिया. हमारे लिए तो खुशी की बात है कि दो साल के बाद यह फिल्म सिनेमाघरों में पहुंच रही है. पर यह फिल्म एक वेबसाइट के बनने और उसके साथ जुड़े दो लोगो की प्रेम कहानी है. 

फिल्म‘‘रनिंग शादी’’पर विस्तार से रोशनी डालेंगे?

यह एक छोटे शहर की कहानी है. पटना का एक लड़का राम भरोसे है, जो कि पंजाब जाता है. और वहां एक लहंगे की दुकान में गोटा लगाने का काम करता है. वह देखता है कि पंजाब में शादी को लेकर विवाद है. वह अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक वेबसाइट इस सोच के साथ बनाता है कि जो लोग अपने घरों से भागकर शादी करना चाहते हैं, उनकी मदद की जाए. वह इतना भोला और ईमानदार है. मेरे लिए चुनौती थी. इससे पहले मैंने ‘काई पो चे’ में गुजराती किरदार निभाया. ‘सुल्तान’ में हरियाणवी किरदार निभाया. अब ‘रनिंग शादी डॉट कॉम’ में मुझे बिहारी किरदार निभाना था. मैं जब कलाकार बना तो मैंने सोचा था कि मैं जिस राज्य के किरदार को निभाउंगा, उसके साथ पूरा न्याय करूंगा. मैं किसी भी किरदार को कैरीकेचर के रूप में पेश नहीं करुंगा. मैं हर राज्य के इंसानों को पूरी इज्जत दूंगा. बिहारी है, तो हर इंसान लालू प्रसाद यादव की तरह बात नहीं करता. मेरे जितने पढ़े लिखे दोस्त हैं, सब बिहारी हैं. कोई आएएस, आई एफ एस या आई पीएस है. सब बुद्धिमान, भावुक हैं. इस किरदार के लिए वर्कशॉप करने की जरुरत नहीं पड़ी. इस किरदार को निभाते समय मैंने यह समझा कि बिहारीपना क्या होता है. बिहारीपन यानी कि बिहारी भाषा नहीं, बल्कि एक एटीट्यूड होता है. उस एटीट्यूड को पकड़ा है. इसलिए इस फिल्म को देखकर बिहारी लोग खुश होंगे. सभी कहेगें कि इस कलाकार ने उन्हें इज्जत दिलायी है. उनका दृढ़ संकल्प काफी मजबूत होता है. साथ में बिन्नी और भरोसे की प्रेम कहानी है.जीवन की सरलता की बात है. साथ में मस्ती मजाक है.

आप बीच में एक्टिंग वर्कशॉप करने भी तो गए थे?

जी हां! फिल्म ‘काई पो चे’ की शूटिंग खत्म करने के बाद मैं न्यूयॉर्क में रॉबर्ट एग्नमेंट के पास एक्टिंग का वर्कशॉप करने चला गया था.तीन माह का वर्कशॉप किया.मेरा मानना है कि एक कलाकार को हमेशा वर्कशॉप की जरूरत होती है. जिन कलाकारों को लगता है कि उन्हें वर्कशॉप कि जरूरत नहीं है, उनकी सोच गलत है. अमरीका व हॉलीवुड का बडे़ से बड़ा कलाकार भी वर्कशॉप करता रहता है. हमारे देश में आमिर खान भी हर फिल्म से पहले वर्कशॉप करते हैं. वह विशाल भारद्वाज सहित कई लोगों को अपने साथ लेकर चलते हैं. हर कलाकार को समय समय पर ट्रेनिंग की जरूरत होती है.

तो मैं भी निरंतर प्रगति कर रहा था, आगे बढ़ रहा था, मगर लोगों ने देखा कि अमित साध तो सेकंड हैंड कार चला रहा है, इसका मतलब इसके करियर में कोई प्रगति नही हुई. अब मैं लोगों की इस तरह की सोच को बदल तो नहीं सकता.

क्या पढ़ना पसंद है?

मैं इन दिनों न्यूरो लैंग्वैस्टिक प्रोग्राम से बहुत प्रभावित हूं. इंसान की सोच, उसकी बॉडी लैंगवेज, उसका कॉन्शियसनेस से आकर्शित भी हो रहा हूं, प्रभावित भी हो रहा हूं. मैं इस तरह की चीजें पढ़ रहा हूं, तो मुझे समझ आ रहा है कि किस तरह आप अपने अंदर अच्छी आदतें डाल कर अपनी सोच, अपने डीएनए को बदल सकते हैं. मैंने हाल ही में एक किताब पढ़ी है जिसका नाम है- ‘डिसअपियरेंस ऑफ युनिवर्सल’. इस किताब का सबसे बड़ा संदेश यह है कि इंसान का सबसे बड़ा काम है खुद को और दूसरों को माफ करना. बहुत मोटी किताब है और हर पांच पन्ने के बाद किताब में यही संदेश उभरता है. इस किताब के लेखक हैं गैरी रेनॉल्ड. देखिए,पढ़ने का शौक सबको होना चाहिए, किताबें हमेशा इंसान को प्रभावित करती हैं.

आप लिखते क्या हैं?

यही कमजोरी है. मैं लिखने के बारे में बात नहीं करता. पर लिख रहा हूं. बहुत खतरनाक चीजें लिख रहा हूं. एक किताब लिख रहा हूं. मैं जन्मजात लेखक नहीं हूं. इसलिए लेखन में भी संघर्ष कर रहा हूं. इस किताब को लेकर मेरे ख्याल काफी अच्छे हैं. मेरी किताब का नाम है, नो बडी कैन चेंज.

मेरी राय में जो इंसान खुद का मजाक नहीं उड़ा सकता, जो इंसान ह्यूमरस नहीं है, वह विकलांग है, अपाहिज है.

निर्देशक के तौर पर अमित रॉय की यह पहली फिल्म है?

उनमें सच्चाई है. वह ‘सरकार’ व ‘सरकार राज’ सहित कई फिल्में कैमरामैन के तौर पर कर चुके हैं. वह अमैजिंग इंसान है. पहली मुलाकात में ही मुझे उनसे प्यार हो गया. जब उन्होंने मुझे यह फिल्म आफर की, उस वक्त तक मैं गंभीर फिल्म ‘काई पो चे’ कर चुका था, तो कुछ हल्का फुल्का ह्यूमर करना भी चाहता था. मैंने सोचा कि इस फिल्म से मुझे अपने अंदर के कलाकार का एक अलग पक्ष दिखाने का अवसर मिलेगा.

आप जो यात्राएं करते हैं, वह किसी किरदार को निभाने में मददगार साबित होती है?

बहुत ज्यादा. यात्रा के दौरान हम बहुत कुछ ऑब्जर्व करते हैं. अभिनय तो आब्जर्वेशन ही है. दूसरों की भावनाओं को समझना ही अभिनय है. सुनना बहुत जरुरी है. यात्राएं करते समय यह सब मुझे सीखने को मिलता है. दूसरों की जिंदगी जानने का मौका मिलता है.

करीना फिर दिखाएंगी साइज जीरो का टशन

तैमूर अली खान को जन्म देने के बाद करीना कपूर खान एक बार फिर अपनी पुरानी फॉर्म में आने को बेकरार हैं. बेबो की नजर उस साइजजजीरो फिगर पर है, जिसकी टशन ने एक जमाने में सनसनी मचा दी थी. हालांकि अब ये मंजिल उनके लिए आसान नहीं होगी.

सेलेब्रिटी डाइटीशियन रुजुता दिवेकर के साथ फेसबुक लाइव चैट में करीना ने प्रिग्नेंसी के दौरान अपनी फिजिक को लेकर जहन में चल रही उथल-पुथल के बारे में खुलकर बात की.

करीना ने कहा- ”नौ महीनों में सब कुछ बदल गया है और वापस शेप में आने में वक़्त लगता है. मुझे याद है मैं रुजुता से टशन डाइट पर जाने के लिए कहती थी और उन्होंने मुझसे कहा था कि हम एकदम इसे नहीं कर सकते. हमें ये धीरे-धीरे करना होगा.”

दरअसल, करीना यहां साइज जीरो फिगर की बात कर रही थीं, जो उन्होंने टशन के दौरान हासिल की थी. तैमूर के जन्म के बाद बेबो एक बार फिर काम शुरू कर रही रही हैं. लैक्मे फ़ैशन शो में भी वो रैंप वॉक करती नज़र आ चुकी हैं. तैमूर की डिलीवरी के बाद करीना के वेट को लेकर कई तरह की बातें की जा रही थीं, जैसा कि एक्ट्रेसेज के साथ अक्सर होता है. उन्हें ओवरवेट भी कहा जा रहा था.

इस बारे में करीना ने कहा- ”कोई मुझे ओवरवेट कैसे कह सकता है? हम पर हमेशा नज़रें रहती हैं. लोगों को मुझे हर फेज़ में स्वीकार करते रहना चाहिए.”

सोलर सिस्टम : ऊर्जा का नया भविष्य

यकीनन सोलर ऊर्जा यानी धूप से मिलने वाली ऊर्जा भविष्य की जरूरत है. सोलर ऊर्जा से चलने वाली मशीनों को ले कर नएनए प्रयोग हो रहे हैं. सोलर के साथ सब से खास बात यह है कि इस से ध्वनि प्रदूषण, बिजली बिल और पावर कट की खामियों से बचा जा सकता है. बिजली की कटौती, बिजली की बढ़ती कीमत, लो वोल्टेज की समस्या और जनरेटर के महंगे इस्तेमाल से सोलर ऊर्जा की मांग बढ़ती जा रही है. घरेलू सोलर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और प्रदेश सरकार ने 40 फीसदी छूट देने का काम भी शुरू किया है, जिस की वजह से सोलर वाटर पंप सिस्टम, सोलर पावर प्लांट, सोलर रूफटौफ इनवर्टर, सोलर वाटर हीटर की मांग बढ़ती जा रही है. किसानों के लिए सोलर सब्सिडी योजना सरकार चला रही है, जिस की वजह से किसानों को 75 फीसदी अनुदान मिल जाता है. किसानों के अलावा दूसरे लोगों के लिए भी सोलर सिस्टम लगाना सरल होता जा रहा है. जिस तरह से केंद्र और प्रदेश सरकारें सोलर सिस्टम को बढ़ावा दे रही हैं, उस के चलते बैंक भी अब सोलर सिस्टम को बढ़ावा दे रहे हैं.

पूरे देश में मिलने वाला वातावरण ऐसा होता है, जिस में सूर्य की किरणें खूब मिलती हैं. सूर्य की इन किरणों का सोलर ऊर्जा के क्षेत्र में बहुत अच्छा इस्तेमाल किया जा सकता है. धीरेधीरे सोलर ऊर्जा का इस्तेमाल पूरे देश में होने लगा है. अब इस का इस्तेमाल फैक्टरियों में भी होने लगा है. सोलर पावर प्लांट के इस्तेमाल से बिजली बनाने का काम तेजी से होने लगा है, जिस से बिजली के इस्तेमाल की दूसरी चीजों को चलाया जा सकता है. यह बिजली की जगह इस्तेमाल होने लगा है. नई पीढ़ी के लिए सोलर ऊर्जा का नया रास्ता बनता जा रहा है. इस से बिजली की महंगी दरों से ही नहीं उस पर निर्भर रहने से भी बचा जा सकता है. आज के समय में सोलर ऊर्जा के इस्तेमाल से कई चीजों को चलाया जा रहा है.

