जब अवॉर्ड के लिए ऋषि ने दिए थे 30 हजार रूपए

अपनी जिंदगी पर लिखी गई किताब ‘खुल्लम खुल्ला- ऋषि कपूर अनसेन्सर्ड’ के विमोचन के मौके पर अभिनेता ऋषि कपूर ने कई सनसनीखेज खुलासा किया है. नाम से ही स्पष्ट है कि किताब में ऋषि ने कुछ ज्यादा ही खुलकर बातें लिखीं हैं. बता दें, किताब में उन्होंने अपने पिता राजकपूर के अफेयर से लेकर अपने बेटे तक किसी को नहीं छोड़ा है.

अवॉर्ड के लिए दिए 30 हजार रूपए

ऋषि कपूर ने ये बताकर सभी को चौंका दिया है कि उन्होंने फिल्म ‘बॉबी’ के लिए अवॉर्ड पाने की चाहत में 30 हजार रुपये दिए थे. उन्होंने कहा, ‘एक शख्स मेरे पास आया और मुझसे बोला कि तुम इतने पैसे दे दो तो मैं तुम्हें अवॉर्ड दिला दूंगा. मैं तैयार हो गय. लेकिन ये एक धोखे का खेल भी हो सकता था. मैं ये नहीं मान रहा कि वो पैसा किसी के हाथ में गया और अवॉर्ड फिक्स हुआ. हमें ये सोचना चाहिए कि वो फिक्स नहीं था. लेकिन मैंने पैसे दिए थे और मुझे अवॉर्ड मिला. इसलिए मैं यही सोचता हूं कि मुझे अवॉर्ड मिला क्योंकि मैंने पैसे दिए थे.’

अमिताभ की वजह से करना पड़ा संघर्ष

क्या आपको पता है अमिताभ बच्चन की वजह से ऋषि कपूर को संघर्ष करना पड़ा. जब खुल्लम खुल्ला बातें हो रही थीं तो ऋषि कपूर ने भी खुल्लम खुल्ला ये कबूल किया. ऋषि कपूर ने कहा, ‘मैं रोमांटिक फिल्म के साथ आया था. उसी साल जंजीर के जरिए एंग्री यंग मैन के तौर पर अमिताभ छा गए. उन्होंने सारी तस्वीर बदल कर रख दी. उस वक्त हर हीरो एक्शन हीरो हो गया था. ऐसा लगता था कि मैं पानी में फेंक दिया गया हूं और मुझे अपनी जान बचानी थी नहीं तो मैं मर जाता. कोई संगीत वाली फिल्में नहीं देखना चाहता था. सब एक्शन हीरो को ही देखना चाहते थे. उसके बाद से मैं पूरी जिंदगी संघर्ष करता रहा.’

ऐसे कई सवाल और ऐसी कई बाते हैं जो शायद ऋषि कपूर के फैंस नहीं जानते होंगे. लेकिन ऋषि कपूर की आत्मकथा के जरिए ऋषि कपूर की जिंदगी के अनछुए पहलुओं को जानने का आपको मौका मिल सकता है.

हीरो के तौर पर ऋषि कपूर ने 1973 में आई अपने पिता राज कपूर की फिल्म बॉबी से करियर की शुरुआत की. आज भी ऋषि कपूर लीक से हटकर भूमिकाएं कर रहे हैं. अग्निपथ हो या कपूर एंड संस उनकी भूमिकाएं छाप छोड़ती हैं. ऋषि कपूर की आत्मकथा में उनके बचपन से लेकर आज तक के बारे में सब कुछ खुल्लम खुल्ला मिलेगा. इस किताब को मीना अय्यर ने ऋषि कपूर के साथ लिखा है.

असल जिंदगी पर बनीं इन फिल्मों को देखा है आपने!

बॉलीवुड में कई फिल्में ऐसी हैं, जो असल जिंदगी पर आधारित हैं. ऐसी फिल्में अमूमन अच्छा कारोबार भी करती हैं.

इस साल रिलीज हो रही फिल्म ‘रईस’ भी गुजरात के गैंगस्टर अब्दुल लतिफ से प्रेरित है. अब्दुल पर शराब के अवैध कारोबार का आरोप है. फिल्म में रईस आलम बनें शाहरुख खान का किरदार अंडरवर्ल्ड डॉन अब्दुल लतिफ से प्रेरित है.

यह पहला मौका नहीं है जब बॉलीवुड में किसी डॉन माफिया को उपर कोई फिल्म बनी होगी. गौरतलब है की बॉलीवुड में ऐसी भी फिल्में हैं, जो रियल लाइफ विलेन को पर्दे पर हीरो दिखाती हैं. आइए देखते हैं ऐसी ही कुछ फिल्में जो रियल लाइफ विलेन से प्रेरित हैं.

बैंडिट क्वीन

डकैत फूलन देवी के जीवन पर आधारित इस फिल्म में सीमा बिस्वास मुख्य किरदार में है. शेखर कपूर की इस को सर्वश्रेष्ठ फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ट फिल्म और सर्वश्रेष्ठ निर्दशन का भी पुरस्कार मिला था.

पान सिंह तोमर

एक सैनिक और एथलीट से बाघी डकैत बने पान सिंह तोमर के जीवन पर आधारित यह फिल्म बेहद शानदार है. तिग्मांशु धुलिया की इस फिल्म में इरफान खान मुख्य भूमिका में हैं. नेश्नल गेम्स में गोल्ड जीतने वाले पान सिंह तोमर की फिल्म को भी नेश्नल अवॉर्ड मिला.

शूटआउट एट लोखंडवाला

शूटआउट एट लोखंडवाला एटीएस के चीफ ए. ए. खान की कहानी है जो 16 नवंबर 1991 को 400 पुलिसकर्मियों के साथ लोखंडवाला कॉम्प्लैक्स में एक कुख्यात गैंगस्टर माया दोलास का एंकाउंटर करते हैं. अपूर्व लाखिया की इस फिल्म में विलेन ही असली हीरो हैं.

स्पेशल 26

नीरज पांडे की इस फिल्म की कहानी कुख्यात ओपेरा हाउस में की गई चोरी पर आधारित है. नकली सीबीआई बन कर कैसे एक शख्स मशहूर ज्वेलरी वाले को करोड़ों को चूना लगा कर चंपत हो जाते हैं. फिल्म टिकट खिड़की पर भी खूब चली.

वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई

मिलन लथूरिया की यह फिल्म मुंबई अंडरवर्ल्ड की दुनिया को बेहद करीब से दिखाती है. हाजी मस्तान और दाउद इब्राहिम के जीवन पर बनी इस फिल्म ने अंडरवर्ल्ड की काली दुनिया पर राज करने वाले डॉन की अच्छाई और उसूलों को दर्शाया था. फिल्म बेहद सफल रही थी.

शूटआउट एट वडाला

2013 में आई संजय गुप्ता की यह फिल्म देश में पहले दर्ज एंकाउटर पर आधारित है. मुंबई पुलिस ने सबसा पहला एंकाउंटर मान्या सुर्वे का डॉं अंबेडकर कॉलेज, वडाला में जनवरी 11, 1982 को किया था. फिल्म काफी हिट रही थी.

रक्त चरित्र

आंध्र प्रदेश के राजनेता के जीवन पर बनी इस फिल्म में विवेक ऑबेरॉय मुख्य किरदार में हैं. एक नेता की असल जिंदगी में तमाम-उतार चढ़ाव और सत्ता तक पहुंचने की उसके सफर को इस फिल्म में अच्छे ढंद से दिखाया गया है.

सिन्स

कई आपत्तिजनक सीन के चलते विनोद पांडे की इस फिल्म को सेंसर बोर्ड ने ‘ए’ सर्टिफिकेट दिया. फिल्म कैथलिक पादरी और एक महिला के प्रेम संबंध की सच्ची घटना पर आधारित हैं. फिल्म का काफी विरोध भी हुआ था. केरल के एक पादरी को एक शादीशुदा महिला के साथ अवैध संबंध और हत्या के मामले में मौत की सजा हुई थी.

ओए लक्की, लक्की ओए

‘सुपरचोर’ कहलाने वाले देवेंद्र बंटी की जिंदगी से प्रेरित इस फिल्म को लोगों ने काफी पसंद किया. एक चोर अपने शातिर दिमाग से कैसे लोगों और पुलिस वालों को बेवकूफ बना सकता है. अमीर लोगों के घरों से गाड़ियां, गहने, टीवी, म्युजिक सिस्टम के साथ यह चोर पालतू जानवरों को भी चुरा सकता है.

डर्टी पॉलिटिक्स

राजस्थान के कुख्यात भंवरी देवी मर्डर केस पर बनी इस फिल्म को दर्शकों ने कोई खास तवज्जो नहीं दी. राजनैतिक दबावों के चलते फिल्म ने रिलीज से पहले ही दम तोड़ दिया और फिल्म असलियत से भटक गई. कमजोर स्क्रिप्ट के कारण फिल्म फ्लॉप रही.

आपने लेडी ट्रेनर के साथ सुशांत का ये वीडियो देखा?

अभी हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘एम एस धोनी द अनटोल्ड स्टोरी’ में अपनी दमदार एक्टिंग से सुर्खियां बटोरने वाले सुशांत सिंह राजपूत अब जल्द ही अपनी नई फिल्म ‘राबता’ लेकर आने वाले हैं. फिल्म ‘राबता’ में उनके साथ खूबसूरत अभिनेत्री जैकलिन फर्नांडिस भी होगीं.

धोनी की बायोपिक सुपरहिट होने के बाद सुशांत ने अपनी फीस बढ़ा दी है. इन दिनों सुशांत अपनी आने वाली फिल्म के लिए वो काफी मेहनत भी कर रहे हैं. माना जा रहा है कि वो जल्दी ही एक और नई बायोपिक में नजर आने वाले हैं.

पैरालंपिक मेडलिस्ट मुरलीकांत पेटकर पर बनने वाली फिल्म में सुशांत को जल्द ही देखा जाएगा. फिलहाल फिल्म की शूटिंग शुरू नहीं हुई है. वैसे अभी हाल ही में सुशांत ने अपने इन्स्टाग्राम अकाउंट से एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें वो एक फीमेल ट्रेनर के साथ दिख रहे हैं.

वीडियो में सुशांत अपनी पीठ पर भारी वजन रख कर पुश अप करते दिख रहे हैं. कैप्शन में सुशांत ने लिखा है कि अभी हम गुडनाइट नहीं कह रहे हैं. 180 एलबीएस, कोर, वार्मअप. इस वीडियो को अब तक लाखों लोगों ने देखा है. इसके साथ ही इस वीडियो पर जमकर मजेदार कमेंट भी किये जा रहे हैं.

आप भी देखें यह वीडियो.

 

We’re not saying goodnight just yet. 180 lbs , Core , warmup.

A video posted by Sushant Singh Rajput (@sushantsinghrajput) on

शादी के लिए पहले प्यार होना जरूरी: अमृता राव

भोली भाली सूरत की वजह से फैंस के दिलों में खास जगह बनाने वाली अमृता ने अपने 14 साल के फिल्मी करियर में कुल 24 फिल्में की हैं. उनका नाम उनके दादाजी अमृत के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने सुभाषचंद्र बोस के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था.

मॉडलिंग से अपना करियर शुरू करने वाली अमृता को पहला ब्रेक महज 17 साल की उम्र में मिला था. एक फेयरनैस क्रीम की मॉडलिंग के लिए 60 मौडल्स में से उन्हें चुना गया था. करीब 35 से ज्यादा कमर्शियल ऐड करने के बाद उन्हें बौलीवुड में ऐंट्री 2002 में राजकुंवर की फिल्म ‘अब के बरस’ से मिली. इस फिल्म में उन्होंने लीड रोल निभाया. उन के अपोजिट राज बब्बर के बेटे आर्य बब्बर थे.

संगीत की शौकीन अमृता की असली पहचान सूरज बड़जात्या की फिल्म ‘विवाह’ से मिली. 2011 में मोस्ट डिजायरेबल ऐक्ट्रैस की लिस्ट में शामिल हुईं अमृता ने बौलीवुड में कोई खास मुकाम हासिल न होने पर छोटे परदे का रूख कर लिया है.

पिछले दिनों मैट्रोमोनिअल साइट्स ‘लव विवाह’ के लौंच पर पहुंचीं अमृता ने अपनी शादी और छोटे परदे के अनुभवों को साझा किया. पेश हैं, कुछ चुनिंदा अंश.

आपकी शादी बहुत सीक्रेट रही?

ऐसा तो मेरा कोई सीक्रेट नहीं है, जो आप लोगों से छिपा हो. मैं और अनमोल पिछले 7 सालों से एकदूसरे को जानते थे. जब हमें लगा कि हमें अपने रिश्तों को नाम देना चाहिए तब घर वालों की मरजी से हम ने शादी कर ली. लोग कहते हैं कि शादी के बाद जीवन बदल जाता है, लेकिन मुझे तो अपनी लाइफ में कोई बदलाव नजर नहीं आता. जैसा पहले थी वैसी ही आज हूं, वही लाइफस्टाइल, वही सोच किसी में भी चेंज नहीं आया.

किसी भी शादी में प्यार का होना कितना जरूरी है?

प्यार में पड़े बगैर शादी सफल नहीं हो सकती फिर चाहे वह लव मैरिज हो या अरेंज्ड मैरिज. लव मैरिज में तो मैं मानती हूं कि दोनों एकदूसरे की पसंदनापसंद के बारे में पहले से जानते हैं. पर अरेंज्ड मैरिज में तो दोनों एकदूसरे से तब तक अनजान रहते हैं जब तक एकदूसरे को पर्याप्त समय नहीं देते.

मैं सभी अभिभावकों से कहना चाहती हूं कि अगर आप का बेटा या बेटी आप की पसंद के अनुसार शादी करने जा रही है तो शादी के समय को ले कर उस पर दबाव न डालें, बल्कि दोनों को एकदूसरे को समझने का समय दें ताकि वे समझ सकें कि उस के साथ जिंदगी की गाड़ी आसानी से दौड़ाई जा सकती है या नहीं.

शादी में मैट्रोमोनिअल साइट्स कितनी सहायक हैं?

पहले शादी एकदूसरे के बताने पर ही हो जाती थी, पर अब समय बदल गया है. करियर की तलाश में लोगों ने अपने आशियाने अलगअलग जगह बना लिए हैं. समय की कमी सभी के पास है. इसी के चलते ये वैवाहिक साइट्स बहुत फायदेमंद साबित हो रही हैं. इन में आप अपनी अपेक्षाओं के अनुसार रिश्ते की तलाश कर सकते हैं.

फिल्म ‘सत्याग्रह’ के बाद लंबे ब्रेक की क्या वजह है?

फिल्मों से दूरी जरूर हो गई थी लेकिन मैं ने ऐक्टिंग से दूरी बिलकुल नहीं बनाई. ‘सत्याग्रह’ फिल्म करने के बाद मैं फिल्मों के रूटीन से उकता गई थी. मेरी बहन प्रतिभा जो छोटे परदे की अच्छी कलाकार हैं, ने कहा कि चेंज के लिए छोटा परदा मेरे लिए बिलकुल सही जगह है. उसी समय ऐंड टीवी का शो ‘मेरी आवाज ही पहचान है’ का औफर मेरे पास आया. जब मैं ने शो की कास्ट पर नजर डाली तो दीप्ति नवल से ले कर जरीना बहाव, सलमा आगा सभी इस शो का हिस्सा थीं. मैं ने जब इतने लोगों को देखा तो तुरंत काम करने को हां कह दी.

छोटे पर्दे का कैसा अनुभव रहा?

जितना मैं सोच कर आई थी उस से बढ़ कर यहां सीखने को मिला. टीवी का शैड्यल फिल्मों से बिलकुल अलग होता है. यहां आप को ज्यादा समय अपनेआप को साबित करने के लिए दिया जाता है. आप लाखों दर्शकों के सामने रोज आते हैं. मेरा भी शो ‘डेली सोप’ था, जिस में काम कर के मुझे बहुत मजा आया. सच मानिए, छोटे परदे पर आना मेरे किसी सपने के सच होने के बराबर है.

आज के टीवी शो में क्या अभाव खलता है?

अच्छे कंटैंट का अभाव आज भी टैलीविजन शोज में देखने के मिलता है. अगर अच्छा कंटैंट हो तो शो यादगार बन जाता है. दूरदर्शन पर समाप्त होने वाला शो ‘बुनियाद’ इतने साल बीत जाने पर भी लोगों के दिलोदिमाग में बसा है. कुछ सालों से बौलीवुड के कलाकार भी छोटे परदे का रूख करने लगे हैं. इस जुगलबंदी की शुरुआत अमितजी ने बहुत पहले कर दी थी. उस के बाद कई कलाकारों ने छोटे परदे का रूख किया. क्योंकि सभी जानते हैं कि अगर दर्शकों के जेहन में जिंदा रहना है तो टीवी पर आना ही होगा. इस में सब से बड़ा योगदान टैक्नोलौजी और पब्लिसिटी का भी है. आज के टीवी शोज के बजट और निर्माण की प्रक्रिया किसी भी हाल में एक फिल्म के बजट से कम नहीं है.

आप ने हमेशा सीधी सादी घरेलू लड़की का किरदार निभाया है. क्या वास्तव में अमृता ऐसी ही हैं?

हां, मुझे ज्यादा तड़कभड़क पसंद नहीं है. निजी जिंदगी में भी मैं ऐसी ही घरेलू टाइप लड़की हूं. एक शौक जो मुझे बचपन से रहा है वह है गाने का. मेरे घर वाले फिल्मों में आने से पहले मेरे बारे में यही जानते थे कि मैं बड़ी हो कर सिंगर बनूंगी. मेरा फिल्मों में आना मेरे घर वालों को मेरा हैरान करने वाला निर्णय था. मैं जितने भी गाने गाती हूं अपने मन से गाती हूं. मुझे भावपूर्ण गाने बहुत पसंद हैं.

सूरज के साथ एक सफल फिल्म के बाद आप ने उन की दूसरी फिल्म के लिए मना क्यों कर दिया?

यह सच है कि सूरज बड़जात्या की फिल्म ‘विवाह’ से मुझे काफी लोकप्रियता मिली थी. उन की 2015 में आई फिल्म ‘प्रेम रतन धन पायो’ में जो किरदार मुझे औफर हुआ था उस के लिए मना किया था. फिल्म के लिए कभी मना नहीं किया था. मुझे सलमान खान की बहन बनने को कहा गया था, जिस में नैगेटिव और कई अलगअलग किरदार की परतें थीं. मैं अभी इतनी जल्दी नैगेटिव भूमिकाएं नहीं करना चाहती हूं.   

अमृता क्यों रहीं चर्चा में

फिल्म ‘जब वी मेट’ की शूटिंग के दौरान शाहिद कपूर और करीना कपूर के बीच हुए ब्रेकअप की वजह अमृता को बताया गया. हालांकि अमृता ने इस बात से इनकार करते हुए कहा कि यह सिर्फ अफवाह है.

2015 में जयपुर में एक ज्वैलरी के उद्घाटन से लौटते समय अमृता की वैनिटी वैन से किसी ने 7 लाख की डायमंड ज्वैलरी चुरा ली थी. इस के बाद भी अमृता ने किसी के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज नहीं कराया था.

अमृता ऐक्ट्रैस और मौडल के अलावा एक बेहतर सिंगर भी हैं. शाहिदअमृता का इश्क एक समय सुर्खियों में था. बौलीवुड ऐक्टर शाहिद कपूर के साथ फिल्मी स्क्रीन शेयर करने के बाद फैंस ने इन की जोड़ी शाहिद के साथ बना दी. इस के बाद अमृता की ज्यादातर फिल्में शाहिद के साथ आईं और वे बौक्स औफिस पर सुपरहिट भी साबित हुईं. लेकिन शाहिद के साथ अपनी रिलेशनशिप पर चुप्पी तोड़ते हुए अमृता ने कहा कि उन्होंने शाहिद को कभी डेट नहीं किया. वे शाहिद की सिर्फ एक अच्छी दोस्त और उन की कोस्टार है.

2009 में प्रियंका चोपड़ा और हरमन बावेजा के ब्रेकअप की वजह भी अमृता राव को बताया गया, जिस पर अमृता का कहना था कि दोनों का ब्रेकअप उन की अपनी मिसअंडरस्टैंडिंग की वजह से हुआ, न कि उन की वजह से.

सोने से पहले जरूर करें ये काम

आमतौर पर लोगों को लगता है कि सुबह चेहरा धो लेना, क्रीम और लोशन लगा लेना ही पर्याप्त है लेकिन ऐसा सोचना पूरी तरह गलत है. अगर आप चाहती हैं कि आपकी त्वचा हमेशा निखरी और तरोताजा बनी रहे तो रात के समय भी कुछ जरूरी बातों का ख्याल रखना चाहिए.

रात के समय थोड़ी सी मेहनत करके, सुबह आप खिली-निखरी और तरोताजा स्किन पा सकती हैं. जिस तरह दिनभर काम करने के बाद हमारे शरीर को आराम और देखभाल की जरूरत होती है, उसी तरह हमारी त्वचा को भी कुछ जरूरतें होती हैं. ये कुछ ऐसी जरूरतें है जिन्हें हर हाल में पूरा किया जाना चाहिए. अगर आप त्वचा की इन जरूरतों का ख्याल रखती हैं तो त्वचा लंबे समय तक निखरी-जवान बनी रहेगी वरना बढ़ती उम्र के लक्षण समय से पहले ही नजर आने लग जाएंगे.

रात को सोने से पहले जरूर करें ये काम

1. अगर आप मेकअप करती हैं तो रात को किसी भी हाल में मेकअप उतारे बिना सोएं नहीं. किसी अच्छे लोशन, मेकअप रिमूवर या फिर ऑयल से मेकअप साफ कर लें.

2. चेहरा धोना न भूलें. दिनभर की धूल, गंदगी, धुंआ साफ करना जरूरी है.

3. सोने से पहले मॉइश्चराइजर लगाना न भूलें. खासतौर पर सर्दियों में.

4. फेस पैक लगाना भी जरूरी है. नेचुरल फेस मास्क हो तो और बेहतर ही होगा वरना अपने स्किन टाइप के अनुसार पैक खरीद लें और लगाएं भी.

5. स्क्रब करना भी जरूरी है लेकिन हर रोज नहीं. सप्ताह में दो से तीन बार स्क्रब का इस्तेमाल जरूर करें.

6. टोनिंग करने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे त्वचा में कसावट बनी रहता है और झुर्रियां जल्दी नहीं पड़तीं.

7. त्वचा के पोषण के लिए सेरम लगाना न भूलें. प्रोटीन लोशन भी लगाना फायदेमंद रहेगा.

फैशन छोटे शहरों का

अकसर दो ढाई साल में होने वाले तबादलों के कारण सीमा इतने सारे शहरों प्रदेशों से गुजरी है कि हर बार कपड़ों को ले कर नई उलझन में पड़ जाती है कि क्या पहने और क्या नहीं? क्या आप के साथ भी ऐसा ही होता है? अगर महानगर में हैं तब तो आप बेहिचक जो चाहे पहन सकती हैं, मगर छोटे शहरों में यह देखना पड़ता है कि वहां का माहौल कैसा है. क्या अब भी घूंघट प्रथा चल रही है या महिलाओं का पल्ला सिर तक सीमित रह गया है? उसी माहौल के अनुसार अपने वार्डरोब को तैयार करना होता है वरना आप अपनेआप को सब के बीच सहज नहीं महसूस कर पातीं.

2004 में सीमा जब तबादला होने पर हरदोई, उत्तर प्रदेश पहुंची थी तब वहां सभी महिलाएं साड़ी पहने सिर ढके होती थीं व लड़कियां सूट पहनती थीं. बहुत कम किशोरियां जींस पहनती थीं और वह भी कभीकभी. आज इतने सालों में अब बहुत अंतर आ गया है.

अब वही महिलाएं लैगिंग्स और कुरतियां पहनने लगी हैं और लड़कियां जींसटौप. आज यही हाल अनूपपुर, मध्य प्रदेश का है. अब कोई हरदोई से फोन कर यहां के हालचाल पूछता है तो सीमा यही कहती है कि बिलकुल वैसा ही है जैसा 12 वर्ष पहले हरदोई था, तो पूछने वाला भी हंस पड़ता है.

क्या पहनें

यह तो सच है कि जैसा देश वैसा भेष. जब पूरे शहर में सभी महिलाएं साड़ी पहने रहती हैं, तो इस का मतलब यह नहीं कि आप भी साड़ी के अलावा कुछ नहीं पहन सकतीं, बल्कि ऐसे में साड़ी के अतिरिक्त सलवारकमीज, चूड़ीदार, लैगिंग, पैरलर आदि पहनने में झिझक न करें. एकदूसरे को देख कर इस तरह के कपड़े पहनने का जल्द ही आसपास की महिलाओं का मन भी मचलने लगता है.

यदि आप किसी शादी में जा रही हैं, तो साड़ी से बेहतर कुछ नहीं लगेगा. ऐसे में आप भी पारंपरिक रूप से तैयार हो कर सब को फैशन की टक्कर दे सकती हैं. रोज साड़ी, चूड़ीदार से सजी रहने वाली महिलाएं आप का पारंपरिक रूप देख कर दंग रह जाएंगी. लेकिन ऐसे ही मिलनेमिलाने के अवसर पर पैरलर, लैगिंक या सलवारसूट के साथ दुपट्टा लहरा सकती हैं. यदि आप को जेठ या ससुर से परदा करना है, तो अपने दुपट्टे को सिर पर अच्छी तरह ओढ़ कर पिन से फिक्स कर लें. ऐसा करने पर आप का सिर से पल्ला भी नहीं सरकेगा और आप के फैशन पर भी ऊंगली नहीं उठेगी.

यदि साड़ी से मन भर गया है, तो उत्सवों में लहंगा चोली (गुजराती वर्क मिरर और गोटे से सजी, राजस्थानी बंधेज कपड़े से बनी या कशीदाकारी से सजी राजसी वैभव वाली) जैसी भी आप को पसंद हो उसे पहन कर लुभाएं. चाहें तो रैडीमेड लहंगासाड़ी भी अपनी सुविधा के हिसाब से पहन सकती हैं.

युवतियां जींस या पैंट के साथ घुटनों तक साइज की कुरती व स्टोल पहन कर अपना शौक पूरा कर सकती हैं. यह पहनावा दूर से कुरती व लैगिंग का लुक देता है. इस से आप भीड़ से अलग भी नहीं दिखेंगी. यदि कम उम्र की युवती हैं तो लौंग स्कर्ट और शौर्ट कुरती के साथ स्टोल पहन कर तीज त्योहार में अपना अलग लुक रख सकती हैं.

यदि आप का मिनी मिडी या हौट पैंट पहनने का मन हो और आप का है संयुक्त परिवार, तो आप पति के साथ एकांत में, अपने बैडरूम में यह ड्रैस पहन इतरा सकती हैं और अगर कहीं दूसरे शहर घूमने जा रही हैं, तो वहां भी अपनी मनपसंद ड्रैस पहन सकती हैं. बस अपना फोटो सोशल मीडिया जैसे फेसबुक, व्हाट्सऐप आदि पर पोस्ट न करें, क्योंकि लौट कर तो उन्हीं लोगों के बीच आ कर रहना है. अत: बेकार में बात का बतंगड़ क्यों बनाएं.

क्या न पहनें

अब कुछ अति उत्साही महिलाएं या बहुएं ऐसे ऊटपटांग कपड़े पहन लेती हैं कि हंसी का पात्र बनती हैं. जैसे नैट की साड़ी पहन कर घूंघट निकाल के घूमती हैं. अब कोई इन से पूछे कि क्या ढका है और क्या खुला है? कुछ महिलाएं स्किन टाइट लैगिंग के साथ कुरता पहन लेती हैं, तो ऐसा दिखता है जैसे सिर्फ कुरता ही पहना है, ऐसे में बहुत ही भद्दा दृश्य उत्पन्न होता है. अत: चुस्त लैगिंग पहनते समय उस के रंग पर अवश्य ध्यान दें.

कुछ महिलाएं गाउन पहने ही घर से सब्जीभाजी लेने या फिर पड़ोसिन से गपियाती घंटों रोड पर खड़ी रहती हैं. ऐसे में वे बहुत अभद्र दिखाई देती हैं. अत: घर से बाहर निकलते समय अपनी वेशभूषा का विशेष खयाल रखें.

साड़ी अपनेआप में संपूर्ण पोशाक है, मगर इसे भी पहनने के कई तरीके हैं. साड़ी सीधे पल्ले, उलटे पल्ले या फिर किसी भी पारंपरिक तरीके से पहनी गई हो मगर उस के संग मैचिंग ब्लाउज, पेटीकोट न हो तो उस का सौंदर्य जाता रहता है. यदि सलीके से बांधी न गई हो जैसे ऊंची उठी हुई, फौल उधड़ा हुआ, पल्लू लटका हुआ हो तो वह भी बहुत बेहूदा दिखाई देता है.

यदि जींस या पैंट पहनें तो शौर्ट टौप या स्किन टाइट जींस पहनने से बचें. लौंग स्कर्ट के साथ टाइट कमीज या टीशर्ट न पहनें. छोटे शहरों में ऐसे कपड़े पहनने वाली को लोग ऐसे घूरते हैं जैसे कोई जानवर चिडि़याघर से निकल रोड पर आ गया हो. चूंकि आप किसी की मानसिकता नहीं बदल सकते, इसलिए अपना पहनावा बदल लें.

परिधान चाहे कोई भी पहनें अगर वह करीने से न पहना गया हो तो वह आप के रूप को बढ़ाने की जगह घटा देता है. कुछ महिलाओं का मानना है कि महंगे वस्त्र ही सुंदर लगते हैं, मगर ऐसा नहीं है. रोजमर्रा की पोशाक में रंग संयोजन, डिजाइन आदि का ज्यादा महत्त्व होता है बजाय मूल्य का. अत: जो भी पहनें सलीके से पहनें. उस के रंग से मिलते रंग की चूडि़यां, कड़े, बे्रसलेट, आर्टिफिशियल ज्वैलरी पहन कर आप अपने सौंदर्य में चार चांद लगा सकती हैं.

आस्था की आड़ में गुलाम बनती नारी

जन्म से ले कर मृत्यु तक न जाने कितनी बार पंडेपुजारियों द्वारा मानव को स्वर्ग और नर्क के रास्ते दिखाए जाते हैं. ‘ऐसा करोगे तो स्वर्ग में जाओगे’, ‘वैसा करोगे तो नर्क मिलेगा.’ जिन लोगों ने ये भ्रांतियां फैलाई हैं उन्हें खुद नहीं मालूम है कि वे कहां जाने वाले हैं?

आज अंधविश्वासों, मिथकों और छद्म वैज्ञानिक तथ्यों में अत्यधिक बढ़ोतरी हो रही है. आज जो मिथ्या परंपरागत रीतिरिवाज हमारी आवश्यकता के अनुकूल नहीं हैं, उन्हें भी मात्र परंपरा के नाम पर बढ़ावा दिया जा रहा है. जैसेजैसे लड़की बड़ी होती है अकसर बड़ों को कहते सुनते हैं कि फलां व्रत करने से अच्छा पति मिलेगा. यदि व्रत, पूजापाठ से ही मनभावन जीवनसाथी मिलता तो सब का जीवन सुखशांतिपूर्ण होता.

हमारे देश में अंधविश्वास अन्य देशों की तुलना में कुछ अधिक ही है, जोकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण की गैरमौजूदगी को दर्शाता है, इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण भारत की तात्कालिक आवश्यकता है. यदि हम अपने दैनिक जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखेंगे तो हम व्यक्तिगत एवं सामाजिक घटनाओं के तर्कसंगत कारणों को जान सकेंगे, जिस से असुरक्षा की भावना और निरर्थक भय से छुटकारा प्राप्त हो सकेगा.

शकुन अपशकुन की मान्यताएं

हमारे समाज में अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली कथाओं से ले कर शकुनअपशकुन की अनगिनत मान्यताएं कौओं से जुड़ी हैं. यों भारतीय समाज में कौओं को धूर्त पक्षी मानते हैं पर श्राद्धपक्ष में उन की खूब आवभगत होती है. कौआ मुंडेर पर बैठे तो मेहमान आने का संकेत माना जाता है, पर महंगाई के इस युग में अतिथि आ जाए, यह कौन चाहेगा? अब अंधविश्वास के विरोधी माने जाने वाले सिद्धारमैया को ही देख लें, कार पर कौआ बैठा तो उन के लिए वह शुभ ही सिद्ध हुआ, नई महंगी कार जो आ गई.

सूचना क्रांति के दौर में हम भले ही अंतरिक्ष और चांद पर बस्ती बसाने की सोच रहे हों, लेकिन अंधविश्वास अब भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा है. वैज्ञानिक युग के बढ़ते प्रभाव के बावजूद अंधविश्वास की जड़ें समाज से नहीं उखड़ रही हैं. अंधविश्वास को दूर करने के लिए कुछ लोग वर्षों से प्रयासरत हैं, लेकिन इन प्रयासों का अब तक कोई सार्थक परिणाम नहीं निकल पाया है. निकले भी कैसे? यहां तो सब मौकापरस्त हैं. अपने पाले में गेंद आते ही दूसरे के लिए उछाल दी जाती है.

सरकारें चुप हैं और मीडिया ऐसे ढोंगियों के प्रसार का सहयोगी. आज घरघर में टीवी तो मिल जाएगा पर ज्ञान देने वाली पत्रिकाओं का अभाव होगा. अंधविश्वास फैलाने वालों का बड़ा नैटवर्क इंटरनैट पर छाया हुआ है. लोग डाक्टर से ज्यादा ऐसे ढोंगी तांत्रिकों पर यकीन करने लगे हैं. इन बहुरुपियों की शिकार ज्यादातर महिलाएं हो रही हैं और महिलाओं के जरीए पुरुष भी इन के शिकार बन रहे हैं. विडंबना तो यह है कि जिस जादूटोने को विज्ञान मानने से इनकार करता रहा है आज उसी वैज्ञानिक तकनीक के सहारे तंत्रमंत्र का जाल बिछा हुआ है. लोगों की महत्त्वकांक्षाएं बढ़ी हैं तो फर्जी लोगों का जाल भी बढ़ रहा है. चूंकि हर हाथ में फोन है और इंटरनैट की पहुंच भी बढ़ रही है तो अंधविश्वास का कारोबार भी इसी के जरीए आप तक पहुंच रहा है.

गलत परंपरा

हालत यह है कि चाहे सफर हो, बाजार हो हर तरफ इस तरह के विज्ञापन और साइटें नजर आ रही हैं, जो एक क्लिक के साथ जीवन को खुशियों से भरने का दावा कर रही हैं. अंधविश्वास लोगों के उत्पीड़न, हत्याओं का कारण बनता जा रहा है. इस की शुरुआत ढोंगी ओझाओं और तांत्रिकों की बदनीयती और गलत सलाह से शुरू होती है. कई जगह कुछ गलत परंपराएं भी आग में घी का काम करती हैं.

देखने में आया है कि जब कभी अंधविश्वास से संबंधित घटनाओं का भंडाफोड़ किया जाता है, तो सभी दुख अवश्य प्रकट करते हैं, लेकिन जब कभी अंधविश्वास पर चोट करते हुए सवाल खड़े किए जाते हैं तो सब कन्नी काट जाते हैं.

लोग ‘हम नहीं जानते’ वाले इस नजरिए को उम्र भर जीते हैं. हमारा नजरिया, हमारी सोच सब पहले से तय होता है और इस अंधविश्वास की जड़ें सब से गहरी औरतों में ही होती हैं, हालांकि पुरुष भी इस से अछूते नहीं. इस मामले में कुछ महिलाएं इन बातों पर चर्चा करना पसंद नहीं करतीं, क्योंकि उन्हें लगता है कि दूसरों पर उंगली उठाना सही नहीं है.

जबकि कुछ महिलाएं मौका मिलते ही कह देती हैं, ‘‘हमारे हिसाब से यह दुनिया की सब से बड़ी बेवकूफी है कि आस्था पर तर्क किए जाएं चाहे वह आस्था विज्ञान को ले कर ही हो.’’

वहीं इन से इतर कुछ महिलाएं जिन के दिमाग में क्या चलता रहता है, यह समझना मुश्किल हो जाता है. इसीलिए वे कभीकभी कंफ्यूज हो कह बैठती हैं, ‘‘यह बहुत अच्छा है कि साइंस के जरीए आप रूढिवादी सोच को आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास कर रहे हैं.’’

धर्म के धंधेबाज

ज्यादातर महिलाएं धार्मिक मुद्दों पर चुप रहना अथवा बिना टिप्पणी किए निकल जाना बेहतर समझती हैं, भले ही वे समाज में महिलाओं की स्थिति के प्रति चिंता व्यक्त करती रहती हों, उन्हें विषय बना कर कविताएं और कहानियां लिखती रहती हों.

महिलाएं इस बात को समझने में असमर्थ हैं कि अंधविश्वास उन्हें बंधनों में बांध कर रखने का एक कारगर अस्त्र है. अंधविश्वास से जूझे बिना हम पूरी तरह से सफल नहीं हो सकते हैं. दरअसल, औरतों के पास अंधविश्वास से जूझने का वास्तविक हौसला नहीं है. महिलाओं में बचपन से धार्मिक भावनाएं ज्यादा ठूंस दी जाती हैं और वे उद्देश्यों की तुलना में अंधविश्वास को ज्यादा महत्त्व देती हैं. धर्म वैसे भी नारी की गुलामी का सब से प्राचीन दस्तावेज है. धर्म से मुक्ति स्त्री मुक्ति की पूर्वपीठिका है. धर्म पर विश्वास और अंधविश्वास में कोई फर्क नहीं है. जहां विश्वास का आधार एकतरफा श्रद्धा है वहां यह अंध ही हो सकता है. धर्म के धंधेबाजों ने औरतों को बड़ी चालाकी से अंधविश्वासों में उलझा रखा है ताकि उन को दानदक्षिणा मिलती रहे.

धार्मिक अंधविश्वास ही महिला अधिकारों की राह में सब से बड़े रोड़े हैं. इन से जूझे बिना नारी की आजादी असंभव है. बिल्ली, कुत्ते, चांद, सूरज आदि से जुड़े कई अंधविश्वास हैं, जो आम हैं पर छोटीमोटी और भी कई अंधविश्वासी बातें हैं जिन से हम स्वयं ही जुड़ जाते हैं व कभीकभी लेने के देने पड़ जाते हैं.

सोच बदलने की जरूरत

इन में से कुछ हैं- सब्जी वाला झूठी तारीफ करेगा कि हम ने उस से सब्जी ली तो उस की खूब बिक्री हुई तो हम खुश हो कर रोज सब्जी लेंगे या आज फलां रंग के कपड़े पहने तो मेरा दिन अच्छा गया. कुछ औरतें गर्भावस्था में काली वस्तु का सेवन इसलिए नहीं करतीं कि कहीं बच्चा काला न हो जाए. ये सब दकियानूसी बातें अंधविश्वास का ही तो एक रूप हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती हैं. यह अंध नजरिया ले कर कोई मां के गर्भ से पैदा नहीं होता. स्त्री को शोषित करने वाला समाज भी स्त्री के द्वारा ही बनाया जाता है. अकसर लोग यह कहते हैं कि सोच बदलो तो समाज बदलेगा. पर क्या सच में ऐसा हो सकता है? जब उन में से किसी पर कोई बात आती है तो वही मुंह छिपाने लगता है.

भारतीय स्त्रियां धार्मिक मान्यताओं के नाम पर तमाम ऐसी रूढियों को सहर्ष गले लगा कर बैठी रहती हैं जो उन के विरुद्ध ही रची गई हैं. यह निश्चित है कि किसी बीमार को जितनी चिंता अपने इलाज की स्वयं होगी, किसी अन्य को नहीं होगी, पर क्या यह चिंता वाकई रोगनिवारण के लिए है या रोगी के लिए?

दोषी नारी ही क्यों

धर्म ने तो स्त्रियों के लिए पति के चरणों को ही स्वर्ग की संज्ञा दी है और पति उस स्वर्ग का देवता. कितना अजीब सा लगता है कि आदमी के लिए कोई तय मानक नहीं. जिंदगी भर एक सुरक्षाकवच ओढ़े रहता है. कभी मां के नाम का तो कभी पत्नी के नाम का. मतलब यह कि शादी से पहले उस की लंबी आयु के लिए पहले मां पूजापाठ करती है, तो बाद में पत्नी. ऐसे में कोई अनहोनी हो जाए तो सारा दोष उस स्त्री का.

कन्या भ्रूण हत्याओं का ठीकरा भी स्त्रियों के ही सिर फोड़ा जाता है, क्योंकि उन्हीं को बेटा चाहिए होता है. क्यों चाहिए होता है स्त्री को बेटा? क्यों वह अपनी ही कोख में अपनी बेटी के मार दिए जाने की पीड़ा बयां नहीं कर सकती? क्यों उस ने समझ लिया है कि बेटी को जन्म दे कर वह अपना बचाखुचा वजूद भी खो देगी? उस का सम्मान, उस का गौरव, उस के अधिकार सब एक बेटे के जन्म पर आश्रित हैं, इसलिए वह बेटे की कामना करती है, जिस का दंश भी उसी को ही सहना पड़ता है. यह काला समाज है. स्त्री के लिए न कोई अधिकार है यहां, न सुरक्षा, न जीने लायक जीवन. मीडिया में, सेना में, मैडिकल में, बैंक में, बिजनैस में जाने वाली लड़कियों की बाहर की दुनिया तो बदली, लेकिन घरेलू संघर्ष नहीं बदले. ये संघर्ष धर्म की देन हैं पर औरतों में इतनी हिम्मत नहीं कि वे दकियानूसी बेडि़यों को उतार फेंकें.

कैसे निकलें शिकंजे से

एक ऐसी स्त्री जो सुपरवूमन है. जो घर से बाहर तक, क्लब से बिस्तर तक सब हंसते हुए संभाल लेती है, जो सब को समझ लेती है, सब के काम फुरती से निबटा लेती है, जो भले ही नाइटक्लब में जाती हो, लेकिन मंगलसूत्र और करवाचौथ से विमुख नहीं होती.

इस समाजरूपी रेलगाड़ी के हर डब्बे में वही बिक रहा है, जिस की इजाजत समाज ने दी है. यात्रियों को आजादी तो पूरी है, लेकिन अपनेअपने डब्बे के भीतर भर. आसमान देखा तो जा सकता है, लेकिन पूरा नहीं और इस बात का इल्म भी नहीं होने देना है कि अपनी जिंदगी से हम ही मिसिंग हैं. धर्म और धर्म की बनाई मान्यताओं की जड़ें हमारे जेहन में गहरी होती जा रही हैं. धर्म की खाने वालों ने स्त्रियों को अपने स्वार्थ के लिए शिकंजे में फंसा रखा है. स्त्रियों को आजादी, तरक्की के लिए खुद धर्म के जंजाल को काट फेंकना होगा.

– मोनिका अग्रवाल

मियां बीवी में नाराजी, तो क्या करेगा काजी

हिंदू विवाह कानून 1956 में लिखा हुआ है कि यदि तलाक हो जाए तो भी 6 माह तक टूटे पति पत्नी विवाह नहीं कर सकते और उन्हें एक बार फिर अदालत आ कर आवेदन करना होगा कि उन के तलाक पर अंतिम मुहर लगाई जाए ताकि वे नए सिरे से जिंदगी शुरू कर सकें. इस कानून की धारा के खिलाफ सहमति से तलाक पाए एक जोड़े ने सुप्रीम कोर्ट जा कर गुहार लगाई कि उन्हें 6 माह की शर्त से मुक्ति दिलाई जाए, क्योंकि युवती इंगलैंड जा कर बसना चाहती थी और वहां से फिर 6 माह बाद लौटना नहीं चाहती थी.

न जाने क्यों सुप्रीम कोर्ट को इस भूतपूर्व जोड़े पर दया आ गई और उस ने युवती की गुजारिश मान ली और उन्हें तुरंत मुक्त कर दिया.

असल में भारत में आज भी विवाह कानून संस्कार है कि एक बार विवाह हो गया तो 7 जन्मों तक का साथ होगा पर यह शर्त केवल पत्नी के लिए है, पति चाहे तो दूसरा विवाह कर सकता था या फिर पत्नी को घर से निकाल सकता था. 1956 में हिंदू विवाह अधिनियम व हिंदू विरासत कानून बनने के बाद औरतों को बहुत से अनाचारी नियमों से छुटकारा मिला है, बहुविवाह बंद हुआ, बालविवाह बंद हुआ, बिना तलाक लिए दूसरा विवाह बंद हुआ, संपत्ति में हिस्सा मिला, तलाक के बाद गुजाराभत्ता मिलने लगा. लेकिन इन अधिकारों को पाने में मशक्कत बहुत करनी पड़ती है.

पतिपत्नी का रिश्ता चाहे कितने ही प्रेम का हो, बच्चों के साथ बंधा हो, होता यह कच्ची डोर का सा है. कानून और समाज ने सदियों से इसे एक विशिष्ट मान्यता दी है और धर्मों ने इस पर अपने बनाए ईश्वर की मुहर लगवा दी ताकि उसे ईश्वर की आवाज माना जाए पर पहले भी रिश्ते टूटते थे आज भी टूट रहे हैं.

पहले सिर्फ आदमी तोड़ते थे और अगर औरतें तोड़ती थीं तो कुलटा कहलाई जाती थीं. आज कानूनों में सुधार के कारण वे पुनर्विवाह के लायक भी हैं, पर कानूनी प्रक्रिया अभी भी लंबी और निरर्थक है. बेमतलब के कानूनों में तलाक के लिए लंबी लड़ाई लड़नी होती है. कभीकभार तलाक मिलता ही नहीं यानी बंधे रहो एकदूसरे से. सहमति से मिले तलाक में भी हजारों अडंगे हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केवल उसी जोड़े को छूट दी, सब को नहीं दी, यह गलत है. यह प्रावधान हटना ही चाहिए. तलाक हो गया तो फिर 6 माह के कूलिंग पीरियड का क्या लाभ है? इसे सभी के लिए समाप्त कर दो.

बर्थडे स्पेशल: जावेद अख्तर के 10 सुपरहिट गानें

लगभग तीन दशक से अपने गीतों से संगीत जगत को सराबोर करने वाले महान शायर एवं गीतकार जावेद अख्तर के रूमानी नज्में आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है. शब्दों के जादूगर, जावेद अख्तर का आज जन्मदिन है. हिंदी सिनेमा के बेहतरीन गीतकार और स्क्रिप्ट राइटर जावेद अख्तर का जन्म 17 जनवरी, 1945 को उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के खैराबाद कस्बे में हुआ था.

हालांकि जावेद अख्तर ने बॉलीवुड में करियर की शुरुआत बतौर डायलॉग राइटर की थी, लेकिन बाद में वह स्क्रिप्ट राइटर और लिरिसिस्ट बन गए. जावेद अख्तर ने सलीम खान के साथ मिलकर बॉलीवुड को बेहतरीन फिल्में दीं. इनमें जंजीर, त्रिशूल, दोस्ताना, सागर, काला पत्थर, मशाल, मेरी जंग और मि. इंडिया, दीवार, शोले जैसी फिल्में शामिल हैं.

जावेद अख्तर का असली नाम जादू है. उनके पिता की कविता थी, ‘लम्हा-लम्हा किसी जादू का फसाना होगा’ से उनका यह नाम पड़ा था. जावेद नाम जादू से मिलता-जुलता, इसलिए उनका नाम जावेद अख्तर कर दिया गया.

जावेद अख्तर की पहली पत्नी हनी ईरानी थीं, जिनके साथ उनकी पहली मुलाकात ‘सीता और गीता’ के सेट पर हुई थी. हनी और जावेद का जन्मदिन एक ही दिन पड़ता है.

जावेद अख्तर नास्तिक हैं. उन्होंने अपने बच्चों जोया और फरहान की भी परवरिश ऐसे ही की है.

जावेद अख्तर शुरुआती दिनों में कैफी आजमी के सहायक थे. बाद में उन्हीं की बेटी शबाना आजमी के साथ उन्होंने दूसरी शादी की.

जावेद अख्तर 4 अक्टूबर 1964 को मुंबई आए थे. उस वक्त उनके पास न खाने तक के पैसे नहीं थे. उन्होंने कई रातें सड़कों पर खुले आसमान के नीचे सोकर बिताईं. बाद में कमाल अमरोही के स्टूडियो में उन्हें ठिकाना मिला.

सलीम खान के साथ जावेद अख्तर की पहली मुलाकात ‘सरहदी लुटेरा’ फिल्म की शूटिंग के दौरान हुई थीं. इस फिल्म में सलीम खान हीरो थे और जावेद क्लैपर बॉय. बाद में इन दोनों ने मिलकर बॉलीवुड को कई सुपरहिट फिल्में दीं.

सलीम खान और जावेद अख्तर को सलीम-जावेद बनाने का श्रेय डायरेक्टर एसएम सागर को जाता है. एक बार उन्हें राइटर नहीं मिला था और उन्होंने पहली बार इन दोनों को मौका दिया.

सलीम खान स्टोरी आइडिया देते थे और जावेद अख्तर डायलॉग लिखने में मदद करते थे. जावेद अख्तर उर्दू में ही स्क्रिप्ट लिखते थे, जिसका बाद में हिंदी ट्रांसलेशन किया जाता था.

70 के दशक में स्क्रिप्ट राइटर्स का नाम फिल्मों के पोस्टर पर नहीं दिया जाता था, लेकिन सलीम-जावेद ने बॉलीवुड में उन बुलंदियों को छू लिया था कि उन्हें कोई न नहीं कह सका और फिर तो पोस्टरों पर राइटर्स का भी नाम लिखा जाने लगा.

सलीम-जावेद की जोड़ी 1982 में टूट गई थी. इन दोनों ने कुल 24 फिल्में एक साथ लिखीं, जिनमें से 20 हिट रहीं. जावेद अख्तर को 14 बार फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला. इनमें सात बार उन्हें बेस्ट स्क्रिप्ट के लिए और सात बार बेस्ट लिरिक्स के लिए अवॉर्ड से नवाजा गया. जावेद अख्तर को 5 बार नेशनल अवॉर्ड भी मिल चुका है.

जावेद अख्तर के 10 बेहतरीन गानें

1. आफरीं आफरीं

2. पंछी नदियां पवन के झोकें

3. एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा

4. मैं यहां हूं यहां हूं यहां

5. चेहरा है या शाम खिला है, जुल्फ घनेरी शाम है क्या

6. जादूभरी आंखो वाली सुनो

7. हर घड़ी बदल रही है रूप जिंदगी

8. देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए

9. देखा एक ख्वाब तो ये सिलसिले हुए

10. जो भी चाहूं वो मैं पाऊं

‘रईस’ को ‘बैट्री नहीं बोलने का’

शाहरुख खान की फिल्म ‘रईस’ रिलीज के लिए तैयार है. जनवरी के अंतिम सप्ताह में यह फिल्म रिलीज होगी. सोशल मीडिया पर फिल्म का प्रमोशन शुरू हो चुका है. पोस्टर्स, प्रोमो, ट्रेलर और सॉन्ग को बेहतर रिस्पांस मिल रहा है. किंग खान ने इस फेहरिस्त में नया प्रोमो रिलीज किया.

इसकी पंच लाइन ‘बैटरी नहीं बोलने का’ है. शाहरुख इसमें एक्शन करते दिखाई दे रहे हैं. एक रोमांटिक सीन में माहिरा खान भी नजर आ रही हैं. शाहरुख ने यह वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया. इसका कैप्शन लिखा ‘देखिए, जब कोई ‘रईस’ को बैटरी बोलता है तो क्या होता है.’ हैशटैग में लिखा गया है ‘बैटरी नहीं बोलने का.’

इतना ही नहीं सुपरस्टार शाहरुख खान ‘दीवाना’ और ‘जब तक है जान’ के बाद ‘रईस’ में एक बार फिर मोटरसाइकिल चलाते नजर आने वाले हैं. शाहरुख लंबे अर्से बाद किसी फिल्म में मोटरसाइकिल चलाते नजर आएंगे. फिल्म ‘रईस’ के ट्रेलर में शाहरुख को मोटरसाइकिल चलाते देख उनके ‘दीवाना’ और ‘जब तक है जान’ की बाइक राइडिग की यादें ताजा हो गई.

आपको बता दें कि 25 जनवरी 2017 को रिलीज होने वाली इस फिल्म के साथ ही बॉक्स ऑफिस पर सुपरस्टार रितिक रोशन की फिल्म ‘काबिल’ भी रिलीज होगी.

फिलहाल आप देखिए ‘रईस’ का नया प्रोमो.

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