‘रईस’ को ‘बैट्री नहीं बोलने का’

शाहरुख खान की फिल्म ‘रईस’ रिलीज के लिए तैयार है. जनवरी के अंतिम सप्ताह में यह फिल्म रिलीज होगी. सोशल मीडिया पर फिल्म का प्रमोशन शुरू हो चुका है. पोस्टर्स, प्रोमो, ट्रेलर और सॉन्ग को बेहतर रिस्पांस मिल रहा है. किंग खान ने इस फेहरिस्त में नया प्रोमो रिलीज किया.

इसकी पंच लाइन ‘बैटरी नहीं बोलने का’ है. शाहरुख इसमें एक्शन करते दिखाई दे रहे हैं. एक रोमांटिक सीन में माहिरा खान भी नजर आ रही हैं. शाहरुख ने यह वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर किया. इसका कैप्शन लिखा ‘देखिए, जब कोई ‘रईस’ को बैटरी बोलता है तो क्या होता है.’ हैशटैग में लिखा गया है ‘बैटरी नहीं बोलने का.’

इतना ही नहीं सुपरस्टार शाहरुख खान ‘दीवाना’ और ‘जब तक है जान’ के बाद ‘रईस’ में एक बार फिर मोटरसाइकिल चलाते नजर आने वाले हैं. शाहरुख लंबे अर्से बाद किसी फिल्म में मोटरसाइकिल चलाते नजर आएंगे. फिल्म ‘रईस’ के ट्रेलर में शाहरुख को मोटरसाइकिल चलाते देख उनके ‘दीवाना’ और ‘जब तक है जान’ की बाइक राइडिग की यादें ताजा हो गई.

आपको बता दें कि 25 जनवरी 2017 को रिलीज होने वाली इस फिल्म के साथ ही बॉक्स ऑफिस पर सुपरस्टार रितिक रोशन की फिल्म ‘काबिल’ भी रिलीज होगी.

फिलहाल आप देखिए ‘रईस’ का नया प्रोमो.

घर की फाइनैंशियल प्लानिंग

नई चीजें खरीदने की जरूरत व शौक सभी को होता है पर बढ़ती महंगाई के इस दौर में हर तरफ सामंजस्य रखना थोड़ा मुश्किल हो जाता है. ऐसे में साल की शुरुआत में ही यदि वित्तीय प्रबंधन कर लिया जाए तो कई मुश्किलें सुलझ जाती हैं. हर परिवार की अपनी आवश्यकताएं व खर्चे होते हैं पर सामान्य नियम सभी पर लागू होते हैं.

लक्ष्य तय करें

आप को आने वाले वर्ष में जरूरत के मुताबिक कहां और कितना निवेश करना है और घर के लिए क्या खरीदना है, तय कर लें. एलसीडी लेना है या फ्रिज, बच्चे के लिए मोटरसाइकिल लेनी है या पत्नी के लिए स्मार्टफोन. सभी के लिए एक निश्चित राशि की जरूरत होती है, इतना पैसा अलग से निकाल कर रख लें. अच्छा होगा यदि आप दीवाली पर मिले बोनस या सालाना इन्क्रीमैंट से ये चीजें खरीदें. इस से आप का बजट नहीं गड़बड़ाएगा.

आमदनी बढ़ाएं

मौजूदा दौर में पतिपत्नी दोनों कामकाजी हों तो घर के खर्चे अच्छी तरह पूरे हो सकते हैं. पत्नी में छोटामोटा हुनर हो और घरपरिवार की जिम्मेदारियों से मुक्त हो तो वह पार्टटाइम जौब तलाश सकती है.गृहिणियां स्वरोजगार से या टाइमपास नौकरी से आमदनी बढ़ा सकती हैं. घर के पास कोई स्कूल हो या हौबी सैंटर, जौइन कर सकती हैं. टाइपिंग आती हो तो घर बैठे कंप्यूटर पर काम कर के पैसे कमा सकती हैं. ट्यूशन ले सकती हैं. इन सब से टाइमपास के साथसाथ कमाई भी होगी.

डिगरी का उपयोग करें

शादी से पहले की कोई डिगरी, जो व्यस्तता के चलते आप के काम नहीं आ सकी, अब आप उस का उपयोग करें. इस के अलावा कार्ड बनाना, कागज के फूल बनाना, अचार डालना और केक बनाना जैसे छोटे काम भी कई बार आप को पहचान दिला सकते हैं. इन से आप मुनाफा भी कमा सकती हैं.

