Kirthi Jayakumar: मानव तस्करी विरोधी विधेयक में सक्रिय भूमिका

Kirthi Jayakumar: (सोशल इंपैक्ट आइकन अवार्ड)- कीर्ति जयकुमार एक ऐक्टिविस्ट, आर्टिस्ट, ऐंटरप्रन्योर और राइटर हैं, जिन्होंने 2013 में ‘रैड एलिफेंट फाउंडेशन’ की स्थापना की. यह एक यूथ नेतृत्व वाली शांति निर्माण पहल है जो ‘एडवोकेसी,’ ‘स्टोरी टैलिंग,’ ‘टेक फौर गुड’ और डिजिटल मीडिया के माध्यम से लिंग समानता, शांति और सामाजिक न्याय पर फोकस करता है.

कीर्ति जयकुमार का जन्म 15 दिसंबर, 1987 को बैंगलुरु में हुआ था. उन्होंने चैन्नई के ‘स्कूल औफ ऐक्सीलैंस इन ला’ से कानून की डिगरी प्राप्त की और बाद में कोस्टारिका में ‘यूनिवर्सिटी फौर पीस’ से शांति अध्ययन और संघर्ष समाधान में मास्टर डिगरी प्राप्त की.

कीर्ति ने कानून की डिगरी के साथसाथ ‘पीस ऐंड कनफ्लिक्ट स्टडीज’ में मास्टर डिगरी प्राप्त की है. कीर्ति जयकुमार का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में कई चुनौतियों का सामना किया है लेकिन उन की मां ने उन्हें हमेशा प्रेरित किया और उन्हें अपने सपनों को पूरा करने के लिए प्रोत्साहित किया.

कीर्ति जयकुमार ने ‘साहस’ नामक एक जीपीएस इनेबल्ड वैब और मोबाइल ऐप विकसित किया है जो महिलाओं को हिंसा से बचने और मदद प्राप्त करने में सहायता करता है. यह ऐप 197 देशों में उपलब्ध है और महिलाओं को चिकित्सा, कानूनी और अन्य प्रकार की मदद प्रदान करता है.

कीर्ति जयकुमार का कहना है कि उन का उद्देश्य महिलाओं को सशक्त बनाना और उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रेरित करना है. उन्होंने कहा, ‘‘मैं महिलाओं को साहस देना चाहती हूं ताकि वे अपने जीवन को बदल सकें.’’

मुख्य कार्य और योगदान

– महिलाओं के भले के लिए ‘साहस’ ऐप विकसित किया.

– 112 से अधिक वर्कशौप किए, जिन में 3,500 से अधिक बच्चों और युवाओं को जैंडर और पीस से जुड़ी शिक्षा दी.

– न्याय, समानता जैसे विषयों पर उपन्यास और कविताएं प्रकाशित कीं.

– यूएन औनलाइन वालंटियरिंग प्रोग्राम के माध्यम से स्कूलों, कालेजों, यूएन एजेंसियों के साथ कोलैबोरेशन.

पुरस्कार और मान्यता

– यूएस प्रैसिडैंशियल सर्विस अवार्ड (2012) तत्कालीन प्रैसिडैंट बराक ओबामा द्वारा स्वयंसेवी कार्य के लिए.

– 3 बार यूएन औनलाइन वालंटियर औफ द ईयर अवार्ड प्राप्तकर्ता.

– फिक्की फ्लो आउटस्टैंडिंग वूमन अचीवर औफ द ईयर (2018).

– फरवरी, 2018 में फेसबुक इंडिया की 6 महिलाओं में से एक के रूप में नामित.

– व्हाइट हाउस में यूनाइटेड स्टेट्स औफ वूमन समिट (2016) में आमंत्रित.

– न्यू दिल्ली में प्रैसिडैंट ओबामा के टाउन हाल (2017) में आमंत्रित.

कीर्ति के नेतृत्व ने लिंग समानता, शांति निर्माण की ओर मानसिकता में बदलाव को बढ़ावा दिया है. कीर्ति जयकुमार का ‘रैड एलिफेंट फाउंडेशन’ के माध्यम से काम समर्पित सक्रियता का एक उदाहरण है जो लिंग समानता और शांति को बढ़ावा देने के लिए कानूनी ज्ञान, तकनीक और कहानी कहने को जोड़ता है.

कीर्ति जयकुमार की कहानी एक प्रेरणा है कि कैसे एक महिला अपने सपनों को पूरा कर सकती है और समाज में बदलाव ला सकती है. उन्होंने अपनी कला के माध्यम से समाज में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है और उन की कहानी आने वाली पीढि़यों के लिए एक प्रेरणा होगी.

Kirthi Jayakumar

Neha Bagaria: महिलाओं की आजादी और लीडरशिप की बड़ी आवाज

Neha Bagaria: नेहा बगारिया बेंगलुरु, कर्नाटक में रहने वाली एक जानी-मानी उद्यमी हैं. उन्होंने अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया (व्हार्टन स्कूल) से ड्यूल डिग्री हासिल की है. नेहा HerKey (पहले JobsForHer) की संस्थापक और सीईओ हैं जो आज भारत का सबसे बड़ा AI-पावर्ड करियर एंगेजमेंट प्लेटफॉर्म है, खासतौर पर महिलाओं के लिए बनाया गया.

नेहा को इस प्लेटफॉर्म का आइडिया तब आया जब उन्होंने मां बनने के बाद करीब 3.6 साल का करियर ब्रेक लिया. उस दौरान उन्होंने महसूस किया कि भारत में लाखों महिलाएं बच्चे या पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण काम छोड़ देती हैं और फिर दोबारा काम पर लौटने में उन्हें कितनी मुश्किलें होती हैं. इसी सोच से 2015 में उन्होंने JobsForHer की शुरुआत की, जो अब HerKey के नाम से जाना जाता है.

आज HerKey पर 40 लाख से ज़्यादा महिलाएं जुड़ी हुई हैं और 15,000 से ज़्यादा कंपनियां इस प्लेटफॉर्म के जरिए डाइवर्सिटी हायरिंग, ट्रेनिंग, और महिला लीडरशिप प्रोग्राम्स चला रही हैं. यहां सिर्फ नौकरियां नहीं, बल्कि अपस्किलिंग कोर्स, मेंटरशिप, नेटवर्किंग और प्रोफेशनल ग्रोथ के मौके भी मिलते हैं.

नेहा का सफर भी काफी दिलचस्प रहा है. अपने करियर की शुरुआत उन्होंने पैरागौन नाम की कंपनी से की थी, जिसके जरिए उन्होंने भारत में एडवांस्ड प्लेसमेंट (AP) प्रोग्राम लाया. इसके बाद वे अपने परिवार की बायोफार्मा कंपनी Kemwell में बिजनेस स्ट्रैटेजी और मार्केटिंग का काम देखने लगीं. लेकिन जब उन्होंने कुछ साल का ब्रेक लिया, तब उन्हें एहसास हुआ कि महिलाओं के लिए दोबारा काम शुरू करना कितना मुश्किल होता है और यहीं से शुरू हुई HerKey की नींव.

शुरुआत में नेहा ने सिर्फ पांच महिलाओं की टीम के साथ अपने घर की छत से यह काम शुरू किया था. आज HerKey के पास 100 से ज़्यादा लोगों की टीम है और Amazon, Accenture, Capgemini, Myntra जैसी बड़ी कंपनियां इसकी क्लाइंट हैं. कंपनी का मॉडल भी दिलचस्प है महिलाओं के लिए प्लेटफॉर्म पूरी तरह फ्री है, जबकि कंपनियां हायरिंग और टैलेंट एंगेजमेंट सेवाओं के लिए भुगतान करती हैं.

अब तक HerKey ने Kalaari Capital, 360 ONE Asset और कुछ एंजल इन्वेस्टर्स से करीब 4 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाई है. कंपनी का मकसद सिर्फ महिलाओं को नौकरियां दिलाना नहीं, बल्कि उनके करियर को दोबारा संवारना और समाज में बराबरी का माहौल बनाना है.

नेहा बगारिया को कई अवॉर्ड्स से नवाजा जा चुका है- Forbes India’s WPower Trailblazers, BusinessLine Changemaker Award 2023 (Social Transformation) और NITI Aayog व संयुक्त राष्ट्र (UN) से महिला सशक्तिकरण में उनके योगदान के लिए सम्मान मिला है.

वो आज महिलाओं की आर्थिक आजादी, लीडरशिप और फाइनेंशियल इंक्लूजन की बड़ी आवाज़ बन चुकी हैं. HerKey में ज्यादातर महिलाएं काम करती हैं चाहे वो करियर रिटर्नी हों, फ्रेशर्स, लीडर्स या टेक प्रोफेशनल्स.

नेहा का अगला सपना है कि HerKey के जरिए 1 करोड़ महिलाओं को उनके करियर में आगे बढ़ने में मदद मिले. वो चाहती हैं कि भारत की हर महिला को सीखने, बढ़ने और लीडर बनने का मौका मिले और कंपनियां भी महिलाओं की टैलेंट और पोटेंशियल को सही मायने में पहचानें.

Neha Bagaria

Aishwarya Pissay: देश की युवतियों और मोटरस्पोर्ट्स प्रेमियों की रोल मौडल

Aishwarya Pissay: ऐश्वर्या पिस्से बेंगलुरु, कर्नाटक की रहने वाली एक जानी-मानी रेसर हैं. वो भारत की पहली मोटरस्पोर्ट्स एथलीट हैं जिन्होंने वर्ल्ड टाइटल जीता, जब उन्होंने 2019 में FIM Bajas World Cup (महिला कैटेगरी) में इतिहास रचा. आज वो TVS Racing टीम की प्रोफेशनल राइडर हैं और देश-विदेश में अपने दमदार परफॉर्मेंस से पहचान बना चुकी हैं.

ऐश्वर्या का जन्म 14 अगस्त 1995 को बेंगलुरु में हुआ था. उन्होंने महिला सेवा समाज सीनियर सेकेंडरी स्कूल से पढ़ाई की और फिर सुराना कॉलेज से साइकोलॉजी में ग्रेजुएशन किया. उन्हें बचपन से एडवेंचर पसंद था, लेकिन बाइक रेसिंग का जुनून उन्हें 18 साल की उम्र में हुआ. इसी उम्र में उन्होंने Apex Racing Academy से ट्रेनिंग लेकर रेसिंग की शुरुआत की और जल्द ही मोटरस्पोर्ट्स की दुनिया में नाम कमाना शुरू कर दिया.

2016 और 2017 में ऐश्वर्या ने Honda One Make Championship और TVS One Make Road Racing टाइटल्स जीते. इसके बाद उन्होंने लगातार सात FMSCI नेशनल टाइटल्स जीते जिनमें से छह लगातार इंडियन नेशनल रैली चैम्पियनशिप के खिताब थे.

2018 में ऐश्वर्या ने एक और इतिहास रचा जब वो Baja Aragon Rally (Spain) में भाग लेने वाली भारत की पहली महिला रेसर बनीं. यह रैली दुनिया की सबसे कठिन रेसों में से एक मानी जाती है. लेकिन उनका सफर आसान नहीं रहा. कई बार उन्हें गंभीर चोटें आईं एक बार तो उनकी पैंक्रियाज फट गई थी, जिससे उनकी जान को भी खतरा था. लेकिन ऐश्वर्या ने हार नहीं मानी. उन्होंने लंबे इलाज और ट्रेनिंग के बाद फिर से ट्रैक पर वापसी की और अपने जज़्बे से सबको चौंका दिया.

2019 में उन्होंने दुनिया को दिखा दिया कि भारतीय महिलाएं किसी से कम नहीं हैं उन्होंने FIM Bajas World Cup (महिला वर्ग) जीतकर भारत का नाम गर्व से ऊँचा किया. यह वर्ल्ड कप उन्होंने दुबई, पुर्तगाल, स्पेन और हंगरी में खेले गए चार राउंड्स में हिस्सा लेकर 65 पॉइंट्स के साथ जीता. इस जीत के साथ वो भारत की पहली वर्ल्ड चैम्पियन मोटरस्पोर्ट्स एथलीट बन गईं.

ऐश्वर्या को अब तक कई अवॉर्ड्स और सम्मान मिल चुके हैं —

* TiE Young Achiever of the Year (2016)

* Outstanding Women in Motorsports Award (FMSCI द्वारा 2016 और 2017)

* CEAT Sprint Rally Champion

* Asia Road Racing Cup में सेकंड पोज़िशन (2016)

* और हाल ही में 2024 में उन्होंने FIM Bajas World Cup में तीसरा स्थान हासिल किया, यानी तीसरी बार वर्ल्ड चैम्पियनशिप पोडियम पर जगह बनाई.

जज्बा और हिम्मत

ऐश्वर्या पिस्से सिर्फ एक रेसर नहीं बल्कि एक प्रेरणा हैं. उन्होंने साबित किया है कि अगर जज्बा और हिम्मत हो तो कोई भी बाधा बड़ी नहीं होती. आज वे देशभर की युवतियों और मोटरस्पोर्ट्स प्रेमियों के लिए रोल मौडल बन चुकी हैं. वे खुद भी अब इस दिशा में काम कर रही हैं कि महिलाओं को मोटरस्पोर्ट्स में ज्यादा मौके और सही प्लेटफौर्म मिल सके.

उन का मानना है कि खुद पर भरोसा रखो, रास्ता अपनेआप बन जाएगा और शायद यही लाइन उन की जिंदगी और कामयाबी की सब से सही पहचान है.

Aishwarya Pissay

Dhivya Vikram: कौन्फिडैंस किसी साइज का मुहताज नहीं

Dhivya Vikram: (डिजिटल कंटैंट क्रिएटर अवार्ड)-  विक्रम, जिन्हें सोशल मीडिया पर लोग प्यार से Snazzy Tamilachi के नाम से जानते हैं, चैन्नई की एक खूब चर्चित डिजिटल क्रिएटर हैं. वे डांस, ऐक्टिंग, फैशन और अपनी बिंदास पर्सनैलिटी से यह साबित करती हैं कि कौन्फिडैंस किसी साइज का मुहताज नहीं होता. प्लस साइज कंटैंट क्रिएटर के तौर पर धिव्या ने साउथ इंडिया में एक अलग ही पहचान बनाई है.

धिव्या ने अपने कैरियर की शुरुआत एक प्रोफैशनल डांसर और ऐक्टर के रूप में की थी. लेकिन धीरेधीरे उन का झुकाव डिजिटल कंटैंट की तरफ बढ़ा और उन्होंने सोशल मीडिया को ही अपना पूरा मंच बना लिया. आज उन के इंस्टाग्राम, यूट्यूब और दूसरे प्लेटफौर्म्स पर लाखों लोग जुड़े हैं जो उन के डांस, उन के ह्यूमर और उन की ईमानदार बातों से इंस्पायर होते हैं.

क्या है मकसद

धिव्या सिर्फ एक क्रिएटर ही नहीं हैं वे एक ऐंटरप्रन्योर भी हैं. उन्होंने Size Beyond नाम का एक साइज इनक्लूसिव फैशन ब्रैंड कोफाउंड किया है जो XS से ले कर 10 XL तक के साइज में स्टाइलिश और कंफर्टेबल आउटफिट बनाता है. उन का मकसद साफ है, हर महिला को उस के शरीर के हिसाब से अच्छे कपड़े मिलें और फैशन सिर्फ एक वर्ग तक सीमित न रहे.

उन का कंटैंट उन की पहचान है. ऐनर्जी से भरा डांस, लाइफस्टाइल वीडियोज और बाडी पौजिटिविटी पर खुल कर की गई बातें. धिव्या अपने बोल्ड और दिल से जुड़े मैसेजों से यह दिखाती हैं कि खुद से प्यार करना कोई ऐटिट्यूड नहीं बल्कि जरूरी चीज है खासकर साउथ की युवा लड़कियों के लिए वे एक बड़ी प्रेरणा हैं क्योंकि वे उन्हें एक ऐसा चेहरा देती हैं जिस में वे खुद को देख पाती हैं बिना जजमैंट के, बिना ग्लैमर की ओवर फिल्टर परत के.

रंग लाई मेहनत

धिव्या की मेहनत और असर को पहचान भी मिली है. धिव्या को Blaze Summer Fest 2025 में डिजिटल ऐक्सीलैंस और पौजिटिव सोशल इंपैक्ट के लिए सम्मानित किया गया. आज वे 5 लाख से ज्यादा फौलोअर्स के साथ साउथ इंडिया की सब से प्रमुख प्लस साइज फैशन और लाइफस्टाइल इन्फ्लुएंसर्स में गिनी जाती हैं.

Snazzy Tamilachi के जरीए धिव्या विक्रम ने यह साबित कर दिया है कि रीयल कौन्फिडैंस तभी आता है जब आप खुद को जैसे हैं, वैसे ही अपनाते हैं. उन का सफर, उन की आवाज और उन का कंटैंट लगातार महिलाओं को यह भरोसा देता है कि सुंदरता एक ही सांचे में नहीं ढलती हर शरीर खूबसूरत है.

Dhivya Vikram

Dinaz Vervatwala: एक ऐसा इकोसिस्टम बनाया, जहां फिटनैस टिकाऊ और मजेदार

Dinaz Vervatwala: डिजिटल कंटैंट क्रिएटर अवार्ड (हैल्थ ऐंड फिटनैस)- जहां आज भी कोई फिटनैस की बात छेड़ता है तो सब से पहले हमारे दिमाग में सुडौल पुरुष की छवि आती है क्योंकि बरसों से हम सेहत और ताकत का प्रतीक पुरुषों को ही मान रहे हैं. हमारी इसी सोच को चुनौती देते हुए दिनाज 3 दशकों से फिटनैस वर्ल्ड में अपना सिक्का जमाए हुए हैं. दिनाज का फिटनैस वर्ल्ड में हर चुनौती को पार करते हुए यों डटे रहना, उन सभी लड़कियों के लिए मिसाल है जो सिर्फ इस डर से आगे नहीं आतीं कि फिटनैस तो लड़कों की ताकत दिखाने का क्षेत्र है या फिटनैस वर्ल्ड में लड़कियों के लिए ज्यादा स्कोप या कमाई के मौके नहीं.

आज दिनाज को दुनिया में ऐरोबिक्स के लिए गिनीज वर्ल्ड रिकौर्ड होल्डर और स्वास्थ्य एवं कल्याण कोचिंग के क्षेत्र में एक अग्रणी कोच के रूप में जाना जाता है. दिनाज शारीरिक प्रशिक्षण और माइंड प्रोग्रामिंग के माध्यम से व्यक्तियों, समुदायों और नैशनल ऐथलीटों को सशक्त बनाती हैं. दिनाज के इसी जोश को सलाम करते हुए गृहशोभा ने अपने इंस्पायर अवार्ड्स में उन्हें डिजिटल फिटनैस अवार्ड से नवाजा. दिनाज उन सभी लोगों के लिए एक बहुत बड़ा उदाहरण हैं जो फिटनैस वर्ल्ड में अपना नाम बनाने की चाह रखते हैं खासकर लड़कियां.

कौरपोरेट से फिटनैस कोच की राह

दिनाज मुंबई के एमएमके कालेज से कौमर्स ग्रैजुएट हैं और अपने कैरियर की शुरुआत उन्होंने बतौर एक प्रोफैशनल ट्रेंड चार्टर्ड अकाउंटैंट के रूप में की. अपने 1 साल के बेटे को संभालते समय ही उन्हें अपनी फिटनैस पर गौर करने की प्रेरणा मिली. उन्होंने फिटनैस के साथ ऐरोबिक्स क्लासेज जौइन कीं और देखते ही देखते अपनी कड़ी मेहनत से एक प्रसिद्ध उ-मी और फिटनैस ट्रेनर बन गईं. दिनाज अपने सोशल मीडिया हैंडल के द्वारा बहुत से लोगों को फिटनैस से जोड़ रही हैं. उन्हें फिट और हैल्दी रहने के लिए प्रोत्साहित करती हैं. हैल्थ से जुड़ी बहुत सारे महत्त्वपूर्ण टिप्स ऐंड ट्रिक्स और आसान ऐक्सरसाइज शेयर कर उन के जीवन में हैल्दी बदलाव ला रही हैं, जिस वजह से उन्हें लोगों की बहुत तारीफ और शुभकामनाएं मिलती रहती हैं.

फिटनैस में अपने कैरियर को बढ़ाते हुए दिनाज ने 1992 में हैदराबाद के पहले महिला ऐरोबिक्स सैंटर की स्थापना की. आगे के 3 दशकों में उनका काम बहुत फूलाफला और दिनाज फिटनैस स्टूडियो पर्सनल कोचिंग, वैलनैस प्रोग्राम, बड़े कौरपोरेट्स और नामी एवं नैशनल ऐथलीटों के लिए फिटनैस प्रोग्राम का एक प्रमुख केंद्र बन गया, साथ ही एक प्रेरक वक्ता के रूप में दिनाज भारत और विदेशों में फिटनैस, पोषण, वजन घटाने, मधुमेह शिक्षा और लचीलेपन पर कई वर्कशौप प्रदान करती हैं.

उल्लेखनीय भूमिका और उपलब्धियां

– 26 घंटे की नौनस्टौप ऐरोबिक्स मैराथन की गिनीज वर्ल्ड रिकौर्ड होल्डर.

– तीसरी रनर अप मिस फिटनैस यूनिवर्स (2011, रियो डी जनेरियो).

– संस्थापक और प्रबंध निदेशक, दिनाज फिटनैस स्टूडियो.

– ‘वेटलौस ऐक्सट्रीम’ कार्यक्रम के अंतर्गत लगभग 70 फिटनैस पेशेवरों को प्रशिक्षित किया गया.

– राष्ट्रीय खेल आइकनों की ट्रेनर (साइना नेहवाल, वी.वी.एस. लक्ष्मण, पुलेला गोपीचंद).

– प्रमुख मैराथन और सैन्य खेलों में 30 हजार प्रतिभागियों के लिए सामूहिक वार्मअप का नेतृत्व.

– पूरे भारत में चिकित्सा सम्मेलनों, TED3/TED कार्यक्रमों और संस्थानों में वक्ता.

– 2005 में एक भीषण अग्नि दुर्घटना से बचने पर- मनोबल और विपरीत स्थितियों पर दिमागी तालमेल पर चर्चा.

दक्षिण भारत ही नहीं संपूर्ण भारतीय महिलाओं के लिए प्रेरणा

दिनाज वर्वतवाला को दक्षिण भारत में ऐरोबिक्स और आधुनिक कल्याण की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है. दिनाज ने अपनी पहल से एक ऐसा इकोसिस्टम बनाया, जहां फिटनैस सयुंक्त, टिकाऊ और मजेदार हो. विशिष्ट ऐथलीटों के लिए उन का मार्गदर्शन, युवा महिला प्रशिक्षकों के लिए समर्थन और प्रेरक भाषण ने आम स्तर और कौरपोरेट दोनों स्तरों पर स्वास्थ्य के प्रति अपनाई गई धारणा में बदलाव लाया है.

व्यक्तिगत मसलों से लड़ कर बाहर आ कर और अपनी असफलताओं को खुले तौर पर साझा कर वे हर महिला के लिए एकदृढ़ संकल्प और सशक्तीकरण के रोल मौडल के रूप में नजर आती हैं खासकर उन महिलाओं के लिए जो फिटनैस समुदायों से जुड़ी और इस में कुछ कर गुजरना चाहती हैं.

Dinaz Vervatwala

C. A. Bhavani Devi: भारत की पहली ओलिंपियन सेबर फेंसर

C. A. Bhavani Devi: (स्पोर्ट्स अचीवर अवार्ड)- चडालवाड़ा आनंदा भवानी देवी, जिन्हें हम भवानी देवी के नाम से जानते हैं, चैन्नई की रहने वाली भारत की सब से सफल सेबर फेंसर हैं. 27 अगस्त, 1993 को जन्मी भवानी आज भारतीय फेंसिंग की एक ऐसी पहचान बन चुकी हैं, जिन्होंने इस खेल को देश में एक नई जगह दिलाई है. वे 12 बार की नैशनल चैंपियन हैं और 2023 एशियन फेंसिंग चैंपियनशिप में ब्रौंज मैडल जीत कर पहली भारतीय बनीं, जिन्होंने इस टूरनामैंट में पदक जीता, साथ ही वे टोक्यो 2020 ओलिंपिक्स में हिस्सा लेने वाली भारत की पहली फेंसर भी हैं.

भवानी की फेंसिंग की शुरुआत स्कूल के दिनों में हुई. दरअसल, जब स्कूल में बाकी खेलों के लिए सीटें भर गईं तब उन्होंने मजबूरी में फेंसिंग चुन ली लेकिन यही मजबूरी धीरेधीरे उन का जनून बन गई. शुरुआती दिनों में सुविधाएं कम थीं, कोच और ट्रेनिंग के औप्शन भी बहुत सीमित थे, लेकिन उन की मां और परिवार ने हर कदम पर उन का साथ दिया. भवानी ने भारत के साथसाथ विदेशों में भी ट्रेनिंग ली और पढ़ाई के साथसाथ अपने खेल को भी बराबर बैलेंस किया. उन्होंने बीए और एमबीए करते हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया.

बड़ी उपलब्धियां

भवानी के कैरियर में कई बड़ी उपलब्धियां शामिल हैं. वे कौमनवैल्थ फेंसिंग चैंपियनशिप में डबल गोल्ड मैडलिस्ट रह चुकी हैं और कई अंतर्राष्ट्रीय टूरनामैंट्स जैसे टूर्नोई सैटेलाइट इवेंट्स और एशियन चैंपियनशिप में भी मैडल जीत चुकी हैं. लेकिन 2023 का ब्रौंज मैडल उन के कैरियर की सब से ऐतिहासिक उपलब्धियों में से एक है क्योंकि यह भारत का इस प्रतियोगिता में पहला पदक था.

भवानी देवी ने भारत में फेंसिंग को पहचान दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई है. पहले यह एक ऐसा खेल था जिस के बारे में लोग बहुत कम जानते थे, लेकिन भवानी की मेहनत, फोकस और कामयाबी ने इसे युवाओं खासकर लड़कियों के बीच लोकप्रिय बना दिया.

आज वे सिर्फ एक चैंपियन नहीं बल्कि एक प्रेरणा हैं जो साबित करती हैं कि चाहे रास्ता कितना भी मुश्किल क्यों न हो लगातार मेहनत और भरोसा आप को आप की मंजिल तक जरूर पहुंचाता है.

C. A. Bhavani Devi

Yashoda Prakash: क्यों अलग हैं यशोदा की कहानियां

Yashoda Prakash: ऐंपावरमैंट थ्रू ऐंटरटेनमैंट अवार्ड (औफस्क्रीन)- जब एक सफल फाइनैंशियल एडवाइजर को उस के सपने, उस के जनून ने सोने नहीं दिया और फिर ले आया उसे कहानियों के एक ऐसे सफर में जिस का रोमाचंक मोड़ बना नैशनल फिल्म अवार्ड.

कोडागु, कर्नाटक की हरियाली की गोद में जन्मी बच्ची एक दिन नैशनल अवार्ड जीतेगी, यह कभी किसी ने सोचा नहीं था. अपने प्रांत, संस्कृति के रंगों और कहानियों के बीच खेलीकूदी यशोदा हमेशा से अपने भीतर कुछ बड़ा करने का जज्बा लिए हुए थी, जिस की वजह से आज वे पहली कोडावती महिला निर्माता बनी.

एक निर्माता की शुरुआत: स्वास्तिक ऐंटरटेनमैंट

अपने सपने को पूरा करते हुए यशोदा ने स्वास्तिक एंटरटेनमैंट बैनर की नींव रखी, जिस के नीचे यशोदा ने कई फिल्में बनाई. ‘बाक्के माना,’ ‘श्मशान मौन,’ ‘दीक्षा और नाडा पेड़ा आशा’ की वे सहनिर्माता रही. मगर 2023 में बनी फिल्म ‘कंदीलु दी रे औफ होप’ यशोदा के जीवन का एक लाइफ चेंजिंग पौइंट रहा. फिल्म ‘कंदीलु’ को 71वें नैशनल फिल्म अवार्ड्स के अंतर्गत बैस्ट कन्नड़ फिल्म का खिताब मिला.

स्वास्तिक ऐंटरटेनमैंट की स्थापना करने का मकसद शायद यही था कि वे संवेदनशील और ठोस कहानियों को दुनिया के सामने रख सकें ताकि समाज में उन की कहानियों के जरीए कुछ मजबूत बदलाव होने की एक शुरुआत हो सके.

क्यों अलग हैं यशोदा की कहानियां

यशोदा की हर फिल्म लोगों के दिलोदिमाग पर गहरी छाप छोड़ जाती है, जिस से उन्हें दुनियाभर से प्यार और सम्मान मिलता है क्योंकि इन फिल्मों की कहानियां कोई काल्पनिक घटनाओं से नहीं बुनी रहतीं बल्कि जीवन और समाज की वास्तविकता की जमीनी सचाई से उठ कर आती हैं. आम लोगों की आम कहानियां जो जीवन के हर रंग यानी सुखदुख, रोनाहंसना, चीखपुकार को हम सब के सामने एक फिल्म के जरीए पेश करती हैं. इन की कहानियों में कोई सुपर हीरो या फालतू के ट्विस्ट नहीं होते बल्कि एक किसान की पीड़ा, महिला की दुखद जीवनी, परिवार का कठिन संघर्ष और समाज के ऐसे वर्ग के लोगों की कहानियां होती हैं, जिन्हें हम न अपनी दौड़तीभागती जिंदगी में देखते और शायद न देखना चाहते हैं.

यशोदा की अपनी कहानियों के द्वारा समाज को आईना दिखाने और महिलाओं को सशक्त करने के हौसले को नमन करते हुए और उन के इस जब्बे को और मजबूत करने की राह में गृहशोभा ने भी अपनी भूमिका निभाई.

गृहशोभा ने यशोदा को ‘ऐंपावरमैंट थ्रूऐंटरटेनमैंट’ का अवार्ड दे कर यह आशा कि यशोदा यों ही अपनी फिल्मों से महिलाओं को समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ खड़े होने की ताकत और उन से लड़ कर आगे बढ़ने की एक प्ररेणास्रोत बनी रहेंगी.

सम्मान और उपलब्धियां

यशोदा आज फिल्म इंडस्ट्री में उम्दा निर्देशक और निर्माता की श्रेणी में गिनी जाती हैं. उन का काम इंडस्ट्री के साथ आम जनता के दिल को जीतते हुए कई फिल्म फैस्टिवल की शान बन गया है. यशोदा के उन्हीं बेहतरीन फिल्मों की उपलब्धि पर एक नजर:

– ‘कंदीलु दी रे औफ होप’ बैस्ट कन्नड़ फिल्म 71वें नैशनल फिल्म अवार्ड्स (2025).

– ‘बाक्के माना’ कोलकाता इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल, 2017 में चयनित.

– ‘श्मशान माना’ बैंगलुरु इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल, 2018 में चयनित.

– ‘दीक्षा’ कर्नाटक फिल्म फैस्टिवल में चयनित.

– ‘कंदीलु’ विभिन्न फैस्टिवल नौमिनेशन एवं बीआईएफ फैस्टिवल में दूसरे स्थान की बैस्ट कन्नड़ फिल्म.

सोच और निश्चय

यशोदा हर संभव प्रयास करती हैं कि उन की कहानियां, फिल्में समाज में जागरूकता और बदलाव लाएं. इसलिए उन की कहानियां महिला संदर्भ के साथ पारिवारिक चुनौतियों, समाज के दबे वर्ग, उस की अनसुनी पुकार के इर्दगिर्द ही रहती हैं. अपने निर्देशन कार्य में आने वाली कोई भी कठिनाई यशोदा को और अधिक परिश्रम करने की प्रेरणा देती है जो उन के प्रयासों को और भी निखारता है, जिस से हमें सिनेमा इंडस्ट्री में कई यूनीक फिल्में देखने को मिलती हैं.

यशोदा ने एक इंटरव्यू में यह जताया था कि वे अपनी कोडावा संस्कृति को सिनेमा के जरीए विश्वभर में प्रस्तुत करना चाहती हैं और उन की फिल्में खासकर फिल्म ‘कंदीलु’ उसी बात का सत्य प्रमाण दिखता है. यशोदा समाज की कुंठित सोच को तोड़ते हुए दुनिया को ऐसी कहानियां दिखा रही हैं जो कोई कथाकहानियां नहीं बल्कि कड़वी सचाई हैं.

Yashoda Prakash

Jamma Mallari: कला के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी के लिए द्वार खोले

Jamma Mallari: (फोक हेरीटेज आइकन अवार्ड) 80 वर्षीय जम्मा मल्लारी ओग्गु कथा की एकलौती महिला कथाकार हैं. वे इस क्षेत्र में अर्थात ओग्गु कथा कला में बदलाव की क्रांति ले कर आईं, जहां हमेशा से पुरुषों का बोलबाला था. दशकों से अपने ओग्गु कथा के प्रति निष्ठा और समर्पण से कई खूबसूरत परफौर्मैंस पेश कर अपनी सांस्कृतिक कला को बड़ा भी कर रही हैं और अपनी कला के माध्यम से आने वाली पीढ़ी को प्रेरित भी कर रही हैं.

जिस महिला ने अपनी 80 वर्ष की आयु में 70 वर्ष अपनी सांस्कृतिक कला की रक्षा में त्याग दिए, उस महिला से बड़ा फोक आइकन आखिर कौन होगा. जम्मा के इसी समर्पण और निष्ठा को प्रणाम करते हुए गृहशोभा ने उन्हें गृहशोभा इंस्पायर अवार्ड में फोक हैरिटेज आइकन अवार्ड प्रदान किया. जम्मा का कलात्मक सफर और उस के प्रति उन की निष्ठा आने वाली पीढ़ी के लिए मिसाल तो है ही, साथ ही एक आत्मपुकार भी है कि उन्हें अपनी सांस्कृतिक कला से जुड़े रहना चाहिए.

पुरुषों के क्षेत्र में एक महिला की क्रांति

जम्मा का जन्म उस परिवार में हुआ जो परंपरागत रूप से ओग्गु कथा को पेश करता आ रहा था. इसलिए जम्मा के पहले गुरु और कोई नहीं उन के पिता ही थे. जहां औरतों का समाज में कई पिछड़ी धारणाओं के चलते अपने विचार व्यक्त करना, एक अलग सोच रखना भी अपराध माना जाता था, वहां जम्मा ने केवल 11 वर्ष की आयु में प्राचीन कला का ज्ञान अर्जित करना शुरू कर दिया. जिस समय में एक लड़की का घर के बाहर पैर रखना भी अच्छा और सुरक्षित नहीं माना जाता था उस समय अपनी कला प्रदर्शन के लिए जम्मा अपनी यात्राएं हर मुश्किल पार करते हुए पूरा करतीं और मल्लान्ना की कथा को अपने अभिनय द्वारा एक उम्दा कला के रूप में पेश करतीं. उन का जनून और ओग्गु कथा कला सीखने और निखारने के संकल्प ने उन्हें कभी रुकने नहीं दिया.

अध्ययन, अभिनय और प्रशंसा

1956 के पास जम्मा ने ओग्गु कथा में पारंगत होने के लिए गायन, संगीत, नृत्य और परंपरागत वा-यंत्र जैसे रोल ऐंड झांझ को सीखना आरंभ किया ताकि अपने अभिनय को और निखार दे सकें और भारतीय संस्कृति की महान कहानियों को अपनी कला से ओग्गु कथा के रूप में पेश कर सकें. ओग्गु कथा को देश के हर कोने तक पहुंचाने के लिए जम्मा ने पिछले 6 दशकों से हर संभव प्रयास किया. जम्मा तेलंगाना और उस के आसपास के राज्यों और उन के गांवों, शहरों और उत्सवों में जा कर अपनी कला से लोगों का दिल जीत रही हैं.

जम्मा की कला का सब से अनूठा रंग है उन की बहुमुखी प्रतिभा, जहां वे पुरुष का भेष धारण परफौर्मैंस करती हैं. पुरुष वेशभूषा में गाती भी हैं और अभिनय भी करती हैं, जिस से वे सभी दर्शकों का दिल जीतती हैं और पारंपरिक कथा प्रदर्शन के मानदंडों को भी पूरा करती आ रही हैं.

जम्मा की उपलब्धियां

– 1950 के मध्य से ओग्गु कथा का प्रदर्शन करते हुए लगभग 70 वर्ष हो गए.

– सदियों पुरानी पुरुष प्रधान कला शैली में महिला भागीदारी की शुरुआत की.

– लोक कला समुदायों द्वारा आध्यात्मिक और कलात्मक गुरु की मान्यता.

अवार्ड्स

– सर्वश्रेष्ठ महिला लोक कलाकार के लिए वूमन अचीवर अवार्ड, ‘तेलंगाना’ (2020).

– क्षेत्रीय मीडिया और सांस्कृतिक मंचों पर ओग्गु कथा की एक प्रभावशाली महिला कलाकार के रूप में व्यापक रूप से प्रदर्शित कलाकार.

एक संरक्षक और शक्ति के रूप में

जम्मा मल्लारी का योगदान सिर्फ एक कलाकार के रूप में ही नहीं बल्कि एक शक्ति के रूप में भी है. वह शक्ति जो भारत की मौखिक और लोक विरासत के भीतर लैंगिक सशक्तीकरण की आवाज भी है और निरंतर रूप से उस के किए कर्मठ भी है. पारंपरिक रूप से जिस कला में  महिलाओं को अस्वीकार किया जाता था, जम्मा ने उसी कला में अपनी अहम भूमिका निभाई और समाज की बहुत सी महिलाओं के लिए कई रास्ते खोल दिए, जिस से महिलाओं की भागीदारी और प्रेरणा को बढ़ावा मिला है.

Jamma Mallari

Sunitha Krishnan: निर्भीक मानव तस्करी विरोधी योद्धा

Sunitha Krishnan: सुनीता कृष्णन भारत की निर्भीक मानव तस्करी विरोधी योद्धा और ह्यूमन राइट्स ऐक्टिविस्ट हैं. प्रज्ज्वला की सहसंस्थापक के रूप में उन्होंने दुनिया का सब से बड़ा मानव तस्करी विरोधी संगठन बनाया है जिस ने 28,600 से अधिक पीडि़तों को बचाया और पुनर्वासित किया है. उन के पीडि़त नेतृत्व वाले सशक्तीकरण मौडल ने 12 देशों में मानव तस्करी विरोधी नीतियों को फिर से आकार दिया है.

बैंगलुरु के एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी सुनीता कृष्णन प्रज्ज्वला की सहसंस्थापक हैं. सुनीता को बचपन से ही समाज सेवा का शौक था. जब वे 8 साल की थीं तब उन्होंने मानसिक रूप से दिव्यांग बच्चों को डांस सिखाना शुरू कर दिया था. 12 साल की उम्र में वे वंचित बच्चों के लिए झुग्गियों में स्कूल चलाती थीं.

15 की उम्र में जब वे दलित कम्युनिटी के लिए नव साक्षरता अभियान चला रही थीं तब 8 लोगों ने उन का सामूहिक बलात्कार किया था. उन्हें उन के पुरुष प्रधान समाज में एक महिला  की दखलंदाजी पसंद नहीं थी. सुनीता को बुरी तरह पीटा भी गया था. इस से उन का एक कान भी आंशिक रूप से डैमेज हो गया और उन्हें कम सुनाई देने लगा. मगर सुनीता ने हार नहीं मानी. नजरें झुका कर जीने, कुछ न कहने या आत्महत्या करने के बजाय सुनीता कृष्णन ने संघर्ष का रास्ता चुना.

किताब के जरीए जिंदगी की कहानी

कृष्णन कहती हैं, ‘‘आज मुझे जो याद है वह बलात्कार नहीं है. मुझे अपना गुस्सा याद है,’’ उन्होंने उस गुस्से का बखूबी इस्तेमाल किया है जो अब उन के जीवन का काम बन गया है. उन्होंने एक किताब के जरीए अपनी जिंदगी की कहानी भी बयां की. ‘आई एम, व्हाट आई एम’ नाम की इस किताब में अपनी आपबीती के साथ एक मुहिम की शुरुआत की दास्तां लोगों के सामने रखी.

सामूहिक बलात्कार की शिकार महिला अधिकारों की पैरोकार बनी सुनीता ने अपने साथ हुए हादसे को यौन तस्करी और जबरन वेश्यावृत्ति की शिकार महिलाओं को बचाने, पुनर्वास करने और समाज में वापस लाने के लिए प्रेरणा के रूप में इस्तेमाल किया. उन्होंने एक ऐसा संगठन बनाया, जिस ने 17,800 से ज्यादा महिलाओं और बच्चों के जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डाला है.  2016 में उन्हें देश का चौथा सर्वोच्च सम्मान पद्मश्री दिया जा चुका है.

1996 में सुनीता ने हैदराबाद में यौन तस्करी के जाल में फंसी महिलाओं और बच्चों को बचाने के लिए गैर लाभकारी संगठन प्रज्ज्वला की सहस्थापना की थी. वे यौन तस्करी को ‘मानवाधिकारों के उल्लंघन का सब से बुरा रूप’ और ‘आधुनिक गुलामी’ बताती हैं. उन का संगठन हैदराबाद में एचआईवी/एड्स से संक्रमित 5 हजार बच्चों की शिक्षा का दायित्व भी निभाता है और वेश्याओं के हजारों बच्चों के लिए 17 केंद्र संचालित करता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे दूसरी पीढ़ी के यौन शिकार न बनें.

पुरस्कार और सम्मान

अपने कट्टरपंथी विचारों के कारण सुनीता अपने परिवार से दूर हो गईं. उन के कट्टरपंथी काम ने उन की जान को बारबार खतरे में डाला है. सुनीता ने हजारों लड़कियों को बचाया है. 3 साल के बच्चों से ले कर 40 साल तक की महिलाओं को भी सुनीता ने न सिर्फ बचाया बल्कि प्रज्ज्वला के जरीए उन्हें आश्रय ढूंढ़ने और कोई काम सीखने में भी मदद करती हैं. ये लड़कियां आत्मविश्वास हासिल कर रही हैं और अपने जीवन में आशा का संचार कर रही हैं.

सुनीता ने मानव तस्करी विरोधी विधेयक का मसौदा तैयार करने में सक्रिय भूमिका निभाई है और #ShameTheRapist अभियान शुरू किया है. उन्होंने पुलिस अधिकारियों को प्रशिक्षित किया है, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कानून सुधारों को प्रभावित किया है और तकनीकी कंपनियों पर औनलाइन यौन शोषण को संबोधित करने के लिए दबाव डाला है.

उन्हें बहुत से पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं जिन में प्रमुख हैं, ‘पद्म श्री, भारत सरकार’ (2016), ‘टैल्बर्ग ग्लोबल लीडरशिप पुरस्कार,’ ‘फ्रैंकोजरमन अवार्ड फौर ह्यूमन राइट्स ऐंड रूल औफला,’ ‘सिविकस नेल्सन मंडेला इनोवेशन अवार्ड’ (2014), ‘जान जे कालेज इंटरनैशनल लीडरशिप अवार्ड, न्यूयार्क’ (2011), ‘ट्रैफिकिंग इन पर्सन्स हीरो, यू.एस. डिपार्टमैंट आफ स्टेट’ (2009), ‘सीएनएनआईबीएन रियल हीरो अवार्ड’ (2008), ‘लिंविग लिजेंड्स अवार्ड,’ ‘ह्यूमन सिंफनी फाउंडेशन’ (2013), ‘डायने वान फर्स्टेंबर्ग फाउंडेशन ऐक्सप्लेंप्लरी वूमन अवार्ड’ (2013), ‘स्त्री शक्ति पुरस्कार, भारत सरकार’ (2003) और ‘अशोक फैलो फौर इनोवेटिव सोशल ऐंटरप्रन्योरशिप.’

Sunitha Krishnan

Fictional Story: हमदर्दों से दूर- क्या सही था अखिलेश और सरला का फैसला

Fictional Story: “हैलो अखिलेशजी, आप फ्री हों तो आज शाम मिलें?” “जी जरूर, मैं तो खाली ही हूं. मगर कहां?” हड़बड़ाते हुए अखिलेश ने पूछा. “जी वही बंजारा रेस्तरां में ठीक 6 बजे मिलते हैं,” सरला ने जवाब दिया.

“ओके…” अखिलेश सरला से खुद मिलना चाहता था. वह खुश था कि सरला ने ही फोन कर के मिलने बुला लिया. दरअसल, जब से उस ने मैट्रिमोनियल साइट में अपनी प्रोफाइल बनाई थी सरला पहली महिला थी जो उसे एक ही नजर में ही पसंद आ गई थी.

समय 6 बजे का था मगर अखिलेश 2 घंटे पहले ही तैयार हो गया. आखिर सरला से जो मिलने जाना था. हलके ग्रे कलर की शर्ट और पैंट पहन कर वह आईने में ठीक से अपना मुआयना करने लगा. हर ऐंगल से खुद को जांचापरखा. कान के पास

किनारेकिनारे झांक रहे सफेद बालों को छिपाने की कोशिश की. 4 दिन पहले ही डाई लगाई थी मगर सफेदी फिर सामने आ गई थी. आंखों का चश्मा और माथे की सिलवटें वह चाह कर भी छिपा नहीं सकता था. खुद ही दिल को यह सोच कर दिलासा देने लगा कि 60 साल की उम्र में इतना फिट और आकर्षक भला कौन नजर आता है? जेब में पर्स और हाथ में मोबाइल ले कर वह चल दिया.

अखिलेश की पत्नी का करीब 10 साल पहले देहांत हो गया था. उस वक्त बच्चे साथ थे इसलिए ज्यादा पता नहीं चला. मगर धीरेधीरे बच्चों की शादी हो गई और वे अपनीअपनी दुनिया में मशगूल हो गए. बेटी ब्याह कर दूसरे शहर चली गई और

छोटे बेटे ने भी जौब के चक्कर में यह शहर छोड़ दिया. बड़ा बेटा पहले ही शादी के बाद मुंबई में बस चुका था. इस तरह मेरठ के घर में वह नितांत अकेला रह गया था.

अब पत्नी की याद ज्यादा ही आने लगी थी. नौकरानी घर संभाल जाती. नाश्ताखाना भी बना देती. मगर पत्नी वाली केयर कैसे कर सकती थी. यही वजह थी कि अखिलेश ने फिर से शादी करने का फैसला लिया ताकि अपनी बची जिंदगी इस तरह अकेलेपन और उदासी के साथ गुजारने के बजाय किसी विधवा से पुनर्विवाह कर के गुजार सके.

इस के लिए उस ने मैट्रिमोनियल साइट में अपनी प्रोफाइल बना डाली. 3-4 दिनों के अंदर ही बहुत सारी महिलाओं ने उन्हें इंटरैस्ट भेज दिया. इन सबों में सरला सब से ज्यादा पसंद आई थी. रेस्तरां की मेज पर सरला और अखिलेश आमनेसामने बैठे थे. सरला की उम्र करीब 50 साल थी. वह भी विधवा थी. एक बेटी थी जिस की शादी हो चुकी थी.

गोरा रंग, तीखे नैननक्श और चेहरे की चमक बता रही थी कि किसी जमाने में वह बला की खूबसूरत रही होगी. सरला ने साफ शब्दों में अपनी बात रखी,” करीब 5 साल पहले एक सड़क दुर्घटना में मेरे पति की मौत हो गई. आप को पता ही होगा कि पति के जाते ही औरत की

जिंदगी से सारी रौनक चली जाती है. मेरी बेटी भी मायके चली गई. अब बिलकुल दिल नहीं लगता है. बस इसी अकेलेपन की वजह से शादी का फैसला लिया है.”

“सरलाजी, मेरे साथ भी बिलकुल यही बात है. मेरा भी खयाल रखने के लिए कोई अपना मेरे पास नहीं. अकेलापन खाने को दौड़ता है. क्यों न हम एकदूसरे के साथी बन कर इस अकेलेपन को हमेशा के लिए दूर कर दें. मुझे आप की जैसी

समझदार और सरल महिला की ही जरूरत है.” सरला ने हौले से मुसकरा कर अपनी सहमति दे दी. दोनों 1-2 घंटे वहीं बैठे बातें करते रहे. अगले दिन फिर मिलने का वादा कर अपनेअपने घर लौट आए.

आते ही अखिलेश ने मैट्रिमोनियल साइट से अपनी प्रोफाइल हटा दी. उसे जिस की तलाश थी वह मिल चुकी थी. देर रात बेटे का फोन आया तो अखिलेश ने बेटे से अपनी खुशी शेयर की. सुन कर बेटा एकदम चुप हो गया.

कुछ देर बाद समझाते हुए बोला,”पापा, यह क्या करने जा रहे हो? क्या जरूरत है इस उम्र में शादी की? वह औरत पता नहीं कैसी हो? किस मकसद से शादी कर रही हो?”

“बेटा तमीज से बात कर, वह औरत तेरी होने वाली मां है. मैं जो यहां अकेलापन महसूस करता हूं उसे मिटाने के लिए शादी कर रहा हूं.” “यार पापा, अकेलापन मिटाने के सौ तरीके हैं. इस के लिए शादी कौन सा

रास्ता है?” झुंझलाए स्वर में बेटे ने कहा. “शादी ही सही रास्ता है बेटा. मुझे जो उचित लगा वही कर रहा हूं.तुम लोग तो मेरे साथ नहीं रहते न. फिर मेरी समस्या कैसे समझोगे?”

“पापा, इस बार मैं कोशिश करूंगा कि अपना ट्रांसफर दिल्ली करा लूं. फिर पास रहूंगा तो हर वीकेंड आ जाया करूंगा. डोंट वरी पापा.”

“देख 5 साल से तू यही कह रहा है बेटे. पर क्या हुआ? तू आया यहां? ” अखिलेश ने बेटे से सवाल किया. “पापा आप तो समझ ही नहीं रहे.” “तू भी नहीं समझ रहा है सुजय. ”

बेटे ने गुस्से में फोन काट दिया. अखिलेश थोड़ी देर उदास पड़ा रहा फिर सहसा ही उस की आंखों में चमक उभरी. मोबाइल उठा कर सरला का नंबर लगाने

लगा. फिर देर रात तक दोनों बातें करने में मशगूल रहे. कुछ दिनों तक दोनों के बीच इसी तरह बातों और मुलाकातों का दौर चलता रहा. इधर अखिलेश के बच्चे उसे शादी न करने की सलाह देते रहे मगर सही समय देख अखिलेश ने बहुत सादगी के साथ सरला को अपना जीवनसाथी बना लिया.

शादी के लिए अखिलेश ने बहुत सादा समारोह रखा था. अखिलेश का छोटा बेटा और सरला की बेटी और भाई विवाहस्थल पर मौजूद थे. अखिलेश की बेटी नहीं आ पाई थी. उसने वीडियो कौल के जरीए अपने पिता की शादी देखी. बड़ा बेटा औफिस के काम में फंसा होने का बहाना बना कर नहीं आया. अखिलेश के बच्चे अपने पिता की दूसरी शादी से बिलकुल भी खुश नहीं थे.

उस दिन अखिलेश बेटे से बात कर रहा था. सरला बाहर गई हुई थी. अचानक वह लौट आई पर अखिलेश को इस की खबर नहीं थी. अखिलेश फोन स्पीकर पर रख कर बातें करता था क्योंकि उसे कम सुनाई देता था. हमेशा की तरह बेटा सरला के खिलाफ जहर उगल रहा था. मगर अखिलेश लगातार उस की हर बात का प्रतिकार सही दलीलों के साथ पूरे विश्वास से करता रहा. अखिलेश का अपने प्रति यह विश्वास देख कर सरला को बहुत अच्छा लगा.

उम्र की परवाह किए बिना नए जीवन की शुरुआत दोनों ने शिमला की वादियों में जा कर किया. उन्होंने वहां साथ में बहुत खूबसूरत वक्त बिताया. दोनों काफी खुश थे.

अकेलेपन का दर्द एकदूसरे का साथ पा कर कहीं गायब हो चुका था. मगर उन के बच्चों को अभी भी यह शादी रास नहीं आ रही थी. खासकर अखिलेश के बच्चों को डर था कि कहीं सरला उनकी जमीनजायदाद न हड़प ले.

एक दिन बड़ा बेटा सुजय बिना बताए अखिलेश से मिलने चला आया. आते ही उस ने सरला के प्रति रूखा व्यवहार दिखाना शुरू कर दिया. सरला और अखिलेश दोनों

ही जानते थे कि वह सरला को पसंद नहीं करता. सरला बहाना बना कर कुछ दिनों के लिए अपने मायके चली गई. इधर सुजय को पिता से अकेले में बात करने का पूरा मौका मिल गया.

उस ने अखिलेश को समझाने की कोशिश की, “पापा, आप इस बात से अनजान हो कि इस उम्र में विधवा औरतें सिर्फ इसलिए किसी रईस पुरुष से शादी करती हैं ताकि उस की सारी संपत्ति पर अपना हक जमा सके. पापा वह आप की दौलत ले कर गायब हो जाएगी फिर क्या करोगे ? उस की नजर सिर्फ और सिर्फ आप के पैसों पर है.”

“पर तुम ऐसा कैसे कह सकते हो सुजय?” “क्यों नहीं पापा, यदि ऐसा नहीं तो उस ने आप से शादी क्यों की ?” सुजय ने सवाल किया. “तुम ने अपनी बीवी से शादी क्यों की थी?” अखिलेश ने उलटा सवाल किया.

“अरे पापा, यह तो हर कोई जानता है, परिवार बनाने और परिवार बढ़ाने के लिए. पर शादी की भी एक उम्र होती है. आप को कौन सा अब बच्चे पैदा करने हैं जो शादी करनी थी,” सुजय की आवाज में चिढ़ थी.

“ठीक है, बच्चे नहीं पैदा करने पर तुम्हें शादी के बाद बच्चों के अलावा और क्या मिला? पत्नी का साथ नहीं मिला? उस का प्यार नहीं मिला?” “पापा, अब इस उम्र में आप को कौन से प्यार की जरूरत है?”

“जरूरत हर उम्र में होती है बेटा, भले ही रूप बदल जाए और फिर एक साथ भी तो जरूरी है न,” अखिलेश ने उसे समझाने की कोशिश की. “पापा, आप चाहे कितनी भी दलीलें दे लो पर याद रखना, इस औरत की नजर सिर्फ और सिर्फ आप के पैसों पर है,” कहता हुआ सुजय उठ गया.

अखिलेश बोलना तो बहुत चाहता था पर चुप रहा. सुजय के बाद अखिलेश की बेटी भी फोन पर पिता को सावधान करने लग गई,” पापा, ध्यान रखना। ऐसी औरतें जमीनजायदाद अपने नाम करवाती हैं या फिर गहने और कैश लूट कर फरार हो जाती हैं. कई बार अपने पति की हत्या भी कर डालती हैं.”

“बेटे, ऐसी औरतों से क्या मतलब है तुम्हारा?” “मतलब विधवा औरतें जो बुढ़ापे में शादी करती हैं. मैं ने बहुत से मामले देखे हैं, पापा इसलिए समझा रही हूं,” बेटी ने कहा. बच्चों ने अखिलेश के मन में सरला के विरुद्ध इतनी बातें भर दीं कि अब उसे भी इस बात को ले कर शक होने लगा था कि कहीं ऐसा ही तो नहीं?

मैट्रिमोनियल साइट के अपने प्रोफाइल में उस ने इस बात का जिक्र भी काफी अच्छे से किया था कि उस के पास काफी संपत्ति है. इधर सरला मायके गई तो उस के घर वाले और बेटी उस का ब्रैनवाश करने के काम में लग गए. यह तो सच था कि सरला एक साधारण परिवार से संबंध रखती थी जबकि अखिलेश के पास काफी दौलत थी.

सरला की बेटी बहाने से मां को कहने लगी,”मां, तुम्हारे दामाद का काम ठीक नहीं चल रहा. पिछले महीने उन की बाइक भी बिक गई. मां हो सके तो अपने नए पति से कह कर इन के लिए बाइक या गाड़ी का इंतजाम करा दो न और एक दुकान भी खुलवा दो. वे तो बहुत पैसे वाले हैं न.”

“मगर वे तुम्हारे पति के लिए यह सब क्यों करेंगे?” सरला ने पूछा. “अरे मां क्यों नहीं करेंगे? आखिर मैं उन की बेटी ही हुई न भले ही सौतेली सही.””देख बेटी, तू ब्याहता लड़की है. तेरा अपना घरपरिवार है. तेरी देखभाल करना उन की जिम्मेदारी नहीं,” सरला ने दोटूक जवाब दिया.

तब तक भाई बोल पड़ा,”क्या दीदी, तुम तो ऐसे शब्द बोल रही हो जैसे यह तुम्हारी नहीं तुम्हारे पति की जबान हो. अरे दीदी, बच्ची के लिए नहीं तो अपने लिए तो सोचो. सुनहरा मौका है. रईस बुड्ढे से शादी की है. थोड़ा ब्लैकमेल करोगी तो मालामाल हो जाओगी. वरना बुड्ढे ने तो पहले से ही अपने तीनों बच्चों के नाम सब कुछ कर रखा होगा. कल को वह नहीं रहेगा तब तुम्हारा क्या होगा? अपने बुढ़ापे के लिए रुपए जोड़ कर रखना तो पड़ेगा न.

“जब पैसे आ जाएं तो थोड़ीबहुत मदद मेरी या अपने दामाद की भी कर लेना. आखिर हम तो अपने ही हैं न. तुम्हारे भले के लिए ही कह रहे हैं. “अब देखो न, पुराने जीजाजी के साथ तुम ने सारी जवानी गुजार दी मगर वह मरे तो तुम्हें क्या मिला? सब कुछ उन के भाइयों में बंट गया. इसलिए कह रहा हूं कि दीदी कि अपने पति की संपत्ति पर अपना कानूनी हक रखो फिर चाहे कुछ भी हो.”

“भाई मेरे तू ठीक कह रहा है. मैं सोचूंगी. अब ज्यादा नसीहतें न दे और अपने काम पर ध्यान दे,” कह कर सरला ने बात खत्म कर दी. 2-3 दिनों में सुजय चला गया. इधर सरला भी घर वापस लौट आई. दोनों ही थोड़े गुमसुम से थे. अपने बच्चों की बातें उन्हें रहरह कर याद आ रही थी.

इस बीच अखिलेश की तबीयत खराब हो गई. उसे ठंड लग कर तेज बुखार आया. सरला घबरा गई. उस ने जल्दी से डाक्टर को बुलवाया. डाक्टर ने दवाएं लिख दीं और खयाल रखने की बात कह कर चला गया. इधर सरला के भाई को पता चला कि अखिलेश को बुखार है तो वह उसे सलाह देने लगा,” यह बहुत सही समय है दीदी, अपना जाल फेंको ताकि अखिलेश हमेशा के लिए

ऊपर चला जाए. फिर तुम उस की सारी दौलत की अकेली मालकिन बन जाओगी.” सरला ने उसे झिड़का,” बेकार की बातें मत कर. वह मेरे पति हैं और मैं किसी भी तरह उन्हें ठीक कर के रहूंगी.”

इधर दवा खाने के बावजूद अखिलेश का माथा बुखार से तप रहा था. सरला ने जल्दी से उस के माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखनी शुरू कीं. पूरी रात वह पति के सामने बैठी पट्टियां बदलती रही. अखिलेश बेहोश सा सोया हुआ था. बीचबीच में आंखें खुलती तो पानी मांगता. सरला जल्दी से उसे पानी पिलाती और साथ में कुछ खिलाने की भी कोशिश करती. मगर वह खाने से साफ इनकार कर देता.

सुबह होतेहोते अखिलेश का बुखार कम हो गया. खांसी भी कंट्रोल में आ गई. मगर इस बीच सरला को बुखार महसूस होने लगा. पति का बुखार उस ने अपने सिर ले लिया था. अगले दिन दोनों की भूमिका बदल गई थी. अब सरला बेड पर थी और अखिलेश उस की देखभाल कर रहा था.

इस तरह एकदूसरे का खयाल रखतेरखते दोनों ठीक हो गए. अब एक अलग तरह का बंधन दोनों एकदूसरे के लिए महसूस करने लगे थे.

एक दिन शाम में अखिलेश ने सरला से कहा,” मेरी सारी संपत्ति दोनों लड़कों के नाम की हुई है. यह मकान भी बड़े बेटे के नाम है. मैं चाहता हूं कि हम दोनों कहीं दूर जा कर एक नई जिंदगी की शुरुआत करें. क्या तुम इस के लिए तैयार हो?”

“हां ठीक है. इस में समस्या क्या है? हम सब कुछ छोड़ कर कहीं दूर चलते हैं. बस रहने और खाने का प्रबंध हो जाए फिर हमें किस चीज की जरूरत? दोनों आराम से एक छोटा सा घर ले कर रह लेंगे. वैसे भी मेरे पहले पति ने मेरे लिए बैंक में थोड़ीबहुत रकम रख छोड़ी है. जरूरत पड़ी तो उस का भी उपयोग कर लेंगे.”

सरला की बात सुन कर अखिलेश की आंखें भीग गईं. एक तरफ बच्चे जिस महिला को दौलत का लालची बता रहे थे वही इस गृहस्थी में अपनी सारी जमापूंजी लगाने को तैयार थी. अखिलेश को यही सुनने की इच्छा थी.

उस ने सरला को गले से लगा लिया और बोला,” ऐसा कुछ नहीं है सरला. सारी संपत्ति अभी भी मेरे ही नाम है. मैं तो तुम्हारा रिएक्शन देख कर तुम्हें

परखना चाहता था. तुम से अच्छी पत्नी मुझे मिल ही नहीं सकती. वैसे कहीं दूर जाने का प्लान अच्छा है. यह घर बेच कर किसी खूबसूरत जगह घर लिया जा सकता है. ” “सच, मैं भी सब से दूर कहीं चली जाना चाहती हूं,”सरला ने कहा.

अगले ही दिन अखिलेश ने घर बेचने के कागज तैयार करा लिए. काफी समय से उस का एक दोस्त घर खरीदने की कोशिश में था. अखिलेश ने बात कर अपना घर उसे बेच दिया और मिलने वाली रकम से देहरादून के पास एक छोटा सा खूबसूरत मकान खरीद लिया.

उस ने अपना नया पता किसी को भी नहीं दिया था. फोन भी स्विच औफ कर दिया. अपना बैंकबैलेंस भी उस ने दूसरे बैंक में ट्रांसफर करा लिया और पूर्व पत्नी के गहने भी लौकर में रखवा दिए. सरला ने भी अपने घर में किसी को नया पता नहीं बताया.

सारे हमदर्द रिश्तेदारों से दूर दोनों ने अपना एक प्यारा सा आशियाना बना लिया था. यहां वे अपनी जिंदगी दूसरों की हर तरह की दखलंदाजी से दूर शांतिपूर्वक एकदूसरे के साथ बिताना चाहते थे.

Fictional Story

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें