फिल्म ‘टॉयलट एक प्रेम कथा’ की पहली झलक

अक्षय कुमार ने ट्विटर पर अपनी आगामी फिल्म की पहली झलक साझा की है. बॉलीवुड के दिग्गज और बहुत ही लोकप्रिय अभिनेता अक्षय कुमार ने अपनी आने वाली फिल्म ‘टॉयलट एक प्रेम कथा’ की शूटिंग खत्म करने के तुरंत बाद ही अपने प्रशंसकों के लिए फिल्म की पहली झलक साझा की.

निर्देशक श्री नारायण सिंह द्वारा निर्देशित इस फिल्म में मुख्य भूमिका में अक्षय कुमार के साथ अभिनेत्री भूमि पेडनेकर हैं. यह फिल्म दो जून को बड़े पर्दे पर रिलीज हो रही है. पहली बार बड़े पर्दे पर ‘दम लगा के हईशा’ की अदाकारा भूमि पेडनेकर और अक्षय की जोड़ी एक साथ नजर आने वाली है.

अक्षय द्वारा साझा किए गए इस पोस्ट में अक्षय और भूमि, दूल्हा और दुल्हन के लिबास में नजर आ रहे हैं. इस तस्वीर में भूमि ने लाल रंग का लहंगा और सोने के गहने पहने हुए हैं. वे इस तस्वीर में बेहद कम मेकअप में भी बड़ी खूबसूरत नजर आ रही हैं. तस्वीर में अक्षय ने मस्टर्ड रंग के सूट के साथ सिर पर पगड़ी पहन रखी है.

अक्षय कुमार ने ट्वीट करते हुए लिखा है कि, फिल्म ‘टॉयलट एक प्रेम कथा’ की शूटिंग खत्म, आप सभी लोगों के लिए फिल्म की एक तस्वीर. केशव और जया की अनोखी प्रेम कहानी आप तक दो जून को आ रही है….’

‘सरकार 3’ पर रिलीज से पहले चली सेंसर बोर्ड की कैंची

रामगोपाल वर्मा निर्देशित फिल्म ‘सरकार’ सीरिज की तीसरी फिल्म ‘सरकार 3’ बहुत जल्द सिनेमा घरों में आने वाली है. रामगोपाल वर्मा के जन्मदिन सात अप्रैल को फिल्म ‘सरकार 3’ के प्रदर्शित होने की खबर मिली है.

फिल्म के प्रचार के लिए ट्रेलर तैयार कर सेंसर बोर्ड तक पहुंचा दिया था. लेकिन सेंसर बोर्ड ने कहा है कि फिल्म के ट्रेलर के पहले डिसक्लेमर दिखाया जाए. वैसे तो डिसक्लेमर फिल्म में दिखाया जाता है. बहुत कम ऐसा होता है जब ट्रेलर में डिसक्लेमर को दिखाने की शर्त सेंसर बोर्ड द्वारा रखी जाती है.  

सेंसर बोर्ड का मानना है कि फिल्म के कुछ संवाद और दृश्य ठाकरे परिवार से मेल खाते हैं, इसलिए डिसक्लेमर दिखाना जरूरी है. सेंसर बोर्ड ने डिसक्लेमर दिखाने को इसलिए कहां है, क्योंकि जब “सरकार” और “सरकार राज” प्रदर्शित हुई थी तब अमिताभ के किरदार और बाला साहेब ठाकरे की तुलना और समानता पर काफी बातें की गई थी. और फिल्म के अन्य किरदारों की तुलना भी ठाकरे परिवार के अन्य सदस्यों से की गई थी.

कॉलीवुड में एंट्री करेंगी विद्या बालन!

सुपरस्टार रजनीकांत की पा रंजीत निर्देशित फिल्म का प्री-प्रोडक्शन शुरू हो गया है और सूत्रों की मानें तो दिग्गज अभिनेत्री विद्या बालन इस फिल्म में रजनीकांत के साथ नजर आएंगी. खबरों की मानें तो मेकर्स विद्या बालन से फिल्म के लिए डेट्स के सिलसिले में बात कर रहे हैं.

यदि विद्या इस फिल्म में नजर आती हैं तो यह न सिर्फ उनका कॉलीवुड में डेब्यू होगा बल्कि यह पहली बार होगा जब वह रजनीकांत के साथ सिल्वर स्क्रीन पर नजर आएंगी. निर्देशक रंजीत की बात करें तो रजनीकांत के साथ यह उनकी दूसरी फिल्म होगी. इसके पहले उन्होंने ब्लॉकबस्टर फिल्म कबाली में रजनीकांत को कास्ट किया था. यह फिल्म इसलिए भी स्पेशल होगी क्योंकि इसका प्रोडक्शन रजनीकांत के दामाद धनुष करेंगे.

धनुष अपने होमप्रोडक्शन वंडरबार फिल्म्स के बैनर तले इस फिल्म का प्रोडक्शन करेंगे. खबरों के मुताबिक धनुष को तुरंत ही रंजीत का रजनीकांत की इस अपकमिंग फिल्म का आइडिया पसंद आ गया था और उन्होंने इसके लिए हां कर दी थी.

ताकि लाइफ रहे ‘टैक्स-फ्री’

‘आय’ और ‘कर’ दोनों एक साथ बड़े ही मजाकिया लगते हैं. ‘आय’ हो न हो पर ‘कर’ तो देना ही पड़ता है, कई बार खुशी से तो कई बार जबरदस्ती पर चुकाना तो सबको पड़ता है. टैक्स का बोझ झेलना किसी को पसंद नहीं है. जिन कर्मचारियों की ‘इन-हैंड’ सैलेरी ही टैक्स कटने के बाद आती है, उनके गमों का अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता. माना की कर चुकाना देश की उन्नति के लिए बहुत जरूरी है. पर टैक्स चुकाने वालों की संख्या को देखकर तो ऐसा लगता है जैसे देश की उन्नति का भार केवल कुछ लोगों पर ही है. जिन्हें जबरदस्ती टैक्स चुकाना पड़ता है, उनके दर्द को टैक्स से बचने वाले कभी नहीं समझ सकते.

 जिस देश में ‘100 बुलाने पर पुलिस आ जाती है और 100 देने पर पुलिस चली जाती है’ वाले हालात हों उस देश के टैक्स स्ट्रकचर का होना और न होना भी बराबर है. कई बार कुछ लाइमलाइट में रहने वाले लोग टैक्स के चक्कर में फंस जाते हैं. पर देश का मध्यम वर्ग पर इनकम टैक्स की मार सबसे तेज पड़ती है.

लोग आयकर से बचने के अलग अलग, गलत सही सभी तरह के तरीके खोजते हैं. कई बार इस चक्कर में पकड़े भी जाते है. पर ऐसे कुछ रोजगार और बिजनेस हैं जहां आपको इनकम टैक्स नहीं चुकाना पड़ता. तो बाकि चक्करों को छोड़कर सही चक्कर लगाइए और इन तरीकों को अपनाइए.

1. खेती-बाड़ी

खेती-बाड़ी को कुछ लोग तुच्छ और बेकार समझते हैं. कोई काम छोटा और बड़ा नहीं होता और जो खेती को तुच्छ समझते हैं, उनके मगज की जितनी दाद दी जाए कम है. खेती एक ऐसा ‘बिजनेस’ है जिस पर कोई टैक्स नहीं देना पड़ता. इंडियन इनकम टैक्स ऐक्ट, 1961 के तहत कृषि संबंधी काम काज को आयकर के घेरे से दूर कर दिया था.

2. एचयुएफ (HUF) से मिले पैसे

अगर व्यक्ति किसी एचयुएफ (हिन्दू अनडीवाइडेड फैमिली) से है, और उसे परिवार द्वारा कुछ राशि दी गई है तो यह राशि भी आयकर के दायरे में नहीं आएगी. अगर यह राशि पर भी टैक्स लगते तो न जाने बेरोजगारों का क्या होता.

3. बचत खाते पर मिलने वाला ब्याज

आईटी ऐक्ट के सेक्शन 80TTA के तहत किसी भी बचत खाते में मौजूद पैसों पर अधिकतम 10,000 तक का इंट्रेस्ट टैक्स फ्री है.

4. ऐंप्लॉयर से मिला एलटीए

अगर आपका ऐंप्लॉयर आपको परिवार या दोस्तों के साथ घूमने के लिए एलटीए (लीव ट्रेवल अलांउस) देता है, तो ये पैसे भी टैक्स के दायरे में नहीं आएंगे. बशर्ते घूमने-फिरने में लगने वाले असल अमांउट से एलटीए किसी भी कीमत पर ज्यादा न हो.

5. तोहफे के तौर पर मिले पैसे या सामान

अगर आपको तोहफे में 50,000 से कम के सामान या पैसे मिलते हैं, तो यह रकम टैक्स फ्री रहेगी. मौजूदा नियमों के अनुसार 50,000 से ज्यादा के तोहफों या कैश के लेन-देन पर आयकर विभाग की नजर रहती है.

6. पार्टनरशिप फर्म के शेयर

अगर आपने फर्म से हुए लाभ को अपने किसी पार्टनर के साथ शेयर किया है तो यह पैसे भी इनकम टैक्स के दायरे में नहीं आएंगे. इसे पार्टनरशिप पर प्रोफिट शेयरिंग कहते हैं. इस आय पर टैक्स इसलिए नहीं लगता क्योंकि कोई भी फर्म पहले ही टैक्स भर देती है. 

7. हाउस रेंटिंग अलाउंस या एचआरए

कई ऐंप्लॉयर अपने कर्मचारियों को घर के किराए चुकाने के लिए सैलेरी के द्वारा ही कुछ सहायता देते हैं. इस अलाउंस को हाउस रेंटिंग अलाउंस कहते हैं. यह रकम भी आयकर के दायरे में नहीं आती.

8. जीवन बीमा से होने वाली आय

जीवन बीमा कवर पर मिलने वाली रकम भी टैक्स के दायरे में नहीं आती. जीवन बीमा करवाना आपके जीवन और पैसे, दोनों को सुरक्षित रखता है.

9. स्कॉलरशिप

स्कॉलरशिप के तौर पर मिली रकम भी टैक्स के दायरे में नहीं आती. यह मेधावी और जरूरतमंद छात्रों को अच्छी शिक्षा प्राप्त करने के लिए दी जाती है. गौरतलब है कि बहुत से लोग इसका गलत तरीके से इस्तेमाल करते हैं.

10. पुरस्कार

अगर किसी व्यक्ति ने पुरस्कार के तौर पर कोई रकम जीती है या उसे किसी पुरस्कार से नवाजा गया है तो उसमें मिलने वाले पैसों पर भी टैक्स नहीं लगता.

11. विरासत में मिली संपत्ति

विरासत में मिली चल-अचल संपत्ति भी टैक्स के दायरे में नहीं आती. यह किसी भी व्यक्ति की पैतृक संपत्ति है, इसलिए इस पर कोई कर नहीं देना पड़ता.

12. स्वेच्छिक सेवानिवृत्ति

कई बार कर्मचारी अपनी मर्जी से सेवानिवृत्ति ले लेते हैं. रिटायरमेंट के बाद कंपनी द्वारा दी गई ग्रेच्युटी की रकम पर कोई टैक्स नहीं देना पड़ता.

इन तरीकों से आप कुछ हद तक अपनी ‘आय’ पर लगने वाले ‘कर’ से बच सकते हैं. टैक्स से गलत तरीके से बचना गलत है, पर कुछ सही तरीके भी हैं जिससे आप टैक्स से बच सकते हैं.

मुंह के छालों के लिए आसान उपाय

मुंह में छाले की समस्या हो जाना बहुत ही आम बात है. आपने अक्सर देखा होगा लोगों को कभी न कभी, मुंह में छाले हो जाते हैं. और कभी-कभी नहीं लोगों को बार-बार इस समस्या से दो चार होते देखा गया है. जब भी आपको छाले होते हैं तो, इनसे परेशान होकर आपको बोलने में परेशानी होने के साथ-साथ खाने-पीने में भी दिक्कत का सामना करना पड़ता है.

मुंह में होने वाले छालों की समस्या से निजात पाने के लिए आप कुछ घरेलू उपाय अपना सकते हैं. इन उपायों की मदद से आपके छाले जल्दी ठीक हो जाऐंगे.

कारण :

आपके मुंह में होने वाले छालों के कई सामान्य से कारण हैं, जिनके बारे में आपको जानकारी नहीं होती.

1. आपका पेट साफ न होना.

2. आपके दैनिक जीवन में संतुलित आहार का अभाव होना.

3. आपके द्वारा पान मसालों आदि का सेवन करना.

4. गलती से दांतों से कट जाना.

5. जरुरत से ज्यादा तीखा या खट्टा खाना.

छालों का घरेलू उपचार :

1. त्रिफला की राख को शहद में मिलाकर मुंह में छाले वाले स्थान पर लगाएं और जब ऐसा करने से मुंह में थूक भर जाए तब कुल्ला कर लें. ऐसा करने से आपको छालों से राहत मिलती है. ऐसा दिन में कम से कम 2 बार करना चाहिए. 

2. दालचीनी, नीम की छाल, मुनक्का और जौ को मिलाकर एक काढ़े जैसा बना लें. छाले हो जाने पर इस काढ़े को शहद में मिलाकर पीने से छालों की समस्या और इसके दर्द से तुरंत राहत मिलती है.

3. इसके आलावा अजवायन, कपूर और पेपरमिंट को एक शीशे में रखकर धूप में रखें. जब ये पिघल जाऐं तब इन्हें मुँह के छालों पर लगाएं. कुछ लोग इसके पिघले हुए घोल को अमृतधारा कहते हैं. अमृतधारा को मुँह के छालों पर लगाने से, छालों सो राहत मिलती है. 

इनके अलावा इन बातों का भी ध्यान रखें

1. न करें तंबाकू का सेवन.

2. दिन में दो बार दाँतों को ब्रश करना चाहिए.

3. अत्यधिक तला-भुना और बहुत मसालेदार भोजन नहीं करना चाहिए.

4. हर रोज नियमित रूप से हरी सब्जियां और फल खाना चाहिए.

5. मुंह में छाले हो जाने पर कुनकुने पानी से गरारे करने चाहिए.

6. अगर आपको मुंह में जगह-जगह छाले हुएं हैं तो अपने मुँह में पानी भर फिर चेहरे को धोएं. 

7. इसके अलावा अलसी के दाने चबाने और नारियल व दूध का सेवन करने से भी छालों से छुटकारा मिलता है.

चेहरे पर हैं एसिड के घाव, पर जिद है कि हार नहीं मानना

दफ्तर से घर लौट रही थी माला कर्मकार. सियालदह-डायमंड हॉर्बर लोकल ट्रेन में शाम के साढ़े आठ बजे थे. शनिवार का दिन था, इसलिए उस समय लेडीज कंपार्टमेंट में कुछ गिनी-चुनी महिलाएं ही थीं. एकाध स्टेशन के बाद उनमें से एक-एक करके और भी चार-पांच महिलाएं उतर गयी. अब मनीषा समेत तीन महिलाएं रह गयीं. उनमें भी एक तो लोकल की हौकर थी. कल्याणपुर स्टेशन से ट्रेन यात्रियों को उतार कर जब ट्रेन छुटी तो अचानक चलती हुई ट्रेन की खिड़की के सामने एक नकाबपोश सामने आया और उसने खिड़की पर बैठी मनीषा पर एसिड फेंका. यह वह घड़ी थी, जब माला का पूरा जीवन ही बदल गया. एक जमीन को लेकर स्वरूप हलदार नामक एक बिल्डर के साथ माला के परिवार का विवाद था. बिल्डर जमीन चाहता था और माला का परिवार जमीन बेचने के लिए तैयार नहीं था. बिल्डर ने कई बार माला के परिवार को नतीजा भुगतने की धमकी दे चुका था. आखिरकार उसने माला पर एसिड फेंक कर अपनी धमकी को पूरा किया. अब वह हवालात में है. जमानत नहीं हो पा रही है. 

मनीषा पैलान सुबह-सबेरे जब नींद से जग कर अपना चेहरा आईने में देखती है तो एसिड से झुलसे चहरे में गाल, आंखे, उससे नीचे गले और छाती की वीभत्सता से मनीषा का पूरा शरीर कांप जाता है. एक मग नाइट्रिक एसिड ने मनीषा की दु‍निया को ही पूरी तरह झुलसा कर रख दिया है. बचपन से एक ही सपना था मनीषा का. अच्छी तरह पढ़-लिख कर सब्जी बेचनेवाले पिता मुन्नाफ पैलान का सहारा बनना. अपने छोटे-भाई-बहन की पढ़ाई का खर्च जुगाड़ना; ताकि सिर ऊंचा करके परिवार जी सके. इसीलिए पढ़ाई के साथ-साथ नर्सिंग ट्रेनिंग, कंप्यूटर कोर्स, ब्यूटिशियन कोर्स कर रही थी मनीषा. रूढि़वादी मुसलिम परिवार में जन्मी मनीषा कुछ भी करके  अपने पिता और परिवार की लड़खड़ाती जिंदगी को संभालने की कोशिश कर रही थी.

2015 को मुहल्ले में बचपन से देखती आ रही सलीम हलदार से प्रेम और फिर एक दिन घर से भाग कर ब्याह किया. लेकिन कुछ ही दिन के बाद मनीषा के मन में अपने पांव पर खड़ा होकर पिता की मदद करने का सपना पूरे दम-खम के साथ कुलबुलाने लगा. मुसलिम परिवार में ऐसा सपना देखने की सख्त मनाही थी. जाहिर है पति-पत्नी में अनबन होने लगी. मनीषा ने तलाक लेने का फैसला किया. मनीषा कहती है कि सलीम भी तलाक के लिए तैयार था. लेकिन वह इसे मन से स्वीकार नहीं कर पाया.

17 नवंबर 2015 को सर्दी के मौसम की एक शाम. कंप्यूटर क्लास से मनीषा लौट रही थी. सलीम अपने कुछ दोस्तों के साथ अचानक सामने आया और एक मग एसिड फेंक कर नदारत हो गया. मनीषा से अलग होने का खुन्नस उसने एसिड हमला करके निकाला. सलीम से अलग होने के बाद मनीषा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसके लिए एक बहुत बड़ी लड़ाई इंतजार कर रही है. लगातार थाना, पुलिस और अदालत के चक्कर लगाने के साथ अपनी लड़ाई लड़ने के लिए मन को तैयार करती चली गयी. मुहल्ले के लोग इस जुझारू खूबसूरत और जागरूक लड़की को हमेशा से हैरानी से देखा करते थे. हालांकि आज भी देखा करते हैं. लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि देखने का कारण बदल गया है.

एसिड हमले की वारदात के बाद पुलिसी कार्रवाई के बाद सलीम समेत अन्य पांच अभियुक्त जमानत पर छुट्टा घूमते रहे. धमकियां दे रहे हैं. मामला उठा लेने के लिए लगातार दबाव बना रहे हैं. आखिरकार मनीषा को अपना कस्बा छोड़ कर कोलकाता चले आना पड़ा. यहां मनीषा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाईकोर्ट ने 17 जुलाई को राज्य सरकार को तीन लाख रु. हर्जाना के तौर पर मनीषा को दिए जाने का आदेश दिया. गौरतलब है कि प. बंगाल में एसिड हमले की पीडि़तों को तीन लाख हर्जाना देने का कानून है. इस कानून के तहत हाईकोर्ट ने यह फैसला सुनाया. इतना ही नहीं, जमानत पर छुट्टा घूम रहे पांचों अभियुक्तों को भी फिर से गिरफ्तारी के साथ जांच का भी आदेश दिया हाईकोर्ट ने. मुख्य अभियुक्त सलीम फरार है. अन्य सभी अभियुक्तों को पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है. 

पर जहां तक तीन लाख रु. के हर्जाने का सवाल है तो 21 वर्षीय मनीषा बड़े आत्मविश्वास के साथ कहती है कि उसकी अपने योग्यता से कोई नौकरी मिल गयी तो कुछेक सालों में तीन लाख रु. जमा कर लेना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं. सिर्फ त्वचा ही तो जल कर सिकुड़ गयी है. इससे जीना का रास्ता तो बंद नहीं हो जाता है न? नौकरी करके अपने पैरों पर खड़े होने के लिए चिकनी त्वचा एक मात्र योग्यता नहीं हो सकती है.

इलाज के दौरान जब पूरे चेहरे पर बैंडेज था, तब अस्पताल के बिस्तर पर लेटी हुई मनीषा ने खुद को सांत्वना दे दिया था कि जीवन यहीं खत्म नहीं हो जाता. इसके आगे भी दुनिया है. पर उसके लिए खुद को तैयार करना होगा. वैसे इस दिन एक और सचाई से भी वह रूबरू हो गयी थी कि यह दुनिया बड़ी बेदर्द है. तमाशा देखती है. दरअसल, बैंडेज से ढंके पूरे चेहरे के बावजूद उसके कांनों तक लोगों की कुछ फुसफुसाहट पहुंच रही थी. वह कहती है कि बेड के करीब खड़े लोग कह रहे थे कि भले घर की लड़कियों के साथ तो ऐसा नहीं होता है! ये लोग केवल तमाशा देखने के लिए पहुंचे थे.

जब यह हासदा नहीं हुआ था तब मनीषा दुनिया में अपने लिए जगह बनाने की जद्दोजहद किया करती थी. वह कहती है कि कभी उसने किसी राजकुमार का सपना नहीं देखा है. बस, एक ही सपना था कि कोई अच्छी नौकरी ढूंढ़ना है. तैयारी के तौर पर वह टीवी देख-देखकर अंग्रेजी-हिंदी सीखती थी. ‘स्मार्ट’ होने की कोशिश किया करती थी. यह तैयारी बीच में थम गयी. गौरतलब है कि एसिड हमले के बाद 21 दिनों के गलत इलाज के कारण उसकी आंखें नष्ट हो चुकी है. अब धुंधला-धुंधला-सा दिखता है.

पर जीवन के प्रति जीजीविषा में कहीं कोई कमी नहीं है. वह बताती है कि अभी उसी दिन की बात है लोकल ट्रेन में उसकी आप बीती सुनकर एक सहयोगी यात्री ने यहां तक पूछ लिया कि सिर्फ एसिड ही फेंका था या रेप भी हुआ? ऐसी दुनिया से रूबरू होने के बाद भी यह मनीषा ही है जो आत्मविश्वास से लबालब है. मनीषा का मनाना है कि उसका जला चेहरा दरअसल, समाज का आईना है. उसके जले चेहरे में उस जैसी अनगिनत लड़कियों का संघर्ष भी शामिल है.

अस्पताल से जब छुट्टी मिली तो वह ईद का दिन था. घर लौटी तब पता कि हमलावर जमानत पर छूट कर मुहल्ले में लौट आए हैं और छाती फुला कर उसके घर के आसपास घूम रह हैं. उसी दम मनीषा ने संकल्प ले लिया कि पूरे साहस के साथ इनके सामने जाकर मुस्कुराते हुए उसे खड़ा होना है. उन्हें समझा देना है कि ‘तुम्हारा एसिड उसका कुछ भी नहीं जला पाया है. मेरे सपने को, मेरी मेरी चाह को जला नहीं सका है.’ आज भी मनीषा गानों पर थिकरती है. ब्यूटिशियन कोर्स से प्रशिक्षित मनीषा आज भी मुहल्ले की औरतों को सजाती-संवारती है. 

इसी तरह मैयत्री भट्टाचार्य द्वारा अवैध संबंध बनाने से इंकार करने की सजा एसिड हमले से दी गयी. इसी साल 17 जून की घटना थी. प. बंगाल के वर्दमान जिला के रानाघाट स्टेशन में एक परिचित युवक ने मैयत्री के चेहरे को निशाना बना कर एसिड फेंका. इस हमले में मैयत्री का चेहरा ही झुलस गया और एक आंख भी जाती रही. लेकिन उस का मनोबल आज भी अपने चरम पर है. कलकत्ता मेडिकल कौलेज में इलाज करा रही है बास्केट बॉल की खिलाड़ी मैयत्री भट्टाचार्य. एसिड हमले में झुलसा है, बल्कि कंधा, हाथ और पैर भी जल गया है.

जब पहली बार उससे मिली थी तब स्थिति इतनी भयावह थी कि कंधे और दाहिने हाथ की त्वचा ही नहीं, मांसपेशियां तक गल गयी थी और वहां सेप्टिक हो गया था. उसके हाथों में स्लाइन का चैनल और चेहरे पर सफेद महलम लगा हुआ है. फिर भी वह दम साध कर दोषियों को सजा दिलाने और एसिड हमले की पीडि़तों के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ने का संकल्प लेती है. अन्य पीडि़तों को वह संदेश देना चाहती है कि जीवन सिमट नहीं जाता त्वचा की सिकुड़न से.

वह जानती है कि यह संघर्ष कठिन है, पर लड़ना ही होगा. अस्पताल से छुट्टी मिलने पर वह अपनी मास्टर्स की डिग्री भी पूरा करना चाहती है. इसी के साथ वह इस लड़ाई को सड़क पर लड़ना चाहती है. वह कहती है बलात्कार के विरोध में लोग सड़क पर उतरते हैं, लेकिन एसिड हमले का देश में कड़ाई से विरोध कोई नहीं करता. इसीलिए वह इसे एक लंबी लड़ाई मानती है. इस लड़ाई में आमलोगों का साथ चाहती है.

आंकड़ों की जुबानी

बहरहाल, एसिड सर्वाइवल फाउंडेशन इंडिया के आंकड़े कहते हैं कि एसिड हमले की वारदातें हमारे देश में बड़ी तेजी से बढ़ रही हैं. 2011 में एसिड हमले की वारदात जहां महज 106 प्रकाश में आयी थी, वहीं 2015 आते-आते देश भर में 802 ऐसी वारदातों रिपोर्ट हुई हैं. जाहिर है यह चिंता का विषय है. हालांकि आंकड़े से पता चलता है कि एसिड हमले की वारदातों पर नियंत्रण करने में महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश एक हद तक कामयाब रहा है. वहीं उत्तरप्रदेश, प. बंगाल और दिल्ली ऐसी वारदातों के लिए बड़ा नाम कमाया है. 2011 से 2015 तक एसिड हमले के 147 मामलों के साथ सबसे ऊपर पायदान पर है. दूसरा स्थान प. बंगाल का है. 2011-2015 के बीच यहां 125 मामले प्रकाश में आए हैं. दिल्ली 96 हमलों के साथ तीसरे नंबर पर है. मध्यप्रदेश 61 वारदातों के साथ चौथे नंबर पर, 45 के साथ हरियाणा पाचवें, 42 के साथ पंजाब छठे, 38 के साथ आंध्रप्रदेश सातवें, 37 के साथ बिहार आठवें, 31 के साथ महाराष्ट्र नौवे, 30 के साथ तमिलनाडू दसवें, 24 वारदातों के साथ ओडिशा ग्यारहवें स्थान पर है. वहीं 21 एसिड हमले के साथ गुजरात बारहवें, 17 एसिड हमले के वारदातों के साथ असम और केरल तेरहवें, 14 के साथ कर्नाटक चौदहवें और 11 के साथ जम्मू-कश्मीर पंद्रहवेंस्थान पर है.

 

कानूनी पेंच से मुक्ति

फरवरी 2013 से पहले एसिड हमले का आंकड़ा पुख्ता आंकड़ा नहीं माना जा सकता. इसकी वजह यह है कि तब तक हमारे देश में एसिड हमला जैसी वारदात के लिए भारतीय आपराधिक कानून में अलग से कोई धारा नहीं थी. फरवरी 2013 को भारतीय दंड विधान में संशोधन किया गया. 326चए और 326 बी को गैर जमानती धारा के तहत ऐसे अपराध को चिह्नित किया गया. अपराध साबित होने पर न्यूतम सात और अधिकतम दस साल की सजा का प्रावधान किया गया है. इस तरह देखा जाए तो एसिड हमले का पुख्ता आंकड़ा 2014 में ही उपलब्ध हो पाया. इस साल नई धारा के तहत पूरे देश में 225 एसिड हमले के मामले दर्ज हुए और 2015 में यह बढ़ कर 249 तक पहुंच गए. जबकि 2012 में एसिड हमले का आंकड़ा पूरे देश में 106 और 2013 में 116 ही रहा है. जाहिर है आपराधिक धारा के तहत इन हमलों की पहचान न होने के कारण सही स्थिति का पता नहीं चल पाता था.

सरकारी स्तर पर उदासीनता

प. बंगाल की बात करें तो पिछले कुछ सालों से राज्य में एसिड हमले की वारदात लगातार बढ़ती जा रही है. 2013 से लेकर अब तक जिस कदर राज्य ऐसी घटना आए दिन हो रही है, उसे देख कर साफ लगता है कि पुलिस प्रशासन और सरकार उदासीन हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो का आंकड़ा कहता है कि बीते पांच साल में राज्य में 131 मामले दर्ज हुए. वहीं 2014 और 2015 में 41-41 मामले पूरे राज्य में दर्ज हुए. पर मजेदार बात यह है कि किसी भी अभियुक्त को सजा नहीं हुई है.

