अधूरा सा दिल: आखिर कैसा हो गया था करुणा का मिजाज?

‘‘आप को ऐक्साइटमैंट नहीं हो रही है क्या, मम्मा? मुझे तो आजकल नींद नहीं आ रही है, आय एम सो सुपर ऐक्साइटेड,’’ आरुषि बेहद उत्साहित थी. करुणा के मन में भी हलचल थी. हां, हलचल ही सही शब्द है इस भावना हेतु, उत्साह नहीं. एक धुकुरपुकुर सी लगी थी उस के भीतर. एक साधारण मध्यवर्गीय गृहिणी, जिस ने सारी उम्र पति की एक आमदनी में अपनी गृहस्थी को सुचारु रूप से चलाने में गुजार दी हो, आज सपरिवार विदेशयात्रा पर जा रही थी.

पिछले 8 महीनों से बेटा आरव विदेश में पढ़ रहा था. जीमैट में अच्छे स्कोर लाने के फलस्वरूप उस का दाखिला स्विट्जरलैंड के ग्लायन इंस्टिट्यूट औफ हायर एजुकेशन में हो गया था. शुरू से ही आरव की इच्छा थी कि वह एक रैस्तरां खोले. स्वादिष्ठ और नएनए तरह के व्यंजन खाने का शौक सभी को होता है, आरव को तो खाना बनाने में भी आनंद आता था.

आरव जब पढ़ाई कर थक जाता और कुछ देर का ब्रेक लेता, तब रसोई में अपनी मां का हाथ बंटाने लगता, कहता, ‘खाना बनाना मेरे लिए स्ट्रैसबस्टर है, मम्मा.’ फिर आगे की योजना बनाने लगता, ‘आजकल स्टार्टअप का जमाना है. मैं अपना रैस्तरां खोलूंगा.’

ग्लायन एक ऐसा शिक्षा संस्थान है जो होटल मैनेजमैंट में एमबीए तथा एमएससी की दोहरी डिगरी देता है. साथ ही, दूसरे वर्ष में इंटर्नशिप या नौकरी दिलवा देता है. जीमैट के परिणाम आने के बाद पूरे परिवार को होटल मैनेजमैंट की अच्छी शिक्षा के लिए संस्थानों में ग्लायन ही सब से अच्छा लगा और आरव चला गया था दूर देश अपने भविष्यनिर्माण की नींव रखने.

अगले वर्ष आरव अपनी इंटर्नशिप में व्यस्त होने वाला था. सो, उस ने जिद कर पूरे परिवार से कहा कि एक बार सब आ कर यहां घूम जाओ, यह एक अलग ही दुनिया है. यहां का विकास देख आप लोग हैरान हो जाओगे. उस के कथन ने आरुषि को कुछ ज्यादा ही उत्साहित कर दिया था.

रात को भोजन करने के बाद चहलकदमी करने निकले करुणा और विरेश इसी विषय पर बात करने लगे, ‘‘ठीक कह रहा है आरव, मौका मिल रहा है तो घूम आते हैं सभी.’’

‘‘पर इतना खर्च? आप अकेले कमाने वाले, उस पर अभी आरव की पढ़ाई, आरुषि की पढ़ाई और फिर शादियां…’’ करुणा जोड़गुना कर रही थी.

‘‘रहने का इंतजाम आरव के कमरे में हो जाएगा और फिर अधिक दिनों के लिए नहीं जाएंगे. आनाजाना समेत एक हफ्ते का ट्रिप बना लेते हैं. तुम चिंता मत करो, सब हो जाएगा,’’ विरेश ने कहा.

आज सब स्विट्जरलैंड के लिए रवाना होने वाले थे. कम करतेकरते भी बहुत सारा सामान हो गया था. क्या करते, वहां गरम कपड़े पूरे चाहिए, दवा बिना डाक्टर के परचे के वहां खरीदना आसान नहीं. सो, वह रखना भी जरूरी है. फिर बेटे के लिए कुछ न कुछ बना कर ले जाने का मन है. जो भी ले जाने की इजाजत है, वही सब रखा था ताकि एयरपोर्ट पर कोई टोकाटाकी न हो और वे बिना किसी अड़चन के पहुंच जाएं.

हवाईजहाज में खिड़की वाली सीट आरुषि ने लपक ली. उस के पास वाली सीट पर बैठी करुणा अफगानिस्तान के सुदूर फैले रेतीले पहाड़मैदान देखती रही. कभी बादलों का झुरमुट आ जाता तो लगता रुई में से गुजर रहे हैं, कभी धरती के आखिर तक फैले विशाल समुद्र को देख उसे लगता, हां, वाकईर् पृथ्वी गोल है. विरेश अकसर झपकी ले रहे थे, किंतु आरुषि सीट के सामने लगी स्क्रीन पर पिक्चर देखने में मगन थी. घंटों का सफर तय कर आखिर वो अपनी मंजिल पर पहुंच गए. ग्रीन चैनल से पार होते हुए वे अपने बेटे से मिले जो उन के इंतजार में बाहर खड़ा था. पूरे 8 महीनों बाद पूरा परिवार इकट्ठा हुआ था.

आरव का इंस्टिट्यूट कैंपस देख मन खुश हो गया. ग्लायन नामक गांव के बीच में इंस्टिट्यूट की शानदार इमारत पहाड़ की चोटी पर खड़ी थी. पहाड़ के नीचे बसा था मोंट्रियू शहर जहां सैलानी सालभर कुदरती छटा बटोरने आते रहते हैं. सच, यहां कुदरत की अदा जितनी मनमोहक थी, मौसम उतना ही सुहावना. वहीं फैली थी जिनीवा झील. उस का गहरा नीला पानी शांत बह रहा था. झील के उस पार स्विस तथा फ्रांसीसी एल्प्स के पहाड़ खड़े थे. घनी, हरी चादर ओढ़े ये पहाड़, बादलों के फीते अपनी चोटियों में बांधे हुए थे. इतना खूबसूरत नजारा देख मन एकबारगी धक सा कर गया.

हलकी धूप भी खिली हुई थी पर फिर भी विरेश, करुणा और आरुषि को ठंड लग रही थी. हालांकि यहां के निवासियों के लिए अभी पूरी सर्दी शुरू होने को थी. ‘‘आप को यहां ठंड लगेगी, दिन में 4-5 और रात में 5 डिगरी तक पारा जाने लगा है,’’ आरव ने बताया. फिर वह सब को कुछ खिलाने के लिए कैफेटेरिया ले गया. फ्रैश नाम के कैफेटेरिया में लंबी व सफेद मेजों पर बड़बड़े हरे व लाल कृत्रिम सेबों से सजावट की हुई थी. भोजन कर सब कमरे में आ गए. ‘‘वाह भैया, स्विट्जरलैंड की हौट चौकलेट खा व पेय पी कर मजा आ गया,’’ आरुषि चहक कर कहने लगी.

अगली सुबह सब घूमने निकल गए. आज कुछ समय मोंट्रियू में बिताया. साफसुथरीचौड़ी सड़कें, न गाडि़यों की भीड़ और न पोंपों का शोर. सड़क के दोनों ओर मकानों व होटलों की एकसार लाइन. कहीं छोटे फौआरे तो कहीं खूबसूरत नक्काशी किए हुए मकान, जगहजगह फोटो ख्ंिचवाते सब स्टेशन पहुंच गए.

‘‘स्विट्जरलैंड आए हो तो ट्रेन में बैठना तो बनता ही है,’’ हंसते हुए आरव सब को ट्रेन में इंटरलाकेन शहर ले जा रहा था. स्टेशन पहुंचते ही आरुषि पोज देने लगी, ‘‘भैया, वो ‘दिलवाले दुलहनिया ले जाएंगे’ वाले टे्रन पोज में मेरी फोटो खींचो न.’’ ट्रेन के अंदर प्रवेश करने पर दरवाजे खुद ही बंद हो गए. अंदर बहुत सफाई थी, आरामदेह कुशनदार सीटें थीं, किंतु यात्री एक भी न था. केवल यही परिवार पूरे कोच में बैठा था. कारण पूछने पर आरव ने बताया, ‘‘यही तो इन विकसित देशों की बात है. पूरा विकास है, किंतु भोगने के लिए लोग कम हैं.’’

रास्तेभर सब यूरोप की अनोखी वादियों के नजारे देखते आए. एकसार कटी हरी घास पूरे दिमाग में ताजा रंग भर रही थी. वादियों में दूरदूर बसा एकएक  घर, और हर घर तक पहुंचती सड़क. अकसर घरों के बाहर लकडि़यों के मोटेमोटे लट्ठों का अंबार लगा था और घर वालों की आवाजाही के लिए ट्रकनुमा गाडि़यां खड़ी थीं. ऊंचेऊंचे पहाड़ों पर गायबकरियां और भेड़ें हरीघास चर रही थीं.

यहां की गाय और भेंड़ों की सेहत देखते ही बनती है. दूर से ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी ने पूरे पहाड़ पर सफेद रंग के गुब्बारे बिखरा दिए हों, पर पास आने पर मालूम होता है कि ये भेंड़ें हैं जो घास चरने में मगन हैं. रास्ते में कई सुरंगें भी आईं. उन की लंबाई देख सभी हैरान रह गए. कुछ सुरंगें तो 11 किलोमीटर तक लंबी थीं.

ढाई घंटे का रेलसफर तय कर सब इंटरलाकेन पहुंचे. स्टेशन पर उतरते ही देखा कि मुख्य चौक के एक बड़े चबूतरे पर स्विस झंडे के साथ भारतीय झंडा भी लहरा रहा है. सभी के चेहरे राष्ट्रप्रेम से खिल उठे. सड़क पर आगे बढ़े तो आरव ने बताया कि यहां पार्क में बौलीवुड के एक फिल्म निर्मातानिर्देशक यश चोपड़ा की एक मूर्ति है. यश चोपड़ा को यहां का ब्रैंड ऐंबैसेडर बनाया गया था. उन्होंने यहां कई फिल्मों की शूटिंग की जिस से यहां के पर्यटन को काफी फायदा हुआ.

सड़क पर खुलेआम सैक्स शौप्स भी थीं. दुकानों के बाहर नग्न बालाओं की तसवीरें लगी थीं. परिवार साथ होने के कारण किसी ने भी उन की ओर सीधी नजर नहीं डाली, मगर तिरछी नजरों से सभी ने उस तरफ देखा. अंदर क्या था, इस का केवल अंदाजा ही लगाया जा सकता है. दोनों संस्कृतियों में कितना फर्क है. भारतीय संस्कृति में तो खुल कर सैक्स की बात भी नहीं कर सकते, जबकि वहां खुलेआम सैक्स शौप्स मौजूद हैं.

दोपहर में सब ने हूटर्स पब में खाना खाने का कार्यक्रम बनाया. यह पब अपनी सुंदर वेट्रैस और उन के आकर्षक नारंगी परिधानों के लिए विश्वप्रसिद्ध है. सब ने अपनीअपनी पसंद बता दी किंतु करुणा कहने लगी, ‘‘मैं ने तो नाश्ता ही इतना भरपेट किया था कि खास भूख नहीं है.’’

अगले दिन सभी गृंडेलवाल्ड शहर को निकल गए. ऐल्प्स पर्वतों की बर्फीली चोटियों में बसा, कहीं पिघली बर्फ के पानी से बनी नीली पारदर्शी झीलें तो कहीं ऊंचे ऐल्पाइन के पेड़ों से ढके पहाड़ों का मनोरम दृश्य, स्विट्जरलैंड वाकई यूरोप का अनोखा देश है.

गृंडेलवाल्ड एक बेहद शांत शहर है. सड़क के दोनों ओर दुकानें, दुकानों में सुसज्जित चमड़े की भारीभरकम जैकेट, दस्ताने, मफलर व कैप आदि. एक दुकान में तो भालू का संरक्षित शव खड़ा था. शहर में कई स्थानों पर गाय की मूर्तियां लगी हैं. सभी ने जगहजगह फोटो खिंचवाईं. फिर एक छोटे से मैदान में स्कीइंग करते पितापुत्र की मूर्ति देखी. उस के नीचे लिखा था, ‘गृंडेलवाल्ड को सर्दियों के खेल की विश्व की राजधानी कहा जाता है.’

भारत लौटने से एक दिन पहले आरव ने कोऔपरेटिव डिपार्टमैंटल स्टोर ले जा कर सभी को शौपिंग करवाई. आरुषि ने अपने और अपने मित्रों के लिए काफी सामान खरीद लिया, मसलन अपने लिए मेकअप किट व स्कार्फ, दोस्तों के लिए चौकलेट, आदि. विरेश ने अपने लिए कुछ टीशर्ट्स और दफ्तर में बांटने के लिए यहां के खास टी बिस्कुट, मफिन आदि ले लिए. करुणा ने केवल गृहस्थी में काम आने वाली चीजें लीं, जैसे आरुषि को पसंद आने वाला हौट चौकलेट पाउडर का पैकेट, यहां की प्रसिद्ध चीज का डब्बा, बढि़या क्वालिटी का मेवा, घर में आनेजाने वालों के लिए चौकलेट के पैकेट इत्यादि.

‘‘तुम ने अपने लिए तो कुछ लिया ही नहीं, लिपस्टिक या ब्लश ले लो या फिर कोई परफ्यूम,’’ विरेश के कहने पर करुणा कहने लगी, ‘‘मेरे पास सबकुछ है. अब केवल नाम के लिए क्या लूं?’’

शौपिंग में जितना मजा आता है, उतनी थकावट भी होती है. सो, सब एक कैफे की ओर चल दिए. इस बार यहां के पिज्जा खाने का प्रोग्राम था. आरव और आरुषि ने अपनी पसंद के पिज्जा और्डर कर दिए. करुणा की फिर वही घिसीपिटी प्रतिक्रिया थी कि मुझे कुछ नहीं चाहिए. शायद उसे यह आभास था कि उस की छोटीछोटी बचतों से उस की गृहस्थी थोड़ी और मजबूत हो पाएगी.

अकसर गृहिणियों को अपनी इच्छा की कटौती कर के लगता है कि उन्होंने भी बिना कमाए अपनी गृहस्थी में योगदान दिया. करुणा भी इसी मानसिकता में उलझी अकसर अपनी फरमाइशों का गला घोंटती आई थी. परंतु इस बार उस की यह बात विरेश को अखर गई. आखिर सब छुट्टी मनाने आए थे, सभी अपनी इच्छापूर्ति करने में लगे थे, तो ऐसे में केवल करुणा खुद की लगाम क्यों खींच रही है?

‘‘करुणा, हम यहां इतनी दूर जिंदगी में पहली बार सपरिवार विदेश छुट्टी मनाने आए हैं. जैसे हम सब के लिए यह एक यादगार अनुभव होगा वैसे ही तुम्हारे लिए भी होना चाहिए. मैं समझता हूं कि तुम अपनी छोटीछोटी कटौतियों से हमारी गृहस्थी का खर्च कुछ कम करना चाहती हो. पर प्लीज, ऐसा त्याग मत करो. मैं चाहता हूं कि तुम्हारी जिंदगी भी उतनी ही खुशहाल, उतनी ही आनंदमयी हो जितनी हम सब की है. हमारी गृहस्थी को केवल तुम्हारे ही त्याग की जरूरत नहीं है. अकसर अपनी इच्छाओं का गला रेतती औरतें मिजाज में कड़वी हो जाती हैं. मेरी तमन्ना है कि तुम पूरे दिल से जिंदगी को जियो. मुझे एक खुशमिजाज पत्नी चाहिए, न कि चिकचिक करती बीवी,’’ विरेश की ये बातें सीधे करुणा के दिल में दर्ज हो गईं.

‘‘ठीक ही तो कह रहे हैं,’’ अनचाहे ही उस के दिमाग में अपने परिवार की वृद्धाओं की यादें घूमने लगीं. सच, कटौती ने उन्हें चिड़चिड़ा बना छोड़ा था. फिर जब संतानें पैसों को अपनी इच्छापूर्ति में लगातीं तब वे कसमसा उठतीं

उन का जोड़ा हुआ पाईपाई पैसा ये फुजूलखर्ची में उड़ा रहे हैं. उस पर ज्यादती तो तब होती जब आगे वाली पीढि़यां पलट कर जवाब देतीं कि किस ने कहा था कटौती करने के लिए.

जिस काम में पूरा परिवार खुश हो रहा है, उस में बचत का पैबंद लगाना कहां उचित है? आज विरेश ने करुणा के दिल से कटौती और बेवजह के त्याग का भारी पत्थर सरका फेंका था.

लौटते समय भारतीय एयरपोर्ट पहुंच कर करुणा ने हौले से विरेश के कान में कहा, ‘‘सोच रही हूं ड्यूटीफ्री से एक पश्मीना शौल खरीद लूं अपने लिए.’’

‘‘ये हुई न बात,’’ विरेश के ठहाके पर आगे चल रहे दंपतियों का मुड़ कर देखना स्वाभाविक था.

कसौटी: क्यों झुक गए रीता और नमिता के सिर

मां के फोन वैसे तो संक्षिप्त ही होते थे पर इतना महत्त्वपूर्ण समाचार भी वह सिर्फ 2 मिनट में बता देंगी, मेरी कल्पना से परे ही था. ‘‘शुचिता की शादी तय हो गई है. 15 दिन बाद का मुहूर्त निकला है, तुम सब लोगों को आना है,’’ बस, इतना कह कर वह फोन रखने लगी थीं.

‘‘अरे, मां, कब रिश्ता तय किया है, कौन लोग हैं, कहां के हैं, लड़का क्या करता है?’’ मैं ने एकसाथ कई प्रश्न पूछ डाले थे. ‘‘सब ठीकठाक ही है, अब आ कर देख लेना.’’

मां और बातें करने के मूड में नहीं थीं और मैं कुछ और कहती तब तक उन्होंने फोन रख दिया था. लो, यह भी कोई बात हुई. अरे, शुचिता मेरी सगी छोटी बहन है, इतना सब जानने का हक तो मेरा बनता ही है कि कहां शादी तय हो रही है, कैसे लोग हैं. अरे, शुचि की जिंदगी का एक अहम फैसला होने जा रहा है और मुझे खबर तक नहीं. ठीक है, मां का स्वास्थ्य इन दिनों ठीक नहीं रहता है, फिर शुचिता की शादी को ले कर पिछले कई सालों से परेशान हो रही हैं. पिताजी के असमय निधन से और अकेली पड़ गई हैं. भाई कोई है नहीं, हम 3 बहनें ही हैं. मैं, नमिता और शुचिता. मेरी और नमिता की शादी हुए काफी अरसा हो गया है पर पता नहीं क्यों शुचिता का हर बार रिश्ता तय होतेहोते रह जाता था. शायद इसीलिए मां इतनी शीघ्रता से यह काम निबटाना चाह रही हों.

जो भी हो, बात तो मां को पूरी बतानी थी. शाम को मैं ने फिर शुचिता से ही बात करनी चाही थी पर वह तो शुरू से वैसे भी मितभाषी ही रही है. अभी भी हां-हूं ही करती रही. ‘‘दीदी, मां ने बता तो दिया होगा सबकुछ…’’ स्वर भी उस का तटस्थ ही था.

‘‘अरे, पर तू तो पूरी बात बता न, तेरे स्वर में भी कोई खास उत्साह नहीं दिख रहा है,’’ मैं तो अब झल्ला ही पड़ी थी. ‘‘उत्साह क्या, सब ठीक ही है. मां इतने दिन से परेशान थीं, मैं स्वयं भी अब उन पर बोझ बन कर उन की परेशानी और नहीं बढ़ाना चाहती. अब यह रिश्ता तो जैसे एक तरह से अपनेआप ही तय हो गया है, तो अच्छा ही होगा,’’ शुचिता ने भी जैसेतैसे बात समाप्त ही कर दी थी.

राजीव तो अपने काम में इतने व्यस्त थे कि उन को छुट्टी मिलनी मुश्किल थी. मेरा और बच्चों का रिजर्वेशन करवा दिया. मैं चाह रही थी कि 4-5 दिन पहले पहुंचूं पर मैं और नमिता दोनों ही रिजर्वेशन के कारण ठीक शादी वाले दिन ही पहुंच पाए थे. मेरी तरह नमिता भी उतनी ही उत्सुक थी यह जानने के लिए कि शुचि का रिश्ता कहां तय हुआ और इतनी जल्दी कैसे सब तय हो गया पर जो कुछ जानकारी मिली उस ने तो जैसे हमारे उत्साह पर पानी ही फेर दिया था.

जौनपुर का कोई संयुक्त परिवार था. छोटामोटा बिजनेस था. लड़का भी वही पुश्तैनी काम संभाल रहा था. उन लोगों की कोई मांग नहीं थी. लड़के की बूआ खुद आ कर शुचिता को पसंद कर गई थीं और शगुन की अंगूठी व साड़ी भी दे गई थीं.

‘‘मां,’’ मेरे मुंह से निकल गया, ‘‘जब इतने समय से रिश्ते देख रहे हैं तो और देख लेते. आप को जल्दी क्या थी. ऐसी क्या शुचि बोझ बन गई थी? अब जौनपुर जैसा छोटा सा पुराना शहर, पुराने रीतिरिवाज के लोग, संयुक्त परिवार, शुचि कैसे निभेगी उस घर में.’’ ‘‘सब निभ जाएगी,’’ मां बोलीं, ‘‘अब मेरे इस बूढ़े शरीर में इतनी ताकत नहीं बची है कि घरघर रिश्ता ढूंढ़ती रहूं. इतने बरस तो हो गए, कहीं जन्मपत्री नहीं मिलती, कहीं दहेज का चक्कर… और तुम दोनों जो इतनी मीनमेख निकाल रही हो, खुद क्यों नहीं ढूंढ़ दिया कोई अच्छा घरबार अपनी बहन के लिए.’’

मां ने तो एक तरह से मुझे और नमिता दोनों को ही डपट दिया था. यह सच भी था, हम दोनों बहनें अपनेअपने परिवार में इतनी व्यस्त हो गई थीं कि जितने प्रयास करने चाहिए थे, चाह कर भी नहीं कर पाए.

खैर, सीधेसादे समारोह के साथ शुचिता ब्याह दी गई. मैं और नमिता दोनों कुछ दिन मां के पास रुक गए थे पर हम रोज ही यह सोचते कि पता नहीं कैसे हमारी यह भोलीभाली बहन उस संयुक्त परिवार में निभेगी. हम लोग ऐसे परिवारों में कभी रहे नहीं. न ही हमें घरेलू काम करने की अधिक आदत थी. पिताजी थे तब काफी नौकरचाकर थे और अभी भी मां ने 2 काम वाली बाई लगा रखी थीं और खाना भी उन्हीं से बनवा लेती थीं.

फिर शुचि का तो स्वभाव भी सरल सा है. तेजतर्रार सास, ननदें, जेठानी सब मिल कर दबा लेंगी उसे. जब चचेरा भाई रवि विदा कराने गया तब हम लोग यही सोच कर आशंकित थे कि पता नहीं शुचि आ कर क्या हालचाल सुनाए. पर उस समय तो उस की सास ने विदा भी नहीं किया. रवि से यह कह कर कि महीने भर बाद भेजेंगी, अभी किसी बच्चे का जन्मदिन है, उसे भेज दिया था.

उधर रवि कहता जा रहा था, ‘‘दीदी, शुचि दीदी को आप ने कैसे घर में भेज दिया, वह घर क्या उन के लायक है. छोटा सा पुराने जमाने का मकान, उस में इतने सारे लोग…अब आजकल कौन बहुओं से घूंघट निकलवाता है, पर शुचि दीदी से इतना परदा करवाया कि मेरे सामने ही मुश्किल से आ पाईं. ‘‘ऊपर से सास, ननदें सब तेजतर्रार. सास ने तो एक तरह से मुझे ही झिड़क दिया कि बहू से घर का कामकाज तो होता नहीं है, इतना नाजुक बना कर रख दिया है लड़की को कि वह चार जनों का खाना तक नहीं बना सकती, पर गलती तो इस की मां की है जो कुछ सिखाया नहीं. अब हम लोग सिखाएंगे.

‘‘सच दीदी, इतनी रोबीली सास तो मैं ने पहली बार देखी.’’ रवि कहता जा रहा है और मेरा कलेजा बैठता जा रहा था कि इतने सीधेसादे ढंग से शादी की है, कहीं लालची लोग हुए तो दहेज के कारण मेरी बहन को प्रताडि़त न करें. वैसे भी दहेज को ले कर इतने किस्से तो आएदिन होते रहते हैं.

शुचि से मिलना भी नहीं हो पाया. मां से भी इस बारे में अधिक बात नहीं कर पाई. वैसे भी हृदय रोग की मरीज हैं वे.

शुचि से फोन पर कभीकभार बात होती तो जैसा उस का स्वभाव था हांहूं में ही उत्तर देती. बीच में दशहरे की छुट्टियों में फिर मां के पास जाना हुआ था. सोचा कि शायद शुचि भी आए तो उस से भी मिलना हो जाएगा पर मां ने बताया कि शुचि की सास बीमार हैं…वह आ नहीं पाएगी.

‘‘मां, इतने लोग तो हैं उस घर में फिर शुचि तो नईनवेली बहू है, क्या अब वही बची है सास की सेवा को, जो चार दिन को भी नहीं आ सकती,’’ मैं कहे बिना नहीं रह पाई थी. मुझे पता था कि उस की ननदें, जेठानी सब इतनी तेज हैं तो शुचि दब कर रह गई होगी. उधर मां कहे जा रही थीं, ‘‘सास का इलाज होना था तो पैसे की जरूरत पड़ी. शुचि ने अपने कंगन उतार कर सास के हाथ पर धर दिए…सास तो गद्गद हो गईं.’’

मैं ने माथे पर हाथ मारा. हद हो गई बेवकूफी की भी. अरे, छोटीमोटी बीमारी का तो इलाज यों ही हो जाता है फिर पुश्तैनी व्यापार है, इतने लोग हैं घर में… और सास की चतुराई देखो, जो थोड़ा- बहुत जेवर शुचि मायके से ले कर गई है उस पर भी नजरें गड़ी हैं. उधर मां कहती जा रही थीं, ‘‘अच्छा है उस घर में रचबस गई है शुचि…’’

मां भी आजकल पता नहीं किस लोक में विचरण करने लगी हैं. सारी व्यावहारिकता भूल गई हैं. शुचि के पास कुछ गहनों के अलावा और है ही क्या. मेरा तो मन ही उचट गया था. घर आ कर भी मूड उखड़ाउखड़ा ही रहा. राजीव से यह सब कहा तो उन का तो वही चिरपरिचित उत्तर था.

‘‘तुम क्यों परेशान हो रही हो. सब का अपनाअपना भाग्य है. अब शुचि के भाग्य में जौनपुर के ये लोग ही थे तो इस में तुम क्या कर सकती हो और मां से क्या उम्मीद करती हो? उन्होंने तो जैसे भी हो अपना दायित्व पूरा कर दिया.’’ फोन पर पता चला कि शुचि बीमार है, पेट में पथरी है और आपरेशन होगा. दूसरी कोई शिकायत हो सकती है तो पहले सारे टेस्ट होंगे, बनारस के एक अस्पताल में भरती है.

‘‘तुम लोग देख आना, मेरा तो जाना हो नहीं पाएगा,’’ मां ने खबर दी थी. नमिता भी छुट्टी ले कर आ गई थी. वहीं अस्पताल के पास उस ने एक होटल में कमरा बुक करा लिया था.

‘‘रीता, मैं तो 2 दिन से ज्यादा रुक नहीं पाऊंगी, बड़ी मुश्किल से आफिस से छुट्टी मिली है,’’ उस ने मिलते ही कहा था. ‘‘मैं भी कहां रुक पाऊंगी, छोटू के इम्तहान चल रहे हैं, नौकर भी आजकल बाहर गया हुआ है. बस, दिन में ही शुचि के पास बैठ लेंगे, रात को तो जगना भी मुश्किल है मेरे लिए,’’ मैं ने भी अपनी परेशानी गिना दी थी.

सवाल यह था कि यहां रुक कर शुचि की देखभाल कौन करेगा? कम से कम 10 दिन तो उसे अस्पताल में ही रहना होगा. अभी तो सारे टेस्ट होने हैं. हम दोनों शुचि को देखने जब अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि उस की दोनों ननदें आई हुई हैं. बूढ़ी सास भी उसे संभालने आ गई हैं और उन लोगों ने काटेज वार्ड के पास ही कमरा ले लिया था.

दबंग सास बड़े प्यार से शुचि के सिर पर हाथ फेर रही थीं. ‘‘फिक्र मत कर बेटी, तू जल्दी ठीक हो जाएगी, मैं हूं न तेरे पास. तेरी दोनों ननदें भी अपनी ससुराल से आ गई हैं. सब बारीबारी से तेरे पास सो जाया करेंगे. तू अकेली थोड़े ही है.’’

उधर शुचि के पति चम्मच से उसे सूप पिला रहे थे, एक ननद मुंह पोंछने का नैपकिन लिए खड़ी थी. ‘‘दीदी, कैसी हो?’’ शुचि ने हमें देख कर पूछा था. मुझे लगा कि इतनी बीमारी के बाद भी शुचि के चेहरे पर एक चमक है. शायद घरपरिवार का इतना अपनत्व पा कर वह अपनी बीमारी भूल गई है.

पर पता नहीं क्यों मेरे और नमिता के सिर कुछ झुक गए थे. कई बार इनसानों को समझने में कितनी भूल कर देते हैं हम. मैं ऐसा ही कुछ सोच रही थी.

अग्निपरीक्षा: श्रेष्ठा की जिंदगी में कौन-सा तूफान आया

जीवनप्रकृति की गोद में बसा एक खूबसूरत, मनोरम पहाड़ी रास्ता नहीं है क्या, जहां मानव सुख से अपनों के साथ प्रकृति के दिए उपहारों का आनंद उठाते हुए आगे बढ़ता रहता है.

फिर अचानक किसी घुमावदार मोड़ पर अतीत को जाती कोई संकरी पगडंडी उस की खुशियों को हरने के लिए प्रकट हो जाती है. चिंतित कर, दुविधा में डाल उस की हृदय गति बढ़ाती. उसे बीते हुए कुछ कड़वे अनुभवों को याद करने के लिए मजबूर करती.

श्रेष्ठा भी आज अचानक ऐसी ही एक पगडंडी पर आ खड़ी हुई थी, जहां कोई जबरदस्ती उसे बीते लमहों के अंधेरे में खींचने का प्रयास कर रहा था. जानबूझ कर उस के वर्तमान को उजाड़ने के उद्देश्य से.

श्रेष्ठा एक खूबसूरत नवविवाहिता, जिस ने संयम से विवाह के समय अपने अतीत के दुखदायी पन्ने स्वयं अपने हाथों से जला दिए थे. 6 माह पहले दोनों परिणय सूत्र में बंधे थे और पूरी निष्ठा से एकदूसरे को समझते हुए, एकदूसरे को सम्मान देते हुए गृहस्थी की गाड़ी उस खूबसूरत पहाड़ी रास्ते पर दौड़ा रहे थे. श्रेष्ठा पूरी ईमानदारी से अपने अतीत से बाहर निकल संयम व उस के मातापिता को अपनाने लगी थी.

जीवन की राह सुखद थी, जिस पर वे दोनों हंसतेमुसकराते आगे बढ़ रहे थे कि अचानक रविवार की एक शाम आदेश को अपनी ससुराल आया देख उस के हृदय को संदेह के बिच्छु डसने लगे.

श्रेष्ठा के बचपन के मित्र के रूप में अपना परिचय देने के कारण आदेश को घर में प्रवेश व सम्मान तुरंत ही मिल गया, सासससुर ने उसे बड़े ही आदर से बैठक में बैठाया व श्रेष्ठा को चायनाश्ता लाने को कहा.

श्रेष्ठा तुरंत रसोई की ओर चल पड़ी पर उस की आंखों में एक अजीब सा भय तैरने लगा. यों तो श्रेष्ठा और आदेश की दोस्ती काफी पुरानी थी पर अब श्रेष्ठा उस से नफरत करती थी. उस के वश में होता तो वह उसे अपनी ससुराल में प्रवेश ही न करने देती. परंतु वह अपने पति व ससुराल वालों के सामने कोई तमाशा नहीं चाहती थी, इसीलिए चुपचाप चाय बनाने भीतर चली गई. चाय बनाते हुए अतीत के स्मृति चिह्न चलचित्र की भांति मस्तिष्क में पुन: जीवित होने लगे…

वषों पुरानी जानपहचान थी उन की जो न जाने कब आदेश की ओर से एकतरफा प्रेम में बदल गई. दोनों साथ पढ़ते थे, सहपाठी की तरह बातें भी होती थीं और मजाक भी. पर समय के साथ श्रेष्ठा के लिए आदेश के मन में प्यार के अंकुर फूट पड़े, जिस की भनक उस ने श्रेष्ठा को कभी नहीं होने दी.

यों तो लड़कियों को लड़कों मित्रों के व्यवहार व भावनाओं में आए परिवर्तन का आभास तुरंत हो जाता है, परंतु श्रेष्ठा कभी आदेश के मन की थाह न पा सकी या शायद उस ने कभी कोशिश ही नहीं की, क्योंकि वह तो किसी और का ही हाथ थामने के सपने देख, उसे अपना जीवनसाथी बनाने का वचन दे चुकी थी.

हरजीत और वह 4 सालों से एकदूजे संग प्रेम की डोर से बंधे थे. दोनों एकदूसरे के प्रति पूर्णतया समर्पित थे और विवाह करने के निश्चय पर अडिग. अलगअलग धर्मों के होने के कारण उन के परिवार इस विवाह के विरुद्घ थे, पर उन्हें राजी करने के लिए दोनों के प्रयास महीनों से जारी थे.

बच्चों की जिद और सुखद भविष्य के नाम पर बड़े झुकने तो लगे थे, पर मन की कड़वाहट मिटने का नाम नहीं ले रही थी.

किसी तरह दोनों घरों में उठा तूफान शांत होने ही लगा था कि कुदरत ने श्रेष्ठा के मुंह पर करारा तमाचा मार उस के सपनों को छिन्नभिन्न कर डाला.

हरजीत की एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई. श्रेष्ठा के उजियारे जीवन को दुख के बादलों ने पूरी तरह ढक लिया. लगा कि श्रेष्ठा की जीवननैया भी डूब गई काल के भंवर में. सब तहसनहस हो गया था. उन के भविष्य का घर बसने से पहले ही कुदरत ने उस की नींव उखाड़ दी थी.

इस हादसे से श्रेष्ठा बूरी तरह टूट गई  पर सच कहा गया है समय से बड़ा चिकित्सक कोई नहीं. हर बीतते दिन और मातापिता के सहयोग, समझ व प्रेमपूर्ण अथक प्रयासों से श्रेष्ठा अपनी दिनचर्या में लौटने लगी.

यह कहना तो उचित न होगा कि उस के जख्म भर गए पर हां, उस ने कुदरत के इस दुखदाई निर्णय पर यह प्रश्न पूछना अवश्य छोड़ दिया था कि उस ने ऐसा अन्याय क्यों किया?

सालभर बाद श्रेष्ठा के लिए संयम का रिश्ता आया तो उस ने मातापिता की इच्छापूर्ति के लिए तथा उन्हें चिंतामुक्त करने के उद्देश्य से बिना किसी उत्साह या भाव के, विवाह के लिए हां कह दी. वैसे भी समय की धारा को रोकना जब वश में न हो तो उस के साथ बहने में ही समझदारी होती है. अत: श्रेष्ठा ने भी बहना ही उचित समझ, उस प्रवाह को रोकने और मोड़ने के प्रयास किए बिना.

विवाह को केवल 5 दिन बचे थे कि अचानक एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई. आदेश जो श्रेष्ठा के लिए कोई माने नहीं रखता था, जिस का श्रेष्ठा के लिए कोई वजूद नहीं था एक शाम घर आया और उस से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की. श्रेष्ठा व उस के पिता ने जब उसे इनकार कर स्थिति समझने का प्रयत्न किया तो उस का हिंसक रूप देख दंग रह गए.

एकतरफा प्यार में वह सोचने समझने की शक्ति तथा आदरभाव गंवा चुका था. उस ने काफी हंगामा किया. उस की श्रेष्ठा के भावी पति व ससुराल वालों को भड़का कर उस का जीवन बरबाद करने की धमकी सुन श्रेष्ठा के पिता ने पुलिस व रिश्तेदारों की सहायता से किसी तरह मामला संभाला.

काफी देर बाद वातावरण में बढ़ी गरमी शांत हुई थी. विवाह संपन्न होने तक सब के मन में संदेह के नाग अनहोनी की आशंका में डसते रहे थे. परंतु सभी कार्य शांतिपूर्वक पूर्ण हो गए. बैठक से तेज आवाजें आने के कारण श्रेष्ठा की अतीत यात्रा भंग हुई और वह बाहर की तरफ दौड़ी. बैठक का माहौल गरम था. सासससुर व संयम तीनों के चेहरों पर विस्मय व क्रोध साफ ?ालक रहा था. श्रेष्ठा चुपचाप दरवाजे पर खड़ी उन की बातें सुनने लगी.

‘‘आंटीजी, मेरा यकीन कीजिए मैं ने जो भी कहा उस में रत्तीभर भी झूठ नहीं है,’’ आदेश तेज व गंभीर आवाज में बोल रहा था. बाकी सब गुस्से से उसे सुन रहे थे.

‘‘मेरे और श्रेष्ठा के संबंध कई वर्ष पुराने हैं. एक समय था जब हम ने साथसाथ जीनेमरने के वादे किए थे. पर जैसे ही मुझे इस के गिरे चरित्र का ज्ञान हुआ मैं ने खुद को इस से दूर कर लिया.’’

आदेश बेखौफ श्रेष्ठा के चरित्र पर कीचड़ फेंक रहा था. उस के शब्द श्रेष्ठा के कानों में पिघलता शीशी उड़ेल रहे थे.

आदेश ने हरजीत के साथ रहे श्रेष्ठा के पवित्र रिश्ते को भी एक नया ही रूप दे दिया जब उस ने उन के घर से भागने व अनैतिक संबंध रखने की झूठी बात की. साथ ही साथ अन्य पुरुषों से भी संबंध रखने का अपमानजनक लांछन लगाया. वह खुद को सच्चा साबित करने के लिए न जाने उन्हें क्याक्या बता रहा था.

आदेश एक ज्वालामुखी की भांति झूठ का लावा उगल रहा था, जो श्रेष्ठा के वर्तमान को क्षणभर में भस्म करने के लिए पर्याप्त था, क्योंकि हमारे समाज में स्त्री का चरित्र तो एक कोमल पुष्प के समान है, जिसे यदि कोई अकारण ही चाहेअनचाहे मसल दे तो उस की सुंदरता, उस की पवित्रता जीवन भर के लिए समाप्त हो जाती है. फिर कोई भी उसे मस्तक से लगा केशों में सुशोभित नहीं करता है.

श्रेष्ठा की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा. क्रोध, भय व चिंता के मिश्रित भावों में ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे हृदय की धड़कन तेज दौड़तेदौड़ते अचानक रुक जाएगी.

‘‘उफ, मैं क्या करूं?’’

उस पल श्रेष्ठा के क्रोध के भाव 7वें आसमान को कुछ यों छू रहे थे कि यदि कोई उस समय उसे तलवार ला कर दे देता तो वह अवश्य ही आदेश का सिर धड़ से अलग कर देती. परंतु उस की हत्या से अब क्या होगा? वह जिस उद्देश्य से यहां आया था वह तो शायद पूरा हो चुका था.

श्रेष्ठा के चरित्र को ले कर संदेह के बीज तो बोए जा चुके थे. अगले ही पल श्रेष्ठा को लगा कि काश, यह धरती फट जाए और वह इस में समा जाए. इतना बड़ा कलंक, अपमान वह कैसे सह पाएगी?

आदेश ने जो कुछ भी कहा वह कोरा झूठ था. पर वह यह सिद्घ कैसे करेगी? उस की और उस के मातापिता की समाज में प्रतिष्ठा का क्या होगा? संयम ने यदि उस से अग्निपरीक्षा मांगी तो?

कहीं इस पापी की बातों में आ कर उन का विश्वास डोल गया और उन्होंने उसे अपने जीवन से बाहर कर दिया तो वह किसकिस को अपनी पवित्रता की दुहाई देगी और वह भी कैसे? वैसे भी अभी शादी को समय ही कितना हुआ था.

अभी तो वह ससुराल में अपना कोई विशेष स्थान भी नहीं बना पाई थी. विश्वास की डोर इतनी मजबूत नहीं हुई थी अभी, जो इस तूफान के थपेड़े सह जाती. सफेद वस्त्र पर दाग लगाना आसान है, परंतु उस के निशान मिटाना कठिन. कोईर् स्त्री कैसे यह सिद्घ कर सकती है कि वह पवित्र है. उस के दामन में लगे दाग झूठे हैं.

जब श्रेष्ठा ने सब को अपनी ओर देखते हुए पाया तो उस की रूह कांप उठी. उसे लगा सब की क्रोधित आंखें अनेक प्रश्न पूछती हुई उसे जला रही हैं. अश्रुपूर्ण नयनों से उस ने संयम की ओर देखा. उस का चेहरा भी क्रोध से दहक रहा था. उसे आशंका हुई कि शायद आज की शाम उस की इस घर में आखिरी शाम होगी.

अब आदेश के साथ उसे भी धक्के दे घर से बाहर कर दिया जाएगा. वह चीखचीख कर कहना चाहती थी कि ये सब झूठ है. वह पवित्र है. उस के चरित्र में कोई खोट नहीं कि तभी उस के ससुरजी अपनी जगह से उठ खड़े हुए.

स्थिति अधिक गंभीर थी. सबकुछ समझ और कल्पना से परे. श्रेष्ठा घबरा गई कि अब क्या होगा? क्या आज एक बार फिर उस के सुखों का अंत हो जाएगा? परंतु उस के बाद जो हुआ वह तो वास्तव में ही कल्पना से परे था. श्रेष्ठा ने ऐसा दृश्य न कभी देखा था और न ही सुना.

श्रेष्ठा के ससुरजी गुस्से से तिलमिलाते हुए खड़े हुए और बेकाबू हो उन्होंने आदेश को कस कर गले से पकड़ लिया, बोले, ‘‘खबरदार जो तुमने मेरी बेटी के चरित्र पर लांछन लगाने की कोशिश भी की तो… तुम जैसे मानसिक रोगी से हमें अपनी बेटी का चरित्र प्रमाणपत्र नहीं चाहिए. निकल जाओ यहां से… अगर दोबारा हमारे घर या महल्ले की तरफ मुंह भी किया तो आगे की जिंदगी हवालात में काटोगे.’’

फिर संयम और ससुर ने आदेश को धक्के दे कर घर से बाहर निकाल दिया. ससुरजी ने श्रेष्ठा के सिर पर हाथ रख कहा, ‘‘घबराओ नहीं बेटी. तुम सुरक्षित हो. हमें तुम पर विश्वास है. अगर यह पागल आदमी तुम्हें मिलने या फोन कर परेशान करने की कोशिश करे तो बिना संकोच तुरंत हमें बता देना.’’

सासूमां प्यार से श्रेष्ठा को गले लगा चुप करवाने लगीं. सब गुस्से में थे पर किसी ने एक बार भी श्रेष्ठा से कोई सफाई नहीं मांगी.

घबराई और अचंभित श्रेष्ठा ने संयम की ओर देखा तो उस की आंखें जैसे कह रही थीं कि मुझे तुम पर पूरा भरोसा है. मेरा विश्वास और प्रेम इतना कमजोर नहीं जो ऐसे किसी झटके से टूट जाए. तुम्हें केवल नाम के लिए ही अर्धांगिनी थोड़े माना है जिसे किसी अनजान के कहने से वनवास दे दूं.

तुम्हें कोई अग्निपरीक्षा देने की आवश्यकता नहीं. मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं और रहूंगा. औरत को अग्निपरीक्षा देने की जरूरत नहीं. यह संबंध प्यार का है, इतिहास का नहीं. श्रेष्ठा घंटों रोती रही और आज इन आंसुओं में अतीत की बचीखुची खुरचन भी बह गई. हरजीत की मृत्यु के समय खड़े हुए प्रश्न कि यह अन्याय क्यों हुआ, का उत्तर मिल गया था उसे.

पति सदासदा के लिए अपना होता है. उस पर भरोसा करा जा सकता है. पहले क्या हुआ पति उस की चिंता नहीं करते उस का जीवन सफल हो गया था.

पुराणों के देवताओं से कहीं ज्यादा श्रेष्ठकर संयम की संगिनी बन कर सासससुर के रूप में उच्च विचारों वाले मातापिता पा कर स्त्री का सम्मान करने वाले कुल की बहू बन कर नहीं, बेटी बन कर उस रात श्रेष्ठा तन से ही नहीं मन से भी संयम की बांहों में सोई. उसे लगा कि उस की असल सुहागरात तो आज है.

इंतजार शौहर का: भाग 3- अरशद दुबई क्यों गया था

बस वही नसीहत हमें आज भी याद है इसलिए हम गाड़ी को आगे बढ़ाना भी सीख गए और घुमानामोड़ना भी आ गया हमें. बस अब गाड़ी को रिवर्स करने में परेशानी हो रही थी और घबराहट भी अधिक होती थी. लगता था पीछे का सारा आलम ही गोलगोल घूम रहा है क्योंकि हमें झले पर बैठते ही सिर घूमने और उलटी आने जैसी समस्या बचपन से ही है इसलिए जब साथ की लड़कियां मेले में आए हुए झले में बैठ कर आसमान में गुम हो जाने को होतीं तब हम डरपोक से बने उन्हें नीचे खड़े हो कर देखते और अपने को कोसते रहते. उम्र बीतने से समस्याएं हल नहीं होती.

हमारी भी यह समस्या जस की तस बनी रही और हम तो इस सिर घूमने वाली बीमारी को भूल ही गए थे पर जब गाड़ी को रिवर्स गियर में डाला और व्यू मिरर में देखा तब समझ में आ गया कि वह बचपन के सिर घूमने वाली समस्या बदस्तूर अब भी हमारे साथ बनी हुई है.

हमें परेशान देख कर अरशद ने हमें हौसला दिया और कहा कि ये सारी मामूलीमहीन चीजें धीरेधीरे जेहन में उतरती हैं. जैसेजैसे आप का हाथ साफ होगा वैसेवैसे आप ठीक ढंग से गाड़ी को रिवर्स करने लगोगी और फिर रिवर्स में आप गाड़ी को कभीकभार ही करते हो. यह कह कर उस ने हमें एक अच्छे ड्राइवर होने का तमगा और भरोसा दे दिया था जिस के कारण हमारा तो मन ही भर आया था. तुरंत पर्स से क्व2,000 का नोट निकाला और अरशद की जेब में डाल दिया.

‘‘ये पैसे कुछ सोच कर नहीं दे रही, बस समझ लो पिज्जा पार्टी के लिए हैं.’’
अरशद सिर्फ मुसकरा दिया था.

आज लखनऊ में सुबह से ही बारिश की फुहारें पड़ रही थीं. तपती गरमी के बाद
इस बारिश से मन को बड़ा सुकून मिल रहा था. याद आया कि कौन बनेगा करोड़पति. नाम के टीवी शो में एक बार एक प्रतियोगी ने अमिताभ बच्चन को बताया था कि उसे तेज बारिश में तेज ड्राइविंग करना बहुत पसंद है. बदले में बिग बी ने उसे ऐसा नहीं करने की सलाह दी थी क्योंकि ये दोनों ही चीजें खतरनाक होती हैं. पर बारिश में गाड़ी चलाने में मजा आएगा और फिर गाड़ी को अलग से धोने की जहमत उठानी पड़ेगी, हमारे जेहन में ये सारी बातें गूंज गईं फिर क्या था.

हम ने गैराज में खड़ी गाड़ी पर नजर डाली और 7 साल की गुलशन का हाथ पकड़ कर छतरी लगा कर गाड़ी में आ कर बैठ गए और घर वालों को बताया कि गुलशन के पेट में दर्द हो रहा है सो पास वाले डाक्टर साहब के यहां उसे दिखा कर वापस आते हैं.

डाक्टर साहब ज्यादा दूरी पर नहीं थे और वैसे भी घर वालों को अब तक हमारी ड्राइविंग पर थोड़ाबहुत भरोसा आ चुका था इसलिए उन्होंने कुछ न कहा. हम और गुलशन गाड़ी में बैठ कर सड़क पर आ चुके थे और गाड़ी की विंडस्क्रीन पर चलते हुए वाइपर बड़ा खुशनुमा सा एहसास करा रहे थे हमें. गुलशन भी मुसकरा जाती थी.

हम गाड़ी धीरेधीरे चला रहे थे और वजीराबाद चौराहे पर आ कर हम ने गाड़ी सीधा अमीनाबाद मार्केट की ओर मोड़ दी. अमूमन मेरे जैसा नौसिखिया ड्राइवर अमीनाबाद मार्केट की तरफ गाड़ी ले जाता क्योंकि मार्केट में भीड़भाड़ होती है पर तो क्या. अभी तो बारिश हो रही है, लोग भी सड़कों पर कम दिख रहे हैं बस थोड़ा आगे जा कर गाड़ी को घुमा लेंगे, ऐसा सोच कर हम आगे बढ़े जा रहे थे. बारिश पिछले कुछ समय से काफी तेज होने लगी थी और अब सड़कों पर थोड़ाबहुत जलभराव भी दिखने लगा था.

दुकानदार अपनी दुकानें तो ऊंची करते रहे पर सड़कें नीची की नीची ही रह गईं और फिर लगता है कि बारिश के पानी का निकास भी ठीक से नहीं हो पा रहा है. तभी तो पानी भरता सा दिख रहा है. मेरी नजरों के सामने सड़क पर नाली की ओर से पानी आता हुआ दिख रहा था. मैं ने गुलशन को देखा, अब उसे गाड़ी के अंदर मजा नहीं आ रहा था बल्कि उस के चेहरे पर अब एक अजीब सा डर नुमाया हो रहा था. वैसे डरने की बात तो थी ही क्योंकि बारिश तेज हो रही थी.

सड़क पर आधा फुट तक पानी चलने लगा था. मुझे लगा कि अब गाड़ी को मोड़ लेना चाहिए, आगे वाले गोल चौराहे से घुमा लूंगी, ऐसा सोच कर मैं गाड़ी को चौराहे तक ले गई और यू टर्न ले लिया. मैं ने देखा कि पानी चौराहे पर लगी हुई मूर्ति के दूसरे पायदान तक पहुंच चुका है. हम ने उस मूर्ति के पायदान से गाड़ी थोड़ा सा आगे बढ़ाई पर इतने में हम ने देखा कि सामने वाली सड़क तेज बारिश के कारण दरक सी गई थी और एक बड़ा सा गड्ढा बन गया था.
मतलब साफ था कि अब आगे जा पाना खतरे से खाली नहीं था. कुछेक नई उम्र के लड़के छतरी लगा कर मोबाइल से उस टूटी सड़क का वीडियो बनाने में लगे थे जबकि कुछ लोग हमें हाथ से इशारा कर रहे थे कि आगे जाना खतरे से खाली नहीं है इसलिए आप बैक कर के वापस चली जाइए.
हमें सम?ा में आ गया था कि गाड़ी को किसी तरह गोल घुमा कर वापस जाना संभव नहीं है इसलिए रिवर्स गियर लगा कर गाड़ी को बैक करना होगा. हम ने क्लच दबा कर रिवर्स गियर लगाया और गाड़ी पीछे की ओर रेंगने लगी और गाड़ी किस जानिब मुखातिब हो रही है यह देखने के लिए व्यू मिरर में देखा, पर जैसे ही हम ने व्यू मिरर में गाड़ी के पिछले हिस्से को देखा तो बस वहीं हमारा सिर अचानक से घूमने लगा और चक्कर सा आ गया. लिहाजा, हमारे हाथ से स्टीयरिंग का कंट्रोल लड़खड़ा सा गया. हमें गुलशन की परवाह थी सो हम ने अपनेआप को बहुत संभाला और होशोहवास में रहने की पूरी कोशिश करी और हम इस में कामयाब भी हो गए पर इतने में भाड़ की आवाज के साथ गाड़ी रुक गई. और हम ने देखा कि गाड़ी का पिछला हिस्सा उस मूर्ति के पायदान से टकरा गया था. बदहवासी में हम गुलशन को देखते हुए नुकसान का जायजा लेने बाहर उतरे तो देखा कि गाड़ी की डिक्की पिचक चुकी थी. डर के मारे सिर घूमना बंद हो गया था और हमारी आंखों के सामने अब घर वालों और रहीम मियां का चेहरा घूम रहा था. लग रहा था कि वे सब हमें गुस्से से घूर रहे हैं. हमारा पूरा शरीर कांप रहा था, गुलशन रोए जा रही थी.
शुक्र था कि हम दोनों में से कोई भी चोटिल नहीं हुआ था. अपनी गाड़ी का ऐसा हाल देख कर वही वीडियो बनाने वाले लड़के मदद को आए और हमें हौसला दिया. एक लड़के ने तो तुरंत कंपनी की हैल्पलाइन को फोन कर दिया और उसी से हमें पता चला कि वे लोग मदद के लिए कुछ ही देर में आ कर गाड़ी को सर्विस स्टेशन मरम्मत के लिए ले जाएंगे.
गाड़ी तो मरम्मत के लिए चली गई लेकिन घर आ कर हमारी जो मरम्मत हमारे ससुर ने करी उसे तो हम ताउम्र नहीं भूल पाएंगे.
‘‘क्या जरूरत थी वहां भीड़ वाली मार्केट में जाने की और वह भी कार से और अगर गुलशन को कुछ हो जाता तो?’’
शाम को अरशद का फोन आया. कम से कम उस से तो ऐसी उम्मीद नहीं थी.
‘‘आप भी कमाल करती हैं, अभी तो आप को रिवर्स करना ठीक से नहीं आया और आप बारिश में गाड़ी चलाने चल दीं. अरे अगर गुलशन को कुछ हो जाता तो?’’
अब्बू ने रहीम मियां को भी फोन कर के मीडिया चैनल की तरह सब बता दिया होगा. तभी तो उन का फोन भी इतनी रात को आया.
‘‘गाड़ी चलाना तो ठीक था, टूटफूट होती है और होती रहेगी पर सोचो अगर कहीं तुम्हें कुछ हो जाता तो?’’ रहीम बेहद शांत आवाज में बोल रहे थे और उन के अंदाज में एक शौहर की चिंता साफ ?ालक रही थी.

कोई तो है जिसे गाड़ी की टूट और गुलशन के अलावा मेरी चिंता भी है, उन की
बात सुन कर मेरी रुलाई निकल गई. रहीम ने औडियो कौल को वीडियो कौल में बदला और मु?ा से मुखातिब हो कर बड़ी देर तक सम?ाते रहे और अंत में मैं ने रोतेरोते उन से बस एक गुजारिश करी, ‘‘मु?ो कुछ नहीं चाहिए, गाड़ीबंगला इन सब के बगैर काम चला लूंगी मगर एक औरत अपने शौहर के बिना अधूरी रहती है. रात ढलने पर जब तक वह अपने शौहर के सीने पर सिर रख कर 2-4 बातें न कर ले तब तक उसे चैन नहीं आता, इसलिए आप वहां पैसों का लालच छोड़ कर अपने वतन वापस आ जाइए,’’ और मैं सिसकियों में टूट गई थी.

मेरी बात पर रहीम मियां ने जल्दी वापस आने का भरोसा दिया मु?ो.
अब करीब 1 महीना बीत चुका है, गाड़ी बन कर वापस आ गई है और अब तो पहले से ज्यादा चमक रही है वह लेकिन हम ने गाड़ी को चलाया नहीं.
अरशद ने उसे गैराज में पार्क कर के उसे कवर से ढक दिया है और आज सुबह ही रहीम मियां की कौल आई है कि वे दुबई से अपने
वतन आने के लिए चल दिए हैं फिर कभी
वापस न जाने के लिए, अब तो हमारी गाड़ी के साथसाथ हम सब को भी उन के आने का बेसब्री से इंतजार है.

इंतजार शौहर का: भाग 2- अरशद दुबई क्यों गया था

हमें बात जम गई अरशद को पैसे ट्रांसफर कर दिए और खुद हमें भी आरटीओ औफिस के चक्कर लगाने पड़े. फिर भी पूरे 2 महीने लगे थे डीएल के आने में पर मजाल है कि हम इन 2 महीनों में घर पर निठल्ले बैठे रहे हों पर इन दिनों में तो अरशद हमें एक बहुत शानदार कार ड्राइविंग स्कूल ले गया जहां पर एक हौलनुमा कमरे में ही ‘कार सिम्युलेटर’ की ट्रेनिंग दी जाती थी. दरअसल, यह एक वीडियो गेम की तरह था जिस पर सीखने वाला व्यक्ति अपने हाथ में स्टेयरिंग पकड़ कर अपने सामने लगी स्क्रीन पर देखते हुए एकदम रोड पर गाड़ी चलाने जैसे माहौल में गाड़ी सीखता है. इतना ही नहीं बल्कि गाड़ी के टकरा जाने पर आप से पैसा भी लिया जाता है, न जाने कितनी बार तो हमें फाइन भरना पड़ा.

अब हमारा ड्राइविंग लाइसैंस भी बन कर आ गया था भले ही उस पर अभी लर्नर होने की कुछ पाबंदियां थीं पर हमें तो पाबंदियां तोड़ने में ही मजा आता है इसलिए हम अरशद के साथ जा कर वैदिकी इंटर कालेज वाली फील्ड में पहले ही गाड़ी चलाना सीख रहे थे ताकि लाइसैंस आने पर हम तुरंत ही सड़क पर जा कर बिंदास गाड़ी चला सकें.

भाई चाबी लगा कर कैसे क्लच को दबा कर पहला गियर डाल कर गाड़ी आगे बढ़ानी और उस के बाद धीरे से दूसरे गियर में कैसे आना है यह तो बखूबी समझ लिया था हम ने और अब जा कर ही पहली बार समझ आया था कि कार सिर्फ गोलगोल स्टीयरिंग व्हील से नहीं चलाई जाती बल्कि गाड़ी चलाने में बाकायदा ए, बी और सी अर्थात ऐक्सीलेटर, ब्रेक और क्लच का यूज किया जाता है. मुझे याद आता कि गाड़ी न जाने कितनी बार झटके ले कर बंद हुई थी.
कई बार तो अरशद को भी कोफ्त हुई लेकिन हम ने भी सुन रखा था कि गिरते हैं शहसवार ही मैदान जंग में… सो हम लगे रहे और एक बार गाड़ी आगे बढ़ी तो बस हमारी समझ में आ गया कि गाड़ी को दूसरे से तीसरे गियर में कैसे लाना है.

घर आतेआते हमारी आंखें लगातार विंडस्क्रीन के बाहर देखते रहने के कारण थक कर
सूज जातीं और हाथपैरों में एक अलग तरह की कंपकंपी होती रहती. घर के लोग तो हमारा जोश हाई रखते थे पर हमारे महल्ले वालों के लिए एक औरत जात को गाडी चलाते देखना गंवारा नहीं हो रहा था. तभी तो हमें अरशद के साथ जाते देख कर मुंह दबा कर हंसते और उलटेसीधे फिकरे कसते.

‘‘अब शौहर अपना वतन छोड़ कर कमाने गया है तो उस के पीछे बेगमें कैसी मौज ले रही हैं. अब तो गाड़ी से ही आयाजाया जा रहा है. भई वाह.’’

और फिर आखिरकर वह नुक्कड़ वाली बड़ी बी कल शाम को आ ही गई और हम लोगों की तबीयत के बारे में पूछताछ करने लगी. शायद वह जानना चाहती थी कि हम लोग रोज शाम को गाड़ी ले कर कहां जाते हैं. हम ने भी बड़ी बी को टालने के अंदाज में बता दिया कि दरअसल हमारे बदन पर बैठेबैठे थोड़ी चरबी अधिक चढ़ गई थी इसलिए मार्केट में एक जिम जौइन कर रखा है बस वहीं चले जाते हैं. अब जिम खासा दूर है, तो रिकशा कौन ढूंढे़ इसलिए अरशद और गाड़ी को साथ ले लेते हैं.

बड़ी बी को हमारी बातों से इत्मीनान तो नहीं हुआ पर वह कुछ कह न सकी. थोड़ी देर इधरउधर की बातें करती रही और उस के बाद टाइम नहीं है, जल्दी जाना है का बहाना कर के चली गई. यह एक दीगर बात थी कि वह पूरे 2 घंटे बैठ कर और चायपकौड़े उड़ा कर गई थी.

हम यह तो जानते थे कि गाड़ी चलाना सीखने में दिक्कतें तो आएंगी पर हमारी ड्राइविंग लोगबाग की आंखों में छिदने लगेगी, यह तो न सोचा था. खैर, जाने दीजिए, कुछ तो लोग कहेंगे और एक बात मैं ने अपनेआप से भी कही थी कि गाड़ी चलाना सीखते वक्त गाड़ी की रफ्तार बढ़ाने की जरूरत बिलकुल नहीं है. पता चला कि 2-4 बातें जानते ही गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी और लगे आसमान से बातें करने. ज्यादातर नया ड्राइवर और नई उम्र के लड़के जो अपनेआप को माइकल शुमाकर की अगली कौम सम?ाते हैं वे गलती कर बैठते हैं.

अरे मेरे भाई, थोड़ा रहम रखो इस ऐक्सीलेटर पैडल पर और फिर गाड़ी हलकी रफ्तार
में रहेगी तो अचानक किसी जानवर या आदमजात के सामने नुमायां हो जाने से संभाली भी जा सकती है पर अगर रफ्तार अधिक होगी तब तो जानवर के साथ ड्राइवर को भी उठाने के बजाय बटोरने की नौबत आ सकती है.

अब यह सारी मालूमात हमें वैसे तो यू ट्यूब के वीडियोज देख कर पता चली थी और वैसे तो इन सब बातों का इल्म हमें तभी हो गया था जब हम छठी क्लास में साइकिल सीख रहे थे. भाई जान ने हमें गद्दी पर बैठाया और खुद कैरियर पर बैठ गए और हमें आगे देखते रहने की नसीहत देते रहे. 2-4 बार हैंडल संभला, 3-4 बार भाई जान की डांट खाई और 5-6 बार जमीन से गले भी मिले पर फिरफिर खड़े हुए वह भी पूरी शान से और फिर भाई जान ने हमें रफ्तार न बढ़ा कर धीरेधीरे ही साइकिल चलाने की सलाह दी और तब जा कर हम कामयाब हुए थे.

गुलाब: आखिर क्या था देव का असली चेहरा

‘‘बारिश अब कहां सावन की राह देखती है. नवंबर आने को है और छटा तो ऐसे बरस रही है जैसे जुलाई का महीना हो,’’ मन ही मन बुदबुदाते हुए मालिनी वार्डरोब में कुछ ढूंढ़ रही थी. तभी एक पुरानी डायरी मिली, जिस में से सूखा हुआ गुलाब नीचे गिर गया. पंखुडि़यां सूख चुकी थीं. अब रंग भी कुछ गहरा हो गया था. पर यादें अब भी बारिश की बूंदे पड़ने पर खुशबू देने वाली मिट्टी की तरह ताजा हो कर महका गई थीं…
कालेज मे देव मु?ो सुहाने मौसम का मजा लेने को उकसाते थे. फिर हमारी दोस्ती प्यार के गलियारे से गुजरते हुए शादी की चौखट पर आ गई. सुहाने मौसमों का दौर अब हमारे जीवन से जाने लगा था.
डोरबैल बजी तो मेरा ध्यान उन यादों से बाहर आ गया. दरवाजा खोला तो सामने मेरे हसबैंड औफिस से आ गए थे.

‘‘मालिनी मैं फ्रैश होने जा रहा हूं. आज काफी थक गया. आज औफिस में काफी काम था,’’ सोफे पर औफिस बैग रखते हुए उन्होंने  कहा.

मैं ने भी हां में सिर हिला दिया. यह नई बात नहीं थी कि उन्होंने मु?ा पर ध्यान नहीं दिया. आज मैं ने उन का पहला तोहफा पहना था जो उन्होंने मुझे शादी के बाद दिया था. वक्त रिश्तों में वाकई कई बदलाव ला देता है, यह मुझे महसूस होने लगा था.

ऐसे बदलाव जिन के हम आदी नहीं होते हैं या शायद नहीं होना चाहते हैं. मेरे हसबैंड जो मेरी चाय के बिना न तो शाम की थकान उतारते थे और न ही सुबह की शुरुआत करते थे उन का ध्यान धीरेधीरे ही सही कम हो रहा था मु?ा पर से, हमारे रिश्ते पर से.

हमारी ऐनिवर्सरी को 2 दिन बचे थे. मेरे हसबैंड को याद नहीं था शायद… मैं जानती थी कि आजकल प्रमोशन के वजह से उन पर काम बढ़ गया है. पर फिर भी मै उन का थोड़ा वक्त चाहती थी. होता है न अकसर हम दिमाग को सम?ा लिया करते हैं, मगर मन को सम?ाना मुश्किल हो जाता है.

2 दिन बीत गए ऐनिवर्सरी का दिन भी आ गया जो यों ही बीत रहा था. हम ने एकदूसरे को विश तक नहीं किया था या शायद मेरी कई कोशिशों के बाद भी उन्हें याद न दिला पाने की और उन्हें याद न आने की टीस थी जो मु?ो उन्हें विश करने से रोक रही थी. मैं भी रोज की तरह औफिस में काम में बिजी हो गई. तभी फोन पर मैसेज रिंग हुआ लिखा था, ‘‘हब्बी सुनो आज बाइक में कुछ दिक्कत हो गई. तुम आते टाइम मु?ो मेरे औफिस से पिक कर लेना.’’

मैं ने रिप्लाई में ‘ओके’ भेज दिया. मैं लगभग आधे घंटे बाद उन के औफिस के बाहर खड़ी थी.
मैं ने उन को कार में बैठने का इशारा किया.

‘‘आज कार मैं ड्राइव करूंगा,’’ उन्होंने कहा. मैं जहां ऐनिवर्सरी को ले कर कुछ सोच रही थी वहीं मेरे हसबैंड का यों अनजान बनना मु?ो दुख दे रहा था. हम चाहे कितने भी सम?ादार या अंडरस्टैंडिंग वाले क्यों न हों पर अपने पार्टनर से ऐक्सपैक्टेशंस न चाहते हुए भी होती हैं कि वह हमारा खयाल रखे, हमारी पसंदनापसंद को अहमियत दे, हमारे साथ वक्त बिताए, हम से जुड़ी चीजों को याद रखे.

मैं खुद को सम?ाने की कोशिश कर रही थी हमारी लाइफ अब बदल गई है. हम शायद हसबैंडवाइफ से ज्यादा मातापिता है और हमें उस पर फोकस करना चाहिए. मैं ये सब सोच रही थी कि तभी मेरा ध्यान रास्ते की ओर गया कि यह तो घर का रास्ता नहीं है.

तभी कार समुद्र के किनारे रुकी. मैं सम?ा नहीं पाई. तभी देव ने मेरी तरफ सफेद गुलाब बढ़ाया, ‘‘दोस्ती करोगी मु?ा से?’’देव के इन शब्दों ने मु?ो कालेज के दिन याद दिला दिए, जब देव मु?ो सफेद गुलाब
देने आए थे और यही शब्द कहे थे मैं न कर दूंगी इस डर से यह भी कहा कि सीनियर ने कहा है. हमारी दोस्ती से शुरू हुआ सफर, जिंदगी के कई रास्तों से गुजरा था. दोस्त, हसबैंडवाइफ, मातापिता…
देव अभी भी मेरी तरफ कालेज वाली मासूम शकल बना कर देख रहे थे. मैं ने भर्राई आवाज में जवाब दिया, ‘‘तुम्हारी दोस्त तो हमेशा तुम्हारी है देव.’’

हम दोनों की आंखें नम थीं. देव ने मु?ो गले लगा लिया शायद सालों बाद हम दोनों को अपनी दोस्ती से शुरू हुआ प्यार जो दोबारा हराभरा हो गया था. आज मु?ो लग रहा था जैसे कि जिंदगी का सफर और वह सफेद गुलाब फिर खिल गया हो.

इंतजार शौहर का: भाग 1- अरशद दुबई क्यों गया था

जब से हमारे शौहर रहीम मियां दुबई कमाने के लिए गए हैं तब से उन की बहुत सी पसंदीदा चीजें धूल खा रही हैं. मसलन, उन का सोनी कंपनी का सुनहरे रंग का हैडफोन जिसे उन्होंने कितने नाज से खरीदा था कि वे फुरसत के लमहों में जगजीत सिंह की उम्दा गजलों का लुत्फ उठाया करेंगे. ठीक इसी तरह कोने में रखी टेबल पर सजा हुआ टेबललैंप, जिसे जला कर देर तक पढ़ते रहते थे रहीम मियां.

इस टेबललैंप की खासीयत यह थी कि यह मुरादाबादी पीतल से बना हुआ था और इसे लखनऊ महोत्सव से खासे महंगे दाम में खरीदा था उन्होंने. हालांकि इसे खरीदते समय उन्हें भी महसूस हुआ था कि दुकानदार उन की पसंद को भांप चुका है और इसीलिए नाजायज दाम बता रहा है पर रहीम मियां भी ठहरे महंगी चीजों के शौकीन इसलिए वे इसे खरीद कर ही माने थे.

मगर ये तो छोटीमोटी चीजें थीं जो उन के बिना अपनेआप को बेजार सम?ा रही थीं, पर अब इस बड़ी सी चीज का क्या करूं जो रहीम मियां के बगैर गर्दिश में ही जी रही है. मैं जिक्र कर रही हूं गैराज के अंदर खड़ी 7 सीटर कार का. कितने नाजों और अरमानों से खरीदा था, जब एक रिश्तेदार की देखादेखी रहीम मियां को भी कार का नामुराद शौक लगा. फिर क्या था. रहीम मियां ने ‘‘कौन सी कार लें,’’ इस मौजूं पर यूट्यूब पर न जाने कितने वीडियोज देख डाले. बाकायदा तमाम गाडि़यों के प्लस माइनस खंगाले गए और गाडि़यों में यात्रियों की सुरक्षा के लिए कितने एअरबैग्स आदि लगे हुए हैं, इस बात की पुख्ता जानकारी लेने में कितनी संजीदगी दिखाई थी रहीम मियां ने. अपनी निजी जिंदगी में लापरवाही का सा रवैया रखने वाले रहीम मियां गाड़ी चुनने में इतने चूजी और फिक्रमंद निकलेंगे यह तो हम ने कभी सोचा भी न था.

गाड़ी लेने के नाम पर अब्बू का मशवरा था कि नई गाड़ी पर इतना पैसा खर्च
करना कोई सम?ादारी की बात थोड़े ही है. घर में पैसों का पेड़ तो है नहीं, क्यों न कोई सैकंड हैंड कार खरीद ली जाए पर रहीम मियां की सलामी तो 21 तोपों से ही दी जाती थी.

रहीम मियां नहीं माने. पैसों की दिक्कत हुई तो बैंक से लोन ले कर कार लेने की बात कह दी और फिर क्या था. कुछ पैसा घर से लिया, थोड़ाबहुत यारदोस्तों से और बाकी का बैंक से लोन ले लिया और चमचमाती नीले रंग की कार लेने के लिए शोरूम पहुच गए और वापसी में फूलों से सजवाना भी तो नहीं भूले थे. वे अपनी गाड़ी को दिनभर रहीम मियां गाड़ी में घूमतेघुमाते रहे और रात में मकान के ठीक सामने एक जगह को गैराजनुमा शक्ल दे दी थी सो कार को उस में पार्क कर दिया.अगले दिन से पूरे लखनऊ शहर में बेवजह घूमते रहे थे हम लोग और जिन रि

श्तेदारों के यहां कभी नहीं गए थे उन के यहां भी गए और उन की मिजाजपुर्सी करने के साथसाथ अपनी गाड़ी के बारे में बताना भी न भूले थे रहीम मियां.
अभी 8 महीने ही तो हुए थे गाड़ी लिए हुए कि दुबई से उन के दोस्त की कौल आ गई, ‘‘यहां आ जाओ, लाखों में खेलोगे.’’

मगर रहीम मियां को तो अपने वतन की मिट्टी से इश्क था ‘‘जीना यहां मरना यहां,’’ वाला. सो इन्होंने मना किया तो इन के दोस्त ने इन पर दबाव बनाते हुए कहा कि अपने वतन से मुहब्बत तो ठीक है पर अपने परिवार से भी मुहब्बत रखो और उस मुहब्बत को निभाने के लिए पैसों की जरूरत होती है. दुबई में तनख्वाह अच्छी है और वैसे भी काफी समय से रहीम मियां खाड़ी देश में कमाई करने जाना चाहते थे. हालांकि यहां पर भी कामधंधा ठीकठाक था पर रहीम मियां कुछ बड़ा करना चाहते थे इसलिए बाहर जाने की बात सोची थी पर कहीं न कहीं बात अटक जाती थी.

अब उन के दोस्त ने दबाव डाला तो यह बात रहीम मियां को जम गई और वे दुबई निकल गए. एक बार भी न तो हमारे बारे में सोचा, न अपनी बेटी गुलशन के बारे में और न ही अपनी चमचमाती गाड़ी के बारे में. अब उन के पीछे उन की गाड़ी सिर्फ धूल ही तो खा रही है. हम ने गाड़ी को देखा तो हमें उस बेचारी पर बहुत तरस आया जैसे कोई बेगम भरी जवानी में ही बेवा हो गई हो, पर हम कर ही क्या सकते थे क्योंकि कार चलाना तो हमें आता ही नहीं था. तो क्या हुआ? एक औरत जो चाहे वह कर सकती है. हमें टीवी वाले औरतों के सीरियल की एक लाइन हमारे जेहन में गूंज गई कि हां हम गाड़ी चलाना सीखेंगे, पर कैसे भला. अरे भई शहर में इतने तो मोटर ट्रैनिंग स्कूल हैं. बस उस में दाखिला ले कर गाड़ी चलाना सीख लेंगे हम.
उस पूरा दिन हम मोबाइल पर शहर के सारे मोटर सिखाने वाले स्कूलों में फीस आदि के बारे में बात करते रहे ताकि बाद में हमें कोई ठगे गए न कह सके और फिर एक स्कूल को हम ने चुन ही लिया ड्राइविंग सीखने के लिए.

मगर जैसे ही हमारे 25 साला भतीजे को हमारी कार ड्राइविंग सीखने के बारे में पता चला तो वह खुद हमारे पास आ कर कहने लगा कि भला उस के होते हुए हमें महंगे ड्राइविंग स्कूल में पैसे गलाने की जरूरत क्या है. उस की इस बात पर हम ने सवालिया नजरों से उसे देखा तो ?ाट से उस ने उस की जेब में रखा हुआ ड्राइविंग लाइसैंस दिखाया. अब साहब यह तो गाड़ी सीखने में पहली चीज थी जो चाहिए थी और हमें याद आया कि ये सरकारी कागज तो हमारे पास हैं ही नहीं.
अब यह समस्या हम ने भतीजे अरशद से डिस्कस करी तो उस ने बताया कि डीएल के बिना तो सड़क पर गाड़ी चलाना कानूनन गलत है इसलिए पहले ङीएल की जरूरत बड़ी शिद्दत से महसूस हुई और इस समस्या का हल भी अरशद ने फौरन ही बता दिया कि दलाल को 2 नंबर में पैसे देने से ङीएल आसानी से और जल्दी बन जाएगा.

मैं वह नहीं: भाग 1- आखिर पाली क्यों प्रेम करने से डरती थी

आज कालेज में पाली का आखिरी दिन था. उस के साथ के सभी स्टूडैंट्स बहुत खुश दिखाई दे रहे थे. एक वही थी जो आज भी चुपचाप खिड़की के पास बैठ कर बाहर ?ांक रही थी.

रितु ने पूछा, ‘‘तुम ने घर जाने की तैयारी कर ली पाली?’’

‘‘कर लूंगी इतनी भी क्या जल्दी है.’’

‘‘क्या बात है पाली तुम घर जाने के नाम से सीरियस क्यों हो जाती हो? घर जाना सब को अच्छा लगता है. मेरी मम्मी के रोज फोन आ रहे हैं कि कब आ रही हो. वे मु?ो लेने आने वाले थे पर मैं ने ही मना कर दिया.’’

रितु की बात का पाली ने कोई उत्तर नहीं दिया और वैसे ही चुपचाप बाहर देखती रही.

4 साल से वे दोनों बीटैक करने के दौरान एकसाथ एक ही कमरे में रहती आ रही थी. इतना तो वह सम?ा गई थी कि पाली यहां से जाने के लिए तैयार नहीं. मजबूरी है कि डिगरी पूरी होते ही 2-4 दिन से ज्यादा वह यहां नहीं रह सकती.

‘‘तुम चाहो तो कुछ दिनों के लिए मेरे साथ आ सकती हो पाली. मम्मी को खुशी होगी.’’

‘‘फिर कभी आऊंगी,’’ छोटा सा उत्तर दे कर उस ने बात खत्म कर दी.

रितु अपना सामान पैक करने में व्यस्त थी. पाली के पास वैसे भी बहुत ज्यादा सामान नहीं था. वह चाहती तो कब का उसे समेट सकती थी लेकिन उस ने अपनी ओर से अभी तक कोई तैयारी नहीं की थी. शाम के समय वह रोज की तरह थोड़ी देर के लिए होस्टल के सामने वाले पार्क में चली आई. वहां पर उस का सहपाठी पार्थ उस का इंतजार कर रहा था. उस ने भी वही प्रश्न दोहरा दिया.

‘‘मु?ो घर जाने की जल्दी नहीं है. जब मन करेगा चली जाऊंगी. तुम कब जा रहे हो?’’

‘‘कल शाम की ट्रेन से निकल जाऊंगा. तुम चाहो तो 1-2 दिन रुक सकता हूं.’’

‘‘इस की जरूरत नहीं है. मु?ो अकेले रहना ज्यादा अच्छा लगता है,’’ कह कर पाली ने बात खत्म कर दी.

पिछले कई सालों से वे दोनों एकसाथ पढ़ रहे थे. पार्थ को वह बहुत अच्छी लगती थी. वह खुद भी बहुत हैंडसम और स्मार्ट था. उस के लिए लड़कियों की कमी नहीं थी

फिर भी उसे गुमसुम अपने में ही मस्त रहने वाली पाली अच्छी लगती. वह उस से बात करने के अवसर ढूंढ़ता रहता पर पाली उसे नजरअंदाज करती रहती.

‘‘आगे क्या करने का इरादा है?’’

‘‘अभी कुछ सोचा नहीं है. घर जा कर सोचूंगी.’’

‘‘मेरे लिए जौब का औफर आ गया है. कुछ दिन घर में बिता कर जौइन कर लूंगा. तुम चाहो तो तुम्हारे लिए भी कोशिश कर सकता हूं.’’

‘‘अभी रहने दो. जरूरत होगी तो बता दूंगी,’’ वह बोली.

पार्थ ने उस की बात का जरा भी बुरा नहीं माना. जानता था वह ऐसी ही है. थोड़ी देर बाद वह बोला, ‘‘कहीं घूम आते हैं फिर पता नहीं साथ बैठ कर कब कौफी पीने का मौका मिले.’’

पार्थ के कहने पर पाली उस के साथ सड़क पार एक छोटे से कैफे में आ गई. पार्थ को अच्छा लगा. उस ने इस समय उस की बात काटी नहीं.

‘‘मैं तुम्हें बहुत मिस करूंगा पाली,’’ पार्थ बोला तो उस ने नजरें उठा कर देखा और बोली कुछ नहीं.

कौफी खत्म करते ही पाली बोली, ‘‘चलते हैं. तुम्हें घर जाने की तैयारी करनी होगी.’’

4 साल का साथ इस तरह छूटने का पार्थ को बुरा लग रहा था. उसे कम से कम आज पाली से ऐसे ठंडे व्यवहार की उम्मीद नहीं थी. अगले दिन पार्थ अपने घर चला गया और पाली भी सामान समेट कर जाने की तैयारी करने लगी.

रितु बोली, ‘‘मैं मदद कर दूं?’’

‘‘नहीं मैं कर लूंगी.’’

‘‘फोन करती रहना. मु?ो तुम्हारी बहुत याद आएगी. भूलना मत.’’

‘‘कर दूंगी पर कभी मिस हो जाए तो बुरा मत मानना,’’ पाली बोली.

रितु की नजर बारबार घड़ी पर लगी हुई थी. उस ने कैब बुला ली. जाते समय पाली उसे छोड़ने बाहर तक आई. उस के गले लगा कर बैस्ट औफ जर्नी कह कर हाथ हिला उसे विदा किया. आज रात उसे कमरे में अकेले ही रहना था.

शाम को थोड़ी देर अकेले पार्क में बिता कर पाली कमरे में चली आई. उस के साथ पढ़ने वाले सभी साथी 1-1 कर के जा रहे थे. उस ने भी अगले दिन घर जाने का प्रोग्राम बना लिया और इस की सूचना अपनी छोटी बहन मौली को दे दी. उसे पापामम्मी को खबर करने के बजाय मौली से बात करना अच्छा लगता .वह जानती थी मौली यह बात सब को बता देगी.

पापा ने मौली से पूछा, ‘‘वह कैसे आ रही है ट्रेन से या टैक्सी से?’’

‘‘मैं ने पूछा नहीं पापा. जब चलोगी तो बता देगी. आप तो जानते हैं ज्यादा पूछने पर वह बात का जवाब नहीं देती,’’ मौली बोली तो रूपेश चुप हो गए. उन्हें बेटी की आदतें पता थीं.

घर पर पाली किसी से ज्यादा बात न करती. बस थोड़ीबहुत बातें उस की मौली से हो जातीं. मम्मी से तो जैसे उस का कोई नाता ही न था. अपनी जरूरत की बातें भी वह मौली के माध्यम से उन तक पहुंचा देती.

कई बार रूपेश ने उसे सम?ाया, ‘‘पाली, अब तुम छोटी नहीं रह गई हो. मम्मी से खुल कर बात किया करो कम से कम अपनी जरूरत की बातें उन्हें बता दिया करो .वह कितनी परेशान हो जाती है.’’

‘‘आई एम सौरी पापा,’’ कह कर वह बात खत्म कर देती.

रितु ने रात को फोन पर बात कर उस का हालचाल पूछा, ‘‘मेरे बगैर तुम्हें कमरे में अच्छा नहीं लग रहा होगा?’’

‘‘हां खालीपन लग रहा है. एक रात की बात है कल मैं भी चली जाऊंगी.’’

‘‘पाली जिंदगी खुल कर जीना सीखो यार. क्यों इस तरह से बु?ाबु?ा रहती हो. पार्थ तुम्हें बहुत पसंद करता है. हर समय तुम्हारे आगेपीछे घूमता रहता है फिर भी तुम उस से बात करने में कतराती हो.’’

‘‘जिस बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं है तुम बारबार वही क्यों पूछती हो मैं जैसी हूं ठीक हूं. मु?ो अपने से कोई शिकायत नहीं.’’

‘‘लेकिन मु?ो है. इतने सालों में तुम जरा भी नहीं बदली. जिस तरह पहले दिन हम मिले थे आखिर तक भी तुम्हारा बरताव वैसा ही ठंडा बना रहा. रिश्तों में थोड़ी गरमाहट हो तो वे बड़ा सुकून देते हैं.’’ रितु बोली.

पाली चुप हो गई. वह कुछ कह कर अपने जज्बात किसी से सा?ा नहीं करना चाहती थी.

‘‘मेरी बात बुरी लगी हो तो हवा में उड़ा देना. तुम तो जानती हो मैं ऐसी ही हूं,’’ कह कर रितु ने फोन रख दिया.

थोड़ी देर बाद मौली का फोन आ गया, ‘‘दी, आज तुम कमरे में अकेली हो. दोस्तों से बात करने का अच्छा मौका मिल रहा होगा.’’

‘‘मु?ो रितु के साथ भी कोई परेशानी नहीं  थी मौली. वह बहुत अच्छी लड़की है. मेरा बहुत खयाल रखती थी.’’

‘‘मैं तुम्हारा बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रही हूं दी. कल कब तक पहुंचोगी?’’

‘‘शाम तक आ जाऊंगी. तब तक तुम भी कालेज से घर पहुंच जाओगी.’’

‘‘ठीक है कल मिलते हैं बाय,’’ कह कर मौली ने फोन रख दिया.

आज पाली को रितु की कमी खल रही थी लेकिन दूसरे ही क्षण उस ने इस विचार को ?ाटक दिया और सोने की कोशिश करने लगी. सुबह आराम से नाश्ता करने के बाद वह कैब से स्टेशन चली आई. इस शहर के छूटने का उसे जरा भी दुख नहीं हो रहा था. इतने साल पढ़ाई के दौरान भी उसे यहां से कोई खास लगाव नहीं रहा. वह पता नहीं किस मिट्टी की बनी थी. न उसे दोस्तों से लगाव था और न ही उस जगह से जहां वह रह रही थी. पार्थ ने फोन कर के उस का हालचाल पूछ लिया था. उसे अच्छा लगा जब उस ने सुना वह आज घर जा रही है.

‘‘मैं तुम्हें याद कर रहा हूं पाली. यह बात तुम जानती हो फिर भी कभी अपने मुंह से कुछ नहीं कहती. कभी तो 2 शब्द प्यार के बोल कर मेरा भी हौसला बढ़ा दिया करो. मैं ही अपनी

ओर से बगैर पूछे तुम पर अपने जज्बात लादता रहता हूं.’’

‘‘तुम्हारी जिंदगी तुम्हारे हिसाब से और मेरी मेरे हिसाब से चलेगी पार्थ. हमें दोनों को एकसाथ मिलाना नहीं चाहिए.’’

‘‘मैं चाहता हूं हम दोनों मिल कर एकसाथ जिंदगी शुरू करें लेकिन तुम्हारे मन की बात न जान कर अकसर हिचक जाता हूं. सम?ा नहीं आता तुम क्यों इस तरह से व्यवहार करती हो.’’

‘‘तुम अपने व्यवहार के लिए स्वतंत्र हो. मैं ने तुम्हें कभी फोर्स नहीं किया कि तुम मु?ा से आ कर मिला करो. यह तुम्हारी इच्छा है कि तुम मु?ा से आ कर बात करते हो.’’

‘‘तुम्हें मु?ा से मिलना अच्छा नहीं लगता?’’ पार्थ ने पूछा.

पाली ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘ठीक है घर जा कर इस बारे में सोचना,’’ कह कर पार्थ ने बात खत्म कर दी.

पाली असमंजस में थी उसे क्या जवाब दे. पार्थ से बात करना उसे अच्छा लगता था लेकिन एक सीमा तक. उस से आगे न वह कभी खुद बढ़ी और न उस ने कभी उसे बढ़ने का मौका दिया. वह भी एक सुल?ा हुआ लड़का था. उसने उस की इच्छा के खिलाफ कभी कुछ करने

की नहीं सोची. यह बात पाली भी भलीभांति जानती थी. कालेज में उस के लिए लड़कियों की कमी न थी. समय काटने के लिए वह किसी को भी अपना दोस्त बन सकता था फिर भी वह अपना अधिकांश समय पाली के साथ बिताना पसंद करता.

घर पर सब पाली का इंतजार कर रहे थे. रूपेश ने पूछा, ‘‘आने में दिक्कत तो नहीं हुई पाली?’’

‘‘नहीं पापा. सफर ठीक रहा.’’

जिया चाह कर भी उस से बात न कर सकी. वह जानती थी पाली उस की बात का कोई जवाब नहीं देगी. वह बोली, ‘‘तुम फ्रैश हो जाओ पाली. मैं खाना लगा देती हूं.’’

मां के कहने पर वह कमरे में आ गई. मौली अभी कालेज से नहीं आई थी इसीलिए घर

बहुत शांत लग रहा था वरना उस की बातों से घर गूंजता रहता. कुछ देर में मौली आ गई और पाली के गले लगते हुए बोली, ‘‘दी, अब तुम यहीं रहोगी कहीं नहीं जाओगी. मु?ो तुम्हारे बगैर अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘तुम आते ही जाने की बात करने लगी.’’

‘‘जानती हूं तुम ने जो सोचा होगा वह

कर के रहोगी इसीलिए मैं ने तुम्हें अपनी इच्छा बता दी.’’

‘‘ठीक है बाबा नहीं जाऊंगी,’’ पाली बोली और फिर दोनों खाने की टेबल पर आ गईं.

पाली को सम?ा नहीं आ रहा था कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद वह आगे क्या करेगी? रिजल्ट आने में अभी 1 महीने का समय बाकी था. वह पढ़ाईलिखाई में बहुत अच्छी थी. पापा की इच्छा थी वह इंजीनियर बने इसीलिए उस ने बीटैक की पढ़ाई की.

रूपेश आते ही उस से यह प्रश्न नहीं करना चाहते थे. अगले दिन मौली उसे ले कर बाजार

आ गई.

‘‘दी, मु?ो कुछ ड्रैस खरीदनी है. दोनों साथ मिल कर खरीदेंगी.’’

‘‘मेरे पास बहुत ड्रैसेज हैं. मु?ो कुछ नहीं लेना.’’

‘‘जानती थी तुम्हारा यही जवाब होगा. आज तुम्हें एक ड्रैस मेरे हिसाब से भी लेनी होगी. तुम इतनी सुंदर हो तो फिर भी तुम अपना खयाल नहीं रखती हो. मेरे फीचर तुम्हारे जैसे होते तो मैं अपनेआप को किसी हीरोइन से कम नहीं सम?ाती.’’

उस की बात सुन कर पाली मुसकरा दी.

उस ने ?ाठ नहीं कहा था. मौली के मुकाबले वह देखने में बहुत सुंदर थी फिर भी उसे सजनेसंवरने का कोई शौक नहीं था. सच पूछा जाए तो उसे जीवन में कोई शौक था ही नहीं. उसे खुद पता नहीं था उसे क्या करना है?

पाली के साथ के स्टूडैंट्स ने मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने का मन बना लिया था और वे उस के लिए प्रयास भी करने लगे थे. पाली का इस में भी कोई रु?ान नहीं था. इतना वह भी जानती थी कि पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ा होना आज के समय में बहुत जरूरी है.

पाली इस के लिए अपने को मानसिक रूप से तैयार भी कर रही थी लेकिन कहां जौब करेगी यह उस ने अभी सोचा नहीं था. पार्थ ने उस से कहा था साथ मिल कर जौब कर लेंगे लेकिन उस ने उस की बात को भी अनसुना कर दिया था.

1 हफ्ता गुजर जाने के बाद रूपेश ने पूछा, ‘‘पाली, तुम्हारा भविष्य के बारे में क्या इरादा है?’’

‘‘रिजल्ट आने के बाद ही कुछ निर्णय लूंगी. अभी से कुछ नहीं कह सकती.’’

‘‘तुम्हारे सामने 2 विकल्प हैं नौकरी और पढ़ाई. उन में से तुम्हें जो ठीक लगे वह कर लेना. दोनों के लिए ही तुम्हें घर से बाहर जाना होगा.’’

‘‘जानती हूं पापा और इस के लिए मानसिक रूप से तैयार भी हूं,’’ संक्षिप्त सा उत्तर दे कर उस ने बात खत्म कर दी.

जिया कभी भी पाली पर अपनी इच्छा नहीं थोपती और अपनी ओर से उसे खुश रखने की कोशिश करती. फिर भी वह जिया से पर्याप्त दूरी बना कर रखती. पता नहीं उस के मन में क्या था जिसे वह कभी खुल कर किसी से कह नहीं पाई. यह सच था जिया उस की सौतेली मां थी.

पाली की मम्मी की बर्षों पहले कैंसर के कारण मौत हो गई थी. पाली उस समय मात्र 6 साल की थी. बेटी की परवरिश के लिए रूपेश ने जिया से दूसरी शादी कर ली थी. जिया स्वभाव से सरल थी. उस ने पाली को पूरे दिल से अपनाने की कोशिश की थी लेकिन इतने छोटे बच्चों के मन में कब कैसे सौतेली मां की गांठ लग गई वह सम?ा नहीं पाई.

मौली जिया की अपनी बेटी थी. वह कभी दोनों में कोई अंतर न करती. मौली पाली से बहुत प्यार करती थी. जैसेजैसे पाली बड़ी हो रही थी उस ने पापा से भी बात करना बहुत कम कर दिया था. अब उन के बीच में बात का माध्यम मौली थी जो अपनी चटपटी बातों से सब का दिल बहलाए रहती और साथ ही पाली की जरूरतें मम्मीपापा तक पहुंचाती रहती.

पाली के बगैर पार्थ का दिल नहीं लग रहा था. वह उसे अपने दिल की हर बात बताना चाहता था लेकिन वह इस का मौका ही नहीं देती. आपसी बातचीत में भी पार्थ ही बातें करता रहता. वह केवल उस की बातें सुनती और बहुत जरूरी हो तब छोटा सा उत्तर दे कर बात खत्म कर देती. उस ने अपने जज्बात रितु के हाथों उस तक पहुंचाने की कोशिश की थी. बदले में उस ने उसे पाली की मनोदशा बता दी.

‘‘तुम जानते हो हम दोनों रूम पार्टनर है लेकिन वह अपनी कोई बात मु?ा से भी नहीं कहती. मु?ो भी उस के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं है. वह फोन पर भी किसी से ज्यादा बात

नहीं करती. छोटी बहन से उस की बौंडिंग अच्छी है. वही अकसर इस से बातें करती रहती है.

तभी उस के चेहरे पर जरा सी मुसकान दिखाई देती है अन्यथा वह गुमसुम सी किताबों में ही खोई रहती है.’’

‘‘उस ने कभी मेरे बारे में तुम से बात नहीं की?’’

‘‘वह किसी के बारे में कोई बात नहीं करती यह तुम अच्छी तरह जानते हो. मेरी भी हिम्मत नहीं पड़ती कि उस से ज्यादा कुछ पूछ सकूं.’’

पार्थ को सम?ा नहीं आ रहा था पाली के बारे में कैसे जानकारी जुटाए. जब तक दोनों

साथ पढ़ रहे थे कम से कम उस का चेहरा तो दिखाई दे जाता था. अब वह यहां से दूर चली गई थी तो वह बेचैन हो गया. उस ने मन बना लिया कि वह लखनऊ जा कर उस के बारे में सबकुछ पता करेगा.

1 हफ्ता घर में बिता कर पार्थ लखनऊ के लिए निकल गया. रितु ने उस के घर का पता दे दिया था और मौली के बारे में भी जितनी जानकारी वह फोन पर सुनती थी वह उसे दे दी.

पार्थ पाली के घर से कुछ दूरी पर खड़ा हो कर मौली का इंतजार कर रहा था. कालेज

से आते हुए वह घर के मोड़ पर दिखाई दे गई. पार्थ तेज कदमों से उस के पास पहुंच गया. बोला, ‘‘सुनिए.’’

एक अनजान लड़के को सामने देख कर मौली ने बुरा सा मुंह बनाया.

‘‘प्लीज, मेरी मदद कीजिए. मैं पाली का क्लासफैलो हूं. मेरा नाम पार्थ है. हम दोनों अच्छे दोस्त हैं.’’

‘‘दी ने कभी आप के बारे में कोई जिक्र नहीं किया.’’

‘‘वह किसी का भी जिक्र कहां करती है. तभी तो मु?ो यहां आना पड़ा,’’ कह कर उस से फोन पर रितु और पाली के साथ अपने बहुत सारे फोटो दिखा दिए. मौली को यकीन हो गया कि वह सही कह रहा है.

‘‘पाली के बारे में कुछ जानना चाहता हूं. क्या आप मु?ो कुछ समय दे सकेंगी?’’

‘‘मैं 1 घंटे बाद आप से मिलती हूं. आप मेरा पार्क में इंतजार कीजिए.’’

‘‘प्लीज, इस बारे में पाली को कुछ मत बताइगा.’’

‘‘मैं आप की स्थिति सम?ा सकती हूं,’’ मौली बोली.

पार्थ वहां से जा कर कुछ दूरी पर स्थित पार्क में मौली का इंतजार करने लगा.

1 घंटे बाद मौली आ गई, ‘‘कहिए आप क्या पूछना चाहते हैं?’’

सिंदूर का हक: आखिर शन्नो का क्या था राज

स्नेहाका मोबाइल दोबारा बजने लगा. स्नेहा बाथरूम से अभी नहीं निकली थी. अत: सलिल को मोबाइल उठाना पड़ा. सलिल के हैलो कहते ही दूसरी ओर से एक लड़की ने सिसकते हुए पूछा, ‘‘स्नेहा
दीदी हैं?’’

‘‘हां, अभी बाथरूम में है.’’ ‘‘आप उन्हें बता देना कि शरणा दीदी नहीं रहीं.’’ यह सुनते ही सलिल सकते में आ गया. शरणा यानी शरणवती उर्फ शन्नो. स्नेहा की बचपन की अभिन्न सहेली. शन्नो के वर्षों बाद अचानक स्नेहा से मिलने पर सलिल की जिंदगी बेहद सहज हो गई थी. उस की सब से बड़ी समस्या थी स्नेहा और बच्चों को बोरियत से बचाने के लिए सप्ताह में 1 बार बाहर ले जाने की वजह से छुट्टी के दिन भी आराम न कर पाना. शन्नो के मिलते ही इस समस्या का समाधान हो गया था. शन्नो एक टीवी चैनल में न्यूज ऐडिटर थी.

वह फुरसत मिलते ही स्नेहा और बच्चों को घुमाने ले जाती थी. स्नेहा के कहने पर गाड़ी भी भेज देती थी, जिस से स्नेहा वे सभी काम कर लेती थी जिन्हें करने के लिए सलिल को आधे दिन की छुट्टी लेनी पड़ती थी. सब से अच्छी बात यह थी कि दोनों सहेलियों ने अपनी दोस्ती कभी सलिल पर नहीं थोपी थी. न तो स्नेहा उसे शन्नो के घर चलने को कहती थी और न ही जबतब शन्नो को अपने घर बुलाती थी. यदाकदा शन्नो से मिलना सलिल को भी अच्छा लगता था. दोनों में सालीजीजा वाली नोक झोंक हो जाती थी.

कुछ महीने पहले स्नेहा ने उसे बताया था कि शन्नो दिल की मरीज है और पेसमेकर के सहारे जी रही है, लेकिन उस का इतनी जल्दी और इस तरह चले जाना अप्रत्याशित था. न जाने स्नेहा इस आघात को कैसे झेलेगी?

चूंकि वह कल रात ही टूअर से लौटा था, इसलिए आज औफिस जाना जरूरी था. लेकिन उस से भी ज्यादा स्नेहा के साथ रहना, जरूरी है सलिल ने सोचा. फिर उस ने दबी जबान स्नेहा को यह बताया.

‘‘यह तो होना ही था,’’ स्नेहा ने उसांस ले कर कहा, ‘‘1 सप्ताह से असपताल में थी. डाक्टरों के यह कहते ही कि पेस मेकर कभी भी साथ छोड़ सकता है, मैं ने आप से बगैर सलाह किए बच्चों को छुट्टियां मनाने राधिका भाभी और उन के बच्चों के साथ पंचमढ़ी भेजना बेहतर सम झा.’’

‘‘ठीक किया स्नेहा, बच्चों को शन्नो मौसी से कितना स्नेह हो गया था. उसे अस्पताल में देख कर व्यथित हो जाते,’’ सलिल बोला, ‘‘दुखी तो खैर अभी भी बहुत होंगे.’’

‘‘वह तो स्वाभाविक है,’’ कह कर स्नेहा ने मोबाइल उठा लिया, ‘‘माधवी, कब हुआ यह सब… बौडी को और्गन डोनेशन के लिए भिजवा दिया… तो तुम भी घर चली जाओ… मैं कुछ देर में वहीं आ रही हूं… जिसे भी खबर करनी है उस की लिस्ट बना लो. मैं आने के बाद फोन कर दूंगी,’’ और फिर स्नेहा मोबाइल बंद कर किचन की ओर बढ़ गई.

‘‘बस 1 कप चाय दे दो स्नेहा, नाश्ते के चक्कर में मत पड़ो,’’ सलिल ने धीरे से कहा.

‘‘नाश्ता बनाने में कुछ देर नहीं लगती. लंच नहीं बना सकूंगी, औफिस की कैंटीन से ही कुछ मंगवा लेना.’’

‘‘मैं आज औफिस नहीं जा रहा. तुम्हारे साथ चल रहा हूं स्नेहा… कितनी भी सादगी से करो अंतिम संस्कार फिर भी बहुत काम होते हैं.’’

‘‘उन्हें संभालने के लिए रमण भैया हैं.’’

‘‘रमण भैया शन्नो को जानते हैं?’’ सलिल ने हैरानी से पूछा.

राजस्व विभाग का उच्चाधिकारी राधारमण स्नेहा का फुफेरा भाई था. इसलिए अकसर मुलाकात होती रहती थी. लेकिन शन्नो के बारे में दोनों भाईबहन को कभी बात करते नहीं देखा था.

‘‘आप को बताया तो था कि रमण भैया एम.कौम. और फिर प्रशासनिक प्रतियोगी परीक्षा की पढ़ाई के लिए 3 साल तक हमारे ही घर में रहे थे. फिर सामने की कोठी में रहने वाली मेरी अभिन्न सहेली शन्नो को कैसे नहीं जानेंगे?’’

‘‘फिर तुम ने कभी रमण भैया के परिवार के साथ चाय या खाने पर शन्नो को क्यों नहीं बुलाया? कभी उन लोगों से शन्नो के बारे में बात भी नहीं की. मु झे भी यह तो नहीं बताया कि उन दोनों में भी इतनी अभिन्नता है कि अपने सब कामधाम छोड़ कर अतिव्यस्त रमण भैया उस के अंतिम संस्कार का ताम झाम
संभालने को मौजूद हैं?’’ सलिल ने शिकायती स्वर में पूछा.

स्नेहा हैरान हो कर कुछ देर चुप रही, फिर गहरी सांस ले कर बोली, ‘‘किसी के जीवन के बंद परिच्छेद खोलने का मु झे हक तो नहीं है. मगर अब जब तुम्हारी जिज्ञासा जगा ही दी है तो चलो, आज पूरी कहानी सुना देती हूं…

‘‘रमण भैया और शन्नो को पहली नजर में ही प्यार हो गया था और मेरे सहयोग से वह प्यार परवान चढ़ने लगा. जातपांत का लफड़ा नहीं था. फिर मेधावी भैया प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर ही रहे थे.
‘‘शन्नो पूरी तरह आश्वस्त थी कि उस के घमंडी आला अफसर पिता को प्रशासनिक अधिकारी रमण भैया से उस की शादी करने में कोई एतराज नहीं होगा. अत: वह बेखटके भैया के साथ प्यार की पींगें बढ़ा रही थी. 3 साल तक बगैर किसी को पता चले सब कुछ मजे में चलता रहा.

‘‘हमारी एम.ए. की और भैया की प्रतियोगी परीक्षाएं शुरू होने वाली थी. उस के बाद भैया का हमारे घर रुकने और दोनों की शादी 2 वर्षों तक होने का सवाल ही नहीं था. यह सोच कर भैया खासकर शन्नो बहुत परेशान रहती थी.

‘‘इसी बीच एक दिन बूआजी ने फोन कर बताया कि उन्होंने रमण भैया की छोटी बहन का रिश्ता उस की पसंद के लड़के से तय कर दिया है. भैया को लगा कि जब बहन का रिश्ता उस की पसंद से हो सकता है तो उन का क्यों नहीं और फिर छोटी बहन की शादी के बाद तो उन की शादी में कोई अड़चन भी नहीं रहनी चाहिए. इस सब से आश्वस्त हो कर भैया ने होली पर गुलाल के बजाय शन्नो की मांग में सिंदूर भर दिया. हालांकि शन्नो ने उस सिंदूर को सिर पर ढेर सा गुलाल डलवा कर छिपा दिया, लेकिन वह उस की मां की पैनी नजरों से नहीं छिप सका और यह भी कि यह भरा किस ने.

‘‘शन्नो की जितनी लानतमलानत होनी थी हुई और उस के हमारे घर आने और फोन करने पर रोक लग गई. शन्नो के यह कहने पर कि भैया उस के लिए सर्वथा उपयुक्त हैं और प्रतियोगी परीक्षा दे रहे हैं उस के पिता ने व्यंग्य से कहा कि दूसरों के घर रहने और लड़कियों से आंख लड़ाने वाले लड़के का इस परीक्षा में पास होने का सवाल ही नहीं उठता. न ही बिजनौर में वकालत करने वाले रमण के बाप की हैसियत उन का समधी बनने लायक है. अत: शन्नो पर रमण की परछाईं भी नहीं पड़नी चाहिए.

‘‘परीक्षा दिलवाने के लिए भी शन्नो की मां उसे छोड़ने और लेने आती थीं. लेकिन परीक्षा हौल से बाहर निकलने के पहले मैं और शन्नो बात कर लिया करती थीं. उसे भैया का पत्र दे देती थी और उस से भैया का ले लेती थी. शन्नो ने बताया था कि पापा ने वहां से बदली करवा ली है. उस की परीक्षा खत्म होते ही वहां से चले जाएंगे. कहां जाएंगे, यह किसी को नहीं बता रहे. भैया ने उसे आश्वस्त कर दिया कि किसी भी सरकारी अफसर का पताठिकाना खोजना मुश्किल नहीं होता. कहीं भी चले जाएं, प्रशासनिक सेवा में चयन होते ही वह उस के पिता से मिलने आएंगे. शन्नो बस तब तक अपनी शादी टाल दे.

‘‘शन्नो ने भी आश्वासन दिया था कि व्यावसायिक कोर्स करने के बहाने 2 वर्ष आसानी से शादी टाली जा सकती है. ‘‘शन्नो की परीक्षा खत्म होने की अगली सुबह ही उन की कोठी पर ताला लगा हुआ दिखा. कुछ रोज के बाद भैया भी अपने घर चले गए और मैं दीदी के पास छुट्टियों में पुणे. वहां जीजू के कहने पर मैं ने कंप्यूटर सीखा तो समय गुजारने को था, लेकिन उस में मु झे इतना मजा आया कि मैं ने उसी में स्पैशलाइजेशन करने का फैसला किया और उस के लिए दीदी के पास ही रहने लगी. फिर वहीं तुम से मुलाकात हो गई. कुछ समय बाद पता चला कि रमण भैया का चयन राजस्व सेवा में हो गया है और उन की शादी हो रही है. सुन कर धक्का तो लगा था, लेकिन तब तक मेरी दुनिया तुम्हारे नाम से शुरू और खत्म होने लगी थी. अत: न तो मैं ने रमण भैया से संपर्क किया, न ही उन की शादी में गई और न ही वे मेरी शादी में आए. शन्नो ने भी मु झ से संपर्क नहीं किया. मेरे पास तो उस का अतापता भी न था.

‘‘कई वर्षों बाद रमण भैया की पोस्टिंग यहां होने पर मुलाकात हुई. वह राधिका भाभी और बच्चों के साथ खुश थे. अत: मैं ने भी पुरानी बातों का जिक्र करना मुनासिब नहीं सम झा. लेकिन एक दिन भाभी और बच्चों की गैरहाजिरी में भैया ने मु झे बताया कि पढ़ाई पूरी कर के उन के घर लौटने से पहले ही उन के मातापिता ने उन का सौदा राधिका भाभी के साथ कर के उन के दहेज में मिलने वाली राशि के बल पर छोटी बहन का उस की पसंद के लड़के से धूमधाम से रोका भी कर दिया था. छोटी बहन की खुशी की खातिर भैया के पास चुपचाप बिकने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था.’’

गनीमत यह थी कि राधिका भाभी उन के सर्वथा अनुकूल थीं. फिर भी वे आज तक अपने पहले प्यार शन्नो को नहीं भूल सके थे. उन्होंने ही मु झे बताया कि शन्नो यहीं एक चैनल में न्यूज ऐडिटर है. शादी तो नहीं की थी, लेकिन अपनी उपलब्धियों और परिवेश में पूर्णतया संतुष्ट लगती थी. इसलिए वे उस से मिल कर अपने और उस के स्थिर जीवन में उथलपुथल नहीं मचाना चाहते. लेकिन चाहते थे कि मैं उस से मिलूं, शन्नो से मिलने को तो मैं स्वयं भी तड़प रही थी. शुरू में तो शन्नो भी मु झे खुश ही लगी और मैं ने भी रमण भैया या उस के व्यक्तिगत जीवन के बारे में बात नहीं की, लेकिन एक दिन अचानक तबीयत खराब होने पर उस ने मु झे बताया कि उसे अब तक 2 बार हार्टअटैक हो चुका है और वह पेसमेकर के सहारे जी रही है.’’
‘‘लेकिन अब मु झ से मिलने के बाद वह चैन से मरेगी. उसे विश्वास है कि मैं उसे उस के सिंदूर का हक जरूर दिलवा दूंगी यानी रमण के हाथों अग्निदाह. मु झे स्तब्ध देख कर उस ने कहा कि उस ने हमेशा रमण की खोजखबर रखी है. उसे रमण से कोई शिकायत नहीं है. उस के द्वारा मांग में भरे गए सिंदूर और यादों के सहारे जिंदगी तो गुजार ली है, लेकिन मरने के बाद अपने सिंदूर का हक जरूर चाहेगी, यानी एक सुहागिन जैसी मौत और मौत बारबार तो होगी नहीं.’’

‘‘मेरे यह कहने पर कि भैया उसे भूले नहीं हैं और वह जब चाहे मेरे घर पर रमण भैया से बेखटके मिल सकती है तो शन्नो ने यह कह कर मिलने से मना कर दिया कि कितने भी सतर्क रहो, ऐसी बातों को छिपाना आसान नहीं होता है और इस से रमण की सुखी गृहस्थी बरबाद हो सकती है.

‘‘अंतिम संस्कार के लिए भी मु झे रमण को बुलाने के लिए शन्नो को अपनी दूर की रिश्तेदार बनाना पड़ेगा, शन्नो को तो मैं ने आश्वस्त कर दिया, लेकिन रमण भैया को सब बातें बता दीं और दुखी विह्वाल तो खैर होना ही था और बहुत हुए भी. उन्होंने भी मु झ से वादा लिया कि जब भी शन्नो की तबीयत खराब हो मैं उन्हें खबर कर दूं. वे उस के अंतिम दिनों में बगैर किसी की परवाह किए उस के साथ रहेंगे और राधिका को उस समय जो ठीक सम झेंगे वह बता देंगे.

‘‘पिछले सप्ताह शन्नो की तबीयत के बारे में पता चलते ही मैं ने रमण भैया को खबर कर दी फिर सब बच्चों को उकसाया कि उन्हें छुट्टियों में बाहर घूमने जाना चाहिए. फिर किसी तरह राधिका भाभी को उन के साथ पचमढ़ी भिजवा दिया ताकि रमण भैया इतमीनान से शन्नो के पास रह सकें.’’

‘‘मु झे तसल्ली है कि मैं ने अपनी सहेली को उस के अंतिम दिनों में रमण भैया का भरपूर सान्निध्य और उस के सिंदूर का हक दिलवा दिया. मैं नहीं चाहती कि तुम मेरे साथ चल कर रमण भैया को अपने कर्तव्य निर्वहन से रोको,’’ स्नेहा ने अनुरोध किया.

‘‘बेफिक्र रहो स्नेहा, जितना हक शन्नो का अपने सिंदूर पर था उतना ही कर्तव्य रमण भैया का भी उस सिंदूर की लाज रखने का है,’’ सलिल ने गहरी सांस लेते हुए कहा, ‘‘मैं रमण भैया से वह कर्तव्य निभाने का सुख और उन की गोपनीयता नहीं छीनूंगा.’’

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