Online Hindi Story : जूमजूम झूम वाला

 Online Hindi Story : रोहित ने शान से अपना नया स्मार्टफोन निकाल कर अपने दोस्तों को दिखाया और बोला, ‘‘यह देखो, पूरे 45 हजार रुपए का है.’’

‘‘पूरे 45 हजार का?’’ रमन की आंखें आश्चर्य से फैल गईं, ‘‘आखिर ऐसा क्या खास है इस मोबाइल में?’’

‘‘6 इंच स्क्रीन, 4 जीबी रैम, 32 जीबी आरओएम, 16 एमपी ड्यूल सिम, 13 मेगापिक्सल कैमरा…’’ रोहित अपने नए फोन की खासीयतें बताने लगा.

रोहित के पापा शहर के बड़े व्यापारी थे. रोहित मुंह में सोने का चम्मच ले कर पैदा हुआ था. उस की जेब हमेशा नोटों से भरी रहती थी इसलिए वह खूब ऐश करता था.

रोहित के पापा भी यह जानते थे, लेकिन उन्होंने कभी रोहित को टोका नहीं. उन का मानना था कि कुछ समय बाद तो रोहित को ही उन का व्यापार संभालना है इसलिए अभी जितनी मौजमस्ती करनी है कर ले.

पापा की छूट का रोहित पर बुरा असर पड़ रहा था. वह पढ़नेलिखने के बजाय नएनए दोस्त बनाने और मस्ती करने में लगा रहता.

आज भी वही हो रहा था. क्लास बंक कर के रोहित कैंटीन में दोस्तों के साथ बैठा अपनी शेखी बघारता हुआ उन्हें अपने नए मोबाइल की खूबियां बता रहा था. उस के दोस्त भी उस के मोबाइल की तारीफ के पुल बांधने में जुटे थे.

‘‘यार, मानना पड़ेगा, तुम्हारे पापा तुम्हें बहुत प्यार करते हैं. तभी तो तुम्हारी हर ख्वाहिश पूरी कर देते हैं,’’ सनी ने मोबाइल को देखते हुए कहा.

‘‘क्या बात करते हो यार, मेरी तो ज्यादातर ख्वाहिशें अधूरी हैं,’’ रोहित बोला.

‘‘कार, सूट, कीमती घडि़यां, विदेशी चश्मे और नोटों की गड्डियां सबकुछ तो तुम्हें हासिल है जिन के बारे में हम लोग सोच भी नहीं सकते. इस के बाद भी तुम्हारी कौन सी ख्वाहिश अधूरी रह गई है?’’ उमंग ने जानना चाहा.

‘‘कार, माईफुट. एक कार पकड़ा दी और पिछले 2 साल से उसे ढो रहा हूं,’’ रोहित ने बुरा सा मुंह बनाया. फिर लंबी सांस भरते हुए बोला, ‘‘मेरी तो ख्वाहिश है कि मेरा अपना एक प्राइवेट जैट हो, जिस पर बैठ कर मैं वीकऐंड मनाने यूरोप जाऊं. स्विट्जरलैंड में अपना एक खूबसूरत सा विला हो, जहां गर्लफ्रैंड के साथ छुट्टियां मनाने जाऊं.’’

‘‘यार, तुम्हारे पापा इतने अमीर हैं. तुम्हारा यह ख्वाब वे एक दिन जरूर पूरा करेंगे,’’ रमन ने कहा.

‘‘तुम्हारे मुंह में घीशक्कर,’’ रोहित ने रमन की पीठ थपथपाई, फिर बैरे को बुला कर सभी के लिए एकएक बर्गर और कोल्ड ड्रिंक का और्डर दिया, जबकि एकएक पिज्जा वे पहले ही खा चुके थे.

‘‘अरे भाई, किस चीज की दावत चल रही है,’’ तभी हेमंत ने कैंटीन में प्रवेश करते हुए पूछा.

‘‘रोहित 45 हजार का नया मोबाइल फोन लाया है. ऐसा मोबाइल पूरे शहर में किसी के पास नहीं होगा,’’ दीपक ने कोल्ड ड्रिंक का घूंट पीने के बाद मुंह पोंछते हुए बताया.

‘‘ऐसी क्या खास बात है इस में?’’ हेमंत ने करीब आ कर एक कुरसी पर बैठते हुए पूछा, तो रोहित से पहले रमन उस की खूबियां गिनाने लगा.

हेमंत ने मोबाइल हाथ में ले कर गौर से देखा. फिर बोला, ‘‘यार, तुम्हारे पिछले स्मार्टफोन में भी तो यही सब फीचर्स थे.’’

‘‘हां, लेकिन यह 4जी फ्रैंडली है और इस का कैमरा जूम वाला है. इस से तुम यहीं बैठेबैठे फोन के कैमरे को जूम कर दूर का फोटो भी साफसाफ खींच सकते हो और कोई तुम्हें देख भी नहीं पाएगा,’’ रोहित ने रहस्यमय अंदाज में फुसफुसाते हुए बताया.

‘‘कोई देख नहीं पाएगा तो उस से क्या फायदा होगा?’’ हेमंत ने पूछा.

‘‘यार, तू भी न पूरा घोंचू है,’’ रोहित ने कहा और फिर आगे बढ़ कर हेमंत की जेब से उस का मोबाइल निकाल कर उस के हाथ में रखते हुए बोला, ‘‘वह देख, तेरी क्लास की लड़की आ रही है. जा उस का एक फोटो खींच ला.’’

‘‘अबे, मरवाएगा क्या? कोई फोटो खींचते हुए देख लेगा तो जूते तो पड़ेंगे ही कालेज से भी निकाल दिया जाऊंगा,’’ हेमंत ने हड़बड़ाते हुए अपना मोबाइल अपनी जेब में वापस रख लिया.

रोहित ने ठहाका लगाया और बोला, ‘‘बेटा, यही खास बात है मेरे फोन में कि यहीं बैठेबैठे जूम कर के किसी का भी फोटो खींच लो और उसे व्हाट्सऐप ग्रुप पर डाल दो ताकि सारे दोस्त उसे देख कर झूम सकें.’’

‘‘अरे वाह, तब तो इस फोन का नाम जूमजूम झूम वाला रख दो,’’ हेमंत का चेहरा खिल उठा. फिर वह खुशामदी स्वर में बोला, ‘‘यार, एक मिनट के लिए अपना फोन देना जरा इस लड़की का एक फोटो खींच लूं. क्लास में तो यह लिफ्ट ही नहीं देती,’’ हेमंत ने एक लड़की की ओर इशारा करते हुए कहा.

‘‘छोड़ न यार. इस का क्या फोटो खींचना. यह लड़की तो रोज वाली है. बगल में जो गर्ल्स कालेज है वहां की लड़कियां बहुत नकचढ़ी हैं. सीधे मुंह बात ही नहीं करतीं. चल उन में से किसी खास पीस का फोटो खींच कर करते हैं कैमरे का उद्घाटन,’’ रोहित ने अपने दिल की बात सब के सामने रखी.

‘‘अरे वाह, आइडिया अच्छा है,’’ हेमंत चहकते हुए बोला, ‘‘ला, यह शुभ काम मैं ही कर दूं. बदले में तुम जो कहोगे कर दूंगा.’’

‘‘चल तू भी क्या याद करेगा,’’ रोहित ने मोबाइल हेमंत को पकड़ाया और बोला, ‘‘बस, एक शर्त है, फोटो जोरदार होना चाहिए. अगर सब को पसंद नहीं आया तो आज के नाश्ते का बिल तुझे भरना होगा.’’

‘‘मंजूर है,’’ हेमंत ने कहा और सभी दोस्तों की ओर इशारा करते हुए बोला, ‘‘चलो, सभी बाउंड्री वाल के पास. जिस का कहोगे उस का फोटो खींच दूंगा.’’

‘‘इतने लोग गर्ल्स कालेज के पास जाएंगे तो पकड़े जाएंगे. तुम अकेले जाओ और चुपचाप फोटो खींच लाओ,’’ रोहित ने समझाया.

‘‘ठीक है,’’ हेमंत ने सिर हिलाया और मोबाइल ले कर सधे कदमों से ऐसे बाहर निकल गया जैसे किसी मोरचे पर जा रहा हो.

उस के कैंटीन से बाहर निकलते ही रोहित ने कहा, ‘‘यह अपने को बहुत तीसमारखां समझता है. आज इसे बकरा बनाना है. यह चाहे जितनी खूबसूरत लड़की का फोटो खींच कर लाए, सब उसे रिजैक्ट कर देना. फिर आज का बिल इसे ही भरना पड़ेगा.’’

यह सुन सभी ने ठहाका लगाया और हेमंत के वापस आने का इंतजार करने लगे.

थोड़ी देर बाद ही रमन, दीपक, उमंग और सनी के मोबाइल पर हेमंत का व्हाट्सऐप मैसेज आया.

‘‘अरे वाह, क्या पटाखा फोटो खींचा है,’’ कहते हुए रमन ने रोहित को फोटो दिखाया तो वह सन्न रह गया. दरअसल, उस कालेज में उस की बहन तान्या भी पढ़ती थी और हेमंत ने उसी का फोटो खींच कर व्हाट्सऐप ग्रुप पर डाल दिया था वह भी उसी के नंबर से.

‘‘अबे, यह क्या कर दिया इस घोंचू ने, मेरी ही बहन का फोटो खींच कर व्हाट्सऐप ग्रुप पर डाल दिया. अब तक तो यह फोटो पचासों लड़कों के पास पहुंच चुका होगा,’’ रोहित ने दोस्तों को बताया तो सभी परेशान हो गए.

‘‘क्या यह तुम्हारी बहन है, ओह नो,’’ कहते हुए सभी ने अपनेअपने मोबाइल जेब में रख लिए.

‘‘मैं इस कमीने को छोडूंगा नहीं,’’ रोहित के जबड़े भिंच गए और आंखें लाल अंगारा हो उठीं.

जैसे ही हेमंत कैंटीन में दाखिल हुआ, उसे देखते ही रोहित तेजी से उस की ओर लपका और उस के चेहरे पर घूंसा जड़ दिया.

‘‘यह क्या मजाक है?’’ हेमंत बोला.

‘‘मजाक तो तू ने किया है, जो अब तुझे बहुत महंगा पड़ने वाला है,’’ गुस्से से कांपते हुए रोहित ने हेमंत पर लातघूंसों की बरसात कर दी.

हेमंत की समझ में ही नहीं आ रहा था कि रोहित उसे मार क्यों रहा है. अचानक हेमंत ने रोहित को पूरी ताकत से धक्का दिया तो वह दूर जा गिरा. फिर हेमंत उसे घूरते हुए बोला, ‘‘तू पागल हो गया है क्या, जो मारपीट कर रहा है. आखिर बात क्या है?’’

‘‘पागल तो तू हो गया है, जो तूने मेरी बहन का फोटो व्हाट्सऐप ग्रुप पर डाला है,’’ रोहित उसे खा जाने वाले लहजे में बोला तो हेमंत की आंखें आश्चर्य से फैल गईं, ‘‘क्या रोहित वह तुम्हारी बहन है. मुझे तो पता नहीं था और न ही मैं उसे पहचानता हूं, उफ, यह क्या हो गया?’’ हेमंत ने अपना सिर पकड़ लिया. उस की आंखों में पाश्चात्ताप साफ झलक रहा था.

वह रोहित के पास पहुंच भर्राए स्वर में बोला, ‘‘रोहित, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई है. तेरी बहन मेरी बहन हुई. मैं ने अपनी बहन को ही बदनाम कर दिया. मुझे माफ कर दे.’’

‘‘यह क्या तमाशा हो रहा है यहां पर?’’ तभी प्रिंसिपल साहब की कड़क आवाज सुनाई पड़ी. मारपीट होते देख कैंटीन का मैनेजर उन्हें बुला लाया था.

‘‘जी, कुछ नहीं. वह हम लोगों का आपसी मामला था,’’ रोहित हड़बड़ाते हुए उठ खड़ा हुआ.

‘‘आपसी मामले इस तरह निबटाए जाते हैं?’’ प्रिंसिपल साहब ने दोनों को डांटा. फिर बोले, ‘‘तुम लोग मेरे औफिस में आओ.’’

रोहित और हेमंत प्रिंसिपल साहब के पीछेपीछे उन के औफिस में गए. पूरी बात सुन कर प्रिंसिपल साहब का चेहरा गंभीर हो गया. उन्होंने फोन कर के फौरन दोनों के पापा को स्कूल में बुला लिया.

