Married Life : मेरी वाइफ बहुत झगड़ालू है… मैं क्या करूं?

Married Life : अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल

मैं सरकारी स्कूल में शिक्षक हूं. घर में किसी चीज की दिक्कत नहीं है पर मेरी परेशानी मेरी पत्नी है, जो निहायत ही झगड़ालू और क्रोधी है. घर में मेरी मां के साथ वह हमेशा लड़ती रहती है और मुझ पर दबाव डालती है कि कहीं और फ्लैट ले लो, मुझे तुम्हारी मां के साथ नहीं रहना. मैं किसी भी हाल में अपनी मां को खुद से अलग नहीं कर सकता. बताएं मैं क्या करूं?

जवाब-

पहले तो आप यह जानने की कोशिश करें कि आप की पत्नी ऐसा क्यों चाहती है? तह तक जाए बगैर फिलहाल कोई निर्णय लेना सही नहीं होगा. पत्नी को समझा-बुझा सकते हैं. संभव हो तो पत्नी के मातापिता को भी मध्यस्थ बनाएं. पत्नी के साथ अधिक से अधिक समय बिताएं और साथ घूमनेफिरने जाएं. इन सब से पत्नी सही रास्ते पर आ सकती है.

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वैवाहिक बंधन प्यार का बंधन बना रहे तो इस रिश्ते से बढि़या कोई और रिश्ता नहीं. परंतु किन्हीं कारणों से दिल में दरार आ जाए तो अकसर वह खाई में परिवर्तित होते भी देखी जाती है. कल तक जो लव बर्ड बने फिरते थे, वे ही बाद में एकदूसरे से नफरत करने लगते हैं और बात हिंसा तक पहुंच जाती है.

अतएव पतिपत्नी को परिवार बनाने से पहले ही आपसी मतभेद सुलझा लेने चाहिए और बाद में भी वैचारिक मतभेदों को बच्चों की गैरमौजूदगी में ही दूर करना उचित है ताकि उन का समुचित विकास हो सके.

छोटीछोटी बातों से झगड़े शुरू होते हैं. फिर खिंचतेखिंचते महाभारत का रूप ले लेते हैं. ज्यादातर झगड़े खानदान को ले कर, कमतर अमीरी के तानों, रिश्तेदारों, अपनों के खिलाफ अपशब्द या गालियों, कमतर शिक्षा व स्तर, कमतर सौंदर्य, बच्चे की पढ़ाई व परवरिश, जासूसी, व्यक्तिगत सामान को छूनेछेड़ने, अपनों की आवभगत आदि को ले कर होते हैं. यानी दंपती में से किसी के भी आत्मसम्मान को चोट पहुंचती है तो झगड़ा शुरू हो जाता है, फिर कारण चाहे जो भी हो.

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Best Stories : आलू वड़ा

Best Stories : ‘‘बाबू, तुम इस बार दरभंगा आओगे तो हम तुम्हें आलू वड़ा खिलाएंगे,’’ छोटी मामी की यह बात दीपक के दिल को छू गई.

पटना से बीएससी की पढ़ाई पूरी होते ही दीपक की पोस्टिंग भारतीय स्टेट बैंक की सकरी ब्रांच में कर दी गई. मातापिता का लाड़ला और 2 बहनों का एकलौता भाई दीपक पढ़ने में तेज था. जब मां ने मामा के घर दरभंगा में रहने की बात की तो वह मान गया.

इधर मामा के घर त्योहार का सा माहौल था. बड़े मामा की 3 बेटियां थीं, मझले मामा की 2 बेटियां जबकि छोटे मामा के कोई औलाद नहीं थी.

18-19 साल की उम्र में दीपक बैंक में क्लर्क बन गया तो मामा की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वहीं दूसरी ओर दीपक की छोटी मामी, जिन की शादी को महज 4-5 साल हुए थे, की गोद सूनी थी.

छोटे मामा प्राइवेट नौकरी करते थे. वे सुबह नहाधो कर 8 बजे निकलते और शाम के 6-7 बजे तक लौटते. वे बड़ी मुश्किल से घर का खर्च चला पाते थे. ऐसी सूरत में जब दीपक की सकरी ब्रांच में नौकरी लगी तो सब खुशी से भर उठे.

‘‘बाबू को तुम्हारे पास भेज रहे हैं. कमरा दिलवा देना,’’ दीपक की मां ने अपने छोटे भाई से गुजारिश की थी.

‘‘कमरे की क्या जरूरत है दीदी, मेरे घर में 2 कमरे हैं. वह यहीं रह लेगा,’’ भाई के इस जवाब में बहन बोलीं, ‘‘ठीक है, इसी बहाने दोनों वक्त घर का बना खाना खा लेगा और तुम्हारी निगरानी में भी रहेगा.’’

दोनों भाईबहनों की बातें सुन कर दीपक खुश हो गया. मां का दिया सामान और जरूरत की चीजें ले कर दोपहर 3 बजे का चला दीपक शाम 8 बजे तक मामा के यहां पहुंच गया.

‘‘यहां से बस, टैक्सी, ट्रेन सारी सुविधाएं हैं. मुश्किल से एक घंटा लगता है. कल सुबह चल कर तुम्हारी जौइनिंग करवा देंगे,’’ छोटे मामा खुशी से चहकते हुए बोले.

‘‘आप का काम…’’ दीपक ने अटकते हुए पूछा.

‘‘अरे, एक दिन छुट्टी कर लेते हैं. सकरी बाजार देख लेंगे,’’ छोटे मामा दीपक की समस्या का समाधान करते हुए बोल उठे.

2-3 दिन में सबकुछ सामान्य हो गया. सुबह साढ़े 8 बजे घर छोड़ता तो दीपक की मामी हलका नाश्ता करा कर उसे टिफिन दे देतीं. वह शाम के 7 बजे तक लौट आता था.

उस दिन रविवार था. दीपक की छुट्टी थी. पर मामा रोज की तरह काम पर गए हुए थे. सुबह का निकला दीपक दोपहर 11 बजे घर लौटा था. मामी खाना बना चुकी थीं और दीपक के आने का इंतजार कर रही थीं.

‘‘आओ लाला, जल्दी खाना खा लो. फेरे बाद में लेना,’’ मामी के कहने में भी मजाक था.

‘‘बस, अभी आया,’’ कहता हुआ दीपक कपड़े बदल कर और हाथपैर धो कर तौलिया तलाशने लगा.

‘‘तुम्हारे सारे गंदे कपड़े धो कर सूखने के लिए डाल दिए हैं,’’ मामी खाना परोसते हुए बोलीं.

दीपक बैठा ही था कि उस की मामी पर निगाह गई. वह चौंक गया. साड़ी और ब्लाउज में मामी का पूरा जिस्म झांक रहा था, खासकर दोनों उभार.

मामी ने बजाय शरमाने के चोट कर दी, ‘‘क्यों रे, क्या देख रहा है? देखना है तो ठीक से देख न.’’

अब दीपक को अजीब सा महसूस होने लगा. उस ने किसी तरह खाना खाया और बाहर निकल गया. उसे मामी का बरताव समझ में नहीं आ रहा था.

उस दिन दीपक देर रात घर आया और खाना खा कर सो गया.

अगली सुबह उठा तो मामा उसे बीमार बता रहे थे, ‘‘शायद बुखार है, सुस्त दिख रहा है.’’

‘‘रात बाहर गया था न, थक गया होगा,’’ यह मामी की आवाज थी.

‘आखिर माजरा क्या है? मामी क्यों इस तरह का बरताव कर रही हैं,’ दीपक जितना सोचता उतना उलझ रहा था.

रात खाना खाने के बाद दीपक बिस्तर पर लेटा तो मामी ने आवाज दी. वह उठ कर गया तो चौंक गया. मामी पेटीकोट पहने नहा रही थीं.

‘‘उस दिन चोरीछिपे देख रहा था. अब आ, देख ले,’’ कहते हुए दोनों हाथों से पकड़ उसे अपने सामने कर दिया.

‘‘अरे मामी, क्या कर रही हो आप,’’ कहते हुए दीपक ने बाहर भागना चाहा मगर मामी ने उसे नीचे गिरा दिया.

थोड़ी ही देर में मामीभांजे का रिश्ता तारतार हो गया. दीपक उस दिन पहली बार किसी औरत के पास आया था. वह शर्मिंदा था मगर मामी ने एक झटके में इस संकट को दूर कर दिया, ‘‘देख बाबू, मुझे बच्चा चाहिए और तेरे मामा नहीं दे सकते. तू मुझे दे सकता है.’’

‘‘मगर ऐसा करना गलत होगा,’’ दीपक बोला.

‘‘मुझे खानदान चलाने के लिए औलाद चाहिए, तेरे मामा तो बस रोटीकपड़ा, मकान देते हैं. इस के अलावा भी कुछ चाहिए, वह तुम दोगे,’’ इतना कह कर मामी ने दीपक को बाहर भेज दिया.

उस के बाद से तो जब भी मौका मिलता मामी दीपक से काम चला लेतीं. या यों कहें कि उस का इस्तेमाल करतीं. मामा चुप थे या जानबूझ कर अनजान थे, कहा नहीं जा सकता, मगर हालात ने उन्हें एक बेटी का पिता बना दिया.

इस दौरान दीपक ने अपना तबादला पटना के पास करा लिया. पटना में रहने पर घर से आनाजाना होता था. छोटे मामा के यहां जाने में उसे नफरत सी हो रही थी. दूसरी ओर मामी एकदम सामान्य थीं पहले की तरह हंसमुख और बिंदास.

एक दिन दीपक की मां को मामी ने फोन किया. मामी ने जब दीपक के बारे में पूछा तो मां ने झट से उसे फोन पकड़ा दिया.

‘‘हां मामी प्रणाम. कैसी हो?’’ दीपक ने पूछा तो वे बोलीं, ‘‘मुझे भूल गए क्या लाला?’’

‘‘छोटी ठीक है?’’ दीपक ने पूछा तो मामी बोलीं, ‘‘बिलकुल ठीक है वह. अब की बार आओगे तो उसे भी देख लेना. अब की बार तुम्हें आलू वड़ा खिलाएंगे. तुम्हें खूब पसंद है न.’’

दीपक ने ‘हां’ कहते हुए फोन काट दिया. इधर दीपक की मां जब छोटी मामी का बखान कर रही थीं तो वह मामी को याद कर रहा था जिन्होंने उस का आलू वड़ा की तरह इस्तेमाल किया, और फिर कचरे की तरह कूड़ेदान में फेंक दिया.

औरत का यह रूप उसे अंदर ही अंदर कचोट रहा था.

‘मामी को बच्चा चाहिए था तो गोद ले सकती थीं या सरोगेट… मगर इस तरह…’ इस से आगे वह सोच न सका.

मां चाय ले कर आईं तो वह चाय पीने लगा. मगर उस का ध्यान मामी के घिनौने काम पर था. उसे चाय का स्वाद कसैला लग रहा था.

Kahaniyan : साहब की चतुराई

Kahaniyan : तबादले पर जाने वाला नौजवान अफसर विजय आने वाले नौजवान अफसर नितिन को अपने बंगले पर ला कर उसे चपरासी रामलाल के बारे में बता रहा था. नितिन ने जब चपरासी रामलाल की फिल्म हीरोइन जैसी खूबसूरत बीवी को देखा, तो वह उसे देखता ही रह गया. नितिन बोला, ‘‘यार, तुम्हारी यह चपरासी की बीवी तो कमाल की है. तुम ने तो इस के साथ खूब मजे किए होंगे?’’ ‘‘नहीं यार, ये छोटे लोग बहुत ही धर्मकर्म पर चलते हैं और इस के लिए अपना सबकुछ कुरबान कर देते हैं. ये लोग पद और पैसे के लिए अपनी इज्जत को नहीं बेचते हैं. मैं ने भी इसे लालच दे कर पटाने की खूब कोशिश की थी, मगर इस ने साफ मना कर दिया था.’’

यह सुन कर नितिन विजय की ओर हैरानी से देखने लगा.

नितिन को इस तरह देख विजय अपनी सफाई में बोला, ‘‘ये छोटे लोग हम लोगों की तरह नहीं होते हैं, जो अपने किसी काम को बड़े अफसर से कराने के लिए अपनी बहनबेटियों और बीवियों को भी उन के साथ सुला देते हैं. हमारी बहनबेटियों और बीवियों को भी सोने में कोई दिक्कत नहीं होती है, क्योंकि वे तो अपने स्कूल और कालेज की पढ़ाई करते समय अपने कितने ही बौयफ्रैंड्स के साथ सो चुकी होती हैं.’’ इतना सुन कर नितिन मन ही मन  उस चपरासी की बीवी को पटाने की तरकीब सोचने लगा.

विजय से चार्ज लेने के बाद नितिन अपने सरकारी बंगले में रहने लग गया था. शाम को जब वह अपने बंगले पर आया, तो चपरासी रामलाल उस से बोला, ‘‘साहब, आप को शराब पीने का शौक हो तो लाऊं? पुराने साहब तो रोजाना पीने के लिए बोतल मंगवाते थे.’’

‘‘और क्याक्या मंगवाते थे तुम्हारे पुराने साहब?’’

चपरासी रामलाल बोला, ‘‘कालेज में पढ़ने वाली लड़की भी मंगवाते थे. वे पूरी रात के उसे 2 हजार रुपए देते थे.’’ ‘‘ले आना,’’ सुन कर नितिन ने उस से कहा, तो वह उन के लिए शराब की बोतल और उस लड़की को ले आया था.

उस लड़की और उस अफसर ने शराब पी कर रातभर खूब मजे किए. जाते समय नितिन ने उसे 3 हजार रुपए दिए और उस से कहा कि वह चपरासी रामलाल से कहे कि तुम्हारे ये कैसे साहब हैं, जिन्होंने रातभर मेरे साथ कुछ किया ही नहीं था, बल्कि मुझे छुआ भी नहीं था, फिर भी मुझे 3 हजार रुपए मुफ्त में दे दिए हैं.’’ उस लड़की ने चपरासी रामलाल से यह सब कहने की हामी भर ली. जब वह लड़की वहां से जाने लगी, तो चपरासी रामलाल से बोली, ‘‘तुम्हारे ये साहब तो बेकार ही रातभर लड़की को अपने बंगले पर रखते हैं, उस के साथ कुछ करते भी नहीं हैं, मगर फिर भी उस को पैसे देते हैं. तुम्हारे साहब का तो दिमाग ही खराब है.’’

यह सुन कर चपरासी रामलाल हैरान हो कर उस की ओर देखने लगा, तो वह उस से बोली, ‘‘तुम्हारे साहब ने तो रातभर मुझे छुआ भी नहीं, फिर भी मुझे 3 हजार रुपए दे दिए हैं,’’ कह कर वह वहां से चली गई. उस लड़की की बातें सुन कर चपरासी रामलाल सोचने लगा था कि उस के अफसर का दिमाग खराब है या वे औरत के काबिल नहीं हैं, फिर भी उन्हें औरतों को अपने साथ सुला कर उन पर अपने पैसे लुटाने का शौक है. चपरासी रामलाल अपने कमरे पर आ कर बीवी सरला से बोला, ‘‘हमारे ये नए साहब तो बेकार ही अपने पैसे लड़की पर लुटाते हैं.’’ ‘‘वह कैसे?’’ सुन कर सरला ने रामलाल से पूछा, तो वह बोला, ‘‘कल रात को मैं साहब के लिए एक लड़की लाया था, लेकिन उन्होंने उस के साथ कुछ भी नहीं किया. यहां तक कि उन्होंने उसे छुआ भी नहीं, मगर फिर भी उन्होंने उसे 3 हजार रुपए दे दिए.’’

यह सुन कर उस की बीवी सरला हैरानी से उस की ओर देखने लगी, तो वह उस से बोला, ‘‘क्यों न अपने इस साहब से हम पैसे कमाएं?’’ ‘‘वह कैसे?’’ सरला ने उस से पूछा, तो वह बोला, ‘‘तुम इस साहब के साथ सो जाया करो. यह साहब तुम्हारे साथ कुछ करेगा भी नहीं और उस से मुफ्त में ही हम को पैसे मिल जाएंगे. उन पैसों से हम अपने लिए नएनए गहने भी बनवा लेंगे और जरूरत का सामान भी खरीद लेंगे.

‘‘मेरा कितने दिनों से नई मोटरसाइकिल खरीदने का मन कर रहा है, मगर पैसे न होने से खरीद ही नहीं पाता हूं. जब तुम्हें नएनए गहनों में नए कपड़े पहना कर मोटरसाइकिल पर बिठा कर अपने गांव और ससुराल ले जाऊंगा, तो वे लोग हम से कितने खुश होंगे. हमारी तो वहां पर धाक ही जम जाएगी.’’ ‘‘कहीं यह तुम्हारा साहब मुझ से मजे लेने लग गया तो…’’ खूबसूरत बीवी सरला ने अपना शक जाहिर किया, तो वह उसे तसल्ली देते हुए बोला, ‘‘तुम इस बात की चिंता मत करो. वह तुम से मजे नहीं लेगा.’’

पति रामलाल की इस बात को सुन कर बीवी सरला अपने साहब के साथ सोने के लिए तैयार हो गई. शाम को अपने साहब के लिए शराब लाने के बाद रात को चपरासी रामलाल ने अपनी बीवी सरला को उन के कमरे में भेज दिया. साहब जब उस पर हावी होने लगे, तो उसे बड़ी हैरानी हो रही थी, क्योंकि उस के पति ने तो उस से कहा था कि साहब उसे छुएगा भी नहीं, मगर उस का साहब तो उस पर ऐसा हावी हुआ था कि… रातभर में साहब ने उसे इतना ज्यादा थका दिया था कि वह सो न सकी. सरला को अपने पति पर बहुत गुस्सा आ रहा था, लेकिन गुस्से को दबा कर मुसकराते हुए दूसरे दिन अपने पति से वह बोली, ‘‘तुम्हारे साहब ने तो मुझे छुआ भी नहीं. हम ने मुफ्त में ही उन से पैसे कमा लिए.’’ यह सुन कर उस का पति रामलाल अपनी अक्लमंदी पर खुशी से मुसकराने लगा, तो वह उस से बोली, ‘‘मुझे रातभर तुम्हारी याद सताती रही थी. क्यों न हम तुम्हारी बहन नीता को गांव से बुला कर तुम्हारे साहब के साथ सुला दिया करें. ‘‘तुम्हारा साहब उस के साथ कुछ करेगा भी नहीं और उस से मिले पैसों से हम उस की शादी भी धूमधाम से कर देंगे.’’

यह सुन कर रामलाल बीवी सरला की इस बात पर सहमत हो गया. वह उस से बोला, ‘‘तुम इस बारे में नीता को समझा देना. मैं आज ही उसे फोन कर के बुलवा लूंगा.’’ शाम को जब चपरासी रामलाल की बहन नीता वहां पर आई, तो सरला उस से बोली, ‘‘ननदजी, तुम गांव के लड़कों को मुफ्त में ही मजे देती फिरती हो. किसी दिन किसी ने देख लिया, तो गांव में बदनामी हो जाएगी. इसलिए तुम यहीं रह कर हमारे साहब के साथ रातभर सो कर मजे भी लो और पैसे भी कमाओ.’’ यह सुन कर उस की ननद नीता खुशी से झूम उठी थी. रातभर वह साहब के साथ मौजमस्ती कर के सुबह जब उन के कमरे से निकली, तो बहुत खुश थी. साहब ने उसे 5 हजार रुपए दिए थे. कुछ ही दिनों में चपरासी रामलाल अपने लिए नई मोटरसाइकिल ले आया था और अपनी बीवी सरला और बहन नीता के लिए नएनए जेवर और कपड़े भी खरीद चुका था, क्योंकि उस के साहब अपने से बड़े अफसरों को खुश रखने के लिए उन दोनों को उन के पास भेजने लगे थे. एक दिन सरला और नीता आपस में बातें करते हुए कह रही थीं कि उन के साहब तो रातभर उन्हें इतने मजे देते हैं कि उन्हें मजा आ जाता है.

उन की इन बातों को जब चपरासी रामलाल ने सुना, तो वह अपने साहब की इस चतुराई पर हैरान हो उठा था. लेकिन अब हो भी क्या सकता था. रामलाल ने सोचा कि जो हो रहा है, होने दो. उन से पैसे तो मिल ही रहे हैं. उन पैसों के चलते ही उस की अपने गांव और ससुराल में धाक जम चुकी थी, क्योंकि आजकल लोग पैसा देखते हैं, चरित्र नहीं.

लेखिका- यामेश्वरी

Family Drama 2025 : अम्मी कहां – कहां खो गईं थी अम्मी

Family Drama 2025 :  ‘‘अम्मीजान, आप यहीं खड़ी रहना, मैं टिकट ले कर अभी आता हूं,’’ कह कर मोहिन खान अपनी मां को रेलवे प्लेटफार्म की तरफ जाने वाली सीढ़ी के पास छोड़ कर टिकट लेने चला गया.

टिकट खिड़की पर लाइन लंबी थी, जो बस स्टौप तक पहुंच गई. उसे इतनी भीड़ होने का अंदाजा न था. उस ने सोचा, ‘टिकट ही तो लेनी है. उस में कौन सी बड़ी बात है.’

पर जब वह टिकट लेने पहुंचा, तो सब ने उसे ‘लाइन से आओ’ कह कर पीछे भेज दिया. वह सब से पीछे जा कर खड़ा हो गया और लाइन आगे बढ़ने का इंतजार करता रहा. पर कहां? लाइन वहीं की वहीं, धीरेधीरे चींटी की तरह आगे बढ़ रही थी.

मोहिन खान को अपनी मां को ले कर भिंडी बाजार जाना था. कल उस के भतीजे का पहला जन्मदिन था.

चूंकि उस की मां की उम्र हो चुकी थी. उस ने सोचा कि आज मां को वहां छोड़ कर कल शाम अपनी बीवी और बच्चे को साथ ले जाएगा, इसलिए मां को भाई के घर छोड़ कर उसे किसी भी हाल में वापस लौटना था, क्योंकि नौकरों के भरोसे वह दुकान छोड़ नहीं सकता था, इसलिए उसे जल्दी थी.

वहां उस की अम्मी इंतजार कर के थक गईं. मन ही मन कुढ़ते हुए वे सोचने लगीं कि पता नहीं कहां चला गया. कह कर गया था कि टिकट लाने जा रहा हूं, पर इतनी देर हो गई और अब तक नहीं लौटा.

उन्होंने गुस्से में आव देखा न ताव धीरेधीरे सीढ़ी चढ़ कर 2 नंबर के प्लेटफार्म पर आ गईं. यह सोच कर कि उन का बेटा पीछेपीछे आ जाएगा.

जो ट्रेन आई, वे उस में चढ़ गईं.

उन्हें अपनी सहेली की बेटी सुलताना मिली. उसे भी भिंडी बाजार जाना था. वे कई सालों बाद उस से मिलीं, तो बतियाने लगीं.

इधर मोहिन खान टिकट ले कर सीढि़यों के पास पहुंचा. वहां अपनी अम्मी को न देख कर वह घबरा गया. उस ने टिकटघर के आसपास का सारा इलाका छान मारा, पर उसे उस की अम्मी कहीं नहीं नजर आईं.

शाम ढल चुकी थी. अंधेरा भी हो गया. सड़कें, दुकान, मकान, होटल यहां तक कि टिकटघर के साथ प्लेटफार्म भी बिजली की रोशनी से जगमगाने लगे थे.

उस ने सभी प्लेटफार्म देख लिए, पर अम्मी का कहीं पता नहीं चला. पूछताछ करे भी तो किस से? उसे कुछ भी सूझ नहीं रहा था कि वह क्या करे.

मोहिन खान ने बारीबारी से सब को फोन कर के पूछ लिया, पर कहीं से भी उस की अम्मी के पहुंचने की खबर नहीं मिली. अब तो वह और भी डर गया. उस के परिवार वाले भी परेशान थे. भिंडी बाजार में फोन करने पर उस के भाईजान और भाभीजान दोनों परेशान हो गए. कुर्ला से भायखाला का आधे घंटे का सफर है, फिर वे कहां रह गईं.

भिवंडी में मझले भाई असलम को पता चला, तो वह भी परेशान हो गया. गोवंडी में मोहिन खान की आपा को जब यह बात पता चली, तो वे बहुत गुस्से में बिफर कर फोन पर ही चिल्लाईं, ‘कितने लापरवाह हो तुम लोग? अभी कल ही तो छोड़ आई थी मैं उन्हें, कहीं कोई झगड़ा तो नहीं कर लिया किसी ने?’ कह कर गुस्से से फोन रख दिया.

मझला भाई भी अपने परिवार के साथ अम्मी को ढूंढ़ता हुआ पहुंच गया. फिर सब ने मिल कर अंदाजा लगाया कि कहीं वे वापस मोहिन खान के घर तो नहीं चली गईं?

