कहानी : फंदों की सतरंगी दुनिया

फंदों की दुनिया भी बड़ी अजीब होती है. अगर हम गौर से देखें तो इस संसार का हर प्राणी किसी न किसी फंदे के शिकंजे में फंसा हुआ नजर आएगा. कोई अपनी बीवी के फंदों से दुखी है, तो कोई प्रेमिका के प्यार में गरदन फंसा कर कसमसा रहा है, जो न छोड़ती है न ही शादी कर रही है. इतना ही नहीं, कोई पैसे की मारामारी में फंसा है, तो कोई दोस्त की गद्दारी में. कोई बौस की चमचागीरी में, तो कोई नेता या पुलिस की दादागीरी में.

फंदों का एक बहुत बड़ा अखाड़ा हमारी राजनीति को भी कहा जा सकता है. गरदन तक जुल्म की दुनिया में डूबे लोगों को सालों के इंतजार के बाद कानून गले में फंदा पहनाने का हुक्म सुना पाता है. पर वोट की शतरंज बिछाए नेताओं को ऐसे लोगों से सहानुभूति हो जाती है. वे फांसी के फंदे में भी फंदा फंसा अपनी वोट की राजनीति कर जाते हैं यानी उन्हें छुड़ा लेते हैं.

इस प्रसंग में एक और किस्म के प्राणियों का यदि जिक्र न किया तो यह चर्चा बेजान नजर आएगी. वे हैं हमारी हाउस मेकर बहनें, जिन्हें सर्दियों के आने का बड़ी बेसब्री से इंतजार रहता है. सितंबर में जरा सर्द हवाएं चलीं नहीं कि उन का ऊन, सलाइयों और फंदों का सफर शुरू हो जाता है. इस में पहले पिछले साल के आधेअधूरे छोड़े स्वैटरों पर काम शुरू होता है, फिर नए ऊनों के लिए बाजार का रुख किया जाता है. जल्दीजल्दी रसोई और घर का काम निबटाया जाता है और वे ले कर बैठ जाती हैं ऊन और सलाइयां. कभी घरों की छतों पर महफिल जमती है, तो कभी किसी की धूप वाली बालकनी में.

बुनाई के साथ ये गृहिणियां एकदूसरे से बहुत से टिप्स भी बांट लेती हैं. जैसे, मटर के छिलकों की रैसिपी, कई चीजों के दाम, कहां मिलेंगी महंगाई के जमाने में कौन सी चीजें सस्ती. सारी जानकारियां बिलकुल सच्ची और फ्री में. साथ में सुखदुख और महल्ले की अपडेट खबरें, जो किसी अखबार या न्यूज चैनल पर किसी को नहीं मिल सकतीं और सब से कमाल की बात यह कि यह सब चलता रहता है और हाथ की सलाइयां बिना रुके फंदों पर फंदे पिरोती जाती हैं. शायद इसे ही कहते हैं एक पंथ दो काज.

बुनाई का फंदा जिस को भा गया, उस की मनोदशा ही कुछ अजीबोगरीब हो जाती है. उस का रातदिन ऐसी कल्पनाओं के संसार में खोया रहता है कि कौन से रंग में कौन सा कौंबिनेशन खूब जमेगा, रजनी की बहू को सर्दियों में बच्चा होगा, उस के लिए अभी से 1-2 बेबी सैट तैयार करने हैं. वहां रजनी की ननद भी जरूर आएगी. बुनाई और स्वैटर बनाने में तो वह ऐक्सपर्ट है. मैगजीन वगैरह में भी उस के बनाए स्वैटरों के डिजाइन निकलते हैं और जिस महफिल में वह जाती है, बुनाई पूछने और प्रशंसा करने वालों से घिरी रहती है. उस के स्वैटर से मेरे स्वैटर किसी तरह से कम नहीं होने चाहिए. इसी सोच और उधेड़बुन में काफी समय निकल जाता है. यह स्पर्धा और ईर्ष्या भी अजीब चीज होती है. कभी आगे बढ़ाती है तो कभीकभी दिल को जला कर भी रख देती है.

उर्मिलाजी अपनी बालकनी से पड़ोस में नई बसी फैमिली में एक छोटे बच्चे को रोजाना देखती थीं. वह नएनए डिजाइन के स्वैटर पहने चहक रहा होता. अब कैसे एकदम अनजान लोगों से मित्रता बढ़ाई जाए और उस पर भी एकदम से स्वैटर का डिजाइन पूछना काफी ‘भद्दा’ लगता है. पर अपने पर कंट्रोल भी तो नहीं होता. खैर, किसी तरह नए पड़ोसी से बच्चे के बहाने मेलजोल बढ़ा लिया और अवसर मिलते ही छेड़ दी सलाई और फंदों की बातें.

पड़ोसिन भी एक नंबर की बुनक्कड़ निकलीं. दोनों के विचार मिले तो ऊन और सलाइयां तो जैसे हाथों में भागने लगीं. बस जल्दी से रसोई और जरूरी दैनिक कार्य निबटाए और बुनाई का काम शुरू. कभीकभी तो यह काम कंपीटिशन जैसा हो जाता और हाथ की हड्डियां दर्द होने लगतीं. घर वालों से दर्द की बात कहने पर डांट और सहनी पड़ती. फिर भी बुनाई का सफर मुश्किलों से जूझते हुए अनवरत जारी रहता. सचमुच बुनाई को जिन्होंने हौबी बना लिया, उन्हें तो हर हालत में इस से जुड़ा कुछ न कुछ करते रहना होता है.

रंजना को एक इंटरव्यू देने जाना था. वह अपने हाथ का बुना लेटैस्ट बुनाई वाला स्वैटर पहन कर वहां गई. वहां इंटरव्यू टीम की एक महिला की नजर उस पर गई तो रंजना की काफी तारीफ हुई. साइंस स्टूडैंट हो कर भी उस की बुनाई में ऐसी सफाई और निपुणता देख सभी वाहवाह कर उठे. पता नहीं रंजना को वह जौब मिलेगी या नहीं पर यह जान कर उसे बहुत अच्छा लगा कि हाथ की बुनाई के कद्रदान सभी जगह बैठे हैं.

छोटे बच्चों के लिए हाथ से बुने प्यारे व आकर्षक रंगबिरंगे स्वैटर का रिवाज सदियों से हमारी हाउस मेकर बहनों के कारण आज भी कायम है. जो लोग बुनाई नहीं कर सकते, वे ईर्ष्यावश ये कमैंट्स करते देखे गए हैं कि हमारे बच्चे तो हाथ के बुने स्वैटर पहनते ही नहीं, इसलिए हमें इतनी मेहनत करने और आंखें लगाने की क्या जरूरत है? फिर बाजार में एक से बढ़ कर एक सुंदर डिजाइन वाले स्वैटर मिल जाते हैं, तो क्यों न हम उन्हें खरीदें. पर आज भी जिन के घरों में मम्मी, दादी, नानी, मौसी, ताई या कोई और हाथ की बुनाई की कला में सिद्धहस्त है, उन घरों के किशोर बच्चे बड़े शौक से उन के हाथ के बुने स्वैटर पहन कालेज, जौब और कई बार तो फंक्शन में भी जाते हैं और बड़े गर्व से सब को बताते भी हैं कि यह उन की मां, बूआ, दादी या किसी और ने उन्हें जन्मदिन पर बना कर दिया है.

ऐसे उपहार में 1-1 फंदे में गुंथीबुनी होती हैं देने वाले की सच्ची, कोमल, लगाव भरी भावनाएं और लेने वाला जब भी उस स्वैटर को सर्द हवाओं में पहनता है तो देने वाले की नेह भरी गरमाहट के फंदों की गिरफ्त में आए बिना नहीं रह पाता.

आप भी इन सर्दियों में ऐसे मधुर, रंगीन धागों के फंदों में अपना दिल जरूर फंसाएं और बुनतेबुनते प्यार बढ़ाएं.

दहकता पलाश: भाग-1

‘‘अरे अर्पिता तुम?’’

अपना नाम सुन कर अर्पिता पीछे मुड़ी तो देखा, एक गोरा स्टाइलिश बालों वाला लंबा व्यक्ति उस की ओर देख कर मुसकरा रहा था. अर्पिता ने उसे गौर से देख कर पहचाना तो उत्साह से चहक कर बोली, ‘‘अरे प्रवीण तुम… यहां कैसे?’’

‘‘3 महीने पहले ही मेरी यहां पोस्टिंग हुई है और तुम अब भी यहीं हो?’’ प्रवीण ने उस से पूछा.

‘‘हां, मैं तो यहीं हूं. बस घर का पता बदल गया है,’’ अर्पिता ने हंसते हुए कहा.

‘‘हां उस की निशानी तो मैं देख रहा हूं,’’ प्रवीण ने मंगलसूत्र की तरफ इशारा किया तो दोनों हंस पड़े.

‘‘आओ न, यहां पास के रैस्टोरैंट में चल कर बैठते हैं,’’ प्रवीण ने सुझाव दिया तो अर्पिता इनकार नहीं कर पाई. फिर दोनों रैस्टोरैंट में एक कोने वाली टेबल पर जा कर बैठ गए.

‘‘तुम तो अब भी पहले जैसी हो, जरा भी नहीं बदलीं,’’ बेयरे को कौफी का और्डर देते हुए प्रवीण बोला.

‘‘वैसी कहां हूं मैं, थोड़ी मोटी तो हो ही गई हूं. हां, तुम जरूर बिलकुल पहले जैसे ही हो,’’ अर्पिता ने कहा.

‘‘मैं कहना चाह रहा था कि तुम्हारा चेहरा आज भी वैसा ही नाजुक और मासूम है, जैसा 7-8 साल पहले था. तभी तो मैं तुम्हें देखते ही पहचान गया…’’ प्रवीण ने अर्पिता को भरपूर नजर से देखते हुए कहा तो वह शरमा गई.

‘‘चलो छोड़ो, तुम क्या मेरे चेहरे को ले कर बैठ गए. यह बताओ कि आज भरी दोपहरी में बाजार में क्या कर रहे थे?

कालेज छोड़ने के बाद क्या किया? तुम तो आई.ए.एस. की तैयारी कर रहे थे न, क्या हुआ? और इतने दिन कहां रहे? अभी क्या काम कर रहे हो?’’ अर्पिता ने एक के बाद एक इतने सारे सवाल कर डाले कि प्रवीण हड़बड़ा गया.

‘‘तुम ने तो प्रैस वालों की तरह एक के बाद एक ढेर सारे सवाल कर डाले. पहले किस सवाल का जवाब दूं यही समझ में नहीं आ रहा,’’ फिर हंसते हुए बोला, ‘‘मैं बी.ए. करने के बाद आई.ए.एस. की कोचिंग करने इंदौर चला गया था, यह तो तुम्हें पता ही है. 2 साल जम कर मेहनत की पर पहली बार में सिलैक्शन नहीं हुआ. पर दूसरे अटैंप्ट में मैं सिलैक्ट हो ही गया. फिर मेन ऐग्जाम फिर इंटरव्यू. 6-7 साल के बाद अब जा कर मनचाही पोस्ट मिली है और चार इमली पर एक घर भी अलौट हुआ है.’’

‘‘अरे वाह,’’ अर्पिता के चेहरे पर प्रशंसा के भाव आ गए, ‘‘वहां के मकान तो बहुत बड़े और सुंदर है.’’

‘‘हां, उसी के लिए थोड़ाबहुत फर्नीचर देखने आया था. अब तो पापा का भी ट्रांसफर फिर से यहां हो गया है. अगले हफ्ते वे लोग भी यहां आ जाएंगे,’’ प्रवीण ने बताया.

ये भी पढ़ें- Short Story: तुम्हारे हिस्से में- पत्नी के प्यार में क्या मां को भूल गया हर्ष?

‘‘और तुम्हारी पत्नी? शादी की या नहीं की अब तक?’’ अर्पिता ने पूछा.

‘‘नहीं, अभी तक तो नहीं की. 1-2 साल जरा सर्विस में जम जाऊं फिर सोचूंगा. अब

मैं तुम्हारी तरह सवालों की झड़ी नहीं लगाऊंगा, तुम खुद ही अपने बारे में बता दो,’’ प्रवीण ने कौफी का खाली प्याला नीचे रखते हुए कहा.

‘‘कुछ खास नहीं. बी.ए. करने के बाद मैं ने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया. अभी शहर के 4-5 बुटीक्स के लिए सूट्स डिजाइन करती हूं. रोजरोज आनेजाने की झंझट नहीं है. जब उन को जरूरत होती है बुला लेते हैं. बस कमाई भी हो जाती है और शौक भी पूरा हो जाता है. अगर मन हुआ तो अपना एक बुटीक भी खोल लूंगी. बस मेरी तो सीधीसादी छोटी सी कहानी है,’’ अर्पिता ने बताया.

‘‘और तुम्हारे पतिदेव क्या करते हैं?’’ प्रवीण ने पूछा.

‘‘वे एक प्राइवेट कंपनी में हैं और अकसर टूर पर रहते हैं,’’ अर्पिता के मुंह पर पति के टूर पर रहने की बात कहने पर हलकी सी मायूसी छा गई जिसे प्रवीण ने भांप लिया. वह तुरंत ही बातचीत का विषय कालेज के दिनों और पुराने साथियों की तरफ ले गया. फिर 2 घंटे कब निकल गए पता ही नहीं चला. फिर दोनों ने एकदूसरे के फोन नंबर लिए और अपनेअपने घरों की ओर लौट गए.

अर्पिता जब घर पहुंची तब तक उस के पति आनंद घर नहीं पहुंचे थे. बाजार से लाया सामान टेबल पर रख कर वह टीवी औन कर के बैठ गई, लेकिन आज उस का मन टीवी देखने में नहीं लग रहा था. वह तो प्रवीण के बारे में सोच रही थी.

वह और प्रवीण 8वीं कक्षा से साथसाथ पढ़े थे. कालेज में भी दोनों एक ही सैक्शन में थे. अन्य लड़कों की अपेक्षा प्रवीण अंतर्मुखी और मेधावी लड़का था. वह फ्री पीरियड में भी बाकी लड़कों की तरह ऊधम, मस्ती न करते हुए कुछ न कुछ पढ़ता रहता था. क्लास के अन्य लड़कों से अलग प्रवीण को स्कूल या कालेज की किसी भी लड़की में दिलचस्पी लेते हुए कभी किसी ने नहीं देखा था. प्रवीण के स्वभाव की इसी खूबी से अर्पिता मन ही मन उस से प्रभावित थी. फर्स्ट ईयर के अंत तक जहां क्लास के प्रत्येक लड़के की क्लास की या दूसरे क्लास की या महल्ले की किसी लड़की के साथ अफेयर की बातें सुनाई देती थीं, वहीं प्रवीण के बारे में अर्पिता ने कभी भी ऐसी कोई बात नहीं सुनी.

प्रवीण दिखने में बहुत अच्छा था. ऊंचा कद, हलके घुंघराले बाल, गोरा रंग, तीखी नाक. वह क्लास में ही क्या कालेज में सब से स्मार्ट लड़के के रूप में मशहूर हो गया था. पास से गुजरती लड़की चाहे जूनियर हो चाहे सीनियर एक बार तो भरपूर नजर से उसे देखती जरूर थी. प्रवीण के रंगरूप और बुद्धि पर फिदा बहुत सी लड़कियां उस पर मरती थीं, लेकिन वह आंख उठा कर भी किसी की ओर नहीं देखता था.

फाइनल तक पहुंचतेपहुंचते अर्पिता से उस की अच्छी पटने लगी थी, क्योंकि क्लास में प्रवीण के बाद अर्पिता ही पढ़ाई में तेज थी. विभिन्न चैप्टर्स और किस किताब में कौन सा चैप्टर कितना अच्छा है इस विषय पर क्लास में या लाइब्रेरी में दोनों देर तक बातें करते रहते थे. प्रवीण से दोस्ती की वजह से कई लड़कियां अर्पिता से ईर्ष्या करने लगी थीं. वर्ष के अंत तक अर्पिता भी प्रवीण के प्रति एक अलग ही आकर्षण महसूस करने लगी थी. उसे यह भी लगने लगा था कि प्रवीण का उसे देखने का अंदाज भी कुछ बदल सा गया है.

एक दिन फ्री पीरियड में दोनों लाइब्रेरी में बैठे थे. अर्पिता किताब पढ़ने में तल्लीन थी. बीच में इतिहास की एक तारीख समझ में न आने के कारण उस ने प्रवीण से पूछने के लिए सिर ऊपर उठाया तो देखा वह किताब टेबल पर रख कर खोईखोई सी नजरों से उसे देख रहा था.

अर्पिता का दिल बड़ी जोर से धड़कने लगा. वह भी बिना कुछ कहे अपनी किताब देखने लगी, लेकिन बड़ी देर तक उस के मन में एक हलचल सी होती रही.

इस के बाद अर्पिता को लगने लगा कि वह शायद धीरेधीरे प्रवीण की ओर आकर्षित होती जा रही थी. कालेज में प्रवेश करते ही उस की नजरें प्रवीण को खोजती रहतीं.

क्लास में बैठे हुए भी अर्पिता की नजरें दरवाजे पर ही टिकी रहतीं और जैसे ही प्रवीण अंदर आता अर्पिता का दिल बड़ी जोरजोर से धड़कने लगता.

अर्पिता के मन में भावनाओं के कई नएनए, अनजाने मगर अपने से लगने वाले रंग तैरने लगे थे. लेकिन दोनों ही ओर से ये रंग भावनाओं का रूप ले कर शब्दों में अभिव्यक्त हो पाते, फाइनल ऐग्जाम सिर पर आ गए और फिर लास्ट पेपर जिस दिन था उसी दिन प्रवीण अपने मातापिता के साथ इंदौर चला गया, क्योंकि उस के पिता का वहां ट्रांसफर हो चुका था. वे तो बस प्रवीण के पेपर की खातिर ही रुके थे. प्रवीण एक ख्वाहिश भरी नजर अर्पिता पर डाल कर चला गया.

दोनों के बीच जो भी था बस मूक ही रहा. कभी शब्दों या भावनाओं के रूप में अभिव्यक्त नहीं हो पाया, इसलिए कोई किसी का इंतजार भी क्या करता. अर्पिता ने फैशन डिजाइनर का कोर्स किया और जब उस के मातापिता ने आनंद को उस के जीवनसाथी  के रूप में चुना तो उस ने भी उन की इच्छा का सम्मान करते हुए अपनी स्वीकृति दे दी.

ये भी पढ़ें- Short Story: नेकी वाला पेड़- क्या हुआ जब यादों से बना जब पेड़ गिरा?

आनंद के साथ उस का जीवन आराम से गुजर रहा था. आनंद अर्पिता का बहुत ध्यान रखता था, लेकिन उस के बारबार टूर पर जाने और काम में अत्यधिक व्यस्त रहने से अर्पिता अकेलापन महसूस करती थी. दिन तो घर के काम और बुटीकों के डिजाइन वगैरह तैयार करने में कट जाता, लेकिन उदास शामें और तनहा रातें उसे काट खाने को दौड़तीं. आनंद के बगैर वह सारीसारी रातें पलंग पर करवटें बदलते हुए गुजार देती. महीनों वह आनंद के साथ पिक्चर देखने या कहीं बाहर घूमने जाने को तरस जाती. लेकिन फिर भी आनंद की भी मजबूरी समझ कर वह अपने मन को समझा लेती.

अर्पिता एक गहरी सांस ले कर उठी. आज प्रवीण से मिल कर न जाने क्यों वह अपने अंदर बहुत खुशी महसूस कर रही थी. मन के कोने में बरसों से दबे हुए जिन रंगों पर समय की धूल पड़ गई थी, उन्हें जैसे किसी ने पानी की कुनकुनी फुहारें बरसा कर धो दिया था. और फीके पडे़ रंग धुल जाने से ताजे हो कर चमचमाने लगे थे.

2 दिन बाद बुटीक से आ कर अर्पिता चाय पीते हुए एक फैशन मैगजीन में कपड़ों के लेटैस्ट डिजाइन देख रही थी कि फोन बज उठा. अर्पिता ने फोन उठाया, ‘‘हैलो…’’

‘‘हैलो, क्या कर रही हो अर्पिता?’’ उधर से प्रवीण का स्वर सुनाई दिया.

‘‘अरे, तुम?’’ अर्पिता का स्वर और चेहरा दोनों खिल गए.

‘‘हां सुनो, संग्रहालय में मणिपुरी कलाकारों की बहुत अच्छी प्रस्तुति है. सारा इंतजाम मेरी ही देखरेख में चल रहा है. तुम लोग आ जाओ,’’ प्रवीण ने कहा.

‘‘आनंद तो टूर पर बैंगलुरु गए हुए हैं. मैं अगर आई तो लौटते वक्त रात हो जाएगी. मैं अकेली इतनी दूर रात में वापस कैसे आऊंगी?’’ अर्पिता के स्वर में मायूसी छा गई.

‘‘बस इतनी सी बात,’’ प्रवीण हंसते हुए बोला, ‘‘अरे पगली मेरे होते हुए तुम्हें अकेले आने की क्या जरूरत है? तुम ठीक 5 बजे तैयार रहना, मैं ड्राइवर को भेज दूंगा तुम्हें ले आने को. मैं बहुत बिजी हूं नहीं तो खुद आ जाता,’’ इतना कह कर बिना जवाब का इंतजार किए प्रवीण ने फोन काट दिया. अर्पिता मुसकरा दी.

प्रवीण ने उस दिन बताया कि वह संस्कृति विभाग में एग्जीक्यूटिव डायरैक्टर है. उसे यों भी भारतीय लोक संस्कृति से बहुत लगाव था. स्कूल, कालेज में भी वह सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन व संचालन करने में हमेशा आगे रहता था.

अर्पिता को भी सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रदर्शनियां आदि देखने का बहुत शौक था लेकिन आनंद को कभी भी टाइम नहीं मिलता. संडे को भी आनंद अकसर या तो औफिस में या फिर घर पर ही कोई न कोई काम करता रहता था. 4 साल पहले 10 दिनों के लिए वे हनीमून पर गए थे. उस के बाद से आनंद लगातार अपने काम में व्यस्त ही रहा है.

5 बजे बाहर गाड़ी का हौर्न सुन कर अर्पिता ने खिड़की से झांक कर देखा. बाहर एक गाड़ी खड़ी थी. अर्पिता समझ गई कि यह गाड़ी प्रवीण ने ही भेजी होगी. वह ताला लगा कर बाहर आ गई.

‘‘आप अर्पिताजी हैं?’’ ड्राइवर ने गाड़ी से उतरते हुए पूछा. और अर्पिता के ‘हां’

कहते ही दरवाजा खोल दिया. अर्पिता गाड़ी में बैठ गई. संग्रहालय पहुंच कर ड्राइवर ने उसे प्रवीण के पास पहुंचा दिया और वापस चला गया.

‘‘आओ अर्पिता,’’ प्रवीण ने आगे बढ़ कर उस का स्वागत किया और उसे ले कर आगे चल कर सब से आगे के एक सोफे पर बैठा कर बोला, ‘‘तुम थोड़ी देर यहां बैठो मैं जरा व्यवस्था देख कर आता हूं. कार्यक्रम बस 10 मिनट में शुरू हो जाएगा.’’

10 मिनट बाद ही प्रवीण आ कर उस के बगल बैठ गया. कार्यक्रम शुरू हुआ और कलाकार अपनी मनोरम प्रस्तुतियां देने लगे. बेयरे पानी, चाय, कौफी और स्नैक्स वगैरह सर्व कर रहे थे. प्रवीण अर्पिता को अपने विभाग और विभाग के अन्य लोगों के बारे में बताता जा रहा था.

सुरमई शाम, सुहावना मौसम, सामने नृत्य व संगीत की प्रस्तुति. अर्पिता को लग रहा था कि वह सपनों के लोक में पहुंच गई है. कुछ बात कहने के लिए जब प्रवीण उस की ओर झुका तो उस का कंधा अर्पिता के कंधे से छू गया. अर्पिता का दिल अचानक वैसे ही जोर से धड़कने लगा जैसे कालेज के दिनों में प्रवीण को पहली बार अपनी ओर देखता पा कर धड़का था.

दिल में सालों से दबी हुई कोई कुंआरी अनछुई सी अनुभूति अचानक ही जाग गई. मन में न जाने कब से सोए पड़े एहसास अंगड़ाई ले कर जाग गए. अर्पिता को लग रहा था जैसे वह कुंआरी है और उस के कुंआरे मन में आज पहली बार किसी के प्रति कोई अनजानी सी कशिश, अनजाना सा रोमांच महसूस किया है. प्रवीण के साथ पहली पंक्ति में बैठी वह और चारों ओर बड़ेबड़े सरकारी अफसर और गणमान्य अतिथि. सब कुछ कितना भव्य लग रहा था.

तालियों की गड़गड़ाहट से अर्पिता की तंद्रा भंग हुई. कार्यक्रम समाप्त हो चुका था. प्रवीण ने अपने साथी अफसरों और उन की पत्नियों से अर्पिता की पहचान कराई. देर तक सब से बातें होती रहीं फिर डिनर के बाद प्रवीण उसे घर पहुंचा कर चला गया. विवाह के बाद शायद यह पहली शाम थी, जो अर्पिता अपनी मरजी से अपनी खुशी के लिए इतनी अच्छी तरह से बिताई थी.

– क्रमश:

ये भी पढ़ें- स्वीकृति नए रिश्ते की: पिता की अचानक मृत्यु से कैसे बदली सुमेधा की जिंदगी?

पेश है बीइंग ह्यूमन की ई-साइकिल

एक्टर सलमान खान साइकिल को अपनी निजी जिंदगी में पसंद करते हैं, लेकिन अब वे बीइंग ह्यूमन ई-साइकिल लॉन्च करने वाले हैं.

सुत्रों की मानें तो , यह आइडिया सलमान खान का ही है कि उन्होंने अपनी पूरी टीम को इसके लिए काम कराया और अब साइकिल मार्केट में लॉन्च होने को तैयार है. इसका ट्रायल भी हो चुका है. यह पतली और नए जेनरेशन के कूल लुक में होगी.

ऑटोमेटिक होगी साइकिल

इस साइकिल के जरिए सलमान खान अपने फैन्स तक प्यार पहुंचाना चाहते हैं. कहा ये भी जा रहा है कि स्टार स्क्रीन अवॉर्ड में सलमान-शाहरुख ने बीइंग ह्यूमन ई-साइकिल से ही एन्ट्री ली थी. यह साइकिल ऑटोमेटिक और बैटरी से चलने वाली होगी. इसके 5 अलग-अलग मॉडल होंगे. 

साइकिल अलग-अलग एज ग्रुप के लोगों के लिए होगी. सलमान ऐसा चाहते थे कि कोई ऐसी चीज बनाएं जिसे सभी उम्र के लोग इस्तेमाल कर सकें. 

जहां तक बीइंग ह्यूमन की क्लोदिंग रेंज की बात है तो सलमान खान ने 2017 की प्रमोशन के लिए एमी जैक्सन को साइन किया है. हाल ही में इसका फोटोशूट भी हुआ था. 

BeingInTouch ऐप किया था लॉन्च
सलमान ने इससे पहले दिसबंर में बर्थडे के मौके पर फैन्स के लिए एक नया ऐप BeingInTouch. जारी किया था. ऐप के जरिए फैन्स सलमान से कनेक्ट रह सकते हैं. गूगल प्ले स्टोर से इसे मुफ्त में डाउनलोड भी किया जा सकता है. इस ऐप में सलमान से जुड़ी विभिन्न जानकारी और अपडेट्स मौजूद रहती है.

“संगीत सुकून देने वाला साथी है”

एक तरफ गजल गायक व गजल सुनने वाले गायब होते जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ मुंबई की जानी मानी रेडियोलौजिस्ट डा. काकोली बोरठाकुर अपने पहले 6 गजलों के सोलो गजल एलबम ‘दिल के पास’ में आवाज का जादू बिखेरेंगी. इस में शकील बदायुनी की डुएट गजल ‘कैसे कह दूं कि मुलाकात नहीं होती…’ को डा. काकोली ने भजन सम्राट अनूप जलोटा के साथ गाया है.

आसाम में जन्मी काकोली की परवरिश डाक्टर परिवार में हुई है. उन के माता-पिता के साथ साथ भाईबहन, चाचा सभी डाक्टर हैं. लेकिन काकोली को संगीत भी अपनी मां से विरासत में मिला. उनकी मां आरती डाक्टर होने के साथ-साथ फोक गायिका भी थीं.

घर के माहौल ने आपको संगीत से जोड़ा?

सच कहूं तो शुरुआत में मेरी मां डाक्टर आरती ने ही मुझे संगीत सीखने के लिए भेजा. यह वह दौर था, जब बच्चे अपने बड़ों की बात आंख मूंद कर मानते थे. स्कूल में संगीत सीखते और घर में रियाज करतेकरते मेरे अंदर भी संगीत के प्रति ललक बढ़ गई.

बचपन में संगीत की समझ न होने पर भी हम सीखते रहे. पर बाद में संगीत की समझ हुई. मुंबई आने के बाद जब मेरा संपर्क भजन सम्राट व गजल गायक अनूप जलोटाजी से हुआ, तब मैंने उन से संगीत की कुछ बारीकियां सीखीं. अब मैं संगीत को गहराइयों में जा कर समझती हूं. संगीत में रूह बहुत जरूरी है. यह रूह आप सीख नहीं सकते, यह तो दिल से आती है.

संगीत के अलावा डाक्टरी पेशा?

मेरे परिवार में सभी डाक्टर हैं. मैं भी पढ़ाई में गोल्ड मैडलिस्ट थी. मेरे घर में मेरे मम्मीपापा, बूआ, भाई सभी डाक्टर हैं. मतलब मेरा कोई रिश्तेदार नहीं है, जो डाक्टर न हो. हां, मेरे पति संगीत जगत में नहीं हैं. वे रिलायंस में हैं.

मुंबई आने से पहले आप ने सिर्फ अपनी मां से ही संगीत सीखा था?

हां, मुझे संगीत की प्रेरणा अपनी मां से मिली. पर बाद में मैं ने शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली. मैं ने 1996 में लखनऊ के ‘भातखंडे संगीत विद्यापीठ’ से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में विशारद की डिगरी हासिल की. मैं ने मुंबई के टाटा मैमोरियल अस्पताल से रेडियोलौजी में पोस्ट ग्रैजुएशन भी किया है. 15 वर्षों से नवी मुंबई में रेडियोलौजिस्ट के रूप में अपना खुद का अस्पताल चला रही हूं.

अस्पताल में महिलाओं के स्वास्थ्य की फिक्र, तो घर पर मां और पत्नी की जिम्मेदारियों को निभाना कभी आसान नही रहा. पर हर जिम्मेदारी को निभाते हुए संगीत से भी जुड़ी रही.

सुबह शाम संगीत का रियाज करने से मेरी सारी थकावट दूर हो जाती है. संगीत के पैशन ने मुझे हमेशा प्रसन्न रखा. मेरी 2 टीनऐजर बेटियां भी खुश हैं. मुंबई पहुंचने के बाद मेरी मुलाकात भजन सम्राट अनूप जलोटा, पंडित अजय पोहनकर, उस्ताद मकबूल खान और राकेश पंडित से हुई.

मैंने मुंबई में अपने संगीत के कार्यक्रम देने शुरू किए. तब मेरी मुलाकात अनूप जलोटा से हुई. मैंने उन के साथ भी कई बार स्टेज पर गाया. अनूप जलोटा के साथ मैं ने गजल, भजन और सेमीक्लासिकल गीत गाए हैं. मेरा अपना पहला गजल एलबम ‘दिल के पास’ है, जिसे ‘टाइम्स म्यूजिक’ बाजार में ले कर आया है.

आप ने अपना पहला गजल एलबम ‘दिल के पास’ बनाने की बात कब सोची?

मुंबई के स्टेज कार्यक्रमों में मैं गजल तो गा ही रही थी, इत्तेफाक से मेरे दिमाग में एक दिन आया कि मुझे भी अपना संगीत एलबम बनाना चाहिए. यदि मैं यह कहूं कि संगीत के प्रति पैशन और गजल को बढ़ावा देने के मकसद से मैं अपना पहला गजल एलबम ‘दिल के पास’ ले कर आ रही हूं तो भी गलत नहीं होगा. पर मैं ने डाक्टरी पेशे से समय निकाल कर संगीत की साधना करते हुए इस एलबम को तैयार किया है. इसे तैयार करने में भजन सम्राट व गजल गायक अनूप जलोटा से काफी मदद मिली.

इस एलबम में किस तरह की गजलें हैं?

इस एलबम की सभी गजलें रोमांस से जुड़ी हैं. इन गजलों में रोमांस का हर पहलू नजर आएगा. इस एलबम की गजलें शकील बदायुनी, शकील आजमी और इरशाद दलाल ने लिखी हैं. इस में नए गजलकार इरशाद दलाल की एक गजल है ‘उन से नजरें मिलाने को जी चाहता है, जमाना भूल जाने को जी चाहता है…’ जबकि गजल ‘आए नहीं साजन…’ में श्रोताओं को ठुमरी का रसास्वादन मिलेगा. इस के साथसाथ एलबम में नए कलाकारों को भी मौका मिला है.

आपके लिए संगीत क्या है?

मेरे लिए संगीत खुद को तनावमुक्त रखने का बेहतरीन माध्यम है. संगीत खुद को समझाने के साथसाथ दूसरों को भी समझा देता है. संगीत दोस्त व हमराही है. संगीत तनहाई को दूर करता है. मेरे जैसे दूसरे पेशे में व्यस्त रहने वाले लोगों के लिए भी संगीत सब से बड़ा सुकून देने वाला साथी है.

आप मशहूर रेडियोलौजिस्ट हैं और संगीत से भी जुड़ी हुई हैं. ऐसे में आपकी दिनचर्या क्या रहती है?

सुबह 6 बजे उठ कर घर का काम निबटा कर 2 घंटे संगीत का रियाज करती हूं. फिर तैयार हो कर 10 बजे तक अस्पताल पहुंच जाती हूं. शाम को 6 बजे घर पहुंचती हूं. चाय वगैरह पीने के बाद 2 घंटे संगीत का रियाज करती हूं. फिर घर के काम करती हूं.

सांझ की दुलहन: भाग-3

लेखिका- मीना गुप्ता

अब तक आप ने पढ़ा:

अपनी भाभी राधिका से, जिन की राजन बहुत इज्जत करता था, एक दिन अपने मन की बात कहते हुए स्वप्न सुंदरी से शादी करने की बात कह दी. भाभी राधिका परेशान थीं कि कहां और कैसे देवर राजन की शादी इतनी खूबसूरत लड़की से कराई जाए.

तब दूर की एक रिश्तेदारी में जिस स्वप्न सुंदरी की तलाश थी वह मिल गई. मगर जब शादी हो कर वह घर आई तो घर का अच्छाभला माहौल बिगड़ने लगा, जबकि राजन इस ओर से अनजान था. सुंदरी काफी खुले विचारों वाली थी.

कुछ दिनों बाद सुंदरी ने बताया कि उस की शादी राजन से जबरदस्ती उस के घर वालों ने करा दी, लेकिन वह शुरू से ही किसी और को चाहती है.

अब वह यदाकदा अपने प्रेमी को घर पर भी बुलाने लगी. अंतत: आपसी रजामंदी से दोनों ने तलाक ले लिया.

राजन अब दोबारा शादी नहीं करना चाहता था. पर भाभी और अन्य लोगों के दबाव के आगे उसे झुकना पड़ा और उस ने शादी करने की रजामंदी दे दी. राजन की शादी बेहद साधारण और कम पढ़ीलिखी लड़की के साथ हुई. नई बहू ने राजन का घर भी जल्द संभाल लिया. घर के लोग भी उस से खुश थे.

– अब आगे पढ़ें:

राजन दूसरी शादी से बहुत खुश था. पहली बार उस ने अनु को उस नजर से देखा था जिस नजर से सुंदरी को देखा करता था. आज वह उसे वह प्यार दे सकेगा, जो सुंदरी को देने चला था. मगर उस ने उस की कीमत नहीं समझी थी.

रात राजन और अनु की थी. राधिका तो माध्यम बनी थी, जो इस वक्त दोनों की हंसी से गूंज रहे माहौल में खुद को हलका महसूस कर रही थी.

सुबह उठ कर राधिका ने ही चाय बनाई और दरवाजे पर रख कर बोली, ‘‘आप लोगों की चाय आप को बुला रही है.’’

अनु ने चाय सर्व करते हुए कहा, ‘‘सुनो, आज मुझे थोड़ी शौपिंग करनी है. तुम चलोगे?’’

‘‘हां, क्यों नही?’’

अनु तैयार हो कर राधिका से कह कर शौपिंग के लिए निकल गई. राधिका खुश थी.

जब अनु और राजन घर लौटे राधिका रात के खाने पर दोनों का इंतजार कर रही थी. खाना खा कर दोनों अपने कमरे में, बाबूजी अपने कमरे में, राधिका अपने कमरे में. राधिका जाग रही थी. शिब्बू बिजनैस के सिलसिले में बाहर था. उसे नींद नहीं आ रही थी.

8 साल हो गए थे शादी को. उसे कोईर् संतान नहीं थी. वह इस अकेलेपन को अकसर जाग कर काट लिया करती थी. डाक्टर ने कहा था कोई संभावना नहीं है. फिलहाल बहू में कोई कमी नहीं. राधिका उस की भरपाई में शिब्बू और बाबूजी को खुश करने में लगी रहती. शिब्बू को इस बात का अफसोस नहीं था. मगर वह इस अफसोस में अकसर खिलौनों और गुड्डों से बातें करती रहती और इस प्रकार अपने मातृत्व की पूर्ति करती. तभी किचने से आवाज आई. राधिका ने देखना चाहा क्या हुआ. शायद बिल्ली होगी. लेकिन घर में बिल्ली के आने का कोई रास्ता नहीं था. बाहर आ कर देखा राजन के कमरे से लगी छत का दरवाजा खुला था.

‘तो क्या देवरजी दरवाजा खोल कर सो गए?’ सोच राधिका ने टौर्च की रोशनी से देखना चाहा.

छत पर उसे बात करने की आवाज सुनाई दी. सोचने लगी इतनी रात गए कौन हो सकता है. लगता है दोनों अभी तक जाग रहे हैं. फिर मन ही मन मुसकराई और तसल्ली के लिए पूछा, ‘‘छत पर कौन है?’’

‘‘मैं हूं भाभीजी अनु… लाइट चली गई थी न, तो गरमी के कारण छत पर आ गई.’’

ये भी पढ़ें- Short Story: मलहम- प्यार में मिले धोखे का बदला कैसे लिया गुंजन ने?

‘‘ठीक है. मगर दरवाजा बंद कर के सोया करो… किचन में बिल्ली आ गई थी.’’

‘‘ठीक है भाभीजी, आप सो जाइए मैं देख लेती हूं किचन में कौन है… चूहा भी हो सकता है… आप सोई नहीं अभी तक?

‘‘नहीं. नींद नहीं आ रही है.’’

‘‘जाइए, अब सो जाइए.’’

राधिका ने बेचैनी से टहलते हुए बाबूजी के कमरे में झांक कर देखा. वे सो रहे थे.

सभी इतमीनान में हैं, फिर वह क्यों परेशान है? इस बेचैनी का कारण क्या है? शिब्बू का न होना या उस का निस्संतान होना या फिर कुछ और?

देर रात तक जागने पर भी भोर में ही राधिका की नींद खुल गई. देखा राजन का कमरा खुला था. लगता है राजन आज जल्दी उठ गया. अनु को आवाज देती हूं, बाबूजी को चाय दे देगी. आज तबीयत भारी हो रही है. रात भर नींद नहीं आई.

नीचे से ही आवाज दी, ‘‘अनु, नीचे आ जाओ. बाबूजी को चाय दे दो.’’

राजन बाहर आते हुए बोला, ‘‘भाभी, अनु यहां नहीं है. नीचे चली गई है.’’

राधिका ने फिर आवाज दी, ‘‘अनु कहां हो?’’ मगर उस के कहीं भी होने की आहट सुनाई नहीं दी. शायद बाथरूम में होगी. लेकिन वहां तो बाबूजी हैं. फिर कहां होगी? किचन में जा कर देखा वहां भी नहीं. शायद बाहर बगीचे में होगी. वहां भी नहीं. आखिर इतनी सुबह कहां जाएगी?

राधिका ने आवाज दी, ‘‘देवरजी देवरानी को नीचे भेज दो, मजाक मत करो.’’

‘‘भाभीजी मैं मजाक नहीं कर रहा. सच में अनु यहां नहीं है.’’

‘‘नहीं है?’’

बाबूजी बाथरूम से निकले तो बोले,

‘‘अरे बहू, आज तुम घर का दरवाजा बंद करना भूल गईं?’’

‘‘क्या घर का दरवाजा… छत का दरवाजा… अनु घर में नहीं है बाबूजी… यह सब क्या है? देवरजी, अनु घर पर नहीं है.’’

‘‘क्या तुम दोनों के बीच रात में कोई झगड़ा हुआ है?’’

‘‘नहीं.’’

कमरे में जा कर देखा तो अनु का सामान भी नहीं था. घर की तिजोरी भी खुली और खाली थी.

बहू घर छोड़ कर जा चुकी थी… ज्यादा ही समझदार निकली.

राधिका को रात की बिल्ली… छत का खुला दरवाजा… अनु का आश्वासन… सब कुछ बिजली की तरह कौंध गया. वह चकरा गई. बोली, ‘‘देवरजी, यह तो बहुत समझदार निकली.’’

राजन जो अब तक सब समझ चुका था, सिर थामे बैठा था.

देर तक घर में फैली खामोशी को कौन तोड़ता? किस में हिम्मत थी? भाभी में जिस ने राजन को दूसरी शादी के लिए प्रेरित किया था या बाबूजी में, जिन्होंने उस की समझदारी पर अनेक प्रश्न किए थे या फिर राजन जिस ने दोनों के निर्णय पर बंद आंखों से अपनी सहमति का अंगूठा लगा दिया था? कौन था समझदार? राधिका जिस ने राजन की गृहस्थी फिर से बसानी चाही, बाबूजी जो अपने आंगन में खेलताकूदता छोटा राजन चाहते थे या फिर राजन जिस के स्वभाव की सरलता ने अनु की बढ़ी समझदारी का कारण नहीं समझना चाहा. शायद इन तीनों से ज्यादा समझदार वह थी जिस ने तीनों की समझदारी पर पानी फेर दिया… सब कुछ ले गई… कुछ नहीं बचा.

रात में फोन आया, ‘‘मैं दूसरा विवाह करने जा रही हूं. उस दमघोंटू माहौल में मैं नहीं रह सकती थी और नई जिंदगी की शुरुआत के लिए पैसा तो चाहिए था सो मैं ले आई. मुझे ढूंढ़ने की कोशिश मत कीजिएगा. आखिर मैं आप के घर की बहू थी.

बाबूजी को काटो तो खून नहीं. राधिका भी जड़वत कि यह सब क्या हुआ? हमारे साथ इतना बड़ा धोखा? यह नजरों का धोखा था या फिर हमारी समझदारी का?

राजन दोनों के बीच मूकदर्शक था. भाभी क्या कहती हैं या बाबूजी क्या कहते हैं उस ने नहीं सुना. उसे लगा उस ने गलत सपना फिर देख लिया. हर बार रो कर चुप होना और फिर रोना. पहले सुंदरी के सौंदर्य ने धोखा दिया. इस बार समझदारी के बड़े भ्रम ने धोखा दिया. धोखा… धोखा… धोखा… कब तक? वह टूट चुका था. घर आने में भी उसे हिचक होती. उसे देखते ही राधिका हिचक जाती. सब एकदूसरे से नजर यों चुराते जैसे वे एकदूसरे के गुनहगार हैं और जिन की सजा यही है कि खुद को एकदूसरे से अलग कर लें. कहीं गुनाह का परदाफाश न हो जाए और ठीकरा किसी एक के सिर फोड़ दिया जाए.

इस बार बाबूजी का चोटिल सम्मान रहरह कर चटक उठता. समाज में उठनेबैठने और तन कर चल सकने की सारी हिम्मत जाती रही. रिश्तेदारी में जहां जाओ एक ही चर्चा. बहू क्यों चली गई? जरूर इस परिवार में ही कोई कमी है, जो दूसरी भी छोड़ कर चली गई. अनेक इलजाम जमाने ने लगाए. खुद को इतना छोटा महसूस करते कि जिस टोपी को उन्होंने कभी नहीं भुलाया था उसे लगाना भी उन्हें याद नहीं रहता. वे बिना टोपी के ही निकल जाते. राधिका याद दिलाती, ‘‘बाबूजी, टोपी…’’

विश्रुतिजी निरुत्साहित से उसे पकड़ते, मगर टोपी लगा कर खुद को निहारने का दुस्साहस अब नहीं करते.

इधर समय की कमी ने शिब्बू और राधिका के बीच जो रिक्तता पैदा की थी उस

जगह अब एक लंबी दीवार खड़ी हो रही थी. अकसर वह बिजनैस के सिलसिले में देर रात तक बाहर होता और जब आता थकान से चूर होता. उस थकान के बीच राधिका उस की जिंदगी में अगर कुछ भरना चाहती तो वह यह कह कर सो जाता, ‘‘राधिका, मैं थक गया हूं, तुम से कल बात करता हूं.’’ और कल थकान बेहिसाब बढ़ी होती. राधिका पास जाने की हिम्मत भी न जुटा पाती.

वह उस टूटी नाव की पतवार थामे चल रही थी, जिस पर अनजाने, अनचाहे अनेक गड्ढे बन चुके थे, जिन्हें पाटते उस की उम्र बीत रही थी.

बाबूजी अपने आहत सम्मान और दम तोड़ती इच्छाओं के बीच खुद को अकेला पाते और सब से अलग रहने के प्रयास में अपने कमरे से बाहर नहीं आते.

राजन अपनी खिड़की में ढलती शाम से ले कर ढलती रात तक न जाने किस का इंतजार करता. उसे घर में क्या चल रहा है, पता भी नहीं रहता. राधिका घर में फैली इस खामोशी में कभी खुद को ढूंढ़ती तो कभी खुद को भुला देती तो कभी राजन और बाबूजी की खामोशी को तोड़ने की हिम्मत करती. कभीकभी उन 4 आंखों में तलाश करती कि वह कहां है?

क्या बाबूजी की इस हिदायत में कि बहू तुम मेरी नहीं इस घर की बहू हो और इस घर को जो तुम दोगी वही पाओगी या फिर शिब्बू की उन हिदायतों में जब वह राधिका के हाथों में रुपयों से भरा बैग थमाते हुए कहता, ‘‘यह घर तुम्हारा है जैसा चाहो चलाओ. मैं कभी नहीं पूछूंगा. मगर इस की खुशियों की परवाह तुम्हें ही करनी होगी.’’

ये भी पढ़ें- वह नीला परदा: आखिर ऐसा क्या देख लिया था जौन ने?

कागज के टुकड़ों को देख सोचती, ‘काश, मैं इन से इस घर की सारी खुशियां, बाबूजी का खोया सम्मान, उन के कुल के दीपक राजन भैया की उजड़ी गृहस्थी सब खरीद सकती. शिब्बू जिसे खुशी कहता है क्या उसी खुशी की तलाश है सभी को? शायद नहीं. मैं कब तक इन कागज के टुकड़ों को संभालती रहूंगी? ये मुझे चिढ़ाते से नजर आते हैं.

उस ने जब भी कुछ मांगा अपने बाबूजी और भाईर् की खुशी. कभी उस ने पूछा कि राधिका इन पैसों से तुम्हारी खुशी मिल सकेगी? रात का अकेलापन और जिंदगी का सूनापन अकसर उसे डसने लगता. शिब्बू तो बस आगे बढ़ने की धुन में बढ़ता जा रहा है. इस बढ़ने में उस के अपने पीछे छूट रहे हैं, उस ने भूल से भी यह नहीं सोचा. मुड़ कर ही नहीं देखना चाहा. कोई आवाज दे भी तो कैसे? वह तो ऐसी मंजिल को थामे चल रहा था, जिस के छूट जाने से वह बिखर जाता. महत्त्वाकांक्षा में वह भूल गया कि वह एक बेटा भी है, भाई भी है और एक पति भी है.

राजन भी अपनी तनख्वाह भाभी को देते हुए कहता, ‘‘भाभी, अब आप संभालो इसे भी. मैं नहीं संभाल सकता… क्या करूंगा मैं इस का?’’

‘‘और कितनी जिम्मेदारियों के बोझ तले मुझे दबना पड़ेगा? क्या इन कागज के टुकड़ों से घर की रौनक और खुशियां मैं ला सकूंगी? फिर मैं इन का क्या करूं? इन कागज के टुकड़ों में दबी कामनाएं दम तोड़ रही हैं देवरजी. मैं इन से बेजार सी हो रही हूं… अब और नहीं.’’

राधिका बोले जा रही थी और राजन सुनता जा रहा है. आज भाभी को उस ने पहली बार ऊबता महसूस किया था. उन की बातों में सदियों की तलखी थी. यह तलखी शायद हम से थी? नहीं तो फिर जिंदगी से? कब तक झेलेंगी? कौन है जिस से वे अपनी बात कहतीं? सोचता हुआ राजन राधिका के कमरे के सामने से गुजरा तो उसे सिसकने की आवाजें आईं. उस ने बाहर से ही आवाज दी, ‘‘भाभी…’’

‘‘हां, आती हूं,’’ कहते हुए बाहर आने का प्रयास किया मगर राजन उस से पहले ही अंदर पहुंच चुका था. पहली बार इस कमरे में आया था वह. भाभी का कमरा अपनी व्यवस्था से अव्यवस्थित सा लग रहा था. कांच का एक बड़ा सा शोकेस तरहतरह की गुडि़यों और गुड्डों से भरा था. बगल की ड्रैसिंगटेबल पर एक खूबसूरत परदा जो शायद ही कभी उठाया जाता होगा.

बिस्तर की चादर ठीक करते हुए राधिका बोली, ‘‘आइए देवरजी, आज कैसे इधर भटक गए?’’

‘‘यों ही भाभी… दिल किया आ गया.’’ तभी बिस्तर के सिरहाने रखी जापानी गुडि़या बोल पड़ी कि मम्मा, आई लव यू. राधिका ने उसे चुप कराया.

राजन ने कहा, ‘‘बोलने दीजिए अच्छा लग रहा है… भाभी एक बात पूछूं?’’

‘‘हां क्या पूछेंगे पूछिए. वैसे आप जो जानना चाहते हैं वह मुझे मालूम है. देवरजी, इस घर से खुशियों ने हमेशा के लिए मुंह फेर लिया है…

घर अब घर नहीं एक सरायखाना लगता है, जिस में सभी रह तो रहे हैं, मगर अजनबियों की तरह… कौन कब रोया, कब हंसा, किसे मालूम? किस की रात आंसुओं से भीगती रही या किस की शाम आंखों को धुंधला कर गई, किस ने जानना चाहा?’’

‘‘तो शिब्बू भैया…?’’ बेचैनी ने उसे वहां रुकने न दिया.

देर तक भाभी के आंसुओं में भीगे लफ्ज उस के जेहन में गूंजते रहे… मैं भी हूं इस घर

में. यह किसे पता है… सब अपने में गुम… मैं ने क्या पाया… कौन है मेरा… किसे फुरसत है मेरी खातिर?

शाम ढल रही थी, फिर भी राजन ने आज खिड़की नहीं खोली, न ही शाम ने खिड़की से दस्तक दी. बारबार राधिका का कुम्हलाया चेहरा याद आ रहा था कि उम्र में मुझ से सिर्फ 2 माह ही बड़ी हैं, मगर जिम्मेदारियों के बोझ ने उन्हें समय से पहले ही बहुत बड़ा कर दिया. बड़प्पन के एहसास तले उन्होंने खुद को भुला दिया और घर के 3-3 बड़े बच्चों को संभालती रहीं.

बाबूजी कमरे से बाहर नहीं आए थे. अब अकसर वे शाम के धुंधलके में ही घर से निकलते थे. राधिका ने शाम की रसोई शुरू कर दी.

बाबूजी घूम कर आए. बोले, ‘‘बहू खाना दे दो. जल्दी सो जाऊंगा,’’ और फिर खाना खा कर अपने कमरे में चले गए.

राधिका ने रसोई समेटी. किचन का दरवाजा बंद किया. जैसे ही अपने कमरे में जाना चाहा देखा राजन छत पर है. आवाज दी, ‘‘देवरजी.’’

कोई जवाब नहीं मिला… खुद जा कर देखना चाहा. राजन अपनी ही परछाईं के साथ आंखमिचौली कर रहा था. छत में फैली चांदनी सारी चीजों को स्पष्ट कर रही थी. फिर भी न जाने क्यों राजन कुछ ढूंढ़ता सा नजर आ रहा था.

‘‘क्या खो गया?’’ राधिका ने आज बहुत दिनों बाद छत पर कदम रखे थे. कभीकभी अनु के साथ आया करती थी.

अचानक भाभी को छत पर आया देख राजन बोला, ‘‘अरे भाभी आप? कुछ नहीं यों ही मेरी अंगूठी कहीं गिर गई है.’’

‘‘यहीं कहीं होगी,’’ कह राधिका ने छत से घर के अंदर जा रही सीढि़यों की तरफ झांकने का प्रयास किया. 2-3 सीढि़यां नीचे उतर कर देखा तो अंगूठी दिखाई दे गई. बोलीं, ‘‘देखिए देवरजी मिल गई.’’

‘‘अरे मैं कब से खोज रहा था. मिल ही नहीं रही थी.’’

‘‘पकडि़ए,’’ राधिका ने वहीं से देनी चाही. मगर उस का पैर डगमगा गया. चांदनी रात का उजाला सीढि़यों के अंधेरे को मिटा न सका था और राधिका उस अंधेरे से भिड़ने की कोशिश में डगमगा गई.

राजन भी तो राधिका को सीधे हाथ नहीं थाम सका उलटा हाथ पकड़ाया. संभल नहीं सका… लड़खड़ा गया. दूधिया चांदनी में राधिका के उजले चेहरे पर खुदी उदासी की गहरी रेखाएं भर आईं… सूखे और बिखरे बालों के बीच से झांकती आंखों का सूनापन महक उठा… बदन में वर्षों की सोई लचक जाग गई…

राजन ने देखा क्या ये वही राधिका भाभी हैं जिन्हें वर्षों से सिर्फ औरों के लिए खुश रहते देखा. आज पहली बार उन महकी आंखों में उन की ही खुशी तैरती दिखाई दी… इतना आवेग और इतना आकर्षण राधिका के सान्निध्य में? वह संभाल न सका था उस रूप को. राधिका के उस लड़खड़ा कर गिरने में सारा समर्पण समा गया और सारे आकाश ने उस समर्पण को अपनी बांहों में भर लिया कभी न छोड़ने के लिए और बोल पड़ा, ‘‘इन आंखों की खुशी मैं कभी सूखने नहीं दूंगा. परिवार की सारी खुशियां इन में भर दूंगा… यह मेरा वादा है… आखिर भैया को भी परिवार की खुशियां ही तो अजीज हैं.’’

तभी अचानक दरवाजे पर किसी ने आवाज दी, ‘‘भाभी,’’

‘‘अरे, यह तो सुंदरी की आवाज लग रही है.’’

‘‘मैं सुंदरी हूं. दरवाजा खोलिए,’’ फिर आवाज आई.

‘‘यह क्या, आज तो राजन ने खिड़की भी नहीं खोली फिर कौन सी सुंदरी आ गई…’’ सुंदरी यानी? राजन की पहली… नहींनहीं… अब नहीं.

बाबूजी ने कह दिया कि अब किसी सुंदरी की जगह हमारे यहां नहीं है.

दरवाजे पर हुई दस्तक को राजन ने भी सुना था और राधिका ने भी, लेकिन धोखा समझ कर कहा, ‘‘सुंदरी के लिए अब कोई दरवाजा नहीं… सांझ की दुलहन रात ढले घर नहीं आती… मेरी सांझ की दुलहन मुझे मिल गई है.’’

तभी दूर रेडियो पर गाना बज उठा, ‘कहीं तो ये दिल कभी मिल नहीं पाते, कहीं से निकल आए जन्मों के नाते, घनी थी उलझन बैरी अपना मन अपना ही हो कर सहे दर्द पराए, कहीं दूर जब दिन ढल जाए.’

ये भी पढ़ें- Short Story: विश्वासघात- आखिर कैसे लिए अमृता ने अपना बदला

नोटबंदी का कुछ तो मुआवजा मिलता

अरुण जेटली के नए बजट में एक भी ऐसी छूट नहीं दिखी जिस से लगे कि नोटबंदी के कारण जो सजा पूरे देश को मिली थी और अभी भी चालू हो, उस का कुछ मुआवजा घरवालियों को देने की कोई नीयत हो. सरकार के पास बजट एक ऐसा माध्यम होता है जिस से वह कुछ छूट दे कर जनता को सांत्वना दे सकती है पर घरघर में हुई दिक्कत पर न प्रधानमंत्री को कोई गम है न ही वित्तमंत्री को.

अगर नोटबंदी जाली नोटों अथवा आतंकवाद या कालाधन रखने वालों के कारण की गई थी तो करोड़ों घरों को सजा देने का औचित्य ‘मित्रों’ वाली सरकार आज तक स्पष्ट नहीं कर पाई. सरकार का हुक्म तो ऐसा था मानो सास ने कह दिया कि सारे बहूबेटे रोज 5 बजे उठें और मन करे या न करे उन के पैर छू कर जरूर जाएं. एक निरर्थक आदेश जिस का कोई लाभ नहीं पर हिटलरी अंदाज में अपनी ताकत दिखाना.

बजट में सरकार कुछ सहूलतें आसानी से दे सकती थी. खानेपीने की चीजों पर सर्विस टैक्स समाप्त करा जा सकता था, साडि़यों पर उत्पाद शुल्क हटाया जा सकता था, कौस्मैटिक्स को दवाओं की श्रेणी में रख कर कर मुक्त करा जा सकता था. इन से सरकार को आमदनी कम होती पर ज्यादा नहीं पर औरतों को तो लगता कि उन्हें नोटबंदी के कहर का कुछ मुआवजा तो मिला.

असल में हर शासक के सिर पर ताकत का भूत चढ़ ही जाता है. नरेंद्र मोदी के इतने गुणगान उन की पार्टी ने ही नहीं मध्यवर्ग ने भी गाए कि उन्होंने सोचना शुरू कर दिया कि उन के फैसले उस राजा की तरह के हैं, जो बिना कपड़े पहन कर बाजार में निकला था यह सोच कर कि उस ने विशिष्ट कपड़े पहन रखे. सरकार ने नोटबंदी यह सोच कर लागू की थी कि इस से धड़ाधड़ कालाधन सरकार के हाथ में आएगा और जनता पर टैक्स लगाए बिना खजाना भर जाएगा. अब जब सरकार के पल्ले न के बराबर कुछ पड़ा है तो वह खिसियाई हुई है और बजट में उस ने कुछ भी छूट नहीं दी है.

उलटे व्यापारियों और उद्योगपतियों पर शिकंजा कसा गया है शायद अपनी खीज उतारने के लिए कि उन्होंने नोटबंदी के नारे को सच्चा बनाने में साथ क्यों नहीं दिया. असल में नोटबंदी आम व्यक्ति को यह एहसास दिला गई है कि सरकार के एक फैसले से लाखों नहीं करोड़ों लोगों को नुकसान पहुंच सकता है. अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी मुसलिम देशों से आने वालों को वीजा न दे कर या आईटी कंपनियों में एच-1बी वीजा को सख्त बना कर नोटबंदी जैसा काम कर रहे हैं. दुनिया की जनता खासतौर पर मांएं और पत्नियां एक बार फिर असमंजस के माहौल में जीने को मजबूर हैं. कल क्या होगा, बच्चों का क्या होगा, चूल्हा जलेगा या नहीं, ये सवाल तकनीकी उन्नति के बावजूद खब्ती शासकों के कारण खड़े हो गए हैं.

अब धर्म की आग में और जलेगी दुनिया

किसी न किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह करना ही था. अमेरिका को अब एक सिरफिरा, दंभी और न देश, न जनता, न पार्टी की चिंता करने वाला राष्ट्रपति मिला है, जो मुसलिमों, लैटिनियों, मैक्सिकियों, इमिग्रैंटों, चीनियों, अखबार वालों सब से बिना चेहरे पर शिकन लाए ‘अमेरिका फर्स्ट’ कह कर कुछ भी कर सकता है.

उस ने मुसलिमों के देश में प्रवेश पर पाबंदियां लगा कर यह साबित कर दिया है कि उस की पहले की बातें नरेंद्र मोदी के नारे ‘अच्छे दिन’ की तरह केवल चुनावी जुमले नहीं थे. वह अमेरिकन समाज के तानेबाने को तारतार करने की हिम्मत रखता है, उस से चाहे लाभ हो या न हो.

उस ने कुछ मुसलिम बहुल देशों से वीजा प्राप्त मुसलिमों के अमेरिका में प्रवेश पर जैसे ही प्रतिबंध लगाया. अमेरिका देश भर में मुसलिम विरोधी तत्त्व खड़े हो गए हैं. 2-4 जगह मसजिदें जला दी गई हैं. 2002 में मुसलिम आतंकवादियों द्वारा न्यूयौर्क के ट्विन टौवर पर हमले का बदला अब फिर शुरू हो गया है, क्योंकि अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सीरिया को तहसनहस करने के भी मुसलिम आतंकवादियों ने अपना कहर ढाहना बंद नहीं किया है.

अब हिटलरी अंदाज में इंतहाई बदला लेने का माहौल डोनाल्ड ट्रंप तैयार कर रहे हैं

और अगर वे चुनाव जीत सकते हैं तो देश में ही नहीं विश्व भर में मुसलिम विरोधी माहौल पैदा कर सकते हैं, क्योंकि कितने ही देश मुसलिम आतंकवाद के शिकार हो चुके हैं.

डोनाल्ड ट्रंप गलत हैं, खब्ती हैं, मूर्ख हैं पर उन का मुकाबला अपने से कहीं ज्यादा कट्टरों से है, जो अपने गांव, शहर, देश और धर्म वालों किसी की भी चिंता नहीं करते और धर्म की आग में किसी को भी झोंकते हुए अपनेपराए को भूल जाते हैं.

अगर डोनाल्ड ट्रंप के लिए ‘अमेरिका फर्स्ट’ नारा है तो मुसलिम कट्टरपंथियों के लिए ‘इसलाम फर्स्ट’ है.

अब समय आ गया है जब पश्चिमी एशिया के अमीर मुसलिम देश अफगानिस्तान, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, मलयेशिया, सूडान, नाइजीरिया, सोमालिया, इजिप्ट, लीबिया की सरकारें यह तय करें कि इसलाम के नाम पर कहर को अपने देशों में ही समाप्त करना होगा वरना डोनाल्ड ट्रंप हर देश में पैदा हो जाएंगे.

इसलाम हो या हिंदू धर्म अथवा ईसाई धर्म, किसी में कोई हीरेमोती नहीं जड़े हैं कि उसे मानने वाले सुखी हो जाते हैं. सभी धर्म फसाद की जड़ ज्यादा हैं, प्रेम का कम.

सिरफिरा शासक डोनाल्ड ट्रंप गलत कर रहा है पर अगर गोरी चमड़ी वाले अमेरिकी उसे समर्थन दे रहे हैं तो समझा जा सकता है कि उदारता की सीमा पूरी हो चुकी है और दंभी राष्ट्रपति के नेतृत्व में अमेरिका ने इसलाम पर ही नहीं हर गैर गोरे अमेरिका में रह रहे लोगों पर भी धावा बोल दिया है.

बड़े पर्दे की ओर रुख कर रहे हैं अभिनेता सिद्धांत गुप्ता

टेलीवीजन अभिनेता सिद्धांत गुप्ता फिल्म ‘भूमि’ से बॉलीवुड में डेब्यू करने जा रहे हैं. हम आपको बता दें कि इसी फिल्म से अभिनेता संजय दत्त भी बड़े पर्दे पर वापसी कर रहे हैं. बॉलीवुड फिल्मकार उमंग कुमार ने अपनी आगामी फिल्म ‘भूमि’ के लिए अभिनेता सिद्धांत गुप्ता को साइन कर लिया है. हम आपको ये भी बता दें कि कुमार ने इस फिल्म में सिद्धांत गुप्ता को बतौर मुख्य अभिनेता अदिति राव हैदरी के विपरीत लिया है. मुंबई में लीजेंड स्टूडियोज, चार अगस्त को इस फिल्म को रिलीज कर रहा है.

टेलीवीजन पर जलवे बिखेर चुके सिद्धांत गुप्ता इस फिल्म के जरिए बॉलीवुड में अपना पहला कदम रखने जा रहे है. सिद्धांत अब तक मुख्य रूप से टीवी शो ‘टशन-ए-इश्क’ में कुंज सरना की भूमिका निभाने के लिए ही जाने जाते हैं. अब सजा पूरी कर चुके संजय दत्त जो कि अवैध रूप से हथियार रखने के मामले में पुणे की यरवदा जेल में थे, वापस लौट चुके हैं और इस फिल्म से ही सिनेमा में वापसी कर रहे हैं.

यह फिल्म ‘भूमि’ पिता और बेटी के संबंधों पर आधारित है. इस फिलेम में संजय, अदिति के पिता के रूप में नजर आने वाले हैं. फिल्म ‘भूमि’ का निर्माण टी-सीरीज और लीजेंड स्टूडियोज ने साथ मिलकर किया है. ‘भूमि’ 4 अगस्त 2017 को सिनेमा घरों में रिलीज की जानी है.

अभिनेता सिद्धांत गुप्ता ने कुछ विज्ञापनों जैसे हीरो होंडा और कुछ शैम्पू में काम किया है, उनकी मॉडलिंग के कामों का बड़ा हिस्सा कुछ बड़े नामों और परियोजनाओं में शामिल है जैसे विल्स इंडिया फैशन वीक 2009, दिल्ली फैशन वीक 2009 आदि.

सिद्धांत गुप्ता ने मॉडलिंग और बाद में टीवी शो ‘टशन-ए-इश्क’ की टीआरपी के चार्ट को देखते हुए और इस शो को मिली अच्छी प्रतिक्रिया के साथ अपने अभिनय करियर को जारी रखने का फैसला किया. सिद्धांत, ज़ी रिश्ते पुरस्कार 2015 में, बेला भसीन के साथ पसंदीदा नई जोड़ी के लिए यह पुरस्कार विजेता चुने गए थे. इसके अलावा वे अपनी कोरियोग्राफर प्रणालिनी अतुल के साथ ‘झलक दिखला जा’ के सीजन-9 में एक प्रतियोगी भी रह चुके है.

वर्तमान में वे निर्देशक उमंग कुमार की आगामी फिल्म ‘भूमि’ में अभिनेत्री अदिति राव हैदरी के विपरीत और बड़े अभिनेता संजय दत्त के साथ अपनी पहली फिल्म में काम करने के लिए हस्ताक्षर कर चुके हैं.

नच बलिए में दिखेंगी परिणीति चोपड़ा

अभी हाल ही में लोकप्रिय टीवी शो नच बलिए शुरु होने जा रहा है. और खबर मिली है कि परिणीति चोपड़ा बतौर जज इस शो में दिखाई देंगी. अभी फिलहाल में परिणीति चोपड़ा के पास कोई काम भी नहीं है और इसी बहाने परिणीति लोगों की नजरों में भी आ जायेंगी. और टीवी शो के निर्माता भी इसी ताक में रहते हैं कि कोई नामी हीरो या हीरोइन अपने करियर के बुरे दौर से गुजर रहा हो तो उसे अपने शो में जज बना दें. इससे उनके शो की चमक बढ़ जाती है और स्टार कलाकार भी  राजी हो जाता है. पैसे भी कम ले लेते है.    

परिणीति चोपड़ा की हालत इन दिनों खराब ही है. वजन कम करने और ग्लैमरस फोटो ‍शूट कराने के बावजूद भी करियर आगे नहीं बढ़ रहा है. अभी परिणीति चोपड़ा के पास यशराज फिल्म्स की ‘मेरी प्यारी बिंदू’ उनके हाथ में है 

नच बलिए डांस शो प्रसिद्ध है और इसका सीजन आठ शुरू होने जा रहा है. परिणीति के आने से शो की टीआरपी बढ़ सकती है क्योंकि कुछ लोग जिन्हें डांस की एबीसीडी भी नहीं पता है वे परिणीति को देखने के बहाने नच बलिए जरूर देख लेंगे.

यह दुविधा हर कलाकार के सामने आती है जब फिल्मों में उसका करियर थम सा जाता है और पहला ऑफर टीवी से ही आता है.

झारखंड : कण कण में प्रकृति का अद्भुत नजारा

झारखंड पर प्रकृति ने अपने सौंदर्य का खजाना जम कर बरसाया है. घने जंगल, खूबसूरत वादियां, जलप्रपात, वन्य प्राणी, खनिज संपदाओं से भरपूर और संस्कृति के धनी इस राज्य में सैलानियों के लिए देखने को बहुत कुछ है.

रांची

झारखंड की राजधानी रांची समुद्र तल से 2064 फुट की ऊंचाई पर बसा है. यह चारों तरफ से जंगलों और पहाड़ों से घिरा है. इस के आसपास गुंबद के आकार के कई पहाड़ हैं जो शहर की खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं. इस जिले में हिंदी, नागपुरी, भोजपुरी, मगही, खोरठा, मैथिली, बंगला, मुंडारी, उरांव, पंचपरगनिया, कुडुख और अंगरेजी बोलने वाले आसानी से मिल जाते हैं. यहां के कई जलप्रपात और गार्डन पर्यटकों को रांची की ओर बरबस खींचते रहे हैं.

हुंडरू फौल : रांची शहर से 40 किलोमीटर दूर स्थित इस फौल की खासीयत यह है कि इस में नदी का पानी 320 फुट की ऊंचाई से गिर कर मनोहारी दृश्य पेश करता है. रांची – पुरुलिया मार्ग पर अनगड़ा के पास स्थित इस फौल तक कार, मोटरसाइकिल, बस, ट्रैकर (छोटी गाड़ी जिस में 10-12 लोग बैठ सकते हैं) के जरिए पहुंचा जा सकता है.

जोन्हा फौल (गौतम धारा) : यहां राढ़ू नदी 140 फुट ऊंचे पहाड़ से गिर कर फौल बनाती है. इस की खूबी यह है कि फौल और धारा के निकट पहुंचने के लिए 489 सीढि़यां बनी हुई हैं. सीढ़ियों पर चढ़ते और उतरते समय सावधानी रखने की जरूरत होती है क्योंकि पानी से भीगे रहने की वजह से सीढ़ियों पर फिसलन होती है. रांची-पुरुलिया मार्ग पर स्थित यह फौल रांची शहर से 49 किलोमीटर दूर है और यहां तक कार, मोटरसाइकिल, बस, ट्रैकर के जरिए पहुंचा जा सकता है.

दशम फौल : शहर से 46 किलोमीटर दूर स्थित यह फौल कांची नदी की कलकल करती धाराओं से बना है. यहां पर कांची नदी 144 फुट ऊंची पहाड़ी से गिर कर दिलकश नजारा प्रस्तुत करती है. प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर इस फौल के पानी में कभी भी उतरने की कोशिश नहीं करनी चाहिए क्योंकि पानी के नीचे खतरनाक नुकीली चट्टानें हैं. फौल के पास के पत्थर भी काफी चिकने हैं, इसलिए उन पर खास ध्यान दे कर चलने की जरूरत है. फौल तक कार, मोटरसाइकिल, बस या फिर यहां चलने वाली छोटी गाड़ियों के जरिए पहुंचा जा सकता है.

हिरणी फौल : यह फौल रांची-चाईबासा मार्ग पर है और रांची से करीब 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. यहां तक कार, मोटरसाइकिल, बस, ट्रैकर के जरिए पहुंचा जा सकता है. 120 फुट ऊंचे पहाड़ से गिरते पानी का संगीत पर्यटकों के दिलों के तारों को झंकृत कर देता है.

सीता फौल : यहां 280 फुट की ऊंचाई से गिरते पानी को देखने और कैमरे में कैद करने का अलग ही मजा है. यह फौल शहर से 44 किलोमीटर दूर रांची-पुरुलिया रोड पर स्थित है. यहां कार, मोटरसाइकिल, बस, ट्रैकर के जरिए पहुंच सकते हैं. फौल के पानी में ज्यादा दूर तक जाना खतरे को न्यौता देना हो सकता है.

पंचघाघ : यहां पर एकसाथ और एक कतार में पहाड़ों से गिरते 5 फौल प्राकृतिक सुंदरता का अनोखा नजारा पेश करते हैं. रांची से 40 किलोमीटर और खूंटी से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस फौल के पास हराभरा घना जंगल और बालू से भरा तट है जो पर्यटकों को दोहरा आनंद देता है. इस फौल तक पहुंचने के लिए कार, मोटरसाइकिल, बस, ट्रैकर आदि का सहारा लिया जा सकता है.

बिरसा मुंडा जैविक उद्यान : यह उद्यान रांची से 16 किलोमीटर पूर्व में रांचीपटना मार्ग पर ओरमांझी के पास स्थित है. इस से 8 किलोमीटर की दूरी पर मूटा मगरमच्छ प्रजनन केंद्र भी है.

रौक गार्डन : कांके के रौक गार्डन में प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद उठाया जा सकता है. गार्डन का भूतबंगला बच्चों के बीच खूब लोकप्रिय है. यहां से कांके डैम का भी नजारा लिया जा सकता है.

टैगोर हिल : शहर से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मोराबादी हिल, टैगोर हिल के नाम से मशहूर है. यह कवि रवींद्र नाथ टैगोर के बड़े भाई ज्योतिंद्रनाथ टैगोर के जीवन से जुड़ी हुई है. रवींद्रनाथ को भी यहां की प्राकृतिक सुंदरता काफी लुभाती थी. सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा लेने के लिए पर्यटक यहां घंटों बिताते हैं.

इस के अलावा बिरसा मृग विहार, नक्षत्र वन, कांके डैम, सिद्धूकान्हू पार्क, रांची झील, रातूगढ़ आदि भी रांची के मशहूर पर्यटन स्थल हैं.

एअरपोर्ट : रांची एअरपोर्ट

रेलवे स्टेशन : रांची रेलवे स्टेशन

बस अड्डा : रांची बस अड्डा (रेलवे स्टेशन के पास)

कहां ठहरें : मेन रोड पर कई होटल 500 से ले कर 3 हजार रुपए किराए पर मौजूद हैं.

जमशेदपुर

टाटा स्टील की नगरी जमशेदपुर या टाटा नगर पूरी तरह से इंडस्ट्रियल टाउन है, पर यहां के कई पार्क, अभयारण्य और लेक पर्यटकों को अपनी ओर खींचते रहे हैं.

जुबली पार्क : 238 एकड़ में फैले जुबली पार्क को टाटा स्टील के 50वें सालगिरह के मौके पर बनाया गया था. साल 1958 में बने इस पार्क को मशहूर वृंदावन पार्क की तरह डैवलप किया गया है. इस की सब से बड़ी खासीयत यह है कि इस में गुलाब के 1 हजार से ज्यादा किस्मों के पौधे लगाए गए हैं, जो पार्क को दिलकश बनाने के साथसाथ खुशबुओं से सराबोर रखते हैं. इस में चिल्ड्रेन पार्क और झूला पार्क भी बनाया गया है. झूला पार्क में तरहतरह के झूलों का आनंद लिया जा सकता है. रात में रंगबिरंगे पानी के फौआरे जुबली पार्क की खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं.

दलमा वन्य अभयारण्य : दलमा वन्य अभयारण्य जमशेदपुर का खास प्राकृतिक पर्यटन स्थल है. शहर से 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह अभयारण्य 193 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है. इस में जंगली जानवरों को काफी नजदीक से देखने का खास इंतजाम किया गया है. हाथी, तेंदुआ, बाघ, हिरन से भरे इस अभयारण्य में दुर्लभ वन संपदा भरी पड़ी है. यह हाथियों की प्राकृतिक आश्रयस्थली है. झारखंड के पूर्वी सिंहभूम, सरायकेला, खरसावां से ले कर पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले की बेल पहाड़ी तक इस का दायरा फैला हुआ है.

डिमना लेक : जमशेदपुर शहर से 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित डिमना लेक के शांत और प्राकृतिक सौंदर्य का लुत्फ लिया जा सकता है. दलमा पहाड़ी की तलहटी में बसी इस लेक को देखने के लिए सब से ज्यादा पर्यटक दिसंबर और जनवरी के महीने में आते हैं.  इस के अलावा हुडको झील, दोराबजी टाटा पार्क, भाटिया पार्क, जेआरडी कौंप्लैक्स, कीनन स्टेडियम, चांडिल डैम आदि भी जमशेदपुर के प्रमुख पर्यटन स्थल हैं.

नजदीकी एअरपोर्ट : टाटा एअरपोर्ट

रेलवे स्टेशन : टाटानगर रेलवे स्टेशन

हजारीबाग

झारखंड के सब से खूबसूरत शहर हजारीबाग को ‘हजार बागों का शहर’ कहा जाता है. कहा जाता है कि कभी यहां 1 हजार बाग हुआ करते थे. झीलों और पहाड़ियों से घिरा यह खूबसूरत शहर समुद्र तल से 2019 फुट की ऊंचाई पर बसा हुआ है. रांची से 91 किलोमीटर की दूरी पर हजारीबाग नैशनल हाईवे-33 पर बसा हुआ है.

बेतला नैशनल पार्क : साल 1976 में बना यह नैशनल पार्क 183.89 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है. इस नैशनल पार्क में जंगली सूअर, बाघ, तेंदुआ, भालू, चीतल, सांभर, कक्कड़, नीलगाय आदि जानवर भरे पड़े हैं. पार्क में घूमने और जंगली जानवरों को नजदीक से देखने के लिए वाच टावर और गाड़ियों की व्यवस्था है. हजारीबाग शहर से 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस पार्क की रांची शहर से दूरी 135 किलोमीटर है.

कनेरी हिल : यह वाच टावर हजारीबाग का मुख्य आकर्षण है. शहर से 5 किलोमीटर दूरी पर स्थित कनेरी हिल से हजारीबाग का विहंगम नजारा लिया जा सकता है. सूर्यास्त और सूर्योदय के समय पर्यटक इस जगह से शहर की खूबसूरती को देखने आते हैं. इस वाच टावर के ऊपर पहुंचने के लिए 600 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं.

इस के अलावा रजरप्पा, सूरजकुंड, हजारीबाग सैंट्रल जेल, हजारीबाग लेक आदि कई दर्शनीय स्थल भी हैं.

नजदीकी एअरपोर्ट : रांची एअरपोर्ट (91 किलोमीटर)

रेलवे स्टेशन : कोडरमा रेलवे स्टेशन (56 किलोमीटर)

बस अड्डा : हजारीबाग बस अड्डा

नेतरहाट

छोटा नागपुर की रानी के नाम से मशहूर नेतरहाट से सूर्योदय और सूर्यास्त का अद्भुत नजारा देखा जा सकता है. 6.4 किलोमीटर लंबे और 2.5 किलोमीटर चौड़ाई में फैले नेतरहाट पठार में क्रिस्टलीय चट्टानें हैं. समुद्र तल से 3514 फुट की ऊंचाई पर स्थित नेतरहाट के पठार रांची शहर से 160 किलोमीटर की दूरी पर हैं. झारखंड के लातेहार जिले में स्थित नेतरहाट में घाघर और छोटा घाघरी फौल भी पर्यटकों को लुभाते हैं.

नजदीकी एअरपोर्ट : रांची एअरपोर्ट

नजदीकी रेलवे स्टेशन : रांची रेलवे स्टेशन

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें