..तो पार्टी में दिखेंगी सबसे अलग

कभी कभी ऐसा होता है अचानक ही आपको पता चलता है की आपको किसी पार्टी में जाना है. और आपने पार्टी के लिए पहले से कोई भी तैयारी नहीं की है तो कोई बात नहीं, हम आपको बता रहे हैं ऐसे टिप्स जिससे आप पार्टी में सबसे अलग नजर आएंगी.

पार्टी में जाने की तैयारी करने जा ही रही हैं तो सबसे पहले अपने चेहरे की सफाई कर लीजिए. सबसे पहले अपने चेहरे की गंदगी को साफ कीजिए. इससे चेहरे पर जमी धूल साफ हो जाएगी. इस बात का ध्यान रखें कि क्लींजर माइल्ड हो.

चेहरे को साफ करने के बाद उसे अच्छी तरह से तौलिया से थपथपा कर पोंछें. अब अपने चेहरे पर अच्छी क्वालिटी का मोइस्चराइजर इस्तेमाल करें. हल्के हाथों से इसे पूरे चेहरे पर लगाएं. अब थोड़ी देर तक इसे रहने दें.

पार्टी में लम्बे समय तक आपका मेकअप टिका रहे इसके लिए चहरे पर प्राइमर लगाना बहुत जरूरी है. इससे चेहरा स्मूथ होने के साथ साथ मेकअप भी खिलकर उभरता है.

अब सबसे पहले आंखों का मेकप करें. इसके लिए आप काजल के साथ मस्कारा लगाकर आई मेकअप कम्प्लीट करें. अगर आप चाहें तो लेंस भी लगा सकती हैं.

अब बारी है आपके चीक्स की. इसके लिए लाइट पिंक कलर का ब्लशऑन करें. इससे आपके चीक्स हाई लाइट होंगे.

अपनी पसंद की लिपस्टिक लगा सकती हैं, ये आपको फ्रेश लुक देने के साथ-साथ अटरेक्टिव भी बनाता है. पार्टी रात की है तो बेहतर होगा कि आप मैट लिपस्टिक लगाने की बजाय ग्लॉसी लिपस्टिक लगाएं.

फिल्म रिव्यू: काफी विथ डी

एक अच्छे विषय को एक अनुभवहीन लेखक व निर्देशक किस तरह से घटिया फिल्म में परिवर्तित करता है,इसका ताजातरीन उदाहरण है फिल्म ‘‘काफी विथ डी’’.

फिल्म की कहानी के केंद्र में मुंबई का एक समाचार चैनल और उसमें कार्यरत न्यूज एंकर अर्नब घोष (सुनील ग्रोवर) के इर्द गिर्द घूमती है. अर्नब घोष अपने चैनल के प्राइम टाइम कार्यक्रम का संचालक है, जिसमें वह राजनीतिज्ञों के इंटरव्यू लेता है. चैनल की टीआरपी कम होती जा रही है. इस वजह से चैनल का संपादक (राजेष शर्मा) भी अर्नब से खुश नहीं है. क्योंकि चैनल के मालिकों ने दो माह के अंदर चैनल की टीआरपी को बढ़ाकर चैनल को फायदे में लाने की चेतावनी दे दी है, अन्यथा चैनल बंद कर दिया जाएगा.

संपादक ने अर्नब को शाम सात बजे के कूकरी शो को संचालित करने के लिए कह दिया है. जबकि उसके कार्यक्रम की जिम्मेदारी नेहा (दीपानिता शर्मा) को दे दी गयी. जब अर्नब यह बात अपने घर जाकर अपनी गर्भवती पत्नी पारूल (अंजना सुखानी) को बताता है, तो पारूल उससे कहती है कि उसे डी (जाकिर हुसेन) का इंटरव्यू करना चाहिए. यह बात अर्नब को जंच जाती है. फिर अर्नब, डी के बारे में कुछ अजीबो गरीब कहानियां बनाकर प्रसारित करता है. जिसकी वजह से डी का ध्यान उसकी तरफ जाता है. आखिरकार डी, अर्नब की चार सदस्यीय टीम को कराची अपने घर बुलाकर इंटरव्यू देता है.

एक समाचार चैनल का न्यूज एंकर मशहूर डान डी से इंटरव्यू करने जाता है, जिसका हौव्वा हमारे देश में है,जिसने आज तक किसी पत्रकार से बात नहीं की, यह सोच अपने आप में काफी अनूठी है. मगर इस सोच को कहानीकार व निर्देशक तथा पटकथा लेखक आभार दधीच सिनेमा के परदे पर लाने में बुरी तरह से विफल रहे हैं. फिल्म देखते समय कहानी में अधूरापन नजर आता है. फिल्म का गीत संगीत भी प्रभावित नहीं करता. संवाद लेखक के रूप मे भी आभार दधीच निराश करते हैं.

इंटरवल तक फिल्म किसी तरह से घिसटती रहती है. पर दर्शक को उम्मीद बंधती है कि डी से अर्नब के इंटरव्यू का हिस्सा लुभाएगा, मगर वहां भी फिल्म निराश करती है. डी और अर्नब के बीच बातचीत देखते समय लगता है कि यह फिल्म कब खत्म हो.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो अंजना सुखानी और सुनील ग्रोवर दोनों ही बहुत निराश करते हैं. सुनील ग्रोवर को मान लेना चाहिए कि उनके अंदर अभिनय क्षमता का अभाव है, उसे निखारने के लिए उन्हे काफी मेहनत करने की जरुरत है. टीवी के कामेडी शो में औरतों के कपड़े पहनकर फूहड़ हरकतें कर दर्शकों को हंसाना अभिनय नहीं है. कलाकार की असली परीक्षा सिनेमा के परदे पर अभिनय कर लोगों के चेहरे पर मुस्कुराहट लाने में है. पर सुनील ग्रोवर बुरी तरह से असफल रहे हैं. ‘निल बटे सन्नाटा’ से बेहतर कलाकार के रूप में उभरे पंकज त्रिपाठी भी इस फिल्म में डी के सहायक गिरधारी के किरदार में विफल रहे हैं. डी के किरदार में जाकिर हुसेन सही बैठे. पर महज एक कलाकार की प्रतिभा के बल पर अच्छी फिल्म नहीं बनती है.

