AR Rahman Divorce : 29 सालों बाद एआर रहमान और सायरा बानो ले रहे हैं तलाक, सिंगर का छलका दर्द

AR Rahman Divorce :’तलाक’ ये शब्द कितना हलका होता जा रहा है. अब लोगों की शादी महीनों में टूट जाती है. कुछ लोग तो 29-30 सालों तक साथ रहने के बावजूद भी एकदूसरे से तालमेल नहीं बिठा पाते और उनके बीच इतनी दूरियां बढ़ जाती है कि बात तलाक तक पहुंच जाती है. हालांकि एक तरह से ये सही भी है कि अगर कपल को लगता है कि आगे की जिंदगी साथ रहने से ज्यादा मुश्किल हो सकती है, तो तलाक लेना बेहतर औप्शन है. घुटघुुट कर जीने से अच्छा है कि साथी को आजाद करे और अपनी जिंदगी शर्तों पर जिएं.

सिंगर एआर रहमान ले रहे हैं तलाक

सिनेमा जगत से एक बड़ी खबर आ रही है कि म्यूजिक कंपोजर और सिंगर एआर रहमान 29 सालों बाद अपनी पत्नी सायरो बानो से तलाक ले रहे हैं. हर कोई इस खबर को सुनकर हैरान है. पहले तो कुछ लोगों को लगा कि ये फेक न्यूज है, लेकिन एर रहमान के बच्चों के भी इस पर रिऐक्शन आने लगे, तो उनके फैंस को मानना पड़ा कि इस खबर में सच्चाई है. 1995 में एर रहमान की शादी सायरा बानों से हुई. यह अरेंज मैरिज थी. कपल के बीच कुछ सालों से रिश्ता ठीक नहीं चल रहा था. जिसके बाद उन्होंने अलग होने का फैसला किया.

एआर रहमान और सायरा बानो क्यों हो रहे हैं अलग

सायरा बानो की वकील वंदना शाह ने एक बयान जारी कर बताया कि ‘कई सालों की शादी के बाद, मिसेज सायरा ने अपने पति एआर रहमान से अलग होने का यह मुश्किल फैसला लिया है. यह फैसला उनके रिश्तों में बहुत ज्यादा तनाव आने की वजह से लिया गया है. बेहिसाब प्यार के बावजूद दोनों ने पाया कि इस तनाव ने उनके बीच एक बड़ा गैप क्रिएट किया है’.

एआर रहमान ने बयां किया दर्द

एआर रहमान ने भी एक्स पर एक पोस्ट शेयर किया है. और इसमें लिखा कि ‘हमें उम्मीद थी कि हम 30 साल पूरे कर लेंगे, लेकिन ऐसा लगता है कि सभी चीजों का एक अनदेखा अंत होता है. उन्होंने आगे लिखा कि टूटे हुए दिलों के वजन से ईश्वर का सिंहासन भी हिल सकता है. फिर भी, इस बिखराव में, हम अर्थ तलाशते हैं, भले ही टुकड़ों को फिर से अपनी जगह न मिले. हमारे दोस्तों, इस नाजुक दौर से गुजरते समय हमारी निजता का सम्मान करने के लिए धन्यवाद.’

रहमान की मां ने सायरा को किया था पसंद

रहमान-सायरा की शादी 12 मार्च 1995 को हुई थी. उस समय सायरा की उम्र 28 साल थी और रहमान 29 साल के थे. उनके मां के पसंद की सायरा थी. एक इंटरव्यू के अनुसार, रहमान ने बताया था कि उनके पास दुल्हन की तलाश करने का समय नहीं था. लेकिन, उन्हें पता था कि शादी करने का यह सही समय है. उन्होंने अपनी मां से कहा था- ‘मेरे लिए दुल्हन ढूंढ़ो.’

तीन बच्चों के पैरेंट्स हैं रहमान-सायरा

रहमान-सायरा के तीन बच्चे हैं. दो बेटियां और एक बेटा. वह अपने निजी जीवन के बारे में कम ही बात करते थे. रहमान अपने प्रोफेशनल लाइफ को लेकर चर्चे में रहते हैं. बेटे अमीन ने इंस्टाग्राम स्टोरीज में लिखा है “हम सभी से अनुरोध करते हैं कि इस समय हमारी निजता का सम्मान करें.”

एआर रहमान को मिल चुका है औस्कर अवार्ड

आपको बता दें कि एआर रहमान भारत के सबसे बड़े म्यूजिक कंपोजर में से एक है. वह स्लमडाग मिलियनेअर फिल्म के लिए औस्कर अवार्ड जीत चुके हैं. 5 साल की उम्र से ही एआर रहमान ने संगीत की यात्रा शुरू कर दी थी. रहमान बतौर संगीतकार फिल्म ‘रोजा’ में काम किया था. इस फिल्म में उनका म्यूजिक हिट रहा और इसके लिए उन्हें बैस्ट म्यूजिशियन का नेशनल अवार्ड भी मिला.

शायद: क्या हो पाई निर्वाण और प्रेरणा की दोस्ती?

‘‘मेरेसपनों को हकीकत में बदलने वाले आप क्या हो, आप नहीं समझ सकते. आप के लंबे से घने ब्राउन बालों में उंगलियां फिराना ऐसा है जैसे जंगल की किसी घनेरी शाम में अल्हड़ प्रेमी के साथ रात बिताने का ख्वाब. आप का चेहरा तो जैसे भोर का सूरज. 6 फुट की आप की बलिष्ठ काया मेरे लिए तूफान का रास्ता रोक लेगी. प्रद्युमन, मैं वापस आऊंगी तो आप प्रांजल को एक भाई देंगे वादा करो… आप के शरीर का अंश अपनी देह में सजाना चाहती हूं मैं.’’

‘‘प्रेक्षा, अभी तुम्हारी पढ़ने की उम्र है. इन खयालों को अब दिल से निकाल फेंको. तुम्हें कई सालों से यही समझा रहा हूं मैं… विद्या साधना मांगती है. तुम्हारा ध्यान इतना भटकता क्यों है? क्यों तुम अपने मन को इतनी खुली छूट देती हो? कैरियर बनाने का समय है यह, यह क्यों नहीं समझती?’’

‘‘चलो कुछ भी नहीं कहूंगी आप से फिर कभी, बल्कि बात ही नहीं करूंगी आप से.’’

‘‘प्रेक्षा,’’ वे उसे अपनी ओर खींच आलिंगन में बांध उस के होंठों पर मिठास से भरपूर चुंबन रख देते हैं. फिर कहते हैं, ‘‘तुम्हारा कैरियर से ध्यान न बंटे यही चाहता हूं न मैं.’’

‘‘पर मेरा ध्यान तुम्हारी ओर तब तक रहेगा जब तक तुम मुझ पर पूरी तरह ध्यान नहीं दोगे,’’ मोहपाश में डूबीडूबी सी प्रेक्षा ने प्यार जताया.

‘‘मेरे प्यार को नहीं समझती तुम?’’

‘‘समझती हूं, तभी तो तुम्हारे आगोश में डूबी रहना चाहती.’’

‘‘अब तो तुम 19 साल की हो गई, बड़ी हो गई हो न… अब और ध्यान न भटकने दो… तुम्हें इतनी दूर पिलानी भेज कर मैं कितना चिंतित रहूंगा मैं ही जानता हूं, लेकिन हमेशा रिजल्ट अच्छा करोगी तो ये 4 साल निकाल ही लूंगा.’’

‘‘तुम्हारे ऊपर सालभर के प्रांजल की जिम्मेदारी दे कर जा रही हूं. एक तो पहले तुम्हारा ही खानेपीने और सोने का ठिकाना न था, कोई देखभाल को न था. अब कोचिंग की जिम्मेदारी के साथ मेरी गलती का खमियाजा भी… सौरी प्रद्युमनजी मुझे माफ कर दो.’’

एक बार फिर प्रेक्षा को प्रद्युमन ने कस कर आलिंगन में बांध लिया. प्यार से उस का कान मरोड़ते हुए बोले, ‘‘इस छोटी सी नासमझ बच्ची को अब बड़ीबड़ी बातें करना आ गया है… अब जरूर अपनी जिम्मेदारी ठीक तरह समझेगी. तुम प्यारी बच्ची हो. तुम्हारे लिए सबकुछ करूंगा, पिलानी से पढ़ाई खत्म कर के आओ तुरंत प्रांजल को एक बहन से नवाजूंगा.’’

प्रेक्षा ने प्रद्युमन का माथा चूमते हुए कहा, ‘‘हां ठीक है, लेकिन खबरदार जो फिर कभी बच्ची कहा.’’

समंदर सी गहरी और चांद सी शीतल नजर डाल प्यार से निहारते हुए प्रद्युमन ने कहा, ‘‘चलोचलो, ट्रेन का समय हो रहा है?’’

प्रद्युमन प्रांजल को गोद में उठाए सामान सहित प्रेक्षा को लिए स्टेशन की ओर निकल गए.

प्रेक्षा जिस से इतना लाड़ जता रही थी वे प्रद्युमन हैं. 44 साल के नौजवान से दिखते अधेड़. इन का अपना दोमंजिला मकान है, पुराना है. इन के पिता का मकान, जिन्हें अभीअभी इन्होंने नए सिरे से सजा कर कुछ लग्जरी रूप दिया है. वैसे तो वे शौकीनमिजाज ही हैं, लेकिन कारण यह भी है कि इन के घर अब एक परी जो हमेशा के लिए आ गई है उन की प्रेक्षा.

जिंदगी से जूझती बिस्तर पर पड़ी मां के काफी करीब रहे प्रद्युमन. उन का हर काम अपने हाथों से करने के लिए उन्होंने कभी नौकरी की तलाश ही नहीं की, जबकि मैथ बेस्ड साइंस के स्कौलर हैं वे.

इकलौता बेटा और बीमार मां, एकदूसरे को ले कर स्नेह की डोर में

बंधे, एकदूसरे को ले कर असुरक्षित. कभी शादी का खयाल न आतेआते 42 साल के हो चुके थे प्रद्युमन, जब प्रेक्षा से उन का पाला पड़ा. हां, पाला ही. समझ जाएंगे क्यों.

अपनी इच्छाओं और वासनाओं को मार कर मां के प्रति अदम्य सेवा की भावना से ओतप्रोत यह शख्स अपनी कोचिंग में आने वाले बच्चों के प्रति भी बहुत संवेदनशील था. प्रद्युमन हर बच्चे से साल के क्व10 हजार लेते, लेकिन बदले में उन की सफलता के प्रति इस से 10 गुना ज्यादा समर्पित रहते. इन में से कई बच्चे खुद ही अपने कैरियर के प्रति जागरूक थे, लेकिन कई बच्चे ऐसे भी थे, जिन्हें सही दिशा में प्रेरित करने के लिए उन्हें बड़ी जुगत लगानी पड़ती. इन्हीं में एक प्रेक्षा थी. यह 17 साल की 11वीं कक्षा में पढ़ती एक दुबलीपतली बालिका थी. थी तो वह छोटी सी बालिका, लेकिन अब जैसे उस की काया में वसंत का उल्लास बस प्रकट होने ही वाला था. वह पढ़ने में खासकर मैथ में तेज थी, लेकिन उम्र का कच्चापन उस के मन के बालक को हमेशा ही इधरउधर दौड़ा देता. वह भटक जाती… पढ़ाई कम होती. प्रेम विलास के सपने ज्यादा देखे जाते, कैरियर पर फोकस उसे ऊबा देता.

प्रद्युमन की मां का देहांत हो गया. कुछ दूर के रिश्तेदारों का आनाजाना लगा, कई लोग कई तरह की सलाह ले कर आगे आए. उन में से एक मुख्य सलाह थी कि प्रद्युमन की मां के खाली कमरे को वह पेइंग गैस्ट के रहने के लिए दे दे. दरअसल, एक रिश्तेदार के पहचान के लड़के को इस शहर में एक कमरा चाहिए था, जहां पेइंग गैस्ट की तरह रह कर वह 12वीं कक्षा के बाद कोचिंग इंस्टिट्यूट में इंजीनियरिंग की तैयारी कर सके.

रिश्तेदार ने प्रद्युमन को उस की मां के जाने के बाद के अकेलापन भरने के लिए इतना समझाया कि आखिर प्रद्युमन भी इस बात पर राजी हो गए कि उस लड़के को पेइंग गैस्ट की तरह रहने दिया जाए. बुरा भी क्या था अगर कुछ रुपए और आ रहे हैं? सच तो यह भी था कि आजकल मां का खाली कमरा उन्हें बारबार मां की याद दिलाता और वे दुखी हो जाते.

इस विकल्प में प्रद्युमन की सहमति की मुहर लगते ही रिश्तेदार के पहचान के लड़के की समस्या हल हो गई.

गेहुआं रंग, मध्यम हाइट, हाथ में एक सूटकेस, पीठ पर बैग और दूसरे हाथ में गिटार ले कर निर्वाण आ पहुंचा. घर के पीछे की सीढि़यों से ऊपर का कमरा बता दिया प्रद्युमन ने. निर्वाण इस बड़े शहर में इंजीनियरिंग कोचिंग के लिए आया था. उस के छोटे से शहर में इस तरह की अच्छी कोचिंग की सुविधा नहीं थी

और एक नामी इंस्टिट्यूट में कोचिंग के लिए भेजने का मतलब ही था उस के घर वालों का अटैची भर कर सपनों का बोझ साथ भेजना. उसे पूरी तैयारी के साथ जेईई की ऐंट्रेंस परीक्षा में बैठना था.

प्रद्युमन के घर निर्वाण को सारी सुविधाएं थीं. पढ़ाई के साथसाथ वह आसानी से गिटार के रियाज का समय भी निकाल लेता था. गिटार उस का पैशन था. जब वह एक के बाद एक गानों की धुन पर उंगलियां थिरकाता तो नीचे कोचिंग में बैठी प्रेक्षा अपनी सुधबुध खो देती. महीन सपने सतरंगी रथ पर बैठ इंद्रधनुष के पार चले जाते. अनुभूतियां सिहर कर सिर से पांव तक दौड़ जातीं और जब वह चौंक कर देखती तो गणित के सवाल पर उस की कलम मुंह के बल चारों खाने चित्त पड़ी मिलती.प्रद्युमन की सभी बच्चों पर बराबर नजर थी, लेकिन प्रेक्षा पर उन का ध्यान आजकल ज्यादा ही रहता. परीक्षाएं शुरू होने वाली थीं पर इस लड़की का हाल कुछ सही नहीं था. सारा सिखाया हुआ भूलती जा रही थी, स्कूल की कौपी में बारबार खराब प्रदर्शन था. डांटने और चिंता व्यक्त करते रहने से जब प्रेक्षा पर कोई असर नहीं हुआ तो प्रद्युमन ने एक दिन अकेले में उसे रोक लिया. वे कुरसी पर बैठे थे. प्रेक्षा सिर झुकाए सामने खड़ी थी. उन में बातचीत कुछ यों हुई-

‘‘और कितना समझाऊं तुम्हें? क्यों न अब तुम्हारे पापा को खबर करूं? पर वे इतना रुपया खर्च कर रहये हैं… कुछ तो उम्मीद होगी तुम से… मैं यह नहीं कहता कि सौ प्र्रतिशत लाओ, लेकिन कुछ तो रिटर्न दोगी उन्हें.’’

‘‘पापा से न कहना प्लीज.’’

‘‘क्यों? उन्हें पता चलना चाहिए?’’

‘‘पापा को इस कोचिंग के बारे में पता नहीं है.’’

‘‘क्यों क्व10 हजार तुम्हारी मां ने तो दिए नहीं होंगे… नौकरी तो वे करती नहीं.’’

‘‘मां ने ही दिए, अपने कुछ गहने बेच कर.’’

‘‘क्या समस्या है? मुझे बताओ?’’

‘‘हम 3 बहनें हैं, मां चाहती हैं हम तीनों ही खूब पढ़ेलिखें और घर में लड़कों की कमी को पूरा करें, पर पापा को इन बातों से चिढ़ है. खासकर मुझ से… मेरी जगह उन्हें एक लड़के की चाह थी.

‘‘मेरी दीदी मुंबई में नौकरी करती हैं. वे वहां बहुत खुश हैं. वे अपने बौयफ्रैंड से शादी करने वाली हैं, हमें हमेशा ढेरों तसवीरें दिखाती रहती हैं… उन्हें पापा से अब कोई मतलब नहीं और न ही पापा उस की जिंदगी में दखल देते हैं. हम दोनों बहनों की वे जल्द शादी कर देंगे, लेकिन मैं अपनी पसंद की जिंदगी जीना चाहती हूं.’’

प्रद्युमन ने प्रेक्षा के घर वालों से सलाह करने की बात छोड़ दी, लेकिन उन की चिंता दिनोंदिन बढ़ती गई.

चोरीछिपे वैसे तो निर्वाण से प्रेक्षा की नजरें टकरातीं, लेकिन जहां इस की प्रेरणा ही हो वहां रोके से कौन रुका है? तो दोस्ती की शुरुआत कुछ इस तरह हुई-

निर्वाण ऊपर अपने कमरे में गिटार बजा रहा था. उस की धुनों ने प्रेक्षा की

कोमल कल्पनाओं में पंख लगा दिए. एक दिन उस ने जल्द पढ़ाई खत्म कर घर जाने की छुट्टी मांगी और अपना बैग समेट कर बाहर निकल आई. पीछे की  सीढि़यों का रास्ता पकड़ा उस ने और सीधे निर्वाण के कमरे के दरवाजे की ओट पकड़ कर लगभग उस के सामने खड़ी हो गई. आंखों में प्रशंसा, होंठों पर सलज्ज मुसकान, कच्ची सी कली का आगे बढ़ कर इस तरह मान प्रदर्शन नए शहर में नई उम्र के लड़के को भला क्यों न अच्छा लगता? इश्क की बग्घी चल पड़ी उन की. अब दोनों को अपनी इस भरी व्यस्तता के बीच प्यार के लिए भी समय निकालना था. दोनों तालमेल बैठाते रहे.

परीक्षाएं शुरू हो चुकी थीं. प्रेक्षा की तबीयत कुछ दुविधा में डालने वाली थी. घबराहट, भय, निर्वाण को खोने की शंका ने उसे परेशान कर दिया था. जैसेतैसे परीक्षा में ध्यान लगाने के बावजूद वह 11वीं कक्षा की परीक्षा में सफल नहीं हो पाई.

प्रद्युमन मर्माहत थे. उन की स्थिति कुछ विकट हो गई. उन्होंने प्रेक्षा की मां से प्रेक्षा की ट्यूशन फीस ली हुई थी. लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद प्रेक्षा का प्रदर्शन बचा नहीं पाए. उन्होंने प्रेक्षा से बातचीत बंद कर दी. प्रेक्षा भी अब यहां नहीं आ पा रही थी.

समय कुछ और बीत गया. निर्वाण का जेईई में चयन हो गया और फिर रातोंरात वह प्रद्युमन से हिसाब चुकता कर के ज्यादा कुछ बोले बिना निकल गया.

इस के 10 दिन के बाद प्रेक्षा प्रद्युमन के घर आई और सब से पहले बेचैन सी निर्वाण को मिलने ऊपर गई. अपने अंदेशे को निर्वाण से साझा करना था उसे, लेकिन खाली कमरे की दीवारों ने उस के गाल पर करारा थप्पड़ जड़ दिया. वह हैरान सी हर दीवार को ताकती रही. वह दौड़ती हुई नीचे आई. ट्यूशन वाले बच्चों की आज छुट्टी थी.

वह प्रद्युमन के आगे जा कर खड़ी हो गई. बड़ा रोष था मन में. कहीं प्रद्युमन सर ने ही तो जाने का रास्ता नहीं दिखा दिया उसे? उन्हें पता तो चल ही रहा था उन दोनों के बारे में… सोचते हुए प्रेक्षा की सांसें फूल आईं. वह अपनी परीक्षा और रिजल्ट के बारे में भूल चुकी थी. निर्वाण के साथ उस के भविष्य के सपनों की चिंदीचिंदी बिखर जाना अभी उस का सब से बड़ा सच था और जिस के लिए प्रद्युमन नामक वास्तव के इस कठोर धरातल को वह पहला जिम्मेदार मान चुकी थी.

लुटीपिटी हांफती वह प्रद्युमन से पूछ रही थी, ‘‘निर्वाण क्यों चला गया? रोष से भरी प्रेक्षा लगभग फट पड़ी थी प्रद्युमन पर.’’

प्रद्युमन अचरज से भर गए, लेकिन तुरंत उन्हें प्रेक्षा की स्थिति का भान हुआ और फिर कुछ सहज हो गए. प्रेक्षा का हाथ पकड़ कर सब से पहले तो वे उसे अपने नजदीक लाए और फिर कहा, ‘‘प्रेक्षा, मैं ने निर्वाण से जाने को नहीं कहा. तुम वहम में इतना डूब गई हो कि तुम्हारे सिर के ऊपर से कितने ही युग निकल कर चले गए, तुम्हें पता ही नहीं चला. तुम 11वीं कक्षा में फेल हो चुकी हो. निर्वाण की कोचिंग समाप्त हो चुकी है. उस ने अपने सपने को पकड़ लिया है. उस का इंजीनियरिंग में चयन हो गया है और वह वापस चला गया, तुम्हें कुछ भी बताए बिना. अब तुम भी होश में आओ, उसे लगभग झंझोड़ते हुए प्रद्युमन आवेश में आ गए थे.

प्रेक्षा रोते हुए वहीं जमीन पर बैठ गई. उसे अब सबकुछ लुटपिट जाने का आभास  होने लगा था. वह देर तक जमीन पर बैठी रोती रही.

प्रद्युमन वहां से उठ कर अपने कमरे में चले गए. कुछ देर बाद प्रेक्षा अपने चेहरे पर पानी डाल थोड़ा शांत हुई और फिर प्रद्युमन के पास गई. जाते ही सीधे बोल पड़ी, ‘‘निर्वाण ने कहा था वह मुझ से शादी करेगा. उस ने मुझ से वादा किया और मुझे यह अंगूठी भी दी थी.’’

‘‘यह अंगूठी बनावटी है आर्टिफिशियल… उस के वादे की तरह.’’

‘‘मैं ने अंगूठी नहीं, उस की भावना देखी थी?’’

‘‘यह अंगूठी नहीं लाइसैंस था संबंध बनाने का… सब सौंप दिया या कुछ बचा भी? माफ करना मैं मजबूर हूं ये सब पूछने को… तुम ने मुझे बेइज्जत करने का पूरा इंतजाम कर दिया… तुम्हारी मां को क्या कहूंगा मैं?’’

‘‘नहीं पता यह लाइसैंस था या कुछ और… मैं क्या चाहती थी, खुद ही नहीं समझ पाई.’’

‘‘अब क्या? पापा से कहो जा कर अपने.’’

‘‘घर में कह पाती तो आप के पास कहने क्यों आती? आप निर्वाण से कहो न एक बार.’’

‘‘कैसी लड़की हो तुम? जानती हो उस ने तुम्हें बताया नहीं ताकि तुम से संपर्क न रहे, फिर भी… मैं ने उस के दिए नंबर पर पहले ही फोन कर के देख लिया है… सब खत्म है… सब खत्म है… उस का नंबर भी जीवित नहीं है?’’

‘‘मेरी तबीयत ठीक नहीं उस से नहीं तो किस से कहूं?’’ हताश हो कर चीख पड़ी प्रेक्षा.

‘‘मुझ से कहो… मैं ही ले जाऊंगा तुम्हें डाक्टर के पास और कौन है तुम्हारी इन बचकानी हरकतों से निबटने के लिए?’’ प्रद्युमन ने बड़ी सरलता से कहा.

मगर पहले से छली गई कमजोर प्रेक्षा मन ही मन अमरबेल सी प्रद्युमन से लिपट गई. उस पर निर्भर होने की प्रेरणा पैदा होने लगी उस में. बोली, ‘‘ले चलिए डाक्टर के पास जल्दी?’’

‘‘मां को नहीं बताओगी?’’

‘‘शायद नहीं.’’

शक सही ही था प्रेक्षा का, वह 5 महीने के गर्भ से थी. बात सिर्फ अब भविष्य की ही नहीं, बल्कि वर्तमान की भी थी. प्रद्युमन आश्चर्य में थे… प्रेक्षा बुझ गई थी.

निर्वाण तक पहुंचने के लिए अगर रिश्तेदार का सूत्र पकड़ा जाए तो बात को जंगल की आग बनते देर नहीं लगेगी… प्रद्युमन की भी बदनामी होगी सो अलग… गैरजिम्मेदार ठहराया जाना उन के लिए बेहद दुखदाई होगा.

प्रद्युमन की कोचिंग तो चल रही थी, लेकिन आजकल वे बड़े अनमने से रहते. प्रेक्षा के पिता को अगर भनक लगी तो प्रेक्षा के साथसाथ उस की मां और दूसरी बहनों की जिंदगी भी नर्क बन जाएगी. अब तक तो प्रेक्षा के घर में उस के फेल होने तक की ही खबर थी… दूसरी बड़ी खबर तो भूचाल ही ला देगी.

प्रद्युमन ने प्रेक्षा के लिए मंझधार में खेवैया की भूमिका ली और उसे किनारे पर लाने का जिम्मा उठाया. लेडी डाक्टर ने हाथ खींच लिया था. प्रेक्षा की मैडिकल कंडीशन बच्चे को नष्ट करने की इजाजत नहीं देती थी.

मुसीबत दोगुनी हो चुकी थी. असहाय सी प्रेक्षा प्रद्युमन के कमरे में

बैठी थी. वे नीचे कोचिंग में सभी को जल्दी छुट्टी दे कर ऊपर आ गए. कुरसी पर रोनी सी सूरत बना कर बैठी प्रेक्षा के सिर पर उन्होंने हाथ फिराया और अपने पलंग पर आ कर बैठ गए. फिर उसे अपने पास बुलाया, ‘‘मेरे करीब आ कर बैठो.’’

प्रेक्षा यंत्रचालित सी उन के पास पलंग पर जा कर बैठ गई.

‘‘बताओ मैं क्या करूं? न अबौर्शन की गुंजाइश है और न बच्चे को बिना पिता के सामने लाने की. अबौर्शन की स्थिति में तुम्हारी जिंदगी पर बन आए यह तो कभी नहीं चाहूंगा मैं… रही बात बच्चे की, तो अकेली तुम इस हालत में नहीं हो कि इस अजन्मे को बचाने के लिए तुम समाज की पाबंदियों से टकरा सको… कैसे सुलझाऊं प्रेक्षा… जब घर में भी मुश्किलें थीं तो बाहर भटकी क्यों?’’

‘‘घर की मुश्किलों की वजह से ही तो बाहर भटक गई… पर आप बहुत कुछ कर सकते हैं. आप… आप मुझे अपना लीजिए.’’

‘‘क्या कह रही हो? कुछ तो सोच कर बोलो?’’

‘‘आप ने अपना लिया तो मैं आप की खूब सेवा करूंगी, फिर आप को कभी शिकायत का मौका नहीं दूंगी… प्रौमिस.’’

‘‘तुम क्या बोल रही हो प्रेक्षा? मैं 43 साल का हो चुका हूं… तुम अभी 18 साल की हो… उम्र का फर्क नहीं समझती हो? कैरियर भी पड़ा है सामने.’’

‘‘ठीक है, फिर मैं मरने जा रही हूं,’’ प्रेक्षा ने रोते हुए कहा, ‘‘मैं इस घर से बाहर नहीं जाना चाहती, लोग खा जाएंगे मुझे.’’

प्रद्युमन लगातार उसे समझाने की कोशिश कर रहे थे, ‘‘प्रेक्षा, शरण एक बात है और शादी दूसरी… मैं तुम्हें शरण दे सकता हूं, तुम्हारे लिए हजार बातें सुन सकता हूं, लेकिन शादी के लिए मेरे हिसाब से प्रेम जरूरी है वरना वह समझौता हो जाता है और समझौते की एक न एक दिन मियाद खत्म होती ही है.’’

‘‘तो आप नहीं कर सकेंगे प्रेम मुझ से? न सही, मैं करती हूं आप से… जब मेरा और आप का कोई नाता नहीं तो फिर आप मुझे ले कर इतना परेशान क्यों रहने लगे. अब शायद आप से दूर जा कर मैं नहीं रह पाऊंगी… जी नहीं पाऊंगी आप के बिना… आदत हो गई है आप की मुझे… और क्या पता उम्र के फासले ने मुझ में इतनी हिम्मत नहीं दी थी कि मैं यह बात स्वीकार पाती कि आप… शायद मैं कहीं और बह गई… इन दिनों जब मुझे खुद के अंदर झांकने का मौका मिला तो धीरेधीरे मेरे दिल में आप की तसवीर साफ होने लगी है,’’ कह प्रेक्षा ने प्रद्युमन के कंधे पर अपना सिर रख दिया और चुप हो गई.

प्रद्युमन अपनी तरफ से उसे छुए बिना दीवारों को ताकते शांत बैठे रहे.

इन दोनों की मैरिज की रजिस्ट्री हो चुकी थी. कुछ गिनेचुने रिश्तेदार, प्रेक्षा के मातापिता और बहनें ही थे उन के विवाह के साक्षी. प्रद्युमन ने सब के सामने स्वीकारा कि प्रेक्षा के प्रति मेरे प्रेम के अतिरेक ने प्रेक्षा को इस स्थिति में डाला, प्रेक्षा बेकुसूर है और हम दोनों का प्रेम सच्चा है. उम्र की खाई भले ही गहरी है, लेकिन प्रेक्षा को एक अभिभावक बन कर सहारा दूंगा मैं ताकि उस का कैरियर फिर से रफ्तार पकड़ सके. प्रेक्षा और बच्चे की जिम्मेदारी अब मेरी है. अब किसी को फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं.

प्रेक्षा को बेटा हुआ. प्रद्युमन ने सारी जिम्मेदारी उठा ली और प्रेक्षा जीजान लगा कर इंजीनियरिंग की परीक्षा पास कर इंजीनियरिंग पढ़ने पिलानी चली गई. दिन दूनी पढ़ाई और चौगुनी सफलता उस के कदम चूम रही थी.

तब प्रेक्षा सैकंड ईयर में पहुंची थी. लास्ट बैच के सीनियर

स्टूडैंट पासआउट हो कर कालेज छोड़ रहे थे. स्टूडैंट और फैकल्टी मैंबर्स की एकसाथ तसवीरें ली गईं.

प्रेक्षा ने यह तसवीर भेजी थी प्रद्युमन को. प्रोफैसरों के पीछे की लाइन में एक किनारे जानापहचाना सा एक चेहरा दिखा. यह निर्वाण था. प्रद्युमन अपने बिस्तर पर बेटे को सुलाने के बाद तसवीर को गौर से देखते रहे. मोबाइल में भेजी गई तसवीर के इस खास चेहरे को जूम कर के कई बार देखा, कई बार प्रेक्षा के चेहरे को भी जूम किया उन्होंने जो सैकेंड ईयर की लाइन में खड़ी थी.

सबकुछ सामान्य था, लेकिन प्रद्युमन का दिल जोर से धड़कने लगा. वे सोच में पड़ गए कि क्यों डर लग रहा है मुझे जब खुद प्रेक्षा ने ही आगे बढ़ कर मेरे दिल में अपना बसेरा बनाया है? क्या पता वक्त की जरूरत थी.

शायद वह अकेली पड़ गई थी और उसे उसी वक्त एक सशक्त संबल की जरूरत थी. क्यों मैं उस का इतना ध्यान रखने लगा था? क्यों उस की परेशानियां मुझे दिनरात बेचैन किए थीं? क्यों प्रेक्षा की ओर से शादी का प्रस्ताव मुझे हास्यास्पद नहीं लगा जबकि यह इतना बेमेल है? क्या पता प्रेक्षा ने भी मुझ को चाहा हो या फिर मैं ठगा गया? नहीं पता कौन सही है?

क्या पता फिर से वहां निर्वाण का मिलना प्रेक्षा को कमजोर कर दे… आखिर निर्वाण के साथ अनगिनत रोमांस की यादें हैं उस की… वह प्रांजल का पिता भी तो है… तीनों साथ हो जाएं तो मेरी क्या जरूरत रह जाएगी प्रेक्षा के लिए?

मोबाइल रख कर प्रद्युमन बेटे को पीछे छोड़ करवट ले कर सो गए. नींद भला कैसे आती? कभी ऐसा किया था उन्होंने? हमेशा तो नन्ही जान को सहलाते हुए ही सोते रहे हैं.

मन उचाट था कि अगर प्रेक्षा के लिए बोझ सा बनने लगा मैं तो देर किए बिना उस की जिंदगी से निकल जाऊंगा.

सुबहसुबह प्रेक्षा का फोन आ गया था. प्रांजल को खिला कर वे खुद के लिए नाश्ता बना रहे थे.

‘‘बहुत दिन हो गए अब एक बार यहां आ जाओ… प्रांजल को कितने दिनों से नहीं देख मैं ने… उसे गोद में नहीं लिया… एक बार दिखाओगे न?’’

‘‘हां, आ जाऊंगा.’’

‘‘कुछ और नहीं कहोगे?’’

‘‘नाश्ता बना रहा हूं?’’

‘‘अच्छाअच्छा… जल्दी आना…’’

फोन रख देने के बाद काम करते हुए प्रद्युमन कुछ यों सोचते रहे कि निर्वाण का कोर्स खत्म, अब जाने वाला होगा वह… बेटे को बुलवा रही है. शायद अब प्रेक्षा मुझे अंतिम सत्य सुनाने के लिए बुला रही है. सही भी तो है, मेरी उम्र उस के लिए दोगुनी से भी ज्यादा है, जब उसे उस का पहला प्यार मिल ही गया है तो मैं इन के बीच क्या कर रहा हूं? कुछ सोचसमझ कर ही उस ने तसवीर भेजी होगी.

तय वक्त पर वे प्रांजल को ले कर प्रेक्षा के पास पहुंचे. इस मिलन में प्रद्युमन के दिलोदिमाग पर विरह का गीत छाया रहा. प्रेक्षा को देख वे कुछ समझ नहीं पा रहे थे. सोचते तिरिया चरित्र बलिहारी. अंत में एक बार फिर से सब खत्म कर देगी.

प्रेक्षा ने कालेज और होस्टल से 3-4 दिन की छुट्टी ले ली थी. वे होटल में ठहरे थे. यह पहला दिन था. वह दोनों के साथ मौजमस्ती में मग्न रही. प्रद्युमन उस की खुशी में साथ था, लेकिन अपने दुख के साथ.

अंतत: रात को जब प्रांजल सो गया और अंधेरे की घनी सांसें दोनों को बाहुपाश में बांधने लगीं तब प्रद्युमन ने प्रेक्षा से धीरे से पूछा, ‘‘निर्वाण से नहीं मिलवाया तुम ने? वह यहीं पढ़ता रहा इतने दिन?’’

क्यों? उस से हमारा क्या काम? वह तो कोर्स खत्म कर के कब का जा चुका… उस की एक नहीं अब 2-2 गर्लफ्रैंड्स हैं और दोनों ही शादी की आस में बारीबारी से घूम रही हैं उस के इर्दगिर्द. कुछ लोग अपनी बुरी आदतों से ताउम्र बाज नहीं आते. मैं ने तो उसे यहां आते ही देख लिया था, लेकिन कभी उस से मुलाकात नहीं की. उस ने भी दूर ही रहना ठीक समझा… वह मेरी भूल थी. क्यों दोहराऊं भूल को बारबार? तब तुम से कहने का मुझ में साहस नहीं था और निर्वाण की ओर मुड़ गई थी… मुझे लगता था कि तुम से वैसा कुछ कहूंगी तो तुम खफा हो कर मुझे पढ़ाना छोड़ दोगे.’’

प्रद्युमन ने उसे अपनी ओर जोर से खींचते हुए पूछा, ‘‘क्या कुछ कहती, अब कह दो.’’

आंखें बंद हो गई थीं प्रेक्षा की. प्रद्युमन के कसे होंठों की गरमी उस की पलकों पर थी. वे आहिस्ताआहिस्ता प्रेम की गहराई को समझते रहे… उस के पार एक सपनों वाली झील में उन के विश्वास की नैया धीरेधीरे बहती रही. यकीनन.

ट्रैडिशनल लहंगे को दें मौडर्न ट्विस्ट, सोनी सब के कलाकार से लें ये बैस्ट आइडियाज

आजकल ट्रैडिशनल फैशन में एक नया ट्रैंड देखने को मिल रहा है. लोग मौडर्न ट्विस्ट के साथ भारत की विरासत को अपना रहे हैं और पहले से कहीं ज्यादा क्लासिक साड़ियों, लहंगों और कुरतों को आज के युग की ऐक्सेसरीज और अनूठे स्टाइलिंग आइडियाज के साथ जोड़ रहे हैं.

सोनी सब के कलाकार भी इस ट्रैंड में शामिल होते देखे जा सकते हैं क्योंकि वे ट्रैडिशनल परिधानों के प्रति अपना लगाव दिखाते हैं, जो मौडर्न स्टाइल्स के साथ मेल खाते हैं. यहां वे अपने स्टाइलिंग आइडियाज, मेकअप और ऐक्सेसरीज दिखाते हैं जो भारत की संस्कृतियों और परंपराओं का जश्न मना रहे हैं.

प्राची बंसल : टीवी अदाकारा प्राची बंसल विरासत के कपड़ों के माध्यम से पुरानी यादें ताजा करती हुई बताती हैं, “अपनी मां का खूबसूरत लहंगा पहनना मेरे परिवार की विरासत के एक हिस्से में कदम रखने जैसा है. इस में पुरानी यादों का एहसास है, जो इसे हर बार पहनने पर खास महसूस कराता है. मुझे इसे हलके मेकअप और लंबी बालियों के साथ पहनना पसंद है. यह खुद के प्रति सच्चे रहते हुए अतीत का सम्मान करने का मेरा तरीका है.”

अमनदीप सिद्धू : सोनी सब के फेमस शो ‘बादल पे पांव है’ में बानी की भूमिका निभाने वाली अमनदीप सिद्धू ट्रैडिशनल कौस्ट्यूम के प्रति अपने बढ़ते प्यार के बारे में बात करती हैं, “मुझे पारंपरिक पोशाकें बहुत पसंद आने लगी हैं. न केवल सैट पर बल्कि मेरी रोजमर्रा की जिंदगी में भी.

“बानी, जो अकसर पंजाबी कौस्ट्यूम पहनती हैं, के किरदार ने मुझे अपनी जड़ों के और भी करीब महसूस कराया है. जब मैं चिकनकारी कुरता डैनिम के साथ पहनती हूं, तो यह कैजुअल लगता है, लेकिन मेरी सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा होता है. मेरा स्टाइल मिनिमलिज्म की ओर झुका हुआ है, इसलिए मैं ऐक्सेसरीज को हलका रखती हूं, बस कुछ स्टैंडआउट पीस जैसे लंबे झुमके या एक सिंपल बिंदी. बानी के किरदार में मैं ने जो नाक की अंगूठी पहनी है, वह मेरे लिए विशेषरूप से सार्थक थी क्योंकि यह मेरे लिए एक छोटे से सपने को पूरा करने जैसा था.”

चिन्मयी साल्वी : सोनी सबका का सीरियल ‘वागले की दुनिया’ में सखी के नाम से मशहूर चिन्मयी साल्वी कपड़ों के सांस्कृतिक महत्त्व को रेखांकित करती हैं.

वे कहती हैं, “साड़ी या नौवारी (9 गज की साड़ी) पहनना मुझे खुद से कहीं बड़ी किसी चीज से जोड़ता है. यह विरासत को पहनने जैसा है. इस में मुझे अपना निजी ट्विस्ट जोड़ने में मजा आता है. कभीकभी यह एक मौडर्न हेयरस्टाइल होता है या एक क्लासिक साड़ी को समकालीन ब्लाउज के साथ जोड़ कर एक टाइमलैस और फ्रैशलुक तैयार किया जाता है.

“मेरे लिए फैशन का मतलब उन तत्त्वों को मिलाना है जो परंपरा का सम्मान करते हैं लेकिन यह भी बताते हैं कि मैं आज कौन हूं.”

सीरियल ‘बादल पे पांव है’ में फेम आस्था गुप्ता वाइब्रैंट कलर्स और कौंप्लैक्स डिटैल्स में रुचि रखती हैं.

वे कहती हैं,”डीप रैड और गोल्डन कलर बहुत ही प्लीजेंट है. यह कलर गरमजोशी और उत्सव की भावना लाते हैं. जब मैं अपने आउटफिट को स्टाइल करती हूं, तो मैं ऐसी ऐक्सेसरीज चुनती हूं जिन में कौंप्लैक्स डिटेल्स होते हैं, जैसे ऐंब्रौयडरी वाले बैग या बोल्ड इयररिंग्स, जो एक यूनिक टच देते हैं.

“मेकअप भी मेरे लिए आवश्यक है. मुझे काजल से अपनी आंखों को निखारनासंवारना और एक लाइट ब्लश लगाना पसंद है, यह सुनिश्चित करते हुए कि मेरे लुक के प्रत्येक ऐलिमैंट को रैडिऐंट और कंप्लीट बनाता है. यह सब एक ऐसा लुक बनाने के बारे में है जो ऐलिगैंट और लाइफ से भरा हुआ लगे.”

Friendship : दोस्तों से बातें करें दिल खोल कर, लेकिन कुछ चीजों का रखें ध्यान

रात 8 बजे संगीता ने कीर्ति को फोन मिलाया और रोज की तरह दिनभर की गौसिप शुरू कर दी.

‘‘आज फिर बौस ने सब के सामने मुझे फटकार लगाई. मैं सब समझती हूं. ये सब वह अर्पिता के सामने ज्यादा करता हैं,’’ संगीता ने अपना रोना रोते हुए कहा.

‘‘अर्पिता कौन?’’

‘‘बताया तो था वह नई कोआर्डिनेटर’’

‘‘उस पर इंप्रैशन जमा रहा होगा कुछ दिनों बाद शांत हो जाएगा.’’

‘‘मु?ा से बरदाश्त नहीं होता. मन करता है जौब छोड़ दूं.’’

‘‘इसे जौइन करे 6 महीने ही हुए हैं छोड़ देगी तो बौस का क्या बिगड़ जाएगा? नुकसान तो तेरा ही होगा.’’

‘‘फिर क्या करूं?’’

‘‘जो बातें बुरी लगी है उन सब को डायरी में नोट कर ले. नई नौकरी ढूंढ़ती रह. जब मिल जाए तो अपने खड़ूस बौस को सारी बातें सुना कर ही जाना.’’

‘‘नई नौकरी नहीं मिली तो क्या करूंगी?’’

‘‘लिखने से तेरी भड़ास तो निकल जाएगी और हो सकता है तेरे बौस को ही नई नौकरी मिल जाए.’’

‘‘यानी बौस ही बदल जाएगा. ठीक है यह भी कर के देख लेती हूं.’’

‘‘छोड़ फालतू बातें, यह बता ऋषभ से तेरी दोस्ती कहां तक पहुंची?’’

कीर्ति की बात सुनते ही संगीता का मूड चेंज हो गया और वह हंस कर, ऋषभ के संग अपने रिश्ते को बताने लगी.

संगीता इकलौती संतान है. स्कूलकालेज की सहेलियां अपनी नौकरी या नई गृहस्थी में व्यस्त हो चुकी हैं. उसे यहां बैंगलुरु में आ कर अचानक एहसास होने लगा कि वह कितनी अकेली हो गई है. वह जल्दी मित्र नहीं बना पाती और पुरानी सहेलियों को भी क्या डिस्टर्ब करे, सोच कर मन ही मन घुट रही थी कि एक दिन मौल में कीर्ति मिल गई. दोनों एक ही शहर कानपुर से हैं, यह जान कर दोनों बहुत खुश हो गईं. अब तीजत्योहार पर साथ ही घर जाने लगी हैं. धीरेधीरे कीर्ति संगीता की प्रिय सहेली बन चुकी है जिस से वह अपनी हर बात शेयर कर सकती है.

क्या आप के पास है ऐसी सहेली जिस से खुल कर अपने दिल की बातें कर सकें? आजकल युवाओं को नौकरी में प्रतिस्पर्धा, अकेलापन, नया माहौल, घरपरिवार, पुराने मित्रों से दूरी आदि कारक अवसाद की ओर ले जा रहे हैं.

ऐसे में यह बहुत जरूरी होता है कि आप के पास अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए एक मित्र अवश्य हो जिस से दिल खोल कर बातें कर सकें. मगर मित्रता के चयन में कुछ बातों का ध्यान अवश्य दें:

हमउम्र

अपनी हमउम्र का मित्र (Friendship) आप की समस्याओं को भलीभांती समझता है क्योंकि वह भी उसी दौर से गुजर रहा है. अगर आप की और मित्र की उम्र में 10 से 15 वर्ष का अंतर होगा तो उस के साथ खुल कर अपनी बात रखने में आप को झिझक महसूस होगी.

समान लिंगी

लड़की और लड़कों की मित्रता या संबंधों में कोई बुराई नहीं है किंतु स्त्री विमर्श या समस्याओं को जितना बेहतर एक स्त्री समझ सकती है उतनी गहराई से कोई पुरुष मित्र न तो सोच सकता है और न ही समझ सकता है.

यही बात पुरुषों के लिए भी लागू होती है. मित्रों की सूची में तो महिला, पुरुष दोनों शामिल हो सकते हैं लेकिन बैस्टी तो समलिंगी ही चुनें.

सकारात्मक विचार

मित्रता उसी से करें जिस से बात करने के बाद आप को अपने अंदर सकारात्मक ऊर्जा महसूस हो. नकारात्मक बातें करने वाले मित्रों की संगत से दूरी बना कर रखें. कुछ लोग हर बात को ले कर दुखी रहते हैं. ऐसों से मित्रता आप को भी अवसाद की ओर ले जाएगी.

जिंदादिल मित्रता

जिंदादिल मित्रता से तात्पर्य है समय का सदुपयोग करते हुए हर पल का आनंद लेना. जैसे वीकैंड में फिल्म, थिएटर या विंडों शौपिंग का प्रोग्राम बनाना या एकदूसरे के फ्लैट में जा कर  मनपसंद भोजन बनाना अथवा बाहर से और्डर कर दिल खोल कर गप्पें लगाना.

प्रकृति प्रेमी

पेड़पौधों, नदी, तालाब, समुद्र जिसे आकर्षित करते हों, ऐसे मित्र होने पर नई यात्राओं का योग बनता है. यात्राएं हम में जीवन के प्रति प्रेम और नवीन उमंग का संचार करती हैं. ऐसे में  अपनी प्रिय सहेली का साथ हो तो यात्रा का आनंद कई गुना बढ़ जाता है. यदि उस की यात्राओं में दिलचस्पी नहीं है तो आप उसे प्रेरित करें. यदि आप के पास कोई अपना सा है तो आप की जिंदगी आसान हो जाएगी.

हौस्टल लाइफ आसान बनाते गैजेट्स

हौस्टल है कोई घर तो नहीं और कब छोड़ना पड़ जाए पता नहीं, इसलिए सामान कम हो लेकिन काम को हो तो लाइफ आसान हो जाती है. आइए, आप को बताते हैं कुछ ऐसे स्मार्ट गैजेट्स के बारे में जिन में मैंटीनैंस का झंझट नहीं है और इन्हें आसानी से अपने बैकपैक में कैरी भी कर सकती हैं:

न्यूट्री ब्लैंडर: हौस्टल में भूख टाइम देख कर तो आती नहीं है कभी लग जाती है. ऐसे में कभी जूस या शेक पीने का मन हो जाए तो यह पर्सनल ब्लैंडर बहुत काम आता है. बस जरूरी सामग्री डाली और बटन पै्रस करते ही मनपसंद जूस तैयार. यह गैजेट 1000 रूपए से 2500 के बीच कहीं से?भी ले सकती हैं.

इलैक्ट्रिक एग बौयलर: इस गैजेट की सब से अच्छी बात यह है कि इसे आप अपनी सुविधा के अनुसार कहीं भी इस्तेमाल कर सकती हैं. जरूरी नहीं जहां आप रह रही हैं वहां गैस स्टोव की सुविधा सभी के लिए हो. तो आप इस गैजेट को अपने रूम में रख सकती हैं और जब मन करे एग बौयल कर सकती हैं. 1000 रूपए से 1500 के बीच अच्छे एग बौयलर मिल जाते हैं.

क्लोथ स्टैंड: हौस्टल में सब से बड़ी समस्या कपड़ों को सुखाने की होती है क्योंकि कहीं छत नहीं मिलती तो कहीं बालकनी. इस समस्या का समाधान आप सिर्फ 500 रूपए में कर सकती हैं. 12 कपड़े हैंग करने की कैपेसिटी वाला फोल्डेबल स्टैंड औनलाइन शौपिंग साइट्स पर उपलब्ध है.

इलैक्ट्रिक केटल: वैसे तो केटल चाय या कौफी बनाने के काम में आती है लेकिन आप में से बहुत लोगों ने इस में मैगी भी बनाई होगी. तो हुई न काम की चीज. बहुत महंगी भी नहीं क्योंकि अच्छे ब्रैंड की भी 600 रूपए में आ जाती है.

कौफी ब्लैंडर: कौफी के शौकीन हैं लेकिन झंझट नहीं चाहिए तो यह गैजेट मात्र 300 रूपए में मिलता है. कप में कौफी और मिल्क या फिर पानी मिक्स करना है और बाकी काम बैटरी से चलने वाला यह ब्लैंडर कर देगा.

ट्रैंड में है Bralette, जानिए ब्रा और इसमें क्या है अंतर

अभिनेत्री अनन्या पांडे ने हाल ही में अपनी वैब सीरीज ‘कौल मी बे’ में एक नियान बैलेंसियागा शर्ट को एक फ्लोरल जारा ब्रालेट (Bralette) और एक क्विल्टेड लैदर स्कर्ट के साथ पेयर किया जिसे आज का यूथ काफी पसंद कर रहा है. फिल्म इंडस्ट्री की अनन्या से ले कर जाह्नवी कपूर तक और बेला हदीद से ले कर रिहाना तक, हरकोई अलगअलग आउटफिट्स के साथ ब्रालेट पहन कर मौडर्न लुक का प्रदर्शन कर रही है और फैशन प्रेमी इस ट्रैंड को पसंद कर रहे हैं.

असल में ब्रालेट अब सिर्फ अंडरगारमैंट से आगे बढ़ कर युवाओं के लिए एक स्टाइलिश टौप बन गया है जो रोजमर्रा के कपड़ों के स्टाइल को बदल रहा है. यह एक आरामदायक पहनावा है, जिसे कैजुअल और ड्रैसी दोनों तरह के लुक के लिए जरूरी हो चुका है.

ब्रालेट और ब्रा में अंतर

ब्रालेट एक हलका या जालीदार टौप होता है जो पारंपरिक ब्रा की तुलना में अधिक आरामदायक और कम स्ट्रक्चर्ड होता है. इसे आमतौर पर आराम के लिए डिजाइन किया जाता है. इसे अकेले या लेयर्ड आउटफिट के साथ पहना जा सकता है.

ब्रा अधिक स्ट्रक्वर्ड और सही सपोर्ट देने वाली होती है, जबकि ब्रालेट में हलका सपोर्ट होता है. ब्रा को स्तनों को सहारा देने के लिए पहना जाता है, जबकि ब्रालेट सिर्फ एक ब्रा क्रौप टौप, बिना वायर वाला, बिना पैड वाला होता है जो अनिवार्य रूप से एक साधारण स्लिप औन जैसा पहनावा होता है, इसलिए युवा आजकल इसे अधिक पहनते हैं.

ब्रा को बनाने के लिए टैक्नोलौजी का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि ब्रालेट को अनकन्वैशनल मैटीरियल से बनाया जा सकता है.

ब्रा आमतौर पर तार वाली होती है, जबकि ब्रालेट में तार नहीं होते. ब्रालेट्स में अनोखे कट और डिजाइन होते हैं.

ब्रा ज्यादातर कपड़ों के नीचे पहनी जाती है, जबकि ब्रालेट को स्टाइलिश और स्मार्ट लुक के लिए पहना जाता है. ब्रालेट को क्रौप टौप की तरह भी पहना जा सकता है. ब्रालेट आमतौर पर आरामदायक होती है क्योंकि इस में पैडिंग, तार या टाइट कपड़ा नहीं होता.

ब्रालेट्स कई तरह के टैक्स्चर और बनावट में उपलब्ध होते हैं. वे खुले तौर पर स्टाइल किए जा सकते हैं और फंकी प्रिंट में भी आते हैं.

ब्रालेट को पहनें कैसे

हाई वैस्ट स्कर्ट के साथ स्टाइलिश लुक के लिए ब्रालेट पहनें. फ्री फ्लो स्कर्ट के साथ सफेद लेस वाले ब्रालेट आउटिंग के लिए एकदम सही होते हैं. अच्छी मिक्स मैच के लिए ब्रालेट के रंग और स्टाइल से मेल खाती स्कर्ट चुनें.

ब्रालेट और जींस एक क्लासिक कैजुअल कौंबो बनाते हैं. ट्रैंडी लुक के लिए हाईवेस्ट जींस के साथ फिटेड ब्रालेट ट्राई कर सकती हैं. ब्लैक ब्रालेट ब्लू जींस के साथ दिन या रात में पहनने के लिए अच्छा विकल्प हो सकता है.

जौगिंग करते वक्त भी आरामदायक और फैशनेबल लुक के लिए ब्रालेट पहना जा सकता है. इस समय बोल्ड ब्रालेट चुनें और अतिरिक्त स्टाइल के लिए जैकेट पहन सकती हैं.

पारंपरिक परिधान साड़ी के साथ ब्लाउज की जगह आधुनिक लुक के लिए ब्रालेट पहन सकती हैं. साड़ी से मेल खाने वाले या मिक्स मैच वाले ब्रालेट चुनें ताकि आप पुराने और नए स्टाइल को अच्छी तरह से कैरी कर पाएं.

कार्सेट एक सहज और स्टाइलिश लुक वाला पहनावा है. कार्सेट के साथ मैचिंग करते हुए ब्रालेट पहनने की कोशिश करें. स्लीक और कार्डिनेटेड लुक पाने के लिए ब्रालेट, मैचिंग शर्ट और हाई वेस्ट पैंट के साथ मोनोक्रोमैटिक कलर स्कीम चुन सकती है. स्टाइल के अलावा यह आरामदायक भी होता है जो किसी भी फैशन फारवर्ड वार्डरोब के लिए एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है.

ब्रालेट की केयर करें कुछ ऐसे

ब्रालेट को 2 या 3 बार पहनने के बाद धोना ठीक रहता है लेकिन यदि आप को पसीना अधिक आता है तो इसे एक बार पहनने के बाद तुरंत धो लें.

माइक्रोमौडल से बने ब्रालेट सस्टेनेबल होते हैं इसलिए इन्हें ल्यूकवौर्म वाटर में माइल्ड डिटर्जैंट का प्रयोग कर, हाथ से धोना सही होता है. इसे ड्रायर में नहीं छाया में सुखाएं ताकि इस के डैलिकेट फैब्रिक और इलास्टिक को किसी प्रकार का नुकसान न पहुंचे.

सीताफल से बनाएं ये टेस्टी डिशेज, सर्दियों में बढ़ जाएगा खाने का मजा

Writer- Pratibha Agnihotri

सीताफल या शरीफा जिसे अंग्रेजी भाषा में चेरिमोया(Cherimoya) कहा जाता है मुख्य रूप से हाई एल्टीट्यूड ट्रॉपिकल एरियाज में पाया जाता है. कोनिकल शेप वाला यह हरे रंग का फल दिखने में तो बहुत सुंदर होता है साथ ही खाने में भी बेहद स्वादिष्ट होता है. इसके अंदर का गूदा सफेद रंग का और बीज काले होते हैं. फाइबर, विटामिन्स, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होने के कारण यह हमारी त्वचा, दिल को दुरुस्त रखने के साथ साथ इम्यूनिटी को भी बूस्ट करता है. यह मुख्यतया सितंबर से लेकर नवम्बर तक तीन माह ही मिलता है. हमेशा बड़ी बड़ी आंखों या कोन वाले बड़े आकार के ही सीताफल लेने चाहिए छोटे आकार और छोटी आंखों वाले फलों में गूदा बहुत कम और बीज ज्यादा होते हैं. चूंकि यह स्वाद में मीठा होता है अतः इससे मीठे व्यंजन ही बनाये जा सकते हैं.

आज हम इससे दो डिशेज बनाएंगे जो खाने में बहुत स्वादिष्ट हैं साथ ही इन्हें बनाना भी आसान है. तो आइए देखते हैं कि इन्हें कैसे बनाते हैं-

-सीताफल बासुंदी

कितने लोंगों के लिए               6

बनने में लगने वाला समय       40 मिनट

मील टाइप                             वेज

सामग्री

फुल क्रीम दूध                  1लीटर

मध्यम आकार के शरीफे     2

शकर                              50 ग्राम

इलायची पाउडर               1/4 टीस्पून

बारीक कटी मेवा              1टेबलस्पून

विधि

शरीफे के गूदे को छलनी में डालकर चम्मच से चलाते हुए काले रंग के बीजों को अलग कर दें. अब दूध को फुल फ्लैम पर आधा रहने तक उबालें. शकर डालकर पुनः 5 मिनट उबालकर गैस बंद कर दें. इलायची पाउडर डालें और ठंडा होने पर शरीफे का गूदा अच्छी तरह मिलाएं. कटी मेवा से गार्निशिंग करके सर्व करें.

-सीताफल कुल्फी

कितने लोंगों के लिए             6

बनने में लगने वाला समय      30 मिनट

मील टाइप                           वेज

सामग्री

शरीफे का गूदा                 1 कप

फुल क्रीम दूध                   1 लीटर

मिल्क पाउडर                   1/2 कप

शकर                                50 ग्राम

पिस्ता कतरन                     1 टेबलस्पून

विधि

दूध को फुल फ्लेम पर शकर और मिल्क पाउडर डालकर 750 ग्राम रहने तक उबालें. बीच बीच में चलाते रहें ताकि पैन में दूध लगे नहीं. शरीफे के गूदे को मिक्सी में हल्का सा चर्न कर लें. जब दूध पूरी तरह ठंडा हो जाये तो शरीफे का गूदा अच्छी तरह मिलाएं. पिस्ता कतरन डालकर कुल्फी मोल्ड्स में भरें. 6 से 8 घण्टे में यह जम जाएगी. डिमोल्ड करके सर्व करें.

ऐसे करें प्रिजर्व

चूंकि यह पूरे वर्ष में केवल इन दिनों अर्थात सितंबर से नवम्बर तक ही बहुतायात में बाजार में मिलता है इसलिए इसके 1 कप गूदे में 1 टीस्पून शकर मिलाकर आप एक जिप बैग में डाल कर फ्रीजर में रख दें. इससे आप ऑफ सीजन भी सीताफल का स्वाद ले सकेंगीं.

दीपाली: क्यों बेचैन थी वह?

लेखक- वंदना आर्य

दीपाली की याद आते ही आंखों के सामने एक सुंदर और हंसमुख चेहरा आ जाता है. गोल सा गोरा चेहरा, सुंदर नैननक्श, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी और होंठों पर सदा रहने वाली हंसी.

असम आए कुछ ही दिन हुए थे. शहर से बाहर बनी हुई उस सरकारी कालोनी में मेरा मन नहीं लगता था. अभी आसपड़ोस में भी किसी से इतना परिचय नहीं हुआ था कि उन के यहां जा कर बैठा जा सके.

एक दोपहर आंख लगी ही थी कि दरवाजे की घंटी बजी. मैं ने कुछ खिन्न हो कर दरवाजा खोला तो सामने एक सुंदर और स्मार्ट सी असमी युवती खड़ी थी. हाथ में बड़ा सा बैग, आंखों पर चढ़ा धूप का चश्मा, माथे पर बड़ी सी लाल बिंदी. इस से पहले कि मैं कुछ पूछती, वह बड़े ही अपनेपन से मुसकराती हुई भीतर की ओर बढ़ी.

कुरसी पर बैठते हुए उस ने कहा, ‘‘आप नया आया है न?’’ तो मैं चौंकी फिर उस के बाद जो भी हिंदीअसमी मिश्रित वाक्य उस ने कहे वह बिलकुल भी मेरे पल्ले नहीं पड़े. लेकिन उस का व्यक्तित्व इतना मोहक था कि उस से बातें करना हमेशा अच्छा लगता था. उस की बातें सुन कर मैं ने पूछा, ‘‘आप सूट सिलती हैं?’’

‘‘हां, हां,’’ वह उत्साह से बोली तो एक सूट का कपड़ा मैं ने ला कर उसे दे दिया.

‘‘अगला वीक में देगा,’’ कह कर वह चली गई.

यही थी दीपाली से मेरी पहली मुलाकात. पहली ही मुलाकात में उस से एक अपनेपन का रिश्ता जुड़ गया. उस से मिल कर लगा कि पता नहीं कब से उसे जानती थी. यह दीपाली के व्यवहार, व्यक्तित्व का ही असर था कि पहली मुलाकात में बिना उस का नामपता पूछे और बिना रसीद मांगे हुए ही मैं ने अपना महंगा सूट उसे थमा दिया था. आज तक किसी अजनबी पर इतना विश्वास पहले नहीं किया था.

वह तो मीरा ने बाद में बताया कि उस का नाम दीपाली है और वह एक सेल्सगर्ल है. कितना सजधज कर आती है न. कालोनी की औरतों को दोगुने दाम में सामान बेच कर जाती है. मैं तो उसे दरवाजे से ही विदा कर देती हूं. दीपाली के बारे में ज्यादातर औरतों की यही राय थी.

मैं ने कभी दीपाली को मेकअप किए हुए नहीं देखा. सिर्फ एक लाल बिंदी लगाने पर भी उस का चेहरा दमकता रहता था. उस का हर वक्त खिल- खिलाना, हर किसी से बेझिझक बातें करना और व्यवहार में खुलापन कई लोगों को शायद खलता था. पर मस्तमौला सी दीपाली मुझे भा गई और जल्द ही वह भी मुझ से घुलमिल गई.

उस के स्वभाव में एक साफगोई थी. उस का मन साफ था. जितना अपनापन उस ने मुझ से पाया उस से कई गुना प्यार व स्नेह उस ने मुझे दिया भी.

‘आप इतना सिंपल क्यों रहता है?’ दीपाली अकसर मुझ से पूछती. काफी कोशिश करने पर भी मैं स्त्रीलिंगपुल्ंिलग का भेद उसे नहीं समझा पाई थी, ‘कालोनी में सब लेडीज लोग कितना मेकअप करता है, रोज क्लब में जाता है. मेरे से कितना मेकअप का सामान खरीदता है.’

अकसर लेडीज क्लब की ओर जाती महिलाओं के काफिले को अपनी बालकनी से मैं भी देखती थी. मेकअप से लिपीपुती, खुशबू के भभके छोड़ती उन औरतों को देख कर मैं सोचती

कि कैसे सुबह 10 बजे तक इन का काम निबट गया होगा, खाना बन गया होगा और ये खुद कैसे तैयार हो गई होंगी.

दीपाली ने एक बार बताया था, ‘आप नहीं जानता. ये लेडीज लोग सब अच्छाअच्छा साड़ी पहन कर, मेकअप कर के क्लब चला जाता है और पीछे सारा घर गंदा पड़ा रहता है. 1 बजे आ कर जैसेतैसे खाना बना कर अपने मिस्टर लोगोें को खिलाता है. 4 नंबर वाली का बेटाबेटी मम्मी के जाने के बाद गंदी पिक्चर देखता है.’

मुझे दीपाली का इंतजार रहता था. मैं उस से बहुत ही कम सामान खरीदती फिर भी वह हमेशा आती. उसे हमारा खाना पसंद आता था और जबतब वह भी कुछ न कुछ असमी व्यंजन मेरे लिए लाती, जिस में से चावल की बनी मिठाई ‘पीठा’  मुझे खासतौर पर पसंद थी. मैं उसे कुछ हिंदी वाक्य सिखाती और कुछ असमी शब्द मैं ने भी उस से सीखे थे. अपनी मीठी आवाज में वह कभी कोई असमी गीत सुनाती तो मैं मंत्रमुग्ध हो सुनती रह जाती.

हमेशा हंसतीमुसकराती दीपाली उस दिन गुमसुम सी लगी. पूछा तो बोली, ‘जानू का तबीयत ठीक नहीं है, वह देख नहीं सकता,’ और कहतेकहते उस की आंखों में आंसू आ गए. जानू उस के बेटे का नाम था. मैं अवाक् रह गई. उस के ठहाकों के पीछे कितने आंसू छिपे थे. मेरे बच्चों को मामूली बुखार भी हो जाए तो मैं अधमरी सी हो जाती थी. बेटे की आंखों का अंधेरा जिस मां के कलेजे को हरदम कचोटता हो वह कैसे हरदम हंस सकती है.

मेरी आंखों से चुपचाप ढलक कर जब बूंदें मेरे हाथों पर गिरीं तो मैं चौंक पड़ी. मैं देर तक उस का हाथ पकड़े बैठी रही. रो कर कुछ मन हलका हुआ तो दीपाली संभली, ‘मैं कभी किसी के आगे रोता नहीं है पर आप तो मेरा अपना है न.’

मेरे बहुत आग्रह पर दीपाली एक दिन जानू को मेरे घर लाई थी. दीपाली की स्कूटी की आवाज सुन मैं बालकनी में आ गई. देखा तो दीपाली की पीठ से चिपका एक गोरा सुंदर सा लगभग 8 साल का लड़का बैठा था.

‘दीपाली, उस का हाथ पकड़ो,’ मैं चिल्लाई पर दीपाली मुसकराती हुई सीढि़यों की ओर बढ़ी. जानू रेलिंग थामे ऐसे फटाफट ऊपर चला आया जैसे सबकुछ दिख रहा हो.

‘यह कपड़ा भी अपनी पसंद का पहनता है, छू कर पहचान जाता है,’ दीपाली ने बताया.

‘जानू,’ मैं ने हाथ थाम कर पुकारा.

‘यह सुन भी नहीं पाता है ठीक से और बोल भी नहीं पाता है,’ दीपाली ने बताया.

वह बहुत प्यारा बच्चा था. देख कर कोई कह ही नहीं सकता कि उसमें इतनी कमियां हैं. जानू सोफा टटोल कर बैठ गया. वह कभी सोफे पर खड़ा हो जाता तो कभी पैर ऊपर कर के लेट जाता.

‘आप डरो मत, वह गिरेगा नहीं,’ दीपाली मुझे चिंतित देख हंसी. सचमुच सारे घर में घूमने के बाद भी जानू न गिरा न किसी चीज से टकराया.

जाते समय जानू को मैं ने गले लगाया तो वह उछल कर गोद में चढ़ गया. उस बेजबान ने मेरे प्यार को जैसे मेरे स्पर्श से महसूस कर लिया था. मेरी आंखें भर आईं. दीपाली ने उसे मेरी गोद से उतारा तो वह वैसे ही रेलिंग थामे सहजता से सीढि़यां उतर कर नीचे चला गया. दीपाली ने स्कूटी स्टार्ट की तो जा कर उस पर चढ़ गया और दोनों हाथों से मां की कमर जकड़ कर बैठ गया.

‘अब घर जा कर ही मुझे छोड़ेगा,’ दीपाली हंस कर बोली और चली गई.

मैं दीपाली के बारे में सोचने लगी. घंटे भर तक उस बच्चे को देख कर मेरा तो जैसे कलेजा ही फट गया था. हरदम उसे पास पा कर उस मां पर क्या गुजरती होगी, जिस के सीने पर इतना बोझ धरा हो. वह इतना हंस कैसे सकती है. जब दर्द लाइलाज हो तो फिर उसे चाहे हंस कर या रो कर सहना तो पड़ता ही है. दीपाली हंस कर इसे झेल रही थी. अचानक दीपाली का कद मेरी नजरों में ऊपर उठ गया.

एक दिन सुबहसुबह दीपाली आई. मेखला चादर में बहुत जंच रही थी. ‘आप हमेशा ऐसे ही अच्छी तरह तैयार हो कर क्यों नहीं आती हो?’ मैं ने प्रशंसा करते हुए कहा. इस पर दीपाली ने खुल कर ठहाका लगाया और बोली, ‘सजधज कर आएगा तो लेडीज लोग घर में नहीं घुसने देगा. उन का मिस्टर लोग मेरे को देखेगी न.’

मुझे तब मीरा की कही बात

याद आई कि दीपाली के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा था जो औरतों में ईर्ष्या जगाता था.

‘मैं भाग कर शादी किया था. मैं ऊंचा जात का था न अपना आदमी

से. घर वाला लोग मानता नहीं था,’ दीपाली कभीकभी अपनी प्रेम कथा सुनाती थी.

जहां कालोनी में मेरी एकदो महिलाओं से ही मित्रता थी वहां दीपाली के साथ मेरी घनिष्ठता सब की हैरानी का सबब थी. जानू हमारे घर आता तो पड़ोसियों के लिए कौतूहल का विषय होता. एक स्थानीय असमी महिला से प्रगाढ़ता मेरे परिचितों के लिए आश्चर्यजनक बात थी.

जब दीपाली को पता चला कि हमारा ट्रांसफर हो गया है तो कई दिनों पहले से ही उस का रोना शुरू हो गया था, ‘आप चला जाएगा तो मैं क्या करेगा. आप जैसा कोई कहां मिलेगा,’ कहतेकहते वह रोने लगती. दीपाली जैसी सहृदय महिला के लिए हंसना जितना सरल था रोना भी उतना ही सहज था. दुख मुझे भी बहुत होता पर अपनी भावनाएं खुल कर जताना मेरा स्वभाव नहीं था.

आते समय दीपाली से न मिल पाने का अफसोस मुझे जिंदगी भर रहेगा. हमें सोमवार को आना था पर किन्हीं कारणवश हमें एक दिन पहले आना पड़ा. अचानक कार्यक्रम बदला. दोपहर में हमारी फ्लाइट थी. मैं सुबह से दीपाली के घर फोन करती रही. घंटी बजती  रही पर किसी ने फोन उठाया नहीं, शायद फोन खराब था. मैं जाने तक उस का इंतजार करती रही पर वह नहीं आई. भरे मन से मैं एअरपोर्ट की ओर रवाना हुई थी.

बाद में मीरा ने फोन पर बताया था कि दीपाली सोमवार को आई थी और हमारे जाने की बात सुन कर फूटफूट कर रोती रही थी. वह मुझे देने के लिए बहुत सी चीजें लाई थी, जिस में मेरा मनपसंद ‘पीठा’ भी था.

मैं ने कई बार फोन किया पर वह फोन शायद अब तक खराब पड़ा है. पत्र वह भेज नहीं सकती थी क्योंकि उसे न हिंदी लिखनी आती है न अंगरेजी और असमी भाषा मैं नहीं समझ पाती.

दीपाली का मेरी जिंदगी में एक खास मुकाम है क्योंकि उस से मैं ने हमेशा जीने की, मुसकराने की प्रेरणा पाई है. हमारे शहरों में बहुत ज्यादा दूरियां हैं पर अब भी वह मेरे दिल के बहुत करीब है और हमेशा रहेगी.

मैं किसी भी लड़के से बात करती हूं, तो मेरा बौयफ्रैंड शक करने लगता है…

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है, तो ये लेख अंत तक जरूर पढ़ें…

सवाल

मैं 20 वर्षीय कालेज की स्टूडैंट हूं. मुझे मेरे बौयफ्रैंड से परेशानी है. वह बहुत शक्की है और व्यवहार भी ठीक नहीं. मैं कालेज में किसी भी लड़के से बात करूं तो उसे जलन होती है. मैं कहां जाती हूं किस के साथ जाती हूं वह सब जानना चाहता है समझता है मैं उसी की बात मानूं जिस से कहे बात करूं. कृपया बताएं मैं क्या करूं?

जवाब

आप का बौयफ्रैंड शक्की है तो शक का कोई इलाज नहीं लेकिन आप समाधान बन सकती हैं उस पर इतना प्यार उढ़ेलिए कि किसी अन्य के पास जाने पर भी उसे न लगे कि उस का प्यार बंट रहा है. साथ ही अपनी सोच को पौजिटिव बनाइए उस के व्यवहार को ऐसे समझिए कि वह कितना केयरिंग है. आप की कितनी परवा है उसे. किसी भी गलत व्यक्ति से बातचीत पसंद नहीं वह आप का बुरा नहीं चाहता.

इस तरह की सोच से आप उस के प्रति समर्पित होंगी फिर जिस से उसे शक लगे उस से मिलवाइए व खुद से ज्यादा उस की तारीफ के पुल बांधिए जब सब से घुलमिल जाएगा तो आप को गलत नहीं समझेगा. हां, गलती से भी इन बातों के कारण उसे डांटिएगा नहीं क्योंकि इस से उसे लगेगा कि आप दूसरे की वजह से उसे डांट रही हैं. इस से दूरी बढ़ेगी और अगर आप उसे प्यार से कहेंगी कि कितने केयरिंग हो तुम. कितना ध्यान रखते हो मेरा. तो उसे लगेगा कि वह भी कुछ है उस की हीनभावना भी समाप्त होगी और शक वाली बातें भी.

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कैसे परखें अपने पार्टनर को, आप भी जानिए

आप की सगाई पक्की हो चुकी है. शादी में अभी समय है. सपने हैं, इच्छाएं हैं, उमंगें हैं, ललक है… आजकल आप को कोई अच्छा लगने लगा है. वह भी आप को कनखियों से देखता है. मिल्स ऐंड बून का रोमांस किताबों में ही नहीं, असल जीवन में भी होता है, ऐसा आप को लगने लगा है. उस रात पार्टी में जब आप बेहद खूबसूरत लग रही थीं, उस ने प्रपोज कर दिया वह भी आकर्षक अंदाज में. आप हवा में उड़ रही हैं. जिंदगी में इतने अच्छे पल पहले कभी नहीं आए थे. चाहा जाना किसे अच्छा नहीं लगता. फिर चाहने वाला विपरीतलिंगी हो, तो कहना ही क्या.

प्यार करना अच्छा एहसास है पर आज के माहौल को देखते हुए जहां लवजिहाद, फेक मैरिज, एसिड अटैक जैसे केसेज हो रहे हों, वहां थोड़ा सावधान रहना अच्छा है.

आप कैसे जान सकती हैं कि आप का बौयफ्रैंड, मंगेतर या लवर आप को चीट तो नहीं कर रहा? मनोचिकित्सकों, परिवार के परामर्शदाताओं, समाजसेवकों और पुलिस अधिकारियों से बातचीत के आधार पर कुछ बिंदु उभरे हैं, जिन्हें यदि आप देखपरख लें तो धोखा खाने से बच सकती हैं :

दिखावा ज्यादा करता हो

आप का पार्टनर चाहे रईस न हो, पर महंगे शौक रखता हो. उन का हर जगह प्रदर्शन करता हो. खुद को हाइप्रोफाइल कहलाना उसे पसंद हो. उधार ले कर स्टैंडर्ड लाइफ जीने में उसे आनंद आता हो तो सावधान हो जाएं. ऐसा शख्स भविष्य में किसी को भी संकट में डाल सकता है.

पैसों की खातिर गलत काम करने में वह हिचकिचाएगा नहीं. हो सकता है आप को भी उस ने सब्जबाग दिखा रखे हों, जितना आप उसे जानती हो, वह वैसा भी न हो.

ऐसे व्यक्ति को ध्यानपूर्वक नोटिस कीजिए. उस के बाद अपनी धारणा बनाइए.

फिजिकल क्लोजनैस चाहता हो

अकसर उस की तारीफ में आप के हुस्न की तारीफ छिपी रहती हो. साथ घूमने जाने या मिलने के लिए वह एकांत स्थल या ऐक्सक्लूसिव प्लेस चुनता हो. मौका पाते ही आप को हाथ लगाने, चूमने या स्पर्शसुख प्राप्त करने से न चूकता हो. रिवीलिंग ड्रैसेज आप को गिफ्ट करता हो और उन्हें पहनने की फरमाइश करता हो. फोन पर सैक्सी मैसेज भेजता हो तो सावधान हो जाइए. जो मजनूं सीमाएं लांघते हैं वे विश्वसनीय नहीं होते. कौन जाने आप से फिजिकल प्लेजर हासिल करने के बाद वह आप को छोड़ दे. बेहतर है लिमिट में रहिए और उस की ऐसी हरकतों पर पैनी नजर रखिए.

अकसर पैसे उधार लेता हो

जमाना कामकाजी महिलापुरुष का बेशक है, पर जो पुरुष अपनी गर्लफ्रैंड, प्रेमिका, मंगेतर से पैसे उधार मांगता रहता हो उस से सावधान रहिए. मैरिज के बाद वह आप पर पूर्णतया आर्थिक रूप से आश्रित नहीं हो जाएगा, इस की क्या गारंटी है. स्वावलंबी व आत्मनिर्भर पुरुष, पति या बौयफ्रैंड हर महिला चाहती है. पत्नियों पर आश्रित पुरुषों के साथ रिश्ते स्थायी तौर पर नहीं टिक पाते.

बातें छिपाता हो

लंबे रिश्ते के बाद भी यदि वह आप से बातें छिपाए, टालमटोल करे, दोस्तों से न मिलवाए, मोबाइल को न छूने दे तो सावधान रहिए. दाल में कुछ काला है. यदि मंगेतर या बौयफ्रैंड विदेश में काम करता हो तो उस के स्थानीय मित्रों, घर वालों, रिश्तेदारों से उस की कारगुजारियों पर नजर रखिए.

विदेश में जहां वह काम करता है उस संस्थान और दोस्तों के बारे में खंगालिए. जानकारी जुटाइए. उस के पैतृक गांव या कसबे से भी आप जानकारी जुटा सकती हैं. फेसबुक अकाउंट, व्हाट्सऐप या ईमेल से भी आप पता लगा सकती हैं. बात उसे बुरा लगने की नहीं, बल्कि खुद का भविष्य सुरक्षित रखने की है.

अजीबोगरीब व्यवहार करता हो

अचानक यों ही किसी दिन उस ने अपनी सगाई की अंगूठी उतार दी. आप को टाइम दे कर वह निर्धारित स्थल पर पहुंचना भूल गया, सार्वजनिक स्थल पर आप को बेइज्जत कर दिया या आप से ज्यादा अपनी भावनाओं को तवज्जुह देता हो तो चिंता की बात है.

दोहरा चरित्र या व्यवहार खतरे की घंटी है. व्यक्ति का असम्मानजनक व्यवहार या तो आप को डीवैल्यू करने के लिए या स्वयं स्थिर न हो पाने का नतीजा हो सकता है.

सामने कुछ, पीठ पीछे कुछ

दोहरापन, चुगलखोरी, छल किसी भी रिश्ते में दरार डाल सकते हैं. आप के सामने अच्छा और पीठ पीछे बुरा कहने वाला आप का अपना कैसे बन सकता है. आप का पार्टनर भी यदि ऐसा करता है तो वह यकीनन इस रिश्ते को ले कर सीरियस नहीं है.

उस के मित्रों के टच में रहिए ताकि फीडबैक मिल सके. यदि वह सामने पौजिटिव और पीठ पीछे नैगेटिव हो तो उसे खतरे की घंटी समझिए.

अकाउंट्स के बारे में न बताता हो

पार्टनर यदि वित्तीय मामलों में आप को शामिल नहीं करना चाहता हो, आप से छिपाए या बहाने बनाए, तो पड़ताल कर लीजिए. कोई भी रिलेशन विश्वास के आधार पर ही टिकता है.

बातें शेयर न करता हो

यदि पार्टनर अपनी बातें छिपाए और पूछने पर भी न बताए, उलटे, आप ही को टौंट करे और ओवरक्यूरियस कहे तो जाग जाइए. स्पष्टवादिता और सचाई रिश्ते की आधारशिला होती हैं.

महिला मित्र बनाम पुरुष सहकर्मी

पार्टनर खुद तो मित्रों के साथ काफी फ्री हो, वैस्टर्न व मौडर्न तरीकों से पेश आता हो पर आप के मेल कलीग्स को शक की दृष्टि से देखता हो तो सावधान हो जाइए. ऐसे पुरुष शादी के बाद भी फ्लर्ट करने की आदत नहीं छोड़ते.

बातबात पर झूठ बोलता हो

वजहबेवजह जब आप का पार्टनर छोटीछोटी बातों पर झूठ बोलता हो तो यह इस बात का संकेत है कि कुछ तो संदिग्ध है. उस के साथ रहने वाले, उस के मैसेज, उस के फोन कौल्स, उस के संपर्क…यदि इन बातों पर वह झूठ बोलता हो तो निसंदेह कहीं कुछ गड़बड़ है.

अचानक व्यवहार में बदलाव

पार्टनर अचानक सफाईपसंद हो जाए, गाड़ी अपेक्षाकृत साफ रखने लग जाए, अपने पुराने परफ्यूम को छोड़ कर दूसरा लगाने लग जाए, बेहद रूमानी हो जाए या बिलकुल रूखा हो जाए तो किसी महिला मित्र की उपस्थिति अवश्यंभावी है. सावधान हो जाइए. आप से ध्यान हटना, आप को इग्नोर करना, आप में रुचि न लेना किसी अन्य महिला की उपस्थिति का प्रभाव है.

जनूनी हो

यदि पार्टनर आप को दिलोजान से चाहता हो. किसी और की आप कभी नहीं हो पाएंगी, यह जताता रहता हो. आप की जुदाई को जीवनमरण का प्रश्न बना लेता हो तो सावधान हो जाइए. किसी कारणवश यदि यह रिश्ता टूट गया तो वह किसी भी सीमा तक जा सकता है. ऐसे प्रेमी से सावधान रहें. ऐसे जनूनी पुरुष असफल होने पर कुछ भी कर सकते हैं.

पार्टनर की कई बातें आप को अजीब लग सकती हैं. दिल से काम मत लीजिए, दिमाग से काम करें. जहां थोड़ा भी संशय हो, तसल्ली कर लीजिए. पार्टनर को बुरा लगेगा यह मत सोचिए. अपना विवेक रखिए. आखिर, थोड़ी सी सावधानी आप को भावी जीवन के दुखों से बचा सकती है.

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या हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- sampadak@delhipress.biz सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

वह छोटा लड़का: जब उस के बारे में जान कर मैं हैरान रह गई?

एक हाथ में पर्स व टिफिन और दूसरे हाथ में गाड़ी की चाबी ले कर तेजी से मैं घर से बाहर निकल रही थी कि अचानक चाबी मेरे हाथ से छूट कर आंगन के एक तरफ जा गिरी.

‘ओफ्फो, एक तो वैसे ही आफिस के लिए देरी हो रही है दूसरे…’ कहतेकहते जैसे ही मैं चाबी उठाने के लिए झुकी तो मेरी नजर कूड़ेदान पर गई, जो ऊपर तक भरा पड़ा था. लगता है कूड़े वाला आज भी नहीं आया, यह सोच कर झल्लाती हुई मैं घर से बाहर निकल गई.

गाड़ी में बैठ कर मैं अपने आफिस की ओर चल पड़ी. जितनी तेजी से मैं सड़क पर दूरी तय कर रही थी, मेरा मन शायद उस से भी तेजी से छलांगें भर रहा था.

याद आया मुझे 15 साल पहले का वह समय जब मैं नईनई इस कालोनी में आई थी. सामान को ठीक जगह पर लगातेलगाते रात के 12 बज गए थे. थकान के मारे बदन टूट रहा था. यह सोच कर कि सुबह देर तक सोऊंगी और फिर फ्रैश हो कर सामान सैट करूंगी, मैं सो गई थी.

सुबहसुबह ही दरवाजे की घंटी बज उठी और उस गहरी नींद में मुझे वह घंटी चीत्कार करती लग रही थी.

‘अरे, इतनी सुबह कौन आ गया,’ झल्लाती हुई मैं बाहर आ गई.

‘‘अरे, बीबीजी, कूड़ा दे दो और कूड़े का डब्बा कल से रात को ही बाहर निकाल दिया करना. मेरी आदत बारबार घंटी बजाने की नहीं है.’’

वह यहां का कूड़ा उठाने वाला कर्मचारी था. धीरेधीरे मैं नई कालोनी में रम गई. पड़ोसियों से जानपहचान हो गई. बाजार, पोस्टआफिस, डाक्टर आदि हर चीज की जानकारी हो गई. नए दफ्तर में भी सब ठीक था. काम वाली बाई भी लगभग समय पर आ जाती थी. बस, अगर समस्या रही तो कूड़े की. रात को मैं कूड़ा बाहर निकालना भूल जाती थी और सुबह कूड़ा उठाने वाला अभद्र भाषा में चिल्लाता था.

गुस्से में एक दिन मैं ने उस से कह दिया, ‘‘कल से कूड़ा उठाने मत आना. मैं कोई और कूड़े वाला लगा लूंगी.’’

‘‘कैसे लगा लेंगी आप कोई दूसरा कूड़े वाला? लगा कर तो दिखाइए, हम उस की टांगें तोड़ देंगे. यह हमारा इलाका है. इधर कोई दूसरा देख भी नहीं सकता,’’ उस की आवाज में किसी आतंकवादी सा दर्प था.

मेरा स्वाभिमान आहत हो गया. उस की ऊंची आवाज सुन कर मेरी पड़ोसिन श्रीमती शर्मा भी बाहर आ गईं. उन्होंने किसी तरह कूड़े वाले को शांत किया और उस के जाने के बाद मुझे समझाया कि इस से पंगा मत लो वरना तुम्हारे कूड़े उठवाने की समस्या खड़ी हो जाएगी. इन के इलाके बटे हुए हैं. ये किसी दूसरे को लगने नहीं देते.

श्रीमती शर्मा का कालोनी में काफी रुतबा था. उन के पति किसी अच्छी पोस्ट पर थे. उन के घर में सुखसुविधा का हर सामान था. नौकरचाकर, गाडि़यां, यहां तक कि उन के इकलौते बेटे को स्कूल लाने ले जाने के लिए भी एक गाड़ी तथा ड्राइवर अलग से था. तो अगर वह भी इस कूड़े वाले के आगे असहाय थीं तो मेरी क्या बिसात. मैं मन मार कर रह गई. पर मन में एक फांस सी चुभती रहती थी कि काश, मैं उस कूड़े वाले को हटा पाती.

एक दिन शाम को मैं किसी काम से अपनी कालोनी के सामने वाली कालोनी में गई थी. गाड़ी रोक कर मैं ने एक छोटे से लड़के से अपने गंतव्य का पता पूछा. अचानक मुझे लगा कि यह लड़का तो घरों से कूड़ा उठा रहा है.

समाज के प्रति जागरूकता के अपने स्वभाव के चलते मैं उस लड़के से पूछने ही जा रही थी कि बेटा, आप स्कूल क्यों नहीं जाते लेकिन मेरा स्वार्थ और मेरा आहत स्वाभिमान आड़े आ गया. मैं ने पूछा, ‘बेटा, मैं सामने वाली कालोनी में रहती हूं, क्या तुम मेरा कूड़ा उठाओगे?’ मेरी आशा के विपरीत उस का जवाब था, ‘उठा लेंगे.’

मैं हैरान हो गई. मैं ने उसे अपने कूड़े वाले की बात बता देना उचित समझा. मेरी बात सुन कर वह लड़का मुसकराया और बोला, ‘हम किसी से नहीं डरते, हम क्या किसी से कम हैं पर हम कूड़ा उठाने शाम को ही आ पाएंगे.’

10-12 साल के उस बच्चे की आवाज में इतना आत्मविश्वास था कि मैं ने उसे अपना पता दे दिया तथा अगले दिन से आने को कह दिया.

मुझे लगा, मेरी समस्या सुलझ गई. लड़का शाम को कूड़ा लेने आने लगा. उस के आने तक अकसर मैं अपने आफिस से वापस आ जाती थी. पुराने कूड़े वाले को मैं ने यही कहा कि मैं खुद ही अपना कूड़ा कहीं डाल आती हूं. वैसे भी वह लड़का शाम को आता था और पुराने कूड़े वाले को पता भी नहीं चलता था. पर यह नया लड़का छुट्टियां बहुत करता था. कभीकभी तो कईकई दिन. मैं मन ही मन बहुत कुढ़ती थी. बीमारी फैलने का डर बना रहता था. मैं सोचती, काश, भारत में भी विदेशों की तरह मशीन मिलने लगे, जिस में कूड़ा डालो बटन दबाओ और बस कूड़ा खत्म. कूड़े की यह परेशानी जैसे हमेशा मेरे व्यक्तित्व पर हावी रहती थी.

छुट्टी करने के बाद जब वह आता तो मैं इतनी झल्लाई हुई होती कि गुस्से से पूछती, ‘कहां मटरगश्ती करते रहे इतने दिन तक?’

उस का वही चिरपरिचित जवाब, ‘कहीं भी, हम क्या किसी से कम हैं.’

मेरा मन करता कि मैं उस की छुट्टियों के पैसे काट लूं पर कहीं वह काम न छोड़ दे यही सोच कर डर जाती और मन मसोस कर रह जाती थी. उस की छुट्टियां करने की आदत से मैं उस से इतनी नाराज रहती कि मैं ने कभी भी उस के बारे में जानने की कोशिश ही नहीं की कि उस के मांबाप क्या करते हैं, वह स्कूल क्यों नहीं जाता, आदि. हां, एकाध बार उस का नाम जरूर पूछा था पर वह भी जहन से उतर गया.

मेरी छुट्टी वाले दिन अकसर श्रीमती शर्मा मेरे पास आ कर बैठ जातीं. उन की बातों का विषय उन का बेटा ही होता. उन का बेटा शहर के सब से महंगे स्कूल में पढ़ता था. घर पर भी बहुत अच्छे ट्यूटर पढ़ाने आते थे. उन के बेटे के पास महंगा कंप्यूटर, महंगे वीडियो गेम्स तो थे ही साथ में एक अच्छा सा मोबाइल फोन भी था. वह अपने बच्चे का पालनपोषण पूरे रईसी ढंग से कर रही थीं. यहां तक कि मैं ने कभी उसे कालोनी के बच्चों के साथ खेलते भी नहीं देखा था. कभीकभी मुझे लगता था कि श्रीमती शर्मा अपने बेटे की चर्चा कम मगर बेटे की आड़ में अपनी रईसी की चर्चा ज्यादा कर रही हैं. पर फिर भी मुझे उन से बात करना अच्छा लगता क्योंकि मेरे बच्चे होस्टल में थे और उन के बेटे के बहाने मैं भी अपने बच्चों की बातें कर लेती थीं.

वक्त गुजरता रहा, जिंदगी चलती रही. श्रीमती शर्मा का लड़का जवान हो गया और कूड़े वाला भी. पर उस की आदतें नहीं बदलीं. वह अब भी बहुत छुट्टियां करता था. पर मेरे पास उसे झेलने के सिवा कोई चारा नहीं था क्योंकि मैं पुराने कूड़े वाले की सुबहसुबह की अभद्र भाषा सहन नहीं कर सकती थी. ‘इतने वर्षों में भी कोई मशीन नहीं बनी भारत में’ कुढ़तेकुढ़ते मैं ने अपने आफिस में प्रवेश किया.

रोज की तरह आफिस का दिन बहुत व्यस्त था. कूड़ा और कूड़े वाले के विचारों को मैं ने दिमाग से झटका और अपने काम में लग गई.

शाम को घर आई तो देखा कि मेरे पति अभी नहीं आए थे. मैं ने अपने लिए चाय बनाई और चाय का कप ले कर लौन में बैठ गई. अचानक मैं ने देखा कि सफेद टीशर्ट और नीली जींस पहने मिठाई का डब्बा हाथ में लिए कूड़े वाला लड़का मेरे सामने खड़ा है. उस ने पहली बार मेरे पांव छुए तथा मिठाई मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मैं ने नौन मैडिकल में यूनिवर्सिटी में टौप किया है. यह सब आप लोगों की उन छुट्टियों की बदौलत है, जो मैं ने जबरदस्ती की हैं. दिन में मैं सरकारी स्कूल में पढ़ता था. इसलिए शाम को कूड़ा उठाता था लेकिन परीक्षाओं के दिनों में मैं शाम को आ नहीं पाता था. कूड़ा उठाना मेरी पढ़ाई के खर्च का जरिया था. अगर आप लोग मुझे सहयोग नहीं देते और हटा देते तो मैं यह सब नहीं कर पाता.’’

मैं हैरान रह गई. अचानक ही मुझे उस की बात ‘हम क्या किसी से कम हैं’ याद आ गई. मैं ने पूछा कि तुम ने कभी इस बारे में बताया नहीं तो वह हंस कर बोला, ‘‘आंटी, आप ने कभी पूछा ही नहीं.’’

मैं ने आशीर्वाद दिया तथा उस की लाई मिठाई भी खाई. कूड़े वाला अचानक ही मेरी नजर में ऊंचा, बहुत ऊंचा हो गया था. जिसे इतने वर्षों तक कोसती रही थी तथा हमेशा ही जिस के पैसे काटना चाहती थी आज मन ही मन मैं ने उस की आगे की पढ़ाई का खर्च उठाने का निश्चय कर लिया था.

अरे, श्रीमती शर्मा के बेटे का भी तो आज ही परीक्षाफल आया होगा. वह भी तो नौन मैडिकल की परीक्षा दे रहा था. याद आते ही मैं श्रीमती शर्मा के यहां चली गई. उन का चेहरा उतरा हुआ था.

‘‘मैं ने अपने बेटे को सभी सुविधाएं व ऐशोआराम दिए हैं फिर भी वह मुश्किल से पास भर हुआ है,’’ श्रीमती शर्मा बोलीं.

अचानक ही श्रीमती शर्मा की रईसी मुझे उस कूड़े वाले की गरीबी के आगे बहुत बौनी लगने लगी थी.

‘पुष्पा 2’ के लिए 300 करोड़ रुपए, फीस के मामले में Allu Arjun ने सलमान को पछाड़ा

बौलीवुड में अल्लू अर्जुन की फिल्म पुष्पा ने 3 साल पहले धमाल मचा दिया था. साउथ की फिल्म पुष्पा को डब फिल्म के तौर पर हिंदी औडियंस द्वारा बहुत सहारा सराहा गया. जिसके पास सुकुमार के निर्देशन में बन रही फिल्म पुष्पा 2 का दर्शकों को बेसब्री से इंतजार है. इस फिल्म में अल्लू अर्जुन (Allu Arjun) की हीरोइन रश्मिका मंदाना ही है . जैसेजैसे फिल्म की रिलीज डेट सामने आ रही है जो इसी साल दिसंबर के पहले हफ्ते में सिनेमाघरों में दस्तक देने वाली है, पुष्पा 2 को लेकर कई सारी बातें सामने आ रही हैं.

जिसके तहत एक खास खबर सामने आई है. अल्लू अर्जुन ने पुष्पा 2 के लिए जो पारिश्रमिक लिया है वह पुष्पा के पारिश्रमिक से डबल है. प्राप्त सूत्रों के अनुसार अल्लू अर्जुन ने फिल्म पुष्पा के लिए 100 से 125 करोड़ के बीच पारिश्रमिक लिया था.

लेकिन अब खबर है अल्लू अर्जुन ने पुष्पा 2 के लिए 300 करोड़ के करीब पारिश्रमिक लिया है. जिसके बाद पारिश्रमिक के मामले में अल्लू अर्जुन ने सलमान खान शाहरुख खान, प्रभास, और रजनीकांत सबको पीछे छोड़ दिया है. अब देखना यह है अल्लू अर्जुन की पुष्पा 2 बौक्स औफिस पर पैसा वसूल फिल्म बनती है या नहीं. साउथ के सुपरस्टार अल्लू अर्जुन की फिल्म पुष्पा 2 बौलीवुड पर कितना भारी पड़ती है ? ये तो आने वाला वक्त ही बता पाएगा.

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