स्वाद लाजवाब: कड़ाही चिकन

सामग्री

500 ग्राम बोनलैस चिकन

2 बड़े प्याज कटे

4 टमाटर कटे

1/2 छोटा चम्मच जीरा पाउडर

1 छोटा चम्मच धनिया पाउडर

2 शिमला मिर्चें कटी

1/2 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर

1/2 छोटा चम्मच हलदी पाउडर

1 बड़ा चम्मच टोमैटो प्यूरी

1 तेज पत्ता

1/2 छोटा चम्मच चिकन मसाला

1 बड़ा चम्मच तेल

नमक स्वादानुसार

1/2 छोटा चम्मच जीरा

1/2 छोटा चम्मच अदरक लहसुन बारीक कटे.

विधि

एक पैन में जीरा पाउडर व धनिया पाउडर डाल कर ड्राई रोस्ट कर लें. अब एक कड़ाही में तेल गरम कर के जीरा, तेजपत्ता, अदरकलहसुन, प्याज व हरीमिर्च डाल कर भूनें. फिर टमाटर के साथ रोस्टेड जीरा व धनिया पाउडर, नमक, हलदी, लालमिर्च पाउडर व टोमैटो प्यूरी डाल कर अच्छी तरह भूनें.

अब थोड़े से पानी के साथ चिकन डालें और ढक कर चिकन पक जाने तक पकाएं. फिर चिकन मसाला व शिमलामिर्च डाल कर 2 मिनट तक और पकाएं, धनियापत्ती से सजा कर परोसें.

ओल्ड इज गोल्ड का फैशन ट्रैंड

क्या आप जानती हैं कि करीना कपूर यानी बेबो ने अपनी शादी में शर्मिला टैगोर का वही शरारा पहना था, जो शर्मिला टैगोर ने अपनी शादी के दिन पहना था और पटौदी परिवार की परंपरा को निभाया था?

बॉलीवुड की इसी तर्ज पर चलते हुए आज की युवतियों को भी पुरानी साडि़यों और लहंगों को रीसाइकल कर नया रूप देना और उन्हें पहन कर फ्लौंट करना खासा भा रहा है. इस से भावनात्मक जुड़ाव

तो झलकता ही है, साथ ही पुराना फैशन भी धरोहर के रूप में जीवित रहता है. अगर फैशन डिजाइनरों की मानें तो मां, दादी या सास के लहंगे को अपनी शादी में पहनने का चलन आजकल फैशन में है.

बचपन से आपको अपनी मम्मी, दादी या नानी का लहंगा या फिर बनारसी साड़ी पसंद थी तो आप अपनी शादी में उस साड़ी का रीवैंप करा कर नया लुक देने के साथ साथ अपने रिश्तों के साथ भावनात्मक जुड़ाव को भी मजबूत कर सकती हैं.

लहंगों की रीडिजाइनिंग

फैशन डिजाइनर, मीनाक्षी सभरवाल का कहना है कि महिलाएं पुराने लहंगे को ही फिर से नए तरीके से तैयार करवा रही हैं. अगर फैब्रिक की बात करें तो ब्रौकेड, टिशू, चंदेरी, शिफौन व जौर्जेट के लहंगों पर बेहतरीन काम करवा कर उन्हें खूबसूरत बनाया जाता है. इन पर गोटा लेस, सोना, चांदी व कलर्ड स्टोंस लगा कर खूबसूरत लुक दिया जाता है.

निम्न टिप्स पर अमल कर आप अपनी मां या दादी की पुरानी साड़ी या फिर लहंगे को नया रूप दे सकती हैं.

1. लहंगे का बौर्डर चेंज कर उसे नया लुक भी दे सकती हैं जैसे मैचिंग चोली के बजाय पोंचू, शर्ट या कंट्रास्ट कलर ट्राई करें. इस से ईजी लुक मिलेगा.

2. कांजीवरम या बनारसी साड़ी से खूबसूरत अनारकली बनवा सकती हैं. इस से आप की साड़ी को नया लुक भी मिलेगा और इसे पहनना भी आसान हो जाएगा.

3. आप अपनी मां या दादी की प्लेन सिल्क की साड़ी का गाउन भी बनवा सकती हैं और रिसैप्शन या संगीत कार्यक्रम में पहन सकती हैं.

4. अगर साड़ी का बौर्डर घिस या फट गया है, तो उस पर नया बौर्डर लगवाया जा सकता है. अगर आप दिल्ली में रहती हैं, तो चांदनी चौक का किनारी बाजार स्टाइलिश बौर्डर के लिए परफैक्ट हब है. बौर्डर चेंज के बाद साड़ी का रूप बिलकुल निखर जाएगा यानी साड़ी बिलकुल नई जैसी हो जाएगी और ऐसी साड़ी आप को बाजार में कहीं नहीं मिलेगी. अगर साड़ी का बीच का हिस्सा कट या फट गया है, तो आप उस जगह पर कंट्रास्ट कलर का जौर्जेट या शिफौन का फैब्रिक लगवा सकती हैं. इस से आप की साड़ी डिजाइनर बन जाएगी.

ऐक्सपैरिमैंट करें

शादी के टाइम आप अपनी मां के लहंगे को क्रौप टौप या कोर्सेट के साथ पहन कर इंडोवैस्टर्न लुक पा सकती हैं. आप चाहें तो लहंगे को शीयर जैकेट के साथ भी पहन सकती हैं. इस से लहंगे को नया लुक मिलेगा.

लहंगे को बनाएं अनारकली

अपनी मां के लहंगे या चोली से अनारकली भी बनवा सकती हैं. इस के लिए मनपसंद फैब्रिक को लहंगे के घेरे के साथ सिलवा लें. ऐसे ही अगर आप के पास कोई पुरानी लेकिन स्टाइलिश चोली है तो आप उस के साथ मनचाहा फैब्रिक जुड़वा कर अनारकली बनवा सकती हैं.

बनारसी साड़ी का हैवी दुपट्टा

आप अपनी मां की बनारसी साड़ी का हैवी दुपट्टा भी बनवा सकती हैं और प्लेन स्कर्ट या सलवारसूट के साथ पेयर कर सकती हैं. ऐसा करने से आप के पैसे भी बचेंगे और नया व ऐक्सक्लूसिव लुक भी मिलेगा. दुपट्टा स्ट्रेट फिट वाले सूट, अनारकली, पटियाला सलवारकमीज सभी के साथ बखूबी जंचता है.

लेटैस्ट कलर इन ट्रैंड

लाल रंग अब आउट औफ ट्रैंड हो गया है यानी लाल रंग की अब कोई बंदिश नहीं रह गई है. अब लड़कियां नएनए रंग आजमा रही हैं. आज की दुलहन पेस्टल रंग जैसे हलका गुलाबी, सी ग्रीन, क्रीम

रंग या गाढ़ा नारंगी रंग भी कौन्फिडैंटली कैरी कर रही हैं.

लाइट वेट नैट लहंगे

भारी भरकम लहंगों की जगह अब लाइट वेट नैट और वैलवेट के लहंगों ने ले ली है. ये लाइट वेट होने से काफी पसंद किए जा रहे हैं. नैट लहंगे डार्क और लाइट दोनों ही कलर कौंबिनेशन के साथ मौजूद हैं. लाइट पिंक, पर्पल, क्रीम के साथ यलो, ब्लू, ग्रीन, रैड आदि कलर कौंबिनेशन के नैट के लहंगे युवतियों के आकर्षण का केंद्र हैं. ये स्टाइलिश लुक और डिजाइनर होने के कारण काफी खूबसूरत लुक और जुदा अंदाज देते हैं.

छोटे पर्दे की रौनक हैं ये बाल कलाकार

जहां पहले लीड रोल में सास-बहु का किरदार लोगों को काफी पसंद आता था, तो वहीं अब टीवी सीरियल पर नन्हें किरदारों ने लोगों के दिल में जगह बना ली है. आजकल टीवी सीरियल्स में सास बहु के बजाए नन्हें किरदारों को लीड रोल में पसंद किया जा रहा है.

यह कहना गलत नहीं होगा कि जहां एक ओर किसी भी शो का सक्सेस मंत्रा उस शो की कहानी और कॉसेप्ट दोनों ही होते हैं. वहीं ये चाइल्ड आर्टिस्ट अपनी एक्टिंग के दम पर टेलीविजन की दुनिया पर राज कर रहे हैं.

अर्शीन नामदार

10 साल की चाइल्ड आर्टिस्ट अर्शीन नामदार स्टार प्लस के सीरियल ‘नामकरण’ में दमदार भूमिका में नजर आ रही हैं. सीरियल में वह एक ऐसी बेटी का रोल प्ले कर रही हैं, जिसमें उसके पिता हिंदू और मां मुस्लिम है.

आर्यन प्रजापति

आर्यन स्टार प्लस के सीरियल ‘इश्कबाज’ में अनिका के छोटे भाई साहिल के रोल में नजर आ रहे हैं, जो फिजिकली चैलेंजड हैं. यह रोल लोगों के बीच काफी पॉपुलर हो गया है. शो में उनका सेंस ऑफ ह्यूमर देखते ही बनता है.

रुद्र सोनी

सोनी टीवी पर प्रसारित सीरियल ‘बाजीराव पेशवा’ से 12 साल के रुद्र सोनी सबकी वाहवाही बटोर रहे हैं. बाजीराव के रोल को झोली में डालने के लिए रुद्र ने इतिहास के पन्ने खंगाले. साथ ही उन्होंने इस रोल को पाने के लिए घुड़सवारी भी सीखी.

रुहानिका धवन

छोटे पर्दे की सबसे क्यूट चाइल्ड आर्टिस्ट रुहानिका धवन का जादू अब तक चल रहा है. मोस्ट पॉपुलर सीरियल ‘ये हैं मोहब्बतें’ में रुही के रोल से सबके दिलों पर राज कर रहीं रूहानिका शो में लीप के बाद भी ‘पीहू’ के रोल में नजर आ रही हैं.

आन्या अग्रवाल

नए टेलीविजन शो ‘मेरी दुर्गा’ में आन्या अग्रवाल दुर्गा का रोल प्ले कर रही हैं. इससे पहले आन्या ‘सीया के राम’ शो में अपनी एक्टिंग का लोहा मनवा चुकी हैं.

बिग बी का बॉलीवुड में 48 सालों का सफर

इसी हफ्ते बीते बुधवार यानि कि तारीख 15 फरवरी की रात को बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग पर लिखा, कि  “इस तिथि से संबंधित घटनाओं का जैसे एक तूफान है. साल 1969 में फरवरी की 15 तारीख की तिथि पर ही मैंने फिल्म के उद्योग में अधिकारिक रूप से प्रवेश लिया था और अपनी पहली फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ पर हस्ताक्षर किया था”

74 वर्षीय अमिताभ बच्चन ने अपने इस सिनेमाई सफर के चार से भी ज्यादा दशकों का समय पूरा कर लिया है. वे कहते हैं कि वे 15 फ़रवरी 1969 को बॉलीवुड के एक “आधिकारिक प्रवेशी या प्रतियोगी” बने थे.

बॉलीवुड में अपने चार दशकों या 48 सालों की एक लंबी यात्रा के दौरान, बिग बी ने 100 से भी अधिक फिल्मों में काम किया है. भारतीय सिनेमा में उनके काम और कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए साल 1984 में महानायक अमिताभ बच्च्न को पद्मश्री, 2001 में उन्हें पद्म भूषण और हाल ही में साल 2015 मे पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था.

साल 2007 में फ्रांस की सरकार द्वारा अमिताभ बच्चन को पूरी दुनिया में सिनेमा जगत में एक असाधारण करियर के लिए, फ्रांस के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘’Knight of the Legion of Honour’’ से नवाजा गया. जून 2000 में अमिताभ बच्चन वे पहले ऐसे एशियाई व्‍यक्ति थे जिनकी लंदन के मैडम तुसाद संग्रहालय में वैक्‍स की मूर्ति स्‍थापित गई थी.

अमिताभ बच्चन ने कई सुपर डुपर हिट और बहुत ही सफल रहीं फिल्मों जैसे “बॉम्बे टू गोवा”, “जंजीर”, “अभिमान”, “नमक हराम”, “शोले”, “अग्निपथ” और “दीवार” में काम किया है. अपने बॉल्ग पर फिल्म पीकू के सुपर स्टारमबिग बी ने इस फिल्म के सेट के साथ-साथ, कई अन्य काले और सफेद तस्वीरों की एक लंबी श्रृंखला को भी साझा किया है.

विवाह में शर्तें उचित या अनुचित

मेरी एक परिचिता की बेटी को लड़के वाले देखने आए. सारी बातें पक्की हो जाने के बाद जब लड़का व लड़की ने एकांत में औपचारिक वार्त्तालाप किया तो लड़के ने लड़की से प्रश्न किया, ‘‘विवाह के बाद यदि फेसबुक, व्हाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया का प्रयोग करने से हम मना करेंगे तो तुम बंद कर दोगी?’’

लड़की ने उत्तर दिया, ‘‘नहीं, बिलकुल नहीं.’’ साथ ही बाहर आ कर लड़की ने विवाह करने से भी यह कह कर मना कर दिया कि लड़का संकुचित मानसिकता का है. अभी से ऐसी शर्त रखी जा रही है तो विवाह के बाद तो जीना ही मुश्किल हो जाएगा.

एक अन्य परिवार में लड़के वालों ने लड़की वालों से कहा, ‘‘हमारे लगभग सौ बराती होंगे. उन के स्वागतसत्कार में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए. साथ ही, हरेक बराती को विदाई में सोने का सिक्का देना होगा.’’

सीमा को एक लड़का देखने आया. औपचारिक वार्त्तालाप के बाद उस के मातापिता ने कहा, ‘‘देखो बेटी, हमारे घर की सभी बहूबेटियां नौकरी करती हैं तो तुम्हें भी हम घर में बैठने नहीं देंगे. बस, शादी के बाद एमबीए कर लेना ताकि सैलरी पैकेज अच्छा हो जाए, और शान से नौकरी करना.’’

सीमा को नौकरी करने के स्थान पर आराम से घर पर रहना पसंद था, सो उस ने शादी करने से इनकार कर दिया.

आजकल अरेंज मैरिज में लड़के वाले लड़की वालों के समक्ष शर्तों का पिटारा कुछ इस प्रकार खोलते हैं मानो लड़की और उस के परिवार का कोई अस्तित्व

ही नहीं. कुछ लड़कियों और उन के मातापिता से की गई बातचीत के आधार पर हम ने जाना कि कैसीकैसी शर्तें लड़के वाले लड़की और उस के मातापिता के समक्ष रखते हैं-

–       शादी के बाद नौकरी छोड़नी पड़ेगी और यदि लड़की कामकाजी नहीं है तो यह, कि हमें कामकाजी बहू पसंद है इसलिए नौकरी करनी पड़ेगी.

–       हमारे पास मेहनत से कमाया हुआ सबकुछ है. हमें कुछ चाहिए नहीं. पर फिर भी, शादी का आप का बजट कितना है?

–       शादी के बाद मायके से कोई रिश्ता नहीं रखोगी और उन की किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं करोगी. जो भी कमा कर लाओगी, हमारे हाथ पर ही रखोगी.

–       तुम एमबीए नहीं हो, हमें तो एमबीए लड़की ही चाहिए. शादी के बाद एमबीए करना पड़ेगा.

–       मोटी बहुत हो, शादी से पहले 10 किलो तक वजन कम करना पड़ेगा.

–       35 साल की उम्र तक अविवाहित रहने के पीछे क्या कारण रहा.

–       नाक नहीं छिदी है, शादी से पहले छिदवानी पड़ेगी.

–       एक लड़के वाले ने यह कह कर रिश्ता करने से इनकार कर दिया कि लड़की के पिता को आंखों की लाइलाज बीमारी है.

उपरोक्त शर्तों को पढ़ कर पता चलता है कि समाज में स्त्री को किस दृष्टि से देखा जाता है. इस प्रकार की शर्तें लड़की के लिए ही क्यों? आज के समय में मातापिता लड़की और लड़के दोनों को पढ़ालिखा कर आत्मनिर्भर बनाने में समान पैसा, और परिश्रम व्यय करते हैं, फिर दोनों में असमानता क्यों? क्या अरेंज मैरिज में लड़की की अपनी इच्छा कोई माने नहीं रखती?

एक कंपनी में मैनेजर के पद पर काम कर रही नेहा गोयल कहती हैं, ‘‘कोई भी रिश्ता शर्तों पर नहीं टिक सकता क्योंकि शर्तों पर तो सिर्फ बिजनैस डील होती है, रिश्ता नहीं निभाया जा सकता.’’

वरिष्ठ मैरिज काउंसलर और मनोवैज्ञानिक निधि तिवारी कहती हैं, ‘‘विवाह से पूर्व लड़की व लड़की दोनों का ही शर्त रखना कुछ हद तक सही है क्योंकि विवाह से पूर्व ही सारी बातें साफ हो जाती हैं तो भविष्य में विवाद की आशंका नहीं होती. दोनों को यदि एकदूसरे की बात पसंद है तो शादी होगी वरना नहीं.

‘‘इस की अपेक्षा, विवाह के बाद यदि कोई शर्त रखी जाती है तो कई बार विवाह जैसा पवित्र बंधन टूटने के कगार तक पहुंच जाता है. दरअसल, लड़की व लड़का मानसिक रूप से उस स्थिति के लिए तैयार नहीं होते. परंतु सिर्फ लड़के के परिवार या लड़के के द्वारा ही शर्तों का रखना पूरी तरह गलत है.’’

शर्तों में बंधा बंधन

विवाह एक प्यारा सा बंधन है जो परस्पर सहयोग, समझदारी, विश्वास और आपसी सामंजस्य पर टिका होता है. इस बंधन में भावना प्रधान होती है. ऐसे बंधन में बंधने से पूर्व ही यदि शर्तें लाद दी जाएंगी तो उस का टिकना ही संदेहास्पद हो जाएगा. इसलिए इस में किसी भी प्रकार की अनपेक्षित शर्तों का रखा जाना बेमानी है. शर्त रखने के स्थान पर दोनों परिवारों के लोग आपसी बातचीत के माध्यम से अपनी इच्छाएं साझा करें ताकि दोनों को एकदूसरे की विचारधारा का पता लग सके.

कितनी बार देखा जाता है कि विवाह के बाद समय और परिस्थिति की मांग को देखते हुए बच्चों की परवरिश की खातिर अथवा अन्य कारणों से महिलाएं नौकरी खुद ही छोड़ देती हैं, या परिवार की आवश्यकतानुसार नौकरी करती हैं. विवाहोपरांत पति, पत्नी और ससुराल के परस्पर व्यवहार व सहयोग के बाद अनेक समस्याएं खुद हल हो जाती हैं परंतु विवाह पूर्व जब उन्हीं समस्याओं को शर्त के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तो रिश्ते की शुरुआत में ही कटुता आ जाती है जो कई बार ताउम्र भी समाप्त नहीं हो पाती.

विवाह 2 परिवारों और संस्कृतियों का मिलन होता है, नई रिश्तेदारी का सृजन होता है, लड़का व लड़की इस से अपने एक नवीन जीवन का प्रारंभ करते हैं, नवीन रिश्तों को जीना शुरू करते हैं. ऐसे नाजुक रिश्ते में बंधने से पूर्व ही किसी भी प्रकार की शर्त रखना सरासर गलत है. वास्तविकता तो यह है कि विवाह में लड़की के मातापिता अपने खून से सींचे गए अंश को लड़के वालों के परिवार को दे कर शृंगारित करते हैं. ऐसे में लड़की वालों का स्थान लड़के वालों से ऊपर हो जाता है. सो, उन्हें हेय न समझ कर, बराबरी का मानसम्मान दिया जाना चाहिए.

विवाह में किसी भी प्रकार की शर्त का रखा जाना सर्वथा अनुचित है. बिना शर्त प्यार और सहयोग की भावना से किए गए विवाह में लड़की अपने ससुराल के प्रति प्यार, विश्वास और सम्मान की भावना ले कर सासससुर के घर में प्रवेश करती है जिस से घर में चहुंओर खुशियां रहती हैं.

नाच पर आंच क्यों

मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के ब्लौक छपारा की भीमगढ़ कालोनी में छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले से आ कर रह रही लता डांस पार्टी में 40 लोग थे. इन में नौजवान लड़कियों की तादाद ज्यादा थी. भीमगढ़ कालोनी में पार्टी के सदस्यों ने डेरा डाला. किराए पर लिए गए कच्चेपक्के मकानों में बुनियादी सहूलियतों का टोटा था, पर इन्हें इस से कोई खास फर्क पड़ा, हो ऐसा लगा नहीं.

अस्थायी गृहस्थी में जरूरत का सारा सामान था, मसलन खाना बनाने के बरतन, कपड़े रखने के लिए पेटियां, सूटकेस और इन के लिए सब से ज्यादा अहम मेकअप का सामान जो करीने से सजा कर रखा गया था. डांसरों की नई चमकीली ड्रैसें संभाल कर दीवार के सहारे टांग दी गई थीं. 3-4 अधनंगे बच्चे भी इन के साथ थे जो दिनभर हुड़दंग मचाते रहते थे पर गांव के दूसरे बच्चे इन के साथ नहीं खेलते थे, जिस का इन्हें मलाल था.

बच्चे तो ठहरे बच्चे, जो यह नहीं समझ पाए कि गांव के बच्चों को उन से दूर रहने की नसीहत और समझाइश दी गई है. पर बिगड़ते माहौल का अंदाजा डांस पार्टी की उम्रदराज मुखिया यानी मैनेजर जोति बाई को था और कमसिन, खूबसूरत, तीखे नैननक्श वाली डांसर रति को भी. पर इन्हें इस तरह के एतराज का तजरबा है, लिहाजा इन्होंने कोई खास तवज्जुह गांव वालों के एतराज पर नहीं की. फिर भी एक चिंता तो लग ही गई थी.

छपारा में डेरा डालने से पहले ये लोग थाने गई थीं और वहां अपनी आमद दर्ज कराई थी. आमद के साथ मुंहजबानी यह ब्योरा भी इन्होंने थानाध्यक्ष को दिया था कि हम नाचनेगाने वाले लोग हैं और हर साल यहां आ कर ठहरा करते हैं. ऐसा एहतियात के तौर पर इसलिए किया गया था कि अगर इस इलाके में कोई जुर्म हो तो गांव वाले उस का ठीकरा डांस पार्टी के सिर पर न फोड़ दें और दूसरा मकसद इस से भी ज्यादा अहम, अपने ग्रुप की सुरक्षा का था.

लता डांस पार्टी के आ जाने की खबर मिनटों में इलाके में फैल गई थी और अपने डेरे पर पहुंचने के तुरंत बाद ही जोतिबाई को बुकिंग मिलनी शुरू हो गई थीं. कुछ पुराने जानपहचान वाले लोग खासतौर से मिलने आए थे जिन्होंने यह तसल्ली कर ली थी कि डांस पार्टी साल के आखिर तक तो रुकेगी ही, और अगर काम मिलता रहा तो होली तक भी रुक सकती है.

डांस पार्टी के आ जाने की खबरभर से न केवल छपारा बल्कि आसपास के गांवों में भी रौनक सी आ गई थी. गांवदेहातों में अब गणेश और दुर्गा की झांकियां इफरात से लगने लगी हैं जिन में तबीयत से नाचगाना होता है. कुकुरमुत्ते सी उग रही धार्मिक समितियों में राजनेता वोट पकाते हैं, पंडेपुजारी दक्षिणा झटकते हैं और आमलोग झांकी में बैठी मूर्ति के पांव पड़ कर सीधे जा पहुंचते हैं स्टेज के नीचे खासतौर से बने पंडाल में, जहां फिल्मी गानों की तर्ज पर रति के साथ दूसरी डांसर्स थिरक रही होती हैं.

डेरे पर डांस पार्टी की सुबह नहीं होती, बल्कि सीधे दोपहर होती है, क्योंकि नाचगाने का प्रोग्राम सुबह तक चलता है. इस दौरान गांव की आबादी के मुताबिक, 4-5 सौ से ले कर 2 हजार तक की तादाद में बैठे लोग अपने पसंदीदा गाने की फरमाइश स्टेज तक पहुंचाते और खूब नोट भी लुटाते हैं.

रातभर फरमाइशी गानों पर डांस पेश करतेकरते इन डांसर्स का अंगअंग दुखने लगता है पर इन का जोश कम नहीं होता. एकएक कर ये स्टेज पर आ कर नाचती हैं, कभी 2-4 के समूह में भी डांस पेश करती हैं.

कौन हैं ये

केवल राजनांदगांव या छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देश के अधिकांश जिलों में ऐसी हजारों डांस पार्टियां हैं जो तकरीबन 8 महीने मध्य प्रदेश के किसी जिले में जा कर अपना डेरा डालती हैं और अपना पेट पालती हैं. इन डांसरों में कुछ आदिवासी जाति की लड़कियां हैं तो कुछ दूसरी छोटी जाति की भी हैं. गानेबजाने का जरूरी सामान डांस पार्टी अपने साथ ले कर चलती है. 

नाचगाना इन का पुश्तैनी पेशा है. इन के समूह में मर्द कहने भर को होते हैं जिन का काम बाहरी भागदौड़ करना और डांस के दौरान स्टेज के नीचे तैनात रहना होता है, जिस से कभी कोई झगड़ाफसाद हो तो ये हालत संभाल लें. जब लड़कियां डांस कर रही होती हैं तब ये फरमाइशी पर्चियां बटोर रहे होते हैं.

ग्रुप की मुखिया जोति बाई बताती हैं, ‘‘हम तो अपनी दादीनानी के जमाने से इसी तरह प्रोग्राम देते चले आ रहे हैं. यही हमारा पेशा है. इस के अलावा हमें कुछ और पता नहीं.’’ हां, इतना जरूर है कि पहले ग्रुप का नाम डांस पार्टी न हो कर नौटंकी हुआ करता था जिन में गानों के साथसाथ कुछ पुराने जमाने के नाटक भी खेला करते थे.

डांस कहां से सीखा? पूछने पर रति झिझकती हुए बताती है, ‘‘उस ने डांस बचपन से बुआओं और मौसियों से सीखा है और लगभग सभी हिट फिल्मी गानों पर वह नाच लेती है. पहले टेपरिकौर्डर और कैसेट से गाने सुन अभ्यास करती थी पर अब सीडी व पैनड्राइव आ गई हैं जिन के जरिए वह नाचगानों का अभ्यास करती है.’’ रति आगे बताती है, ‘‘एक प्रोग्राम की बुकिंग 2-3 हजार रुपए की होती है पर पार्टी तगड़ी हो तो 8-10 हजार रुपए तक मिल जाते हैं.’’

ये पैसे न्योछावर के पैसों से अलग होते हैं जिन्हें ज्यादा से ज्यादा झटकने की हर डांसर कोशिश करती है कि भीड़ का दिल जीत सके क्योंकि पैसा अच्छे डांस पर ज्यादा बरसता है. एक प्रोग्राम में 4-5 हजार रुपए की न्योछावर मिलनी आम बात है. डेरे पर जा कर पूरे पैसे का हिसाब होता है और रकम सब में बराबर बंट जाती है. कुछ सीनियर डांसर्स को कुछ ज्यादा पैसा मिलता है क्योंकि वे अपने नाम से जानी जाती हैं और भीड़ जमा करने में उन की भूमिका अहम होती है.

नहीं हैं धंधेवालियां हम

रति और जोति दोनों मानती हैं कि हर किसी को उन्हें और उन के पेशे को ले कर गलतफहमी हो जाती है, जिसे वे जल्द दूर भी कर देती हैं. जब गांव वालों को बात समझ आ जाती है तो फिर कोई झंझट नहीं रह जाता. इस के बाद भी कुछ लोग पेशकश कर ही देते हैं जिन्हें ये  सख्ती दिखाते झिड़क देती हैं.

जोति और रति को भी अपना इतिहास पूरा नहीं मालूम जिस की उन्हें जरूरत भी महसूस नहीं होती पर अंगरेजों के जमाने से कुछ छोटी जाति वाले नाचगा कर अपना पेट भरते रहे हैं. पहले ये लोग जमींदारों या दूसरे पैसे वालों के यहां शादीब्याह या दूसरे मौकों पर नाचते थे लेकिन जैसेजैसे वक्त गुजरता गया वैसेवैसे इन के पेशे में भी तबदीलियां आती गईं.

जमींदारी खत्म हुई तो ये लोग दूसरे सूबों में जा कर नाचगाना करने लगे और अब हालत यह है कि इन की जाति की लड़कियां मुंबई के डांस बारों तक जा पहुंची हैं. कुछ नागपुर, पुणे सहित महाराष्ट्र के दूसरे बड़े शहरों के डांसबार में पहुंच गई हैं. पर अधिकांश लड़कियां शहर जाना ठीक नहीं समझतीं, ये किसी मंडली में ही खुद को महफूज महसूस करती हैं.

कमाई ज्यादा नहीं

पैसा इन पर बरसता जरूर है लेकिन वह इतना नहीं होता कि ये लोग शान की जिंदगी जी पाएं. पेट भरने लायक ही ये कमा पाती हैं. इन लड़कियों के सपने बहुत बड़े नहीं हैं. कभीकभार शौकिया तौर पर ये कोई बड़ा शहर घूम आती हैं, वरना इन का पूरा वक्त अपनी डांस पार्टी के साथ घूमते रह कर प्रोग्राम करने और बारिश के 4 महीने अपने गांव में गुजारने में बीतते हैं. बारिश में चूंकि कमाई नहीं होती, इसलिए बाकी 8 महीने कमाया पैसा खर्च हो जाता है.

कुछ डांसर्स ने स्कूल का मुंह देखा है पर सिर्फ 2-4 साल के लिए ही. इस के बाद घुंघरुओं ने इन्हें जकड़ा तो जवानी कब आ कर चली गई, इन्हें पता भी नहीं चला. 35-40 वर्ष की होतेहोते कुछ डांसर्स शादी कर लेती हैं. बाद में यही अपनी डांस पार्टी बना लेती हैं क्योंकि तब तक इन्हें प्रोग्रामों और दूसरे कई मसलों का तजरबा हो जाता है.

कमाई का बड़ा हिस्सा ड्रैस और मेकअप के आइटमों पर खर्च हो जाता है. एक डांसर बताती है, ‘‘और कोई शौक हमें नहीं है, चांदी के गहने जरूर हम बनवाती हैं, यही हमारी बचत है जो बुढ़ापे में हमारा सहारा बनती है.’’

यह डांसर बताती है कि उस की दादीनानी सस्ते कौस्मेटिक प्रौडक्ट इस्तेमाल करती थीं पर ये लोग ब्रैंडेड प्रौडक्ट इस्तेमाल करती हैं.

बड़े शहरों के मुकाबले कसबों में प्रोग्राम करना ये ज्यादा पसंद करती हैं क्योंकि वहां आमदनी ज्यादा होती है और अन्य अड़चनें भी कम रहती हैं. 6-8 महीने में ये तकरीबन 50 किलोमीटर के दायरे में आने वाले सभी गांवों में प्रोग्राम दे आती हैं.

छोटी जगहों में नाचगाने का चलन ज्यादा होने लगा है और लोगों के पास वक्त भी खूब होता है. नाचगाने के शौकीन लोग रातरातभर बैठे डांस का लुत्फ उठाते हैं और दिल खोल कर डांसरों पर पैसे लुटाते रहते हैं.

बावजूद इस के यानी हाड़तोड़ मेहनत के, इन डांसरों की कमाई इतनी नहीं है कि ये बुढ़ापे को ले कर बेफिक्र हो सकें. इसलिए इन की हर मुमकिन कोशिश यह रहती है कि उम्र यानी जवानी रहते ज्यादा से ज्यादा पैसा कमा लें.

मुसीबतें भी कम नहीं

ये डांस पार्टियां कहीं भी जाएं, परेशानियां और मुसीबतें साए की तरह इन के पीछे लगी रहती हैं. कहीं पुलिस वाले परेशान करते हैं तो कहींकहीं स्थानीय रसूखदार नाक में दम कर डालते हैं.

डांसरों के साथ छेड़छाड़ आम बात है, जिस की ये इतनी आदी हो जाती हैं कि ये उस का लुत्फ उठाने लगती हैं. हालांकि डांस के जलसों में भारी भीड़ के चलते कोई खास खतरा इन्हें नहीं रहता लेकिन दिक्कत उस वक्त पेश आती है जब गुंडेमवाली टाइप के लोग इन के डेरे के बाहर चक्कर काटना शुरू कर देते हैं.

ऐसे वक्त में डांस पार्टी की उम्रदराज औरतें काफी काम आती हैं जो इन शोहदों और लफंगों को ऐेसे काबू करती हैं कि ये दोबारा डेरे के पास नहीं फटकते. पर ऐसा करते वक्त इन्हें काफी सब्र, समझदारी और दिमाग से काम लेना पड़ता है. अगर चक्कर काटने वाले रसूखदारों के बेटे हों तो उन से निबटना थोड़ा मुश्किल होता है और उन्हें फटकारने पर कभीकभी लेने के देने पड़ जाते हैं.

आजकल गांवों में सभी नेता हो गए हैं जिन की पहुंच ऊपर तक होती है. लिहाजा, वे बेइज्जत किए जाने पर हल्ला मचा देते हैं कि ये डांस पार्टियां माहौल खराब कर रही हैं. वे लोग प्रचार यह करते हैं कि इन डेरों पर नाचने वालियां नहीं, बल्कि ध्ांधेवालियां हैं. लिहाजा, इन्हें भगाया जाए.

एक बड़ी परेशानी उस वक्त भी खड़ी हो जाती है जब गांव या कसबे के किसी बाहुबली का संदेश आ जाता है कि साहब अकेले में अपनी हवेली पर डांस देखना चाहते हैं और इस बाबत मुंहमांगी रकम देने को तैयार हैं. रंगीनमिजाज रसूखदारों की हवेली में जा कर डांस करना खतरे वाला काम होता है क्योंकि नशे में वे मनमानी पर उतारू हो आएं तो उन से निबटना आसान काम नहीं होता. ऐसी हालत में कई बार डांसरों को वह सब झेलना पड़ता है जिस से वे खुद को अब तक बचाए रखे थीं.

इन परेशानियों से बचने के लिए ये उन बड़े लोगों से दूर ही रहती हैं जो भीड़ में अकसर डांस देखना अपनी तौहीन समझते हैं.

छपारा की भीमगढ़ कालोनी के लोगों ने थाने जा कर इस डांस पार्टी की शिकायत की थी कि इन लोगों के यहां आने से माहौल खराब हो रहा है. इस पर भीमगढ़ पुलिस चौकी के इंचार्ज जी पी शर्मा ने शिकायत करने वालों से पूछा था कि आप ही बताइए, किस कानून के तहत इन पर इलजाम लगा कर कार्यवाही की जाए. ये लोग अपना हुनर दिखा कर पेट पाल रहे हैं और कानून हर किसी को इस की इजाजत देता है.

इस पर गांव वालों ने सरपंच राजकुमारी काकोडि़या की अगुआई में यह शिकायत की थी कि इन लोगों के खुले में शौच जाने से गंदगी फैलती है जबकि उन की पंचायत निर्मल ग्राम पंचायत है.

छोटी जाति से चिढ़

इस इलजाम में कोई खास दम नहीं था, इसलिए पुलिस वालों ने इस पर भी ध्यान नहीं दिया. लेकिन हर कोई जानता है कि इन डांसर्स से चिढ़ की एक अहम वजह उन की छोटी जाति का होना भी है.

चिढ़ भी इतनी कि छोटी जाति वालों को सार्वजनिक स्थलों से पानी नहीं भरने दिया जाता. उन के साथ होने वाला जातिगत भेदभाव किसी सुबूत का भले मुहताज नहीं हो, लेकिन छपारा के मामले से एक बात यह भी हैरतअंगेज तरीके से लगातार हुई कि सार्वजनिक शौचालयों तक में इन के साथ भेदभाव होने लगा है.

अगर इन डांसरों के खुले में शौच जाने से ग्रामपंचायत निर्मल नहीं रह जाती है तो इन्हें सार्वजनिक शौचालयों में क्यों नहीं जाने दिया गया, इस सवाल का जवाब शायद ही कोई सरपंच दे पाए.

हकीकत यह है कि चूंकि ये आदिवासी और दूसरी छोटी जाति की थीं, इसलिए आंख में खटक रही थीं. ये बिंदास हो कर नाच का अपना हुनर पेश कर रही थीं, इसलिए इन्हें माहौल खराब करने वाली कहा गया. सालों से यह डांस पार्टी यहां आ रही है और सभी तरह के लोग इन के डांस का लुत्फ उठाते हैं. धार्मिक जलसे इन से आबाद होने लगे, इसलिए कई ऊंची जाति वाले भी इन की तरफदारी करने लगे हैं क्योंकि उन की खुदगरजी इन से जुड़ी है और पूरी भी होती है. इसीलिए इन्हें आसानी से खदेड़ा नहीं जा सकता.

चिंता की बात, कला में भी भेदभाव है. किसी सरकारी या गैरसरकारी बड़े जलसे में कोई नामी डांसर स्टेज पर डांस पेश करे तो उस का नाम और फोटो अखबारों में छपता है और टीवी चैनल्स में भी उन्हें दिखाया जाता है. पीढि़यों से नाच रही जोति और रति बाई का डांस, डांस नहीं है बल्कि माहौल खराब करने वाला पेशा है, जबकि उन के बारे में ऐसा कहा जाता है, तो तय है दोहरापन लोगों की सोच में है. जिन्हें सरकार बड़ेबड़े इनाम, तमगे और खिताब देदे वह कला हो जाती है और ये कलाकार, जिन के हिस्से में हवाईयात्रा, बड़े बंगले और एयरकंडीशन वगैरा तो दूर की चीजें हैं, पेटभर खाने के लाले पड़े रहते हैं, जाने क्यों कलंक करार दिए जाने लगते हैं.

छपारा के एक युवा पत्रकार हाशिम खान की मानें तो यह छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार की हकीकत उजागर करती बात है कि वहां के बाश्ंिदों को रोजगार के लिए यहांवहां भटकना पड़ रहा है. जाहिर है सरकारी योजनाओं का फायदा इन्हें नहीं मिल पा रहा है जिन्हें ले कर बड़ेबड़े दावे किए जाते हैं. इन के बच्चे पढ़ नहीं पा रहे, इस की जिम्मेदारी किस की है, कहां गया सर्वशिक्षा अभियान और रोजगार का वादा. इन बातों पर गौर किया जाना चाहिए.

हाशिम का जोश और आरोप अपनी जगह ठीक है पर गड़बड़ ऊपर से भी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी परंपरागत व्यवसायों को बढ़ावा देने की बात करते रहते हैं लेकिन वह राजमिस्त्रियों और कुम्हारों तक में सिमटी रहती है.

देशभर में एक अंदाजे के मुताबिक, घुमक्कड़ नाचनेगाने वालियों की तादाद सवा करोड़ से भी ज्यादा है पर इन के लिए न कुछ सोचा जा रहा, न ही कुछ किया जा रहा. मानो नाचगाना कोई गुनाह हो.

गांवगांव घूम कर आम और खास लोगों का दिल बहलाने वाली ये डांसर्स उम्रभर तपती हैं, तब कहीं जा कर अपना और अपने घरवालों का पेट भर पाती हैं. इस पर भी तरहतरह की जिल्लतें, जलालतें और दुश्वारियां इन्हें उठानी पड़ती हैं.

इन्हें समाज में बराबरी का दरजा या इज्जत न मिले, यह खास हर्ज की बात नहीं, हर्ज की बात है इन्हें दोयम दरजे का मानना, इन्हें धकियाना व धकेलना और इन पर घटिया इलजाम लगाना.

बदलाव इतनाभर आया है जो इन के लिहाज से अच्छा है या बुरा, यह तय कर पाना मुश्किल है कि अब धार्मिक जलसे छोटी जाति वाले भी करने लगे हैं और झांकियों में भी अपनी गाढ़ी कमाई खर्च करने लगे हैं, इसलिए वे इन छोटी जाति वालों व डांसर्स को बुलाने लगे हैं, नचाने लगे हैं और पैसा बरसाने लगे हैं. यह बात ऊंची जाति वालों को रास नहीं आ रही, मानो भगवान को पूजने और खुश करने का हक उन्हीं को है.

धर्म के नाम पर छोटी जाति वाले कैसेकैसे ठगे जा रहे हैं, यह अलग मुद्दा है पर इन डांसर्स का इस में अहम रोल है जो गणेश और दुर्गा की झांकियों में नाचगा कर रौनक ला देती हैं.

नोटबंदी की मार

छपारा की डांस पार्टी शिकायतों और दबाव में आ कर नहीं गई, पर 8 नवंबर की नोटबंदी इन डांसर्स को भी महंगी पड़ी. जैसे ही बड़े नोटों का चलन बंद हुआ तो अफरातफरी मच गई और नोटों की कमी की मार इन छोटे स्तर की डांसर्स पर भी पड़ी. मुंबई के डांस बार हों या देहात के नाचनेगाने वाले कलाकार, सभी को पैसों के लाले पड़ गए.

छोटी जगहों में डांसरों पर छोटे नोट ज्यादा लुटाए जाते हैं. जब उन का ही टोटा पड़ गया तो इस डांस पार्टी ने राजनांदगांव वापस जाने में ही भलाई समझी.

अब आने वाले कल को ले कर जोति बाई पसोपेश में है कि क्या होगा. सालभर की कमाई का कोटा पूरा नहीं हुआ था. इसलिए खानेपीने की समस्या सब लोगों के सामने मुंहबाए खड़ी है. नोटों की किल्लत के चलते इन का पूरा हिसाबकिताब गड़बड़ा गया है.

अब खादी पर भी राजनीतिक रंग

अब हो सकता है कि मोदी सरकार भारतीय नोट से गांधी को अवकाश पर भेज दे और उन की जगह खुद को या किसी अन्य संघ समर्थक स्वतंत्रता सेनानी को दी जाए. बहरहाल, खादी विलेज इंडस्ट्रीज कमीशन ने वर्ष 2017 का जो कलैंडर और डायरी प्रकाशित की हैं, उन में गांधीजी की छुट्टी कर दी गई है. इस से देश के विभिन्न तबकों की जनता में नाराजगी है.

आजादी के बाद से गांधीजी को खादी से जोड़ कर देखा जाता रहा है. पर अब गांधी का खादी से कनैक्शन बदला गया है. गांधी की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ले लेने से देशवासियों को एतराज है.

कोलकाता के बड़ा बाजार इलाके में महात्मा गांधी रोड के दोनों तरफ कतार में खादी की दुकानें हैं. खादी भंडार के एक बुजुर्ग दुकानदार का कहना था, ‘‘संजय दत्त की एक फिल्म आई थी, कुछ मुन्ना भाई कर के.’’  मैं ने कहा, ‘‘लगे रहो मुन्ना भाई.’’ वे बोले, ‘‘हांहां उस में मुन्ना भाई को मुगालता हो जाता है कि भारतीय नोट में गांधीजी के बदले उस की तसवीर हुआ करेगी. मुन्ना भाई के दिमाग में तो कैमिकल लोचा हुआ था, लेकिन नरेंद्र भाई मोदी को यह क्या हुआ?

‘‘खादी के लिए अगर मौडलिंग करते तो भी एक बात थी. किसी को आपत्ति न होती. लेकिन गांधीजी को हटा कर उन की जगह लेने की भला क्या जरूरत आन पड़ी मोदीजी को?’’

वहीं, कोलकाता में हैंडलूम और खादी के मार्केट में गांधी खादी भंडार के विक्रेता विनोद सिंह का कहना है कि खादी का प्रतीकात्मक संबंध अहिंसावादी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ही हैं और वही रहेंगे. यह छवि भारतीय ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जनजन के दिलोदिमाग पर बैठ चुकी है. वहां तक नरेंद्र मोदी की पहुंच कभी नहीं हो पाएगी.

रतनलाल पासवान का कहना है कि गांधीजी ने स्वतंत्रता आंदोलन के समय चरखा कात कर खादी के जरिए स्वदेशी पर गर्व करने और आत्मनिर्भरता के प्रतीक के रूप में देशवासियों को एक संदेश दिया था. यही नहीं, वे हर रोज नियमपूर्वक घंटादोघंटे चरखा काता करते थे. लेकिन महज तसवीर खिंचवाने के मकसद से नरेंद्र मोदी का चरखे के सामने बैठ कर चरखा कातने का पोज दिया जाना गांधीजी से जुड़ी देश की भावना को ठेस पहुंचाना है.

सच यह है कि गांधीजी के तमाम आदर्शों को सरकार आहिस्तेआहिस्ते दफन करती जा रही है. पिछले साल भी ऐसी कोशिश की गई थी. तब मजदूर संगठन के विरोध के बाद अधिकारियों ने भविष्य में ऐसा कभी न होने का आश्वासन दिया था.

कमीशन की सफाई नहीं टिक पाई: खादी विलेज इंडस्ट्रीज कमीशन ने अपनी तरफ से सफाई दी कि नरेंद्र मोदी लंबे समय से खादी की पोशाक पहनते आ रहे हैं. मोदी ने आम जनता के बीच खादी को लोकप्रिय बनाया है. दावा यह भी किया गया है कि विदेश में मोदी ने खादी को पहचान दी है. गौरतलब है कि हिप्पी संस्कृति के दौरान भी खादी पूरे विश्व में लोकप्रिय हो गई थी और गांधीजी के स्वदेशी आंदोलन को नरेंद्र मोदी का मेड इन इंडिया नाम दिया जाना नई बोतल में पुरानी शराब ही कहलाता है.

बचाव में कहा तो यह भी जा रहा है कि कई सालों से कलैंडर में गांधीजी की तसवीर नहीं छपी थी. इस साल भी अगर गांधीजी कलैंडर और डायरी में नहीं हैं तो इतना हंगामा क्यों बरपा है? नहीं छपी थी तो नहीं छपी थी, गांधीजी खादी से तब भी जोड़ कर देखे जाते थे. उन्हें बेदखल नहीं किया गया था. लेकिन अब गांधीजी के बदले मोदी का दिखना गांधी की छवि ‘हाइजैक’ होने जैसा माना जा रहा है.

लुट गए बापू : गांधीजी की टोपी, गांधीजी का खद्दर, गांधीजी का चरखा सबकुछ देश की राजनीति ने लूट लिया है. राष्ट्रपिता व महात्मा कहला कर गांधी लुट गए है. बावजूद इस के, यह भी सच है कि देश का जनजन गांधीजी की टोपी, खद्दर और चरखे के मोह

से दूर नहीं हो पाया है. मारकाट, उठापटक, कादाकीचड़ की राजनीति के बीच आज भी गांधीजी का हैंगओवर है. इस देश की जनता के मन में गांधीजी के लिए जगह कुछ कम  नहीं हुई है. इसी कारण तो खादी के कलैंडर में राष्ट्रपिता की जगह नरेंद्र मोदी को देख देश उबल रहा है.

फिल्म रिव्यू : इरादा

‘इरादा’ एक इको फ्रेंडली थ्रिलर फिल्म है, जिसे निर्देशक अपर्ना सिंह ने लिखा और निर्देशन किया है, फिल्म में निर्देशक ने एक गंभीर मुद्दा जो खासकर बड़ी-बड़ी फैक्टरियों के द्वारा छोड़े गए दूषित कैमिकल को बिना ट्रीट किये जलधाराओं और जमीन में सीधा छोड़ देते है. जिससे आज शहर और गांव का हर परिवार प्रभावित है. हर परिवार में कोई न कोई सदस्य कैंसर का पेशेंट है. ये विषाक्त पानी हर घर में, फल सब्जियों में किसी न किसी रूप मे आ रहा है, लेकिन हमारी सरकार और कुछ मौका परस्त लोग इसे अपने एशो-आराम के लिए नज़र अंदाज कर रहे है और विरोध करने वाले हर इंसान को अपने पैसे और ताकत के बल पर चुप करा रहे हैं.

फिल्म को मनोरंजक रूप में पेश करने की कोशिश की गयी है, लेकिन निर्देशक ऐसा करने में पूरी तरह सफल नहीं रहे, फिल्म का पहला भाग काफी धीमा था. इंटरवल के बाद फिल्म की पकड़ कुछ ठीक रही. फिल्म में अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने पिता की भूमिका में उम्दा अभिनय किया है. अरशद वारसी ने भी अपनी जगह सही अभिनय किया. लेकिन अभिनेत्री सागरिका घाटगे कुछ खास असर नहीं छोड़ पायी. मुख्यमंत्री की भूमिका में दिव्या दत्ता और विलेन की भूमिका में शरद केलकर ने अच्छा अभिनय किया है. कहानी इस प्रकार है.

रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर परबजीत वालिया (नसीरुद्दीन शाह) अपनी एकमात्र बेटी रिया (रूमान मोल्ला) को पायलट बनाने के सपने लिए उसे हर दिन फिटनेस ट्रेनिंग देते हैं, उसमें वह स्विमिंग भी करती है, लेकिन एक दिन वह पानी में तैरती हुई बेहोश हो जाती है. डॉक्टरी चेक करने के बाद पता चलता है कि उसे लंग कैंसर है. उसकी मृत्यु नजदीक है. परबजीत बेटी की इस बीमारी की वजह जानने के लिए उसके बालों का लैब टेस्ट करवाते हैं और पता चलता है दूषित पानी की वजह से उसकी बेटी को कैंसर हुआ है. गुस्से से वह एक ब्लास्ट फैक्ट्री में करवाता है.

एक जर्नालिस्ट सिमी (सागरिका घाटगे) भी अपने बॉयफ्रेंड को न्याय दिलाने के लिए आगे आती है, उसका बॉयफ्रेंड ऐसे लोगों को सजा दिलाने की कोशिश करता है, जिन्होंने पानी को प्रदूषित किया है. लेकिन वह कंपनीके मालिक विलेन पैडी शर्मा (शरद केलकर) और उसकी पार्टनर और मुख्यमंत्री रमनदीप (दिव्या दत्ता) के गुंडों के हाथों मारा जाता है. समस्या को गंभीर होता देख रमनदीप, एनआईए ऑफिसर अर्जुन मिश्रा (अरशद वारसी ) को शहर में बुलाती है और सबकुछ चुपचाप स्पैम में डाल देने को कहती है, लेकिन कई ट्विस्ट के बाद अर्जुन को इसकी हकीकत का पता चलता है और वह सच्चाई का साथ देता है. इस तरह कहानी अंजाम तक पहुंचती है.

फिल्म में गाने खास नहीं हैं. नसीरुद्दीन शाह की शेरो शायरी कहने का अंदाज अच्छा था. बहरहाल फिल्म एक बार देखने लायक है .इसे टू एंड हाफ स्टार दिया जा सकता है.

फिल्म रिव्यू के बाद अब पढ़ें ‘इरादा’ की पूरी कहानी

औद्योगिक कंपनियां किस तरह रिवर्स बोरिंग कर अपनी फैक्टरी से निकलने वाली जहरीली गैस व जहरीले रसायन जमीन की सतह से नीचे फेंक कर जमीन के नीचे के पानी को विशाक्त बनाती हैं. इस गंभीर मुद्दे पर बनी एक घटिया स्तर की फिल्म का नाम है-‘‘इरादा’’.

‘‘इको क्राइम’’ पर आधारित फिल्म की कहानी पंजाब के भटिंडा शहर की है, जहां आर्मी से रिटायर्ड परबजीत वालिया (नसिरूद्दीन शाह) रहते हैं. उनकी बेटी रिया (रूमान मोल्ला) अपने करियर को पुख्ता करने के लिए सीडीएस परीक्षाओं की तैयार कर रही होती है. लेकिन एक फैक्टरी ‘‘पीपीएफपीएल’ द्वारा रिवर्स बोरिंग कर अपनी कंपनी के जहरीले रासायनिक पदार्थ पुनः जमीन के नीचे बोरिंग करके फेंकने से शहर का पानी विषाक्त हो गया है और इस पानी की वजह से पंजाब के लोग कैंसर के मरीज बन रहे हैं. इसी पानी की वजह से रिया को भी फेफड़े का कैंसर हो जाता है और एक दिन उसकी मौत हो जाती है. अब परबजीत वालिया अपनी बेटी कीमौत के लिए जिम्मेदार तथा पूरे राज्य को कैंसर का मरीज बना रही कंपनी व फैक्टरी ‘‘पीपीएफपीएल’’ के मालिक पैडी शर्मा (शरद केलकर) के खिलाफ अपने अंदाज में मुहीम छेड़ते हैं. वह स्वतंत्रता सेनानी शहीद भगत सिंह के इस कथन में यकीन करते हैं कि, ‘बहरों को सुनने के लिए धमाकों की जरुरत होती है.’’

इस कहानी के समानांतर पत्रकार सिमी (सागरिका घाटगे) की कहानी चलती है, जो कि अपने प्रेमी अनिरूद्ध की मौत के लिए न्याय मांग रही है. अनिरूद्ध ने पैडी व उनकी फैक्टरी में जिस तरह से विषैला जहर पानी मेंमिलाया जा रहा है, उसको लेकर पूरी सच्चाई जुटा ली थी. इस बात की भनक लगते ही पैडी शर्मा, अनिरूद्ध को मौत देता है, पर उससे पहले पैडी शर्मा, अनिरूद्ध से कहता है कि कालेज के दिनों से उनकी आदत रही है कि जो उसकी बात न माने उसे मौत की नींद सुला दो और सबूत न छोड़ो.

जैसे कहानी आगे बढ़ती है, वैसे पता चलता है कि राज्य की मुख्यमंत्री रमन दीप (दिव्या दत्ता) और व्यवसायी पैडी शर्मा (शरद केलकर) की साठ गांठ की वजह से रिवर्स बोरिंग का शिकार पूरा प्रदेश हो रहा है. सिमी ने अपने तरीके से पैडी की फैक्टरी के काले करनामों का वीडियो भी बना लिया है. मगर सिमी व परबजीत के सारे प्रयास विफल हो जाते हैं. तब परबजीत, पैडी की ही फैक्टरी में कार्यरत भगतसिंह नामक युवक के जरिए पैडी की फैक्ट्री में ब्लास्ट करवा देता है. भगत सिंह की पत्नी कैंसर की मरीज है. बेटे की पढ़ाई रूकी हुई है. उस पर कर्ज बहुत है. इसलिए भगत सिंह, परबजीत से पैसा लेता है.

अब पैडी चाहता है कि उसकी छह हजार करोड़़ की फैक्टरी का एक सप्ताह के अंदर बीमा मुख्यमंत्री दिलवा दें. तब मुख्यमंत्री उसे आश्वस्त करते हुए इस हादसे की जांच के लिए एनआईए आफिसर अर्जुन मिश्रा (अरशद वारसी) की ड्यूटी उसी शहर में लगाती हैं. मुख्यमंत्री अपनी तरफ से अर्जुन मिश्रा को आदेश देती है कि जांच रिपोर्ट पैडी से लेकर इस मामले को बंद कर दे और इसके बदले में उसे पीएमओ में भेज दिया जाएगा. अर्जुनखुश है. इसलिए जब सिमी उसे पैडी के खिलाफ सारे सबूत देती है, तो अर्जुन सिमी के पीछे पुलिस लगा देता है. वह जांच शुरू करता है.

एक दिन अर्जुन, परबजीत की अनुपस्थिति में उसके घर की तलाशी लेता है. भगतसिंह के मोबाइल से पता चल जाता है कि वह कहां है. भगत सिंह अपनी गिरफ्तारी से पहले ही आत्महत्या कर लेता है. फिर परबजीत सच स्वीकार लेते हैं और अर्जुन से कहते हैं कि वह दूसरे शहर के अस्पताल जाकर भगत सिंह की पत्नी से इकबालिया बयान ले आए. अर्जुन भगतसिंह की पत्नी से इकबालिया बयान लेता है. बयान देने के बाद भगतसिंह की पत्नी अर्जुन से कहती है कि वह भटिंडा कार की बजाय ट्रेन से वापस जाए. पता चलता है कि यह पूरी ट्रेन कैंसर के मरीजों से भरी हुई है. उधर अर्जुन का बेटा फोन पर उससे कहता है कि उसे तो सिंघम जैसा पुलिस वाला पसंद है. उसके बाद कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. मुख्यमंत्री, अर्जुन को बुलाकर धमकाती है. मगर हालात ऐसे बदल जाते हैं कि प्रेस काफ्रेंस में मुख्यमंत्री अपना त्यागपत्र दे देती हैं. पैडी गिरफ्तार हो जाता है.

एक बेहतरीन विषय पर एक स्तरहीन व कैरीकेचर जैसे किरदारों वाली फिल्म कैसी हो सकती है, उसका नाम है-‘‘इरादा’’. इस फिल्म को देखना सिरदर्द के अलावा कुछ नहीं है. कैंसर मरीजों से भरी पूरी ट्रेन इस तरह से परदे पर दिखायी गयी है कि उसे देखकर भी कोई भावना नहीं जगती. किसी के भी साथ सहानुभूति नही जगती है. इंटरवल से पहले तो फिल्म की गति बहुत धीमी है. फिल्म में शायरी काफी हैं, मगर वह भी फिल्म को बांध नहीं पाती. पूरी फिल्म टीवी पर प्रसारित हो रहे किसी अपराध आधारित सीरियल का एपीसोड नजर आती है. हकीकत यही है कि फिल्म ‘इरादा’ देखकर ‘क्राइम पेट्रोल’ या ‘सीआईडी’ का कोई एपीसोड याद आ जाएगा.

पटकथा लेखक व निर्देशक की अपनी कमजोरी के चलते फिल्म में रिवर्स बोरिंग, औद्योगिक फैक्टरियां किस तरह हवा व पानी को दूषित कर रही हैं, जमीन के नीचे प्रदूषित होते पानी और रासायनिक पदार्थ किस तरह आम इंसान के जीवन में जहर घोल रहे हैं, अति खतरनाक व भयंकर मुद्दे भी फिल्म में उभर नहीं पाते. राजनेता या सरकार और उद्योगपतियों के बीच का गठजोड़ भी महज कैरी केचर बनकर ही रह गया.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो नसिरूद्दीन शाह व अरशद वारसी ने अपनी तरफ से बेहतरीन परफार्मेंस दी है, मगर पटकथा व किरदार ऐसे नहीं थे कि फिल्म को इनकी परफार्मेंस से फायदा होता. सागरिका घाटगे प्रभावित नहीं करती हैं. शरद केलकर अपने किरदार में उपयुक्त नजर नहीं आते हैं. भ्रष्ट मुख्यमंत्री के किरदार में दिव्या दत्ता जंची हैं.

एक घंटा पचास मिनट की फिल्म ‘‘इरादा’’ का निर्माण फाल्गुनी पटेल व प्रिंस सोनी, लेखन व निर्देशन अपर्णा सिंह ने किया है. संगीतकार नीरज श्रीधर, कलाकार हैं- नसिरूद्दीन शाह, अरशद वारसी, सागरिका घाटगे,रूमान मोल्ला, दिव्या दत्ता, शरद केलकर.

फिल्म रिव्यू : रनिंग शादी

फिल्म ‘‘रनिंग शादी डॉट कॉम’’ तीन साल तक प्रदर्शन का इंतजार करती रही और अब ‘‘रनिंग शादी’’ के नाम से प्रदर्शित हो पायी है. फिल्म देखकर इस बात का अहसास हो गया कि आखिर इस फिल्म को वितरक क्यों नहीं मिल रहे थे. इस फिल्म में दर्शक के लिए ऐसा कुछ नहीं है, जिसकी वजह से इस फिल्म को सिनेमा घर में प्रदर्शित किया जाता. पर फिल्म प्रदर्शित हो ही गयी. आखिर कभी न कभी घूरे/ कुडे़ के भी दिन बहुर/अच्छे जाते हैं. पूरी फिल्म देखकर आश्चर्य होता है कि इस फिल्म के निर्माता शुजीत सरकार जैसे संजीदा फिल्मकार और निर्देशक अमित राय हैं, जो कि कैमरामैन के तौर पर ‘सरकार’ व ‘सरकार राज’ सहित 15 से अधिक बड़ी फिल्में व कई विज्ञापन फिल्में निर्देशित कर चुके हैं.

पटना का एक तेइस वर्षीय भोला भाला ईमानदार लड़का राम भरोसे पांडे उर्फ छोटू उर्फ लिटिल (अमित साध) काम की तलाश में बिहार से पंजाब के अमृतसर शहर पहुंचता है. और वहां एक लहंगे की दुकान में गोटा लगाने का काम करता है. वह जिस दुकान में नौकरी करता है, उस दुकान के मालिक सरदार जी कठोर स्वभाव के हैं. मालिक की बेटी निम्मी (तापसी पन्नू) अपने पिता से बहुत डरती है. मगर उसके लिए कंडोम खरीदना, शराब का सेवन और खुला सेक्स आम बात है. वह अपने साथ स्कूल में पढ़ने वाले एक लड़के के साथ सेक्स संबंध बनाती है और गर्भवती हो जाती है. तब वह छोटू की मदद से दूसरे शहर जाकर गर्भपात करवाकर आती है.

उधर राम भरोसे जिस इमारत में रहते हैं, उसी इमारत की पहली मंजिल पर इंटरनेट व फेसबुक के दीवाने सरबजीत सिधाना (अर्ष बाजवा) से राम भरोसे की अच्छी दोस्ती है. एक दिन सरदार जी रामभरोसे को अपनी दुकान की नौकरी से बाहर कर देते हैं. इस बीच किसी न किसी बहाने निम्मी, राम भरोसे से भी बात करती रहती है. तो वहीं स्कूल व अन्य दोस्तों के साथ उसका घूमना जारी है. नौकरी छूटने के बाद राम भरोसे व उसका दोस्त एक शादी में पहुंचते हैं. पता चलता है कि लड़की भाग गयी है, इसलिए शादी व खाना पीना रद्द. जब दोनों एक ढाबे पर खाना खा रहे होते हैं, तभी भागी हुई लड़की अपने प्रेमी के साथ पकड़ी जाती है और प्रेमी की पिटाई होती है. यह सब देखकर राम भरोसे अपने दोस्त के साथ मिलकर एक वेबसाइट इस सोच के साथ बनाता है कि जो लोग अपने घरों से भागकर शादी करना चाहते हैं, उनकी मदद की जाए.

उधर निम्मी मन ही मन राम भरोसे से प्यार करने लगी है. पर निम्मी की बात से निराश होकर राम भरोसे पटना में अपने मामा से कह देता है है कि वह नेहा से उसकी शादी तय कर दें. इधर राम भरोसे व उसके दोस्त की वेब साइट ‘‘रनिंग शादी’’ सफल हो जाती है. वह 49 शादी करवा देते हैं. एक दिन निम्मी उससे कहती है कि वह उसका व उसके प्रेमी शंटी को भगाकर शादी करवा दे. बड़ी मुश्किल से राम भरोसे राजी होते हैं. भरोसे के साथ घर से भागने के बाद रास्ते में निम्मी कबूल करती है कि शंटी नहीं आएगा, वह तो भरोसे के साथ शादी करेगी. पर भरोसे तैयार नहीं. मगर हालात कुछ ऐसे बन जाते हैं कि राम भरोसे को अपने दोस्त व निम्मी के साथ भागना पड़ता है. अंततः यह भागकर पटना पहुंचते हैं. तब भरोसे को अहसास होता है कि वह तो निम्मी से प्यार करने लगा है. कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. राम भरोसे व निम्मी मिलकर नेहा की शादी उसके प्रेमी से करवा कर खुद शादी करते हैं.

फिल्म की घटिया पटकथा के चलते इस हास्य व रोमांटिक फिल्म के किसी भी दृष्य पर हंसी नहीं आती. बल्कि दर्शक सोचता है कि यह फिल्म कब खत्म होगी. शादी व्याह की समस्या हो या परप्रांतीय का मुद्दा हो या रोमांस हो, कुछ भी ठीक से उभर नहीं पाता. वास्तव में वेब साइट बनने के बाद कहानी खत्म हो जाती है, पूरी फिल्म बिखर जाती है. हकीकत में भागने वालों की शादी कराने की वेबसाइट बनाने का मुद्दा ही अनूठा है, मगर फिल्म के शुरू होते ही आधे घंटे में यह मुद्दा खत्म हो जाता है और फिर वही घिसी पिटी कहानी चलती रहती है. परदे पर अमित साध व तापसी पन्नू की केमिस्ट्री भी इस फिल्म को उबार नहीं पाती है.

निर्देशक अमित राय ने फिल्म में तापसी पन्नू के किरदार को उस रूप में पेश किया है, जिस रूप में फिल्म की हीरोईन को पेश करने से हर फिल्मकार डरता रहा है कि इससे पारिवारिक दर्शक दूर हो जाएंगे. निर्देशक अमित राय ने बेवजह इस फिल्म को एक घंटे 54 मिनट तक खींचा. बेवजह ही मैथिली, हिंदी, भोजपुरी व पंजाबी भाषा के संवाद रखकर ज्यादा से ज्यादा दर्शक बटोरने का असफल प्रयास किया. फिल्म में कहानी की बनिस्बत कुछ घटनाक्रम हैं, जो कि वर्तमान समय के टीवी सीरियलों की याद दिलाते है.

जहां तक अभिनय का सवाल है तो अमित साध और तापसी पन्नू ने अपने हिसाब से बेहतरीन पराफर्मेस दी है, मगर जब पटकथा व किरदार ही घटिया हों, तो बेहतरीन परफार्मेंस से क्या होगा? पंजाबी लड़की के किरदार में तापसी पन्नू और भोले भाले ईमानदार युवक के किरदार में अमित साध जमे हैं.

एक घंटा चौवन मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘रनिंग शादी’’ का निर्माण शुजीत सरकार और क्राउचिंग टाइगर मोशन पिक्चर्स ने किया है. फिल्म के निर्देशक अमित राय, लेखक नवजोत गुलाटी व अमित राय, संगीतकार अनुपम राय, अभिषेक अक्षय और जेब तथा कलाकार हैं-अमित साध, तापसी पन्नू, अर्ष बाजवा.

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