फिल्म ‘‘काफी विथ डी’’ की कमजोर कड़ियों में कहानीकार व निर्देशक विशाल मिश्रा, पटकथा लेखक आभार दधीच व अभिनेता सुनील ग्रोवर आते हैं.

दो घंटे तीन मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘काफी विथ डी’’ के निर्माता विनोद रमानी, निर्देशक विशाल मिश्रा,पटकथा व संवाद लेखक आभार दधीच, कलाकार हैं-सुनील ग्रोवर, अंजना सुखानी, दीपानिता शर्मा, राजेशशर्मा, पंकज त्रिपाठी, जाकिर हुसेन.

‘कमांडो 2’ का फर्स्ट लुक देखा आपने!

अभिनेता विद्युत जामवाल अपनी फिल्मों के साथ-साथ अपनी शानदार बॉडी के कारण भी सुर्खियों में हैं. खबरों की मानें तो एक बार फिर से अभिनेता विद्युत जामवाल अपनी एक और दमदार फिल्म को लेकर आ रहे हैं. साल 2013 में रिलीज हुई फिल्म ‘कमांडो अ वन मैन आर्मी’ से विद्युत को एक अलग पहचान मिली.

वैसे तो विद्युत् को जॉन अब्राहम के साथ फिल्म ‘फोर्स’ में भी देखा गया था मगर, ‘कमांडो’ के बाद उनके कई दीवाने पैदा हुए. लडकियों के दिल की धड़कन विद्युत एक बार फिर अपनी कमांडोगिरी दिखाने वाले हैं.

यह तो आप जानते ही होंगे कि कमांडो की सीक्वल बन रही है और अब विद्युत इसका फर्स्ट लुक ले कर आए हैं. देखिए कमांडो 2 का फर्स्ट लुक.

बड़े पर्दे पर ‘धूम’ मचाएंगे किंग खान

बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान सिल्वर स्क्रीन पर धूम मचाते नजर आ सकते हैं. बॉलीवुड फिल्मकार आदित्य चोपड़ा अपनी सुपरहिट फिल्म धूम का चौथा संस्करण बनाने जा रहे हैं.

गौरतलब है कि धूम में जॉन अब्राहम, धूम 2 में ऋतिक रौशन और धूम 3 में आमिर खान ने काम किया था. चर्चाएं भी थी कि धूम 4 में सलमान खान खलनायक का किरदार निभा सकते हैं.

लेकिन अब चर्चा हो रही है कि ‘धूम 4’ में शाहरुख विलेन का रोल निभाएंगे. फिल्म का निर्देशन इस बार खुद आदित्य चोपड़ा करेंगे. इससे पूर्व धूम सीरीज की फिल्मों का निर्देशन आदित्य चोपड़ा ने नहीं किया था.

हाल ही में आदित्य ने बेफिक्रे से निर्देशन के क्षेत्र में आठ साल बाद वापसी की है. आदित्य इससे पूर्व शाहरूख को दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे, मोहब्बतें, रब ने बना दी जोड़ी जैसी तीन सफल फिल्मों में निर्देशित कर चुके हैं.

सनी लियोन का ये वीडियो देख चौंक जाएंगे आप

फिल्म ‘रईस’ का इंतजार शाहरुख के फैंस कर रहे हैं. इस फिल्म में शाहरुख खान कई सालों बाद एक बार फिर ग्रे किरदार में नजर आएंगे. उनके इस अंदाज को लोगों ने ट्रेलर में ही खूब पसंद किया हैं. फिल्म में शाहरुख का डायलाग ‘कोई धंधा छोटा नहीं होता और धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं होता’ लोगों को दीवाना बना चुका है और हर किसी के जुबां पर यही डायलॉग है.

इसी डायलॉग का एक और वर्जन सामने आया है जिसे सनी लियोन ने बोला है. जी हां सनी ने फिल्म के इस डायलॉग का डबस्मैश बनाया है. अपने ट्विटर अकाउंट पर सनी से इसे शेयर किया है और कहना पड़ेगा की सनी शाहरुख के इस डायलॉग को बोलते हुए काफी अच्छी लग रही है.

सनी ने अपनी क्यूटनेस से इस डायलॉग को और भी बेहतरीन बना दिया है. वो डबस्मैश के शुरुआत में काफी स्टाइलिश लग रही हैं. सनी के फैंस को उनका यह डबस्मैश काफी पसंद आ रहा है.

देखिये लैला का सुपरहिट डायलोग.

केन्या की विश्व प्रसिद्ध नायवाशा झील

रंगबिरंगे गुलाबों और विभिन्न प्रजातियों के पक्षियों से घिरी केन्या की नायवाशा झील की खूबसूरती दिलोदिमाग में छा जाती है. अगर आप भी घुमक्कड़ मिजाज के हैं तो नायवाशा झील का एक दौरा तो बनता है जनाब.

ईस्ट अफ्रीका के देश केन्या जाने वाले ज्यादातर सैलानी नायवाशा झील जरूर देखते हैं. यह केन्या की राजधानी नैरोबी के उत्तरपश्चिम में है. यह ग्रेट रिफ्ट वैली का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है. यह 139 किलोमीटर के क्षेत्र में फैली हुई है. यह समुद्रतल से 6180 फुट की ऊंचाई पर है. इस की अधिकतम गहराई 100 फुट है.

झील के आसपास कई तरह के जंगली जानवरों का एक दर्शनीय स्थल है जिस में जिराफ, जैब्रा, हाइना, हिरण और 200 से अधिक तरह के पक्षी हैं.

विशेष प्रकार के फूलों, खासतौर से कई रंगों के गुलाबों के अनेक फौर्म यहां चारों ओर फैले हुए हैं. यह यहां का महत्त्वपूर्ण उद्योग है. हजारों अफ्रीकी लोगों को यहां रोजगार मिला हुआ है. ये फूल विशेषतौर पर गुलाब यूरोप के देशों में निर्यात किए जाते हैं.

मछली उद्योग भी यहां की स्थानीय आबादी की रोजीरोटी का बड़ा साधन है. इस झील में कई प्रकार की मछलियां पाई जाती हैं. वहां मसाई भाषा बोलने वाले मसाई लोग झील को नाइपोशा कहते थे जिस का अर्थ होता है तूफानी पानी. दरअसल, यहां शाम को अकसर पानी में तूफान आता है, ऊंची लहरें उठती हैं.

यहां के फूल उद्योग पर अंगरेजों का तकरीबन पूरा कब्जा है. वे यहां फूलों के अलावा विभिन्न प्रकार की सब्जियां भी उगाते हैं.

ऐलसामेयर, झील के किनारे बसा विश्वप्रसिद्ध घर है जोकि अब एक स्मारक है. यहां जौय ऐडमसन रहती थीं. उन्होंने विश्वप्रसिद्ध पुस्तक ‘बौर्न फ्री’ की रचना की, जिस पर ‘बौर्न फ्री’ फिल्म बनी और लोगों के दिलोदिमाग पर छा गई.

ऐलसा नामक एक शेरनी से जाय ऐडमसन का गूढ़ स्नेह था. उस से प्रभावित हो कर उन्होंने ‘बौर्न फ्री’ की रचना की. केन्या के वन्यजीवन की रक्षा के लिए उन्होंने एक विशेष संस्था बनाई थी. वर्ष 1980 में इस महान लेखिका की हत्या हो गई थी. ऐलसामेयर को अब एक स्मारक के रूप में बदल दिया गया है. रोज शाम को इस को जनता के लिए खोल दिया जाता है.

अपनी पाठशाला के कुछ अध्यापकों तथा छात्राओं के विशेष आग्रह पर सितंबर के महीने में हम ने नायवाशा झील के भ्रमण का कार्यक्रम बनाया. केन्या वन विभाग के निदेशक मिस्टर मजाबी ने हमारे विशेष आग्रह पर विभाग की बस उपलब्ध करवा दी.

नायवाशा नकुरू टाउन से लगभग 75 किलोमीटर की दूरी पर है. 10 सितंबर, 1999 को 80 छात्राओं, 10 अध्यापकों तथा मैट्रन के साथ हम नायवाशा के लिए रवाना हुए. हम खाद्य सामग्री अपने साथ ले गए थे. बस के चलते ही मैट्रन ने सभी छात्राओं को चौकलेटें दीं. छात्राएं बहुत ही प्रसन्न थीं तथा अफ्रीकी गीत गा रही थीं.

नायवाशा पहुंचने से पहले मार्ग में गिलगिल नामक टाउन आया जोकि केन्या की सेना का एक प्रमुख अड्डा है. अनेक प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेते हुए हम नायवाशा टाउन के समीप पहुंच गए. केसीसी, जोकि दुग्ध उत्पादनों जैसे कि घी, पनीर, दही इत्यादि की एक विशाल फैक्टरी है, दृष्टिगोचर हुई. नायवाशा टाउन पहुंचने पर एक उद्यान में बैठ कर हम ने अपने साथ लाई खाद्य सामग्री का सेवन किया. झील, नायवाशा टाउन से 2 किलोमीटर दूर है.

झील के तट पर अनेक होटल व लौज हैं. लेक नायवाशा रिसौर्ट तथा लेक नायवाशा कंट्री क्लब कुछ विशेष होटल हैं, जहां पर्यटक ठहरना पसंद करते हैं. केन्या वनविभाग की बस हमें उस किनारे पर ले गई जहां जनता जा सकती है.

हम सभी इस विशाल झील की सुंदरता को देखते ही रह गए. मछुआरे अपनी नौकाओं से जाल फैलाए मछलियां पकड़ रहे थे. हम सब ने नौका विहार का आनंद लिया तथा अनेक दृश्य कैमरों में कैद किए. लगभग 1 घंटा वहां ठहरने के बाद हम ऐलसामेयर स्मारक की ओर बस में रवाना हुए. वहां पहुंचने पर वहां के मुख्य अधिकारी साइमन ने हमारा अच्छा स्वागत किया. उन्होंने हमें वे विशाल चित्र दिखाए जिन से जौय ऐडमसन के जीवन की विभिन्न झांकियां देखने को मिलीं. बौर्न फ्री फिल्म में जो बातें दिखी हैं वे प्रत्यक्ष रूप से सामने थीं. जौय ऐडमसन तथा उन के पति जौर्ज एडमसन, जो वस्तुएं प्रयोग करते थे, जैसे कि उन के बरतन, कपड़े, पुस्तकें आदि, वहां सुरक्षित रखी हैं.

अधिकारी महोदय ने छात्रों को बौर्न फ्री फिल्म का विशेष शो दिखाया. यहां से हम मिस्टर क्लाइव के गुलाबों के पुष्प उद्यान में गए जहां गुलाब के फूलों की ऐसीऐसी श्रेणियां देखीं जिन्हें दूसरे देशों को निर्यात किया जाता है.

केन्या वर्ष 1963 में ब्रिटिश साम्राज्य से स्वतंत्र हुआ था लेकिन नायवाशा जा कर ऐसा लगा कि यह अभी भी ब्रिटिश साम्राज्य में ही है. सब्जी उगाने वाले खेतों में कार्य कर रहे अंगेरज किसान तथा अनेक दुकानें तथा होटल, जिन को अंगरेज चला रहे हैं, देख कर लगा कि ब्रिटिश साम्राज्य का पूरा प्रभाव यहां आज भी विद्यमान है.

हमें माउंट लौंगोनौट पर जाना था लेकिन समयाभाव के कारण वहां नहीं जा पाए. शाम हो रही थी. झील पर मछुआरे अपनी नौकाओं में बैठे मछलियां पकड़ते दिखाई दे रहे थे. झील के पानी की लहरें ऊंची उठ रही थीं. नायवाशा की यात्रा अत्यंत आनंदपूर्ण थी जो भूले नहीं भुलाई जा सकती.

साथी हाथ बढ़ाना

कामकाजी महिलाओं की संख्या हर दिन बढ़ रही है और बढ़ती ही जाएगी. यह शुभ संकेत है पर महिला के शिक्षित और सुदृढ़ होने पर खुशी कहां अकेली आती है? अपने साथ कुछ मुसीबतें भी तो ले आती है. कामकाजी महिला घरबाहर के सारे काम संभालती है, फिर भी यही सुनती है कि तुम करती क्या हो? काम करती हो तो इतना जताती क्यों हो? क्या सिर्फ तुम ही काम करती हो? आजकल तो सब औरतें काम करती हैं, फिर इतना हल्ला क्यों?

कामकाजी महिलाएं घरबाहर, बच्चों की परवरिश से जुड़े कई मोरचे संभालती हैं, पर तब उतनी ही दुखी भी हो जाती हैं जब उन्हें सहयोग और प्रशंसा नहीं मिलती. उन्हें सहयोग, प्रशंसा की जगह ताने क्यों सुनने पड़ते हैं? पति सहयोगी क्यों नहीं हो पाते? यदि वह अकेली है, तो यह दर्द और भी बढ़ जाता है.

इस की जगह कुछ महिलाएं ऐसी भी हैं, जिन्हें सहयोग, समर्थन ज्यादा मिलता है. क्या कारण और तरीके हैं, जो इस समस्या को सुलझा कर सुकून दे सकते हैं?

विवाह की शुरुआत सतरंगी होती है. वह समय है अपनेआप को स्थापित करने का. आप आगे की सोच कर यदि अभी से पति को भी घरबाहर के कामों में शामिल करेंगी, तो उन्हें भी इस की आदत हो जाएगी. पर सावधान, इस समय की पतिभक्ति उन्हें कहीं नवाब न बना दे. जैसाकि सपना ने किया. पति नेवी में औफिसर हैं. वह खुद कालेज में लैक्चरर है. एक बार जब पति बाहर से आए तो सपना बीमार हो गई. सुबह की चाय पति ने बना कर दी. बहुत स्वाभाविक और सही था, पर सपना की प्रतिक्रिया थी कि आज तक मैं ने इन से घर का कोई काम नहीं करवाया. इन की जूठी थाली भी हमेशा मैं ने ही उठाई है. आज जब इन्होंने मुझे चाय दी तो मैं ने मन ही मन कुदरत से कहा कि ऐसा दिन मत दिखाना कि मेरे पति को काम करना पड़े. मुझे हमेशा स्वस्थ रखना.

यह रुख गलत था. फिर वही हुआ जो हमेशा से होता आया है. पहला बच्चा होने के बाद जब पति अधिकतर बाहर रहते, तो सारे काम उसे खुद ही करने पड़ते. तब वह चिढ़ने लगी. अब कहती है कि इन्हें मेरी जरा भी चिंता नहीं है.

अब पति को बदलना आसान नहीं है. जब वक्त था तब वह खो दिया, इसलिए शुरू से सारे मोरचे खुद न संभालें.

‘‘मुझे आप की सहायता की जरूरत है. ये सब मैं अकेली नहीं कर पाऊंगी,’’ ऐसे शब्दों के साथ ही अपने जीवनसाथी का हाथ थामे रखें. उन्हें यह एहसास दिला दें कि आप को उन की जरूरत है. अब देखो शिखा का समर्पण कल उस का ही दुश्मन बन गया. शादी के बाद पति ने पहला अल्ट्रासाउंड केंद्र खोला. संघर्ष के दिनों में शिखा ने उन का बेहद साथ दिया. अपना काम, बच्चे सब कुछ संभालती गई. जैसेजैसे काम बढ़ा पति ने शिखा को यह कह कर कार खरीदवा दी कि अब तुम आराम से बच्चों को साथ ले कर काम कर लिया करना.

शुरू में तो शिखा को भी लगा पति उस का ध्यान रख रहे हैं पर जब 3 अल्ट्रासाउंड केंद्र खुल गए. पति की व्यस्तता सुबह 8 से रात के 12 बजे तक की हो गई तो अकेले सारी जिम्मेदारी उठाना शिखा को बेहद खलने लगा. अब पति का कहना था कि सारे काम तो नौकर कर देते हैं, तुम करती ही क्या हो? मुझे काम कर लेने दो. परेशान मत करो.

शिखा के लाख समझाने पर भी कि बच्चों और उसे उन के साथ की जरूरत है, वह अपने पति को नहीं बदल पाई.

बात यहीं नहीं रुकी, शिखा ने भी अपना काम बढ़ा लिया. बच्चों को कम समय देने लगी. हालात ने उस दिन जमीन पर ला पटका जब बच्चों ने कहा, ‘‘मम्मी, आप घर में आती हो, तो बहुत परेशान कर देती हो. नैट बंद करो, टीवी की आवाज कम करो. आप कमरे से बाहर चली जाओ.’’

यह सब सुन कर शिखा रो पड़ी कि उस का कियाधरा सब धूल में मिल गया.

जब शिखा ने पति को यह सब बताया तो उन्हें अपनी भूल समझ में आई. अभी हालात संभालने को वक्त था. उस दिन से उन दोनों ने बच्चों को समय देना शुरू किया. बच्चे छोटे थे, इसलिए सब कुछ संभल गया. यदि बच्चे बड़े होते तो शायद स्थिति को संभालना आसान न होता.

सब को साथ ले कर चलें

पूरे विश्व में यह साबित हो चुका है कि महिलाएं बेहतर मैनेजर होती हैं. घर हो या बाहर उन्हें यह दक्षता विरासत में ही मिली होती है. छुट्टी के दिन काम का बंटवारा करें. सुनीता के पति छुट्टी के दिन सुबह का नाश्ता बनाते हैं. बच्चे भी उन की सहायता करते हैं. परिवार का साथ और मिल कर काम करना सुनीता की छुट्टी को सुंदर बना देता है. बच्चों को भी पिता का साथ अच्छा लगता है. सब को कमरे में जाजा कर हाथ में खाना देने की जगह सब को साथ ले कर चलें. रास्ते रंगीन और आसान लगने लगेंगे.

खुद को नजरअंदाज न करें

यदि आप कामकाजी हैं, तो दिन घड़ी की सुइयों के साथ चलने लगता है. सुबह की चाय से रात को दही जमाने तक का रूटीन बेहद थका देता है. ये सब करतेकरते आप अपने स्वास्थ्य को नजरअंदाज न करें.

जो खुद की कद्र नहीं करते उन की कद्र  दूसरे भी नहीं करते हैं. इस व्यस्त दिनचर्या में से पति या परिवार को आप की भी चिंता है, ऐसा माहौल बनने दें. ऐसा न करने पर कई बार कोई गंभीर बीमारी हमारे अंदर पल रही होती है. जब तक हम जागते हैं तब तक देर हो चुकी होती है. ब्रैस्ट कैंसर के अधिकतर केसों में ऐसा ही होता है.

विभा को सिर में बेहद दर्द होता था. कोई भी पेन किलर खा कर वह अपना काम चला लेती थी. पति शुरू में कहते थे कि चलो विभा जांच करवा लेते हैं, पर हर बार विभा टाल जाती कि फिर कभी देखेंगे. अभी नहीं जा सकते. उस के बाद पति ने भी कहना छोड़ दिया. फिर एक दिन जब विभा की हालत बहुत बिगड़ गई और उसे अस्पताल में भरती करवाना पड़ा तब पता चला कि उसे ब्रेन ट्यूमर है.

यदि अकेली हैं तो

अकेले होने पर आप की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है. एक तो सारे मोरचे आप को ही संभालने होते हैं, दूसरा बच्चे को पिता की कमी भी खलती है उसे भी पूरा करना होता है. इस के लिए जरूरी है आप का बेहद चौकन्ना होना, धैर्यवान होना. घरबाहर, बच्चों के स्कूल, पढ़ाई, बिजली का बिल हो या डाक्टर के पास जाना सब कुछ अब आप को ही देखना है. जरूरत है बच्चों को अपना दोस्त बनाने की, उन से बात करते रहने की और एक स्वस्थ व मजबूत रिश्ता बनाने की, जिसे जमाने की आंधी से आप बचा सकें. बेशक, आप को सुनने और समझने वाला कोई नहीं है, फिर भी धीरेधीरे बच्चे ही आप के हमदर्द बनेंगे.

शारदा के साथ ऐसा नहीं हो सका. शादी के 1 साल बाद पति से अलगाव हो गया. शारदा एक बेहद अनुशासित जीवन जीने वाली महिला थी. बेटे रवि को भी उसी अनुशासन के घेरे में बड़ा होना पड़ा. वह न तो अपनी पसंद से अपना कैरियर चुन सका न गाने का शौक पूरा कर सका. ऐसे ही जब वह 24 साल का हुआ, तो एक बार पिता की तरफ से संदेशा आया कि तुम यहां आ कर मेरे साथ मेरा काम संभाल सकते हो. रवि पिता के पास चला गया. उस ने मां को भी बहुत समझाया पर वे नहीं मानीं. आज वे अकेली हैं. अपनेआप को बहुत हारा हुआ महसूस करती हैं.

शारदा की जगह छवि ने अपनी इकलौती बेटी को अकेले ही पाला. आज मांबेटी की दोस्ती एक मिसाल है.

अपने बच्चों को घरबाहर के काम में सहयोगी बनाएं. आज जो कमी आप ने महसूस की उसे कल को आप के बच्चे महसूस न करें. जीवन हम सब को अलगअलग चुनौतियां देता है. जो मिला है उसे कैसे बेहतर बनाना है, यह सोच ही सफल जीवन का राज है. हमारे आसपास कई उदाहरण हैं. जरूरत है पैनी निगाह की, जीवन को थाम लेने की चाह की और यदि वह चाह है तो साथी हाथ जरूर बढ़ा देगा, जीवनसाथी के या फिर अपने बच्चे के रूप में.      

– सीमा जैन

इन्हें भी होता है दर्द का एहसास

‘द इंटरनैशनल ऐसोसिएशन फौर द स्टडी औफ पेन’ दर्द को कुछ इस तरह परिभाषित करता है- दर्द एक किस्म का ऐसा अप्रिय एहसास व आवेश है, जो हमारे मौजूदा उतकों को ही नहीं, बल्कि नए तैयार होने वाले उतकों को भी नष्ट कर देता है. भले ही इस एहसास को जबानी बता पाना संभव न हो, लेकिन दर्द के एहसास को नकारा नहीं जा सकता.

अकसर यह सवाल पूछा जाता रहा है कि क्या मछलियों को दर्द होता है? यह भी मान लिया गया है कि जीवजंतुओं में भी दर्द सहने की क्षमता होती है, पर उन में इस से जूझने का तरीका इनसानों से जरा अलग होता है.

विक्टोरिया ब्रिथबेट ने अपनी किताब ‘डू फिश फील पेन’ में वैज्ञानिक प्रमाण दे कर बताया है कि मछलियां होशियार और मानसिक तौर पर बड़ी सक्षम होती हैं. सैकड़ों अध्ययनों में यही एक बात सामने आई है कि मछलियां बड़ी बुद्धिमान होती हैं और उन की याददाश्त अचूक और लंबे समय तक तरोताजा रहती है. प्रवासी सलमन की याददाश्त तो पूरा जीवन बनी रहती है. हां, इतना जरूर है कि मछलियां चीख नहीं सकतीं, जब वे कांटों में फंसाती हैं या फंस जाती हैं, तो जो तकलीफ उन्हें होती है वह उन के बरताव से जरूर नजर आ जाती है, बशर्ते हम देखना चाहें. मछलियों की इंद्रियां हमारी सभी इंद्रियों से अधिक संवेदी होती हैं.

दर्द का एहसास

मछलियों में इनसानों से कहीं ज्यादा इंद्रियां होती हैं. एक पतली पार्श्व रेखा जैसी विशेष संवेदी रिसैप्टर्स या अभिग्राहिकाएं पूरे शरीर तक जाती हैं, जो उन्हें अपने आसपास की वस्तुओं का एहसास कराती हैं.

ब्लाइंड कैव फिश, जो मैक्सिको में समुद्र के नीचे कंदराओं में रहती हैं, इन का इस्तेमाल देखने के लिए करती हैं. इलैक्ट्रिक ईल, जिस की पूंछ के अंत में एक विशेष अंग होता है, जो इस के शिकार को बेकायदा करने के लिए बिजली के झटके देता है. नाइफ फिश या ऐलिफैंट नोज फिश संप्रेषण के लिए एक हलका इलैक्ट्रिक सिगनल भेजती है.

मछलियों के मस्तिष्क के भी 3 हिस्से होते हैं- अग्र मस्तिष्क, मध्य मस्तिष्क और पश्व मस्तिष्क. हालांकि मछलियों में नियोकोर्टैक्स नहीं होता है. यही एक चीज है जो इस बहस में मुख्य भूमिका अदा करती है. यहां तक कि जो यह कहते हैं कि मछलियों में दर्द का एहसास नहीं होता है, वे भी मानते हैं कि जीवजंतुओं में भावनाओं के एहसास के मामलें में नियोकोर्टैक्स अहम भूमिका अदा करता है. एमआरआई दिखाता है कि नियोकोर्टैक्स मस्तिष्क का हिस्सा है. दर्द में यह सक्रिय हो जाता है. मस्तिष्क के दूसरे हिस्से भी सक्रीय हो जाते हैं और अपनाअपना काम करने लगते हैं.

इनसानों की तरह अनुभूति

डा. इऐन डंकन कहते हैं कि हम लोगों को इन का बरताव और शरीर विज्ञान भी देखना पड़ता है, न केवल शारीरिक संरचना. मस्तिष्क में संभावना होती है कि यह दूसरी तरह से भी काम करने में विकसित हो जाए. मछलियों के मामले में यही होता है. दर्द के मामले में इन के मस्तिष्क का वह हिस्सा उसी तरह से विकसित हो गया है.

मछलियों जैसे विकसित मेरुदंड जीवजंतुओं के पास ऐंडोर्फिन जैसा न्यूरोट्रांसमीटर होता है, जो दर्द में राहत दिलाता है. शोधकर्ताओं ने दर्द अभिग्राहिकाओं के साथ उन हिस्सों का भी एक विस्तृत नक्शा तैयार किया है, जहां मछलियां पकड़ने का कांटा जा कर फंसता है.

डा. स्टेफिन यूई लिखते हैं, ‘‘दर्द में अनुकूलन का भी क्रमिक विकास होता है, जो जीव की जिंदा रहने में मदद करता है. दर्द की अनुभूति जैसी खासीयत किसी विशेष वर्ग के जीवों में एकदम से गायब नहीं हो जाती है.’’

नोसिस्पेटर एक संवेदी तांत्रिका कोशिका होती है, जो क्षतिग्रस्त होने पर या क्षतिग्रस्त होने की संभावना होने पर प्रतिक्रियास्वरूप उत्तेजना व उद्दीपन को मेरुदंड और मस्तिष्क में संकेत के जरीए भेजने लगती है. इस से दर्द की अनुभूति होने लगती है. (लैटिन में नोसी का अर्थ दर्द है.) नोसिस्पेटर स्तनधारियों में जैसे काम करता है, मछलियों में भी उसी तरह काम करता है और यह ताप, दबाव और ऐसिड व मधुमक्खी के डंक के जहर जैसे हानिकारक रासायनिक के संपर्क में आने पर प्रतिक्रिया करता है.

अन्य जीवों की तरह अनुभूति

फिजियोलौजिस्ट लेने स्नेडोन के एक अध्ययन को 2004 में प्रकाशित किया. यह अध्ययन कहता है कि मछलियां पीड़ा का पता लगा लेती हैं और इस का एहसास भी उन्हें होता है. स्नेडोन ने मानव जैसे स्तनधारी समेत उभयचर और पक्षियों के साथ 58 पीड़ा अभिग्राहिकाओं की खोज की है, जो नोसिस्पेटर के नाम से जाने जाते हैं. ऐसी अभिग्राहिकाएं ट्राउट नामक मछली के मुंह और उभयचरों, पक्षियों व इनसान जैसे स्तनधारियों के होंठों में एकसमान होती हैं. मधुमक्खी के डंक के जहर या ऐसिटिक ऐसिड जैसे रासायनिक के संपर्क में आने पर वे भी अन्य जीवों की तरह ही बरताव करती हैं. वे अपनी नाक को पत्थर से रगड़ती हैं या अपने पूरे शरीर को झकझोरती हैं. मछलियों का बरताव ठीक उसी तरह होता है जैसाकि किसी अन्य विकसित मेरूदंड वाले स्तनधारियों में देखा जा सकता है. ऐसी स्थिति में राहत देने के लिए मौर्फिन सक्रीय हो उठता है.

सोचने समझने की क्षमता

स्वभाव से ट्राउट नियोफोबिक होते हैं यानी वे किसी भी नई चीज से दूरी बना कर चलते हैं. लेकिन अगर उन्हें इंजैक्शन के जरीए ऐसिटिक ऐसिड दिया जाए तो उन में ऐसिड की तकलीफ में भी कोई प्रतिक्रिया दिखाईर् नहीं देगी और वे फिश टैंक में डाली गई किसी भी रंगीन व चमकदार चीज से दूरी बनाने के बदले उस के पास से हो कर गुजर जाएंगे. उन का ध्यान किसी रंगीन व चमकदार चीज पर नहीं जाएगा. इस के विपरीत ट्राउट को स्लाइन का इंजैक्शन दिया जाता है या फिर ऐसिड के बाद दर्दनिवारक दिया जाए तो वे अपने स्वभाव के अनुरूप सावधानीपूर्वक उस नई चीज से बच कर निकल जाएंगे. ऐसा ही बरताव हम इनसानों में भी देखते हैं, खासकर ऐसे मरीज में, जो किसी बीमारी के कारण पीड़ा की स्थिति से गुजर रहा हो. ऐसा इसलिए होता है कि दर्द हमारी स्वाभाविक सोचनेसमझने की क्षमता को प्रभावित करता है.

नौर्वे की पुरड्यू यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का मानना है कि गोल्डफिशेज पूरे होशोहवास में दर्द को महसूस करती हैं. इन्हें स्लाइन के घोल का इंजैक्शन दिए जाने पर या परीक्षण टैंक में गरम पानी के संपर्क में आने के बाद इन्हें फिर से इन के अपने टैंक में डाल दिए जाने पर ये एक ही जगह मंडराने लगती हैं. इस का अर्थ यह हुआ कि डर व भय की स्थिति में बच कर चलने का बरताव तर्कसंगत है, बेबसी नहीं.

खूनी खेल की तरह

अन्य प्रजाति की मछलियों को मौर्फिन का इंजैक्शन दिए जाने पर उन में भयभीत होने का बरताव नहीं दिखता. क्वींस यूनिवर्सिटी बेलफास्ट में हुए एक अध्ययन ने यह साबित कर दिया है कि अन्य जीवजंतुओं की तरह मछलियां भी दर्द से बचना जानती हैं. वे उन जगहों में जाने से बचती हैं, जहां उन्हें चोट पहुंची हो. वे एक गलती को फिर नहीं दोहराती हैं. उन की याददाश्त अच्छी होती है और इसलिए स्थिति के अनुरूप अपने बरताव में बदलाव लाती हैं.

एफएडब्ल्यूसी की 2014 की रिपोर्ट कहती है कि मछलियों में नुकसानदायक उद्दीपन को पहचानने और उस के प्रति प्रतिक्रिया देने की क्षमता होती है. मछलियों में दर्द का एहसास होता है इस बारे में वैज्ञानिकों के बीच आम सहमति बनाने की दिशा में एफएडब्ल्यूसी उन्हें सपोर्ट भी करता है.

मछलियां पकड़ना क्रूरतापूर्ण खूनी खेल से ज्यादा कुछ नहीं है. जब मछलियों को कांटे में फंसाया जाता है या पानी से बाहर निकाला जाता है तो यह उन के लिए कोई खेल नहीं होता है. वे भयभीत हो जाती हैं, उन्हें तकलीफ होती है और जिंदा रहने के लिए तड़पती हैं.

क्रूर तरीका

नौर्थ कोरोलिना यूनिवर्सिटी में ऐक्वाटिक (जलक्रीड़ा), वन्य जीवन और प्राणीशास्त्र औषधि के जानकार प्रोफैसर माइकल स्टोजकोफ कहते हैं कि यह मानना बहुत बड़ी भूल है कि मछलियों को इन स्थितियों में दर्द नहीं होता. शोधकर्ता डा. कुलम ब्राउन कहते हैं कि मछलियों सहित अन्य जीवजंतुओं के लिए पूरे होशोहवास में दर्द को महसूस करने की क्षमता के बगैर जीवित रह पाना अंसभव है. हम इनसानों द्वारा यह मान लेना कि मछलियां विलक्षण होती हैं और इसलिए उन्हें दर्द का एहसास नहीं होता अपनेआप में क्रूरता ही कहा जाएगा.

यकीनन बिजली का झटका इनसानों या किसी भी स्तनधारी के लिए बहुत दर्दनाक होता है. लेकिन टोडफिश पर इस का क्या असर होता है, जानने के लिए एक प्रयोग किए जाने पर पाया गया कि  जबजब बिजली का झटका दिया गया, तबतब टोडफिश कराहने लगती है. एक समय के बाद इलैक्ट्रोड को देखने भर से वह कराहने लगती है. इस से यह साबित होता है कि इनसानों की तरह मछलियां भी दर्द के प्रति क्रियाशील होती हैं और दर्द का एहसास उन के बरताव में साफ तौर पर दिखाई पड़ता है.

पीटर सिंगर कहते हैं कि मछलियों के लिए किसी कसाईघर की जरूरत नहीं होती. ज्यादातर जगहों में समुद्र व नदियों से वे पकड़ी जाती हैं और मार दी जाती हैं. ट्रोलर जाल फैलाने पर मछलियां उस में फंस जाती हैं. जाल को पानी से निकाल कर जहाज में इन का ढेर लगा दिया जाता है, जहां वे छटपटाती दम घुटने से मर जाती हैं.

सवाल है कि बगैर पीड़ा पहुंचाए क्या हमारा ग्रह जिंदा नहीं रह सकता? जिस हवा में हम सांस लेते हैं उस में क्रूरता और हिंसा कूटकूट कर भरी पड़ी है. हमारे आसपास क्रूरता का प्रदूषित वातावरण एक काले कफन की तरह लटका है. अगर मैं कहूं कि जीवजंतुओं को इस कदर तकलीफ पहुंचा कर हम खुद को ही दुखी कर रहे हैं, तो इस में किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए.

टी ट्री ऑयल निखारे खूबसूरती

आप अपने चेहरे की रंगत निखारने और बालों की खूबसूरती के लिए क्या क्या नहीं करती. पर क्या आपने टी ट्री ऑयल ट्राई किया है? टी ट्री ऑयल लगाने के कई फायदे हैं. इससे न सिर्फ आपके चेहरे की खूबसूरती बढ़ेगी, पर आपके बालों की भी खूबसूरती बढ़ेगी. टी ट्री ऑयल में ऐंटी-फंगल, ऐंटी-बैक्टीरियल और ऐंटी-माइक्रोबायल गुण होते हैं, जो कई तरह के स्किन और स्कैल्प इन्फेक्शन से निजात दिलाते हैं.

स्किन की ड्राईनेस को कहें बाय-बाय

अगर आप भी अपनी रूखी त्वचा से परेशान हैं तो टी ट्री ऑयल जरूर लगायें. आपकी रूखी त्वचा बन जाएगी कोमल. टी ट्री ऑयल को बादाम तेल के साथ मिलाकर नहाने से पहले पूरे शरीर पर लगाएं. रोजाना ऐसा करने से आपको रूखी त्वचा से छुटकारा मिलेगा.

बढ़ायें नाखूनों की खूबसरती

टी-ट्री ऑयल के रेगुलर इस्तेमाल से आप हर तरह के नेल इंफेक्शन्स से छुटकारा पा सकती हैं. इसके इस्तेमाल से आपके नाखून मजबूत और चमकदार बनेंगे.

अब नहीं सतायेंगे ऐक्ने

टी ट्री ऑयल ऐक्ने की समस्या से निजात दिलाने का प्राकृतिक उपाय है. रात को सोने से पहले ड्रॉपर से ऐक्ने पर टी ट्री ऑयल लगायें.  धीरे-धीरे एक्ने हल्के होने लगेंगे, क्योंकि टी ट्री ऑयल जर्म्स और इन्फेक्शंस से लड़ता है.

बालों को बनायें लंबे और मजबूत

टी ट्री ऑयल आपके बालों को जड़ से मजबूत बनाता है. इसके साथ ही ये आपके बालों की लंबाई भी बढ़ाता है. इसे सीधे बालों पर न लगाएं, बल्कि लगाने से पहले किसी बेस तेल के साथ मिलाएं. शुरू में आपके स्कैल्प पर हल्की जलन महसूस होगी पर धीरे-धीरे यह जलन ठीक हो जाएगी.

हेयर कलर ऐंड ऐक्सैसरीज

आजकल ब्राइड्स अपनी हेयरस्टाइल के साथ नए नए प्रयोग करती हैं. जहां कुछ दुलहनें बालों को कलर या हाइलाइट करवाना पसंद करती हैं, वहीं कुछ बालों को ऐक्सैसरीज के द्वारा अलग लुक देना चाहती हैं.

आइए, जानते हैं कि किस तरह की ऐक्सैसरीज ब्राइड को परफैक्ट लुक देगी और बालों को कलर करवाने वाली दुलहनों को किस तरह की सावधानियां बरतनी चाहिए.

हेयर ऐक्सैसरीज

हेयर ऐक्सैसरीज से ब्राइडल हेयरस्टाइल काफी ग्लैमरस और ज्वैलसीफाई लगती है. अगर ब्राइडल हेयर ऐक्सैसरीज की बात करें तो बीडेड चेन, ग्लिटरिंग हेयरबैंड्स, ज्वैल्ड पिन्स, मांगटीका और झूमर जैसे अनेक औप्शन मौजूद हैं.

बीडेड चेन्स

ये पर्ल्स और स्टोंस दोनों की हो सकती हैं, जिन्हें हेयर बन के साथ कैरी किया जा सकता है.

झूमर

झूमर पर्ल और स्टोन दोनों में स्टाइलिश लगते हैं. ब्राइड अगर चाहे तो गोल्डन ज्वैलरी के साथ कलरफुल झूमर भी कैरी कर सकती हैं.

मांगटीका

किसी भी इंडियन ब्राइड को परफैक्ट लुक देने में मांगटीका महत्त्वपूर्ण रोल अदा करता है. मार्केट में कुंदन, क्रिस्टल, पर्ल, स्टोन मांगटीका की बहुत वैरायटी उपलब्ध हैं. अपने आउटफिट के साथ मैच कर के कोई भी ब्राइड स्टाइलिश और ग्लैमरस लुक पा सकती है.

टियारा

यह किसी भी ब्राइड को प्रिंसेस लुक देता है. यह फूलों से ले कर स्टोन, पर्ल किसी का भी हो सकता है.

हेयर कलर के बाद सावधानियां

हेयर कलर कराना आसान होता है, लेकिन अगर सही देखभाल न की जाए तो कलर जल्दी हटने लगता है, इसलिए अच्छी क्वालिटी का कलर प्रिवैंट शैंपू का इस्तेमाल करें. यह कलर को जल्दी हलका होने से रोकता है. कभी कलर्ड बालों में हार्श शैंपू का इस्तेमाल न करें और न ही ऐंटीडैंड्रफ शैंपू चुनें.

कलर किए बालों में कोई भी कंडीशनर न लगाएं. कलर किए बालों के लिए खास बना कंडीशनर ही लगाएं.

कलर किए बालों के लिए तेल जरूरी होता है. ध्यान रहे तेल सिर्फ बालों में ही न लगाएं, बल्कि जड़ों में भी लगाएं.

हेयर मास्क का इस्तेमाल करें. ये बालों को सौफ्ट बनाते हैं.

हेयर स्पा जरूर लें. यह बालों में ड्राईनैस की समस्या को दूर करता है.

कलर किए बालों को तेज धूप से बचाएं.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें