Family Drama 2025 : पछतावा

Family Drama 2025 : सनोबर ने फर्स्ट डिविजन में बीएससी कर लिया. अख्तर एमबीए कर के एक मल्टीनैशनल कंपनी में जौब पर लग गया. सनोबर आगे पढ़ना चाहती थी पर उस की अम्मा आमना का खयाल था कि उस की शादी कर दी जाए. आमना ने पति सगीर से कहा, ‘‘अख्तर अब एमबीए कर के नौकरी पर लग गया है. अब आप उस के पिता जमाल से शादी की बात कर लीजिए. सनोबर को आगे पढ़ना है तो अख्तर आगे पढ़ाएगा. दोनों में अच्छी अंडरस्टैंडिंग है.’’ दूसरे दिन सगीर और आमना मिठाई ले कर अपने पड़ोसी जमाल के घर गए.

सगीर ने जमाल भाई से कहा, ‘‘अब सनोबर ने ग्रेजुएशन कर लिया है. अख्तर भी एमबीए कर के नौकरी पर लग गया है. यह शादी का सही वक्त है. देर करने से कोई फायदा नहीं.’’

जमाल खुश हो कर बोले, ‘‘सगीर, तुम बिलकुल ठीक कह रहे हो. बेगम, कैलेंडर ले कर आओ, सही समय देख कर हम अख्तर और सनोबर की शादी की तारीख तय कर देते हैं.’’

खुतेजा मुंह बना कर बोली, ‘‘इतनी जल्दी क्या है. मेरे भाई की बेटी की शादी तय हो रही है. पहले वह तय हो जाए. कहीं हमारी तारीख उन की तारीख से टकरा न जाए. हम अपनी तारीख बाद में तय करेंगे.’’ खुतेजा की बात पर सगीर चुप रहे. जमाल अपनी पत्नी से दबते थे. कुछ ज्यादा न कह सके.

उस दिन वे लोग नाकाम लौट आए. अख्तर, रिदा, फिजा घर में बैठे खुशखबरी का इंतजार कर रहे थे. आमना ने जब बताया कि चाची ने शादी की तारीख नहीं तय की, बाद में तय करने को कहा है, तो सभी के चेहरे लटक गए.

अम्माअब्बा की परेशानी जायज थी. सनोबर का रिश्ता बरसों से अख्तर से तय था. अख्तर के पिता जमाल रिश्ते में अब्बा के भाई थे. वे पड़ोस में ही रहते थे. जमाल का एक ही बेटा था अख्तर. अच्छी हाइट, खूबसूरत, भूरी आंखों वाला. सनोबर के पिता सगीर को अख्तर बहुत पसंद था.

सगीर नेक और सुलझे हुए इंसान थे. उन का प्लास्टिक का सामान बनाने का छोटा सा कारखाना था. गुजरबसर अच्छे से हो रही थी. कुछ बचत भी हो जाती थी. जमाल और सगीर का रिश्ते के अलावा दोस्ती का संबंध भी था.

जमाल की पत्नी खुतेजा यों तो अच्छी थी पर मिजाज की थोड़ी तेज और पुराने खयालात की थी. रस्मोंरिवाज और पुरानी कही हुई बातों पर बहुत यकीन रखती थी वह. सगीर की पत्नी आमना बहुत मिलनसार, नरमदिल व खुशमिजाज औरत थी. सब से मोहब्बत से पेश आती और मदद करने को तैयार रहती. जेठजेठानी से उस के बहुत अच्छे संबंध थे.

अख्तर जब 5 साल का था तब सनोबर पैदा हुई थी. बहुत ही खूबसूरत, नन्ही परी लगती थी वह. अख्तर पूरे वक्त उसे उठाए फिरता. उसे खूब प्यार करता. दोनों को साथ देख कर आमना और खुतेजा बहुत खुश होतीं. जब सनोबर थोड़ी बड़ी हुई तो उस का रिश्ता अख्तर से तय कर दिया गया. दोनों घरों में खूब खुशियां मनाई गईं.

सनोबर के बाद आमना के 2 बेटियां और हुईं. सगीर ने भी बड़ी मोहब्बत से तीनों लड़कियों की परवरिश की. उसे कोई मलाल न था कि उसे बेटा नहीं मिला. सनोबर भी दोनों बहनों से बहुत प्यार करती. बहनें उस से करीब 5 साल छोटी थीं. सनोबर को खेलने के लिए जैसे खिलौने मिल गए. दोनों जुड़वां बच्चियां थीं. उन के नाम रखे गए फिजा और रिदा.

दिन गुजर रहे थे. अख्तर के बाद खुतेजा के यहां एक लड़का और हुआ. आमना महसूस कर रही थी बेटा होने के बाद से खुतेजा के बरताव में फर्क आ गया. बच्चियों से भी पहले जैसी मोहब्बत और अपनापन नहीं रहा. सनोबर का भी वह पहले जैसा लाड़ नहीं करती. आमना ने कोई खास तवज्जुह नहीं दी, लड़कियों की परवरिश में मसरूफ रही. सनोबर पढ़ने में बहुत होशियार थी. क्लास में रैंक लाती. रिदा और फिजा भी दिल लगा कर पढ़तीं.

खुतेजा की बात सुन कर सब का मूड बिगड़ चुका था. सब सोच में डूबे थे कि ऐसा क्यों हुआ. अख्तर भी अपनी मां की बात सुन कर मायूस हो गया. उस की आंखों में उदासी आ गई. इतने सालों से दोनों की बात तय थी. मोहब्बत घर जमा चुकी थी. दोनों के दिल एकदूसरे के नाम से धड़कते थे. इस खबर से दोनों ही चुप हो गए. अभी शायद उन की मोहब्बत को और इंतजार करना था.

इंतजार में डेढ़दो माह निकल गए. एक बार फिर सगीर ने फोन पर बात की, पर खुतेजा ने टाल दिया. अब तो आमना, सगीर और सनोबर तीनों ही परेशान हो गए. आखिर में उन लोगों ने सोच लिया कि दोटूक बात कर ली जाए. एक बार फिर आमना और सगीर शादी की तारीख तय करने जमाल के यहां पहुंच गए.

आमना ने साफ कहा, ‘‘भाभी, अब आप इसी महीने की कोई तारीख दे दीजिए. बेवजह शादी में देर करने का कोई मतलब नहीं है. इस महीने की 21 तारीख अच्छी रहेगी. हम ने सबकुछ सोच कर तारीख तय की है. अब आप अपनी राय बताइए.’’

खुतेजा ने तीखे लहजे में कहा, ‘‘देखिए भाई साहब और भाभी, असल बात यह है कि मैं यह शादी नहीं करना चाहती. मुझे अपने अख्तर के लिए सनोबर पसंद नहीं आ रही है.’’

यह सुन कर सब सन्न रह गए. जमाल भी चुप से रह गए. सगीर ने पूछा, ‘‘भाभी, आखिर मंगनी तोड़ कर शादी न करने की कोई वजह तो होनी चाहिए. इतनी पुरानी मंगनी तोड़ने की कोई खास वजह होनी चाहिए.’’

खुतेजा ने फिर रूखे लहजे में कहा, ‘‘वजह है और बहुत खास वजह है.’’

सगीर जल्दी से बोल उठे, ‘‘फिर बताइए, क्या वजह है?’’

‘‘वजह यह है कि सनोबर का कोई भाई नहीं है. भाई की तरफ से कोई रस्म आप के यहां नहीं होगी. जब मैं ने सनोबर से मंगनी की थी तब वह 5 साल की थी. मुझे उम्मीद थी कि अब आमना के यहां लड़का होगा. लेकिन जुड़वां लड़कियां हो गईं. और आमना ने औपरेशन भी करा लिया. अब लड़का होने के कोई चांस नहीं बचे. तभी से सनोबर की तरफ से मेरा दिल बदल गया था. और आमना भी 4 बहनें हैं. उन का भी कोई भाई नहीं है. मतलब यह है कि नुक्स खानदान में ही है. जब सनोबर ब्याह कर हमारे घर आएगी तो अपनी मां की तरह लड़कियों को ही जन्म देगी. हमारी तो नस्ल ही खत्म हो जाएगी.’’

सगीर बोले, ‘‘लड़का या लड़की होना मौके की बात है. यह जरूरी नहीं है कि आमना के कोई बेटा नहीं है, तो सनोबर के यहां भी बेटा नहीं होगा. आप कुदरत के कानून को अपने हाथ में क्यों ले रही हैं? यह सब समय पर छोड़ दीजिए. शादी न करने की यह कोई जायज वजह नहीं है.’’

खुतेजा उलझ कर बोली, ‘‘वजह क्यों नहीं है. मेरा भाईर् जिस लड़की को बहू बना कर लाया है उस की मां के भी कोई भाई नहीं है. अब मेरा भाई पोते की शक्ल देखने को तरस रहा है. बहू ने 3 बेटियों को जन्म दिया. सारे इलाज करा चुके. किसी तरह भी लड़का न हुआ. सो, मैं अपने अख्तर की शादी ऐसी लड़की से करूंगी जिस का भाई हो. यह मेरा आखिरी फैसला है. अभी सिर्फ मंगनी ही तो हुईर् है, टूट भी सकती है. कई लोगों की मंगनियां टूटती हैं. इस में कौन सी कयामत आ गई है.’’

जब से आमना के यहां जुड़वां बेटियां हुई थीं तब से खुतेजा के दिल में यह बात बैठ गई थी कि बिना भाई की लड़की से हरगिज शादी नहीं करेगी. तब से ही वह शादी के खिलाफ हो गई थी.

अख्तर यह सुन कर बेहद परेशान हो गया. उसे सनोबर से मोहब्बत थी. वह किसी कीमत पर दूसरी लड़की से शादी नहीं करना चाहता था. उस ने मां को बहुत समझाया पर वह अपनी जिद पर अड़ी रही. किसी कीमत पर भी शादी के लिए तैयार नहीं हुई. उस ने साफ कह दिया कि अगर अख्तर ने सनोबर से शादी की तो वह जहर खा लेगी.

बहुत दिनों तक बहस चलती रही. पर खुतेजा ने अख्तर की बात मानने से साफ इनकार कर दिया. अख्तर अपनी मोहब्बत खोना नहीं चाहता था. वह सनोबर के पास आया और बोला, ‘‘सनोबर, अम्मा तो किसी कीमत पर शादी करने को राजी नहीं हैं. मैं ने हजार मिन्नतें कीं, लेकिन वे अपनी जिद पर अड़ी हैं. खुदकशी करने की धमकी दे रही हैं. मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता. चलो, हम कोर्ट मैरिज कर लेते हैं. जो होगा, देखा जाएगा.’’

सनोबर खुद गम से निढाल थी. उस की मोहब्बत दांव पर लगी हुई थी. पर वह समझदार थी. वह खुतेजा को जानती थी. वह हठधर्म औरत बड़ी शक्की थी, वहम और पुराने खयालात छोड़ नहीं सकती थी. ऐसे में अगर वह अख्तर से कोर्ट मैरिज कर लेती और खुतेजा जहर खा लेती तो मौत की बुनियाद पर शादी की शहनाई उन्हें उम्रभर रुलाती. वह एक अच्छी बेटी थी और एक बेमिसाल बहू बनना चाहती थी. शादी बस 2 दिलों का मेल ही नहीं, बल्कि 2 खानदानों का आपसी संबंध है.

सनोबर ने कहा, ‘‘मान लो शादी के बाद तुम्हारी मां कुछ कर लेती हैं तो यह शादी शादमानी के बजाय उम्रभर की परेशानी बन जाएगी. मैं खुद आप से बेहद मोहब्बत करती हूं. पर जो अफसाना अंजाम तक पहुंचना नामुमकिन हो, उसे एक खूबसूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा है. आप अपनी राह बदल लीजिए. अपनी मां की खातिर अपनी मोहब्बत कुरबान कर दीजिए. मां का दिल दुखा कर हम सुखी नहीं रह सकेंगे. आप उन की मरजी से शादी कर लीजिए.

‘‘मैं ने आप को अपनी मोहब्बत और मंगनी के बंधन से आजाद किया. आप मां की खुशी की खातिर अपना फैसला बदल लीजिए. मैं वादा करती हूं, मैं खुश रहने की पूरी कोशिश करूंगी और अगर कोई रिश्ता आता है तो शादी भी कर लूंगी. मैं अपने मांबाप को अपने लिए आंसू बहाता नहीं देख सकती. आइए, अब हम बीते हुए समय को भुला कर एक नई शुरुआत करते हैं. आप को हमारी मोहब्बत की खातिर, यह बात माननी पड़ेगी.’’

सनोबर ने इस तरह से समझाया कि अख्तर को उस की बात माननी पड़ी. उन्होंने वादा किया कि अब वे दोनों नहीं मिलेंगे. यह फैसला तकलीफदेह है, पर जरूरी है. एक खूबसूरत कहानी बिना अपने अंजाम को पहुंचे बीच में ही खत्म हो गई.

अख्तर ने मां से कहा, ‘‘आप जहां चाहें, मेरी शादी कर दें.’’

खुतेजा ने देर नहीं की. 2 महीने के अंदर ही वह अपने रिश्ते की बहन की बेटी रुखसार को बहू बना कर ले आई. रुखसार अच्छी, खूबसूरत लड़की थी. सब से बड़ी बात, 4 भाइयों की इकलौती बहन थी. उस की मां भी 2 भाइयों की एक बहन थी. खुतेजा बेहद खुश थी. उसे मनचाही, मरमरजी की बहू मिल गई थी. सगीर और आमना रस्म निभाने की खातिर शादी में शामिल हुए. दोनों सनोबर के लिए दुखी थे. अकसर एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा दरवाजा खुल जाता है.

सगीर के खास दोस्त नोमान का बेटा अरशद दुबई में जौब करता था. वह शादी के लिए इंडिया आया हुआ था. नोमान और उस की बीवी अच्छी लड़की की तलाश में थे. यहांवहां लड़कियां देख रहे थे. एक दिन वे दोनों सगीर से मिलने घर आए. वहां सनोबर से मिले. उस की खूबसूरती, व्यवहार और सलीका देख कर वे बहुत प्रभावित हुए. उन लोगों ने 2 दिनों बाद अरशद को भी लड़की दिखा दी. उसे सनोबर बहुत पसंद आई. वह तो जीजान से फिदा हो गया.

दूसरे दिन ही नोमान, उन की पत्नी सनोबर के लिए अरशद का रिश्ता ले कर आ गए. बहुत अरमानों से सनोबर की मांग करने लगे. सगीर के जानेपहचाने लोग थे. पढ़ालिखा खानदान था. अरशद की जौब भी बहुत अच्छी थी. आमना ने सनोबर की मरजी पूछी. उस ने कोई एतराज नहीं किया क्योंकि जो कहानी खत्म हो चुकी थी उस पर आंसू बहाना फुजूल था. पर उस ने एक शर्त रखी कि अरशद को उस की मंगनी टूटने के बारे में बता दिया जाए.

नोमान को यह बात पहले से ही पता थी क्योंकि वह सगीर का खास दोस्त था. यह बात अरशद को भी बता दी गई. उसे इस बात पर कोई एतराज न हुआ. 15 दिनों के अंदर अरशद से सनोबर की शादी धूमधाम से हो गई. अरशद ने सनोबर को दुबई बुलाने की कारर्रवाई शुरू कर दी. अरशद छुट्टी खत्म होने पर इस वादे के साथ दुबई रवाना हुआ कि वह जल्दी ही सनोबर को दुबई बुला लेगा.

अरशद बहुत मोहब्बत करने वाला पति साबित हुआ. 3 महीने के अंदर ही उस ने सनोबर को दुबई बुला लिया. उस की मोहब्बत ने धीरेधीरे सनोबर के जख्म भर दिए. वे दोनों खुशहाल जिंदगी गुजारने लगे.

सनोबर की शादी के एक साल बाद ही उस के यहां बेटा हुआ जबकि अख्तर के यहां बेटी हुई. बेटी देख कर खुतेजा फूटफूट कर रोई. सगीर और आमना ने शुक्र अदा किया कि उन की बेटी पर लगा बेहूदा इलजाम गलत साबित हो गया. खुतेजा ने लड़की होने पर रुखसार को बुराभला कहना शुरू किया. पर वह दबने वाली बहू न थी. 4 भाइयों की इकलौती बहन थी. मिजाज बहुत ऊंचे थे. उस ने साफ कह दिया, ‘‘आप मुझे इलजाम न दें. लड़का या लड़की होने के लिए मर्द जिम्मेदार होता है. औरत तो सिर्फ उस के दिए हुए तोहफे को कोख में पालती है. इस में औरत कुछ नहीं कर सकती. चाहें तो आप डाक्टर से पूछ लें. और दोष ही देना है, तो अपने बेटे को दीजिए. वही इस के लिए जिम्मेदार है.’’

रुखसार ने ऐसा खराखरा जवाब दिया कि खुतेजा की बोलती बंद हो गई. उस ने बेटे की तरफ मदद के लिए देखा, पर अख्तर बाप की तरह सीधासादा था. रुखसार के आगे कुछ बोल न सका. वैसे भी, रुखसार ने साइंस का हवाला दिया था जो कि सच था.

2 साल और गुजर गए. एक बार फिर सनोबर के यहां बेटा हुआ और अख्तर के यहां फिर बेटी हुई. खुतेजा मारे सदमे के बेहोश हो गई. होश आने पर फूटफूट कर रोने लगी. जमाल और अख्तर ने उस की अच्छी खबर ली और कहा, ‘‘अपनी मरजी से अपनी पसंद की बहू लाई थी 2 दिल तोड़ कर, बरसों पुरानी मंगनी ठुकरा कर. सो, अब क्यों रोती हो. सब कियाधरा तो तुम्हारा है. तुम तो खुशियां मनाओ. अपनी दकियानूसी सोच व वहम की वजह से 2 दिलों की मोहब्बत रौंद डाली.’’

लेखिका- शकीला एस हुसैन

Best Short Story : मीठी छुरी

 Best Short Story : चंचला भाभी के स्वभाव में जरूरत से कुछ ज्यादा मिठास थी जो शुरू से ही मेरे गले कभी नहीं उतरी, लेकिन घर का हर सदस्य उन के इस स्वभाव का मुरीद था. वैसे भी हर कोई चाहता है कि उस के घर में गुणी, सुघड़, सब का खयाल रखने वाली और मीठे बोल बोलने वाली बहू आए. हुआ भी ऐसा ही. चंचला भाभी को पा कर मां और बाबूजी दोनों निहाल थे, बल्कि धीरेधीरे चंचला भाभी का जादू ऐसा चला कि मां और बाबूजी नवीन भैया से ज्यादा उन की पत्नी यानी चंचला भाभी को प्यार और मान देने लगे. कभी बुलंदियों को छूने का हौसला रखने वाले, प्रतिभाशाली और आकर्षक व्यक्तित्व वाले नवीन भैया अपनी ही पत्नी के सामने फीके पड़ने लगे.

मेरे  4 भाईबहनों में सब से बड़े थे मयंक भैया, फिर सुनंदा दी, उस के बाद नवीन भैया और सब से छोटी थी मैं. हम  चारों भाईबहनों में शुरू से ही नवीन भैया पढ़ने में सब से होशियार थे. इसलिए घर के लोगों को भी उन से कुछ ज्यादा ही आशाएं थीं. आशा के अनुरूप, नवीन भैया पहली बार में ही भारतीय प्रशासनिक सेवा की मुख्य लिखित परीक्षा में चुन लिए गए और उस दौरान मौखिक परीक्षा की तैयारियों में जुटे हुए थे, जब एक शादी में उन की मुलाकात चंचला भाभी से हुई.

निम्न  मध्यवर्गीय परिवार की साधारण से थोड़ी सुंदर दिखने वाली चंचला भाभी को नवीन भैया में बड़ी संभावनाएं दिखीं या वाकई प्यार हो गया, किसे मालूम, लेकिन नवीन भैया उन के प्यार के जाल में ऐसे फंसे कि उन्होंने अपना पूरा कैरियर ही दांव पर लगा दिया. उन से शादी करने की ऐसी जिद ठान ली कि उस के आगे झुक कर उन की मौखिक परीक्षा के तुरंत बाद उन की शादी चंचला भाभी से कर दी गई.

शादी के बाद भाभी ने घर वालों से बहुत जल्द अच्छा तालमेल बना लिया, लेकिन नवीन भैया को पहला झटका तब लगा जब भारतीय प्रशासनिक सेवा का फाइनल रिजल्ट आया. आईएएस तो दूर की बात उन का तो पूरी लिस्ट में कहीं नाम नहीं था. अब उन्हें अपना सपना टूटता नजर आया, वे चंचला भाभी को मांबाबूजी के सुपुर्द कर नए सिरे से अपनी पढ़ाई शुरू करने दिल्ली चले गए.

नवीन भैया भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में 3 बार शामिल हुए. हर बार असफल रहे. भैया हतप्रभ थे. बारबार की इस असफलता ने उन के आत्मविश्वास को जड़ से हिला दिया.

जिन नौकरियों को कभी नवीन भैया ने पा कर भी ठोकर मार दी थी, अब उन्हीं को पाने के लिए लालायित रहते, कोशिश करते पर हर बार असफलता हाथ आती. जब किसी काम को  करने से पहले ही आत्मविश्वास डगमगाने लगे तो सफलता प्राप्त करना कुछ ज्यादा ही मुश्किल हो जाता है. उन के साथ यही हो रहा था.

नवीन भैया पटना लौट आए थे. यहां भी वे नौकरी की तलाश में लग गए, कहीं कुछ हो नहीं पा रहा था. बाबूजी उन का आत्मविश्वास बढ़ाने के बदले उन्हें हमेशा निकम्मा, कामचोर और न जाने क्याक्या कहते रहते.

प्रतिभाशाली लोगों को चाहने वालों की कमी नहीं होती और उन से ईर्ष्या करने वाले भी कम नहीं होते. होता यह है कि जब कोई प्रतिभाशाली व्यक्ति कामयाबी की राह नहीं पकड़ पाता तो उस के चाहने वाले उस से मुंह मोड़ने लगते हैं और ईर्ष्या करने वाले ताने कसने का कोई मौका नहीं छोड़ते.

नवीन भैया से जलने वाले रिश्तेदारों और पड़ोसियों को भी मौका मिल गया उन पर तरहतरह के व्यंग्यबाण चलाते रहने का. उन की असफलता से आहत उन के अपने भी उन्हें जबतब जलीकटी सुनाने लगे. पासपड़ोस के लोग तो अकसर उन्हें कलैक्टर बाबू कह उन के जले पर नमक छिड़कते, जिसे सुन एक बार नवीन भैया तो मरनेमारने पर उतारू हो गए थे. जब बाबूजी को इस घटना के बारे में मालूम हुआ तो वे क्रोध में अंधे हो उन्हें बेशर्म और नालायक जैसे अपशब्दों से नवाजते हुए मारने तक दौड़ पड़े थे.

पूरी तरह टूट चुके नवीन भैया देर तक ड्राइंगरूम के एक कोने में सुबकसुबक कर रोते रहे थे. उन का तो आत्मविश्वास के साथ जैसे स्वाभिमान भी खत्म हो रहा था. दूसरे ही दिन नौकरी की तलाश में जाने के लिए उन्होंने बाबूजी से ही रुपए मंगवाए थे. भाई की दुर्दशा से आहत बड़े भैया ने दूसरा कोई रास्ता न देख समझाबुझा कर उन का दाखिला ला कालेज में करवा दिया.

नवीन भैया के ऐसे कठिन समय में उन का साथ देने के बदले चंचला भाभी मां और बाबूजी के पास बैठी उन्हें कोसती रहतीं और आंसू बहाती रहतीं जिस से उन लोगों की पूरी सहानुभूति बहू के साथ होती चली गई और नवीन भैया के लिए उन के अंदर गरम लावे की तरह उबलता गुस्सा ही बचा रह गया था.

क्षणिक आवेश में लिए गए जीवन के एक गलत फैसले ने नवीन भैया को कहां से कहां पहुंचा दिया था. विपरीत परिस्थितियों के शिकार नवीन भैया के मन की स्थिति समझने के बदले जबतब उन के जन्मदाता बाबूजी ही उन के विरुद्ध कुछ न कुछ बोलते रहते. वे अपनी सारी सहानुभूति और वात्सल्य  चंचला भाभी पर न्योछावर करते और अपनी सारी नफरत नवीन भैया पर उड़ेलते.

चंचला भाभी ने अपनी मीठी जबान और सेवाभाव से सासससुर को अपने हिसाब से लट्टू की तरह नचाना शुरू कर दिया था. वे जो चाहतीं, जैसा चाहतीं, मांबाबूजी वैसा ही करते. नवीन भैया वकालत पास कर कोर्ट जाने तो लगे पर उन की वकालत ढंग से चल नहीं पा रही थी. पैसों की तंगी हमेशा बनी रहती.

इस दौरान उन के 2 लड़के भी हो गए अंश और अंकित. शुरू से ही बड़ी होशियारी से चंचला भाभी अपने दोनों बच्चों को नवीन भैया से दूर अपने अनुशासन में रखतीं. बातबात में जहर उगल कर बच्चों के मन में पिता के प्रति उन्होंने इतना जहर भर दिया था कि अपने पिता की अवज्ञा करना उन के दोनों बेटों के लिए शान की बात थी. घर के बड़े ही जब घर के किसी सदस्य की उपेक्षा करने लगते हैं तो क्या नौकर, क्या बच्चे, कोई भी उसे जलील करने से नहीं चूकता.

अंश और अंकित पूरी तरह बाबूजी के संरक्षण में पलबढ़ रहे थे पर उन का रिमोट कंट्रोल हमेशा चंचला भाभी के पास रहता. नवीन भैया तो अपने बच्चों के लिए भी कोई फैसला लेने से वंचित हो गए थे. धीरेधीरे उन के अंदर भी एक विरक्ति सी उत्पन्न होने लगी थी, अब वे देर रात तक यहांवहां घूमते रहते. घर आते बस खाने और सोने के लिए.

घर के लोग चंचला भाभी की चाहे जितनी बड़ाई करें पर मैं जब भी उन के स्वभाव का विश्लेषण करती, मुझे लगता कुछ है जो सामान्य नहीं है. चंचला भाभी की जरूरत से ज्यादा फर्ज निभाने का उत्साह मेरे मन में संशय भरता. मैं अकसर मां से कहती, ‘‘मां, ज्यादा मिठास की आदत मत डालो, कहीं तुम्हें डायबिटीज न हो जाए.’’

मेरी बातें सुनते ही बड़ों की आलोचना करने के लिए मां दस नसीहतें सुना देतीं.

यह चंचला भाभी के मीठे वचनों का ही असर था जो मयंक भैया अंश और अंकित को भी अपने तीनों बच्चों में शामिल कर अपने बच्चों की तरह पढ़ातेलिखाते और उन की सारी जरूरतों को पूरा करते. पर्वत्योहार में जैसी साड़ी भैया भाभी के लिए खरीदते वैसी ही साड़ी चंचला भाभी के लिए भी खरीदते. वैसे भी मां की मयंक भैया को सख्त हिदायत थी कि कपड़ा हो या और कोई दूसरी वस्तु, दोनों बहुओं के लिए एक समान होनी चाहिए. भैया भी मां की इस बात का मान रखते.

वैसे चंचला भाभी भी कुछ कम नहीं थीं, जबतब बड़ी भाभी के कीमती सामान पर भी मीठी छुरी चलाती रहतीं. कभी कहतीं, ‘‘हाय भाभी, कितने सुंदर कर्णफूल आप ने बनवाए हैं. इन पर तो मेरी पसंदीदा मीनाकारी है. मैं तो इन के कारण लाचार हूं, इन्होंने इतनी छोटीछोटी चीजों को भी मेरे लिए दुर्लभ बना दिया है.’’

झट बड़ी भाभी अपना बड़प्पन दिखातीं, ‘‘अरे नहीं, चंचला, इतना मायूस मत हो. तू इन्हें रख ले. मैं अपने लिए दूसरे बनवा लूंगी.’’

पहले वे मना करतीं, ‘‘नहींनहीं, भाभी, मैं भला इन्हें कैसे ले सकती हूं. ये आप ने अपने लिए बनवाए हैं.’’

बड़ी भाभी जब जिद कर उन्हें थमा ही देतीं तब बोलतीं, ‘‘मैं खुश हूं कि मुझे आप जैसी जेठानी मिलीं. भला इस दुनिया में कितने लोग हैं जिन के दिल आप के जैसे सोने के हैं. आप मुझे छोटी बहन मानती हैं तो पहन ही लूंगी.’’

चंचला भाभी की तारीफ सुन कर बड़ी भाभी फूल कर कुप्पा हो जातीं.

सुनंदा दी जब भी चेन्नई से आतीं, सब के लिए साडि़यां लातीं. यह सोच कर कि नवीन तो शायद ही चंचला के लिए अच्छी साड़ी ला पाता होगा, सब से पहले चंचला भाभी को ही साड़ी पसंद करने को बोलतीं और चंचला भाभी अकसर 2 साडि़यों के बीच कन्फ्यूज हो जातीं कि कौन सी साड़ी ज्यादा अच्छी है. तब सुनंदा दी इस का हंस कर समाधान निकालतीं, ‘‘तुम दोनों ही साडि़यां रख लो.’’

जितना जादू चंचला भाभी के मधुर वचनों का घर के लोगों पर बढ़ता जा रहा था, उतना ही नवीन भैया अपने घर में  बेगाने होते जा रहे थे.

नवीन भैया की शादी के समय बाबूजी ने छत पर एक कमरा बनवाया था, उसी कमरे में नवीन भैया और चंचला भाभी रहते थे. जब भाभी नीचे का काम खत्म कर सोने जातीं तब सीढि़यों से दरवाजा बंद कर लेतीं.

एक बार देर रात तक पढ़तेपढ़ते मैं बुरी तरह थक कर आंगन में आ बैठी. सामने सीढि़यों का दरवाजा खुला देख, मैं ठंडी हवा  का आनंद उठाने छत पर आ गई. तभी चंचला भाभी की कर्कश और फुफकारती हुई धीमी आवाज सुन जैसे मेरी रीढ़ की हड्डी में एक ठंडी लहर सी दौड़ गई. नवीन भैया को चंचला भाभी किसी बात पर सिर्फ डांट ही नहीं रही थीं, अपशब्द भी बोल रही थीं. फिर धक्कामुक्की की आवाज सुनाई पड़ी. उस के तुरंत बाद ऐसा लगा जैसे कुछ गिरा. मेरा तो यह हाल हो गया था कि काटो तो खून नहीं.

अचानक नवीन भैया दरवाजा खोल कर बाहर आ गए. कमरे से आती धीमी रोशनी में भी मुझे सबकुछ साफसाफ दिख रहा था. वे बुरी तरह हांफ रहे थे, उन के बाल बिखरे और कपड़े जगहजगह से फटे हुए नजर आ रहे थे. अपने हाथ से रिसते खून को अपनी शर्ट के कोने से साफ करने की कोशिश करते नवीन भैया को देख, मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरा कलेजा चाक कर दिया हो.

मेरी उपस्थिति से अनजान चंचला भाभी ने फटाक से दरवाजा बंद कर लिया और नवीन भैया सीढि़यों की तरफ बढ़े. तभी सीढि़यों पर जलते बल्ब की रोशनी में हम दोनों की आंखें टकराईं. भैया मुझे विवश दृष्टि से देख तेजी से आगे बढ़ गए.

हमेशा से सहनशील रहे नवीन भैया का चेहरा उस समय इतना दयनीय दीख रहा था कि वहां खड़ी मैं हर पल शर्म के बोझ तले दबती जा रही थी. इन्हीं चंचला भाभी की लोग मिसाल अच्छी बहू के रूप में देते हैं जिन्होंने अपने पति को इस कदर प्रताडि़त करने के बाद भी, दुनियाभर में उन पर तरहतरह के आरोप लगा उन को बदनाम कर रखा था. मैं ने किसी से कुछ भी नहीं कहा. परिवार के लोगों पर तो अभी भाभी का जादू छाया हुआ था. मेरी कौन सुनता.

उन्हीं दिनों मयंक भैया का ट्रांसफर रांची हो गया था. संयोग से उसी साल मुझे भी रांची मैडिकल कालेज में दाखिला मिल गया. मैं पटना से रांची आ गई.

मयंक भैया के पटना से हटते ही बाबूजी की चिंता नवीन भैया के परिवार के लिए कुछ ज्यादा बढ़ गई थी. अभी तक बड़े भैया एक परिवार की तरह सब को संभाले हुए थे. घर से बाहर निकलने पर कई तरह के खर्चे बढ़े, फिर भी अंश और अंकित की पढ़ाई का पूरा खर्च भेजते रहे. लेकिन बाबूजी संतुष्ट नहीं थे. वे नवीन भैया के परिवार की निश्चित आय की व्यवस्था करना चाहते थे.

