हैप्पी भाग जाएगी का बनेगा सीक्वल

अभय देओल, डायना पैंटी और जिमी शेरगिल अभिनीत फिल्म ‘हैप्पी भाग जाएगी’ पिछले साल प्रदर्शित हुई थी. फिल्म ने अपेक्षा से ज्यादा व्यवसाय किया और जिसने भी इस फिल्म को देखा सभी ने फिल्म को पसंद भी किया था. यह एक हल्की-फुल्की फिल्म थी जिसे देखने के बाद दर्शक मुस्कुराते हुए थिएटर से बाहर निकलता है. मल्टीप्लेक्स ऑडियंस की रूचि के अनुरूप यह फिल्म थी और मेट्रो सिटी में फिल्म ने सफलता हासिल की थी. 

हैप्पी भाग जाएगी का निर्देशन मुदस्सर अजीज ने किया था. और अब वे हैप्पी भाग जाएगी का सीक्वल बनाने जा रहे है. उन्होंने इस विषय में निर्माता आनंद एल राय से बात की है और वे तैयार भी हो गए है.

मुदस्सर के अनुसार फिल्म को उसी स्टारकास्ट के साथ बनाया जाएगा. अभय देओल, डायना पैंटी, जिमी शेरगिल, अली फजल, पियूष मिश्रा ने  अपनी स्वीकृति दे दी है. फिल्म में दो नए किरदार जोड़े जाएंगे. यह एक लड़का और एक लड़की का होगा. लेकिन वे लड़का और लड़की कौन होंगे इस बारे में अभी कोई जानकारी नहीं दी गई है.

दिल को सुकून देंगे लक्षद्वीप के बीच

छोटेछोटे द्वीपों से बने लक्षद्वीप पहुंच कर सैलानी शांत, भीड़भाड़ से दूर, सुकून भरे वातावरण में पहुंच  जाते हैं. वे सागर से आती लहरें, हरेभरे ऊंचे वृक्ष और रोमांच से भर देने वाले दृश्य में डूब जाते हैं. यहां कुदरत के ऐसेऐसे अद्भुत नजारे मिलते हैं कि बस देखते ही रह जाते हैं.

जून के पहले सप्ताह में हमें लक्षद्वीप जाने का अवसर मिला. दिल्ली से हवाई मार्ग द्वारा रात को कोच्चि पहुंचने पर, कोच्चि में ही विश्राम करना पड़ा क्योंकि कोच्चि से लक्षद्वीप के लिए प्रतिदिन एअर इंडिया की एक ही घरेलू फ्लाइट है और फिर वही फ्लाइट दोपहर को वापस कोच्चि आ जाती है. इसलिए हम कोच्चि से एअर इंडिया की घरेलू फ्लाइट से लक्षद्वीप के लिए रवाना हुए. कोच्चि से लक्षद्वीप पहुंचने में लगभग 2 घंटे का समय लगा. हमारा विमान लक्षद्वीप के एक छोटे से द्वीप अगाती हवाई अड्डे पर जब उतरा तो विमान से बाहर आते ही बड़ा ही रोमांचकारी दृश्य देखने को मिला. हम ने अपनेआप को समुद्र के बीच एक द्वीप पर पाया. 3 ओर से समुद्र की लहरें हिलोरे मार रही थीं. हवाई पट्टी के एक ओर पवन हंस का एक हैलीकौप्टर भी आ कर खड़ा हो गया.

पूछने पर पता चला कि यह हैलीकौप्टर लोगों को लक्षद्वीप की राजधानी कावाराती से ले कर आ रहा है और अभीअभी जो यात्री विमान से उतरे हैं और कावाराती जाने वाले हैं, यह उन्हें ले कर भी जाएगा. यात्रियों को यहां से हैलीकौप्टर द्वारा सिर्फ कावाराती द्वीप पर ही ले जाया जाता है और यात्रियों को यह सुविधा दिन में एक ही बार मिलती है. शनिवार और रविवार को यह हैलीकौप्टर सेवा छुट्टियों के कारण बंद रहती है.

वास्तव में 32 किलोमीटर लंबी भूमि वाला लक्षद्वीप 36 छोटेछोटे द्वीपों से मिल कर बना है, जिन में आबादी केवल 10 द्वीपों पर ही है.

लक्षद्वीप भारत का केंद्र शासित राज्य है. इस के सभी द्वीपों पर जलवायु सामान्य है. यहां की मिश्रित भाषा है जिस में मलयालम, तमिल और अरेबिक इत्यादि भाषाओं का मिश्रण है, जिसे ‘जिसरी’ कहा जाता है.

दर्शनीय स्थल

अगाती द्वीप : यह कोच्चि से 459 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. हवाई जहाज से यहां पहुंचने में 2 घंटे का समय लग जाता है. यह द्वीप 7 किलोमीटर लंबा है. सब द्वीपों में लंबा होने के कारण ही यहां एअरपोर्ट बनाना संभव हो पाया, इसलिए इस द्वीप का अपना ही महत्त्व है. उत्तर में इस द्वीप की चौड़ाई आधे किलोमीटर से भी कम है. द्वीप के बीचोंबीच एक पक्की सड़क बनी हुई है जहां से दोनों ओर का समुद्र दिखाई देता है.

जब हम इस द्वीप पर पहुंचे, वहां वर्षा ऋतु का आगमन हो चुका था. समुद्र और मौसम के बदले तेवर के कारण यहां से अन्य द्वीपों पर जाने का एकमात्र साधन पानी के जहाज बंद हो चुके थे, इसलिए हम कुछ दिन अगाती में ही रुक कर वापस कोच्चि के लिए रवाना हो गए. इसी दौरान इस द्वीप पर बसे गांव को बड़े नजदीक से देखने का अवसर मिला.

यहां टूरिज्म विभाग भी कार्यरत है और यहां आने वाले पर्यटकों के लिए आधुनिक सुविधाओं से लैस उन का गैस्ट हाउस और एक पुराना डाकबंगला भी है. यहां वाटर स्पोर्ट्स, स्कूबा डाइविंग, केनोइंग, कांच के तल वाली नावों से समुद्र के अंदर कोरल व समुद्री जीवजंतुओं को देखने व हट्स इत्यादि जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध हैं.

समुद्र के किनारे बहुत ही साफसुथरे हैं. नारियल के पेड़ों की सूखी टहनियों और खोलों को बड़े ही करीने से ढेर लगा कर रखा जाता है. यहां लोगों के आनेजाने का मुख्य साधन साइकिल लोकप्रिय है, इसलिए प्रदूषण की समस्या नहीं है. इस द्वीप की एक बड़ी खासीयत यह भी है कि बिजली आपूर्ति के लिए सोलर स्टेशन बनाया गया है. सड़कों पर सोलर लाइटें लगी हुई हैं. पीने के पानी के लिए घरघर में वर्षाजल संचित किया जाता है.

कावाराती द्वीप : कोच्चि से 440 किलोमीटर की दूरी पर स्थित, कावाराती द्वीप लक्षद्वीप की राजधानी है. इस द्वीप का क्षेत्रफल 4.22 वर्ग किलोमीटर है और जनसंख्या 25 हजार से भी अधिक है, इसलिए भीड़भाड़ भी ज्यादा है. अगाती से कावाराती हैलीकौप्टर या शिप द्वारा आया जा सकता है. हैलीकौप्टर से 20-25 मिनट और शिप से यहां पहुंचने के लिए 6 घंटे लगते हैं. वर्षा ऋतु में मौसम खराब हो जाने पर शिप बंद कर दिए जाते हैं. यहां भी अगाती की तरह स्थानीय लोगों के लिए जीवनयापन की सभी सुविधाएं मौजूद हैं. पर्यटकों के लिए सभी सुखसुविधाओं से लैस गैस्ट हाउस बने हुए हैं. यहां के खूबसूरत समुद्री किनारे पर्यटकों को लुभाते नजर आते हैं इसीलिए पर्यटक यहां वाटर स्पोर्ट्स और तैराकी का लुत्फ उठाते हैं.

मिनीकाय द्वीप : कोच्चि से इस द्वीप की दूरी 398 किलोमीटर है. इस का क्षेत्रफल 4.80 वर्ग किलोमीटर है. यह दूसरा सब से बड़ा द्वीप है. पहला बड़ा द्वीप अन्द्रोथ है. मिनीकाय, लक्षद्वीप के दक्षिण में स्थित है. इस द्वीप पर रहने वाले लोगों की संस्कृति उत्तरी द्वीपों के लोगों से भिन्न है. यहां की बोलचाल की भाषा माही है. यहां वर्ष 1885 का बना सब से पुराना लाइटहाउस भी  है. पर्यटकों को लुभाने हेतु खूबसूरत समुद्री किनारे हैं.

किल्टन द्वीप : फारस की खाड़ी और श्रीलंका के साथ व्यापार करने के लिए यह एक अंतर्राष्ट्रीय मार्ग के नाम से भी जाना जाता है. यह द्वीप बहुत गरम है. गरमी अधिक होने के कारण लोग बाहर सोते हैं. यह पहला द्वीप है जिस की ‘बीचेस’ पर ऊंची तूफानी लहरें उठती रहती हैं. इस द्वीप की मिट्टी बहुत उपजाऊ होने के कारण यहां बहुत अधिक वनस्पतियां उगाई जाती हैं. यहां के समुद्री किनारे लोकनृत्यों के लिए प्रसिद्ध हैं.

कादमत द्वीप : यह द्वीप कोच्चि से 407 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. इस के पश्चिम में खूबसूरत व उथला समुद्र होने के कारण वाटर स्पोर्ट्स के लिए यह बहुत उत्तम समुद्री किनारा है. पूर्व में तंग लैगून है और लंबा बीच है. शहर से दूर यहां आ कर सैलानी वाटर स्पोर्ट्स, पैडल बोट्स, स्वीमिंग, सी डाइविंग, सेलिंग के अतिरिक्त शीशों के तल वाली नावों में समुद्र में जा कर, समुद्री जीवजंतुओं को देखने का आनंद भी उठाते हैं. इस के अतिरिक्त स्कूबा डाइविंग पर्यटकों के लिए यहां का विशेष आकर्षण है.

एडमिनी द्वीप : कोच्चि से इस द्वीप की दूरी 407 किलोमीटर है. यह द्वीप आयताकार है. यहां के समुद्र में भवन निर्माण हेतु कोरल्स और रेतीले पत्थर बहुतायत मात्रा में पाए जाते हैं. यहां के निवासी कुशल शिल्पकार हैं जो कछुए के खोल और नारियल के खोलों से छड़ी बनाने के लिए मशहूर हैं.

अन्द्रोथ द्वीप : कोच्चि से इस द्वीप की दूरी 293 किलोमीटर है. यह लक्षद्वीप का सब से बड़ा द्वीप है. यह द्वीप घनी हरियाली के लिए भी जाना जाता है, विशेषकर घने नारियल के पेड़ों के कारण. जूट और नारियल यहां के मुख्य उत्पादन हैं.

चेतला द्वीप : कोच्चि से इस द्वीप की दूरी 432 किलोमीटर है. यहां नारियल कम होता है इसलिए जूट यहां के लोगों का मुख्य व्यवसाय है. नारियल के पत्तों की चटाइयां बनाई जाती हैं. 20वीं शताब्दी में यहां समुद्री जहाज, नावें बनाने का यहां का उद्योग बहुत प्रसिद्ध रहा है जिस की अन्य द्वीपों पर जाने वाले लोगों द्वारा मांग की पूर्ति की जाती थी.

कल्पेनी द्वीप : कोच्चि से यह द्वीप 287 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. यह द्वीप भी अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है. सब से पहले इस द्वीप पर लड़कियों को पढ़ाना शुरू किया गया था. वर्ष 1847 में इस द्वीप पर बहुत बड़ा तूफान आया था जिस में बहुत बड़ेबड़े पत्थर भी यहां आ कर गिरे थे. वाटर स्पोर्ट्स, रीफ वौक, तैराकी जैसी सुविधाएं पर्यटकों के लिए यहां उपलब्ध हैं.

ऐश्वर्या के लिए सलमान ने डायरेक्टर को मारा थप्पड़

बॉलीवुड के दबंग सलमान खान अपनी सुपरहिट फिल्मों और दमदार एक्टिंग के लिए जाने जाते हैं. दरियादिल सलमान खान अक्सर अपने फैन्स की मदद करते रहते हैं. लेकिन इन सबके साथ ही सलमान अपने गुस्से के लिए भी जाने जाते हैं. अपने गुस्से की वजह से सलमान को कई बार मुसीबतों का सामना भी करना पड़ा है. खबरों की मानें तो गुस्से की वजह से ही सलमान का ऐश्वर्या के साथ ब्रेकअप हुआ था.

लेकिन क्या आपको पता है कि सलमान ने ऐश्वर्या राय के चक्कर में बॉलीवुड के फेमस फिल्म डायरेक्टर के साथ मारपीट भी की थी. जी हां ये बात साल 1999 की है. उन दिनों सलमान खान ऐश्वर्या राय को डेट कर रहे थे और उसी दौरान ऐश सुभाष घई की फिल्म ‘ताल’ में काम कर रही थीं, लेकिन सलमान नहीं चाहते थे कि ऐश सुभाष घई की उस फिल्म में काम करें. इसकी वजह थी घई के साथ उनकी लड़ाई.

दरअसल जब सलमान अपने करियर की शुरूआत कर रहे थे तब उन दिनों सुभाष घई शाहरुख खान के घर की बिल्डिंग के नीचे अपनी एक फिल्म की शूटिंग कर रहे थे. वहां सलमान अचानक से आ धमके और घई के पूछने पर उन्होंने कहा कि वो उनके साथ काम करना चाहते हैं. सलमान के एटिट्यूड और बॉडी लैंग्वेज को देख घई समझ गए और उन्हें नजरअंदाज करने के स्टाइल में बोले कि हां क्यों नहीं. ये कहकर घई ने सलमान को वापस भेज दिया.

सलमान को तो सुभाष घई ने किसी फिल्म में मौका नहीं दिया लेकिन उसी दौरान सलमान को राजश्री प्रोडक्शनंस का बड़ा ब्रेक मिल गया. इसके बाद तो सलमान और सुभाष घई के बीच की खाई और गहरी और हो गई और एक दिन पार्टी में सलमान का घई से झगड़ा भी हो गया.

घई से इसी नाराजगी के चलते ही सलमान नहीं चाहते थे कि ऐश्वर्या उस फिल्म में काम करें, लेकिन ऐश उस वक्त के जाने-माने निर्देशक के साथ काम करने से भला क्यों मना करतीं. बस ऐश्वर्या भी अपनी जिद पर अड़ी रहीं और सलमान को कह दिया कि चाहे कुछ भी वो उस फिल्म में काम करेंगी.

ऐश्वर्या ने मना क्या किया, सलमान का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. ऐश्वर्या को तो वो कुछ कह नहीं पाए लेकिन गुस्साए सलमान ने सुभाष घई के साथ जो किया वो काफी बुरा था.

सलमान गुस्से में भड़कते हुए घई की फिल्म के सेट पर पहुंचे और उन्हें खूब खरी खोटी सुनाई. कुछ लोग कहते हैं कि सलमान ने तो घई को थप्पड़ तक दे मारा था और घई सन्न रह गए. सलमान को अपनी इस गलती का जरा भी पछतावा नहीं हुआ.

लेकिन जब सलीम खान को बेटे सलमान की इस हरकत के बारे में पता चला तो वो सलमान को सुभाष के पास लेकर गए और उनसे माफी मंगवाई. तब जाकर सुभाष घई और सलमान का वो झगड़ा खत्म हुआ.

परिवार को ज्यादा समय देता हूं : अरशद वारसी

राजू हिरानी की फिल्म ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ में सर्किट की भूमिका निभाकर चर्चित हुए अभिनेता अरशद वारसी बेहतर कॉमिक टाइमिंग के लिए जाने जाते हैं. हालांकि उनके कैरियर का शुरुआती दौर काफी संघर्षपूर्ण था, पर उन्होंने धीरज और मेहनत के बल पर मुकाम हासिल किया. पहली फिल्म में काम करने का मौका उन्हे अमिताभ बच्चन की कंपनी की फिल्म ‘तेरे मेरे सपने’ से मिला, इसके बाद भी उन्होंने कई फिल्में की, पर वे हिंदी सिनेमा में कही नजर नहीं आये. सर्किट की भूमिका उनके जीवन का टर्निंग पाइंट था. जहां से उन्हे पीछे मुड़कर देखना नहीं पड़ा. अभी उनकी फिल्म ‘इरादा’ रिलीज पर है, जिसे लेकर वह खुश हैं. उनसे हुई बातचीत के अंश इस प्रकार हैं.

प्र. इस फिल्म में काम करने की खास बात क्या थी? नसीरुद्दीन शाह के साथ एक बार फिर काम करने का अनुभव कैसा रहा?

यह एक ‘इशू बेस्ड’ इको थ्रिलर फिल्म है, जो गंभीर समस्या आजकल हमारे देश में है. निर्देशक ने इसे दिखाते हुए रोचक बनाया है. मैंने इस तरह की भूमिका पहले निभाई नहीं थी. इसके अलावा अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के साथ फिर से काम करना हमेशा से एक ड्रीम ही रहता है. वे भी मेरे साथ काम करना पसंद करते हैं. वे मेरी कंपनी पसंद करते हैं. वे शायरी और समझदारी की बात करते हैं और मैं बेकार और मस्ती की बातें अधिक करता हूं. असल में वे मेरी ईमानदारी को पसंद करते हैं.

प्र. आप एक डांसर और अच्छे कॉमिक टाइमिंग के लिए जाने जाते हैं? लेकिन अभी आप काफी कम फिल्में कर रहे हैं, इसकी वजह क्या है?

सभी मुझे यह पूछते हैं. मेरे उत्तर को शायद ही लोग विश्वास करें, मेरे हिसाब से प्रॉपर्टी से अधिक फैमिली पर इन्वेस्ट करना अच्छा होता है. मेरे बच्चे, पत्नी सभी के साथ अब मैं समय बिताना पसंद करता हूं, काम तो मैंने बहुत कर लिए हैं. दोनों आप साथ में नहीं कर सकते, कहीं पर आपको मना करना जरुरी है. मेरे लिए मेरा परिवार पहले है. कभी ऐसा समय था जब मैं एक शूट ख़त्म कर घर पंहुचा फिर अगले दिन दूसरे के लिए तैयार होकर निकल गया. एक दिन मैंने अपने बेटे को जब वापस आकर मिलने की बात कही तो उसने भोलेपन से कहा कि आप तो अब तब आओगे, जब मैं बड़ा हो जाऊंगा. उसकी इस बात ने मुझे सोच में डाल दिया और उस दिन से मैंने कम काम करना शुरू कर दिया, क्योंकि पैसे की कोई लिमिट नहीं होती और उसे पाने की लालच में मैं अपना परिवार खो नहीं सकता.

प्र. आप अब तक की जर्नी को कैसे देखते हैं?

मैंने सोचा नहीं था कि मुझे इतना कुछ मिलेगा. मैं अपने आप को ‘ब्लेस्ड’ मानता हूं. जो इच्छाएं थी, मुश्किल थी, पर मिला भी. मैं अभी अपना समय परिवार के साथ बिताना चाहता हूं, ताकि मैं अब निर्देशक बनने के लिए अपने आप को तैयार कर सकूं. मैं निर्देशक बनना चाहता हूं और अच्छी फिल्में बनाना चाहता हूं. इसके अलावा मैं बड़े स्केल पर एक म्यूजिकल प्ले का निर्देशन करना चाहता हूं. जिसमें डांस और म्यूजिक का अच्छा परफोर्मेंस दर्शकों को देखने का मौका मिले. डांस और एक्टिंग मेरा पैशन रहा है. डांस से मैं एक्टिंग में आया हूं. इसलिए एक्टिंग और डांस को मैं छोड़ नहीं पा रहा हूं.

प्र. इंडस्ट्री में आजकल कई शादियां सालों साथ रहने के बाद टूट चुकी हैं, आप और मारिया के बीच बहुत अच्छा सामंजस्य है, आपने इसे कैसे बनाये रखा?

मेरे हिसाब से किसी को भी प्रॉपर्टी और पैसे बनाने के अलावा रिलेशनशिप पर अपना समय देने की जरुरत है, क्योंकि रिश्ते को बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है. मैंने अपना एक मापदण्ड तैयार कर लिया है कि मुझे नाम, प्रसिद्धी फोटोग्राफी, लोगों के साथ पार्टियां करना अधिक पसंद है या मेरा परिवार? जिन्हें ऐसा है कि काम करना ही है, वहां परिवार खुद समझ जाता है कि काम करना जरुरी है. ये एडजस्टमेंट दोनों तरफ से आताहै. मैं पत्नी के अलावा बच्चों के साथ समय बिताता हूं, उनके लिए ब्रेकफास्ट बनाना, होमवर्क करवाना, घूमने ले जाना आदि सब करता हूं.

प्र. आप कैसे पिता हैं और उन्हें कितनी आजादी देते हैं?

मैं अधिक स्ट्रिक्ट फादर नहीं हूं. वह काम मारिया करती है. मैंने पहली साइकिल अपने पैसे से खरीदी थी. 22 साल की उम्र में लंदन एक डांस शो के लिए गया था. मेरी जिंदगी अलग थी. मैंने बहुत देरी से पैसा कमाया, लेकिन मेरे बच्चों को वे सारी सुविधाएं मिल रही हैं, जो उन्हें चाहिए. मैं बच्चों को स्पॉइल नहीं करता. हर चीज की उपयोगिता उन्हें मालूम है. बेटी मां के नजदीक है, जबकि बेटा मेरे क्लोज है.

प्र. आजकल महिलाओं के साथ कई प्रकार की छेड़-छाड और हत्या की घटनाएं हो रही हैं. इसके जिम्मेदार किसे मानते हैं? परिवार, समाज या धर्म?

दरअसल हम अपने भूतकाल को छोड़ना नहीं चाहते और हमारे ‘पास्ट’ में यही सिखाया गया है कि पुरुष सबसे बेहतर हैं, जबकि महिलाएं उनसे कमतर. इसे आप एक उदहारण से समझ सकते हैं कि एक तरफ सरकार हमारी सोच को आगे बढ़ाने को कहती है, जिसमें ‘हाई’ तकनीक से लेकर नोटबंदी तक आती है, वही सरकार जब चुनाव लड़ने जाती है, तो हमारी सभ्यता और संस्कृति की बात कहती है. यही मुख्य समस्या है. छोटे शहरों औरगांव में अभी भी वही पुरानी  मानसिकता है. जिसे हटाना मुश्किल है. मेरे हिसाब से हर महिला को कम कीमत पर लाइसेंस वाली ‘गन’ आसानी से दे देनी चाहिए, इससे कुछ दुरुपयोग तो होगा, पर उसकी सजा भी होनी चाहिए. इससे  पुरुषों के अंदर डर बैठेगा और 90 प्रतिशत अपराध काम होंगे.

प्र. आगे की योजनायें क्या हैं?

मुन्नाभाई एमबीबीएस 3 की शूटिंग करने वाला हूं. इसकी कहानी भी अच्छी और अलग है.

विभागों की चक्करघिरनी में फंसा बिहार पर्यटन

बिहार के चप्पेचप्पे में पर्यटन बिखरा हुआ है. इस के बावजूद यहां का पर्यटन उद्योग दम तोड़ रहा है. पर्यटन की बदहाली पर गौर करें तो इस की वजह साफ हो जाती है. राज्य की पर्यटन नीति यहां की औद्योगिक नीति के तहत संचालित होती है. औद्योगिक नीति को उद्योग विभाग तय करता है. वहीं टूरिस्ट बसों को परिमिट देने का काम परिवहन विभाग के पास है. टूरिस्ट होटलों के रजिस्ट्रेशन का नियंत्रण 1863 के सराय ऐक्ट के तहत जिलाधीश की मुट्ठी में है. इस लिहाज से पर्यटन विभाग कहने को ही पर्यटन विभाग है. उस के पास अपने बूते पर्यटन की तरक्की की योजना बनाने की बात तो दूर, एक कदम अपनी मरजी से चलने की भी क्षमता नहीं है.

पर्यटन स्थलों के रखरखाव के अलावा पर्यटन विभाग के पास कोई काम नहीं है. ऐसी हालत में राज्य में पर्यटन की तरक्की की बात ही बेमानी हो जाती है.

बिहार का पर्यटन कई विभागों के जाल में फंसा हुआ है. कोई भी नई योजना बनाने और उसे पास कराने के लिए उसे कई विभागों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, इस से राज्य का पर्यटन उद्योग लचर व लाचार बन कर रह गया है. हालत यह है कि पर्यटन के क्षेत्र में निवेश के नाम पर केवल बयानबाजी और ऐलान ही होते रहे हैं. बिहार में पर्यटन की तमाम संभावनाओं के बाद भी कोई निवेशक आगे नहीं आ पाता है. दरअसल, राज्य के पर्यटन में निवेश करने के लिए कई देशी और विदेशी निवेशक इच्छुक हैं, पर विभागों की चक्करघिरनी में फंसने को वे भी तैयार नहीं हैं.

फाइलों में उलझी योजना

साल 2003 में केंद्रीय पर्यटन विभाग ने 20 सालों के लिए एक बड़ी योजना बनाई. उस वक्त पर्यटन के दिन फिरने की उम्मीद जगी थी, पर 13 सालों के बाद भी 241 पृष्ठों में बनी योजना फाइलों से बाहर नहीं निकल सकी. जिस से पर्यटन उद्योग पंगु होता गया और पर्यटक बिदकने लगे.

राज्य सरकारें पर्यटन की तरक्की को ले कर कितनी लापरवाह और उदासीन हैं, इस का अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि साल 2010 में अलग पर्यटन नीति बनने के बाद भी उस पर रत्तीभर भी अमल नहीं हो सका है. इतना ही नहीं, पर्यटन विभाग को सभ्य बनाने की सारी कवायद उस समय धराशायी हो गई जब साल 2011 में पर्यटन नीति को फिर से औद्योगिक नीति से जोड़ दिया गया. इस से पर्यटन की तरक्की की जो उम्मीद जगी थी वह एक बार फिर से टूट गई. और तब से पर्यटन उद्योग की हालत लगातार खस्ता होती जा रही है.

नई और अलग पर्यटन नीति बनने के बाद कुछ निवेशक निवेश के  लिए आगे आए थे पर बाद में उन्होंने अपने कदम वापस खींच लिए. पर्यटन नीति वापस उद्योग विभाग की चारदीवारी में कैद हो गई. बिहार के ही एक बड़े बिल्डर ने पर्यटन में निवेश का मूड बनाया था, पर कुछ दिनों की बातचीत के बाद ही सरकारी रवैए व विभागों की उदासीनता देख उस ने भी अपने कदम वापस खींच लिए. बिल्डर का कहना है कि कई विभागों के जाल में पर्यटन विभाग के फंसे होने की वजह से पर्यटन से जुड़ी किसी भी छोटीबड़ी योजना को पास कराने के लिए निवेशक को पर्यटन विभाग के साथ उद्योग विभाग के चक्कर काटने पड़ेंगे. इस से सारा मामला बाबुओं की टेबलों के बीच चक्कर लगाता रह जाएगा.

राज्य में पर्यटन की तरक्की के लिए राज्य सरकार ने कुछ राज्यों के पर्यटन और पर्यटन नीति के बारे में जानकारियां इकट्ठी कीं पर उस पर कोई अमल नहीं हो सका. गौरतलब है कि हिमाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे पर्यटन के मामले में विकसित राज्यों में पर्यटन से जुड़ी तमाम योजनाएं पर्यटन नीति के तहत ही बनती और अमल में लाई जाती हैं. बिहार में सरकार ऐसा करने में लापरवाही बरतती रही है जिस से यहां पर्यटन की हालत बदतर होती जा रही है.

पर्यटन से प्राप्ति

समूची दुनिया में पर्यटन ही इकलौता उद्योग है जिस की पिछले 20 सालों के दौरान विकास दर 5 फीसदी प्रतिवर्ष है. वहीं ग्लोबल जीडीपी में पर्यटन उद्योग का योगदान 11 फीसदी है. दुनिया के कुल रोजगार में से 8 फीसदी रोजगार पर्यटन उद्योग में है. वर्ल्ड ट्रैवल ऐंड टूरिज्म काउंसिल के सर्वे के मुताबिक, भारत के जीडीपी में पर्यटन का योगदान 6.60 फीसदी तक हो सकता है और देश में पैदा होने वाले कुल रोजगार में 7.70 फीसदी पर्यटन में होगा.

बिहार में पर्यटन स्थलों के आसपास का माहौल और सुविधाएं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की नहीं हैं. विदेशी पर्यटकों के साथ भारत के दूसरे राज्यों के पर्यटकों में बिहार की छवि यही बनी हुई है कि यहां पर्यटकों की सुरक्षा का खास इंतजाम नहीं है, सड़क और बाकी परिवहन की सुविधा दुरुस्त नहीं है. राज्य में राजगीर, वैशाली, नालंदा और बोधगया जैसे कई बौद्ध पर्यटन स्थल होने के बाद भी दुनियाभर में उस का खास प्रचारप्रसार नहीं किया गया है. पर्यटकों की सुरक्षा के लिए अलग फोर्स नहीं है और न ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर के गाइड ही हैं. लिहाजा, यहां विदेशी पर्यटकों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

बिहार में धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, ग्रामीण, योग आधारित पर्यटन और बुद्धिस्ट, सिख, सूफी और जैन सर्किट हैं. राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में सेवाक्षेत्र का योगदान 56.40 फीसदी है और इस में होटल तथा रैस्टोरैंट का हिस्सा 22.30 फीसदी है.

पर्यटन मामलों के जानकार सुनील राज बताते हैं कि अगर बिहार सरकार पर्यटन पर ध्यान दे तो इस में काफी ऊंची छलांग लगाई जा सकती है. राज्य में होटलों के कमरों और पर्यटकों का औसत एक कमरा, प्रति एक हजार भी नहीं है.

उपेक्षा की मार

बिहार में पिछले साल पर्यटन का बजट 155 करोड़ रुपए के करीब था, जिस में योजना मद के लिए केवल 8.43 करोड़ रुपए तय किए गए थे. इस से स्पष्ट हो जाता है कि राज्य सरकार पर्यटन को ले कर कितनी लापरवाह व उदासीन है.

इसी लापरवाही की वजह से बिहार सरकार की लाख कोशिशों के बाद भी राज्य में देसी और विदेशी पर्यटकों की संख्या में कोई खास इजाफा नहीं हो पा रहा है. साल 2014 से 2 करोड़ 25 लाख 44 हजार 377 देसी और 8 लाख 29 हजार 508 विदेशी पर्यटक बिहार आए. साल 2012 और 2013 में भी यह आंकड़ा इसी के आसपास था. साल 2012 में 2 करोड़ 14 लाख 47 हजार 099 देसी और 10 लाख 96 हजार 933 विदेशी पर्यटकों ने बिहार के पर्यटन स्थलों का भ्रमण किया. 2013 में 2 करोड़ 15 लाख 88 हजार 306 देसी और 7 लाख 56 हजार 835 विदेशी पर्यटक बिहार घूमने आए थे. विदेशी पर्यटकों के मामले में बिहार की हालत देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले ठीकठाक है पर देसी पर्यटकों को लुभाने के मामले में बिहार टौप 10 की सूची में नहीं है.

आर्थिक मामलों के जानकार विनोद पांडे कहते हैं कि बिहार की जीडीपी और रोजगार पैदा करने के मामले में पर्यटन का योगदान जीरो है. वहीं, पर्यटन के क्षेत्र में निवेश का आंकड़ा भी जीरो ही है. यूनाइटेड नैशन वर्ल्ड टूरिस्ट और्गेनाइजेशन के मुताबिक, भारत के सकल घरेलू उत्पाद में पर्यटन का योगदान करीब 6.7 फीसदी है. पर्यटन के क्षेत्र में करीब 3 करोड़ रोजगार सृजन हो रहा है. वहीं, देश के कुल निवेश का 6.2 फीसदी पर्यटन के क्षेत्र में हो रहा है.                  

टौप 5 सूची में लाने की कवायद

पर्यटन के क्षेत्र में काफी पिछड़ने के बाद अब राज्य सरकार की नींद खुली है. उस ने पर्यटन के मामले में बिहार को देश के टौप 5 राज्यों की लिस्ट में शुमार कराने के लिए कमर कस ली है. इस के लिए पर्यटन रोडमैप बनाने की कवायद शुरू की गई है. राज्य की पर्यटन मंत्री अनिता देवी ने बताया कि इस के लिए मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जा रहा है और रोडमैप बनाने के लिए कंसल्टैंट की बहाली की जाएगी. पर्यटन विभाग के साथ कलासंस्कृति विभाग भी इस में मदद करेगा. उन्होंने  उम्मीद जताई कि रोडमैप को जमीन पर उतारने के बाद पर्यटन के क्षेत्र में बिहार लंबी छलांग लगाएगा.

मोदी का शुद्धियज्ञ, अनुयायियों की अंधभक्ति

दीवाली के तुरंत बाद हमारा देश ऐतिहासिक शुद्धियज्ञ का गवाह बना है. सवा सौ करोड़ देशवासियों के धैर्य और संकल्पशक्ति से चला यह शुद्धियज्ञ आने वाले अनेक वर्षों तक देश की दिशा निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाएगा. हमारे राष्ट्र जीवन और समाज जीवन में भ्रष्टाचार, कालाधन, जाली नोटों के जाल ने ईमानदार को भी घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया था. उस का मन स्वीकार नहीं करता था, पर उसे परिस्थितियों को सहन करना पड़ता था, स्वीकार करना पड़ता था. दीवाली के बाद की घटनाओं से सिद्ध हो चुका है कि करोड़ों देशवासी ऐसी घुटन से मुक्ति के अवसर की तलाश कर रहे थे.  

जब देश के कोटिकोटि नागरिक अपने ही भीतर घर कर गई बीमारियों के खिलाफ, विकृतियों के खिलाफ लड़ाई लड़ने के लिए मैदान में उतरते हैं तो वह घटना हर किसी को नए सिरे से सोचने को प्रेरित करती है. दीवाली के बाद देशवासी लगातार दृढ़संकल्प के साथ, अप्रतिम धैर्य के साथ, त्याग की पराकाष्ठा करते हुए, कष्ट झेलते हुए, बुराइयों को पराजित करने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं. जब हम कहते हैं कि ‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी’, तो इस बात को देशवासियों ने जी कर दिखाया है. कभी लगता था कि सामाजिक जीवन की बुराइयां, विकृतियां जानेअनजाने में, इच्छाअनिच्छा से हमारी जिंदगी का हिस्सा बन गई हैं लेकिन 8 नवंबर, 2016 की घटना हमें पुनर्विचार के लिए मजबूर करती है.’’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 50 दिन के यज्ञ के बाद 31 दिसंबर, 2016 की शाम प्रजा के नाम जब यह संदेश दिया तो 5 हजार साल पहले पांडु कुल के अंतिम सम्राट राजा जनमेजय के सर्पयज्ञ की कथा ताजा हो गई. जनमेजय ने पृथ्वी से सांपों के अस्तित्व को मिटाने के लिए सर्पमेध यज्ञ किया था.

पौराणिक कथा के अनुसार, परीक्षित, पांडु के एकमात्र वंशज थे. उन को किसी ऋषि ने श्राप दिया था कि वे सर्पदंश से मृत्यु को प्राप्त होंगे. ऐसा ही हुआ. सर्पराज तक्षक की वजह से मर गए. परीक्षित की मृत्यु के बाद हस्तिनापुर की राजगद्दी पर उन के पुत्र जनमेजय विराजमान हुए. जनमेजय पिता की मौत से बहुत आहत हुए और उन्होंने सारे सर्प वंश का समूल नाश करने का संकल्प लिया. इसी उद्देश्य से उन्होंने सर्पयज्ञ के आयोजन का निश्चय किया. यह यज्ञ इतना भयंकर था कि विश्व के सारे सर्पों का महाविनाश होने लगा.

राजा ने जैसे ही महायज्ञ का आरंभ किया तो आह्वान करने पर विभिन्न प्रकार के सर्प और नागों की प्रजातियां एकएक कर अग्निकुंड में समाहित होने लगीं. यज्ञ के धुंए से लोगों की आंखें लाल हो गईं. कालेकाले कपड़े पहने ऋषिगण  जोरजोर से मंत्रोच्चार कर रहे थे. उस समय सारे सर्पों का हृदय डर से कांपने लगा. एकदूसरे से लिपटते, चीखतेचिल्लाते सर्प हवनकुंड में आआ कर  गिरने लगे. उन के जलने की दुर्गंध चारों ओर फैल गई. उन के शोरशराबे व चीख से सारा आकाश गूंज उठा.

यह समाचार तक्षक ने भी सुना. वह भयभीत हो कर देवराज इंद्र की शरण में चला गया. इंद्र उस की रक्षा करने के लिए आगे आना चाहते थे पर यज्ञ इतना विशाल था कि वे तक्षक की कोई मदद नहीं कर पाए.

सर्पयज्ञ में एकएक कर सारे सर्प भस्म होने लगे. जो बेचारे भस्म हो रहे थे उन्हें मालूम ही नहीं था कि आखिर उन का कुसूर क्या है.

वहीं, तक्षक को बचाने के लिए राजा जनमेजय से यज्ञ को समाप्त कराने के लिए जाल बुना गया. इस के लिए वासुकि नाम का नाग आगे आया. वह अस्तीक ऋषि के आश्रम  में गया. वहां जा कर उस ने विनती की कि वे किसी तरह इस यज्ञ को समाप्त करा दें. फिर अस्तीक ऋषि राजा के पास पहुंचे. राजा से कहा गया कि जो हुआ वह ठीक नहीं हुआ, पर इस का मतलब यह नहीं कि किसी एक प्रजाति के जीवों की पूरी सृष्टि ही खत्म कर दी जाए. राजा जनमेजय को लगा कि ऋषि ठीक कह रहे हैं और इस तरह यज्ञ समाप्त कर दिया गया पर इस के बाद राजा राजपाट छोड़ कर जंगल में जा कर संन्यासी हो गए.

आम लोगों की बढ़ी परेशानी

इधर, 8 नवंबर को मोदी ने कालाधन बाहर निकालने के लिए ज्यों ही शुद्धियज्ञ की घोषणा की, जनमेजय के सर्पयज्ञ की भांति कालाधन बैंकों में आ कर जमा होने लगा. कालाधन रखने वालों में खलबली मची या नहीं, आम लोगों में जरूर परेशानी बढ़ गई. वे बैंकों में अपना पैसा जमा कराने व निकालने के लिए लाइनों में लग गए.

50 दिन रोज नए सरकारी नियमों के मंत्रोच्चार के साथ संपन्न हुए. अखंड शुद्धिकरण महायज्ञ में आम जनता की आहुतियों से सरकारी तिजोरियां दानदक्षिणा से भर गईं.

जनमेजय की दुश्मनी नागराजा से थी पर बेकुसूर सांप भी यज्ञ की अग्नि में आ कर जलने लगे. मोदी के निशाने पर भ्रष्टाचारी, कालाधन रखने वाले रहे होंगे पर इस यज्ञ में निर्दोषों की आहुतियां चढ़ने लगीं.

मोदी ने कुछ अलग हट कर नहीं किया. ऐसे काम तो हिंदू राजा करते आए हैं. वे स्मृतियों, पुराणों में लिखी व्यवस्था से चलते थे जो पक्षपातपूर्ण, अन्याय और गैरबराबरी पर आधारित थी. शूद्र को संपत्ति के स्वामित्व से वंचित किया गया है. इस व्यवस्था में राजा को किसी का भी धन जबरन छीनने का अधिकार सुरक्षित था. शूद्र को धनसंपत्ति रखने का हक ही नहीं था. वैश्य का धन भी वह यज्ञ को संपन्न कराने के लिए जबरदस्ती छीन सकता था. धर्मग्रंथों में राजा को मनुष्यों में श्रेष्ठ बताया गया है. उस के वचन ईश्वर के आदेश माने गए हैं. गं्रथों में लिखी बातें भी ईश्वरीय वाणी बताई गई हैं, फिर राजा और प्रजा भला अलग हट कर कैसे चल सकते हैं.

मनुस्मृति में स्पष्ट लिखा है कि शूद्र संपत्ति नहीं रख सकता. अगर उस के  पास कुछ है, यानी वह कोई उत्पाद तैयार करता है तो ब्राह्मण को अधिकार है कि वह उसे छीन ले.

विस्रब्धं ब्राह्मण: शूद्राद् द्रव्योपादानमाचरेत्,

न हि तस्यास्ति किंचित्स्वं भर्तृहार्य धनोहि स:.

मनुस्मृति, 8-417

अर्थात, ब्राह्मण शूद्र से द्रव्य ले ले क्योंकि शूद्र का अपना कुछ नहीं होता. ये जिस के अधीन रहते हैं या जिस की सेवा करते हैं, धन का मालिक वही होता है.                                                                                                                                                                                                                                                               

भार्यापुत्रश्च दासश्च त्रय एव अधना.

मनुस्मृति, 8-416

यानी पत्नी, पुत्र और शूद्र ये तीनों  संपत्ति के योग्य नहीं हैं.

न स्वामिना निसृष्टोपि शूद्रो दास्याद्विमुच्यते.

आश्चर्यजनक यह है कि दासत्व से मालिक मुक्त भी कर दे तो भी शूद्र को दासता करनी ही होगी.

यह जो जयजयकार हो रही है, यह दासता का स्वाभाविक गुण है.

मनु ने लिखा है,

निसर्गजं हि तत्तस्य कस्तस्मात्तपोहति.

यानी दासता उस का स्वाभाविक धर्म है, उस से उसे कौन अलग कर सकता है.

इस तथाकथित शुद्धिकरण से कितना नफानुकसान हुआ, कभी सटीक आकलन नहीं हो पाएगा पर इतना तय है कालेधन के खिलाफ मोदी के इस ब्रह्मास्त्र से जमीनी स्तर पर लाखों गरीब, मध्यवर्ग के लोग प्रभावित हुए हैं. सरकार अभी तक यह आंकड़े नहीं बता पाई है कि नोटबंदी के बाद लोगों द्वारा जमा कराए गए 14.86 लाख करोड़ रुपए में से कितना कालाधन है. कितना शुद्ध हुआ? असली कालेधन के कुबेर तो सुरक्षा के लिए तक्षक की तरह  बैंकों में बैठे भ्रष्ट इंद्र की शरण में चले गए जहां उन्हें अभयमुक्ति मिल गई. बेईमानी में इंद्र का कोई सानी नहीं था, इसीलिए तक्षक इंद्र के पास गया.

राजाओं ने यज्ञ हमेशा अपने लिए किए हैं, जनता के कल्याण के लिए नहीं. पुत्रेष्ठि यज्ञ से ले कर अश्वमेध यज्ञ तक राजा की निजी इच्छापूर्ति के लिए हुए. राजा इस तरह के फैसले कभी जनता से पूछ कर नहीं लेते. उन के निर्णय निरंकुश, गैरलोकतांत्रिक होते हैं. जनमेजय ने भी सर्पमुक्त पृथ्वी का निर्णय तक्षक से निजी दुश्मनी के चलते लिया था. जनता के भले के लिए नहीं. युद्ध राजाओं द्वारा आपसी लूट और साम्राज्य बढ़ाने के मकसद से होते रहे हैं.

 अब कैशलैस यज्ञ चल रहा है. यज्ञ का विरोध तो कोई कर ही नहीं सकता. यह तो देवयज्ञ था और देवयज्ञ नहीं करने वाले चोर, पापी हो जाते हैं, इसीलिए लाइनों में लगे लोग परेशानी के बावजूद मोदी के इस यज्ञ को अश्वमेध यज्ञ से कम नहीं मान रहे थे हालांकि मोदी के इस महान यज्ञकर्म में विघ्न डालने वाले, विध्वंस करने वाले बीच में आए कुछ बेईमान बैंक कर्मचारियों के कारनामों को देवइच्छा ही समझा गया.

शुद्धिकरण के नाम पर जनता से लूटे गए इस धन में से कुछ गरीबों में बांटने का ऐलान और हर गर्भवती महिला को बच्चा जन्मने के बाद 6 हजार रुपए का सौभाग्यवती, 100 पुत्रों की मां होने जैसा आशीर्वाद मोदी को वापस सत्ता दिलाने वाला सिद्ध होगा या फिर सर्पयज्ञ के बाद जनमेजय की तरह संन्यास  ले कर जंगल की ओर चल देने जैसा. इस देश में राजा के अंधभक्त अनुयायी अपने शासक के प्रति धर्म द्वारा थोपी गई सोच से अलग हट कर चलना सीख पाएंगे, इस में संदेह है.

फिल्म के निर्देशकों को मंहगी कारों का तोहफा

तेलुगू फिल्म सिंघम-3 या एसआइथ्री में मुख्य भूमिका निभाने वाले अभिनेता सूर्या ने हाल ही में, फिल्म के निर्देशक हरि को एक महंगी कार तोहफे में दी है. ऐसा लगता है कि सूर्या भी सुपरस्टार महेश बाबू के नक्शे कदम पर चल रहे हैं.

हम आपको बता दें कि कुछ दिनों पहले ही अभिनेता महेश बाबू ने भी अपनी फिल्म श्रीमंतुडु के लिए, फिल्म के निर्देशक शिवा को एक आलीशान कार भेंट की है.

सूर्या और महेश, पिछले 12 वर्षों से तमिल और अन्य फिल्मों के लिए काम कर रहे हैं. तेलुगू फिल्म सिंघम-3 को दर्शकों से बहुत ही सकारात्मक प्रतिक्रिया प्राप्त हुई है. फिल्म की सफलता पर, फिल्म के निर्देशक और पूरे कलाकारों के साथ फिल्म की पूरी टीम को बेहद खुश है.

इसी हफ्ते फिल्म की सफलता पर हैदराबाद में आयोजित की गई एक पार्टी में, फिल्म के अभिनेता सूर्या ने कुछ खास बातों का खुलासा किया है. वे कहते हैं कि उनके जीवन में उनके पिता से उन्हें दूसरा हग इसी फिल्म के लिए मिला है और पिता के इस प्रेम को देखकर वे सातवें आसमान पर पहुंच गए. फिल्म की सफलता को लेकर आभार व्यक्त करने के लिए सूर्या ने, निर्देशक हरि को एक लक्जरी टोयोटा फॉर्च्यूनर कार उपहार दी.

सूर्या ने कहा कि वे जल्द ही आगे सिंघम-4 भी करना चाहते हैं और अगले 4-5 सालों में फिल्म के आने की संभावना बताई. आखिर में सूर्या ने दर्शकों को धन्यवाद दिया और कहा कि दर्शकों ने ही इस फिल्म को एक ब्लॉकबस्टर फिल्म बनाया है.

फिल्म रिव्यू : द गाजी अटैक

यदि आप यह जानना चाहते हैं कि 1971 के पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में विशाखापट्टनम के पास समुद्र के अंदर किस तरह पाकिस्तानी समुद्री बेडे़ के जहाज पीएनएस गाजी को डुबाया गया था, तो फिल्म ‘‘द गाजी  अटैक’’ को जरुर देखना चाहिए. फिल्म शुरू से अंत तक बांधकर रखती है, मगर जिन्हे सिर्फ मनोरंजन चाहिए,उन्हे यह फिल्म निराश कर सकती है.

सर्वविदित है 1971 के भारत पाक युद्ध के दौरान विशाखापट्टनम के पास पाकिस्तानी जलयान ‘‘पीएनएस गाजी’’ डूबा था. पर उस वक्त भारतीय जलसेना ‘एस 21’ जहाज पर सवार थी. यानी कि नेवी और इस जहाज पर सवार पाकिस्तानियों के बीच क्या हुआ था, इसका सच किसी को पता नहीं है. क्योंकि इस मसले से जुड़ी सभी फाइलें क्लासीफाइड हैं. उस जलयान की अनकही कहानी को अब तीन भाषाओं की फिल्म ‘‘गाजी’’ में लेकर आए हैं फिल्मकार संकल्प रेड्डी.

हिंदी, तेलगू व तमिल इन तीन भाषाओं में बनी 1971 युद्ध के समय विशाखापट्टनम के पास डूबे पाकिस्तानी जलयान ‘‘पीएनएस गाजी” की अनकही कहानी और भारतीय जल सेना यानी कि नेवी के वीरों की दास्तान बयां करने वाली फिल्म ‘‘द गाजी अटैक’’ की कहानी है 1971 की. जब आज का बांगलादेश, पूर्वी पाकिस्तान के रूप में जाना जाता था. मगर पूर्वी पाकिस्तान के नेता मुजीबुर रहमान की अगुवाई में हुए आंदोलन व युद्ध के बाद वह आजाद होकर बांगलादेश बन गया था.

उसी युद्ध में जब पाकिस्तानी सेना पूर्वी पाकिस्तान के बागियों पर कारवाही करती है, तभी खबर आती है कि समुद्र के रास्ते पाकिस्तान के पीएनएस गाजी से भारत के आईएनएस विक्रांत पर हमला किया जाने वाला है. भारतीय नौ सेना प्रमुख वी पी नंदा (ओम पुरी) इस सच को जानने के लिए ‘‘सर्च’’ अभियान के तहत ‘एस 21’नामक पनडुब्बी को भेजते हैं. इस पनडुब्बी के कैप्टन रणविजय सिंह (के के मेनन) व लेफ्टीनेट कमांडर अर्जुन वर्मा (राणा डग्गू बटी) व देवराज (अतुल कुलकर्णी) हैं.

एक तरफ राजनीतिक सोच चल रही है, तो दसरी तरफ पनडुब्बी के अंदर रणविजय सिंह और अर्जुन वर्मा के बीच आपसी सोच का टकराव व अपने आपको ताकतवर बताने की लड़ाई भी है. पर अंत में दोनों एक दूसरे को समझ जाते हैं. बहरहाल, भारतीय नौसेना के यह वीर पानी के अंदर कई तरह की मुसीबतों व पाकिस्तानी नौ सेना के प्रहार का जवाब देते हुए अंततः गाजी को डुबाते हैं. मगर कैप्टन रणविंजय सिंह की मौत हो जाती है.

अति चुस्त व कसी हुई पटकथा पर बनी यह फिल्म दर्शकों को कभी भावुक बनाती है, कभी डर पैदा करती है,तो कभी उनके अंदर देशभक्ति भी जगाती है. संवाद फिल्म की गुणवत्ता को बढ़ाते हैं. निर्देशक संकल्प ने नौसेना की कार्यप्रणाली वगैरह पर काफी शोधकार्य किया है, इस बात का अहसास यह फिल्म दिलाती है. यह फिल्म इस बात का सबूत है कि भारत में भी सीमित साधनों के बावजूद सबमैरिन यानी कि पानी के अंदर युद्ध फिल्म का बेहतर निर्माण किया जा सकता है.

