जल्द आ रहा है ‘दीया और बाती हम’ का सीक्वल

स्टार प्लस का बेहद सफल रहे धारावाहिक ‘दीया और बाती हम’ के अंत के बाद अब इस शो के निर्माता ने इस शो के दूसरे सत्र को लाने का फैसला लिया है. लोकप्रिय टीवी शो ‘दीया और बाती हम’ के दूसरे सीजन का नाम ‘तू सूरज मैं सांझ पियाजी’ होगा और ये बात दीया और बाती हम’ में भाभो का किरदार निभाने वाली नीलू वाघेला द्वारा सामने आई.

स्टार प्लस पर प्रसारित हुए शो ‘दीया और बाती हम’ की समाप्ति के बाद शो के अगले सीक्वल में 20 साल का अंतर दिखाया ताएगा मतलब शो में 20 साल का लीप लिया जाएगा. ‘दीया और बाती हम’ के राठी परिवार के कुछ पुराने और कुछ नए चेहरे इस सीजन में नजर आने वाले हैं. शो का नया नाम भी ‘दीया और बाती हम’ टाइटल की तर्ज पर ही रखा गया है. सूत्रों की मानें तो ‘दीया और बाती हम’ के इस अगले सीजन में दिव्यांका त्रिपाठी की छोटी बहन नजर आने वाली हैं.

दीया और बाती हम’ के आखिरी कड़ी प्रसारित होने के सात महीने बाद से ही शो की पूरी कास्ट, शो के अगले सीजन की वापसी को लेकर बेहद खुश हैं. यह बात तो आप भी जानते हैं कि ये शो घर-घर में कितना मशहूर हो गया था. खबरों के अनुसार शो के बंद होने के बाद से ही कई दर्शक और शो के प्रशंसक शो की पूरी टीम को चिट्ठी और मेल भेजकर, सभी से  शो के सीक्वल के साथ वापस आने की गुजारिश कर रहे हैं.

सूत्रों का कहना है कि दिया और बाती हम’ में संध्या राठी का किरदार निभाने वाली दीपिका सिंह और उनके पति का किरदार निभाने वाले सूरज राठी यानि कि अनस राशिद, इस नए शो का हिस्सा नहीं होंगे. शो नया सीक्वल संध्या और सूरज के बच्चों वेद और कनक पर आधारित होगा और इनके इर्दगिर्द ही घूमेगा.

टेलीवीजन पर शो दीया और बाती हम पांच सालों तक प्रसारित हुआ और हमेशा बेहद सफल शोज की लिस्ट में सबसे ऊपर रहा. लंबे समय के बाद टीआरपी में गिरावट आने के कारण हाल ही में निर्माताओं ने इसे बंद करने का निर्णय लिया, लेकिन केवल इसे ताजा सामग्री के साथ पर्दे पर वापस लाने के लिए. वर्तमान में स्टार प्लस पर इस शो का समय स्लॉट महेश भट्ट के धारावाहिक नामकरण को दिया गया है.

नौनिहालों के लिए निवेश में न करें देरी

अपने बढ़ते नौनिहालों को महंगी शिक्षा देने व उन्हें नंबर वन पर रखने का हर मातापिता का सपना होता है. लेकिन महंगाई का मुकाबला करते हुए इस सपने को पूरा करने के लिए पैसों का सही समय पर व सही जगह निवेश कैसे करें, बता रहे हैं अमरीश सिन्हा.

भारत में बच्चों को केंद्र में रख कर निवेश करने की परंपरा नहीं रही है. जब से देश और दुनिया में उदारीकरण व बाजारवाद ने दस्तक दी तब से शिक्षा, पैसा व कैरियर अधिक महत्त्वपूर्ण होते गए. यही वजह है कि 20वीं सदी तक तो ऐसी गिनीचुनी निवेश योजनाएं ही देश में उपलब्ध थीं जो विशेषकर बच्चों के लिए हों. इन के बारे में भी शहरी निवेशकों या किसी दूसरे प्रकार के बीमा लेने वालों को ही पता होता था.

चाइल्ड इंश्योरैंस प्लान के अधिकतर ग्राहक वे ही होते थे जो या तो स्वयं बीमा कंपनी में कार्यरत थे या उन के मित्र व रिश्तेदार होते थे. बच्चों के भविष्य की निवेश योजनाएं बहुत ही ‘लो प्रोफाइल’ यानी कम लोगों के बीच प्रसारित होती थीं. वे तो गनीमत रहे 20वीं सदी के समापन के वर्ष और 21वीं सदी के शुरुआती साल जब उदारवाद की कोख से कई सारे घटनाक्रमों ने जन्म लिया. उन में से एक यह था कि लोगों में अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए निवेश करने की जागरूकता पनपी.

अश्विनी गरोडि़या तभी तो अपने इकलौते पुत्र को आईआईएम अहमदाबाद में प्रवेश दिलाने के वास्ते जीजान से जुटे हैं. बेटा होशियार भी है. उस का दाखिला एक नामीगिरामी कोचिंग संस्था में भी कराया गया है. अश्विनी वहां की फीस और फिर मैनेजमैंट में चयन के बाद पूरे 3 साल के आवासीय शिक्षण शुल्क आदि को मिला कर करीब 20 लाख रुपए जुटा चुके हैं.

मुकुंद गाडगिल का लड़का अतुल इसी साल साइंस इंस्टीट्यूट, भोपाल में चुना गया है जहां सभी छात्रों को सरकार की तरफ से 5 हजार रुपए माहवार छात्रवृत्ति मिलती है. वे काफी खुश हैं क्योंकि बतौर फीस मोटी रकम जुटा पाना उन के लिए मुमकिन नहीं था. दरअसल, पिछली सदी तक 1 बच्चे की पढ़ाई में मामूली रकम (कुछ विशेष विषयों की पढ़ाई को छोड़ कर) खर्च होती थी और वह नौकरी भी पा जाता था. लेकिन अब प्रतिस्पर्धी माहौल में पढ़ाई आसान नहीं रह गई है. महत्त्वाकांक्षाएं दिनबदिन बलवती हो रही हैं. हालांकि औरों को पीछे छोड़ आगे बढ़ने के मार्ग में कई निजी व सामाजिक खतरे भी हैं लेकिन उन्हें एक ओर रखते हुए सिर्फ आर्थिक पहलू पर गौर करें तो यह कहा जाना जरूरी है कि बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अभिभावकों को आर्थिक तौर पर सबल बनना होगा.

बच्चों के भविष्य उन के अध्ययन के कोर्स, डिग्री, इंस्टीट्यूट आदि पर निर्भर होते हैं. ये सभी उच्च कोटि के हों, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप का बच्चा कितना होशियार है व आप श्रेष्ठ संस्थाओं में उस के अध्ययन का खर्च उठा पाने में सक्षम हैं या नहीं. शायद यही वजह है कि कई अभिभावक अपने बच्चों की बेहतर पढ़ाई हेतु बजट बनाने व पैसों का जुगाड़ करने को अपने जीवन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा समझते हैं. हो भी क्यों न, राजेश सिन्हा अपने पुत्र को एमबीए में दाखिला दिलाना चाहते हैं. पर जिस किसी नामी संस्थान से संपर्क करते हैं, उन्हें पढ़ाई का कुल खर्च 12-13 लाख के आसपास बताया जाता है. वे अपने पुत्र निशांत को आईआईएम अहमदाबाद या एक्सएलआरआई जमशेदपुर के लिए तैयार कर रहे हैं.

चाइल्ड इंश्योरैंस प्लान

चाइल्ड इंश्योरैंस योजना की खासीयत यह होती है कि यदि बच्चे के एक निश्चित आयु तक पहुंचने से पहले ही बीमाधारक की मृत्यु हो जाती है तो भी बीमा अपनी मैच्योरिटी तिथि तक जारी रहता है जबकि उस के बाद सारे प्रीमियम माफ हो जाते हैं. प्रीमियम बीमा कंपनी द्वारा खुद भरे जाते हैं. पौलिसी के मैच्योर होने पर सारे लाभ आप के बच्चे को पूर्ववत मिलेंगे.

दरअसल, यह पौलिसी काफी उपयोगी है व सभी बीमा कंपनियों के पास ऐसी पौलिसी उपलब्ध है. अमूमन यह पौलिसी 2 तरह की होती है. पहली पौलिसी मार्केट से जुड़ी होती है यानी इस में अदा किया जाने वाला प्रीमियम ‘इक्विटी’ और ‘डेट’ दोनों में निवेश किया जाता है जबकि दूसरी पौलिसी पारंपरिक होती है. इस में निवेश सिर्फ ‘डेट’ में होता है. दोनों में से कौन सा विकल्प आप को पसंद है. इस का चुनाव बीमा लेते वक्त आप को करना होता है. जहां पहले विकल्प में ‘जोखिम’ अधिक होने की वजह से मैच्योरिटी पर मिलने वाली रकम अधिक हो सकती है, वहीं दूसरा विकल्प ‘रिस्क फ्री’ होता है. पर इस में ‘मैच्योरिटी वैल्यू’ अपेक्षाकृत कम हो सकती है.

निवेश की शुरुआत

बच्चा जन्म ले, तभी से उस के लिए निवेश के रास्ते तय करने शुरू कर देने चाहिए. अधिकतर मांबाप अपने बच्चों के नाम लंबी अवधि के लिए फिक्स्ड डिपौजिट या आरडी (रेकरिंग डिपौजिट) अकाउंट खुलवाते हैं लेकिन ये नाकाफी होते हैं. कारण, एक तो ये मुद्रास्फीति को मात नहीं दे पाते, दूसरा, लंबी अवधि के एफडी में आप की रकम लंबे समय के लिए ब्लौक हो जाती है. ये रकम मैच्योरिटी पर अमूमन उतनी भी नहीं होती कि मौजूदा मार्केट दर पर आप बच्चों की महंगी पढ़ाई का खर्च वहन कर सकें.

समझदारी इस में है कि अपने नौनिहालों के लिए निवेश के विभिन्न ‘सेगमैंट’ तय कर लिए जाएं. यह सेगमैंट निर्धारण आप के लक्ष्य के मुताबिक हो. मसलन, लड़के या लड़की के विवाह का खर्च, विवाह की अनुमानित आयु, पढ़ाई पर होने वाला अनुमानित व्यय आदि. अब इन लक्ष्यों के मुताबिक अपनी वर्तमान आय व भविष्य की आय को ध्यान में रख कर निवेश करें. निवेश के कई सेगमैंट हो सकते हैं, जैसे चाइल्ड इंश्योरैंस प्लान, रियल एस्टेट या चुनिंदा कंपनियों के शेयरों में निवेश, पीपीएफ खाते में निवेश. पीपीएफ में माहवार जमा की जाने वाली रकम 15 वर्षों बाद बड़ी रकम में तबदील हो जाती है. रिटर्न का गोल्ड ईटीएफ भी अच्छा विकल्प है.

मुंबई के चेंबूर इलाके में रहने वाले हरीश रावजियानी शेयरों में निवेश के जरिए न सिर्फ अपनी दोनों संतानों (एक पुत्र व एक पुत्री) को अच्छी शिक्षा दिला सके, बल्कि आज दोनों संतानें बहुराष्ट्रीय कंपनियों में ऊंचे ओहदों पर कार्यरत हैं. चाइल्ड इंश्योरैंस प्लान ‘टर्म प्लान’ भी हो सकता है. ये प्लान एक से अधिक भी लिए जा सकते हैं. रियल एस्टेट में निवेश में रिटर्न 20-25 फीसदी सालाना हो सकता है. यह निवेश मुद्रास्फीति को तेजी से मात देता है पर पूंजी अधिक निवेश करनी पड़ती है.

चुनिंदा स्टौक में निवेश से लंबी अवधि में अच्छा रिटर्न मिलता है. कुछ स्टौक लंबी अवधि के लिए काफी फायदेमंद माने जाते हैं, जैसे एसबीआई, एलएंडटी, नेसले, ब्रिटानिया, कोलगेट, कैस्ट्रोल, केडिला हैल्थकेयर, डाबर, कोल इंडिया आदि. ‘सिप’ के जरिए श्रेष्ठ म्युचुअल फंड में निवेश 15 वर्षों में औसतन आप की रकम में 400 फीसदी इजाफा कर सकते हैं. वास्तविक सोने या गोल्ड ईटीएफ में निवेश भी अच्छा है. औसतन 18-20 फीसदी का रिटर्न देने वाला यह निवेश महंगाई की मार से आप को बचाता है और आप की पूंजी को सुरक्षित भी रखता है.

बहरहाल, जहां चाइल्ड प्लान में 10 हजार रुपए प्रति माह की बचत पर आप को 15 साल में करीब 61 लाख रुपए मिलेंगे, वहीं ऊपर दर्शाए गए निवेश के अलगअलग सेगमैंट के अनुसार इसी अवधि में लगभग 1 करोड़ 15 लाख का रिटर्न प्राप्त हो सकता है. चूंकि मुद्रास्फीति की दर भी औसतन 8 फीसदी रहती है, इसलिए महंगाई का मुकाबला करते हुए अपने बढ़ते नौनिहालों को महंगी शिक्षा देने और उन्हें ‘नंबर वन’ पर रखने के लिए निवेश करने में समझदारी ही नहीं बल्कि तत्परता भी दिखानी होगी यानी चाइल्ड इंश्योरैंस प्लान भी लें और मार्केट में सूझबूझ से पैसे भी लगाएं.

एक दुनिया सिर्फ स्त्रियों की…

धर्म और समाज के ठेकेदारों ने कुछ ऐसे बेतुके नियम बनाए हैं, जिसके बिनाह पर स्त्रियों को न जाने कब से उनके अधिकारों से वंचित रखा गया है. बनाने वाले ने तो स्त्री या पुरुष के पैदा होने की संभावनाएं भी ‘टॉस’ की तरह ही बनाई है, यानी की 50-50 बनाई है. पर नियम बनाने वालों ने पुरुषों को ज्यादा अधिकार देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी.

स्त्रियों को हमेशा ही प्रताड़ित और शोषित किया गया. धर्म के नाम पर आडंबर और पाखंड की दुकानें खोलने वालों ने आस्था के नाम पर स्त्री को अपवित्र तक घोषित कर दिया. धर्म की दुकानों(मंदिर, मस्जिद, मजार आदि) पर तो रजस्वला स्त्रियों को अंदर जाने की मनाही है, पर कामाख्या मंदिर में ही देवी की योनि की पूजा करते हैं. यही नहीं चैत्र मास के पर्व के समय देवी के “उन दिनों” के तथाकथित रक्त जैसे द्रव्य को कपड़े में भिगोकर अपने साथ ले जाते हैं, इसे शुभ माना जाता है.

यह धर्म के नाम पर पाखंड नहीं तो और क्या है कि, एक तरफ एक स्त्री को “गंदा” और “मलिन” समझा जाता है, वहीं दूसरी तरफ एक स्त्री के ही “उन दिनों” के रक्त को संभाल कर रखा जाता है. यह अजीब हिपोक्रिसी है लोगों की, जब मन किया औरत का उपयोग किया और जब मन किया उसे प्रताड़ित किया या दुत्कार दिया.

पर ऐसा भी नहीं है कि कभी इन सब के खिलाफ आवाजें नहीं उठीं. समय गवाह है कि इस नाइंसाफी के खिलाफ स्त्रियों ने आवाज उठाई है. चाहे वो कलम से हो या तलवार से स्त्रियां इस हिपोक्रिसी के खिलाफ कई बार उठ खड़ी हुई हैं. सिमोन दे बोवा हो या वर्जीनिया वूल्फ सभी ने अपने स्तर पर आवाजें उठाई हैं. कुछ औरतों ने ऐसी जगहों का निर्माण किया जहां पुरुषों का जाना वर्जित है. कई क्लब और बार स्त्रियों की एंट्री पर भारी छूट भी देते हैं. भारत में कुछ ही दिनों पहले भूमाता ब्रिगेड की नारियों ने धर्म की दुकानों के खिलाफ आवाजें उठाईं और प्रताड़ित भी हुईं.

पर ट्रेवल के सेक्शन की खबर है तो ऐसी बातें शोभा नहीं देती, पाठक भी यही सोचेंगे कि ये क्या अजीबोगरीब बातें हैं, जो एक पागल लेखक ने लिखी है. पर बातें अजीबोगरीब ही सही पर सच हैं और कड़वी चीजें लोगों को कम ही पसंद आती हैं. क्योंकि सेक्शन की बाध्यता है, तो मुद्दे को जरा नर्म मिजाज बनाना फर्ज बन जाता है.

आज हम बात करने जा रहे हैं कुछ ऐसी जगहों की जहां पुरुषों का जाना वर्जित है-

1. उमोजा गांव, केन्या

केन्या के आदिवासियों के बारे में तो आपने सुना ही होगा, पर उत्तरी केन्या में एक ऐसा गांव भी हैं, जहां सिर्फ औरतें रहती हैं. यहां एक भी पुरुष नहीं रहता और यहां उनका प्रवेश भी वर्जित है. यहां पर रहने वाली औरतें खुद से गहने बनाकर, बेचकर और जानवर पालकर गुजर-बसर करती हैं. इस गांव को 1990 में 15 रेप सर्वाइवर औरतों ने बसाया था. पर उमोजा में अब कई तरह की स्त्रियां रहती हैं. इनमें से अधिकतर औरतें या तो घरेलू हिंसा का शिकार हुईं थी या फिर उनका बलात्कार हुआ था. कुछ औरतें शादी से बचकर भी यहां आकर बस गईं हैं. यात्री और पर्यटक यहां आ सकते हैं पर उनको भी फ्री एंट्री नहीं मिलती. पुरुषों की इस बड़ी सी दुनिया में आजाद स्त्रियों का यह छोटा सा गांव पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र है.

2. मदर्स मार्केट, मणिपुर

इमा केइथेल, जिसे अंग्रेजी में मदर्स मार्केट कहा जाता है उत्तर पूर्वी भारत में बसे मणिपुर राज्य का “वुमन ओन्ली” बाजार है. यह एशिया का सबसे बड़ा “वुमन ओन्ली” बाजार है. यह 500 साल पुराना बाजार है, जिसे 16वीं शताब्दी में बसाया गया था. यहां 4,000 से भी अधिक महिला व्यापारी और दुकानदार काम करती हैं. इस बाजार का उद्देश्य महिलाओं को आत्मनिर्भर महसूस करवाना है.

यहां भी पुरुषों ने अपनी गिरी हरकतें दिखाई थीं और कई बार इस बाजार पर कब्जा करने की कोशिश की थी. 1904 में ‘नुपि लाल’ युद्ध से यहां की औरतों ने अंग्रेजों को भी यहां से बाहर खदेड़ा था. इस बाजार की रौनक देखते ही बनती है. 2003 में सरकार तक ने इस बाजार को बंद करने की कोशिश की, पर यूनियन के आगे सरकार भी सफल नहीं हो पाई.

3. इब्रा, ओमान

रेगिस्तानी शहर इब्रा की जनसंख्या 35,000 से अधिक नहीं है. यह ओमानी शहर मस्कट से 140 किमी की दूरी पर है. हफ्ते के एक दिन, बुधवार को इस शहर की रौनक देखते ही बनती है. वजह है यहां पर लगने वाला औरतों का बाजार. सैंकड़ों स्त्रियां कपड़ों से लेकर जेवर आदि बेचती हैं. खाने की अलग अलग वस्तुएं भी यहां मिलती हैं. बुधवार को यहां पर पुरुष दिखाई नहीं देते, क्योंकि उनको इस बाजार में आने की मनाहि है. पर सहर होते ही, यानी गुरुवार से फिर यहां पुरुषों का दबदबा होता है.
4. कसोल, हिमाचल प्रदेश

हिमाचल की गोद में बसे कसोल को प्रकृति ने बड़ी ही शिद्दत से बनाया है. पर यहां जाकर आपको लगेगा मानो आप इज्राइल में हो. यहां के ज्यादातर लोग हिब्रू बोलते हुए मिलेंगे. भारत में ही बसे इस गांव में भारतीय पुरुषों के आने की मनाही है. टूरिस्ट यहां आते तो हैं, पर गांववालें पुरुषों के ठहरने पर एतराज जताते हैं. जो लोग ठहरने का प्रबंध करते हैं वे पुरुषों से एक्सट्रा पैसे लेते हैं. यह ज्यादती तो है, पर औरतों पर होने वाली ज्यादती के मुकाबले कुछ भी नहीं है.

5. धर्म की कुछ दुकानें (मंदिर)

यूं तो रजस्वला स्त्रियों का मंदिरों में प्रवेश वर्जित है. पीरियड्स शुरु होते ही लड़कियों को इससे अवगत करा दिया जाता है कि उन्हें मंदिर नहीं जाना है या रसोई है में नहीं जाना, वगैरह, वगैरह. भारत के कुछ मंदिर ऐसे भी हैं, जहां पुरुषों का जाना वर्जित है.

1) ब्रह्मा मंदिर, पुष्कर

पुष्कर में स्थित विश्व प्रसिद्ध ब्रह्मा मंदिर के गर्भ गृह में विवाहित पुरुषों की एंट्री बैन है.

2) अत्तुकल भागवती मंदिर

केरल में स्थित अत्तुकल भागवती मंदिर में भी पुरुष प्रवेश नहीं कर सकते. पोंगल के समय यहां लाखों औरतें इकट्ठा होती हैं. इस मौके पर यहां पुरुष प्रवेश नहीं कर सकते हैं.

3) भगती मां मंदिर, कन्याकुमारी

केरल में स्थित यह मंदिर में भी देवी की पूजा सिर्फ औरतें ही करती हैं.

दुनिया बदल रही है. सउदी अरब जैसे देश में भी स्त्रियां अपने हक की बात कर रही हैं. अगर हक नहीं मिल रहा है तो अपनी ही एक अलग दुनिया बना रही हैं. तथाकथित पुरुषों के इस समाज में स्त्रियों के लिए जगह नहीं है, तभी तो स्त्रियों को अपनी जगह खुद बनानी पड़ रही है.

जिंदगी में भरें फैशन के नए रंग

सर्दी का मौसम लगभग बीत चुका है और अब गर्मी का मौसम आपसे बस कुछ ही दिनों की दूरी पर है, तो क्या आप भी तैयारी कर चुकी हैं. इन गर्मियों में आप अपना सारा टेंशन भूलकर, खुद को फैशनेबल रख सकते हैं. सभी लोग गर्मियों के मौसम में खाने-पीने पर तो ध्यान देते हैं पर पहनावे की समझ तो जैसे खो बैठते हैं.

तो आज हम आपको बता रहे हैं कि आप इस गर्मी के मौसम में किस तरह से खुद को फैशनेबल बनाकर, खूबसूरत दिख सकती हैं. हम आपको बताएंगे कि गर्मी के इस मौसम में कैसे कपड़े पहनें, ताकि आप स्टाइलिश भी दिखें और आप गर्मी से अपने आपको बचा भी सकें..

सही फैब्रिक और सही रंगों का चुनाव

गर्मी के मौसम में यह ध्यान रखें कि आप जो कपड़े पहन रहे हैं उनका फैब्रिक कैसे है. इनके चुनाव सही होना चाहिए. इसके अलावा कपड़ों में सही रंग का चुनाव करना भी बहुत जरूरी होता है. गर्मी में हल्के रंगों का चुनाव करना चाहिए.

अगर आपको सफेद रंग के कपड़े पहनना पसंद है तो गर्मी में इससे बेहतर रंग कोई और नहीं हो सकता है. हम आपको बता देना चाहते हैं कि सफेद रंग न सिर्फ सूरज की गर्मी को कम करता है बल्कि आपको एक कूल लुक भी देता है. गर्मी में आपको खुद को ब्लैक या ग्रे जैसे गहरे रंगों से दूर ही रखना चाहिए.

आरामदायक कपड़े

अगर आप इस गर्मी के लिए शॉपिंग करने निकले रही हैं तो कपड़े खरीदते समय ये बात ध्यान रखें कि कपड़े आपके शरीर के लिए आरामदायक होने चाहिए. गर्मी में पहने जाने वाले कपड़े न सिर्फ मुलायम होने चाहिए बल्कि गरमी में उनका थोड़ा सा हवादार होना भी जरूरी है. सूती कपड़ों से बेहतर गर्मी के मौसम में कोई और कपड़ा नहीं होता. हम आपको बता दें कि गर्मी के मौसम में ढीले-ढाले कपड़े पहनने से पसीना जल्दी सूख जाता है और आपको तेज गर्मी से तुरंत राहत भी मिल जाती है.

कूल फ्लोरल प्रिंट व पेस्टल रंग

इस मौसम में आपको कोशिश करनी चाहिए कि कपड़ों में छोटे-छोटे प्रिंट और पेस्टल रंगों के साथ कपड़े पहनें. सुंदर फ्लोरल प्रिंट वाले कपड़ों से भी आपको एक कूल लुक मिलता है. मोटे फैब्रिक और बड़े-बड़े प्रिंट वाले ड्रेसेस गर्मी के मौसम में एवॉयड ही करना चाहिए. इस बात पर ध्यान दें कि अगर आपका वजन थोड़ा ज्यादा है तो बड़े प्रिंट वाले कपड़ों में आप थोड़ा और मोटी दिखेंगी.

टाइट फिटिंग भूल जाइये

गर्मी में आपका पूरा शरीर पसीने से तर हो जाता है. गर्मी में में कपड़ों की फिटिंग करवाते समय ये ना भूलें कि आपका कपड़ा टाइट फिटिंग तो नहीं है न, क्योंकि टाइट कपड़ों में आपका फिगर तो अच्छा दिखता है पर आपको उन कपड़ों में आराम बिल्कुल भी महसूस नहीं होगा. गर्मी में पसीने से आपके अच्छे और महंगे कपड़े आपकी बॉडी से चिपक जाते हैं, जो कि एक गंदा लुक देते हैं.

एक्सेसरीज

मौसम गर्मी का है तो क्या हुआ. आप एक दम साधारण रहकर भी बहुत खूबसूरत दिख सकते हैं. गर्मी में हल्के रंग के कपड़े तो जरूर पहनें लेकिन साथ ही खुद को सही एक्सेसरीज से संजाएं. सही एक्सेसरीज का चुनाव आपके लुक को सुपरकुल बना देता है. गर्मी के मौसम में हेड एक्सेसरीज, बेल्ट्स, ब्रेसलेट्स या कोई भी हल्की चीजें आपके समर लुक को बेहतर बना देती हैं. इसके अलावा ड्रेस से मैचिंग के बैग्स और पर्सेस का चुनाव भी करें. 

खुद के साथ एक्सपेरिमेंट

इस गर्मी में अपने साथ एक्पेरीमेंट्स जरूर करें. ये गर्मी ही ऐसा एक मौसम है जिसमें आप अपने कपड़ों को लेकर अपने साथ तरह-तरह के एक्सपेरिमेंट्स आसानी से कर सकती हैं. हर कोई जो पहनता है वही आपका भी फैशन बने ये जरूरी तो नहीं है. अपने साथ एक्सपेरिमेंट्स जरूर करें और साथ ही यह बात भी ध्यान रखें कि एक्सपेरिमेंट्स आप पर अच्छे भी लगें. जैसे कैप्री के साथ कुर्ता पहन सकते हैं या फिर ढीली फिटिंग वाली पैंट के साथ कॉटन की अच्छी शर्ट या टी-शर्ट आपको एक आकर्षक लुक दे सकता है.

ट्रेंडी कपड़े है अच्छा ऑप्शन

अगर आपको गर्मी के मौसम में जींस पहनना पसंद नहीं आता तो आप उसकी जगह ढीली फिटिंग वाली पैंट या ट्राऊजर भी पहन सकती हैं. हैरम और विभिन्न सलवारों से लेकर कई तरह के विकल्प आज बाजार में उपलब्ध होते हैं. इनमें से सभी के साथ आप टी-शर्ट या शॉर्ट कुर्ता जैसा कुछ पहन सकती हैं.

कलाकार होने की यह सबसे बड़ी खूबसूरती है : शाहिद कपूर

शाहिद कपूर के करियर पर जब निगाह दौड़ाते हैं, तो पता चलता है कि शाहिद ने जब जब विशाल भारद्वाज के निर्देशन में फिल्में की है, तब तब उन्हें सफलता मिली है. फिलहाल वह विशाल भारद्वाज निर्देशित फिल्म ‘‘रंगून’’ को लेकर काफी उत्साहित हैं.

आपके करियर में जो टर्निंग प्वाइंट रहे हैं, उनका आपकी निजी जिंदगी में क्या असर रहा?

मेरी जिंदगी व मेरे करियर में पहला टर्निंग प्वाइंट पहली फिल्म ‘‘इश्क विश्क’’ का मिलना ही रहा. मैं किसी स्टार का बेटा नही हूं. मेरे पिता कलाकार हैं, स्टार नहीं. आप भी जानते हैं कि कलाकार और स्टार में बहुत बड़ा फर्क होता है. दोनों को किस तरह से ट्रीट किया जाता है, उससे भी आप वाकिफ हैं. उसके बाद दूसरा टर्निंग प्वाइंट रहा, जब मैंने ‘विवाह’ और ‘जब वी मेट’ जैसी फिल्में की. इन फिल्मों से मेरी एक रोमांटिक इमेज लोगों के जेहन में बसी. अब इस ईमेज को तोड़ना भी मेरे लिए चुनौती बन गयी थी.

उसके बाद तीसरा टर्निंग प्वाइंट फिल्म ‘‘कमीने’’ करना रहा. जहां मैंने अपनी इमेज को तोड़ा. यह मेरे लिए अच्छी बात रही. क्योंकि इमेज में बंधकर काम करना मुझे कभी पसंद नहीं रहा. मेरा मानना है कि जब कलाकार किसी इमेज में बंध जाता है, तो कई बंदिशों से वह घिर जाता है. इसके बाद चौथा टर्निंग प्वाइंट फिल्म ‘‘आर राजकुमार’’ को मिली सफलता रही. क्योंकि इससे पहले मेरी तीन चार फिल्में बुरी तरह से असफल हो चुकी थीं. इस वजह से ‘आर राजकुमार’ मेरे लिए बहुत महत्व रखती है.

फिर दो तीन वर्षों में ‘हैदर’, ‘उड़ता पंजाब’ और अब ‘रंगून’ टर्निंग प्वाइंट हैं. इसके बाद ‘पद्मावती’ भी मेरे करियर में टर्निग प्वाइंट लेकर आएगी. हां! बीच में ‘शानदार’ की असफलता भी टर्निंग प्वाइंट थी, इसने मुझे हिला दिया था. पर बहुत कुछ सिखाया भी. पर यह सच है कि हर टर्निंग प्वाइंट के समय मैं अलग अलग स्टेट ऑफ माइंड में रहा. इन सभी टर्निंग प्वाइंट ने मुझे एक ऐसी दिशा दी, जिससे कि मैं कलाकार के तौर पर कुछ बेहतरीन काम कर सकूं. मैं नयी नयी चीजें दर्शकों और प्रशंसकों को देना चाहता हूं. यदि ‘रंगून’ और ‘पद्मावती’ सफल हो गयीं, तो मेरा आत्म विश्वास और बढ़ेगा. दर्शकों का मुझ पर यकीन बढ़ेगा.

आपकी पहली फिल्म के कैमरामैन रहे अमित राय आपके बड़े आलोचक हैं. उनकी राय में आपने अपने करियर में फिल्मों के चयन में काफी गलतियां की हैं?

वह सही कह रहे हैं. मैंने कुछ गलत फिल्में की. फिर अंदर से ही मेरी गलतियों का एहसास जागा. अमित राय जैसे कुछ शुभचिंतकों ने भी मुझे आगाह किया. मुझे लगता है कि हम कुछ अनुभवों व समय के साथ अपने अंदर की आवाज को बेहतर तरीके से सुनने व समझने लगते है.

उड़ता पंजाब के प्रदर्शन के बाद जब आप पंजाब गए होंगे, तो किस तरह का रिस्पांस मिला?

मैं पंजाब तो अक्सर जाता रहता हूं. ‘उड़ता पंजाब’के प्रदर्शन के बाद मैं पंजाब अपने निजी कारणों से गया था. मगर जब यह फिल्म प्रदर्शित हो रही थी, उस वक्त लोगों की तरफ से सकारात्मक रिस्पांस मिल रहे थे, लोगों को खुशी थी कि यह फिल्म पंजाब की एक बड़ी समस्या पर बात कर रही है. उनकी परेशानियों के बारे में बात की जा रही है. सबसे ज्यादा रिस्पांस तो कालेज में पढ़ने वाले बच्चों के माता पिता से मिला, कि उनके बच्चे को पता चल रहा है कि राज्य के अंदर क्या हो रहा है. तो मुझे बहुत प्यार मिला.

‘उड़ता पंजाब’ महज एक फिल्म नहीं है, उससे कहीं ज्यादा है. फिल्म में जो संदेश है, उससे पूरा देश सहमत है. इस फिल्म में महत्वपूर्ण संदेश बच्चों व यंगस्टर्स तक पहुंचाया है. मैंने यह फिल्म यंगस्टर्स के लिए ही किया था. देखिए,मेरी बहन व दो भाई है. मेरी बहन 25 साल की है. मेरा एक भाई 21 व एक भाई 20 साल का है. उस उम्र से गुजर रहे हैं, जब ड्रग्स का असर उन पर बहुत आसानी से हो सकता है. मैंने इस फिल्म को निजी एहसास के साथ किया था.

‘‘उड़ता पंजाब’’ और ‘‘रंगून’’ के किरदार एक दूसरे से बहुत अलग हैं. आप इन्हें किस रूप में लेते हैं?

‘उड़ता पंजाब’ में पंजाबी स्टार गायक है, जो कि ड्रग्स के शिकंजे यानी कि ड्रग्स की लत का शिकार है. घमंडी है, खुद को ही सब कुछ समझता है. जबकि अंदर से एक डरा हुआ बच्चा है. तो दूसरी तरफ ‘रंगून’ में नबाब मलिक आजादी से पहले ब्रिटिश सेना में है, पर अंदर से भारतीय व देशभक्त है. जो अपने देश के लिए मर मिटने को तैयार है. उसके सामने अजीब सी दुविधा है. एक तरफ अंदर से देशप्रेमी है, पर वह निजी जिंदगी में अपने देश के ही दुश्मन ब्रिटिश सेना में नौकरी कर रहा है. तो वह अपनी इस दोहरी जिंदगी के साथ कैसे जूझता है. इस तरह नबाब मलिक बहुत ही ज्यादा रोचक किरदार है. नबाब मलिक फिल्म के अंदर जो कुछ करता है, वह बहुत ही ज्यादा ‘हीरोईक’ है. इस फिल्म को करने के बाद भारतीय सेना के प्रति मेरे मन में सम्मान व प्यार बढ़ गया.

‘रंगून’ से पहले मैंने अपने पिता पंकज कपूर के निर्देशन में एक फिल्म ‘‘मौसम’’ की थी. जिसमें मैने एअरफोर्स पायलट का किरदार निभाया था. इसके लिए मैंने ग्वालियर में एअरबेस में जाकर ट्रेनिंग ली थी. मैंने वहां पर कई दिन बिताए थे. वहां पर विंग कमांडर सरताज हैं, उनसे मेरी अच्छी दोस्ती हो गयी थी. उसी तरीके से जब सेना के किसी भी अंग से जुड़े सैनिक से मिलते हो, तो बहुत कुछ सीखते व समझते हैं. इससे हमें प्रेरणा मिलती है, हमें समझ में आता है कि असली हीरो कौन है.

नबाब मलिक का किरदार व उस काल व उस वक्त के इतिहास को समझने के लिए आपने क्या किया?

विशाल सर ने इस पर काफी रिसर्च करके रखा हुआ था. वह आठ साल से पटकथा को विकसित कर रहे थे. ज्यादातर चीजें मुझे उनके माध्यम से ही पता चल गयी. उन्होंने मुझे उस वक्त के कुछ वीडियो शेयर किए. उस वक्त इनको जमादार कहा जाता था. जमादार नवाब मलिक सुनकर मैं चौंक गया. तब विशाल भारद्वाज ने मुझसे कहा कि वीडियो ध्यान से देखकर समझो. वीडियो देखकर समझ में आया कि उस वक्त लोगों की दिमागी सोच क्या थी? जो भारतीय युवा सैनिक थे, मगर वह ब्रिटिश सेना में कार्यरत थे, उन्हें वह मान सम्मान नहीं मिलता था, जैसा ब्रिटिश मूल के सैनिकों को मिलता था. फिर भी नौकरी करने की वजह से वह लड़ते थे.

उनके अंदर का जज्बा किसी भी सैनिक से कम नहीं होता था. इस फिल्म को करके आजादी से चार पांच साल पहले के समय को समझना बहुत रोचक रहा. आजादी को लेकर कई फिल्में बनी हैं. पर आजादी से तीन साल पहले जब आजादी को लेकर सर गर्मियां बढ़ी थीं, उस पर कोई फिल्म नहीं बनी. क्योंकि जब आजादी की आग पूरे देश में फैल रही थी, तो लोगों के अंदर देशभक्ति का जज्बा बहुत ज्यादा था. और नवाब मलिक उसी जज्बे का प्रतीक है. नवाब मलिक का किरदार कई स्टेज से गुजरता है.

इस फिल्म के किरदार के साथ न्याय करने के लिए आपने एक गोल्ड मैडलिस्ट से ट्रेनिंग ली?

देखिए, यूं तो ‘‘रंगून’’ एक प्रेम कहानी है, पर इसमें एक्शन भी है. क्योंकि कहानी की पृष्ठभूमि में द्वितीय विश्व युद्ध भी है. मैं इसमें एक सैनिक नवाब मलिक का किरदार निभा रहा हूं. मेरे किरदार के साथ युद्ध के दृष्य भी हैं. उन युद्ध के दृष्यों को फिल्माने से पहले जिस तरह की तैयारी की जरूरत थी, उसके लिए मुझे गोल्ड मैडलिस्ट से ट्रेनिंग लेनी पड़ी. हमने इस फिल्म को बहुत ही यथार्थपरक बनाया है. हर फिल्म की कहानी व फिल्म के किरदार के साथ भी न्याय करने की मैंने पूरी कोशिश की है.

ट्रेनिंग के दौरान आप सैनिकों की भावनाओं से भी रूबरू हो पाते होंगे?

जी हां! कलाकार का काम ही ऐसा है. हम कलाकार देष के अलग अलग हिस्सों में रहने वाले अलग अलग तरह के काम करने वाले लोगों से मिलते हैं. उनके हावभाव, उनके बात करने का लहजा, उनके जज्बात आदि को समझने और फिर उसे अपने किरदारों के माध्यम से परदे पर पेश करने का बड़ा काम करते रहे हैं. और मेरी पिछली कुछ वर्षों की यात्रा भी इसी तरह की है.

यदि आप मेरे करियर पर नजर दौड़ाएं, तो पाएंगे कि मैंने फिल्म ‘हैदर’ की, जो कि कश्मीर के दिल में बसी हुई है. इसमें मैंने ऐसे आम इंसान का किरदार निभाया है, जिसका जब पिता खो जाता है, तो उसे क्या महसूस होता है. कश्मीर के आम इंसान के अहसास को परदे पर उकेरना बहुत मुश्किल रहा. मुझे लगता है कि मेरे लिए यह बहुत अच्छा मौका था. उसके बाद फिल्म ‘‘उड़ता पंजाब’’ में पंजाब के अंदर फैले ड्रग्स के व्यापार पर फिल्म थी. अब ‘रंगून’ आजादी से तीन चार साल पहले की कहानी है. हमें इसके लिए अरूणाचल में जाकर सीमा पर शूटिंग करने का मौका मिला. वहां के लोगों से हमें मिलने का मौका मिला. जब हम इस तरह के किरदार निभाते हैं, तो कहीं न कहीं अपनेपन का अहसास ही होता है. परदे पर इस तरह के किरदारों को देखकर दर्शक को भी उसी तरह के जज्बातों का अहसास होता है.

विशाल भारद्वाज के साथ तीन फिल्में की. इन फिल्मों को करते समय विशाल के साथ आपके समीकरण किस तरह से बनते बिगड़ते रहे हैं. आपको विशाल भारद्वाज में कुछ बदलाव नजर आ रहा है?

विशाल सर के साथ तो मेरे रिश्ते बहुत रोचक रहे हैं. ‘‘कमीने’’ के वक्त हम दोनों के बीच बहुत खास रिश्ता था. ‘‘हैदर’’ के समय मुझे लगा कि हम दोनों निजी रूप में बहुत करीब आ गए हैं. इस फिल्म ‘‘रंगून’’ के समय मुझे बार बार लग रहा था कि वह मुझे और ज्यादा वक्त क्यों नहीं दे रहे हैं. क्योंकि इस फिल्म में दो बड़े सह कलाकार थे. तो उन्हें उनको भी कुछ समय देना पड़ा. इस तरह मैंने ‘‘रंगून’’ करते समय सीखा कि कलाकारों के साथ कैसे शेयर करना चाहिए. विशाल सर के संग हमारे संबंध बहुत बेहतरीन हैं. मैं अपने आपको खुशकिस्मत समझता हूं कि मुझे विशाल सर के साथ तीन फिल्में करने का मौका मिला. वह इतने बेहतरीन निर्देशक हैं कि हर कलाकार उनके साथ काम करने को लालायित रहता है. वह अब तक कलाकार के तौर पर मुझसे बोर नहीं हुए हैं.

‘‘रंगून’’ के लिए अरूणाचल में शूटिंग की. उत्तर पूर्वी भारत, भारत की मुख्य धारा से अलग थलग ही रहता है. ऐसे में आपके अपने अनुभव क्या रहे?

जी हां! कमाल की बात यह रही कि उन्होंने हमारा शानदार स्वागत किया.जबकि मैं भी सोच रहा था कि पता नही वह हिंदी फिल्में देखते हैं या नहीं. वह हमें अपने बीच पाकर कोई अड़चन तो पैदा नहीं करेंगे? कहीं उन्हें ऐसा तो नही लगेगा कि हम उन्हें परेशान करने पहुंचे हैं. पर ऐसा कुछ नही हुआ.

मेरी शंकाएं निर्मूल साबित हुई. मुझे याद है, हम फ्लाइट पकड़कर मुंबई से डिब्रूगढ़ गए. वहां से सड़क मार्ग से हम ब्रम्हपुत्रा गए. फिर हमने ब्रम्हपुत्रा नदी पार की. उसके बाद लगभग तीन घंटे की यात्रा करके आसाम सीमा पार की. फिर एक घंटे की यात्रा कर हम पासीघाट पहुंचे, जो कि अरूणाचल प्रदेश में है. हमें याद है कि जब हम आसाम की सीमा पर पहुंचे, तो हमारा स्वागत करने के लिए ढाई तीन हजार लोग मौजूद थे. उस जगह पर आसाम की पुलिस हमें छोड़ती है और अरूणाचलत प्रदेश की पुलिस हमारे साथ हो जाती है. इसी के चलते हमें लगभग एक मिनट रूकना पड़ा. मैंने देखा कि उस वक्त वहां खड़े लोग इस तरह से चिल्ला रहे थे जैसे कोई लाइव शो चल रहा हो.

मुझे अहसास हुआ कि वहां के लोग हम भारतीय कलाकारों और हमारी फिल्मों से कितना प्यार करते हैं. जब हम होटल पहुंचे, तो वहां बहुत भीड़ जमा थी. उसके बाद हम वहां 25 दिन रहे. हर दिन दो बार नीचे जाकर वहां मौजूद लोगों का हम हाथ हिलाकर अभिवादन करते थे या उनसे कुछ बातचीत करते थे. फिर वह लोग वापस अपने अपने घर चले जाते थे. इससे मैं बहुत भावुक हुआ. मुझे उन लोगों से बहुत अपनापन और प्यार मिला. मैं अपने आपको खुशकिस्मत समझता हूं कि मैं अपनी फिल्मों की शूटिंग के सिलसिले में कई ऐसी जगहों पर गया हूं, जहां को लेकर हम तमाम तरह की बातें सुनते रहते हैं. पर मुझे हर जगह प्यार व अपनापन मिला. देखिए, हम फिल्म वालों की सबसे बड़ी खासियत यही है कि हम लोगों में प्यार बांटते हैं. कलाकार होने की यह सबसे बड़ी खूबसूरती है.

‘‘पद्मावती’’ को लेकर जो कुछ हो रहा है. राजपूतों की करणी सेना ने पटकथा को सेंसर करने की मांग की है. आपकी राय?

मैं इन चीजों पर कोई प्रतिक्रिया नही देना चाहता. मैं तो हमेशा लोगों से यही कहना चाहता हूं कि कोई भी फिल्म हो,आप पहले फिल्म देखें,फिर निर्णय लें.

पिता बनने के बाद क्या सोच रहे हैं?

सच कहूं तो ज्यादा से ज्यादा समय मैं मीशा के साथ रहने का प्रयास करता हूं. पिता बनते ही कई तरह के एहसास अपने आप जाग गए. अब खुश हूं. अंदर से और मेहनत करने, अच्छा काम करने की भावना जगी है. अब मैं ऐसी फिल्में करना चाहता हूं, जिन्हें मैं अपनी बेटी को गर्व के साथ दिखा सकूं.

पत्नी मीरा को लेकर क्या कहेंगे?

वह आज की पीढ़ी की हैं. आज की पीढ़ी के लोग संकोची तो होते नहीं है. वह कैमरे के सामने बहुत सहज होती हैं.

मंटो बनने जा रहे हैं नवाजुद्दीन सिद्दीकी

उर्दूलेखक सआदत हसन मंटो पर बन रही फिल्म में मंटो का किरदार नवाजुद्दीन सिद्दीकी निभाने वाले हैं. खबर मिली है कि इसकी शूटिंग मार्च में शुरू हो रही है, रईस की रिलीज के बाद से नवाज, मंटो को समझने के लिए हर कोशिश में जुटे हैं.

कुछ दिन पहले नवाज की एक तस्वीर इंटरनेट पर वायरल हुई थी, जिसमें वे हूबहू मंटों के अवतार में दिखाई दे रहे थे. जानकारी के मुताबिक नवाजुद्दीन सिद्दीकी जितना ज्यादा से ज्यादा मंटो को पढ़ सकते है, पढ़ रहे हैं. यहां तक कि नवाज ने मंटो जैसा ही सोचने और समझने के लिए अपने निजी जीवन में काफी सारे बदलाव किए हैं.

खबर है कि नवाज ने हाल ही में कहा है कि, ‘मंटो के किरदार को निभाने के लिए मेरे लिए सबसे जरूरी यह है कि मैं उन्हीं की तरह सभी काम करूं, इसलिए मैंने मंटो की दुनिया को अपने इर्द-गिर्द रीक्रिएट करने का प्लान बनाया है. मैं अपने कमरे को भी रीफर्निश करने जा रहा हूं, वहां सिर्फ वहीं चीजें मौजूद होंगी जिनके साथ मंटो वक्त बिताया करते थे.’

मंटो की सभी आदतों की जानकारी नवाजुद्दीन सिद्दीकी एकत्रित कर रहे हैं. उनकी ईटिंग हेबिट्स के बारे में, वे कैसे तैयार होते थे, वे बात कैसे करते थे, यहां तक कि वे कैसे बिस्तर पर सोते थे. ये सब जानकारियां नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने बटोरी हैं.

दरअसल, मुझे लगता है कि अगर मैं उनके फिजिकल वर्ल्ड में प्रवेश कर जाता हूं, तो ही मैं उन्हें अच्छे से समझ सकूंगा.’ नवाज ने आगे बताया, सुत्रों से पता चला है कि जब तक नवाजुद्दीन सिद्दीकी मंटो की बायोपिक में काम कर रहे हैं, तब तक वे किसी भी अन्य प्रोजेक्ट में काम करेंगे. क्योंकि मंटो के किरदार के साथ नवाजुद्दीन सिद्दीकी कोई भी गलती करना नहीं चाहते हैं. नवाजुद्दीन सिद्दीकी इसके लिए कोई भी त्याग करने को तैयार है.

मंटो की इस बायोपिक की सबसे शानदार खाशियत यह है कि इस फिल्म में जो भी चीजें उपयोग में लाई जाएंगी वे सभी मंटो के दौर की होंगी.

सआदत हसन मंटो की गिनती ऐसे साहित्यकारों में की जाती है जिनकी कलम ने अपने वक्त से आगे की ऐसी रचनाएं लिख डालीं जिनकी गहराई को समझने की दुनिया आज भी कोशिश कर रही है. सआदत हसन के क्रांतिकारी दिमाग और अतिसंवेदनशील हृदय ने उन्हें मंटो बना दिया और तब जलियांवाला बाग की घटना से निकल कर कहानी ‘तमाशा’ आई. 1936 में मंटो का पहला मौलिक उर्दू कहानियों का संग्रह प्रकाशित हुआ, उसका शीर्षक था “आतिशपारे.” जनवरी, उनके रेडियो-नाटकों के चार संग्रह प्रकाशित हुए ‘आओ’, ‘मंटो के ड्रामे’, ‘जनाज़े’ तथा ‘तीन औरतें’. 1948 के बाद मंटो पाकिस्तान चले गए. पाकिस्तान में उनके 14 कहानी संग्रह प्रकाशित हुए जिनमें 161 कहानियां संग्रहित हैं.

जब दिखना हो स्लिम

पर्सनैलिटी पर फबते सही ड्रेसिंग सेंस की समझ और थोड़ी-सी कोशिश आपको ऐसी परफेक्ट पर्सनैलिटी दे सकती है कि आप भी किसी मॉडल से कम नहीं लगेंगी. अपनी फिगर को लेकर किसी भी प्रकार की झिझक को भूल जाइए. कोशिश करें, आपके पास जो है, उसे ही निखारने और संवारने की.

आप अपने कपड़ों के माध्यम से अपने शरीर को कैसा फ्रेम देती हैं, इस पर बहुत कुछ निर्भर करता है. अपने कपड़ों के चुनाव में आपको खास ध्यान इस बात पर रखना है कि कपड़े ऐसे हों जो आपकी फिगर को पतली और तराशी हुई लुक का आभास दें. अपने लिए सही कपड़ों का चुनाव करने के लिए सबसे पहले अपनी शारीरिक बनावट को समझना जरूरी है.

सही फैब्रिक से करें शुरुआत

बड़े फ्रेम वाली महिलाओं को मुलायम और फ्री फ्लोइंग फैब्रिक वाली ड्रेस का चुनाव करना चाहिए. यह उनकी बनावट को सही ढंग से आकार देते हैं और उभार को छिपाने में मदद करते हैं.

इनर वीयर भी हो सही

जहां बात सही फिट की आती है, वहां जरूरी है ड्रेस की सही फिटिंग के साथ-साथ आपके इनर वीयर की फिटिंग भी सही हो. इनर वीयर की फिटिंग में किसी भी प्रकार की कमी, सहज ही आपके उभारों की ओर ध्यान ले जाएगी.

रंग हों ऐसे

पतला दिखने के लिए काले रंग को तो सदाबहार माना ही जाता है, लाल रंग भी इसके लिए बेहद उपयुक्त है. रोशनी को सही ढंग से सोख कर, आकर्षक लुक के लिए यह भी आपको परफेक्ट शेड देगा. ऐसे सभी रंग जो आपकी स्किन टोन पर जंचते हों, उनके हल्के शेड्स की जगह गहरे शेड्स के कपड़े पहनना आपको अपेक्षाकृत पतला दिखाने में मदद करेंगे.

चर्बी को छुपाने की कोशिश न करें

कपड़ों की सही फिटिंग आपके शरीर को सही फ्रेम में दिखाने के लिए बेहद जरूरी है. अधिक वजन वाली महिलाएं अकसर कई लेयर और सही माप से ज्यादा बड़े कपड़े पहनकर अपना मोटापा छिपाने की कोशिश करती हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसा करने से वो और ज्यादा मोटी दिखती हैं. ज्यादा ढीली या ज्यादा टाइट की जगह, ड्रेस की सही फिट आपको बेडौल दिखाने की जगह आपके आकार के अनुरूप आपको आकर्षक लुक देगी.

मोनोक्रोमेटिक हो आपकी ड्रेसिंग

अगर आपका वजन ज्यादा है तो कंट्रास्ट रंगों के प्रयोग से बचें. ये आपके फ्रेम को ज्यादा चौड़ा दर्शाते हैं. ऐसे कपड़े पहनें जिसमें मोनोक्रोमेटिक कलर स्कीम हो यानी एक ही रंग के अलग-अलग शेड का इस्तेमाल किया गया हो. लुक को आकर्षक बनाने के लिए सटीक एक्सेसरीज का इस्तेमाल करना न भूलें.

स्टाइल और कट भी हो सही

ड्रेस की स्टाइल और कट से भी लुक में काफी बदलाव किया जा सकता है. नेकलाइन में हाईनेक वाले डिजाइन से बचें. इसकी जगह शालीन डीप ‘वी’ या बोट नेक खूबसूरत विकल्प हैं. ये आपकी गर्दन को और लंबा दिखाएंगे. अगर आपके शरीर का ऊपरी हिस्सा भारी है, लेकिन टांगें और निचला हिस्सा फिट है तो नी-लेंथ स्कर्ट या ऐसी ही किसी ड्रेस का चुनाव करें. टॉप की सही लंबाई से भी आप परफेक्ट फिगर पा सकती हैं. कमर तक की लंबाई वाले टॉप से मोटापा ज्यादा झलकता है.

वेगन मैक ऐंड चीज

सामग्री

2 कप मैकरोनी

1 कप आलू कटे हुए

1 कप गाजर कटी हुई

1/4 कप प्याज कटा हुआ

3/4 कप पानी

1/2 कप काजू

1/4 कप कोकोनट मिल्क

1 बड़ा चम्मच नीबू का रस

1/4 छोटा चम्मच लहसुन पाउडर

नमक व लालमिर्च पाउडर स्वादानुसार

विधि

मैकरोनी को पानी में आधा पका कर अलग रखें. आलू, गाजर और प्याज को पानी में अच्छी तरह उबाल कर ब्लैंड कर लें. ब्लैंडिंग में इन्हीं सब्जियों के पानी का इस्तेमाल करें. एक पैन में तैयार मिश्रण के साथ कोकोनट मिल्क व नीबू का रस, नमक, लालमिर्च पाउडर, लहसुन पाउडर डाल कर धीमी आंच पर पकाएं. इस में मैकरोनी डाल कर अच्छी तरह मिलाएं और गरमगरम सर्व करें.

-व्यंजन सहयोग : शैफ रनवीर बरार

कभी पैसों के लिए ऐक्टिंग नहीं की : संध्या मृदुल

कुछ अलग हट कर करने का जनून ही संध्या को सिनेमा तक खींच लाया. उन्होंने कमर्शियल सिनेमाई भूमिकाओं से हट कर अलग सिनेमा चुना पर उसमें उन्हें वह पहचान नहीं मिल पाई जो उन की समकक्ष अभिनेत्रियों को मिली.

उम्र के 40 बसंत देख चुकीं संध्या ने अपने करियर की शुरुआत छोटे पर्दे से 1994 में जी टीवी के शो ‘बनेगी अपनी बात’ से की. इस के बाद उन्होंने छोटे पर्दे पर कई शो किए लेकिन वह पहचान हासिल नहीं कर पाईं जो वे चाहती थीं. हिंदी सिनेमा में आने का मौका यशराज की फिल्म ‘साथिया’ से मिला लेकिन दर्शकों की निगाहों में मधुर भंडारकर की फिल्म ‘पेज 3’ से आईं, जिस में सशक्त भूमिका के लिए संध्या को आईफा अवार्ड से सम्मानित किया गया.

फिल्मों के बाद छोटे पर्दे का रुख संध्या ने एक बार फिर पकड़ा है. वह स्टारप्लस पर आ रहे शो ‘पीओडब्ल्यू बंदी युद्ध के’ में सिंगल मदर नाजनीन की भूमिका कर रही हैं. प्रस्तुत हैं शो के प्रमोशन पर गृहशोभा से हुई बातचीत के प्रमुख अंश.

छोटे पर्दे पर आप की वापसी बहुत दिनों बाद हो रही है इस का कारण? 

मैं ने जब अपने करियर की शुरुआत ही छोटे पर्दे से की थी तो भला इसे कैसे भूल सकती हूं जिस ने मुझे पहचान दिलाई. मैं एक बात और बताना चाहती हूं कि ऐक्टिंग से मैं ने कभी ब्रेक नहीं लिया, मैं हमेशा कुछ न कुछ करती रही हूं. कुछ फिल्में जैसे ‘द ग्रेट इंडियन बटरफ्लाई’, ‘ऐंग्री इंडियन गौडेस’ के बारे में तो अधिकांश लोगों को मालूम भी न होगा क्योंकि इन की पब्लिसिटी बिलकुल नहीं की गई थी. जब विदेशों में इन फिल्मों को वाहवाही मिली तब यहां के लोगों ने जाना. रही बात छोटे पर्दे की तो मैं बहुत दिनों से किसी ऐसे शो की स्क्रिप्ट की तलाश में थी जिस शो को सारा परिवार साथ बैठ कर देख सके.

फिल्मों में आप का किरदार हमेशा मजबूत व्यक्तित्व वाला होता है इस की कोई खास वजह?

मैं कभी यह सोच कर कोई फिल्म साइन नहीं करती कि इस में मेरा लीड रोल होगा, हां यह जरूर सोचती हूं कि जो रोल मुझे मिला है उसे कैसे सशक्त बनाऊं. एक बात तो है कि महिलाएं ज्यादा मजबूत होती हैं. जब मेरे पिताजी का निधन हुआ तब लगा कि मेरी मम्मी जो हाउस वाइफ हैं बिलकुल टूट जाएगीं, पर ऐसा बिलकुल नहीं हुआ. उन्होंने मजबूती से हमें संभाला और आज तक मैं जितनी भी महिलाओं से मिली हूं उन में वे सब से मजबूत महिला हैं. उन्होंने अपने दर्द को समेटा और वही किया जो करना चाहिए. ऐसे किरदार मुझे वास्तविक लगते हैं. इसीलिए ऐसे किरदारों को मैं करती हूं.

काम के प्रति क्या नजरिया है?

मैं ने कभी पैसों के लिए ऐक्टिंग नहीं की, बल्कि बचपन से ही ऐक्टिंग करना मेरा शौक रहा है. मैं जल्द ही एक तरह के काम कर के उकता जाती हूं. यही बात है कि मैं ने हमेशा अलगअलग भूमिकाओं वाली फिल्मों और टीवी शोज को चुना है. मुझे टाईपकास्ट बनने से चिढ़ है, इसलिए मैं किसी शो या फिल्म को साइन करने से पहले उस के कंटैंट को अच्छी तरह समझती हूं तभी हां करती हूं. इसलिए दर्शक मुझे पहचानते नहीं हैं, क्योंकि मैं आर्ट मूवी करती हूं और देखने वाले दर्शकों की संख्या कितनी है यह सब को पता है. मुझे न तो संजनेसंवरने का शौक है और न ही पब्लिसिटी करने का, सिर्फ एक शौक है और वह है सिर्फ और सिर्फ ऐक्टिंग करने का.

छोटे और बड़े पर्दे में आज क्या बदलाव आए हैं?

मेरे देखते ही देखते सिनेमा में बहुत परिवर्तन हुए हैं. ‘पिंक’ और ‘तलवार’ जैसी फिल्मों का बौक्स औफिस पर सफल होना बताता है कि हमारे दर्शकों का भी फिल्म देखने का टेस्ट बदल गया है. आज की युवा पीढ़ी वास्तविकता और समाज के मुद्दों से भरी फिल्में देखाना चाहती है. लेकिन यह चेंज अभी छोटे पर्दे पर नहीं आया. आज भी नागनागिन, चुड़ैल, धार्मिक अंधविश्वास से भरे शोज की हर चैनल पर भरमार है. कुछ युवा निर्माता अगर सामाजिक मुद्दों से भरे शोज को बनाते भी हैं तो टीआरपी की दौड़ में जल्दी ही वे शोज दम तोड़ देते हैं. लेकिन आज जो सब से बड़ी उपलब्धि मिली है वह है सोशल मीडिया की, जिस की वजह से आप अपने शो  की और अपनी पब्लिसिटी कर सकते हैं.

कभी कमर्शियल फिल्में करने का मन नहीं हुआ?

पहले तो कभी नहीं हुआ था, लेकिन एक वक्त ऐसा आया जब मेरी फिल्में बौक्स औफिस पर कब आईं कब गईं इस का पता ही नहीं चलता था. मुझे लोगों को बताना पड़ता था कि मैं ने उस फिल्म में काम किया है तब लगा कि मुझे इस सिनेमा से नाता तोड़ कर कमर्शियल सिनेमा करना चाहिए. पर दिल ने कहा कि वही काम करो जिस में तुम्हें खुशी मिले और मुझे खुशी तो लीक से हट कर फिल्मों में काम कर के मिलती है. दिल की सुनी और सिनेमा करती गई. जितने दर्शक मिले उतने में ही संतोष कर लिया. लेकिन आज संजय मिश्रा, रणवीर शौरी, नंदिता दास जैसे बौलीवुड ऐक्टरों को सफल होते देखती हूं तो लगता है कि मैं सही राह पर चल रही हूं.

आप को लग रहा है कि अब दर्शकों का टेस्ट बदल रहा है?

ऐसी फिल्में देखने वाले दर्शक हर दशक के सिनेमा में मौजूद हैं. ‘अर्धसत्य’ से ले कर ‘तलवार’ फिल्मों तक के लिए हमेशा दर्शक मौजूद रहे हैं. लेकिन उन दर्शकों की संख्या सीमित है. अब हर निर्मातानिर्देशक घाटा उठा कर हमेशा तो सामाजिक मुद्दों वाली फिल्में बना नहीं सकता इसलिए ऐसी फिल्में कम दिखती हैं. दूसरा सब से बड़ा कारण है इन फिल्मों का प्रमोशन नहीं किया जाता. अब तो सोशल मीडिया के प्रमोशन के कारण दर्शकों की नजरों में फिल्म का नाम आ जाता है. मैं जहां भी जाती हूं लोग मेरी फिल्मों के बारे में तारीफ करते हैं. यही सुन कर मुझे तसल्ली हो जाती है.

हमारी फिल्मों को विदेशी ठप्पे की जरूरत क्यों पड़ती है?

कहावत ‘घर की मुरगी दाल बराबर’ हमारी फिल्मों के लिए बिलकुल सटीक बैठती है. मेरी फिल्म ‘ऐंग्री इंडियन गौडेस’ जब रोम में अवार्ड जीत कर आई तब कहीं यहां हमें उस फिल्म के लिए डिस्ट्रीब्यूटर मिले. हमारे यहां की यही सब से बड़ी समस्या है. कई फिल्में हैं जिन्हें जब देश से बाहर वाहवाही मिली तब हमारे देश के दर्शकों में उन्हें देखने की उत्सुकता जगी. इस का कारण यह नहीं कि हमारे दर्शकों को अच्छी फिल्मों की समझ नहीं है. लेकिन आज भी दर्शकों का भारी वर्ग स्टार कलाकारों की फिल्मों को सिरआंखों पर बैठाता है, चाहे उन फिल्मों की कहानी कैसी भी हो.

इस शो को चुनने की कोई खास वजह?

मैं हमेशा से हट कर भूमिकाएं करती रही हूं. जब इस शो के लिए निखिल ने मुझ से संपर्क किया और बताया कि उन का यह शो युद्ध बंदियों के परिवार की कहानियों पर आधारित है तो मैं ने तुरंत हां कर दी, क्योंकि सीमा पर शहीद हुए या युद्ध के दौरान दुश्मन देश में बंदी बने जवान के परिवार पर खासकर उन की पत्नियों पर क्या गुजरती है इस को दिखाना जरूरी है. इन रीयल हीरों की कहानियों को सब के सामने लाना चाहिए ताकि देश जान सके कि एक सैनिक का परिवार किस तरह से देश की सेवा कर रहा है. एक सैनिक जब सीमा से गायब होता है, तब हम लोग उसे सिर्फ एक घटना मान कर भुला देते हैं पर उस का परिवार सालोंसाल सिर्फ इसी उम्मीद पर जिंदा रहता है कि कभी न कभी तो वह वापस आएगा.

इस शो में सिंगल मदर की भूमिका कैसे निभाई?

पहली बात तो यह कि मैं अभी मदर नहीं हूं, पर एक मां के दिल के एहसास को बखूबी समझती हूं. लेकिन एक प्रिजनर की बीवी, जिस के बच्चे हों, की क्या मनोदशा होती है. इस की कल्पना भी नहीं कर सकती थी. यह करना मेरे लिए चैंलेंज था. मैं ने कई सहेलियों से, जो मदर हैं, बात की और खुद सोचा कि अगर इस स्थिति में मैं खुद होती तो कैसा रिएक्ट करती. तभी यह रोल मैं अच्छी तरह कर पाई.

काम से थक जाती हैं तो क्या करती हैं?

जब काम से थक जाती हूं तो कमरा बंद कर के ऋषि दा की फिल्में देखती हूं और अकेले ही खूब हंसती हूं. ‘गोलमाल’, ‘अंगूर’ जैसी फिल्में मेरी पसंदीदा हैं. इन्हें मैं ने न जाने कितनी बार देखा है. इन्हें देख कर मन रिफ्रैश हो जाता है और एक काम मैं रोजाना करती हूं. वह है ऐक्सरसाइज. इस से मैं हमेशा ताजगी महसूस करती हूं.

संध्या की नजर में प्रेम की परिभाषा क्या है?

प्रेम में समर्पण अनिवार्य है. या तो आप खुद को पूरा सौंप दीजिए या फिर प्रेम कीजिए ही नहीं. इस में आप हंसेंगे भी और रोएंगे भी. यह आप से सबकुछ छीन लेता है और मैं ऐसा नहीं कर सकती, इसलिए कभी प्रेम में पड़ी ही नहीं.

18 सालों में कभी पीछे मुड़ कर देखा है?

मुझे पीछे मुड़ कर देखना पसंद नहीं. पीछे वे देखते हैं जिन्होंने कुछ प्लान किया होता है या फिर गलतियां. मुझे नहीं लगता कि मैं ने ऐसा कुछ किया है. मैं ने वही किया जो दिल ने कहा. मैं अपना रीव्यू नहीं करती सिर्फ आगे देखती हूं कि अब क्या करना है. मैं किसी दूसरे के साथ कभी भी रेस नहीं लगाती. रेस लगाती भी हूं, तुलना करती भी हूं तो अपने पिछले काम से अपने नए काम की कि इस

में क्या गलतियां कर गई. मैं रानी मुखर्जी, काजोल और तब्बू की हमेशा प्रशंसक रही हूं. अगर कभी मौका मिलता है तो मैं फिल्म ‘उमराव जान’ में जो रेखाजी का कैरेक्टर है उसे प्ले करना चाहूंगी.

टिप की परंपरा है गलत

रेस्तरांओं ने आजकल सर्विस चार्ज लगा कर भारीभरकम बिलों पर एक और बोझ जोड़ दिया है. होता यह है कि बिल में जुड़ कर आने वाले सर्विस चार्ज के बाद वेटर हाथ बांध कर खड़ा हो जाता है और अच्छी सेवा के पैसे देने के बाद ग्राहक को असल संतुष्टि के लिए कुछ और पैसे छोड़ने पड़ते हैं या वेटर के तीखे रुख का सामना करना पड़ता है.

अच्छी सेवा के लिए टिप देना असल में गलत है और इसे सामंती युग की देन समझा जाना चाहिए जब राजा या दरबारी अपने सेवकों को समयसमय पर पैसे देते रहते थे ताकि वे विद्रोह न करें और विश्वसनीय बने रहें. खाने के बाद खाने के दाम मैन्यू के हिसाब से देने के बाद टिप की परंपरा गलत है, क्योंकि वेटरों को वेतन देने का काम रेस्तरां मालिकों का है. ग्राहक ने जितना खाया उतना पैसा दिया, हिसाब बराबर. जापान व पूर्वी देशों में यह चलन बिलकुल नहीं है पर अमेरिका में भरपूर है.

अगर टिप देने का कोई औचित्य है तो हर जगह होनी चाहिए. अगर आप कपड़े खरीदती हैं और सेल्स गर्ल्स 20-25 पोशाकें दिखाती हैं तो क्या वे टिप की अधिकारी हो जाती हैं? डाक्टर यदि अच्छा काम करे तो क्या फीस के  साथसाथ टिप भी मांगे?

टिप का वातावरण अपनेआप में गलत है. सरकारी अस्पतालों में बच्चे पैदा होने पर नर्स को खुश हो कर टिप देने की परंपरा है, यह भी गलत है. कई घरों में अतिथि जाते समय घर के नौकरों को टिप देते हैं, जो गलत है. अतिथि के कारण जो अतिरिक्त काम नौकर ने किया उस की भरपाई का जिम्मा घर के मालिक का है.

कंज्यूमर मामलों के मंत्रालय ने जो आदेश रेस्तरांओं में टिप देने पर दिया है वह आधाअधूरा है. होना यह चाहिए कि यह बिलकुल बंद हो जाए. इस पर पूरी तरह से निषेध हो. यह केवल रेस्तरांओं में ही नहीं, व्यवसाय के हर क्षेत्र में हो. टिप की परंपरा गलत है, क्योंकि इस से अमीर और फैजदिली का अंतर स्पष्ट होता है. यह सेवा देने वाले को अवसर देती है कि वह सेवा में कमीबढ़ती करे ताकि टिप मिलने का अवसर मिले.

रेस्तरांओं को चाहिए कि वे अपने वेटरों को वेतन ही इस प्रकार दें कि टिप की गुंजाइश ही न रहे. वेटरों को किसी भी तरह की टिप न लेने दें. टिप इनसैंटिव की तरह वेतन में से देना ही ग्राहकों को अच्छी सेवा सुरक्षित करना माना जाए.

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