नौकरी से अवकाश प्राप्त करने के बाद उन्होंने एक मार्केट कौंप्लैक्स बनवाया था, जिस से उन की अच्छीखासी आमदनी हो जाती थी. उन्होंने उस मार्केट कौंप्लैक्स को मयंक भैया के मना करने के बावजूद चंचला भाभी के नाम कर दिया. मयंक भैया चाहते थे कि वह मार्केट कौंप्लैक्स नवीन भैया के नाम हो. लेकिन बाबूजी के लिए तो नवीन भैया एक गैरजिम्मेदार और निकम्मे इंसान थे. उन की बहू ने उन के दिमाग में यह बात बिठा दी थी.

मयंक भैया के हटते ही चंचला भाभी ने मांबाबूजी की जिम्मेदारी के साथसाथ उन की सारी आमदनी भी अपनी मुट्ठी में कर ली थी. फिर भी हम सभी चंचला भाभी के इस तरह सबकुछ संभाल लेने से मांबाबूजी की तरफ से चिंतामुक्त हो गए थे. अकसर बाबूजी मयंक भैया को फोन कर नवीन भैया की गैरजिम्मेदाराना हरकतों से अवगत कराते रहते. इतने दिनों बाद भी बाबूजी यह नहीं समझ पा रहे थे कि नवीन भैया को फटकार के बदले अपनों के प्यार और सहानुभूति की कितनी जरूरत है.

वह जनवरी की ठिठुरती शाम थी. हम सभी शाम होते ही उस हाड़ कंपा देने वाली ठंड से बचने के लिए एक कमरे में आग जला कर बैठे गपशप कर रहे थे. तभी फोन की घंटी बजी. फोन उठाते ही मां ने रोतेरोते बताया, बाबूजी की तबीयत बहुत खराब है. उन्हें आईसीयू में भरती कराया गया है. मां को आश्वस्त कर हम फौरन पटना के लिए रवाना हो गए.

नवीन भैया द्वारा बताए पते पर सीधे अस्पताल पहुंचे. वार्ड के बाहर ही नवीन भैया और मां बैठे मिले. चंचला भाभी कहीं नजर नहीं आ रही थीं. हम लोगों को देख मां को थोड़ी तसल्ली हुई. जब मयंक भैया ने चंचला भाभी के बारे में पूछा तो उस चिंता, दुख, अनिश्चितता और भय की स्थिति में भी जो कुछ मां ने सुनाया, सुनते ही जैसे हम सब के पैरों तले जमीन खिसक गई. किंकर्तव्यविमूढ़ बने हम सब मां की बातें सुनते रहे.

मां ने बताया, ‘जब बाबूजी को दिल का दौरा पड़ने से अस्पताल में भरती करवाया गया, आननफानन डाक्टरों ने लाखों के खर्चों की फेहरिस्त थमा दी. हमेशा की तरह जब मां ने चंचला भाभी से पैसा निकालने के लिए कहा तो उन्होंने थोड़े से पैसे निकाल कर देने के बाद, यह कह कर पैसे निकालने से मना कर दिया कि अकाउंट में पैसे हैं ही नहीं. जबकि चंचला भाभी के साथ जौइंट अकाउंट में बाबूजी ने अच्छीखासी रकम जमा करवा रखी थी. 1 मिनट में चंचला भाभी ने मांबाबूजी के अटूट विश्वास की धज्जियां उड़ा कर रख दी थीं.

मां ने धैर्य से काम लेते हुए मकान और उस के बगल वाले जमीन के कागजात बाबूजी से मांगे, ताकि उन्हें गिरवी रख पैसों का इंतजाम करें. तब उन्हें पता चला, दुकान की रजिस्ट्री के समय वे सब भी चंचला भाभी ने अपने नाम करवा लिए थे. परिस्थिति को देखते हुए हम सब ने अभी मां को चुप रहने की सलाह दी और खुद भी खामोश रहे. मयंक भैया ने सारे खर्च संभाल लिए थे, पर डाक्टरों की लाख कोशिश के बाद भी बाबूजी को बचाया नहीं जा सका.

बाबूजी की तेरहवीं तक इस बारे में सब चुप रहे. जब सारे रिश्तेदार चले गए, मयंक भैया ने चंचला भाभी को बुलवा कर मां द्वारा लगाए गए आरोपों की सत्यता जाननी चाही तब बिना किसी संकोच के मां द्वारा लगाए गए सारे आरोपों को सही बताते हुए वे बोलीं, ‘‘हां, मैं ने ऐसा किया है, क्योंकि मैं नहीं चाहती कि मैं और मेरे दोनों बच्चे हमेशा आप लोगों के मुहताज रहें.’’

उन की आंखों में एक अजीब सी हिंसक ईर्ष्या धधक उठी, जिसे देख भैया ने समझाना चाहा कि तुम ऐसा क्यों सोचती हो कि हम सब तुम्हारे अपने नहीं हैं.

भैया की बातें सुनते ही वे और भी भड़क उठीं. हमेशा से सीधीसादी दिखने वाली चंचला भाभी ने एकाएक बहुत उग्र रूप धारण कर लिया. कहीं बहस में रिश्तों की मर्यादा न टूट जाए, यह सोच मयंक भैया खामोशी से मां के बचेखुचे सामान और गहने समेट हम सब को साथ रांची ले जाने के लिए कार में आ बैठे.

हम सभी घर से निकले ही थे कि नवीन भैया बीच रास्ते में आ खड़े हो गए. मयंक भैया के कार रोकते ही वे दौड़ कर आए और भैया का हाथ थामते हुए बोले, ‘‘भैया, मुझे अकेला छोड़ कर मत जाइए, मैं आप लोगों के बिना जी नहीं सकूंगा.’’

भैया कुछ बोलते, उस के पहले ही भाभी गाड़ी से उतर नवीन भैया का हाथ थाम अपने बगल में बैठाते हुए बोलीं, ‘‘चलो, तुम मेरे साथ चलो. इतना प्रतिभाशाली हो कर भी किस कदर तुम ने अपनी जिंदगी को नरक बना लिया. बहुत हुआ यह सब. तुम्हें मैं ने हमेशा अपना छोटा भाई समझा है. देखना, मैं तुम्हें फिर से कैसे बुलंदियों पर पहुंचाती हूं. जितना तुम ने जिंदगी में चाहा होगा उस का चौगुना तुम पाओगे, यह तुम्हारी भाभी का तुम से वादा है. एक दिन तुम यह भी देखोगे कि कैसे तुम्हारे यही बीवीबच्चे सिर के बल दौड़े तुम्हारे पास आएंगे.’’

गाड़ी आगे बढ़ी, अब मेरे बोलने की बारी थी, ‘‘आप लोगों को चंचला भाभी पर अटूट विश्वास करते देख मैं हमेशा खामोश रही, वरना मैं तो शुरू से ही उन्हें अच्छी तरह समझ रही थी. जो जितना उन की मीठी वाणी का मुरीद हुआ उस के गले पर उन की मीठी छुरी उतनी ही तेज चली. आप लोगों के तो फिर भी धनसंपत्ति पर ही उन की मीठी छुरी चली, जरा नवीन भैया की सोचिए, जिन की पूरी जिंदगी ही बरबाद हो गई.’’

किसी के पास अब इस बात का भला क्या जवाब था? सब मीठी छुरी के मारे हुए थे. सब को राहत इस बात की थी कि चलो घाव भले हुआ, प्राण तो बचे. शायद इसीलिए उस विषम परिस्थिति में भी सब के चेहरों पर मुसकराहट छा गई.

Inspirational Social Stories : जिंदगी एक बांसुरी है

Inspirational Social Stories : जोकी हाट का ब्लौक दफ्तर. एक गोरीचिट्टी, तेजतर्रार लड़की ने कुछ दिन पहले वहां जौइन किया था. उसे आमदनी, जाति, घर का प्रमाणपत्र बनाने का काम मिला था. वह अपनी ड्यूटी को मुस्तैदी से पूरा करने में लगी रहती थी. सुबह के 10 बजे से शाम के 4 बजे तक वह सब की अर्जियां लेने में लगी रहती थी. आज उसे यहां 6 महीने होने को आए हैं. अब उस के चेहरे पर शिकन उभर आई है. होंठों से मुसकान गायब हो चुकी है. ऐसा क्या हो गया है? अजय भी ठहरा जानामाना पत्रकार. खोजी पत्रकारिता उस का शगल है. अजय ने मामले की तह तक जाने का फैसला किया. पहले नाम और डेरे का पता लगाया.

नाम है सुमनलता मुंजाल और रहती है शिवपुरी कालोनी, अररिया में.अजय ने फुरती से अपनी खटारा मोटरसाइकिल उठाई और चल पड़ा. पूछतेपूछते वहां पहुंचा. आज रविवार है, तो जरूर वह घर पर ही होगी.

डोर बैल बजाई. वह बाहर निकली. अजय अपना कार्ड दिखा कर बोला, ‘‘मैं एक छोटे से अखबार का प्रतिनिधि हूं मैडमजी. मैं आप से कुछ खास जानने आया हूं.’’

‘फुरसत नहीं है’ कह कर वह अंदर चली गई और अजय टका सा मुंह ले कर लौट आया.

अजय दूसरे उपाय सोचने में लग गया. 15 दिन की मशक्कत के बाद उसे सब पता चल गया. सुमनलता को किसी न किसी बहाने से उस के अफसर तंग करते थे.

अजय ने स्टोरी बना कर छपवा दी. फिर तो वह हंगामा हुआ कि क्या कहने. दोनों की बदली हो गई. अच्छी बात यह हुई कि सुमनलता के होंठों पर पुरानी मुसकान लौट आई.

एक दिन अजय कुछ काम से ब्लौक दफ्तर गया था. उस ने आवाज दे कर बुलाया. अजय चाहता तो अनसुना कर सकता था, पर फुरसत पा कर वह मिला. औपचारिक बातें हुईं. उस ने अजय को घर आने का न्योता दिया और उस का फोन नंबर लिया. बात आईगई हो गई.

3 दिन बाद रविवार था. शाम को अजय को फोन आया. अजनबी नंबर देख कर ‘हैलो’ कहा.

उधर से आवाज आई, ‘सर, मैं मिस मुंजाल बोल रही हूं. आप आए नहीं. मैं सुबह से आप का इंतजार कर रही हूं. अभी आइए प्लीज.’

मिस मुंजाल यानी ‘वह कुंआरी है’ सोच कर अजय तैयार हुआ और चल पड़ा. एक बुके व मिठाई ले ली. डोर बैल बजाते ही उस ने दरवाजा खोला.

साड़ी में वह बड़ी खूबसूरत लग रही थी. वह चहकते हुए बोली, ‘‘आइए, मैं आप का ही इंतजार कर रही थी.’’

अजय भीतर गया. वहां एक औरत बनीठनी बैठी थी. वह परिचय कराते हुए बोली, ‘‘ये मेरी मम्मी हैं. और मम्मी, ये महाशय पत्रकार हैं. मेरे बारे में इन्होंने ही छापा था.’’

अजय ने उन के पैर छू कर प्रणाम किया. वे उसे आशीर्वाद देते हुए बोलीं, ‘‘सदा आगे बढ़ो बेटा. आओ, बैठो.’’

तभी मिस मुंजाल बोलीं, ‘‘आप ने मुझे अभी तक अपना नाम तो बताया ही नहीं?’’

वह बोला, ‘‘मुझे अजय मोदी कहते हैं. आप सिर्फ मोदी भी कह सकती हैं.’’

‘‘मैं अभी आती हूं,’’ कह कर वह अंदर गई. पलभर में वह ट्रौली धकेलती हुई आई. उस पर केक सजा हुआ था. देख कर अजय को ताज्जुब हुआ.

उस ने खुलासा किया, ‘‘आज मेरा जन्मदिन है.’’

अजय ने पूछा, ‘‘मेहमान कहां हैं?’’

वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘आप ही मेहमान हैं मिस्टर अजय मोदी.’’

‘‘ओह,’’ अजय ने इतना ही कहा.

मोमबत्ती बुझा कर उस ने केक काटा. पहला टुकड़ा अजय को खिलाया. अजय ने भी उसे और उस की मम्मी को केक खिलाया. फिर बुके व मिठाई के साथ बधाई दी और कहा, ‘‘मैं बस यही ले कर आया हूं. पहले पता होता, तो तैयारी के साथ आता.’’

उस ने इशारे से मना किया और बोली, ‘‘आज प्रोफैशनल नहीं पर्सनल मूमैंट को जीना है.’’

अजय चुप हो गया. रात के 8 बजे वह लौटा, तो वे दोनों अजनबी से एक गहरे दोस्त बन चुके थे.

2 महीने बाद अजय का प्रमोशन हो गया, तो सोचा कि उस के साथ ही सैलिबे्रट करे. फोन किया. उस ने बधाई दी. उस की आवाज में कंपन और उदासी थी.

अजय ने कहा, ‘‘आप आज शाम को तैयार रहना.’’

शाम में वह तैयार हो कर शिवपुरी पहुंचा. वह सजसंवर कर तैयार थी. दोनों मोटरसाइकिल पर बैठ कर चल पड़े.

अजय ने रास्ते में बताया कि वे दोनों पूर्णिया जा रहे हैं. वह कुछ नहीं बोली. होटल हर्ष में सीट बुक थी. खानेपीने का सामान उस की पसंद से और्डर किया. पनीर के पकौड़े, अदरक की चटनी कौफी…

अजय ने कहा, ‘‘मिस मुंजाल, आज हम लोग स्पैशल मूमैंट्स को जीएंगे.’’

वह गजब की मुसकान के साथ बोली, ‘‘जैसा आप कहें सर.’’

अजय ने प्यार से पूछा, ‘‘मिस मुंजाल, मुझे ‘सर’ कहना जरूरी है?’’

वह भी पलट कर बोली, ‘‘मुझे भी ‘मिस मुंजाल’ कहना जरूरी है?’’

अजय ने कहा, ‘‘ठीक है. आज से केवल अजय कहना या फिर मोदी.’’

वह बोली, ‘‘मुझे भी केवल सुमन या लता कहना.’’

फिर वह अपने बारे में बताने लगी कि वह हरियाणा के हिसार की है. नौकरी के सिलसिले में बिहार आ गई, पर अब मन नहीं लग रहा है. एलएलएम कर रही है. बहुत जल्द ही वह यहां से चली जाएगी. उसे वकील बनने की इच्छा है.

फिर अजय ने बताया, ‘‘मैं भी बहुत जल्द दिल्ली जौइन कर लूंगा. हैड औफिस बुलाया जा रहा है.’’

फिर उस ने मुझे एक छोटा सा गिफ्ट दिया. बहुत खूबसूरत ‘ब्रेसलेट’ था, जिस पर अंगरेजी का ‘ए’ व ‘एस’ खुदा था.

मैं ने भी एक सोने की पतली चेन दी. उस में एक लौकेट लगा था और एक तरफ ‘ए’ व दूसरी तरफ ‘एस’ खुदा था.

वह बहुत खुश हुई. ब्रेसलेट पहना कर उस ने अजय का हाथ चूम लिया और सहलाने लगी. वह भी थोड़ा जोश में आ गया. उस ने भी उसे चेन पहनाई और गरदन चूम ली. वह सिसकने लगी.

अजय ने वजह पूछी, तो बोली, ‘‘तुम पहले इनसान हो, जिस ने मेरी बिना किसी लालच के मदद की थी.’’

अजय ने कहा, ‘‘एलएलएम करने तक तुम यहीं रहो. कुछ गलत नहीं होगा. मैं हूं न.’’

उस ने ‘हां’ में सिर हिलाया. रात होतेहोते अजय ने उसे उस के डेरे पर छोड़ दिया. विदा लेने से पहले वे दोनों गले मिले.

अजय दूसरे ही दिन गुपचुप तरीके से बीडीओ साहब से मिला. अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया और उस की ड्यूटी बदलवा दी.

इस बात को 10 साल गुजर गए. अजय अपने असिस्टैंट के साथ एक मशहूर मर्डर मिस्ट्री की सुनवाई कवर करने पटियाला हाउस कोर्ट गया था.  कोर्ट से बाहर निकल कर वह मुड़ा ही था कि कानों में आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘मिस्टर मोदी, प्लीज रुकिए.’’

अजय ने देखा कि एक लड़की वकील की ड्रैस में हांफती हुई चली आ रही थी. पास आ कर उस ने पूछा, ‘‘ऐक्सक्यूज मी प्लीज, आर यू मिस्टर अजय मोदी?’’

अजय ने कहा, ‘‘यस. ऐंड यू?’’

उस ने कहा, ‘‘मैं रीना महिंद्रा. आप प्लीज मेरे साथ चलिए. मेरी सीनियर आप को बुला रही हैं.’’

अजय हैरान सा उस के साथ चल पड़ा. पार्किंग में एक लंबी नीली कार खड़ी थी. उस के अंदर एक औरत वकील की ड्रैस में बैठी थी.

अजय के वहां पहुंचते ही वह बाहर निकली और उस के गले लग गई.

अजय यह देख कर अचकचा गया. वह चहकते हुए बोली, ‘‘कहां खो गए मिस्टर मोदी? पहचाना नहीं क्या मुझे? मैं सुमनलता मुंजाल.’’

अजय बोला, ‘‘कैसी हैं आप?’’

वह बोली, ‘‘गाड़ी में बैठो. सब बताती हूं.’’

अजय ने अपने असिस्टैंट को जाने के लिए कहा और गाड़ी में बैठ गया. उस ने भी रीना को मैट्रो से जाने के लिए कहा और खुद ही गाड़ी ड्राइव करने लगी.

वह लक्ष्मी नगर के एक फ्लैट में ले आई. अजय को एक गिलास पानी ला कर दिया और खुद फ्रैश होने चली गई.

कुछ देर बाद टेबल पर नाश्ता था, जिसे उस ने खुद बनाया था. फिर वह अपनी जिंदगी की कहानी बताने लगी.

‘‘आप ने तो चुपचाप मेरी ड्यूटी बदलवा दी. कुछ दिन बाद ही मुझे पता चल गया. सभी ताने मारने लगे. मुझ से सभी आप का रिलेशन पूछने लगे, तो मैं ने ‘मंगेतर’ बता दिया.

‘‘काफी समय बीत जाने पर भी जब आप नहीं मिले और न ही फोन लगा, तो मैं परेशान हो गई. पता चला कि आप दिल्ली में हो और अखबार भी बंद हो गया है.

‘‘मैं समझ गई कि आप जद्दोजेहद कर रहे होंगे. इधर मेरी मां को लकवा मार गया. मेरी एलएलएम भी पूरी हो गई थी. उस नौकरी से मैं तंग आ ही चुकी थी.

‘‘मां के इलाज के बहाने मैं दिल्ली चली आई. एक महीने बाद मेरी मां चल बसीं. फिर मेरा संघर्ष भी शुरू हो गया. दिल्ली हाईकोर्ट जौइन कर लिया और धीरेधीरे मैं क्रिमिनल वकील के रूप में मशहूर हो गई.’’

अजय मुसकरा कर रह गया.

उस ने पूछा, ‘‘आप बताओ, कैसी कट रही है?’’

अजय ने बताया, ‘‘दिल्ली आने के कुछ महीनों बाद ही अखबार बंद हो गया. मैं ने हर छोटाबड़ा काम किया. ठेला तक चलाया. अखबार बेचा. फिर एक दिन एक रिपोर्टिंग कर एक अखबार को भेजी और उसी में मुझे काम मिल गया. आज तक उसी में हूं.’’

‘‘बीवीबच्चे कैसे हैं?’’

अजय ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘‘मैडम मुंजाल, जब अपना पेट ही नहीं भर रहा हो, तो फिर वह सब कैसे?’’

वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘तब तो ठीक है.’’

अजय बोला, ‘‘सच कहूं, तो तुम्हारी जैसी कोई मिली ही नहीं और न ही मिलेगी. जहां इतनी कट गई है, तो आगे भी कट ही जाएगी.’’

वह बोली, ‘‘अच्छी बात है.’’

अजय ने पूछा, ‘‘तुम्हारे बालबच्चे कहां और कैसे हैं?’’

वह फीकी मुसकान के साथ बोली, ‘‘एक भिखारी दूसरे भिखारी से पूछ रहा है, तुम ने कितना पैसा जमा किया है.’’

फिर वह चेन दिखाते हुए बोली, ‘‘याद है न… ये चेन आप ने ही पहनाई थी. मैं ने तब से ही इसे अपना ‘मंगलसूत्र’ मान लिया है. समझे…’’

‘‘और फिर मैं हरियाणवी हूं. पति के शहीद होने पर भी दूसरी शादी नहीं करते, यहां तो मेरा ‘खसम’ मोरचे पर गया था, शहीद थोड़े ही हुआ था.’’

अजय उस की प्यार वाली बात सुन कर फफकफफक कर रोने लगा. वह उस के आंसू पोंछते हुए बोली, ‘‘कितना झंडू ‘खसम’ हो आप मेरे? मर्द हो कर रोते हो?’’

अजय ‘खसम’ शब्द पर मुसकराते हुए बोला, ‘‘आई एम सौरी माई लव. यू आर ग्रेट ऐंड आई लव यू वैरी मच.’’

वह भी मुसकराते हुए बोली, ‘‘अच्छा, इसलिए पलट कर मेरी खबर तक नहीं ली.’’

इस के बाद अजय को अपनी बांहों में कसते हुए वह बोली, ‘‘मैं इस ‘अनोखे मंगलसूत्र’ को दिखादिखा कर थक चुकी हूं, मोदी डियर. अब सब के सामने मुझे स्वीकार भी कर लो प्लीज.’’

वे दोनों अगले हफ्ते ही एक भव्य समारोह में एकदूसरे के हो गए. कहा भी गया है कि जिंदगी एक बांसुरी की तरह होती है. अंदर से खोखली, बाहर से छेदों से भरी और कड़ी भी, फिर भी बजाने वाले इसे बजा कर ‘मीठी धुन’ निकाल ही लेते हैं.

लेखक- डा. चंदन

Hindi Moral Tales : क्या तुम आबाद हो

लेखिका- कात्यायनी सिंह

Hindi Moral Tales : कलरात अचानक नन्ही की तबीयत बहुत खराब होने की वजह से मैं परेशान हो गई. जय को फोन लगाया तो कवरेज से बाहर बता रहा था. रात के आठ बज रहे थे. कुछ सम झ नहीं आया तो मैं अकेली ही डाक्टर को दिखाने के लिए निकल पड़ी. नीरवता में अजीब सी शांति थी. मु झे यह रात बहुत भा रही थी. चारों ओर फैली उस कालिमा में रोमांस के अलावा और कुछ था तो वह था नन्ही की बीमारी के लिए चिंता और मेरे तेज चलते कदमों की आहट.

डाक्टर के कैबिन से बाहर आते ही मैं ने राहत की सांस ली. नन्ही को वायरल था, घबराने वाली बात नहीं थी. अंधेरा और गहरा हो गया था. दिल की धड़कनें तेज हो रही थीं. अपनेआप पर गुस्सा भी आ रहा था. नन्ही की बीमारी ने मेरा दिलदिमाग सुन्न कर दिया था. बगैर सोचे रात को निकल पड़ी थी.

जय बहुत गुस्सा करेंगे. गुस्सा याद आते ही शरीर में डर से  झुर झुरी पैदा हो गई. जय जब गुस्सा करते हैं तो उन्हें कुछ भी तो सम झ में नहीं आता है… कभीकभी तो हाथ भी उठा देते हैं. मेरी खुद्दारी सिर्फ मेरे पास थी. इस से जय को कुछ लेनादेना नहीं था. वे तो अपने पौरुष बल को जबतब दिखा कर मु झे और कमजोर कर देते हैं.

कभीकभी सोचती हूं कि मेरे मांबाप ने मु झे पढ़ाया ही क्यों. अनपढ़ रहती तो ज्यादा अच्छा था. तभी मोबाइल की रिंग ने मु झे चौंका दिया. जय का नंबर देख थोड़ी राहत महसूस हुई.

‘‘कहां हो? मैं घर आया तो दरवाजे पर ताला लगा देख घबरा गया,’’ जय का घबराया स्वर सुन मेरा डर और बढ़ गया.

मैं ने कांपती आवाज में जवाब दिया, ‘‘नन्ही की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी… तुम्हारा मोबाइल कवरेज क्षेत्र से बाहर बता रहा था. पड़ोसी के घर चाबी है, ले लेना.’’

‘‘तुम वहीं रहो, मैं थोड़ी देर में आता हूं,’’ कह कर जय ने फोन काट दिया.

मेरे बेचैन मन को शांति मिली.

फोन कटने के बाद जैसे ही नजर उठाई कि मु झे बरसों पुरानी मेरी एक दोस्त दिखाई दी.

हम एकदूसरे को कुछ देर देखते रह गए. बात करने की पहल उसी ने की, ‘‘व्हाट ए सरप्राइज… कल्पना तुम मु झे यहां ऐसे मिलोगी, मैं सोच भी नहीं सकती थी.’’

मैं ने मुसकराते हुए हलके से उस का हाथ दबा दिया.

बरसों पहले जब हम जुदा हुए थे तो छोटी सी बात पर हम दोनों के बीच दरार आ गई थी. बरसों की दूरी ने उस दरार को भर दिया था. हम सहज थे और मु झे अपनी सहजता पर विस्मय भी हो रहा था.

हालांकि मु झे उसे देख कर खास खुशी नहीं हुई. यह अप्रत्याशित मुलाकात मेरे अकेलेपन की समस्या से छुटकारा दिला देगी, यह सोच कर मेरा मन संतोष से भर गया. वह मेरे पास आ गई. मेरा हाथ पकड़ पास की बैंच पर बैठ गई तो मु झे भी बैठना पड़ा. उस ने मेरी बच्ची को मेरी गोद से अपनी गोद में ले लिया.

मैं ने उस का चेहरा गौर से देखा. थकी और परेशान लग रही थी. मु झे बरसों पुरानी बात याद आ गई, जब वह मु झे अपना दुखड़ा सुनाया करती थी और मैं ऊब जाया करती थी. वह हर समय अपने प्रेमी के बारे में बातें कर के जी हलका कर लेती थी पर मैं और भारी हो जाती थी. मैं वाहियात बातों पर अपना समय खराब नहीं करना चाहती थी. इसीलिए उस समय या बाद के दिनों में मेरा कोई प्रेमी नहीं हुआ.

‘‘कहां खो गई कल्पना?’’ उस की नम्र आवाज मु झे भूत से वर्तमान में ले आई.

‘‘कृति तुम अपने बारे में बताओ? इतने साल बाद मिली हो. तुम जिस से प्यार करती थी उसी से तुम्हारी शादी हुई या किसी और से? कितना प्यार करती थी न तुम उस से. तुम्हारी हरेक बात में सिर्फ उसी का जिक्र होता था,’’ वह बोली.

‘‘मैं उसे अभी तक नहीं भूल पाई… आखिर तक नहीं भूल पाऊंगी. शायद भूलना चाहूं तब भी नहीं भूल सकती. जानती हो कल्पना जिस दिन मैं उस को भूल जाऊंगी, उस दिन मैं मर जाऊंगी. उस ने मेरे साथ विश्वासघात किया, मु झे धोखा दिया. प्यार मु झ से किया और शादी किसी और से…’’

मैं उसे कभी माफ नहीं करूंगी. मैं मरते दम तक उसे कोसती रहूंगी. वह जहां है जैसे भी है कभी खुश नहीं रहेगा. मेरी जिंदगी को बरबाद करने वाला कभी आबाद नहीं रहेगा. मेरे अंदर एक आग हमेशा जलती रहती है, जिसे मैं कभी बु झने नहीं दूंगी, क्योंकि मैं इसी आग के सहारे अभी तक जिंदा हूं. मैं अब किसी आदमी पर भरोसा नहीं कर पाती… वह मेरा विश्वास इस कदर तोड़ गया है.

‘‘मेरे शरीर के 1-1 हिस्से पर उस के स्पर्श के निशान हैं. उस ने मु झे निचोड़ दिया है. मेरे अंदर अब कुछ भी नहीं बचा है कि मैं अब किसी दूसरे पुरुष से शादी भी कर सकूं. मैं टूट गई हूं. बस अब तो मेरी एक ही ख्वाहिश है कि किसी भी तरह वह बेवफा मु झे मिल जाए और मैं उस से बदला ले सकूं. हालांकि मैं जानती हूं उस से बदला लेने के बाद मेरे मन में रिक्तता भर जाएगी. जीने की इच्छा खत्म हो जाएगी, लेकिन इस सब के बावजूद मैं उसे खोज रही हूं, कई शहर भटक रही हूं. बस एक ही ख्वाहिश लिए कि वह एक बार मिल जाए कहीं भी.’’

मैं परेशान हो गई. अभी भी इस की बातों में, इस के जेहन में सिर्फ वही लड़का है. इन्हीं वाहियात बातों के कारण मैं ने इस से दूरी बना ली थी. पर आज… आज की अप्रत्याशित मुलाकात के बाद भी इस के पास बात करने के लिए सिर्फ एक ही व्यक्ति था.

मैं ने कहा, ‘‘कृति भूल जाओ उस शख्स को, जिस ने तुम्हें इतना दर्द दिया है. उसे तुम्हारी कद्र नहीं है. तुम क्यों उस के पीछे अपना जीवन बरबाद कर रही हो. आगे बढ़ो… तुम्हें उस से कहीं अच्छा और ज्यादा प्यार करने वाला लड़का मिल जाएगा.’’

उस ने मु झे अजीब नजरों से देखा फिर धीरे से कहा, ‘‘क्या तुम आबाद हो?’’

यह एक विचित्र प्रश्न था मेरे लिए. मेरे मन में उथलपुथल होने लगी. क्या मैं आबाद हूं?

मेरी पलकें बादल बन गईं और आंखें समुद्र… पानी अंदर ही अंदर पीने की नाकाम कोशिश करने लगी कि क्या हम औरतों के हिस्से यही लिखा है. बारबार चोट खाने के बाद हम अपने ही वजूद को बचाने की नाकाम कोशिश करते रहते हैं. कई बार तो यह नाकाम कोशिश हमें पीड़ा दे जाती है. क्या हमारा मन बारबार नहीं रूठता? मगर फिर खुदबखुद मान भी जाता है क्योंकि वह जानता है कि हमें मनाने वाला कोई नहीं है.

मेरी आंखों में पानी देख कल्पना का हाथ मेरे हाथ में आ गया. एक अनकही आत्मीयता का फूल हमारे मन में खिल गया. एक नजर उस ने मु झे देखा और फिर कहा, ‘‘कह दो कल्पना अपने अंदर का सारा दर्द… शायद तुम्हारा दर्द कुछ हलका हो जाए,’’ उस की बड़ीबड़ी आंखों में ममता उतर आई.

‘‘मैं क्या बताऊं कृति, मेरी जिंदगी रेगिस्तान है, जिस में कोई फूल नहीं खिल सकता. पोस्ट ग्रैजुएशन करते ही मेरी शादी हो गई. कई ख्वाबों को ले कर मैं सुसराल आ गई. सुहागरात के दिन करीब 12 बजे मेरे पति शराब के नशे में लड़खड़ाते हुए आए.

‘‘मेरी कल्पनाओं के ख्वाब मन के खुले आसमान में उमंगें भर रहे थे. पर मेरी कल्पनाओं के विपरीत आते ही मेरी साड़ी उतार दी… न प्यार न मनुहार. मैं शर्म से सिकुड़ गई. उस की हंसी कमरे के चारों तरफ गूंज गई. मैं ने धीरे से कहा कि व्हाट इज दिस.

मगर जैसे उसे कुछ सुनाई ही नहीं दिया. मैं रो पड़ी. उस के चुंबन से मेरा दम घुटने लगा. मन गुस्से से भर गया. दिल में यही खयाल आया कि यह इंसान नहीं जानवर है. मैं बर्फ सी ठंडी पड़ गई.

कुछ मिनटों के बाद वह शांत सो गया पर मैं रातभर जागती रही. शरीर और मन दर्द से तड़पता रहा. कृति मैं बलात्कार की शिकार हो गई थी. इस से बचने का कोई उपाय हमारे समाज के पास नहीं है. मेरा पति अब हर रात मेरा बलात्कार करता है और मैं कुछ नहीं कर सकती. कुछ न कर सकने की पीड़ा मेरे अंदर आग जलाती रहती है. घर है राजमहल जैसा. सारी सुखसुविधाएं… पर मु झे इन सुखसुविधाओं से कोई मतलब नहीं. मैं एक भटकती आत्मा की तरह दिनभर भटकती रहती हूं. मेरे सपने तिरोहित हो गए कल्पना. पढ़लिख कर अनपढ़से भी बदतर जिंदगी… अकेलापन काटने के लिए कई नुसखे आजमाए… पर कुंठा और हताशा मेरे अंदर निराशा भरती गई. मेरा दर्द आंसुओं के रूप में बहने लगा. मैं एक लंबी सांस ले कर चुप हो गई.’’

‘‘ओह, कल्पना तुम कितना सहन करती हो… मु झ से कहीं ज्यादा. शायद सारे मर्द कमीने होते हैं. जहां भी मर्द को मौका मिला औरत के शरीर को नापने लगता है. कभी हाथों से तो कभी आंखों से. इसीलिए मु झे सख्त नफरत है मर्द जात से.’’

अभी कृति कुछ और कहना चाह रही थी कि गाड़ी की आवाज से मैं कांप गई. पति की गाड़ी का हौर्न मेरे दिलोदिमाग पर छाया रहता है. मैं ने हलके से कृति का हाथ दबा दिया. स्पर्श की अपनी भाषा होती है. शायद कृति सम झ गई और गाड़ी की दिशा में देखने लगी.

जय को देखते ही अचानक उस की सांसें तेज हो गईं और वह जोर से चिल्ला पड़ी,

‘‘यही तो है वह बेवफा, जिस ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी. तुम्हारी शादी इस से हुई है? तभी तो यह जानवर है… नहींनहीं यह जानवर नहीं यह तो राक्षस है राक्षस… औरतों के शरीर से खेलने की आदत हो गई है इसे. मैं इसी को तो कोस दे रही थी. मेरा आज कुदरत पर से विश्वास उठ गया… तुम्हारी जैसी लड़की को यह हैवान मिला.’’

अचानक जय ने मेरा हाथ पकड़ खींचते हुए गाड़ी में बैठा दिए. गाड़ी चल दी. मैं अंदर से खोखली हो गई थी. अब मु झे अपनी इस दोस्त से ईर्ष्या होने लगी… कम से कम उस के पस याद करने के लिए बेवफाई का अनुभव तो है पर मेरे पास क्या है?

एक दलदल जिस में मैं धंसती जा रही थी, जहां से निकलने का कोई रास्ता नहीं था. मेरा मन कहीं और था पर मेरा शरीर एक और शरीर के साथ चले जा रहा था उसी विशाल मकान में जहां मैं रोज रात अपने ही शरीर का शोर सुनती हूं.

Hindi Fiction Story : गृहस्थी की गाड़ी

Hindi Fiction Story : रविशंकर के रिटायर होने की तारीख जैसेजैसे पास आ रही थी, वैसेवैसे विमला के मन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. रविशंकर एक बड़े सरकारी ओहदे पर हैं, अब उन्हें हर महीने पैंशन की एक तयशुदा रकम मिलेगी. विमला की चिंता की वजह अपना मकान न होना था, क्योंकि रिटायर होते ही सरकारी मकान तो छोड़ना पड़ेगा.

रविशंकर अभी तक परिवार सहित सरकारी मकान में ही रहते आए हैं. एक बेटा और एक बेटी हैं. दोनों बच्चों को उन्होंने उच्चशिक्षा दिलाई है. शिक्षा पूरी करते ही बेटाबेटी अच्छी नौकरी की तलाश में विदेश चले गए. विदेश की आबोहवा दोनों को ऐसी लगी कि वे वहीं के स्थायी निवासी बन गए और दोनों अपनीअपनी गृहस्थी में खुश हैं.

सालों नौकरी करने के बावजूद रविशंकर अपना मकान नहीं खरीद पाए. गृहस्थी के तमाम झमेलों और सरकारी मकान के चलते वे घर खरीदने के विचार से लापरवाह रहे. अब विमला को एहसास हो रहा था कि वक्त रहते उन्होंने थोड़ी सी बचत कर के छोटा सा ही मकान खरीद लिया होता तो आज यह चिंता न होती. आज उन के पास इतनी जमापूंजी नहीं है कि वे कोई मकान खरीद सकें, क्योंकि दिल्ली में मकान की कीमतें अब आसमान छू रही हैं.

आज इतवार है, सुबह से ही विमला को चिड़चिड़ाहट हो रही है. ‘‘तुम चिंता क्यों करती हो, एक प्रौपर्टी डीलर से बात की है. मयूर विहार में एक जनता फ्लैट किराए के लिए उपलब्ध है, किराया भी कम है. आखिर, हम बूढ़ेबुढि़या को ही तो रहना है. हम दोनों के लिए जनता फ्लैट ही काफी है,’’ रविशंकर ने विमला को समझाते हुए कहा.

‘‘4 कमरों का फ्लैट छोड़ कर अब हम क्या एक कमरे के फ्लैट में जाएंगे? आप ने सोचा है कि इतना सामान छोटे से फ्लैट में कैसे आएगा, इतने सालों का जोड़ा हुआ सामान है.’’

‘‘हम दोनों की जरूरतें ही कितनी हैं? जरूरत का सामान ले चलेंगे, बाकी बेच देंगे. देखो विमला, घर का किराया निकालना, हमारीतुम्हारी दवाओं का खर्च, घर के दूसरे खर्चे सब हमें अब पैंशन से ही पूरे करने होंगे. ऐसे में किराए पर बड़ा फ्लैट लेना समझदारी नहीं है,’’ रविशंकर दोटूक शब्दों में पत्नी विमला से बोले.

‘‘बेटी से तो कुछ ले नहीं सकते, लेकिन बेटा तो विदेश में अच्छा कमाता है. आप उस से क्यों नहीं कुछ मदद के रूप में रुपए मांग लेते हैं जिस से हम बड़ा फ्लैट खरीद ही लें?’’ विमला धीरे से बोली.

‘‘भई, मैं किसी से कुछ नहीं मागूंगा. कभी उस ने यह पूछा है कि पापा, आप रिटायर हो जाओगे तो कहां रहोगे. आज तक उस ने अपनी कमाई का एक रुपया भी भेजा है,’’ रविशंकर पत्नी विमला पर बरस पड़े.

विमला खुद यह सचाई जानती थी. शादी के बाद बेटा जो विदेश गया तो उस ने कभी मुड़ कर भी उन की तरफ देखा नहीं. बस, कभीकभार त्योहार आदि पर सिर्फ फोन कर लेता है. विमला यह भी अच्छी तरह समझती थी कि उस के स्वाभिमानी पति कभी बेटी के आगे हाथ नहीं फैलाएंगे. विमला उन मातापिता को खुशहाल मानती है जो अपने बेटेबहू, नातीपोतों के साथ रह रहे हैं जबकि वे दोनों पतिपत्नी इस बुढ़ापे में बिलकुल अकेले हैं.

आखिर, वह दिन भी आ ही गया जब विमला को सरकारी मकान से अपनी गृहस्थी समेटनी पड़ी. रविशंकर ने सामान बंधवाने के लिए 2 मजदूर लगा लिए थे. कबाड़ी वाले को भी उन्होंने बुला लिया था जिस कोे गैरजरूरी सामान बेच सकें. केवल जरूरत का सामान ही बांधा जा रहा था.

विमला ने अपने हाथों से एकएक चीज इकट्ठा की थी, अपनी गृहस्थी को उस ने कितने जतन से संवारा था. कुछ सामान तो वास्तव में कबाड़ था पर काफी सामान सिर्फ इसलिए बेचा जा रहा था, क्योंकि नए घर में ज्यादा जगह नहीं थी. विमला साड़ी के पल्लू से बारबार अपनी गीली होती आंखों को पोंछे जा रही थी. उस के दिल का दर्द बाहर आना चाहता था पर किसी तरह वह इसे अपने अंदर समेटे हुए थी.

उस के कान पति रविशंकर की कमीज की जेब में रखे मोबाइल फोन की घंटी पर लगे थे. उसे बेटे के फोन का इंतजार था क्योंकि पिछले सप्ताह ही बेटे को रिटायर होने तथा घर बदलने की सूचना दे दी थी. आज कम से कम बेटा फोन तो करेगा ही, कुछ तो पूछेगा, ‘मां, छोटे घर में कैसे रहोगी? घर का साजोसामान कैसे वहां सैट होगा? मैं आप दोनों का यहां आने का प्रबंध करता हूं आदि.’ लेकिन मोबाइल फोन बिलकुल खामोश था. विमला के दिल में एक टीस उभर गई.

‘‘आप का फोन चार्ज तो है?’’ विमला ने धीरे से पूछा.

‘‘हां, फोन फुलचार्ज है,’’ रविशंकर ने जेब में से फोन निकाल कर देखा.

‘‘नैटवर्क तो आ रहा है?’’

‘‘हां भई, नैटवर्क भी आ रहा है. लेकिन यह सब क्यों पूछ रही हो?’’ रविशंकर झुंझलाते हुए बोले.

‘‘नहीं, कुछ नहीं,’’ कहते हुए विमला ने अपना मुंह फेर लिया और रसोईघर के अंदर चली गई. वह अपनी आंखों से बहते आंसुओं को रविशंकर को नहीं दिखाना चाहती थी.

सारा सामान ट्रक में लद चुका था. विमला की बूढ़ी गृहस्थी अब नए ठिकाने की ओर चल पड़ी. घर वाकई बहुत छोटा था. एक छोटा सा कमरा, उस से सटा रसोईघर. छोटी सी बालकनी, बालकनी से लगता बाथरूम जोकि टौयलेट से जुड़ा था. विमला का यह फ्लैट दूसरी मंजिल पर था.

विमला को इस नए मकान में आए एक हफ्ता हो गया है. घर उस ने सैट कर लिया है. आसपड़ोस में अभी खास जानपहचान नहीं हुई है. विमला के नीचे वाले फ्लैट में उसी की उम्र की एक बुजुर्ग महिला अपने बेटेबहू के साथ रहती है. विमला से अब उस की थोड़ीथोड़ी बातचीत होने लगी है. शाम को बाजार जाने के लिए विमला नीचे उतरी तो वही बुजुर्ग महिला मिल गई. उस का नाम रुक्मणी है. एकदूसरे को देख कर दोनों मुसकराईं.

‘‘कैसी हो विमला?’’ रुक्मणी ने विमला से पूछा.

‘‘ठीक हूं. घर में समय नहीं कटता. यहां कहीं घूमनेटहलने के लिए कोई अच्छी जगह नहीं है?’’ विमला ने रुक्मणी से कहा.

‘‘अरे, तुम शाम को मेरे साथ पार्क चला करो. वहां हमउम्र बहुत सी महिलाएं आती हैं. मैं तो रोज शाम को जाती हूं. शाम को 1-2 घंटे अच्छे से कट जाते हैं. पार्क यहीं नजदीक ही है,’’ रुक्मणी ने कहा.

अगले दिन शाम को विमला ने सूती चरक लगी साड़ी पहनी, बाल बनाए, गरदन पर पाउडर छिड़का. विमला को आज यों तैयार होते देख रविशंकर ने टोका, ‘‘आज कुछ खास बात है क्या? सजधज कर जा रही हो?’’

‘‘हां, आज मैं रुक्मणी के साथ पार्क जा रही हूं,’’ विमला खुश होती हुई बोली.

विमला को बहुत दिनों बाद यों चहकता देख रविशंकर को अच्छा लगा, क्योंकि विमला जब से यहां आई है, घर के अंदर ही अंदर घुट सी रही थी.

विमला और रुक्मणी दोनों पार्क की तरफ चल दीं. पार्क में कहीं बच्चे खेल रहे थे तो कहीं कुछ लोग पैदल घूम रहे थे ताकि स्वस्थ रहें. वहीं, एक तरफ बुजुर्ग महिलाओं का गु्रप था. विमला को ले कर रुक्मणी भी महिलाओं के ग्रुप में शामिल हो गई.

सभी बुजुर्ग महिलाओं की बातों में दर्द, चिंता भरी थी. कहने को तो सभी बेटेबहुओं व भरेपूरे परिवारों के साथ रहती थीं, लेकिन उन का मानसम्मान घर में ना के बराबर था. किसी को चाय समय पर नहीं मिलती तो किसी को खाना, कोई बीमारी में दवा, इलाज के लिए तरसती रहती. दो वक्त की रोटी खिलाना भी बेटेबहुओं को भारी पड़ रहा था.

इन महिलाओं की जिंदगी की शाम घोर उपेक्षा में कट रही थी. शाम के ये चंद लमहे वे आपस में बोलबतिया कर, अपने दिलों की कहानी सुना कर काट लेती थीं. अंधेरा घिरने लगा था. अब सभी घर जाने की तैयारी करने लगीं. विमला और रुक्मणी भी अपने घर की ओर बढ़ गईं.

घर पहुंच कर विमला कुरसी पर बैठ गई. पार्क में बुजुर्ग महिलाओं की बातें सुन कर उस का मन भर आया. वह सोचने लगी कि बुजुर्ग मातापिता तो उस बड़े पेड़ की तरह होते हैं जो अपना प्यार, घनी छावं अपने बच्चों को देना चाहते हैं लेकिन बच्चे तो इस छावं में बैठना ही नहीं चाहते. तभी रविशंकर रसोई से चाय बना कर ले आए.

‘‘लो भई, तुम्हारे लिए गरमागरम चाय बना दी है. बताओ, पार्क में कैसा लगा?’’

विमला पति को देख कर मुसकरा दी. जवाब में इतना ही बोली, ‘‘अच्छा लगा,’’ फिर चाय की चुस्की लेने के साथ मुसकराती हुई बोली, ‘‘सुनो, कल आप आलू की टिक्की खाने को कह रहे थे, आज रात के खाने में वही बनाऊंगी. और हां, आप कुछ छोटे गमले सीढ़ी तथा बालकनी में रखना चाहते थे, तो आप कल माली को कह दीजिए कि वह गमले दे जाए, हरीमिर्च, टमाटर के पौधे लगा लेंगे. थोड़ी बागबानी करते रहेंगे तो समय भी अच्छा कटेगा,’’ यह कहते हुए विमला खाली कप उठा कर रसोई में चली गई और सोचने लगी कि हम दोनों एकदूसरे को छावं दें और संतुष्ट रहें.

रविशंकर हैरान थे. कल तक वे विमला को कुछ खास पकवान बनाने को कहते थे तो विमला दुखी आवाज में एक ही बात कहती थी, ‘क्या करेंगे पकवान बना कर, परिवार तो है नहीं. बेटेबहू, नातीपोते साथ रहते, तो इन सब का अलग ही आनंद होता.’ गमलों के लिए भी वे कब से कह रहे थे पर विमला ने हामी नहीं भरी. विमला में यह बदलाव रविशंकर को सुखद लगा.

रसोईघर से कुकर की सीटी की आवाज आ रही थी. विमला ने टिक्की बनाने की तैयारी शुरू कर दी थी. घर में मसालों की खुशबू महकने लगी थी. रविशंकर कुरसी पर बैठेबैठे गीत गुनगुनाने लगे. आज उन्हें लग रहा था जैसे बहुत दिनों बाद उन की गृहस्थी की गाड़ी वापस पटरी पर लौट आई है…

Moral Stories In Hindi : मां की बेबसी

Moral Stories In Hindi : बरसती बूंदें कजरी के पैरों से कदमताल कर रही थीं. अभी 6 ही तो बजे थे, पर तेज बारिश और काले बादलों ने वक्त से पहले ही जैसे अंधेरा करने की ठान ली थी. ठीक उस के जीवन की तरह, जिस में उस की खुशियों के उजाले को समय के स्याह बादलों ने हमेशा के लिए ढक लिया था. कजरी सोचती जा रही थी. झमाझम होती बारिश में उस की पुरानी छतरी ने भी आज उस का साथ छोड़ दिया था. बच्चों की चिंता ने उस के पैरों की गति को और बढ़ा दिया. उस का घर आने से पहले ही बाबूलाल किराने वाले की दुकान पड़ती थी, जहां से उसे कुछ किराना भी लेना था.

‘‘क्या चाहिए?’’ बाबूलाल ने कजरी की भीगी देह पर भरपूर नजर डालते हुए कहा.

‘‘2 किलो आटा, आधा लिटर तेल, पाव किलो शक्कर और हां, आधा लिटर दूध भी दे देना,’’ कजरी ने अपने आंचल को ठीक करते हुए कहा. बाबूलाल की ललचाई नजरों में उसे हमेशा ही एक मौन आमंत्रण दिखाई देता था. यह तो उस की मजबूरी थी कि वह यहां से वक्तबेवक्त कभी भी उधारी में सामान ले लिया करती थी, वरना उस की दुकान की ओर कभी वह मुड़ कर भी न देखती.

सोचतेसोचते कजरी घर पहुंच गई. बच्चे ‘‘मां, मां’’ कहते हुए उस से लिपट गए.

‘‘आई बहुत भूख लगी है, ताई ने कुछ खाने को नहीं दिया,’’ छोटे बेटे कमल ने दीदी की शिकायत की.

‘‘क्या करती आई, घर में आटा ही नहीं था,’’ सुमि ने सफाई देते हुए कहा.

‘‘अच्छा मेरा राजा बेटा, मैं अभी गरमागरम रोटी बना कर अपने लाल को खिलाती हूं, मीठे दूध में मींज के खा लेना,’’ कजरी ने बेटे को पुचकारते हुए कहा.

‘‘आई, मैं भी खाऊंगी,’’ 9 साल की रीना ने मचलते हुए कहा.

‘‘क्यों नहीं मेरी गोलू, तू भी खाना.’’ गोलमटोल बड़ीबड़ी आंखों वाली रीना को सब गोलू ही कह कर बुलाते थे.

‘‘मैं ने टमाटर की मस्त चटनी भी बनाई है, आई,’’ सुमि ने उसे पानी का गिलास पकड़ाते हुए कहा.

जल्दी से आटा गूंध कर उस ने बच्चों को खाना खिलाया. उन को सुलाने के बाद कजरी सुमि के साथ वहीं नीचे जमीन पर लेट गई.

‘‘आई, आज फिर दीनू रीना को चौकलेट खिला रहा था. तब मैं ने रीना के हाथ से छीन कर वापस उस के मुंह पर फेंक दी, तो वह मेरे को देख लेने की धमकी दे कर चला गया. मुझे उस से बहुत डर लगता है, आई,’’ सुमि ने भयभीत स्वर में मां को बताते हुए कहा.

‘‘तुम घबराओ नहीं, सुमि, मैं उस की मां से बात करूंगी,’’ कजरी ने उसे तो समझा दिया, परंतु खुद सोच में पड़ गई.

जब से रमेश उसे छोड़ कर गया है, जीना कितना दूभर हो गया है. कभी सोचा नहीं था कि जिंदगी इस कदर बोझ बन जाएगी. रमेश के रहते उसे कभी भी बाहर जा कर काम करने की जरूरत नहीं पड़ी. 17 साल की थी जब मांबाप ने रमेश के साथ उस का ब्याह कर दिया था. बहुत खुश थी वह रमेश के साथ. पेशे से पेंटर रमेश इंदौर के राजेंद्रनगर इलाके से कुछ दूर बुद्धनगर के स्लम एरिया में किराए के मकान में रहता था. मकान बहुत अच्छा नहीं, पर रहने लायक जरूर था. दोनों की जिंदगी मजे में कट रही थी.

समय के साथ कजरी 3 प्यारे बच्चों की मां बनी. सब से बड़ी सुमि, उस से छोटी रीना और सब से छोटा कमल. बच्चों के जन्म के बाद कजरी का भरा बदन और भी सुंदर लगने लगा था. शादी के 12 साल बीत जाने पर भी रमेश उसे जीजान से चाहता था. आसपड़ोस के लोग उन दोनों के प्यारभरे रिश्ते से अनजान नहीं थे. कजरी के घर के पास ही एक बढ़ई परिवार रहता था. इस परिवार की इकलौती लड़की माया रमेश को बहुत पसंद करती थी, पर रमेश उस पर कभी ध्यान नहीं देता था.

इधर, बच्चों की देखरेख और घर के कामों में व्यस्त कजरी चाहते हुए भी रमेश को ज्यादा वक्त न दे पाती थी जिस वजह से अकसर दोनों में झड़प हो जाया करती थी. वह रमेश को समझाती थी कि बच्चों के आने के बाद उस का काम बढ़ गया है. पर पुरुषवादी सोच का गुलाम रमेश उस की न को अपना अपमान समझने लगा था. धीरेधीरे उन के बीच में दूरियां बढ़ती चली गईं.

अब काम से लौट कर रमेश सीधे जो बाहर निकलता, तो रात 11-12 बजे ही वापस आता. बच्चों के पालनपोषण में व्यस्त कजरी ने पहले तो इस ओर ध्यान नहीं दिया, और जब ध्यान दिया तब तक बड़ी देर हो चुकी थी.

35 साल का रमेश अब 16 साल की लड़की माया का दीवाना बन चुका था. इस बात का पता लगते ही कजरी ने बहुत बवाल मचाया. रमेश से लड़ीझगड़ी, उस माया के घर जा कर उसे लताड़ा. फिर भी उन दोनों पर कोई असर न होता देख कजरी ने माया के सामने अपना आंचल फैलाते हुए अपने बच्चों के पिता को छोड़ देने के लिए बहुत अनुनयविनय की. पर माया टस से मस न हुई. माया के मातापिता भी उस की इस हरकत के आगे मजबूर थे.

फिर, एक दिन वह दिन भी आया जब काम पर गया रमेश कभी घर नहीं लौटा. इधर, माया भी घर से गायब थी. कजरी की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. वह फूटफूट कर रोई. पर अब हो भी क्या सकता था. भारी मन से उस ने इस सचाई को स्वीकार कर लिया कि अब वह एक परित्यक्ता है, जिसे उस का आदमी हमेशा के लिए छोड़ कर जा चुका है.

पति द्वारा छोड़ी हुई औरत समाज के पुरुषों की बपौती बन जाती है, कुछ ही दिनों में यह बात उस की समझ में आ चुकी थी. यह वह समाज है, जहां पुरुषों द्वारा की गई गलती की सजा भी औरत को ही भुगतनी पड़ती है. घर के बाहर हर दूसरा आदमी उस के शरीर पर अपनी गिद्ध निगाह जमाए बैठा था. पर बच्चों के भरणपोषण के लिए उस का घर से निकलना बेहद जरूरी हो चुका था. ऐसे में रमेश के दोस्त लखन ने उस की बहुत सहायता की. उस ने अपने मालिक के घर पर कजरी को काम दिला दिया.

जल्द ही कजरी ने भी बेशर्मी की चादर ओढ़ कर जीना सीख लिया. लेकिन, अब भी काम पर जाने के बाद बच्चों की देखरेख की समस्या उस के आगे मुंहबाए खड़ी थी, जिस का जिम्मा उस की 11 साल की बेटी ने ले लिया. अपनी पढ़ाई छोड़ कर वह अपने छोटे भाईबहन को संभालने लगी. पापा के घर छोड़ कर चले जाने से वह अचानक ही अपनी उम्र से कुछ ज्यादा बड़ी हो गई थी. कुछ महीनों में कजरी को ऐसा लगने लगा कि जिंदगी फिर पटरी पर आने लगी है.

एक दिन वह काम पर से वापस आ रही थी कि रास्ते में लखन मिल गया. बातोंबातों में उस ने कजरी से अपने प्यार का इजहार कर दिया. उस के एहसानों तले दबी कजरी उसे एकदम से इनकार न कर सकी. उस ने उस से सोचने के लिए कुछ समय मांगा. रातभर वह इसी ऊहापोह में रही कि अपने ही पति द्वारा वह एक बार ठगी जा चुकी है. क्या फिर से उसे किसी पर इतना विश्वास करना चाहिए? परंतु बिना मर्द के घर पर लोगों की चीलकौवे सी पड़ती निगाहों से बचने के लिए आखिरकार उसे यही रास्ता सब से उपयुक्त लगा.

उस के घर में ही लखन ने कुछ पासपड़ोसियों के सामने उसे मंगलसूत्र पहना कर उस की मांग में सिंदूर भर दिया. अब लखन उस के साथ ही आ कर रहने लगा. बच्चों ने भी कुछ समय बाद आखिर उसे अपना लिया.

शादी को 8 महीने हो चुके थे. पुराने जख्म भरने लगे थे कि अचानक एक दिन सुबहसुबह एक औरत उस के दरवाजे पर आ कर उसे भलाबुरा कहने लगी. पहले तो कजरी समझ ही न पाई कि यह चक्कर क्या है. बाद में उसे समझ आया, तो उस पर फिर से एक बार आसमान टूट पड़ा.

वह औरत लखन की पत्नी थी जो रात ही अपने गांव से आई थी, और लखन व उस के संबंध की जानकारी मिलते ही वह उस से लड़ने चली आई थी. कजरी ने इस बारे में लखन से कई सवाल किए, पर उस की खामोशी देख कर वह समझ गई कि समय ने फिर से उस के साथ बहुत ही गंदा मजाक किया है. लखन ने सिर्फ अपनी वासनापूर्ति की खातिर ही उस से संबंध जोड़ा था.

लखन जा चुका था, कजरी अंदर ही अंदर टूट कर फिर बिखर चुकी थी. पर इस बार वह पहले की तरह एक कमजोर औरत नहीं थी, जो अपनी बेबसी का रोना ले कर बैठे. सो, दूसरे दिन से ही उस ने सुमि पर भाईबहनों की जिम्मेदारी छोड़ कर काम पर जाना शुरू कर दिया.

इधर, पड़ोस में रहने वाला 22 साल का दीनू उस की छोटी बेटी रीना पर गलत निगाह रखता था. रीना 9 साल की एक अबोध बालिका थी, जिसे अकसर वह चौकलेट वगैरह का लालच दे कर अपने पास बुलाने की कोशिश करता था. एक दिन सुमि ने चौकलेट खाती रीना के शरीर पर उस के रेंगते हाथों को देख कर मां को तुरंत बताया था. कजरी ने भी इस वाकए को हलके रूप में न ले कर दीनू के मांबाप से जा कर तुरंत इस की शिकायत की थी. उस के बाद दीनू ने सब के सामने उस से माफी मांगी थी.

कुछ दिनों शांत बैठ कर दीनू फिर से वही काम दोहरा रहा था. कजरी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वह क्या करे. कैसे बुरी नीयत व बुरी निगाह रखने वाले लोगों से अपनी बच्चियों को बचाए. खुद उस की देह भी तो उस के लिए बड़ी दुखदाई बन चुकी थी. मर्दों की पैनी निगाहें उस के शरीर पर यों फिसलती थीं मानो कपड़ों के अंदर तक झांक लेना चाहती हों.

पति की छोड़ी औरत शायद हर मर्द की जागीर हो जाती है. जिस पर हर कोईर् हाथ साफ करना चाहता है. कजरी के अंदर की औरत बहुत अकेली व लाचार हो गई थी. क्या बिना आदमी के औरत का कोई वजूद नहीं है? आखिर औरत को इतना कमजोर क्यों बनाया है? उस की बेचैनी आंसू बन कर उस के गालोें पर ढुलकने लगी. रात को न जाने कब उस की आंख लगी.

सुबह उठी तो सिर भारी हो रहा था.

आंखें भी जल रही थीं. देररात तक जागने से ऐसा हुआ है, यह  सोच कर कजरी ने उठने की कोशिश की परंतु शरीर ने साथ न दिया.सुमि ने मां को सहारा देने के लिए हाथ बढ़ाया, तो चौंक पड़ी, ‘‘आई, तुझे तो तेज बुखार है.’’

‘‘हां रे, मुझ से तो उठा भी नहीं जा रहा,’’ कजरी पर बेहोशी छाती जा रही थी. शायद बारिश में भीगने से उसे बुखार ने जकड़ लिया था.

मां की हालत देख कर सुमि घबरा गई. मां को वैसे ही छोड़ कर वह दौड़ कर पड़ोस से विमला काकी को बुला लाई. विमला काकी के पति औटो चलाते थे. जल्दी से कजरी को अपने औटो में बैठा कर वे उसे पास के अस्पताल ले गए.

कजरी की बिगड़ती हालत देख कर डाक्टर ने उसे वहीं ऐडमिट कर ग्लूकोस की बोतल चढ़ाने की सलाह दी. जब तक वह हौस्पिटल में रही, विमला काकी ने उस की पूरी देखभाल की और हौस्पिटल का बिल भी उन्होंने ही भरा.

कजरी घर पर तो आ गई लेकिन कमजोरी के चलते उस से उठतेबैठते नहीं बन रहा था. कुछ पैसे जो उस ने बचा कर रखे थे, वे घर के खानेखर्च में खत्म हो गए. अभी विमला काकी का उधार पूरा बाकी था.

‘‘आई, आज आटा खत्म हो गया है, तेल भी नहीं बचा. खाना कैसे बनाऊं?’’ सुमि ने एक सुबह कुछ झिझकते हुए मां से कहा. काम पर गए उसे एक हफ्ता हो गया था.

‘‘आज कुछ अच्छा लग रहा है. आज जाती हूं काम पर. उधर से आते वक्त सब किराना लेती आऊंगी. तब तक तुम पास वाली दुकान से दूध और ब्रैड ले आना और चाय बना कर उस के साथ टोस्ट खा लेना,’’ अपने पास बचे 50 रुपए का आखिरी नोट सुमि को पकड़ाते हुए वह बोली.

काम पर जा कर उसे बहुत बड़ा झटका लगा. उस की मालकिन ने बगैर बताए इतने दिनों की छुट्टी करने पर उसे काम से हटा कर दूसरी बाई रख ली थी. उस ने लाख मिन्नतें कर उन्हें समझाने की भरपूर कोशिश की कि उस ने जानबूझ कर छुट्टी नहीं मारी. लेकिन उन का कलेजा न पसीजा. उन्होंने उसे दोबारा काम पर रखने से साफ मना कर दिया.

दुखी मन से कजरी वहां से चल पड़ी कि तभी बाहर से मालिक की गाड़ी आती दिखाई दी. मन में उम्मीद की एक किरन जागी. शायद मालिक को उस की परेशानी समझ दया आ जाए और वे मालकिन को समझा कर उसे फिर काम पर रख लें. कुछ हौसला कर के उस ने पास जा कर मालिक को अपनी मजबूरी की पूरी दास्तां सुना दी. ध्यान से उस की परेशानी सुन कर मालिक ने धीमे स्वर में उसे कुछ समझाया, जिसे सुन कर एक बार फिर उस के होश उड़ गए. तेज कदमों से चलते हुए वह उन के बंगले से बाहर निकल आई. पीछे से मालिक उसे आवाज लगाते रह गए.

मालिक के शब्द अभी भी उस के कानों में गूंज रहे थे, ‘देखो, तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हें भरपूर पैसा दूंगा. बस, बदले में मैं तुम्हें जब बुलाऊं, चली आना.’ छि, उसे अब अपनेआप से भी घिन आने लगी थी. क्या औरत के शरीर में अब यही रह गया है? उस के काम, उस के हुनर की कोई कीमत ही नहीं है? वह मालिक की बात को अनसुनी कर चली तो आई थी, पर पेट की रोटी के लिए जुगाड़ करने का सवाल अब भी अपनी जगह मुंहबाए खड़ा था.

अब कोई रास्ता दिख नहीं रहा था कजरी को. ‘घर में खाने के लिए अन्न का दाना नहीं है,’ कजरी अपनेआप में ही बड़बड़ाती जा रही थी. आसपास के दोचार घरों के गेट खड़का कर उस ने उन से कोई काम देने की गुहार लगाई. एकदो लोगों ने उसे बाद में आने को कहा भी, पर फिलहाल तो उस के पास एक भी पैसा नहीं था. काम पर आते वक्त उस ने यही सोचा था कि मालकिन से कुछ एडवांस मांग लेगी. पर अब तो उस के पास काम भी नहीं था.

‘चल कर कुछ किराना ही उधार ले लेती हूं, बाद में चुका दूंगी,’ सोचते हुए कजरी बाबूलाल की दुकान की तरफ चल दी.

‘‘भैया, कुछ सामान लेना है,’’ कुछ झिझकते हुए उस ने बाबूलाल से कहा.

‘‘पहले पुराना हिसाब चुकता कर दो, 1,250 रुपए हो रहे हैं,’’ बाबूलाल ने उसे गहरी नजरों से देखते हुए कहा.

‘‘हमेशा ही चुका देती हूं, भैया. हां, इस बार जरूर कुछ देर हो गई. पर मैं जल्द ही आप के सारे रुपए चुका दूंगी,’’ कजरी ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा.

‘‘माफ करना, मैं ने यहां कोई धर्मखाता नहीं खोल रखा है, जो मुफ्त में ही सब को जलपान कराता जाऊं,’’ बाबूलाल ने उसे दुत्कारते हुए कहा.

‘‘आज मेरा काम छूट गया है, लेकिन मैं विश्वास दिलाती हूं कि जल्द ही कोई काम ढूंढ़ कर आप की पूरी उधारी चुका दूंगी,’’ कह कर कजरी ने बेबसी से अपने हाथ जोड़ दिए.

‘‘काम तो मैं भी तुम्हें दे सकता हूं, अगर तुम चाहो तो. इस से तुम्हारा आज तक का पूरा उधार चुक जाएगा और ऊपर से कुछ कमाई भी हो जाएगी.’’ बाबूलाल की आंखों से टपकती लार देख कर कजरी सहम गई.

जाने कैसे ये भेडि़ए एक औरत की मजबूरी को सूंघ कर अपना दांव गांठते हैं. कजरी ने गहरी सांस छोड़ी और दुकान के बाहर आ गई.

मोड़ तक आतेआते वह कुछ ठिठक कर खड़ी हो गई. घर जा कर बच्चों को क्या खिलाएगी? बच्चों के भूख से कलपते चेहरे उसे साफ दिखाई पड़ रहे थे. मकान का किराया कहां से आएगा? विमला काकी का पूरा उधार अभी बाकी है. उफ, कैसे होगा यह सब? कजरी के दिल और दिमाग में एक जंग सी छिड़ गई थी. दिल कहता था…यह गलत है जबकि दिमाग कुछ ज्यादा ही व्यावहारिक हो चला था, जो हालफिलहाल की स्थिति से कैसे निबटा जाए, यह सोच रहा था. आखिरकार, एक औरत के सतीत्व पर मां की ममता भारी पड़ गई. कजरी के दुकान में दोबारा प्रवेश करते ही बाबूलाल की आंखों में वासनाजनित चमक आ गई.

कुछ देर बाद ही कजरी दोनों हाथों में सामान लिए घर की तरफ तेजी से बढ़ी चली जा रही थी. सामान्यतया रोज खुला रहने वाला दरवाजा आज भीतर से बंद था. अंदर से आती घुटीघुटी सिसकारी की आवाज ने कजरी को तनिक संशय में डाल दिया. किसी अनिष्ट की आशंका से उस का मन कांप गया. जोरजोर से बच्चों को आवाज लगा कर उस ने दरवाजा पीटना शुरू कर दिया. पर दरवाजा न खुला.

इतने में सुमि और कमल को बाहर से आता देख कजरी चीख पड़ी, ‘‘रीना कहां है सुमि?’’

‘‘अंदर ही होगी, आई. मैं कुछ देर पहले ही ब्रैड और दूध लेने गई थी और यह कमल मेरे पीछे लग लिया. बहुत समझाया, पर माना ही नहीं.’’

तब तक चिल्लाने की आवाज सुन कर आसपड़ोस से कई लोग निकल कर जमा हो गए. तुरंतफुरत ही दरवाजा तोड़ दिया गया. दरवाजा टूटते ही कजरी अंदर घुसी और कमरे के एक कोने में रीना को बेसुध पड़ा देख बदहवास सी हो गई. तभी भीतर से एक साया निकल कर बाहर की तरफ भागा. हां, वह दीनू ही था, जिस ने रीना के अकेले होने का फायदा आज उठा ही लिया था. यह सब इतना अचानक हुआ कि किसी को कुछ समझ ही नहीं आया.

शोरगुल की आवाज से विमला काकी भी आ चुकी थीं. कजरी ने रीना को उठानेहिलाने की बहुत कोशिश की, मगर सब बेकार था. रीना बेजान हो चुकी थी. एक नन्ही कली आज फिर किसी वहशी दरिंदे की बुरी नीयत का शिकार हो चुकी थी. कजरी सामने पड़ी सचाई स्वीकार नहीं कर पा रही थी. अपनी प्यारी गोलू का यह हाल देख कर वह कांप उठी थी. उस की पूरी दुनिया ही जैसे उजड़ गई थी. सुमि लगातार रोए जा रही थी और कमल सहमा हुआ एक तरफ खड़ा हुआ था.

लोगों की आपसी चर्चा चालू थी. कोई पुलिस को बुलाने की बात कर रहा था तो कोई रीना को डाक्टर के पास ले जाने को कह रहा था. कजरी अचानक उठी और पलंग के नीचे से हंसिया निकाल कर बिजली की फुरती से बाहर निकल गई. उधर, दीनू जल्दीजल्दी एक बैग में अपने कुछ कपड़े भर कर घर से निकलने ही वाला था कि कजरी ने उस का रास्ता रोक लिया.

‘‘मुझे माफ कर दो कजरी भाभी, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. पता नहीं मुझे क्या हो गया था. मैं उसे मारना नहीं चाहता था, वह चिल्ला न सके, इसलिए मैं ने उस का मुंह बंद किया. मुझे नहीं…’’ दीनू अपनी सफाई देता रह गया और कजरी ने उस पर हंसिये से प्रहार करना शुरू कर दिया.

‘‘नीच, तू ने मेरी गोलू को क्यों मारा, क्या बिगाड़ा था उस मासूम ने तेरा,’’ कजरी चीखती जा रही थी. तभी पीछे से विमला काकी ने आ कर कुछ लोगों की मदद से उसे रोका.

दीनू घायल हो कर गिर पड़ा था. इलाके की पुलिस ने तुरंत ही दीनू को अस्पताल भेजा. और पूछताछ में लग गई. रीना की मृतदेह एम्बुलेंस में ले जाई जा रही थी. उपस्थित सभी लोगों की आंखें नम थीं. इतनी देर से मूकदर्शक बनी कजरी ने अचानक अट्टहास करना शुरू कर दिया. भीड़ में से किसी ने कहा, ‘वह पागल हो गई है.’ एक विमला काकी ही ऐसी थीं जिन्हें कजरी में एक परित्यक्त मां की बेबसी और हताशा दिखाई दे रही थी, जो अपना सबकुछ दांव पर लगा कर भी अपनी मासूम बच्ची को नहीं बचा पाई.

Extra Marital Affair : शादी को 5 साल होने के बावजूद मुझे एक लड़की से प्यार हो गया है, क्या करूं?

Extra Marital Affair : अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल
मैं 26 साल का हूं. मेरी शादी को 5 साल हो चुके हैं. 2 साल का लड़का भी है. इस बीच मुझे एक गरीब लड़की से प्यार हो गया है. मैं क्या करूं?

जवाब
आप अपने बच्चे व बीवी की अच्छी तरह देखभाल करें और प्यार का खयाल मन से निकाल दें. लड़की से दोस्ती रखना तो ठीक है, पर प्यार का कोई तुक नहीं है. वह गरीब है तो बेशक उस की मदद करें, मगर बगैर लालच के.

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एक दिन का बौयफ्रैंड

‘‘क्या तुम मेरे एक दिन के बौयफ्रैंड बनोगे?’’ उस लड़की के कहे ये शब्द मेरे कानों में गूंज रहे थे. मैं हक्काबक्का सा उस की तरफ देखने लगा. काली, लंबी जुल्फों और मुसकराते चेहरे के बीच चमकती उस की 2 आंखें मेरे दिल को धड़का गईं. एक अजनबी लड़की के मुंह से इस तरह का प्रस्ताव सुन कर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मुझ पर क्या बीत रही होगी.

मैं अच्छे घर का होनहार लड़का हूं. प्यार और शादी को ले कर मेरे विचार बिलकुल स्पष्ट हैं. बहुत पहले एक बार प्यार में पड़ा था पर हमारी लव स्टोरी अधिक दिनों तक नहीं चल सकी. लड़की बेवफा निकली. वह न सिर्फ मुझे, बल्कि दुनिया छोड़ कर गई और मैं अकेला रह गया.

लाख चाह कर भी मैं उसे भुला नहीं सका. सोच लिया था कि अब अरेंज्ड मैरिज करूंगा. घर वाले जिसे पसंद करेंगे, उसे ही अपना जीवनसाथी मान लूंगा.

अगले महीने मेरी सगाई है. लड़की को मैं ने देखा नहीं है पर घर वालों को वह बहुत पसंद आई है. फिलहाल मैं अपने मामा के घर छुट्टियां बिताने आया हूं. मेरे घर पहुंचते ही सगाई की तैयारियां शुरू हो जाएंगी.

‘‘बोलो न, क्या तुम मेरे साथ..,’’ उस ने फिर अपना सवाल दोहराया.

‘‘मैं तो आप को जानता भी नहीं, फिर कैसे…’’ में उलझन में था.

‘‘जानते नहीं तभी तो एक दिन के लिए बना रही हूं, हमेशा के लिए नहीं,’’ लड़की ने अपनी बड़ीबड़ी आंखों को नचाया. ‘‘दरअसल,

2-4 महीनों में मेरी शादी हो जाएगी. मेरे घर

वाले बहुत रूढि़वादी हैं. बौयफ्रैंड तो दूर कभी मुझे किसी लड़के से दोस्ती भी नहीं करने दी. मैं ने अपनी जिंदगी से समझौता कर लिया है. घर

वाले मेरे लिए जिसे ढूंढ़ेंगे उस से आंखें बंद कर शादी कर लूंगी. मगर मेरी सहेलियां कहती हैं कि शादी का मजा तो लव मैरिज में है, किसी को बौयफ्रैंड बना कर जिंदगी ऐंजौय करने में है. मेरी सभी सहेलियों के बौयफ्रैंड हैं. केवल मेरा ही कोई नहीं है.

‘‘यह भी सच है कि मैं बहुत संवेदनशील लड़की हूं. किसी से प्यार करूंगी तो बहुत गहराई से करूंगी. इसी वजह से इन मामलों में फंसने से डर लगता है. मैं जानती हूं कि मैं तुम्हें आजकल की लड़कियों जैसी बिलकुल नहीं लग रही होऊंगी. बट बिलीव मी, ऐसी ही हूं मैं. फिलहाल मुझे यह महसूस करना है कि बौयफ्रैंड के होने से जिंदगी कैसा रुख बदलती है, कैसा लगता है सब कुछ, बस यही देखना है मुझे. क्या तुम इस में मेरी मदद नहीं कर सकते?’’

‘‘ओके, पर कहीं मेरे मन में तुम्हारे लिए फीलिंग्स आ गईं तो?’’

‘‘तो क्या है, वन नाइट स्टैंड की तरह हमें एक दिन के इस अफेयर को भूल जाना है. यह सोच कर ही मेरे साथ आना. बस एक दिन खूब मस्ती करेंगे, घूमेंगेफिरेंगे. बोलो क्या कहते हो? वैसे भी मैं तुम से 5 साल बड़ी हूं. मैं ने तुम्हारे ड्राइविंग लाइसैंस में तुम्हारी उम्र देख ली है. यह लो. रास्ते में तुम से गिर गया था. यही लौटाने आई थी. तुम्हें देखा तो लगा कि तुम एक शरीफ लड़के हो. मेरा गलत फायदा नहीं उठाओगे, इसीलिए यह प्रस्ताव रखा है.’’

मैं मुसकराया. एक अजीब सा उत्साह था मेरे मन में. चेहरे पर मुसकराहट की रेखा गहरी होती गई. मैं इनकार नहीं कर सका. तुरंत हामी भरता हुआ बोला, ‘‘ठीक है, परसों सुबह 8 बजे इसी जगह आ जाना. उस दिन मैं पूरी तरह तुम्हारा बौयफ्रैंड हूं.’’

‘‘ओके थैंक्यू,’’ कह कर मुसकराती हुई वह चली गई.

घर आ कर भी मैं सारा समय उस के बारे में सोचता रहा.

2 दिन बाद तय समय पर उसी जगह पहुंचा तो देखा वह बेसब्री से मेरा इंतजार कर रही थी.

‘‘हाय डियर,’’ कहते हुए वह करीब आ गई.

‘‘हाय,’’ मैं थोड़ा सकुचाया.

मगर उस लड़की ने झट से मेरा हाथ थाम लिया और बोली, ‘‘चलो, अब से तुम मेरे बौयफ्रैंड हुए. कोई हिचकिचाहट नहीं, खुल कर मिलो यार.’’

मैं ने खुद को समझाया, बस एक दिन. फिर कहां मैं, कहां यह. फिर हम 2 अजनबियों ने हमसफर बन कर उस एक दिन के खूबसूरत सफर की शुरुआत की. प्रिया नाम था उस का. मैं गाड़ी ड्राइव कर रहा था और वह मेरी बगल में बैठी थी. उस की जुल्फें हौलेहौले उस के कंधों पर लहरा रही थीं. भीनीभीनी सी उस की खुशबू मुझे आगोश में लेने लगी थी. एक अजीब सा एहसास था, जो मेरे जिस्म को महका रहा था. मैं एक गीत गुनगुनाने लगा. वह एकटक मुझे निहारती हुई बोली, ‘‘तुम तो बहुत अच्छा गाते हो.’’

‘‘हां थोड़ाबहुत गा लेता हूं… जब दिल को कोई अच्छा लगता है तो गीत खुद ब खुद होंठों पर आ जाता है.’’

मैं ने डायलौग मारा तो वह खिलखिला कर हंस पड़ी. दूधिया चांदनी सी छिटक कर उस की हंसी मेरी सांसों को छूने लगी. यह क्या हो रहा है मुझे. मैं मन ही मन सोचने लगा.

तभी उस ने मेरे कंधे पर अपना सिर रख दिया, ‘‘माई प्रिंस चार्मिंग, हम जा कहां रहे हैं?’’

‘‘जहां तुम कहो. वैसे मैं यहां की सब से रोमांटिक जगह जानता हूं, शायद तुम भी जाना चाहोगी,’’ मेरी आवाज में भी शोखी उतर आई थी.

‘‘श्योर, जहां तुम चाहो ले चलो. मैं ने तुम पर शतप्रतिशत विश्वास किया है.’’

‘‘पर इतने विश्वास की वजह?’’

‘‘किसीकिसी की आंखों में लिखा होता है कि वह शतप्रतिशत विश्वास के योग्य है. तभी तो पूरी दुनिया में एक तुम्हें ही चुना मैं ने अपना बौयफ्रैंड बनाने को.’’

‘‘देखो तुम मुझ से इमोशनली जुड़ने की कोशिश मत करो. बाद में दर्द होगा.’’

‘‘किसे? तुम्हें या मुझे?’’

‘‘शायद दोनों को.’’

‘‘नहीं, मैं प्रैक्टिकल हूं. मैं बस 1 दिन के लिए ही तुम से जुड़ रही हूं, क्योंकि मैं जानती हूं हमारे रिश्ते को सिर्फ इतने समय की ही मंजूरी मिली है.’’

‘‘हां, वह तो है. मैं अपने घर वालों के खिलाफ नहीं जा सकता.’’

‘‘अरे यार, खिलाफ जाने को किस ने कहा? मैं तो खुद पापा के वचन में बंधी हूं. उन के दोस्त के बेटे से शादी करने वाली हूं. 6-7 महीनों में वह इंडिया आ जाएगा और फिर चट मंगनी पट विवाह. हो सकता है मैं हमेशा के लिए पैरिस चली जाऊं,’’ उस ने सहजता से कहा.

‘‘तो क्या तुम भी ‘कुछकुछ होता है’ मूवी की सिमरन की तरह किसी अजनबी से शादी करने वाली हो, जिसे तुम ने कभी देखा भी नहीं है?’’ कहते हुए मैं ने उस की आंखों में झांका. वह हंसती हुई बोली, ‘‘हां, ऐसा ही कुछ है. पर चिंता न करो. मैं तुम्हें शाहरुख यानी राज की तरह अपनी जिंदगी में नहीं आने दूंगी. शादी तो मैं उसी से करूंगी जिस से पापा चाहते हैं.’’

‘‘तो फिर यह सब क्यों? मेरे इमोशंस के साथ क्यों खेल रही हो?’’

‘‘अरे यार, मैं कहां खेल रही हूं? फर्स्ट मीटिंग में ही मैं ने साफ कह दिया था कि हम केवल 1 दिन के रिश्ते में हैं.’’

‘‘हां वह तो है. ओके बाबा, आई ऐम सौरी. चलो आ गई हमारी मंजिल.’’

‘‘वैरी नाइस. बहुत सुंदर व्यू है,’’ कहते हुए उस के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई.

थोड़ा घूमने के बाद वह मेरे पास आती हुई बोली, ‘‘लो अब मुझे अपनी बांहों में भरो जैसे फिल्मों में करते हैं.’’

वह मेरे और करीब आ गई. उस की जुल्फें मेरे कंधों पर लहराने लगीं. लग रहा था जैसे मेरी पुरानी गर्लफ्रैंड बिंदु ही मेरे पास खड़ी है. अजीब सा आकर्षण महसूस होने लगा. मैं अलग हो गया, ‘‘नहीं, यह नहीं होगा मुझ से. किसी गैर लड़की को मैं करीब क्यों आने दूं?’’

‘‘क्यों, तुम्हें डर लग रहा है कि मैं यह वीडियो बना कर वायरल न कर दूं?’’ वह शरारत से खिलखिलाई. मैं ने मुंह बनाया, ‘‘बना लो. मुझे क्या करना है? वैसे भी मैं लड़का हूं. मेरी इज्जत थोड़े ही जा रही है.’’

‘‘वही तो मैं तुम्हें समझा रही हूं. तुम्हें क्या फर्क पड़ता है, तुम तो लड़के हो,’’ वह फिर से मुसकराई, ‘‘वैसे तुम आजकल के लड़कों जैसे बिलकुल नहीं.’’

‘‘आजकल के लड़कों से क्या मतलब है? सब एकजैसे नहीं होते.’’

‘‘वही तो बात है. इसीलिए तो तुम्हें चुना है मैं ने, क्योंकि मुझे पता था तुम मेरा गलत फायदा नहीं उठाओगे वरना किसी और लड़के को ऐसा मौका मिलता तो उसे लगता जैसे लौटरी लग गई हो.’’

‘‘तुम मेरे बारे में इतनी श्योर कैसे हो कि वाकई मैं शरीफ ही हूं? तुम कैसे जानती हो कि मैं कैसा हूं और कैसा नहीं हूं?’’

‘‘तुम्हारी आंखों ने सब बता दिया मेरी जान, शराफत आंखों पर लिखी होती है. तुम नहीं जानते?’’

इस लड़की की बातें पलपल मेरे दिल को धड़काने लगी थीं. बहुत अलग सी थी वह. काफी देर तक हम इधरउधर घूमते रहे. बातें करते रहे.

एक बार फिर वह मेरे करीब आती हुई बोली, ‘‘अपनी गर्लफ्रैंड को हग भी नहीं करोगे?’’ वह मेरे सीने से लग गई. लगा जैसे वह पल वहीं ठहर गया हो. कुछ देर तक हम ऐसे ही खड़े रहे. मेरी बढ़ी हुई धड़कनें शायद वह भी महसूस कर रही थी. मैं ने भी उसे आगोश में ले लिया. उस पल को ऐसा लगा जैसे आकाश और धरती एकदूसरे से मिल गए हों. कुछ पल बाद उस ने खुद को अलग किया और दूर जा कर खड़ी हो गई.

‘‘बस, कुछ और हुआ तो हमारे कदम बहक जाएंगे. चलो वापस चलते हैं,’’ वह बोली. मैं अपनेआप को संभालता हुआ बिना कुछ कहे उस के पीछेपीछे चलने लगा. मेरी सांसें रुक रही थीं. गला सूख रहा था. गाड़ी में बैठ कर मैं ने पानी की पूरी बोतल खाली कर दी.

सहसा वह हंस पड़ी, ‘‘जनाब, ऐसा लग रहा था जैसे शराब की बोतल एक बार में ही हलक के नीचे उतार रहे हो.’’

उस के बोलने का अंदाज कुछ ऐसा था कि मुझे हंसी आ गई. ‘‘सच, बहुत अच्छी हो तुम. मुझे डर है कहीं तुम से प्यार न हो जाए,’’ मैं ने कहा.

‘‘छोड़ो भी यार. मैं बड़ी हूं तुम से, इस तरह की बातें सोचना भी मत.’’

‘‘मगर मैं क्या करूं? मेरा दिल कुछ और कह रहा है और दिमाग कुछ और.’’

‘‘चलता है. तुम बस आज की सोचो और यह बताओ कि हम लंच कहां करने वाले हैं?’’

‘‘एक बेहतरीन जगह है मेरे दिमाग में. बिंदु के साथ आया था एक बार. चलो वहीं चलते हैं,’’ मैं ने वृंदावन रैस्टोरैंट की तरफ गाड़ी मोड़ते हुए कहा, ‘‘घर के खाने जैसा बढि़या स्वाद होता है यहां के खाने का और अरेंजमैंट देखो तो लगेगा ही नहीं कि रैस्टोरैंट आए हैं. गार्डन में बेंत की टेबलकुरसियां रखी हुई हैं.’’

रैस्टोरैंट पहुंच कर उत्साहित होती हुई प्रिया बोली, ‘‘सच कह रहे थे तुम. वाकई लग रहा है जैसे पार्क में बैठ कर खाना खाने वाले हैं हम… हर तरफ ग्रीनरी. सो नाइस. सजावटी पौधों के बीच बेंत की बनी डिजाइनर टेबलकुरसियों पर स्वादिष्ठ खाना, मन को बहुत सुकून देता होगा.

है न?’’

मैं खामोशी से उस का चेहरा निहारता रहा. लंच के बाद हम 2-1 जगह और गए. जी भर कर मस्ती की. अब तक हम दोनों एकदूसरे से खुल गए थे. बातें करने में भी मजा आ रहा था. दोनों ने ही एकदूसरे की कंपनी बहुत ऐंजौय की थी, एकदूसरे की पसंदनापसंद, घरपरिवार, स्कूलकालेज की कितनी ही बातें हुईं.

थोड़ीबहुत प्यार भरी बातें भी हुईं. धीरेधीरे शाम हो गई और उस के जाने का समय आ गया. मुझे लगा जैसे मेरी रूह मुझ से जुदा हो रही है, हमेशा के लिए.

‘‘कैसे रह पाऊंगा मैं तुम से मिले बिना? नहीं प्रिया, तुम्हें अपना नंबर देना होगा मुझे,’’ मैं ने व्यथित स्वर में कहा.

‘‘आर यू सीरियस?’’

‘‘यस आई ऐम सीरियस,’’ मैं ने उस का हाथ पकड़ लिया, ‘‘मुझे नहीं लगता कि अब मैं तुम्हें भूल सकूंगा. नो प्रिया, आई थिंक आई लाइक यू वैरी मच.’’

‘‘वह डील न भूलो मयंक,’’ प्रिया ने याद दिलाया.

‘‘मगर दोस्त बन कर तो रह सकते हैं न?’’

‘‘नो, मैं कमजोर पड़ गई तो? यह रिस्क मैं नहीं उठा सकती.’’

‘‘तो ठीक है. आई विल मैरी यू,’’ मैं ने जल्दी से कहा. उस से जुदा होने के खयाल से ही मेरी आंखें भर आई थीं. एक दिन में ही जाने कैसा बंधन जोड़ लिया था उस ने कि दिल कर रहा था हमेशा के लिए वह मेरी जिंदगी में आ जाए.

वह मुझ से दूर जाती हुई बोली, ‘‘गुडबाय मयंक, मैं शादी वहीं करूंगी जहां पापा चाहते हैं. तुम्हारा कोई चांस नहीं. भूल जाना मुझे.’’ वह चली गई और मैं पत्थर की मूर्त बना उसे जाते देखता रहा. दिल भर आया था मेरा. ड्राइविंग सीट पर अकेला बैठा अचानक फफकफफक कर रो पड़ा. लगा जैसे एक बार फिर से बिंदु मुझे अकेला छोड़ कर चली गई है. जाना ही था तो फिर जरूरत क्या थी मेरी जिंदगी में आने की. किसी तरह खुद को संभालता हुआ घर लौटा. दिन का चैन, रात की नींद सब लुट चुकी थी. जाने कहां से आई थी वह और कहां चली गई थी? पर एक दिन में मेरी दुनिया पूरी तरह बदल गई थी. देवदास बन गया था मैं. इधर घर वाले मेरी सगाई की तैयारियों में लगे थे. वे मुझे उस लड़की से मिलवाने ले जाना चाहते थे, जिसे उन्होंने पसंद किया था. पर मैं ने साफ इनकार कर दिया.

‘‘मैं शादी नहीं करूंगा,’’ मेरा इतना कहना था कि घर में कुहराम मच गया.

‘‘क्यों, कोई और पसंद आ गई?’’ मां ने अलग ले जा कर पूछा.

‘‘हां.’’ मैं ने सीधा जवाब दिया.

‘‘तो ठीक है, उसी से बात करते हैं. पता और फोन नंबर दो.’’

‘‘मेरे पास कुछ नहीं है.’’

‘‘कुछ नहीं, यह कैसा प्यार है?’’ मां ने कहा.

‘‘क्या पता मां, वह क्या चाहती थी? अपना दीवाना बना लिया और अपना कोई अतापता भी नहीं दिया.’’

फिर मैं ने उन्हें सारी कहानी सुनाई तो वे खामोश रह गईं. 6 माह बीत गए. आखिर घर वालों की जिद के आगे मुझे झुकना पड़ा. लड़की वाले हमारे घर आए. मुझे जबरन लड़की के पास भेजा गया. उस कमरे में कोई और नहीं था. लड़की दूसरी तरफ चेहरा किए बैठी थी. मैं बहुत अजीब महसूस कर रहा था.

लड़की की तरफ देखे बगैर मैं ने कहना शुरू किया, ‘‘मैं आप को किसी भ्रम में नहीं रखना चाहता. दरअसल मैं किसी और से प्यार करने लगा हूं और अब उस के अलावा किसी से शादी का खयाल भी मुझे रास नहीं आ रहा. आई एम सौरी. आप इस रिश्ते के लिए न कह दीजिए.’’

‘‘सच में न कह दूं?’’ लड़की के स्वर मेरे कानों से टकराए तो मैं हैरान रह गया. यह तो प्रिया के स्वर थे. मैं ने लड़की की तरफ देखा तो दिल खुशी से झूम उठा. यह वाकई प्रिया ही थी.

‘‘तुम?’’

‘‘हां मैं, कोई शक?’’ वह मुसकराई.

‘‘पर वह सब क्या था प्रिया?’’

‘‘दरअसल, मैं अरेंज्ड नहीं, लव मैरिज करना चाहती थी. अत: पहले तुम से प्यार का इजहार कराया, फिर इस शादी के लिए रजामंदी दी. बताओ कैसा लगा मेरा सरप्राइज.’’

‘‘बहुत खूबसूरत,’’ मैं ने पल भर भी देर नहीं की कहने में और फिर उसे बांहों में भर लिया.

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Jasleen Royal : भारत की प्रमुख पौप आइकन, जसलीन रायल ने भारत में कोल्डप्ले के समीक्षकों द्वारा प्रशंसित म्यूजिक औफ द स्फीयर्स वर्ल्ड टूर की शुरुआत करने वाली एकमात्र भारतीय अभिनेत्री के रूप में मंच संभाला,उन्होंने एक ऐसा परफौरमेंस दिया जो पावरफुल, सोलफुल और मैजिकल था! उन्होंने अपने ड्रीमी वोकल्स और बेजोड़ करिश्मे से भरे परफौरमेंस के साथ स्टेज की कमान संभाली. इसके अलावा, जसलीन रायल और क्रिस मार्टिन ने “वी प्रे” की प्रेजेंटेशन के लिए स्टेज शेयर किया, जिसमें पूरा स्टेडियम उनके साथ गा रहा था.

हर ट्युन पर चीयर 

जसलीन कि एंट्री मैग्नेटिक थी, जिसने अपनी सोलफुल वौइस्, एनर्जी और अपने स्टार्टिंग सांग-लव यू जिंदगी से, भीड़ को आकर्षित किया। उनका प्रेजेंटेशन केवल एक म्यूजिकल परफौरमेंस नहीं था -यह एक इमोशनल जर्नी थी जिसमें फैंस हर ट्युन पर गाते और चीयर करते थे. जसलीन के सेट में साहिबा, खो गए हम कहा, हीरिये, रांझा और कई अन्य चार्ट-टौपिंग हिट शामिल थे.

एक ट्रू पौप आइकन

कोल्डप्ले के प्रतिष्ठित म्यूजिक औफ द स्फीयर्स वर्ल्ड टूर में अपने परफौरमेंस के माध्यम से, जसलीन रायल ने एक ट्रू पौप आइकन होने का सार वापस लाया है. जसलीन की स्टेज पर उपस्थिति ने कौन्फिडेंस पैदा किया और जो उनके अपने फैंस और औडीयंस के साथ उनके जुड़ाव का एक प्रमाण था.

इंडियन पौप को किया डिफाइंड 

लुधियाना से एक लड़की के रूप में भारतीय पौप को फिर से परिभाषित करने वाले एक सेल्फ मेड आर्टिस्ट के रूप में जसलीन की जर्नी , और उनके विश्व स्तर पर प्रशंसित (globally acclaimed) म्यूजिक औफ द स्फीयर्स वर्ल्ड टूर के लिए कोल्डप्ले के लिए शुरुआत करने वाली पहली भारतीय पौप आइकन बनना असाधारण से कम नहीं है. अपने फैंस के साथ एक प्रामाणिक और संबंधित संबंध बनाए रखते हुए भारतीय पौप को फिर से परिभाषित करने की उनकी क्षमता ने उन्हें वैश्विक मंच पर एक ताकत के रूप में स्थापित किया है कल रात उनके प्रदर्शन ने संगीत उद्योग में एक गेमचेंजर के रूप में उनकी स्थिति को और मजबूत कर दिया.

करियर में न्यू चैप्टर

यह परफौरमेंस जसलीन के पहले से ही शानदार करियर में एक नया अध्याय है. म्यूजिक के प्रति उनके इनोवेटिव, ओरिजिनल एप्रोच और लिमिट्स को आगे बढ़ाने की उनकी क्षमता ने फैंस से उनका प्यार जीता है जो सीमाओं को पार करते हैं और उनके लिए दरवाजे खोलते हैं जो भारतीय पॉप म्यूजिक को नई ऊंचाइयों पर ले जाते हैं।

उनकी जर्नी अनगिनत फैंस को प्रेरित करती

जैसे ही भीड़ उनके समापन टिप्पणियों के दौरान जयकारों और तालियों से झूम उठी इससे एक बात स्थापित हो गई कि जसलीन रौयल सिर्फ एक कलाकार नहीं है; वह एक घटना है! उनकी जर्नी अनगिनत फैंस को प्रेरित करती है, और कोल्डप्ले के विश्व स्तर पर प्रशंसित म्यूजिक ऑफ द स्फेयर्स टूर में उनके प्रदर्शन को निस्संदेह सभी उपस्थित लोगों द्वारा याद किया जाएगा. 19 और 21 जनवरी को मुंबई में और 25 और 26 जनवरी को अहमदाबाद में उनके प्रदर्शन के लिए बने रहें.

भाग्यलक्ष्मी से लेकर परिणीति तक, Ekta Kapoor के ये सीरियल हो सकते हैं बंद

Ekta Kapoor :  छोटे पर्दे पर एक छत्र राज करने वाली, ओटीटी पर लौकअप और कई सारी हिट फिल्में बतौर निर्माता देने वाली एकता कपूर के लिए 2024 कुछ खास अच्छा नहीं रहा और उनकी करीना कपूर अभिनीत फिल्म बकिंगघम मर्डर, विक्की विद्या का वह वाला वीडियो, क्रू ,जैसी कई फिल्में फ्लौप रही वही कोई भी सीरियल ऐसा नहीं रहा जिसको टीआरपी के मामले में रिकौर्ड तोड़ सफलता मिली हो, अब खबर है 2025 भी उनके लिए थोड़ा भारी पड़ने वाला है.

क्योंकि एकता कपूर के तीन शोज बंद होने की अर्थात औफ एयर होने की खबर है. जिसमें से एक है भाग्यलक्ष्मी जो की कुंडली भाग्य का आगे वाला भाग था. इस शो की शुरुआत तो अच्छी हुई थी लेकिन बाद में इस सीरियल की कहानी कोई खास पकड़ नहीं रख पाई. इसी वजह से शो की टीआरपी लगातार नीचे जाने की वजह से मार्च के महीने में भाग्यलक्ष्मी के औफ एयर होने की खबर है.

उसके बाद दूसरा सीरियल परिणीति है जो काफी समय से चल रहा है और जिसकी कहानी जबरदस्ती में खींची जा रही है और क्योंकि अब इस सीरियल में दम नहीं रहा इसलिए ये शो भी जल्द ही बंद होने जा रहा है. तीसरा सीरियल कुमकुम भाग्य है जो कि साल की शुरुआत में ही बंद होने वाला था लेकिन बावजूद इसके इस शो को भी जबरदस्ती खींचा जा रहा था, यह शो भी फरवरी में बंद हो रहा है. ऐसे में कह सकते हैं कि 2025 की शुरुआत एकता कपूर के लिए कुछ खास नहीं रही है.

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