तकनीक के स्तर पर भी गुणवत्ता वाली फिल्म है. स्पेशल इफेक्ट्स वगैरह काफी अच्छे बन पड़े हैं. फिल्म के अंदर हर घटनाक्रम का अपना लाजिक है. फिल्म में सेना के नियम, कानून, अनुशासन आदि को भी बहुत बेहतर तरीके से उकेरा गया है. कम से कम भारत में युद्ध व सेना को लेकर इतनी बेहतरीन फिल्म नहीं बनी है. फिल्म को यथार्थपरक बनाने का प्रयास किया गया है, जिसके चलते कहीं कहीं यह फिल्म डाक्यूमेंटरी होने का अहसास भी दिलाती है. कैमरामैन माधी भी बधाई के पात्र हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो इस फिल्म में राणा डग्गूबटी, के के मेनन, ओमपुरी, अतुल कुलकर्णी व राहुल सिंह सभी ने बेहतरीन परफॅार्मेंस दी है. के के मेनन का किरदार भी काफी अच्छा है. राणा डग्गूबटी के किरदार में तो कई डायमेशंस हैं. मगर फिल्म में बांगलादेशी रिफ्यूजी कम डाक्टर के किरदार की कोई आवश्यकता नहीं थी. सभी जानते हैं कि नौ सेना के बेड़े व हर पनडुब्बी में डाक्टर होता ही है. इस फिल्म में तापसी पन्नू की उपस्थिति कहीं से भी कहानी में कोई योगदान नहीं देती. यदि फिल्म में तापसी पन्नू का किरदार न होता तो भी कहानी में कोई असर न पड़ता.

फिल्म में राजनीति पर कटाक्ष भी किया गया है. फिल्म में इशारों व संवादों के माध्यम से कहा गया है कि सीमा पर सैनिक मरते रहते हैं, मगर हमारी सरकारें राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के चलते निर्णय लेने में देरी करती हैं. फिल्मकार ने फिल्म की शुरुआत में ही उनकी फिल्म को इतिहास का पूर्ण सत्य न माना जाए, ऐलान कर पाकिस्तान को खुश कर पाकिस्तान में अपनी फिल्म के प्रदर्शन की उम्मीद बनायी है.

दो घंटे पांच मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘द गाजी अटैक’’ का निर्माण अवनेश रेड्डी, वेंकटरमन्ना रेड्डी, प्रसाद,एनएम पाशा व जगन मोहन वांछा ने किया है. फिल्म के निर्देशक संकल्प रेड्डी, पटकथा लेखक संकल्प रेड्डी,गंगराजू गुन्नम व निरंजन रेड्डी, कैमरामैन माधी हैं. और कलाकार हैं-राणा डग्गुबटी, के के मेनन, तापसी पन्नू,अतुल कुलकर्णी, ओम पुरी, राहुल सिंह, मिंलिंद गुणाजी व अन्य.

फिल्म “भूमि” से वापसी करेंगे संजय दत्त

संजय दत्त फिल्म “भूमि” से बड़े पर्दे पर अपनी वापसी कर रहे हैं. संजय दत्त ने फिल्म की शूटिंग 15 फरवरी से आगरा में शुरू कर दी है. फिल्म में उनके और अदिति राव हैदरी के लुक की तस्वीरें बाहर आई हैं.

फिल्म “भूमि” को उमंग कुमार डायरेक्ट कर रहे हैं. जेल की सजा पूरी करने के बाद संजय दत्त पहली बार कैमरा फेस करने वाले हैं. इसलिए संजय दत्त के लिए यह बेहद खास मौका है. सरबजीत के बाद डायरेक्टर उमंग कुमार “भूमि” को डायरेक्ट कर रहे हैं. “भूमि” की कहानी एक पिता और बेटी के रिश्तों पर आधारित है. अदिति राव हैदरी फिल्म “भूमि” में संजय की बेटी के रोल में हैं. फिल्म में शेखर सुमन भी बेहद खास रोल में दिखाई देंगे, और यह भी सुना है कि शरद केलकर भूमि में विलेन का किरदार निभा रहे हैं.

संजय दत्त आखिरी बार राजकुमार हिरानी की फिल्म पीके में नजर आए थे. फिल्म में उन्होंने आमिर खान के दोस्त का किरदार निभाया था. ऐसा सना जा रहा है कि 4 अगस्त तक फिल्म रिलीज के लिए तैयार हो जायगी. फिल्म “भूमि” से संजय तीन साल बाद सिल्वर स्क्रीन पर वापसी करेंगे.

खान कलाकारों से क्या चाहती हैं प्रियंका बोस

हिंदी, बंगला, मराठी व अंग्रेजी फिल्मों के अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाटक ‘‘निर्भया’’ के हजारों शो कर चुकी अभिनेत्री प्रियंका बोस हमेशा सामाजिक मुद्दों को उकेरने वाली फिल्मों में ही अभिनय करती हैं. फिर चाहे वह नारी प्रधान फिल्म ‘गणगोर’ हो या महिला तस्करी पर ‘सोल्ड’ हो या ‘चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज पर बनी फिल्में हो या गैंग रेप पर नाटक ‘निर्भया’ हो अथवा सिंगल पैरेंटिंग पर आधारित उनकी ताजातरीन फिल्म ‘‘लायन’’ हो.

ऑस्ट्रेलियन निर्देशक गाथ्र की फिल्म ‘‘लायन’’ में प्रियंका बोस ने एक ऐसी भारतीय गांव की औरत का किरदार निभाया है, जिसका आठ साल का बेटा सरू खो जाता है, पर अंततः 21 साल के बाद वह महिला अपने बेटे सरू से मिलती है, जो कि अब ऑस्ट्रेलिया में रह रहा है. फिल्म ‘‘लायन’’ को ऑस्कर अवार्ड के लिए छह कटेगरी में नोमीनेट किया गया है. 26 फरवरी को खुद प्रियंका बोस ‘ऑस्कर अवार्ड’ समारोह में रेड कार्पेट पर फिल्म के अन्य कलाकारों व निर्देशक गार्थ के साथ चलने वाली हैं.

प्रियंका बोस ‘‘लायन’’ की वजह से मिल रही शोहरत से काफी उत्साहित हैं. मगर उन्हें अफसोस है कि भारतीय कलाकार अपने ओहदे का उपयोग सामाजिक मुद्दों के संदर्भ में नहीं करते हैं. एक खास मुलाकात के दौरान प्रियंका बसु ने ‘‘सरिता’’ पत्रिका से बात करते हुए कहा, ‘‘औरतों के साथ जो कुछ गलत हो रहा है, उस पर हम बहुत विचार करते हैं. विचार करते करते थक जाते हैं. मेरी समझ में नहीं आता कि हमारे स्टार कलाकार कब तक गोरेपन की क्रीम का विज्ञापन करते रहेंगे. एक ओहदे में आ गए हैं, तो उन्हें इस तरह के मुद्दों पर काम करना चाहिए. कैलाश सत्यार्थी को देखिए, वह क्या काम कर रहे हैं. कैलाश सत्यार्थी के लिए मैं तीन फिल्मों का निर्माण कर चुकी हूं. यह तीनों फिल्में चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज पर है. मैं इसे बहुत महत्वपूर्ण मानती हूं. मुझे लगता है कि मैं इस ओहदे पर पहुंच चुकी हूं कि समाज में व्याप्त इन बुराईयों व अपराधों के खिलाफ मुझे मुखर होना चाहिए. इसीलिए सिनेमा बना रही हूं. सिनेमा की अपनी ताकत है. ऐसी चीजें दर्षकों तक पहुंचनी चाहिए. चाइल्डसेक्सुअल एब्यूज की आवाज हर किसी के कानों में पहुंचनी चाहिए. अन्याय होता है. जरूरत है कि लोग अपना नजरिया बदले. हमारे देश के कलाकारों को भी इस दिशा में काम करना चाहिए. मैं सभी खान कलाकारों से निवेदन करना चाहूंगी कि वह समाज के इस तरह के मुद्दों पर काम करें. विदेषों में रॉबर्ट डिनेरो हों या मार्क अपोलो हों, यह सभी सामाजिक मुद्दों को लेकर काम करते रहते हैं.’’

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