यह सोच कर मझले भाई ने उसे फोन लगा कर कहा, ‘‘देखो मोहिन, तुम घबराना मत. तुम एक काम करो, एक बार घर जा कर देख लो. कहीं वे वापस न चली गई हों. अगर वे घर पर न हों, तो भी फिक्र मत करो. तुम दुकान बंद कर के बीवीबच्चों के साथ यहां चले आओ. हम सब मिल कर ढूंढ़ते हैं.’’

‘‘अच्छा भाईजान,’’ कह कर मोहिन खान सीधा घर गया. वहां अम्मी को न पा कर दोनों मियांबीवी कुछ देर बाद भिंडी बाजार पहुंच जाते हैं.

सब कितने खुश थे कि कल असलम के बच्चे का पहला जन्मदिन मनाया जाने वाला था. सब सोच रहे थे कि बड़े धूमधाम से जन्मदिन मनाएंगे कि अचानक यह खबर मिली. जहां कल के जश्न की तैयारियां होनी थीं, आज वहां एक अजीब सी खामोशी छाई थी.

जैसेजैसे रात होती गई, सब की फिक्र भी बढ़ती जा रही थी. सब के चेहरे मायूस थे. फिर सब ने तय किया कि अगर कल शाम तक कोई खबर नहीं मिली या अम्मी नहीं लौटीं, तो पुलिस में शिकायत दर्ज करेंगे. रात के साढ़े 11 बजे थे. सब थक चुके थे, पर किसी को भी न भूख थी, न आंखों में नींद.

अचानक दरवाजे की घंटी बजी. दरवाजा खुलते ही सामने अम्मी को एक अजनबी के साथ देख कर सब को हैरानी हुई. सब के चेहरे खुशी से चमक उठे.

अम्मी ने उस अजनबी को भीतर बुलाया और सोफे पर बैठाया. बहू से कहा, ‘‘शबनम, जरा पानी तो लाना.’’

‘‘जी अम्मीजान,’’ कह कर वह रसोईघर में गई और एक ट्रे में एक जग पानी भर कर और कुछ खाली गिलास भी ले आई.

तब तक अम्मी भी बैठ चुकी थीं. उन को पानी पिला कर वह जाने लगी, तो अम्मी ने कहा, ‘‘बहू, ये हमारे मेहमान हैं, आज रात यहीं रुकेंगे. इन के खानेपीने का इंतजाम करो.’’

‘‘जी अम्मीजान,’’ कह कर वह वापस रसोईघर में चली गई.

अब अम्मी बेटों और दामाद की ओर मुड़ कर बोलीं, ‘‘यह मेरी सहेली का बेटा है, जो मुझे छोड़ने आया है. हुआ यों कि मैं मोहिन खान के इंतजार में खड़ीखड़ी थक कर यह सोच कर धीरेधीरे चल पड़ी कि मेरे पीछे चला आएगा, पर वह नजर ही नहीं आया…

‘‘मैं यह सोच कर गाड़ी में भी चढ़ गई कि वह पीछे ही होगा, पर इस का तो पता ही नहीं था.

‘‘फिर मुझे मेरी सहेली की बेटी सुलताना मिली. उस से पता चला कि उस की मां की तबीयत आजकल खराब चल रही है, इसलिए मैं उसे देखने चली गई थी. वह भिंडी बाजार में ही रहती है.’’

यह सुन कर सब खामोश हो गए. कुछ ही देर में शबनम ने आ कर अम्मी के कान में कहा, ‘‘अम्मीजान, खाना लग चुका है.’’

‘‘चलो, खाना लग चुका है,’’ अम्मी ने कहा.

बाद में अम्मी अपनी सहेली के बेटे अजीज को मेहमानों के कमरे में पहुंचा कर खुद भी आराम करने अपने कमरे में चली गईं. बाकी सब भी सोने के लिए जाने की तैयारी में थे कि ऐसे में असलम के मोबाइल फोन की घंटी बजी. सामने से पूछा गया… ‘अम्मी कहां…’

इस से पहले कि उस की बात पूरी होती, असलम ने कहा, ‘‘अम्मी यहां…’’ और इस से आगे वह खुशी के मारे कुछ भी नहीं कह पाया.

लेखिका- रश्मि नायर

Stories In Hindi : खुद ही – नरेन और रेखा के बीच क्या संबंंध था

Stories In Hindi : रात के साढ़े 10 बजे थे. नरेन के आने का कोई अतापता नहीं था. हालांकि उस ने विभा को फोन कर दिया था कि उसे आने में देर हो जाएगी, सो वह खाना खा कर, दरवाजा बंद कर सो जाए, उस का इंतजार न करे. चाबी उस के पास है ही. वह आ कर दरवाजा खोल कर जोकुछ खाने को रखा है, खा कर सो जाएगा. यह जानते हुए भी विभा नरेन के आने के इंतजार में करवटें बदल रही थी. वह देखना चाहती थी कि आखिर उस के आने में कितनी देर होती है, जबकि बेटी अंशिता सो चुकी थी.

समय काटने के लिए विभा ने रेडियो पर पुराने गाने लगा दिए थे, जिन्हें सुनतेसुनते उसे कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला. एकाएक विभा की नींद टूटी. उस ने चालू रेडियो को बंद करना चाहा कि उस गाने को सुन कर उस के हाथ रेडियो बंद करतेकरते रुक गए. गाने के बोल थे, ‘अपने जीवन की उलझन को कैसे मैं सुलझाऊं. बीच भंवर में नाव है मेरी कैसे पार लगाऊं…’ गाने ने जैसे मन की बात कह दी. गाने जैसी खींचातानी उस की जिंदगी में भी हो रही थी.

‘कोई कामधाम नहीं है, यह सब बहानेबाजी है,’ विभा ने मन ही मन कहा. दरअसल, नरेन उस रेखा के चक्कर में है जिस से वह उस से एक बार मिलवा भी चुका था. विभा से वह घड़ी आज भी भुलाए नहीं भूलती. कितना जोश में आ कर उस ने परिचय कराया था. ‘इन से मिलो विभा, ये मेरे औफिस में ही हैं, हमारे साथ काम करने वाली रेखा. बहुत अच्छा स्वभाव है इन का… और रेखा, ये हैं मेरी पत्नी विभा…’

विभा को शक हो गया था. एक पराई औरत के प्रति ऐसा खिंचाव. और तो और बाद में वह उसे छोड़ने भी गया था. चाहता तो किसी बस में बिठा कर विदा भी कर सकता था, पर नहीं. गाना खत्म हुआ तो विभा ने रेडियो बंद कर दिया और सोने की कोशिश करने लगी. आखिरकार नींद लग ही गई.

पता नहीं, कितना समय हुआ कि उस ने अपने शरीर पर किसी का हाथ महसूस किया. उसे लग गया था कि यह नरेन ही है. उस ने उस के हाथ को अपने पर से हटाया और उनींदी में कहने लगी, ‘‘सोने दो. नींद आ रही है. कहां थे इतनी देर से. समय से आना चाहिए न.’’ ‘‘क्या करूं डार्लिंग, कोशिश तो जल्दी आने की ही करता हूं,’’ नरेन ने विभा को अपनी ओर खींचते हुए कहा.

‘‘आप रेखा से मिल कर आ रहे हैं न…’’ विभा ने अपनेआप को छुड़ाते हुए ताना सा कसा, ‘‘इतनी अच्छी है तो मुझ से शादी क्यों की? कर लेते उसी से…’’ ‘‘विभा, छोड़ो भी न. यह भी कोई समय है ऐसी बातों का. आज अच्छा मूड है, आओ न.’’

‘‘तुम्हारा तो अच्छा मूड है, पर मेरा तो मूड नहीं है न. चलो, सो जाओ प्लीज,’’ विभा दूसरी ओर मुंह कर के सोने की कोशिश करने लगी. ‘‘तुम पत्नियां भी न… कब समझोगी अपने पति को,’’ नरेन ने निराश हो कर कहा.

‘‘पहले तुम मेरे हो जाओ.’’ ‘‘तुम्हारा ही तो हूं बाबा. पिछले

15 सालों से तुम्हारा ही हूं विभा. मेरा यकीन मानो.’’ ‘‘तो सच बताओ, इतनी देर तक उस रेखा के साथ ही थे न?’’

‘‘देखो, जब तक मैं उस कंपनी में था, उस के पास था. जब मैं वहां से जौब छोड़ कर अपनी खुद की कौस्मैटिक की मार्केटिंग का काम कर रहा हूं तो अब वह यहां भी कहां से आ गई?’’ ‘‘मुझे तो यकीन नहीं होता. अच्छा बताओ कि तुम ने नहीं कहा था कि अब जब मैं अपना काम कर रहा हूं तब तो मैं समय से आ जाया करूंगा. तुम तो अब भी ऐसे ही आ रहे हो जैसे उसी कंपनी में काम करते हो.’’

‘‘अपना काम है न. सैट करने में समय तो लगता ही है. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा. मेरी बात मानो. अब सब तुम्हारे हिसाब से चलने लगेगा. ठीक है, अच्छा अब तो मान जाओ.’’ ‘‘नहीं, बिलकुल नहीं. मुझे तो बिलकुल यकीन नहीं होता. तुम एक नंबर के झूठे हो. मैं कई बार तुम्हारा झूठ पकड़ चुकी हूं.’’

‘‘तो तुम नहीं मानोगी?’’ ‘‘जब तक मुझे पक्का यकीन नहीं हो जाता,’’ निशा ने कहा.

‘‘तो तुम्हें यकीन कैसे होगा?’’ ‘‘बस, सच बोलना शुरू कर दो और समय से घर आना शुरू कर दो.’’

‘‘अच्छी बात है. कोशिश करता हूं,’’ रंग में भंग पड़ता देख नरेन ने अपने कदम पीछे खींच लेने में ही भलाई समझी. वह नहीं चाहता था कि बात आगे बढ़े. वह भी करवट बदल कर सोने की कोशिश करने लगा. विभा का शक नरेन के प्रति यों ही नहीं था. दरअसल, कुछ महीने पहले की बात है. वह और विभा बच्ची अंशिता के साथ शहर के एक बड़े गार्डन में घूमने गए थे जहां वह रेखा के साथ भी घूमने जाता रहा था. वहां से वे अपने एक परिचित भेल वाले के यहां नाश्ते के लिए चले गए.

भेल वाले ने सहज ही पूछ लिया था कि आज आप के साथ वे बौबकट बालों वाली मैडमजी नहीं हैं? बस, यह सुनते ही विभा के तनबदन में आग लग गई थी और घर लौट कर उस ने नरेन की अच्छे से खबर ली थी.

नरेन ने लाख सफाई दी, पर विभा नहीं मानी थी. जैसेतैसे आगे न मिलने की कसम खा कर नरेन ने अपना पिंड छुड़ाया था. विभा की बातों में सचाई थी इसलिए नरेन कमजोर पड़ता था. नरेन रेखा के चक्कर में इस कदर पड़ा था कि वह चाह कर भी खुद को रेखा से अलग नहीं कर पा रहा था.

रेखा का खूबसूरत बदन और कटार जैसे तीखे नैन. नरेन फिदा था उस पर. अब एक ही रास्ता था कि रेखा शादी कर ले और अपना घर बसा ले, पर एक तरह से रेखा यह जानते हुए कि नरेन शादीशुदा है, वह खुद को उसे सौंप चुकी थी. नरेन में उसे पता नहीं क्या नजर आता था. यहां तक कि जब विभा गांव में कुछ दिनों के लिए अपनी मां के यहां जाती तो रेखा नरेन के यहां आ जाती और फिर दोनों मजे करते.

पर विभा को किसी तरह इस बात की भनक लग गई थी, इसलिए उस ने अब मां के यहां जाना कम कर दिया था. विभा संबंधों की असलियत को समझ नहीं पा रही थी क्योंकि जहां एक ओर वह मां बनने के बाद नरेन से प्यार में कम दिलचस्पी लेती थी या लेती ही नहीं थी, वहीं दूसरी ओर नरेन अब भी विभा से पहले वाले प्यार की उम्मीद रखता था. उस की तो इच्छा होती थी कि हर रात सुहागरात हो. पर जब विभा से उस की मांग पूरी नहीं होती तो वह रेखा की तरफ मुड़ जाता था. इस तरह नरेन का रेखा से जुड़ाव एक मजबूरी था जिसे विभा समझ नहीं पा रही थी.

विभा ने रेखा वाली सारी बातें अपने तक ही सीमित रखी थीं. अगर वह नरेन के रेखा से प्रेम संबंध वाली बात अपने मां या बाबूजी को बताती तो उन्हें बहुत दुख पहुंचता, जो वह नहीं चाहती थी. विभा के सामने यह जो रेखा वाली उलझन है वह इसे खुद ही सुलझा लेना चाहती थी.

2 बच्चों में से एक बच्चा यानी अंशिता से बड़ा लड़का अर्पित तो अपने ननिहाल में पढ़ रहा है, क्योंकि यहां पैसे की समस्या है. अभी मकान हो जाएगा, तो हो जाएगा, फिर बच्चों का कैरियर, उन की शादी का काम आ पड़ेगा. ऐसे में खुद का मकान तो होने से रहा. नरेन के प्यार के इस तेज बहाव को ले कर विभा एक बार डाक्टर से मिलने की कोशिश भी कर चुकी थी कि प्यार में अति का भूत उस पर से किसी तरह उतरे. ऐसा होने पर वह रेखा से भी दूर हो सकेगा. उस ने यह भी जानने की कोशिश की थी कि कहीं वह कुछ करता तो नहीं है, पर ऐसी कोई बात नहीं थी. अब वह अंशिता को ज्यादातर अपने आसपास ही रखती थी ताकि नरेन को भूल कर भी एकांत न मिले.

अगले दिन नरेन ने काम पर जाते हुए विभा के हाथ में 200 रुपए रखे और मुसकराते हुए उस की कलाई सहलाई. विभा ने आंखें तरेरीं. नरेन सहमते हुए बोला, ‘‘जानू, आज साप्ताहिक हाट है. सब्जी के लिए पैसे दे रहा हूं. भूलना मत वरना फिर रोज आलू खाने पड़ेंगे,’’ कहते हुए टीवी देख रही अंशिता को प्यार से अपने पास बुलाते हुए उस से शाम को आइसक्रीम खिलाने का वादा करते हुए अपने बैग को थामते हुए बाहर निकल गया. विभा दरवाजा बंद कर अपने काम में जुट गई. उसे तो याद ही नहीं था कि सचमुच आज तो हाट का दिन है और उसे हफ्तेभर की सब्जी भी लानी है. वह अंशिता की मदद ले कर फटाफट काम पूरा करने में जुट गई.

कामकाज खत्म कर अंशिता को पढ़ाई की हिदायत दे कर बड़ा सा झोला उठाए विभा दरवाजा लौक कर बाजार की ओर निकल गई. उसे अंशिता के चलते घर जल्दी लौटने की फिक्र थी. अभी विभा कुछ सब्जियां ही ले पाई थी और एक सब्जी का मोलभाव कर रही थी कि किसी ने पीछे से कंधे पर हाथ रखा. विभा पलटी तो एक अजनबी औरत को देख कर अचरज करने लगी.

‘‘तुम विभा ही हो न,’’ उस अजनबी औरत ने विभा को हैरानी में देखा तो पूछा, ‘‘जी. पर, आप कौन हैं? ‘‘अरे, तारा दीदी आप… दरअसल, आप को जूड़े में देखा तो…’’ झटपट विभा ने तारा टीचर के पैर छू लिए.

‘‘सही पहचाना तुम ने. कितनी कमजोर थी तुम पढ़ने में, जब तुम मेरे घर ट्यूशन लेने आती थी. इसी से तुम मुझे याद हो वरना एक टीचर के पास से कितने स्टूडैंट पढ़ कर निकलते हैं. कितनों को याद रख पाते हैं हम लोग,’’ आशीर्वाद देते हुए तारा दीदी ने कहा. ‘‘मेरा घर यहां नजदीक ही है. आइए न. घर चलिए,’’ विभा ने कहा.

‘‘नहींनहीं, फिर कभी. अब मैं रिटायर हो चुकी हूं और पास की कालोनी में रहती हूं. लो, यह है मेरा विजिटिंग कार्ड. घर आना. खूब बातें करेंगे. अभी इस वक्त थोड़ा जल्दी है वरना रुकती. अच्छा चलती हूं विभा.’’ विभा ने कार्ड पर लिखा पता पढ़ा और अपने पर्स में रख कर सब्जी के लिए आगे बढ़ गई.

विभा ने तय किया कि वह अगले दिन तारा दीदी से मिलने उन के घर जरूर जाएगी. उसे लगा कि तारा दीदी उस की उलझन को सुलझाने में मदद कर सकती हैं. अगले दिन सारा काम निबटा कर वह अंशिता को पड़ोस में रहने वाली उस की हमउम्र सहेली के पास छोड़ कर तारा दीदी के घर की ओर चल पड़ी. उसे घर ढूंढ़ने में जरा भी परेशानी नहीं हुई. उस ने डोर बेल बजाई तो दरवाजा खोलने वाली तारा दीदी ही थीं.

‘‘आओ विभा,’’ कह कर अपने साथ अंदर ड्राइंगरूम में ले जा कर बिठाया. सबकुछ करीने से सजा हुआ था. शरबत वगैरह पीने के बाद तारा दीदी ने विभा का हाथ अपने हाथ में लेते हुए पूछा, ‘‘कहो, क्या बात है विभा. सबकुछ ठीकठाक है. जिंदगी किस तरह चल रही है? तुम्हारे मिस्टर, तुम्हारे बच्चे…’’ विभा फिर जो शुरू हुई तो बोलती चली गई. तारा दीदी बड़े गौर से सारी बातें सुन रही थीं. उन्हें लगा कि विभा की मुश्किल हल करने में अभी भी एक टीचर की जरूरत है. स्कूल में विभा सवाल ले कर जाती थी, आज वह अपनी उलझन ले कर आई है.

अपनी उलझन बता देने से विभा काफी हलका महसूस हो रही थी जैसे कोई सिर पर से बोझ उतर गया हो. तारा दीदी ने गहरी सांस ली. उन्होंने कहा, ‘‘मुझे गर्व है कि तुम मेरी स्टूडैंट हो. अपना यह सब्र बनाए रखना. ऐसा कोई गलत कदम मत उठाना जिस से घर बरबाद हो जाए. आखिर ये 2 बच्चों के भविष्य का भी सवाल है.’’

‘‘तो बताओ न दीदी, मुझे क्या करना चाहिए?’’ विभा ने पूछा. ‘‘देखो विभा, समस्या होती तो छोटी है, केवल हमारी सोच उसे बड़ा बना देती है. एक तो तुम अपनी तरफ से किसी तरह से नरेन की अनदेखी मत करो. उसे सहयोग करो. आखिर तुम बीवी हो उस की. अगर वह तुम से प्यार चाहता है तो उसे दो. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा. रहा सवाल रेखा का तो इतना समझ लो इस मामले में जो भी मुझ से हो सकेगा मैं करूंगी.’’

‘‘मैं अब आप के भरोसे हूं दीदी. अच्छा चलती हूं क्योंकि घर पर अंशिता अकेली है.’’ ‘‘बिलकुल जाओ, अपना फर्ज, अपनी जिम्मेदारी ठीक से निभाओ.’’

विभा अब ठीक थी. उसे लगा नरेन पर से अब रेखा का साया उठ जाएगा और उस की जिंदगी में खुशहाली छा जाएगी. शाम को जब नरेन घर लौटा तो उन के साथ एक साहब भी थे. नरेन ने विभा से उन का परिचय कराया और बताया, ‘‘आज जब मैं एक बड़े मौल में मार्केटिंग के काम से गया था तो एक शौप पर इन से मुलाकात हुई.

‘‘दरअसल, इन का वडोदरा में कौस्मैटिक का कारोबार है और इन्हें वहां एक मैनेजर की सख्त जरूरत है. जब इन्होंने उस दुकानदार से मेरा बातचीत का लहजा और स्टाइल देखी तो ये बहुत प्रभावित हुए. मुझ से मेरा सारा जौब ऐक्सपीरियंस सुना. मेरी लाइफ के बारे में जाना और कहने लगे कि तुम में मुझे मैनेजर की सारी खूबियां दिखती हैं. मैं तुम्हें अपने यहां मैनेजर की पोस्ट औफर करता हूं. अच्छी तनख्वाह, फ्लेट, गाड़ी, सब सहूलियतें मिलेंगी. ‘‘मैं ने इन से कहा कि अपनी पत्नी से बात किए बिना मैं कोई फैसला नहीं ले सकता, इसलिए इन्हें यहां ले आया हूं. क्या कहती हो. क्या मैं इन का प्रस्ताव स्वीकार कर लूं?’’

‘‘पहले तुम कुछ दिनों के लिए वहां जा कर सारा कामकाज देख लो, समझ लो. अच्छा लगे तो स्वीकार कर लो,’’ विभा ने खुश होते हुए कहा. विभा को यह अच्छा लगा कि नरेन कितनी तवज्जुह देते हैं उसे. आज पहली बार उसे लगा कि वह अब तक नरेन से बुरा बरताव करती रही है, वह भी सिर्फ एक रेखा के पीछे. और यह उलझन भी अब उसे सुलझती नजर आ रही थी.

नरेन वडोदरा की ओर निकल पड़ा था. रोज रात को विभा से बात करने का नियम था उस का. विभा भी बातचीत में पूरी दिलचस्पी लेती. प्रतिदिन के कामकाज के बारे में, मालिक के बरताव के बारे में वह सबकुछ बताता. नए मिलने वाले फ्लैट जो वह देख भी आया था, के बारे में बताया और कहा कि अब वडोदरा शिफ्ट होने में फायदा ही है. विभा ने झटपट तारा दीदी के घर की ओर रुख किया. उन्हें नरेन के वडोदरा की जौब और वहीं शिफ्ट होने के बारे में बताया.

तारा दीदी के मुंह से निकला, ‘‘तब तो तुम्हारी सारी उलझनें अपनेआप ही सुलझ रही हैं विभा. जब तुम लोग शहर ही बदल रहे हो तो रेखा इतनी दूर तो वहां आने से रही.’’ सबकुछ इतना जल्दी तय हुआ कि विभा का इस पहलू की ओर ध्यान ही नहीं गया. तारा दीदी की इस बात में दम था. एक तीर से दो शिकार हो रहे थे. अब इस के पहले कि रेखा के पीछे नरेन का मन पलट जाए, उस ने वडोदरा जाना ही सही समझा.

रात को नरेन का फोन आया तो उस ने झटपट यह काम कर लेने को कहा. अभी छुट्टियां भी चल रही हैं. नए सैक्शन में बच्चों के एडमिशन में भी दिक्कत नहीं होगी. लगे हाथ अर्पित को भी मां के यहां से बुलवा लिया जाएगा. अब वह उस के पास ही रह कर आगे की पढ़ाईलिखाई करेगा. आननफानन यह काम कर लिया जाने लगा. पूरी गृहस्थी के साथ नरेन ने शिफ्ट कर लिया. विभा नए शहर में नया घर देख कर अवाक थी. ऐसे ही घर का तो उस ने कभी सपना देखा था. दोनों बच्चे तो यह सब देख कर चहक उठे.

नरेन में शुरूशुरू में उदासी जरूर नजर आई. विभा समझ गई थी कि ऐसा क्यों है. पर उस ने अब अपना प्यार नरेन पर उड़लेना शुरू कर दिया था. एक शाम जब नरेन काम से घर लौटा तो बुझाबुझा सा था. यह कामकाज की वजह से नहीं हो सकता था. उसे कुछ खटका हुआ जिसे उस ने जाहिर नहीं होने दिया. बालों में उंगलियां घुमाते हुए विभा ने बस इतना ही कहा, ‘‘क्यों न एकएक कप कौफी हो जाए.’’

नरेन ने हामी भरी. विभा कुछ सोचते हुए किचन में दाखिल हो गई. अगले ही दिन दोपहर में कामकाज से फुरसते पाते ही उस ने तारा दीदी को फोन घुमा दिया.

तब तारा दीदी ने उसे यह सूचना सुनाई कि रेखा की शादी हो गई है. सुन कर विभा उछल पड़ी, ‘‘थैंक्यू,’’ बस इतना ही कह पाई विभा और फोन बंद कर बिस्तर पर बिछ गई.

अब उसे नरेन के बुझे चेहरे की वजह भी समझ में आ गई थी. लेकिन अब सबकुछ ठीक भी हो गया था. गृहस्थी की गाड़ी बिना रुकावट एक बार फिर पटरी पर सरपट दौड़ने के लिए तैयार थी.

लेखक- दिलीप रामचंद्र नीमा

Valentine’s Special : पनाह – कौनसा गुनाह कर बैठी थी अनामिका

Valentine’s Special :  अलसाई हुई सी धूप लान की घास पर से उतरती हुई समुद्र किनारे की रेत पर आ बैठी थी. अनामिका आर्म चेयर पर आँखें मूँदे लेटी थी. इतने में एक तेज़ हवा के झोंके ने उसे कंपकँपा दिया और उसने अपना गुलाबी सिल्क का स्कार्फ़ कंधे पर से उतारकर अपने बदन पर लपेटकर उसे चूम लिया. अभी तक उसके वार्डरोब में इन शोख़ रंगो के लिए कोई जगह नहीं थी. बिलकुल उसके दिल की तरह जिसमें सिर्फ़ उदासी, एकाकीपन के सफ़ेद काले रंगों का ही साम्राज्य था . पर आर्यन नाम के रंगरेज ने उसकी ज़िंदगी को, उसके दिल को चटक रंगो से सरोबार कर दिया था.

उसने घड़ी की तरफ़ नज़र डाली और बेचैनी से आर्यन का इंतज़ार करने लगी. आर्यन बैंकाक से लौटने वाला था. अँधेरा गहराने पर वह आर्म चेयर पर से उठ खड़ी हुई और पैरों में स्लीपर डाले अपने कमरे में लगे बड़े आइने तक आयी. आर्यन के प्यार की मख़मली छींट ने उसके गुलाब से चेहरे की रंगत को और भी बढ़ा दिया था जिसे देखकर वह स्वयं मुग्ध हो गई. उसने नीले रंग का गाउन निकालकर पहन लिया. नीला रंग आर्यन को बेहद पसंद था. उसे मालूम था आर्यन उसे टीशर्ट और ट्रैकपैंट में देखते ही कहेगा,’क्यों अपने साथ इतनी नाइंसाफ़ी करती हो, कायनात ने दिल खोलकर नूर बरसाया है आप पर और आप हैं कि आपको इसकी बिल्कूल क़द्र ही नहीं है. मॉडर्न कपड़ों में आप नाज़ुक सी कॉलेज गोइंग गर्ल लगती हैं.’ सोचते ही अनामिका के लबों पर मुस्कान दौड़ गई .

आर्यन के ना पहुँचने पर अनामिका ने उसे फ़ोन लगाया .

” तुम अभी तक आए नहीं ? गाड़ी ड्राइवर तो तुम्हें एरपोर्ट पर मिल गए होंगे ना ?”

” हाई स्वीट हार्ट ! शिट! आई ऐम सो सॉरी! मैं आपको मैसेज करना ही भूल गया । जब आपका काल आया मैं मार्केट में था. वहाँ पर नेटवर्क इश्यू होने से आप से बात ही नहीं हो पाई. अच्छा एक गुड न्यूज़ है, डील पक्की हो गई है. वो लोग हर हफ़्ते माल इम्पोर्ट के लिए तैयार हो गए हैं.”

” ओके, बाई ! कल मिलते हैं. मिसिंग यू !” उसकी ख़ुशी उसकी आवाज़ में झलक रही थी.

” बच्चा है बिलकुल . जल्दी आ जाओ .. आई ऐम मिसिंग यू टू ” फ़ोन रख उसने साइड टेबल पर रखे फ़ोटो फ़्रेम में लगी आर्यन की फ़ोटो को चूमते हुए कहा. आज बहुत अरसे बाद उसने अपना ब्लॉग खोला था जिसमें वह अपनी भावनाओं को , ज़िंदगी के प्रति अपने दृष्टिकोण को बयां करती थी. उसके डैड कहा करते थे उसमें ये आदत उसकी माँ से आई है वह भी वक़्त निकालकर रोज़ एक कविता ज़रूर लिखती थी .माँ को उसने बचपन में ही खो दिया था .

उसके डैड प्रशासनिक सेवा में उच्च अधिकारी थे . उन्होंने उसे माँ बाप दोनों का प्यार देने की भरसक कोशिश की . वह बचपन से ही गम्भीर स्वभाव की थी . दो साल पहले पिता की अकस्मात् मृत्यु ने तो उसे बिलकुल ही ख़ामोश बना दिया था. एक गम्भीरता , रूखापन उसके वजूद का हिस्सा बन गए थे . इस अबेधी आवरण को तोड़कर उसके दिल तक पहुँचना किसी के लिए भी आसान नहीं था.

वह मुंबई की प्रसिद्ध मैनज्मेंट कॉलेज में बिज़्नेस प्लानिंग की प्रोफ़ेसर थी . बात क़रीब दो साल पहले की है . एमबीए की फ़र्स्ट ईयर की क्लास में पहला पिरीयड अनामिका का ही था . आर्यन अक्सर आधा पिरीयड निकल जाने पर क्लास में आ ता था. कईदिनों तक तो अनामिका कुछ नहीं बोली , पर उस दिन उसे वार्न कर दिया,

” आज का दिन आप क्लास के बाहर ही रहिए , कल अपने आप समय से क्लास में हाज़िर हो जाएँगे .” वह बिना किसी बहस के सिर झुकाता हुआ क्लास से बाहर निकल गया . बाद में स्टाफ़ रूम में उसकी इकलौती सहेली पल्लवी से उसे पता चला की वह किस मजबूरी के चलते लेट आ रहा था .

” आज तेरी क्लास के समय आर्यन लॉन में क्यों था ?”

“इन जैसे लड़कों को पढ़ने से कोई लेना – देना नहीं है ये अपने पिता की पावर के दम पर सिर्फ़ डिग्री हासिल करने कॉलेज चले आते हैं .”

” तू आर्यन के बारे में ग़लत सोच रही है . उसके तो पिता ही नहीं है . वह बोरिवली में एक एनजीओ द्वारा संचालित बॉय्ज़ होम में रहकर पला – बढ़ा है . उसे यहाँ तक पहुँचने में दो ट्रेन बदलनी पड़ती है . बहुत ही अच्छा लड़का है , दूसरों से बिलकुल हटकर . तू एक काम कर सकती है . उसे अपने बंगले पर पेइंग गेस्ट की तरह रख ले . इससे अंकल के जाने के बाद तेरी ज़िंदगी में आया सूनापन भी भर जाएगा .”

उस समय तो उसने पल्लवी की बात को हवा में उड़ा दिया था . पर साल भर में अनामिका ने भी परख लिया था कि आर्यन पढ़ाई के प्रति कितना गम्भीर है . वह अपना अतिरिक्त समय और लड़कों की तरह कैंटीन में ना बिता लाइब्रेरी में बिताता था और शाम के समय स्कूली बच्चों के ट्यूशन्स ले अपना ख़र्चा ख़ुद निकालता था .

बहुत सोच – विचार के बाद अनामिका ने पल्लवी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था . उसका ज़ूहु पर सी फ़ेसिंग बंगलो था जिससे कॉलेज दस मिनीट की ही दूरी पर था . अब आर्यन, अनामिका के साथ उसकी गाड़ी में ही कॉलेज जानेआने लगा था . आर्यन के सानिध्य से अनामिका के आँसू हँसी में और उदासी शोख़ी में बदल गई थी . दोनों साथ में बैठ कर पढ़ा करते थे . अनामिका अपनी थिसिस लिखती और आर्यन इग्ज़ाम की तैयारी करता . कुछ लिखते – पढ़ते समय उसके हाथ से आर्यन का हाथ छू जाए तो उसके मन के तार झन्कृत होने लगते थे . दोनों के दरमियान एक अजीब सी मादकता और तन्मयता पसरी रहती . एक दिन ऐसे ही अवसर पर आर्यन ने अनामिका का हाथ पकड़ लिया .

“मैम आपको नहीं लगता अब हमारे रिश्ते को एक नाम मिल जाना चाहिए ?” कहते हुए आर्यन कुर्सी पर से उठकर उसके पैरों के पास घास पर ही बैठ गया .

“विल यू मैरी मी ?”उसके स्वर में भावुक सी याचना थी . पल भर को वह सिर से पैर तक काँप उठी .

” पागल मत बनो आर्यन .. एक बार ये सोचने से पहले हम दोनों के बीच का उम्र का फ़ासला तो देख लेते . ”

” मैंने आपसे प्यार करते वक़्त आपकी उम्र को नही आपकी रूह को परखा था .”और उसने अनामिका के लिए एक शायरी कह डाली .

“पनाह मिल जाए रूह को

जिसका हाथ छूकर

उसी की हथेली को घर बना लो ”

” अच्छा तो आप शायरी भी कर लेते हैं ?”

” कॉपी पेस्ट है .” आर्यन ने शरारत से कहा .

. आर्यन , अनामिका की ज़िन्दगी में ताजे हवा के झोंके की तरह था . उसका ऐसा साथी जिसका साहचर्य उसे ख़ुशी देता था पर उसे वह बच्चा ही मानती थी . उनके बीच कभी प्रणय का फूल भी खिल सकता है इसकी तो अनामिका ने कभी कल्पना भी नहीं की थी .बड़ी देर तक इसी उधेड़बुन में डूबे जाने कब उसे गहरी नींद ने घेर लिया .

◦ सवेरे उसके कमरे की खिड़की पर बैठे कबूतर की गुटर गु ने उसे नींद से जगा दिया नहीं तो जाने वह कितनी देर तक सोती रहती . आज उसे मौसम और दिनों से अलग लग रहा था . आसमान में तैर रहे गुलाबी बादलों की आभा में उसकी खिड़की पर लटक कर आ रही रंगून क्रीपर भी गुलाबी लग रही थी क्योंकि आज उसके मन का मौसम गुलाबी हो रहा था .एक नई ज़िंदगी उसे बाँहें फैलाकर अपनी गोद में बुला रहे थे .

◦ आर्यन की फ़ाइनल इग्ज़ैम्ज़ हो जाने पर दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली और बैंकॉक के लिए निकल गए . बैंकॉक चुनने के पीछे एक और कारण था , आर्यन वहाँ से इम्पोर्ट का बिज़्नेस शुरू करना चाहता था . उन्होंने चाओ फ्राया रिवर के पास की होटेल में रूम ले लिया था . दोनों के लिए सबकुछ स्वप्न की तरह था . एक ख़ुमारी , एक अनकही सी अनुभूति भरे वह लम्हे जिसे हर दिल हमेशा के लिए संजो लेना चाहता हो . आर्यन , अनामिका को रिवर फ़्रंट पर बिठाकर ख़ुद पास ही स्थित परत्युमन मार्केट केलिए निकल जाता था. अनामिका घंटों बैठी हुई दूर – दूर तक फैले हुए उस नदी के विस्तार को , उसके दामन में विहार करती नौकाओं को निहारती रहती . उसकी छुट्टियाँ ख़त्म होने को थी . पंद्रह दिन बाद वो फिर से मुंबई आ गई और आर्यन दो दिन बाद लौटने वाला था .

सबकुछ बहुत अच्छा चल रहा था एक हसीन ख़्वाब की तरह .महीने भर बाद ही अनामिका को नन्हें क़दमों की आहट हुई थी . उस दिन उसने डिनर मेपुडिंग के तीन बोल डाइनिंग टेबल पर रखे . एक बोल उसने आर्यन के आगे कर दिया और दो बोल ख़ुद लेकर बैठ गई .

आप ग़लती से दो बोल ले आई है .”

” ग़लती से नहीं , एक मेरा और एक ..”उसने अपने पेट पर हाथ रख लिया .

“आई नो , आपको पुडिंग बहुत पसंद है . एक से आपका जी ही नहीं भरता है .” कहकर आर्यन खिलखिलाने लगा .

” बुद्धू तुम डैड बनने वाले हो .”

सुनकर आर्यन ख़ुश नहीं असमंजस में था. उसे समझ नहीं आया वह क्या प्रतिक्रिया दे . इसके लिए शायद वो मानसिक रूप से तैयार ही नहीं था .

एक महीने बाद अनामिका की डिलिवरी होने वाली थी . इधर आर्यन की व्यस्तता बढ़ती जा रही थी . उसका एक पैर बैंकॉक और एक मुंबई में रहता था . पर जितना समय वह अनामिका के पास रहता उसे पलकों पर बिठाकर रखता था .

” बस अब पंद्रह दिन अपने सारे टूर कैन्सल कर दो . मुझे अकेले डर लगता है . डॉक्टर कह रही थी अब बेबी कभी भी इस दुनिया में क़दम रख सकता है . मैं चाहती हूँ अब तुम पूरा समय मेरे साथ रहो . मुझे लेबर पेन के नाम से ही डर लगता है . “सुनते ही उसने अनामिका का चेहरा हाथ में ले लिया .

” मैं हूँ ना .. मैं अपनी अनामिका को कुछ नहीं होने दूँगा . ”

कहते हुए उसने अनामिका के हाथ की छोटी – छोटी अंगुलिया अपनी अंगुलियों के बीच फँसा ली .

“कहते है माँ के सामने जिसका चेहरा होता है बेबी में उसकी छवि आती है . ” आर्यन कभी भी अनामिका की बात नहीं टालता था . वह उसे हर हाल में ख़ुश देखना चाहता था . यही नहीं उसने लेबर रूम की विडीओ ग्राफ़ीकर उनके जीवन में आए उन अनमोल पलों को भी सदा के लिए क़ैद कर लिया .

उन्होंने उस नन्ही परी का नाम आर्या रखा . वह बिलकुल अपने पिता की शक्ल लिए थी . गोरा चिट्टा रंग , सुनहरे बाल और भोले चेहरे के बीच भूरी चमकीली आँखें . अब अनामिका की ज़िंदगी आर्या तक ही सिमट कर रह गई थी .

इधर कई दिनों से अनामिका ,आर्यन में बदलाव सा महसूस कर रही थी . अब वह जब तब आवेश में आकर उसे गोद में उठाने की , बाँहों में भरने की या बात बात पर उसे चूमने की चेष्टा नहीं करता था . हाँ वह आर्या से बहुत प्यार करता था . पर उसके प्रेम में पिता वाला बड़प्पन , दुलार या चिंता नहीं थी बल्कि एक बेफ़िक्री और आकर्षण था जो एक बच्चे को अपने प्रिय खिलौने के प्रति होता है . वह समझ गई थी उसे अपनी ज़िम्मेदारियों को समझने के लिए थोड़ा वक़्त देने की ज़रूरत है . अब आर्या एक महीने की हो गई थी . उस दिन वो पिंक नैट की फ़्रॉक में थी .

“वाउ ! माई स्वीट प्रीटी डॉल .. लेट्स टेक अ सेल्फ़ी ”

” ग्रेट आइडिया ! वैसे भी हमारी एक भी फ़ैमिली पिक नहीं है .” उस फ़ोटो को अनामिका ने अपने मोबाइल पर प्रोफ़ायल पिक की तरह सेट कर दिया और फिर आर्यन के फ़ोन को लेकर उस पर भी सेट करने लगी . इतने में स्क्रीन पर एक मैसेज पॉप अप हुआ . अनामिका ने उस मैसेज को खोला जिस पर लिखा था ” मिसिंग यू “.

अनामिका ने फ़ोन आर्यन की तरफ़ बढ़ा दिया . उसकी मासूम आँखों में प्रश्न थे .

” अनामिका मैं आपसे इस बारे में बात करने ही वाला था . ये चिमलिन है . आप ही की तरह बहुत प्यारी और मासूम है . मैं आप दोनों से बहुत प्यार करता हूँ पर इसे भी नहीं छोड़ सकता . ये मजबूरी के चलते सेक्स वर्कर की तरह काम कर रही थी . पर दिल की बहुत अच्छी है .इसकी वहाँ के होलसेल मार्केट्स में बहुत पहचान है . अनामिका आज मैं जो भी हूँ इसी की बदौलत हूँ . वर्ना मैं इतना बड़ा बिज़्नेस खड़ा नहीं कर पाता . उसे मेरी ज़रूरत है . और उसने मुझसे वादा किया है कि वह जल्दी ही उस दुनिया से बाहर आ जाएगी . आप उसे अपनी छोटी बहन की तरह नहीं अपना सकती ? मैं आपको यक़ीन दिलाता हूँ कि उसके आने से हमारे रिश्ते पर कोई आँच नहीं आएगी .”

अनामिका निशब्द सी सब सुन रही थी उसे लगा कोई उसके कानो में पिघला हुआ शीशा उँडेल रहा हो . कहते हुए आर्यन उसके कंधे पर अपना सिर रखने लगा . अनामिका धीरे से उसका सिर हटा देती है .

” आई ऐम सॉरी ! नाराज़ हो क्या ? “आर्यन केपूछने पर अनामिका चीख़ – चीख़ कर कहना चाहती थी उसे तुम्हारी ज़रूरत है और हम दोनों ? आज तुम जो भी हो उसकी बदौलत हो . मेरे प्यार का, समर्पण का क्या ? मैंने तुम्हें अपने दिल में पनाह दी अपने घर में जगह दी .” पर नहीं कह पाई जैसे उसकी आवाज़ गले में ही घुट गई थी . उसकी तरफ़ से कोई भी जवाब ना मिलने पर आर्यन वहाँ से उठकर चला गया . वह उसे तब तक देखती रहती है जब तक वह उसकी आँखों से ओझल नहीं हो गया . उसे लगता है वह उन लोगों से बहुत दूर चला गया है .

,उस दिन के बाद से घर में एक ख़ामोशी , एक सूनापन सा पसर गया . आर्यन हफ़्ते भर से बैंकॉक में था . अनामिका निरुद्देश्य सी लॉन में बैठी हुई थी . शाम का धुँधलका उसके मन को और भी विचलित कर रहा था .लॉन पर रखी टेबल पर , बग़ीचे के मुस्कुराते फूलो पर उसे आर्यन का ही वजूद नज़र आ रहा था . उसकी नज़र सामने खड़े गुलमोहर के पेड़ के तने पर ख़ुदेदिल में लिखे दोनों के नाम पर जाती है और वह आँखें मूँद कर बैठ जाती है . ” तो क्या आर्यन का प्यार मात्र मेरा भ्रम था . एक छलावा था . नहीं वह स्पर्श जिसने उसके मेरे तन – मन को भिगो दिया था , उसकी आँखों से छलकता मौन प्रेम जो उसके हृदय को परत दर परत खोल कर रख देता है . भ्रम नहीं हो सकता . “वह आर्यन को फ़ोन लगाती है . तीन चार बार फ़ोन लगाने पर आर्यन फ़ोन नहीं उठाता है तो उसे लगता है आर्यन उनसे रूठ कर बहुत दूर चला गया है .

अनामिका की सारी रात करवटें बदलने में ही निकल गई . सुबह होने को है पर आसमान अभी भी अंधेरे की गिरफ़्त में है . उसे लगता है यह अंधकार धीरे – धीरे उस पर भी हावी हो रहा है . वह सहमकर बैठ जाती है . वह फिर से आर्यन को फ़ोन लगाती है . सामने से लड़की की आवाज़ सुनकर फ़ोन रखने ही वाली होती है कि , ” आई ऐम फ्रॉम सिटी हॉस्पिटल बैंकॉक .”

हॉस्पिटल का नाम सुनते ही फ़ोन पर से उसकी पकड़ ढीली होने लगती है पर वह अपने आप को संभाल लेती है . उसे बताया जाता हैं कि आर्यन में कोरोना वाइरस के प्रारम्भिक लक्षण दिख रहे हैं इसलिए उसे आइसोलेटेड वार्ड में रखा गया है . बहुत गुज़ारिश करने पर वो आर्यन की बात करवाने को तैयार हो जाते हैं .

” हेलो , अनामिका .. मुझे ले जाओ यहाँ से .. मैं बेहद अकेला पड़ गया हूँ . मुझे कुछ नहीं हुआ है , सिर्फ़ वाइरल था . मेरे रिपोर्ट्स भी नोर्मल आई है पर ये लोग कुछ भी सुनने को तैयार नहीं है . “इसके बाद आर्यन की आवाज़ सिसकियों में बदल गई .

अनामिका की सांसें थम सी जाती है . उसे अपने शरीर में असीम पीड़ा का अनुभव होता है . तब उसे अहसास होता है आर्यन के प्यार की जड़ें उसके हृदय की कितनी गहराई तक जमी हुई है . वह अपने डैड के सम्पर्क के बल पर आर्यन को भारत लाने के लिए एड़ी – चोटी का ज़ोर लगा देती है .

उसकी भाग – दौड़ का नतीजा है कि आर्यन आज एक महीने बाद लौटने वाला है . पर आज से उसने अपनी कॉलेज भी जॉंइन कर ली है और आर्या के लिए भी वहीं डे केर की व्यवस्था कर दी है .वह आर्यन के लिए अपने बंगले के पास वाला क्वॉर्टर खुलवाँ देती है और आर्यन का सारा सामान भी वहीं शिफ़्ट करवा देती है . क्वार्टर के दरवाज़े पर आर्यन के लिए एक चिट छोड़ दी.

” अपने दिल में पनाह देने के लिए शुक्रिया ! मैं मानती हूँ जीवन के ख़ूबसूरत सफ़र में राही मिल जाया करते है. पर हम हर एक अनजान राही के साथ आशियाना बनाने की भूल तो नहीं करते है . बस मैं यही गुनाह कर बैठी . मेरा सब कुछ तुम्हारा है क्योंकि मैंने प्यार किया है तुमसे . सच्चा प्यार लेना नहीं देना सिखाता है . पर माफ़ करना आर्यन इस बेवफ़ाई के बदले में तुम्हें फिर से अपने दिल में पनाह ना दे पाऊँगी .

तुम्हारी ,

अनामिका मैम

लेखिका- मेहा गुप्ता 

Moral Stories : पहला निवाला

 Moral Stories : घनश्याम शुक्ला बिहार के छपरा जिले में शिवनगरी गांव का रहने वाला 45 वर्षीय अधेड़ उम्र का आदमी था. 15 साल पहले घनश्याम गांव में पंडिताई का काम करता था. रुकरुक कर उस की थोड़ीबहुत कमाई हो जाया करती थी, लेकिन बंधा हुआ पैसा हाथ नहीं रहता था.

जैसेजैसे परिवार बढ़ता गया, वैसेवैसे घनश्याम को पंडिताई के पेशे की कमाई नाकाफी लगने लगी. इस मारे घनश्याम गांव से दिल्ली शहर काम के लिए रवाना हो गया. लेकिन शहर आने के बाद भी घनश्याम ने पंडिताई का काम नहीं छोड़ा.

दिल्ली के आनंद पर्वत इंडस्ट्रियल इलाके में लोहे की फैक्टरी में घनश्याम की नौकरी लगी थी. वह दिन में फैक्टरी में काम करता और जब भी पंडिताई का काम आता तो शाम का प्लान बना लगे हाथ उसे भी कर लिया करता.

आसपास के रहने वाले लोगों को भी घनश्याम सस्ता पंडित पड़ता था, तो मुंडन, बरसी, गृह प्रवेश इत्यादि में बुला लिया करते थे. और फिर घनश्याम के लिए यह काम मानो रेगिस्तान में पानी के जैसे था तो अच्छा तो लगना ही था, और अच्छा लगेगा भी क्यों नहीं, इस में साइड से पैसे भी बनने लग गए थे.

घनश्याम का पूरा परिवार गांव में रहता था. 5-6 साल पहले तक तो घनश्याम की पत्नी उस के कहने पर बीचबीच में शहर आ जाया करती थी, लेकिन अब पहले जैसी बात नहीं थी.

जो किराए का कमरा पहले पत्नी के आने से हिलौरे पैदा करता था और बड़ा लगता था, अब ढलती जवानी के साथ कमरे का आकार भी छोटा लगने लगा था. ऊपर से बूढ़े मांबाप के कारण घनश्याम की नैतिकता पत्नी को शहर लाने से रोक रही थी.

शहर में काम करते घनश्याम ने खुद के लिए कुछ उसूल बनाए थे. वह न तो किसी का दिया हुआ खाना खाता, न बाकी मजदूरों की तरह रात को ढाबे से खाना लाता, बल्कि जितनी थकान क्यों न हो, वह खुद कमरे में अपने हाथों से खाना बनाता था चाहे फैक्टरी से आने में रात के 9 ही क्यों न बज जाएं.

घनश्याम की दिनचर्या काफी टाइट थी. वह आदतन शौचालय जाने से पहले जनेऊ कान में लपेट लेता, सर्दी हो या गरमी सुबह ही नहा लेता. विशेष तौर पर गांव से चंदन का प्रबंध किया रहता था तो धूपबत्ती जला पूजा करने के बाद टीका जरूर लगाता.

हांलाकि गरमी और पसीने से टीका एक समय के बाद माथे पर टिकता नहीं था. लेकिन टीका लगाने की आदत घनघोर थी. आमतौर पर चंदन का टीका लोगों को आकर्षित करता था, जिस से लगे हाथ उन के पंडित होने का ही प्रचार होता और उसे इस का फायदा हो जाया करता.

एक दिन धनश्याम को अचानक सुनने में आया कि पूरे देश में कोरोना महामारी के कारण प्रधानमंत्री ने 21 दिन की तालाबंदी कर दी है. वह थोड़ा हैरान तो हुआ, लेकिन 21 दिन तक अपने खानेपीने का खर्चा उठा सकता था, तो उसे खास चिंता नहीं हुई. और फिर घनश्याम ने राष्ट्र समर्पण की भावना से खुद को तालाबंदी के लिए तैयार कर लिया था. लेकिन इस तालाबंदी में उस के बहुत से उसूल बिगड़ने लगे थे.

पूरा दिन घर में खाली होने के कारण वह पहले सूर्योदय से पहले नहा लिया करता था, पर अब 8 बजे तक सो कर उठने लगा था. तब तक सूर्य आंखों के सामने चमकने लगता था.

हां, पूजापाठ नियमित तौर पर किया करता, लेकिन धूपबत्ती जलाने से परहेज करने लगा. जो चंदन का टीका घनश्याम के माथे की शान हुआ करता था, पर उसे अब इस की जरूरत नहीं महसूस हुई. ऊपर से चंदन महंगा था तो लगाने से वह बचता भी रहा.

तालाबंदी  खत्म होने के साथसाथ घनश्याम की जमापूंजी खत्म होने लगी थी. लेकिन वह इस बात को ले कर निश्चिंत था कि तालाबंदी खुलते ही उस की रुकी हुई गाड़ी फिर से पटरी पर आने लगेगी. लेकिन यह क्या, प्रधानमंत्री ने फिर से 3 हफ्ते की तालाबंदी पूरे देश में कर दी.

अब तो घनश्याम के माथे पर शिकन आने लगी थी. उस की हालत पतली होने लगी थी. घरगांव में रोज फोन पर बात होती तो थी, लेकिन अब घनश्याम को दूसरे तालाबंदी के कारण इतने दिनों बाद पहली बार लगा कि वह यहां फंस चुका है. उस के दिमाग में दिनरात परिवार और घरगांव की बातें घूमने लगी थीं.

घनश्याम इस तालाबंदी से परेशान हो चला था. सरकार के इस फैसले से मन ही मन गाली देने का जी तो करता, लेकिन फैसले को देशहित में समझ द्वंद्व की स्थिति में रहता. उस ने कच्चे राशन के लिए सरकारी ई कूपन का फार्म भरा था, उसे थोड़ाबहुत कच्चा राशन मिल गया.

हां, राशन के लिए उसे कई दिनों तक पहले कूपन के लिए, फिर राशन के लिए 8-9 दिन रोज घंटों लाइन में लगना पड़ा था, लेकिन जैसेतैसे कड़ी मशक्कत के बाद राशन पा लिया.

भूख से तो घनश्याम जंग जीत गया, लेकिन समस्या उसे इस बात की थी कि अगर यही हालत रही तो फैक्टरी न जाने कब तक खुलेगी और ऊपर से कमरे के किराए का बोझ भी सिर पर पड़ रहा था. वह इतना जानता था कि सरकार ऊपर हवाहवाई जो कहे नीचे जमीन पर हकीकत अलग ही रहती है. इसलिए वह समझता था कि अब उस की अपने गांव जाने में ही भलाई है.

जैसेतैसे दूसरे तालाबंदी के दिन बीतने को आए थे. एक दिन पड़ोस के मदन ने आवाज़ लगाई, “शुक्लाजी तुम्हें पता चला कि सरकार गांव जाने के लिए ट्रेन चला रही है? तो क्या सोच रहे हो जी, चलोगे गांव?”

मदन घनश्याम की जानपहचान का था. मदन वही था, जिस के भरोसे घनश्याम गांव से शहर आया था. मदन घनश्याम को शुक्लाजी कह कर पुकारता था. यहां तक कि गांव में भी घनश्याम को शुक्लाजी के नाम से ही पुकारा जाता था.

“हां, चलना तो है. यहां शहर में रहने का अब कोई मतलब नहीं है. न काम बचा है, न कमाई. ऊपर से किराया भरो अलग से. मैं ने तो अपने गांव में प्रधान से बात कर के गांव जाने के लिए सरकारी फार्म भी भर दिया है. कुछ दिनों बाद मैं चलता बनूंगा यहां से,” घनश्याम ने जवाब दिया.

कुछ दिन बाद घनश्याम सरकार के द्वारा चलाई गई स्पेशल ट्रेन से अपने गांव छपरा को निकल पड़ा. सरकारी आदेशानुसार गांव पहुंचते ही उसे क्वारंटाइन कर दिया गया.

गांव आ कर उसे पता चला कि बाहर से आने वालों को गांव के पंचायत हाल में क्वारंटाइन किया गया था, जिस में रहने और खानेपीने की भी व्यवस्था की गई थी.

घनश्याम पंचायत हाल में पहुंचते ही सामान रख पाखाने की ओर भागता है. वह जैसे वहां पहुंचता है, तो उसे सामने पाखाने से भोलाराम निकलते हुए दिखता है.

भोलाराम शिवनगरी गांव में चमार जाति से था. गांव में लोग टोले के हिसाब से बंटे हुए थे. घनश्याम गांव के जिस तरफ था, उसे बामन टोला कहा जाता था और भोलाराम का घर गांव के जिस तरफ था, वह गांव के अंत में चमार टोले में पड़ता था. वह घनश्याम से कुछ दिन पहले ही मुंबई से साइकिल चला कर लौटा था.

घनश्याम का माथा घूम जाता है. “यह डोमबा यहां क्या कर रहा है?” वह पास खड़े एक आदमी से पूछता है.

“यह भी हमारे साथ यहीं क्वारंटाइन हुआ है.”

“तो क्या यहां साथ में ही खानापीना होता है?” घनश्याम पूछता है.

“हां, कुछ ऐसा ही समझ लो.”

घनश्याम फिर कहता है, “यहां तो हमारा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा. हम एक पल भी यहां नहीं ठहर सकते, या तो हमें इस डोम से अलग कर दे या उसे हम से दूर.”

घनश्याम किसी व्यक्ति को कह कर गांव के प्रधानजी को उन से मिलने आने को कहते हैं.

गांव के प्रधानजी बुद्धि से चतुर और जाति के ब्राह्मण थे. उन का 15 साल लगातार प्रधान बने रहने का रिकॉर्ड था. लेकिन पिछले साल शिवनगरी गांव की प्रधान सीट महिला आरक्षित कर दी गई थी. इस के कारण प्रधानजी चुनाव नहीं लड़ पाए थे. उन्होंने अपनी चतुर बुद्धि का प्रयोग कर इस सीट पर अपनी पत्नी को चुनाव के लिए खड़ा कर दिया. बस फिर क्या था, प्रधानजी की पत्नी चुनाव जीत गईं और प्रधानजी बन गए प्रधानपति.

वैसे तो प्रधानजी बड़े ही घपलेबाज़ आदमी थे, लेकिन इस बार घपले के बारे में सोच भी नहीं सकते थे.

प्रधानजी अगले भोर घनश्याम से मिलने आए और बोले, “बताओ शुक्लाजी का आफत आन पड़ी?”

“प्रधानजी ई सब का चल रहा है?”

प्रधानजी सोचते हुए बोले, “का चल रहा है?”

“मतलब, हमें काहे उस डोमबा भोलाराम के साथ रखे हैं?”

“का बताएं शुक्लाजी, यह तो आगे से और्डर आया है तो बस वही कर रहे हैं.”

“लेकिन, हमरा तो धर्म भ्रष्ट हो जाएगा, प्रधानजी आप तो जानते ही हैं.”

“देखो शुक्लाजी ई सब हमरा बस में नाही हैं और अगर ई बात बाहर फैली तो समझो बवाल हो जाई. डीएम साहेब खुदे नजर रखे हुए हैं क्वारंटाइन सेंटर पर.”

“प्रधानजी आप तो खुदई ब्राह्मण हैं. भला आप ही जरा सोची कि हम यहां कैसे रही? पूरा दिन हमरे आसपास उ डोमबा मंडरात रही, ऊपर से एकई बरतन में खाना बनी. एकई साथ बैठ के खाई. आज ऊ बरतन मा डोमबा खावत रही कल हम. अब ई घोर पाप करिएगा हमरे साथ?”

“बात के समझा. ई तोहर घर नाहि के जो तू जइसे चाही वइसे होई. एक तो सरकार पईसा कम देत है ऊपर से तोहरा अलग रखी, हम तोहरा के पागल दिखेत बाणी?” इतना कह कर प्रधानजी वहां से निकल जाते हैं.

घनश्याम निश्चय कर चुका था कि वह जब तक इस झंझट से निकल नहीं जाता, तब तक अन्न का एक दाना नहीं खाएगा.

वैसे तो धनश्याम शहर में अकसर फैक्टरी के भीतर साथ में काम करने वाले बाकी मजदूरों के साथ बिना जाति पूछे बैठ कर खाना खा लिया करता था, किंतु गांव की हवा में जादू ही कुछ और होता है, एकदम से अर्श से फर्श ले ही आता है. शहर में जो आदमी कबूतरखाने में रह कर खुद को लाचार महसूस कर रहा था, वह एकाएक अपनी चालढाल बदल लेता है. गांव आते ही आदमी जातियों में बंटने ही लगता है.

घनश्याम बचपन से भोलाराम से दूरी बनाए रखा था. लगभग हमउम्र होने के बावजूद कभी भी दोनों ने साथ में खेला नहीं था. खाना, पीना, रहना सब दूरदूर था. तो अब साथ कैसे रह सकता था. गांव में घनश्याम अकसर भोलाराम को जाति के पाठ पढ़ाया करता था कि, “बामन टोला के आसपास न भटका करो, वरना कूट दिए जाओगे.”

इसी अहम में पहले दिन घनश्याम भूखे पेट ही सो जाता है. अगले दिन की सुबह उसे जोर की भूख लगती है. लेकिन जैसे ही उस के सामने से भोलाराम दिखता है, उसे देख वह अपनी भूख को काबू में रख संकल्प मजबूत कर लेता है.

दोपहर में खाने का समय होने वाला ही था कि घनश्याम के पेट में गैस बननी शुरू हो गई. वह जोरजोर से पादे जा रहा था. पेट में धीरेधीरे दर्द शुरू हो रहा था. एक पल के लिए लगा कि घनश्याम का संकल्प टूट जाएगा. लेकिन भोलाराम के बारे में सोचते ही दोपहर का खाना भी नहीं खाया.

रात के भोजन में भी घनश्याम खाने के लिए खड़ा नहीं हुआ. लेकिन उस का पेट जवाब दे रहा था. पेट में जोरजोर की गुड़गुड़ की आवाज आने लगी थी और भूख भीतर कुचोड़ने लगी थी मानो चूहे पेट के भीतर कुश्ती कर रहे हों.

आधी रात हो चली थी. घनश्याम को मारे भूख के नींद नहीं आ रही थी. पेट में भूख से दर्द उठने लगा था. उस की नजर उस के लिए बचाए खाने पर पड़ी.

भूख का चुम्बक उसे खाने की तरफ मानो खींच रहा था. जैसे ही घनश्याम बिस्तर से उठा, धीरे से खाने की तरफ बढ़ा और अपने लिए रखा खाने का डोंगा ज्यों ही वहाथ में लिया, तभी एक आवाज पीछे से आती है.

“और दिन के मुकाबले आज खाना ठीकठाक है, खा लीजिए.”

यह सुनते ही घनश्याम की आंखों में आंसू आने लगते हैं और वह पहला निवाला अपने मुंह में डाल देता है.

तलाक के तीन साल बाद साउथ एक्ट्रेस Samantha Ruth Prabhu को फिर से हुआ प्यार

Samantha Ruth Prabhu : साउथ एक्ट्रेस समांथा प्रभु जो पुष्पा,और शाकुंतलम जैसी फिल्मों के जरिए हिंदी फिल्मों में अपनी अलग पहचान बना रही है. साथ ही सामंथा प्रभु हमेशा किसी न किसी बात को लेकर चर्चा में बनी रहती है. पिछले कुछ सालों से अपनी फिल्मों के अलावा अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर भी सामंथा हमेशा चर्चा में रही है. जैसे कि कई सालों तक साउथ एक्टर नागा चैतन्य से डेटिंग, उसके बाद शादी, और शादी के तीन सालों बाद तलाक और तलाक के अलावा उनका गंभीर बीमारी से घिरे रहना, जैसी खबरों ने हमेशा सामंथा को चर्चा में बनाए रखा.

समांथा एक बार फिर चर्चा में है . खबरों के अनुसार समांथा को फिर से प्यार हो गया है. तलाक के 3 साल बाद समांथा प्रभु का नाम एक डायरेक्टर से जुड़ रहा है हालांकि एक्ट्रेस ने अपने प्यार की खबर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है . लेकिन इनकार भी नहीं किया. लेकिन हाल ही में सोशल मीडिया पर उनकी एक फोटो वायरल हो रही है जिसके बाद उनकी डेटिंग को लेकर खबरें और गर्म हो गई है. सभी के मन में सवाल है कि आखिर साउथ की सुंदरी का किस पर दिल आ गया है. इसी बात की पुष्टि उस वक्त हुई जब हाल ही में सामंथा रुथ प्रभु एक स्पोर्ट्स इवेंट में शामिल हुई वह भी डायरेक्टर राज निदिमोरू के साथ.

यही वह डायरेक्टर है जिनके साथ सामंथा रुथ प्रभु का नाम जुड़ रहा है. दरअसल सामंथा रुथ प्रभु पहली बार डायरेक्टर राज निदिमोरू के साथ किसी स्पोर्ट्स इवेंट में शामिल हुई. साथ ही उन्होंने इंस्टाग्राम पर फोटोज के साथ एक कैप्शन लिखा खेल की दुनिया में मेरा पहला कदम. एक्ट्रेस के अनुसार उन्हें खेल के मैदान में आने में झिझक महसूस हो रही थी, क्योंकि वह हमेशा इससे दूर रही है. लेकिन खुशी है कि वह चेन्नई सुपर चैंप्स की मालिक बन गई हैं  और उनकी टीम जबरदस्त है. साथ ही अपने साथ उपस्थित डायरेक्टर राज की तारीफ करते हुए सामंथा ने कहा कि मेरे उतारचढ़ाव भरे सफर में राज और हिमांक और मेरी टीम ने पूरा साथ दिया है.

खबरों के अनुसार सामंथा ने यह खबर उस दौरान पोस्ट की जब उनके पहले पति नागा चैतन्य ने शोभिता धुलिपाला के साथ शादी की फोटोज सोशल मीडिया पर शेयर की थीं.उसी दौरान सामंथा की दूसरे प्यार की खबरें भी सोशल मीडिया पर चर्चा में बनी रही . बहरहाल सामंथा kaदूसरा प्यार शादी की मंजिल तक पहुंचेगा कि नहीं यह अभी बताना मुश्किल है लेकिन डायरेक्टर से प्रेम के साथ साथ खेल में रुचि ने उनके जीवन की दिशा जरूर बदल दी. जो पौजिटिव नजर आ रही है.

Valentine’s Special : बौलीवुड में प्यार, सजा या मजा

Valentine’s Special :  किसी शायर ने खूब कहा है,’यह इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजिए, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है…’ कहने का मतलब यह कि आज स्वार्थ से भरी दुनिया में वैसे तो हर इंसान अपनेआप से ही प्यार करता है लेकिन अगर यही प्यार आप को किसी और से हो जाए तो उस के बिना जीना मुश्किल हो जाता है. उस को देखे बिना चैन नहीं आता और उस को पाना भी मुश्किल ही हो जाता है क्योंकि जरूरी नहीं है की जिस से हम सच्चा प्यार करें वह हमें मिल ही जाए और अगर वह मिल भी गया तो हमेशा के लिए टिक जाए क्योंकि आज के दौर में प्यार पाना जितना मुश्किल है उस प्यार को जिंदगीभर निभा पाना उस से भी ज्यादा मुश्किल है.

कुछ लोगों का तो यह भी मानना है कि आज के दौर में अगर लैला मजनूं शीरीं फरहाद होते और उन की शादी हो गई होती तो वे भी अपने हक के लिए लड़ाईझगड़ा कर रहे होते. यानि जिस तरह दूर के ढोल सुहावने होते हैं उसी तरह जब तक शादी नहीं होती तब तक प्यार में प्रेमी को अपनी महबूबा चांद की तरह लगती है, लेकिन शादी होते ही वह सूर्यमुखी और ज्वालामुखी लगने लगती है. लेकिन बावजूद इस के प्यार में कोई कमी नहीं आती क्योंकि पतिपत्नी का यह भी मानना है कि प्यार और तकरार अपनों के बीच ही होती है.

प्यार और तकरार हलकेफुलके लड़ाईझगड़े तक ही सीमित रहें तब तक तो ठीक है लेकिन अगर इस में ‘हम’ की जगह ‘मैं’ आ जाए यानि ईगो आ जाए तो उस प्यारभरी शादी को तलाक तक बदलने में ज्यादा वक्त नहीं लगता. फिर चाहे वह रितिक रोशन और सुजैन खान हों, जिन का बचपन का प्यार तलाक में बदल गया या फिर मलाइका अरोड़ा खान और अरबाज खान ही क्यों न हों, जिन्होंने काफी साल साथ में रहने के बाद तलाक ले लिया.

जो प्रेमी जोड़े प्यार में जान देने को तैयार थे वे शादी के बाद जान छुड़ाने में लगे हैं. लेकिन यह प्यार का एक पहलू है, हर किसी के साथ ऐसा नहीं होता. प्यार को ले कर हर किसी की सोच एकजैसी नहीं होती. बौलीवुड में ही कई ऐसे जोड़े हैं जिन्होंने अपने प्रेमी से शादी की और अपनी शादीशुदा जिंदगी में खुश हैं.

कुछ मशहूर सैलिब्रिटीज ऐसे भी हैं जिन्होंने एक बार प्यार में पड़ने के बाद और उस में असफल रहने के बाद पूरी जिंदगी किसी और से शादी ही नहीं की क्योंकि उन को कोई और पसंद ही नहीं आया जबकि उन के इर्दगिर्द खूबसूरत चेहरों की भरमार है और इन सैलिब्रिटीज की लोकप्रियता के चलते कोई भी शादी करने को तैयार है. लेकिन ये सच्चे आशिक कभी अपने प्यार को भुला नहीं पाए और आजीवन कुंआरे ही रहे.

पेश हैं, रोमांस और प्यार करने वाले प्रेमियों और आशिकों के लिए फरवरी महीने में वैलेंटाइन डे को ध्यान में रखते हुए कुछ ऐसे आशिकों पर एक नजर जो प्यार में या तो सफल रहे या असफल, लेकिन हमेशा प्यार में जरूर रहे.

बौलीवुड के प्रेमी जोड़े जिन्होंने प्यार में सफलता पाई और जिंदगीभर प्यार को निभाया

बौलीवुड के रोमांस किंग शाहरुख खान ने गौरी से प्रेमविवाह किया और जिंदगीभर साथ निभा रहे हैं। दिलीप कुमार सायरा बानो, नीतू सिंह ऋषि कपूर, धर्मेंद्र हेमा मालिनी, कियारा आडवाणी सिद्धार्थ मल्होत्रा, अनुष्का शर्मा विराट कोहली, अभिषेक बच्चन ऐश्वर्या राय, सोनाक्षी सिन्हा जहीर खान, रणवीर सिंह दीपिका पादुकोण, आलिया भट्ट रणबीर कपूर, विकी कौशल कैटरीना कैफ, रितेश देशमुख जेनेलिया डिसूजा आदि कई जोड़ियां हैं जो अपने प्यार को पा कर शादी की मंजिल तक पहुंचे.

बौलीवुड के सितारे जिन्होंने प्यार के नाम कर दी पूरी जवानी और कभी शादी के बंधन में नहीं बंधे

किसी से सच्चा प्यार करना या किसी का सच्चा प्यार पाना अगर एक भावनात्मक रिश्ता है तो उसी प्यार की खातिर अपनी जिंदगी दांव पर लगा देना और किसी और को नापसंद करना एक ऐसा सच्चा प्यार है जो न सिर्फ दुख देता है, बल्कि किसी भयानक बीमारी की तरह मरते दम तक साथ भी रहता है.

ग्लैमर और खूबसूरती से भरे बौलीवुड में कई ऐसे सैलिब्रिटीज भी हैं जिन्होंने प्यार में मिली असफलता के चलते कभी किसी और से शादी नहीं की बल्कि अपनी पूरी जिंदगी अपने प्यार के लिए कुरबान कर दी, जैसे काफी सालों पहले निर्माता निर्देशक ऐक्टर गुरुदत्त ने वहीदा रहमान के प्यार में पड़ने की वजह से और प्यार में असफल होने की वजह से आत्महत्या कर ली थी. इसी तरह सुलक्षणा पंडित ने संजीव कुमार के प्यार में पड़ कर और कल्पना अय्यर ने अमजद खान के प्यार में अपना पूरा जीवन तबाह कर लिया था और उन के ही नाम पर विधवा की तरह पूरी जिंदगी गुजार दी.

इसी तरह अभिनेत्री परवीन बौबी ने डाइरैक्टर महेश भट्ट के प्यार में पड़ कर अपनी जिंदगी बरबाद कर ली थी. खबरों के अनुसार निर्माता निर्देशक करण जौहर ट्विंकल खन्ना से प्यार करते थे। शादी न होने की वजह से करण जौहर ने किसी और से शादी नहीं की. इसी तरह संजय लीला भंसाली, जो एक मशहूर निर्माता निर्देशक हैं, भी किसी लड़की के प्यार में थे जिस से शादी न होने पर संजय लीला भंसाली ने पूरा जीवन कुंआरे रह कर ही गुजार दी.

इसी तरह सलमान खान ने कई बार प्यार किया फिर चाहे वे ऐश्वर्या राय हों, कैटरीना कैफ हों या संगीता बिजलानी. सलमान खान भी प्यार में असफल रहे और अभी तक कुंआरे घूम रहे हैं.

कंगना रनौत रितिक रोशन से प्यार करती थीं। उन को प्यार में धोखा मिला इसलिए अभी तक शादी नहीं कीं। इसी तरह रेखा ने अमिताभ बच्चन की खातिर, आशा पारेख ने नासिर हुसैन की खातिर पूरी जिंदगी अकेले ही काट दी.

एक एहसास है प्यार

इन सभी बातों से यही निष्कर्ष निकलता है कि प्यार में सफलता मिले या असफलता, लेकिन प्यार एक ऐसा एहसास है जिस से दूर नहीं रहा जा सकता क्योंकि यह दिल से दिल का रिश्ता है जो कभी भी कहीं भी हो सकता है. यह बिना तार का कनैक्शन है जो कब किस से जुड़ जाए पता ही नहीं चलता लेकिन यह दिल का कनैक्शन एक बार जुड़ गया तो मरने के बाद ही खत्म होता है.

शायद तभी तो कहते हैं कि यह इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजिए इक आग का दरिया है और डूब के जाना है.

Sister Goals : मेरी बहन मुझसे बातबेबात नाराज रहती है, मैं क्या करूं?

Sister Goals :  अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल-

मैं 21 वर्षीय युवती हूं. मुझ से 5 साल बङी मेरी एक बहन है. हम दोनों को मातापिता से बहुत प्यार मिलता है. मेरी परेशानी यह है कि मेरी बहन मुझ से बातबेबात नाराज हो जाती है और हमेशा मुझे घर में नीचा दिखाने में लगी रहती है. बहन की शिकायत पर मुझे घर में डांट भी सुननी पङती है. समझ नहीं आता क्या करूं? कृपया उचित सलाह दें?

जवाब-

बहन का रिश्ता बङा ही अनमोल होता है. इसे ताउम्र रिश्तों में सहेज कर रखना हमेशा खुशियों की सौगात देता है क्योंकि यही एक ऐसा रिश्ता होता है जिस के साथ आप खुल कर जी सकती हैं, मन की बात शेयर कर सकती हैं.

आप की बङी बहन आप से नाराज रहती हैं तो आप इस की वजह जानने की कोशिश करें. फुरसत के समय जब आप की बहन का मूड अच्छा रहे तो अपनी दिल की बात बताएं और कहें कि आप उन्हें बहुत प्यार करती हैं. बहन को मनाने के लिए आप सौरी कार्ड खरीद कर अथवा बना कर वैसी जगह रखें जहां आप की बहन की नजर बराबर पङती हो. इस के अलावा आप की बहन को जो खाना पसंद है वह आप अपने हाथों से बना कर और उन्हें अपने हाथों से खिला कर उन की नाराजगी दूर कर सकती हैं.

बर्थडे या अन्य अवसरों पर उन्हें केक या फिर कोई अच्छा सा गिफ्ट जरूर दें. अपनी बात भी उन से बराबर शेयर करती रहें और उन्हें यह एहसास दिलाती रहें कि वे आप के लिए बेहद खास हैं. यकीन मानिए, बहन के साथ दोस्ताना संबंध उन्हें भी पसंद आएगा और आप की बहन सिर्फ बहन नहीं, बल्कि अच्छी दोस्त बन जाएगी.

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