एसिड सर्वाइवल फाउंडेशन इंडिया के विक्रमजीत सेन का मानना है कि गैर जमानती धारा में अभियुक्तों की गिरफ्तारी के बाद ही ये जमानत पर छूट जाते हैं. ऐसा इसलिए होता है कि पुलिस चार्जशीट पुख्ता तैयार नहीं करती और अभियुक्त जमानत पर छूट जाते हैं.

सलफ्यूरिक, नाइट्रिक और हाइड्रोक्लोरिक एसिड खरीदने-बेचने में नियंत्रण के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने दिशानिर्देश जारी किए है. जिसके तहत राज्य सरकार ने 31 मार्च 2014 में एसिड बिक्री से संबंधित कुछ नियम बनाए. मसलन; दूकानदारों को एसिड खरीददारों का एक अलग रेजिस्टर रखना होगा और रेजिस्टर में उसमें खरीदार का नाम पता विस्तार से दर्ज करना होगा. साथ में यह भी कहा गया कि एक्जीक्यूटिव मैजिस्ट्रेट जितनी हैसियत वाला कोई अधिकारी, पुलिस में सब-इंस्पेक्टर की हैसियत वाला पुलिस कर्मी औचक दौरा करके एसिड विक्रेताओं के रेजिस्टर की जांच कर सकता है. ममता सरकार ने एंफोर्समेंट ब्रांच को भी नियमित अभियान चलाने की ताकीद कर दी है. लेकिन इस नियम का पालन नहीं हो रहा है.

कानूनी पचड़े में पीडि़त

राज्य सरकार के मौजूदा नियमानुसार एसिड पीडि़त को अधिकतम दो लाख रु. हर्जाने व बतौर आर्थिक मदद के रुपए में दिए जाने का प्रावधान है. उधर 2013 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशा जारी करके कहा था कि एसिड पीडि़त को 15 दिनों के भीतर राज्य सरकार तीन लाख रु. दे. लेकिन अभी इसी साल जून में एसिड हमला पीडि़त मनीष पैलान ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाईकोर्ट ने तीन लाख रु. का हर्जाना सरकार को देने का निर्देश दिया. लेकिन अभी तक मनीषा को सरकार रकम नहीं दे पायी है.

हालांकि इस बारे में गृह विभाग के अधिकारी के अनुसार इस देरी की वजह कानूनी अड़चन है. दरअसल, वित्त विभाग की मंजूरी मिलने के बावजूद कानून में बदलाव की अनुमति कानून विभाग से अभी तक नहीं मिला है. ने के कारण मामला अधर में लटका हुआ है. जाहिर है राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार हर्जाना नहीं दे पा रही है. सुप्रीम कोर्ट का निर्देश मान कर तीन लाख रु. का हर्जाना देने के लिए राज्य सरकार को वित्त विभाग की अनुमति चाहिए और वित्त विभाग इस रकम की मंजूरी दे चुका है. लेकिन कानून विभाग द्वारा पुराने कानून में संशोधन किए राज्य सरकार पीडि़त को वह रकम नहीं दे सकती. बंगाल में एपीडीआर जैसे मानवाधिकार संगठन और स्वयंसेवी संगठनों के लगातार दबाव बनाने के बाद हुआ सिर्फ इतना है कि सरकारी अस्पतालों में पीडि़त का निशुल्क इलाज का निर्देश सरकार ने जारी करके छुट्टी पा ली है.

एक मिसाल यह भी

एसिड हमला न केवल उसके चेहरे-मोहरे को बिगाड़ देने की कवायद है, बल्कि उसके पूरे वजूद को वभीत्स बनाने की एक नाकाम कोशिश है. ‘नाकाम कोशिश’ इसलिए क्योंकि इस तरह का हमला पीडि़त को दरअसल, पीडि़त नहीं बनाता; बल्कि उनमें सबसे डट कर मुकाबला करने का माद्दा ही पैदा करता है. तमाम प्रतिकूलताओं से संघर्ष का जुनून भी पैदा करता है. आगरा के फतेहाबाद रोड में गेटवे होटल के ठीक सामने शिरोस हैंगआउट इसी बात का प्रमाण है. इस कैफेटेरिया को एसिड हमले की पीडि़त लड़कियां व महिलाएं चलाती हैं. एसिड ने भले ही इनके चेहरे को बिगाड़ दिया है, लेकिन इनके चेहरे पर हजारों वाट की मुस्कुराहट को हमलावर मद्धिम करने में कामयाब नहीं हुए.

एसिड अटैक सर्वाइवलों के पुर्नवास की अपनी ही तरह का देश में यह पहला प्रोजेक्ट है. बल्कि कहा जाना चाहिए कि एसिड सर्वाइवल द्वारा चलाया जानेवाला यह देश का पहला कैफेटेरिया है. बिगड़े-विकृत चेहरे, समाज की उपेक्षा, आस-पड़ोस के लोगों की सहानुभूति, हास-परिहास, डर-भय को अंगूठा दिखा कर ये लड़कियां शिरोज हैंगआउट चला रही हैं.

2014 में अकेले उत्तरप्रदेश में 186 एसिड हमले के मामले पुलिस ने दर्ज किए थे. इसके बाद ‍अखिलेश यादव ने दिल्ली की एक स्वयंसेवी संस्था छांव फाउंडेशन के सहयोग से इन लड़कियों की पुनर्वास योजना लेकर आगे आयी. मजेदार बात यह है कि इस कैफेटेरिया में चाय-कौफी और स्नैक्श के साथ कम्युनिटी रेडियो सुनने का लुत्फ और लाइब्रेरी में बढ़ने की भी सहूलियत है. इसके अलावा समय-समय पर यहां आर्ट वर्कशाप और एग्जिबिशन भी आयोजित किए जाते हैं. इन विशेषताओं के साथ यह कैफेटेरिया आगरा में न केवल स्थानीय लोगों के बीच बल्कि देशी-विदेशी पर्यटकों के बीच बहुत ही कम समय में लोकप्रिय हो गया. इसकी लोकप्रियता को देखते हुए लखनऊ में भी इसकी एक शाखा खोल ली गयी है. जाहिर है उप्र की यह मिसाल उम्मीद जगाती है. पर इसमें सरकार और समाज का साथ जरूरी है.

औफिस में बोल्डनैस सही या गलत

‘‘देखो देखो सर ने बैल बजाई. अब डीप नैक का टौप और मिनी स्कर्ट पहने टीना कैबिन में पहुंच जाएगी और फिर अपनी आंखों को घुमाते हुए सर से ऐसे बातें करेगी कि वे उसे एकटक देखते रह जाएंगे. अरे सरजी, कभी हमें भी बुला लिया कीजिए. क्या हम में कांटे लगे हैं? आप कहें तो हम भी कल से शौर्ट्स पहन कर आ जाएंगी.’’

 ‘‘चुप कर पगली. हम कभी इतने छोटे कपड़े नहीं पहन सकतीं, भले हमें नौकरी ही क्यों न छोड़नी पड़े.’’

 ‘‘तो फिर क्या हम हमेशा यों ही कुढ़ती रहेंगी, अपनी अदाओं से बौस को नचाने वाली टीना को देख कर?’’

औफिस में उपस्थित सोनम और सुमन की बातें सुन कर स्टाफ के सभी लोग मंदमंद मुसकरा रहे थे, लेकिन टीना के कैबिन से बाहर आते ही सब के मुंह बन गए. टीना सब को यों घूर रही थी मानो मन ही मन गा रही हो, ‘ये दुनिया… ये दुनिया पीतल दी, बेबी डौल मैं सोने दी… बेबी डौल मैं सोने दी…’ और जवाब में स्टाफ कह रहा हो कि चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात…

बहुत से औफिसों का है यही हाल

यह हाल सिर्फ सोनम और सुमन के औफिस का नहीं, बल्कि ऐसे कई औफिसों का है, जहां सैक्सुअली ऐक्टिव रहने वाली लड़कियों का राज चलता है, जो अपनी बोल्डनैस के चलते बौस को अपनी जेब में रखती हैं और इस का खमियाजा बेचारी दूसरी लड़कियों को भुगतना पड़ता है. इस तरह की बोल्ड लड़कियों की वजह से स्टाफ की आम लड़कियों को किस तरह के मैंटल और फाइनैंशियल हैरेसमैंट का सामना करना पड़ता है, आइए जानते हैं:

बस हमें ही पड़ती है डांट

इस तरह की लड़कियां चाहे कोई भी गलती करें, बौस उन्हें जल्दी नहीं डांटता, बल्कि जिन की गलती नहीं है, उन्हें डांट कर अपना गुस्सा शांत करता है. ऐड एजेंसी में कार्यरत शशिकला यादव कहती हैं, ‘‘मेरे साथ कई बार इस तरह का वाकेआ हुआ है जब मेरी हौट कलीग की गलती पर बौस उसे डांटने के बजाय मुझे कैबिन में बुला कर फटकारने लगता है. शुरुआत में मैं कुछ नहीं कहती थी, लेकिन बाद में मुझे लगा कि उस की गलती की सजा मुझे क्यों? इसलिए फिर मैं बौस के पास सुबूत के साथ जाने लगी, उन्हें यह बताने को कि गलती किस की है. ऐसे में मजबूरन बौस को उसे बुला कर मेरे सामने डांटना पड़ता. अभिनय ही सही, लेकिन यह देख कर मेरे दिल को ठंडक मिलती है.’’

शशिकला की तरह ऐसी और भी कई लड़कियां हैं, जिन की गलती न होने पर भी बोल्डनैस परोसती लड़कियों की वजह से बौस की खरीखोटी सुननी पड़ती है.

हौट होती हैं लेकिन टेलैंटेड नहीं

ऐक्सपोर्टइंपोर्ट कंपनी में कार्यरत प्रीति कहती हैं, ‘‘मैं उस वक्त मन मसोस कर रह जाती हूं जब किसी मीटिंग में सीनियोरिटी और टैलेंट के हिसाब से बौस के साथ जाने का हक मेरा होता है, लेकिन बौस नए क्लाइंट से मिलने के लिए मेरी हौट कलीग को साथ ले जाता है. खून तो उस वक्त खौल उठता है जब मीटिंग से आने के बाद जो काम उसे करना है, वह मेरे मत्थे बौस यह कह कर मड़ देता है कि तुम उस से काफी सीनियर हो, इसलिए यह काम तुम करो. तब जी चाहता है कह दूं कि आप भी जानते हैं कि इसे कुछ नहीं आता, मैं इस से ज्यादा टेलैंटेड हूं, इसलिए आप यह काम मुझे सौंप रहे हैं.’’

इस में दोराय नहीं है कि कई कंपनियों में नए क्लाइंट से मिलनेमिलाने के लिए खूबसूरत लड़कियों को आगे किया जाता है, इस सोच के साथ कि शायद इन की ओर आकर्षित हो कर बात बन जाए. लेकिन इन लड़कियों की वजह से टेलैंटेड लड़कियों को जो सहना पड़ता है, उस की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता.

तेजी से बढ़ता है सैलरी ग्राफ

ऐसी लड़कियां जब किसी औफिस में खाली जगह भरने जाती हैं तो पहले ही अपनी हौटनैस दिखा कर अच्छा पैकेज पा जाती हैं और जैसेजैसे ये कंपनी में पुरानी होती जाती हैं इन का सैलरी ग्राफ भी बहुत बढ़ जाता है. हाल ही में पीआर एजेंसी जौइन करने वाली निशा सिंह कहती हैं, ‘‘मैं ने अपनी पुरानी कंपनी इसी वजह से छोड़ी थी, क्योंकि वहां 4 साल काम करने पर भी मेरी सैलरी 6 हजार बढ़ी, जबकि मेरी हौट और बौस से सब से ज्यादा क्लोज ऐक्स कलीग की 2 साल में ही 6 हजार सैलरी बढ़ाई गई, जबकि मैं उस से ज्यादा काम करती थी और उस से कहीं ज्यादा टेलैंटेड भी थी.’’

किसी कंपनी द्वारा ऐसा करना आम लड़कियों का आर्थिक शोषण नहीं तो और क्या है?

बौस की होती है खूब मेहरबानी

बात छुट्टी की हो या प्रमोशन की, सुनने के बाद बौस की भौंहें तन ही जाती हैं, लेकिन जब बोल्ड टाइप की इन लड़कियों को छुट्टी की दरकार होती है तो इन्हें बौस या एचआर की ओर से तुरंत मंजूरी मिल जाती है, जिस की वजह है बौस का इन पर जरूरत से ज्यादा मेहरबान होना. ऐसी लड़कियों को प्रमोशन के लिए खुद को प्रूव करने की जरूरत नहीं होती, जबकि बाकी लड़कियां इतनी मेहनत करने के बाद भी अपने  हक का पद नहीं पा सकतीं, प्रमोशन की तो बात ही छोड़ दें.

बैंकर रोशनी कहती हैं, ‘‘मेरे साथ भी यही हुआ था. मैं अपनी कलीग से ज्यादा सीनियर थी, लेकिन मेरी बजाय बौस ने मुझे मिलने वाली पोस्ट उसे दी थी, सिर्फ इसलिए, क्योंकि वह बोल्ड और हौट थी और मैं साधारण सी दिखने वाली लड़की. अत: मैं ने वह औफिस छोड़ दिया.’’

बाकी भी करते हैं जीहुजूरी

कहते हैं बौस अगर कह दे कि सूरज पश्चिम से उगता है तो कर्मचारी भी इसे ही सच मान लेते हैं. ऐसे में अगर बौस की किसी कर्मचारी पर विशेष कृपा हो, तो बाकियों को भी उस की जीहुजूरी करनी पड़ती है. बौस से करीबी की वजह से ऐसी लड़कियों के पैर कभी जमीं पर नहीं टिकते. किसी से बात करना तो दूर ये उन की तरफ देखती भी नहीं हैं. ऐसे में चपरासी से ले कर बाकी स्टाफ के लोगों को भी जरूरत पड़ने पर खुद इन से बोलना पड़ता है. इतना ही नहीं, अगर किसी चपरासी को एकसाथ कोई आम और इस तरह की खास लड़की काम कहे, तो वह भी पहले खास लड़की की ही बात सुनता है, क्योंकि वह उस से पंगा ले कर बौस की नजरों में नहीं आना चाहता, फिर चाहे आम लड़की का काम औफिस के नजरिए से ज्यादा खास ही क्यों न हो.

बोल्डनैस परोसतीं लड़कियां जाएं संभल

बोल्डनैस परोसती लड़कियों के विषय में यह कहना गलत नहीं होगा कि वे जो कुछ भी कर रही हैं, वह सिर्फ चार दिन की चांदनी है, आने वाली रात उन के लिए गहरा अंधकार ले कर आएगी. किस तरह की परेशानियों से उन्हें जूझना पड़ सकता है? आइए, जानें:

चार दिन की है चांदनी : आज आप के पीछे दीवानों की तरह घूमने वाला आप का बौस हमेशा आप पर यों ही लट्टू रहे यह जरूरी नहीं. यह खेल तो सिर्फ चार दिन का है. जहां आप की जवानी ढली, वहीं आप बौस की निगाहों से भी दूर होती चली जाएंगी. यह आप का हमसफर नहीं है जो जवानी के साथसाथबुढ़ापे में भी आप का साथ दे. यह भी हो सकता है कि कल को अगर आप से खूबसूरत लड़की औफिस में आए तो वह आप को छोड़ कर उस का दीवाना बन जाएगा.

झेलनी पड़ेगी बदनामी: माना कि बौस का साथ आप को पैसों के साथसाथ तरक्की की सीढि़यां भी मुहैया करवा रहा है, लेकिन यह न भूलें कि बौस की आप पर यह मेहरबानी आप के चरित्र पर सवाल उठा सकती है. आजकल की महंगाई में कोई बिना किसी फायदे के किसी को 1 रुपया तक नहीं देता, तो भला आप का बौस आप पर हजारों क्यों उड़ा रहा है, यह सवाल औफिस में गौसिप का विषय बन सकता है.

सैक्स सिंबल बन जाएंगी: आप के ऐसे रवैए से हो सकता है कि आप बौस और औफिस स्टाफ की नजरों में महज सैक्स सिंबल बन कर रह जाएं खासकर तब जब बौस शादीशुदा हो. ऐसे में बौस भी आप को सिर्फ अपनी आंखें सेंकने के इरादे से देखेगा और औफिस स्टाफ भी आप के प्रति बौस की रखैल का नजरिया रखेगा.

काम के साथ कामलीला भी: सब से बड़ा और कड़वा सच यह है कि बौस अगर आप की अदाओं पर फिदा है, तो वह आप से काम भी चाहता है और आप के साथ कामलीला भी करना चाहता है. ऐसे में आप यह सोचें कि आप सिर्फ कामलीला कर के बच जाएंगी और औफिस का काम नहीं करेंगी तो आप गलत हैं, क्योंकि आप को काम करने के लिए ही रखा गया है.

छंटनी में आप का नंबर होगा पहला: नुकसान होने पर कंपनी में छंटनी की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. अगर आप के दफ्तर में भी छंटनी शुरू हो जाए, तो आप का नंबर सब से पहला होगा, क्योंकि आप जो भी काम कर रही हैं उस से बौस का केवल मनोरंजन हो रहा है, कंपनी का मुनाफा नहीं.

पर्सनल लाइफ में बढ़ेंगी मुश्किलें: अगर आप किसी औफिस में अपनी जवानी का इस तरह गलत फायदा उठा रही हैं तो हो सकता है कि आप की इतनी बदनामी हो कि वह बदनामी आप की पर्सनल लाइफ को भी डिस्टर्ब कर दे. यह न भूलें कि दुनिया बहुत छोटी है. आप के ये कारनामे अगर आप के होने वाले हमसफर के कानों में पड़ गए तो आप की शादी होनी मुश्किल हो जाएगी. अत: औफिस में प्रेजैंटेबल नजर आने में कोई बुराई नहीं है, बल्कि यह तो एक अच्छी आदत है, मगर बोल्ड या हौट बनने की कोशिश भूल से भी न करें वरना बदनामी और खैराती तरक्की के अलावा आप को कुछ हासिल नहीं होगा. मेहनत से मिली तरक्की आप को सम्मान और संतुष्टि का एहसास दिलाएगी और आप जिंदगी का हर पल सुकून से जी पाएंगी.            

काम बोलता है चापलूसी नहीं

माना कि इस तरह की मानसिक प्रताड़ना आप के मनोबल को कमजोर कर सकती है, जिस से आप का आत्मविश्वास डगमगा सकता है, लेकिन दूसरों की वजह से अपनेआप को कमजोर न पड़ने दें. इस में आप का ही नुकसान होगा. बेहतर यही है कि आप ऐसे लोगों की गतिविधियों को नजरअंदाज करते हुए अपने काम पर ध्यान दें और अपने काम से मतलब रखें. कुछ लोग उन की बराबरी करने के लिए खुद भी वैसा ही बनने की कोशिश करते हैं, लेकिन आप ऐसा करने की गलती न करें. दूसरों की तरह बनने के बजाय अपनेआप को संवारें ताकि लोग आप की तरह बनना चाहें. यह बात गांठ बांध लें कि अगर आप टेलैंटेड हैं, काबिल हैं तो आप को कुछ बोलने की जरूरत नहीं है, काम खुद बोलता है.

क्लीनिकल साइकोलौजिस्ट, निमिषा कहती हैं कि रिसर्च के अनुसार अकसर जब हम अंदर से कमजोर होते हैं, तो हमारा आत्मविश्वास डगमगाने लगता है, जिस से हमारे व्यक्तित्व में निम्न बदलाव आते हैं:

– हम दूसरों से खुद की तुलना करते हैं और खुद को उन से कम पाने पर अपनेआप को पीडि़त महसूस करते हैं, जो हमें मानसिक रूप से बीमार कर देता है.

– हम हीन मानसिकता का शिकार हो जाते हैं, जिस से अपनी तरक्की में हम खुद ही रुकावट बन कर खड़े हो जाते हैं.

– अपने अंदर की आग को शांत करने के लिए हम कई बार गलत राह पकड़ लेते हैं जैसे सिगरेट, शराब पीना आदि.

– बहुत ज्यादा स्ट्रैस लेने से हम कई बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं.

– हम जब अपने आसपास के वातावरण से खुश नहीं होते, तो उसे सुधारने के बजाय दूसरों को दोषी मानने लगते हैं.

– हम अपनेआप और दूसरों के आलोचक बन जाते हैं. अपने बेसिरपैर वाले आलोचनावादी विचार से अपना नुकसान तो करते ही हैं, दूसरों की आलोचना कर उन से भी रिश्ता बिगाड़ लेते हैं.

हमारी आहार विशेषज्ञा पत्नी

विवाह से पहले जब हमें पता चला था कि हमारी होने वाली पत्नी डाइटीशियन यानी आहार विशेषज्ञा हैं, तो उन की इस योग्यता को हम ने सामान्य अर्थ में लिया था. हम खुश थे कि आहार विशेषज्ञा के आने से हमारे वृद्ध मातापिता के लिए अतिरिक्त सुविधा हो जाएगी. उन्हें घर बैठे ही पता चल जाएगा कि भोजन में क्याक्या लेना है तथा किन चीजों से परहेज करना है. किनकिन चीजों के सेवन करने से उन्हें नुकसान हो सकता है तथा क्याक्या चीजें उन के भोजन में शामिल होनी चाहिए. साथ ही हम ने यह भी सोचा था कि इन से विवाह के बाद हमारे भोजन में भी गुणवत्ता आ जाएगी. इन बातों के अलावा और भी ऐसी ही ढेर सारी बातें हम ने सोची थीं. यों समझिए कि उन दिनों डाइटीशियन से शादी को ले कर हम ढेरों सपने देखा करते थे.

फिर वह दिन आ ही गया जब हमारी उन के साथ शादी हो गई. नईनवेली वधू को ले कर हमें बहुत उत्साह था. उन दिनों हमारे पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे थे. हमें लगता था कि हम इस दुनिया के सब से अधिक सौभाग्यशाली पुरुष हैं, जिसे इतनी अच्छी तथा गुणवान पत्नी का सान्निध्य प्राप्त हुआ है. यह सब सोचते हुए हम अपने सासससुर के प्रति कृतज्ञता से भर उठते, जिन्होंने अपनी आंखों की पुतली की हमारे साथ शादी कर हमारे जीवन को धन्य कर दिया.

शादी के बाद हंसीखुशी के माहौल में हमारा समय गुजरता जा रहा था, लेकिन एक पुरानी कहावत है कि अच्छे दिनों को गुजरने में ज्यादा समय नहीं लगता. तो हमारे भी अच्छे दिनों का अंत एक दिन आ ही गया. हमारी खुशियों को हम से जलने वालों की नजर लग ही गई. एक रविवार की सुबह जब हम सो कर उठे, तो हमारी नवविवाहिता ने हम से कहा, ‘‘जानते हैं, इन दिनों आप की तोंद बाहर निकलने लगी है. आप का शरीर बेडौल लगने लगा है. इतनी कम उम्र में यह सब होना कोई अच्छी बात नहीं है. आप को पता है, इस सब के पीछे क्या कारण है?’’

अपनी नवविवाहिता के ये वचन सुन कर हम तो एकदम हक्केबक्के रह गए. साथ ही हमें उन के मुंह से अपने लिए यह सब सुन कर बहुत शर्म भी आई. हमें समझ में नहीं आया कि अपनी सफाई में उन से क्या कहें, कैसे उन्हें समझाएं? हमारी नवविवाहिता ने हमारी जिस कमजोरी की ओर इशारा किया था, वह हमारे लिए वास्तव में बहुत शर्मनाक थी, फिर भी अपनी सफाई में कुछ तो कहना ही था.

इसलिए लाचारगी भरे स्वर में हम ने कहा, ‘‘अब इस के लिए हम क्या कर सकते हैं? फिर भी कोई जिम वगैरह जौइन कर हम इस पर काबू पाने और आप की शिकायत दूर करने की कोशिश करेंगे.’’

‘‘आप तो बीमारी हो जाने के बाद दवा खाने की बात कर रहे हैं. एक बार तोंद निकल आने के बाद उसे काबू में करने की चर्चा कर रहे हैं. असली बात तो आप समझ ही नहीं रहे हैं कि आप की इस असामयिक तोंद निकलने का कारण क्या है. वह क्या बात है, जिस ने असमय ही आप को इस परेशानी में डाल दिया. तो सुनिए, इस का कारण है आप की खानपान की आदतें. आप भोजन में तली हुई चीजों का बहुत प्रयोग करते हैं. इस कारण आप के शरीर में अतिरिक्त चरबी का जमाव हो रहा है, जिस का परिणाम है आप की बढ़ी हुई तोंद. अभी तो शादी की शुरुआत थी, इसलिए मैं ने कुछ नहीं कहा. लेकिन अब मैं आप के खानपान की आदतों पर पूरा ध्यान रखूंगी. आज से आप के परांठे एकदम बंद. आज से दोनों वक्त आप सिर्फ चपातियां ही खाएंगे, वह भी बिना घी की. चपातियां आप के शरीर के लिए ठीक रहेंगी. इस से आप की बढ़ी हुई तोंद को अंदर करने में मदद मिलेगी,’’ हमारी नवविवाहिता ने निर्णायक स्वर में कहा.

अपनी नवविवाहिता के मुख से इन कड़वे वचनों को सुन कर हमें जोर का झटका लगा. शनिवार की शाम से ही हम ने रविवार के लिए क्याक्या सोच रखा था, क्याक्या योजनाएं बना रखी थीं और कहां सुबह होते ही श्रीमतीजी ने हमें भोजन में चपाती का करंट दे दिया. भोजन में परांठे के हम बड़े शौकीन थे. ऐसे में चपाती को गले से नीचे उतारने की कल्पना से ही हम कांप उठे. फिर भी अपनी जीभ की खातिर हम ने नवविवाहिता से कहा, ‘‘यदि हम व्यायाम के द्वारा इस अतिरिक्त चरबी को हटाने का वादा करें, अपने पेट को पहले वाली स्थिति में ले आएं तब तो परांठे चल सकते हैं?’’

‘‘व्यायाम और वह भी आप करेंगे?

8 बजे तो आप सो कर उठते हैं. वह भी इस मजबूरी में कि यदि उस से अधिक देर से उठे तो आप को दफ्तर के लिए देर हो जाएगी. इसलिए व्यायाम की बात आप कम से कम मुझ से तो न करें. शाम को भी आप की इतनी अनियमित दिनचर्या है कि आप चाह कर भी अपनी मित्रमंडली के घेरे से बाहर नहीं आ पाते. ऐसे में सिर्फ आप के खानपान की आदतों पर काबू कर ही मैं किसी तरह आप के मोटापे पर नियंत्रण कर सकती हूं,’’ श्रीमतीजी ने कहा.

अभी हम चपाती की मार से ठीक से बाहर निकले भी नहीं थे कि अगला आक्रमण हमारी चाय की आदत पर हुआ. चाय का हमें बहुत शौक है. अब चाय हो और वह मीठी न हो यानी उस में चीनी न पड़े, ऐसा तो हो ही नहीं सकता. हमारी नवविवाहिता की नजरों में हमारा यह चाय प्रेम भी हमारे पेट को बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था, अत: उन्होंने हमारी चाय में चीनी की मात्रा कम कर दी. साथ ही दिन भर में हमारी चाय की मात्रा भी निर्धारित कर दी.

चायपरांठों के बाद हमारी आहार विशेषज्ञा पत्नी ने अपने आहार नियंत्रण कार्यक्रम को और भी अधिक कड़ा कर दिया. हमारे भोजन पर अपने नियंत्रण के फंदे को और अधिक कसना प्रारंभ कर दिया. चायपरांठों के बाद हमारी सब्जी में तेल तथा मसाले की मात्रा उन का अगला शिकार थी.

श्रीमतीजी की नजरों में ये भी हमारे स्वास्थ्य के दुश्मन थे तथा इन्हें मार भगाना उन्हें बहुत अच्छी तरह आता था. इसलिए हमारे भोजन में उबली हुई या बहुत कम मिर्चमसाले की सब्जियों ने स्थान ले लिया. आलू, चावल को तो वैसे भी मोटापे का प्रमुख कारण माना जाता है और अब जब दुश्मन से जंग करने की ठान ही ली है तो दुश्मन के सहयोगियों को भला हमारे साथ कैसे गुजारा हो सकता था? फिर भी हमारे विशेष अनुरोध पर श्रीमतीजी ने दरियादिली दिखाते हुए भोजन में थोड़े से चावल की हमें अनुमति दे दी.

भोजन के बाद कुछ मीठे का तो प्रश्न ही नहीं उठता था, क्योंकि यह मीठा ही तो हमारे मोटापे का एक प्रमुख कारण था. साथ ही हमारे भोजन में बहुत सा सलाद भी शुरू हो गया.

हमारी आहार विशेषज्ञा पत्नी की हमें उचित आहार देने की ये कोशिश हमें आगे कहां तक ले जाएंगी, यह तो हम नहीं जानते. फिर भी अभी तो हम यही सोचसोच कर दुबले होते जा रहे हैं कि हमारी भोजन की थाली में से आगे क्याक्या गायब होने वाला है.

दहकता पलाश: भाग-2

पूर्व कथा

प्रवीण से अचानक मुलाकात होते ही अर्पिता की कालेज के दिनों की यादें ताजा हो गईं. तब वह प्रवीण को चाहने लगी थी. उधर प्रवीण के दिल में भी उस के लिए प्यार उमड़ने लगा था. मगर प्रवीण के पिता के ट्रांसफर की खबर ने 2 दिलों को एक होने से पहले ही जुदा  कर दिया. कालेज की पढ़ाई के बाद अर्पिता की शादी आनंद के साथ हो गई. शादी के बाद आनंद का अकसर टुअर पर रहना उसे बेहद खलता था. मगर प्रवीण से मिल कर उस के दिल में दबी प्यार की चिनगारी भड़क उठी. एक रोज प्रवीण ने उसे सांस्कृतिक कार्यक्रम में आमंत्रित किया तो वह मना न कर पाई. प्रवीण का साथ पा कर वह बेहद खुश थी.

– अब आगे पढ़ें:

उस रात पलंग पर लेटी अर्पिता देर तक प्रवीण के बारे में और उस शाम के बारे में सोचती रही. उस के मन की गहराई में एक कसक सी उठी कि काश, उस समय वह अपनी भावनाओं को प्रवीण के सामने व्यक्त कर देती तो आज प्रवीण के बगल में वह अधिकारपूर्वक बैठी होती. आज तो यह जाहिर ही है कि जल्दी ही उस की भी शादी हो जाएगी और फिर उस के साथ उस की पत्नी बैठा करेगी.

अर्पिता हमेशा चाहती थी कि उस की शादी किसी ऊंचे पद वाले सरकारी अधिकारी से हो और बड़ा बंगला, नौकरचाकर, गाड़ी हो. अर्पिता खिड़की से झांकते चांद में अपने सपनों का चेहरा तलाशती पता नहीं कब गहरी नींद में सो गई.

दूसरे दिन प्रवीण की छुट्टी थी. वह सुबह ही अर्पिता को लेने आ पहुंचा. सिर से पैर तक सादगी में लिपटी वह इतनी सुंदर लग रही थी कि प्रवीण उसे देखता ही रह गया. अर्पिता का दिल जोर से धड़क गया. उस ने तुरंत ही प्रवीण के चेहरे से अपनी नजरें हटा लीं और दूसरी ओर देखने लगी. प्रवीण मुसकरा दिया.

दिन भर प्रवीण और अर्पिता आसपास की जगहों में घूमतेफिरते रहे. दोनों एक जगह लगी चित्र प्रदर्शनी भी देखने गए. शाम को दोनों ने भारत भवन में नाटक देखा. लंच और डिनर भी बाहर ही किया. चित्र प्रदर्शनी व नाटक देखते और साथ में घूमते जब प्रवीण की बांह अर्पिता की बांह से छू जाती तब अर्पिता के शरीर में सिहरन सी दौड़ जाती.

आनंद के साथ उसे यह अनुभूति कभी नहीं हो पाई थी, क्योंकि आनंद के मन ने आज तक उस के मन की कोमल अभिरुचियों को छुआ ही नहीं था. आनंद का साहचर्य अर्पिता के तनमन के पलाश को आज तक खिला नहीं पाया था.

चित्र प्रदर्शनी में दोनों देर तक 1-1 चित्र के ऊपर आपस में चर्चा करते रहे. एक जैसी रुचियां बातचीत के कितने मार्ग प्रशस्त कर देती हैं, अर्पिता को पहली बार लगा.

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डिनर के बाद प्रवीण अर्पिता को घर तक छोड़ने आया तो अर्पिता ने उस से बहुत आग्रह किया कि वह कौफी पी कर जाए लेकिन प्रवीण बाहर से ही चला गया.

अर्पिता कपड़े बदल कर पलंग पर लेट गई. आज उसे लग रहा था कि वह एक सुंदर बगीचे में खड़ी है और उस के चारों ओर सुर्ख पलाश खिल रहा है. देर तक वह फूलों की मादक गंध से सराबोर हो कर मन ही मन महकती रही.

2 दिनों तक अर्पिता स्वप्नलोक में खोई उन्हीं भावनाओं में विचरती रही. तीसरे दिन आनंद टुअर से वापस आ गया तो अर्पिता भी स्वप्नलोक से निकल कर यथार्थ में आ गई. जीवन अपनी गति से चलता रहा. लेकिन अर्पिता के लिए जीवन में एक नया रोमांच भर गया था. घर और बुटीक्स से उसे जब भी समय मिलता और प्रवीण को फुरसत होती, दोनों कहीं न कहीं घूमने चले जाते. कभी चित्रों की तो कभी फूलों की या क्राफ्ट की प्रदर्शनी में. कभी किसी नाटक का मंचन देखने तो कभी किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम या मेले में.

अर्पिता के तनमन में प्रवीण की नजदीकियों से एक अलग ही खुमारी छाती जा रही थी. वह प्रवीण के चेहरे पर भी अपने प्रति आकर्षण के विशिष्ट भाव ढूंढ़ने का प्रयास करती, लेकिन प्रवीण उसे बिलकुल सहज व संतुलित नजर आता. अर्पिता समझ नहीं पा रही थी कि प्रवीण उसे बस एक बहुत अच्छी दोस्त भर समझता है या फिर उस का उस से खास लगाव भी है. अर्पिता देर तक अकेले में इसी ऊहापोह में पड़ी रहती पर समझ नहीं पाती तब सिर को झटका दे कर अपनेआप को यही समझाती कि मुझे क्या करना, प्रवीण का साथ और अटैंशन मिल रहा है यही बहुत है.

इस तरह 6-7 महीने बीत गए. आनंद इतने महीनों में काम में अधिक व्यस्त हो गया था और अर्पिता अकेली होती चली गई थी.

घर का अकेलापन अर्पिता को काट खाने को दौड़ता था. ऐसे में प्रवीण का साथ ही था जिस ने उसे संबल दिया हुआ था. कभीकभी अर्पिता के मन के साथसाथ तन भी प्रवीण की नजदीकियां पाने के लिए मचल उठता था. खासतौर पर तब, जब आनंद कईकई दिनों कंपनी के काम की वजह से शहर से बाहर रहता था.

पलंग पर करवटें बदलती अर्पिता सोचने लगती कि काश… लेकिन प्रवीण का संतुलित व्यवहार और अर्पिता के संस्कार अर्पिता को मर्यादा की सीमा पार नहीं करने देते थे. कभीकभी आनंद के साथ रहते हुए अर्पिता को अचानक ग्लानि और अपराधबोध सा महसूस होने लगता था कि वह उस के साथ विश्वासघात तो नहीं कर रही? ऐसे में वह आनंद से सहज हो कर आंखें नहीं मिला पाती थी. उसे लगता था कि कहीं वह उस का चेहरा देख कर मन के भावों को पढ़ न ले. पर आनंद के टुअर पर जाते ही अर्पिता निश्चिंत हो जाती और अपनी भावनाओं की मादकता में खोई रहती.

इसी बीच प्रवीण के पिताजी रिटायर हो गए तो वे और प्रवीण की मां प्रवीण के पास ही आ कर रहने लगे. प्रवीण की मां जोरशोर से प्रवीण के लिए लड़की तलाशने लगीं ताकि उस का विवाह हो जाए. अर्पिता ऐसी खबरों पर ऊपर से तो सहज रहती लेकिन अंदर ही अंदर अत्यंत चिंतित हो जाती. पर जब सुनती किसी कारण बात नहीं बन पाई तो चैन की सांस लेती.

तभी प्रवीण के लिए एक बहुत ही अच्छा रिश्ता आया. घरपरिवार भी बहुत अच्छा था और लड़की भी बहुत योग्य थी. प्रवीण की मां की इच्छा थी कि उस का रिश्ता यहां पक्का हो जाए. बस प्रवीण ही था, जो आनाकानी कर रहा था. अर्पिता भी मन ही मन बेचैन थी. वह जानती थी कि उस का सोचना गलत है पर प्रवीण की शादी हो जाएगी यह बात सोच कर वह मन ही मन एक पीड़ा का अनुभव करती थी. इस बात को ले कर उस का मन उदास सा रहता था.

प्रवीण अर्पिता को उदास देख कर उस से पूछता रहता था कि उस की उदासी का क्या कारण है पर अर्पिता क्या बताती, कैसे बताती. कैसे कहती प्रवीण से कि वह शादी न करे. उसे उदास देख कर अपनी व्यस्तता के बावजूद प्रवीण समय निकाल कर उस से बराबर संपर्क बनाए रखता और उसे खुश रखने का प्रयत्न करता रहता. अर्पिता आनंद और प्रवीण की तुलना कर के एक गहरी सांस भर कर रह जाती. प्रवीण व्यस्त रहते हुए भी उस का हालचाल पूछने के लिए समय निकाल लेता था, लेकिन आनंद कभी भी काम के बीच में से समय निकाल कर पूछताछ नहीं करता था कि वह कैसी है, उसे कोई परेशानी तो नहीं है.

आनंद की कंपनी उसे ट्रेनिंग के लिए कैलिफोर्निया भेज रही थी. उसे साल भर के लिए वहां ठहरना था और 15 दिन के भीतर ही दिल्ली से फ्लाइट पकड़नी थी. आनंद के जाने के नाम से अर्पिता एक ओर जहां खुद को दुखी महसूस कर रही थी वहीं दूसरी ओर खुश भी थी, क्योंकि उसे लग रहा था कि प्रवीण के साथ घूमते हुए जो थोड़ीबहुत झिझक होती थी, वह अब नहीं रहेगी.

‘‘तुम अकेली कैसे रहोगी साल भर? अपने मम्मीपापा के यहां शिफ्ट हो जाओ,’’ आनंद ने कहा.

‘‘मम्मी का घर तो शहर के दूसरे कोने में है. वहां से तो मुझे बुटीक काफी दूर पड़ेंगे. फिर बेवजह घर को साल भर बंद रखने से क्या फायदा? इतने सारे सामान की देखभाल कौन करेगा? कभीकभी मैं वहां चली जाया करूंगी या बीचबीच में उन्हें यहां बुला लिया करूंगी. आप मेरी चिंता मत कीजिए,’’ अर्पिता ने आनंद को आश्वस्त कर दिया.

वैसे आनंद के साथ रहते हुए भी एक तरह से अर्पिता अकेली ही रहती आई है. फिर मम्मीपापा के यहां रहे तो प्रवीण से मिलना कहां हो पाएगा? मम्मी के सामने वह प्रवीण से बात भी नहीं कर पाएगी. यह सब सोच कर उस ने अपने घर पर ही रहना ठीक समझा. अर्पिता के पिताजी अभी रिटायर नहीं हुए थे, उन का औफिस घर के पास ही था. इसलिए वे लोग साल भर के लिए अर्पिता के पास आ कर रह पाएंगे, इस की भी संभावना कम थी.

15 दिनों बाद आनंद कैलिफोर्निया चला गया. अर्पिता के मातापिता 5-6 दिन उस के साथ रह कर अपने घर चले गए. अब अर्पिता के सामने अपनी खुशियों का उन्मुक्त और विस्तृत खुला आसमान था. अब वह अपने पंख फैला कर इस आसमान में जी भर कर उड़ लेना चाहती थी. वर्षों से मन में दबा कर रखी इच्छाएं पंख फड़फड़ाने लगी थीं. प्रवीण का ठाटबाट, प्रतिष्ठा और आनबान देख कर अर्पिता की आंखें चौंधियाने लगी थीं. काश पिताजी उस की शादी की इतनी जल्दी न करते, तो आज उस के पास सब कुछ होता. वह भी सरकारी गाडि़यों में घूमती. बड़े सरकारी बंगले में रहती. नौकरचाकर दिन भर उस की जी हुजूरी करते.

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प्रवीण की जिस दिन छुट्टी रहती, वह कभीकभी अर्पिता को अपने घर भी ले जाता था. अर्पिता प्रवीण की मां से बातें करती रहती. प्रवीण के मातापिता को पता था कि अर्पिता और प्रवीण कालेज में साथ पढ़े हैं, इसलिए वे दोनों उन की मित्रता को सहज रूप से लेते थे.

अर्पिता को कभीकभी मन ही मन ग्लानि होती थी अपनेआप पर कि वह आनंद को धोखा दे रही है. कितना विश्वास करता है आनंद उस पर. लेकिन जीवन में सुख की और भी कई इच्छाएं होती हैं. सिर्फ विश्वास के बल पर रिश्ते उम्र भर नहीं ढोए जा सकते. प्रवीण से उस की इच्छाएं, उस की रुचियां उस के विचार मेल खाते हैं, तभी उस का साथ इतना अच्छा लगता है.

‘‘पचमढ़ी चलोगी 2 दिनों के लिए?’’ कौफी हाउस में जब एक दिन दोनों कौफी पी रहे थे तो प्रवीण ने अर्पिता से पूछा.

‘‘अचानक पचमढ़ी?’’ अर्पिता ने आश्चर्यमिश्रित खुशी से पूछा.

‘‘हां, वहां सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत लोकरंग का कार्यक्रम होने वाला है, इसलिए मुझे 2 दिनों के लिए वहां जाना है,’’ प्रवीण ने बताया.

‘‘तुम्हारे साथ और कौन जा रहा है?’’ अर्पिता ने थोड़ी मायूसी से पूछा.

‘‘कोई नहीं. मम्मीपापा तो उस समय इंदौर जा रहे हैं शादी में. बस तुम और मैं चलेंगे,’’ प्रवीण ने कौफी खत्म करते हुए कहा.

अर्पिता के मन की कली खिल उठी. 2 दिन वह पूरा समय प्रवीण के साथ बिताएगी. उसे तो मुंहमांगी मुराद मिल गई. अगले हफ्ते दोनों पचमढ़ी रवाना हो गए. दिन भर दोनों पचमढ़ी के दर्शनीय स्थलों पर घूमते रहे. शाम 5-6 बजे दोनों गैस्ट हाउस में वापस आए. चाय पी और अपनेअपने कमरों में तैयार होने चले गए. शाम 7 बजे से सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू होने वाला था.

शाम को 7 बजे के पहले प्रवीण ने दरवाजे पर नौक कर के उसे आवाज दी. अर्पिता ने दरवाजा खोला तो वह अर्पिता को देखता रह गया.

‘‘बहुत खूबसूरत लग रही हो अर्पिता,’’ प्रवीण ने उस के गाल से बालों की लट को पीछे हटाते हुए प्रशंसात्मक स्वर में उस की तारीफ की.

यह पहली बार हुआ था कि प्रवीण ने मुक्त कंठ से उस की सुंदरता की तारीफ की थी और उस के गालों को छुआ था. अर्पिता का रोमरोम सिहर गया.

‘‘चलो न,’’ अर्पिता ने आगे बढ़ते हुए कहा.

‘‘2 मिनट रुको तो सही तुम्हें जी भर कर देख तो लूं,’’ प्रवीण ने बांह पकड़ कर अर्पिता को अपने सामने खड़ा कर लिया.

अर्पिता नई दुलहन की तरह शरमा गई. बंधनरहित मुक्त वातावरण में आ कर प्रवीण की झिझक भी दूर हो गई थी. वह मुग्ध भाव से उसे ऊपर से नीचे तक निहारता रहा.

गाड़ी में प्रवीण पिछली सीट पर अर्पिता के साथ ही बैठा. दोनों के बीच की दूरियां सिमट गई थीं. प्रवीण अर्पिता से सट कर बैठा था. अर्पिता की देह की सिहरन पलपल बढ़ती जा रही थी.

आयोजन स्थल पर पहुंच कर प्रवीण थोड़ा अलग हट कर बैठ गया. वहां दूसरे पहचान वालों के साथ प्रवीण ने अर्पिता की मुलाकात अपने दोस्त की पत्नी के रूप में करवाई. मेल मुलाकात के समय ही एक वरिष्ठ आई.ए.एस. अधिकारी ने रायपुर से हाल ही में भोपाल ट्रांसफर हो कर आए चौधरीजी से प्रवीण को मिलवाया.

‘‘इन्हें तो तुम जानते ही होगे. चौधरीजी और उन की पत्नी नीलांजना चौधरी. 8 दिन ही हुए हैं इन्हें भोपाल आए हुए. परसों ही जौइन किया है.’’

नीलांजना को देखते ही प्रवीण अचानक सकपका गया. उन्होंने एक भरपूर नजर प्रवीण पर डाली और फिर उस के पास खड़ी अर्पिता को अजीब सी नजरों से देखने लगीं. अर्पिता को उन का देखने का अंदाज अच्छा नहीं लग रहा था. उसे लग रहा था कि नीलांजना की आंखें उस की आंखों से होती हुईं उस के मन में छिपे हुए चोर का भेद पा गई हैं. कुछ देर बाद नीलांजनाजी के मुख पर एक तिरछी व्यंग्यात्मक मुसकान तैरने लगी.

अर्पिता अपना ध्यान हटा कर दूसरी ओर देखने लगी. प्रवीण भी जल्दी ही वहां से चला गया. कुछ ही देर में कार्यक्रम शुरू हो गया और सब लोग अपनीअपनी जगह बैठ गए.

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अर्पिता को लग रहा था मानो वह स्वप्नलोक में पहुंच गई है. सामने खुले आकाश के नीचे भव्य मंच पर नर्तकों द्वारा नृत्य की प्रस्तुति. वह स्वप्नलोक के सुखसागर में तैरने लगी.

कार्यक्रम समाप्त होने पर वहीं रात के खाने का इंतजाम था. प्रवीण और अर्पिता भी वहीं डिनर करने लगे. खाना खाते हुए जब भी नीलांजना से आमनासामना होता वे अजीब नजरों से घूरघूर कर प्रवीण और अर्पिता को देखने लगतीं. अर्पिता को अच्छा नहीं लग रहा था और प्रवीण भी उन्हें देखते ही अर्पिता को ले कर उन के सामने से हट जाता था.

 – क्रमश:

टेटली सुपर ग्रीन टी की नई रेंज हुई लौंच

टाटा ग्लोबल बेवरेजेज ने टेटली सुपर ग्रीन टी के तहत एक नई रेंज का लौंच मुंबई में किया, फिटनेस के महत्व को बताते हुए उस दिन जुम्बा डांस का आयोजन किया गया. जहां करीब डेढ़ हजार महिला, पुरुष और बच्चों ने शामिल होकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया. यहां उपस्थित क्रिकेट प्लेयर सौरभ गांगुली, अभिनेत्री नेहा धूपिया और प्रेज़ेंटर शिबानी दांडेकर ने भी सबके साथ शामिल होकर जुम्बा डांस किया.

अभिनेत्री नेहा धूपिया कहती हैं कि डेली फिटनेस पर मैं हमेशा से ध्यान देती हूं, ताकि मैं स्वस्थ रहूं. क्रिकेटर सौरभ गांगुली कहते हैं कि आज की लाइफ सभी के लिए बहुत हेक्टिक है, लोग दिन भर काम करते रहते हैं, अपने लिए उनके पास समय नहीं होता. ऐसे में नियमित वर्कआउट ही उन्हें एक अच्छी लाइफस्टाइल दे सकती है. मैंने कभी स्टेज पर डांस नहीं किया, लेकिन ये अनुभव बहुत अच्छा रहा. मैंने पिछले 20 सालों में चाय के अलावा कभी कोई ड्रिंक नहीं लिया. मैं अभी भी कुछ न कुछ वर्कआउट रोज करता हूं. मैंने विदेशों में देखा है कि लोग फिटनेस के लिए रास्ते पर दौड़ते हैं, सही डाइट लेते हैं. आज भारत में भी ऐसा शुरू हो चुका है.

टाटा ग्लोबल बेवरेज के रीजनल प्रेसिडेंट सुशांत दाश कहते है कि आजकल हर कोई सुपर ह्यूमन बनना चाहते है. ऐसे में ग्रीन टी उनके एनर्जी लेवल को बढ़ाने की दिशा में एक कदम है.

                                                              

 

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