साइको किलर नहीं साइको वायलैंट लड़की को कैसे पहचाने

Psycho violent: हरियाणा के पानीपत में खूबसूरत बच्चियों की हत्या करने वाली साइको लेडी किलर को हाल ही में गिरफ्तार किया गया है. उस ने 3 लड़की 1 लड़के की हत्या की बात कबूली है.

खूबसूरत बच्चियां देख जल जाती थी यह साइको किलर

सनकी साइको पूनम 2023 से 2025 तक अपने ही परिवार व रिश्तेदारों के 4 बच्चों को मौत के घाट उतार चुकी है. इसे खूबसूरत बच्चियां देख तनबदन में आग लगती थी.

मर्डर के बाद जश्न मनाती थी

यह चाहती थी कि उस से सुंदर कोई न हो परिवार में. खूबसूरत बच्चियों को देख कर उस के अंदर जलन पैदा होती थी. फिर शुरू होती थी ईर्ष्या, गुस्सा और धीरेधीरे हत्या का प्लान.

पुलिस का कहना है कि बच्चों को देख कर वह परेशान हो जाती थी. दिमाग पर जैसे कोई परदा पड़ जाता था. होश खो बैठती थी. हत्या के बाद जश्न मनाती थी.

इस लेडी के पति ने कहा है कि उसे बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि उस की पत्नी ऐसी है और वह चाहता कि उसे फांसी दे दी जाए. इस लेडी किलर को ‘साइको’ कहा जा रहा है.

साइको शब्द आमतौर पर साइकोपैथी या ऐंटीसोशल पर्सनैलिटी डिसऔर्डर (एएसपीडी) से जुड़े गंभीर लक्षणों को दर्शाने के लिए उपयोग किया जाता है. जब इस में ‘हिंसक’ पहलू जोड़ा जाता है, तो यह व्यक्ति के उन लक्षणों के साथसाथ शारीरिक या भावनात्मक आक्रामकता प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति को इंगित करता है.

इस तरह के लोग कई तरह के होते हैं. कुछ शांत बैठ कर मन में प्लानिंग करते रहते हैं और कुछ डायरी लिखते हैं, जिस में वे वारदात की हर बारीकी को समझते हैं, वे उस के इर्दगिर्द एक कहानी रचते हैं. वे यह भी सोचते हैं कि वारदात को अंजाम देते वक्त क्या पहनेंगे, सुसाइड नोट लिखते हैं. हथियार पास हो, तो उस के साथ खेलते रहते हैं, न हो तो उस की कल्पना करते हैं. ये लोग अच्छीखासी रिसर्च भी करते हैं. इस तरह की दूसरी घटनाओं के बारे में पढ़ते हैं, डौक्यूमेंट्री देखते हैं, वीडियो देखते हैं.

इस सब का मकसद पुरानी घटनाओं की नकल करना और योजना बनाना होता है. इस के अलावा ऐसी वीडियो गेम्स भी खेलते हैं जिस में उन्हें लोगों पर गोलियां चलानी होती हैं. ये लोग काफी खतरनाक होते हैं और हमारे और आप के घरों में ही मौजूद होते हैं.

अग्रेसिव इंपल्सिविटी यानि अक्रामक प्रवृति

आक्रामक आवेग का मतलब है कि व्यक्ति बिना सोचेसमझे, परिणामों की परवाह किए बिना अचानक और अत्यधिक आक्रामक या हिंसक तरीके से प्रतिक्रिया करता है. जैसे छोटीछोटी बातों पर चिल्लाना, गुस्से में तोड़फोड़ करना, सामान को इधरउधर फेंकना, हाथापाई करना आदि. गुस्से में इतना अग्रेसिव हो जाना कि उसे रोकने के लिए काफी मेहनत करनी पड़े. घर के बड़ों के काफी समझनेबुझाने से मामला शांत हो जाए, तो समझ लें कि इस प्रवृति के लोग आक्रामक लोगों की श्रेणी में आते हैं.

जानवरों के प्रति क्रूरता

कई लोगों की आदत होती है कि वे बेवजह जानवरों को तंग करते हैं जैसेकि चूहे को पिंजरे में बंद कर के उस की पूंछ को माचिस से जलाना, सर्दी के मौसम में जानवरों के सोने की जगह को पानी से गीला कर देना, उन्हें खाने को न देना. ऐसा करना एएसपीडी के लिए एक गंभीर चेतावनी संकेत है. सामने वाले को तकलीफ में देख कर इन्हें मजा आता है.

धमकी देना इन के लिए मामूली बात

अगर किसी डिलिवरी बौय से समय पर सामान न लाने या अन्य किसी बात पर किसी से कोई बहस हो जाए तो मरनेमारने तक बात पहुंचा देना. उसे जान से मारने की धमकी देना, डराना आदि कोई लड़की आप के आसपास करती है तो इसे सामान्य न समझें.

बदला लेने की प्रवृति

कुछ कह दिया तो ये उस से बदला लेने की सोच कर अपना सुखचैन सब गंवा देती हैं. भले ही वह व्यक्ति इसे मामूली नोकझोंक समझ सब भूल जाएं लेकिन ये मौके की तलाश में होती हैं और अचानक से वार कर कब बदला ले लें पता भी नहीं चलता. ये अपना काम बहुत सफाई से करती हैं. आप को पता भी नहीं चलता कि ये कई साल पहले हुए किसी छोटी सी बात को आज तक दिल में लिए बैठी थी और आज अपना बदला पूरा किया है.

गैर जिम्मेदार और जोखिमभरा व्यवहार

सुरक्षा या दूसरों के कल्याण की परवाह किए बिना लगातार जोखिम भरे काम करना, जैसेकि लापरवाह ड्राइविंग या अवैध गतिविधियों में शामिल होना. ड्राइविंग करते हुए यह नहीं सोचतीं कि ऐक्सिडेंट हो गया, ये अपने साथ किसी और की जान से भी खेल जाएंगी. समाज की एक जिम्मेदार नागरिक नहीं होतीं और कई बार अपराध करने वाले छोटेछोटे लोगों से इन का ताल्लुक होता है और हमें पता भी नहीं चलता क्योंकि वे घर की मेंबर होती हैं.

बातबात में झूठ बोलना

ऐसे लोग बेवजह झूठ बोलते हैं और बातें छिपाते हैं क्योंकि यह उन की आदत में शामिल होता है.

झूठ बोल कर दूसरों को फंसाने में इन्हें मजा आता है. हो सकता है कि यह आप की बहन ही हो जो बचपन से ही मम्मीपापा से आप की डांट पढ़वाती आ रही हो और आप इग्नोर करते आ रहे हों लेकिन इतना इग्नोर करना भी सही नहीं है क्योंकि बड़ी होते ऐसी लङकियां इस चीज में माहिर हो जाती हैं.

इस के आलावा अपने हिंसक या आक्रामक कार्यों को छिपाने या सही ठहराने के लिए लगातार और सहज रूप से झूठ बोलती हैं.

पछतावे की कमी

ऐसे लोग कितना भी बड़ा कांड कर दें लेकिन इन्हें कभी अपने किए पर पछतावा नहीं होता. भले इन्हें पता हो कि वे गलत थीं लेकिन कभी मानेंगी नहीं. सामने वाले को उलटा यह एहसास दिलाएंगी कि वे कितनी सही हैं. अपने कार्यों से दूसरों को चोट पहुंचाने के बाद ये सहानुभूति या पश्चाताप नहीं दिखातीं. गलत काम करने पर भी ये अकसर शांत और बेपरवाह रहती हैं.

मतलबी होना

ये मतलबी होती हैं और सारे रिश्ते मतलब से ही निभाती हैं. अपना काम निकल जाने पर पहचानने से भी इनकार कर देती हैं.

कम भावनात्मक नियंत्रण

वे अपनी निराशा, गुस्सा या असुविधा को नियंत्रित नहीं कर पातीं.

उत्तेजना की आवश्यकता

उन्हें ऊब से बचने और रोमांच महसूस करने के लिए लगातार हाई इंटेंसिटी की गतिविधियों की आवश्यकता होती है, जो कभीकभी आक्रामक व्यवहार की ओर ले जाता है.

आईएम दी बैस्ट

इन्हें खुद पर बहुत घमंड होता है. वे खुद को बेहद खास या दूसरों से बेहतर मानती हैं. इन्हें लगता है कि मैं दुनिया में सब से सुंदर, सब से गुणी हूं. मुझ जैसा कोई दूसरा हो ही नहीं सकता.

आसपास कोई ऐसा हो तो क्या करें

यदि आप को लगता है कि आप के आसपास कोई ऐसा है फिर चाहे वह आप का कोई अपना, कोई सगा ही क्यों न हो, तो भी उसे समाज के लिए खतरा ही मानें. कुछ अलग आपराधिक गतिविधियों में उसे लिप्त पाएं तो तुरंत पुलिस को  सूचना दें.

मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर (साइकोलोजिस्ट/साइक्राइट्रिस्ट) से निदान और सहायता लेने के लिए प्रोत्साहित करें. (हालांकि, साइकोपैथी वाले व्यक्ति शायद ही कभी खुद मदद मांगते हैं, क्योंकि उन्हें नहीं लगता कि उन के साथ कुछ गलत है). लेकिन आप उन्हें समझाबुझा कर डाक्टर के पास ले जाएं और उन का मानसिक इलाज कराएं क्योंकि वह मन से बीमार है.

ऐसे व्यक्ति से व्यवहार करते समय अपनी सुरक्षा के लिए स्पष्ट सीमाएं निर्धारित करना और जरूरत पड़ने पर दूरी बना लेना आवश्यक है.

Psycho violent

Road Accident: क्या करें क्या न करें

Road Accident: बीते महीने रोहित अपनी कार से शिमला जा रहा था. अचानक सामने से आती तेज स्पीड कार के साथ उस की कार की टक्कर हो गई. पहले तो रोहित घबरा गया लेकिन अपनी सूझबूझ से न सिर्फ उस ने अपनी बल्कि तेज स्पीड में आती कार सवार लोगों की भी जान बचा ली. उस ने बहसबाजी में न फंस कर पहले तो कार में रखे फर्स्ट ऐड बौक्स को निकला और खुद की चोट पर डिटौल लगाने लगा व 108 पर कौल कर दुर्घटनाग्रस्त जगह पर ऐंबुलेंस को बुला लिया. इस से अपने साथसाथ दूसरी कार में सवार लोगों की जान भी बचा ली.

आजकल सड़क पर बढ़ता ट्रैफिक लोगों के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है. आएदिन सड़क दुर्घटनाओं की घटनाएं सामने आती रहती हैं. लेकिन ऐसी परिस्थिति में घबराने के बजाय हमें सूझबूझ और संयम से काम लेना चाहिए. यदि आप कम चोटिल हुए हैं तो सही कदम तुरंत उठा कर न केवल अपनी, बल्कि दूसरों की जान भी बचा सकते हैं.

साथ ही कुछ ऐसी महत्त्वपूर्ण चीजें हैं, जो आप को हमेशा अपने वाहन में रखनी चाहिए क्योंकि पहले खुद को सुरक्षित रखना बहुत जरूरी है तभी हम किसी की मदद कर सकेंगे.

क्या करें

-अपने वाहन में फर्स्ट ऐड बौक्स जरूर रखें जिस में प्राथमिक उपचार में काम आने वाली चीजें रखना न भूलें, जैसे स्टरलाइज्ड गौजपैड और रोल, ऐंटीसैप्टिक सोल्यूशन (जैसे डेटौल, सेवलौन), बैंडऐड और मैडिकल टेप, दर्द कम करने की दवा (पैरासिटामोल), बर्न ओइटमैंट (बरनोल), रुई, साफ दस्ताने वगैरह.

-एक इमरजैंसी नंबर जरूर रखें ताकि यदि कोई घटना घट जाए तो घर वालों को सूचित किया जा सके.

-अपने वाहन की समयसमय पर सर्विस अवश्य कराएं ताकि ब्रेक, लाइट आदि सही स्थिति में रहें.

दोपहिया वाहन चलाते समय हमेशा हेलमेट पहनें और चारपहिया वाहन में सीटबेल्ट लगाएं.

-यदि किसी कारणवश आप के द्वारा ऐक्सिडेंट हो जाता है या आप शिकार बन जाते हैं तो घबराएं नहीं, तुरंत गाड़ी रोकें और इंजन बंद करें.

-यदि आप गंभीर रूप से चोटिल नहीं हैं तो खुद को और दूसरे यात्रियों को सुरक्षित स्थान पर ले जाएं और सामने वाले की भी मदद करें.

-घायलों को प्राथमिक उपचार दें और तुरंत एंबुलेंस (108/102) बुलाएं. साथ ही पास के थाने या 112 नंबर पर सूचना दें.

-अपने वाहन की इमरजैंसी लाइट/हैजर्ड लाइट जलाएं ताकि पीछे से आने वाले वाहन चालक सतर्क हो सकें.

-दुर्घटनास्थल की फोटो/वीडियो लें ताकि घटना का रिकौर्ड सुरक्षित रहे.

-इंश्योरैंस कंपनी को सूचित करें क्योंकि दावा (क्लेम) करने के लिए यह आवश्यक है.

-हमेशा अपने पास आवश्यक दस्तावेज रखें– ड्राइविंग लाइसेंस, आरसी, इंश्योरैंस और पौल्यूशन सर्टिफिकेट. साथ ही इन की फोटोकापी घर पर भी सुरक्षित रखें.

क्या न करें

-शांत रह कर स्थिति को संभालें. झगड़े या बहस से बचें.

-उपचार पर ध्यान दें. आसपास के लोगों की मदद लें.

-घायल को गलत तरीके से न उठाएं, विशेषकर रीढ़ की हड्डी की चोट के मामले में. पेशेवर मदद का इंतजार करें.

-यदि आप ने शराब या नशे में गाड़ी चलाई है तो इसे छिपाए नहीं. यह गंभीर अपराध है और पुलिस जांच में साबित हो सकता है.

-दुर्घटना की जानकारी तुरंत सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के बजाय कानूनी और मैडिकल मदद को प्राथमिकता दें.

-यदि गलती आप की नहीं है तो डर में अपनी गलती न मान लें. कानून निर्दोष को सजा नहीं देता.

-पुलिस और इंश्योरैंस कंपनी को हमेशा सही और पूरी जानकारी दें.

संबंधित मुख्य अधिनियम और धाराएं

-भारतीय दंड संहिता (आईपीसी)

धारा 279 : लापरवाही से वाहन चलाना.

-धारा 304ए : लापरवाही से वाहन चलाने से मृत्यु होना.

-धारा 337/338 : लापरवाही से चोट पहुंचाना (साधारण या गंभीर

मोटर वाहन अधिनियम, 1988 धारा 134 : चालक का कर्तव्य (घायल को अस्पताल पहुंचाना व पुलिस को सूचना देना)

-धारा 187 : दुर्घटना के बाद मदद न करना या भाग जाना अपराध.

-धारा 146 : थर्ड पार्टी इंश्योरैंस का होना अनिवार्य होता है.

Road Accident

Love Story: दो चुटकी सिंदूर- सविता की क्या थी गलती

Love Story: ‘‘ऐ सविता, तेरा चक्कर चल रहा है न अमित के साथ?’’ कुहनी मारते हुए सविता की सहेली नीतू ने पूछा.

सविता मुसकराते हुए बोली, ‘‘हां, सही है. और एक बात बताऊं… हम जल्दी ही शादी भी करने वाले हैं.’’

‘‘अमित से शादी कर के तो तू महलों की रानी बन जाएगी. अच्छा, वह सब छोड़. देख उधर, तेरा आशिक बैजू कैसे तुझे हसरत भरी नजरों से देख रहा है.’’ नीतू ने तो मजाक किया था, क्योंकि वह जानती थी कि बैजू को देखना तो क्या, सविता उस का नाम भी सुनना तक पसंद नहीं करती. सविता चिढ़ उठी. वह कहने लगी, ‘‘तू जानती है कि बैजू मुझे जरा भी नहीं भाता. फिर भी तू क्यों मुझे उस के साथ जोड़ती रहती है?’’

‘‘अरे पगली, मैं तो मजाक कर रही थी. और तू है कि… अच्छा, अब से नहीं करूंगी… बस,’’ अपने दोनों कान पकड़ते हुए नीतू बोली. ‘‘पक्का न…’’ अपनी आंखें तरेरते हुए सविता बोली, ‘‘कहां मेरा अमित, इतना पैसे वाला और हैंडसम. और कहां यह निठल्ला बैजू.

‘‘सच कहती हूं नीतू, इसे देख कर मुझे घिन आती है. विमला चाची खटमर कर कमाती रहती हैं और यह कमकोढ़ी बैजू गांव के चौराहे पर बैठ कर पानखैनी चबाता रहता है. बोझ है यह धरती पर.’’ ‘‘चुप… चुप… देख, विमला मौसी इधर ही आ रही हैं. अगर उन के कान में अपने बेटे के खिलाफ एक भी बात पड़ गई न, तो समझ ले हमारी खैर नहीं,’’ नीतू बोली.

सविता बोली, ‘‘पता है मुझे. यही वजह है कि यह बैजू निठल्ला रह गया.’’ विमला की जान अपने बेटे बैजू में ही बसती थी. दोनों मांबेटा ही एकदूसरे का सहारा थे. बैजू जब 2 साल का था, तभी उस के पिता चल बसे थे. सिलाईकढ़ाई का काम कर के किसी तरह विमला ने अपने बेटे को पालपोस कर बड़ा किया था.

विमला के लाड़प्यार में बैजू इतना आलसी और निकम्मा बनता जा रहा था कि न तो उस का पढ़ाईलिखाई में मन लगता था और न ही किसी काम में. बस, गांव के लड़कों के साथ बैठकर हंसीमजाक करने में ही उसे मजा आता था. लेकिन बैजू अपनी मां से प्यार बहुत करता था और यही विमला के लिए काफी था. गांव के लोग बैजू के बारे में कुछ न कुछ बोल ही देते थे, जिसे सुन कर विमला आगबबूला हो जाती थी.

एक दिन विमला की एक पड़ोसन ने सिर्फ इतना ही कहा था, ‘‘अब इस उम्र में अपनी देह कितना खटाएगी विमला, बेटे को बोल कि कुछ कमाएधमाए. कल को उस की शादी होगी, फिर बच्चे भी होंगे, तो क्या जिंदगीभर तू ही उस के परिवार को संभालती रहेगी?

‘‘यह तो सोच कि अगर तेरा बेटा कुछ कमाएगाधमाएगा नहीं, तो कौन देगा उसे अपनी बेटी?’’

विमला कहने लगी, ‘‘मैं हूं अभी अपने बेटे के लिए, तुम्हें ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है… समझी. बड़ी आई मेरे बेटे के बारे में सोचने वाली. देखना, इतनी सुंदर बहू लाऊंगी उस के लिए कि तुम सब जल कर खाक हो जाओगे.’’

सविता के पिता रामकृपाल डाकिया थे. घरघर जा कर चिट्ठियां बांटना उन का काम था, पर वे अपनी दोनों बेटियों को पढ़ालिखा कर काबिल बनाना चाहते थे. उन की दोनों बेटियां थीं भी पढ़ने में होशियार, लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि उन की बड़ी बेटी सविता अमित नाम के एक लड़के से प्यार करती है और वह उस से शादी के सपने भी देखने लगी है.

यह सच था कि सविता अमित से प्यार करती थी, पर अमित उस से नहीं, बल्कि उस के जिस्म से प्यार करता था. वह अकसर यह कह कर सविता के साथ जिस्मानी संबंध बनाने की जिद करता कि जल्द ही वह अपने मांबाप से दोनों की शादी की बात करेगा.

नादान सविता ने उस की बातों में आ कर अपना तन उसे सौंप दिया. जवानी के जोश में आ कर दोनों ने यह नहीं सोचा कि इस का नतीजा कितना बुरा हो सकता है और हुआ भी, जब सविता को पता चला कि वह अमित के बच्चे की मां बनने वाली है.

जब सविता ने यह बात अमित को बताई और शादी करने को कहा, तो वह कहने लगा, ‘‘क्या मैं तुम्हें बेवकूफ दिखता हूं, जो चली आई यह बताने कि तुम्हारे पेट में मेरा बच्चा है? अरे, जब तुम मेरे साथ सो सकती हो, तो न जाने और कितनों के साथ सोती होगी. यह उन्हीं में से एक का बच्चा होगा.’’

सविता के पेट से होने का घर में पता लगते ही कुहराम मच गया. अपनी इज्जत और सविता के भविष्य की खातिर उसे शहर ले जा कर घर वालों ने बच्चा गिरवा दिया और जल्द से जल्द कोई लड़का देख कर उस की शादी करने का विचार कर लिया.

एक अच्छा लड़का मिलते ही घर वालों ने सविता की शादी तय कर दी. लेकिन ऐसी बातें कहीं छिपती हैं भला.अभी शादी के फेरे होने बाकी थे कि लड़के के पिता ने ऊंची आवाज में कहा, ‘‘बंद करो… अब नहीं होगी यह शादी.’’ शादी में आए मेहमान और गांव के लोग हैरान रह गए. जब सारी बात का खुलासा हुआ, तो सारे गांव वाले सविता पर थूथू कर के वहां से चले गए.

सविता की मां तो गश खा कर गिर पड़ी थीं. रामकृपाल अपना सिर पीटते हुए कहने लगे, ‘‘अब क्या होगा… क्या मुंह दिखाएंगे हम गांव वालों को? कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा इस लड़की ने हमें. बताओ, अब कौन हाथ थामेगा इस का?’’

‘‘मैं थामूंगा सविता का हाथ,’’ अचानक किसी के मुंह से यह सुन कर रामकृपाल ने अचकचा कर पीछे मुड़ कर देखा, तो बैजू अपनी मां के साथ खड़ा था. ‘‘बैजू… तुम?’’ रामकृपाल ने बड़ी हैरानी से पूछा.

विमला कहने लगी, ‘‘हां भाई साहब, आप ने सही सुना है. मैं आप की बेटी को अपने घर की बहू बनाना चाहती हूं और वह इसलिए कि मेरा बैजू आप की बेटी से प्यार करता है.’’

रामकृपाल और उन की पत्नी को चुप और सहमा हुआ देख कर विमला आगे कहने लगी, ‘‘न… न आप गांव वालों की चिंता न करो, क्योंकि मेरे लिए मेरे बेटे की खुशी सब से ऊपर है, बाकी लोग क्या सोचेंगे, क्या कहेंगे, उस से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता है.’’

अब अंधे को क्या चाहिए दो आंखें ही न. उसी मंडप में सविता और बैजू का ब्याह हो गया.

जिस बैजू को देख कर सविता को उबकाई आती थी, उसे देखना तो क्या वह उस का नाम तक सुनना पसंद नहीं करती थी, आज वही बैजू उस की मांग का सिंदूर बन गया. सविता को तो अपनी सुहागरात एक काली रात की तरह दिख रही थी.

‘क्या मुंह दिखाऊंगी मैं अपनी सखियों को, क्या कहूंगी कि जिस बैजू को देखना तक गंवारा नहीं था मुझे, वही आज मेरा पति बन गया. नहीं… नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, इतनी बड़ी नाइंसाफी मेरे साथ नहीं हो सकती,’ सोच कर ही वह बेचैन हो गई.

तभी किसी के आने की आहट से वह उठ खड़ी हुई. अपने सामने जब उस ने बैजू को खड़ा देखा, तो उस का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

बैजू के मुंह पर अपने हाथ की चूडि़यां निकालनिकाल कर फेंकते हुए सविता कहने लगी, ‘‘तुम ने मेरी मजबूरी का फायदा उठाया है. तुम्हें क्या लगता है कि दो चुटकी सिंदूर मेरी मांग में भर देने से तुम मेरे पति बन गए? नहीं, कोई नहीं हो तुम मेरे. नहीं रहूंगी एक पल भी इस घर में तुम्हारे साथ मैं… समझ लो.’’

बैजू चुपचाप सब सुनता रहा. एक तकिया ले कर उसी कमरे के एक कोने में जा कर सो गया.

सविता ने मन ही मन फैसला किया कि सुबह होते ही वह अपने घर चली जाएगी. तभी उसे अपने मातापिता की कही बातें याद आने लगीं, ‘अगर आज बैजू न होता, तो शायद हम मर जाते, क्योंकि तुम ने तो हमें जीने लायक छोड़ा ही नहीं था. हो सके, तो अब हमें बख्श देना बेटी, क्योंकि अभी तुम्हारी छोटी बहन की भी शादी करनी है हमें…’

कहां ठिकाना था अब उस का इस घर के सिवा? कहां जाएगी वह? बस, यह सोच कर सविता ने अपने बढ़ते कदम रोक लिए.सविता इस घर में पलपल मर रही थी. उसे अपनी ही जिंदगी नरक लगने लगी थी, लेकिन इस सब की जिम्मेदार भी तो वही थी.

कभीकभी सविता को लगता कि बैजू की पत्नी बन कर रहने से तो अच्छा है कि कहीं नदीनाले में डूब कर मर जाए, पर मरना भी तो इतना आसान नहीं होता है. मांबाप, नातेरिश्तेदार यहां तक कि सखीसहेलियां भी छूट गईं उस की. या यों कहें कि जानबूझ कर सब ने उस से नाता तोड़ लिया. बस, जिंदगी कट रही थी उस की.

सविता को उदास और सहमा हुआ देख कर हंसनेमुसकराने वाला बैजू भी उदास हो जाता था. वह सविता को खुश रखना चाहता था, पर उसे देखते ही वह ऐसे चिल्लाने लगती थी, जैसे कोई भूत देख लिया हो. इस घर में रह कर न तो वह एक बहू का फर्ज निभा रही थी और न ही पत्नी धर्म. उस ने शादी के दूसरे दिन ही अपनी मांग का सिंदूर पोंछ लिया था.

शादी हुए कई महीने बीत चुके थे, पर इतने महीनों में न तो सविता के मातापिता ने उस की कोई खैरखबर ली और न ही कभी उस से मिलने आए. क्याक्या सोच रखा था सविता ने अपने भविष्य को ले कर, पर पलभर में सब चकनाचूर हो गया था.

‘शादी के इतने महीनों के बाद भी भले ही सविता ने प्यार से मेरी तरफ एक बार भी न देखा हो, पर पत्नी तो वह मेरी ही है न. और यही बात मेरे लिए काफी है,’ यही सोचसोच कर बैजू खुश हो उठता था. एक दिन न तो विमला घर पर थी और न ही बैजू. तभी अमित वहां आ धमका. उसे यों अचानक अपने घर आया देख सविता हैरान रह गई. वह गुस्से से तमतमाते हुए बोली, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई यहां आने की?’’

अमित कहने लगा, ‘‘अब इतना भी क्या गुस्सा? मैं तो यह देखने आया था कि तुम बैजू के साथ कितनी खुश हो? वैसे, तुम मुझे शाबाशी दे सकती हो. अरे, ऐसे क्या देख रही हो? सच ही तो कह रहा हूं कि आज मेरी वजह से ही तुम यहां इस घर में हो.’’ सविता हैरानी से बोली, ‘‘तुम्हारी वजह से… क्या मतलब?’’

‘‘अरे, मैं ने ही तो लड़के वालों को हमारे संबंधों के बारे में बताया था और यह भी कि तुम मेरे बच्चे की मां भी बनने वाली हो. सही नहीं किया क्या मैं ने?’’ अमित बोला. सविता यह सुन कर हैरान रह गई. वह बोली, ‘‘तुम ने ऐसा क्यों किया? बोलो न? जानते हो, सिर्फ तुम्हारी वजह से आज मेरी जिंदगी नरक बन चुकी है. क्या बिगाड़ा था मैं ने तुम्हारा?

‘‘बड़ा याद आता है मुझे तेरा यह गोरा बदन,’’ सविता के बदन पर अपना हाथ फेरते हुए अमित कहने लगा, तो वह दूर हट गई. अमित बोला, ‘‘सुनो, हमारे बीच जैसा पहले चल रहा था, चलने दो.’’ ‘‘मतलब,’’ सविता ने पूछा. ‘‘हमारा जिस्मानी संबंध और क्या. मैं जानता हूं कि तुम मुझ से नाराज हो, पर मैं हर लड़की से शादी तो नहीं कर सकता न?’’ अमित बड़ी बेशर्मी से बोला.

‘‘मतलब, तुम्हारा संबंध कइयों के साथ रह चुका है?’’ ‘‘छोड़ो वे सब पुरानी बातें. चलो, फिर से हम जिंदगी के मजे लेते हैं. वैसे भी अब तो तुम्हारी शादी हो चुकी है, इसलिए किसी को हम पर शक भी नहीं होगा,’’ कहता हुआ हद पार कर रहा था अमित.

सविता ने अमित के गाल पर एक जोर का तमाचा दे मारा और कहने लगी, ‘‘क्या तुम ने मुझे धंधे वाली समझ रखा है. माना कि मुझ से गलती हो गई तुम्हें पहचानने में, पर मैं ने तुम से प्यार किया था और तुम ने क्या किया?

‘‘अरे, तुम से अच्छा तो बैजू निकला, क्योंकि उस ने मुझे और मेरे परिवार को दुनिया की रुसवाइयों से बचाया. जाओ यहां से, निकल जाओ मेरे घर से, नहीं तो मैं पुलिस को बुलाती हूं,’’ कह कर सविता घर से बाहर जाने लगी कि तभी अमित ने उस का हाथ अपनी तरफ जोर से खींचा.

‘‘तेरी यह मजाल कि तू मुझ पर हाथ उठाए. पुलिस को बुलाएगी… अभी बताता हूं,’’ कह कर उस ने सविता को जमीन पर पटक दिया और खुद उस के ऊपर चढ़ गया. खुद को लाचार पा कर सविता डर गई. उस ने अमित की पकड़ से खुद को छुड़ाने की पूरी कोशिश की, पर हार गई. मिन्नतें करते हुए वह कहने लगी, ‘‘मुझे छोड़ दो. ऐसा मत करो…’’

पर अमित तो अब हैवानियत पर उतारू हो चुका था. तभी अपनी पीठ पर भारीभरकम मुक्का पड़ने से वह चौंक उठा. पलट कर देखा, तो सामने बैजू खड़ा था. ‘‘तू…’’ बैजू बोला.

अमित हंसते हुए कहने लगा, ‘‘नामर्द कहीं के… चल हट.’’ इतना कह कर वह फिर सविता की तरफ लपका. इस बार बैजू ने उस के मुंह पर एक ऐसा जोर का मुक्का मारा कि उस का होंठ फट गया और खून निकल आया. अपने बहते खून को देख अमित तमतमा गया और बोला, ‘‘तेरी इतनी मजाल कि तू मुझे मारे,’’ कह कर उस ने अपनी पिस्तौल निकाल ली और तान दी सविता पर.

अमित बोला, ‘‘आज तो इस के साथ मैं ही अपनी रातें रंगीन करूंगा.’’ पिस्तौल देख कर सविता की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. बैजू भी दंग रह गया. वह कुछ देर रुका, फिर फुरती से यह कह कह अमित की तरफ लपका, ‘‘तेरी इतनी हिम्मत कि तू मेरी पत्नी पर गोली चलाए…’’ पर तब तक तो गोली पिस्तौल से निकल चुकी थी, जो बैजू के पेट में जा लगी.

बैजू के घर लड़ाईझगड़ा होते देख कर शायद किसी ने पुलिस को बुला लिया था. अमित वहां से भागता, उस से पहले ही वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया. खून से लथपथ बैजू को तुरंत गांव वालों ने अस्पताल पहुंचाया. घंटों आपरेशन चला. डाक्टर ने कहा, ‘‘गोली तो निकाल दी गई है, लेकिन जब तक मरीज को होश नहीं आ जाता, कुछ कहा नहीं जा सकता.’’

विमला का रोरो कर बुरा हाल था. गांव की औरतें उसे हिम्मत दे रही थीं, पर वे यह भी बोलने से नहीं चूक रही थीं कि बैजू की इस हालत की जिम्मेदार सविता है.

 

‘सच ही तो कह रहे हैं सब. बैजू की इस हालत की जिम्मेदार सिर्फ मैं ही हूं. जिस बैजू से मैं हमेशा नफरत करती रही, आज उसी ने अपनी जान पर खेल कर मेरी जान बचाई,’ अपने मन में ही बातें कर रही थी सविता. तभी नर्स ने आ कर बताया कि बैजू को होश आ गया है. बैजू के पास जाते देख विमला ने सविता का हाथ पकड़ लिया और कहने लगी, ‘‘नहीं, तुम अंदर नहीं जाओगी. आज तुम्हारी वजह से ही मेरा बेटा यहां पड़ा है. तू मेरे बेटे के लिए काला साया है. गलती हो गई मुझ से, जो मैं ने तुझे अपने बेटे के लिए चुना…’’

‘‘आप सविता हैं न?’’ तभी नर्स ने आ कर पूछा. डबडबाई आंखों से वह बोली, ‘‘जी, मैं ही हूं.’’ ‘‘अंदर जाइए, मरीज आप को पूछ रहे हैं.’’ नर्स के कहने से सविता चली तो गई, पर सास विमला के डर से वह दूर खड़ी बैजू को देखने लगी. उस की ऐसी हालत देख वह रो पड़ी. बैजू की नजरें, जो कब से सविता को ही ढूंढ़ रही थीं, देखते ही इशारों से उसे अपने पास बुलाया और धीरे से बोला, ‘‘कैसी हो सविता?’’

अपने आंसू पोंछते हुए सविता कहने लगी, ‘‘क्यों तुम ने मेरी खातिर खुद को जोखिम में डाला बैजू? मर जाने दिया होता मुझे. बोलो न, किस लिए मुझे बचाया?’’ कह कर वह वहां से जाने को पलटी ही थी कि बैजू ने उस का हाथ पकड़ लिया और बड़े गौर से उस की मांग में लगे सिंदूर को देखने लगा.

‘‘हां बैजू, यह सिंदूर मैं ने तुम्हारे ही नाम का लगाया है. आज से मैं सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी हूं,’’ कह कर वह बैजू से लिपट गई.

Love Story

Long Story: गुमनाम शिकायतें- क्यों एक निर्दोष को झेलनी पड़ी सजा

Long Story: पिछले 6 महीने से मुझे पुलिस स्टेशन में बुलाया जा रहा है. मुझे शहर में घटी आपराधिक घटनाओं का जिम्मेदार मानते हुए मुझ पर प्रश्न पर प्रश्न तोप के गोले की तरह दागे जा रहे थे. अपराध के समय मैं कब, कहां था. पुलिस को याद कर के जानकारी देता. मुझे जाने दिया जाता. मैं वापस आता और 2-4 दिन बाद फिर बुलावा आ जाता. पहली बार तो एक पुलिस वाला आया जो मुझे पूरा अपराधी मान कर घर से गालीगलौज करते व घसीटते हुए ले जाने को तत्पर था.

मैं ने उस से अपने अच्छे शहरी और निर्दोष होने के बारे में कहा तो उस ने पुलिसिया अंदाज में कहा, ‘पकड़े जाने से पहले सब मुजरिम यही कहते हैं. थाने चलो, पूछताछ होगी, सब पता चल जाएगा.’

चूंकि न मैं कोई सरकारी नौकरी में था न मेरी कोई दुकानदारी थी. मैं स्वतंत्र लेखन कर के किसी तरह अपनी जीविका चलाता था. उस पर, मैं अकेला था, अविवाहित भी.

पहली बार मुझे सीधा ऐसे कक्ष में बिठाया गया जहां पेशेवर अपराधियों को थर्ड डिगरी देने के लिए बिठाया जाता है. पुलिस की थर्ड डिगरी मतलब बेरहमी से शरीर को तोड़ना. मैं घबराया, डरा, सहमा था. मैं ने क्या गुनाह किया था, खुद मुझे पता नहीं था. मैं जब कभी पूछता तो मुझे डांट कर, चिल्ला कर और कभीकभी गालियों से संबोधित कर के कहा जाता, ‘शांत बैठे रहो.’ मैं घंटों बैठा डरता रहा. दूसरे अपराधियों से पुलिस की पूछताछ देख कर घबराता रहा. क्या मेरे साथ भी ये अमानवीय कृत्य होंगे. मैं यह सोचता. मैं अपने को दुनिया का सब से मजबूर, कमजोर, हीन व्यक्ति महसूस करने लगा था.

मुझ से कहा गया आदेश की तरह, ‘अपना मोबाइल, पैसा, कागजात, पेन सब जमा करा दो.’ मैं ने यंत्रवत बिना कुछ पूछे मुंशी के पास सब जमा करा दिए फिर मुझ से मेरे जूते भी उतरवा दिए गए.

उस के बाद मुझे ठंडे फर्श पर बिठा दिया गया. तभी उस यंत्रणाकक्ष में दो स्टार वाला पुलिस अफसर एक कुरसी पर मेरे सामने बैठ कर पूछने लगा :

‘क्या करते हो? कौनकौन हैं घर में? 3 तारीख की रात 2 से 4 के बीच कहां थे? किनकिन लोगों के साथ उठनाबैठना है? शहर के किसकिस अपराधी गिरोह को जानते हो? 3 जुलाई, 2012 को किसकिस से मिले थे? तुम चोर हो? लुटेरे हो?’

बड़ी कड़ाई और रुखाई से उस ने ये सवाल पूछे और धमकी, डर, चेतावनी वाले अंदाज में कहा, ‘एक भी बात झूठ निकली तो समझ लो, सीधा जेल. सच नहीं बताओगे तो हम सच उगलवाना जानते हैं.’

मैं ने उस से कहा और पूरी विनम्रता व लगभग घिघियाते हुए, डर से कंपकंपाते हुए कहा, ‘मैं एक लेखक हूं. अकेला हूं. 3 तारीख की रात 2 से 4 बजे के मध्य में अपने घर में सो रहा था. मेरा अखबार, पत्रपत्रिकाओं के कुछ संपादकों से, लेखकों से मोबाइलवार्ता व पत्रव्यवहार होता रहता है. शहर में किसी को नहीं जानता. मेरा किसी अपराधी गिरोह से कोई संपर्क नहीं है. न मैं चोर हूं, न लुटेरा. मात्र एक लेखक हूं. सुबूत के तौर पर पत्रिकाओं, अखबारों की वे प्रतियां दिखा सकता हूं जिन में मेरे लेख, कविताएं, कहानियां छपी हैं.’

मेरी बात सुन कर वह बोला, ‘पत्रकार हो?’

‘नहीं, लेखक हूं.’

‘यह क्या होता है?’

‘लगभग पत्रकार जैसा. पत्रकार घटनाओं की सूचना समाचार के रूप में और लेखक उसे विमर्श के रूप में लेख, कहानी आदि बना कर पेश करता है.’

‘मतलब प्रैस वाले हो,’ उस ने स्वयं ही अपना दिमाग चलाया.

मैं ने उत्तर नहीं दिया. प्रैस के नाम से वह कुछ प्रभावित हुआ या चौंका या डरा, यह तो मैं नहीं समझ पाया लेकिन हां, उस का लहजा मेरे प्रति नरम और कुछकुछ दोस्ताना सा हो गया था. उस ने अपने प्रश्नों का उत्तर पा कर मुझे मेरा सारा सामान वापस कर के यह कहते हुए जाने दिया कि आप जा सकते हैं. लेकिन दोबारा जरूरत पड़ी तो आना होगा.

पहली बार तो मैं ‘जान बची तो लाखों पाए’ वाले अंदाज में लौट आया लेकिन जल्द ही दोबारा बुलावा आ गया. इस बार जो पुलिस वाला लेने आया था उस का लहजा नरम था.

इस बार मुझे एक बैंच पर काफी देर बैठना पड़ा. जिसे पूछताछ करनी थी, वह किसी काम से गया हुआ था. इस बीच थाने के संतरी से ले कर मुंशी तक ने मुझे हैरानपरेशान कर दिया. किस जुर्म में आए हो, कैसे आए हो, अब तुम्हारी खैर नहीं? फिर मुझ से चायपानी, सिगरेट के लिए पैसे मांगे गए. मुझे देने पड़े न चाहते हुए भी. फिर जब वह पुलिस अधिकारी आया, मैं उसे पहचान गया. वह पहले वाला ही अधिकारी था. उस ने मुझे शक की निगाहों से देखते हुए फिर शहर में घटित अपराधों के विषय में प्रश्न पर प्रश्न करने शुरू किए. मैं ने उसे सारे उत्तर अपनी स्मरणशक्ति पर जोर लगालगा कर दिए. कुछ इस तरह डरडर कर कि एक भी प्रश्न का उत्तर गलत हुआ तो परीक्षा में बैठे छात्र की तरह मेरा हाल होगा.

चूंकि उस का रवैया नरम था सो मैं ने उस से पूछा, ‘क्या बात है, सर, मुझे बारबार बुला कर ये सब क्यों पूछा जा रहा है, मैं ने किया क्या है?’

‘पुलिस को आप पर शक है और शक के आधार पर पुलिस की पूछताछ शुरू होती है जो सुबूत पर खत्म हो कर अपराधी को जेल तक पहुंचाती है.’

‘लेकिन मुझ पर इस तरह शक करने का क्या आधार है?’

‘आप के खिलाफ हमारे पास सूचनाएं आ रही हैं.’

‘सूचनाएं, किस तरह की?’

‘यही कि शहर में हो रही घटनाओं में आप का हाथ है.’

‘लेकिन…?’

उस ने मेरी बात काटते हुए कहा, ‘आप को बताने में क्या समस्या है? हम आप से एक सभ्य शहरी की तरह ही तो बात कर रहे हैं. पुलिस की मदद करना हर अच्छे नागरिक का कर्तव्य है.’

अब मैं क्या बताऊं उसे कि हर बार थाने बुलाया जाना और पुलिस के प्रश्नों का उत्तर देना, थाने में घंटों बैठना किसी शरीफ आदमी के लिए किसी यातना से कम नहीं होता. उस की मानसिक स्थिति क्या होती है, यह वही जानता है. पलपल ऐसा लगता है कि सामने जहरीला सांप बैठा हो और उस ने अब डसा कि तब डसा.

इस तरह मुझे बुलावा आता रहा और मैं जाता रहा. यह समय मेरे जीवन के सब से बुरे समय में से था. फिर मेरे बारबार आनेजाने से थाने के आसपास की दुकानवालों और मेरे महल्ले के लोगों को लगने लगा कि या तो मैं पेशेवर अपराधी हूं या पुलिस का कोई मुखबिर. कुछ लोगों को शायद यह भी लगा होगा कि मैं पुलिस विभाग में काम करने वाला सादी वर्दी में कोई सीआईडी का आदमी हूं. मैं ने पुलिस अधिकारी से कहा, ‘सर, मैं कब तक आताजाता रहूंगा? मेरे अपने काम भी हैं.’

उस ने चिढ़ कर कहा, ‘मैं भी कोई फालतू तो बैठा नहीं हूं. मेरे पास भी अपने काम हैं. मैं भी तुम से पूछपूछ कर परेशान हो गया हूं. न तुम कुछ बताते हो, न कुबूल करते हो. प्रैस के आदमी हो. तुम पर कठोरता का व्यवहार भी नहीं कर रहा इस कारण.’

‘सर, आप कुछ तो रास्ता सुझाएं?’

‘अब क्या बताएं? तुम स्वयं समझदार हो. प्रैस वाले से सीधे तो नहीं कुछ मांग सकता.’

‘फिर भी कुछ तो बताइए. मैं आप की क्या सेवा करूं?’

‘चलो, ऐसा करो, तुम 10 हजार रुपए दे दो. मेरे रहते तक अब तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी. न तुम्हें थाने बुलाया जाएगा.’ मैं ने थोड़ा समय मांगा. इधरउधर से रुपयों का बंदोबस्त कर के उसे दिए और उस ने मुझे आश्वस्त किया कि मेरे होते अब तुम्हें नहीं आना पड़ेगा.

मैं निश्चिंत हो गया. भ्रष्टाचार के विरोध में लिखने वाले को स्वयं रिश्वत देनी पड़ी अपने बचाव में. अपनी बारबार की परेशानी से बचने के लिए और कोई रास्ता भी नहीं था. मैं कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं था. न मेरा किसी बड़े व्यापारी, राजनेता, पुलिस अधिकारी से परिचय था. रही मीडिया की बात, तो मैं कोई पत्रकार नहीं था. मैं मात्र लेखक था, जो अपनी रचनाएं आज भी डाक से भेजता हूं. मेरा किसी मीडियाकर्मी से कोई परिचय नहीं था. एक लेखक एक साधारण व्यक्ति से भी कम होता है सांसारिक कार्यों में. वह नहीं समझ पाता कि उसे कब क्या करना है. वह बस लिखना जानता है.

अपने महल्ले में भी लोग मुझे अजीब निगाहों से देखने लगे थे, जैसे किसी जरायमपेशा मुजरिम को देखते हैं. मैं देख रहा था कि मुझे देख कर लोग अपने घर के अंदर चले जाते थे. मुझे देखते ही तुरंत अपना दरवाजा बंद कर लेते थे. महल्ले में लोग धीरेधीरे मेरे विषय में बातें करने लगे थे. मैं कौन हूं? क्या हूं? क्यों हूं? मेरे रहने से महल्ले का वातावरण खराब हो रहा है. और भी न जाने क्याक्या. मेरे मुंह पर कोई नहीं बोलता था. बोलने की हिम्मत ही नहीं थी. मैं ठहरा उन की नजर में अपराधी और वे शरीफ आदमी. अभी कुछ ही समय हुआ था कि फिर एक पुलिस की गाड़ी सायरन बजाते हुए रुकी और मुझ से थाने चलने के लिए कहा. मेरी सांस हलक में अटक गई. लेकिन इस बार मैं ने पूछा, ‘‘क्यों?’’

‘‘साहब ने बुलाया है. आप को चलना ही पड़ेगा.’’

यह तो कृपा थी उन की कि उन्होंने मुझे कपड़े पहनने, घर में ताला लगाने का मौका दे दिया. मैं सांस रोके, पसीना पोंछते, पुलिस की गाड़ी में बैठा सोचता रहा, ‘साहब से तो तय हो गया था.’ महल्ले के लोग अपनीअपनी खिड़कियों, दरवाजों में से झांक रहे थे.

थाने पहुंच कर पता चला जो पुलिस अधिकारी अब तक पूछताछ करता रहा और जिसे मैं ने रिश्वत दी थी उस का तबादला हो गया है. उस की जगह कोई नया पुलिस अधिकारी था.

मेरे लिए खतरनाक यह था कि उस के नाम के बाद उस का सरनेम मेरे विरोध में था. वह बुद्धिस्ट, अंबेडकरवादी था और मैं सवर्ण. मैं समझ गया कि अपने पूर्वजों का कुछ हिसाबकिताब यह मुझे अपमानित और पीडि़त कर के चुकाने का प्रयास अवश्य करेगा. इस समय मुझे अपना ऊंची जाति का होना अखर रहा था.

मैं ने कई पीडि़त सवर्णों से सुना है कि थाने में यदि कोई दलित अफसर होता है तो वह कई तरह से प्रताडि़त करता है. मेरे साथ वही हुआ. मेरा सारा सामान मुंशी के पास जमा करवाया गया. मेरे जूते उतरवा कर एक तरफ रखवाए गए. मुझे ठंडे और गंदे फर्श पर बिठाया गया. फिर एक काला सा, घनी मूंछों वाला पुलिस अधिकारी बेंत लिए मेरे पास आया और ठीक सामने कुरसी डाल कर बैठ गया. उस ने हवा में अपना बेंत लहराया और फिर कुछ सोच कर रुक गया. उस ने मुझे घूर कर देखा. नाम, पता पूछा. फिर शहर में घटित तथाकथित अपराधों के विषय में पूछा.

मैं ने अब की बार दृढ़स्वर में कहा, ‘‘मैं पिछले 6 महीने से परेशान हूं. मेरा जीना मुश्किल हो रहा है. मेरा खानापीना हराम हो गया है. मेरी रातों की नींद उड़ गई है. इस से अच्छा तो यह है कि आप मुझे जेल में डाल दें. मुझे नक्सलवादी, आतंकवादी समझ कर मेरा एनकाउंटर कर दें. आप जहां चाहें, दस्तखत ले लें. आप जो कहें मैं सब कुबूल करने को तैयार हूं. लेकिन बारबार इस तरह यदि आप ने मुझे अपमानित और प्रताडि़त किया तो मैं आत्महत्या कर लूंगा,’’ यह कहतेकहते मेरी आंखों से आंसू बहने लगे.

नया पुलिस अधिकारी व्यंग्यात्मक ढंग से बोला, ‘‘आप शोषण करते रहे हजारों साल. हम ने नीचा दिखाया तो तड़प उठे पंडित महाराज.’’

उस के ये शब्द सुन कर मैं चौंका, ‘पंडित महाराज, तो एक ही व्यक्ति कहता था मुझ से. मेरे कालेज का दोस्त. छात्र कम गुंडा ज्यादा.’

‘‘पहचाना पंडित महाराज?’’ उस ने मेरी तरफ हंसते हुए कहा.

‘‘रामचरण अंबेडकर,’’ मेरे मुंह से अनायास ही निकला.

‘‘हां, वही, तुम्हारा सीनियर, तुम्हारा जिगरी दोस्त, कालेज का गुंडा.’’

‘‘अरे, तुम?’’

‘‘हां, मैं.’’

‘‘पुलिस में?’’

‘‘पहले कालेज में गुंडा हुआ करता था. अब कानून का गुंडा हूं. लेकिन तुम नहीं बदले, पंडित महाराज?’’

उस ने मुझे गले से लगाया. ससम्मान मेरा सामान मुझे लौटाया और अपने औफिस में मुझे कुरसी पर बिठा कर एक सिपाही से चायनाश्ते के लिए कहा.

यह मेरा कालेज का 1 साल सीनियर वही दोस्त था जिस ने मुझे रैगिंग से बचाया था. कई बार मेरे झगड़ों में खुद कवच बन कर सामने खड़ा हुआ था. फिर हम दोनों पक्के दोस्त बन गए थे. मेरे इसी दोस्त को कालेज की एक उच्चजातीय कन्या से प्रेम हुआ तो मैं ने ही इस के विवाह में मदद की थी. घर से भागने से ले कर कोर्टमैरिज तक में. तब भी उस ने वही कहा था और अभी फिर कहा, ‘‘दोस्ती की कोई जाति नहीं होती. बताओ, क्या चक्कर है?’’

मैं ने उदास हो कर कहा, ‘‘पिछले 6 महीने से पुलिस बुलाती है पूछताछ के नाम पर. जमाने भर के सवाल करती है. पता नहीं क्यों? मेरा तो जीना हराम हो गया है.’’

 

‘‘तुम्हारी किसी से कोई दुश्मनी है?’’

‘‘नहीं तो.’’ ‘अपनी शराफत के चलते कभी कहीं ऐसा सच बोल दिया हो जो किसी के लिए नुकसान पहुंचा गया हो और वह रंजिश के कारण ये सब कर रहा हो?’’

‘‘क्या कर रहा हो?’’‘‘गुमनाम शिकायत.’’ ‘‘क्या?’’ मैं चौंक गया, ‘‘तुम यह कह रहे हो कि कोई शरारत या नाराजगी के कारण गुमनाम शिकायत कर रहा है और पुलिस उन गुमनाम शिकायतों के आधार पर मुझे परेशान कर रही है.’’

‘‘हां, और क्या? यदि तुम मुजरिम होते तो अब तक जेल में नहीं होते. लेकिन शिकायत पर पूछताछ करना पुलिस का अधिकार है. आज मैं हूं, सब ठीक कर दूंगा. तुम्हारा दोस्त हूं. लेकिन शिकायतें जारी रहीं और मेरी जगह कल कोई और पुलिस वाला आ गया तो यह दौर जारी रह सकता है. इसीलिए कह रहा हूं, ध्यान से सोच कर बताओ कि जब से ये गुमनाम शिकायतें आ रही हैं, उस के कुछ समय पहले तुम्हारा किसी से कोई झगड़ा या ऐसा ही कुछ और हुआ था?’’

मैं सोचने लगा. उफ्फ, मैं ने सोचा भी नहीं था. अपने पड़ोसी मिस्टर नंद किशोर की लड़की से शादी के लिए मना करने पर वह ऐसा कर सकता है क्योंकि उस के बाद नंद किशोर ने न केवल महल्ले में मेरी बुराई करनी शुरू कर दी थी बल्कि उन के पूरे परिवार ने मुझ से बात करनी भी बंद कर दी थी. उलटे छोटीछोटी बातों पर उन का परिवार मुझ से झगड़ा करने के बहाने भी ढूंढ़ता रहता था. हो सकता है वह शिकायतकर्ता नंद किशोर ही हो. लेकिन यकीन से किसी पर उंगली उठाना ठीक नहीं है. अगर नहीं हुआ तो…मैं ने अपने पुलिस अधिकारी मित्र से कहा, ‘‘शक तो है क्योंकि एक शख्स है जो मुझ से चिढ़ता है लेकिन यकीन से नहीं कह सकता कि वही होगा.’’

फिर मैं ने उसे विवाह न करने की वजह भी बताई कि उन की लड़की किसी और से प्यार करती थी. शादी के लिए मना करने के लिए उसी ने मुझ से मदद के तौर पर प्रार्थना की थी. लेकिन मेरे मना करने के बाद भी पिता ने उस की शादी उसी की जाति के ही दूसरे व्यक्ति से करवा दी थी.

‘‘तो फिर नंद किशोर ही आप को 6 महीने से हलकान कर रहे हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘यार, मुझे इस मुसीबत से किसी तरह बचाओ.’’

‘‘चुटकियों का काम है. अभी कर देता हूं,’’ उस ने लापरवाही से कहा.

फिर मेरे दोस्त पुलिस अधिकारी रामचरण ने नंद किशोर को परिवार सहित थाने बुलवाया. डांट, फटकार करते हुए कहा, ‘‘आप एक शरीफ आदमी को ही नहीं, 6 महीनों से पुलिस को भी गुमराह व परेशान कर रहे हैं. इस की सजा जानते हैं आप?’’

‘‘इस का क्या सुबूत है कि ये सब हम ने किया है?’’ बुजुर्ग नंद किशोर ने अपनी बात रखी.

पुलिस अधिकारी रामचरण ने कहा, ‘‘पुलिस को बेवकूफ समझ रखा है. आप की हैंडराइटिंग मिल गई तो केस बना कर अंदर कर दूंगा. जहां से आप टाइप करवा कर झूठी शिकायतें भेजते हैं, उस टाइपिस्ट का पता लग गया है. बुलाएं उसे? अंदर करूं सब को? जेल जाना है इस उम्र में?’’

पुलिस अधिकारी ने हवा में बातें कहीं जो बिलकुल सही बैठीं. नंद किशोर सन्नाटे में आ गए.

‘‘और नंद किशोरजी, जिस वजह से आप ये सब कर रहे हैं न, उस शादी के लिए आप की लड़की ने ही मना किया था. यदि दोबारा झूठी शिकायतें आईं तो आप अंदर हो जाएंगे 1 साल के लिए.’’

नंद किशोर को डांटडपट कर और भय दिखा कर छोड़ दिया गया. मुझे यह भी लगा कि शायद नंद किशोर का इन गुमनाम शिकायतों में कोई हाथ न हो, व्यर्थ ही…

‘‘मेरे रहते कुछ नहीं होगा, गुमनाम शिकायतों पर तो बिलकुल नहीं. लेकिन थोड़ा सुधर जा. शादी कर. घर बसा. शराफत का जमाना नहीं है,’’ उस ने मुझ से कहा. फिर मेरी उस से यदाकदा मुलाकातें होती रहतीं. एक दिन उस का भी तबादला हो गया.

मैं फिर डरा कि कोई फिर गुमनाम शिकायतों भरे पत्र लिखना शुरू न कर दे क्योंकि यदि यह काम नंद किशोर का नहीं है, किसी और का है तो हो सकता है कि थाने के चक्कर काटने पड़ें. नंद किशोर ने तो स्वीकार किया ही नहीं था. वे तो मना ही करते रहे थे अंत तक.

लेकिन उस के बाद यह सिलसिला बंद हो गया. तो क्या नंद किशोर ही नाराजगी के कारण…यह कैसा गुस्सा, कैसी नाराजगी कि आदमी आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाए. गुस्सा है तो डांटो, लड़ो. बात कर के गुस्सा निकाल लो. मन में बैर रखने से खुद भी विषधर और दूसरे का भी जीना मुश्किल. पुलिस को भी चाहिए कि गुमनाम शिकायतों की जांच करे. व्यर्थ किसी को परेशान न करे.

शायद नंद किशोर का गुस्सा खत्म हो चुका था. लेकिन अब मेरे मन में नंद किशोर के प्रति घृणा के भाव थे. उस बुड्ढे को देखते ही मुझे अपने 6 माह की हलकान जिंदगी याद आ जाती थी. एक निर्दोष व्यक्ति को झूठी गुमनाम शिकायतों से अपमानित, प्रताडि़त करने वाले को मैं कैसे माफ कर सकता था. लेकिन मैं ने कभी उत्तर देने की कोशिश नहीं की. हां, पड़ोसी होते हुए भी हमारी कभी बात नहीं होती थी. नंद किशोर के परिवार ने कभी अफसोस या प्रायश्चित्त के भाव भी नहीं दिखाए. ऐसे में मेरे लिए वे पड़ोस में रहते हुए भी दूर थे.

Long Story

Fictional Story: अलमारी का ताला- आखिर क्या थी मां की इच्छा?

Fictional Story: हर मांबाप का सपना होता है कि उन के बच्चे खूब पढ़ेंलिखें, अच्छी नौकरी पाएं. समीर ने बीए पास करने के साथ एक नौकरी भी ढूंढ़ ली ताकि वह अपनी आगे की पढ़ाई का खर्चा खुद उठा सके. उस की बहन रितु ने इस साल इंटर की परीक्षा दी थी. दोनों की आयु में 3 वर्ष का अंतर था. रितु 19 बरस की हुई थी और समीर 22 का हुआ था. मां हमेशा से सोचती आई थीं कि बेटे की शादी से पहले बेटी के हाथ पीले कर दें तो अच्छा है. मां की यह इच्छा जानने पर समीर ने मां को समझाया कि आजकल के समय में लड़की का पढ़ना उतना ही जरूरी है जितना लड़के का. सच तो यह है कि आजकल लड़के पढ़ीलिखी और नौकरी करती लड़की से शादी करना चाहते हैं. उस ने समझाया, ‘‘मैं अभी जो भी कमाता हूं वह मेरी और रितु की आगे की पढ़ाई के लिए काफी है. आप अभी रितु की शादी की चिंता न करें.’’ समीर ने रितु को कालेज में दाखिला दिलवा दिया और पढ़ाई में भी उस की मदद करता रहता. कठिनाई केवल एक बात की थी और वह थी रितु का जिद्दी स्वभाव. बचपन में तो ठीक था, भाई उस की हर बात मानता था पर अब बड़ी होने पर मां को उस का जिद्दी होना ठीक नहीं लगता क्योंकि वह हर बात, हर काम अपनी मरजी, अपने ढंग से करना चाहती थी.

पढ़ाई और नौकरी के चलते अब समीर ने बहुत अच्छी नौकरी ढूंढ़ ली थी. रितु का कालेज खत्म होते उस ने अपनी जानपहचान से रितु की नौकरी का जुगाड़ कर दिया था. मां ने जब दोबारा रितु की शादी की बात शुरू की तो समीर ने आश्वासन दिया कि अभी उसे नौकरी शुरू करने दें और वह अवश्य रितु के लिए योग्य वर ढूंढ़ने का प्रयास करेगा. इस के साथ ही उस ने मां को बताया कि वह अपने औफिस की एक लड़की को पसंद करता है और उस से जल्दी शादी भी करना चाहता है क्योंकि उस के मातापिता उस के लिए लड़का ढूंढ़ रहे हैं. मां यह सब सुन घबरा गईं कि पति को कैसे यह बात बताई जाए. आज तक उन की बिरादरी में विवाह मातापिता द्वारा तय किए जाते रहे थे. समीर ने पिता को सारी बात खुद बताना ठीक समझा. लड़की की पिता को पूरी जानकारी दी. पर यह नहीं बताया कि मां को सारी बात पता है. पिता खुश हुए पर कहा, ‘‘अपना निर्णय वे कल बताएंगे.’’

अगले दिन जब पिता ने अपने कमरे से आवाज दी तो वहां पहुंच समीर ने मां को भी वहीं पाया. हैरानी की बात कि बिना लड़की को देखे, बिना उस के परिवार के बारे में जाने पिता ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम खुश तो हम खुश.’’ यह बात समीर ने बाद में जानी कि पिता के जानपहचान के एक औफिसर, जो उसी के औफिस में ही थे, से वे सब जानकारी ले चुके थे. एक समय इस औफिसर के भाई व समीर के पिता इकट्ठे पढ़े थे. औफिसर ने बहाने से लड़की को बुलाया था कुछ काम समझाने के लिए, कुछ देर काम के विषय में बातचीत चलती रही और समीर के पिता को लड़की का व्यवहार व विनम्रता भा गई थी. ‘उल्टे बांस बरेली को’, लड़की वालों के यहां से कुछ रिश्तेदार समीर के घर में बुलाए गए. उन की आवभगत व चायनाश्ते के साथ रिश्ते की बात पक्की की गई और बहन रितु ने लड्डुओं के साथ सब का मुंह मीठा कराया. हफ्ते के बाद ही छोटे पैमाने पर दोनों का विवाह संपन्न हो गया. जोरदार स्वागत के साथ समीर व पूनम का गृहप्रवेश हुआ. अगले दिन पूनम के मायके से 2 बड़े सूटकेस लिए उस का मौसेरा भाई आया. सूटकेसों में सास, ससुर, ननद व दामाद के लिए कुछ तोहफे, पूनम के लिए कुछ नए व कुछ पहले के पहने हुए कपड़े थे. एक हफ्ते की छुट्टी ले नवदंपती हनीमून के लिए रवाना हुए और वापस आते ही अगले दिन से दोनों काम पर जाने लगे. पूनम को थोड़ा समय तो लगा ससुराल में सब की दिनचर्या व स्वभाव जानने में पर अधिक कठिनाई नहीं हुई. शीघ्र ही उस ने घर के काम में हाथ बटाना शुरू कर दिया. समीर ने मोटरसाइकिल खरीद ली थी, दोनों काम पर इकट्ठे आतेजाते थे.

समीर ने घर में एक बड़ा परिवर्तन महसूस किया जो पूनम के आने से आया. उस के पिता, जो स्वभाव से कम बोलने वाले इंसान थे, अपने बच्चों की जानकारी अकसर अपनी पत्नी से लेते रहते थे और कुछ काम हो, कुछ चाहिए हो तो मां का नाम ले आवाज देते थे. अब कभीकभी पूनम को आवाज दे बता देते थे और पूनम भी झट ‘आई पापा’ कह हाजिर हो जाती थी. समीर ने देखा कि पूनम पापा से निसंकोच दफ्तर की बातें करती या उन की सलाह लेती जैसे सदा से वह इस घर में रही हो या उन की बेटी ही हो. समीर पिता के इतने करीब कभी नहीं आ पाया, सब बातें मां के द्वारा ही उन तक पहुंचाई जाती थीं. पूनम की देखादेखी उस ने भी हिम्मत की पापा के नजदीक जाने की, बात करने की और पाया कि वह बहुत ही सरल और प्रिय इंसान हैं. अब अकसर सब का मिलजुल कर बैठना होता था. बस, एक बदलाव भारी पड़ा. एक दिन जब वे दोनों काम से लौटे तो पाया कि पूनम की साडि़यां, कपड़े आदि बिस्तर पर बिखरे पड़े हैं. पूनम कपड़े तह कर वापस अलमारी में रख जब मां का हाथ बटाने रसोई में आई तो पूछा, ‘‘मां, आप कुछ ढूंढ़ रही थीं मेरे कमरे में.’’

‘‘नहीं तो, क्या हुआ?’’

पूनम ने जब बताया तो मां को समझते देर न लगी कि यह रितु का काम है. रितु जब काम से लौटी तो पूनम की साड़ी व ज्यूलरी पहने थी. मां ने जब उसे समझाने की कोशिश की तो वह साड़ी बदल, ज्यूलरी उतार गुस्से से भाभी के बैड पर पटक आई और कई दिन तक भाईभाभी से अनबोली रही. फिर एक सुबह जब पूनम तैयार हो साड़ी के साथ का मैचिंग नैकलैस ढूंढ़ रही थी तो देर होने के कारण समीर ने शोर मचा दिया और कई बार मोटरसाइकिल का हौर्न बजा दिया. पूनम जल्दी से पहुंची और देर लगने का कारण बताया. शाम को रितु ने नैकलैस उतार कर मां को थमाया पूनम को लौटाने के लिए. ‘हद हो गई, निकाला खुद और लौटाए मां,’ समीर के मुंह से निकला.

ऐसा जब एकदो बार और हुआ तो मां ने पूनम को अलमारी में ताला लगा कर रखने को कहा पर उस ने कहा कि वह ऐसा नहीं करना चाहती. तब मां ने समीर से कहा कि वह चाहती है कि रितु को चीज मांग कर लेने की आदत हो न कि हथियाने की. मां के समझाने पर समीर रोज औफिस जाते समय ताला लगा चाबी मां को थमा जाता. अब तो रितु का अनबोलापन क्रोध में बदल गया. इसी बीच, पूनम ने अपने मायके की रिश्तेदारी में एक अच्छे लड़के का रितु के साथ विवाह का सुझाव दिया. समीर, पूनम लड़के वालों के घर जा सब जानकारी ले आए और बाद में विचार कर उन्हें अपने घर आने का निमंत्रण दे दिया ताकि वे सब भी उन का घर, रहनसहन देख लें और लड़कालड़की एकदूसरे से मिल लें. पूनम ने हलके पीले रंग की साड़ी और मैचिंग ज्यूलरी निकाल रितु को उस दिन पहनने को दी जो उस ने गुस्से में लेने से इनकार कर दिया. बाद में समीर के बहुत कहने पर पहन ली. रिश्ते की बात बन गई और शीघ्र शादी की तारीख भी तय हो गई. पूनम व समीर मां और पापा के साथ शादी की तैयारी में जुट गए. सबकुछ बहुत अच्छे से हो गया पर जिद्दी रितु विदाई के समय भाभी के गले नहीं मिली.

रितु के ससुराल में सब बहुत अच्छे थे. घर में सासससुर, रितु का पति विनीत और बहन रिचा, जिस ने इसी वर्ष ड्रैस डिजाइनिंग का कोर्स शुरू किया था, ही थे. रिचा भाभी का बहुत ध्यान रखती थी और मां का काम में हाथ बटाती थी. रितु ने न कोई काम मायके में किया था और न ही ससुराल में करने की सोच रही थी. एक दिन रिचा ने भाभी से कहा कि उस के कालेज में कुछ कार्यक्रम है और वह साड़ी पहन कर जाना चाहती है. उस ने बहुत विनम्र भाव से रितु से कोई भी साड़ी, जो ठीक लगे, मांगी. रितु ने साड़ी तो दे दी पर उसे यह सब अच्छा नहीं लगा. रिचा ने कार्यक्रम से लौट कर ठीक से साड़ी तह लगा भाभी को धन्यवाद सहित लौटा दी और बताया कि उस की सहेलियों को साड़ी बहुत पसंद आई. रितु को एकाएक ध्यान आया कि कैसे वह अपनी भाभी की चीजें इस्तेमाल कर कितनी लापरवाही से लौटाती थी. कहीं ननद फिर कोई चीज न मांग बैठे, इस इरादे से रितु ने अलमारी में ताला लगा दिया और चाबी छिपा कर रख ली.

एक दिन शाम जब रितु पति के साथ घूमने जाने के लिए तैयार होने के लिए अलमारी से साड़ी निकाल, फिर ताला लगाने लगी तो विनीत ने पूछा, ‘‘ताला क्यों?’’ जवाब मिला-वह किसी को अपनी चीजें इस्तेमाल करने के लिए नहीं देना चाहती. विनीत ने समझाया, ‘‘मम्मी उस की चीजें नहीं लेंगी.’’

रितु ने कहा, ‘‘रिचा तो मांग लेगी.’’ अगले हफ्ते रितु को एक सप्ताह के लिए मायके जाना था. उस ने सूटकेस तैयार कर अपनी अलमारी में ताला लगा दिया. सास को ये सब अच्छा नहीं लगा. सब तो घर के ही सदस्य हैं, बाहर का कोई इन के कमरे में जाता नहीं, पर वे चुप ही रहीं. मायके पहुंची तो मां ने ससुराल का हालचाल पूछा. रितु ने जब अलमारी में ताला लगाने वाली बात बताई तो मां ने सिर पकड़ लिया उस की मूर्खता पर. मां ने बताया कि यहां ताला पूनम ने नहीं बल्कि मां के कहने पर उस के भाई समीर ने लगाना शुरू किया था और चाबी हमेशा मां के पास रहती थी. ताला लगाने का कारण रितु का लापरवाही से भाभी की चीजों का बिना पूछे इस्तेमाल करना और फिर बिगाड़ कर लौटाना था. यह सब उस की आदतों को सुधारने के लिए किया गया था. वह तो सुधरी नहीं और फिर कितनी बड़ी नादानी कर आई वह ससुराल में अपनी अलमारी में ताला लगा कर. मां ने समझाया कि चीजों से कहीं ऊपर है एकदूसरे पर विश्वास, प्यार और नम्रता. ससुराल में अपनी जगह बनाने के लिए और प्यार पाने के लिए जरूरी है प्यार व मान देना. रितु की दोपहर तो सोच में डूबी पर शाम को जैसे ही भाईभाभी नौकरी से घर लौटे उस ने भाभी को गले लगाया. भाभी ने सोचा शायद काफी दिनों बाद आई है, इसलिए ऐसा हुआ पर वास्तविकता कुछ और थी.

रितु ने देखा यहां अलमारी में कोई ताला नहीं लगा हुआ, वह भी शीघ्र ससुराल वापस जा ताले को हटा मन का ताला खोलना चाहती है ताकि अपनी भूल को सुधार सके, सब की चहेती बन सके जैसे भाभी हैं यहां. एक हफ्ता मायके में रह उस ने बारीकी से हर बात को देखासमझा और जाना कि शादी के बाद ससुराल में सुख पाने का मूलमंत्र है सब को अपना समझना, बड़ों को आदरमान देना और जिम्मेदारियों को सहर्ष निभाना. इतना कठिन तो नहीं है ये सब. कितनी सहजता है भाभी की अपने ससुराल में, जैसे वह सब की और सब उस के हैं. मां के घुटनों में दर्द रहने लगा था. रितु ने देखा कि भाभी ने सब काम संभाल लिया था और रात को सोने से पहले रोज वे मां के घुटनों की मालिश कर देती थीं ताकि वे आराम से सो सकें. अब वही भाभी, जिस के लिए उस के मन में इतनी कटुता थी, उस की आदर्श बनती जा रही थीं.

एक दिन जब पूनम और समीर को औफिस से आने में देर हो गई तब जल्दी कपड़े बदल पूनम रसोई में पहुंची तो पाया रात का खाना तैयार था. मां से पता चला कि खाना आज रितु ने बनाया है, यह बात दूसरी थी कि सब निर्देश मां देती रही थीं. रितु को अच्छा लगा जब सब ने खाने की तारीफ की. पूनम ने औफिस से देर से आने का कारण बताया. वह और समीर बाजार गए थे. उन्होंने वे सब चीजें सब को दिखाईं जो रितु के ससुराल वालों के लिए खरीदी गई थीं. इस इतवार दामादजी रितु को लिवाने आ रहे थे. खुशी के आंसुओं के साथ रितु ने भाईभाभी को गले लगाया और धन्यवाद दिया. मां भी अपने आंसू रोक न सकीं बेटी में आए बदलाव को देख कर. रितु ससुराल लौटी एक नई उमंग के साथ, एक नए इरादे से जिस से वह सब को खुश रखने का प्रयत्न करेगी और सब का प्यार पाएगी, विशेषकर विनीत का.

रितु ने पाया कि उस की सास हर किसी से उस की तारीफ करती हैं, ननद उस की हर काम में सहायता करती है और कभीकभी प्यार से ‘भाभीजान’ बुलाती है, ससुर फूले नहीं समाते कि घर में अच्छी बहू आई और विनीत तो रितु पर प्यार लुटाता नहीं थकता. रितु बहुत खुश थी कि जैसे उस ने बहुत बड़ा किला फतह कर लिया हो एक छोटे से हथियार से, ‘प्यार का हथियार’.

Fictional Story

Hindi Drama Story: विश्वास- शिखा ने क्यों किया मां और अंकल के रिश्तों पर शक

Hindi Drama Story: फोन पर ‘हैलो’ सुनते ही अंजलि ने अपने पति राजेश की आवाज पहचान ली.

राजेश ने अपनी बेटी शिखा का हालचाल जानने के बाद तनाव भरे स्वर में पूछा, ‘‘तुम यहां कब लौट रही हो?’’

‘‘मेरा जवाब आप को मालूम है,’’ अंजलि की आवाज में दुख, शिकायत और गुस्से के मिलेजुले भाव उभरे.

‘‘तुम अपनी मूर्खता छोड़ दो.’’

‘‘आप ही मेरी भावनाओं को समझ कर सही कदम क्यों नहीं उठा लेते हो?’’

‘‘तुम्हारे दिमाग में घुसे बेबुनियाद शक का इलाज कर ने को मैं गलत कदम नहीं उठाऊंगा…अपने बिजनेस को चौपट नहीं करूंगा, अंजलि.’’

‘‘मेरा शक बेबुनियाद नहीं है. मैं जो कहती हूं, उसे सारी दुनिया सच मानती है.’’

‘‘तो तुम नहीं लौट रही हो?’’ राजेश चिढ़ कर बोला.

‘‘नहीं, जब तक…’’

‘‘तब मेरी चेतावनी भी ध्यान से सुनो, अंजलि,’’ उसे बीच में टोकते हुए राजेश की आवाज में धमकी के भाव उभरे, ‘‘मैं ज्यादा देर तक तुम्हारा इंतजार नहीं करूंगा. अगर तुम फौरन नहीं लौटीं तो…तो मैं कोर्ट में तलाक के लिए अर्जी दे दूंगा. आखिर, इनसान की सहने की भी एक सीमा…’’

अंजलि ने फोन रख कर संबंधविच्छेद कर दिया. राजेश ने पहली बार तलाक लेने की धमकी दी थी. उस की आंखों में अपनी बेबसी को महसूस करते हुए आंसू आ गए. वह चाहती भी तो आगे राजेश से वार्तालाप न कर पाती क्योंकि उस के रुंधे गले से आवाज नहीं निकलती.

शिखा अपनी एक सहेली के घर गई हुई थी. अंजलि के मातापिता अपने कमरे में आराम कर रहे थे. अपनी चिंता, दुख और शिकायत भरी नाराजगी से प्रभावित हो कर वह बिना किसी रुकावट के कुछ देर खूब रोई.

रोने से उस का मन उदास और बोझिल हो गया. एक थकी सी गहरी आस छोड़ते हुए वह उठी और फोन के पास पहुंच कर अपनी सहेली वंदना का नंबर मिलाया.

राजेश से मिली तलाक की धमकी के बारे में जान कर वंदना ने उसे आश्वासन दिया, ‘‘तू रोनाधोना बंद कर, अंजलि. मेरे साहब घर पर ही हैं. हम दोनों घंटे भर के अंदर तुझ से मिलने आते हैं. आगे क्या करना है, इस की चर्चा आमने- सामने बैठ कर करेंगे. फिक्र मत कर, सब ठीक हो जाएगा.’’

वंदना उस के बचपन की सब से अच्छी सहेली थी. उस का व उस के पति कमल का अंजलि को बहुत सहारा था. उन दोनों के साथ अपने सुखदुख बांट कर ही पति से दूर वह मायके में रह रही थी. अपना मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए अंजलि जो बात अपने मातापिता से नहीं कह पाती, वह इन दोनों से बेहिचक कह देती.

राजेश से फोन पर हुई बातचीत का ब्योरा अंजलि से सुन कर वंदना चिंतित हो उठी तो उस के पति कमल की आंखों में गुस्से के भाव उभरे.

‘‘अंजलि, कोई चोर कोतवाल को उलटा नहीं धमका सकता है. राजेश को तलाक की धमकी देने का कोई अधिकार नहीं है. अगर वह ऐसा करता है तो समाज उसी के नाम पर थूथू करेगा,’’ कमल ने आवेश भरे लहजे में अपनी राय बताई.

‘‘मेरी समझ से हमें टकराव का रास्ता छोड़ कर राजेश से बात करनी चाहिए,’’ चिंता के मारे अपनी उंगलियां मरोड़ते हुए वंदना ने अपने मन की बात कही.

‘‘राजेश से बातचीत करने को अगर अंजलि उस के पास लौट गई तो वह अपने दोस्त की विधवा के प्रेमजाल से कभी नहीं निकलेगा. उस पर संबंध तोड़ने को दबाव बनाए रखने के लिए अंजलि का यहां रहना जरूरी है.’’

‘‘अगर राजेश ने सचमुच तलाक की अर्जी कोर्ट में दे दी तो क्या करेंगे हम? तब भी तो अंजलि

को मजबूरन वापस लौटना पडे़गा न.’’

‘‘मैं नहीं लौटूंगी,’’ अंजलि ने सख्त लहजे में उन दोनों को अपना फैसला सुनाया, ‘‘मैं 2 महीने अलग रह सकती हूं तो जिंदगी भर को भी अलग रह लूंगी. मैं जब चाहूं तब अध्यापिका की नौकरी पा सकती हूं. शिखा को पालना मेरे लिए समस्या नहीं बनेगा. एक बात मेरे सामने बिलकुल साफ है. अगर राजेश ने उस विधवा सीमा से अपने व्यक्तिगत व व्यावसायिक संबंध बिलकुल समाप्त नहीं किए तो वह मुझे खो देंगे.’’

वंदना व कमल कुछ प्रतिक्रिया दर्शाते, उस से पहले ही बाहर से किसी ने घंटी बजाई. अंजलि ने दरवाजा खोला तो सामने अपनी 16 साल की बेटी शिखा को खड़ा पाया.

‘‘वंदना आंटी और कमल अंकल आए हुए हैं. तुम उन के पास कुछ देर बैठो, तब तक मैं तुम्हारे लिए खाना लगा लाती हूं,’’ भावुकता की शिकार बनी अंजलि ने प्यार से अपनी बेटी के कंधे पर हाथ रखा.

‘‘मेरा मूड नहीं है, किसी से खामखां सिर मारने का. जब भूख होगी, मैं खाना खुद ही गरम कर के खा लूंगी,’’ बड़ी रुखाई से जवाब देने के बाद साफ तौर पर चिढ़ी व नाराज सी नजर आ रही शिखा अपने कमरे में जा घुसी.

अंजलि को उस का अचानक बदला व्यवहार बिलकुल समझ में नहीं आया. उस ने परेशान अंदाज में इस की चर्चा वंदना और कमल से की.

‘‘शिखा छोटी बच्ची नहीं है,’’ वंदना की आंखों में चिंता के बादल और ज्यादा गहरा उठे, ‘‘अपने मातापिता के बीच की अनबन जरूर उस के मन की सुखशांति को प्रभावित कर रही है. उस के अच्छे भविष्य की खातिर भी हमें समस्या का समाधान जल्दी करना होगा.’’

‘‘वंदना ठीक कह रही है, अंजलि,’’ कमल ने गंभीर लहजे में कहा, ‘‘तुम शिखा से अपने दिल की बात खुल कर कहो और उस के मन की बातें सहनशीलता से सुनो. मेरी समझ से हमारे जाने के बाद आज ही तुम यह काम करना. कोई समस्या आएगी तो वंदना और मैं भी उस से बात करेंगे. उस की टेंशन दूर करना हम सब की जिम्मेदारी है.’’

उन दोनों के विदा होने तक अपनी समस्या को हल करने का कोई पक्का रास्ता अंजलि के हाथ नहीं आया था. अपनी बेटी से खुल कर बात करने के  इरादे से जब उस ने शिखा के कमरे में कदम रखा, तब वह बेचैनी और चिंता का शिकार बनी हुई थी.

‘‘क्या बात है? क्यों मूड खराब है तेरा?’’ अंजलि ने कई बार ऐसे सवालों को घुमाफिरा कर पूछा, पर शिखा गुमसुम सी बनी रही.

‘‘अगर मुझे तू कुछ बताना नहीं चाहती है तो वंदना आंटी और कमल अंकल से अपने दिल की बात कह दे,’’  अंजलि की इस सलाह का शिखा पर अप्रत्याशित असर हुआ.

‘‘भाड़ में गए कमल अंकल. जिस आदमी की शक्ल से मुझे नफरत है, उस से बात करने की सलाह आज मुझे मत दें,’’  शिखा किसी ज्वालामुखी की तरह अचानक फट पड़ी.

‘‘क्यों है तुझे कमल अंकल से नफरत? अपने मन की बात मुझ से बेहिचक हो कर कह दे गुडि़या,’’ अंजलि का मन एक अनजाने से भय और चिंता का शिकार हो गया.

‘‘पापा के पास आप नहीं लौटो, इस में उस चालाक इनसान का स्वार्थ है और आप भी मूर्ख बन कर उन के जाल में फंसती जा रही हो.’’

‘‘कैसा स्वार्थ? कैसा जाल? शिखा, मेरी समझ में तेरी बात रत्ती भर नहीं आई.’’

‘‘मेरी बात तब आप की समझ में आएगी, जब खूब बदनामी हो चुकी होगी. मैं पूछती हूं कि आप क्यों बुला लेती हो उन्हें रोजरोज? क्यों जाती हो उन के घर जब वंदना आंटी घर पर नहीं होतीं? पापा बारबार बुला रहे हैं तो क्यों नहीं लौट चलती हो वापस घर.’’

शिखा के आरोपों को समझने में अंजलि को कुछ पल लगे और तब उस ने गहरे सदमे के शिकार व्यक्ति की तरह कांपते स्वर में पूछा, ‘‘शिखा, क्या तुम ने कमल अंकल और मेरे बीच गलत तरह के संबंध होने की बात अपने मुंह से निकाली है?’’

‘‘हां, निकाली है. अगर दाल में कुछ काला न होता तो वह आप को सदा पापा के खिलाफ क्यों भड़काते? क्यों जाती हो आप उन के घर, जब वंदना आंटी घर पर नहीं होतीं?’’

अंजलि ने शिखा के गाल पर थप्पड़ मारने के लिए उठे अपने हाथ को बड़ी कठिनाई से रोका और गहरीगहरी सांसें ले कर अपने क्रोध को कम करने के प्रयास में लग गई. दूसरी तरफ तनी हुई शिखा आंखें फाड़ कर चुनौती भरे अंदाज में उसे घूरती रहीं.

कुछ सहज हो कर अंजलि ने उस से पूछा, ‘‘वंदना के घर मेरे जाने की खबर तुम्हें उन के घर के सामने रहने वाली रितु से मिलती है न?’’

‘‘हां, रितु मुझ से झूठ नहीं बोलती है,’’ शिखा ने एकएक शब्द पर जरूरत से ज्यादा जोर दिया.

‘‘यह अंदाजा उस ने या तुम ने किस आधार पर लगाया कि मैं वंदना की गैर- मौजूदगी में कमल से मिलने जाती हूं?’’

‘‘आप कल सुबह उन के घर गई थीं और परसों ही वंदना आंटी ने मेरे सामने कहा था कि वह अपनी बड़ी बहन को डाक्टर के यहां दिखाने जाएंगी, फिर आप उन के घर क्यों गईं?’’

‘‘ऐसा हुआ जरूर है, पर मुझे याद नहीं रहा था,’’ कुछ पल सोचने के बाद अंजलि ने गंभीर स्वर में जवाब दिया.

‘‘मुझे लगता है कि वह गंदा आदमी आप को फोन कर के अपने पास ऐसे मौकों पर बुलाता है और आप चली जाती हो.’’

‘‘शिखा, तुम्हें अपनी मम्मी के चरित्र पर यों कीचड़ उछालते हुए शर्म नहीं आ रही है,’’ अंजलि का अपमान के कारण चेहरा लाल हो उठा, ‘‘वंदना मेरी बहुत भरोसे की सहेली है. उस के साथ मैं कैसे विश्वासघात करूंगी? मेरे दिल में सिर्फ तुम्हारे पापा बसते हैं, और कोई नहीं.’’

‘‘तब आप उन के पास लौट क्यों नहीं चलती हो? क्यों कमल अंकल के भड़काने में आ रही हो?’’ शिखा ने चुभते लहजे में पूछा.

‘‘बेटी, तेरे पापा के और मेरे बीच में एक औरत के कारण गहरी अनबन चल रही है, उस समस्या के हल होते ही मैं उन के पास लौट जाऊंगी,’’ शिखा को यों स्पष्टीकरण देते हुए अंजलि ने खुद को शर्म के मारे जमीन मेें गड़ता महसूस किया.

‘‘मुझे यह सब बेकार के बहाने लगते हैं. आप कमल अंकल के कारण पापा के पास लौटना नहीं चाहती हो,’’ शिखा अपनी बात पर अड़ी रही.

‘‘तुम जबरदस्त गलतफहमी का शिकार हो, शिखा. वंदना और कमल मेरे शुभचिंतक हैं. उन दोनों का बहुत सहारा है मुझे. दोस्ती के पवित्र संबंध की सीमाएं तोड़ कर कुछ गलत न मैं कर रही हूं न कमल अंकल. मेरे कहे पर विश्वास कर बेटी,’’ अंजलि बहुत भावुक हो उठी.

‘‘मेरे मन की सुखशांति की खातिर आप अंकल से और जरूरी हो तो वंदना आंटी से भी अपने संबंध पूरी तरह तोड़ लो, मम्मी. मुझे डर है कि ऐसा न करने पर आप पापा से सदा के लिए दूर हो जाओगी,’’ शिखा ने आंखों में आंसू ला कर विनती की.

‘‘तुम्हारे नासमझी भरे व्यवहार से मैं बहुत निराश हूं,’’ ऐसा कह कर अंजलि उठ कर अपने कमरे में चली आई.

इस घटना के बाद मांबेटी के संबंधों में बहुत खिंचाव आ गया. आपस में बातचीत बस, बेहद जरूरी बातों को ले कर होती. अपने दिल पर लगे घावों को दोनों नाराजगी भरी खामोशी के साथ एकदूसरे को दिखा रही थीं.

शिखा की चुप्पी व नाराजगी वंदना और कमल ने भी नोट की. अंजलि उन के किसी सवाल का जवाब नहीं दे सकी. वह कैसे कहती कि शिखा ने कमल और उस के बीच नाजायज संबंध होने का शक अपने मन में बिठा रखा था.

करीब 4 दिन बाद रात को शिखा ने मां के कमरे में आ कर अपने मन की बातें कहीं.

‘‘आप अंदाजा भी नहीं लगा सकतीं कि मेरी सहेली रितु ने अन्य सहेलियों को सब बातें बता कर मेरे लिए इज्जत से सिर उठा कर चलना ही मुश्किल कर दिया है. अपनी ये सब परेशानियां मैं आप के नहीं, तो किस के सामने रखूं?’’

‘‘मुझे तुम्हारी सहेलियों से नहीं सिर्फ तुम से मतलब है, शिखा,’’ अंजलि ने शुष्क स्वर में जवाब दिया, ‘‘तुम ने मुझे चरित्रहीन क्यों मान लिया? मुझ से ज्यादा तुम्हें अपनी सहेली पर विश्वास क्यों है?’’

‘‘मम्मी, बात विश्वास करने या न करने की नहीं है. हमें समाज में मानसम्मान से रहना है तो लोगों को ऊटपटांग बातें करने का मसाला नहीं दिया जा सकता.’’

‘‘तब क्या दूसरों को खुश करने के लिए तुम अपनी मां को चरित्रहीन करार दे दोगी? उन की झूठी बातों पर विश्वास कर के अपनी मां को उस की सब से प्यारी सहेली से दूर करने की जिद पकड़ोगी?’’

‘‘मुझ पर क्या गुजर रही है, इस की आप को भी कहां चिंता है, मम्मी,’’ शिखा चिढ़ कर गुस्सा हो उठी, ‘‘मैं आप की सहेली नहीं बल्कि सहेली के चालाक पति से आप को दूर देखना चाहती हूं. अपनी बेटी की सुखशांति से ज्यादा क्या कमल अंकल के साथ जुडे़ रहना आप के लिए जरूरी है?’’

‘‘कमल अंकल मेरे लिए तुम से ज्यादा महत्त्वपूर्ण कैसे हो सकते हैं, शिखा? मुझे तो अफसोस और दुख इस बात का है कि मेरी बेटी को मुझ पर विश्वास नहीं रहा. मैं पूछती हूं कि तुम ही मुझ पर विश्वास क्यों नहीं कर रही हो?  अपनी सहेलियों की बकवास पर ध्यान न दे कर मेरा साथ क्यों नहीं दे रही हो? मेरे मन में खोट नहीं है, इस बात को मेरे कई बार दोहराने के बावजूद तुम ने उस पर विश्वास न कर के मेरे दिल को जितनी पीड़ा पहुंचाई है, क्या उस का तुम्हें अंदाजा है?’’ बोलते हुए अंजलि का चेहरा गुस्से से लाल हो गया.

‘‘यों चीखचिल्ला कर आप मुझे चुप नहीं कर सकोगी,’’ गुस्से से भरी शिखा उठ कर खड़ी हो गई, ‘‘चित भी मेरी और पट भी मेरी का चालाकी भरा खेल मेरे साथ न खेलो.’’

‘‘क्या मतलब?’’ अंजलि फौरन उलझन का शिकार बन गई.

‘‘मतलब यह कि पापा ने अपनी बिजनेस पार्टनर सीमा आंटी को ले कर आप को सफाई दे दी तब तो आप ने उन की एक नहीं सुनी और यहां भाग आईं, और जब मैं आप से कमल अंकल के साथ संबंध तोड़ लेने की मांग कर रही हूं तो किस आधार पर आप मुझे गलत और खुद को सही ठहरा रही हो?’’

अंजलि को बेटी का सवाल सुन कर तेज झटका लगा. उस ने अपना सिर झुका लिया. शिखा आगे एक भी शब्द न बोल कर अपने कमरे में लौट गई. दोनों मांबेटी ने तबीयत खराब होने का बहाना बना कर रात का खाना नहीं खाया. शिखा के नानानानी को उन दोनों के उखडे़ मूड का कारण जरा भी समझ में नहीं आया.

उस रात अंजलि बहुत देर तक नहीं सो सकी. अपने पति के साथ चल रहे मनमुटाव से जुड़ी बहुत सी यादें उस के दिलोदिमाग में हलचल मचा रही थीं. शिखा द्वारा लगाए गए आरोप ने उसे बुरी तरह झकझोर दिया था.

राजेश ने कभी स्वीकार नहीं किया था कि अपने दोस्त की विधवा के साथ उस के अनैतिक संबंध थे. दूसरी तरफ आफिस में काम करने वाली 2 लड़कियों और राजेश के दोस्तों की पत्नियों ने इस संबंध को समाप्त करवा देने की चेतावनी कई बार उस के कानों में डाली थी.

तब खूबसूरत सीमा को अपने पति के साथ खूब खुल कर हंसतेबोलते देख अंजलि जबरदस्त ईर्ष्या व असुरक्षा की भावना का शिकर रहने लगी.

राजेश ने उसे प्यार से व डांट कर भी खूब समझाया पर अंजलि ने साफ कह दिया, ‘मेरे मन की सुखशांति, मेरे प्यार व खुशियों की खातिर आप को सीमा से हर तरह का संबंध समाप्त कर लेना होगा.’

‘मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा जिस से अपनी नजरों में गिर जाऊं. मैं कुसूरवार हूं ही नहीं, तो सजा क्यों भोगूं? अपने दिवंगत दोस्त की पत्नी को मैं बेसहारा नहीं छोड़ सकता हूं. तुम्हारे बेबुनियाद शक के कारण मैं अपनी नजरों में खुद को गिराने वाला कोई कदम नहीं उठाऊंगा,’ राजेश के इस फैसले को अंजलि किसी भी तरह से नहीं बदलवा सकी.

पहले अपने पति और अब अपनी बेटी के साथ हुए टकरावों में अंजलि को बड़ी समानता नजर आई. उस ने सीमा को ले कर राजेश पर चरित्रहीन होने का आरोप लगाया था और शिखा ने कमल को ले कर खुद उस पर.

वह अपने को सही मानती थी, जैसे अब शिखा अपने को सही मान रही थी. वहां राजेश अपराधी के कटघरे में खड़ा हो कर सफाई देता था और आज वह अपनी बेटी को सफाई देने के लिए मजबूर थी.

अपने दिल की बात वह अच्छी तरह जानती थी. उस के मन में कमल को ले कर रत्ती भर भी गलत तरह का आकर्षण नहीं था. इस मामले में शिखा पूरी तरह गलत थी.

तब सीमा व राजेश के मामले में क्या वह खुद गलत नहीं हो सकती थी? इस सवाल से जूझते हुए अंजलि ने सारी रात करवटें बदलते हुए गुजार दी.

अगली सुबह शिखा के जागते ही अंजलि ने अपना फैसला उसे सुना दिया, ‘‘अपना सामान बैग में रख लो. नाश्ता करने के बाद हम अपने घर लौट रहे हैं.’’

‘‘ओह, मम्मी. यू आर ग्रेट. मैं बहुत खुश हूं,’’ शिखा भावुक हो कर उस से लिपट गई.

अंजलि ने उस के माथे का चुंबन लिया, पर मुंह से कुछ नहीं बोली. तब शिखा ने धीमे स्वर में उस से कहा, ‘‘गुस्से में आ कर मैं ने जो भी पिछले दिनों आप से उलटासीधा कहा है, उस के लिए मैं बेहद शर्मिंदा हूं. आप का फैसला बता रहा है कि मैं गलत थी. प्लीज मम्मा, मुझे माफ कर दीजिए.’’

अंजलि ने उसे अपने सीने से लगा लिया. मांबेटी दोनों की आंखों में आंसू भर आए. पिछले कई दिनों से बनी मानसिक पीड़ा व तनाव से दोनों पल भर में मुक्त हो गई थीं.

उस के बुलावे पर वंदना उस से मिलने घर आ गई. कमल के आफिस चले जाने के कारण अंजलि के लौटने की खबर कमल तक नहीं पहुंची.

वंदना को अंजलि ने अकेले में अपने वापस लौटने का सही कारण बताया, ‘‘पिछले दिनों अपनी बेटी शिखा के कारण राजेश और सीमा को ले कर मुझे अपनी एक गलती…एक तरह की नासमझी का एहसास हुआ है. उसी भूल को सुधारने को मैं राजेश के पास बेशर्त वापस लौट रही हूं.

‘‘सीमा के साथ उस के अनैतिक संबंध नहीं हैं, मुझे राजेश के इस कथन पर विश्वास करना चाहिए था, पर मैं और लोगों की सुनती रही और हमारे बीच प्रेम व विश्वास का संबंध कमजोर पड़ने लगा.

‘‘अगर राजेश निर्दोष हैं तो मेरा झगड़ालू रवैया उन्हें कितना गलत और दुखदायी लगता होगा. बिना कुछ अपनी आंखों से देखे, पत्नी का पति पर विश्वास न करना क्या एक तरह का विश्वासघात नहीं है?

‘‘मैं राजेश को…उन के पे्रम को खोना नहीं चाहती हूं. हो सकता है कि सीमा और उन के बीच गलत तरह के संबंध बन गए हों, पर इस कारण वह खुद भी मुझे छोड़ना नहीं चाहते. उन के दिल में सिर्फ मैं रहूं, क्या अपने इस लक्ष्य को मैं उन से लड़झगड़ कर कभी पा सकूंगी?

‘‘वापस लौट कर मुझे उन का विश्वास फिर से जीतना है. हमारे बीच प्रेम का मजबूत बंधन फिर से कायम हो कर हम दोनों के दिलों के घावों को भर देगा, इस का मुझे पूरा विश्वास है.’’

अंजलि की आंखों में दृढ़निश्चय के भावों को पढ़ कर वंदना ने उसे बडे़ प्यार से गले लगा लिया.

Hindi Drama Story

Short Hindi Story: सासें भांति भांति की

Short Hindi Story: विविधता से परिपूर्ण हमारे देश में भांतिभांति के अजूबे पाए जाते हैं. हमारी हर बात निराली होती है. लेकिन हमारे देश की संस्कृति में एक अजूबा चरित्र ऐसा भी है, जो भारत की विविधताओं में एकता का गुरुतर भार अपने कंधों पर सदियों से ढोता आ रहा है.

कश्मीर से कन्याकुमारी और अटक से कटक तक संपूर्ण भारतवर्ष में यह जीव सर्वत्र नजर आता है. इस अद्भुत चरित्र का नाम है सास. प्रादेशिक भाषाओं में इसे सासू, सास, सासूमां अथवा अन्य किसी संबोधन से पुकारा जाता है, लेकिन इस का मुख्य अर्थ है पति की माताश्री, जिन्हें आदर के साथ सास कहा जाता है. वैसे पत्नी की माताश्री भी जंवाई राजा की सास कहलाती है, लेकिन वह सास का गौणरूप है.

सास का मुख्य और अहम स्वरूप पति की माता के रूप में अधिक वर्णनीय है. यह चरित्र सरल भी है, खासा जटिल भी. जलेबी की तरह सीधा भी है तो करेले की तरह मीठा भी, यह नमक की तरह खारा भी है तो स्वाद का राजा भी.

यदि दुनिया की गूढ़ पहेलियों की बात की जाए तो सास की पहेली सब से ज्यादा जटिल नजर आती है. बीजगणित के जटिल समीकरण आसानी से हल हो सकते हैं, लेकिन सासबहू के समीकरण को समझना और हल करना हम जैसे तुच्छ प्राणी के वश की बात नजर नहीं आती है. हमें उम्मीद नहीं लगती कि कभी कोई विद्वान 36 के ऐसे आंकड़े के रहस्य से परदा उठा पाएगा. सासबहू के विवाद का हर गृहस्थी को सामना करना पड़ता है.

सास शब्द की उत्पत्ति पर विचार करना भी कठिन है. यदि व्याकरण के नियमों और सिद्धांतों को ताक पर रख कर हम थोड़े व्यावहारिक दृष्टिकोण से चिंतन करें तो प्रतीत होता है जैसे सृष्टि को नियंत्रित करने के लिए ही इस जीव विशेष की रचना हुई होगी. सास शब्द निश्चय ही श्वास से जुड़ा होगा. हमारे अनुसार सास की सरल परिभाषा अथवा भावार्थ यह हो सकता है कि सास वह होती है, जो सांसों को नियंत्रित करने का जिम्मा उठाती है. सासबहू के संबंध गृहस्थी की नींव होते हैं, इसलिए एक गृहस्थ की सांसें इस नींव पर ही टिकी रहती हैं. सासें विभिन्न प्रकार की हो सकती हैं. इन के गुणधर्म और आचारव्यवहार के आधार पर हम ने इन्हें विभिन्न श्रेणियों में विभाजित कर के समझने का प्रयास किया है.

उपयोगिता की दृष्टि से सकारात्मक सोच वाली सासें अपनी बहू के लिए एक आदर्श और मजबूत संबल होती हैं, तो नकारात्मक भूमिका वाली सासें गृहस्थी का बंटाढार करने के लिए जगतप्रसिद्ध हैं. सासें चाहें तो घर की बागडोर को अच्छी तरह हैंडल कर सकती हैं तथा नईनवेली बहुओं के लिए आदर्श प्रशिक्षिका भी साबित हो सकती हैं, जिस में सारे परिवार का उद्धार निहित है.

पहली श्रेणी उन सासों की है, जो अकसर बड़बड़ करती रहती हैं. इस श्रेणी की सासों को ‘बकबक सासें’ कहा जा सकता है. उन का पहला और आखिरी काम होता है बहुओं के क्रियाकलापों पर टीकाटिप्पणी करना. ऐसी सासें जब चाहें तब तिल का पहाड़ बना कर विस्फोट करा सकती हैं. उन का खून गरम होता है, अत: तापमान को ज्वलनशीलता की ओर अग्रसर करना उन के बाएं हाथ का खेल होता है. बहुओं की छोटी से छोटी बात पर भी पैनी नजर रखना उन की सामान्य आदत होती है. मीनमेख निकालने की कला में वे दक्ष होती हैं. संभवत: इसी क्रिया द्वारा उन का भोजन पचता है. साधारणतया इस श्रेणी की सासों के वार्तालाप का मुख्य विषय भी बहू पर ही केंद्रित होता है. ऐसी सासें अपनी बहुओं के दोषों का बखान करते कभी नहीं थकतीं. उन की अपनी बहुओं से हमेशा तनातनी चलती रहती है. ऐसी सासें सब से ज्यादा संख्या में पाई जाती हैं.

दूसरे प्रकार की सासों को ‘सौम्य सासें’ कहा जा सकता है. वे गऊछाप सासें होती हैं, इसलिए उन की प्रकृति बहुओं पर दोष मढ़ने की नहीं होती, बल्कि उन्हें प्यार से समझा कर उन की गलतियों को सुधारने की होती है. लेकिन ऐसी सासों का अकसर अकाल ही रहता है. ऐसी सासों  का पाला अगर ‘हू हू’ किस्म की यानी डरावनी बहू से पड़ जाए तो वे दहेज के झूठे इलजाम में हवालात की गौशाला में भी बंधी नजर आ सकती हैं.

तीसरी श्रेणी की सासें ‘पहलवान टाइप’ होती हैं. वे अपने बाहुबल के प्रदर्शन का अवसर कभी नहीं चूकती हैं. मौका मिलते ही थप्पड़ जड़ना उन का शगल होता है. लेकिन वरीयता क्रम में पिछड़ी इन सासों की लोकप्रियता आधुनिक युग में बड़ी तेजी के साथ घटती जा रही है. वर्तमान कानून और प्रतिबंध उन की वंशवृद्धि में बड़ी रुकावट पैदा कर रहे हैं. ऐसी सासों को शास्त्रीय अथवा क्लासिकल सासें कहना भी उचित होगा.

एक जमाना था जब ऐसी सासों ने बौलीवुड की फिल्मों में धाक जमाई हुई थी. ललिता पवार को ऐसी सास के अभिनय ने लोकप्रियता की बुलंदियों पर पहुंचा दिया था. ऐसी सासों से बहूबेटे ही नहीं बल्कि पूरा महल्ला डरा करता था. लेकिन अब ऐसे रोबदाब वाली सासों के दिन लद गए हैं. उन का स्वर्ण युग इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह गया है. अलबत्ता दहेज कानूनों ने इस ब्रैंड की बहुओं की फौज जरूर खड़ी कर दी है.

चौथी श्रेणी में ‘चुगलबाज सासों’ को रखा जा सकता है. उन का प्रिय शौक चुगलबाजी करना होता है. अत: अपने घरपरिवार की बातें मीडिया की तरह जनसाधारण तक पहुंचाने में उन्हें बड़ा आनंद मिलता है. उन की रिपोर्टिंग के आगे इलैक्ट्रौनिक अथवा प्रिंट मीडिया भी फेल साबित होता है. आज बहू कब सो कर उठी अथवा सब्जी में नमक ज्यादा था या कम जैसी महत्त्वपूर्ण खबरें हजारों मील दूर बैठे रिश्तेदारों को सहज ही पता चल जाती हैं.

5वीं श्रेणी ‘फरमाइशी सासों’ की है. कारण, उन की फरमाइशें कभी पूरी नहीं होती हैं. बहुओं से उन की फरमाइशें हमेशा चलती रहती हैं. ऐसी सासें दहेज से कभी संतुष्ट नहीं दिखतीं. उन्हें पूंजीवादी सासें भी कहा जा सकता है, क्योंकि उन की सारी चिंता पूंजी पर केंद्रित रहती है.

छठे वर्ग की सासों को ‘समाजवादी सासें’ कहना उचित होगा. उन्हें हमेशा समाज की चिंता सताती रहती है. उन्हें हमेशा डर रहता है कि पता नहीं बहू कब उन की प्रतिष्ठा की नाक समाज में कटवा डाले, किसी ने देख लिया तो लोग क्या कहेंगे जैसे जुमले उन के मुंह पर हमेशा चढ़े रहते हैं. ऐसी सासें हमेशा अपनी बहुओं के कृत्यों और उन के समाज पर पड़ने वाले प्रभाव का मूल्यांकनविश्लेषण करती प्रतीत होती हैं.

7वीं श्रेणी में ‘शिकायतप्रधान सासें’ आती हैं. वे मुंह पर थप्पड़ की तरह अपनी शिकायतें दागती रहती हैं. ऐसी सासों को झेलने के लिए जरूरी है कि बहुएं अपने कानों में हमेशा रुई ठूंस कर रखें अथवा सास की बात को एक कान से सुनें और दूसरे से निकाल दें.

8वीं श्रेणी ‘भक्तिप्रधान सासों’ की है. उन का ज्यादातर समय बहू पुराण पर बतियाते हुए पूजापाठ करने, माला जपने या भजनकीर्तन करने में व्यतीत होता है. उन के शरीर में कभीकभी सास की ओरिजनल फौर्म भी अवतरित होती रहती है. बहू के कारनामों के टर्निंग पौइंट से वे भी मुक्त नहीं होतीं. माला घुमाते वे बहू को हुक्म देने के विस्फोटक बीज मंत्रों का उच्चारण भी करती रहती हैं.

लेकिन यह तथ्य भी बेहद महत्त्वपूर्ण है कि वर्तमान समय में आधुनिकता के दौर में सासों की दशा बेहद खराब है. हम दो हमारे दो के फैशन में एकल परिवारों में सासससुर अवांछित सदस्य समझे जाने लगे हैं.

अतीत के आक्रामक रूप से पिछड़ कर अब सास सुरक्षात्मक भूमिका तक सीमित हो गई है. अब वह जमाना भी कहां रहा जब सास की झिड़कियों को प्रसाद समझ कर बहुएं उन पर अमल करती थीं. सासों को सर्वत्र आदरसम्मान प्राप्त था. वर्तमान तो ‘जैसे को तैसा’ का युग है, इसलिए बदले जमाने में तो सासों का शास्त्रीय रूप दुर्लभ होता जा रहा है.

यह भी सत्य है कि सासबहू की खटपट कभी खत्म नहीं होती, उन का कोल्ड वार जारी रहता है. बहू हो या जंवाई राजा, उन्हें अपनीअपनी सासूमां की अंतहीन शिकायतें सुननी ही पड़ती हैं. शीत युद्ध लड़ना उन की विवशता होती है, वे चाहे मीठीं हों या कड़वी. समाज का तानाबाना ही ऐसा बुना गया है कि आमतौर पर उन्हें नाराज करने का रिस्क कोई नहीं लेता.

फिलहाल सासों की शोचनीय हालत से लगता है कि उन्हें सरकारी संरक्षण की जरूरत पड़ने वाली है. ‘सेव टाइगर’ की तरह ‘सेव मदर इन ला’ की योजना सरकार को लांच करनी पड़ेगी, क्योंकि यदि यही हाल रहा तो सास धीरेधीरे अपना मूल स्वरूप खो कर अतीत की धरोहर मात्र रह जाएगी.

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Best Hindi Story: मुखौटा- समर का सच सामने आने के बाद क्या था संचिता का फैसला

Best Hindi Story: भारतीय लड़कियों की किसी अमेरिकन या अंगरेज लड़के से शादी करने के बाद क्या हालत होती है इस का वर्णन करना आसान नहीं है. वे धोखा केवल इसलिए खाती हैं क्योंकि उन के परिवार वाले शादी से पहले लड़के की ठीक से तहकीकात नहीं करते.

निर्मला पुणे की रहने वाली हैं. उन की माता और महिला मंडल में आने वाली वत्सलाजी से अच्छी जानपहचान थी. एक दिन बातोंबातों में संचिता की शादी का जिक्र किया तब वत्सलाजी ने उन्हें अपने अमेरिका में रहने वाले भतीजे समर के बारे में बताया जो शादी के लायक हो गया था.

फिर दोनों अपनेअपने घर में इस बारे में बात करती हैं. संचिता अमेरिका में रहने वाले लड़के से शादी के लिए तैयार हो जाती है. वत्सलाजी भी समर को फोन कर के उस की राय मांगती है. तब वह भी शादी के लिए राजी हो जाता है. दोनों वीडियो चैट करते हैं तो सब ठीकठाक लगता है.

समर 2 महीनों के लिए भारत आ गया और झट मंगनी पट ब्याह हो गया. समर की कोई भी तहकीकात किए बिना सिर्फ वत्सलाजी के भरोसे संचिता के मातापिता उस का ब्याह समर से कर दिया. वैसे वत्सलाजी पर भरोसा करने के पीछे एक वजह और थी और वह यह कि समर को वत्सलाजी ने ही पालपोस कर बड़ा किया था. समर  जब छोटा था तब उस के मातापिता की एक दुर्घटना में मौत हो गई थी.

समर की जिम्मेदारी उठाने के लिए कोई तैयार नहीं था. पर जब समर के अमीर मातापिता की प्रौपर्टी में से समर का पालनपोषण करने

वाले व्यक्ति क ो हर महीने 25 हजार रुपए देने की बात सामने आई, जोकि उन की प्रौपर्टी के पैसों के ब्याज में दिए जाने थे, वत्सलाजी उसे संभालने के लिए आगे आ गईं. वत्सलाजी विधवा थीं, उन्हें बच्चे भी नहीं थे और उन्हें मिलने वाली पैंशन से वे सिर्फ अपना ही गुजारा कर सकती थीं, इसलिए वे पहले समर को पालने के लिए मना पर 25 हजार रुपए महीने मिलने की बात सुन कर वे समर को पालने के लिए राजी हो गई.

वत्सलाजी ने समर के पालनपोषण में कोई कमी नहीं छोड़ी. उसे अच्छे स्कूल में पढ़ायालिखाया. उसे सौफ्टवेयर इंजीनियर बनाया. समर के 18 बरस का होने के बाद उस की प्रौपर्टी उस के नाम कर दी गई और 21 साल का होने के बाद उस के हाथों सौंप दी गई. पर पैसा मिलते ही समर की ख्वाहिशें बढ़ने लगीं और वह अमेरिका में बसने के सपने देखने लगा और फिर उस ने वैसा ही किया.

सौफ्टवेयर इंजीनियर बनते ही वह एक कंपनी में नौकरी के जरीए अमेरिका चला गया और वहीं पर बस गया. अब शादी के सिलसिले में वह भारत आया और संचिता के साथ शादी कर के उसे भी अमेरिका ले गया. समर के साथ खुशीखुशी कब 2 साल बीत गए संचिता को पता ही नहीं चला. उसे लगने लगा था मानो समर के साथ उसे दुनिया के सारे सुख मिल रहे हैं. ऐसे में ही उसे अपने गर्भवती होने का एहसास हुआ. डाक्टर के पास चैकअप करा कर इस बात की तसल्ली कर ली और फिर समर के आने की राह देखने लगी. वह जल्द से जल्द यह खुशखबरी समर को बताना चाहती थी.

शाम को समर के घर आते ही उस ने सब से पहले उसे यही खुशखबरी दी. पर उस के चेहरे पर खुशी की जगह और ही भाव नजर

आने लगे. उस का बदला रूप देख कर संचिता पलभर के लिए कांप गई. लेकिन कुछ ही क्षणों में समर संभल गया और संचिता को बांहों में भरते हुए बोला, ‘‘मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा है मैं बाप बनने वाला हूं. सच कहूं तो तुम ने जब यह खुशखबरी दी तब मुझे कुछ सूझा ही नहीं. अब तुम आराम करो. कल हम अपनी अच्छी पहचान वाली लेडी डाक्टर के पास जाएंगे ताकि वह अच्छी तरह तुम्हारा चैकअप करें.’’

दूसरे दिन संचिता ने जब आंखें खोली तब उसे अपनी कमर के नीचे का भाग कुछ भारीभारी सा लग रहा था. उस ने कमरे का निरीक्षण किया तब उसे ऐसा लगा कि वह किसी अस्पताल के कमरे में है. उस ने उठने की कोशिश की तो उस से उठा भी नहीं जा रहा था. तब एक नर्स दौड़ती हुई उस के पास आई और बोली, ‘‘अब थोड़ी देर और आराम करो. 2-3 तीन घंटे बाद तुम उठ सकती हो.’’

संचिता ने जब उस से पूछा कि उसे क्या हुआ तब नर्स ने उसे हैरानी से देखते हुए कहा कि तुम्हारा अबौर्शन हुआ है. सुनते ही संचिता के पांवों के नीचे से जमीन खिसक गई क्योंकि वह तो सिर्फ चैकअप के लिए आई थी. डाक्टर ने

उसे कोलड्रिंक पीने के लिए दिया था. उस के बाद उसे गहरी नींद आने लगी और वह सो गई. पर अब उसे सब पता चल गया था. कुछ घंटों बाद समर आ कर उसे ले गया. घर जाने के

बाद उस ने शाम को संचिता से बस इतना ही कहा कि अभी वह बच्चे के लिए तैयार नहीं है. उसे अभी बहुत कुछ करना है. अगर वह उसे गर्भपात कराने को कहता तो शायद वह कभी तैयार नहीं होती, इसलिए उस ने यह रास्ता अपनाया.

अब संचिता के पास झल्लाने के सिवा कुछ नहीं बचा था. उस ने समर से बात करना छोड़ दिया. पहले समर के प्रति उस के मन में जो प्यार और आदर की भावना थी उस की जगह अब उस पर घृणा, तिरस्कार और चिड़ आने लगी थी. पर यहां विदेश में समर से बैर लेना उस ने उचित नहीं समझ क्योंकि यहां उस का कोई नहीं था. न कोई दोस्त न रिश्तेदार न पड़ोसी. अपना दर्द वह किसे सुनाती.

तभी एक दिन दोपहर को वत्सला बूआ का फोन आया. उन्होंने उसे बताया कि पिछले 15 दिनों में समर का 3 बार फोन आ चुका है और वह हर बार 25 लाख रुपए उस के अमेरिका के खाते में जमा करने की बात कह रहा है. उस ने बूआ को यह कहा कि  उस ने अपनी नौकरी छोड़ दी है और खुद का कोई कारखाना शुरू करना चाहता है, जिस के लिए उसे पैसों की सख्त जरूर है. पर बूआ को दाल में कुछ काला नजर आया, इसलिए उन्होंने संचिता से इस बारे में पूछना चाहा. पर संचिता को तो इस बारे में कुछ भी पता नहीं था. उलटा उस ने जब समर द्वारा धोखे से उस का गर्भपात कराने की बात वत्सला बूआ को बताई तब वे और भी हैरान रह गईं.

अब तो संचिता को समर से डर लगने लगा था. उस की सारी सचाई सामने आने लगी थी. विदेश में उस से बैर लेना मुनासिब नहीं था और मामापिता को सचाई बता कर वह उन्हें मुश्किल में नहीं डालना चाहती थी.

दूसरे दिन अब आगे क्या करना है, इस कशमकश में डूबी संचिता भारतीय

भूल के अमेरिका में रह रहे लोगों के लिए निकाले जा रहे अखबार के पन्ने पलट रही थी. तब एक तसवीर देख कर उस के हाथ रुक गए और उस ने वह खबर पढ़ी. प्रणोती, क्राइम विभाग की पत्रकार ने अपनी हिम्मत और दिमाग से बड़े सैक्स रैकेट का परदाफाश किया और सफेदपोश कहे जाने वाले भारत और पाकिस्तान के काले दरिंदों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. उस ने 2-3 बार वह खबर पढ़ी. उसे आशा की किरण नजर आने लगी. उस ने तुरंत अखबार के कार्यालय में फोन लगाया और प्रणोती के घर का पता और फोन नंबर ले लिया. प्रणोती उस की सहपाठी निकली. दोनों पूना में एकसाथ पढ़ा करती थीं. उस के पिताजी नौकरी के सिलसिले में अमेरिका गए और उस की मां को भी साथ ले गए और फिर हमेशा के लिए अमेरिका में ही बस गए.

संचिता ने फोन कर के प्रणोती से संपर्क किया और उस से मिलने की इच्छा जाहिर की. प्रणोती ने उसे तुरंत अपने घर बुला लिया. अमेरिका में भी उस का अपना कोई है यह जान कर संचिता को बहुत अच्छा लगा. प्रणोती से मिल कर उस ने उस के साथ जो कुछ घटा और वत्सला बूआ ने 25 लाख रुपयों के बारे में जो कुछ कहा वह सब बताया.

प्रणोती ध्यान से उस की बातें सुनती रही. लगभग 2 घंटे दोनों में इस बात पर चर्चा चली. फिर प्रणोती से विदा ले कर संचिता अपने घर चली गई. प्रणोती ने उसे आश्वासन दिया कि वह मामले की तह तक जाएगी.

इधर संचिता रातभर समर की राह देखती रही पर वह घर नहीं आया. फिर कब उस की आंख लग गई उसे पता ही नहीं चला. पर सुबह भी वह नहीं आया. उस ने झट से चाय बना कर पी और नहाधो कर प्रणोती से मिलने जाने की तैयारी की. उस की गैरहाजिरी से समर घर आ सकता था, इसलिए उसे जाते एक चिट्ठी छोड़ दी कि वह मार्केट जा रही है.

प्रणोती के घर जाते ही प्रणोती ने उसे बैठाया और कहा, ‘‘आज मैं जो बताने जा रही हूं उसे धैर्य से सुनना. तुम ने मुझे समर के औफिस का पता और उस के बारे में जो जरूरी जानकारी दी थी उस के आधार पर मैं ने कल ही उस की तहकीकात शुरू कर दी थी. संचिता, कल रात समर को खून के मामले में पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. वह शबर के पुलिस लौकअप में बंद है. दूसरी बात उस ने नौकरी से इस्तीफा नहीं दिया बल्कि उसे नौकरी से निकाला गया है क्योंकि उस ने औफिस में भारतीय मुद्रा के रूप में 25 लाख रुपयों का गबन किया था. वत्सला बूआ से उस ने सब झठ कहा था. कल सुबह उस के खाते में पैसे जमा होते ही उस ने वे पैसे कंपनी में भर कर खुद को छुड़ा लिया.

‘‘फिर दिनभर यहांवहां भटक कर शराब के नशे में धुत्त हो कर वह देर रात को कैसिनो में पहुंचा. वह हमेशा का ग्राहक था इसलिए कैसिनो के मालिक ने उसे जुआ खोलने के लिए 2 लाख रुपए उधार दिए, पर समर घंटेभर में ही सारे

पैसे हार गया और उस ने कैसिनो के मालिक से फिर से पैसों की मांग की. पर कैनो के मालिक ने उसे पहले के दो लाख रुपए 24 घंटों के अंदर वापस करने की बात कहते हुए और

पैसे देने से मना कर दिया. तब दोनों में इस बात को ले कर झगड़ा हो गया और झगड़ा बढ़तेबढ़ते लड़ाई में बदल गया जिस में समर के हाथों कैसिनो के मालिक का खून हो गया. वह वहां

से भागने की फिराक में था पर कैसिनो के बाउसरों ने उसे पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया.

‘‘और अब मैं जो कहने जा रही हूं वह सुन कर तुम्हारे पांवों तले की जमीन खिसक जाएगी. तुम्हारी शादी से 6 महीने पहले उस ने एक जरमन लड़की से शादी की पर उस लड़की ने समर की चालढाल देख कर उसे छोड़ दिया. दोनों का अब तक कानूनी तौर पर तलाक भी नहीं हुआ है. इसलिए तुम्हारी शादी गैरकानूनी मानी जा सकती है. तुम्हारा गर्भपात कराने के पीछे भी शायद यही मंशा थी कि तुम्हारी और तुम्हारे बच्चे की वजह से वह मुश्किल में पड़ सकता था.

‘‘संचिता, समर पूरी तरह फ्रौड निकला. उस पर दया करने की कोई जरूरत नहीं है. तू जैसे भी हो अपनेआप को उस के चंगुल से छुड़ा ले. मैं अपने वकील से बात करती हूं. देखते हैं वे क्या सलाह देते हैं. कल दोपहर को समर को कोर्ट में हाजिर किया जाएगा. हम वहां अपने वकील के साथ जाएंगे. अभी तुम अपने घर जाओ और तुम्हारा जितना सामान, जेवरात और पैसे हैं उन्हें ले कर मेरे घर आ जाओ. यहां तुम्हारी सारी चीजें बिलकुल महफूज रहेंगी और मामला पूरी तरह से निबटने तक तुम मेरे घर मेरी सहेली, मेरी बहन बन कर रह सकती हो.’’

संचिता ने आंसू पोंछे और प्रणोती के हाथों पर हाथ रख कर हां में सिर हिलाते हुए चली गई. घर पहुंचते ही संचिता ने तुरंत अपनी बैग निकाला और सारे कपड़े उस में भर दिए.

अपने जेवर सहीसलामत देख कर उसे राहत महसूस हुई. उस ने जेवर, नकद रुपए, अपने सारे कागजात और पासपोर्ट व वीजा भी बैग में रखा. फिर पूरे घर पर एक नजर डाल कर अपना बैग उठा कर प्रणोती के घर चल दी.

दूसरे दिन समर को कोर्ट में हाजिर किया गया. संचिता प्रणोती के साथ वहीं खड़ी थी. कोर्ट से बाहर आने के बाद संचिता ने समर का कौलर पकड़ कर उस से पूछा कि उस ने

ऐसा क्यों किया, पर समर ने कोई जवाब नहीं दिया और पुलिस की गाड़ी में जा बैठा. संचिता प्रणोती के साथ मिल कर उस जरमन लड़की से भी मिली जिसे समर ने धोखा दिया था. समर के कारनामे सुन कर वह लड़की हैरान रह गई. उस ने संचिता से सहानुभूति दिखाई और कहा कि समर से छुटकारा पाने के लिए अगर उसे उस से कोई मदद चाहिए तो वह उस की जरूर मदद करेगी.

अब संचिता को विश्वास हो गया कि वह समर से आसानी से छुटकारा पा लेगी. लेकिन समर का केस पूरे डेढ़ साल तक चला. समर को 10 साल की कैद की सजा सुनाई गई. इस बार संचिता ने उस के सामने तलाक के कागजात रख दिए और समर ने भी बिना कुछ कहे उन पर साइन कर दिए. संचिता आजाद हो चुकी थी. उस ने प्रणोती को बहुतबहुत धन्यवाद दिया.

समर के काले कारनामों की पूरी जानकारी संचिता ने वत्सला बूआ और अपने मातापिता को दे दी. उन सभी को गहरा आघात लगा. वत्सला बूआ ने संचिता के मातापिता से माफी मांगी. लेकिन इस में वत्सला बूआ की कोई गलती नहीं थी और वे भी समर के धोखे की शिकार हुई थीं, इसलिए संचिता के मातापिता ने उन्हें माफ कर दिया.

अगले हफ्ते संचिता मुंबई के सहारा हवाईअड्डे पर उतर रही थी. उस के मातापिता और वत्सला बूआ उस के स्वागत के लिए खड़े थे, उस ने समर के चेहरे पर लगा झठ का मुखौटा जो निकाल फेंका था और उस का असली चेहरा दुनिया के सामने लाया था. ऐसे और भी कितने समर इस दुनिया में मौजूद हैं, जिन के चेहरे पर चढ़ा झठ का मुखौटा निकाल फेंकने के लिए खुद महिलाओं को ही आगे आना होगा.

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ब्रेकअप के बाद भी एकसाथ काम करने वाले फिल्मी सितारे

Bollywood Breakups: जिंदगी में कई बार ऐसे मोड़ आते हैं जब हमें जिंदगी की असली सचाई का पता चलता है. जवानी की दहलीज पर कदम रखते वक्त जहां प्यार ही सब कुछ होता है, प्यार में हम पूरी तरह अंधे हो जाते हैं, वहीं कुछ समय के बाद यह एहसास होने लगता है कि पैसे और अच्छी जिंदगी से ज्यादा कुछ भी महत्त्वपूर्ण नहीं होता क्योंकि आज के समय में प्यार भी वही फलताफूलता है जहां पैसा होता है. पैसों के अभाव में कई बार प्यार भी दम तोड़ देता है.

सालों पहले एक गाना आया था,’यार दिलदार तुझे कैसा चाहिए, प्यार चाहिए कि पैसा चाहिए…’ जिस के जवाब में अगली लाइन थी, ‘प्यार के लिए मगर पैसा चाहिए…’ कहने का मतलब यह है कि आज के आधुनिक युग में जहां लोगों के लिए पैसा ही सबकुछ है, वहां प्यार से ज्यादा आज लोगों के लिए पैसा महत्त्वपूर्ण है क्योंकि एक बार प्यार के बिना तो जिंदगी जी जा सकती है, लेकिन बिना पैसे के आज के समय में प्रेमी भी नहीं पूछते. यही वजह है कि एक समय में जहां एक गाना बना, ‘जब दिल ही टूट गया, तो जी कर क्या करेंगे…’ वहीं आज के समय में ब्रेकअप होने के बाद ‘तू नहीं और सही’ फौर्मूले को अपनाते हुए कई लोग ब्रेकअप पार्टी रखते हैं और प्यार में धोखा खाने के बावजूद जिंदगी में आगे बढ़ जाते हैं और पिछला सबकुछ भूल भी जाते हैं.

ऐसे टूटे दिल वाले बहुत बार पहले से ज्यादा मजबूत हो जाते हैं इस सोच के साथ कि दिल टूटने से तकलीफ तो बहुत हुई मगर जिंदगीभर का आरंभ हो गया क्योंकि प्यार से दिल तो खुश हो जाता है लेकिन पेट नहीं भरता, जरूरतें पूरी नहीं होतीं जबकि पैसा सारी सुखसुविधाएं दे सकता है.

इसी सचाई के साथ जीते हैं कई सारे ऐसे लोग जो एक ही फील्ड में साथ काम करते वक्त प्यार में पड़ जाते हैं और किन्हीं वजहों से उन का प्यारभरा रिश्ता टूट जाता है, लेकिन एक ही प्रोफेशन होने की वजह से साथ काम करना पड़ता है. इन का आपस में बारबार सामना भी होता है. जैसे अगर शिक्षा के लिए स्कूल, कालेज में पढ़ाने वाले टीचर्स की बात करें तो वे कई सालों तक एक ही स्कूल में साथ काम करते हैं और स्कूल के दौरान प्रेम संबंध टूटने के बावजूद उन का बारबार अपने एक्स प्रेमी से सामना होता है, जिस से उन का प्यार शुरुआती दिनों में हुआ था.

इसी तरह आईएएस में सिलेक्ट हुए लोग और गवर्नमैंट नौकरी में भी दायरा बहुत छोटा होता है जिस में वहां काम कर रहे लोगों को बारबार एकदूसरे से मिलना पड़ता है. ब्रेकअप होने के बाद भी काम के सिलसिले में औपचारिक रूप से बातें करनी पड़ती हैं. ऐसे में कई लोग हालात से समझौता करते हुए पुरानी बातें भूल कर आपस में प्रोफेश्नल रिश्ते निभाते हैं. इस में प्यार तो नहीं होता लेकिन एक प्रोफेशनल रिश्ता जरूर बन जाता है, जिस में भावनाएं नहीं होतीं बस ‘हायहैलो’ वाला रिश्ता बन जाता है.

ऐसे ही रिश्तों में हमारे कई बौलीवुड स्टार्स भी शामिल हैं जो ब्रेकअप के बाद भी साथ काम कर रहे हैं. पेश हैं, इसी सिलसिले पर एक नजर :

ब्रेकअप के बाद भी साथ फिल्मों में काम किया

हिंदी फिल्मों में साथ काम करने वाले कलाकार जो 24 घंटे और कई महीनों तक एकसाथ रहते हैं, फिल्म की शूटिंग के दौरान लव सीन और इंटिमेट सीन करते हुए कई बार प्यार में पड़ जाते हैं. इस के बाद इन हीरोहीरोइन का अफेयर सालों चलता है, लेकिन कुछ सालों बाद मनमुटाव और खराब हालात के चलते ब्रेकअप हो जाता है. ऐसे में साथ काम करना तो दूर एकदूसरे की बारबार शक्ल देखना भी मुश्किल हो जाता है. ऐसे में कई सितारे जिन का प्यार में दिल टूटा होता है और कड़वाहट ज्यादा हो जाती है तो वे एकदूसरे के साथ काम करना पसंद नहीं करते, जैसे एक जमाने की हिट रियल लाइफ जोड़ी सलमान खान और ऐश्वर्या राय, अभिषेक बच्चन और करिश्मा कपूर, जिन का प्यार सालों चला और बाद में ब्रेकअप हो गया, जिस के बाद इन प्रेमी जोड़ों ने एकदूसरे की शक्ल देखना भी मंजूर नहीं किया.

लेकिन बौलीवुड में कई ऐसी मशहूर जोड़ियां हैं जिन का एक समय में गहरा प्रेम संबंध था, लेकिन बाद में ब्रेकअप हो गया. कुछ सालों बाद जैसे कि कहते हैं कि वक्त हर जख्म भर देता है, लिहाजा ये सारे कलाकार ब्रेकअप के बाद भी पुरानी बातें भूल कर एकदूसरे के साथ फिल्म करते नजर आए. इस दौरान एक समय की लवर्स जोड़ी अब अपनी जिंदगी में आगे बढ़ चुकी है और अपने पिछले प्रेमी को ले कर उन के मन में कोई भावना भी नहीं है. फिलहाल ये जोड़ियां अपने एक्स प्रेमी के साथ प्रोफेशल रिश्ते के साथ फिल्मों में अभिनय कर रहे हैं.

दीपिका पादुकोण और रणबीर कपूर एकदूसरे को दिल दे बैठे थे लेकिन ब्रेकअप के बाद दीपिका पादुकोण डिप्रैशन तक में चली गई थी, लेकिन बाद में दीपिका पादुकोण की लाइफ में रणवीर सिंह की ऐंट्री हो गई और रणवीर के साथ शादी भी हो गई, जिस के बाद सब भूल कर ब्रेकअप के बाद भी दीपिका ने रणबीर के साथ ‘तमाशा’ और यह ‘जवानी है दीवानी’ जैसी बेहतरीन सुपरहिट फिल्में दीं.

करीना कपूर और शाहिद कपूर

करीना कपूर और शाहिद कपूर का रोमांस काफी सालों तक चला जब ‘वी मेट’ की शूटिंग के दौरान शाहिद और करीना की नजदीकियां बढ़ी थीं लेकिन बाद में उन का ब्रेकअप हो गया. ब्रेकअप के बाद दोनों ने ‘फिर मिलेंगे’ और ‘उड़ता पंजाब’ में एकसाथ काम किया.

सलमान खान कैटरीना कैफ

सलमान खान उन हीरोज में हैं जिन का अफेयर लंबे समय तक नहीं टिकता. ऐश्वर्या राय के बाद सलमान खान का कैटरीना कैफ के साथ अफेयर हुआ लेकिन बाद में कैटरीना की जिंदगी में रणबीर कपूर आ गए और सलमान से उन का ब्रेकअप हो गया. उस के बाद भी कैटरीना कैफ ने सलमान के साथ ‘भारत’, ‘टाइगर जिंदा है’ आदि कई फिल्मों में काम किया. आज भी कैटरीना के सलमान के साथ दोस्ताना रिश्ते हैं.

अक्षय कुमार रवीना टंडन

एक समय में रवीना टंडन और अक्षय कुमार का गहरा रोमांटिक रिश्ता था, जो ‘मोहरा’ फिल्म के साथ शुरू हुआ था. अक्षय कुमार की रवीना टंडन से सगाई तक हो गई थी, लेकिन बाद में किन्हीं कारणों से अक्षय और रवीना का रिश्ता खत्म हो गया. लेकिन उस के बाद सब भूल कर रवीना और अक्षय ने अवार्ड फंक्शन में स्टेज शेयर किया और कई सालों बाद दोनों ने फिल्म ‘वेलकम टू जंगल’ में स्क्रीन भी शेयर किया. यह फिल्म दिसंबर में रिलीज होगी.

संजय दत्त माधुरी दीक्षित

90 के दशक में संजय दत्त और माधुरी दीक्षित का अफेयर सुर्खियों में था. दोनों ने कई फिल्मों में साथ काम किया था. खबरों के अनुसार संजय दत्त और माधुरी दीक्षित की शादी भी होने वाली थी लेकिन बाद में संजय दत्त जेल चले गए और दोनों का रिश्ता भी खत्म हो गया. लेकिन बाद में काफी समय के बाद संजय दत्त और माधुरी दीक्षित करण जौहर की फिल्म ‘कलंक’ में एकसाथ नजर आए.

अक्षय कुमार और शिल्पा शेट्टी

अक्षय कुमार और शिल्पा शेट्टी का भी अफेयर काफी समय तक चला लेकिन बाद में ब्रेकअप के बाद दोनों ने साथ कोई फिल्म तो नहीं की, लेकिन अवार्ड फंक्शन और डांस रियलिटी शोज में पुरानी बातें भूल कर एकसाथ डांस जरूर किया.

इस से साबित होता है कि ऐक्टर्स अपनी प्रोफेशनल लाइफ में पर्सनल लाइफ को नहीं आने देते हैं और काम के प्रति ईमानदारी दिखाते हुए सबकुछ भूल कर ब्रेकअप के बाद भी साथ फिल्में करने के लिए भी तैयार हो जाते हैं क्योंकि उन का मानना है,’शो मस्ट गो औन’.

Bollywood Breakups

Aalisha Panwar: एक्स्ट्रा बोल्ड कंंटेंट के साथ मैं सहज नहीं

Aalisha Panwar: हिमाचल प्रदेश के शिमला में जन्मीं व पलीबड़ी खूबसूरत अलिशा पनवार ने अभिनय कैरियर की शुरुआत 2012 में फिल्म ‘अक्कड़ बक्कड़ बंबे बो’ से की थी. साल 2015 में शो ‘बेगूसराय’ में नजमा की भूमिका में पहली बार अभिनय की शुरुआत की. इस के बाद उन्होंने ‘थपकी प्यार की’, ‘इश्क में मरजावां’ आदि कई धारावाहिकों और शौर्ट फिल्मों में काम किया है.

उन की मां अनीता पनवार स्कूल की शिक्षिका हैं और पिता दिनेश पनवार पेशे से वकील हैं. अलिशा को बचपन से ही अभिनय की इच्छा थी और उन के मातापिता ने हमेशा उन्हें मनमुताबिक काम करने की आजादी दी.

इन दिनों अलिशा ओटीटी हंगामा पर मिनी वैब सीरीज ‘विन्नी की किताब’ में विन्नी की मुख्य भूमिका निभा रही हैं. वे अपनी भूमिका को ले कर काफी उत्साहित हैं क्योंकि इंडस्ट्री में 10 साल पूरे होने बाद यह उन की पहली हिंदी वैब सीरीज है. उन्होंने खास गृहशोभा के साथ बात की. पेश हैं, कुछ खास अंश.

एक इमोशनल जर्नी

‘विन्नी की किताब’ शो को करने के बारे में अलिशा का कहना है कि यह एक मिनी वैब सीरीज है, जिस में मैं विन्नी की भूमिका निभा रही हूं, जो एक राइटर है. उस के दिमाग की सोच और फैंटेसी से जुड़ी हुई कहानी वह लिखती जाती है, जो हर लड़की की एक इमेजिनरी सोच होती है. यह बहुत ही खूबसूरत स्टोरी है, जिस से सारे दर्शक रिलेट कर सकते हैं. देखा गया है कि लड़कियों का लव लाइफ या लव औफर लाइफ को ले कर कई सारे ड्रीम्स होते हैं, जिस में प्यार के बाद शादी कर साथ रहने की होती है, लेकिन कैसे वह एक रोमांटिक लाइफ से घरेलू हाउसवाइफ बन कर सब हैंडल करती है, इन सब के बीच में रोमांस गायब हो जाता है और जिम्मेदारी आ जाती है.

ऐसे में उसे निभाना कितना मुश्किल होता है, उस के सपनों पर किस तरह पानी फिर जाता है वगैरह कई बातों को दिखाने की कोशिश की गई है, जिसे लोग पसंद कर रहे हैं. असल में यह एक लड़की की इमोशनल जर्नी के बारे में है, जो आज की काफी लड़कियां फेस कर रही हैं.

इस भूमिका से अलिशा खुद को अधिक रिलेट नहीं कर पातीं. वे कहती हैं कि मैं केवल विन्नी की मासूमियत से खुद को रिलेट कर सकती हूं क्योंकि मैं भी एक मासूम लड़की हूं.

मिली प्रेरणा

अलिशा कहती हैं कि मुझे बचपन से ही ऐक्टिंग का शौक था. मैं 5 साल की उम्र से ही टीवी देख कर मां से ऐक्टिंग करने की बात कहती रहती थी. दिमाग में था कि मैं एक सुपर स्टार बनूं, लोग मुझे जानें. एक किड की तरह मेरी फैंटेसी रही, जिस की वजह से मैं यहां तक पहुंच पाई.

बचपन से था शौक

अलिशा कहती हैं कि मैं ने बचपन से ही सोच लिया था कि मैं ऐक्टिंग करूंगी और मेरा विजन बहुत क्लीयर था. मेरे पेरैंट्स ने भी बहुत सहयोग दिया. शुरू में मुझे छोटेछोटे जो भी रोल मिलते थे, मैं करती गई, क्योंकि मैं शिमला एक छोटी सी जगह से हूं, जहां मुझे बहुत अधिक मौका इस फील्ड में नहीं मिल सकता था. छोटेछोटे औडिशंस होते रहते थे. मैं हर जगह चली जाती थी. मुझे याद है कि मैं ने 15 साल की उम्र में शिमला क्वीन का खिताब जीता था. मैं ने 12 साल की उम्र में पहली बार एक डांस रिएलिटी शो के लिए कैमरा फेस किया था. उस की शूट के लिए मैं चंडीगढ़ गई थी. मैं उस समय महज 7वीं कक्षा में पढ़ रही थी. मेरे पेरैंट्स ने उस समय मेरा बहुत साथ दिया है. तब मैं ने पहली बार खुद को टीवी पर देखा था, उस के बाद से आगे बढ़ने का सिलसिला जारी रहा.

शिमला से मुंबई का सफर

जब मैं कालेज की प्रथम वर्ष में पढ़ रही थी, मैं ने सुना कि एक नए चैनल का लौंच हो रहा है और उस के किसी शो के लिए औडिशन शिमला में हो रहा है, जिस में एक मुसलिम लड़की की चरित्र के लिए औडिशन हो रहा था. मैं ने अपनी मां से इसे बताई, तो वे मुझे वहां ले कर भी गईं, तब मुझे औडिशन की एबीसी तक नहीं आती थी. मुझे स्क्रिप्ट दिया गया और मैं ने उसे ऐसे ही पढ़ दिया. तब मेकअप भी मुझे करना नहीं आता था. मैं एक लिपबाम और काजल लगा कर औडिशन के लिए चली गई थी, लेकिन उन्होंने मुझे चुन लिया, पर बाद में कई बार मैं चंडीगढ़ लुक टेस्ट के लिए गई. शो का नाम ‘बेगूसराय’ था.

इस के बाद मुझे मुंबई बुलाया गया. मुझे कालेज छोड़ना पड़ा, लेकिन मैं ने अपनी पढ़ाई डिस्टैंस से ही पूरा किया. मेरे पिता मुझे मुंबई छोड़ने आए थे. मैं यहां कई लड़कियों के साथ शेयरिंग में रहने लगी थी. मैं पहली बार मुंबई आई थी और मुझे मालाड से भयंदर जा कर शूटिंग करनी पड़ती थी. मैं इस शहर से बिलकुल अनजान थी, ऐसे में पिता ने मुझे सेट पर पहुंचने की सारी जानकारी जुटा दी थी, जिस से मेरा काम करना आसान हुआ. इस तरह से मेरी ऐक्टिंग की जर्नी शुरू हो गई.

मुंबई बङा शहर है, ऐसे में किसी छोटे शहर से बड़े शहर में आ कर रहना मेरे लिए आसान नहीं था. मगर धीरेधीरे मैं ने सबकुछ सीखा है.

परिवार का सहयोग

अलिशा ने जब पहली बार जब पिता को मुंबई जा कर ऐक्टिंग करने की बात कही, तो वे शौक्ड हो गए थे क्योंकि मुंबई में उन का कोई नहीं था, लेकिन उन्होंने उन का मजाक नहीं बनाया, बल्कि सीरियसली लिया और हां कर दी. इस से अलिशा के अंदर एक विश्वास पैदा हुआ और वे आगे बढ़ पाईं.

रहा संघर्ष  

अलिशा को पहला शो आसानी से मिला था, लेकिन वह शो 1 साल में बंद हो गया. इस के बाद वे आगे क्या करेंगी, सोचना कठिन रहा क्योंकि वे किसी प्रोडक्शन हाउस या कोऔर्डिनेटर को जानती नहीं थीं.

अलिशा कहती हैं कि मुझे इस बात का भी डर था कि मैं एक छोटे शहर से हूं और एकदम अनजान शहर में किसी गलत इंसान से न टकरा जाऊं. लेकिन संयोग से सभी सही लोग मुझ से मिले, जिन्होंने मुझे सही गाइड किया और मुझे काम मिलता गया. मुझे याद है कि जब मैं एक दिन पूरी तैयार हो कर गरमी में औटो रिक्शा में बैठ कर एक जगह से दूसरे जगह 4 औडिशन देने गई, जहां लंबी कतार में 2 से 3 घंटे खड़ी हो कर औडिशन दिया. इन सब चीजों को मैं अभी भी याद करती हूं.

पहली शो के बाद मैं ने ‘जमाई राजा सीजन 2’ में पैरेलल लीड किया, इस के बाद एक शो में बहन, दोस्त आदि भूमिकाएं निभाते हुए आगे बढ़ी और ‘इश्क में मरजावा सीजन 1’ में मैं ने मुख्य भूमिका निभाई. मैं ने अपनी छोटीछोटी भूमिका को ले कर कभी शर्म महसूस नहीं किया, बल्कि अभिनय की बारीकियों को बेस लेवल से जाना है क्योंकि मैं ने अभिनय की तालिम नहीं ली है और इन सभी भूमिकाओं ने मुझे लीड के लिए परिपक्व बनाया है.

अलिशा ने केवल सकारात्मक ही नहीं नकारात्मक भूमिका भी निभाई है. वे कहती हैं कि मुझे दोनों तरह की भूमिकाओं को करने में मजा आता है. मैं ने दोनों में लीड भूमिका निभाई है, दोनों के अलगअलग शेड्स हैं, जिसे करना मेरे लिए अच्छी बात रही है.

ऐक्स्ट्रा बोल्ड सीन

वे कहती हैं कि पहले भी मुझे कई वैब सीरीज के औफर्स मिले हैं, लेकिन तब मैं ने उस में बोल्ड कंटेंट की वजह से अस्वीकार किया है क्योंकि मैं इन दृश्यों के साथ अधिक कंफर्ट फील नहीं करती, लेकिन इस वैब सीरीज में मेरे हिसाब से सीन्स हैं, जिस में मैं कंफर्ट फील कर रही हूं.

मेरी ड्रीम है कि मैं फिल्ममेकर संजय लीला भंसाली के साथ किसी भी फिल्म या वैब सीरीज में काम करूं. मैं जानती हूं कि ऐक्स्ट्रा बोल्ड सीन्स से मुझे परहेज है, लेकिन उम्मीद है कि कुछ ऐसा अवश्य बनेगा, जिस में मैं काम कर पाऊंगी.

सपनों का राजकुमार

खूबसूरत अलिशा सिंगल हैं क्योंकि अभी कोई लाइफ पार्टनर उन्हें नहीं मिला है, लेकिन अगर मिला, तो इन 5 चीजों पर अवश्य गौर करेंगी- सच्चा प्यार, रिस्पेक्ट, ट्रस्ट, समझदारी और पारदर्शिता, जिसे लड़के में भी होना जरूरी है.

Aalisha Panwar

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