‘‘अंकल, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. मुझे नहीं पता था कि वह रोहित की बहन है. अगर पता होता तो उस का फोटो कभी न खींचता,’’ हेमंत ने रोहित के पापा के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा.

‘‘तड़ाक,’’ इस से पहले कि वे कुछ कह पाते हेमंत के पापा उस के गाल पर तमाचा जड़ते हुए चीखे, ‘‘अगर तुझे पता भी होता तो तू किसी दूसरी लड़की का फोटो खींच लेता,  वह भी तो किसी न किसी की बहन होती. शर्म नहीं आती ऐसी हरकत करते हुए.’’

‘‘भाई साहब, गलती इस की नहीं बल्कि मेरी है. मैं ने ही रोहित को इतनी छूट दे रखी है कि यह अच्छेबुरे का भेद भूल गया है. आज इस की बहन का फोटो खिंच गया तो इसे तकलीफ हो रही है, लेकिन यही फोटो किसी और की बहन का होता तो इसे आनंद आ रहा होता,’’ रोहित के पापा ने आगे आ कर हेमंत के पापा का हाथ थाम लिया.

‘‘तुम लोगों को सोचना चाहिए कि जिन लड़कियों के साथ तुम छेड़छाड़ करते हो वे भी किसी न किसी की बहन होती हैं. तुम लोगों की हरकतों से उन्हें कितनी तकलीफ होती होगी, सोचा है कभी?’’ प्रिंसिपल साहब ने भी कड़े स्वर में डांटा.

‘‘सर, हमें माफ कर दीजिए,’’ रोहित ने हाथ जोड़ते हुए कहा.

‘‘हां सर. हम लोग अब ऐसी गलती कभी नहीं करेंगे,’’ हेमंत ने भी हाथ जोड़ कर माफी मांगी.

‘‘लेकिन फोटो वायरल होने से तान्या की जो बदनामी हुई उस का क्या होगा?’’ प्रिंसिपल साहब ने पूछा.

‘‘सर, फोटो मैं ने केवल अपनी क्लास के दोस्तों के ग्रुप पर ही डाला था. मैं अभी सब से हाथ जोड़ कर विनती करूंगा कि मेरी बहन का फोटो डिलीट कर दें,’’ हेमंत ने कहा.

‘‘ठीक है, जल्दी करो,’’ प्रिंसिपल साहब ने आज्ञा दी तो दोनों दौड़ते हुए क्लास में जा कर दोस्तों से फोटो डिलीट करने का आग्रह करने लगे. लेकिन अन्य दोस्तों से मामला पता चलने पर उन्होंने पहले ही ग्रुप से फोटो डिलीट कर दिया था.

‘‘घबराओ नहीं रोहित, तुम्हारी बहन हमारी भी बहन है. हम भी नहीं चाहेंगे कि उस के साथ गलत हो. साथ ही हम ने भी ऐसी छेड़खानी से तोबा करने की सोच ली है,’’ रमन सब की ओर से बोला. अब तक प्रिंसिपल साहब और हेमंत व रोहित के पापा भी क्लास में पहुंच गए थे. दोनों के पापा के चेहरों पर जहां पश्चात्ताप के भाव थे वहीं वे संकल्पित थे कि जरूरत से ज्यादा छूट दे कर बच्चों को बिगाड़ेंगे नहीं. साथ ही यह सुकून भी था कि बच्चों को अपनी गलती का एहसास हो गया है. रोहित और हेमंत की आंखें भी शर्म से झुकी हुई थीं.

मै दोबारा नौकरी करना चाहती हूं, लेकिन पति मना कर रहे हैं….

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल-

मैं 26 वर्षीय विवाहिता व 3 वर्षीय बेटे की मां हूं. विवाह से पूर्व मैं नौकरी करती थी. शादी चूंकि दूसरे शहर में हुई है, इसलिए नौकरी छोड़नी पड़ी. अब मैं चाहती हूं दोबारा नौकरी कर लूं. पति से इस विषय में बात की तो वे मना करने लगे. चूंकि हम यहां अकेले रहते हैं, घर में कोई बड़ा बच्चे को संभालने के लिए नहीं है. बच्चे को क्रैच में छोड़ने के वे सख्त खिलाफ हैं. इस के अलावा उन का कहना है कि जब आर्थिक तौर पर हम सक्षम हैं तो फिर मैं क्यों नौकरी करना चाहती हूं. मैं कैसे समझाऊं कि आर्थिक निर्भरता के लिए नहीं अपनी इच्छा के लिए नौकरी करना चाहती हूं. यदि मैं ने और 2-4 साल यों ही बरबाद कर दिए तो मेरा कैरियर चौपट हो जाएगा. बताएं क्या करूं?

जवाब

शादी के बाद पारिवारिक कारणों से खासकर बच्चों की परवरिश के लिए अधिकांश महिलाएं नौकरी छोड़ देती हैं. उन्हें इस बात का मलाल भी नहीं होता, क्योंकि घरगृहस्थी और बच्चों का लालनपालन अपनेआप में एक फुल टाइम जौब है. दोनों को एकसाथ मैनेज करना, खासकर तब जब बच्चे की देखरेख करने के लिए परिवार का कोई सदस्य न हो, बहुत मुश्किल होता है. जहां तक क्रैच में बच्चे को छोड़ने की बात है, पहले तो अच्छे क्रैच मिलते नहीं और मिल भी जाएं तो भी उतनी अच्छी देखभाल बच्चे की नहीं हो पाती जितनी उस की मां करती है. अत: यदि आप को किसी प्रकार की आर्थिक तंगी नहीं है तो आप को नौकरी के लिए जिद नहीं करनी चाहिए. घर में अतिरिक्त समय में आप अपनी कोई हौबी विकसित या ट्यूशन आदि कर सकती हैं.

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‘‘शादी…यानी बरबादी…’’ जब उस की मां ने उस के सामने उस की शादी की चर्चा छेड़ी तो सुलेखा ने मुंह बिचकाते हुए कहा था, ‘‘मां मुझेशादी नहीं करनी है, मैं हमेशा तुम्हारे साथ रह कर तुम्हारा देखभाल करना चाहती हूं.’’

‘‘नहीं बेटा ऐसा नहीं कहते,’’ मां ने स्नेहभरी नजरों से अपनी बेटी की ओर देखा.

‘‘मां मुझेशादी जैसी रस्मों पर बिलकुल भरोसा नहीं… विवाह संस्था एकदम खोखली हो चुकी है… आप जरा अपनी जिंदगी देखो, शादी के बाद पापा से तुम्हें कौन सा सुख मिला है? पापा ने तो तुम्हें किसी और के लिए तलाक…’’ कहती हुई वह अचानक रुक गई और फिर आंसू भरे नेत्रों से मां की ओर देखने लगी.

मां ने दूसरी तरफ मुंह घुमा अपने आंसुओं को छिपाने की कोशिश करते हुए बोलीं, ‘‘अरे छोड़ो इन बातों को… इस वक्त ऐसी बातें नहीं करते और फिर लड़कियां तो होती ही हैं पराया धन. देखना ससुराल जा कर तुम इतनी खो जाओगी कि अपनी मां की तुम्हें कभी याद भी नहीं आएगी,’’ और फिर बेटी को गले लगा कर उस के माथे को चूम लिया.

मालती अपनी बेटी को बेहद प्यार करती हैं. आज 20 वर्ष हो गए उन्हें अपने पति से अलग हुए, जब मालती का अपने पति से तलाक हुआ था तब सुलेखा सिर्फ 5 वर्ष की थी. तब से ले कर आज तक उन्होंने सुलेखा को पिता और मां दोनों का प्यार दिया. सुलेखा उन की बेटी ही नहीं उन की सुखदुख की साथी भी थी. अपने टीचर की नौकरी से जितना कुछ कमाया वह अपनी बेटी पर ही खर्च किया. अच्छी से अच्छी शिक्षादीक्षा के साथसाथ उस की हर जरूरत का खयाल रखा. मालती ने अपनी बेटी को कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी भले खुद कितना भी कष्ट झेलना पड़ा हो.

विल औफ चेंज : सनफीस्ट मौम्स मैजिक

Will Of Change :  सनफीस्ट मौम्स मैजिक मांओं को इस बात के लिए प्रेरित कर रहा है कि वे ‘विल औफ चेंज’ के साथ बेटियों के लिए इक्वल इनहेरिटेंस की तरफ कदम बढ़ाएं. सदियों पुरानी मान्यता रही है कि ‘बेटियां पराया धन होती हैं’ इस धारणा ने पीढ़ी दर पीढ़ी विरासत के निर्णयों को प्रभावित किया है जिस के कारण अकसर बेटियां अपने माता-पिता की संपत्ति पर दावा किए बिना छोड़ देती हैं. हालांकि 2005 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम ने बेटियों को पैतृक संपत्ति में समान अधिकार देने में महत्त्वपूर्ण प्रगति की है लेकिन फिर भी इस मामले में सामाजिक दृष्टिकोण के विकसित होने की गति धीमी है. आईटीसी के शोध के अनुसार भारत में केवल 7 बेटियों को ही वसीयत के माध्यम से समान संपत्ति का अधिकार प्राप्त होता है. सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों बेटों को ‘स्वाभाविक’ उत्तराधिकारी मानते हुए बेटियों को विरासत से वंचित करते हैं.

आईटीसी के सनफीस्ट मौम्स मैजिक ने इस गहरी जड़ें जमा चुके मुद्दे को पहचाना और अपने नवीनतम अभियान ‘विल औफ चेंज’ के माध्यम से इस के खिलाफ आवाज उठाने के लिए एक साहसिक कदम उठाया. इस का उद्देश्य माताओं को बदलाव की चैंपियन बनने के लिए प्रेरित करना है ताकि उन की बेटियां समानता और न्याय का जश्न मना सकें.

अली हैरिस शेरे, चीफ औपरेटिंग अफसर, बिस्कुट ऐंड केक क्लस्टर, फूड्स डिवीजन, आईटीसी लिमिटेड ने कहा, ‘‘भारत में कई माताओं को अपने माता-पिता से विरासत के संबंध में व्यक्तिगत रूप से असमान व्यवहार का सामना करना पड़ा है. अब उन के पास अपनी बेटियों के लिए सही फैसले ले कर अपने परिवारों में बदलाव लाने का मौका है. विल औफ चेंज के माध्यम से हम माताओं को अपनी बेटियों के अधिकारों के लिए कार्रवाई करने और बदलाव के लिए प्रेरित करने की उम्मीद करते हैं.’’

ओगिल्वी, द्वारा निर्मित, ‘विल औफ चेंज’ अभियान, एक भावनात्मक आह्वान है. मनीष चौधरी और शेफाली शाह की यह लघु फिल्म एक मां-पिता के बीच विरासत पर चर्चा के पावरफुल मोमेंट को उजागर करती है.

सनफीस्ट मौम मैजिक पूरे भारत में माताओं से हैशटैग #momofchnage का उपयोग करके अपना समर्थन देने का आग्रह कर रहा है. इस शक्तिशाली पहल के माध्यम से सनफीस्ट मौम्स मैजिक न केवल विरासत से जुड़ी प्रथाओं में बल्कि लैंगिक समानता के बारे में भी सकारात्मक बदलाव लाने वाली माताओं की एक सामूहिक शक्ति की कल्पना करता है.

इस मुद्दे के बारे में अधिक जानने और समान विरासत का समर्थन करने का संकल्प लेने के लिए www.willofchange.com पर जाएं.

चंडीगढ़ में चर्चित रहा गृहशोभा एम्पावर हर इवेंट

कलाग्राम चंडीगढ़ में 7 दिसम्बर 2024 को दिन में 11 बजे से दिल्ली प्रेस पब्लिकेशन की तरफ से ‘ गृहशोभा एम्पावर हर ‘ इवेंट शानदार आगाज हुआ. प्रतिभागी  महिलाएं बहुत उत्साह में नजर आ रही थीं. हों भी क्यों न गृहशोभा के साथ जुड़ कर उन्हें प्रेरित होने, सीखने और सशक्त बनने का मौका जो मिल रहा था.

गृहशोभा के द्वारा कराए जा रहे ‘ गृहशोभा एम्पावर हर ‘  इवेंट्स का उद्देश्य महिलाओं को स्वास्थ्य, सौंदर्य और फाइनेंसियल प्लानिंग के क्षेत्र में आगे बढ़ने में मदद करना है. स्किनकेयर और हेल्थ टिप्स से लेकर स्मार्ट सेविंग आइडियाज से परिचित कराना है. यह कार्यक्रम महिलाओं को अपना सर्वश्रेष्ठ जीवन जीने के लिए सशक्त बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया . दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, लखनऊ और बैंगलोर , लुधियाना जैसे शहरों के बाद यह इवेंट चंडीगढ़ में आयोजित किया गया.

इस इवेंट के सहयोगी प्रायोजक डाबर खजूर प्राश, ब्यूटी पार्टनर ग्रीन लीफ ब्रिहंस , स्किन केयर पार्टनर ला शील्ड और होम्योपैथी पार्टनर SBL होम्योपैथी थे. इवेंट के दौरान इन के द्वारा  कई तरह के सेशन और गेम्स आयोजित किए गए जिन में प्रतिभागियों को गिफ्ट हैंपर्स भी मिले. .

12 बजे तक पूरा हॉल भर गया था. महिलाओं का स्वागत स्नैक्स और चाय के साथ हुआ. इसके बाद कार्यक्रम की शुरुआत वंदना ने अपने खूबसूरत अंदाज में किया और पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा से दर्शकों को रूबरू कराया.

फर्स्ट सेशन : वुमन हेल्थ और वेलनेस

सबसे पहले डाबर खजूर प्राश द्वारा लाया गया वुमन हेल्थ और वेलनेस सेशन की शुरुआत हुई. इस के तहत डॉ. मधु गुप्ता ने महिलाओं में आयरन की कमी पर विस्तार से बात की. महिलाओं में आयरन की कमी एक आम लेकिन अक्सर अनदेखी की जाने वाली स्वास्थ्य समस्या है. डॉ. मधु गुप्ता  20 वर्षों से अधिक समय से एक अत्यधिक अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टर हैं जो वर्तमान में शक्ति भवन, पंचकुला में कार्यरत हैं। उन्होंने हिमाचल प्रदेश के आरजीजीपीजीए कॉलेज से काया चिकित्सा (चिकित्सा) में एमडी और श्री धनवंतरी आयुर्वेदिक कॉलेज, चंडीगढ़ से आयुर्वेदिक चिकित्सा में स्नातक की डिग्री हासिल की है। वह जीवनशैली संबंधी बीमारियों और ऑटोइम्यून बीमारियों के इलाज में माहिर हैं। उन्होंने महिलाओं में आयरन की कमी की समस्या पर बात की और इसे दूर करने के उपाय भी बताए.

महिलाओं के लिए फाइनेंशियल प्लानिंग और इन्वेस्टमेंट सेशन

इस सेशन में एक्सपर्ट थे देवेंद्र गोस्वामी जिन्हें मनी मैनेजमेंट और फाइनेंसियल प्लानिंग में  21 से अधिक वर्षों का अनुभव है. उन के पास SCD गवर्नमेंट कॉलेज से स्नातक की डिग्री और PCTE से फाइनेंसियल प्लानिंग में मास्टर डिग्री है. उन्होंने शीर्ष बैंकों और बड़ी कंपनियों के साथ काम किया है. वे ब्लूरॉक वेल्थ प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक हैं.

उन्होंने बताया कि महिलाओं के लिए पैसे कमाना और उसे मैनेज करना करना सीखना क्यों जरूरी है. अपनी सैलरी का एक हिस्सा बचाना और उसे सही जगह निवेश करना आर्थिक स्वतंत्रता की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है. निवेश के लिए ‘म्यूचुअल फंड’ में सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान एसआईपी के माध्यम से हर महीने एक छोटी राशि का निवेश किया जा सकता है.  इसके साथ ही साथ जीवन बीमा और चिकित्सा बीमा का महत्व समझाया. इस तरह महिलाएं आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त कर सकती हैं और अपने जीवन को बेहतर बना सकती हैं.
एसबीएल सेशन

होम्योपैथी के क्षेत्र में पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से बीएचएमएस में गोल्ड मेडलिस्ट और ग्रीस से विशेषज्ञता के साथ होम्योपैथी में एमडी पूरा करने वाली डॉ. श्वेता गोयल 5 वर्षों से अधिक समय से होम्योपैथी के माध्यम से पुरानी बीमारियों के रोगियों का इलाज कर रही हैं और बीमारियों को जड़ से ठीक करने पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। वह पंजाब में दो क्लीनिक चलाती हैं. डॉ श्वेता ने महिलाओं को रजोनिवृत्ति यानी मेनोपॉज से जुड़ी महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारियां दीं और बताया कि इस दौरान आने वाली समस्याओं में होम्योपैथी किस तरह कारगर है.

ला शील्ड द्वारा ब्यूटी और स्किन केयर सेशन

इस सेशन के लिए ब्यूटी और स्किन केयर के क्षेत्र में एक्सपर्ट डॉ. बेट्टी नांगिया( बेट्टी होलिस्टिक और स्किन केयर की संस्थापक) ने महिलाओं को जरुरी जानकारियां दीं। डॉ. बेट्टी ने प्राकृतिक रूप से चमकदार, स्वस्थ त्वचा पाने के टिप्स दिए.

इस के साथ इवेंट अपने अंतिम चरण में पहुँच गया. महिलाओं ने भोजन का आनंद लेने के बाद पंजीकरण डेस्क से अपने गुडी बैग लिए और शानदार दिन बिता कर अपने घरों को चली गई .

मैंने परिवार से छिप कर शादी की है, लेकिन कोई भी हमारे रिश्ते को एक्सेप्ट नहींं कर रहा है…

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल

मैं 22 वर्षीय युवती हूं. अपनी मौसी के जेठ के बेटे से प्यार करती हूं. वह भी मुझे प्यार करता है. हम ने सब से छिप कर शादी की है. उस ने मेरी मांग में सिंदूर भरा था और मुझे मंगलसूत्र भी पहनाया था. इस बात के सिर्फ हम दोनों ही साक्षी हैं और कोई इस का गवाह नहीं है. घर में जब हम दोनों की शादी की बात चली तो हम ने उन्हें अपनी इस गुपचुप शादी के बारे में बताया पर इसे किसी ने स्वीकार नहीं किया. लड़के की सगाई कर दी गई है और मेरे घर वाले भी मेरे लिए लड़का ढूंढ़ रहे हैं. हम दोनों के शारीरिक संबंध भी बन चुके हैं. क्या हमें अन्यत्र शादी करनी चाहिए?

जवाब

यदि आप दोनों वास्तव में एकदूसरे से प्रेम करते तो आप अपने घर वालों को विवाह के लिए राजी कर सकते थे. पर आप ने ऐसा नहीं किया. शायद आप दोनों ही इस रिश्ते को ले कर गंभीर नहीं थे. इसीलिए लड़के (आप के बौयफ्रैंड) ने कहीं और सगाई कर ली और आप के घर वाले भी आप के लिए वर तलाश रहे हैं. इसलिए अपने प्रेम संबंध को समाप्त कर दें और भविष्य के बारे में सोचें. रही आप की चोरीछिपे शादी की बात तो इस तरह की शादी की कोई अहमियत नहीं होती. रही बात आप दोनों के अवैध संबंध की तो उसे अपने भावी जीवनसाथी से कतई जाहिर न करें.

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शादी और सेक्स से जुड़ी जिज्ञासाएं शांत करें ऐसे

शादी तय होते ही हर लड़की के मन में जहां एक तरफ अनकही खुशी होती है वहीं दूसरी ओर मन में डर भी रहता है कि न जाने नया घर, वहां के रीतिरिवाज, घर के लोग कैसे होंगे? क्या मैं उस माहौल में सहज महसूस कर पाऊंगी? ऐसे तमाम सवालों के साथसाथ एक अहम पहलू यानी सैक्स जीवन को ले कर भी मन में अनगिनत जिज्ञासाएं होती हैं, जिन के बारे में वह हर बात को शेयर करने वाली मां से भी नहीं पूछ पाती है और न ही भाभी अथवा बहन से.

सैक्स संबंधी जिज्ञासाएं एक विवाहयोग्य लड़की के मन में होना आम बात है. इसी विषय पर बात करते हुए 2 महीने पूर्व विवाह के बंधन में बंधी रीमा कहती है कि विवाह तय होते ही मैं ने मां से पूछा कि मां पहली रात के बारे में सोच कर घबराहट हो रही है, क्या होगा जरा बताइए? तब मां ने झुंझलाते हुए जवाब दिया कि घबराओ नहीं, सब ठीक होगा. जब विवाहित सहेली से पूछा तो उस ने कहा कि संबंध बनाते समय बड़ा दर्द होता है. पर अब अपने अनुभव से कह सकती हूं कि यदि आप मानसिक और शारीरिक रूप से सहज हैं, साथ ही पति का स्नेहपूर्ण स्पर्श है, तो कोई समस्या नहीं आती.

भले आज कितनी ही प्रीमैरिटल काउंसलिंग संस्थाएं खुल गई हों पर जरूरी नहीं कि हर लड़की का परिवार एक बड़ी फीस दे कर अपनी बेटी को वहां भेज सके. मगर सवाल उठता है कि भावी दुलहन अगर मन की जिज्ञासाओं को अपनी मां से नहीं पूछ सकती, भाभी, बहन और सहेली भी उसे ठीक से नहीं बताएंगी और बताएंगी भी तो वे उन के निजी अनुभव होंगे और जरूरी नहीं कि भावी दुलहन के साथ भी वैसा ही हो, ऐसे में वह क्या करे? हम ने विवाहयोग्य लड़कियों व जिन के विवाह होने वाले हैं, ऐसी कई लड़कियों से उन के मन की जिज्ञासाओं को जाना कि वे मोटेतौर पर मन में किस प्रकार की जिज्ञासाएं रखती हैं. प्रस्तुत हैं, उन की जिज्ञासाएं…

जिज्ञासाएं कैसी कैसी

हर लड़की के मन में जिज्ञासा उपजती है कि क्या प्रथम मिलन के दौरान रक्तस्राव होना जरूरी है? क्या यही कौमार्य की पहचान है? क्या प्रथम मिलन पर बहुत दर्द होता है? इन के अलावा यदि विवाहपूर्व किसी और से शारीरिक संबंध रहा है तो क्या पति को उस का पता चल जाएगा? क्या माहवारी के दौरान सैक्स किया जा सकता है? क्या रात में 1 से अधिक बार शारीरिक संबंध स्थापित करने पर शरीर में कमजोरी आ जाती है? कौन सा गर्भनिरोधक उपाय अपनाएं ताकि तुरंत गर्भवती न हो, आदि.

इन सभी प्रश्नों के उत्तर देते हुए मदर ऐंड चाइल्ड हैल्थ स्पैशलिस्ट व फैमिली प्लानिंग काउंसलर डा. अनीता सब्बरवाल ने बताया कि प्रथम समागम के समय खून आने का कौमार्य से कोई संबंध नहीं होता. दरअसल, बढ़ती उम्र में खेलकूद या व्यायाम आदि के दौरान भी हाइमन नाम की पतली झिल्ली फट जाती है और लड़कियों को इस का पता भी नहीं चलता. इस के अलावा जो लड़कियां हस्तमैथुन करती हैं उन की झिल्ली भी फट सकती है. अत: विवाहयोग्य लड़कियों को मन से यह बात निकाल देनी चाहिए कि खून न आने से कौमार्य पर प्रश्नचिह्न लग सकता है.

इसी तरह प्रथम मिलन पर दर्द होना भी जरूरी नहीं है. अकसर शर्म और झिझक के कारण लड़कियां सैक्स के दौरान सहज नहीं हो पातीं, जिस के कारण योनि में गीलापन नहीं आ पाता और शुष्कता के कारण दर्द होता है. इसलिए संबंध बनाते समय पति का साथ दें. विवाहपूर्व बने शारीरिक संबंधों के बारे में पति को तब तक पता नहीं चल सकता जब तक पत्नी स्वयं न बताए.

ऐसे ही माहवारी के दौरान सैक्स करने से कोई हानि नहीं होती. फिर भी सैक्स न किया जाए तो अच्छा है, क्योंकि एक तो पत्नी वैसे ही रक्तस्राव, पीएमएस जैसी तकलीफों से गुजर रही होती है, उस पर कई पति ओरल सैक्स पर जोर डालते हैं, जो सही नहीं है. अधिकांश लड़कियों के मन में यह जिज्ञासा भी बहुत रहती है कि सैक्स अधिक बार करने से कमजोरी आती है. दरअसल, ऐसा नहीं है, पत्नियां पतियों की सैक्स आवश्यकता से अनजान होती हैं. इस कारण उन्हें लगता है कि अधिक बार सैक्स करना हानिकारक होगा, जबकि ऐसा कुछ नहीं है. हां, फैमिली प्लानिंग उपाय के लिए अच्छा होगा कि पत्नी किसी स्त्रीरोग विशेषज्ञा से मिले ताकि वह शादी के बाद तुरंत गर्भवती न हो कर वैवाहिक जीवन का पूर्ण आनंद उठा सके.

ध्यान देने योग्य बातें

– सैक्स संबंधी जानकारी इंटरनैट पर आधीअधूरी मिलती है. अत: उस पर ध्यान न दें.

– फैंटेसी में न जिएं और ध्यान रखें कि हर चीज हर किसी को नहीं मिलती.

– यदि कोई बीमारी है जैसे डायबिटीज, अस्थमा आदि तो उस की जानकारी विवाहपूर्व ही भावी पति को होनी चाहिए. इसी तरह पति को भी कोई बीमारी हो तो उस का पता पत्नी को होना चाहिए.

– मन की यह जिज्ञासा कि ससुराल वाले कैसे होंगे तो ध्यान रखें, हर घर के तौरतरीके अलग होते हैं. जरूरी यह है कि बड़ेबुजुर्गों को सम्मान दें, घर के तौरतरीकों को अपनाने की कोशिश करें तथा अपनी मुसकराहट व काम से सब का दिल जीतें. मन में जितनी भी सैक्स संबंधी जिज्ञासाएं हैं उन्हें किसी अच्छी पत्रिका के सैक्स कालम के अंतर्गत प्रकाशित होने वाले लेखों को पढ़ कर शांत करें.

– यदि किसी समस्या का समाधान लेखों में न मिले तो उसे किसी पत्रिका के ‘सैक्स कालम’ में लिख कर भेजें. ऐसे कालमों की समस्याओं के समाधान योग्य डाक्टरों से पूछ कर ही प्रकाशित किए जाते हैं.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर 8588843415 पर  भेजें. 

या हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- sampadak@delhipress.biz सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

Short Story In Hindi : पीकू की सौगात

Short Story In Hindi : हमारेलाख समझाने के बावजूद कि अमिताभ की फिल्म देखने का मजा तो पीवीआर में ही है, बच्चों ने यह कहते हुए एलईडी पर पैन ड्राइव के जरीए ‘पीकू’ लगा दी कि पापा 3 घंटे बंध कर बैठना आप के बस में कहां? हंसने लगे सो अलग. उस समय तो हम समझ नहीं पाए कि बच्चे क्या समझाना चाहते हैं. परंतु जब फिल्म में मोशन के साथ इमोशन जुड़े और बच्चे मम्मी की ओर देख कर हंसने लगे, तो हमें समझ में आया कि बच्चे क्या कर रहे थे. बच्चों की हंसी देख हम झेंपे जरूर, लेकिन उन का हंसना जायज भी था. दरअसल, मोशन की इस बीमारी से हम भी पिछले काफी समय से जूझ रहे थे, जिस का एहसास पहली बार हमें उस दिन हुआ जब संडे होने के कारण बच्चे देर तक सो रहे थे और अखबार में छपे एक इश्तहार को पढ़ हमारी श्रीमतीजी का मन सैंडल खरीदने को हो आया.

‘‘चलो न, पास ही तो है यह मार्केट. गाड़ी से 5 मिनट लगेंगे. बच्चों के उठने तक तो वापस भी आ जाएंगे,’’ श्रीमतीजी के इस कदर प्यार से आग्रह करने पर हम नानुकर नहीं कर पाए और पहुंच गए मार्केट. सेल वाली दुकान के पास ही बहुत अच्छा रैस्टोरैंट था, तो श्रीमतीजी का मन खाने को हो आया. इसलिए पहले हम ने वहां कुछ खायापिया और फिर घुसे फुटवियर के शोरूम में. श्रीमतीजी सैंडल की वैरायटी देखने लगीं, लेकिन तभी हमारे पेट में हलचल होने लगी. अब हम श्रीमतीजी को सैंडल पसंद करने में देरी करता देख खीजने लगे कि जल्दी सैंडल पसंद करें और घर चलें. आखिर उन्हें सैंडल पसंद आ गई, तो हम ने राहत की सांस ली. लेकिन चैन कहां मिलने वाला था हमें? बाहर निकलते ही सामने गोलगप्पे वाले की रेहड़ी देख श्रीमतीजी की लार टपकी. वे बाजार जाएं और गोलगप्पे न खाएं, यह तो असंभव है. उन्होंने हमारे आगे गोलगप्पे खाने की इच्छा जाहिर की तो हमारा मन हुआ कि गोलगप्पे वाले का मुंह नोच लें. मुए को यहीं लगानी थी रेहड़ी.

खैर, 2-2 गोलगप्पे खाने की बात कर श्रीमतीजी ने 6 तो खुद खाए और उतने ही हमें भी खिला दिए. अब उन्हें कैसे समझाते कि हम किस परेशानी में हैं. दूसरे, उन की तुनकमिजाजी से भी वाकिफ थे हम, इसलिए न चाहते हुए भी गोलगप्पे गटक लिए. लेकिन पेट की जंग ने रौद्र रूप ले लिया था. मार्केट से बाहर निकल हम तेज कदमों से पार्किंग की ओर बढ़े तो श्रीमतीजी पूछ बैठीं, ‘‘इतनी जल्दी क्यों चल रहे हो?’’

हम ने पेट की परेशानी के बजाय बहाना बनाया, ‘‘बच्चे उठ गए होंगे, जल्दी चलो.’’ तभी उन्हें उन की पुरानी सहेली मिल गई. गप्पें मारने में तो श्रीमतीजी वैसे ही माहिर हैं, सो लगीं दोनों अगलीपिछली हांकने. उन्हें हंसी के फुहारे छोड़ते देख हम ने अपना माथा पीट लिया क्योंकि जल्दी देरी में जो बदलती जा रही थी. ऐसे में श्रीमतीजी का मोबाइल बजा तो हमें सुकून मिला. बच्चों का फोन था, इसलिए बतियाना छोड़ वे जल्दी से घर चलने को हुईं तो हम ने राहत महसूस की. घर पहुंचने पर फारिग होने के बाद हम ने घर के लोगों से अपनी समस्या शेयर की तो सभी हंसने लगे, लेकिन समाधान किसी ने न बताया. वैसे रोज तो हम यह परेशानी झेल लेते थे, क्योंकि औफिस में डैस्कवर्क था. साथ ही वहां वौशरूम की परेशानी नहीं थी. पर कभी बाहर जाना पड़ता तो खासी परेशानी होती. तिस पर जब इस का संबंध श्रीमतीजी की खरीदारी से जुड़ा तो मुश्किलें और बढ़ गईं.

हमारी श्रीमतीजी मार्केट जा कर खरीदारी भले ही धेले भर की भी न करें पर जिस दुकान में घुस जाती थीं, सारा माल खुलवा कर रख देती थीं. और भले ही घर से खापी कर निकलें, लेकिन चाटपकौड़ी खाए बिना न रहतीं. ऐसे में हमारी हालत पतली होनी ही थी. ‘पीकू’ में भास्कर की समस्या हम से कुछ मिलतीजुलती ही थी, जिसे दिखा बच्चे उसे हमारी हालत से जोड़ रहे थे. जोड़ते भी क्यों न, उस दिन हुआ भी तो कुछ ऐसा ही था. हम ससुराल गए हुए थे कि देर रात तक की आपसी बातचीत से हमारी श्रीमतीजी को पता चला कि यहां पास की मार्केट में सूटों के बहुत अच्छे शोरूम बन गए हैं, जहां बहुत अच्छे डिजाइनर सूट मिलते हैं, साथ ही वे फिटिंग भी कर के देते हैं. बस, श्रीमतीजी की खरीदारी की सनक परवान चढ़ी और वे बना बैठीं सुबह हमारी साली के साथ मार्केट जाने का प्रोग्राम. और कोई प्रोग्राम होता तो हम मना कर देते लेकिन साली संग जाने का मजा कहां बारबार मिलता है, सो हम ने हां कर दी. सुबह नाश्ते में सासूमां ने खातिरदारी वाली भारतीय संस्कृति का निर्वहन करते हुए हमारी यानी अपने जमाई की खातिर में ऐसे घी चुपड़चुपड़ कर बने गोभी के परांठे खिलाए जैसे अपने बेटे को भी कभी न खिलाए होंगे. न न करते भी हम 4 परांठे डकार गए. ऊपर से दहीमट्ठा पिलाया सो अलग. अब हम श्रीमतीजी संग खरीदारी पर जाने को तैयार हुए तो माथा ठनका कि कहीं रास्ते में बीमारी ने जोर पकड़ लिया तो… हम ने कई बार इस के बारे में सोचा फिर श्रीमतीजी को थोड़ा रुकने को कह पहुंच गए फारिग होने.

लेकिन काफी देर नाक बंद कर सीट पर बैठने और जोर मारने पर भी राहत न मिली, तो श्रीमतीजी के इमोशंस का खयाल रखते हुए हम अपने मोशन का खयाल छोड़ आज्ञाकारी पति की भांति जल्दी से उठे और चल दिए उन के संग मार्केट. श्रीमतीजी दुकान में घूमतीं फिर दूसरी देखतीं. पहले शोकेस में लगा सूट पसंद करतीं फिर अंदर जा कर उलटपुलट कर देखतीं. उन के साथ एक से दूसरी दुकान घूमतेघूमते कब पेट में हलचल शुरू हो गई पता ही न चला. अब हमारी हालत पतली. लगे इधरउधर सुलभ शौचालय तलाशने. हमें नजरें घुमाते देख श्रीमतीजी बोल पड़ीं, ‘‘इधरउधर क्या ढूंढ़ रहे हो, चलो दूसरी दुकान में, यहां तो वैरायटी ही नहीं है.’’ हमें उन की इस आदत का पता है, इसलिए चुपचाप उन के पीछे हो लिए. तभी हमारी नजर सामने शौचालय पर पड़ी तो हम श्रीमतीजी को रोक उधर इशारा करते हुए बोले, ‘‘जरा उधर चलें, हमें…’’

अभी हमारी बात पूरी भी न हुई थी कि साली बोल पड़ी, ‘‘वाह जीजाजी, बड़ा खयाल रखते हैं दीदी के जायके का. चलो चलते हैं. वहां के भल्लेपापड़ी तो वैसे भी मशहूर हैं.’’ अब उसे कौन समझाता कि हमारा उधर जाने का क्या मकसद था. खैर, चल दिए उन के पीछे अपना सा मुंह लिए. श्रीमतीजी ने भल्लेपापड़ी की प्लेटें बनवाईं. हम ने सासूमां के स्वादिष्ठ परांठों का वास्ता देते मना किया पर वे कहां मानने वाली थीं. हमारे न न करने पर भी एक प्लेट हाथ में थमा ही दी. हम ने आधी भल्लापापड़ी खा प्लेट दूसरी ओर रख दी. तभी श्रीमतीजी की नजर एक शोरूम में लगे बुत पर लिपटे एक अनारकली सूट पर अटक गई, जबकि हमारी नजरें अभी भी फारिग होने का मुकाम तलाश रही थीं. ऐसे में राहत यह देख कर मिली कि जिस शोरूम की ओर श्रीमती मुखातिब हुई थीं, उसी के सामने हमारी समस्या का समाधान था. सो हम साली और घरवाली को खरीदारी में मशगूल कर ‘अभी आया’ कह कर इस संकल्प के साथ बाहर निकले कि आगे से श्रीमतीजी संग खरीदारी हेतु जाएंगे तो कुछ खा कर नहीं निकलेंगे. फारिग हो कर आने पर हम ने चैन की सांस ली, लेकिन श्रीमतीजी सूट खरीद पैसों हेतु हमारे इंतजार में तेवर बदले खड़ी थीं. मेरे आते ही वे जोर से बोलीं, ‘‘कहां चले गए थे? हम इतनी देर से इंतजार कर रहे हैं.’’ हम ने धीरे से इशारा कर उन्हें समझाया तो साली हंसी, ‘‘क्या जीजाजी, ससुराल के खाने का इतना भी क्या मोह कि बारबार जाना पड़े,’’ और दोनों खीखी करने लगीं. हम ने चुपचाप पैसे दे कर सामान उठाया और घर चलने में ही भलाई समझी. घर आ कर साली ने चटखारे लेले कर हमारे मोशन के किस्से सुनाए तो बच्चे भी हंसी न रोक सके.

‘पीकू’ में रहरह कर भास्कर बने अमिताभ मोशन पर अच्छीखासी बहस छेड़ते और बच्चे हमारी स्थिति से उस का मेल करते हुए हंसते. सोचने वाली बात यह है कि क्या मोशन जैसा विषय भी किसी कहानी का हो सकता है. हां, क्यों नहीं जनाब, उन से पूछिए जिन्हें रोज इस समस्या से जूझना पड़ता है. हम ने गुस्से से कह दिया, ‘‘हमारे इमोशन की हंसी उड़ाने को दिखा रहे हो न हमें यह फिल्म?’’ ‘‘नहीं जी, बच्चे तो यह बताना चाह रहे हैं कि आप भी अपने मोशन का कुछ ऐसा इंतजाम कर के रखो. जब भी खरीदारी करने जाओ आप भागते हो इसी चक्कर में,’’ श्रीमतीजी ने हमारी बीमारी पर कटाक्ष करते हुए बच्चों का बचाव किया, ‘‘देखा नहीं था उस दिन जब वह आदमी हमारा दुपट्टा खींच गया था.’’ हमें याद आया. दरअसल, उस दिन हम साली की शादी हेतु खरीदारी करने गए हुए थे. बच्चे भी साथ थे. श्रीमतीजी आगेआगे और हम बच्चों का हाथ पकड़े पीछेपीछे. बच्चों के लिए ड्रैस लेते समय वे हम से पूछतीं, लेकिन हमारे हां कहने के बावजूद उन्हें पसंद न आता और वे आगे चल देतीं. बड़ी मुश्किल से उन्होंने बच्चों के कपड़े खरीदे. अब हमारी बारी थी. हम बच्चों के कपड़ों के बैग से लदे पड़े थे कि श्रीमतीजी को सामने उबली, मसालेदार चटपटी छल्ली वाला दिख गया. बस, उन के मुंह में पानी आ गया. चटपटी मसालेदार छल्ली हमें भी पसंद थी, साथ ही सुखद एहसास था कि आज हम घर से खाली पेट निकले थे. अत: बिना हीलहुज्जत हां कर दी. श्रीमतीजी ने अपने हिसाब का ज्यादा मसालेवाला पत्ता बनवा दिया. जनाब वे तो चटरपटर कर खा गईं पर हमारे पसीने छूट गए. बड़ी मुश्किल से डकारा.

 

तभी श्रीमतीजी को सामने शोरूम में टंगी साड़ी इतनी भाई कि वे उधर चल दीं. लेकिन कीमत पूछ चौंकीं और बोलीं, ‘‘महंगी है. चलो पहले तुम्हारे कपड़े खरीद लेते हैं.’’ हम ने भी सोचा कि चलो हमें तो इन की पसंद पर ही मुहर लगानी है, जल्दी निबटारा हो जाएगा. अभी हम यह सोच ही रहे थे कि चटपटी छल्ली ने अपना असर दिखा दिया. हम समझ गए कि अब फारिग होने का इंतजाम करना पड़ेगा.  श्रीमतीजी हमें पैंट पसंद करवा रही थीं और हम पहनी पैंट को गीली होने से बचाने की जुगत सोच रहे थे. खैर, उन्होंने जो पसंद किया, हम ने मुहर लगाई और शोरूम से बाहर निकल इधरउधर झांकने लगे. सामने एक साड़ी के शोरूम में पहुंच श्रीमतीजी ने तमाम साडि़यां खुलवा डालीं. न श्रीमतीजी साड़ी देखती थक रही थीं, न दुकानदार दिखाते थक रहा था. पर उन की पसंद की साड़ी न मिलनी थी न मिली. हम मौके की तलाश में थे कि कब वे हमारी ओर मुखातिब हों और हम इजाजत लें. एक साड़ी थोड़ी पसंद आने पर वे हमारी ओर मुखातिब हुईं, तो हम ने आंख मूंद कर हां कर दी. उन्हें कौन सी हमारी पसंद की साड़ी खरीदनी थी, यह तो बस दिखावा था. साथ ही हम ने उंगली उठा कर 1 नंबर के लिए जाने की इजाजत मांगी तो वे बरस पड़ीं, ‘‘जाओ, तुम्हें तो हर समय भागना ही पड़ता है.’’ उन के इस प्रकार डांटने पर बच्चे भी हमारी हालत पर हंसने लगे और हम खिसक लिए 1 नंबर का बहाना कर 2 नंबर के लिए.

हर ओर निगाह दौड़ाने पर भी कोई शौचालय न दिखा, तो एक शख्स से पूछने पर पता चला कि बहुत दूर है. हम ने सोचा कि इतनी दूर तो हमारा घर भी नहीं. क्यों न घर ही हो आएं? यह सोच कर हम पीछे मुड़े ही थे कि पत्नी को साड़ी पसंद कर बच्चों के साथ शोरूम से बाहर आते देखा. वे हमारे पास पहुंचतीं उस से पहले एक मोटातगड़ा आदमी श्रीमतीजी से उलझता दिखा. हम वहां पहुंचे तो वह उन्हें सौरी कह रहा था. उस ने चुपचाप सौरी कह जाने में ही अपनी भलाई समझी, लेकिन श्रीमतीजी हम पर बरस पड़ीं, ‘‘कितनी देर कर दी आने में. पता है यह आदमी मुझे छेड़ रहा था.’’ अब हम उन्हें कैसे बताते कि हम किस मुसीबत में हैं. हम बोले, ‘‘अरे सौरी बोला न वह, चलो अब.’’ इस पर उन के तेवर बिगड़े, ‘‘तुम भी कितने डरपोक पति हो. अरे, वह तो मेरा दुपट्टा खींच कर चला गया और तुम उसे इतने हलके में ले रहे हो.’’ जैसे अपने पालतू कुत्ते को हुश्श… कह हम दूसरे पर छोड़ देते हैं, उसी लहजे में श्रीमतीजी ने हमें पुश किया. अब उन्हें कौन समझाता कि हम अपनी कदकाठी ही नहीं बल्कि अपनी बीमारी के कारण भी इस समय कुछ न कहने को विवश हैं. पर उन के ताने ने हमारे जमीर को इस कदर झिंझोड़ा कि न चाहते हुए भी हम दुम हिलाते हुए उस के पीछे हो लिए और उसे ललकारा. अब सूमो पहलवान सा दिखने वाला वह बंदा शेर की तरह खा जाने वाली नजरों से हमें घूरता हम पर बरसा, ‘‘कह दिया न सौरी. उन के पास से निकलते हुए मेरी बैल्ट के बक्कल में उन का दुपट्टा फंस गया तो इस में मेरा क्या कुसूर है?’’ उस की दहाड़ से हमारी घिग्घी बंध गई. लगा हमारी बीमारी बाहर आने को है. और कोई समय होता तो शायद हम उस से भिड़ भी जाते पर मोशन की वजह से हमें अपने इमोशंस पर कंट्रोल रखना पड़ा.

हम दांत पीस कर रह गए. वह दहाड़ कर चला गया तो हम ने चैन की सांस ली और किसी तरह श्रीमतीजी को समझाबुझा कर जल्दीजल्दी घर फारिग होने पहुंचे. बच्चे हमारी हालत पर हंस रहे थे व श्रीमतीजी अधूरी शौपिंग के कारण नाराज थीं. ‘पीकू’ अपने आखिरी मकाम तक पहुंच गई थी. श्रीमतीजी बच्चों संग हंसती हुई हमारी ओर मुखातिब हुईं और बोलीं, ‘‘सीख लो कुछ भास्कर से. हमेशा बहाने से जाते हो फारिग होने. ले लो एक अदद सीट और रख लो गाड़ी में, ताकि जहां जरूरत महसूसहुई, हो लिए फारिग.’’ वातावरण में बच्चों सहित गूंजे उस के ठहाके में एलईडी की आवाज भी जैसे गुम हो गई जिस से हमें पिक्चर खत्म होने का पता भी न चला. ठीक ही तो कह रही हैं श्रीमतीजी, हम ने सोचा. ‘पीकू’ ने एक आसान रास्ता दिखाया है इस बीमारी से जूझते लोगों का. अमिताभ की तरह एक सीट सदा अपने साथ रखो. फिर जी भर कर खाओ और जब चाहो फारिग हो जाओ. शौचालय मिल जाए तो ठीक वरना ढूंढ़ने का झंझट खत्म. ‘पीकू’ की सौगात तो है ही फौरएवर.

Rava Idli Recipe : ब्रेकफास्ट में बनाएं रवा इडली, ट्राई करें ये रेसिपी

Rava Idli Recipe : रवा इडली घर में बनाना काफी आसान है. ये खाने में स्वादिष्ट के साथ पौष्टिक भी है. दक्षिण भारत में इसे काफी पसंद किया जाता है. तो आइए जानते है कैसे बनाते है रवा इडली.

सामग्री

रवा – 2 कप

दही – 2 कप

नमक – स्वादानुसार

हरे मटर के दाने – 1/4 कप

हरी मिर्च – 2 बारीक कटी हुई

अदरक – कद्दूकस किया हुआ

उरद की दाल – 1 चम्मच

राई – 1 चम्मच

हरा धनियां – बारीक कटा हुआ

तेल – 2-3 चम्मच

ईनो- एक छोटी चम्मच

विधि

दही को अच्छे से फेट लीजिए. अब रवा को बर्तन में निकालकर दही मिलाइए. अच्छी तरह से मिलाएं. अब इसमें नमक, अदरक, हरी मिर्च, हरा धनियां डाल कर मिला लीजिए. छोटे पैन में 1 चम्मच तेल डालकर गरम कीजिए.

तेल में राई डालिए, उरद की दाल डालिये और जैसे ही दाल हल्की ब्राउन हो जाए इसे इडली के मिश्रण में मिला दीजिए. मिश्रण को 10-15 मिनट के लिए रख दीजिए.

कुकर में 2 छोटे ग्लास पानी डाल कर गैस पर रख दीजिए. इडली स्टैन्ड खानों में तेल लगा कर चिकना कीजिए. 15 मिनिट बाद मिश्रण में ईनो डालकर मिलाते रहिए, जैसे ही बबल आ जाय चलाना बन्द कर दीजिए.

मिश्रण को चमचे की सहायता से प्रत्येक खाने में भरे और कुकर में रख दीजिए. ढक्कन से सीटी हटाकर कुकर को बन्द कर दीजिए. इडली को 10-12 मिनिट पकने दीजिए. आपकी इडली बनकर तैयार हैं.

इसे मूंगफली की चटनी और हरे धनिए की चटनी के साथ सर्व करें.

Hindi Story- रिश्तों का सच : क्या सुधर पाया ननदभाभी का रिश्ता

Hindi Story : घर में घुसते ही चंद्रिका के बिगड़ेबिगड़े से तेवर देख रवि भांपने लगा था कि आज कुछ हुआ है, वरना रोज मुसकरा कर स्वागत करने वाली चंद्रिका का चेहरा यों उतरा हुआ न होता. ‘‘लो, दीदी का पत्र आया है,’’ चंद्रिका के बढ़े हुए हाथों पर सरसरी सी नजर डाल रवि बोला, ‘‘रख दो, जरा कपड़ेवपड़े तो बदल लूं, पत्र कहीं भागा जा रहा है क्या?’’

चंद्रिका की हैरतभरी नजरों का मुसकराहट से जवाब देता हुआ रवि बाथरूम में घुस गया. चंद्रिका के उतरे हुए चेहरे का राज भी उस पर खुल गया था. रवि मन ही मन सोच कर मुसकरा उठा, ‘सोच रही होगी कि आज मुझे हुआ क्या है, दीदी का पत्र हर बार की तरह झपट कर जो नहीं लिया.’ हर साल गरमी की छुट्टियों में दीदी के आने का सिलसिला बहुत पुराना था. परंतु विवाह के 5 वर्षों में शायद ही ऐसा कभी हुआ हो जब उन के आने को ले कर चंद्रिका से उस की जोरदार तकरार न हुई हो. बेचारी दीदी, जो इतनी आस और प्यार के साथ अपने एकलौते, छोटे भाई के घर थोड़े से मान और सम्मान की आशा ले कर आती थीं, चंद्रिका के रूखे बरताव व उन दोनों के बीच होती तकरार से अब चंद दिनों में ही लौट जाती थीं.

दीदी से रवि का लगाव कम होता भी, तो कैसे? दीदी 10 वर्ष की ही थीं, जब मां रवि को जन्म देते समय ही उसे छोड़ दूसरी दुनिया की ओर चल दी थीं. ‘दीदी न होतीं तो मेरा क्या होता?’ यह सोच कर ही उस की आंखें भर उठतीं. दीदी उस की बड़ी बहन बाद में थी, मां जैसी पहले थीं. कैसे भूल जाता रवि बचपन से ले कर जवानी तक के उन दिनों को, जब कदमकदम पर दीदी ममता और प्यार की छाया ले उस के साथ चलती रही थीं.

दीदी तो विवाह भी न करतीं, परंतु रिश्तेदारों के तानों और बेटी की बढ़ती उम्र से चिंतित पिताजी के चेहरे पर बढ़ती झुर्रियों को देखने के बाद रवि ने अपनी कसम दे कर दीदी को विवाह के लिए मजबूर कर दिया था. उन के विवाह के समय वह बीए में आया ही था. विवाह के बाद भी बेटे की तरह पाले भाई की तड़प दीदी के अंदर से गई नहीं थी, उस की जरा सी खबर पाते ही दौड़ी चली आतीं. वह भी उन के जाने के बाद कितना अकेला हो गया था. यह तो अच्छा हुआ कि जीजाजी अच्छे स्वभाव के थे. दीदी की तड़प समझते थे, भाईबहन के प्यार के बीच कभी बाधा नहीं बने थे.

चंद्रिका को भी तो वह ही ढूंढ़ कर लाई थीं. उन दिनों की याद से रवि मुसकरा उठा. दीदी उस के विवाह की तैयारी में बावरी हो उठी थीं. ऐसा भी नहीं था कि चंद्रिका को इन बातों की जानकारी न हो, विवाह के शुरुआती दिनों में ही सारी रामकहानी उस ने सुना दी थी. विवाह के बाद जब पहली बार दीदी आईर् थीं तो चंद्रिका भी उन से मिलने के लिए बड़ी उत्साहित थी और स्वयं रवि तो पगला सा गया था. आखिर उस के विवाह के बाद वह पहली बार आ रही थीं. वह चाहता था भाई की सुखी गृहस्थी देख वह खिल उठें.

पति के ढेरों आदेशनिर्देश पा कर चंद्रिका का उत्साह कुछ कम हो गया था, वह कुछ सहम सी भी गई थी. परंतु रवि तो अपनी ही धुन में था, चाहे कुछ हो जाए, दीदी को इतना सम्मान और प्यार मिलना चाहिए कि उन की ममता का जरा सा कर्ज तो वह उतार सके.

दीदी के आने के बाद उन दोनों के बीच चंद्रिका कहीं खो सी गई थी. उन दोनों को अपने में ही मस्त पा उन के साथ बैठ कर स्वयं भी उन की बातों में शामिल होने की कोशिश करती, पर रवि ऐसा मौका ही न देता. तब वह खीज कर रसोई में घुस खाना बनाने की कोशिश में लग जाती. मेहनत से बनाया गया खाना देख कर भी रवि उस पर नाराज हो उठता, ‘यह क्या बना दिया? पता नहीं है, दीदी को पालकपनीर की सब्जी अच्छी लगती है, शाही पनीर नहीं.’ फिर रसोई में काम करती चंद्रिका का हाथ पकड़ कर बाहर ला खड़ा करता और कहता, ‘आज तो दीदी के हाथ का बना हुआ ही खाऊंगा. वे कितना अच्छा बनाती हैं.’

तब भाईबहन चुहलबाजी करते हुए रसोई में मशगूल हो जाते और चंद्रिका बिना अपराध के ही अपराधी सी रसोई के बाहर खड़ी उन्हें देखती रहती. दीदी जरूर कभीकभी चंद्रिका को भी साथ लेने की कोशिश करतीं, लेकिन रवि अनजाने ही उन के बीच एक ऐसी दीवार बन गया था कि दोनों औपचारिकता से आगे कभी बढ़ ही न पाई थीं. उस समय तो किसी तरह चंद्रिका ने हालात से समझौता कर लिया था, लेकिन उस के बाद जब भी दीदी आतीं, वह कुछ तीखी हो उठती. सीधे दीदी से कभी कुछ नहीं कहा था, लेकिन रवि के साथ उस के झगड़े शुरू हो गए थे. दीदी भी शायद भांप गई थीं, इसीलिए धीरेधीरे उन का आना कम होता जा रहा था. इस बार तो पूरे एक वर्ष बाद आ रही थीं, पिछली बार उन के सामने ही चंद्रिका ने रवि से इतना झगड़ा किया कि वे बेचारी 4 दिनों में ही वापस चली गई थीं. जितने भी दिन वे रहीं, चंद्रिका ने बिस्तर से नीचे कदम न रखा, हमेशा सिरदर्द का बहाना बना अपने कमरे में ही पड़ी रहती.

एक दोपहर दीदी को अकेले काम में लगा देख भनभनाता हुआ रवि, चंद्रिका से लड़ पड़ा था. तब वह तीखी आवाज में बोली थी, ‘तुम क्या समझते हो, मैं बहाना कर रही हूं? वैसे भी तुम्हें और तुम्हारी दीदी को मेरा कोई काम पसंद ही कब आता है, तुम दोनों तो बातों में मशगूल हो जाओगे, फिर मैं वहां क्या करूंगी?’ बढ़तेबढ़ते बात तेज झगड़े का रूप ले चुकी थी. दीदी कुछ बोलीं नहीं, पर दूसरे ही दिन सुबह रवि द्वारा मिन्नतें करने के बाद भी चली गई थीं. उन के चले जाने के बाद भी बहुत दिनों तक उन दोनों के संबंध सामान्य न हो पाए थे, दीदी के इस तरह चले जाने के कारण वह चंद्रिका को माफ नहीं कर पाया था.

दोनों के बीच बढ़ते तनाव को देख अभी तक खामोशी से सबकुछ देख रहे पिताजी ने आखिरकार एक दिन रात को खाने के बाद टहलने के लिए निकलते समय उसे भी साथ ले लिया था. वे उसे समझाते हुए बोले थे, ‘पतिपत्नी के संबंध का अजीब ही कायदा होता है, इस रिश्ते के बीच किसी तीसरे की उपस्थिति बरदाश्त नहीं होती है…’ ‘लेकिन दीदी कोई गैर नहीं हैं,’ बीच में ही बात काटते हुए, रवि का स्वर रोष से भर उठा था.

‘बेटा, विवाह के बाद सब से नजदीकी रिश्ता पतिपत्नी का ही होता है. बाकी संबंध गौण हो जाते हैं. माना कि सभी संबंधों की अपनीअपनी अहमियत है, लेकिन किसी भी रिश्ते पर कोई रिश्ता हावी नहीं होना चाहिए, वरना कोई भी सुखी नहीं रहता. तुम्हीं बताओ, इतनी कोशिशों के बाद भी क्या तुम्हारी दीदी खुश है?’ समझातेसमझाते पिताजी सवाल सा कर उठे थे. ‘तो मैं क्या करूं? चंद्रिका की खुशी के लिए उन से सारे संबंध तोड़ लूं या फिर दीदी के लिए चंद्रिका से,’ रवि असमंजस में था, ‘आप तो जानते ही हैं कि दोनों ही मुझे कितनी प्रिय हैं.’

‘संबंध तोड़ने के लिए कौन कहता है,’ पिताजी धीरे से हंस पड़े थे, फिर गंभीर हो, बोले, ‘यह तो तुम भी मानते ही होगे कि चंद्रिका मन से बुरी या झगड़ालू नहीं है. मेरा कितना खयाल रखती है, तुम्हारे लिए भी आदर्श पत्नी सिद्ध हुई है.’ ‘फिर दीदी से ही उस की क्या दुश्मनी है?’ रवि के इस सवाल पर थोड़ी देर तक उसे गहरी नजरों से देखने के बाद वे बोले ‘कोई दुश्मनी नहीं है. याद करो, पहली बार वह भी कितनी उत्साहित थी. इस सब के लिए. अगर कोई दोषी है तो वह स्वयं तुम हो.’

‘मैं?’ सीधेसीधे अपने को अपराधी पा रवि अचकचा उठा था. ‘हां, तुम उन दोनों के बीच एक दीवार बन कर खड़े हो. कुछ करने का मौका ही कहां देते हो. आखिर वह तुम्हारी पत्नी है, वह तुम्हारी खुशी के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती है, लेकिन तुम हो कि अपनी बहन के आते ही उस के पूरे के पूरे व्यक्तित्व को ही नकार देते हो,’ पिताजी सांस लेने के लिए तनिक रुके थे.

रवि सिर झुकाए चुप बैठा किसी सोच में डूबा सा था. ‘बेटा, मुझे बहुत खुशी है कि तुम्हारी दीदी और तुम में इतना स्नेह है. भाईबहन से कहीं अधिक तुम दोनों एकदूसरे के अच्छे दोस्त हो, पर अपनी दोस्ती की सीमाओं को बढ़ाओ. अब चंद्रिका को भी इस में शामिल कर लो. यह उस का भी घर है. उसे तय करने दो कि वह अपने मेहमान का कैसे स्वागत करती है. विश्वास मानो, इस से तुम सब के बीच से तनाव और गलतफहमियों के बादल छंट जाएंगे. और तुम सब एकदूसरे के अधिक पास आ जाओगे.’

‘‘अंदर कितनी देर लगाओगे?’’ चंद्रिका की आवाज सुन वह चौंक उठा, ‘अरे, इतनी देर से मैं बाथरूम में ही बैठा हूं.’ झटपट नहा कर वह बाहर निकल आया. चाय और गरमागरम नाश्ते की प्लेट उस का इंतजार कर रही थी. इस दौरान वे खामोश ही रहे. जूठे कप व प्लेटें समेटती चंद्रिका की हैरत यह देख और बढ़ गई कि रवि पत्र को हाथ लगाए बगैर ही एक पत्रिका पढ़ने लगा है.

‘‘तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?’’ चंद्रिका का चिंतित चेहरा देख कर अपनी हंसी को रवि ने मुश्किल से रोका, ‘‘हां, ठीक है, क्यों?’’ ‘‘फिर अभी तक दीदी का पत्र क्यों नहीं पढ़ा?’’ चंद्रिका के सवाल के जवाब में वह लापरवाही से बोला, ‘‘तुम ने तो पढ़ा ही होगा, खुद ही बता दो, क्या लिखा है?’’

‘‘वे कल दोपहर की गाड़ी से आ रही हैं.’’ ‘‘अच्छा,’’ कह वह फिर पत्रिका पढ़ने में मशगूल हो गया. कुछ देर तक चंद्रिका वहीं खड़ी गौर से उसे देखती रही, फिर कमरे से बाहर निकल गई.

दूसरे दिन रविवार था. सुबहसुबह रवि को अखबार में खोया पा कर चंद्रिका बहुत देर तक खामोश न रह सकी, ‘‘दीदी आने वाली हैं. तुम्हें कुछ खयाल भी है?’’ ‘‘पता है,’’ अखबार में नजरें जमाए हुए ही वह बोला.

‘‘खाक पता है,’’ चंद्रिका झुंझला उठी थी, ‘‘कुछ सामान वगैरह लाना है या नहीं?’’ ‘‘घर तुम्हारा है, तुम जानो,’’ उस की झुंझलाहट पर वह खुद मुसकरा उठा.

कुछ देर तक उसे घूरने के बाद पैर पटकती हुई चंद्रिका थैला और पर्स ले बाहर निकल गई. ?जब वह लौटी तो भारी थैले के साथ पसीने से तरबतर थी. रवि आश्चर्यचकित था. वह दीदी की पसंद की एकएक चीज छांट कर लाई थी.

‘‘दोपहर के खाने में क्या बनाऊं?’’ सवालिया नजरों से उसे देखते हुए चंद्रिका ने पूछा. ‘‘तुम जो भी बनाओगी, लाजवाब ही होगा. कुछ भी बना लो,’’ रवि की बात सुन चंद्रिका ने उसे यों घूर कर देखा, जैसे उस के सिर पर सींग उग आए हों.

दोपहर से काफी पहले ही वह खाना तैयार कर चुकी थी. रवि की तेज नजरों ने देख लिया था कि सभी चीजें दीदी की पसंद की ही बनी हैं. वास्तव में वह मन ही मन पछता भी रहा था. उसे महसूस हो रहा था कि उस के बचकाने व्यवहार की वजह से ही दीदी और चंद्रिका इतने समय तक अजनबी बन परेशान होती रहीं.

‘‘ट्रेन का टाइम हो रहा है. स्टेशन जाने के लिए कपड़े निकाल दूं?’’ चंद्रिका अपने अगले सवाल के साथ सामने खड़ी थी. अपने को व्यस्त सा दिखाता रवि बोला, ‘‘उन्हें रास्ता तो पता है, औटो ले कर आ जाएंगी.’’ ‘‘तुम्हारा दिमाग तो सही है?’’ बहुत देर से जमा हो रहा लावा अचानक ही फूट कर बह निकला था, ‘‘पता है न कि वे अकेली आ रही हैं. लेने नहीं जाओगे तो उन्हें कितना बुरा लगेगा. आखिर, तुम्हें हुआ क्या है?’’

‘‘अच्छा बाबा, जाता हूं, पर एक शर्त पर, तुम भी साथ चलो.’’ ‘‘मैं?’’ हैरत में पड़ी चंद्रिका बोली, ‘‘मैं तुम दोनों के बीच क्या करूंगी.’’

‘‘फिर मैं भी नहीं जाता.’’ उसे अपनी जगह से टस से मस न होते देख आखिर, चंद्रिका ने ही हथियार डाल दिए, ‘‘अच्छा उठो, मैं भी चलती हूं.’’

चंद्रिका को साथ आया देख दीदी पहले तो हैरत में पड़ीं, फिर खिल उठीं. शायद पिछली बार के कटु अनुभवों ने उन्हें भयभीत कर रखा था. स्टेशन पर चंद्रिका को भी देख एक पल में सारी शंकाएं दूर हो गईर्ं. वे खुशी से पैर छूने को झुकी चंद्रिका के गले से लिपट गईं.

रवि सोच रहा था, इतनी अच्छी तरह से तो वह घर में भी कभी नहीं मिली थी. ‘‘किस सोच में डूब गए?’’ दीदी का खिलखिलाता स्वर उसे गहरे तक खुशी से भर गया. सामान उठा वह आगेआगे चल दिया. चंद्रिका और दीदी पीछेपीछे बतियाती हुई आ रही थीं.

खाने की मेज पर भी रवि कम बोल रहा था. चंद्रिका ही आग्रह करकर के दीदी को खिला रही थी. हर बार चंद्रिका के अबोलेपन की स्थिति से शायद माहौल तनावयुक्त हो उठता था, इसीलिए दीदी अब जितनी सहज व खुश लग रही थीं, उतनी पहले कभी नहीं लगी थीं. खाने के बाद वह उठ कर अपने कमरे में आ गया. वे दोनों बहुत देर तक वहीं बैठी बातों में जुटी रहीं. कुछ देर बाद चंद्रिका कमरे में आ कर दबे स्वर में बोली, ‘‘यहां क्यों बैठे हो? जाओ, दीदी से कुछ बातें करो न.’’

‘‘तुम हो न, मैं कुछ देर सोऊंगा…’’ कहतेकहते रवि ने करवट बदल कर आंखें मूंद लीं. रात के खाने की तैयारी में चंद्रिका का हाथ बंटाने के लिए दीदी भी रसोई में ही आ गईं. रवि टीवी खोल कर बैठा था.

‘‘रवि की तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’ रसोईघर से आता दीदी का स्वर सुन रवि के कान चौकन्ने हो गए. पलभर की खामोशी के बाद चंद्रिका का स्वर उभरा, ‘‘नहीं तो, आजकल औफिस में काम अधिक होने से ज्यादा थक जाते हैं, इसलिए थोड़े खामोश हो गए हैं. आप को बुरा लगा क्या?’’

‘‘अरे नहीं, इस में बुरा मानने की क्या बात है? वैसे भी तुम्हारा साथ ज्यादा भला लग रहा है. पहली बार ऐसा लग रहा है कि अपने मायके आई हूं. मां तो थीं नहीं, जिन से यहां आने पर मायके का एहसास होता. पिताजी और भाई का मानदुलार था तो, पर असली मायके का एहसास तो मां या भौजाई के प्यार और मनुहार से ही होता है.’’

‘‘दीदी, मुझे माफ कर दीजिए,’’ चंद्रिका ने हौले से कहा, ‘‘मैं ने आप के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया…’’ ‘‘ऐसी बात नहीं है, हम ने तुम्हें अवसर ही कहां दिया था कि तुम अपना अच्छा या बुरा व्यवहार सिद्ध कर सको. खैर छोड़ो, इस बार जैसा सुकून मुझे पहले कभी नहीं मिला,’’ दीदी का स्वर संतुष्टिभरा था.

टीवी के सामने बैठे रवि का मन भी दीदी की खुशी और संतुष्टि देख चंद्रिका के प्रति प्यार और गर्व से भर उठा था. सुबह उस के उठने से पहले ही दीदी और चंद्रिका उठ कर काम के साथसाथ बातों में व्यस्त थीं. रात भी रवि तो सो गया था, वे दोनों जाने कितनी देर तक एकसाथ जागती रही थीं. जाने उन के अंदर कितनी बातें दबी पड़ी थीं, जो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं. रवि को एक बार फिर अपनी मूर्खता पर पछतावा हुआ. बिस्तर से उठ कर वह औफिस जाने की तैयारी में लग गया.

‘‘कहां जा रहे हो?’’ शीशे के सामने बाल संवार रहे रवि के हाथ अचानक चंद्रिका को देख रुक गए. ‘‘औफिस.’’

‘‘दीदी आई हैं, फिर भी?’’ चंद्रिका की हैरानी वाजिब थी. दीदी के लिए रवि पहले पूरे वर्ष की छुट्टियां बचा के रखता था. जितने भी दिन वह रहतीं, वे उन्हें घुमानेफिराने के लिए छुट्टियां ले कर घर बैठा रहता था. ‘‘छुट्टी क्यों नहीं ले लेते? हम सब घूमने चलेंगे,’’ चंद्रिका जोर देते हुए बोली.

‘‘नहीं, इस बार छुट्टियां बचा रहा हूं, शरारतभरी नजर चंद्रिका के चेहरे पर डालता हुआ रवि बोला.’’ ‘‘क्यों?’’ चंद्रिका के सवाल के जवाब में उस ने उसे अपने पास खींच लिया, ‘‘क्योंकि इस बार मैं तुम्हें मसूरी घुमाने ले जा रहा हूं. अभी छुट्टी ले लूंगा, तो बाद में नही मिलेंगी.’’

चंद्रिका की आंखें भीग उठी थीं, शायद वह विश्वास नहीं कर पा रही थी कि रवि की जिंदगी और दिल में उस के लिए भी इतना प्यार छिपा हुआ है. अपने को संभाल आंखें पोंछती वह लाड़भरे स्वर में बोली, ‘‘मसूरी जाना क्या दीदी से अधिक जरूरी है? मुझे कहीं नहीं जाना, तुम्हें छुट्टी लेनी ही पड़ेगी.’’

‘‘अच्छा, ऐसा करता हूं, सिर्फ आज की छुट्टी ले लेता हूं,’’ वह समझौते के अंदाज में बोला. ‘‘लेकिन इस के बाद जितने भी दिन दीदी रहेंगी, तुम्हीं उन के साथ रहोगी.’’

‘‘मैं, अकेले?’’ चंद्रिका घबरा रही थी, ‘‘मुझ से फिर कोई गलती हो गई तो?’’ ‘‘तो क्या, उसे सुधार लेना. मुझे तुम पर पूरा विश्वास है,’’ मन ही मन सोचता जा रहा था रवि, ‘मैं भी तो अपनी गलती ही सुधार रहा हूं.’

वह रवि की प्यार और विश्वासभरी निगाहों को पलभर देखती रही, फिर हंस कर बोली, ‘‘अच्छा, अब छोड़ो, चल कर कम से कम आज की पिकनिक की तैयारी करूं.’’ दीदी पूरे 15 दिनों के लिए रुकी थीं, चंद्रिका और उन के बीच संबंध बहुत मधुर हो गए थे. इस बार पिताजी भी अधिक खुश नजर आ रहे थे. दीदी के जाने का दिन ज्योंज्यों नजदीक आ रहा था, चंद्रिका उदास होती जा रही थी.

आखिरकार, जीजाजी के बुलावे के पत्र ने उन के लौटने की तारीख तय कर दी. दौड़ीदौड़ी चंद्रिका बाजार जा कर दीदी के लिए साड़ी और जीजाजी के लिए कपड़े खरीद लाई थी. तरहतरह के पापड़ और अचार दीदी के मना करने के बावजूद उस ने बांध दिए थे. शाम की ट्रेन थी. चंद्रिका दीदी के साथ के लिए तरहतरह की चीजें बनाने में व्यस्त थी. रवि सामान पैक करती दीदी के पास आ बैठा. दीदी ने मुसकरा कर उस की तरफ देखा, ‘‘अब तुम कब आ रहे हो चंद्रिका को ले कर?’’

‘‘आऊंगा दीदी, जल्दी ही आऊंगा,’’ बैठी हुई दीदी की गोद में वह सिर रख लेट गया था, ‘‘तुम नाराज तो नहीं हो न?’’ ‘‘किसलिए?’’ उस के बालों में हाथ फेरती हुई दीदी एकाएक ही उस की बात सुन हैरत में पड़ गईं.

‘‘मैं तुम्हारे साथ पहले जितना समय नहीं बिता पाया न?’’ रवि बोला. ‘‘नहीं रे, बल्कि इस बार मैं यहां जितनी खुश रही हूं, उतनी पहले कभी नहीं रही. चंद्रिका के होते मुझे किसी भी चीज की कमी महसूस नहीं हुई. एक बात बताऊं, मुझे बहुत डर लगता था. तेरे इतने प्यार जताने के बाद भी लगता था, मेरा भाई मुझ से अलग हो जाएगा. कभीकभी सोचती, शायद मेरे आने की वजह से ही चंद्रिका और तुम्हारे बीच झगड़ा होता है. तुझे देखने के लिए मन न तड़पता तो शायद यहां कभी आती ही नहीं.

‘‘चंद्रिका के इस बार के अच्छे व्यवहार ने मुझे एहसास दिलाया है कि भाई तो अपना होता ही है, पर भौजाई को अपना बनाना पड़ता है, क्योंकि वह अगर अपनी न बने तो धीरेधीरे भाई भी पराया हो जाता है. आज मैं सुकून महसूस कर रही हूं. चंद्रिका जैसी अच्छी भौजाई के होते मेरा भाई कभी पराया नहीं होगा. इस सब से भी बढ़ कर पता है, उस ने क्या दिया है मुझे?’’ ‘‘क्या?’’

‘‘मेरा मायका, जो मुझे पहले कभी नहीं मिला था. चंद्रिका ने मुझे वह सब दे दिया है,’’ दीदी की आंखें बरस उठी थीं, ‘‘चंद्रिका ने यह जो एहसान मुझ पर किया है, इस का कर्ज कभी नहीं चुका पाऊंगी.’’ ‘‘खाना तैयार है,’’ चंद्रिका कब कमरे में आई, पता ही न चला. लेकिन उस की भीगीभीगी आंखें बता रही थीं कि वह बहुतकुछ सुन चुकी थी. गर्व से निहारती रवि की आंखों में झांक चंद्रिका बोली, ‘‘कैसे भाई हो, पता नहीं, आज सुबह से दीदी ने कुछ नहीं खाया. चलो, खाना ठंडा हो रहा है.’’

दीदी को ट्रेन में बिठा रवि उन का सामान व्यवस्थित करने में लगा हुआ था. चंद्रिका दीदी के साथ ही बैठी उन्हें दशहरे की छुट्टियों में आने के लिए मना रही थी. हमेशा उतरे मुंह से वापस होने वाली दीदी का चेहरा इस बार चमक रहा था. ट्रेन की सीटी की आवाज के साथ ही रवि ने कहा, ‘‘उतरो चंद्रिका, ट्रेन चलने वाली है.’’

चंद्रिका दीदी से लिपट गई, ‘‘जल्दी आना और जाते ही पत्र लिखना.’’ ‘‘अब पहले तुम दोनों मेरे घर आना,’’ भीगी आंखों के साथ दीदी मुसकरा रही थीं.

उन के नीचे उतरते ही ट्रेन ने सरकना शुरू कर दिया. ‘‘दीदी, पत्र जरूर लिखना,’’ दोनों अपनेअपने रूमाल हिला रही थीं. ट्रेन गति पकड़ स्टेशन से दूर होती जा रही थी. चंद्रिका ने पलट कर रवि की तरफ देखा. रवि की गर्वभरी आंखों को निहारती चंद्रिका की आंखें भी चमक उठी थीं.

Social Media पर रहें सावधान, हो सकते हैं फ्रौड के शिकार

Social Media : 25 साल की भोपाल की शीतल की पलवल हरियाणा के 23 साल के विनोद से फ्रैंडशिप फेसबुक पर 3 साल पहले हुई थी. विनोद शादीशुदा था, मगर उस ने यह बात शीतल से छिपा कर उस से दोस्ती कर रिलेशनशिप भी बनाई. विनोद को अपना सबकुछ सौंप चुकी शीतल को यह रिलेशनशिप भारी पड़ी. विनोद उसे मनाली घुमाने के बहाने ले गया और 15 मई, 2024 को एक होटल में उस की हत्या कर एक ट्रौली बैग में उस की डैड बौडी छोड़ कर भाग निकला.

फरवरी, 2023 में भी मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के साईंखेड़ा में 23 साल की लड़की शिखा अवस्थी का मर्डर अमेठी उत्तर प्रदेश के राहुल ने इसलिए कर दिया कि शिखा की बड़ी बहन खुशबू से राहुल की फ्रैंडशिप हुई थी और वे दोनों शादी करना चाहते थे. छोटी बहन शिखा खुशबू को नसीहत दे रही थी कि अनजान लोगों से दोस्ती और शादी के चक्कर में कहीं तू अपनी जिंदगी बरबाद न कर लेना. प्यार में अंधी खुशबू ने राहुल के साथ मिल कर उस का घर के बाथरूम में ही मर्डर कर दिया.

आए दिन इस तरह की खबरें सामने आती हैं, जिन में अनजाने लोगों से सोशल मीडिया (Social Media) के माध्यम से की गई फ्रैंडशिप युवकयुवतियों के गले की फांस बन जाती है और पेरैंट्स अपनेआप को ठगा सा महसूस करते हैं. सोशल मीडिया का हद से ज्यादा उपयोग साइबर क्राइम के साथ रिश्तों को भी बिगाड़ने में अहम रोल निभा रहा है, मगर इस के खतरों से अनजान युवाओं और किशोरों को  नशे की तरह इस की लत लग चुकी है.

मोबाइल का गलत इस्तेसाल

टीनऐजर बच्चों में मोबाइल का इस्तेमाल जिस तरह से बढ़ रहा है उस में पेरैंट्स की जिम्मेदारी काफी बढ़ गई है. अभिभावकों के लिए यह चैक करना जरूरी है कि उन के बच्चे सोशल मीडिया अकाउंट पर क्या ऐक्टिविटी कर रहे हैं. यदि कुछ गलत दिखे या किसी अनहोनी की आशंका हो तो समय पर साइबर सैल की मदद ली जा सकती है.

आजकल औनलाइन डेटिंग ऐप्लिकेशन, लोन उपलब्ध कराने वाले ब्लैकमेलिंग ऐंड्रौयड ऐप्लिकेशन और मोबाइल डिवाइस को हैक कर अश्लील फोटो बना कर शोषण की खबरें कुछ ज्यादा आ रही हैं. फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि एड टूल्स के पहले दोस्ती फिर सुसाइड के मामले आए हैं. इसलिए ऐसे मामलों में पुलिस की मदद ले कर बचा जा सकता है.

मोबाइल ने युवकयुवतियों को इंटरनैट ऐडिक्ट बना दिया है. कोई कामधंधा करने के बजाय युवा सोशल मीडिया पर घंटों वक्त बरबाद कर रहे हैं. समाचारपत्र और पत्रिकाएं पढ़ने के बजाय युवा व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी और यूट्यूब चैनलों के अधकचरा ज्ञान को ही सबकुछ समझ रहे हैं. एक रिसर्च सैंटर की रिपोर्ट के अनुसार 13 से 17 वर्ष के 97त्न बच्चे 7 प्रमुख औनलाइन प्लेटफौर्मों में से कम से कम 1 का उपयोग जरूर करते हैं. इन के द्वारा सोशल साइट्स पर बिताया गया समय भी चौंकाने वाला है. एक रिपोर्ट से पता चलता है कि 13 से 18 साल की उम्र के औसत बच्चे हर दिन सोशल मीडिया पर लगभग 9 घंटे बिताते हैं.

बिगाड़ता है स्वास्थ्य

यही हाल युवाओं का है. सुबह से ले कर रात 12 बजे तक मोबाइल उन के हाथों से दूर नहीं होता. सोशल मीडिया पर बिताया गया अधिक समय साइबर बुलिंग, सामाजिक चिंता, अवसाद और उम्र के अनुरूप नहीं होने वाली सामग्री के संपर्क में आने का कारण बन जाता है.

जब आप कोई गेम खेल रहे होते हैं या कोई कार्य पूरा कर रहे होते हैं तो आप उसे पूरी  तन्मयता से करने की कोशिश करते हैं और जब  एक बार आप इस में सफल हो जाते हैं तो आप का मस्तिष्क आप को डोपामाइन और अन्य खुशी वाले हारमोन की खुराक देने लगता है, जिस से आप खुश हो जाते हैं.जब आप इंस्टाग्राम या फेसबुक पर कोई तसवीर पोस्ट करते हैं तो वही तंत्र काम करता है. एक बार जब आप अपनी स्क्रीन पर लाइक और कमैंट के लिए सभी सूचनाएं देखते हैं तो आप इसे पुरस्कार या प्रोत्साहन के रूप में स्वीकार कर लेंगे .

सोशल मीडिया (Social Media) बना ठगी का हथियार

14 मार्च, 2024 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर के मुरार थाना क्षेत्र में रहने वाली 72 साल की आशा भटनागर रिटायर्ड प्रोफैसर हैं. उन की 2 विवाहित बेटियां पुणे में रहती हैं और 1 बेटा अमेरिका में जौब करता है. रिटायर्ड प्रोफेसर आशा के पति की 2017 में मौत हो चुकी है. वे अब घर में अकेली रहती हैं. इसलिए ज्यादातर समय सोशल मीडिया का इस्तेमाल करती हैं. एक दिन एक महिला पुलिसकर्मी बन कर ठग ने बुजुर्ग महिला को मुंबई पुलिस के अफसर के सामने वीडियो कौलिंग के जरीए बात करने को कहा.

उस अफसर ने आशा से कहा आप को मालूम नहीं कि आप का नाम चाइल्ड पोर्नोग्राफी के केस में नामजद हैं, गंभीर मामला है. फिर उस ने अपने दूसरे साथी को अधिकारी बता कर बात कराई. इन लोगों ने घर के अंदर ही वीडियोकौल पर शिक्षिका को डिजिटली अरैस्ट कर लिया. अपने को किसी केस में फंसा हुआ जान आशा इतनी परेशान हो गईं कि दूसरे दिन उन्होंने बैंक जा कर अपनी 51 लाख रुपए की एफडी तुड़वा कर क्राइम ब्रांच के अफसरों के बताए श्रीनगर की पंजाब नैशनल बैंक व राजकोट के फैडरल बैंक के अकाउंट नंबरों पर रुपए जमा करवा दिए. अगले दिन आशा ने अपने परिवार वालों को पैसे डालने के बारे में बताया तब समझ आया कि उन के साथ फ्रौड हुआ है.

साइबर ठगी

आज के समय में मित्रों, परिवार और को वर्कर्स के साथ संपर्क में रहने का सब से लोकप्रिय और मनोरंजन वाला जरीया सोशल मीडिया प्लेटफौर्म ही है. मगर इन प्लेटफौर्म पर फ्रौड करने वालों की पैनी नजर रहती है. फ्रौड करने वाले यूजर्स को अपना निशाना पहले बनाते हैं. यहां पर यूजर्स पर सीधे अटैक करने के बजाय उन की निजी जानकारी चुराई जाती है और उस के बाद उन के बैंक अकाउंट पर हमला किया जाता है.

सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर यूजर्स को एक मैसेज मिलता है, जिस में उन्हें कुछ गिफ्ट या बैनिफिट्स का वादा करने वाले लिंक पर क्लिक करने के लिए इनवाइट किया करते हैं. जैसे ही यूजर्स इस प्रकार के लिंक पर क्लिक करते हैं तो उन के फोन या डिवाइस में कुछ ऐप डाउनलोड हो जाते हैं जो यूजर्स की जासूसी करने और साइबर क्रिमिनल्स को जानकारी भेजने के लिए तैयार किए गए होते हैं.

सोशल मीडिया पर जानकारी देने वाले सभी इन्फ्लुएंसर सही खबरे दें एैसा नहीं है. कुछ इन्फ्लुएंसर सोशल मीडिया पर झूठी जानकारी भी शेयर करते हैं, जिन को लोग सच मान लेते हैं.  कुछ कंपनियां भी अपने प्रोडक्ट को बेचने के लिए इस तरह के इन्फ्लुएंसर का सहारा  लेती हैं.

सोशल मीडिया का सब से बड़ा खतरा उस पर परोसा जाने वाला झूठ है. सभी राजनीतिक दलों ने अपनी आईटी सेल बना रखी है जो 24 घंटे ?ाठी खबरें फैलाने का काम कर रही हैं. कई दफा इन फेंक न्यूज को पढ़ कर लोग इन्हें सही मान लेते हैं जिस से समाज में भ्रम, वैमनस्य और हिंसा की घटनाएं देखने को मिलती हैं. युवा पीढ़ी के साथ कामकाजी वर्ग के लोग भी सोशल मीडिया के गुलाम बन चुके हैं. औफिस में काम के वक्त भी नौकरीपेशा लोग घंटों सोशल मीडिया साइट्स पर बिता रहे हैं.

सोशल मीडिया साइट्स पर किसी प्रकार का नियंत्रण नहीं है. फेसबुक, इंस्टाग्राम, ओटीटी पर पोर्न कंटैंट परोसा जा रहा है. सोशल मीडिया साइट्स पर लौग इन के लिए कोई ठोस प्रावधान और पहचान की जरूरत नहीं है. यही कारण है कि नाबालिग बच्चे भी अपनेआप को बालिग दिखा कर अपना प्रोफाइल बना लेते हैं और फिर इस नाजुक उम्र में ऐसे प्लेटफौर्म पर उपलब्ध कंटैंट को देखने के आदी हो जाते हैं और फिर साइबर ठगी या सैक्सुअल हैरसमैंट का शिकार बनते हैं.

पुलिस ने जारी की एडवाइजरी

हाल ही में भोपाल पुलिस द्वारा जारी की गई एडवाइजरी में बताया गया है कि सोशल मीडिया ब्लैकमेलिंग या साइबर क्राइम होने पर हैल्प लाइन 1930 पर संपर्क करें और भोपाल में मोबाइल नंबर 9479990636 पर भी अपनी शिकायत या समस्या बता सकते हैं. यदि आप का नाबालिग बच्चा  सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफौर्म पर वैब सीरीज आदि देख रहा है तो सतर्क रहें. कहीं आप का बच्चा ओटीपी कंटैंट के चक्कर में फंस चुका है तो उस की काउंसलिंग कराएं. परिवार के बीच बैठ कर उस से खुल कर चर्चा करें.

भोपाल शहर के पुलिस कमिश्नर हरिनारायणचारी मिश्रा के अनुसार सोशल मीडिया पर कई तरह के गिरोह सक्रिय हैं जो मासूमों और युवाओं को अपना शिकार बना रहे हैं. ऐसे में अभिभावकों को चाहिए कि बच्चों को गलत ट्रैक पर जाने से पहले ही आगाह करें. यदि समस्या ज्यादा बढ़ चुकी है तो तत्काल साइबर सैल की सहायता ले कर मामले को सुल?ाने पर परेशान होने से बच सकते हैं. सोशल मीडिया फ्रैंडशिप के बढ़ते चलन को ले कर भोपाल पुलिस ने अभिभावकों के लिए एडवाइजरी जारी की है, जिस में आगाह किया है कि सोशल मीडिया फ्रैंडशिप में सर्तकता और सावधानी रखना बेहद जरूरी है.

सोशल मीडिया साइट्स के उपयोग में बरतें सावधानी

सोशल मीडिया पर बिना जांचपड़ताल के किसी अनजान से दोस्ती न करें.

सोशल मीडिया साइट्स पर पर्सनल वीडियो, फोटो या पर्सनल बातें बताने से बचें.

बगैर पुख्ता पहचान के किसी शख्स को पैसे न भेजें और न ही किसी तरह के लिंक पर क्लिक करें.

अपने साथ ठगी, ब्लैकमेलिंग होने पर तुरंत लोकल पुलिस स्टेशन में अपनी शिकायत दर्ज कराएं.

अनजान नंबरों से आने वाली व्हाट्सऐप कौल को अटैंड न करें.

यदि फेसबुक मैसेंजर से कोई अपने परिचित की आईडी से पैसों की डिमांड करता है तो एक बार अपने परिचित को फोन कर के कन्फर्म जरूर कर लें.

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