मोबाइल सिंचाई सोलर पैनल सिस्टम

बस्ती जिले के खड़का देवरी गांव के रहने वाले किसान आज्ञाराम वर्मा ने मोबाइल सोलर सिस्टम बना लिया है. सरकार द्वारा आज्ञाराम वर्मा को सिंचाई के लिए सोलर सिस्टम दिया गया था. आज्ञाराम वर्मा के पास अलगअलग जमीनें थीं. ऐसे में एक ही खेत में सोलर पैनल लगाने से काम नहीं चल रहा था. आज्ञाराम वर्मा ने इस के लिए अलग जुगाड़ तकनीक का सहारा लिया. उन्होंने सोलर पैनल को एक ट्राली पर फिट कर दिया. इस के बाद जिस खेत में सिंचाई की जरूरत होती थी, आज्ञाराम ट्रैक्टर के जरीए उसे खींच कर वहां ले जाते थे. पंपसेट के साथ जोड़ देने से एक ही सोलर पंप से कई खेतों की सिंचाई होने लगी. आज्ञाराम वर्मा प्रगतिशील किसान हैं. उन को राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया. आज्ञाराम वर्मा कहते हैं, ‘मोबाइल सोलर पैनल के बनने से एक ही सोलर पैनल से कई पंपसेटों से पानी लिया जा सकता है.’

सोलर पावर प्लांट

उन क्षेत्रों में इस से बहुत लाभ होता है, जहां पर बिजली की आवाजाही बड़ी समस्या के रूप में सामने होती है. सोलर पावर प्लांट में सोलर ऊर्जा को बिजली की तरह इस्तेमाल किया जाता है. सोलर ऊर्जा बैटरी में जमा हो जाती है. इस के बाद उस का इस्तेमाल कभी भी किया जा सकता है. सोलर से मिलने वाली एनर्जी में खर्च कम होता है. इस से बिजली से चलने वाले हर यंत्र को चलाया जा सकता है. सोलर पावर प्लांट 1 किलोवाट से ले कर 10 किलोवाट तक का हो सकता है. जितनी बिजली की जरूरत हो उतने किलोवाट का इस्तेमाल किया जा सकता है.

सोलर रूफटाप इनवर्टर

इस के द्वारा अपने घर की छत पर ही सोलर पैनल लगा कर घर के इनवर्टर का इस्तेमाल किया जा सकता है. इस से बिजली की खपत कम हो जाती है. सोलर पावर से बैटरी की बैकअप पावर बढ़ जाती है. अब कई सोलर लाइट सिस्टम भी आने लगे हैं, जिन में सोलर पैनल लगे होते हैं, जिस से रात को रोशनी मिलती है. अब सोलर पैनल की कीमत और रखरखाव सरल होने से इस की खपत बढ़ रही है. लाइट के लिए 500 रुपए की कीमत से ले कर ज्यादा कीमत के उपकरण आने लगे हैं. इन को दिन में सूर्य की रोशनी से चार्ज किया जाता है और रात में ये रोशनी देने का काम करते हैं. इन में लगने वाली बैटरी बिजली में लगने वाली बैटरी के मुकाबले ज्यादा चलती है, इसलिए भी इन का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है. आटोमैटिक सोलर स्ट्रीट लाइट सिस्टम में सूर्य की रोशनी खत्म होते ही स्ट्रीट लाइट जल जाती है. इस का इस्तेमाल घर, दुकान और खेत वगैरह कहीं भी हो सकता है.

सोलर वाटर हीटर

जाड़ों में गरम पानी के लिए अब बिजली या एलपीजी गैस से ज्यादा सस्ता सोलर वाटर हीटर आने लगा है. इस में हीटर को सोलर ऊर्जा से चलाया जाता है, जिस से पानी गरम मिलता है. होटलों, घरों व कारखानों में इस का इस्तेमाल बढ़ने लगा है. यह पानी को गरम करने का सब से सस्ता साधन हो गया है. जाड़ों में गरम पानी की जरूरत हर जगह पड़ती है. कपड़े व बरतन धोने के साथ ही साथ गरम पानी से नहाने के लिए भी इस का इस्तेमाल किया जाता है. सोलर ऊर्जा सिस्टम को लगाने के लिए एक बार पैसा लगाना पड़ता है, इस के बाद सालोंसाल मुफ्त में बिजली मिलती है. अब सरकार इसे बढ़ावा देने के लिए तमाम तरह की योजनाएं चला रही है. केवल खेती के लिए ही नहीं, जीवन के दूसरे कामों के लिए भी सोलर ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ रहा है. बैंकों के द्वारा सोलर सिस्टम को लगवाने के लिए तमाम तरह की योजनाओं के जरीए लोन भी दिए जा रहे हैं.

सरकार जल्द ही इस सोलर पैनल के जरीए बिजली पैदा कर के उसे कुछ घरों तक पहुंचा कर पैसा कमाने की योजना भी तैयार कर रही है. दरअसल सोलर ऊर्जा आने वाले दिनों की जरूरत है. यह सब से सस्ती मिलने वाली ऊर्जा है. जरूरत इस बात की है कि सोलर सिस्टम को सस्ता किया जाए, जिस से यह गरीब लोगों तक पहुंच सके. पूरी दुनिया के देश सोलर एनर्जी पर काम कर रहे हैं. भारत में भी तेजी से में यह काम होने लगा है. खेतीकिसानी से ले कर दूसरे जरूरी काम इस के जरीए होने लगे हैं. यह केवल रोशनी की दिशा में ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिहाज से भी बहुत फायदेमंद है. इसे लगातार बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है. बिजली के बेहतर जरीए के रूप में सौर ऊर्जा का इस्तेमाल किया जा रहा है. दिनोंदिन इस का इस्तेमाल और इस से मिलने वाली राहत बढ़ती जा रही है.

जब दिखना हो हर दम जवां

बढ़ती उम्र के साथ चेहरे पर झुर्रिया पड़ने लगती हैं. तब महिलाएं जवां दिखने की चाहत में बहुत मेहनत करती हैं और तरह तरह की तरकीबों का प्रयोग करती हैं. इसी सूची में शामिल है ग्रीन जूस. हां ये बात तो सच है कि ग्रीन जूस पीने से चेहरे पर चमक आती हैं और जवां लुक मिलता है पर जवां दिखने के लिए सिर्फ ये उपाय ही काफी नहीं होंगे. आज हम आपको कुछ और भी तरकीब बताऐंगे जिन्हें अपनाने से आपकी त्वचा हमेशा दमकती रहेगी और हर दम जवां दिखेंगे..

जवां दिखने के लिए आपकी त्वचा को नमी की जरुरत होती है, इसीलिए पानी खूब पीना चाहिए. इससे नमी बरकरार रहेगी और शरीर से हानिकारक तत्व भी निकल जाते हैं.

मॉइश्चराइजर के इस्तेमाल से भी झुर्रियां दूर होती हैं. ये आपकी त्वचा को नमी और पोषण प्रदान करता है. पोषित त्वचा लंबे समय तक जवां रहती है. 

रोजाना ग्रीन जूस पीने से खून साफ होता है और चेहरे पर चमक आती है. इसके अलावा आपको अपनी दिनचर्या में क्लीजिंग और टोनिंग को भी शामिल करना चाहिए.

आपके जीवन में बढ़ती उम्र के असर को रोकने के लिए आपको, अपनी जीवनशैली से जुड़ी हर बात पर ध्यान देना चाहिए. हमेशा व्यायाम करते रहना चाहिए और एक संतुलित आहार लेना चाहिए. हमेशा खुश रहने की कोशिश करें.

सामान्यत: 30 की उम्र के बाद ही झुर्रियां पड़ना शुरु होती हैं, लेकिन सही देखभाल न होने  और सही जीवनशैली के अभाव में आप एक तनावपूर्ण जीवन जीने लगती हैं और इससे झुर्रियां कम उम्र में भी नजर आ सकती हैं, इसलिए अपने स्वास्थ्य पर खासा ध्यान दें.

कुछ लोग एंटी एजिंग को जीन से भी जोड़ने लगते हैं, लेकिन सच ये है कि आपके आसपास का जलवायु, प्रदूषण, तनाव, आपकी त्वचा की प्रकृति और आपकी जीवनशैली आदि आपकी त्वता पर असर डालती हैं. मुस्कुराना और अपनी भौं को चढ़ाना चेहरे के लिए एक प्रकार का व्यायाम है. ऐसा करने से झुर्रियां नहीं पड़तीं.

इसके अलावा धूम्रपान करने से, त्वचा में नमी की कमी होने लगती है और आपको तनाव भी हो सकता है. इन सभी कारणों से झुर्रियां पड़ती हैं. ये बात आपको समझ लेनी चाहिए कि आपकी पूरी दिनचर्या और जीवनशैली का आपके शरीर व त्वचा पर बहुत असर पड़ता है.

स्कैटिंग : रिस्क और रोमांच का मजा

दुनिया में ऐडवैंचर प्रेमियों की कमी नहीं है. कभी वे पर्वत की ऊंचाइयों को छूने की कोशिश करते हैं तो कभी लहरों के बीच जा कर भीगने का आनंद उठाते हैं. कभी बाइक पर खतरनाक स्टंट कर के देखने वालों का दिल दहला देते हैं. दरअसल, ऐडवैंचर का शौक ही ऐसा है.

इन्हीं ऐडवैंचर्स खेलों में स्कैटिंग भी काफी पौपुलर है, जिसे आप स्कूलकालेज के ग्राउंड से ले कर बर्फ पर भी कर सकते हैं. बस, आप को जरूरत है अपने कदमों को बैलेंस बनाते हुए हवा को चीरते हुए आगे बढ़ कर स्कैटिंग का लुत्फ उठाने की. इस में पांवों के दबाव से गति और घुमाव देखते ही बनता है.

स्कैट्स के आविष्कार का श्रेय

1760 में पहला रोलर स्कैट बनाने का श्रेय जौन जोसफ मर्लिन को जाता है, जिन के दिमाग में एक आइडिया आया कि क्यों न छोटे धातु के पहिए लगा कर स्कैट्स तैयार किए जाएं. उन का यह विचार सफल भी हुआ, लेकिन शुरुआती चरण में कुछ कमियां रहीं, जिन्हें बाद में सुधार कर बेहतरीन स्कैट्स तैयार किए गए. आज जो इनलाइन स्कैट्स से मिलतेजुलते हैं. अभी तक इनलाइन स्कैट्स का ही चलन था, लेकिन 1863 में क्वाड स्कैट्स आए, जो विकसित डिजाइन था. इस में हर पैर के लिए 2 आगे और 2 पीछे पहिए होते थे. इस स्कैट से टर्न लेने और तेजी से आगे बढ़ कर खुद को कंट्रोल करने में आसानी होती थी. इसे बनाने का श्रेय न्यूयौर्क के जेम्स लेनौर्ड प्लिंपटन को जाता है.

