Satire : डोरे डालने के लिए उम्र का बंधन नहीं होता

Satire : डोरे डालने का सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम अपने देश में अनादिकाल से चला आ रहा है. स्त्री और पुरुष तो परस्पर एकदूसरे पर डोरे डालते ही हैं, जानवरों में भी नर व  मादा एकदूसरे पर डोरे डालते हैं. जीवित प्राणियों की बात तो छोडि़ए आदमी ने बेजान चीजों के मामले में भी डोरे डालना सीख लिया है. अब देखिए कि इनसान ने सिलाई मशीन तक को नहीं छोड़ा, सुई को भी नहीं छोड़ा. वहां भी अनेक प्रकार के डोरे डाले जाते हैं.

सतयुग में एकदूसरे पर डोरे डाले जाते थे. विश्वामित्र पर मेनका ने डोरे डाले तो दुष्यंत ने शकुंतला पर. त्रेता में राम और उन के भाई लक्ष्मण पर रावण की बहन सूर्पणखा ने डोरे डाले. द्वापर में कृष्ण और राधा के परस्पर डोरे डालने की दास्तां तो अनेक कवियों ने बखानी है. कलियुग में तो डोरे डालने का अभियान विधिवत और योजना बना कर अबाध गति से चल रहा है. पूरे महल्ले से ले कर विदेशों तक डोरे डालने के कार्यक्रम चलते आए हैं.

एक राजनेता विदेशी महारानी पर डोरे डालने में सफल हो गए थे. दूसरे राजनेता तो विदेशी मैडम पर डोरे डाल कर उसे डोली में बिठा कर बाकायदा स्वदेश ही ले आए. प्रेम के डोरों से ही तो प्रेम की रस्सी बनती है. कोई छिप कर डोरे डालता है तो कोई खुलेआम डोरे डाल कर प्रेम की डोर तगड़ी करता रहता है.

डोरे डालने के लिए उम्र का बंधन नहीं होता है. किशोरों से ले कर बुजुर्गों तक और किशोरियों से ले कर बुजुर्ग बालाओं तक परस्पर डोरे डालने का कार्यक्रम चलता रहता है. फलां लड़का फलां लड़की को या फलां आदमी फलां स्त्री को भगा ले गया या वह उस के साथ भाग गई, ये सभी डोरे डालने के नतीजे हुआ करते हैं. डोरे डालतेडालते ही घर बसते हैं, तो कहीं घर उजड़ते हैं, कई जेल की हवा खाते हैं.

डोरे डालने के वाबस्ता कइयों के मंत्री पद छिन गए, कइयों के मुख्यमंत्री पद छिने. प्राचीनकाल में तो कइयों के राज्य छिन गए और राजगद्दियां छिन गईं. पड़ोसी अपनी पड़ोसिन पर और पड़ोसिन अपने पड़ोसी पर डोरे डालते देखे जा सकते हैं. बहरहाल अंजाम कुछ भी हो, डोरे डालने का व्यक्तिगत और सामाजिक कार्य कभी रुकता नहीं है.

यों तो डोरे डालने का कार्यक्रम सदाबहार रहता है और यह कार्यक्रम बारहों महीने चलता है, लेकिन कुछ समय या ऋतु विशेष इस के लिए विशेष मुफीद होती है. शीत ऋतु सब से अच्छी होती है जब डोरे डालने का कार्य सर्वत्र चलता है. शीतकाल में जिधर देखिए उधर, जब देखिए तब डोरे डलते दिखाई देते हैं. महिलाएं अपनी नाजुक कलाइयों की उंगलियों से स्वैटर बुनने की सलाइयों पर फंदे तो रजाइयों में डोरे डालती देखी जा सकती हैं. उधर लड़कीलड़का, पुरुष व महिलाएं धूप सेंकने के बहाने छत पर या एक छत से दूसरी छत पर डोरे डालते मिल जाएंगे. अपनी छत पर एक खड़ा है तो सामने या बगल की छत पर दूसरा खड़ा है और बस हो जाती है डोरे डालने की प्रक्रिया प्रारंभ.

डोरे डालतेडालते प्रेम की डोर बन जाती है जो 2 प्राणियों को बांधने में समर्थ होती है. ऐसी स्थिति को कवि देखता है तो कह बैठता है, ‘‘पहले मन लेते बांध प्यार की डोरी से पीछे चुंबन पर कैद लगाया करते हैं.’’ पाबंदी तो जालिम जमाना लगाता है, जो प्रेमीप्रेमिकाओं को जीने नहीं देता. डोरे डालतेडालते यह स्थिति हो जाती है कि ‘मरने न दे मुहब्बत, जीने न दे जमाना.’ आजकल टेलीविजन पर चैनल वाले भी तरहतरह के सीरियल दिखा कर डोरे डालने का अच्छा प्रशिक्षण दे रहे हैं.

पहले जमाने में महल्ले में ही डोरे डालने की डबिंग और कार्यक्रम होता था. मकान की छतों, छज्जों, बालकनियों, खिड़कियों, पिछले दरवाजों और एकांत गलियों का उपयोग इस कार्य के लिए होता था. अब महल्ले की सीमा लांघ कर बागबगीचे, पार्क, दफ्तर, मैट्रो स्टेशन की सीढि़यां, तालाब और नदी के किनारे, एकांत सड़कें या पहाडि़यां परस्पर डोरे डालने के मुफीद स्थान हैं.

अपने देश और विदेशों में प्रेम करने का यही मूलभूत अंतर है. विदेशों में तो परस्पर मिलनेजुलने के लिए समय की कमी है, इसलिए तड़ाकफड़ाक प्रेम किया और काम पर चल दिए. अपने यहां प्यार भी विधिवत तरीके से होता है. डोरे डालतेडालते प्रेम की डोर में लिपटते हैं, और डोर जब तक सड़ नहीं जाती तब तक उस में बंधे रहते हैं. कोई ऐरागैरा सत्यानाशी व्यक्ति प्रेम की डोर को बीच से काट देता है, तो फिर स्थिति अलग होती है.

जब से राजनीतिक दलों की हिम्मत टूटी है और अकेले सरकार बनाने की कूवत नहीं रही, तब से राजनीति में भी डोरे डालने का कार्यक्रम शुरू हुआ है. घटक दलों पर परस्पर डोरे डाले जा रहे हैं. कभी अम्मा किसी दल के दादा पर डोरे डालती हैं तो कभी किसी दल का सदस्य किसी दल की बहनजी या मैडम पर डोरे डालता है. यह राजनीति ही है, जहां सभी मर्यादाओं और पिछली परंपराओं को दरकिनार करते हुए कुरसी हेतु अम्मा और बहनजी पर भी डोरे डाल कर गठबंधन की गांठ मजबूत की जाती है. तभी सरकार चलती है और कुरसी कुछ समय के लिए स्थिर होती है.

ये डोरे बड़े महीन होते हैं लेकिन इस में एक से एक तीसमारखां बांधे जा सकते हैं. राजनीति में भी यों तो परस्पर डोरे डालने का समय 5 साल तक रहता है लेकिन चुनावों के समय डोरे डालने की गतिविधियां काफी तेज हो जाती हैं. इस समय अगर किसी पर डोरे डाल कर पटा लिया जाए तो चुनाव की वैतरणी पार होने में काफी मदद मिलती है.

डोरे डालते समय डोरा टूटता भी है, कभी व्यवधान भी आता है. घबराइए नहीं और आप भी समय और अनुकूल मौका पा कर डोरे डालिए. डोरे डालने के लिए उम्र, समय, ऋतु तथा स्थान का तो बंधन होता नहीं है, यह सदाबहार प्रक्रिया है. यह जरूर ध्यान रहे कि डोरे डालने में सावधानी रहे, आप भी न फंसें और डोरे भी न फंसें. फंसने पर दोनों के टूटने का डर है, तभी तो कहा है कि ‘रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय…’ और हां, कैंची ले कर घूमने वालों से सावधान.

‘मम्माज बौय से कभी शादी न करो’, सास नीतू कपूर ने Alia Bhatt को जरा भी नहीं दिया भाव

Alia Bhatt : बौलीवुड ऐक्ट्रैस आलिया भट्ट (Alia Bhatt) आज किसी पहचान की मोहताज नहीं है. वह अपनी ऐक्टिंग के बदौलत लोगों के दिल पर राज करती हैं. वह अपनी मैरिड लाइफ को लेकर भी सुर्खियों में छाई रहती है. अकसर उन्हें सास नीतू कपूर (Neetu Kapoor) के साथ देखा जाता है. कपूर खानदान की बहू होने के नाते आलिया परिवार से जुड़ा किसी भी चीज को मिस नहीं करती.

साड़ी में आलिया भट्ट ने बिखेरा खूबसूरती का जलवा

बीते हफ्ते राज कपूर (Raj Kapoor) की 100वीं बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर इंडस्ट्री में फिल्म फेस्टिवल का ओयजन किया गया. जिसमें अलिया भट्ट साड़ी खूबसूरती का जलवा बिखेर रही थी. रणबीर कपूर और आलिया की जोड़ी कमाल की लग रही थी. हर कोई कपल की तारीफ कर रहा था. इस कार्यक्रम में बौलीवुड के तमाम सितारे पहुंचे थे.

नीतू कपूर को यूजर्स ने किया ट्रोल

इस इवेंट से जुड़ा एक वीडिया सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. इस वीडियो में सास नीतू कपूर बहू आलिया भट्ट को बुरी तरह से इग्नोर कर रही हैं. दरअसल, आलिया भट्ट और नीतू कपूर के इस वीडियो को एक फैन पेज ने अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर शेयर किया है. इस वीडियो में आलिया भट्ट व्हाइट कलर की साड़ी में दिख रही हैं तो वहीं नीतू कपूर ग्रे कलर के सूट में नजर आ रही हैं. इस वीडियो को देखने के बाद आलिया के फैंस नीतू कपूर को काफी ट्रोल कर रहे हैं.

सास सास होती है अपनी हो या फिर सेलेब्रिटीज की

दरअसल, इस वीडियो में रणबीर कपूर मां को लेने के लिए पत्नी आलिया भट्ट को भेजते हैं, जिसके बाद आलिया नीतू कपूर के पास जाती हैं और मां-मां कहने लगती हैं, लेकिन वीडियो में साफसाफ देखा जा सकता है कि नीतू कपूर आलिया को बुरी तरह से इग्नोर कर देती हैं. यूजर्स इस वीडियो पर खूब कमेंट्स कर रहे हैं.

एक यूजर ने इस वीडियो पर कमेंट करते हुए लिखा, ‘सास सास होती है अपनी हो या फिर सेलेब्रिटीज की.’ तो वहीं एक दूसरे यूजर ने लिखा, ‘फैमिली फंक्शन में सास का बहू पर तेवर दिखाना परमानेंट है.’ एक और यूजर ने लिखा, मम्माज बौय कितना भी हैंडसम हो, उससे शादी न करो… एक अन्य यूजर ने लिखा, ‘इतिहास गवाह है एक औरत को सबसे ज्यादा दुःख औरत ही देती है, कभी सुना है ससुर दामाद को दुःख देता है.’

Salman Khan के साथ की गई बातों को गुप्त रखना चाहती है रश्मिका, ‘सिकंदर’ में दोनों साथ आएंगे नजर

Salman Khan : फिल्म पुष्पा से हाल ही में रिलीज हुई पुष्पा 2 (Pushpa 2)  के साथ छोटे से सफर में साउथ फिल्मों से बौलीवुड इंडस्ट्री में अपनी अलग और जबरदस्त पहचान बनाने वाली रश्मिका मंदना (Rashmika Mandana) ने फिल्म एनिमल में रणबीर कपूर के साथ काम करने के बाद हाल ही में रिलीज पुष्पा 2 अपने शक्त अभिनय से धमाल मचा दिया. साउथ की इस एक्ट्रेस के पास बहुत कम समय में टौप के हीरोज के साथ बिग बजट फिल्में है .

गौरतलब है पुष्पा 2 के बाद रश्मिका विक्की कौशल के साथ फिल्म छावा में नजर आने वाली है तो सलमान खान के साथ 2025 में आने वाली सलमान (Salman Khan) की खास अभिनीत फिल्म सिकंदर में मुख्य भूमिका में नजर आएंगी. इन दोनों ही फिल्मों के हीरो के बारे में बात करते हुए रश्मिका ने जहां विक्की कौशल को सरल स्वभाव और दयालु बताया वहीं सलमान खान को लेकर रश्मिका ने कुछ खास बातें बताई.

रश्मिका के अनुसार जब उनको सलमान खान के साथ फिल्म औफर हुई तो वह इस फिल्म में सलमान खान के साथ काम करने को लेकर थोड़ा नर्वस थी. लेकिन जब वह सलमान से शूटिंग के दौरान मिली तो रश्मिका को सलमान बहुत ही डाउन टू अर्थ एक्टर लगे. रश्मिका ने सलमान के साथ हुई बातचीत को महत्वपूर्ण बताते हुए कहां की सलमान के साथ उनकी जो भी बातें हुई हैं वह हमेशा उन दोनों के बीच ही रहेंगी. क्योंकि सलमान के साथ की गई बातें उनके लिए बहुत कीमती है.

रश्मिका के अनुसार सलमान के साथ काम करने का उनका अनुभव बहुत अच्छा रहा. सलमान के बारे में जितनी भी तारीफ उन्होंने सुनी थी, सलमान उससे कहीं अच्छे हैं. रश्मिका और सलमान की फिल्म सिकंदर 2025 में ईद पर रिलीज हो रही है जिसका सभी को इंतजार है.

Diljit Dosanjh को चेतावनी, गंदे अश्लील गाने नहीं चलेंगे…

Diljit Dosanjh : हमारे देश की यह बहुत बड़ी विडंबना है कि यहां पर लोग गंभीर मुद्दों पर ना तो कोई ध्यान देते हैं और ना ही कोई धर्मगुरु या धर्म के ठेकेदार किसी आम इंसान पर हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते नजर आते हैं. अगर कोई सेलिब्रिटी अपना काम कर रहा है, दर्शकों के बीच अपना परफौर्मेंस दे रहा है तो मौके पर चौका मारते हुए उनको धमकाते जरूर नजर आते हैं.

फिर चाहे वह किसी भी दल के क्यों ना हो लेकिन पब्लिसिटी के लिए सेलिब्रिटीज को चेतावनी देते या धमकाते नजर आते हैं. जैसे पंजाबी सिंगर और ऐक्टर दिलजीत दोसांझ के शो पर निहंगों की टेढ़ी नजर पड़ गई है. जिसके चलते निहंग बाबा धर्म सिंह अकाली ने पंजाबी गायकों को जिन में दिलजीत दोसांझ भी शामिल है, चेतावनी दी है कि वह स्टेज पर ढंग से परफौर्म करते नजर आए.

स्टेज पर अश्लील, शराब और शबाब वाले गाने ना गाएं और ना ही ऐसे कार्यक्रमों में शराब का सेवन करें और ना ही शराब परोस है. इतना ही नहीं चंडीगढ़ के सेक्टर 34 प्रदर्शनी ग्राउंड में मशहूर सिंगर ऐक्टर दिलजीत दोसांझ का शो होने वाला है उसे लेकर भी अकाली दल वालों ने ना सिर्फ चेतावनी दी है बल्कि शो को लेकर आपत्ति भी जताई है.

मोहाली में चल रहे मोर्चे में निहंगों ने चेतावनी दी है कि पंजाब में शहीदी सप्ताह शुरू होने जा रहा है, इस दौरान अगर कोई पंजाबी सिंगर शराब या दूसरे कौम के विरोधी गाने गाएगा तो उसे कड़ा सबक सिखाया जाएगा. निहंग बाबा के अनुसार ऐसे सिख गायको को शर्म करनी चाहिए जो शराब पीकर गाना गाते हैं और अपनी पगड़ी का भी मान नहीं रखते.

अब दिलजीत दोसांझ धर्म सिंह अकाली की बातों को कितना ध्यान में रखते हैं और पंजाब में होने वाले शो में कितना अपने गाए गानों में शराफत लेकर आते हैं यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा. पंजाबी होने के नाते अपने धर्म को फौलो करते हैं या प्रोफेशनल होने के नाते सिर्फ और सिर्फ अपने गानों पर ध्यान देते हुए दर्शकों के मनोरंजन का ध्यान रखते हैं.

Kamala Harris के साथ हारी हैं महिलाएं भी, ‘गर्भपात से बैन हटाने के लिए चल रहा संघर्ष’

हाल ही में अमेरिका के सब से अधिक उम्र (78 साल) के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने महिला अधिकारों की वकालत करने वाली अपनी प्रतिद्वंद्वी कमला हैरिस (Kamala Harris) को हरा दिया. यह हार क्या सिर्फ हैरिस की है या फिर इस के पीछे पूरी महिला जाति की हार छिपी हुई है? दुनिया के सब से शक्तिशाली देश की महिलाएं अपनी पसंद के प्रतिनिधि को राष्ट्रपति बनाने में नाकाम रहीं और अब आने वाले 4 साल डरडर कर जीने को विवश रहेंगी.

उन में इतनी कूबत नहीं थी कि वे एक लंपट, महिला अधिकारों को नजरअंदाज करने वाले, रंगभेदनस्लभेद का हिमायती, सनकी और विलासी वृद्ध व्यक्ति को इस गद्दी पर काबिज होने से रोक पातीं और महिलाओं के लिए काम करने वाली महिला प्रतिनिधि को अपना राष्ट्रपति चुन पातीं.

सुप्रीम कोर्ट के रो बनाम वेड फैसले और गर्भपात को ले कर संवैधानिक अधिकार के निर्णय को पलटने के बाद अमेरिका के पहले राष्ट्रपति चुनाव में जीत मिली कट्टरपंथी और औरतों को एक वस्तु सम?ाने वाले ट्रंप को. गर्भपात के मुद्दे को ले कर महिलाएं बड़ी संख्या में हैरिस का समर्थन करती दिखी थीं. मगर हैरिस के पहली महिला राष्ट्रपति बनने की संभावना को ?ाटका लग गया.

जीत के लिए उम्मीदवार को 270 इलैक्टोरल वोटों की जरूरत थी और ट्रंप को 312 इलैक्टोरल वोट मिले. डैमोक्रेट हैरिस को सिर्फ 226 वोट ही मिले. रिपब्लिकन ने सीनेट और प्रतिनिधि सभा दोनों में जीत हासिल की.

गर्भपात से बैन हटाने के लिए चल रहा संघर्ष

अमेरिकी चुनाव अभियान के दौरान अबौर्शन यानी गर्भपात एक बड़ा मुद्दा था. अमेरिका में कई लोग अबौर्शन की मांग कर रहे हैं. कई लोग गर्भपात को महिला अधिकार से जोड़ कर देख रहे हैं. कमला हैरिस ने दावा किया था कि उन की सरकार आएगी तो गर्भपात को कानूनी तौर पर देशभर में मंजूरी दी जाएगी लेकिन ट्रंप के आने से गर्भपात की मांग करने वालों की चिंता अब बढ़ गई है.

दरअसल, 2022 के जून महीने में सुप्रीम कोर्ट ने गर्भपात को मंजूरी देने वाले लगभग 5 दशक पुराने फैसले को पलट दिया था. गर्भपात को नैतिक और धार्मिक रूप से कोर्ट ने गलत करार दिया था. कोर्ट ने ऐंटीअबौर्शन ला को अपने अनुसार और कड़ा करने की बात भी कही थी. इसके बाद कई राज्यों में अबौर्शन क्लीनिकों पर ताला लगा दिया गया. क्लीनिक बंद होने की वजह से कई महिलाएं  मजबूरन घर पर असुरक्षित तरीके से अबौर्शन कराने को मजबूर हैं.

अबौर्शन के अधिकार का विरोध

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की पहली बहस में डोनाल्ड ट्रंप ने अबौर्शन पर स्पष्ट रुख अपनाने से इनकार किया था और इसे राज्यों पर छोड़ने की बात कही थी. ट्रंप का प्रशासन अमेरिका के अबौर्शन विरोधी आंदोलन के समर्थन में स्पष्ट रूप से खड़ा रहा. राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने एक ‘प्रोलाइफ’ राष्ट्रपति होने का दावा किया और अबौर्शन के खिलाफ कई प्रतिबंधों का समर्थन किया. ट्रंप ने 3 सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों को नियुक्त कर के अबौर्शन विरोधी आंदोलन को बल दिया जिस ने अबौर्शन के अधिकार को समाप्त कर दिया.

ट्रंप ने फेडरल जजों की नियुक्ति करते समय ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जो अबौर्शन के खिलाफ थे जिस के कारण महिला अधिकार संगठनों और अबौर्शन समर्थक कार्यकर्ताओं ने इस पर आपत्ति भी जताई थी. अबौर्शन का अधिकार महिलाओं के लिए एक व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवाधिकार का विषय होने के बावजूद ट्रंप की नीतियों के कारण इन्हें कानूनी और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

अबौर्शन पर ट्रंप का सब से विवादास्पद कदम ‘मैक्सिको सिटी पौलिसी’ को रीवाइव करना था जिस में उन अंतर्राष्ट्रीय संगठनों को आर्थिक सहायता नहीं दी जाती जो अबौर्शन सेवाएं प्रदान करते हैं या इस के पक्ष में हैं. यह नीति उन महिलाओं के लिए भी हानिकारक रही जिन्हें स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच के लिए अंतर्राष्ट्रीय संगठनों पर निर्भर रहना पड़ता था.

ट्रंप का महिलाओं के प्रति नीचा नजरिया

ज्यादातर लोगों का मानना है कि ट्रंप एक रक्षक नहीं बल्कि एक भक्षक हैं. अमेरिकी इतिहास में यह एक अजीब मोड़ लगता है कि 2 राष्ट्रपति चुनावों में 2 महिला उम्मीदवारों के खिलाफ चुनाव लड़ने वाला एकमात्र व्यक्ति वह है जिस का महिलाओं को नीचा दिखाने का एक लंबा और स्पष्ट रिकौर्ड है. डोनाल्ड जे. ट्रंप ने बारबार अपने रास्ते में खड़ी महिलाओं पर हमला करने, उन्हें शर्मिंदा करने और धमकाने की कोशिश की है.

ट्रंप ने महिलाओं को डराने के लिए अपनी शारीरिक उपस्थिति और शारीरिक भाषा का इस्तेमाल किया है, परोक्ष रूप से धमकियां दी हैं और उन की योग्यताओं को इस तरह से कमतर आंका है जिसे कई महिलाएं खुले तौर पर लैंगिक भेदभाव मानती हैं.

ट्रंप के ट्विटर अकाउंट पर महिलाओं के लुक्स के बारे में कई अपमानजनक टिप्पणियाँ हैं. ट्रंप ने एक बार ‘सैलिब्रिटी अप्रैंटिस’ में एक प्रतिभागी से कहा था, ‘उसे घुटनों के बल देखना एक सुंदर तसवीर होगी.’ क्या आपको ऐसा लगता है कि यह उस व्यक्ति का स्वभाव है जिसे एक राष्ट्रपति के रूप में चुना जाना चाहिए था?

हिलेरी क्लिंटन ने एक किताब में लिखा, ‘‘उन्हें महिलाओं को अपमानित करना पसंद है, हम कितने घृणित हैं इस बारे में बात करना पसंद है. वे मु?ो डराने की कोशिश कर रहे थे.’’

सार्वजनिक और निजी जीवन में उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि महिलाएं उन के लिए इंसान के रूप में नहीं बल्कि सैक्स औब्जैक्ट के रूप में माने रखती हैं. यहां तक कि जिन महिलाओं को वे पसंद करते हैं और जिन की प्रशंसा करते हैं उन के साथ भी उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वे उन की खूबसूरती को सब से ज्यादा महत्त्व देते हैं.

उन्होंने अपने व्यवहार को अपने दफ्तरों, अपने रिसौर्ट्स और अपने टीवी शो में भेदभावपूर्ण नीतियों में बदल दिया. जो महिलाएं उन्हें आकर्षक लगीं उन्हें परेशान किया और अपने कर्मचारियों से उन महिलाओं को नौकरी से निकालने का आग्रह किया जिन्हें वे आकर्षक नहीं मानते थे.

ट्रंप का कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ भेदभाव करने का भी लंबा रिकौर्ड है. जब ट्रंप किसी महिला को नापसंद करते हैं तो उन की प्रवृत्ति उस के शारीरिक रूप का अपमान करने की होती है. जब वे किसी महिला को पसंद करते हैं तो वे इस के विपरीत करते हैं और तुरंत उस की सुंदरता की प्रशंसा करते हैं. अगर ट्रंप महिलाओं का सम्मान करते तो उन्हें इस बात की परवाह होती कि वे क्या सोचती हैं.

इवाना ट्रंप (ट्रंप की पहली पत्नी) ने तलाक के बयान में कहा था कि ट्रंप ने उन के साथ बलात्कार किया.

एक बार उन्होंने अपनी बेटी इवांका के क्बारे में कहा था, ‘‘मेरी बेटी इवांका 6 फुट लंबी है, उस की बौडी अच्छी है और उस ने मौडल के रूप में बहुत पैसा कमाया है. अगर इवांका मेरी बेटी नहीं होती तो शायद मैं उस से डेटिंग कर रहा होता.’’

विरोध में शुरू किया 4बी मूवमैंट

डोनाल्ड ट्रंप के हाल ही में पुन: निर्वाचित होने से महिला अधिकारों और लैंगिक समानता पर बहस फिर से शुरू हो गई है जिस से पूरे अमेरिका में ‘4बी मूवमैंट’ की नई लहर पैदा हो गई है. मूल रूप से दक्षिण कोरिया से उभरने वाला 4बी मूवमैंट महिलाओं को पुरुषों के साथ डेटिंग, विवाह, यौन संबंध और बच्चे पैदा करने से दूर रहने के लिए प्रोत्साहित करता है. इसे अमेरिका में विवादास्पद चुनाव के बाद अपनाया जा रहा है जहां गर्भपात के अधिकार जैसे मुद्दों ने केंद्रीय भूमिका निभाई. आंदोलन के अधिवक्ताओं का तर्क है कि विभिन्न सामाजिक नीतियों पर ट्रंप के रुख, विशेष रूप से अबौर्शन अधिकारों के प्रति उन के दृष्टिकोण ने महिलाओं को अपने निजी जीवन में अधिक कठोर रुख अपनाने के लिए प्रेरित किया है.

ट्रंप के फिर से चुने जाने के बाद से एक्स जैसे सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर ‘4बी’ बैनर के तहत पोस्ट में उछाल देखा गया है जिस में कई महिलाएं विरोध के रूप में पुरुषों के साथ संबंधों से बचने के लिए रैली कर रही हैं. इस मूवमैंट का सार है कि अगर वे हमारे शरीर पर कब्जा करना चाहते हैं तो हम उन्हें ऐसा नहीं करने देंगे.

Motivational Story : कैसी जिंदगी

Motivational Story : मीता अपने  घर से निकली. पूरे रास्ते वह बेचैन  ही रही. दरअसल, वह अपने बचपन की सखी तनु से हमेशा की तरह मिलने व उस का हालचाल पूछने जा रही थी.  हालांकि, मीता बखूबी जानती थी कि वह तनु से मिलने जा तो रही है पर बातें तो  वही होनी हैं जो पिछले हफ्ते हुई थीं  और उस से पहले भी हुई थीं. मीता का  चेहरा देखते ही तनु एक सैकंड भी बरबाद नहीं करेगी और पूरे समय, बस,  इसी बात का ही रोना रोती रहेगी कि, ‘हाय रे, यह कैसी जिंदगी? आग लगे इस जिंदगी को, मैं ने सब के लिए यह किया वह किया, मैं ने इस को आगे बढ़ने की  सीढ़ी दी, पर  आज कोई मदद करने वाला नहीं. गिनती रहेगी कि यह नहीं वह नहीं…’

मीता जानती थी कि जबरदस्ती की पीड़ा तनु ने पालपोस कर  अमरबेल जैसी बना ली है. काश, तनु अपनी आशा व उमंग को खादपानी देती, तो आज जीवन का  हर कष्ट, बस, कोई हलकी समस्या ही  रह जाता और एक प्रयोग की  तरह तनु उस के दर्द से भी  पार हो जाती. मगर, तनु ने तो अपनी सोच को इतना सडा़ दिया था कि  समय, शरीर और ताकत सब मंद पड़ रहे थे.

सहेली थी, इसलिए मीता की  मजबूरी हो जाती कि उस की इन बेसिरपैर की  बातों को चुपचाप सुनती रहे. आज भी वही सब दुखदर्द, उफ…

मीता ने यह सब सोच कर ठंडी आह भरी और उस को तुरंत  2 दशक पहले वाली तनु याद आ गई. तब तनु 30 बरस की  थी.  कैसा संयोग था कि तनु का  हर काम आसानी से हो जाता था. अगर  उस को लाख रुपए की  जरूरत भी होती तो परिचित व दोस्त तुरंत मदद कर देते थे. मीता को याद था कि कैसे तनु रोब से कहती फिरती कि, ‘मीता, सुन,  मैं समय की बलवान हूं, कुछ तो है मेरे व्यक्तित्व में कि हर काम बन जाता है और जिंदगी टनाटन  चल रही है.’ मगर  मीता सब जानती थी कि यह पूरा सच नहीं था.

असलियत यह थी कि तनु आला दर्जे की  चंट  और धूर्त हो गई थी. उस ने 5 सालों में ऐसे अमीर, बिगडै़ल व इकलौते वारिस संतानों को खूब दोस्त बना कर ऐसा लपेटा था कि वे लोग तनु के  घर को खुशी और सुकून का  अड्डा मान कर चलने लगे. मीता सब जानती थी कि  कैसे प्रपंच कर के  तनु ने लगभग ऐसे ही धनकुबेर दसबारह दोस्तों से बहुत रुपए उधार ले लिए थे और वह सीना ठोक कर कहती थी कि जिन से पैसा उधार लिया है वे सब अब देखना, कैसे जीवनभर मेरे इर्दगिर्द चक्कर काटते रहेंगे. मीता जब आश्चर्य  करती तो वह कहती कि मीता, तुम तो नादान हो, देखती नहीं कि यह सब किस तरह अकेलेपन के मारे हैं बेचारे. लेदे कर इन को मेरे ही घर पर आराम मिलता है.

मगर मीता तनु की ये सब दलीलें सुन कर बहुत टोकती  भी थी कि, बस, घूमनेफिरने और महंगे शौक पूरे करने का  दिखावा बंद करो, तनु. आखिर दोस्त भी कब तक मदद करते रहेंगे?

पर तनु जोरजोर से हंस देती थी और कंधे झटक  कर कहती कि मीता, मेरी दोस्ती तो ये लोग तोड़ ही नहीं सकते. देखो, मैं कौन हूं, मैं यहां नगरनिगम की  कर्मचारी हूं. मेयर तक पहुंच है मेरी. मैं सब के बहुत  काम की  हूं वगैरहवगैरह. यह सुन कर मीता खामोश हो जाती थी. पर वह कहावत है न कि, परिवर्तन समय का  एक नियम है. इसलिए  समय ने रंग दिखा ही दिया. तनु का अपने  पति  से अलगाव हो गया और उस की  इकलौती बेटी गहरे  अवसाद में आ कर बहुत बीमार रही. कहांकहां नहीं गई तनु, किसकिस अस्पताल के  चक्कर नहीं लगाए. पर कोई लाभ नहीं हुआ. एक दिन बेटी कोमा मे चली गई. मगर अभी और परीक्षा बाकी थी. एक दिन  तनु का  नगर निगम में ऐसा विवाद व कानूनी लफड़ा हुआ कि वह विवाद महीनों तक लंबा खिंच गया. और  उस महज पचास की  उम्र में नौकरी से त्यागपत्र देना पड़ा. यही उपाय था, वरना,  उस को सब के सामने धक्के मार मार कर कार्यस्थल से  निकाला जाता. आज वह बीमार बेटी को संभाल रही थी. पर कोई पुराना मित्र या परिचित ऐसा नहीं था जो, उस से मिलना तो बहुत दूर की  बात, उस को मोबाइल पर संदेश तक भी गलती से नहीं भेजता था.

यह सब सोचतीसोचती  मीता अब तनु के घर पर पहुंच चुकी थी और वह बाहर गमलों को पानी देती हुई मिल गई.  मीता के  मुंह से निकल पड़ा, “आहा,  खूबसूरत फूलों की  संगत में वाहवाह.”

यह सुना  तो तनु फट कर  बोल पड़ी, “हां, जानपहचान वालों ने तो  मुझ को, बस,  कैक्टस और कांटे ही दिए. फिर भी कुछ फूल कहीं मिल ही गए.”  और फिर  पाइप से बहते पानी से अधिक आंसू उस की आंख से बहने लगे  और वह  बेचारी व कमजोर इंसान बन कर  हर परिचित को धाराप्रवाह बुराभला कहने लगी.

तब मीता ने कोई पल गंवाए बगैर कहा, “तनु, सुनो, यह जो दुख है न, हमारी उस याददाश्त की देन है जो खराब बातें ही याद दिलाती है. तुम को यह वर्तमान नहीं, बल्कि अतीत है जो रुला कर समय से पहले इतना जर्जर किए दे रहा है. बारबार लोगों को याद कर के लानतें  मत दो.  अच्छे लोगों  की कीमत तब तक कोई नहीं जानता, जब तक वे हमारे व्यवहार से आहत हो कर दूर  जाने न लगें. हमारे जीवन में  कुछ सुकून की जो सांस चल रही होती  है, वह इन सदगुणी लोगों के  कारण ही होती है. तनु, गौर से सुनो और   तुम एक बार याद तो  करो कि तुम को कितने सहयोगी दोस्त एक के  बाद एक मिलते रहे.”

तनु कुछ बोली नहीं. बस, चुपचाप सुनती रही. मीता बोलती गई, “तनु, कई लोग तो दशकों बिता देते हैं और संयोग से मिल रहे हितैषियों से भरपूर लाभ भी लेते रहते हैं पर वे लोग लापरवाह हो जाते हैं.   वे अपनी उस ख़ुशी या उन मित्रों की  अहमियत पर कभी ध्यान नहीं देते हैं जिन की वजह से उन की खुशी और आनंद आज  अस्तित्व में हैं. और सच कहा जाए तो वह ही  उन का सबकुछ है. कैसी विडंबना है कि आदमी इतना संकीर्ण हो जाता है कि  वह सब से पहले उसी अनमोल खजाने को बिसरा देता है.”

“मैं ने सब के लिए कितना किया,” तनु गुस्से व नाराजगी से बोली, “रमा को हर हफ्ते मेयर की  पार्टी में ले जाती थी. सुधा को तो सरकारी ठेके दिलवाए.  उस उमा को तो नगर निगम  के विज्ञापन दिला कर उस की वह हलकीफुलकी पत्रिका निकलवा  दी. सब का काम किया था मैं ने. पर आज कोई यहां झांकता तक नहीं.”

“नहीं तनु, यह निहायत ही  एकतरफा सोच है तुम्हारी. यह संकुचित सोच भी किसी अपराध से कम नहीं है क्योंकि ऐसे नकारात्मक सोचने वाला अपने दिमाग को सचाई से बिलकुल अलग कर लेता है.”

तनु यह सुन कर तमतमाता हुआ चेहरा कर के मुंह बनाने  लगी पर मीता निडर हो कर आगे बोली, “तुम पूरी बात याद करो, तुम कह रही हो कि  रमा को तुम दावतों  में ले जाती थीं. पर उस के एवज में रमा की  एक कार हमेशा तुम्हारे पास ही रही. और तुम ने रमा की  नर्सरी से लाखों के  कीमती पौधे मुफ्त में लिए, याद करो.”

तनु को वह सब याद आ गया और वह अपने होंठ काटती हुई कुछकुछ विनम्र हो गई. अब मीता ने कहा, “सुधा को तुम ने जुगाड़ कर के ठेका दिलवाया. हां बिलकुल,  पर तुम्हारे घर पर कोई भी आयोजन होता था तो सुधा की  तरफ से मुफ्त कैटरिंग  होती थी. बोलो, सच है या नहीं?” “ओह, हां, हां,” कह कर तनु चुप हो गई.

मगर अब  मीता बिलकुल चुप नहीं रही, बोली, “उमा  की  पत्रिका में तुम्हारी बेटी की  कविता छपना  जरूरी था. इतना ही नहीं, तुम ने उमा की  पत्रिका को  अपने ही  एक प्रिय पार्षद का  प्रचार साधन भी बनाया. याद आया कि नहीं, जरा ठीक से  याद करो.”

“हां,”  कह कर तनु कुछ उदास हो गई थी.  मीता को लगा कि उसे कहीं पार्क या किसी खुली जगह में चलने को कहना चाहिए.

आखिर मीता भी इंसान थी और तनु को उदास देख कर उस का मन भी खुश नहीं रह सकता था. मीता ने उस के जीवन का  हर रंग देख लिया था. तनु और  उस ने कितना समय साथ गुजारा था. मीता ने उस से कहा कि तनु, सुनो, अभी तो सहायिका  काम कर रही हैं, वे बिटिया को भी देखती रहेंगी. चलो, हम पास वाले पार्क तक चहलकदमी  कर आते हैं. तनु के लिए मीता सबकुछ थी- बहन, दोस्त, हितैषी सबकुछ. वह चट मान गई और उस के साथ चल दी.

घर की  चारदीवारी से पार होते ही तनु को कुछ अच्छा सा लग रहा था. वह आसपास की  चीजों को गौर से देखती जा रही थी. पार्क पहुंच कर दोनों आराम से एक बैंच  पर बैठ गईं.

तनु वहां पर उड़ रही तितली को यहांवहां देखने लगी. मीता को अब लगा कि आज तनु को सब याद दिलाना ही चाहिए, ताकि यह अपनी सोच को सही व  संतुलित कर के सकारात्मक ढंग से विचार कर सके और खुद भी  किसी पागलपन जैसी बीमारी का  शिकार न हो जाए. तनु को उम्र के  इस मोड़ पर मानसिकरूप से सेहतमंद  होना बहुत अनिवार्य था. मीता यह सोच ही रही थी कि तनु  अचानक अपने पति पुष्प  का जिक्र करते हए पुष्प  को बुराभला कहने लगी. उन की पुरानी गलतियां बता कर शिकायतें करने लगी.

पर मीता ने उस को बीच में ही फिर टोक दिया और जरा जोर दे कर कहा, “तनु, अगर तुम्हारे पति प्राइवेट स्कूल में शिक्षक न हो कर कोई बढ़िया नौकरी कर रहे होते तो तुम इतना रोब दिखातीं उन को, जरा ईमानदारी से याद करो,  तनु. सुनो तनु, तुम उन की सारी तनख्वाह को जब्त कर लेती थीं और अपने ढंग से कहीं प्लौट खरीद लेतीं और लोन की  किस्तें पुष्पजी के वेतन से चुकाई  जातीं. वे कुछ कहते, तो तुम अपना रोबदाब दिखाने लगती थीं. तुम ने एक सरल व सच्चे इंसान को हौलेहौले मंदबुद्धि बना दिया, तनु. वे तुम्हारे चलते यह शहर ही छोड़ कर चले गए. पर आज वे आनंद से हैं, अकेले हैं, पर समाज की  सेवा में बहुत खुश हैं.”

तनु यह सब चुपचाप सुनती रही. उस से कोई जवाब देते ही नहीं बन रहा था. मीता आगे बोली, “तनु, याद है एक बार तुम उन को अपने मेयर साहब से  सिफारिश कर के नगर निगम का कोई सम्मान दिलवा लाई थीं, जबकि पुष्पजी तो चाहते ही नहीं थे कि उन को कोई मानपत्र दिया जाए. पर तुम ने कितना भौंडा प्रदर्शन किया. मुझे तो पुष्पजी का  चेहरा याद आता है कि वे तुम्हारे इस दिखावे के  शोरशराबे और आत्मप्रदर्शन से कितने आहत हो गए थे.

“वे यही सोचते कि एक सरल जीवन जिया जा सकता है. पर तुम तो न जाने किस लत में पड़ गई थीं कि यहां की  गोटी वहां फिट कर दो, इस को आगे करो, उस को पीछे करो, इस से इतना रुपया ऐंठ लो और भी न जाने क्या सनक थी तुम को.  तुम ऐसा क्यों करती थीं. तनु, कितनी ही बार पुष्पजी कोशिश करतेकरते हार गए  कि तुम्हारा यह दंभ और अहंकार  और झूठे पाखंड किसी तरह कम हो जाएं, पर एक बूंद के  बरसने  से ज्वालामुखी कहां शांत होता है.

“तुम तो पूरी महफिल में सरेआम  न जाने क्या से क्या बोल जातीं. तुम हमेशा पुष्पजी के  ड्रैसिंग सैंस का  मजाक उड़ाया करतीं और उन के पहने हुए लिबास को बदलवा  कर दोबारा तैयार होने को कहतीं थीं. वे कितना दुखी हो जाते पर तुम को तो, बस, दिखावा ही चाहिए था. तुम उन के अच्छे कपड़ों पर कैसे टिप्पणी कर देती थीं कि यह देखो, मैं खरीद कर लाई हूं, यह मेरी पसंद की  जींस है. इस पर वे बेचारे कितना झेंप जाते थे. पर तुम को कुछ समझ नहीं आता था.

“पुष्पजी तुम्हारे साथ बहुत असहज होने लगे थे. वे कई बार ऐसे लगते जैसे किसी कैदखाने में  घुट रहे हैं. बस, एक दिन उन्होंने फैसला कर लिया होगा कि चाहे किसी जंगल में खुशीखुशी  रह लेंगे, पर तुम्हारी इस झूठ से भरी हुई  नौटंकीशाला  में कतई नहीं.

“और तनु, तुम्हारी आंखों में तो कितने परदे पड़े थे. सावन के  अंधे को सब हरा ही हरा दिखता है. तुम को अपनी जोड़जुगाड़ वाली कूटनीति के  चश्मे से यही दिखता था कि पुष्पजी से ले कर सब परिचित, बस, इक तुम्हारी ही छत्रछाया में सुकून से हैं.”

तनु यह सब ऐसे सुन रही थी मानो उस के खिलाफ कोई झूठा मुकदमा चलाया जा रहा हो.

मीता धाराप्रवाह बोलती गई, “तनु,  पता है, तुम जब तक उन के सामने नहीं होती थीं वे जिंदगी का  आनंद लेते पर तुम दफ्तर से आतीं तो वे सकपका से जाते. तुम जैसे कोई तबाही बन गई थीं उन के लिए. हम लोग कितना संकेत करते, पर तुम इतनी जोरदार व भारी आवाज में हमारी हर बात काट दिया करती थीं.”

यह सब कहतेकहते जब मीता जरा देर के लिए चुप हो गई तो तनु बोल पड़ी, “हुंह,  मीता, तुम तो आज मुझे दोस्त लग ही नहीं रही हो. हद करती हो तुम, पुष्प के  परिवार को गोवा तक घुमाने ले गई वह भी सरकारी खर्च पर. ऐसा शाहीभ्रमण उन के वश की  बात ही नहीं है, मीता.”

“नहीं तनु, तुम फिर एकतरफा सोच रही हो. वह परिवार बहुत सादगीपसंद है. तुम्हारी चालें, तुम्हारे दांवपेंच  वे नहीं जान सका कभी. तुम अपनी ननद और ननदोई को जिद कर के उन की मरजी के  विरूद्ध गोवा ले गईं और उस से पहले ही तुम ने इस बात का  हर जगह भोंपू बजा कर इतना प्रचार कर दिया था कि सुनसुन कर  पुष्पजी शर्मिंदा हो जाते थे मानो वे कोई नितांत फकीर हैं और तुम ने उन को व उन के गरीब परिवार को शाहीजीवन उपहार में दिया है. पर तुम को यह सब कभी समझ नहीं आया.

“तुम को याद भी नहीं. पर तुम्हारे ननद और ननदोई गोवा जा कर बहुत परेशान हो गए थे. तुम से कहना चाहते थे पर तुम तो अपने प्रभाव व अपने रोब के खोल में बंद रहती थीं. तुम ने एक बार पलभर को भी उन दोनों का  मन नहीं जाना. पर यह बात तुम्हारी ननद ने अपने भाई यानी पुष्पजी से कही कि वहां इतने ओछे और छिछोरे लोगों के  साथ तुम ने उन को पलपल कितना विचलित किया. वे दूसरे दिन लौट जाना चाहते थे पर तुम ने उन को दबाव में ले कर पूरा सप्ताह जैसे उन का मानसिक शोषण किया था.

“तनु, वे बहुत ही सरल लोग हैं. इतना छलकपट, इतना दिखावा उन के वश की  बात नहीं है. पर तुम तो गोवा से लौट कर भी अपनी उदारता का  बखान करती रहीं कि ननदननदोई को घुमा लाईं वगैरहवगैरह.”

“पर आज देखो, तुम्हारे ननद और ननदोई सिर्फ अपने खूनपसीने की  मेहनत के  बल पर  कितने सफल उद्योग चला रहे हैं. कितनों  को रोटी दे रहे हैं. और तुम उन पर ऐसे अपना सिक्का जमाने की  कोशिश करती थीं. तनु, पुष्पजी हों या उन के बहनबहनोई, वे सब मुझ से बहुत प्रेम रखते हैं. मगर मैं आज भी, बस, तुम से ही लगाव रखती हूं, बस, तुम से स्नेह रखती हूं. क्योंकि, एक जमाने में तुम्हारे पापा ने मेरी एक साल की  स्कूल फीस जमा कराई थी. तनु, मेरे पास सब की खबर है, पर मेरा मन हमेशा तुम से ही जुडा रहेगा. मैं सदैव तुम्हारी ही भलाई चाहती हूं.” यह सब कह कर मीता चुप हो गई.

तनु यह सुन कर एकदम खामोश हो गई. थोड़ी देर बाद बोली, “मीता, एकएक बात  सच कह रही हो. मैं जल्दी मालदार बनना चाहती थी और अमीरों की  कमजोरी भांप कर उन का काम करवा कर रुपया मांग लेती थी. पर आज यह लगता है कि शायद मेरी यह फितरत सब भांप गए और मुझ से दूर होने लगे. सच मीता, अगर मैं यह प्रपंच वगैरह न करती तो कम पैसा होता पर कितनी खुशी होती और कितने अपने मेरे साथ होते. आज, बस, तुम ही हो जो मेरा साथ निभा रही हो. अब तुम देखना, मैं संकल्प करती हूं कि  अपनी सोच बदल दूंगी. मैं, बस, प्रकृति की  सेवा करूंगी और बेटी जल्द सही हो, इस की कोशिश. कोई मदद मांगने आए, तो गुप्तदान करूंगी,” कहते हुए तनु का  गला भर आया और वह किसी तरह अपने आंसू रोकने लगी.

“हां तनु, यह ही सही मार्ग है. आखिर तनु,  ऐसी समुचित मानसिक स्थिति होगी तो फिर किसी भी हाल  में तुम्हारा  बुरा  कैसे संभव है? अब तुम इसी पल से अपने को बदल कर रख दो. वह मन सुधार लो जो  अपना काम निकालने को परिचय की  जोड़तोड़ करता रहे. बोलो  तनु, कुदरत  का भी अपना एक अटल कानून है. वह अच्छे लोगों से मिलवाती  रहती है. मगर जब हम उन सहयोगी जनों को बारबार नजरअंदाज करते हैं तो  वे अंतिमरूप से चले जाते हैं और उस के बाद  तो फिर संसार की कोई भी ताकत उन को वापस नहीं बुला सकती है. इस के साथ ही किसी की भी सिफारिश काम नहीं आती है. इस में किसी भी रिश्वत का आदानप्रदान नहीं होता है. इस अच्छे संबंध को तो  आप बाजार से नहीं खरीद सकते हैं. और चाहकर भी इसे आप किसी को नहीं दे सकते हैं और किसी से छीनझपट कर भी  ले नहीं सकते हैं.

“अब  यह पूरी तरह से  हम सब के  ऊपर ही तो  निर्भर करता है कि हम जैसा चाहें, इस अच्छी संगति  को अंत दे सकते हैं.” “हां मीता, सच कहा, इस जीवन को खुशियों से  संपन्न करने के लिए मुझ को ही  यह जिदंगी सफल करनी पड़ेगी. इस जीवन के अंदर समझदारी की स्थापना करनी पड़ेगी.”

“हांहां तनु, हां,”  कहते हुए मीता की  आंखों में तनु की आंखों से टकराती  इंद्रधनुषी आभा प्रतिबिंबित होने लगी.

Winter Special Momos Recipe : घर पर बनाएं हेल्दी और टेस्टी वेज मोमोज

Winter Special Momos Recipe : मोमोज का नाम सुनते ही मुंह में पानी न आए ऐसा हो ही नहीं सकता और अगर ठंड के मौसम में गर्मागर्म मोमोज खाने को मिल जाएं तो कहने ही क्या.  लेकिन क्या उसमें इस्तेमाल होने वाला मैदा याद आते ही आप हाथ पीछे कर लेते हैं. अगर ऐसा है, तो आज हम आपको बता रहे हैं आटा वेज मोमोज की रेसिपी जो आपकी क्रेविंग को पूरा करेगी और सेहत के लिए भी खराब नहीं होगी… ये मोमोज खाने में जितने स्वादिष्ट हैं उतने ही सेहत के लिए भी अच्छे. इन मोमोज़ को बच्चे और बड़े बहुत ही मन से खायेंगे और ये स्ट्रीट फ़ूड की तुलना में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी नहीं है.

मोमोज़ की सबसे बड़ी खासियत ये है की इसको बनाने में तेल का उपयोग बहुत ही कम होता है और यह आसानी से भाप में पक भी जाते है.और आप चाहे तो आप मोमोज़ में मनचाही सब्जियां भी डाल सकते है.
तो देर किस बात की आइए जान लेते हैं आखिर कैसे बनाएं जाते हैं आटे के वेज मोमोज-

कितने मोमोज़ बनेंग-25 से 30
कितना समय -20 से 25 मिनट

हमें चाहिए-

• 250 gm आटा
• 1 चम्मच नमक
• 1 चम्मच तेल
• जरूरत के अनुसार पानी

स्टफिंग के लिए-

• ¼ कप बारीक़ कटी हुई प्याज
• 1 मध्यम साइज़ घिसी हुई बन्दगोभी
• 1/4 कप बारीक कटी शिमला मिर्च
• 1/4 कप घिसी हुई गाजर
• 1 टेबलस्पून लहसुन का पेस्ट
• 1 चुटकी अजीनोमोटो(ऑप्शनल)
• ½ टेबलस्पून तेल

बनाने का तरीका-

1- एक कटोरी में गेहूं का आटा लें और उसमें नमक और तेल डालें. इसमें पानी डालकर गूंधे .आटा ज्यादा कड़ा न गूंधे .आटे को एक कटोरे के साथ कवर करें और 1 घंटे के लिए अलग रखें.

2- अब घिसी हुई बंदगोभी और गाजर को हाथ से दबा -दबा कर उसका पानी निचोड़ ले.

3- अब एक कढ़ाई में 1 छोटा चम्मच तेल गर्म करें. लहसुन का पेस्ट डालें और तब तक फ्राई करें जब तक कि यह रंग में हल्का सुनहरा न हो जाए. अब कटे हुए प्याज डालें .प्याज़ को हल्का लाल होने तक भूने. अब इसमे बंदगोभी ,गाजर और शिमला मिर्च डालकर तेज़ आंच में भून लें.
(Note :आप चाहे तो आप फ्रेंच बीन्स ,स्वीट कॉर्न या और भी कोई मनचाही सब्जी मोमोज में डाल सकते है)

4- अब ऊपर से नमक, अजीनोमोटो डालकर अच्छी तरह मिला लें. अब गैस का स्विच ऑफ करें और इस मिश्रण को अलग रखें. स्टफिंग तैयार है.

(ध्यान रहे : आप चाहे तो अजीनोमोटों का प्रयोग नहीं भी कर सकते है )

5- अब आटे की छोटी-छोटी गोलियां बनाये और उनको पतला पतला बेल ले .अब स्टफिंग को बीच में रखें और आटे का बाहरी हिस्सा उठाएं. रोल में भराव बंद करने के लिए बाहरी भाग को आपस में चिपका दें .

(note:आप चाहे तो आप एक बड़े आकार की लोई काट कर उसे थोड़ा बड़ा और पतला बेल लें और फिर एक छोटे ग्लास की सहायता से उसे काट लें , इससे आपको बार -बार लोई बेलनी भी नहीं पड़ेगी और आपका समय भी बचेगा)
6- बाकी आटे के लिए प्रक्रिया दोहराएं.

7- प्रेशर कुकर का इस्तेमाल भाप लेने के लिए करें. प्रेशर कुकर में एक 2 कप पानी डालें और उस कुकर पर दूध वाली छलनी रखें. अब छलनी के ऊपर मोमोज़ रख दे और ऊपर से छलनी की शेप की प्लेट से ढक दे .8 से 10 मिनट तक पकाएं.

8- स्वादिष्ट आटा वेज मोमोज़ तैयार हैं. इसको लहसुन और लाल मिर्च की चटनी के साथ खाए.

Marriage Anxiety : क्या है मैरिज ऐंग्जाइटी, जानें इससे बचने के उपाय

Marriage Anxiety : आईआईटी इंजीनियर अक्षत की शादी उस की पसंद की लड़की से होने जा रही है. शादी की सारी तैयारियां लगभग हो चुकी हैं. मगर अक्षत के चेहरे पर वह खुशी नहीं ?ालक रही है जो अपनी शादी को ले कर लोगों में होती है. घर में शादी पर बात होते ही अक्षत को घबराहट सी होने लगती है. उस की हार्ट बीट बढ़ जाता है और पसीना आने लगता है. इसलिए जहां तक हो सकता है वह शादी की बातों से बचना चाहता है.

24 साल की शैली कहती है कि उसे अपनी शादी को ले कर बुरेबुरे सपने आते हैं. जहां वह देखती है कि हरकोई एकदूसरे से लड़ रहा है और जो कुछ भी गलत हो सकता है, हो रहा है. शैली कहती है कि वह अपने होने वाले पति को 2 सालों से जानती है. दोनों की मरजी से यह शादी हो रही है पर फिर भी न जाने क्यों वह शादी को ले कर तनाव में है. शादी को ले कर मन में अजीब सा डर बैठा हुआ है. सबकुछ बहुत बढि़या है, फिर भी खुद को तनाव में जाने से रोक नहीं पा रही हूं.

नहीं चाहते कमिटमैंट

शादी कमिटमैंट और एडजस्टमैंट पर चलती है. लेकिन आज के युवा रिलेशनशिप में तो रहना चाहते हैं पर शादी का वादा नहीं करना चाहते. उन्हें लगता है शादी करने से उन की आजादी छिन जाएगी. इसलिए आज कई युवा बिना जीवनसाथी के खुद से ही शादी कर रहे हैं, जिसे सोलोगैमी या सोलो मैरिज कहते हैं. सोलो मैरिज लड़कियां ज्यादा पसंद कर रही हैं. कारण, वे अपने परिवार और सोसायटी में कई असफला शादियां देख चुकी होती हैं.

बचपन में अपने पिता को मां पर हाथ उठाते देख चुकी होती हैं, जहां औरत मार खा कर भी चुप रहती हैं. इसलिए शादी के नाम से ही उन्हें ऐंग्जाइटी होने लगती है. हालांकि हम इसे आम सम?ा कर जाने देते हैं. लेकिन आप को नहीं पता कि यह एक प्रकार का डर है, जिसे मैरिज ऐंग्जाइटी कहते हैं.

आइए, जानते हैं कि मैरिज ऐंग्जाइटी है क्या और यह किन कारणों से होती है और हम मैरिज ऐंग्जाइटी से कैसे उबर सकते हैं?

मैरिज ऐंग्जाइटी क्या है

शादी के बाद लाइफ में होने वाले बदलावों के बारे में सोचसोच कर कई शंकाओं से घिरे रहते हैं. एक डर सताता रहता है कि शादी का मेरा यह फैसला सही तो है न? कहीं मैं शादी कर के कोई गलती तो नहीं करने जा रहा? मैरिज ऐंग्जाइटी से पीडि़त लोगों को लगता है कि अपने पार्टनर से उन की नहीं बना तो या कहीं पत्नी ने किसी बात को ले कर केस कर दिया तो? ऐसी बातें तनाव पैदा करती हैं, जिसे मैरिज ऐंग्जाइटी कहते हैं.

किन कारणों से हो सकती है मैरिज ऐंग्जाइटी

मैरिज ऐंग्जाइटी के कारणों में पुराने अनुभव, व्यक्तिगत असुरक्षा समेत कई वजहें शामिल हो सकती हैं जैसे मातापिता के झगड़े या तलाक या फिर अपने किसी दोस्त की शादी का बहुत बुरी तरह से टूटते देखना भी मैरिज ऐंग्जाइटी को बढ़ा सकता है.

इस के अलावा शादी के बाद कई जगहों पर जाना, नौकरी बदलना, बैंक सेविंग जैसी बातें भी ऐंग्जाइटी का कारण हो सकती हैं. पार्टनर के साथ भविष्य की प्लानिंग को ले कर दोनों के अलगअलग विचार भी तनाव का करना बन सकते हैं.

इन कारणों से हो सकती है मैरिज ऐंग्जाइटी

वैवाहिक जीवन के बाद होने वाले बदलाव को ले कर डर.

यह डर कि पता नहीं शादी के बंधन को निभा पाएंगे या नहीं.

शादी  के बाद आने वाली जिम्मेदारियों को ले कर तनाव में रहना.

विवाह के बाद अपनी पर्सनल फ्रीडम को ले कर परेशान होना.

परिवार, दोस्तों और समाज के सामने एक आदर्श बहू और पत्नी बनने का दबाव होना आदि.

मैरिज ऐंग्जाइटी से कैसे निबटें

शादी से पहले ऐंग्जाइटी होना सामान्य बात है. इस के लिए ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है. ऐसी स्थिति में घर के बड़ों और दोस्तों से अपने मन की बातें शेयर करनी चाहिए. अगर आप मैरिज ऐंग्जाइटी से पीडि़त हैं तो अपने पार्टनर से खुल कर बात कर सकते हैं.

उसे बताएं कि शादी को ले कर आप के मन में क्या चल रहा है ताकि वह आप को बेहतर तरीके से सम?ा सके और सपोर्ट कर सके. हो सकता है आप का पार्टनर भी उसी डर से गुजर रहा हो जिस से आप. इस से आप का रिश्ता और मजबूत बनेगा.

अपना ध्यान रखें

फुजूल की चिंताओं को भूल कर अपनी शादी के बारे में सोचें, अपने पार्टनर के बारे में सोचें और मुसकराएं कि आप का भविष्य बहुत ही उज्जवल होगा. रोज ध्यानयोग करें, अच्छी किताबें पढ़ें, अपने चेहरे की देखभाल पर ध्यान दें क्योंकि अपनी शादी के समय आप को सब से अलग जो दिखना है.

वर्तमान में जीना सीखें

अकसर हम भविष्य की चिंताओं में इतने डूब जाते हैं कि वर्तमान का आनंद लेना भूल जाते हैं. आप ऐसा न करें बल्कि माइंडफुलनैस के तरीके अपनाएं. अपने आसपास की चीजों पर ध्यान केंद्रित करें. अपने फैवरिट काम में खुद को व्यस्त रखें.

Hindi Story : किसे स्वीकारे स्मिता

Hindi Story : ‘‘मैम, रिपोर्ट तथ्यों पर आधारित है और इस में कुछ भी गलत नहीं है.’’ ‘‘क्या तुम्हें अधिकारियों के आदेश का पता नहीं कि हमें शतप्रतिशत बच्चों को साक्षर दिखाना है,’’ सुपरवाइजर ने मेज पर रखी रिपोर्ट को स्मिता की तरफ सरकाते हुए कहा, ‘‘इसे ठीक करो.’’

‘मैम, फिर सर्वे की जरूरत ही क्यों?’ स्मिता ने कहना चाहा किंतु सर्वे के दौरान होने वाले अनुभवों की कड़वाहट मुंह में घुल गई.

चिलचिलाती धूप, उस पर कहर बरपाते लू के थपेडे़, हाथ में एक रजिस्टर लिए स्मिता बालगणना के राष्ट्रीय कार्य में जुटी थी. शारीरिक पीड़ा के साथ ही उस का चित्त भी अशांत था. मन का मंथन जारी था, ‘बालगणना करूं या स्कूल की ड्यूटी दूं. घर का काम करूं या 139 बच्चों का रिजल्ट बनाऊं?’ अधिकारी तो सिर्फ निर्देश देना जानते हैं, कभी यह नहीं सोचते कि कर्मचारी के लिए इतना सबकुछ कर पाना संभव भी है या नहीं.

स्कूटर की आवाज से स्मिता की तंद्रा भंग हुई. सड़क के किनारे बहते नल से उस ने चुल्लू में पानी ले कर गले को तर किया. उस के मुरझाए होंठों पर ताजगी लौटने लगी. नल को बंद किया तो खराब टोंटी से निकली पानी की बूंदें उस के चेहरे और कपड़ों पर जा पड़ीं. उस ने कलाई पर बंधी घड़ी पर अपनी नजरें घुमा दीं.

‘एक बज गया,’ वह बुदबुदाती हुई एक मकान की ओर बढ़ गई. घंटी बजाने पर दरवाजा खुलने में देर नहीं लगी थी.

एक सांवली सी औरत गरजी, ‘‘तुम्हारी अजीब दादागिरी है. अरे, जब मैं ने कह दिया कि मेरे बच्चे पोलियो की दवा नहीं पिएंगे, तो क्यों बारबार आ जाती हो? जाइए यहां से.’’

स्मिता को लगा जैसे किसी ने उस के मुंह पर जोर का तमाचा मारा हो. उस ने विनम्र स्वर में कहा, ‘‘बहनजी, एक मिनट सुनिए तो, लगता है आप को कोई गलतफहमी हुई है. मैं पोलियो के लिए नहीं, बालगणना के लिए यहां आई हूं.’

‘‘फिर आइएगा, अभी मुझे बहुत काम है,’’ उस ने दरवाजा बंद कर लिया.

वह हताशा में यह सोचती हुई पलटी कि इस तरह तो कोई जानवर को भी नहीं भगाता.

स्मिता को लगा कि कई जोड़ी आंखें उस के शरीर का भौगोलिक परिमाप कर रही हैं मगर वह उन लोगों से नजरें चुराती हुई झोपड़ी की तरफ चली गई. वहां नीम के पेड़ की घनी छाया थी. एक औरत दरवाजे पर बैठी अपने बच्चे को दूध पिला रही थी. दाईं ओर 3 अधनंगे बच्चे बैठे थाली में सत्तू खा रहे थे. सामने की दीवार चींटियों की कतारों से भरी थी.

स्मिता उस औरत के करीब जा कर बोली, ‘‘हम बालगणना कर रहे हैं। कृपया बताइए कि आप के यहां कितने बच्चे हैं और उन में कितने पढ़ते हैं?’’

‘‘बहनजी, मेरी 6 लड़कियां और 3 लड़के हैं लेकिन पढ़ता कोई नहीं है.’’

‘‘9 बच्चे,’’ वह चौंकी और सोचने लगी कि यहां तो एक बच्चा संभालना भी मुश्किल हो रहा है लेकिन यह कैसे 9 बच्चों को संभालती होगी?

‘‘अम्मां, कलुवा सत्तू नहीं दे रहा है.’’

‘‘कलुवा, सीधी तरह से इसे सत्तू देता है या नहीं कि उठाऊं डंडा,’’ औरत चीख कर बोली.

‘‘ले खा,’’ और इस के साथ लड़के के मुंह से एक भद्दी सी गाली निकली.

‘‘नहीं बेटा, गाली देना गंदी बात है,’’ कहती हुई स्मिता उस औरत से मुखातिब हुई, ‘‘आप ने अभी तक अपने बच्चों का नाम स्कूल में क्यों नहीं लिखवाया?’’

‘‘अरे, बहनजी, चौकी वाले स्कूल में गई थी मगर मास्टर ने यह कह कर मुझे भगा दिया कि यहां दूसरे महल्ले के बच्चों का नाम नहीं लिखा जाता है. अब आप ही बताइए, जब मास्टर नाम नहीं लिखेेंगे तो हमारे बच्चे कहां पढ़ेंगे? रही बात इस महल्ले की तो यहां सरकारी स्कूल है नहीं, और जो स्कूल है भी वह हमारी चादर से बाहर है.’’

एकएक कर के कई वृद्ध, लड़के, लड़कियां और औरतें वहां जमा हो गए. कुछ औरतें अपनेअपने घर की खिड़कियों से झांक रही थीं. स्मिता ने रजिस्टर बंद करते हुए कहा, ‘‘कल आप फिर स्कूल जाइए, अगर तब भी वह नाम लिखने से मना करें तो उन से कहिए कि कारण लिख कर दें.’’

‘‘ठीक है.’’

एकाएक धूल का तेज झोंका स्मिता से टकराया तो उस ने अपनेआप को संभाला. फिर एकएक कर के सभी बच्चों का नाम, जाति, उम्र, पिता का नाम, स्कूल आदि अपने रजिस्टर में लिख लिया.

बगल के खंडहरनुमा मकान में उसे जो औरत मिली वह उम्र में 35-40 के बीच की थी. चेहरा एनेमिक था. स्मिता ने उस से सवाल किया, ‘‘आप के कितने बच्चे हैं?’’

अपने आंचल को मुंह में दबाए औरत 11 बोल कर हंस पड़ी.

स्मिता ने मन ही मन सोचा, बाप रे, 11 बच्चे, वह भी इस महंगाई के जमाने में. क्या होगा इस देश का? पर प्रत्यक्ष में फिर पूछा, ‘‘पढ़ते कितने हैं?’’

‘‘एक भी नहीं, क्या करेंगे पढ़ कर? आखिर करनी तो इन्हें मजदूरी ही है.’’

‘‘बहनजी, आप ऐसा क्यों सोचती हैं? पढ़ाई भी उतनी ही जरूरी है जितना कि कामधंधा. आखिर बच्चों को स्कूल भेजने में आप को नुकसान ही क्या है? उलटे बच्चों को स्कूल भेजेंगी तो हर महीने उन्हें खाने को चावल और साल में 300 रुपए भी मिलेंगे.’’

चेचक के दाग वाली एक अन्य औरत तमतमाए स्वर में बोली, ‘‘यह सब कहने की बात है कि हर महीने चावल मिलेगा. अरे, मेरे लड़के को न तो कभी चावल मिला और न ही 300 रुपए.’’

‘‘यह कैसे हो सकता है? आप का लड़का पढ़ता किस स्कूल में है?’’

‘‘अरी, ओ रिहाना… कहां मर गई रे?’’

‘‘आई, अम्मी.’’

‘‘बता, उस पीपल वाले स्कूल का क्या नाम है?’’

वह सोचती हुई बोली, ‘‘कन्या माध्यमिक विद्यालय.’’

स्मिता ने अपने रजिस्टर में कुछ लिखते हुए पूछा, ‘‘आप ने कभी उस स्कूल के प्रिंसिपल से शिकायत की?’’

‘‘तुम पूछती हो शिकायत की. अरे, एक बार नहीं, मैं ने कई बार की, फिर भी कोई सुनवाई नहीं हुई. इसीलिए मैं ने उस की पढ़ाई ही बंद करवा दी.’’

‘‘इस से क्या होगा, बहनजी.’’

स्मिता के इस प्रश्न पर उस ने उसे हिकारत भरी नजरों से देखा और बोली, ‘‘कुछ भी हो अब मुझे पढ़ाई करानी ही नहीं, वैसे भी पढ़ाई में रखा ही क्या है? आज मेरे लड़के को देखो, 20 रुपए रोज कमाता है.’’

स्मिता उन की बातों को रजिस्टर में उतार कर आगे बढ़ गई. अचानक तीखी बदबू उस की नाक में उतर आई. चेहरे पर कई रेखाएं उभर आई थीं. एक अधनंगा लड़का मरे हुए कुत्ते को रस्सी के सहारे खींचे लिए जा रहा था और पीछेपीछे कुछ अधनंगे बच्चे शोर मचाते हुए चले जा रहे थे. उस ने मुंह को रूमाल से ढंक लिया.

मकान का दरवाजा खुला था. चारपाई पर एक दुबलपतला वृद्ध लेटा था. सिरहाने ही एक वृद्धा बैठी पंखा झल रही थी. स्मिता ने दरवाजे के पास जा कर पूछा, ‘‘मांजी, आप के यहां परिवार में कितने लोग हैं.’’

‘‘इस घर में हम दोनों के अलावा कोई नहीं है,’’ उस वृद्धा का स्वर नम था.

‘‘क्यों, आप के लड़के वगैरह?’’

‘‘वह अब यहां नहीं रहते और क्या करेंगे रह कर भी, न तो अब हमारे पास कोई दौलत है न ही पहले जैसी शक्ति.’’

‘‘मांजी, बाबा का नाम क्या है?’’

उस वृद्धा ने अपना हाथ उस की ओर बढ़ा दिया. स्मिता की निगाहें उस गुदे हुए नाम पर जा टिकीं, ‘‘कृष्ण चंदर वर्मा,’’ उस के मुंह से शब्द निकले तो वृद्धा ने अपना सिर हिला दिया.

‘‘अच्छा, मांजी,’’ कहती हुई स्मिता सामने की गली की ओर मुड़ गई. वह बारबार अपने चेहरे पर फैली पसीने की बूंदों को रूमाल से पोंछती. शरीर पसीने से तरबतर था. उस की चेतना में एकसाथ कई सवाल उठे कि क्या हो गया है आज के इनसान को, जो अपने ही मांबाप को बोझ समझने लगा है, जबकि मांबाप कभी भी अपने बच्चों को बोझ नहीं समझते?’’

स्मिता सोचती हुई चली जा रही थी. कुछ आवाजें उस के कानों में खनकने लगीं, ‘अरे, सुना, चुरचुर की अम्मां, खिलावन बंगाल से कोई औरत लाया है और उसे 7 हजार रुपए में बेच रहा है.’

आवाज धीमी होती जा रही थी. क्योंकि कड़ी धूप की वजह से उस के कदम तेज थे. वह अपनी रफ्तार बनाए हुए थी, ‘आज औरत सिर्फ सामान बन कर रह गई है, जो चाहे मूल्य चुकाए और ले जाए,’  वह बुदबुदाती हुई सामने के दरवाजे की तरफ बढ़ गई.

तभी पीछे से एक आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘आप को किस से मिलना है. मम्मी तो घर पर नहीं हैं?’’

‘‘आप तो हैं. क्या नाम है आप का और किस क्लास में पढ़ते हैं?’’

‘‘मेरा नाम उदय सोनी है और मैं कक्षा 4 में पढ़ता था.’’

‘‘क्या मतलब, अब आप पढ़ते नहीं हैं?’’

‘‘नहीं, मम्मीपापा में झगड़ा होता था  और एक दिन मम्मी घर छोड़ कर यहां चली आईं,’’ उस बच्चे ने रुंधे स्वर में बताया.

‘कैसे मांबाप हैं जो यह भी नहीं सोचते कि उन के झगड़े का बच्चे पर क्या प्रभाव पड़ेगा?’ स्मिता ने सोचा फिर पूछा, ‘‘पर सुनो बेटा, आप के पापा का क्या नाम है?’’

उस बच्चे का स्वर ऊंचा था, ‘‘पापा का नहीं, आप मम्मी का नाम लिखिए, बीना लता,’’ इतना बता कर वह चला गया.

स्मिता के आगे अब एक नया दृश्य था. कूड़े के एक बड़े से ढेर पर 6-7 साल के कुछ लड़के झुके हुए उंगलियों से कबाड़ खोज रहे थे. दुर्गंध पूरे वातावरण में फैल रही थी. वहीं दाईं ओर की दीवार पर बड़ेबड़े अक्षरों में लिखा था, ‘यह है फील गुड.’ स्मिता के मस्तिष्क में कई प्रश्न उठे, ‘जिन बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं उन के हाथों में उन के मांबाप ने कबाड़ का थैला थमा दिया. कैसे मांबाप हैं? सिर्फ पैदा करना जानते है.’ किंतु वह केवल सोच सकती थी इन परिस्थितियों को सुधारने की जिन के पास शक्ति व सामर्थ्य है वह तो ऐसा सोचना भी नहीं चाहते.

हवा अब भी आग बरसा रही थी. स्मिता को रहरह कर अपने बच्चे की ंिचंता सता रही थी. मगर नौकरी के आगे वह बेबस थी. सामने से एक जनाजा आता नजर आया. वह किनारे हो गई. जनाजा भीड़ को खींचे लिए जा रहा था.

कुछ लोग सियापे कर रहे थे. नाटे कद की स्त्री कह रही थी, ‘बेचारी, आदमी का इंतजार करतेकरते मर गई, बेहतर होता कि वह विधवा ही होती.’

‘तुम ठीक बोलती हो, भूरे की अम्मां. जो आदमी महीनों अपने बीवी- बच्चों की कोई खोजखबर न ले वह कोई इनसान है? यह भी नहीं सोचता कि औरत जिंदा भी है या मर गई.’

‘अरी बूआ, तुम भी किस ऐयाश की बात करती हो. वह तो सिर्फ औरत को भोगना जानता था. 9 बच्चे क्या कम थे? अरे, औरत न हुई कुतिया हो गई. मुझे तो बेचारे इन मासूमों की चिंता हो रही है.’

‘किसी ने उस के पति को खबर की?’ एक दाढ़ी वाले ने आ कर पूछा.

‘अरे भाई, उस का कोई एक अड््डा हो तो खबर की जाए.’

एकएक कर सभी की बातें स्मिता के कानों में उतरती रहीं. वह सोचने पर मजबूर हो गई कि औरत की जिंदगी भी कोई जिंदगी है. वह तो सिर्फ मर्दों के हाथों की कठपुतली है जिस ने जब जहां चाहा खेला, जब जहां चाहा ठुकरा दिया.

प्यास के कारण स्मिता का गला सूख रहा था. उस ने सोचा कि वह अगले दरवाजे पर पानी का गिलास अवश्य मांग लेगी. उस के कदम तेजी से बढ़े जा रहे थे.

धूप दैत्य के समान उस के जिस्म को जकड़े हुए थी. उस ने एक बार फिर अपने चेहरे को रूमाल से पोंछा. उत्तर की ओर 1 वृद्धा, 2 लड़के बैठे बीड़ी का कश ले रहे थे.

‘‘अम्मां, यही आंटी मुझे पढ़ाती हैं,’’ दरवाजे से लड़के का स्वर गूंजा.

इस से पहले कि स्मिता कुछ बोलती, एक भारी शरीर की औरत नकाब ओढ़ती हुई बाहर निकली और तमतमा कर बोली, ‘‘एक तो तुम लोग पढ़ाती नहीं हो, ऊपर से मेरे लड़के को फेल करती हो?’’

उस औरत के शब्दबाणों ने स्मिता की प्यास को शून्य कर दिया.

‘‘बहनजी, जब आप का लड़का महीने में 4 दिन स्कूल जाएगा तो आप ही बताइए वह कैसे पास होगा?’’

‘‘मास्टराइन हो कर झूठ बोलती हो. अरे, मैं खुद उसे रोज स्कूल तक छोड़ कर आती थी.’’

‘‘बहनजी, आप का कहना सही है, मगर मेरे रजिस्टर पर वह गैरहाजिर है.’’

‘‘तो, गैरहाजिर होने से क्या होता है,’’ इतना कहती हुई वह बाहर चली गई.

खिन्न स्मिता के मुंह से स्वत: ही फूट पड़ा कि स्कूल भेजने का यह अर्थ तो नहीं कि सारी की सारी जिम्मेदारी अध्यापक की हो गई, मांबाप का भी तो कुछ फर्ज बनता है.

स्मिता प्यास से व्याकुल हो रही थी. उस ने चारों ओर निगाहें दौड़ाईं, तभी उस की नजर एक दोमंजिले मकान पर जा टिकी. वह उस मकान के चबूतरे पर जा चढ़ी. स्मिता ने घंटी दबा दी. कुछ पल बाद दरवाजा खुला और एक वृद्ध चश्मा चढ़ाते हुए बाहर निकले. शरीर पर बनियान और पायजामा था.

वृद्ध ने पूछा, ‘‘आप को किस से मिलना है?’’

‘‘बाबा, मैं बालगणना के लिए आई हूं. क्या मुझे एक गिलास पानी मिलेगा?’ स्मिता ने संकोचवश पूछा.

‘‘क्यों नहीं, यह भी कोई पूछने वाली बात है. आप अंदर चली आइए.’’

स्मिता अंदर आ गई. उस की निगाहें कमरे में दौड़ने लगीं. वहां एक कीमती सोफा पड़ा था. उस के सामने रखे टीवी और टेपरिकार्डर मूक थे. कमरे की दीवारें मदर टेरेसा, महात्मा गांधी, ओशो, रवींद्रनाथ टैगोर की तसवीरों से चमक रही थीं. दाईं तरफ की मेज पर कुछ साहित्यिक पुस्तकों के साथ हिंदी, उर्दू और अंगरेजी के अखबार बिखरे थे.

स्मिता ने खडे़खडे़ सोचा कि लगता है बाबा को पढ़ने का बहुत शौक है.

‘‘तुम खड़ी क्यों हो बेटी, बैठो न,’’ कह कर वृद्ध ने दरवाजे की ओर बढ़ कर उसे बंद किया और बोले, ‘‘दरअसल, यहां कुत्ते बहुत हैं, घुस आते हैं. तुम बैठो, मैं अभी पानी ले कर आता हूं. घर में और कोई है नहीं, मुझे ही लाना पड़ेगा. तुम संकोच मत करो बेटी, मैं अभी आया,’ कहते हुए वृद्ध ने स्मिता को अजब नजरों से देखा और अंदर चले गए.

उन के अंदर जाते ही टीवी चल पड़ा. स्मिता ने देखा टीवी स्क्रीन पर एक युवा जोड़ा निर्वस्त्र आलिंगनबद्ध था. स्मिता के शरीर में एक बिजली सी दौड़ गई. उस की प्यास गायब हो गई. घबरा कर उठी और दरवाजे को खोल कर बाहर की ओर भागी. वह बुरी तरह हांफ रही थी और उस का दिल तेजी से धड़क रहा था. जैसे अभी किधर से भी आ कर वह बूढ़ा उसे अपने चंगुल में दबोच लेगा और वह कहीं भाग न सकेगी.

‘‘सोच क्या रही हो? जाओ, और जा कर इस रिपोर्ट को ठीक कर के लाओ. मुझे तथ्यों पर आधारित नहीं, शासन की नीतियों पर आधारित रिपोर्र्ट चाहिए.’’

स्मिता चौंकी, ‘‘जी मैम, मैं समझ गई,’’ वह चली तो उस के कदम बोझिल थे और मन अशांत.

Best Family Drama : सत्ता की भूख में जब टूटा परिवार

Best Family Drama: रिटायरमैंट के बाद अपने ही जन्मस्थान में जा कर बसने का मेरा अनमोल सपना था. जहां पैदा हुआ, जहां गलियों में खेला व बड़ा हुआ, वह जगह कितनी ही यादों को जिंदा रखे है. कक्षा 12 तक पढ़ने के बाद जो अपना शहर छोड़ा तो बस मुड़ कर देख ही नहीं पाया. नौकरी सारा भारत घुमाती रही और मैं घूमता रहा. जितनी दूर मैं अपने शहर से होता गया उतना ही वह मेरे मन के भीतर कहीं समाता गया. छुट्टियों में जब घर आते तब सब से मिलने जाते रहे. सभी आवभगत करते रहे, प्यार और अपनत्व से मिलते रहे. कितना प्यार है न मेरे शहर में. सब कितने प्यार से मिलते हैं, सुखदुख पूछते हैं. ‘कैसे हो?’ सब के होंठों पर यही प्रश्न होता है.

रिटायरमैंट में सालभर रह गया. बच्चों का ब्याह कर, उन के अपनेअपने स्थानों पर उन्हें भेज कर मैं ने गंभीरता से इस विषय पर विचार किया. लंबी छुट्टी ले कर अपने शहर, अपने रिश्तेदारों के साथ थोड़ाथोड़ा समय बिता कर यह सर्वेक्षण करना चाहा कि रहने के लिए कौन सी जगह उपयुक्त रहेगी, घर बनवाना पड़ेगा या बनाबनाया ही कहीं खरीद लेंगे.

मुझे याद है, पिछली बार जब मैं आया था तब विजय चाचा के साथ छोटे भाई की अनबन चल रही थी. मैं ने सुलह करवा कर अपना कर्तव्य निभा लिया था. छोटी बूआ और बड़ी बूआ भी ठंडा सा व्यवहार कर रही थीं. मगर मेरे साथ सब ने प्यार भरा व्यवहार ही किया था. अच्छा नहीं लगा था तब मुझे चाचाभतीजे का मनमुटाव.

इस बार भी कुछ ऐसा ही लगा तो पत्नी ने समझाया, ‘‘जहां चार बरतन होते हैं तो वे खड़कते ही हैं. मैं तो हर बार देखती हूं. जब भी घर आओ किसी न किसी से किसी न किसी का तनाव चल रहा होता है. 4 साल पहले भी विजय चाचा के परिवार से अबोला चल रहा था.’’
‘‘लेकिन हम तो उन से मिलने गए न. तुम चाची के लिए साड़ी लाई थीं.’’

‘‘तब छोटी का मुंह सूज गया था. मैं ने बताया तो था आप को. साफसाफ तो नहीं मगर इतना इशारा आप के भाई ने भी किया था कि जो उस का रिश्तेदार है वह चाचा से नहीं मिल सकता.’’
‘‘अच्छा? मतलब मेरा अपना व्यवहार, मेरी अपनी बुद्धि गई भाड़ में. जिसे छोटा पसंद नहीं करेगा उसे मुझे भी छोड़ना पड़ेगा.’’

‘‘और इस बार छोटे का परिवार विजय चाचा के साथ तो घीशक्कर जैसा है. लेकिन बड़ी बूआ के साथ नाराज चल रहा है.’’
‘‘वह क्यों?’’

‘‘आप खुद ही देखसुन लीजिए न. मैं अपने मुंह से कुछ कहना नहीं चाहती. कुछ कहा तो आप कहेंगे कि नमकमिर्च लगा कर सुना रही हूं.’’

पत्नी का तुनकना भी सही था. वास्तव में आंखें बंद कर के मैं किसी भी औरत की बात पर विश्वास नहीं करता, वह चाहे मेरी मां ही क्यों न हो. अकसर औरतें ही हर फसाद और कलहक्लेश का बीज रोपती हैं. 10 भाई सालों तक साथसाथ रहते हैं लेकिन 2 औरतें आई नहीं कि सब तितरबितर. मायके में बहनों का आपस में झगड़ा हो जाएगा तो जल्दी ही भूल कर माफ भी कर देंगी और समय पड़ने पर संगसंग हो लेंगी लेकिन ससुराल में भाइयों में अनबन हो जाए तो उस आग में सारी उम्र घी डालने का काम करेंगी. अपनी मां को भी मैं ने अकसर बात घुमाफिरा कर करते देखा है.

नौकरी के सिलसिले में लगभग 100-200 परिवारों की कहानी तो बड़ी नजदीक से देखीसुनी ही है मैं ने. हर घर में वही सब. वही अधिकार का रोना, वही औरत का अपने परिवार को ले कर सदा असुरक्षित रहना. ज्यादा झगड़ा सदा औरतें ही करती हैं.

मेरी पत्नी शुभा यह सब जानती है इसीलिए कभी कोई राय नहीं देती. मेरे यहां घर बना कर सदा के लिए रहने के लिए भी वह तैयार नहीं है. इसीलिए चाहती है लंबा समय यहां टिक कर जरा सी जांचपड़ताल तो करूं कि दूर के ढोल ही सुहावने हैं या वास्तव में यहां पे्रम की पवित्र नदी, जलधारा बहती है. कभीकभी कोई आया और उस से आप ने लाड़प्यार कर लिया, उस का मतलब यह तो नहीं कि लाड़प्यार करना ही उन का चरित्र है. 10-15 मिनट में किसी का मन भला कैसे टटोला जा सकता है. हमारे खानदान के एक ताऊजी हैं जिन से हमारा सामना सदा इस तरह होता रहा है मानो सिर पर उन की छत न होती तो हम अनाथ  ही होते. सारे काम छोड़छाड़ कर हम उन के चरणस्पर्श करने दौड़ते हैं. सब से बड़े हैं, इसलिए छोटीमोटी सलाह भी उन से की जाती है. उम्रदराज हैं इसलिए उन की जानपहचान का लाभ भी अकसर हमें मिलता है. राजनीति में भी उन का खासा दखल है जिस वजह से अकसर परिवार का कोई काम रुक जाता है तो भागेभागे उन्हीं के पास जाते हैं हम, ‘ताऊजी यह, ताऊजी वह.’

हमें अच्छाखासा सहारा लगता है उन का. बड़ेबुजुर्ग बैठे हों तो सिर पर एक आसमान जैसी अनुभूति होती है और वही आसमान हैं वे ताऊजी. हमारे खानदान में वही अब बड़े हैं. उन का नाम हम बड़ी इज्जत, बड़े सम्मान से लेते हैं. छोटा भाई इस बार कुछ ज्यादा ही परेशान लगा. मैं ताऊजी के लिए शाल लाया था उपहार में. शुभा से कहा कि वह शाम को तैयार रहे, उन के घर जाना है. छोटा भाई मुझे यों देखने लगा, मानो उस के कानों में गरम सीसा डाल दिया हो किसी ने. शायद इस बार उन से भी अनबन हो गई हो, क्योंकि हर बार किसी न किसी से उस का झगड़ा होता ही है.

‘‘आप का दिमाग तो ठीक है न भाई साहब. आप ताऊ के घर शाल ले कर जाएंगे? बेहतर है मुझे गोली मार कर मुझ पर इस का कफन डाल दीजिए.’’
स्तब्ध तो रहना ही था मुझे. यह क्या कह रहा है, छोटा. इस तरह क्यों?
‘‘बाहर रहते हैं न आप, आप नहीं जानते यहां घर पर क्याक्या होता है. मैं पागल नहीं हूं जो सब से लड़ता रहता हूं. मुकदमा चल रहा है विजय चाचा का और मेरा ताऊ के साथ. और दोनों बूआ उन का साथ दे रही हैं. सबकुछ है ताऊ के पास. 10 दुकानें हैं, बाजार में 4 कोठियां हैं, ट्रांसपोर्ट कंपनी है, शोरूम हैं. औलाद एक ही है. और कितना चाहिए इंसान को जीने के लिए?’’

‘‘तो? सच है लेकिन उन के पास जो है वह उन का अपना है. इस में हमें कोई जलन नहीं होनी चाहिए.’’
‘‘हमारा जो है उसे तो हमारे पास रहने दें. कोई सरकारी कागज है ताऊ के पास. उसी के बल पर उन्होंने हम पर और विजय चाचा पर मुकदमा ठोंक रखा है कि हम दोनों का घर हमारा नहीं है, उन का है. नीचे से ले कर ऊपर तक हर जगह तो ताऊ का ही दरबार है. हर वकील उन का दोस्त है और हर जज, हर कलैक्टर उन का यार. मैं कहां जाऊं रोने? बच्चा रोता हुआ बाप के पास आता है. मेरा तो गला मेरा बाप ही काट रहा है. ताऊ की भूख इतनी बढ़ चुकी है कि …’’

आसमान से नीचे गिरा मैं. मानो समूल अस्तित्व ही पारापारा हो कर छोटेछोटे दानों में इधरउधर बिखर गया. शाल हाथ से छूट गया. समय लग गया मुझे अपने कानों पर विश्वास करने में. क्या कभी मैं ऐसा कर पाऊंगा छोटे के बच्चों के साथ? करोड़ों का मानसम्मान अगर मुझे मेरे बच्चे दे रहे होंगे तो क्या मैं लाखों के लिए अपने ही बच्चों के मुंह का निवाला छीन पाऊंगा कभी? कितना चाहिए किसी को जीने के लिए, मैं तो आज तक यही समझ नहीं पाया. रोटी की भूख और 6 फुट जगह सोने को और मरणोपरांत खाक हो जाने के बाद तो वह भी नहीं. क्यों इतना संजोता है इंसान जबकि कल का पता ही नहीं. अपने छोटे भाई का दर्द मैं ही समझ नहीं पाया. मैं भी तो कम दोषी नहीं हूं न. मुझे उस की परेशानी जाननी तो चाहिए थी.
मन में एक छोटी सी उम्मीद जागी. शाल ले कर मैं और शुभा शाम ताऊजी के घर चले ही गए, जैसे सदा जाते थे इज्जत और मानसम्मान के साथ. स्तब्ध था मैं उन का व्यवहार देख कर.
‘‘भाई की वकालत करने आए हो तो मत करना. वह घर और विजय का घर मेरे पिता ने मेरे लिए खरीदा था.’’
‘‘आप के पिता ने आप के लिए क्या खरीदा था, क्या नहीं, उस का पता हम कैसे लगाएं. आप के पिता हमारे पिता के भी तो पिता ही थे न. किसी पिता ने अपनी किस औलाद को कुछ भी नहीं दिया और किस को इतना सब दे दिया, उस का पता कैसे चले?’’
‘‘तो जाओ, पता करो न. तहसील में जाओ… कागज निकलवाओ.’’
‘‘तहसीलदार से हम क्या पता करें, ताऊजी. वहां तो चपरासी से ले कर ऊपर तक हर इंसान आप का खरीदा हुआ है. आज तक तो हम हर समस्या में आप के पास आते रहे. अब जब आप ही समस्या बन गए तो कहां जाएंगे? आप बड़े हैं. मेरी भी उम्र  60 साल की होने को आई. इतने सालों से तो वह घर हमारा ही है, आज एकाएक वह आप का कैसे हो गया? और माफ कीजिएगा, ताऊजी, मैं आप के सामने जबान खोल रहा हूं. क्या हमारे पिताजी इतने नालायक थे जो दादाजी ने उन्हें कुछ न दे कर सब आप को ही दे दिया और विजय चाचा को भी कुछ नहीं दिया?’’
‘‘मेरे सामने जबान खोलना तुम्हें भी आ गया, अपने भाई की तरह.’’
‘‘मैं गूंगा हूं, यह आप से किस ने कह दिया, ताऊजी? इज्जत और सम्मान करना जानता हूं तो क्या बात करना नहीं आता होगा मुझे. ताऊजी, आप का एक ही बच्चा है और आप भी कोई अमृत का घूंट पी कर नहीं आए. यहां की अदालतों में आप की चलती है, मैं जानता हूं मगर प्रकृति की अपनी एक अदालत है, जहां हमारे साथ अन्याय नहीं होगा, इतना विश्वास है मुझे. आप क्यों अपने बच्चों के लिए बद्दुआओं की लंबीचौड़ी फेहरिस्त तैयार कर रहे हैं? हमारे सिर से यदि आप छत छीन लेंगे तो क्या हमारा मन आप का भला चाहेगा?’’
‘‘दिमाग मत चाटो मेरा. जाओ, तुम से जो बन पाए, कर लो.’’
‘‘हम कुछ नहीं कर सकते, आप जानते हैं, तभी तो मैं समझाने आया हूं, ताऊजी.’’
ताऊजी ने मेरा लाया शाल उठा कर दहलीज के पार फेंक दिया और उठ कर अंदर चले गए, मानो मेरी बात भी सुनना अब उन्हें पसंद नहीं. हम अवाक् खड़े रहे. पत्नी शुभा कभी मुझे देखती और कभी जाते हुए ताऊजी की पीठ को. अपमान का घूंट पी कर रह गए हम दोनों.
85 साल के वृद्ध की आंखों में पैसे और सत्ता के लिए इतनी भूख. फिल्मों में तो देखी थी, अपने ही घर में स्वार्थ का नंगा नाच मैं पहली बार देख रहा था. सोचने लगा, मुझे वापस घर आना ही नहीं चाहिए था. सावन के अंधे की तरह यह खुशफहमी तो रहती कि मेरे शहर में मेरे अपनों का आपस में बड़ा प्यार है.
उस रात बहुत रोया मैं. छोटे भाई और विजय चाचा की लड़ाई में मैं भावनात्मक रूप से तो उन के साथ हूं मगर उन की मदद नहीं कर सकता क्योंकि मैं अपने भारत देश का एक आम नागरिक हूं जिसे दो वक्त की रोटी कमाना ही आसान नहीं, वह गुंडागर्दी और बदमाशी से सामना कैसे करे. बस, इतना ही कह सकता हूं कि ताऊ जैसे इंसान को सद्बुद्धि प्राप्त हो और हम जैसों को सहने की ताकत, क्योंकि एक आम आदमी सहने के सिवा और कुछ नहीं कर सकता.

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