Online Hindi Stories : मैं जरा रो लूं

Online Hindi Stories : सुबह जैसे ही वह सो कर उठी, उसे लगा कि आज वह जरूर रोएगी. रोने के बहुत से कारण हो सकते हैं या निकाले जा सकते हैं. ब्रश मुंह में डाल कर वह घर से बाहर निकली तो देखा पति कुछ सूखी पत्तियां तोड़ कर क्यारियों में डाल रहे थे.

‘‘मुझे लगता है आज मेरा ब्लडप्रैशर बढ़ने लगा है.’’

पत्तियां तोड़ कर क्यारी में डालते हुए पति ने एक उड़ती सी निगाह अपनी पत्नी पर डाली. उसे लगा कि उस निगाह में कोई खास प्यार, दिलचस्पी या घबराहट नहीं है.

‘‘ठीक है दफ्तर जा कर कार भेज दूंगा, अपने डाक्टर के पास चली जाना.’’

‘‘नहीं, कार भेजने की जरूरत नहीं है. अभी ब्लडप्रैशर कोई खास नहीं बढ़ा है. अभी तक मेरे कानों से कोई सूंसूं की आवाज नहीं आ रही है, जैसे अकसर ब्लडप्रैशर बढ़ने से पहले आती है.’’

‘‘पर डाक्टर ने तुम से कहा है कि तबीयत जरा भी खराब हो तो तुम उसे दिखा दिया करो या फोन कर के उसे

घर पर बुलवा लो, चाहे आधी रात ही क्यों न हो. पिछली बार सिर्फ अपनी लापरवाहियों के कारण ही तुम मरतेमरते बची हो. लापरवाह लोगों के प्रति मुझे कोई हमदर्दी नहीं है.’’

‘‘अच्छा होता मैं मर जाती. आप बाकी जिंदगी मेरे बिना आराम से तो काट लेते.’’ यह कहने के साथ उसे रोना आना चाहिए था पर नहीं आया.

‘‘डाक्टर के पास अकेली जाऊं?’’

‘‘तुम कहो तो मैं दफ्तर से आ जाऊंगा. पर तुम अपने डाक्टर के पास तो अकेली भी जा सकती हो. कितनी बार जा भी चुकी हो. आज क्या खास बात है?’’

‘‘कोई खास बात नहीं है,’’ उस ने चिढ़ कर कहा.

‘‘सो कर उठने के बाद दिमाग शांत होना चाहिए पर, मधु, तुम्हें सवेरेसवेरे क्या हो जाता है.’’

‘‘आप का दिमाग ज्यादा शांत होना चाहिए क्योंकि  आप तो रोज सवेरे सैर पर जाते हो.’’

‘‘तुम्हें ये सब कैसे मालूम क्योंकि तुम तो तब तक सोई रहती हो?’’

‘‘अब आप को मेरे सोने पर भी एतराज होने लगा है. सवेरे 4 बजे आप को उठने को कौन कहता है?’’

‘‘यह मेरी आदत है. तुम्हें तो परेशान नहीं कर रहा. तुम अपना कमरा बंद किए 8 बजे तक सोती रहती हो. क्या मैं ने तुम्हें कभी जगाया? 7 बजे या साढ़े 7 बजे तक तुम्हारी नौकरानी सोती रहती है.’’

‘‘जगा भी कैसे सकते हैं? सो कर उठने के बाद से इस घर में बैल की तरह काम में जुटी रहती हूं.’’

खाना बनाने वाली नौकरानी 2 दिनों की छुट्टी ले कर गई थी पर आज भी नहीं आई. दूसरी नौकरानी आ कर बाकी काम निबटा गई.

नाश्ते के समय उस ने पति से पूछा, ‘‘अंडा कैसा लेंगे?’’

‘‘आमलेट.’’

‘‘अच्छी बात है,’’ उस ने चिढ़ कर कहा.’’

पति ने जल्दीजल्दी आमलेट और

2 परांठे खा लिए. डबलरोटी वे नहीं खा सकते, शायद गले में अटक जाती है.

उस ने पहला कौर उठाया ही था कि पति की आवाज आई, ‘‘जरा 10,000 रुपए दे दो, इंश्योरैंस की किस्त जमा करानी है.’’ चुपचाप कौर नीचे रख कर वह उठ कर खड़ी हो गई. अलमारी से 10,000 रुपए निकाल कर उन के  सामने रख दिए. अभी 2 कौर ही खा पाई थी कि फिर पति की आवाज आई, ‘‘जरा बैंक के कागजात वाली फाइल भी निकाल दो, कुछ जरूरी काम करने हैं.’’ परांठे में लिपटा आमलेट उस ने प्लेट में गुस्से में रखा और उठ कर खड़ी हो गई. फिर दोबारा अलमारी खोली और फाइल उन के हाथ में पकड़ा दी और नौकरानी को आवाज दे कर अपनी प्लेट ले जाने के लिए कहा.

‘‘तुम नहीं खाओगी?’’

‘‘खा चुकी हूं. अब भूख नहीं है. आप खाने पर बैठने से पहले भी तो सब हिसाब कर सकते थे. कोई जरूरी नहीं है कि नाश्ता करते समय मुझे दस दफा उठाया जाए.’’

‘‘आज तुम्हारी तबीयत वाकई ठीक नहीं है, तुम्हें डाक्टर के पास जरूर जाना चाहिए.’’

11 बजे तक खाना बनाने वाली नौकरानी का इंतजार करने के बाद वह खाना बनाने के लिए उठ गई. देर तक आग के पास खड़े होने पर उसे छींकें आनी शुरू हो गईं जो बहुत सी एलर्जी की गोलियां खाने पर बंद हो गईं.

उस ने अपने इकलौते बेटे को याद किया. इटली से साल में एक बार, एक महीने के लिए घर आता है. अब तो उसे वहां रहते सालों हो गए हैं. क्या जरूरत थी उसे इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए बाहर भेजने की? अब उसे वहां नौकरी करते भी कई साल हो गए हैं. एक महीना मां के पास रह कर वह हमेशा यही वादा कर जाता है, ‘अब की बार आऊंगा तो शादी जरूरी कर लूंगा, पक्का वादा रहा मां.’

झूठा कहीं का. हां, हफ्ते में एक बार फोन पर बात जरूर कर लेता है. उस की जिंदगी में बहुत खालीपन आ गया है. बेटे को याद कर के उसे हमेशा रोना आ जाता है पर आज नहीं आया.

लखनऊ से कितने दिन हो गए, कोई फोन नहीं आया. उस ने भी नहीं किया. पता नहीं अम्माजी की तबीयत कैसी है. वह अपने मांबाप को बहुत प्यार करती है. वह कितनी मजबूर है कि अपनी मां की सेवा नहीं कर पाती. बस, साल में एक बार जा कर देख आती है, ज्यादा दिन रह भी नहीं सकती है. क्या यही बच्चों का फर्ज है?

उस ने तो शायद अपनी जिंदगी में किसी के प्रति कोई फर्ज नहीं निभाया. अपनी निगाहों में वह खुद ही गिरती जा रही थी. सहसा उम्र की बहुत सी सीढि़यां उतर कर अतीत में खो गई और बचपन में जा पहुंची. मुंह बना कर वह घर की आखिरी सीढ़ी पर आ कर बैठ गई थी, बगल में अपनी 2 सब से अच्छी फ्राकें दबाए हुए. बराबर में ही अब्दुल्ला सब्जी वाले की दुकान थी.

‘कहो, बिटिया, आज क्या हुआ जो फिर पोटलियां बांध कर सीढ़ी पर आ बैठी हो?’

‘हम से बात मत करो, अब्दुल्ला, अब हम ऊपर कभी नहीं जाएंगे.’

अब्दुल्ला हंसने लगा, ‘अभी बाबूजी आएंगे और गोद में उठा कर ले जाएंगे. तुम्हें बहुत सिर चढ़ा रखा है, तभी जरा सी डांट पड़ने पर घर से भाग पड़ती हो.’

‘नहीं, अब हम ऊपर कभी नहीं जाएंगे.’

‘नहीं जाओगी तो तुम्हारे कुछ खाने का इंतजाम करें?’

‘नहीं, हम कुछ नहीं खाएंगे,’ और वह कैथ के ढेर की ओर ललचाई आंखों से देखने लगी.

‘कैथ नहीं मिलेगा, बिटिया, खा कर खांसोगी और फिर बाबूजी परेशान होंगे.’

‘हम ने तुम से मांगा? मत दो, हम स्कूल में रोज खाते हैं.’

‘कितनी दफा कहा है कि कैथ मत खाया करो, बाबूजी को मालूम पड़ गया तो बहुत डांट पड़ेगी.’

‘तुम इतनी खराब चीज क्यों बेचते हो?’ अब्दुल्ला चुपचाप पास खड़े ग्राहक के लिए आलू तौलने लगा. सामने से उस के पिताजी आ रहे थे. लाड़ली बेटी को सीढ़ी पर बैठा देखा और गोद में उठा लिया.

‘अम्माजी ने डांटा हमारी बेटी को?’

बहुत डांटा, और उस ने पिता की गरदन में अपनी नन्हीनन्ही बांहें डाल दी.

बचपन के अतीत से निकल कर उम्र की कई सीढि़यां वह तेजी से चढ़ गई. जवान हो गई थी. याद आया वह दिन जब अचानक ही मजबूत हाथों का एक जोरदार थप्पड़ उस के गाल पर आ पड़ा था. वह चौंक कर उठ बैठी थी. उस के हाथ अपने गाल को सहलाने लगे थे. बापबेटी दोनों जलती हुई आंखों से एकदूसरे को घूर रहे थे.

पिता ने नजरें झुका लीं और थके से पास में पड़ी कुरसी पर बैठ गए. उन्होंने अपनी लाड़ली बेटी को जिंदगी में पहला और आखिरी थप्पड़ मारा था. सामने खड़े हो कर अंगारे उगलती आंखों से

उस ने पिता से सिर्फ इतना ही पूछा, ‘क्यों मारा आप ने मुझे?’

‘तुम शादी में आए मेहमानों से लड़ रही थी. मौसी ने तुम्हारी शिकायत की है,’ बहुत थके हुए स्वर में पिता ने जवाब दिया.

‘झूठी शिकायत की है, उन के बच्चों ने मेरा इसराज तोड़ दिया है. आप को मालूम है वह इसराज मुझे कितना प्यारा है. उस से मेरी भावनाएं जुड़ी हुई हैं.’

‘कुछ भी हो, वे लोग हमारे मेहमान हैं.’

‘लेकिन आप ने क्यों मारा?’ वह उन के सामने जमीन पर बैठ गई और पिता के घुटनों पर अपना सिर रख दिया. अपमान, वेदना और क्रोध से उस का सारा शरीर कांप रहा था. पिता उस के सिर पर हाथ फेर रहे थे. यादों से निकल कर वह अपने आज में लौट आई.

कमाल है इतनी बातें याद कर ली पर आंखों में एक कतरा आंसू भी न आया. दोपहर को पति घर आए और पूछा, ‘‘क्या खाना बना है?’’

‘‘दाल और रोटी.’’

‘‘दाल भी अरहर की होगी?’’

‘‘हां’’

वे एकदम से बौखला उठे, ‘‘मैं क्या सिर्फ अरहर की दाल और रोटी के लिए ही नौकरी करता हूं?’’

‘‘शायद,’’ उस ने बड़ी संजीदगी से कहा, ‘‘जो बनाऊंगी, खाना पड़ेगा. वरना होटल में अपना इंतजाम कर लीजिए. इतना तो कमाते ही हैं कि किसी भी बढि़या होटल में खाना खा सकते हैं. मुझे जो बनाना है वही बनाऊंगी, आप को मालूम है कि नौकरानी आज भी नहीं आई.’’

‘‘मैं पूछता हूं, तुम सारा दिन क्या करती हो?’’

‘‘सोती हूं,’’ उस ने चिढ़ कर कहा, ‘‘मैं कोईर् आप की बंधुआ मजदूर नहीं हूं.’’

पति हंसने लगे, ‘‘आजकल की खबरें सुन कर कम से कम तुम्हें एक नया शब्द तो मालूम पड़ा.’’

खाने की मेज पर सारी चीजें पति की पसंद की ही थीं – उड़द की दाल, गोश्त के कबाब, साथ में हरे धनिए की चटनी, दही की लस्सी और सलाद. दाल में देसी घी का छौंक लगा था.

शर्मिंदा से हो कर पति ने पूछा, ‘‘इतनी चीजें बना लीं, तुम इन में से एक चीज भी नहीं खाती हो. अब तुम किस के साथ खाओगी?’’

‘‘मेरा क्या है, रात की मटरआलू की सब्जी रखी है और वैसे भी अब समय ने मुझे सबकुछ खाना सिखला दिया है. वरना शादी से पहले तो कभी खाना खाया ही नहीं था, सिर्फ कंधारी अनार, चमन के अंगूर और संतरों का रस ही पिया था.’’

‘‘संतरे कहां के थे?’’

‘‘जंगल के,’’ उस ने जोर से कहा.

उन दिनों को याद कर के रोना आना चाहिए था पर नहीं आया. अब उसे यकीन हो गया था कि वह आज नहीं रोएगी. जब इतनी बातें सोचने और सुनने पर भी रोना नहीं आया तो अब क्या आएगा.

हाथ धो कर वह रसोई से बाहर निकल ही रही थी कि उस ने देखा, सामने से उस के पति चले आ रहे हैं. उन के हाथ में कमीज है और दूसरे हाथ में एक टूटा हुआ बटन. सहसा ही उस के दिल के भीतर बहुत तेजी से कोई बात घूमने लगी. आंखें भर आईं और वह रोने लगी.

Kahaniyan : अपाहिज – आखिर कौन था स्वाति की पूरी दुनिया?

Kahaniyan : एअरइंडिया का विमान मुंबई एअरपोर्ट पर था. यह मुंबई से दिल्ली की उड़ान थी. वर्किंग डे होने की वजह से अधिकांश सीटें फुल थीं. विमान की रवानगी के कुछ समय पूर्व ही स्वाति ने गौरव के साथ विमान में प्रवेश किया. विमान परिचारिका व्हीलचेयर धकेल रही थी, स्वाति उस का साथ दे रही थी. गौरव व्हीलचेयर पर बैठा था. हैंडसम, गोरेचिट्टे गौरव के चेहरे पर परेशानी के भाव थे. साफ लग रहा था कि वह तनाव में है.

स्वाति ने परिचारिका की सहायता से गौरव को विमान की सीट पर बैठाया और धन्यवाद दिया. उस ने अपने हाथ में थमा सामान रैक में रखा. जैसे ही उस की नजरें अपने से 2 सीट पीछे गई, वह चौंक पड़ी.

उस सीट पर अनंत बैठा था. अकेला नहीं बैठा था. उस की बगल में एक नवविवाहित लगने वाली युवती भी थी. वह अनंत से बातें कर रही थी. उसे देख अवाक रह गई स्वाति.

यह कैसे हुआ? अनंत की बगल में युवती यानी अनंत की शादी हो गई? अनेक सवाल कौंध गए उस के मनमस्तिष्क में. वह धम्म से अपनी सीट पर बैठ गई. माथा चकरा गया उस का.

‘‘क्या हुआ स्वाति?’’ गौरव ने परेशान भाव से पूछा, ‘‘तुम्हारी तबीयत तो ठीक है?’’ स्वाति की अचानक ऐसी हालत देख गौरव ने पूछा.

वह कुछ नहीं बोली, तो गौरव ने उसे झकझोरा, ‘‘क्या हुआ, ठीक तो हो?’’

‘‘हांहां ठीक हूं. बस थोड़ा सिर चकरा गया था,’’ स्वाति ने सामान्य होते हुए कहा.

स्वाति की अनंत से शादी हुई थी. यह उन दिनों की बात है, जब उस ने कालेज से बीए किया ही था. गजब की खूबसूरत स्वाति न केवल आकर्षक तीखे नैननक्श वाली थी, बल्कि कुशाग्रबुद्धि भी थी.

मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी स्वाति 5 बहनों में सब से छोटी थी. चंचल स्वभाव की स्वाति परिवार में सब की लाड़ली थी. बीए अंतिम वर्ष में थी कि उस के पापा का देहांत हो गया. उस की उम्र यही कोई 21 वर्ष के करीब थी. 4 बेटियों की शादी करतेकरते स्वाति के पापा वक्त से पहले ही बूढ़े हो गए थे. इधरउधर से कर्ज ले कर बेटियों को ब्याहा तो स्वाति की शादी से पहले ही चल बसे.

पति का साथ देती आ रही स्वाति की मां ने अपने पति की मौत के बाद चारपाई पकड़ ली. अब चारों बहनों को इस बात की चिंता हुई कि मां भी साथ छोड़ गईं तो स्वाति का क्या होगा? उसे कौन संभालेगा? अत: बहनों ने मिल कर तय किया कि मां के रहते हुए स्वाति के हाथ पीले कर दिए जाएं. पर अच्छे घरपरिवार का लड़का मिले तब न.

कई रिश्ते आए, लेकिन भाई कितने हैं, बाप…? के सवाल पर लड़के वाले खिसक जाते. अगर कोई इन सब हालात से भी समझौता कर लेता तो सवाल आता कि शादी में कितना पैसा खर्च करोगे?

खर्च के नाम पर तो कुछ था ही नहीं, उन के पास.

बहनों की ससुराल में भी ऐसा कुछ नहीं था कि सब मिल कर शादी में खर्च लायक मदद कर सकें.

स्वाति कहती, ‘‘दीदी, आप लोग मेरी टैंशन न लो. अभी मेरी उम्र ही क्या हुई है?’’

एक दिन स्वाति के लिए मुंबई से बहुत बड़े उद्योगपति घराने से रिश्ता आया. स्वाति के रिश्ते की मौसी का लड़का सुशांत मुंबई से यह रिश्ता ले कर दिल्ली आया.

‘‘मौसी, बहुत बड़ा घराना है. यों समझो राज करेगी स्वाति. घर में कितने नौकरचाकर, रुपया, धनदौलत, ऐशोआराम है कि आप सोच भी नहीं सकतीं,’’ सुशांत ने स्वाति की मां से कहा तो उन की आंखों में चमक आ गई.

‘‘हां, मौसी, बिलकुल सच.’’

‘‘तो बेटा इतने बड़े घर का रिश्ता… हमारे घर…’’ मां ने सुशांत से पूछा.

‘‘सब बहुत अच्छा है मौसी, बस एक छोटी सी कमी है…’’

सुशांत अपनी बात पूरी करता उस से पहले ही स्वाति की मां ने उत्सुकतापूर्वक पूछा, ‘‘वह क्या बेटा? कोई बीमारी है लड़के को या कोई ऐब…’’ मां ने पूछा.

‘‘नहीं मौसी, ऐसी कोई खास बीमारी नहीं. बचपन में लड़के के एक पांव में तकलीफ हो गई थी. पर मौसी इस का इलाज जल्दी होने लगेगा अमेरिका में,’’ सुशांत ने एक स्वर में अपनी बात कही.

‘‘पर बेटा अगर ठीक नहीं हुआ तो?’’ मां ने पूछा.

‘‘अरे मौसी, अरबों रुपए हैं उन के पास. कोई छोटामोटा घर नहीं है. इलाज पर पानी की तरह पैसा बहा देंगे. उन की अमेरिका के किसी बड़े डाक्टर से बात चल रही है,’’ सुशांत ने कहा.

‘‘वह तो ठीक है बेटा पर…’’

‘‘मौसी आप बिलकुल चिंता न करें. स्वाति मेरी बहन है. मैं इस का रिश्ता गलत घर या गलत लड़के से कराऊंगा क्या? मेरी नाक नहीं कट जाएगी?’’ सुशांत ने अपनापन दिखाते हुए कहा, तो मां के मन में बात जमती नजर आई.

आखिर सुशांत ने अपने तर्क दे कर मां और बड़ी बहनों को स्वाति की शादी के लिए राजी कर लिया.

स्वाति ने कुछ दिन विरोध किया. लेकिन सब बहनों और मां ने अपनी गरीबी और हालात का वास्ता दे कर उसे मना लिया और फिर एक दिन स्वाति की अनंत से शादी हो गई.

स्वाति मुंबई आ गई. जैसे सुशांत ने बताया था वैसे ही सब शाही ठाटबाट थे अनंत के घर. पता नहीं कितने नौकरचाकर, गाडि़यां, बहुत बड़ा महल सा घर, सासससुर. बस, अनंत इकलौता था अपने मांबाप का. सब का दुलार और प्यार मिला स्वाति को.

अनंत का एक पैर बचपन में पोलियोग्रस्त हो गया था. वह बेसाखी के सहारे चलता. बड़ा अजीब लगता जब वह स्वाति जैसी नवयौवना के साथ चलता. स्वाति को शुरू में बड़ी शर्म महसूस होती जब लोग उन्हें देखते. किसी प्रोग्राम में जाते या मार्केट, लोग घूरने वाले अंदाज से दोनों को देखने. लेकिन स्वाति ने खुद को समझाया. अनंत का प्यार देख कर उस ने निर्णय लिया कि वह अनंत का सहारा बनेगी. उस को दुनिया दिखाएगी और सच में स्वाति ने यही किया. अनंत के कारोबार को समझा और संभाल लिया. देश भर में अनंत को ले कर घूमी स्वाति. वह मुंबई में होने वाले हर कार्यक्रम में जाती. स्वाति हाथ थाम कर चलती अनंत का. खूब ऐंजौय करती.

एक दिन एक क्लब के बहुत बड़े प्रोग्राम के बाद स्वाति अपने पति अनंत का हाथ थामे बाहर आ रही थी कि उसे सामने से गौरव आता नजर आया. वही गौरव जिस ने स्वाति के साथ बीए की थी. बहुत ही स्मार्ट और आकर्षक युवक था वह.

‘‘हैलो गौरव,’’ स्वाति की नजर जैसे ही गौरव पर पड़ी तो उस ने कहा.

‘‘हाय स्वाति, कैसी हो भई? कहां हो आजकल?’’ गौरव ने करीब आते हुए उस से पूछा.

‘‘यहीं हूं मुंबई में. शादी हो गई मेरी…

2 साल हो गए,’’ स्वाति ने चहकते हुए कहा.

‘‘अच्छा 2 साल भी हो गए,’’ गौरव ने आंखें फाड़ कर आश्चर्य से कहा.

‘‘हां, 2 साल और ये हैं मेरे पति अनंत,’’ स्वाति ने परिचय कराया.

‘‘हैलो, माई सैल्फ गौरव.’’

गौरव ने अनंत की ओर मुखातिब होते हुए कहा और अपना हाथ अनंत की ओर बढ़ा दिया.

‘‘अनंत, ये मेरे कालेज का फ्रैंड है गौरव,’’ स्वाति ने कहा.

जब अनंत लंगड़ाते हुए आगे बढ़ा और अपना हाथ आगे बढ़ाया, तो गौरव कुछ समझ नहीं पाया.

‘‘हैलो, गौरव मैं अनंत शर्मा.’’

गौरव प्रश्नवाचक नजरों से स्वाति की ओर देख रहा था. गौरव ने बताया कि वह दिल्ली से मुंबई शिफ्ट हो गया है. यहां एक कंपनी में उच्च पद पर है और अभी तक शादी नहीं की है. स्वाति और गौरव ने फिर मिलने और एकदूसरे को घर आने का न्योता दिया. दोनों ने अपनेअपने मोबाइल नंबर भी दिए और विदा हो गए.

गौरव उस रात सो नहीं पाया. वह कालेज टाइम से ही स्वाति से प्यार करता था. लेकिन कभी अपने प्यार का इजहार नहीं कर पाया. उस के दिमाग में कई सवाल चल रहे थे. स्वाति ने एक अपाहिज से शादी क्यों की? सोचतेसोचते वह सो गया.

गौरव ने फैसला किया कि वह कभी स्वाति से पूरी बात पूछेगा. उस ने एक दिन स्वाति को फोन किया. स्वाति ने कहा कि वह शाम को जरूरी काम से मार्केट जाएगी तब मिलते हैं. दोनों ने एक कौफी शौप पर मिलना तय किया.

स्वाति ने गौरव को सब बातें बताईं. शादी से पूर्व और शादी के बाद से अब तक की. 1-1 बात उस से सांझा की. उस ने यह भी कहा कि वह अनंत और उस के परिवार के साथ खुश है. अनंत के करोड़ों रुपए के टर्नओवर वाला कारोबार भी संभाल रही है.

गौरव को बहुत बड़ा आश्चर्य हुआ कि किस तरह की मजबूरियों में स्वाति ने सब स्वीकार किया और अब इन हालात में भी खुश है.

गौरव ने अपनी बातें भी बताईं. उस शाम स्वाति को घर पहुंचने में थोड़ी देर हो गई. अकेली ही थी और गाड़ी खुद ड्राइव कर के लाई थी, तो अनंत को काफी चिंता हुई.

घर आने पर उस ने अनंत से कहा, ‘‘आप मेरी टैंशन मत लिया कीजिए. आप की स्वाति अब मुंबई में नई नहीं है.’’

गौरव से स्वाति का मेलमिलाप बढ़ने लगा. गौरव कई बार स्वाति के घर भी आया. गौरव और अनंत भी मित्रवत मिलते. स्वाति और गौरव की निकटता बढ़ती जा रही थी.

दोनों ने एकसाथ कई बार मूवी देखी. गौरव को अच्छा लगा. स्वाति को गौरव में एक नई दुनिया नजर आने लगी. स्वाति गौरव की तरफ आकर्षित होती जा रही थी, तो अनंत से दूर.

स्वाति और अनंत की शादी को करीब 5 साल होने जा रहे थे. लेकिन दोनों के अभी तक कोई संतान नहीं हुई. अब उसे गौरव में अपनी दुनिया और सुनहरा भविष्य नजर आने लगा था. धनदौलत, ऐशोआराम और नर्म बिछौने उस के लिए कांटों की सेज लगने लगे.

अनंत भले ही अपाहिज था, लेकिन वह पूरी कोशिश करता कि वह स्वाति को खुश रखे. उसे किसी प्रकार की कमी महसूस नहीं होने  देता. अनंत अकसर स्वाति से कहता, ‘‘स्वाति  तुम ने जितना मेरा साथ दिया है, उस का कर्ज मैं कभी नहीं चुका पाऊंगा. शीघ्र ही मेरे पैर  का इलाज होगा तो तुम्हें अपने बूते पर दुनिया की सैर कराऊंगा.’’

गौरव से मिलने के बाद स्वाति का बदला रुख अनंत महसूस करने लगा था. लेकिन वह स्वाति से कुछ बोल नहीं पाता. बस बच्चों की तरह बिलख कर रह जाता. उसे एहसास होने लगा था कि स्वाति और गौरव की निकटता कुछ नया गुल खिलाएगी. स्वाति का देरसवेर घर आना, औफिस से भी गायब रहना शक पैदा करता था.

अनंत के मम्मीपापा तक भी ये बातें पहुंचने लगीं कि स्वाति का ध्यान अनंत और कारोबार में न हो कर कहीं और है. उन्होंने स्वाति से बात की. लेकिन बड़ी सफाई से स्वाति बहाना बना कर टाल गई. कभी कारोबार तो कभी किट्टी फ्रैंड्स के साथ जाने की बात वह कहती.

अनंत के पापा ने एक दिन तय किया कि वह स्वाति पर नजर रखेंगे. उन्होंने एक प्राइवेट डिटैक्टिव एजेंसी से संपर्क कर स्वाति पर नजर रखने का अनुबंध किया. एजेंसी ने जो रिपोर्ट दी, चौंकाने वाली थी. स्वाति का समय गौरव के साथ व्यतीत हो रहा था. उस ने पांचसितारा होटल में रूम भी बुक करा रखा था, जिस में गौरव और स्वाति मिलते.

एक दिन डिटैक्टिव एजेंसी ने सूचना दी कि स्वाति और गौरव होटल में हैं. अनंत के मम्मीपापा बिना वक्त गंवाए होटल जा पहुंचे.

अनंत के पापा ने होटल के रूम की डोरबैल बजाई. स्वाति और गौरव रूम में ही थे. उन्होंने सोचा वेटर होगा. गौरव ने दरवाजा खोला. सामने अनंत के मम्मीपापा को देख उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. मानो पैरों तले की जमीन खिसक गई हो.

‘‘अ… अ… आप…’’ उस के मुंह से निकला.

‘‘हां…हम… बेशर्म इनसान…’’ अनंत के पापा ने गौरव को अंदर धकेलते हुए कहा. स्वाति बैड पर लेटी हुई थी. उस के वस्त्र अस्तव्यस्त हो रहे थे. रूम के अंदर का दृश्य सारी प्रेमलीला को बयान कर रहा था. स्वाति अपने गुस्से से भरे सासससुर को यों अचानक सामने देख बैड से उठी.

‘‘स्वाति, क्या है यह सब..?’’ सास ने चीखते हुए पूछा.

नजरें गड़ाए खड़ी रही स्वाति.

‘‘हमारी छूट और लाड़प्यार का यह सिला दिया तुम ने?’’ ससुर भी चीख पड़े.

‘‘हां, यही सच है… आप क्या समझते हैं सारी उम्र मैं यों ही गुजार दूं? एक अपाहिज के साथ? मेरे भी अरमान हैं. आखिर कब तक…’’ स्वाति अचानक घायल शेरनी की तरह चीख पड़ी.

‘‘तो रहो इस के साथ ही. हमारे घर के रास्ते अब बंद हैं तुम्हारे लिए,’’ सास ने स्वाति की बात का जवाब देते हुए कहा.

ज्यादा बहस करने का मतलब था गौरव और स्वाति से झगड़ा करना. ज्यादा उचित यही था. दोनों को वहीं छोड़ सासससुर गुस्से में भरे होटल से चले आए.

उस दिन शाम को स्वाति घर आई… वह चुपचाप अपने रूम में चली गई. अनंत को मम्मीपापा से होटल में जो कुछ हुआ उस की जानकारी मिल चुकी थी. रात को दोनों का झगड़ा भी हुआ.

‘‘अब मेरी लाइफ में तुम्हारा कोई काम नहीं स्वाति,’’ अनंत ने दोटूक बात कही.

और एक दिन गौरव के मोहपाश में बंधी स्वाति चुपचाप घर से चली गई. बस एक खत लिखा अनंत के नाम.

‘गौरव के साथ जा रही हूं. आप ने मुझे बहुत अपनापन दिया. आप की आभारी हूं. मुझे खोजने की कोशिश मत करना.’

स्वाति घर छोड़ कर जा चुकी थी. वह जो कामकाज देख रही थी, अनंत के पापा ने उसे फिर से संभाला. उन्होंने बैंक, लेनदारों और समस्त लेनदेन की जानकारी ली. उन के सामने चौंकाने वाले तथ्य सामने आए. होटल के लाखों रुपए के बिलों का भुगतान किया गया था. 1 करोड़ रुपए से ज्यादा की नक्दी और 50 लाख के जेवर गायब थे. अनंत के परिवार के लिए यह बहुत बड़ा विश्वासघात था. परिवार की ही बहू घर से करोड़ों की नक्दी व जेवर ले कर अपने प्रेमी के साथ चली गई. किसी सदमे से कम न था ये सब.

वक्त धीरेधीरे बड़ेबड़े जख्म भर देता है. 1 साल गुजर चुका था. अनंत का परिवार बहू से मिले जख्म को नियति मान कर सामान्य हो रहा था कि एक दिन वकील का नोटिस मिला. स्वाति ने तलाक का नोटिस भेजा. अनंत के परिवार वाले अवाक रह गए. अब भी कोई कसर बाकी थी. ऐसी कौन सी दुश्मनी थी, जो स्वाति निकाल रही थी. उस ने 10 करोड़ के भरणपोषण राशि की मांग भी की. स्वाति का यह नया रूप किसी वज्रपात से कम न था. आखिर परिवार की इज्जत का सवाल था. फजीहत होते नहीं देख सकते थे. अनंत के मम्मीपापा ने तय किया कि आपसी सहमति से तलाक और भरणपोषण की राशि दे कर स्वाति से छुटकारा पा लिया जाए.

अनंत और स्वाति का तलाक हो गया. 8 करोड़ स्वाति को बतौर भरणपोषण दिए गए.

स्वाति ने गौरव से शादी कर ली. वह खुश थी. नई दुनिया में आ कर, अनापशनाप खर्च, स्वाति को तलाक में मिले करोड़ों रुपए पा कर गौरव भी ऐय्याश हो चला था. उस ने पांचसितारा होटलों में पार्टियों, क्रिकेट सट्टे में रुपए फूंक डाले. गौरव इस कदर ऐय्याश और शराब का आदी हो चुका था कि पैसे के लिए स्वाति से मारपीट करने लगा.

एक दिन अचानक घटना घटी. गौरव बाइक पर जा रहा था कि बस ने उस की बाइक में टक्कर मार दी. वह सड़क पर जा गिरा. पीछे से आ रही दूसरी बस से गौरव के पैर बुरी तरह कुचल गए.

स्वाति को जैसे ही सूचना मिली, वह बदहवास दौड़ी चली आई हौस्पिटल. गौरव को औपरेशन थिएटर ले जाया जा चुका था. गौरव के कुछ अन्य मित्र भी आ चुके थे.

डाक्टर्स की टीम ने स्वाति को बताया कि गौरव की टांगें बुरी तरह कुचली जा चुकी हैं. उन्हें काटना पड़ेगा, क्योंकि वह अब ठीक होने योग्य नहीं है.

स्वाति की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. उसे अपनी दुनिया लुटती नजर आई. गौरव के दोनों पैर घुटने के ऊपर तक काटे जा चुके थे.

दुर्घटना में टांगें खो चुके गौरव के लिए यह संभव नहीं था कि मुंबई जैसे महानगर में रह पाए. अपाहिज हो चुका गौरव चिड़चिड़ा हो गया. वह चाहता था कि 24 घंटे स्वाति उस की सेवा में लगी रहे. 1 पल भी दूर न हो. उसे अपनी गुजरी जिंदगी के दिन याद हो जाते. जब स्वाति अनंत को छोड़ कर उस के पास चोरीछिपे दौड़ी चली आती थी. उसे लगने लगा कि स्वाति ने जैसे अनंत के साथ बेवफाई की वैसे उस के साथ भी कर सकती है. वह जरा भी इधरउधर होती, तो झल्ला पड़ता गौरव, ‘‘कहां गई थी? किस से मिलने गई थी? कौन है वह?’’

स्वाति को लगता उस के कानों में किसी ने पिघलता शीशा डाल दिया है. ऐसे शब्दभेदी बाणों से चीत्कार उठता उस का मन. पर करती भी क्या? उस का अतीत ही उस की सजा बन रहा था. उसे अनंत की बड़ी याद आती, पर अब कर भी क्या सकती थी?

धीरेधीरे उन के समक्ष आर्थिक संकट भी खड़ा हो रहा था. गौरव के इलाज पर काफी पैसा खर्च हो चुका था. आखिर दोनों ने तय किया कि दिल्ली लौट जाएंगे. वहीं अपने शहर में कोई कामकाज करेंगे.

गौरव और स्वाति ने दिल्ली जाने का फैसला किया. मुंबई एअरपोर्ट पर दिल्ली के लिए एअर इंडिया की फ्लाइट में  गौरव को व्हीलचेयर पर ले कर आई थी.

वह अपने अतीत को तो खो चुकी थी, अब जो उस के हाथ में था, उस को नहीं खोना चाहती थी.

‘‘ऐक्सक्यूज मी मैडम, आप शायद अपनी बैल्ट बांधना भूल गईं,’’ एअर होस्टेस ने स्वाति से कहा.

‘‘थैंक्स,’’ स्वाति ने इतना ही कहा. उस ने पीछ मुड़ कर देखा अनंत अभी भी बड़े शांत भाव से बैठा था. बगल में बैठी युवती उस के कंधे पर सिर टिका सो रही थी.

स्वाति महसूस कर रही थी जैसे वह आज अपाहिज हो गई है.

Stories : मन का बंधन

Stories : कनक हिंदी में पीएचडी कर रही थी. वह विभाग के प्रमुख डा. अमन के अधीन शोध कर रही थी. डा. अमन कुछ दिनों के लिए बाहर गए थे. उन्होंने अपने कक्ष की चाबी कनक को दे दी थी ताकि वह उन की पुस्तकों को पढ़ सके. इसी बीच एक प्रोफैसर भी 2 महीनों की छुट्टी पर चले गए. उन की जगह कनक को अस्थाई तौर पर नियुक्त किया गया.  कनक हमेशा सफेद साड़ी व ब्लाउज पहनती थी. उस का गेहुआं रंग, तीखे नैननक्श, हंसमुख एवं आकर्षक चेहरा सभी को उसे देखने को मजबूर कर देता था. इस के अलावा कुदरत ने उसे मधुर वाणी भी दी थी.

कनक अपनी पहली क्लास लेने स्नातकोत्तर अंतिम वर्ष की कक्षा में गई. उस ने विद्यार्थियों को संबोधित कर अपना परिचय देते हुए कहा, ‘‘आप सभी विद्यार्थी मुझे अपना मित्र ही समझें. इन 2 महीनों में मैं आप की पूरीपूरी मदद करने की कोशिश करूंगी और हो सकता है मुझे भी आप से कुछ सीखने को मिले जिस से मुझे अपनी शोध पुस्तिका पूरी करने में मदद मिले.’’

इस के बाद कनक ने सभी छात्रछात्राओं का भी परिचय लिया. उस कक्षा में नवीन नामक छात्र भी था जो मध्यवर्गीय परिवार से था. उस के पिता का देहांत हो चुका था. मां गृहिणी थीं. पिता द्वारा रखे रुपयों और पैंशन से मांबेटे का गुजारा होता था. नवीन पढ़ने में बहुत होशियार था और स्मार्ट पर्सनैलिटी का भी स्वामी था. एक पेपर ठीक न होने की वजह से उस ने पिछले साल परीक्षा ड्रौप कर दी थी. वह हंसमुख और मजाकिया स्वभाव का भी था. कनक पहले दिन क्लास ले कर दोपहर में जब कालेज से निकली तो काफी बारिश हो रही थी. वह गेट के बाहर रिकशे के लिए खड़ी थी. बारिश कम हो गई थी. आमतौर पर वह औटो से घर जाती थी.

औटो उसे मेन रोड पर छोड़ देता. फिर कुछ दूर गली में जाने पर उस का घर पड़ता था.   तभी नवीन अपने स्कूटर से वहां से गुजरने लगा तो कनक को देख कर रुक गया.  बोला, ‘‘मैडम, कहां जाना है आप को? चलिए आप को घर तक छोड़ देता हूं.’’ ‘‘नहीं, मैं रिकशे में चली जाऊंगी.’’ ‘‘बारिश के चलते अभी रिकशा जल्दी नहीं मिलेगा. चलिए, किराया मुझे दे देना.’’ इस पर दोनों हंस पड़े और फिर कनक हंसते हुए स्कूटर पर बैठते हुए बोली, ‘‘सब्जी मंडी जाऊंगी. कितना किराया लोगे?’’ ‘‘आप अपनी मरजी से जो भी दे दें. वैसे मैं भी उधर से ही जाता हूं. आप के साथ को ही किराया समझ लूंगा.’’ सब्जी मंडी पहुंचने पर कनक बोली, ‘‘बस मुझे यहीं ड्रौप कर दो.

बगल वाली गली में ही मेरा घर है.’’ नवीन ने स्कूटर न रोक कर गली में मुड़ते हुए कहा, ‘‘अभी बारिश हो रही है… आप को घर तक छोड़ देता हूं.’’ थोड़ी दूर चलने पर कनक ने स्कूटर रोकने को कहा. स्कूटर से उतर कर उस ने नवीन को धन्यवाद दिया. फिर बाय में हाथ हिला कर घर के अंदर चली गई. नवीन सोचने लगा कि इस के घर तक आया और इस ने औपचारिकतावश भी अंदर आने को नहीं कहा और कहां मैं चाय की सोच रहा था. दूसरे दिन कनक ने क्लास में कहा, ‘‘आप लोगों को कल मैं सूरदास द्वारा लिखित सौंदर्य वर्णन के विषय में बता रही थी. मुझे आशा है आप सभी इसे भलीभांति समझ गए होंगे. किसी को कोई संदेह हो तो पूछ सकता है.’’

नवीन ने पूछा, ‘‘मुझे सूरदास की इन पंक्तियों के अर्थ बताएं? अद्भुत एक अनुपम बाग, जुगल कमल पर गजवर क्रीड़त, तापर सिंह करत अनुराग…’’ ‘‘इस का मतलब और जिन्हें पता नहीं है कृपया अपना हाथ उठाएं,’’ कनक ने कहा. पूरी क्लास में किसी ने हाथ नहीं उठाया. तब कनक बोली, ‘‘मुझे पता है आप सभी यह बीए औनर्स में पढ़ चुके हैं. फिर भी नवीन मुझ से डा. अमन के कक्ष में मिले तो उन्हें समझा दूंगी.’’ इस पर सभी लड़के धीरेधीरे मुसकराने लगे जबकि लड़कियां गंभीर मुद्रा में थीं. नवीन जब कनक से मिला तब कनक ने पूछा, ‘‘मैं क्लास को तो आप कह कर संबोधित करती हूं, पर मैं अकेले में तुम्हारे साथ ज्यादा सहज महसूस करती हूं. तुम्हें बुरा तो नहीं लगेगा?’’ ‘‘नहीं, मुझे जरा भी बुरा नहीं लगेगा, बल्कि खुशी ही होगी.’’ ‘‘क्या तुम सही में उन पंक्तियों का अर्थ नहीं जानते हो?’’  ‘‘मैडम, सर ने बताया था पर यह भी कहा था कि वर्तमान में इस का  और अर्थ भी हो सकता है.’’

‘‘तो तुम यह और अर्थ मेरे मुंह से सुनना चाहते हो?’’ ‘‘मैडम, आप बुरा मान गईं तो रहने दीजिए.’’ ‘‘नहीं, मैं बताने जा रही हूं, आजकल तो स्त्री के विभिन्न अंग पुरुष कवियों के प्रिय विषय हैं. नारी की सुंदरता का वर्णन करने के लिए उस के अंगों के और अन्य उतारचढ़ाव की उपमाएं दी जाती हैं. आजकल तो फिल्मों में, फिल्मी गीतों और विज्ञापनों में स्त्री सुलभ अंगों को दिखाया जाता है. तुम कदाचित इसी संदर्भ में मेरे मुख से सुनना चाहते थे.’’

नवीन चुपचाप उठ कर कनक के रूम से निकल गया. अगले सप्ताह फिर कनक को उस की क्लास में पढ़ाना था. कनक ने कहा, ‘‘आज हम लोग अलंकार के विषय में चर्चा करेंगे. अलंकार एक प्रकार है संदेह अलंकार जैसे-  सारी बीच नारी है कि नारी बीच सारी है. सारी ही की नारी है की नारी ही की सारी है. यहां सारी और नारी के बीच में संशय दिखाया गया है. आप में से कोई दूसरे प्रकार के अलंकार का उदाहरण दे सकता है? नवीन बोला- ‘‘एक कबूतर देख हाथ में पूछा कहां अपर है, उस ने कहा अपर कैसा वह तो उड़ गया सपर है.’’ कनक उत्साहित हो कर बोली, ‘‘बहुत अच्छा उदाहरण दिया नवीन ने. धन्यवाद नवीन. ‘‘यह वक्रोक्ति अलंकार का उदाहरण है. कहा जाता है कि जब जहांगीर ने नूरजहां से पूछा कि तुम्हारे पास एक ही कबूतर है दूसरा (अपर) कहां है तो उस ने दूसरे कबूतर को भी उड़ा कर कहा कि अपर (बे पर) कैसा वह तो इसी की तरह सपर (पर वाला) था.’’

उस दिन फिर दोपहर बाद बारिश होने लगी. कनक रिकशे का इंतजार कर रही थी.  नवीन ने सामने आ कर स्कूटर रोक कर कहा, ‘‘चलिए, मैं भी घर ही जा रहा हूं.’’ कनक आज तुरंत बैठने को तैयार हो गई. नवीन उसे घर ड्रौप कर मुड़ने वाला था तो कनक बोली, ‘‘अंदर आओ, चाय पी कर जाना.’’ नवीन कुछ पल कनक को देखता रहा. इसी बीच कनक ने दोबारा कहा, ‘‘स्कूटर बंद करो और अंदर चलो. उस दिन मां घर में नहीं थीं, इसलिए तुम्हें बिना चाय को पूछे जाने दिया था. अंदर आ जाओ.’’ थोड़ी देर में कनक खुद चाय बना लाई और फिर दोनों चाय पीने लगे. कनक की मां बगल के कमरे में सिलाई कर रही थीं. जब तक वे बाहर आईं नवीन जाने के लिए तैयार था. वह मां को प्रणाम और कनक को बाय कर चला गया. उस के जाने पर मां ने पूछा, ‘‘अच्छा लड़का है, तुझे पसंद है?’’ ‘‘मां, तुम भी न… वह मेरा स्टूडैंट नवीन था.’’ ‘‘आजकल तो तुम लोग जिंदगी भर पढ़ते रहते हो.

आखिर शादी कब करोगी?’’  कुछ दिनों बाद कनक अपनी मां के साथ एक रैस्टोरैंट में बैठी थी. संयोगवश  नवीन भी अपनी मां के साथ वहां पहुंचा. कनक ने उन्हें देखा तो अपनी टेबल पर ही बुला लिया. एकदूसरे का परिचय हुआ. कनक ने बताया कि अगले सप्ताह उस की नियुक्ति का कार्यकाल समाप्त हो रहा है और साथ में उस का शोधकार्य भी. नवीन की मां ने कनक से कहा कि नवीन उस की बढ़ाई करते नहीं थकता. कनक की मां ने भी नवीन की तारीफ की और कहा कि बीचबीच में आते रहा करो, अब तो कनक भी घर पर ही मिलेगी. नवीन और कनक कुछ देर तक एकदूसरे को देखते रहे. कनक ने अपना शोध सौंप दिया था. एक दिन नवीन सब्जी मंडी गया तो वहां से कनक के घर जा पहुंचा. उस समय कनक अकेली थी. बोली, ‘‘आओ, आज इधर की याद कैसे आई?’’ सच कहूं या झूठ? ‘‘मुझे सच बोलने वाले अच्छे लगते हैं.’’ ‘‘तो सुनिए, आप की याद तो हर पल मेरे दिल में रहती है. आप की पर्सनैलिटी ही कुछ ऐसी है.’’ ‘‘बातें भी अच्छी बना लेते हो.’’

‘‘नहीं मैडम, मैं आप को अच्छी तरह परख कर आप का मूल्यांकन कर सकता हूं.’’ ‘‘तो क्या देखा मुझ में?’’ ‘‘आप श्वेत वस्त्रों में बहुत निर्मल, अभिजात और सुसंस्कृत लगती हैं.’’ अब तक मां आई गई थीं. तीनों ने चाय पी. फिर नवीन चला गया. कुछ महीने बाद नवीन सैकंड क्लास से एमए कर गया तो कनक डा. कनक बन चुकी थी. कनक नवीन के घर बधाई देने गई, तो नवीन बोला, ‘‘मैं ने लास्ट ईयर ड्रौप किया था यह सोच कर कि इस साल फर्स्ट क्लास लाऊंगा.’’ कनक बोली, ‘‘भाषा में फर्स्ट क्लास लाना कठिन है. वैसे भी इस साल कोई फर्स्ट नहीं आया है और तुम सैकंड क्लास में टौप पर हो, तो मुंह मीठा करो.’’ नवीन को उस ने अपने हाथों से मिठाई खिलाई. नवीन ने भी मिठाई का एक पीस कनक के मुंह में डाला. फिर कहा, ‘‘उस दिन आप ने पूछा था कि आप में क्या देखा है मैं ने? तो मैं यही कहूंगा कि कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय… वा पाय बौराय…’’ ‘‘बसबस, क्या मतलब?’’ ‘‘नहीं मैडम, बोलने दें. मैं इस कनक को पा कर बौरा गया हूं. आप के खयालों में मदहोश रहता हूं.’’ ‘‘पागल मत बनो. जो जी में आए बक देते हो. मत भूलो तुम मेरे स्टूडैंट रहे हो.’’

घर लौटने पर कनक भी कुछ देर तक नवीन के बारे में सोचती रही. थोड़ी देर तक वह भी दुविधा में थी. कनक और नवीन दोनों नौकरी के लिए कोशिश कर रहे थे. कनक ने अपने ही शहर में सरकारी संस्था में राजभाषा विभाग में प्रबंधक के पद पर जौइन किया. नवीन ने दूसरे शहर में नौकरी जौइन की. जाने के पहले नवीन कनक से एक पार्क में मिला.  कनक बोली, ‘‘अब तो तुम दूर जा रहे हो, पर संपर्क में रहना.’’ ‘‘दूर भले रहूं पर आप की याद दिल में लिए जा रहा हूं. पता नहीं आप को मेरी याद आएगी या नहीं?’’ कह उस ने कनक का हाथ पकड़ चूमते हुए आगे कहा, ‘‘मैं नहीं जानता सही है या गलत पर मेरा आप से दूर जाने का मन नहीं कर रहा है.’’ ‘‘तुम क्या पागलों जैसी हरकतें कर रहे हो… यहां पब्लिक प्लेस में अपनी और मेरी इज्जत का कुछ खयाल करो. तुम तो चले जाओगे, पर मैं यहीं रहूंगी. जानबूझ कर क्यों एकतरफा प्यार में पागल हो रहे हो? हम दोनों के बीच फासले हैं, समझो?’’ ‘‘क्या फासले हैं? बस उम्र का फासला है और वह भी 1-2 साल का होगा.’’

‘‘कभीकभी छोटे फासले तय करने में ही उम्र गुजर जाती है…चलो घर चलते हैं.’’ नवीन दूर शहर में नौकरी करने लगा. कनक से उस का संपर्क बना हुआ था. कनक भी उस के बारे में अकसर सोचती थी. उस की शादी भी हो गई. नवीन शादी में आया था. कनक को गिफ्ट देते समय उस की आंखों से आंसुओं की कुछ बूंदें कनक के मेहंदी लगे हाथों पर जा गिरी थीं. उस ने किसी की गजल भीगी आंखें बंद कर सुनाई- ‘‘होंठों को सी के उन को न जीना पड़े कभी, मेहंदी रचे ये हाथ न फीके पड़ें कभी.’’ वह चला गया पर इस बार कनक की आंखें भी नम हो गई थीं. कनक की शादी अपनी ही कंपनी के एक इंजीनियर से हुई थी. 1 साल के अंदर ही वह एक सुंदर कन्या की मां बन गईं. शुरू में सब ठीक चल रहा था, पर 2 सालों के बाद उस का पति अमेरिका चला गया. उस ने जाते समय कनक से कहा था कि वहां ठीक से सैटल होने पर उन्हें भी ले जाऊंगा.   शुरू में तो कनक का पति अकसर उस से बातें करता था, पर फिर धीरेधीरे यह  सिलसिला कम होने लगा और बाद में बिलकुल बंद हो गया.

एक दिन कनक ने पति के नंबर पर फोन किया तो पता चला कि यह नंबर मौजूद नहीं है. कनक ने पति के करीबी दोस्त से बात की तो उस ने कहा, ‘‘भाभीजी, मैं नहीं बताना चाहता था, पर उस का तो अमेरिका में भारतीय मूल की एक अमेरिकी लड़की से चक्कर चल रहा है. काफी दिनों से उसी के साथ रह रहा है. उसे तो ग्रीन कार्ड भी मिल गया है, अब तो उस के लौटने की उम्मीद न के बराबर है.’’ नवीन और कनक संपर्क में तो थे पर कनक ने अपने पति के बारे में उसे या उस की मां को कुछ नहीं बताया था. एक दिन कनक अपनी बेटी को ले कर नवीन की मां से मिलने गई थी. मां ने जब उस के पति के बारे में पूछा तो उस ने अपनी कहानी सुना दी. मां को सुन कर बहुत दुख हुआ.

उसी दिन अचानक नवीन बिना पूर्व सूचना के आ पहुंचा. कनक और उस की बेटी  को देख कर बहुत खुश हुआ. कनक पहले की अपेक्षा दुबली हो गई थी और पुराने स्टाइल में सफेद साड़ी में थी. नवीन श्वेता को गोद में ले कर उस के साथ खेलते हुए बोला, ‘‘यह तो आप से भी सुंदर है.’’ कनक के चहेरे पर एक बनावटी हंसी थी. मां ने जब कनक की कहानी सुनाई तो उसे बहुत दुख हुआ. कुछ इधरउधर की बातों के बाद कनक ने कहा, ‘‘नवीन की शादी जल्दी कर दो मांजी.’’ मां बोलीं, ‘‘अब तुम्हीं समझाओ बेटी.’’ ‘‘मैं तो बस किसी के इंतजार में ही रह गया.’’ ‘‘किस का इंतजार नवीन?’’ ‘‘कनक का.’’ ‘‘यह नामुमकिन है. तुम समझते क्यों नहीं?’’ कह कनक रोने लगी. ‘‘अरे, मैं ने कुछ बुरा कहा क्या?’’ कनक ने नवीन का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘नहीं तुम्हारी सोच में कोई बुराई नहीं है, बल्कि तुम मेरा भला ही सोच रहे हो, पर हम जैसा सोचते हैं, वैसा हमेशा तो हो नहीं पाता.

मैं ने कहा था न कि हमारे बीच जो फासले हैं उन्हें मैं पाट सकती हूं.’’ ‘‘मुझे तो कोई फासला नहीं दिखता है. किस फासले की बात कर रही हैं आप?’’ ‘‘एक हो तो बताऊं?’’ ‘‘मैं नहीं मानता.’’ ‘‘तो सुनो, एक तो उम्र का फासला तुम खुद मानते हो, दूसरा मैं परित्यक्ता हूं, तीसरा मैं एक बच्ची की मां हूं, चौथा अपने बेटी का सौतेला पिता मुझे मंजूर नहीं है और अंत में तुम्हारेमेरे बीच गुरुशिष्य का भी रिश्ता रहा है और शायद इसीलिए तुम मुझे अभी तक आप ही कहते आए हो, मैं अपने जीवन में इस की गरिमा बनाए रखना चाहती हूं.’’ ‘‘इस का मतलब मैं क्या समझूं? आप क्या दोबारा विवाह नहीं करेंगी?’’ ‘‘नहीं.’’ ‘‘आप में अदम्य साहस देख रहा हूं. कुदरत आप की सहायता करेगी,’’ कह कुछ देर तक नवीन खामोश रहा. उस के चेहरे पर निराशा झलक रही थी. वह चुपचाप सिर झुकाए बैठा था. तभी कनक ने पूछा ‘‘क्या तुम मुझे मन से चाहते हो?’’ ‘‘आप को इस में कोई संदेह है क्या?’’

.‘‘नहीं, संदेह नहीं, इसीलिए कह रही हूं कि मां और मेरी बात मान कर शादी कर लो. रिश्ते वही सच्चे होते हैं जो मन से बंधे हों. मन का रिश्ता दिलोंको मन की गहराइयों तक बांधे रहता है. दुखी नहीं होना. तन का बंधन इस जन्म में नहीं संभव है, पर विश्वास करो मन से मैं तुम से जुड़ी रहूंगी.’’  नवीन ने भी अपने दोनों हाथों से उस के हाथों को पकड़ लिया. दोनों की  आंखों से आंसू की बूंदें एकदूसरे के हाथों पर टपक रही थीं. दोनों के मन की पीड़ा आंखों में उतर आई थी. नवीन बोला, ‘‘आप भी एक वादा करें कि जीवन के किसी भी मोड़ पर मेरी जरूरत पड़े तो मुझे अवश्य याद करेंगी, तभी मैं समझूंगा कि मन की डोरी से बंधे हैं हम दोनों.’’ मां काफी देर से चुप खड़ी उन दोनों की बातें सुन रही थीं. वे कनक को संबोधित करते हुए बोलीं, ‘‘कनक, तुम मुझे अपनी मां जैसी ही समझना.’’ ‘‘निस्संदेह,’’ कह कनक बेटी को गोद में ले घर से निकल गई.

Story in Hindi : मेरा पिया घर आया

Story in Hindi : रवि अपनी भाभी कविता और उन की सहेली निशा की सारी दलीलों को नजरअंदाज करते हुए शादी न करने की जिद पर कायम रहा, ‘‘मानवी से जुड़ी यादों के कारण अब किसी लड़की की तरफ देखने का मेरा मन नहीं करता,’’ शादी न करने का मुख्य कारण दोहराते हुए रवि का गला भर आया था.

‘‘पर मानवी अब जिंदा नहीं है,’’ निशा ने उत्तेजित लहजे में उसे याद दिलाया, ‘‘जिंदगी में हुए किसी एक हादसे के कारण इंसान को अपनी जीवनधारा को रोक नहीं देना चाहिए.’’

‘‘मैं मानवी की यादों के सहारे सारा जीवन गुजारने का फैसला कर चुका हूं, निशा भाभी.’’

कविता ने एकाएक नियंत्रण खो दिया और गुस्से से भरी आवाज में अपनी सहेली से कहा, ‘‘निशा, इन जनाब के साथ मगज मारने से कोई फायदा नहीं. अच्छा ही है कि ये शादी करने से इनकार कर रहे हैं. इन जैसे जिद्दी और नासमझ इंसान के साथ शादी कर के कोई लड़की खुश रह भी नहीं सकती.’’

अब तक खामोश बैठी निशा की छोटी बहन नीरजा एकाएक भावुक लहजे में बोल पड़ी, ‘‘ऐसा मत कहो कविता दीदी. इन जैसे संवेदनशील इंसान की जीवनसंगिनी बन कर कोई भी लड़की खुद पर गर्व करेगी.’’

निशा और कविता को उस का शरमातेलजाते अंदाज में अपनी बात कहने का यह ढंग हैरान कर गया. रवि भी उस के चेहरे को उलझन भरे अंदाज में पढ़ने की कोशिश कर रहा था.

‘‘नीरजा, तुम तो मानवी से जुड़ी सारी कहानी अच्छी तरह जानती हो. अगर तुम्हारे लिए इस का रिश्ता आए, तो क्या तुम हां कह दोगी?’’ कुछ देर की खामोशी के बाद कविता ने मजाकिया लहजे में नीरजा से यह सवाल पूछ ही लिया.

‘‘मैं तो फौरन हां कह दूंगी,’’ नीरजा ने भावुक लहजे में ऐसा जवाब दिया तो तीनों को यह बात एकदम समझ आ गई कि वह रवि को मन ही मन प्यार करने लगी है.

कविता ने इस बार संजीदा हो कर अगला सवाल पूछा, ‘‘यह तो बता कि तू ने ऐसा क्या खास गुण देख लिया रवि में जो इसे अपना दिल दे बैठी?’’

नीरजा भावुक लहजे में बोली, ‘‘कुछ दिन पहले जब दीदी के बेटे मोहित की तबीयत खराब हुई, तो इन से उस की पीड़ा नहीं देखी गई थी. सब के रोकने के बावजूद ये ही उसे फौरन अस्पताल ले गए थे.’’

‘‘भाभी, आप या दीदी वक्तबेवक्त इन्हें कुछ भी काम बताओ, ये उसे करने में बिलकुल नानुकर नहीं करते. गुस्सा तो जैसे इन के स्वभाव में है ही नहीं. सब से हंस कर मिलते हैं. मैं ने इन्हें गरीब लोगों से भी हमेशा प्यार और इज्जत के साथ पेश आते देखा है. इन की तो जितनी तारीफ की जाए कम है.’’

रवि ने माथे पर बल डाल कर कहा, ‘‘ऐसी बातें सोचने का कोई फायदा नहीं, क्योंकि मुझे तो कभी शादी ही नहीं करनी है.’’

‘‘इस मामले में मेरा अपने दिल पर कोई नियंत्रण नहीं रहा है,’’ नीरजा ने शरमाते हुए जवाब दिया.

‘‘तुम पागल हो क्या? क्यों इन सब की हंसी का पात्र न रही हो?’’

‘‘आप जैसा संवेदनशील और नेकदिल जीवनसाथी मुझे ढूंढ़ने पर नहीं मिलेगा,’’ वह अपनी धुन में बोली, मानो उस ने रवि की बात सुनी ही न हो.

रवि को बिलकुल नहीं सूझा कि वह नीरजा से आगे क्या कहे. उसे यों बेबस देख निशा और कविता खुल कर मुसकराए जा रही थीं.

‘‘निशा, मुझे तो तेरी छोटी बहन को अपनी देवरानी बनाने में कोई एतराज नहीं…’’

‘‘भाभी, प्लीज. हम अभी आए,’’ ऐसा कह कर रवि ने नीरजा का हाथ पकड़ा और उसे उन के बीच से उठा कर बाहर लौन में ले आया.

‘‘तुम सब के सामने ऐसी पागलपन वाली बातें कर के अपना और मेरा मजाक मत उड़वाओ,’’ रवि नाराज नजर आ रहा था.

‘‘आप इस दुनिया को छोड़ कर जा चुकी मानवी के अलावा किसी और लड़की से प्रेम नहीं करते हो न?’’ नीरजा एकदम संजीदा हो गई.

‘नहीं.’’

‘‘तो मुझ से शादी कर लो.’’

‘‘तुम मेरी मजबूरी समझो, प्लीज. मैं मानवी को प्यार करता था, करता हूं और करता रहूंगा.’’

‘‘मुझे बिलकुल आप के जैसा ही जीवनसाथी चाहिए. अपनी मृत प्रेमिका के प्रति आप अगर इतने वफादार हो तो यकीनन मेरे प्यार के प्रति भी पूरी तरह से ईमानदार और वफादार रहोगे.’’

‘‘मैं मानवी से कभी बेवफाई नहीं करूंगा,’’ नाराजगी भरे अंदाज में उठ कर रवि अपने घर की तरफ चल पड़ा.

‘‘और मेरा दिल कह रहा है कि हमारी शादी जरूर हो कर रहेगी,’’ नीरजा की इस घोषणा का कोई जवाब देने के लिए रवि रुका नहीं था.

रवि का दिल जीतने की कोशिशें नीरजा ने उसी दिन से बड़े उत्साह के साथ शुरू कर दीं. पड़ोस में घर होने के कारण वह सुबहशाम खूब सजधज कर रवि से मिलने पहुंच जाती.

‘‘मैं कैसी लग रही हूं?’’ रवि के सामने आते ही वह उस से यह सवाल तब तक पूछती रहती जब तक वह उस की तारीफ नहीं कर देता.

अपने फोन के कैमरे से वह रवि के हर किसी के साथ खूब फोटो खींचती. उस का हर काम भागभाग कर खुद करती. उस के साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताने के लिए वह अकसर रात का खाना उसी के घर खाने लगी थी.

वह अकसर, ‘अपने पिया की मैं तो बनी रे दुलहनिया…’ और ‘मेरा पिया घर आया…’ जैसे गाने मस्त अंदाज में गाती हुई दोनों घरों में घूमती नजर आती, तो रवि के अलावा सब खूब दिल खोल कर हंसते.

परेशान रवि हर किसी से फरियाद करता, ‘‘कोई इस पगली को समझाओ, प्लीज. यह अपनी भावनाओं पर काबू रखे, नहीं तो बाद में इसे दुख होगा.’’

‘‘उसे समझाना हमारे बस की बात नहीं. वह तो तुम्हारे प्यार में पागल हो चुकी है, रवि,’’ हर किसी से कुछ ऐसा ही जवाब पा कर रवि की खीज निरंतर बढ़ती जाती थी.

आने वाले कुछ दिनों में नीरजा ने अपने उत्साहपूर्ण व्यवहार से रवि के पिता कैलाश, मां सावित्री और बड़े भाई राजीव के दिलों को भी जीत लिया. उन सब के मन में यह उम्मीद बंध  गई कि कभी शादी न करने के रवि के फैसले को शायद नीरजा बदलने में कामयाब हो जाएगी.

नीरजा की मां कांता ने विकास नाम के एक बिजनैसमैन के साथ नीरजा का रिश्ता पक्का करने का मन बना रखा था. जब नीरजा के रवि को दिल देने की खबर उन के कानों तक पहुंची, तो वे अपने पति रमेश के साथ अगले ही दिन मेरठ से दिल्ली आ गईं.

नीरजा को सामने बैठा कर उन्होंने सख्त लहजे में उसे समझाना शुरू किया, ‘‘शादी के बाद किसी भी लड़की की खुशियां सुनिश्चित करने में पैसा बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. तुझे तो इस बात से खुश होना चाहिए कि इतने अमीर घर की बहू बनने का मौका मिल रहा है.’’

‘‘पर मैं रवि को पसंद करती हूं… उसे दिल की गहराइयों से प्यार करती हूं,’’ नीरजा ने रोंआसे स्वर में उन्हें अपने दिल की बात बता दी.

‘‘पैसा सबकुछ नहीं होता, कांता. हमें इस की पसंद नापसंद का भी खयाल रखना चाहिए,’’ रमेश ने अपनी बेटी का पक्ष लिया.

‘‘तुम तो अपना मुंह बंद ही रखो जी,’’ कांता एकदम गुस्से से फट पड़ीं, ‘‘तुम्हारे साथ पिछले 30 साल से मैं अपने मन को मार कर कैसे जी रही हूं, यह मैं ही जानती हूं. कभी न मनचाहा पहना, न कहीं घूमीफिरी. बजट बना कर जीते हुए मेरी सारी जिंदगी बेकार हो गई.’’

रमेशजी ने आगे कुछ न बोलने में ही अपनी भलाई समझी. कांता ने उन से ध्यान हटाया और अपनी बेटी को गुस्से से घूरते हुए कहने लगीं, ‘‘अपने इस प्यार और पसंद के पागलपन को गोली मार और मुझे बता कि विकास के मुकाबले क्या है इस रवि के पास? 3 कमरों का फ्लैट, जिस में वह भैयाभाभी के साथ रहता है और खटारा सी पुरानी कार. अरे, रवि जितना सालभर में कमाता है, उतनी तो विकास की फैक्टरी एक महीने में उसे कमा कर देती है. तू जिंदगीभर ऐश करेगी उस के साथ.’’

नीरजा चिढ़ कर बोली, ‘‘मां, मेरी नजरों में विकास एक अहंकारी और रूखा इंसान है, जो अपनी तारीफ खुद कर के सब को बहुत बोर करता है.’’

‘‘उस काबिल लड़के में जबरदस्ती बेकार के नुक्स मत निकाल. देख, उन्हें सुंदर लड़की चाहिए और ऊपर से तेरी मौसी यह रिश्ता कराने के लिए खूब भागदौड़ कर रही है. तुझ में थोड़ी सी भी अक्ल है, तो फौरन विकास से शादी करने को हां कह दे.’’

‘‘शादी के मामले में किसी ने मेरे साथ जबरदस्ती की तो मैं आत्महत्या कर लूंगी,’’ ऐसी चेतावनी दे कर नीरजा उन के सामने से हट गई.

कुछ देर तक अपनी बेटी को कोसने के बाद कांता ने नीरजा पर दबाव बढ़ाने के लिए विकास को फौरन अगले दिन सुबह मेरठ से दिल्ली आने का हुक्म फोन कर के सुना दिया.

सफल बिजनैसमैन विकास बड़बोला इंसान था, जिसे अपनी अमीरी पर बहुत घमंड था. उसे पूरा विश्वास था कि नीरजा उस के साथ शादी करने से कभी इनकार नहीं करेगी.

‘‘नीरजा को मैं सारी दुनिया घुमाऊंगा… मेरी मां शादी में इतने जेवर चढ़ाएंगी कि देखने वालों की आंखें फटी की फटी रह जाएंगी… हनीमून मनाने के लिए मैं ने स्विट्जरलैंड जाने का मन बना रखा है…’’ हर वक्त ऐसी डींगें मार कर उस ने कांता के अलावा सब को परेशान कर रखा था.

रवि ने अगले ही दिन नीरजा से अकेले में कहा, ‘‘इस विकास के साथ शादी करने को तुम हां मत करना. वह बोर इंसान तुम्हें अपने ढंग से कभी जीने नहीं देगा.’’

‘‘मैं तो आप की हमसफर बनना चाहती हूं, पर आप हो कि हां…’’

‘‘वह बात मत शुरू करो, प्लीज. मैं तुम से शादी नहीं कर सकता,’’ रवि ने उसे फौरन टोक दिया.

‘‘आप मेरी आंखों में देखो और बताओ कि वहां आप को अपने लिए गहरा प्यार दिखाई दे रहा है या नहीं,’’ नीरजा एकदम से रवि के बहुत करीब आ गई थी.

‘‘वह सब तो ठीक है, पर…’’

‘‘मानवी के साथ आप ने सच्चा प्यार किया, पर अब वह इस दुनिया में नहीं है. उस की यादों से जुड़े रह कर मेरे सच्चे प्रेम को अपने दिल में जगह न देने का फैसला करना कहां की समझदारी है,’’ नीरजा का गला एकदम से भर आया.

‘‘मैं मजबूर हूं.’’

‘‘तो मैं भी मजबूर हूं. अगर आप ने हां नहीं की, तो मैं परसों शाम को होने वाली अपनी जन्मदिन पार्टी में विकास के साथ शादी करने को हां जरूर कह दूंगी,’’ नीरजा ने अपना फैसला सुनाने के बाद भावुक अंदाज में उस का हाथ चूमा और अपने कमरे की तरफ चली गई.

उस शाम को विकास के वापस मेरठ लौटने से पहले नीरजा ने सब के सामने उस से कहा, ‘‘मैं शादी को ले कर अपनी पक्की हां या ना आप को 2 दिन के अंदर जरूर बता दूंगी.’’

नीरजा की इस घोषणा के बाद सभी रवि की तरफ आशा भरी नजरों से देखने लगे. उस के गुस्से से डर कर कोई कुछ कह तो नहीं रहा था, पर उन सब की खामोशी भी रवि के ऊपर नीरजा से शादी के लिए हां कहने को जबरदस्त दबाव बना रही थी.

नीरजा की आशा के विपरीत रवि ने शादी को ले कर कोई बात नहीं की. वह तो अपने घर से सुबह से देर रात तक के लिए 2 दिन ऐसा गायब रहा कि उन दोनों की अगली मुलाकात उस की जन्मदिन पार्टी में ही हुई.

पार्टी में शामिल होने के लिए जैसे ही रवि ने ड्राइंगरूम में कदम रखा, तो उस से बेहद खफा नजर आ रही नीरजा ने ऊंची आवाज में सब को संबोधित किया, ‘‘अपने मातापिता की खुशी की खातिर मैं ने विकास से शादी करने का फैसला…’’

रवि ने ऊंची आवाज में टोक कर उसे अपना वाक्य पूरा नहीं करने दिया, ‘‘नीरजा, तुम उस घमंडी इंसान के साथ कभी खुश नहीं रह सकोगी.’’

‘‘तो आप क्यों परेशान हो रहे हैं,’’ गुस्सा करना भूल कर नीरजा एकदम से रोंआसी हो उठी.

कविता ने भी चुभते लहजे में अपने देवर को डांटा, ‘‘यह बिलकुल ठीक कह रही है. तुम्हारे प्रेम में पागल इस प्यारी सी… इस भोली सी…इस सुंदर सी लड़की के सुखदुख की तुम्हें कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है. तुम तो जिंदगीभर अपनी मृत महबूबा को नाराज न करने की फिक्र ही करते रहना.’’

‘‘अब बस भी करो, भाभी. आप सब लोगों के ताने सुनसुन कर मैं इतना तंग आ गया हूं कि मैं ने…मुझे नीरजा से शादी करना मंजूर है,’’ रवि की इस घोषणा को सुन नीरजा के अलावा वहां उपस्थित हर इंसान तालियां बजा उठा.

सब की नजरों का केंद्र बन गई नीरजा ने उदास लहजे में अपने मन की बात कही, ‘‘शादी के मामले में मुझे इन की दया या एहसान नहीं चाहिए. ऐसी शादी करने का क्या फायदा कि इन के सामने मैं रहूं, पर ये मानवी के विचारों में खोए रहें?’’

‘‘पहले तुम ही शादी करने को मेरे पीछे हाथ धो कर पड़ी हुई थी, तो अब क्यों इनकार कर रही हो?’’ रवि ने उस के पास आ कर मुसकराते हुए पूछा.

‘‘मुझे लगता है कि मेरे साथ शादी करने का फैसला आप ने खुश हो कर नहीं किया है.’’

‘‘मेरे मन में क्या है, अब यह भी तुम बताओगी?’’

‘‘मुझे ही क्या, यह तो सब को पता है कि आप के दिलोदिमाग पर मानवी का कब्जा है.’’

‘‘तो तुम्हारे साथसाथ और सब भी कान खोल कर सुन लो कि मानवी ने ही मुझे तुम से शादी करने की इजाजत दी है,’’ रवि ने अपना पर्स खोल कर सब को दिखाया.

पर्स में अब तक मानवी का फोटो सभी ने लगा देखा था, पर इस वक्त वहां नीरजा की तसवीर लगी नजर आई.

एकाएक बेहद भावुक हो कर रवि नीरजा से बोला, ‘‘मानवी ने ही कल रात मुझे देर तक समझाया कि अब से तुम मेरे सुखदुख का खयाल रखोगी. कल रात के बाद से मैं आंखें बंद करता हूं, तो उस की जगह अब मुझे तुम नजर आती हो. मुझ से शादी न कर के क्या तुम मानवी को कष्ट पहुंचाना चाहोगी?’’

‘‘मैं भला ऐसा गलत काम क्यों करूंगी? हमारी शादी जरूर होगी,’’ नीरजा किसी छोटी बच्ची की तरह खुशी से तालियां बजाती उछली और फिर शरमाते हुए रवि की छाती से जा लगी.

Rukmini Vasanth: ‘आज जो भी हूं अपने दम पर हूं’

Rukmini Vasanth: हाल ही में रिलीज फिल्म ‘कांतारा चैप्टर 1’ में राजकुमारी कनकवती की भूमिका में नजर आईं खूबसूरत अभिनेत्री रुक्मिणी वसंत ने दर्शकों का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया है. रुक्मिणी वसंत भारतीय सिनेमा की सब से होनहार प्रतिभाओं में से एक है, जिन्होंने अब तक कन्नड़, तेलुगु, तमिल भाषा की फिल्मों में काम कर के अपनी अलग पहचान बनाई है.

लंदन स्थित ‘रौयल ऐकैडमी औफ ड्रामैटिक आर्ट’ यानी आरएडीए से अभिनय का प्रशिक्षण ले कर 2019 में कन्नड़ फिल्म ‘बीरबल ट्रिलौजी केस 1 फाइंडिंग ब्रजमूनि’ से विनय कैरियर की शुरुआत करने वाली रुक्मिणी को असली पहचान 2023 में उन की अगली रिलीज कन्नड़ फिल्म ‘सप्त सागरदाचे एलो साइड ए और बी’ से मिली, जिस में रुक्मिणी ने प्रिया की भूमिका निभा कर दर्शकों का दिल जीत लिया.

इस फिल्म में सशक्त अभिनय से न सिर्फ रुक्मिणी को आलोचकों से प्रशंसा मिली बल्कि इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ कन्नड़ फिल्म फेयर क्रिटिक अवार्ड भी मिला. रुक्मिणी साउथ फिल्म में अभिनय करने और अवार्ड पाने के अलावा बहुभाषी परियोजनाओं जैसे ‘बना दारियाल्ली,’ ‘बघीरा,’ ‘भैरपी रानागल’ में भी दिखाई दी हैं. खूबसूरत रुक्मिणी सिर्फ अपनी फिल्मों को ले कर ही चर्चा में नहीं हैं बल्कि अपनी बेपनाह खूबसूरती के चलते सोशल मीडिया पर नैशनल क्रश भी बन गई हैं.

हाल ही में गृहशोभा को दिए इंटरव्यू में ‘कांतारा चैप्टर 1’ की हीरोइन रुक्मिणी वसंत ने अपने अब तक के अभिनय कैरियर, ‘कांतारा चैप्टर 1’ को ले कर कई दिलचस्प बातें, 15 साल की उम्र से ही अभिनय में रुचि के चलते उन्होंने अपनी अभिनय यात्रा कैसे शुरू की, उन के परिवार वालों ने उन का कितना साथ दिया, रुक्मिणी कौन से परिवार से तअल्लुक रखती हैं और बालीवुड फिल्मों में काम करने की इच्छा को ले कर उन का क्या कहना है, ऐसी ही कई दिलचस्प बातें शेयर कीं ‘कांतारा चैप्टर 1’ की हीरोइन रुक्मिणी वसंत ने.

पेश है, रुक्मिणी वसंत की अब तक की अभिनय यात्रा की कहानी उन्हीं ही जबानी…

मेरे लिए प्रशिक्षण यात्रा से कम नहीं

‘कांतारा चैप्टर 1’ मेरे लिए बहुत खास है क्योंकि यह फिल्म मेरे लिए आध्यात्मिक प्रशिक्षण से कम नहीं है. यह फिल्म मेरे लिए प्रशिक्षण यात्रा ही है क्योंकि इस फिल्म की शूटिंग के दौरान मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला है जैसे तलवार चलाना, घुड़सवारी और नृत्य में विभिन्नता आदि. इस फिल्म की शूटिंग के दौरान कई दृश्य काफी मुश्किल थे तो कई दृश्य यादगार थे.

इस फिल्म में काम करते वक्त मैं हर दिन कुछ न कुछ नया सीखती थी. इस फिल्म के ऐक्टर, डाइरैक्टर और लेखक ऋषभ शेट्टी मल्टी टेलैंटेड हैं. मैं उन्हें अद्भुत मानती हूं क्योंकि शूटिंग के दौरान बतौर डाइरैक्टर, लेखक और ऐक्टर अलगअलग जगह पर ध्यान केंद्रित करना अपनेआप में खास है. इस के साथ ही ऋषभ अच्छे इंसान भी हैं. बहुत ज्यादा डाउन टू अर्थ हैं इसलिए मुझे उन के साथ काम के दौरान काफी कुछ सीखने को मिला. मैं इस फिल्म में राजकुमारी कनकवती का किरदार निभा रही हूं जो बहुत बहादुर और कलाप्रेमी है. यह किरदार निभाना मेरे लिए चैलेंज था और मजेदार भी.

यही वजह है कि ‘कांतारा चैप्टर 1’ मेरे लिए हमेशा खास फिल्म रहेगी. मेरा परिवार मेरी ताकत है. अभिनय के साथसाथ कला और सेवा की भावना मुझे विरासत में मिली है. मेरे पिता कर्नल वसंत वेणुगोपाल सेवा वीरता और बलिदान के लिए अशोक चक्र से सम्मानित हुए हैं. मेरी मां सुभाषिनी वसंत एक भरतनाट्यम नृत्यांगना हैं. मां की कला के प्रति अटूट भावना और प्रेम ने मुझे अभिनय के लिए प्रेरित किया. मेरी मां जो अनुशासनप्रिय हैं और कला के प्रति गहरा जनून रखती हैं. उन की इसी अटूट श्रद्धा ने मुझे कला की तरफ आकर्षित किया, जिस के चलते 15 साल की उम्र से ही मैं दिली तौर पर अभिनय और कला से जुड़ने लगी.

अभिनय यात्रा की शुरुआत मजेदार रही

मैं ने अभिनय का कोई प्रशिक्षण तो नहीं लिया लेकिन 15 साल की उम्र से ही मेरी अभिनय में रुचि होने लगी थी. अपनी मां की वजह से मेरे मन में भी कहीं न कहीं यह इच्छा जाग रही थी कि मैं अभिनय क्षेत्र में कुछ नया सीखू. लेकिन क्योंकि मैं ने अभिनय के लिए कोई शिक्षा नहीं ली थी इसलिए इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के बारे में मैं कुछ तय नहीं कर पा रही थी. तभी एक बार मैं ने अपनी मां से कहा कि मैं घर में पड़ेपड़े तंग होती हूं कुछ नया करने की इच्छा है, अभिनय में मेरी रुचि है तो कम से कम मुझे थिएटर क्लास में ही दाखिला दिलवा दो.

मेरी मां को मेरी यह बात अच्छी लगी, सो उन्होंने थिएटर क्लास में मेरा एडमिशन करवा दिया. मैं क्योंकि पहले से ही शास्त्रीय बैले डांस और भरतनाट्यम से प्रशिक्षित थी, इसलिए अभिनय से जुड़ना मेरे लिए और भी दिलचस्प रहा. नृत्य करने वाली मुद्राएं और हावभाव से हम भावनाओं को व्यक्त करने की कला जानते हैं, लेकिन रंगमंच के जरीए अभिनय को शब्द मिल जाते हैं.

थिएटर में अभिनय सीखने के बाद भावनाओं को शब्दों के जरीए चेहरे से व्यक्त करने की कला मुझे अभिनय प्रशिक्षण के बाद आई. दिल की बात जबां तक ला कर चेहरे के हावभाव के साथ शब्दों का मेल अभिनय को जन्म देता है जो मैं ने रंग मंच में सिखा. थिएटर क्लास में अभिनय शिक्षा की शुरुआत के बाद मैं ने लंदन में आरडीए अभिनय इंस्टिट्यूट में दाखिला लिया. वहां मैं ने थिएटर, म्यूजिकल थिएटर और फिल्म का अध्ययन किया. वहां पूरी तरह प्रशिक्षित होने के बाद मैं इंडिया वापस आई एक बेहतरीन अभिनेत्री बनने का सपना ले कर. मेरा मकसद बतौर अभिनेत्री फिल्मों में अपनी अलग पहचान बनाना था.

अपनी पहली फिल्म ‘बीरबल ट्रिलौजी…’ के बारे में

इंडिया आने के बाद मेरा एक ही मकसद था फिल्मों में ऐक्टिंग के लिए कोशिश करना, जिस के लिए मैं औडिशन दे रही थी. उसी दौरान मैं मौडलिंग भी कर रही थी. तभी मेरी मुलाकात एक फिल्म कोऔर्डिनेटर से हुई. मैं ने उसे बताया कि मेरी फिल्मों में अभिनय करने में दिलचस्पी है. उस के बाद ही मुझे पहली फिल्म ‘बीरबल ट्रिलौजी…’ में काम करने का मौका मिला. चूंकि यह मेरी पहली फिल्म थी, अभिनय में मेरा पहला मौका था इसलिए मुझे खुशी के साथसाथ घबराहट भी थी.

लेकिन असल पहचान मुझे 2023 में रिलीज हुई फिल्म ‘सप्त सागरदाचे एलो साइड ए और बी’ से मिली. इस फिल्म के लिए मुझे सर्वश्रेष्ठ ऐक्ट्रैस क्रिटिक कन्नड़ फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला. इसी फिल्म की वजह से मुझे ‘कांतारा चैप्टर 1’ जैसा बड़ा औफर भी मिला. दरअसल, मैं ने कभी नहीं सोचा था कि मुझे इतनी बड़ी फिल्म औफर होगी, लेकिन जब ऐसा हुआ तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था. दरअसल, सप्तसागर दाचे के निर्माता रक्षित शेट्टी और कांतारा के ऋषभ शेट्टी दोस्त हैं. वे दोनों एकसाथ प्रीमियर में आए थे. वहीं पर मुझे सागरदाचे में अभिनय के लिए बहुत तारीफ मिली थी. उसी दौरान ऋ षभ शेट्टी ने मुझे ‘कांतारा चैप्टर 1’ के लिए पसंद कर लिया था. इस बात का पता मुझे 1 साल बाद लगा.

इस फिल्म में काम करना मेरे लिए बहुत बड़ा अवसर और चुनौती रहा है क्योंकि इस फिल्म में मेरा अभिनय मेरा भविष्य भी तय कर सकता है. इसी वजह से मैं ‘कांतारा चैप्टर 1’ को ले कर बेहद ऐक्साइटेड हूं. फिल्म इंडस्ट्री में मेरा कोई गौडफादर नहीं है आज मैं जो कुछ भी हूं अपनी मां और अपने परिवार के सहयोग से ही हूं. मेरी मां ने मुझे इतना सक्षम बना दिया है कि मैं अपने टेलैंट के दम पर अभिनय क्षेत्र में अपनी जगह बना सकती हूं. इंडस्ट्री में मेरा कोई गौडफादर नहीं है. मैं ने आज तक जो भी हासिल किया है अपने दम पर ही किया है. मेरी सब से बड़ी शुभचिंतक और गाइड करने वाली मेरी मां ही हैं.

ऐक्टिंग क्षेत्र में प्रगति को ले कर मेरी स्पीड भले ही स्लो रही है, लेकिन हर फिल्म से मैं ने कुछ न कुछ सीखा ही है और धीरेधीरे सफलता की सीढि़यां चढ़ रही हूं, जिस में ‘कांतारा चैप्टर 1’ मेरा सफलता की तरफ एक बढ़ता कदम है. साउथ इंडस्ट्री में हीरोइन के काम करने को ले कर जुड़ी कई तरह की बातों को ले कर प्रतिक्रिया कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री में मैं ने पिछले सालों में कुछ फिल्मों में काम किया है. इस के अलावा तमिलतेलुगू मैं भी काम कर चुकी हूं. इस दौरान मुझे कभी कोई ऐसा कड़वा अनुभव नहीं हुआ, जिस की वजह से मुझे अभिनय कैरियर छोड़ने के बारे में सोचना पड़ा हो.

मेरा मानना है कि अगर आप किसी भी इंडस्ट्री में काम करते हैं तो यह पूरी तरह आप पर निर्भर करता है कि आप को किन शर्तों पर काम करना है, क्या स्वीकार करना है और क्या नहीं. अच्छेबुरे लोग हर जगह होते हैं. यह आप पर निर्भर करता है कि आप उस के साथ कैसे डील करते हैं. जैसे मैं जहां भी काम करती हूं वहां पर सब से पहले माहौल देखती हूं कि मैं किन लोगों के साथ काम कर रही हूं. जब मुझे सब सही लगता है तभी मैं आगे बढ़ती हूं. साउथ इंडस्ट्री ने मुझे बहुत कुछ दिया है नाम, दाम और शोहरत. मेरे लिए साउथ इंडस्ट्री वरदान साबित हुई है.

बौलीवुड कलाकार और साउथ इंडस्ट्री के कलाकारों का एकसाथ काम करना फिल्म उद्योग में नई क्रांति लाने जैसा है

अगर मैं अपनी बात करूं तो मैं खुद बौलीवुड फिल्मों की प्रेमी हूं. मेरी हमेशा से ही इच्छा रही है कि मैं हिंदी फिल्मों में काम करूं. ऐसे ही साउथ के कई कलाकार हिंदी फिल्मों में काम करना चाहते है और हिंदी फिल्मों के कई कलाकार साउथ इंडस्ट्री से जुड़े हुए हैं. ऐसे में देखा जाए तो बौलीवुड कलाकार और साउथ इंडस्ट्री के कलाकारों का एकजुट होना फिल्म उद्योग में नई क्रांति ला सकता है.

दोनों इंडस्ट्री के दिग्गज लोगों का एकसाथ काम करना इंडियन फिल्म के लिए बहुत बेहतर है. यहां पर किसी को किसी से भी असुरक्षा की भावना नहीं है बल्कि एकदूसरे के प्रति प्यार और इज्जत की भावना है. तभी तो साउथ वाले हिंदी फिल्मों में और बौलीवुड वाले साउथ की फिल्मों में काम कर रहे हैं. फिल्म उद्योग के लिए यह एक अच्छी शुरुआत है.

हिंदी फिल्मों में काम करना मेरी बहुत बड़ी इच्छा है

मुझे हिंदी फिल्में देखना बहुत पसंद हैं और मेरी इच्छा है कि मैं हिंदी फिल्मों में काम करूं. फिलहाल मुझे कोई हिंदी फिल्म औफर नहीं हुई है लेकिन भविष्य में आप मुझे जरूर हिंदी फिल्म में काम करते हुए देखेंगे. मुझे उस वक्त बहुत खुशी हुई थी जब करण जौहर ने एक बार मेरी तारीफ की थी. फिल्म ‘सप्त सागरदाचे…’ के लिए तारीफ की थी. फिल्म मेकर करण जौहर की फिल्मों से मैं बहुत प्रभावित हूं खासतौर पर उन के द्वारा बनाई गई रोमांटिक फिल्में मेरी पसंदीदा फिल्में हैं. मेरी दिली तमन्ना है कि मैं ऐसी ही किसी रोमांटिक फिल्म में रोमांटिक किरदार निभाऊं.

‘कांतारा चैप्टर 1’ के अलावा अन्य फिल्मों के बारे में

‘कांतारा चैप्टर 1’ के अलावा मेरे पास कुछ और अच्छे प्रोजैक्ट्स हैं जैसे मैं साउथ ऐक्टर यश के साथ टौक्सिक फिल्म कर रही हूं. एक फिल्म एनटीआर जूनियर के साथ कर रही हूं. इस के अलावा कुछ और प्रोजैक्ट भी हैं जिन के लिए अभी बात चल रही है.

सोशल मीडिया पर यूथ क्रश कहलाने के बारे में

सोशल मीडिया पर मुझे यूथ क्रश का टैग मिलना मेरे लिए खुशी की बात है. सोशल मीडिया पर मुझे बहुत प्यार मिल रहा है. लोग मुझे पसंद कर रहे हैं जिस के लिए मैं उन की आभारी हूं. मेरे अभिनय कैरियर को आगे बढ़ाने में सोशल मीडिया का बहुत बड़ा योगदान है. उन के प्यार और इज्जत की वजह से ही आज मैं यहां तक पहुंची हूं. उस से भी ज्यादा खुशी मुझे तब होगी जब बतौर अभिनेत्री मैं एक सही मुकाम हासिल करूंगी और यह तभी संभव है जब तक मुझे दर्शकों का प्यार मिलता रहेगा.

फैस्टिवल सैलिब्रेशन को ले कर मैं हमेशा उत्साहित रहती हूं

इंडिया में इतने सारे फैस्टिवल्स हैं कि पूरा साल इन्हें मनाने में ही गुजर जाता है और मेरे लिए यह खुशी की बात है क्योंकि हर फैस्टिवल मुझे पौजिटिव ऐनर्जी देता है. मुझे ही नहीं सभी को फैस्टिवल आने पर खुशी महसूस होती है. जैसेकि अभी दीवाली आने वाली है और अभी से लोग दीवाली को ले कर ऐक्साइटेड हैं. पर्सनली मुझे भी दीवाली का त्योहार बहुत पसंद है और इस दिन मैं बहुत ऐंजौय करती हूं. सिर्फ दीवाली ही नहीं मुझे हर त्योहार मनाना पसंद है क्योंकि उस में मुझे खुशी मिलती है.

‘‘अभिनय से जुड़ना मेरे लिए और भी दिलचस्प रहा. नृत्य करने वाली मुद्राएं और हावभाव से हम भावनाओं को व्यक्त करने की कला जानते हैं, लेकिन रंगमंच के जरीए अभिनय को शब्द मिल जाते हैं. थिएटर में अभिनय सीखने के बाद भावनाओं को शब्दों के जरीए चेहरे से व्यक्त करने की कला मुझे अभिनय प्रशिक्षण के बाद आई…’’

Rukmini Vasanth

Eye Makeup: आई मेकअप में हाइजीन का खयाल रखें

Eye Makeup: आंखें हमारे शरीर का सब से सैंसिटिव हिस्सा होती हैं. ऐसे में मेकअप करते समय उन्हें नुकसान न पहुंचे इस बात का खास खयाल रखना चाहिए. दरअसल, बाजार में तरहतरह के काजल, आइलाइनर, आई शैडो, मसकारा आदि मौजूद हैं, जिन्हें अपनी जरूरत के हिसाब से लड़कियां खरीदती हैं और प्रयोग में लाती हैं. इन में कुछ आई मेकअप प्रोडक्‍ट्स हैं जिन्हें ओकेजनल प्रयोग में लाया जाता है जबकि कुछ प्रोडक्‍ट का प्रयोग डेली यूज के लिए भी किया जाता है.

ऐसे में इन के प्रयोग से पहले कुछ जरूरी बातों को ध्‍यान में रखना बहुत ही जरूरी है. जैसेकि आंखों का मेकअप करते हुए जरूरी है कि अपने हाथों को अच्छी तरह से साफ करें. और हां, गलती से भी दूसरों का मेकअप  इस्तेमाल न करें. हो सकता है उन्हें किसी चीज की एलर्जी या इन्फैक्शन होगी, तो वह आप को भी हो सकती है.

अगर आप भी आई मेकअप करती हैं तो किनकिन बातों को ध्‍यान में रखें :

ऐक्सपायर हो चुके आई प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल से बचें

पुराने व ऐक्सपायर हो चुके या किसी और के आई ड्रौप्स, आई मेकअप या कौन्टैक्ट लेंस इस्तेमाल करने से बैक्टीरिया फैल सकते हैं और संक्रमण हो सकता है. इसलिए आई ड्रौप्स, काजल, मसकारा या किसी भी आंखों से जुड़े उत्पाद की ऐक्सपायरी डेट हमेशा जांच लें.

आई मेकअप शेयर करने से बचें

अपने मेकअप या आंखों की देखभाल के सामान को दूसरों के साथ, यहां तक कि परिवार के सदस्यों के साथ भी शेयर करने से बचें. इस के कारण एक से दूसरे को इन्फैक्शन फैल सकता है.

नियमित रूप से उत्पाद बदलें

मसकारा और आईलाइनर जैसे क्रीमी या लिक्विड उत्पादों में बैक्टीरिया पनपते हैं. इन्हें हर 3-6 महीने में बदल दें.

बहुत गरम जगह पर ब्यूटी प्रोडक्ट न रखें

कई लोगों की आदत होती है अपने ब्यूटी प्रोडक्ट को वे किचन या फिर कहीं ऐसी जगह रख देते हैं जो बहुत गरम होती है. इस से उन में बैक्टीरिया पैदा हो सकता है. जैसे की आंखों की आईड्रौप को हमेशा फ्रीज में रखना चाहिए. इसी तरह आई लैंस को भी वहां न रखें जहां धूप आती हो. कुछ चीजों को आप जरूरत के अनुसार फ्रीज में भी रख सकते हैं. वैसे, मेकअप प्रोडक्ट को हमेशा ठंडी, सूखी जगह पर रखना चाहिए.

आई मेकअप अच्छे ब्रैंड का ही यूज करें

आजकल लोग बिना समझे किसी भी लोकल ब्रैंड का सामान मार्केट से कम दाम पर खरीद लेते हैं. इस के कारण कई बार हमारी आंखों को बहुत नुकसान पहुंचता है. लोकल और खराब ब्रैंड का समान यूज करने से बचें और सिर्फ अच्छे ब्रैंड का समान ही खरीदें. आंखों पर कुछ भी यूज करने से पहले पैच टेस्ट जरूर करें. इस से आप को पता चल जाएगा कि कहीं आप की स्किन और आंखों को किसी चीज से एलर्जी तो नहीं हो रही है

कौन्टैक्ट लेंस का यूज करते हुए ध्यान रखें

फेस को क्लीन करने के बाद कोई भी प्रोडक्ट अप्लाई करने से पहले आप को अपने लैंस लगाने हैं. बहुत सी महिलाएं सबसे लास्ट में लैंस लगाती हैं. ऐसा करना सही नहीं है. इस से कई बार आंखों में जलन और रैडनेस की समस्या आती है. वहीं, मेकअप जब उतारें तो इस बात का खयाल रखें कि सब से पहले आप को लैंस ही उतारने हैं. यह लैंस लगाने का बेसिक रूल है. इस के आलावा भी कुछ बातों का ध्यान दें :

-कौन्टैक्ट लेंस पहनने से पहले आंखों का पूरा मेकअप करें

-कौन्टैक्ट लेंस केस खोलने से पहले अपने हाथों को अच्छी तरह धोएं.

-अगर आप के नाखून लंबे हैं, तो कौन्टैक्ट लेंस पहनने से बचें क्योंकि वे आंखों में लग कर उन्हें नुकसान पहुंचा सकते हैं.

-मेकअप रिमूव करने से पहले ध्यान रखें कि सब से पहले कौन्टैक्ट लेंस हटा दें.

-आप चाहे कितने भी थके हुए क्यों न हों लेकिन रात को सोने से पहले लैंस को हटा कर ही सोएं.

मेकअप ब्रश का भी रखें खास खयाल

लिपस्टिक, आईलाइनर जैसे मेकअप प्रसाधनों को हमेशा ब्रश से ही लगाएं और यूज के बाद ब्रश को मेकअप क्लीनर से क्लीन जरूर करें. इस के अलावा आप चाहे तो वन टाइम यूज डिस्पोजेबल ब्रशेज का प्रयोग भी कर सकते हैं. आजकल हर ब्रैंड के मेकअप क्लीनर मार्केट में मिल रहें हैं. इन के प्रयोग से हर बार मेकअप ब्रशेज को यूज करने के बाद नियमित रूप से साफ जरूर करना चाहिए. इस से स्किन इन्फैक्शन होने का खतरा नहीं रहता है. लिप लाइनर, काजल तथा आईब्रो पेंसिल जैसे उत्पादों को हर यूज के बाद शार्पेन कर लें जिस से कि उन का उपयोग किया हुआ लेयर उतर जाए और वे फिर से नए हो जाएं.

सोने से पहले काजल और मेकअप जरूर हटाएं

रातभर काजल लगा कर सोने से या अधूरे काजल के साथ सोने से हो सकता है कि आप की आंखों में इन्फैक्शन हो जाए या सुबह उठने के बाद आप की आंखें सूजी हुई लगें.

लोकल फैशन का पीछा न करें

बाजार में समयसमय पर कई फैशन ट्रेंड्स आते रहते हैं, जो थोड़े दिन रहते हैं और फिर बदल जाते हैं. ऐसे में किसी की देखादेखी कोई भी फैशन ट्रेंड को फौलो न करें. अपने व्यक्तित्व और रुचि को ध्यान में रख कर ही इसे अपनाएं. विशेषरूप से आंखों का मेकअप करते हुए तो इस बात का खास खयाल रखें क्योंकि जरूरी नहीं कि जो आई मेकअप आप की फ्रैंड पर जंच रहा है, वह आप पर भी जंचे. इस के अलावा तरहतरह के प्रोडक्ट इस्तेमाल करने से पहले उसे अपने स्किन पर परख लें. इस से आप किसी भी तरह की एलर्जी और इन्फैक्शन से तो बचेंगी ही, साथ ही आपको यह भी पता चल जाएगा कि अपनी आंखों की खूबसूरती को बढ़ाने के लिए आप ने जिन प्रोडक्ट्स का चयन किया है, वह आप की स्किन के अनुरूप है या नहीं.

लंबे समय तक आई मेकअप रखना

मसकारा और आईलाइनर का लंबे समय तक इस्तेमाल करने से पलक की जड़ों में रुकावट आ सकती है. इस से बाल झड़ने लगते हैं और सूजन (स्टाई) जैसी समस्या हो सकती है. इसी तरह, वाटरलाइन (आंखों की भीतरी लाइन) पर मेकअप लगाने से आंसू ग्रंथियों के छिद्र बंद हो सकते हैं, जिस से आंखों में सूखापन और जलन बढ़ सकती है.

इन बातों का भी रखें खयाल

मेकअप ब्रश और अप्लिकेटर को नियमित रूप से साफ करना भी बेहद जरूरी है. इन्हें गंदा छोड़ने से बैक्टीरिया बढ़ते हैं और यह सीधा आंखों तक पहुंच सकते हैं.

ध्यान दें

-हर 3 महीने में आंखों के मेकअप की नई पैकिंग बदलें.

-मेकअप लगाने से पहले अपना चेहरा अच्छी तरह धो लें.

-उस आंखों के मेकअप का उपयोग जारी न रखें जिस से आप की आंखों में जलन हो.

-बिस्तर पर जाने से पहले आंखों का मेकअप हटा लें.

-अपनी लैशलाइन से दूर आईलाइनर लगाएं.

-मेकअप ब्रश और ऐप्लीकेटर को रोजाना साफ करें.

आईलाइनर पेंसिल को नियमित रूप से तेज करें.

-जहां तक ​​संभव हो खुदरा दुकानों पर ट्रायल मेकअप किट का उपयोग करने से बचें.

-सौम्य मेकअप हटाने वाले उत्पादों का उपयोग करें.

Eye Makeup

Family Story: रिश्ता और समझौता- अरेंज मैरिज के लिए कैसे मानी मौर्डन सुमन?

Family Story: अमेरिका के जेएफके अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे में सारी औपचारिकताओं को पूरा कर के जब अपना सामान ले कर सुमन बाहर आई तो उस ने अपनी चचेरी बहन राधिका को हाथ लहराते देखा. सुमन बड़ी मुसकान के साथ उस की ओर बढ़ी और फिर दोनों एकदूसरे से गले मिलीं.

‘‘अमेरिका के न्यूयौर्क में आप का स्वागत है सुमन,’’ कह कर राधिका ने सुमन के गाल पर किस किया.

सुमन ने भी उसे गले लगाया और फिर दोनों निकास द्वार की ओर बढ़ने लगीं.

राधिका, सुमन की चाची की बेटी है. वे लगभग हमउम्र हैं. दोनों का बचपन इंदौर में अपने नानाजी के घर में एकसाथ गुजरा था. हर छुट्टी पर परिवार के सभी सदस्य अपने नाना के घर इंदौर में इकट्ठा होते थे और उन दिनों की खूबसूरत यादें सुमन के दिमाग में अभी भी ताजा हैं. अपने नानानानी की मृत्यु के बाद सुमन की मां ने अपनी बहनों से अपना संपर्क बनाए रखा और वे अकसर मुंबई आती थीं. राधिका ने खुद सुमन के घर में रह कर मुंबई में ही कैमिस्ट्री में पौस्टग्रैजुएशन किया था और उस समय सुमन भी कंप्यूटर साइंस में पोस्ट ग्रैजुएशन कर रही थी. राधिका नौकरी के सिलसिले में न्यूयौर्क चली गई और सुमन को मुंबई में एक मल्टीनैशनल कंपनी में नौकरी मिल गई.

‘‘चाची और चाचा कैसे हैं,’’ गाड़ी को पार्किंग से बाहर निकालते हुए राधिका ने पूछा.

सुमन मुसकराते हुए बोली, ‘‘वे ठीक हैं.’’

अब दोनों ओर से चुप्पी थी. अमेरिकी धरती पर उतरते ही सुमन से कोई भी निजी सवाल पूछ कर राधिका उसे उलझन में नहीं डालना चाहती थी. इसी बीच सुमन का फोन बजा. आशीष का था. सुमन को झिझक हुई तो राधिका ने कहा, ‘‘तुम कौल लेने में क्यों संकोच कर रही हो?’’

तब सुमन ने कहा, ‘‘हैलो.’’

‘‘हाय स्वीट हार्ट,’’ दूसरी ओर से आशीष की आवाज थी,‘‘तम न्यूयौर्क पहुंच गई हो… यात्रा कैसी रहीं. कोई कठिनाई तो नहीं हुई?’’ उस की आवाज में चिंता बहुत स्पष्ट थी.

‘‘हां आशीष मैं बिना किसी दिक्कत के न्यूयौर्क पहुंच चुकी हूं… सफर अच्छा था… बस थोड़ी थकान महसूस कर रही हूं.  मेरी बहन राधिका हवाईअड्डे मुझे लेने आ गई थीं. अब हम अपने घर जा रही हैं… मैं तुम्हें बाद में फोन करूंगी,’’ और फिर फोन काट दिया.

फिर घंटी बजी. सुमन की मां थीं. मां ने पूछा, ‘‘बेटा, तुम ठीक हो? क्या राधिका एअरपोर्ट आ गई थी? सुमन ने फोन राधिका को पकड़ा दिया. राधिका बोली, ‘‘मौसी मैं एअरपोर्ट कैसे नहीं आती… आप सुमन की चिंता न करो… वह यहां बिलकुल सुरक्षित है. हम घर पहुंच कर आप को फोन करते हैं.’’

‘‘ठीक है,’’ कह सुमन की मां ने फोन काट दिया.

राधिका का तीसरी मंजिल पर

3 बैडरूम वाला अपार्टमैंट था.

जैसे ही राधिका और सुमन ने घर में प्रवेश किया एक फिरंगी लड़की एक बैडरूम से बाहर आई और सुमन को गले लगा कर मुसकराते हुए उस का अभिवादन करते हुए बोली, ‘‘यूएस में आप का स्वागत है और आशा है कि आप मेरे साथ रहना पसंद करेंगी.’’

सुमन सोच में पड़ गई कि राधिका अकेली रह रही है तो यह लड़की कौन?

राधिका उसे कौफी का कप पकड़ाते हुए बोली,

‘‘सुमन यह जेनिफर है. हम ने इस अपार्टमैंट को मिल कर किराए पर लिया है. वह एक सौफ्टवेयर कंपनी में काम करती है और वे ही अपनी कंपनी में तुम्हें नौकरी दिलाने में मदद करने वाली है… न्यूयौर्क बहुत महंगा शहर है… हम इस तरह एक अपार्टमैंट अकेले किराए पर नहीं ले सकते. वह बहुत व्यस्त रहती है, इसलिए ज्यादातर खाना बाहर से मंगवाती है… हमारे बीच कोई समस्या नहीं. अब तुम भी आ गई तो हम तीनों अपार्टमैंट साझा कर सकती हैं,’’ राधिका ने कौफी पीते हुए कहा.

सुमन चुप रही. वैसे भी वह केवल 2 साल के लिए अमेरिका आई है और फिर भारत अपने प्रेमी आशीष के पास वापस चली जाएगी. इस बीच जब जेनिफर उन दोनों के पास आई तो वह औफिस जाने के लिए पूरी तरह तैयार थी. उस ने एक ईमेल आईडी देते हुए सुमन से कहा,‘‘राधिका ने मुझे बताया था कि आप को सौफ्टवेयर सैक्शन में नौकरी की जरूरत है और मैं उसी फील्ड में काम करती हूं… वास्तव में मेरी खुद की टीम में एक शख्स की जरूरत है. आज ही अपना सीवी इस आईडी पर भेजें ताकि जल्दी आप की नियुक्ति हो जाए. बाय… शाम को मिलते हैं,’’ और फिर राधिका को गले लगा अपनी गाड़ी की चाबी ले कर दफ्तर के लिए निकल गई.

‘‘तो क्या चल रहा है? सुमन तुम मुझ से दिल खोल कर बात कर सकती हो, क्योंकि हम केवल चचेरी बहनें ही नहीं बचपन की दोस्त भी हैं. याद है तुम्हें हम उन छोटेछोटे रहस्यों को कैसे साझा करते थे… मैं ने आज छुट्टी ले ली है ताकि तुम्हारे साथ समय बिता सकूं और तुम्हारी चीजों को व्यवस्थित करने के लिए मदद कर सकूं,’’ राधिका ने कहा.

सुमन ने लंबी सांस ली. मुंबई में अच्छी सैलरी वाली नौकरी से इस्तीफा दे कर

अमेरिका क्यों आई है, राधिका को यह बताने के लिए सुमन ने खुद को तैयार किया.

कुछ दिन पहले ही सुमन ने मां को पिता की मौजूदगी में बताया था.

‘‘सुमन तुम यह क्या कह रही हो? तुम

ऐसे सोच भी कैसे सकती हो,’’ उस की मां चिल्लाई थीं.

‘‘क्या आप ने सुना है कि आप की बेटी एक ऐसे लड़के से प्यार करती है, जो हमारी बिरादरी का नहीं है और इस से भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि वह उस के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहना चाहती है ताकि वे एकदूसरे को बेहतर तरीके से समझ सकें. फिर वे तय करेंगे कि शादी करनी है या नहीं,’’ यह कहते हुए सुमन की मां मुश्किल से सांस ले पा रही थीं.

सुमन की मां हर छोटी सी छोटी बात पर भी भावुक हो जाती है, उस के विपरीत उस के पिता एक संतुलित व्यक्ति हैं. उन्होंने ध्यान से अपनी बेटी की बात सुनी.

सुमन ने कहा, ‘‘पापा, आशीष और मैं एकदूसरे से प्यार करते हैं, लेकिन हम शादी में जल्दबाजी नहीं करना चाहते. मेरे अपने दफ्तर में 4 मित्र जोड़ों ने जल्दबाजी में शादी कर ली और फिर 1 साल के भीतर ही उन की शादी टूट गई. ऐसा इसलिए क्योंकि वे एकदूसरे को ठीक से समझे बगैर शादी कर बैठे. हम यह गलती नहीं दोहराना चाहते हैं. इन दिनों मुंबई में लिव इन रिलेशनशिप में रहना आम बात है. मेरे अपने दोस्त ऐसे ही रहते हैं. ऐसे साथ रहने से हम अपने साथी की ताकत और कमजोरी को समझ सकते हैं और एकदूसरे को बेहतर तरीके से जान सकते हैं. फिर तय कर सकते हैं कि एकदूसरे के लिए सही हैं या नहीं, हमारी शादी सफल हो सकती है या नहीं,’’ सुमन ने समझाया.

सुमन की मां बेशक सदमे की स्थिति में थीं, लेकिन उस के पिता हमेशा की तरह शांत थे. उन्होंने सुमन को अपनी बगल में बैठाया और फिर बोले, ‘‘तुम्हारे दोस्तों की शादियां टूट गईं और तुम्हें लगता कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने एकदूसरे को समझे बिना जल्दबाजी में शादी की. इस मामले में मेरा खयाल है कि तुम दोनों 1-2 साल के लिए अपनी दोस्ती बरकरार रख कर एकदूसरे को समझने की कोशिश करो और फिर शादी कर लो. यह लिव इन रिश्ता क्यों?’’ रामनाथ ने पूछा.

सुमन ने कहा, ‘‘पापा यही समस्या है. दरअसल, जब हम दोस्त होते हैं तो हम हमेशा दूसरे व्यक्ति को केवल अपना बेहतर पक्ष दिखाते हैं. हम सभी का एक और पक्ष है, जिसे हम जानबूझ कर दूसरों से छिपाते हैं. विवाह में ऐसा नहीं है. आप को अपने पूरे जीवन में एक व्यक्ति के साथ मिलजुल कर रहना होगा और आप को छोटी सी छोटी चीजें जैसे खाने से ले कर पैसे तक बड़े मामलों पर दोनों के बीच सहमति की जरूरत होती है.

‘‘उदाहरण के लिए मेरी एक दोस्त ने अपने बौयफ्रैंड से 4 साल तक डेटिंग करने के बाद शादी की. लेकिन शादी के बाद ही उसे समझ में आ गया कि जिस से उस ने ब्याह किया वह एक पुरुषवादी व्यक्ति है. यद्यपि मेरी सहेली उस से अधिक कमा रही थी, फिर भी उस के पति ने उस के साथ बदसलूकी की और पुराने जमाने की पत्नियों की तरह अपने परिवार की सेवा करने के लिए उसे मजबूर किया. इस के अलावा मेरी सहेली से उस की कमाई का हिस्सा मांगा… दुख की बात तो यह है कि उस लड़के ने मेरी सहेली की अपने मातापिता को किसी भी रूप से सहायता करने से सख्त मनाकर दिया. जब हम दोस्त होते हैं तब हमें एक मर्द के इस पहलू को नहीं जान सकते, क्योंकि उस वक्त सभी इंसान अपना अच्छा पक्ष ही दिखाएगा,’’ सुमन ने बताया.

थोड़ी देर रुक वह आगे बोली, ‘‘पापा, आज भी बहुत से भारतीय पुरुष हैं जो सोचते हैं कि वे घर के बौस हैं. पत्नी को केवल उन की आज्ञा का पालन करना चाहिए. स्त्री को उचित अधिकार और सम्मान नहीं दिए जाने की वजह से ही इन दिनों कई भारतीय शादियां टूट रही हैं. मैं नहीं चाहती कि मेरे साथ भी ऐसा हो. मैं ने सोचा कि जब हम एकसाथ रहते हैं तो हमारी सचाई एकदूसरे के सामने आती है तब हमें पता चलता है कि हम एकदूसरे के लिए सही हैं या नहीं.’’

रामनाथ ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘तुम सही हो और मैं इस विषय में तुम से पूरी तरह सहमत हूं, लेकिन यह लिव इन रिलेशनशिप भी उतनी आसान नहीं जितना तुम समझ रही हो. यह भी बहुत सारी समस्याओं को जन्म देती है. तुम एक शिक्षित लड़की हो और मुझे तुम्हें बहुत समझाने की जरूरत नहीं है, क्योंकि तुम स्मार्ट और बुद्धिमान हो. शादी जैसे बंधन के बिना लड़का और लड़की पतिपत्नी की तरह रहने से भी समस्याएं हो सकती हैं. पहली बात यह है कि दोनों तरफ कोई प्रतिबद्धता नहीं है और यह किसी भी रिश्ते के लिए अच्छा नहीं है.

‘‘अगर इस तरह साथ रहने में जिन दिक्कतों का लड़का और लड़की को सामना करना पड़ता है, उन के बारे में मैं कहूं तो तुम समझोगी कि मैं पिछली पीढ़ी का बूढ़ा आदमी हूं और लिव इन रिलेशनशिप के खिलाफ कहता हूं. इसलिए मेरे पास एक सुझाव है. लिव इन रिलेशनशिप की अवधारणा पश्चिमी देशों से आई है न? लेकिन अब वे महसूस कर रहे हैं कि शादी की हमारी परंपरा बेहतर है. हमारी राधिका न्यूयौर्क में है और तुम वहां जा कर काम करो और पश्चिमी लोगों के साथ काम करते दौरान उन के जीवन को करीब से देखो. तब तुम अपने लिए क्या सही है यह निर्णय करने की स्थिति में होगी और वह तुम्हारे लिए बेहतर होगा.’’

सुमन को भी लगा कि यह एक अच्छा विचार है.

‘‘तो मैं अब अमेरिका में हूं, जहां लिव इन रिलेशनशिप की संस्कृति को समझना है,’’ सुमन ने हंसते हुए कहा.

राधिका भी हंस पड़ी, ‘‘तुम्हें पता है कि जेनिफर अगले हफ्ते वास्तव में अपने बौयफ्रैंड के साथ इसी बिल्डिंग में एक और फ्लैट में जाने की योजना बना रही है. एक नई लड़की क्लारा हमारी रूममेट होगी,’’ कह कर राधिका चाय के कप रखने चल दी और सुमन खिड़की से नीचे चल रही गाडि़यों की जलूस देखने लगी.

धीरेधीरे 3 साल बीत गए. हर हरिवार को सुमन के मातापिता उस से कम

से कम 2 घंटे तक इंटरनैट पर बात करते थे. इकलौती औलाद होने के नाते सुमन के मातापिता उस पर अपनी जान छिड़कते थे. खासकर सुमन की मां जो अपनी बेटी से अलग नहीं रह पा रही थी. उन्होंने अपने पति से कहा कि वे अमेरिका जाएं अपनी बेटी के पास.

रामनाथ ने उन्हें यह कहते हुए रोक दिया, ‘‘नहीं हम वहां नहीं जा रहे हैं. हम ने सुमन को वहां संस्कृति का निजी ज्ञान प्राप्त करने के लिए भेजा है, जिस की भारतीय युवा पीढ़ी इतने उत्साह से पीछा कर रही हैं.’’

सुमन की मां के पास इसे मानने के अलावा कोई और चारा नहीं था.

आशीष हर हफ्ते उस से इंटरनैट पर बात करता था, क्योंकि उसे भी सुमन से अलग रहना अच्छा नहीं लग रहा था. जब उस ने भी यूएस आने का प्रस्ताव रखा तो सुमन ने तुरंत मना कर दिया और कहा, ‘‘मैं ने अपने पिताजी से वादा किया है कि मैं आप को यहां नहीं बुलाऊंगी… और मैं अपना वादा नहीं तोड़ूंगी.’’

आशीष मान गया.

नौकरी भी अच्छी चल रही थी. न्यूयौर्क एक तेजी से आगे बढ़ने वाला शहर है, जो उस के मुंबई से भी ज्यादा तेज है. सुमन को सुबह 8 बजे अपने दफ्तर में पहुंचना है और वह जिस फ्लैट में रह रही है, वहां से पहुंचने में समय लगता. लेकिन न्यूयौर्क में आवागमन करना कोई समस्या नहीं है.

सुमन हर सुबह अपने और राधिका के लिए भारतीय नाश्ता बनाती और लंच भी पैक कर के औफिस के लिए निकल जाती.

एक रिसर्च स्कौलर होने के कारण राधिका की नौकरी लैब में थी और उस के काम का निश्चित समय नहीं था. कभीकभी 3-3 दिन तक घर नहीं आती और इस की सूचना सुमन को पहले ही दे देती थी ताकि वह उस का इंतजार न करे.

अब तक सुमन और क्लारा अच्छे दोस्त बन गए थे. सुमन को लगा कि क्लारा एक अच्छी लड़की है. लेकिन उस के साथ एकमात्र समस्या यह थी कि वह हर रविवार को कुछ मांसाहारी भोजन बनाती थी. उस की गंध को बरदाश्त करना शाकाहारी सुमन के लिए बहुत मुश्किल था. लेकिन धीरेधीरे सुमन उस गंध की आदी हो गई.

सुमन को रविवार को भी जल्दी उठना पड़ता था, क्योंकि क्लारा के रसोई में आने से पहले ही सुमन अपना और राधिका का खाना बना सके.

एक रविवार सुमन टीवी देख रही थी. तभी दरवाजे की घंटी बजी. उस ने दरवाजा खोला तो सामने जेनिफर थी, जो अब उस की सहकर्मी है. उस के पास एक बैग था और उस की आंखें सूजी थीं. उस का हुलिया देख कर सुमन हैरान हो गई.

जेनिफर अंदर आई और बेकाबू हो कर बिलखबिलख कर रोने लगी. सुमन समझ नहीं पा रही थी कि कैसे रिएक्ट करें. फिर उस ने खुद को संभाला और पूछा, ‘‘क्या हुआ जेनी तुम रो क्यों रही हो? कुछ तो बताओ… क्या मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकती हूं?’’ सुमन ने जेनिफर को गले लगाते हुए कहा.

‘‘सुमन मेरा बौयफ्रैंड अव्वल नंबर का धोखेबाज निकला. उस का किसी दूसरी लड़की के साथ अफेयर चल रहा है. उस ने मुझ से यह बात छिपाई और ऊपर से मेरे सारे पैसे उस लड़की पर खर्च कर दिए. अब मैं बिलकुल कंगाल हूं. जब मैं ने उस से पूछा तो उस ने कहा कि हम दोनों अलग हो जाएंगे. हम कानूनी रूप से विवाहित तो नहीं जो मैं अदालत से मदद ले सकूं… गुजाराभत्ता के रूप में मोटी रकम ले सकूं. अगर इस में एक व्यक्ति दगाबाज निकले तो दूसरा कुछ भी नहीं कर सकता और मैं उसी हालत में हूं. मेरी सारी बचत को उस ने लूट लिया.’’

सुमन उसे सांत्वना देने की कोशिश कर रही थी. जेनिफर ने पूछा, ‘‘क्या मैं आप लोगों के साथ तब तक रह सकती हूं जब तक कि मुझे एक और अपार्टमैंट और रूममेट नहीं मिलता है?’’

सुमन ने कहा, ‘‘बेशक

जेनी यह भी कोई पूछने वाली बात है क्या?’’

जेनिफर की हालत देख कर क्लारा को भी तरस आ गया और उसे अपने साथ रहने की इजाजत दे दी.

शाम को दफ्तर से आने पर राधिका ने पूरी कहानी सुनी. उसे अजीब सी बेचैनी हुई कि एक आदमी इतना मतलबी कैसे हो सकता है और उस के साथ ऐसा व्यवहार भी कर सकता है, जो उस से प्यार कर के उस के साथ रहने आई थी. वह सोच भी नहीं सकती कि एक इंसान इतनी ओछी हरकत कर सकता है. तीनों सहेलियां एकसाथ खाना खा कर इसी बारे में बात करती रहीं.

बातोंबातों में क्लारा ने अपनी समस्या बताई, ‘‘मैं भी ऐसी मुश्किल घड़ी से गुजर चुकी हूं. जब मैं अपने बौयफ्रैंड से ब्रेकअप कर के बाहर आई थी तो पूरी तरह टूट चुकी थी और मेरा बैंक बैलेंस भी शून्य था. हमारे देश में यह एक मामूली समस्या बन चुकी है. ऐसा नहीं है कि केवल लड़के ही धोखा देते हैं. कभीकभी लड़कियां भी ऐसी गिरी हरकत करती हैं. इस तरह के रिश्ते की नींव आपसी विश्वास के अलावा कुछ भी नहीं है और अकेले ही इस स्थिति का सामना करना पड़ता है.

‘‘एक तरह से मुझे लगता है कि आप का देश अच्छा है सुमन. आप की शादियों में सभी बुजुर्ग और परिवार के अन्य सदस्य शामिल होते हैं और यह 2 व्यक्तियों का नहीं, बल्कि 2 परिवारों का मिलन बन जाता है. हमारे मामले में हम इस बड़ी दुनिया में अकेले हैं. 18 साल की उम्र में हम अपने परिवारों से बाहर आते हैं और हमें अकेले ही दुनिया का सामना करना पड़ता है. मेरे 3 ब्रेकअप हो चुके हैं और तुम जानती हो कि हर ब्रेकअप कितना दर्दनाक होता है… एक बार मैं एक गहरे मानसिक अवसाद में चली गई और अभी भी उस अवसाद के लिए गोलियां ले रही हूं… अब मैं अकेली हूं. वास्तव में मैं अब एक नए रिश्ते से डर रही हूं कि इस बार भी मुझे प्यार के बदले में छल ही मिलेगा,’’ और फिर क्लारा ने लंबी सांस भरी.

‘‘सुमन हर हफ्ते आप के मातापिता आप से बात करते हैं और यह एक अच्छा एहसास है कि इस दुनिया में कोई है, जो आप को बहुत प्यार देता है और आप की चिंता करता है. जब मैं 10 साल की थी तब मेरे मातापिता अलग हो गए थे और इस से मैं बहुत परेशान थी. मुझे अपनी मां के नए प्रेमी को स्वीकारने में बहुत समय लगा. मेरे पिताजी समय मिलने पर कभी फोन किया करते थे, लेकिन कभी भी मेरे साथ समय नहीं बिताया. मेरे 2 सौतेली बहनें और 2 सौतेले भाई हैं. मेरे पिता के अन्य महिलाओं के माध्यम से बच्चे हैं और मेरी मां के भी अन्य पुरुषों के साथ बच्चे हैं. मेरी मां कभी हम सब को मिलने के लिए बुलाती है. उस समय हम एकदूसरे से मिलते हैं… वह अवसर बहुत औपचारिक होता था,’’ क्लारा ने दुखी मन से बताया.

‘‘हमारे गुजाराभत्ता कानून महिलाओं के लिए बहुत सख्त और अनुकूल है और यही कारण है कि ज्यादातर अमीर पुरुष कानूनी शादी पसंद नहीं करते हैं. अगर हम शादीशुदा हैं और अलग हो गए हैं तो उन्हें हमारे द्वारा लिए गए पैसे वापस करने होंगे और गुजाराभत्ता के रूप में मोटी रकम भी चुकानी होगी. अब इस प्रकार के संबंधों में कानून कोई भूमिका नहीं निभाता है. हमें इसे अकेले ही निबटना होगा.

‘‘हर बार जब रिश्ते में धोखा खाते हैं तो लड़कियां हमेशा के लिए टूट जाती हैं. मुझे एक गहरी प्रतिबद्धता के साथ संबंध पसंद हैं. सुमन जब मैं आप की मां को आप से बात करते हुए देखती हूं, हालांकि मुझे आप की भाषा नहीं पता, मगर उन की अभिव्यक्ति से पता चलता है कि वे आप से कितना प्यार करती हैं… आप की खातिर किसी भी तरह का दुख भोगने के लिए तैयार हैं… हमारे देश में ऐसा नहीं है. यहां हर किसी को एक अलग व्यक्ति माना जाता है,’’ क्लारा की इस बात पर जेनिफर ने भी हामी भर ली.

राधिका सुमन की तरफ देख कर मुसकराई. सुमन समझ सकती थी कि वह क्या कहना चाहती है. सुमन को लगा कि हर जगह समस्याएं हैं. लिव इन रिलेशनशिप भी इतना आसान नहीं है, जितना हरकोई कल्पना करता है. भारतीय परिस्थितियों और भारतीय पुरुषों के साथ तो यह और भी कठिन है.

सुमन सोच में पड़ गई. एक बात उस की समझ में आई कि यदि आप के पास कानूनी सुरक्षा है, तो आप एक तरह से सुरक्षित हैं कि आप से आप का पैसा नहीं छीना जाएगा और ब्रेकअप के बाद आदमी को मुआवजा देना होगा और फिर जब आप विवाहित होते हैं तो आप की सामाजिक स्वीकृति भी होती है.

उस रविवार को जब उस के मातापिता लाइन पर आए तो सुमन ने अपने पिताजी से

कहा, ‘‘मैं अब उलझन में नहीं हूं पापा… ऐसा लग रहा है कि ऐसा कोई भी तरीका नहीं है, जो बिलकुल सही या बिलकुल गलत है.’’

‘‘तुम ठीक कह रही हो बेटा. कोई भी व्यवस्था हर माने में सही या गलत नहीं हो सकती… हमें ही समझदारी के साथ काम करना पड़ेगा.

‘‘बेटा कोई भी शादी या रिश्ता इस दुनिया में ऐसा नहीं चाहे वह न्यूयौर्क हो या मुंबई ऐसा नहीं जो सौ फीसदी परफैक्ट हो. कोई न कोई कमी तो होती ही है और उसे नजरअंदाज कर के आगे बढ़ने में ही बेहतरी होती है. किसी भी रिश्ते की सफलता के लिए हर किसी को कुछ देना पड़ता है. तुम ही एक उदाहरण हो. तुम शुद्ध शाकाहारी हो मगर क्लारा के साथ एक ही रसोई को साझा कर रही हो क्यों? क्योंकि तुम क्लारा को ठेस पहुंचाना नहीं चाहती और उस से भी बढ़ कर तुम क्लारा से अपने रिश्ते का मूल्य समझती हो और उस की इज्जत करती हो, है न? जीवन भी इसी तरह है. अगर आप रिश्ते को बनाए रखना चाहते हैं तो मुकाम पर आप को हर हाल में समझौता करना होगा.’’

‘‘हर संस्कृति की अपनी ताकत और कमजोरी होती है. अमेरिकी संस्कृति की अपनी ताकत है कि यह हर व्यक्ति को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाती है और वह कम उम्र में ही दुनिया से अकेले लड़ने की सीख देती है. मगर उस के लिए उन लोगों को किनकिन कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है यह आप ने खुद देख लिया.

‘‘हमारी भारतीय संस्कृति हमेशा परिवार की अवधारणा में विश्वास करती है और रिश्ते हमेशा हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता रहे हैं. इस में कुछ ताकत और कमजोरी हो सकती है. समझौता हर रिश्ते का एक अभिन्न हिस्सा है, चाहे 2 लोग दोस्त हों या विवाहित.’’

अपने पिता से बात करने के बाद सुमन बहुत हलका महसूस कर रही थी. ‘जब वह एक रूममेट के लिए समझौता कर सकती है, वह भी एक विदेशी से तो फिर उस आदमी के लिए क्यों नहीं जो जीवनभर उस का साथी बनने वाला है, जो उस की सफलताओं और असफलताओं में उस के जीवन का हिस्सा बनने जा रहा है… वह है उस के जीवन का एक हिस्सा… यदि उस के लिए नहीं तो फिर वह किस के लिए समझौता करेगी,’ सुमन सोच रही थी.

अब सुमन ने फैसला कर लिया. वह आशीष से शादी करने के लिए तैयार थी और उस के साथ आने वाले समझौतों के लिए भी आशीष को वह मनाएगी ही क्योंकि 2 साल से वह भी उसी का इंतजार कर रहा है. आखिर समझौते के बिना जिंदगी ही क्या है.

Family Story

Long Story in Hindi: शीत युद्ध

Long Story in Hindi: दोनों का पारा 7वें आसमान को छू रहा था. व्यंग्य, आरोप, शिकायतों से भरे कूड़े के ढेर एकदूसरे पर फेंके जा रहे थे. भूत, वर्तमान के साथ भविष्य भी इस बहस में शामिल हो चुका था. इस तीखी नोक झोंक में एकदूसरे को अपने त्याग, अपनीअपनी महानता की मिसाल गिनाते हुए दोनों ही इस बात पर तुले थे कि वे एकदूसरे को उस की गलती आज मनवा कर ही मानेंगे. पहली बार कोई सुनता तो उसे यही लगता इन दोनों के बीच का  झगड़ा, मनभेद जिस मुकाम तक पहुंच चुका है, अब इस की अंतिम परिणति बस तलाक ही है.

‘‘आप को कभी भी यह महसूस हुआ कि कितना काम करती है यह औरत? कभी सोचते हैं कि दिनभर मैं घर में अकेले एक नौकरानी की तरह लगी रहती हूं?’’ श्वेता ने तिलमिला कर कहा.

‘‘क्या तुम दुनिया की अकेली औरत हो जो घर का काम करती है? फिर घर में ऐसा बड़ा काम है ही क्या? बस 2-4 लोगों का नाश्ताखाना बनाना, वाशिंग मशीन में कपड़े डालना, वह भी औटोमैटिक मशीन में. बाकी काम के लिए महरी तो आती ही है,’’ अभिषेक ने तुरंत जवाब दिया.

‘‘एक दिन घर में काम कर के देखिए तो पता चल जाए दिनभर क्या काम करती हैं हम औरतें,’’ श्वेता ने चुनौती दी.

‘‘तुम भी एक दिन औफिस जा कर देखों तो आटादाल का भाव मालूम हो जाए. तुम को तो यही लगता है नकि औफिस में हम लोग मौज करते हैं, ऐयाशी करते हैं, जबकि औफिस में घंटों खटने के बाद भी बौस की फटकार सुनने को मिलती है, सुबह और शाम औफिस के रास्ते में 2 घंटे की ड्राइव, कई दफा लंबेलंबे जाम में फंसे रहना पड़ता है. इन सब के बाद घर लौटने के बाद भी चैन नहीं, 10 तरह की मांग, तुम्हारे उलाहने. बस यही है हम जैसों की जिंदगी,’’ अभिषेक ने कहा. उस की आवाज धीरे न पड़ जाए इसलिए सोफे पर बैठेबैठे उस ने रिमोट से टीवी की आवाज धीमी कर दी.

‘‘आप लोग घर के काम को आसान सम झते हैं? कपड़े मशीन में डालने से धुल कर तैयार नहीं हो जाते हैं, मशीन से निकाल कर उन्हें फैलाना, फिर उतारना, प्रैस करना भी होता है. सब का खाना बनाना, घर की सफाई, बच्चों को तैयार करना, उन का, आप का अलग से टिफिन तैयार करना…’’ श्वेता ने घर के काम गिनाने शुरू किए.

तभी अभिषेक बीच में बोल उठा, ‘‘कपड़े धोने, खाना बनाने जैसे काम के लिए ही

क्या मर्द शादी करता है? ये काम तो 3-4 हजार दे कर नौकरानी से भी कराए जा सकते हैं. शादी कर के फिर इतना ताम झाम क्यों पालना? दिनभर घरवालों के लिए मेहनत करने के बाद आदमी जब घर आता है तो उसे सुकून चाहिए. पर यहां सुकून की जगह उलाहने, ताने सुनने को मिलते हैं.’’

श्वेता नौकरानी की अपने से की गई इस तरह की तुलना पर हमेशा तिलमिला जाती थी. आज भी यही हुआ. बोली, ‘‘तो करा लीजिए न नौकरानी से सारा काम. मैं भी देखूं. हमेशा इस का रोब क्या देते हैं? वैसे भी मु झे घर की नौकरानी ही बना कर रख छोड़ा है आप ने?’’ श्वेता का गला भर्रा गया. पर उस ने अपने आंसू रोक लिए. आंसू बहा कर वह अपने को कमजोर नहीं दिखाना चाहती थी.

‘‘उन औरतों के बारे में कभी सोचा है जो दफ्तर जाती हैं, वे सुबह से वहां काम करती हैं,फिर शाम को दफ्तर से वापस आ कर घर सभांलती हैं. दोहरी ड्यूटी करती हैं वे, घर की और दफ्तर की.’’

अभिषेक ने बहस का रुख दूसरी तरफ मोड़ा. बहस के तरकश में रखे ब्रह्मास्त्रों में नौकरानी वाला अस्त्र वह चला चुका था. यह दूसरा था. निशाना सही लगा, असर भी पूरा पड़ा. कामकाजी महिलाओं से तुलना कर उस ने आग में घी डालने का काम किया.

श्वेता की आवाज और तेज हो गई, ‘‘उन के पति आप जैसे नहीं होते. वे घर के कामकाज में अपनी पत्नियों का हाथ बंटाते हैं, सोफे पर बैठे आप की तरह केवल हुक्म नहीं चलाते,’’ इस के साथ ही उस ने 2-3 कामकाजी महिलाओं के पतियों का उदाहरण दे डाला, ‘‘और ऐसा ही था तो खुद क्यों नहीं कर ली नौकरी वाली से शादी? आप तो चाहते ही नहीं थे कि आप की बीवी नौकरी करे, डीटीसी बसों और दफ्तर में धक्के खाए. 10 तरह की फिलौसफी  झाड़ी थी शादी के बाद, अब नौकरी वाली अच्छी लगने लगी…’’

यह सच है कि अभिषेक नहीं चाहता था श्वेता नौकरी करे, उसे इस फैसले को ले कर कभी अफसोस भी नहीं हुआ. उलाहना देना अलग बात है. उस ने शादी के बाद श्वेता से पूछा भी था कि नौकरी करोगी, लेकिन उस के जवाब के पहले ही खुद की सोच उस पर लाद दी, ‘‘मैं नहीं चाहता कि औफिस से घर आऊं तो मेरी बीवी भी उसी हालत में थकीमांदी घर में मिले, मेरे बच्चे स्कूल से आएं तो उन्हें घर पर मां की जगह मेड मिले.’’

श्वेता ने भी शादी के पहले और शादी के बाद एक घरेलू पत्नी की भूमिका ही पसंद

की. अपने व्यक्तिगत कैरियर की उसे कभी महत्त्वाकांक्षा नहीं रही. एक मध्यवर्ग की आम लड़कियों की तरह उस ने भी एक सामान्य गृहस्थ जीवन का सपना जरा सा बड़ा होते ही पाल लिया था. अपना घर हो जिसे वह अपने मुताबिक सजाएसंवारे. प्यार करने वाला पति हो जो मेहनत कर के शाम को घर आए तो उस से बातें करे, बाहर घुमाए, उस की पसंदनापसंद का खयाल रखे. बस 2 बच्चे हों, जिन के भविष्य के लिए दोनों मेहनत करें.

शादी के बाद 2-3 साल तक सबकुछ उसी तरह चला भी. 2 बच्चे भी जल्दीजल्दी हो गए, बड़ी बेटी, फिर उस के बाद बेटा. लेकिन उस के बाद न जाने क्या हुआ बेवजह उस के और अभिषेक के संबंधों की वह अमरबेल सूखने लगी जो उन्होंने साथ लगाई और उसे बढ़ाया था. उस की जगह कैक्टस के ढेर सारे चाहेअनचाहे पौधों ने पांव पसारने शुरू कर दिए.

श्वेता को लगने लगा यह वह अभिषेक नहीं है जिस से उस की शादी हुई थी. वह बदल गया है. अभिषेक को भी कुछ ऐसा ही महसूस होने लगा. कभीकभी उसे विश्वास नहीं होता यह वही श्वेता है जिस की आंखों में, देह में उसे हमेशा प्यार का दरिया उमड़ता नजर आता था, जिस से वह खुद बहुत प्यार करता था, खुद को दुनिया का सब से खुश पति मानता था. न जाने श्वेता एक कर्कशा, वाचाल पत्नी में कब और कैसे बदल गई, उसे पता ही नहीं चला. शायद बच्चों के परिवार में आने के बाद गृहस्थी के बढ़ते दायित्व, बो झ और शारीरिक श्रम के वे  झेल नहीं पाए या फिर प्यार की दुनिया और कशिश का गृहस्थ जीवन के यथार्थ धरातल का जब सामना हुआ तो वे उसे सम झ नहीं पाए और सबकुछ बिखर गया.

‘‘तुम केवल एमए पास थी, तुम्हें टीचिंग के अलावा नौकरी ही क्या मिलती. टीचिंग में भी बीएड चाहिए.’’

बहस में कामकाजी पत्नी बनाम घरेलू पत्नियों का मुद्दा आ चुका था. अभिषेक के लिए यह बड़ा मुद्दा था. वह इसे छोड़ना नहीं चाहता था.

‘‘फिर ऐसी महिलाओं के पति घर में सहयोग क्यों नहीं करेंगे? उन की पत्नियां घर में पैसा लाती हैं, घर के खर्चों में उन का सहयोग होता है. हमारी तरह उन के पति एक गधा नहीं होते जो पूरे घर के खर्च का बो झ अकेले अपनी पीठ पर लादे रहता है. दोहरा बो झ उठाती हैं वे बेचारी. पतियों की तरह दफ्तर में काम करती हैं, उन की तरह कमाती हैं, घर का भी ज्यादा से ज्यादा बो झ उन्हीं पर रहता है. वे भी बच्चों, पति के साथ अपने लिए भी टिफिन तैयार करती हैं. शाम को औफिस से आई नहीं कि खाना बनाने की तैयारी.’’

‘‘दूर के ढोल सुहावने. जरा उन के पतियों को देखिए वे पत्नियों के साथ कैसे रहते हैं,

जा कर हालत देखिए. पत्नी का वे पूरा ध्यान रखते हैं. सुबह वह टिफिन तैयार करती है तो उन के पति बच्चों को स्कूल जाने के लिए तैयार करते हैं. खाना बनाने में मदद करते हैं. ज्यादातर ने खाना बनाने के लिए मेड रखी हैं,’’ श्वेता का बोलना जारी रहा. वह जानती थी कि ऐसे मामले में अभिषेक दूसरों की पत्नियों की तुलना हमेशा जानबू झ कर करता है, बावजूद यह मामला आते ही वह तिलमिला जाती.

‘‘आप तो बच्चों के स्कूल जाने के बाद भी बिस्तर पर अपनी नींद पूरी कर के उठते हैं. फिर उन औरतों के पतियों को जो भी खाने को मिला खा लेते हैं. आप की तरह उन्हें फरमाइशी खाना नहीं चाहिए. आज गुस्साए क्यों आप? खाने को ले कर ही न?’’

‘‘दिनभर खट कर कमाता हूं, सब का ध्यान रखता हूं, सब की जरूरतें पूरी करता हूं, इस के बाद खाना भी अपने घर में ठीक से न मिले?’’ अभिषेक ने किसी तरह यह तर्क ढूंढ़ा.

वैसे श्वेता सही कह रही थी.  झगड़े की वजह मामूली थी, खाने को ले कर ही आज यह बवाल शुरू हुआ था.

‘‘किस की जरूरतें पूरी करते हैं? आप की कमाई से मु झे क्या फायदा हुआ? कौन से मेरे शौक पूरे हुए? मेरे हाथ में एक भी पैसा देते हैं? मेरा कुछ मन हुआ तो अपने मन से कुछ खरीद नहीं सकती. हर बात के लिए आप के सामने हाथ तो पसारूंगी नहीं. शादी के 15 साल हो गए, क्या दिया आप ने? मैं दिनभर खटती हूं. बदले में 2 टाइम का खाना ही तो खाती हूं,’’ श्वेता ने जवाब दिया.

‘‘घर से कभी बाहर निकल कर ध्यान से देखो देश की 60% औरतें कैसे रहती हैं. उन के पास क्या है, यह देखने के बाद तुम्हें पता चल जाएगा कि तुम्हें क्या मिला है, तुम को मैं ने क्या दिया है. यह जो मकान है, गाड़ी है, और भी जो सुविधाएं मैंने आप लोगों के लिए बनाई वे कुछ नहीं है? यह सब मैंने अपने लिए तो किया नहीं. यह सब अपनी मेहनत से किया है. दहेज में तो मिला नहीं?’’

‘‘सब करते हैं. आप ने कौन सा बड़ा तीर मार दिया? शादी कर के आई थी तो आप के पास था ही क्या? मेरे आने के बाद ही तो यह सब आया. शादी के पहले ही पंडित ने कहा था कि तुम्हारे आने से तुम्हारे पति की संपत्ति बढ़ेगी.’’

यह भी एक जहर बु झा बाण होता है जिसे अभिषेक  झेल नहीं पाता. उसे यह चुभ जाता है कि मेरी वर्षों की रातदिन की सारी मेहनत को यह औरत अपनी भाग्य कुडंली सामने ला कर 1 मिनट में खत्म कर देती है.

मां ने एक बार इस के सामने कह क्या दिया कि मर्द की तरक्की पत्नी और बच्चों के भाग्य से ही होती है, श्वेता ने उसे ब्रह्म सूत्र की तरह पकड़ लिया. हर  झगड़े में या किसी के सामने होने वाली बातचीत में मां की इस बात का वह गुगली की तरह इस्तमाल करती है,’’ जब मैं यहां आई तो इन के पास था ही क्या?’’

श्वेता किचन में काम करते हुए अभिषेक की बातों का जवाब दे रही थी. एक बार उस का मन हुआ कि अभिषेक बोलता रहे, वह अब उस का जवाब नहीं देगी. पर सही में यह व्यक्ति तो मुंह में हाथ डाल कर बुलवाता है. वह यह जानती थी कि अगर वह चुप हो भी गई तो अभिषेक सोफे से उठ कर किचन में आ जाएगा, उसे उकसाना शुरू कर देगा, ‘‘चुप क्यों हो गई? अब जवाब क्यों नहीं देती. सारे तर्क खत्म हो गए?’’

जिस मुद्दे को ले कर  झगड़ा शुरू हुआ, वह निहायत मामूली था. दोपहर में श्वेता ने औफिस फोन कर अभिषेक से यह पूछ लिया कि रात में खाने में वह क्या बनाए. अकसर वह यह पहले भी पूछती रही. अभिषेक इस के जवाब में ज्यादातर यही कहता जो मन हो बना लेना. कभीकभी काम के बीच में आए इस तरह के सवाल पर  झल्ला भी जाता था. लेकिन आज उस ने बेसन की सब्जी बनाने को कह दिया था. यह उस की पसंदीदा सब्जियों में से एक थी.

रात में खाने टेबुल पर बैठा तो पहले से बेसन की सब्जी का मूड बना हुआ था. लेकिन

बेसन की सब्जी की जगह उसे कटहल की सब्जी मिली. उस ने बेसन की सब्जी के बारे में पूछा. अभिषेक को गिनचुन कर जो 2-3 सब्जियां पसंद नहीं थीं उन में कटहल भी थी. वह  झल्ला गया. श्वेता ने बेसन की सब्जी न बनने की जो वजह बताई, वह उस के गले नहीं उतरी. इसे भी वह सह लेता होता, लेकिन विकल्प के रूप में उसे जो सब्जी दी गई थी उस से बदन में आग लग गई. उसे लगा यह बात श्वेता को भी पता है कि कटहल उसे नापसंद है, फिर भी यह विकल्प उसे दिया गया.

श्वेता ने वजह बताई चूंकि घर में बेसन कम था, सब के लिए सब्जी पूरी नहीं पड़ती, इसलिए कटहल बना दिया. बस यह सुनते ही बच्चों की तरह अभिषेक उखड़ गया. यह मामला केवल सब्जी का नहीं रह गया. यह मामला घर में अभिषेक के महत्त्व, उस के प्रति श्वेता की सोच, एक पत्नी द्वारा पति की परवाह जैसे गंभीर विषय से जुड़ गया.

अभिषेक बगैर खाना खाए गुस्से में डाइनिंगटेबल छोड़ कर सोफे

पर बैठ गया था. वहीं से वाकयुद्ध में अपना मोरचा संभाले था. श्वेता जवाबी हमले के साथ घर के बचे काम भी समेट रही थी. अभिषेक ने खाया नहीं था, उसे बाकी बचे खाने के साथ बरतन में डाला, फिर फ्रिज में रखा. बाकी बरतनों को हटा कर सिंक में डाला. इस के बाद वह किचन की सफाई में लग गई थी. चूल्हे को पोंछ रही थी ताकि सुबह किचन देख कर महरी का मूड खराब न हो. पर इस सारे काम के बावजूद बोलने और अभिषेक पर हमले की रफ्तार में किसी तरह की कमी नहीं होने दी. कुछ साल पहले ही उस ने ठान लिया था कि अभिषेक जो चाहे वह बोल कर अब नहीं निकल सकता, अपनी गैरवाजिब बातें मु झ पर नहीं थोप सकता है. इसलिए जवाब देने के लिए तर्क खत्म होने लगते तो वह अभिषेक के तर्कों का ही इस्तमोल उस के खिलाफ करने लगती.

जिस तरह श्वेता ने बचा खाना समेट कर फ्रिज में रखा, उस से अभिषेक सम झ गया कि अब वह भी खाना नहीं खाएगी. तमाम  झगड़े के बावजूद जब वह ऐसे में श्वेता को बिना खाए बिस्तर पर जाते देखता, उसे तकलीफ होती. गुस्सा उड़ जाता. लेकिन कष्ट महसूस करने पर भी वह श्वेता से कुछ कह नहीं सकता. वह यह जानता था कि वह तो क्या, श्वेता के पिता भी अब आ जाएं तो वे भी उसे नहीं खिला सकते. ऐसी परिस्थितियों में कई बार उसे लगता फैसले लेने, उन पर टिके रहने पर जिस तरह श्वेता दृढ़प्रतिज्ञ रहती है, अगर सकारात्मक दिशा में वह ऐसे ही फैसला लेती तो अपनी और उस की जिंदगी बन सकती है.

मगर संबंधों में इस तरह से सोचना और कल्पना करना फुजूल की बातें हैं. श्वेता, वह खुद, सभी पतिपत्नी इतने ही सकारात्मक होते, सही तरीके से सोचते तो ज्यादातर घर, परिवार, यह समाज ही नहीं, सारी दुनिया स्वर्ग हो जाए. सदियों से कहा जाता रहा है, दुनिया की खुशी घर से ही शुरू होती है. कई रिश्तों में, कई स्तर पर होने वाले  झगड़ों की वजह ढूंढ़ें तो वह मामूली होती है, फिर भी इन  झगड़ों को ले कर थानेकचहरी में अपार भीड़ लगी होती है.

बच्चे पहले ही खा कर अपने कमरे में चले गए थे. वे इस  झगड़े के बीच अपने कमरे से नहीं निकले. उन्हें मालूम था कि मम्मीपापा की यह लड़ाई कम से कम आधा घंटा चलेगी. ऐसे मौकों पर उन को गुडनाइट कहने की पंरपरा वे दरकिनार कर देते हैं. उन की बहस शुरू होते ही दीप्ति तुरंत अपने लैपटौप में उल झ गई थी, अनुज अपने मोबाइल पर वीडियो गेम खेलने में व्यस्त हो गया.

अभिषेक और श्वेता के सारे तर्क खत्म हो चुके थे. बगैर तर्क या आरोप के इस अहिंसक लड़ाई को जबरन आगे खींचना दोनों के लिए मुश्किल था. अभिषेक बैडरूम में आ गया. कपड़े बदले और बिस्तर पर करवट बदल लेट गया. सब काम निबटाने के बाद श्वेता भी आई और बैड के दूसरे किनारे पर दूसरी तरफ करवट ले कर सो गई. बिस्तर पर आने के पहले श्वेता ने लाइट औफ कर दी. कमरे में अंधेरा हो गया. उन दोनों के दिल में भी कुछ नहीं बचा रह गया. कोई शिकवाशिकायत नहीं. जो थी उस की भड़ास बहस के जरीए निकल चुकी थी. उन की लड़ाई पहले चरण से निकल कर दूसरे चरण में पहुंच चुकी थी. इसे शीत युद्ध कह सकते है.

दूसरा चरण कम से कम 1 हफ्ते का होता है. खत्म करने का कोई बहाना नहीं मिला

तो ज्यादा भी खिंच जाता है. शीत युद्ध के दौरान दोनों के बीच बोलचाल बंद रहती है. दोनों का व्यवहार, कुछ जरूरी बात कहनी भी हुई तो लहजा बदल जाता है. अभिषेक को श्वेता से कुछ कहना रहता है तो ‘तुम’ की जगह अब ‘आप’ कह कर संबोधित करता है. यह बातचीत निहायत खास जरूरतों पर ही होती है. जैसे ‘आंधी आ रही है, बाहर कपड़े हैं उतार लीजिएगा,’ ‘रात में आप मेरा खाना मत बनाइएगा, बाहर डिनर है,’ ‘लाइट औफ कर दीजिए, सोना है.’

श्वेता का भी बात करने का सलीका बदल जाता. इस दौरान वह अभिषेक से यह नहीं पूछती कि आप का खाना निकालूं’ खाना परोस कर टेबल पर रख देती और अभिषेक को सूचना दे देती, ‘खाना टेबल पर लगा दिया हैं.’ इस अवधि में बगैर अभिषेक की तरफ देखे एक संदेश की तरह घर की जरूरतें बता देती.

‘महरी का वेतन देना है,’ ‘दीप्ति अपने स्कूल की पिकनिक पर जाना चाहती है,’ ‘कल के लिए घर में कोई सब्जी नहीं बची है.’

अपने  झगड़ों में, संदेशों के इस आदानप्रदान में वे बच्चों को भरसक इस से दूर रखने की कोशिश करते थे. ‘अपने पापा से कह दो’ या ‘अपनी मम्मी को बता दो’ जैसी परिपाटी से दोनों ने परहेज किया, बच्चों को कभी बीच में नहीं आने दिया.

आपसी कटुता तो जोरदार बहसवाजी कर के घंटे भर बाद ही खत्म हो जाती है लेकिन यह अहम, ईगो, स्वाभिमान, अभिमान जैसी जो चीजें होती हैं, इन की गिरफ्त से निकलना आसान नहीं होता. बहस में कटु से कटु बात से घायल करने की कोशिश की जाती है, कुछ समय के लिए ये कटु वचन दोनों को पकड़ भी लेते हैं लेकिन इन का असर जल्द ही चला जाता है. स्वाभिमान या ईगो का मामला जहां जुड़ता है, वह अपनी जल्दी पकड़ नहीं छोड़ता.

शीत युद्ध के लंबा खिंचने की एकमात्र वजह यही होती है. इसलिए इस शीत युद्ध की अवधि में आपस में बातचीत भले ही बंद हो, दोनों एकदूसरे का पूरा ध्यान रखते हैं.  झगड़े के 2 दिन बाद ही रविवार था. अभिषेक की छुट्टी थी. दोपहर का खाना खाने बैठा तो उस ने देखा बेसन की उस की मनपसंद सूखी सब्जी प्लेट में रखी है. रात में वह लैपटौप पर काम कर रहा था. बगैर उस के मांगे श्वेता ने कौफी का कप उस की मेज पर धीरे से रख कर बगैर उस की प्रतिक्रिया देखे वहां से चली गई.

श्वेता चौंक कर उठी. तब तक साइड टेबल पर चाय रख कर अभिषेक जा चुका था. उस ने भी चाय पीने के बाद अभिषेक को आवाज लगा कर ‘धन्यवाद’ कह कर आभार जताने की औपचारिकता से परहेज किया.

कई सालों से ठीक इसी तरह से होता आया है मानो इस  झगड़े की पटकथा पहले कभी

लिख दी गई थी. शादी के बाद उस पटकथा के आधार पर उन्हीं घिसेपिटे संवादों के साथ समयसमय पर दोनों रिहर्सल करते रहे हों.

मध्यवर्गीय परिवारों में पतिपत्नी के  झगड़े सामान्यतया इसी तरह के होते हैं. सभी को इन के कारण और नतीजे मालूम होते हैं, सभी एक नाटक के पात्र की तरह अपनी भूमिका उन्हीं संवादों को सालों दोहराते रहते हैं, पर कोई उस की पटकथा बदलने की कोशिश नहीं करता. दोनों में से एक की तरफ से कोशिश भी हुई तो दूसरा अपनी पुरानी भूमिका या चरित्र बदलने को तैयार नहीं.

इस वर्ग के दांपत्य जीवन में  झगड़ों के कई मुद्दे विवाह के बंधन में बंधने के कुछ समय बाद अपना सिर उठाना शुरू कर देते हैं. इन में आर्थिक अभावग्रस्तता भी एक मुद्दा होती है. अभाव रोजीरोटी को ले कर नहीं होता. मध्यवर्ग की जरूरतें, आकांक्षाएं, अपने से संपन्न लोगों से प्रतिस्पर्धा की भावनाएं, उन की खुद की आमदनी के मुकाबले सदैव बढ़ती रहती हैं. जितनी आय वह बढ़ाता है उतनी ही उस की इस अंधी दौड़ की सीमा बढ़ती जाती है. उस का छोर नहीं रहता और जब यह पूरी नहीं होती तो तनाव उत्पन्न करती है. कमी हमेशा बनी रहती. उन्हें लगता जिस चीज के वे हकदार हैं वह मिल नहीं पाई. किताबों और फिल्मों के किरदार की तरह अपनी जिंदगी में खुशी के जो पल ढूंढ़ते रहते हैं, वे भी नहीं मिलते. इस का असर पतिपत्नी के संबंधों पर भी पड़ता है.

इस के अलावा बच्चों का लालनपालन, उन की शिक्षा, रिश्तेनातेदारी, ससुरालमायके के संबंध, घरगृहस्थी से जुड़े कर्तव्य, दोनों इन सब में फंस जाते हैं. इन में एकदूसरे को संतुष्ट करना इन पतिपत्नियों के लिए आसान नहीं होता और फिर एकदूसरे पर दोषारोपण का दौर शुरू हो जाता है.

प्यार सभी को चाहिए लेकिन मिलेगा कैसे, इसे सम झने की कोशिश नहीं होती. एकतरफा

चाहत में उल झ कर रह जाते हैं. कभीकभी वे इस मरीचिका में भी फंस जाते हैं कि उस की पत्नी या पति के सिवा दुनिया में सभी स्त्रियां, सभी पुरुष से उन्हें प्यार मिल सकता है. ऐसी स्थिति में कभीकभार दोनों के बीच तीसरे का प्रवेश हो जाता है.

उच्चवर्ग की तरह मध्यवर्ग में दोनों ही मियांबीवी का अपना अलग स्वतंत्र दायरा, जिसे आजकल ‘स्पेस’ कहा जा रहा है, कतई नहीं होता. इस का अर्थ जब तक इन्हें नहीं मालूम था, तब तक कुछ गनीमत थी. जब से मध्यवर्गीय परिवारों की पत्नियां आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने लगी हैं, नौकरियां कर रही हैं, उच्चवर्ग की महिलाओं की नकल में इन्हें भी स्पेस की दरकार हो गई है, जबकि व्यावहारिक तौर पर इस वर्ग में इस स्पेस या स्वतंत्र दायरे का बनना संभव नहीं है क्योंकि शादी के कई सालों के बाद भी उच्चवर्ग की तरह इस वर्ग के पतिपत्नी एकदूसरे से भावनात्मक रूप से अपने को एकदम अलग नहीं कर पाते.

चाहत, प्यार, समर्पण की भावना उन के बीच तनाव और  झगड़ों के बीच भले ही दब जाए पर इन सब चीजों की उम्मीद उन में हमेशा बनी रहती है. उन के  झगड़ों के बावजूद यह ग्रंथि भी कहीं न कहीं काम कर रही होती है. उन का लालनपालन ऐसे माहौल में होता है, ऐसे परिवार से निकल कर वे आते हैं जहां इन सब की जरूरत उन्होंने देख रखी होती है, शादी के जरीए सामान्यत: एकदूसरे से वे इन उम्मीदों के साथ ही बंधते हैं. इसे ‘मध्यवर्गीय स्वप्न’ भी कह सकते हैं. विवाह के बाद गृहस्थी के तनाव में जब यह कहीं गुम होता रहता है तो इसे पाने की बेचैनी बढ़ती जाती है, अनचाहा क्रोध दिलोदिमाग पर हावी होने लगता और इस में परिस्थितियों के सच को सम झने की जगह दोनों एकदूसरे की गलतियों को ढूंढ़ने लगते हैं.

इस के विपरीत उच्चवर्गीय परिवारों में पतिपत्नी के बीच विवाह के बाद कुछ समय बिताने, हनीमून अवधि का उन्माद खत्म होने के उपरांत एक सीमा रेखा खिंच जाती है, एक दायरा बन जाता है. क्लब, किट्टी पार्टी, अपना सर्किल, दोनों ही अपने दायरे में मस्त, सुखी रहते हैं. इसे ही स्पेस कहा जाने लगा है. इन में से किसी ने एकदूसरे की सीमा में अनाधिकृत तौर पर प्रवेश करने की कोशिश की तो ऐसी परिस्थिति में हंगामा होना तय है.

निजी जीवन में एकदूसरे से एकदम अलग परिधि में जी रहे ये पतिपत्नी पार्टियों में जरूर एकदूसरे का हाथ पकड़ कर जाते हैं, एकदूसरे को चूमते हैं, साथ डांस करते हैं, सब के सामने खुद को सर्वोच्च जोड़ी साबित करने की पूरी कोशिश करते हैं.

वैसे भी उच्चवर्ग के पतिपत्नी के बीच घरेलू कामकाज, एकदूसरे के मिजाज को देखने, बच्चों को संभालने जैसी बेवकूफियों की वजह से आपसी रिश्तों में किसी तरह का मलाल कतई नहीं उत्पन्न होता. इन सब बेवकूफियों के लिए नौकरचाकर और कई तरह की व्यवस्थाएं बनी होती हैं. दोनों में से कोई एक मध्यवर्गीय परिवार और संस्कार के साथ अगर आया है, किसी एक में मध्यवर्गीय दंपतियों की तरह किसी पार्टनर में प्रेम, चाहत, एकदूसरे के प्रति समर्पण जैसी उम्मीदों ने अंगड़ाई लेनी शुरू की तो निश्चित तौर पर इस की अंतिम परिणति तलाक तक पहुंच जाती है.

श्वेता और अभिषेक के बीच चल रहे शीत युद्ध का 7वां दिन था. अकसर इस शीत युद्ध के बाद अभिषेक की पहल पर ही संवाद शुरू होता था. श्वेता ने शायद ही इस मामले में कभी पहल की हो. दरअसल, उसे विश्वास होता था कि ज्यादा दिन अभिषेक बगैर उस से बात किए नहीं रह पाएगा. इसलिए वह अपनी तरफ से शिकायत खत्म हो जाने के बाद भी पहल नहीं करती.

अभिषेक को भी यह मालूम था कि श्वेता इस मामले में उसे कमजोर सम झती है. पर वह यहां मजबूती दिखा कर कोई प्रतियोगिता जीतना नहीं चाहता था. इस मामले में उस का ईगो ज्यादा दिन नहीं काम करता. वह घर में श्वेता के साथ प्रेम से रहना चाहता है. वह सम झता है कि बच्चों पर इस का असर पड़ता है. लेकिन वह अपने गुस्से से मजबूर था. उस पर उस का काबू नहीं था. कभी भी नहीं रहा. जब श्वेता उस की बातों को हलके तरीके से लेती या उस के कहे की उपेक्षा करती तो वह सहन नहीं कर पाता है. 4 लोगों के सामने भी वह श्वेता पर भड़क जाता है,यह सोचे बिना कि इस का उस पर क्या असर पड़ेगा, जिन लोगों के सामने बिगड़ा है वे क्या सोचेंगे.

श्वेता को खुद लगता था कि वह काफी बदल चुकी है. 15 साल पहले

अभिषेक के साथ जब दिल्ली आई थी तो वह दूसरी श्वेता थी. उस श्वेता की भावनाएं दूसरी थीं. कुछ अरमान थे सीने में. ऐसे रहेंगे, घर सजाएंगे, गृहस्थी बसाएंगे, मस्ती करेंगे, लेकिन धीरेधीरे सब अरमान 1-1 कर कहीं दफ्न हो गए. कुछ तो घरगृहस्थी के दबाव में और कुछ अभिषेक के स्वभाव की वजह से. वह यह सम झती थी कि अभिषेक ने सबकुछ हमारे लिए किया, पूरा खयाल रखा, मु झे मानता भी है, पर उस ने यह कभी नहीं जानना चाहा कि मैं क्या चाहती हूं. हर जगह, हर मामले में अपनी मरजी को ऊपर रखा. मु झे क्या पहनना है, कैसे रहना है, घर कैसे रखा जाएगा, परदे कैसे रहेंगे, बैड किधर रहेगा, हर चीज पर इन्होंने अपनी मरजी थोपी. शादी के तुरंत ही बाद जिस तरह का उस का गुस्सा देखा, छोटी बातों पर बिगड़ते देखा, अपनी बात सामने रखने की जो इच्छा थी वह अपनेआप खत्म हो गई.

श्वेता को यह लगता था अभिषेक केवल अपना फैसला थोपना चाहता है. कहीं जाना है तो कौन सी साड़ी पहननी है, किस तरह का मेकअप चाहिए, बाल किस तरह बंधे होने चाहिए, सबकुछ अभिषेक ही तो देखता था. कहां जाना है, कहां नहीं सब में अभिषेक का ही फैसला चलता रहा. उसे याद आया शादी के 1 हफ्ते बाद ही अभिषेक के एक मित्र ने दोनों को डिनर पर बुलाया था. अभिषेक औफिस से आया तो वह साड़ी पहन कर तैयार बैठी थी ताकि देर न हो. अभिषेक उसे तैयार देख खुश हुआ. उस ने भी कपड़े बदले. थोड़ी देर बाद दोनों बसस्टौप पर आ गए. सड़क की स्ट्रीट लाइट की रोशनी में अभिषेक बारबार उसे देखे जा रहा था. अचानक उसने उस से धीरे से कहा कि घर चलो, साड़ी ठीक नहीं लग रही है. बदल लो. उस ने हलका सा ऐतराज भी किया क्योंकि साड़ी ही नहीं, ब्लाउजपेटीकोट सब बदलना पड़ता. उसे साड़ी अभी ठीक से पहनने आती भी नहीं थी. दूसरी साड़ी बदलने में काफी मेहनत करनी पड़ती. पर अभिषेक नहीं माना. घर ला कर श्वेता से उस ने साड़ी बदलवाई. इस के बाद वे डिनर पर पहुंचे. हालांकि इस सब में 1 घंटा की देर हुई.

मगर वह यह नहीं सम झ पाई कि अभिषेक ने अपने वर्चस्व बनाने के लिए ऐसा नहीं

किया. श्वेता सुंदर थी, अभिषेक चाहता था वह और सुंदर दिखे. उसे लगता था कि श्वेता छोटे शहर से आई है, दिल्ली के फैशन और रस्मोंरिवाज से अनजान है, बस वह अपने अनुसार उसे हर तरह से ढालने में लग गया. श्वेता ने उसे गलत सम झा. उस की इस भावना को नहीं सम झा. उसे लगा उस के पहननेसवंरने में भी अभिषेक अपनी मरजी थोपता है, बगैर श्वेता के स्वभाव, उस के मनोविज्ञान को जाने. उस ने श्वेता की भावनाओं को, उस के जिज्ञासाओं को, उस की अभिलाषाओं को कभी सम झने की कोशिश ही नीं की. अपने नजरिए से उसे गलतसही बताता रहा. जबकि श्वेता शादी के बाद एक तितली की तरह अपने पति के साथ कुछ समय तक आसमान में स्वच्छंद उड़ना चाहती थी, एक प्रेमिका की तरह अपने पति से अपनी जिद को मनवाना चाहती थी, अपनी इच्छाओं को पूरा करना चाहती थी, घर के फैसलों में भागीदारी चाहती थी, रिश्ते में रोमांस चाहती थी लेकिन उस की इन गरम उमंगों पर अभिषेक के स्वभाव ने बर्फ की सिल्ली रखने का काम किया.

अभिषेक ने काफी समय बाद जब यह सब महसूस किया, निश्चित नतीजे पर पहुंचा तब तक देर हो चुकी थी. श्वेता का स्वभाव नामालूम एक उस मोड़ तक पहुंच गया था, जहां उस की भावनाएं एक चट्टान में बदल गई थीं. उस चट्टान को पिघलाना अब आसान नहीं था.

रात 8 बजे जब अभिषेक घर आया तो दरवाजे पर ही उसे घर के भीतर से कई लोगों की

आवाजें और हंसी की आवाज सुनाई दी. उस ने कालबैल बजाई. अंदर से श्वेता की आवाज आई, ‘‘लगता है वे आ गए?’’

भीतर पहुंचा तो उस ने देखा उस की देहरादून वाली बूआजी, फूफाजी, उन का बेटा, नई बहू, बेटी सभी बैठे हैं. टेबल पर नमकीन, मिठाई और पकौड़ों की प्लेट है, सभी चाय पी रहे थे. श्वेता ने उस की गैरमौजूदगी में शीत युद्ध के बावजूद उस के रिश्तेदारों की खातिरदारी में कोई कमी नहीं छोड़ी थी.

‘‘आओ बेटा, समय पर आ गए, डेढ़ घंटे से हम तुम्हारा ही इंतजार कर रहे थे,’’ अभिषेक को देखते ही बूआ बोलीं.

बूआफूफाजी का पैर छू कर अभिषेक उन के साथ बैठा ही था कि बूआजी ने श्वेता की तारीफ के पुल बांधने शुरू कर दिए, ‘‘बहुत अच्छी बहू मिली है तुम्हें अभिषेक. इतनी देर तक तुम्हारी कमी महसूस ही नहीं होने दी. तुम्हारी शादी में भीड़भाड़ में ही इस से मिली थी, लेकिन इस ने तुरंत पहचान लिया…’’ बूआ आगे भी बोलती गईं.

मन्नो बूआ अभिषेक की सगी बूआ नहीं थीं पर शादी के पहले अकसर बनारस उस के घर आती रहती थीं. रक्षाबंधन में पिताजी को राखी भेजना कभी नहीं भूलीं. बाद में उन से उतनी नजदीकियां नहीं रह गईं. बूआजी का बेटा गुरुग्राम में रहता था, अभिषेक देखते ही सम झ गया कि नई बहू उसी की पत्नी है.

‘‘माफ कीजिएगा बूआ शादी में नहीं आ पाए. बहुत अच्छा हुआ कि आप सभी लोग आज यहां आ गए,’’ अभिषेक ने औपचारिकता निभाई, ‘‘अब खाना खा कर ही जाइए. सादा खाना, जल्दी से बन जाएगा.’’

‘‘नहींनहीं बेटा, खाना वहां मेड को बोल कर आए हैं. दूर है, इसलिए मालूम था देर तक नहीं रुक पाएंगे. श्वेता तो कई बार खाने के लिए पूछ चुकी है,’’ इस बार फूफाजी बोले.

उन लोगों के जाने से पहले श्वेता ने इशारे से अभिषेक को बुलाया. अभिषेक सम झ गया उसे क्यों बुलाया जा रहा है. पहले भी ऐसा होता रहा है. भीतर दूसरे कमरे में पहुंचते ही श्वेता ने याद दिलाया, ‘‘नई बहू है. पहली बार यहां आई है. शगुन देना पड़ेगा.’’ अभिषेक ने

5 सौ का नोट निकाल कर श्वेता से पूछा, ‘‘इतना ठीक है?’’

श्वेता ने 5 सौ रुपए और मांगे, साथ में आई बूआजी की बेटी को देने के लिए.

थाली में चावल, सिंदूर, गुड़, हलदी, 5 सौ के नोट के साथ श्वेता ने 1 रुपए का सिक्का रखा, बहू का मुंह पूरब की तरफ कर पहले टीका किया, सिंदूर लगाया और फिर उस के आंचल में चावल डाले. बूआजी का चेहरा इन सब के बीच खुशी से चमक रहा था. अभिषेक ने नोटिस किया कि वे श्वेता की पूरी तरह से प्रशंसक बन चुकी हैं.

मेहमानों को छोड़ने दोनों ही नीचे उन की गाड़ी तक गए. चेहरे पर ढेर सारी हंसी के साथ उन्हें विदा किया लेकिन जैसे ही उन लोगों की कार आगे बढ़ी, दोनों के चेहरों पर फिर वही गंभीरता आ गई. शीत युद्ध जो मेहमानों की वजह से कुछ देर के लिए स्थगित था, उन के जाने के बाद फिर से प्रभावी हो गया.

दोनों ही बगैर एकदूसरे से बात किए, चुपचाप लिफ्ट में फिर घर में आ गए. अगर

परिस्थितियां सामान्य होतीं तो दोनों इस समय जाने वाले मेहमानों के अचानक आने, उन के व्यवहार को लेकर विवेचना कर रहे होते. नई बहू के बारे में बातें हो रही होतीं, अभिषेक की तरफ से यह ऐतराज भी जताया गया होता कि श्वेता को बूआजी की बेटी को विदाई के पैसे देने की कोई जरूरत नहीं थी. हो सकता इस बयान में एक वाक्य वह यह भी जोड़ देता कि पता नहीं कब तुम्हें पैसे की कीमत और उस का सही उपयोग करने का पता चलेगा. यह भी हो सकता था श्वेता की तरफ से यह जवाब मिल जाता कि आप के रिश्तेदारों पर ही तो खर्च किया है, अपनों पर तो नहीं और नए सिरे से बहस शुरू हो जाती.

श्वेता ने जल्दीजल्दी खाना बनाया. डिनर करने और किचन का काम समेटने के बाद जब श्वेता बिस्तर पर पहुंची तो 11 बज चुके थे. उस ने लाइट बु झा दी. उसे लगा अभिषेक सो गया होगा. लेकिन थोड़ी देर बाद ही अंधेरे में उसे अभिषेक की आवाज सुनाई दी, ‘‘श्वेता.’’

श्वेता चुप रही. कुछ नहीं बोली, ‘‘इतने दिन हो गए हैं. इस तरह घर में चुपचाप रहना, एकदूसरे से बात न करना आप को अच्छा लगता है क्या?’’ अभिषेक ने धीरे से कहा.

श्वेता कुछ जवाब देना चाहती थी पर चुप रही. वह सोच रही थी कि न बोलो तो इन को शांति अच्छी नहीं लगती, बोलो तो लड़ाई होती है. हमारे साथ रहना भी ये नहीं चाहते, 50 शिकायतें हैं, हमारे बिना इन का मन भी नहीं लगता. उसे लगा लोग स्त्रियों के बारे में गलत कहते हैं. सच तो यह है कि पुरुषों के मन की थाह पाना आसान नहीं है.

‘‘हम लोग एकदूसरे को चाहते थे, चाहते हैं, फिर हम इतना लड़ते क्यों हैं?’’ अजीब सवाल था यह. श्वेता इस बार भी कुछ नहीं बोली.

‘‘साथ रहना है एक छत के नीचे. हमेशा एकदूसरे से बात बंद तो हो नहीं सकती. फिर हम लोग छोटीछोटी बातों पर बहस क्यों करते हैं? एकदूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश क्यों

करते हैं?’’

‘‘ताली दोनों हाथों से बजती है. आप की गलती नहीं रहती क्या?’’ इस बार श्वेता से चुप नहीं रहा गया.

‘‘मैं नहीं कहता कि मेरी गलती नहीं रहती पर मु झे काफी समय से लग रहा है कि तुम मेरी उपेक्षा करती हो, तुम्हारी उपेक्षा मु झे बरदाश्त नहीं होती. मैं तुम्हें अभी भी उतना ही चाहता हूं,’’ अभिषेक ने साइड में रखा टेबललैंप जला लिया. अंधेरे में बगैर श्वेता का चेहरा देखे उस से बात करने में उसे दिक्कत महसूस हो रही थी.

‘‘शादी से पहले मेरा और तुम्हारा एक अलग अस्तित्व था. शादी के बाद मेरा ‘मैं’ तुम्हारा ‘तुम’ मिल कर ‘हम’ बने. इस ‘हम’ का अस्तित्व कब और कैसे खत्म हो गया, मैं और तुम में फिर से कैसे बंट गया, कभी सोचते हो?’’

‘‘क्योंकि आप ‘हम’ में अपने मैं को कभी नहीं भुला सके. अपना मैं आप ने हमेशा कायम रखा. बस यही चाहा मैं अपना अस्तित्व आप के ‘मैं’ में समाहित कर लूं, अपना अस्तिव भूल जाऊं. शुरू में आप प्यार भले ही करते थे पर उस समय भी आप ने मेरा कभी खयाल नहीं रखा. यह कभी नहीं देखा कि मैं क्या चाहती हूं,’’ श्वेता ने गंभीरता से जवाब दिया.

‘‘कुछ हद तक सहीं होगा यह. पर यह पूरा सच नहीं है,’’ अचानक अभिषेक को लगा कि कहीं श्वेता ने इधरउधर का जवाब दे दिया तो फिर से बहस शुरू हो जाएगी. अत: उस ने बात को मोड़ने के लिए कहा, ‘‘दशहरी आम आप ने खाए? मैं कल ले कर जो आया था.’’

‘‘नहीं. आज के लिए सोचा था. पर बूआजी आ गईं.’’

‘‘मैं हर सीजन की शुरुआत में आम लाता हूं इसलिए कि तुम्हें पसंद हैं.’’

‘‘मैं जानती हूं. इतना मैं भी सम झती हूं. फिर आप गलती ही क्यों करते हैं, लड़ते क्यों हैं?’’ श्वेता ने बच्चों की तरह सवाल किया.

‘‘क्या यह नहीं हो सकता हम दोनों इस बात की पूरी कोशिश करें कि अपनी पुरानी गलतियों को न दोहराएं? गलती किसी की भी हो, दूसरा उसे तुरंत टोक दे इस बारे में. गलती करने वाला मान जाए. क्या हम दोनों एक बार फिर से पहले की तरह नहीं रह सकते?’’ अभिषेक ने आदर्श दांपत्य जीवन की शर्तों को सामने रख दिया.

‘‘क्या ऐसा हो सकता है?’’ श्वेता ने पूछ लिया, ‘‘आप अपनी गलती कभी मानेंगे?’’

‘‘मैं नहीं कह सकता. लेकिन कोशिश करूंगा अगर तुम भी उसी ईमानदारी से साथ दो. मेरे लिए मुश्किल रहा है दूसरों की बात सुनना या मानना, इस के पीछे मेरा मैं नहीं होता, ईगो नहीं होता. तुम इसे मानोगी नहीं मैं जानता हूं पर तुम्हारे लिए, परिवार के लिए, घर की शांति के लिए मु झे कोशिश तो करनी ही पड़ेगी.’’

श्वेता चुप हो गई. उसे विश्वास नहीं हो पा रहा था कि अभिषेक जो कह रहा है उसे वह कर पाएगा. पर उसे यह महसूस हुआ कि इस समय जो वह कह रहा है वह पूरी ईमानदारी से कह रहा है. दिल से कह रहा है. वह चाहता है कि सबकुछ ठीक हो. उस के लिए वह अपने स्वभाव से सम झौता करने को तैयार है. सफल होता है या नहीं अलग बात है. सोच ने सकारात्मक रास्ता पकड़ लिया था, अभिषेक के स्वभाव में उस ने बनावटीपन कभी नहीं देखा, भले मैं  झगड़े में उस की बात न मानूं. वह केवल उसी के साथ नहीं बल्कि सब के साथ ऐसा ही रहा, अपने इस स्वभाव पर कभी अफसोस भी नहीं किया. पर मेरे लिए वह खुद को बदलने, कोशिश करने की बात इस समय ईमानदारी से कह रहा है, यह बड़ी बात है. दूसरों से अलग वह मु झे महत्त्व दे रहा है. मु झे दूसरों से अधिक मानता तो है ही.

मगर श्वेता कुछ बोली नहीं. अभिषेक को लगा, उस के पास अपनी भावनाओं को जताने

के लिए इस से ज्यादा शब्द अब नहीं बचे हैं. श्वेता का जवाब न पा कर उसे निराशा हुई. वह टेबललैंप का स्विच औफ कर सोने की कोशिश करने लगा.

2 मिनट के बाद ही श्वेता करवट बदल कर अभिषेक से चुपचाप सट गई. शादी के बाद ऐसा बहुत कम हुआ है जब श्वेता खुद अपना किनारा छोड़ अभिषेक के पास आई हो. शीत युद्ध के दौरान तो ऐसा होने का सवाल ही नहीं है.

अभिषेक के दिल की धड़कनें रुक सी गईं. उसे श्वेता के इस व्यवहार पर आश्चर्य हुआ. उस ने कोई हरकत नहीं की. श्वेता की गरम सांसों का मीठा स्पर्श वह अपनी पीठ पर महसूस कर रहा था. बिना करवट बदले उस ने पीछे हाथ बढ़ा कर श्वेता के बाएं हाथ को पकड़, अपनी कमर पर लपेट लिया. श्वेता उस से और सट गई, अपना गाल अभिषेक की पीठ से सटा लिया.

लेखक-   प्रदीप श्रीवास्तव

Long Story in Hindi

Satire Story: श्वान प्रेमियो तुम्हारा कोटीकोटी नमन

Satire Story: ‘‘जो कुत्तों के भूंभूं से परेशान न हों वही सभ्य और सच्चे पड़ोसी,’’ नमन के घर के दरवाजे पर चिपका यह स्टिकर हर आनेजाने वाले का ध्यान खींचता है. दरअसल, नमनजी अपने कुत्तों को तो नियंत्रित नहीं कर सके, उलटा उन्होंने अपने पड़ोसियों के लिए यह उपदेश वाक्य स्टीकर पर लिख कर चिपका दिया.

गुरुग्राम के सब से पौश कहे जाने वाले इलाके की सब से ऊंची सोसाइटी (ऊंची सोसाइटी से तात्पर्य बहुमंजिला इमारत से नहीं बल्कि इस में रहने वाले लोगों की उच्च शिक्षा, उच्च जीवनशैली इत्यादि से भी है) सब से ऊंचे फ्लोर पर नमनजी अपने प्यारे, मासूम 3 अलगअलग विदेशी नस्ल के कुत्तों टौमी, जैकी एवं रौकी के साथ मस्त अकेली जिंदगी काट रहे थे.

एक दिन उन के सामने के खाली पड़े फ्लैट में अमनजी अपनी पूरी फैमिली के साथ रहने आ गए. मुश्किल से सालभर नहीं हुआ अमनजी की शिकायतों से नमन परेशान हो उठे. अमनजी को हमेशा कुत्तों के दिनरात भूंकने से शिकायत रहती और वे अकसर उन के दरवाजे की घंटी बजा कर उन्हें कुत्तों को शांत रखने की हिदायत देते. कभी अमन के बच्चों का ऐग्जाम होता तो कभी किसी की तबीयत खराब. ऐसे में पड़ोसी के घर से आ रही कुत्तों के भूंकने की आवाजों से उन की परेशानी और बढ़ जाती. लाख शिकायतों के बाद भी नमनजी के घर से आने वाली कुत्तों के भूंकने की आवाजें बदस्तूर जारी रहतीं. उन के घर में 3 अलगअलग विदेशी नस्लों के कुत्तों का आपस में एकदूसरे पर भूंकना, एकदूसरे पर गुर्राना पूरी बिल्डिंग में गुंजायमान रहता. उन का एकदूसरे पर भूंकना, गुर्राना, एकदूसरे पर  झपटना ठीक वैसे ही होता जैसे दुनिया के बड़ेबड़े देशों के राष्ट्राध्यक्षों की आपसी तूतूमैंमैं और  झगड़े इन दिनों हो रहे हैं.

तीनों कुत्ते अपनीअपनी नस्ल की श्रेष्ठता को साबित करने के लिए एकदूसरे से ठीक उसी प्रकार भिड़े रहते, जिस प्रकार इंसान आजकल अपनेअपने धर्म की श्रेष्ठता को साबित करने में लगे रहते हैं. एक छत के नीचे 3 अलगअलग नस्ल के कुत्तों से आपसी भाईचारा एवं शांति की उम्मीद भला कैसे रखी जा सकती है, जबकि अलगअलग धर्म, जाति के इंसानों से यह उम्मीद नहीं रखी जा सकती, जबकि कुत्ता तो आरंभ से ही इंसानों की संगति में ही विकसित हुआ है.

कहते हैं कुत्ते और मनुष्य का रिश्ता काफी पुराना है शायद इतना कि जितना एक

इंसान का इंसान से है. प्राचीनकाल में जब इंसान के पूर्वज और कुत्तों के बापदादा यानी ‘भेडि़या’ के बीच दोस्ती शुरू हुई तब इंसान के पूर्वज गुफाओं में रहते थे तथा कुत्तों के बापदादा यानी ‘भेडि़या’ खाने के टुकड़े के लिए इंसान के इर्दगिर्द मंडराता रहता था. ऐसे में इंसानों को लगा कि अरे यह तो बुरा नहीं है, रात को जंगली जानवर से बचाने के काम आएगा और उन्होंने उसे पालतू बना लिया.

एक आनुवंशिक शोध के अनुसार कुत्तों की उत्पत्ति 15 हजार से 40 हजार साल पहले यूरोप, मध्य पूर्व और पूर्वी एशिया में भेडि़यों की अलगअलग प्रजातियों से हुई. इंसान ने भेडि़यों को पालतू बनाया क्योंकि इन्हें शिकार और सुरक्षा में मदद चाहिए थी. बदले में भेडि़यों को खाना और आश्रय मिला. लेकिन आज जब लोग सोसाइटीज में रहते हैं जहां उन की सुरक्षा के लिए 24 घंटे सुरक्षा गार्ड होते हैं इंसानों को कुत्ते पालने की कोई खास आवश्यकता नजर नहीं आती. कुत्तों को भी खाना ढूंढ़ने के लिए इंसानों पर निर्भर रहने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है. फिर भी लोग कुत्ते पालते हैं जबकि इस की कोई अनिवार्यता नहीं. हालांकि लोग इसे कुत्ते के प्रति प्रेम के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जबकि यह कई बार इंसानों के तथा कथित कुत्ता प्रेम से अधिक स्टेटस सिंबल की तरह दिखता है. यदि ऐसा नहीं है तो भारत जैसे देश में जहां पहले से देशी कुत्ते गलियों में भटकते हैं लोग जरमन शेफर्ड, लैब्राडोर और पग्ग जैसी महंगी विदेशी नस्लों के ही दीवाने क्यों हैं?

एक अनुमान के अनुसार, भारत में पालतू जानवरों का बाजार 2023 में 1,200 करोड़ रुपए का था, जिस की 2028 तक 2000 करोड़ रुपए तक पहुंचने की उम्मीद है. एक शुद्ध नस्ल के कुत्ते का पिल्ला खरीदने की लागत 20 हजार से ले कर 2 लाख रुपए तक होती है और यह कीमत नस्ल वंशावली और ब्रीड पर निर्भर करती है. उदाहरण के लिए लैब्राडोर की कीमत 15 हजार से 50 हजार की होती है, तो जरमन शेफर्ड 20 हजार से 80 हजार रुपए की कीमत में आता है, फ्रैंच बुलडौग तो 50 हजार से 2 लाख रुपए तक की कीमत में आता है. साफ जाहिर है कि इतने महंगे कुत्ते लोग सिर्फ स्टेटस सिंबल के लिए ही पालते होंगे न कि कुत्ते के प्रेम में. लोग सिर्फ इंस्टाग्राम पर रील्स डालने के लिए या बस ‘कूल’ दिखने के लिए भी कुत्ते पालते हैं.

इन खर्चों के अतिरिक्त पिल्ले को घर लाने से पहले टीकाकरण (5 हजार से 10 हजार रुपए) तक का खर्च आता है.

माइक्रोचिप, यह एक रेडियो फ्रीक्वैंसी आइडैंटिफिकेशन (एफआई डी) डिवाइस होता है जो चावल के दाने के आकार का होता है. इस में एक विशिष्ट पहचान संख्या संग्रहित होती है. यह चिप पशु चिकित्सक या कुत्ते के मालिक द्वारा एक आरएफआईडी स्कैनर से पढ़ी जा सकती है. चिप में एक अद्वितीय 15 अंकीय कोड होता है जो एक राष्ट्रीय डेटाबेस में मालिक के नामपते और फोन नंबर से जुड़ा होता है. इस चिप को पशु चिकित्सक या पेशेवर माइक्रोचिप के द्वारा कुत्ते की पीठ के ऊपरी हिस्से में या गरदन के पास इंजैक्शन की तरह लगाया जाता है, जिस का खर्च (2 हजार से 5 हजार रुपए) होता है.

कुत्तों के भोजन का खर्च भी विशेष ही होता है. यह खर्च प्रतिमाह 2 हजार से

5 हजार रुपए का खर्च होता है. वहीं कुछ मालिक अपने कुत्तों को घर का बना भोजन या विशेष डाइट जैसे बार्फ डाइट देते हैं, जिस की लागत और भी अधिक होती है.

अब यदि कुत्ते पाले हैं तो उन के स्वास्थ्य की देखभाल की भी आवश्यकता पड़ेगी ही. नियमित टीकाकरण डीवर्मिंग और पिस्सू टिक  उपचार के लिए सालाना 10 हजार से 20 रुपए खर्च होते हैं. अगर कुत्ते को  कोई गंभीर बीमारी निकली जैसे, हिप डिस्प्लेशिया तो सर्जरी और इलाज की लागत लाखों में जा सकती है.

कुत्तों के सौंदर्य और देखभाल की भी जरूरत पड़ती है. इन का ग्रूमिंग सत्र 500 से 2 हजार प्रति सत्र, नहलाने के लिए विशेष शैंपू और अन्य सामान जैसे कालर, पट्टा खिलौने भी खर्च में इजाफा करते हैं. कुछ मालिक अपने कुत्तों  के लिए डिजाइनर कपड़े और ऐक्सैसरीज भी खरीदते हैं. प्रशिक्षण और बोर्डिंग की भी जरूरत पड़ती है. कई मालिक अपने कुत्तों को आज्ञाकारिता प्रशिक्षण के लिए भेजते हैं जिस की लागत 10 हजार से 50 हजार हो सकती है. छुट्टियों के दौरान पैट बोर्डिंग की लागत प्रतिदिन 500 से 2 हजार रुपए तक होती है.

ये सारी तमाम बातें यही सिद्ध करती हैं कि कुत्ते पालने के पीछे कुत्ता प्रेम कम और स्टेटस सिंबल अत्यधिक बन गया है. सोशल मीडिया पर कुत्तों की तसवीर उन के लिए विशेष जन्मदिन पार्टियों और महंगे पैट स्पा का चलन भी बढ़ रहा है. यह एक प्रकार की सामाजिक प्रतिस्पर्धा बन गया है, जहां लोग अपने पालतू जानवरों पर अधिक खर्च कर के अपनी समृद्धि प्रदर्शित करते हैं. कुत्तों के जन्मदिन पर तो कई लोग विशेष तरह का केक जैसे 1000 से 5 हजार और थीम आधारित पार्टियां जिन का खर्च 10 हजार से 50 हजार रुपए पड़ता है आयोजित करते हैं.

कुत्ता प्रेम के दिखावे की इस होड़ में यह खर्च मध्यवर्ग के लिए कई बार बो झ सा बन जाता है. कई लोग बिना पूरी योजना के कुत्ते पाल लेते हैं जिस के बाद उन्हें आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है. कुछ मामलों में लोग खर्च वहन न कर पाने के कारण कुत्तों को छोड़ देते हैं जिस से आवारा कुत्तों की संख्या बढ़ती है. ऐसे कुत्ते उन सोसाइटी में आवारा कुत्तों की तरह भटकते रहते हैं और लोगों को अपना शिकार बनाते रहते हैं.

एक ऐसी ही किसी हाईफाई सोसाइटी में कुछ इसी तरह के आवारा कुत्तों, जिन के मालिकों ने उन का खर्च वहन न कर पाने की सूरत में उन्हें सोसाइटी में ही छोड़ दिया था, ने काफी आतंक मचाना शुरू कर दिया. आए दिन लोगों को अपना शिकार बनाते. इन कुत्तों के आतंक से परेशान डरेसहमे से कुछ निवासियों ने सोसाइटी के व्हाट्सऐप ग्रुप में उन कुत्तों को सोसाइटी के गेट से बाहर कहीं दूर छोड़ आने की अपील की. इस पर उसी हाईफाई सोसाइटी के डौग लवर्स ने उन का जम कर विरोध किया. किसी ने व्हाट्सऐप ग्रुप में लिखा कि 1-2 जनों को काटने की घटना पहले भी होती रही है. इतनी सी बात के लिए हम प्यारे कुत्तों को बेघर तो नहीं कर सकते. तब उस अपीलकर्ता ने उस महिला की तसवीर व्हाट्सऐप ग्रुप में साझा की.

तसवीर में महिला के पैरों पर जगहजगह कुत्ते के नाखूनों की खरोंचें और कुत्ते के काटने के निशान थे. तब खुद को डौग लवर्स बताने वालों में से किसी ने तुरंत कमैंट किया कि ओ वाऊ, व्हाट एन आर्टवर्क और साथ में लाफिंग इमोजी भी चिपका दी. दूसरी महिला ने कमैंट किया कि बेचारा भूखा होगा, उसे मस्त चिकन सूप की जरूरत है. इन डौग लवर्स के तो क्या ही कहने. मानवीय संवेदना से विमुख इन का कुत्ता प्रेम और भक्ति सचमुच वंदनीय है. हे श्वान प्रेमियो, तुम्हें कोटिकोटि नमन है.

अकसर कुत्ता प्रेमी अपने कुत्तों के बेवजह भूंकने, दूसरों पर  झपटने की घटनाओं को गंभीरता से नहीं लेते. गुरुग्राम की ही एक अन्य सोसाइटी में एक मां अपने बच्ची के साथ लिफ्ट से जैसे ही बाहर निकली,  सामने खड़ा डौगी उस पर  झपट पड़ा. बच्ची बेचारी डौगी से बचने के लिए यहांवहां भागती रही. लेकिन. कुत्ते का मालिक खड़ा देखता मुसकराता रहा, जबकि बच्ची की मां और सोसाइटी में जो गार्ड वहां मौजूद था उस ने उस कुत्ते से बच्ची को बचाने की काफी कोशिश की. लेकिन वह डौगी पकड़ में नहीं आ रहा था. हालांकि  कुत्ते ने बच्ची को कुछ नुकसान तो नहीं पहुंचाया लेकिन डर के कारण बच्ची की तबीयत बिगड़ गई.

कुत्ता प्रेमी भी कई प्रकार के होते हैं- कुछ फैशन और स्टेटस  सिंबल के मारे होते हैं तो कुछ अंधविश्वास में जकड़े होते हैं.

कुछ कुत्ता प्रेमी काले कुत्ते इसलिए भी पाल लेते हैं क्योंकि उन्हें पंडितपुजारी, ज्योतिषाचार्य द्वारा बताया गया होता है कि इसे पालने से अथवा रोटी खिलाने से राहुकेतु और शनि के दोष दूर होते हैं. कुछ को यह सु झाव मिला होता है कि काला या कालासफेद कुत्ता पालने से साढ़ेसाती, पितृ दोष और नकारात्मक ऊर्जा से छुटकारा मिलता है.

कुत्ते पालने वाले अकसर अपने पालतू कुत्तों को परिवार का सदस्य मानते हैं और उन की देखभाल में कोई कसर नहीं छोड़ते लेकिन पड़ोसियों की शिकायतों के प्रति उन का रवैया अकसर उदासीन होता है. कुछ के जवाब इस तरह से होते हैं- मेरा कुत्ता तो घर की रखवाली कर रहा है, यह भूंकता नहीं बस अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहा है. जब पड़ोसी शिकायत करते हैं तो जवाब में धार्मिक तर्क दिए जाते हैं जैसे काले कुत्ते को रोटी खिलाने से शनि दोष की शांति हो रही है. लेकिन पड़ोसी के लिए यह तर्क उतना ही बेतुका है जितना सड़क पर कुत्ते की गंदगी. रोज घी में डूबी हुई रोटी खिला कर इन के शनि देव प्रसन्न होते हों या नहीं लेकिन घी पुती हुई रोटी खा कर कुत्ता सोसाइटी और महल्ले की गलियों को गंदा जरूर करता है. अंधविश्वास में डूबे इन कुत्ता प्रेमियों ने इस का भी जवाब ढूंढ़ रखा है. टोकने पर इन का बड़ा ही बेतुका सा जवाब कि कुत्ते की गंदगी से बुरी नजर दूर होती है.

कुछ तो ऐसे भी हैं जिंदगी अंधविश्वास में पड़ कर कुत्ते पाल लिए कि संतान की प्राप्ति होगी और जब संतान की प्राप्ति नहीं हुई तो कुत्ते को ही संतान बना लिया.

श्रीमती आहूजा ने लिफ्ट का बटन दबाया और थोड़ी देर रुक कर लिफ्ट आने

का प्रतीक्षा करने लगी. सुबह का वक्त था. वह रोज इसी वक्तसोसाइटी में बने सैंट्रल पार्क में सैर करने जाया करती थीं. थोड़ी देर की प्रतीक्षा के बाद लिफ्ट का दरवाजा जैसे ही खुला श्रीमती आहूजा की पड़ोसिन रीमा भी अपने पालतू कुत्ते जरमन शेफर्ड के साथ लिफ्ट के अंदर आ गईं. श्रीमती आहूजा को रीमा के कुत्ते के साथ लिफ्ट शेयर करते हुए डर लगा. उन्होंने हलके से इस का विरोध भी किया. लेकिन रीमा ने यह कहते हुए कि आंटी यह कुछ नहीं करेगा, आप को डरने की बिलकुल जरूरत नहीं. श्रीमती आहूजा के साथ ही लिफ्ट के अंदर बनी रही. रीमा अपने जरमन शेफर्ड को अपनी सगी औलाद की तरह प्यार करती हैं, यह बात मिसेज आहूजा जानती हैं. उन के अत्यधिक विरोध करने से रीमा कहीं बुरा न मान जाएं यह सोच कर वे चुप रह गईं.

दरअसल, रीमा को उस की शादी के 5 साल के बाद भी जब संतान सुख की प्राप्ति नहीं हुई तो रीमा ने किसी बाबा के इस परामर्श पर कि काला या सफेद कुत्ता पालने से संतान सुख के  सारे विघ्न मिट जाएंगे और संतान की प्राप्ति हो जाएगी, उस ने काले रंग के इस जरमन शेफर्ड को पाल लिया. लेकिन कुत्ता पालने के बाद भी रीमा को जब संतान सुख की प्राप्ति नहीं हुई तो उन्होंने इस जरमन शेफर्ड को ही अपनी औलाद मान लिया.

रीमा और मिसेज आहूजा को लिफ्ट के अंदर आए कुछ सैकंड भी नहीं हुए थे कि

अचानक लाइट के चले जाने से लिफ्ट रुक गई. रीमा के प्यारे कुत्ते ने आहूजा के ऊपर जोरजोर से भूंकना शुरू कर दिया. मिसेज आहूजा को जरमन शेफर्ड उस वक्त यमराज से कम नहीं लग रहा था. हालांकि इस कुत्ते ने मिसेज आहूजा को कुछ खास नुकसान तो नहीं पहुंचाया लेकिन फिर भी मिसेज आहूजा के मन के अंदर डर बैठ गया. अब वे लिफ्ट में अकेले आनेजाने से भी डरती है.

लोगों का अपने कुत्तों के प्रति प्यार अपने सगेसंबंधियों, पड़ोसियों से भी बढ़ कर देखा गया है. उन के पालतू कुत्ते उन के पड़ोसियों, उन के घर के सदस्यों तक को नुकसान पहुंचा देते हैं, फिर भी ये अपने पालतू कुत्तों  को अपने से अलग नहीं करते.

यूपी के कानपुर शहर में तो एक 80 वर्षीय बुजुर्ग पर उन के अपने ही पालतू कुत्ते ने हमला कर के मौत के घाट उतार दिया, तो वहीं लखनऊ में भी एक शख्स ने घर की सुरक्षा के लिए पिटबुल कुत्ता पाला था लेकिन इस पालतू कुत्ते ने अपने घर की मालकिन को ही नोच खाया और उन की दर्दनाक मौत हो गई.

पालतू कुत्तों  के द्वारा अपने परिवार के सदस्यों पर हमले के बाद भी लोगों ने अपने पालतू कुत्तों का त्याग नहीं किया. अकसर कुत्ते पालने को ले कर कई बार पड़ोसियों के बीच ही नहीं बल्कि पतिपत्नी के बीच भी विवाद हो जाता है. यहां तक कि उन का रिश्ता टूटने की कगार पर पहुंच जाता है. एक खबर के अनुसार, आगरा में एक पतिपत्नी के बीच कुत्ते को ले कर इतना विवाद हुआ कि उन का रिश्ता टूटने की कगार पर पहुंच गया. पत्नी को कुत्ता पसंद नहीं था जबकि पति को कुत्ते से बहुत प्यार था.

डौग लवर्स के लिए उन का पाला हुआ कुत्ता उन के अपने रिश्तेदारों, पड़ोसियों से भी

कहीं ज्यादा अजीज जान पड़ता है. इन कुत्ता प्रेमियों के कुत्ते के प्रति इस तरह के प्रेम को देख कर ऐसा लगता है कि उन्होंने महाभारत की उस कहानी को सच मान लिया है  कि उन का कुत्ता उन्हें स्वर्ग का मार्ग दिखाने में उन का एकमात्र साथी और सहयोगी बनेगा. उन्हें यह भ्रम तो नहीं कि उन का कुत्ता उन्हें स्वर्ग तक ले जाने में मार्गदर्शन करेगा, जिस प्रकार महाभारत में युधिष्ठिर के स्वर्ग जाने में युधिष्ठिर का मार्गदर्शन एक कुत्ते ने किया था.

कुछ लोगों का यहां तक मानना है कि कुत्ते को खाना खिलाने से भैरव प्रसन्न होते हैं और यमदूतों का डर दूर होता है. यमदूतों का तो पता नहीं बल्कि उन के पड़ोसी उन से जरूर दूर हो जाते हैं. कई बार तो उन के सगे रिश्तेदार भी उन के घर आने से बचते हैं.

कुछ लोग कुत्ता इसलिए भी पालते हैं क्योंकि उन के अंदर यह अंधविश्वास गहरे तक बैठा हुआ है कि कुत्ता पालने से घर की तरक्की दिन दूनी रात चौगुनी होगी. उन की तरक्की का तो पता नहीं उलटा कुत्ते पालने का खर्च उन की आमदनी से भी अधिक हो जाता है और उन्हें कर्ज में डुबो देता है. ऐसे कुत्ता प्रेमियों यानी श्वान प्रेमियों को मेरा कोटिकोटि नमन है.

Satire Story

Fictional Story: कमियां हुईं दूर

Fictional Story: ‘‘मैं एक बहुत बड़ी उलझन में हूं और चाहता हूं कि तुम इस उल झन से मुझे उबारो,’’ मनोज ने संगीता से कहा. उस के चेहरे पर गंभीरता और चिंता दोनों ने डेरा जमाया हुआ था.

संगीता कौफी के मग को अपने होंठों से लगातेलगाते रुक गई. उस ने उत्सुकता से मनोज की ओर देखा, ‘‘ऐसी कौन सी उल झन है और क्या मेरे लिए संभव है कि मैं तुम्हें उल झन से उबार सकूं?’’ संगीता ने पूछा.

‘‘मामला मेरा और तुम्हारा है, मेरे और तुम्हारे परिवार का है. ऐसे में तुम से सलाह लेना जरूरी है,’’ मनोज ने कहा.

‘‘बताओ. क्या बात है?’’ संगीता ने कौफी का घूंट लेते हुए पूछा.

‘‘ऐसा है कि हम दोनों की मित्रता बहुत अच्छे से चल रही है. हम दोनों एक ही किश्ती के सवार हैं. हम दोनों सिंगल पेरैंट हैं. मेरे 2 बच्चे हैं और तुम्हारा 1 बच्चा है. उन के बारे में सोचना भी जरूरी है. क्या हम अपने इस रिश्ते को कुछ अलग रूप दे सकते हैं जिस से हमारे बच्चे भी हमारे इस जीवन में सहभागी हो सकें और बेहतर जीवन जी सकें?’’ मनोज ने पूछा. वह पहले ही कौफी समाप्त कर चुका था. उस की आदत थी बिलकुल गरम कौफी पीने की.

संगीता सोच में पड़ गई. कुछ देर सोचने के बाद कहा, ‘‘तुम्हारा प्रश्न वाजिब है पर इस के जवाब के लिए थोड़ा समय चाहिए.’’

‘‘थोड़ा क्यों? पूरा समय लो और बताओ कि क्या किया जा सकता है,’’ मनोज ने कहा.

‘‘ठीक है सोच कर बताती हूं. तुम भी अच्छे से विचार कर के बताना,’’ संगीता ने कहा.

‘‘मैं तो इस पर काफी विचार कर चुका

हूं. किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पाया हूं. पर

2-3 विकल्प नजर आ रहे हैं मु झे,’’ मनोज ने संगीता के चेहरे पर अपनी नजरें जमाते हुए कहा.

‘‘क्या?’’ संगीता ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘पहला अभी तक की तरह इसे सिर्फ दोस्ती और सहारे के रूप में रहने दें जैसा अभी तक चल रहा है,’’ मनोज ने कहा.

‘‘दूसरा?’’ संगीता ने पूछा.

‘‘हम साथसाथ रहने लगें,’’ मनोज ने कहा.

‘‘हूं. और कुछ सोचा है क्या?’’ संगीता

ने पूछा.

‘‘हां. एक और है. हम शादी कर लें और साथ रहने लगें. मेरे बच्चों को मां मिल जाएगी और तुम्हारे बच्चे को पिता,’’ मनोज ने कहा.

‘‘अच्छा…’’ संगीता बस इतना ही बोल पाई. शायद उस ने इन विकल्पों के बारे कल्पना भी नहीं की थी. इस कारण अभी कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थी.

‘‘पर एक बात का विशेष ध्यान रखना है.’’ मनोज बोला.

‘‘क्या?’’ संगीता ने पूछा.

‘‘तुम्हारे या मेरे ऊपर किसी प्रकार का दबाव नहीं रहे. हम दोनों एकदूसरे के साथ बहुत अच्छा समय बिताते हैं. मैं इस रिश्ते को बहुत ही महत्त्वपूर्ण मानता हूं. बस तुम शांत मन से सोचो कि तुम इस रिश्ते को भविष्य में कैसा देखना चाहती हैं. तुम बे िझ झक अपनी अपेक्षाएं, अपनी आशंकाएं बताना. मैं भी अपनी बताऊंगा,’’ मनोज ने कहा.

मनोज ने वेटर को बिल लाने का संकेत किया. वेटर बिल ले कर आया तो मनोज ने भुगतान कर दिया और दोनों रैस्टोरैंट से बाहर निकले.

‘‘ठीक है विचार करना और एक बार फिर से दोहरा दूं तुम्हारे ऊपर मेरी ओर से किसी प्रकार का दबाव नहीं है और साथ ही तुम्हारी ओर से मेरे ऊपर कोई दबाव न रहे. जो भी निर्णय लिया जाए दोनों की सहमति से लिया जाए, बाय,’’ मनोज ने कहा.

‘‘बाय,’’ संगीता ने यंत्रवत कहा. काफी हद तक अचंभित थी.

दोनों अपनेअपने निवास पर पहुंच गए.

निवास पर पहुंचते ही संगीता की बिटिया आरुषि ने उस का स्वागत किया,

‘‘मम्मा, आज शाम को मेरे साथ पार्क चलोगी न?’’

‘‘जरूर,’’ संगीता ने कहा.

‘‘आज मैं खूब देर तक  झूला  झुलूंगी. आज छुट्टी का दिन है. आप मु झे जल्दी आने के लिए मत कहना,’’ आरुषि ने कहा.

‘‘ठीक है बाबा बस आधे घंटे में चलूंगी,’’ संगीता ने कहा और अपने कपड़े बदलने के लिए अपने रूम में चली गई.

इस बीच मेड ने जाने की अनुमति ली और चली गई. कपड़े बदल कर संगीता वहीं आराम करने लगी. उस का ध्यान मनोज की बातों पर चला गया. मनोज उस के साथ कभी काम करता था. इसी क्रम में उस से उस की मित्रता हो गई थी. मित्रता धीरेधीरे घनिष्ठता में बदल गई थी. मनोज की पत्नी का एक दुर्घटना में देहांत हो गया था. उस के घर में उस की मां उस के दोनों बच्चों अनन्या और अद्वैत को संभालती थी. मनोज तो खुद ही 50 के लगभग का होगा. फिर उस की मां 70 से कम की क्या होंगी. परेशानी तो होती होगी बुजुर्ग महिला को.

पत्नी की मृत्यु के बाद मनोज काफी अकेला हो गया था. इस बीच उन की दोस्ती काफी बढ़ गई थी. दोनों एकदूसरे के साथ अपनी भावनाएं सा झा करते थे. न सिर्फ मानसिक रूप से बल्कि शारीरिक तौर पर भी एकदूसरे से जुड़ गए थे. पति ने तलाक के बाद न तो संगीता से कोई संपर्क किया था न आरुषि से. आरुषि की देखभाल के लिए उस ने एक आया को रख लिया था.

मनोज के साथ अभी तक वह बहुत ही सुखपूर्वक मित्रता निभा रही थी. दोनों ही इस रिश्ते से काफी खुश थे. पर अब लगता है कि मनोज को भविष्य की चिंता सताने लगी है तभी वह कई विकल्पों की चर्चा कर रहा था. पर उन विकल्पों में वह किसे चुने सम झ नहीं पा रही थी. एकसाथ रहने पर आरुषि, अनन्या और अद्वैत किस प्रकार प्रतिक्रिया करेंगे? फिर मनोज की मां इसे किस रूप में लेगी? कई बातें उस के जेहन में चल रही थीं.

एकाएक संगीता के विचारों का सिलसिला रुक गया जब आरुषि ने अंदर आ कर कहा, ‘‘मां, आधा घंटा हो चुका. अब तो चलो पार्क में.’’

दोनों मांबेटी पार्क में पहुंच गए. पार्क सोसाइटी में ही था. सोसाइटी के चारों ओर ऊंचे टावर थे और बीच में अच्छा सा पार्क था जिस में क्रिकेट, बास्केटबौल, लौन टैनिस, बैडमिंटन खेलने के लिए व्यवस्था थी. एक ओर छोटे बच्चों के खेलने के लिए तरहतरह के  झूले थे. बेसमैंट में स्विमिंग पूल, जिम, छोटी सी लाइब्रेरी और क्लबहाउस था. पार्क में कई बच्चे  झूला  झूल रहे थे. आरुषि भी उन के साथ खेलने लगी. संगीता वहीं बैठ कर मनोज के प्रस्ताव पर विचार करने लगी. पर किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पा रही थी.

संगीता यह सोच रही थी कि आरुषि से कैसे इस बारे में विचार लिया जाए. वैसे वह छोटी थी और उस के निर्णय को टाल नहीं सकती थी पर उस का विचार जानना वह जरूरी सम झ रही थी. एक अनजान व्यक्ति को पिता के रूप में देखना, 2 अनजान लड़कों को भाई मानना और एक अनजान महिला को दादी के रूप में देखना क्या उसे अच्छा लगेगा? इस के पहले कभी वह उन से मिली भी नहीं थी.

काफी देर विचार करने के बाद संगीता के मन में एक खयाल आया. उस ने एक पुरानी फिल्म देखी थी ‘मासूम.’ पूरी तो नहीं कुछकुछ इस स्थिति से मिलतीजुलती कहानी थी उस फिल्म की. ‘पहले मैं यह फिल्म आरुषि को दिखाऊंगी फिर उस के आधार पर उस का विचार जानने की कोशिश करूंगी, उस ने सोचा.

शाम को खाना खाने के बाद संगीता ने आरुषि से पूछा, ‘‘एक फिल्म देखें क्या आज?’’

‘‘हां मां, मजा आ जाएगा,’’ आरुषि चहकते हुए बोली.

‘‘चलो फिर देखते हैं,’’ कह अपने स्मार्ट टीवी पर उस ने फिल्म लगा दी. आरुषि बहुत ध्यान से फिल्म देखने लगी. फिल्म के कई पात्र उसी की उम्र के थे और बच्चों के लिए ‘लकड़ी की काठी…’ गाना भी उसे बहुत ही अच्छा लगा.

‘‘कैसी लगी फिल्म?’’ संगीता ने पूछा.

‘‘मम्मा बहुत ही अच्छी लगी. राहुल के लिए कितना अच्छा हो गया न? वह भी सब के साथ रहने लगा,’’ आरुषि ने जम्हाई लेते हुए कहा.

‘‘तुम्हें नींद आ रही है. चलो बिस्तर पर,’’ संगीता ने कहा.

दोनों बिस्तर पर आ गए.

‘‘अच्छा, तुम्हें भी अगर राहुल की तरह 2 बच्चों का साथ मिल जाए तो कैसा रहे?’’ संगीता ने पूछा.

‘‘बहुत अच्छा. पर आप मेरे साथ रहोगी तभी,’’ आरुषि ने कहा.

‘‘अरे मैं तो रहूंगी ही तुम्हारे साथ. अब तुम सो जाओ. नींद से तुम्हारी आंखें भारी हो रही हैं,’’ संगीता ने कहा और लाइट बंद कर दी. काफी देर तक वह इसी बारे में सोचती रही और फिर सो गई.

अगली बार जब संगीता मनोज से मिली तो आरुषि की प्रतिक्रिया उसे बताई.

‘‘तुम ने तो अच्छी तरकीब निकाली आरुषि के विचार जानने के लिए. मैं भी अनन्या और अद्वैत को यही फिल्म दिखाऊं क्या?’’ मनोज ने पूछा.

‘‘दिखाने में हरज नहीं है. पर आरुषि अकेली है इसलिए उसे किसी के साथ रहना अच्छा लग सकता है. पर अनन्या और अद्वैत शायद अपने बीच किसी और को सहन न कर सकें,’’ संगीता ने कहा.

‘‘हूं. उन्हें तो फिर भी मनाना आसान रहेगा पर मां के लिए मैं सोच रहा हूं,’’ मनोज ने कहा, ‘‘शादी के लिए तो शायद वे फिर भी तैयार हो जाएं. बिना शादी के हमारा साथ रहना उन्हें अनैतिक लगेगा. पर पहले तुम निश्चय कर लो कि तुम तैयार हो. फिर मां से बात करता हूं.’’

‘‘मु झे तो 2 ही बातें सही लग रही हैं या तो जैसे अभी हम मिलते हैं वैसे ही मिलते रहें या फिर शादी कर के एकसाथ रहें,’’ संगीता ने कहा.

‘‘दोनों में से ज्यादा सही क्या लग रहा है?’’ मनोज ने पूछा.

‘‘शादी कर के साथ रहना,’’ संगीता ने कहा.

‘‘ठीक है फिर अगले रविवार को आ जाओ मेरे घर. मैं मां से बात कर लूंगा. बच्चे तो मान ही जाएंगे,’’ मनोज ने कहा.

मनोज ने समय निकाल कर मां से अपनी बात डरतेडरते कह दी. उसे पूरा यकीन था कि मां विरोध करेंगी. पर उस की खुशी का ठिकाना न रहा जब मां ने कहा, ‘‘इस उम्र में बच्चों की देखभाल मु झ से ठीक से नहीं हो रही. यदि शादी कर लो तो ठीक ही रहेगा. रिश्तेदारों में कुछ दिनों तक कानाफूसी होगी कि तुम ने एक तलाकशुदा, एक बच्ची की मां से शादी की है. पर ये रिश्तेदार कभी मदद को तो आए नहीं. फिर इन की बातों से क्या फर्क पड़ना है.’’

संगीता आई तो उस ने हाथ जोड़ कर मां को प्रणाम किया. मां ने उसे आशीर्वाद दिया. बातों ही बातों में मां ने एक बात संगीता और मनोज से कही, ‘‘जब शादी करने का निर्णय ले लिया है तो एक बात पर विशेष ध्यान रखना होगा. तुम दोनों के अब 3 बच्चे हैं. तीनों को बाराबर प्यार देना होगा. बच्चे अभी छोटे हैं. उन का मन अभी कच्चा है. वे कुछ दिनों में घुलमिल जाएंगे. तुम दोनों के मन में कभी भी यह खयाल नहीं आना चाहिए कि उन में से कोई भी बच्चा तुम्हारा अपना नहीं है.’’

मनोज और संगीता ने इस बात के लिए हामी भरी. अद्वैत को तो कोई आपत्ति नहीं थी पर अनन्या शुरू में थोड़ी रुष्ट जरूर हुई. कुछ दिनों के बाद दोनों की सादे समारोह में शादी हो गई और सभी साथ रहने लगे. अनन्या कुछ दिनों तक आरुषि और संगीता से दूरी बनाती रही पर उस के बाद वह भी दोनों से घुलमिल गई. इस प्रकार 2 सिंगल पेरैंट, पेरैंट बन गए और दोनों परिवारों की कमियां दूर हो गईं.

Fictional Story

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