1990-93 में सेफ्टी के उद्देश्य से रोलर ब्लेड आधारित ब्रैंडेड स्कैट्स लौंच किए गए, जिन्हें काफी पसंद किया गया और इन की बढ़ती प्रसिद्धि को देखते हुए दूसरी कंपनियों ने भी इन से मिलतेजुलते स्कैट्स बना कर प्रतिस्पर्धा को और बढ़ाया.

आज तो ऐडवांस स्कैट्स दुनिया के सामने हैं, जिन्हें प्रयोग में ला कर स्कैट्स प्रेमी स्कैटिंग का लुत्फ उठाते हैं.

स्कैटिंग की श्रेणियां

रोलर स्कैटिंग

रोलर स्कैटिंग ऐसी स्कैटिंग है, जिस का मजा आप घर और बाहर दोनों जगह उठा सकते हैं. इस में आप किसी भी समतल सतह पर रोलर स्कैट्स की मदद से आनंद उठा सकते हैं. इस तरह के स्कैट्स में 2 पहिए आगे और 2 पीछे लगे होते हैं.

इनलाइन स्कैटिंग

इनलाइन स्कैटिंग में स्कैटर बहुत ही हलके बूट्स, जिन के नीचे 3 से 5 पहिए एक ही लाइन में अटैच होते हैं, पहन कर स्कैटिंग करते हैं. इन्हें बनाने का श्रेय अमेरिका के स्कौट ओल्सेन को जाता है. इन स्कैट्स में धातु के ब्रेक, यूरेथेन व्हील्स और हील ब्रेक लगे होते हैं. इन की मदद से स्कैटर को बैलेंस बनाने में आसानी होती है साथ ही जब उन्हें रोकना होता है, तो हील बे्रक का यूज करते हैं, जिस में रबड़ पैड स्कैट्स के पीछे अटैच होता है, जिस से चोट लगने का डर नहीं रहता.

आइस स्कैटिंग

आइस स्कैटिंग के खेल में जो स्कैटर्स होते हैं वे खास तरह के स्कैट्स पहन कर बर्फ पर इस खेल का आनंद उठाते हैं. यह खेल ज्यादातर उन देशों में खेला जाता है जहां ज्यादा ठंड पड़ती है

.बर्फ पर स्कैटिंग किस तरह की

–       आइस स्कैटिंग में आइस स्कैट्स की मदद से बर्फ पर स्कैटिंग की जाती है.

–       फिगर स्कैटिंग में अलग या आइस पर स्कैटिंग की जाती है. इसे 1908 में पहली बार ओलिंपिक में विंटर स्पोर्ट्स में शामिल किया गया.

–       स्पीड स्कैटिंग में कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच प्रतियोगी एकदूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते हैं.

–       टूर स्कैटिंग में बर्फ पर स्कैट्स की सहायता से लंबी सैर का लुत्फ उठाया जाता है.

ठोस सतह पर स्कैटिंग किसकिस तरह की

–       रोलर और इनलाइन स्कैटिंग में समतल जगह पर घूमने का आनंद उठाया जाता है.

–       वर्ट स्कैटिंग में वर्ट रैंप पर राइड का लुत्फ उठाया जाता है.

–       जिस तरह हम सड़क पर साइकिल चला कर खुद को रोमांच प्रदान करते हैं, ठीक उसी तरह रोड स्कैटिंग में सड़क पर स्कैटिंग करते हैं.

–       स्कैट बोर्ड को प्रयोग कर के भी स्कैटिंग के मजे को कई गुना बढ़ाया जाता है.

–       आर्टिस्टिक रोलर स्कैटिंग भी फिगर स्कैटिंग से मिलताजुलता खेल ही है, लेकिन इस में भाग लेने वाले आइस स्कैट्स की जगह रोलर स्कैट्स पर दौड़ते हैं.

स्कैटिंग चैंपियनशिप

–       ‘द फ्रैंच फिगर स्कैटिंग चैंपियनशिप’ फ्रांस में प्रतिवर्ष आयोजित की जाती है, जिस का उद्देश्य प्रतियोगिता के माध्यम से देश के बैस्ट स्कैटर्स की पहचान कर के उन्हें आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना है. इस में मैडल बैस्ट महिला व बैस्ट पुरुष स्कैटर के साथ पियर स्कैटिंग व आइस डांसिंग में बैस्ट प्रदर्शन करने वालों को दिया जाता है.

–       ‘द स्विस फिगर स्कैटिंग चैंपियनशिप’ जो स्विट्जरलैंड में आयोजित की जाती है, में विजेताओं को ताज पहना कर सम्मानित किया जाता है.

–       2016 में दक्षिण कोरिया के सियोल में वर्ल्ड शौर्ट ट्रैक स्पीड स्कैटिंग चैंपियनशिप का आयोजन हुआ, जिसे काफी पसंद किया गया.

इसी तरह देशदुनिया में स्कैटिंग प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है.

स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद

खुद को स्वस्थ रखने के लिए हमें नियमित ऐक्सरसाइज करना जरूरी होता है. वैसे तो यह आप पर निर्भर करता है कि आप खुद को स्वस्थ रखने के लिए जौगिंग, ब्रिस्क वौक, स्किपिंग वगैरा में से क्या करना पसंद करते हैं लेकिन चाहें तो रोलर स्कैटिंग से बहुत कम समय में ज्यादा कैलोरी बर्न कर सकते हैं. जैसे अगर एक सामान्य पुरुष का वजन 190 पाउंड के बराबर है, तो वह रोलर स्कैटिंग से हर मिनट में 10 कैलोरीज बर्न करता है जबकि 163 पाउंड वजन वाली महिला हर मिनट में 9 कैलोरीज बर्न करती है. साथ ही इस से हड्डियों को भी मजबूती मिलती है.

अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के एक शोध के अनुसार रोलर स्कैटिंग से हार्ट को भी मजबूती प्रदान होती है यानी इस से फायदे अनेक हैं.

क्रिस्पी एगप्लांट विद हौट ऐंड सौर सौस

सामग्री

1 बड़ा बैगन

2-1/2 बड़े चम्मच चावल का आटा

2-1/2 बड़े चम्मच बेसन

1/4 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर

सौस की सामग्री

1 बड़ा चम्मच मक्खन

1 बड़ा चम्मच अदरकलहसुन पेस्ट

1 हरा प्याज कटा

2 बड़ेचम्मच लाल

पीली व हरी शिमलामिर्च कटी

1-1/2 बड़े चम्मच टोमैटो सौस

1 छोटा चम्मच सोया सौस

1 छोटा चम्मच चिली सौस

1 छोटा चम्मच विनेगर

1 बड़ा चम्मच कौर्न पाउडर

तलने के लिए पर्याप्त तेल

नमक स्वादानुसार.

विधि

बैगन को धो कर उस के स्लाइस काट लें. चावल, बेसन व नमक को मिला कर सभी स्लाइस को डस्ट कर लें. तेल गरम कर तल कर प्लेट में रखें.

सौस बनाने के लिए एक पैन में मक्खन गरम कर प्याज व अदरकलहसुन का पेस्ट भूनें. भुनने पर शिमलामिर्च डाल कर फिर भूनें. अब सारी सौस, विनेगर, नमक व 1 कप पानी डाल कर सिमर करें. कौर्न पाउडर का पेस्ट बना कर डालें व गाढ़ा होने पर आंच से उतार लें. प्लेट में बैगन व सौस गर्निश कर सर्व करें.

– व्यंजन सहयोग: अनुपमा गुप्ता

राष्ट्रप्रेम थोपा नहीं जा सकता

12 दिसंबर, 2016 को तिरुअनंतपुरम में इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल औफ केरल के आयोजन के दौरान 6 लोग राष्ट्रगान बजने पर खड़े नहीं हुए तो उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. इस घटना के एक दिन पहले चेन्नई के अशोक नगर इलाके के काशी थिएटर में भी 9 लोग राष्ट्रगान के दौरान खड़े नहीं हुए तो उन्हें भी राष्ट्रगान के अपमान के आरोप में गिरफ्तार कर मामला दर्ज कर लिया गया था.

इस के पहले राष्ट्रगान के अपमान के मामले न के बराबर हो रहे थे क्योंकि थिएटर में राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य नहीं था. अब अनिवार्य हो गया है तो ऐसे मामलों की तादाद और बढ़ना तय दिख रही है. थिएटरों में राष्ट्रगान बजाने की अनिवार्यता को ले कर बहस बडे़ पैमाने पर शुरू हो गई है. कई लोग सुप्रीम कोर्ट के 30 नवंबर, 2016 के फैसले से सहमति न रखते हुए यह दलील देने लगे हैं कि राष्ट्रगान की आड़ में लोगों के दिलों में देशप्रेम का जज्बा जबरन पैदा नहीं किया जा सकता तो इन लोगों को पूरी तरह गलत नहीं ठहराया जा सकता.

अपने एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अब देश के सभी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने के पहले राष्ट्रगान बजाना अनिवार्य होगा और इस दौरान थिएटर में मौजूद सभी दर्शकों को राष्ट्रगान के सम्मान में खड़ा होना जरूरी होगा. 52 सैकंड के राष्ट्रगान के दौरान हौल में कोई आएगाजाएगा नहीं और स्क्रीन पर राष्ट्रध्वज दिखाना जरूरी होगा. विकलांगों को खड़े न होने की छूट होगी.

फैसले को कड़ा या प्रभावी बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने यह हिदायत भी दी है कि राष्ट्रगान हमारी राष्ट्रीय पहचान, राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक देशभक्ति से जुड़ा हुआ है. देश में रह रहे हर भारतीय नागरिक को राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े होना होगा.

सुप्रीम कोर्ट ने संभावित आपत्तियों को ध्यान में रखते यह भी स्पष्ट कर दिया कि आप लोग (भारतीय) विदेशों में सभी बंदिशों का पालन करते हैं पर भारत में कहते हैं कि कोई बंदिश न लगाई जाए. अगर आप भारतीय हैं तो आप को राष्ट्रगान के सम्मान में खड़े होने में कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए.

लेकिन एक अजीब बात इस फैसले में यह कही गई जो विवाद की वजह बन सकती है. वह यह है कि शास्त्रों में भी राष्ट्रगान को स्वीकार किया गया है, इसलिए देश के सम्मान के प्रतीक राष्ट्रगान का सम्मान करना आप का भी दायित्व बनता है. कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस बाबत अधिसूचना जारी कर जागरूकता के लिए अखबारों व न्यूज चैनल्स पर विज्ञापन दे.

ठोस वजह नहीं है

थिएटरों में राष्ट्रगान की अनिवार्यता लागू करने के पीछे कोई गंभीर या भारीभरकम वजह नहीं है, बल्कि यह एक दायर याचिका के एवज में आया फैसला है. भोपाल के शाहपुरा इलाके में रहने वाले 77 वर्षीय श्यामसुंदर चौकसे भोपाल के एक सिनेमाघर में ‘कभी खुशी कभी गम’ फिल्म देखने गए थे. जब राष्ट्रगान शुरू हुआ तो वे खड़े हो गए. इस पर मौजूद दूसरे बैठे दर्शकों ने उन की हूटिंग की तो वे दुखी हो उठे और जगहजगह इस वाकए की शिकायत की.

इस पर कोई सुनवाई नही हुई तो उन्होंने जबलपुर हाइकोर्ट में याचिका दायर कर दी. 24 जुलाई, 2004 को फैसला उन के हक में आया पर फिल्म निर्देशक करण जौहर इस पर स्थगन आदेश ले आए. इस पर श्यामसुंदर ने सितंबर 2016 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई और उस में कहा कि सिनेमाहौल में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान जरूरी हो. अपनी याचिका में उन्होंने राष्ट्रगान की गरिमा सुनिश्चित करने के लिए अदालत को कई बिंदु बताए.

30 नवंबर, 2016 को पहली सुनवाई में ही जस्टिस दीपक मिश्रा और अमिताव राय की पीठ ने उन से इत्तफाक रखते यह फैसला दे दिया.

यह है सजा

फैसला आते ही आम लोग अचंभित रह गए और इस का उल्लंघन करने पर सजा के प्रावधान से दहशत में भी हैं. प्रिवैंशन औफ इन्सल्ट टू नैशनल ओनर ऐक्ट 1971 की धारा 3 के मुताबिक, राष्ट्रगान में खलल डालने या राष्ट्रगान को रोकने की कोशिश करने पर 3 साल तक की कैद हो सकती है.

यह ऐक्ट और धारा दोनों विरोधाभासी इस लिहाज से हैं कि इन में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि लोगों को राष्ट्रगान गाने के लिए मजबूर किया जाए.

थिएटरों में राष्ट्रगान की शुरुआत 60 के दशक में हुई थी लेकिन 20 साल बाद इसे बंद कर दिया गया था क्योंकि सभी लोग थिएटरों में इस के बजने के दौरान खड़े नहीं होते थे. दूसरी व्यावहारिक दिक्कतें ये थीं कि लोग सिनेमाघर मनोरंजन के लिए जाते हैं, ऐसे में वहां राष्ट्रगान के दौरान बंद हौल में खड़े होने की बाध्यता उन्हें असहज बना रही थी.

किसी पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि वह देशप्रेमी नहीं है या राष्ट्रगान के दौरान खड़े न हो कर देशद्रोही हो गया है. इस की अपनी वजहें और तर्क हैं लेकिन कड़ी सजा के प्रावधान से लग ऐसा रहा है कि अब बात अंधभक्ति की हो रही है.

अंधभक्ति न हो

यह वाकई जरूरी है कि लोग राष्ट्रगान, ध्वज और दूसरे राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करें. लेकिन वह धर्म की तरह अंधभ्क्ति जैसा हो जाए, इस बात में कोई तर्क नहीं होता. उलटे, लोगों का जी उचटाने वाली बात साबित हो जाती है.

देश के कई मंदिरों में प्रवेश और पूजापाठ का अपना एक अलग संविधान और विधिविधान है और यहां तक है कि बनारस, पुरी, हरिद्वार व इलाहाबाद सहित कई शहरों के मंदिरों में साफसाफ लिखा है कि यहां गैर हिंदुओं का प्रवेश वर्जित है. शनि शिगणापुर के मंदिर में लोग जाते हैं तो उन्हें धोती पहनने के लिए पंडों द्वारा मजबूर किया जाता है. इस पर वहां आएदिन विवादफसाद होते रहते हैं.

मध्य प्रदेश के दतिया स्थित देवी पीतांबरा पीठ में 2 महीने पहले कई दिग्गज भाजपाई नेता पहुंचे थे तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह मंदिर के गर्भगृह में नहीं जा पाए थे क्योंकि वे धोती नहीं पहने थे. किसी भी गुरुद्वारे में दाखिल होने से पहले सिर पर रूमाल रखना एक अनिवार्यता है. ऐसे कई कायदेकानूननियम अधिकांश धर्मस्थलों में जाने के बाबत हैं.

इसी तरह राष्ट्रगान के दौरान वह भी थिएटरों में, खड़े होने की बाध्यता इस के अपमान को जन्म देने और बढ़ावा देने वाली साबित हो रही है. केरल और चेन्नई के मामले इस की बानगी भर हैं. अब जगहजगह इस बात को ले कर फसाद होंगे ठीक वैसे ही जैसे 80 के दशक में होते थे. तब अकेले महाराष्ट्र्र को छोड़ कर देशभर के सिनेमाघरों में राष्ट्रगान की बाध्यता खत्म करनी पड़ी थी.

देश का माहौल राष्ट्र और धर्म को ले कर कतई ठीक नहीं है. हिंदूवादी राष्ट्रभक्ति को धर्म से जोड़ कर लोगों को न केवल उपदेश दे रहे हैं बल्कि धर्म की नई दुकानें भी खोल रहे हैं. भारत माता की जय बोलना और वंदे मातरम कहना जैसे विवाद जबतब होते रहते हैं.

अब तो कई धार्मिक आयोजनों में बाकायदा आरती के साथसाथ राष्ट्रगान भी गाया जाने लगा है. भक्तगणों के हाथ में तिरंगा थमा दिया जाता है यानी राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रप्रेम को धर्म के दुकानदारों ने भुनाना शुरू कर दिया है. पिछले दिसंबर माह के तीसरे हफ्ते में भोपाल के एक धार्मिक समारोह में यह नजारा देख लोग हैरत में थे कि ऐसा क्यों किया जा रहा है.

ऐसे में जरूरी है कि देश और धर्म को अलग किया जाए, न कि इन्हें एकदूसरे का पर्याय बना दिया जाए. रही बात कानून की, तो साफ दिख रहा है कि राष्ट्रप्रेम उस के जरिए न पैदा किया जा सकता है, न ही थोपा जा सकता है. लोगों में यह भावना जगाने के दूसरे तरीके भी हैं. स्कूलकालेजों में राष्ट्रगान अनिवार्य है और छात्र उस का पालन भी करते हैं.

सिनेमाघरों में राष्ट्रगान के दौरान कोई खड़ा न हो तो साथ के लोग एतराज जताते हैं और लड़ाईझगड़ा करते हैं. यह कानून इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा देने वाला साबित होगा. राष्ट्रगान का अपमान करने वालों को सजा देना हर्ज की बात नहीं, लेकिन उस का थोपा जाना ‘सम्मान न करना, अपमान के दायरे में लाना जरूर चिंता की बात है.

अब तक देशभक्ति और धर्मभक्ति में एक फर्क हुआ करता था, उस का खत्म हो जाना भी चिंता और हर्ज की बात है. हिंदू धर्म के नाम पर योग, सूर्य नमस्कार एक तरह से थोपे ही जा रहे हैं. इसी तरह हर धर्म अपने उसूलों और बंदिशों से बंधा हुआ है जिन का पालन करना अनुयायियों की मजबूरी होती है. ऐसा न करने पर वे नास्तिक और पापी करार दे कर तिरस्कृत किए जाने लगते हैं. अब देशभक्ति के मामले में भी यही कानूनीतौर पर होगा तो धर्मभक्ति और देशभक्ति में क्या फर्क रह जाएगा.

छोटे से चुकन्दर के बड़े फायदे

आपकी सेहत को बनाने के लिए कई चीजें जरुरी होती हैं. आप स्वस्थ्य रहने के लिए बहुत मेहनत करते हैं, तो हम आपको बता दें कि चुकन्दर आपकी सेहत के लिए काफी लाभकारी होता है. नेचुरल फूड कलर के रूप में चुकन्दर काम आता है. चुकन्दर को आप सलाद के रूप में, जूस बनाकर या हलवा के रूप में खा कर भी अपने शरीर में पहुंचाते हैं. आज हम आपको इस खूबसूरत रंग वाली सब्जी के लाभों के बारे में बताऐंगे..

एक छोटा सा चुकन्दर आपके ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित रखने और आपका सेक्सुअल स्टैमिना को बढ़ाने का काम करता है.

चुकन्दर सभी नाइट्रेट्स का एक अच्छा स्रोत कहा जाता है. ये नाइट्राइट्स और इसके द्वारा बनने वाली एक गैस नाइट्रिक ऑक्साइड्स ये दोनों तत्व धमनियों को चौड़ा कर देते हैं और ब्लड प्रेशर को कम करने में मदद करता है, इसीलए इसको खाने से शरीर ताकतवर बना रहता है. कई सेहत के सलाहकारों ने ये पाया है कि हर रोज 500 ग्राम चुकन्दर खाने से आपका ब्लड प्रेशर कम हो जाता है.

क्या आप जानते हैं कि चुकन्दर में भारी मात्रा में फाइबर और बेटासायनिन जैसे तत्व होते हैं. इस बेटासायनिन की वजह से ही चुकन्दर का रंग लाल बैंगनी जैसा होता है. बेटासायनिन एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट होता है, यह आपके शरीर के एलडीएल कोलेस्ट्रॉल का ऑक्सीकरण कम कर देता है और इसकी वजह से कुछ भी धमनियों में नहीं जमता. इससे सबसे बड़ा फायदा है कि आपको दिल का दौरा पड़ने की संभावना कम हो जाती है.

इसके अलावा चुकन्दर में प्रचुर मात्रा में फॉलिक नाम का एसिड पाया जाता है जो कि गर्भवती महिलाओं के बहुत महत्वपूर्ण होता है. कहा भी जाता है कि चुकन्दर गर्भवती महिलाओं को आवाश्यक अतिरिक्त ऊर्जा प्रदान करता है.

चुकन्दर में मिनरल सिलिका नामक तत्व मौजूद रहता है जिसकी वजह से शरीर कैल्शियम को अपनी आवश्यकता अनुसार कर पाता है. ये बात तो आप जानते ही हैं कि कैल्शियम आपके दांतों और हड्डियों के लिए बहुत आवश्यक होती है, इसलिए दिन में एक ग्लास चुकन्दर का जूस पीकर आप कई समस्याओं से बचे रह सकते हैं.

जिन लोगों को डायबिटीज की शिकायत होती है, वे चुकन्दर खाकर अपने लिए मीठे की कमी पूरी कर सकते हैं. इसको खाने से आपके शरीर में ब्लड शुगर लेवल बढ़ता नहीं. चुकन्दर में बहुत कम मात्रा में कैलोरी होती है और ये फैट-फ्री होता है. इन सभी कारणों से डायबिटीज़ के मरीजों के लिए चुकन्दर एक परफेक्ट वेजिटेबल होता है.

भारतीय संगीत का नया रिकॉर्ड

बॉलीवुड रैपर हनी सिंह का सुपरहिट गाना ‘धीरे धीरे से’ ने यूट्यूब पर 20 करोड़ से ज्यादा लोगों द्वारा देखा गया है. सुना गया है कि भारतीय संगीत के लिए यह एक नया रिकॉर्ड है.

यह गाना फिल्म ‘आशिकी’ के गाने का रीमेक वर्जन है, इस गाने के खूबसूरत संगीत को अभिनेता ऋतिक रोशन और अभिनेत्री सोनम कपूर पर फिल्माया गया है. साथ ही गाने में हनी सिंह ने रैप किया है.

यह गाना यू-ट्यूब पर 20 करोड़ व्यूज के साथ ही सुपरहिट गानों की श्रेणी में आ गया है. इसके पहले भी हनी सिंह के ‘ब्लू आइस’, ‘देसी कलाकार’, ‘अंग्रेजी बीट’ जैसे गाने सुपरहिट हो चुके हैं.

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