हुनर पहचानें

हाथों में कोई हुनर हो, जैसे सौस, जैम, अचार आदि बनाना या स्वैटर बुनना, क्रोशिए से आइटम बनाना, सौफ्ट टौय बनाना वगैरह तो उन्हें बना कर बाजार में बेच सकती हैं. इस अतिरिक्त आमदनी से आप पति का घर चलाने में हाथ बंटा सकती हैं या खुद के खर्चे निकाल सकती हैं.

खर्चे कम करें

फाइनैंशियल मैनेजमैंट सिर्फ पैसा कमाना ही नहीं, खर्चे कम करना भी होता है. देखें व परखें कि आप की कौन सी आदत फुजूलखर्ची करवाती है. उसे हमेशा के लिए बदल डालें. महीनेभर का राशन आप एकसाथ किसी थोक की दुकान से खरीद सकती हैं. एकसाथ सामान लाने पर पैसे के अलावा पैट्रोल की भी बचत होती है. बच्चे को आप पुरानी किताबें दिलवा सकते हैं. सीनियर स्टूडैंट्स की किताबें यदि अच्छी अवस्था में हों या सैकंडहैंड किताबें ठीक हों तो ले कर पढ़ाई की जा सकती है. नल, बिजली, टैलिफोन व अन्य सभी बिल टाइम पर भरें. अनावश्यक रूप से पैनल्टी देने से आप बचेंगे. सौंदर्य प्रसाधनों के सब्स्टीट्यूट घर पर बना सकें तो बनाएं. गुणवत्ता का भरोसा भी रहेगा और पैसे भी बचेंगे. गैस बचाने के लिए सब्जियां, दालें, अनाज, चावल भिगो कर रखें. गैस पर काम करते वक्त अनावश्यक न बतियाएं. चाहें तो बिजली से चलने वाला इंडक्शन कुकर भी खरीद सकती हैं. रात में गैस सिलैंडर बंद कर दें. पैट्रोल की खपत पर भी ध्यान दें. कम सवारी हो तो टूव्हीलर इस्तेमाल करें. अधिक सवारी में फोरव्हीलर इस्तेमाल करें.

शौपिंग सोच कर करें

विंडो शौपिंग करते वक्त ‘काम आ जाएगी’ की मानसिकता से बचें. शौपिंग करते वक्त दिमाग से काम लें, दिल से नहीं. अकसर महिलाएं कपड़े या कौस्मेटिक्स पसंद आने पर बिना आवश्यकता के खरीद लेती हैं, जो बाद में आउटडेटेड होने पर नौकरों के ही काम आते हैं.

अनावश्यक शगल न पालें

जिम जौइन करने के बजाय घर के काम खुद करने की कोशिश करें. लिफ्ट का उपयोग न कर के सीढि़यां चढ़ें, बाई के न आने पर झाड़ूपोछा खुद ही करने का प्रयास करें. अकसर देखने में आता है कि ‘टे्रडमिल’ खरीदने के बाद वह घर में ड्राइंगरूम की शोभा बढ़ाती है. गिफ्ट में आए सामान, यदि आप उपयोग में न लेना चाहें तो उन्हें  आवश्यकतानुसार मित्रों व रिश्तेदारों को दे सकते हैं. सभी उपहारों को खोलें नहीं, उन्हें संभाल कर रखें. आड़े वक्त आप उन्हें काम में ले सकते हैं.

इंटीरियर संवारें

घर के इंटीरियर को महंगी साजसज्जा के बजाय अपने आइडियाज से संवारें. कम पैसों में आप लोगों की तारीफ पाएंगी. पुरानी हैवी साडि़यों से आप ड्राइंगरूम के परदे बना सकती हैं अथवा डैकोरेटिव वाल पीस बना कर दीवार को सजा सकती हैं.

बीमा अवश्य करवाएं

फाइनैंशियल मैनेजमैंट का एक पहलू आड़े वक्त के लिए पैसा बचाना भी है. इस के लिए बीमा करवाएं. आजकल मैडिक्लेम, दुर्घटना बीमा, प्रौपर्टी इंश्योरैंस और लाइफ इंश्योरैंस सभी प्रचलित हैं. आपात स्थिति में ये पौलिसियां बहुत काम आती हैं. इन्कम टैक्स की धाराओं में छूट मिलने से इन का वैसे भी काफी फायदा रहता है.

विदेश घूमें पर…

देशविदेश घूमने का यदि प्रोग्राम हो तो औफ सीजन में जाएं. ग्रुप में जाने पर यात्रा काफी सस्ती पड़ती है. ग्रुप डिस्काउंट के साथ सीजन डिस्काउंट भी मिलता है. जांचपड़ताल कर के अपना ट्रैवल एजेंट चुनें और देखपरख कर पेमेंट करें.

क्रैडिट कार्ड

क्रैडिट एवं डेबिट कार्ड से शौपिंग का आइडिया लुभावना तो है पर लिक्विड कैश न होने पर भी खरीदारी करने पर पैसा अनावश्यक खर्च हो जाता है. इंटरनैट शौपिंग पर भी यही बात लागू होती है. अपनी परिस्थितियों के अनुसार खुद आकलन करें कि अनावश्यक खर्च कम से कम हो और बचत ज्यादा से ज्यादा हो. पैसा कमाना ही नहीं, उसे खर्च करना भी एक कला है. सोचसमझ कर किया गया खर्च भविष्य के लिए काफी मददगार सिद्ध होता है.

डेब्यू के लिए सिड ने पीसी को कहा था ना

अपने परफेक्ट लुक और फैशन स्टाइल के लिए फेमस सिद्धार्थ मलहोत्रा आज कई दिलों पर राज करते हैं. ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ से बॉलीवुड में एंट्री करने वाले सिद्धार्थ को इस फिल्म से पहले प्रियंका चोपड़ा की एक फिल्म में काम करने का मौका मिला था, मगर सिद्धार्थ ने उस फिल्म के लिए मना कर दिया था.

‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ से बॉलीवुड में एंट्री करने वाले सिद्धार्थ अपनी इस फिल्म से नहीं बल्कि प्रियंका चोपड़ा के साथ बॉलीवुड डेब्यू करने वाले थे. प्रियंका चोपड़ा की फिल्म ‘फैशन’ में सिद्धार्थ को प्रियंका के साथ कास्ट किया जाना था, लेकिन मशहूर फैशन मैगजीन ‘ग्लैडरैग्स’ के साथ अनुबंध के कारण सिद्धार्थ वह प्रोजेक्ट नहीं ले सकें.

सिद्धार्थ मल्होत्रा बॉलीवुड में एंट्री से पहले ही इंटरनेशनल लेवल पर मॉडलिंग में अपनी एक अलग पहचान बना चुके थे. सिद्धार्थ पेरिस, न्यूयॉक जैसे बड़े देशों में मॉडलिंग कर चुके थे. सिद्धार्थ इंटरनेशनल डिजाइनर रोबेर्टो कैवली के लिए भी रैंप पर उतर चुके हैं.

सिद्धार्थ सिर्फ एक्टिंग और मॉडलिंग का ही शौक नहीं रखते, बल्कि उन्हें इसके अलावा कार्टून बनाने का भी शौक है.

कई लड़कियों को कर चुके हैं डेट

सिद्धार्थ ‘स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ के समय एक साउथ इंडियन मॉडल को डेट कर रहें थे. इसके बाद उन्होंने एक ब्राजीलियन मॉडल इज़ाबेल को डेट किया. अब सिद्धार्थ का नाम आलिया के साथ जोड़ा जाता है.

दुनिया के सबसे खूबसूरत स्विमिंग पूल

सर्दियों के मौसम का भी अपना अलग ही मजा है. पर इतनी ठंड पड़ रही है कि गर्मीयों को मिस करना लाजमी है. गर्मीयों का मौसम आने में अभी वक्त है. तब तक आप गर्मियों को मिस करने के साथ दुनिया के इन अद्भुत नैचुरल स्वीमिंग पूल के बारे में.

1. लिटल रिवर कैन्यन, अलाबामा

मीसिसीप्पी नदी के पूर्व में है लिटल रिवर. गर्मियों में ठंडक के लिए यह जगह काफी मश्हूर है. यहां पानी ऊंचाई से गिरता है. लोग इस ऊंचाई से डाइव करते हैं या फिर स्वीमिंग पूल का लुफ्त उठाते हैं.

2. गिओला, थैस्सोस, ग्रीस

अगर आप कभी ऐथेंस जायें, तो आईलैंड ऑफ थैस्सोस जाना न भूलें. यहां साफ पानी से भरा हुआ एक बेहद खूबसूरत लगून है. देखने पर ऐसा लगता है मानो पत्थरों के बीच पूल को उकेरा गया है.

3. इक किल, सेनोट, मेक्सिको

यह पूल ईको-आर्कीयोलोजिकल पार्क इक किल में है. इसे ‘सैक्रेड ब्लू सेनोट’ भी कहा जाता है. यहां कई वॉटरफॉल भी है. यहां हरियाली के बीच साफ पानी में तैरना के अलग ही मजा है. तो अगर कभी मेक्सिको जायें, तो इस पूल में डूबकी लगाना न भूलें.

4. स्लाइडिंग रॉक, ब्रेवार्ड, नोर्थ कैरोलिना

आपने ज्यादातर मैन-मेड स्लाइड ही देखे होंगे. पर यहां नैचुर बनाया गया स्लाइड है. यह पिसगाह नैचुरल फोरेस्च में स्थित है. यहां 60 फीट का माउंटेन स्लाइडर है. यहां दिल्ली मेट्रो या मुंबई लोकल की तरह धक्का-मुक्की नहीं होती. यहां लोग अपनी बारी आने का इंतजार करते हैं. स्लाइड के अंत में स्वीमिंग पूल है. प्रकृति के करिश्मे भी गजब हैं.

5. डेविल्स पूल, विक्टोरिया फॉल्स, जामबिया

कुछ लोग डेविल्स पूल को दुनिया की सबसे खतरनाक मानते है. हो सकता है, क्योंकि यह विक्टोरिया फॉल्स के आखिरी छोर पर है. अगर आप गलती से भी बिना सावधानी बरते इस फॉल के छोर तक पहुंच जाती हैं, तो 360 फुट नीचे गिरने की पूरी संभावनायें है. पर लोग यहां आते हैं, और बच्चों के साथ आते हैं. यहां सितम्बर से दिसंबर के बीच ही स्वीमिंग की जा सकती है. इस वक्त नदी की गहराई कम रहती है.

जब अजय को पाने के लिए दो एक्ट्रेस में छिड़ गई थी जंग

काजोल और अजय देवगन की शादी को 17 साल हो चुके हैं. अजय देवगन एक अच्छे स्टार के साथ-साथ एक अच्छे पति और एक अच्छे पिता भी हैं. अजय के फिल्मी करियर में एक ऐसा दौर भी आया था जब दो अभिनेत्रियां उन्हें पाने के लिए आपस में लड़ बैठी थीं. आखिर कौन हैं वो अभिनेत्रियां जिनके बीच अजय देवगन को पाने के लिए जंग छिड़ गई थी.

इससे पहले के आप किसी और के साथ उनका नाम जोड़ बैठे. हम आपको बता दें कि वो दो अभिनेत्रियां  कोई और नहीं बल्कि रवीना टंडन और करिश्मा कपूर हैं.

फूल और कांटे में अभिनय कर चुके अजय का नाम कभी बॉलीवुड की नंबर वन अभिनेत्री करिश्मा कपूर के साथ जुड़ा था, लोगों का तो यह भी कहना था कि दोनों की जोड़ी सबसे हॉट मानी जाती थी. बीते दौर की फिल्मी मैग्जीन में छपी खबरों की मानें तो कथित तौर पर जब करिश्मा अजय के जीवन में आईं तब अजय रवीना टंडन को डेट कर रहे थे.

काजोल और अजय देवगन की प्रेम कहानी की शुरूआत तब हुई जब अजय फिल्मों में स्ट्रगल कर रहें थे लेकिन काजोल एक खास मुकाम बना चुकी थीं. अजय और काजोल के करीब आने की कहानी भी काफी दिलचस्प है. आपको बता दें कि काजोल और अजय फिल्म हलचल की शूटिंग के दौरान एक-दूसरे के करीब आए और देखते ही देखते उनकी दोस्ती प्यार में बदल गई. साल 1999 में दोनों ने शादी कर ली. बॉलीवुड के इस स्टार कपल के दो बच्चे नायसा और युग हैं.

काली गुफा में अंधेरा ही अंधेरा

नोटबंदी के कहर के बाद अब औरतों को डिजिटल पेमैंट का कहर सहने को तैयार रहना होगा. अब तक औरतें अपना पैसा अपने पास कनस्तरों, दराजों, साडि़यों में छिपा कर रखती थीं पर अब यह तो संभव होगा ही नहीं, कार्ड से पेमैंट करने में जब भी चूक हुई समझ लें कि पैसा हाथ से गया.

डिजिटल पेमैंट के चाहे कितने गुण गा लिए जाएं यह पक्का है कि डिजिटल पेमैंट के पीछे का चेहरा किसी को न दिखेगा. अगर कहीं कुछ गलत हुआ तो मोबाइल फोन लिए बैठे बटन दबाते रहो और मंदिरों की तरह रामधुन के रिकौर्ड सुनते रहो. आप की शिकायत पर कोई सुनवाई नहीं होगी. पंडितों के तंत्रमंत्रों के उतने पेच नहीं होंगे जितने इस डिजिटल पेमैंट के फौर्मूलों में हैं.

जो पुरुष कंप्यूटरों पर काम करते हैं वे तो इस गोरखधंधे को समझ सकते हैं पर सामान्य औरतों के लिए, चाहे वे भारत की हों या अमेरिका की, उन के लिए इस डिजिटल सांपसीढ़ी के खेल को समझना कठिन होगा. असल में डिजिटल पेमैंट का खेल बैंकों से जुड़ी कंपनियों का लूट का अपना तरीका है, जो उन्होंने दुनिया भर में सरकारों के साथ मिल कर जनता पर थोपा है ताकि हर नागरिक की हर बात का पूरा ब्योरा उन के पास रहे. अब औरत की अपनी छिपी संपत्ति कहीं नहीं रह पाएगी.

डिजिटल वर्ल्ड भले लगे कि काम आसान कर रहा है पर प्राइवेसी व सुगमता पर यह हमला है और सरकार व बैंक मिल कर हर जने को एक पैसा कमा कर टैक्स देने वाली मशीन में बदल रहे हैं. युवा अभी चाहे इस पर खुश हों कि उन्हें जेब में मोटा पर्स नहीं ले कर चलना पड़ेगा पर वे नहीं जानते हैं कि उन पर किसकिस तरह का अंकुश लग रहा है. उन की हर गतिविधि सरकार की निगाह में तो बाद में आएगी, मातापिता की निगाह में पहले आ जाएगी. अगर औरतें भी कार्ड पेमैंट या मोबाइल पेमैंट करेंगी तो उन्हें मोटा नुकसान होगा, क्योंकि पति महाशय को पता चल जाएगा.

औरतों को अपनी आर्थिक स्वतंत्रता को इस तरह से नरेंद्र मोदी के भाषणों में बहने नहीं देना चाहिए. यह थोपा नहीं जाए, मनमरजी से हो. जिसे जरूरत हो वह अपनी इच्छानुसार पैसे का इस्तेमाल करे. करेंसी नोट पहले बंद कर के और फिर जानबूझ कर कम जारी कर के सरकार जमाखोरों से भी ज्यादा जघन्य अपराध कर रही है. मजेदार बात तो यह है कि अंधविश्वासी इस में व्रतउपवास सा कष्ट देख रहे हैं कि इस के बाद चमत्कार होगा और फिर स्वर्णयुग आ जाएगा. याद रखें कि इस काली गुफा के बाद गहरा गड्ढा है जिस से निकलना आसान न होगा.

एक पहेली की तरह है नर्सरी में ऐडमिशन

नर्सरी स्कूलों में अपने बच्चों को प्रवेश दिलाना मातापिताओं के लिए सारे देश में एक दुखद प्रक्रिया हो गई है. बच्चे स्कूल जाएं, पढ़ेंलिखें और योग्य युवा बनें. यह अब आदर्श सपना हो गया है कि बच्चे अच्छे स्कूल में जाएं, जहां शान से सिर उठा सकें और फिर पढ़ें या न पढ़ें चमचमाते दिखें. स्कूली शिक्षा पढ़ाई व जानकारी के लिए नहीं वर्ग और वर्ण यानी स्टेटस और कास्ट से जुड़ गई है, जो पहले नर्सरी प्रवेश से शुरू होती है. गोरे ऊंचे वर्ण में पैदा हुई संतान की तरह अच्छा स्कूल जीवन में सफलता की पक्की सीढ़ी माना जाने लगा है.

दिल्ली के स्कूलों में नर्सरी में प्रवेश में ही इतने विवाद होने लगे हैं कि उच्च व सर्वोच्च न्यायालय व सरकार रोज नियम व कानून बनाती और बदलती है. दिल्ली में बहुत स्कूलों को वह जमीन दी गई है जिसे सरकार ने जबरन किसानों से सस्ते दाम पर खरीदा था और उसे बाजार भाव से थोड़े से कम दाम पर स्कूल चलाने वाली संस्थाओं को अलौट किया था. इस अलौटमैंट में बहुत सी शर्तें डाल दी गई थीं, जिन्हें उस समय संस्था के संचालक पढ़ते भी नहीं थे, क्योंकि जमीन का बड़ा टुकड़ा पाना अपनेआप में एक टेढ़ी खीर होता है. अब सरकार उस हक के नाते स्कूलों पर रोब गांठती है, तो संचालक चूंचूं करते हैं.

हाल ही में दिल्ली सरकार ने आदेश दिया है कि नर्सरी में प्रवेश केवल आसपास के पड़ोसी इलाकों में रह रहे मातापिताओं के बच्चों को दिया जाएगा और जो लोग किराए पर रह रहे हैं वे इस सुविधा का लाभ न उठा सकेंगे. किराएदारों को वंचित रखा गया है, क्योंकि मातापिता फर्जी किराया ऐग्रीमैंट बनवा लेते हैं ताकि मनचाहे स्टेटस और कास्ट के स्कूल में दाखिला मिल सके.

छोटेछोटे बच्चों को भेड़ों की तरह रिकशों और कैबों में भर कर ले जाना देश भर में देखा जा सकता है, क्योंकि नेबरहुड स्कूल भी इतने दूर होते हैं कि आज के कोमल बच्चे 20-25 मिनट की वाक भी नहीं कर सकते. व्यस्त मातापिता उन्हें रिकशा वालों और कैब ड्राइवरों के हवाले कर देते हैं.

एक तरह से मातापिताओं, स्कूल संचालकों और सरकारों ने मिल कर शिक्षा का न केवल भयंकर बाजारीकरण कर दिया है, इस पर शासकीय आदेशों, अदालती फैसलों, नेतागीरी की कालिख व पैसे की चाहत के काले ब्रश भी फेर दिए हैं. मातापिता 4 लोगों में अपने बच्चे के स्कूल के गुणगान गा सकें. इस के लिए वे हर नेता, संचालक, व्यापारी की खुशामद को तैयार रहते हैं.

नर्सरी से ले कर 8वीं कक्षा तक की शिक्षा पास के स्कूल में हो यह अच्छी बात है पर अंत के 4 साल ही बच्चे का भविष्य बनाएं, ऐसी कोई नीति बननी चाहिए और इन 4 सालों में वे धर्म, जाति, स्टेटस के आधार पर नहीं, बल्कि योग्यता के आधार पर स्कूलों में प्रवेश पाएं.

छोटे बच्चे नामी स्कूल से न जुड़ें यह भावना पैदा करने की कोशिश करना आवश्यक हो रहा है ताकि छुटपन में ही बच्चों में उच्च या हीनभावना पैदा न हो. यह पहेली हल करना आसान नहीं, क्योंकि किसी को उसे हल करने की फुरसत भी नहीं है.

सर्दियों में ऐसे करें त्वचा की देखभाल

सर्दियों में हमारी त्वचा को कुछ खास देखभाल की जरूरत होती है. इस मौसम में ज्यादातर लोगों को शुष्क त्वचा की शिकायत हो जाती है पर कुछ घरेलू उपायों को अपनाकर आप सर्दी के मौसम में भी निखरी त्वचा पा सकती हैं.

सर्दियों में अपनाएं ये घरेलू उपाय

1. सर्दियों में त्वचा को कोमल बनाए रखने के लिए बादाम के तेल का इस्तेमाल करना बहुत फायदेमंद होता है. बेहतर फायदे के लिए आप चाहें तो रात के वक्त तेल लगाकर सो जाएं. सुबह उठने पर आप पाएंगे कि आपकी त्वचा का मॉइश्चर अब भी बरकरार है.

2. बाजार में बिकने वाले स्क्रब के स्थान पर चीनी के स्क्रब का इस्तेमाल करें. इससे डेड स्‍क‍िन तो साफ हो ही जाएगी आपके चेहरे का मॉइश्चर भी बना रहेगा.

3. साबुन का इस्तेमाल करने से बेहतर है कि सरसों के उबटन का इस्तेमाल करें.

4. चेहरा धोने के लिए न तो बहुत अधिक गर्म पानी का इस्तेमाल करें और न ही बहुत ठंडे पानी का.

5. नहाने के बाद हल्के हाथों से तौलिए का इस्तेमाल करें. संभव हो तो नहाने के तुरंत बाद नारियल के तेल से या किसी ऑयली बॉडी लोशन से पूरे शरीर पर मसाज करें.

गर्म पानी से नहाना हो सकता है खतरनाक

ठंड का मौसम शुरू होने के साथ ही हम गर्म पानी से नहाना शुरू कर देते हैं. पर शायद ही आपने ध्यान दिया हो लेकिन गर्म पानी से नहाने के बाद आपको अपनी त्वचा ज्यादा ड्राई और बुझी-बुझी नजर आती होगी. जानकारों की मानें तो गर्म पानी से नहाने से कई तरह की त्वचा संबंधी बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है.

सर्दी के मौसम में ठंडे पानी से नहाना तो संभव नहीं है लेकिन बहुत अधिक गर्म पानी से नहाना भी सही नहीं है. ऐसे में हल्के गुनगुने पानी का ही इस्तेमाल करें. इससे खुजली नहीं होगी और त्वचा का नेचुरल मॉइश्चर भी बना रहेगा.

ठंड के मौसम में खुजली होना एक आम समस्या है. कई बार तो ये इतनी बढ़ जाती है कि घाव का रूप ले लेती है. पर आप चाहें तो नहाने के पानी में ऑलिव ऑयल या नारियल के तेल की कुछ बूंदें डालकर इससे नहा सकते हैं. तेल की दो से चार बूंदों का पानी में इस्तेमाल करने से त्वचा की नमी खोती नहीं है और यह रूखी व बेजान नहीं होती.

इसके अलावा गर्म पानी से नहाने के बाद पोर्स काफी संवेदनशील हो जाते हैं जिससे इंफेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है. अगर पानी बहुत अधि‍क गर्म है और वातावरण ठंडा तो शरीर पर लाल रंग के चकत्ते भी उभर सकते हैं. जिनमें काफी खुजली होती है. इसलिए कोशि‍श करें कि नहाए तो रोज लेकिन बहुत गर्म पानी से नहीं, गुनगुने पानी से.

इन फिल्मों ने समाज को दिए गलत संदेश

बौलीवुड फिल्मों से समाज पर सकारात्मक असर पड़ रहा है या नहीं, इस पर सालों से बहस चल रही है. पर अगर बात समाज में गलत संदेश भेजने की करें, तो बौलीवुड की फिल्में सालों से ये काम बखूबी कर रही हैं. जैसे- स्टॉकिंग जैसे अपराध को बौलीवुड की फिल्में हमेशा से प्रोमोट करती हैं. स्टॉकिंग ही क्यों, जातिवाद, लैंगिकवाद आदि को भी बौलीवुड की फिल्मों ने जाने-अनजाने बढ़ावा दिया है.

‘कौन सी बौलीवुड फिल्मों ने समाज में गलत संदेश भेजा?’, जब Quora पर यह सवाल पूछा गया तो यूजर्स के जवाब भी सवाल की तरह ही दिलचस्प थे. इन फिल्मों में हमशक्लस, ग्रैंड मस्ती जैसी फिल्में तो थी हीं पर दंगल जैसी फिल्म को भी कुछ लोगों ने समाज के लिए गलत बताया.

1. पार्टनर, ढिशूम, दोस्ताना…

मल्लिकार्जून पंड्या ने बहुत ही जरूरी बात कही. बौलीवुड की फिल्मों में सम्लैंगिक रिश्तों को हमेशा नकारात्मक रूप में प्रस्तूत किया है. ज्यादातर फिल्मों में ऐसा दिखाया जाता है कि गे खुलेआम स्ट्रेट पुरुषों की ताक में रहते हैं. पार्टनर फिल्म में सुरेश मेनन की किरदार इस मानसिकता का उदाहरण है.

बहुत से लोगों का मानना है कि दोस्ताना फिल्म का क्लाइमैक्स सम्लैंगिकता का मजाक उड़ाती है.

ढिशूम में भी अक्षय कुमार का किरदार गे लोगों का मजाक ही उड़ाता है.

2. कुछ कुछ होता है (1998)

यह फिल्म बहुत से लोगों के दिल को छू गई. पर इस फिल्म की शुरुआत ही एक बात पर सोचने पर मजबूर कर देती है. एक 8 साल की लड़की इतनी मैच्यूर है की अपने पापा को उनके ‘सच्चे प्यार’ से मिलाने में मदद करती है. सानंदन रतकल ने इस मूवी के बनावटीपन पर प्रशन उठाया. एक लड़के को लड़की से तभी प्यार हुआ जब लड़की साड़ी में, चुड़ियां खनकाते हुए भजन गाती है. बास्केट बॉल खेलते वक्त प्यार नहीं होता.

3. सुल्तान (2016)

सुल्तान ब्लॉकबस्टर हिट रही. पर सोशल मीडिया पर इस फिल्म के प्लॉट की आलोचना हुई. फिल्म का हीरो सिर्फ कुछ महिनों की ट्रेनिंग के बाद अंतर्राष्ट्रीय लेवल का पहलवान बन जाता है. पर हीरोईन यानी की एक महिला पहलवान 20 सालों से अपने स्कील्स को सुधार ही रही हैं, पर रिजल्ट नदारद. इससे भी हैरान करने वाली बात यह है कि प्रेगनेंट होने पर हीरोईन पहलवानी छोड़कर परिवार पर ध्यान देने लगती है. केतुल मकवाना ने हमारे पितृसत्तातमक समाज को दर्शाते हुए इस फिल्म की सटीक आलोचना की.

4. हौलीडे (2015)

फिल्म भले ही रोमांचक हो. बाइक सवार एक आर्मी ऑफिसर ऑटो में बैठी एक लड़की को देखकर जैसे इशारें करता है, यह कहीं से भी सभ्यता को नहीं दर्शाता है. अंकुर ने बौलीवुड फिल्मों में लड़कियों को इंप्रेस करने के इन गलत तरीकों के ट्रेन्ड को समाज के लिए गलत बताया है.

5. तनु वेड्स मनु रिटर्नस (2015)

इस फिल्म के लिए कंगना रनौत की जितनी भी तारीफ की जाए कम है. पर फिल्म में पारिवारीक रिश्तों पर खासी चोट की गई है. पालकेश असावा ने तनु द्वारा मनु के खिलाफ रेजिस्टर किए गए गलत केस कि ओर इशारा करते हुए बताया कि असल जिन्दगी में भी न जाने कितने ही लोग गलत केसों में फंसाए जाते हैं. ‘फिल्म में ये दिखाना कि एक शादीशुदा औरत कई मर्दों से फ्लर्ट करे तो कोई गलत बात नहीं, पर शादीशुदा पुरुष ने तलाकनामा भेज दिया तो वह बदचलन है.’

6. हैप्पी न्यू ईयर (2014)

कुछ नौसिखीए धोखेबाजी से एक इंटरनेशनल डांस चैम्पियनशिप जीत जाते हैं. कंदर्प जोशी की बात कड़वी पर सच है. उनका कहना है. ‘फिल्म में ये दिखाया गया है कि भारत के डांसर्स पूरी दुनिया को बेवकूफ बनाकर चैम्पियनशिप जीत जाते हैं. क्या भारतीय इतने बेवकूफ हैं कि ऐसे नौसिखीयों को एक विश्वस्तरीय चैम्पियनशिप में भेजेंगे. क्या चैम्पियनशिप के जज इतने बेवकूफ हैं कि उन्हें दिखाई ही न दे की कुछ गड़बड़ी है. फराह खान की सारी फिल्में समाज में गलत मैसेज ही भेजती है. उनकी फिल्में देखकर लगता है कि बौलीवूड की फिल्मों में स्क्रीप्ट ही नहीं होता.’

7. दंगल (2016)

साल के अंत की सबसे बड़ी फिल्म को कुछ लोगों ने सराहा, वहीं कुछ लोगों ने फिल्म की आलोचना की. नमन वर्मा के अनुसार एक पिता को गोल्ड मेडल के अलावा कुछ भी नजर नहीं आता. बच्चों से एक बार पूछा नहीं जाता कि वे क्या करना चाहती हैं. इतनी छोट-छोटी बच्चीयां अपने पिता के सपने को ही अपना सपना बनाकर जीती हैं. फिल्म में लड़कियों के पास दो ही ऑप्शन बचते हैं, या तो पहलवानी या फिर घर का काम.

8. स्टूडेंड ऑफ द ईयर (2012)

करण जोहर की यह फिल्म भले ही बॉक्स ऑफिस पर हिट रही हो. पर कोई भी कॉलेज ऐसा नहीं होता जहां पढ़ाई छोड़कर सब कुछ होता हो. Quora पर बहुत से लोगों ने इस फिल्म की आलोचना की. स्टूडेंट ऑफ द ईयर नामक कम्पीटिशन के कारण अच्छे-अच्छे दोस्त दुश्मन बन गए. फिल्म कॉलेज के बारे में लोगों की मानसिकता बदल देती है. बौलीवुड की ज्यादातर फिल्में ऐसा ही करती हैं. ऐसा दिखाया जाता है मानो कॉलेज में पढ़ाई छोड़कर सब कुछ होता हो.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें