मेनोपौज से जुड़े मिथ्स को जानना है बेहद जरूरी

45 साल की रश्मि पिछले कुछ दिनों से अपने स्वास्थ्य में असहजता महसूस कर रही थी. इस वजह से उसे नींद अच्छी तरह से नहीं आ रही थी. ठण्ड में भी उसे गर्मी महसूस हो रही थी. पसीने छूट रहे थे. उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था. बात-बात में चिडचिडापन आ रहा था. डौक्टर से सलाह लेने के बाद पता चला कि वह प्री मेनोपौज के दौर से गुजर रही है. जो समय के साथ-साथ ठीक हो जायेगा.

दरअसल मेनोपौज यानी रजोनिवृत्ति एक नैचुरल बायोलौजिकल प्रक्रिया है,जो महिलाओं की 40 से 50 वर्ष के बीच में होता है. महिलाओं में कई प्रकार के हार्मोनल बदलाव इस दौरान आते है और मासिक धर्म रुक जाता है.  इस बारें में ‘कूकून फर्टिलिटी’ के डायरेक्टर, गायनेकोलोजिस्ट और इनफर्टिलिटी स्पेशलिस्ट डॉ.अनघा कारखानिस कहती है कि अगर कोई महिला पूरे 12 महीने बिना किसी माहवारी के गुजारती है तो उसे मेनोपौज ही कही जाती है, ऐसे में कुछ महिलाओं को लगता है कि मेनोपौज से उनकी प्रजनन क्षमता समाप्त होने की वजह से वे ओल्ड हो चुकी है, जबकि कुछ महिलाओं को हर महीने की झंझट से दूर होना भी अच्छा लगता है. इतना ही नहीं इसके बाद किसी भी महिला को बिना चाहे माँ बनने की समस्या भी चली जाती है.

इसके आगे डौ.अनघा बताती है कि मेनोपौज एक सामान्य प्रक्रिया होने के बावजूद उसे लेकर कई भ्रांतियां महिलाओं में है, जबकि कुछ महिलाओं में मूड स्विंग और बेचैनी रहती भी नहीं है, लेकिन वे मेनोपौज के बारें में सोचकर ही परेशान रहने लगती है,जिससे न चाहकर भी उनका मनोबल गिरता है और वे डिप्रेशन की शिकार होती है. जबकि ये सब मिथ है और इसका मुकाबला आसानी से किया जा सकता है, जो निम्न है,

मेनोपौज एक नयी शुरुआत

ये एक अवधारणा सालों से चली आ रही है कि मेनोपौज के बाद जीवन अंतिम दौर में पहुंच जाता है. ये शायद प्राचीन काल में था, जब महिलाओं का जीवन मेनोपौज के द्वारा ही आंकी जाती थी, अब महिलाएं रजोनिवृत्ति के बाद भी अधिक दिनों तक स्वस्थ जीवित रहती है और जीवन का एक तिहाई भाग वे अपने परिवार के साथ ख़ुशी-ख़ुशी बिताती है,जो 51 के बाद से ही शुरू होता है. इसमें वे अपने जीवन के सभी लक्ष्यों को पूरा करने की क्षमता रखती है, क्योंकि केवल माहवारी बंद हुई है और कुछ भी बदला नहीं है. उन्हें अपने हिसाब से जीने का पूरा अधिकार मिलता है.

अधिकतर महिलाओं को इस फेज से गुजरने पर एंग्जायटी होती है

ये पूरी तरह से सही नहीं है, महिलाओं को भी पुरुषों की तरह ही डिप्रेशन और अप्रसन्नता का सामना करना पड़ता है, मूड स्विंग अधिकतर हार्मोनल बदलाव की वजह से होती है, जो केवल मेनोपौज की वजह से नहीं होता, दूसरी समस्याएं भी हो सकती है, जिसकी जांच करवा लेना सही होता है,

सभी महिलाएं मेनोपौज के दौरान कुछ अलग लक्षण अनुभव करती है

ये सही है कि रजोनिवृत्ति के दौरान महिलाओं में कुछ लक्षण मसलन अचानक गर्मी लगना, बेड टाइम पसीना, मूड में अस्थिरता आदि होते है, पर ये हर महिला के लिए अलग होता है. कुछ को ये अनुभव बहुत कम भी हो सकता है.

मेनोपौज के बाद वजन अपने आप बढ़ता है

बहुत सारी महिलाओं का वजन 35 से 45 उम्र के दौरान बढती है. इसका मेनोपौज से कुछ लेना देना नहीं होता और ये जांच के बाद ही पता चल पाता है. कुछ शोध कर्ताओं का कहना है कि ये अभी पता नहीं चल पाया है कि मोटापे की वजह मेनोपौज ही है, क्योंकि इस उम्र में महिलाओं की एक्टिवनेस कम हो जाती है, जिससे मोटापा अपने आप ही आ जाती है. ये सही है कि  मेनोपौज में शरीर में फैट की प्रतिशत बढ़ जाती है,ऐसे में अगर खान-पान पर ध्यान दिया जाय तो वजन नहीं बढ़ पाता.

मेनोपौज के बाद सेक्स में रूचि कम हो जाती है

ये पूरी तरह से गलत है,क्योंकि मेनोपौज के बाद सेक्स करने से गर्भधारण की चिंता नहीं रहती. अगर आपने 12 महीने बिना माहवारी के गुजार दिया है, तो आप बिना चिंता के अपनी सेक्सुअल लाइफ जी सकते है और ये सही भी है कि इस समय सेक्सुअल एक्टिवनेस की वजह से आपका मानसिक सामंजस्य भी बना रहता है.

मेनोपौज के बाद भी महिला प्रेग्नेंट हो सकती है

जब महिला इस दौर से गुजरती है और माहवारी का समय बार-बार बदल रहा है, तो इस समय महिला प्री मेनोपौज की स्थिति में है, ऐसे में पार्टनर के साथ सेक्सुअल इंटरकोर्स किया है, तो गर्भधारण हो सकता है और आपको डौक्टर की सलाह से गर्भनिरोधक दवाइयां लेने की जरुरत है. 12 महीने बिना मासिक धर्म के गुजर जाने पर ही प्रेगनेंसी की समस्या नहीं रहती.

डौ.अनघा का आगे कहना है कि ये सारे मिथ की वजह से महिलाएं मेनोपौज के बाद अपने आपको कमजोर और लाचार महसूस करती है, जिसकी कतई जरुरत नहीं है. असल में इस समय महिलाओं की स्वस्थ रहकर अधिक से अधिक एक्टिव होने की जरुरत होती है, ताकि उनके उद्देश्य जिसे उसने अभी तक पूरा नहीं कर पायी हो, उसे कर लें, अपने प्यारे दोस्त और परिवार जनों के साथ ट्रेवल करें. इतना ही नहीं,जो महिलाएं रजोनिवृत्ति के बाद अपने स्वास्थ्य और माइंड की सही देखभाल करती है, वे अधिक अच्छी और सम्पूर्ण जीवन मेनोपौज के बाद ही बिता पाती है, उन्हें कोई रोक नहीं पाता.

Valentine’s Day 2024: प्यार के इस महीने में ऐसा हो आपका अंदाज

फरवरी का महीना प्यार का महीना होता है. सुहाना मौसम और हर तरफ प्यार भरी हवा चल रही होती है. ये समय ही कुछ खास होता है, इस खास समय में हर लड़की सजना सवरना चाहती है और खूबसूरत दिखने की चाहत रखती है. किसी भी पार्टी या फंक्‍शन के लिए खुद को तैयार करना बहुत आसान होता है, पर जब वैलेंटाइन डे जैसे खास मौके की बात आती है तब दिल में एक अलग सा ही अरमान होता है कि अपने प्रेमी के लिए कुछ इस तरह तैयार हुआ जाए कि वह आपको पहली ही नजर में देख कर आपके प्‍यार में घायल हो जाए.

अगर आप इस दिन का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहीं थीं तो लीजिए हम आपके लिए इस खास मौके को और भी रंगीन बनाने के लिए कुछ खास ब्‍यूटी टिप्‍स लेकर आए हैं, जिन्हें आजमा कर आप खुद को स्‍पेशल फील करने से नहीं रोक सकेगीं.

तैयार हों कुछ खास अंदाज में-

प्‍यार का इजहार करने में आंखो का अहम महत्‍व होता है तो आंखों का मेकअप भी खास होना जरूरी है. इसलिए इनको सजाते वक्‍त ध्‍यान दें कि इन पर ज्‍यादा भारी मेकअप न किया गया हो क्‍योंकि वह तो केवल आपके प्राकृतिक रंग रूप से ही प्‍यार करते हैं. इस दिन कोशिश करें कि काजल, मसकारा और पलकों पर हल्‍का सा ग्‍लिटर लगा कर ब्रश चलाएं.

हल्‍के और चमकीले रंगों से सजे आपके होंठ एक अलग सा ही समा बांधेगें. इसलिए इस वेलेंटाइन्स वीक पर आप लिपस्‍टिक का नहीं बल्कि लिप ग्‍लौस का उपयोग करिए. इन दिनों रंगों में पिंक, प्‍लम रेड और पीच बहुत पसंद किए जा रहे हैं. इस दिन लाल रंग का विशेष महत्‍व होता है. इस दिन अगर आप लाल रंग की ड्रेस या फिर नेलपौलिश को लगा कर उनके हाथों में अपना हाथ डालेगीं तो लाल रंग आपके प्‍यार को दर्शाने में आपकी मदद करेगा. इसलिए अपने नाखूनों में बेरी रेड कलर की नेलपौलिश लगाना न भूलें.

इस दिन आपको लाल रंग की ड्रेस पहननी चाहिए. अगर आप चाहें तो अपने लाल रंग की ड्रेस के साथ सफेद या काला रंग भी मैच कर सकती हैं. कोशिश करें कि इस दिन लाल रंग या उससे मिलती जुलती ही ऐक्सेसरीज पहने.

अब जब बात कपड़ों और मेकअप की हो ही चुकी है तो क्‍यों न आखिर में एक और ब्‍यूटी टिप दे दी जाए. वेलेंटाइन डे के दिन जब आप पूरी तरह से तैयार हो जाएं तब एक भीनी खुशबू वाला इत्र या परफ्यूम लगाना बिल्‍कुल न भूलें. इसको अपने हाथों की कलाई या फिर अपने गले के पास लगाएं और फिर देखें इसका जादू.

तो अब देर किस बात की जल्दी से ये खास टिप्स अपनाएं और और अपने वैलेनटाइन्स डे को और भी ज्यादा खास बनाएं.

 

Valentine’s Day 2024: घर पर बनाएं दाल से बनी ये 3 टेस्टी रेसिपी  

दालें हमारे भोजन का बहुत महत्वपूर्ण अंग हैं. दालें प्रोटीन, विटामिन, मिनरल्स, और आयरन से भरपूर होती हैं. अरहर, मूंग, मोठ चना और मसूर भारत में प्रमुख रूप से पायीं जातीं हैं. आहार विशेषज्ञों के अनुसार हमें अपने भोजन में प्रतिदिन कम से कम एक कटोरी दाल अवश्य शामिल करना चाहिए परन्तु फ़ास्ट फ़ूड के इस दौर में बच्चों को दाल खिलाना बहुत चुनौती भरा काम है. यदि बच्चे दालें सीधे नहीं खा पा रहे हैं तो क्यों न उन्हें दाल से बने कुछ ऐसे व्यंजन खिलाये जाएं जिन्हें वे बिना ना नुकुर के बड़े आराम से खा लें. आज हम आपको ऐसे ही कुछ डिशेज बनाना बता रहे हैं जिनसे बच्चों को दालों की पौष्टिकता भी मिलेगी और भरपूर स्वाद भी तो आइए देखते हैं कि इन्हें कैसे बनाते हैं-

-मैगी मसाला पेटीज

कितने लोगों के लिए          6

बनने में लगने वाला समय     30 मिनट

मील टाइप                         वेज

सामग्री

अरहर दाल                     1/4 कप

चना दाल                        1/4 कप

धुली मूंग दाल                  1/4 कप

मसूर दाल                       1/4 कप

किसी गाजर                    1

बारीक कटी शिमला मिर्च    1

अदरक लहसुन पेस्ट           1 टीस्पून

हरी मिर्च पेस्ट                    1 टीस्पून

नमक                               1 टीस्पून

हल्दी पाउडर                    1/2 टीस्पून

बारीक कटा हरा धनिया     1टेबलस्पून

बारीक कटा प्याज             1

मैगी मसाला                      1 टेबलस्पून

तेल                                  2 टेबलस्पून

विधि

पेटीज बनाने से 2 घण्टे पहले सभी दालों को एक साथ भिगो दें फिर पानी निकालकर मिक्सी में पल्स मोड पर  पीस लें ताकि पानी न डालना पड़े अब तेल को छोड़कर सभी सामग्री को पिसी दालों में अच्छी तरह मिला लें. तैयार मिश्रण से एक चम्मच मिश्रण लेकर हथेली पर रखकर पेटीज का आकार दें. नॉनस्टिक तवे पर तेल लगाकर मंदी आंच पर दोनों तरफ से सुनहरा होने तक शैलो फ़्राय करके टोमेटो सॉस के साथ सर्व करें.

-मूंग फ्रिटर्स

कितने लोगों के लिए         4

बनने में लगने वाला समय    30 मिनट

मील टाइप                     वेज

सामग्री

छिल्के वाली मूंग दाल           1 कप

प्लेन ओट्स                         1/2 कप

ताजा दही                            1/2 कप

प्याज                                  1

हरी मिर्च                              3

उबला आलू                           1

शिमला मिर्च                         1/2

नमक                                    स्वादानुसार

हींग                                       चुटकी भर

जीरा                                    1/4 टीस्पून

तलने के लिए तेल                पर्याप्त मात्रा में

विधि

बनाने से 30 मिनट पहले मूंग दाल को भिगो दें. भीगी दाल के साथ सभी सब्जियां, और दही को एक साथ पीस लें. अब इसमें नमक, ओट्स, जीरा और हींग अच्छी तरह मिलाएं. तैयार मिश्रण को चकले पर बेलकर चाकू से फ्रिटर्स काटकर गर्म तेल में मध्यम आंच पर सुनहरा होने तक तलें. एयरटाइट जार में भरकर प्रयोग करें.

-पैरी पेरी चीज बॉल्स

कितने लोगों के लिए                 6

बनने में लगने वाला समय          30 मिनट

मील टाइप                               वेज

सामग्री

अंकुरित दालें                            डेढ़ कप  (मूंग, मोठ, राजमा, सोयाबीन)समान मात्रा में

चीज क्यूब्स                            4

ब्रेड क्रम्ब्स                               1 कप

पेरी पेरी मसाला                    1 टेबलस्पून

बारीक कटी हरी मिर्च              2

गरम मसाला                      1/4 टीस्पून

अमचूर पाउडर                  1/2 टीस्पून

बारीक कटा हरा धनिया       1टेबलस्पून

नमक                               स्वादानुसार

तलने के लिए तेल           पर्याप्त मात्रा में

विधि

सभी दालों को एक साथ मिक्सी में पीस लें. अब इसमें सभी मसाले, नमक, हरी धनिया, हरी मिर्च व 1 कप ब्रेड क्रम्ब्स मिलाएं. चीज क्यूब्स को किसकर 6 भाग में बांट लें. तैयार दाल के मिश्रण में से 1 चम्मच मिश्रण हथेली पर फैलाएं और चीज का एक भाग बीच में रखकर बॉल तैयार कर लें. इसी प्रकार सारे बॉल्स तैयार करें. तैयार चीज बॉल्स को बचे एक कप ब्रेड क्रम्ब्स में लपेटकर गर्म तेल में सुनहरा होने तक तलकर बच्चों को टोमेटो सॉस के साथ सर्व करें.

मंदिर दर्शन तो छलावा हैं

आजकल राहुल गांधी मणिपुर से मुंबई न्याय यात्रा पर निकले हुए हैं. यह वैसे कोई सैरसपाटा नहीं है क्योंकि जैसे नरेंद्र मोदी मंदिरों के दर्शनों से देश को देखना चाहते हैं और वोट पाना चाहते हैं वैसे ही राहुल गांधी देश के शहर, गांव, जंगल, पहाड़, मैदान, नदि देखते हुए वोट की चाहत रखते हैं.

मोदी के दर्शन जहां एक प्रार्थना है कि हे प्रभु, हमारी झोली सीटों से भर दो, हम आप के मंदिर बनाएंगे, मंदिरों के बाहर रास्ते ठीक कराएंगे, मंदिरों के लिए रेलवे स्टेशन, हवाईअड्डे बनवाएंगे, वहीं राहुल गांधी वोट के साथसाथ लोगों के साथ भी जुड़ रहे हैं.

एक आम आदमी, खासतौर पर आम परिवार को भारत की यात्रा करनी चाहिए. यह पर्सनैलिटी डैवलपमैंट के साथसाथ हरेक को अपना होराइजन बड़ा करने के लिए जरूरी है. हर टूर और ट्रैवल आप को नए लोगों से मिलाता है, नई भौगोलिक स्थिति से परिचित कराता है, नई भाषा सिखाता है और सब से बड़ी बात है कि आप को अनजान लोगों के साथ रहना सिखाता है.

अपने से अलग, अलग धर्म के, अलग भाषा के, अलग रंग के लोगों से जब मिलना होता है तो बहुत कुछ नया सीखना होता है. किसी भी पर्यटन पर आप को गैरों के बीच रहने की आदत डालनी होती है. आप को समझने को मिलता है कि आप के घर की सुरक्षा का घेरा आप के पास नहीं है. आप के दोस्त, रिश्तेदार, कलीग आप के आसपास नहीं हैं. आप जिस जगह हैं वहां क्या है यह नहीं जानते. पर्यटन, यात्रा आप को ऐडजस्ट कराना सिखाती है.

मंदिरोें में जब दर्शन करने जाते हैं तो आप का उद्देश्य अपना सुख होता है. भगवान मुझे कुछ दे दो. मेरे पापों को क्षमा कर के मरने के बाद मेरे पापों का फल अगले जन्म न दें इसीलिए तुम्हारी शरण में आया हूं, मुझ से दक्षिणा लो. मैं दरवाजे पर सोने की कील लगवाऊंगा, चांदी का छत्र चढ़ाऊंगा, पंडितों को दक्षिणा दूंगा. मैं…मैं… मैं…

पर्यटन पर आप यह नहीं कहते कि आप जिस तरफ जा रहे हैं या हैं वहां कुछ कराएंगे. वहां से आप ज्ञान प्राप्त करेंगे. वहां के ऐटमौसफियर को जानेंगे, वहां की डाइवर्सिटी और वैरायटी को सम?ोंगे. खास खानपान को चखेंगे. अच्छा लगेगा तो खाने के 2-4 डब्बे दूसरों के लिए ले जाएंगे. गैरधार्मिक यात्रा हरेक को नया बनाती है.

खर्च तो धार्मिक यात्रा में ज्यादा होता है क्योंकि आनेजाने, रहने के अलावा दानदक्षिणा में जेब ढीली करनी होती है. दूसरे टूर में आप उस जगह की निशानी ले कर आते हैं. वहां से सीख कर आते हैं, कुछ मांगते नहीं हैं.

राहुल गांधी की यात्रा का उद्देश्य जनता की सेवा करना हो, ऐसा नहीं लगता पर मंदिरों में भरपूर सरकारी पैसे से आयोजनों से जनता को कुछ नहीं मिलेगा यह पक्का है. कुछ को यह सुखद भाव मिल सकता है कि वे 1000 या 2000 साल की गुलामी के निशान मिटा रहे हैं पर जब पूरे देश पर बेरोजगारी, महंगाई, गरीबी, भूख, करप्शन, अन्याय की जंजीरें लगी हों, औरतें, लड़कियां पिता या पति के घर में भी सुरक्षित न हों, तो वैसा 1000-2000 साल में क्या रिवैंज?

दर्शनों के लिए अपनों के जत्थों के बीच रेलों, हवाईजहाजों, बसों, कारों के काफिलों और प्राइवेट व पब्लिक जेटों से कहीं भी पहुंचें पर आप को भारत के दर्शन नहीं होंगे, आप को सिर्फ मोमैंट्री एहसास होता कि हम ने इतिहास का बदला ले लिया पर क्या उस से लिया जिस ने आप के पुरखों को नुकसान पहुंचाया, जिस के बारे में आप खुद नहीं जानते, आप ने उसे देखा नहीं, आप ने उस के अत्याचार भुगते नहीं. आप ने बारबार पढ़ा था कि जुल्म हुआ पर यह भी संभव है कि आप का ब्रेनवाश किया गया है.

इस से अच्छा तो यह है कि आप डल लेक देखिए, आप ताजमहल देखें, अजंता की गुफाएं देखें, गोवा के तट देखें, राजस्थान का रेगिस्तान देखें, मध्य प्रदेश की भीम बैटका (भीम बैठका) गुफाएं देखें. हरेक से आप को अभूतपूर्व आनंद मिलेगा बिना नकली रोकटोक के, अपने प्राकृतिक सौंदर्य के बीच, बिना दक्षिणा के.

अपर लिप पर बहुत सारे बाल के कारण मैं परेशान हूं?

सवाल-

मेरी उम्र 16 वर्ष है. मेरे अपर लिप पर बहुत सारे बाल हैं, जिन की वजह से घर से निकलना मुश्किल हो जाता है. मैं इन को कैसे रिमूव करूं?

जवाब-

अपर लिप के बालों को हटाने के लिए बहुत सारे तरीके हैं. थ्रैडिंग या वैक्सिंग भी की जा सकती है. थ्रैडिंग में बहुत पेन होता है और धीरेधीरे बाल डार्क और थिक होने शुरू हो जाते हैं. वैक्सिंग से बाल सौफ्ट तो हो जाते हैं, मगर स्किन के बारबार खींचने से रिंकल्स पड़नी शुरू हो जाती हैं.

इसलिए इन बालों से हमेशा के लिए छुटकारा पाने के लिए पल्स लाइट या लेजर सब से अच्छा सलूशन है. पल्स लाइट करने में फ्लैशलाइट का इस्तेमाल होता है. अपर लिप के लिए 3-4 फ्लैशलाइट दी जाती हैं जिस में 2 मिनट लगते हैं. इस तरह से 5 या 6 सिटिंग्स में बाल हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं या यों कहें इतने कम और हलके व सौफ्ट हो जाते हैं कि दिखते भी नहीं हैं और अगर हलके हैं तो ब्लीच किए जा सकते हैं. यह इलाज बिलकुल सेफ है और पेनलैस भी है. 6 महीने के अंदर आप इन बालों से हमेशा के लिए छुटकारा पा लेंगी.

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लौकडाउन के चलते हम सब अपने घरों में कैद है. कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए 21 दिन के लौकडाउन की घोषणा के साथ ही हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं, जिससे हम इस वायरस को हरा पाएं. लौकडाउन के चलते महिलाएं भी अपनी सौंदर्य समस्या को लेकर परेशान हैं कि घर में रहकर किस तरह वो अपनी फिटनेस और ब्यूटी का ख्याल रखें. अब बात करें लड़कियों की तो भले ही हर महीने फेशियल, क्लीनअप और वैक्स ना करवाएं लेकिन अपरलिप्स और आइब्रो  जरूर सेट करवाती हैं.

ऐसे में अगर आप भी अपनी आइब्रो और अपरलिफ्स की बढ़ती ग्रोथ को लेकर परेशान हैं तो घबराने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि इस आर्टिकल में हम आपके लिए कुछ ऐसे टिप्स लेकर आए हैं जिससे आप घर में ही आसनी से इस प्रौब्लम से छुटकारा पा सकती हैं. जिससे आप सिर्फ अपने पति ही नहीं अपनी नजरों में भी हिट बनी रहेगी. भई सेल्फ केयर भी तो जरूरी है.

अगर आपके चेहरे पर बाल रहेंगे तो खूबसूरती वैसे ही फीकी पड़ जाएगी और जहां तक सवाल आइब्रो और होठों के उपर के बालों की है तो ये हर 15 दिन में इनकी ग्रोथ हो जाती है और ये दिखने में भी गंदे लगते हैं. हम यहां आपको अपरलिप्स के बाल हटाने के लिए कुछ घरेलू उपाय बता रहे हैं जिससे नेचुरल तरीके से ये हट जाएंगे. खासियत ये है कि इनके कोई साइड इफैक्ट नहीं होते और ये सारी चीजें आपके किचन में भी मौजूद रहती हैं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

डिलीवरी को आसान बनाने के लिए रोजाना करें ये एक्सरसाइज

पिछली पीढ़ी की ज्यादातर महिलाएं प्रसव से पहले तक रसोई और घर का सारा काम आसानी से संभालती थीं. लेकिन आज की महिलाओं के लिए प्रसव उतना आसान नहीं है. अब ज्यादा से ज्यादा महिलाएं गर्भधारण एवं प्रसव को कठिन कार्य मानती हैं. उन्हें प्रसव बेहद कष्टदायी लगने लगा है. इस कष्ट से बचने के लिए वे सिजेरियन डिलिवरी ज्यादा पसंद कर रही हैं, जो शरीर को आगे चल कर कमजोर बना देती है. इसलिए गर्भधारण से ले कर प्रसव व प्रसवोपरांत तक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए व्यायाम एक बेहतर विकल्प है. प्रसवकाल को सुखद बनाए रखने के लिए व्यायाम में फिजियोथेरैपी एक अच्छा माध्यम है. यह गर्भकाल और प्रसव के दौरान होने वाली कई तरह की परेशानियों से छुटकारा दिलाती है. 9 महीने के लंबे गर्भकाल में स्वास्थ्य का ध्यान रखना बहुत जरूरी है. इस के लिए फिजियोथेरैपी को नियमित रूप से अपनाना चाहिए-

स्ट्रैंथनिंग

कमर के लिए : पैरों को एकसाथ मिला कर कमर के आगे की तरफ लाते हुए आसन पर बैठ जाएं, फिर घुटनों को धीरेधीरे जमीन से छुआने की कोशिश करें. इस क्रिया को भी कई बार करें.

गले के लिए : इसे करने के लिए सीधे बैठें, फिर एक हाथ को मोड़ कर सिर के पीछे की तरफ का हिस्सा पकड़ें और कुहनियों को ऊपर की ओर उठाएं. यही क्रिया दूसरे हाथ से भी दोहराएं. आसन पर बैठ कर दोनों हाथों को आगे की ओर ले जाएं. फिर धीमी गति से सांस लेते हुए हाथों को दोनों ओर फैलाएं. इस क्रिया को 10-12 बार दोहराएं.

 पीठ के लिए : पैरों को जमीन पर टिकाते हुए कुरसी पर सीधी बैठ जाएं. फिर दोनों हाथों से कमर को पकड़ें. आसन पर धीरे से हाथों और घुटनों के बल टेक लगाते हुए झुकें, फिर धीरेधीरे पीछे के मध्य भाग को ऊपर और नीचे की ओर ले जाएं.

गले की पीछे की पेशियों के लिए : इस क्रिया को करने के लिए घर की किसी दीवार के पास खड़ी हो जाएं. कंधों के बराबर दोनों हथेलियों को जोड़ कर रखें. दोनों पैरों के बीच थोड़ी दूरी बना कर रखें यानी पैर मिलें नहीं. फिर दीवार से 30 सैंटीमीटर की दूरी पर खड़े हो कर कुहनियों को मोड़ कर धीरेधीरे नाक से दीवार छूने की कोशिश करें. यह क्रिया फिर दोहराएं. यह व्यायाम प्रसव को भी आसान बनाता है.

जांघों की पेशियों के लिए : इसे करने के लिए सीधी लेट जाएं और फिर एक मोटे तकिए को बारीबारी से घुटनों के बीच 10 मिनट तक दबाए रखें. ऐसा कई बार करें.

रिलैक्सेशन मैथेड : सब से पहले आसन पर लेट जाएं और अपनी सांस की गति पर ध्यान दें. फिर दोनों एडि़यों को 5 सैकंड तक दबा कर रखें. फिर ढीला छोड़ दें. यह क्रिया घुटनों, हथेलियों, कुहनियों, सिर आदि हिस्सों के साथ भी करें. इस से शरीर की पेशियां रिलैक्स होती हैं.

कीगल्स व्यायाम : कीगल्स व्यायाम को मूत्रत्याग के दौरान किया जाता है. इसे करने के लिए मूत्र के दौरान 3 से 5 सैकंड तक मूत्र को रोकरोक कर करें. इस से पेट के निचले हिस्से में कसावट आती है. गर्भवती महिलाओं के लिए यह बेहद महत्त्वपूर्ण व्यायाम है.

पैरों की पेशियों के लिए : इस क्रिया को करने के लिए पहले तो आसन पर बैठें. फिर आसन के ऊपर एक मोटा कपड़ा बिछा कर एडि़यों से उसे दबाएं. इस के बाद पैरों की उंगलियों से कपड़े को भीतर की ओर खींचने की कोशिश करें. इस क्रिया को भी कई बार दोहराएं. यह व्यायाम पैरों की पेशियों में कसावट लाने के साथसाथ फ्लैट फुट की समस्या को भी रोकता है, रक्तसंचार को बढ़ा कर पैरों की सूजन को भी कम करता है.

ध्यान देने योग्य बातें :

  1. दिन भर में एक बार व्यायाम जरूर करें और व्यायाम करते समय थकान और दर्द का ध्यान जरूर रखें.
  2. शुरू में व्यायाम कम समय के लिए करें. फिर धीरेधीरे समय बढ़ाएं.
  3. चिकनी फर्श पर व्यायाम बिलकुल न करें.
  4. व्यायाम करते समय ढीले वस्त्र पहनें.
  5. खाने के तुरंत बाद व्यायाम कभी न करें. खाने के कम से कम 2 घंटे बाद ही व्यायाम करें.
  6. गर्भावस्था के दौरान महिलाएं कम जगह वाले फर्नीचर पर न बैठें. इस से पेशियों पर ज्यादा दबाव पड़ता है.
  7. बैठते समय पीठ को कुरसी से सटा कर बैठें और पैरों को फर्श पर रखें.
  8. गर्भधारण के 20 सप्ताह बाद सीधी न लेटें, बल्कि सिर और कंधों को ऊंचा कर के लेटें. इस के लिए सिर के नीचे 2 तकिए लगा कर लेटें. ऐसा करना गर्भाशय की रक्तनलिकाओं में पड़ने वाले दबाव के कारण होने वाले हाइपरटैंशन को रोकता है.
  9. हाई हील के सैंडल पहनने से बचें, फ्लैट फुटवियर ही पहनें, इस से रीढ़ की हड्डी पर खिंचाव कम होगा.
  10. गर्भकाल के समय व्यायाम करने पर किसी भी प्रकार का दर्द या समस्या हो तो तुरंत स्त्रीरोग विशेषज्ञा की सलाह लें.व्यायाम से संबंधित विशेष जानकारी फिजियोथेरैपिस्ट से भी ले सकती हैं.

गर्भकाल के दौरान होने वाली समस्याएं

  1. पेट के निचले हिस्से में सिकुड़ी अवस्था में स्थित यूटरस गर्भकाल के हफ्तों बीतने के बाद विकसित हो जाता है. इस कारण शरीर के आगे के हिस्से में शरीर का भार बढ़ता है, जिस से शरीर का संतुलन बनाए रखने में समस्या उत्पन्न होने लगती है.
  2. कंधे लटकने लगते हैं. ऐसी अवस्था में मांसपेशियों में खिंचाव पड़ने लगता है.
  3. घुटने फूलने लगते हैं और दोनों पैरों में अंतर बढ़ जाता है, जिस की वजह से कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है.
  4. जिन महिलाओं का वजन ज्यादा होता है, उन की पेशियां ढीली होने की वजह से उन में फ्लैट फुट की समस्या उत्पन्न हो सकती है.
  5. पेट की मांसपेशियों में खिंचाव पड़ने की वजह से स्ट्रैस की समस्या उत्पन्न होने लगती है.
  6. आम अवस्था की अपेक्षा गर्भावस्था के दौरान ज्यादा आराम करने से मांसपेशियां कमजोर पड़ने लगती हैं.
  7. शरीर के आकार में बदलाव आने के कारण शरीर फैलने लगता है.

फिजियोथेरैपी के फायदे

  1. स्वास्थ्य बेहतर बना रहता है और शारीरिक परेशानियां कम होती हैं.
  2. व्यायाम सर्कुलेटरी प्रौब्लम्स, वैरिकोस वेंस समस्या और पैरों की सूजन को कम करता है.
  3. प्रसव के बाद स्वास्थ्य में भी बहुत तेजी से सुधार आता है.
  4. यह जोड़ों से संबंधित समस्याओं को कम करने के साथसाथ उन्हें रोकने में भी सहायक है.
  5. शरीर को नियंत्रित करने में मदद करती है.
  6. गर्भकाल के दौरान मधुमेह की समस्या होने से रोकती है.
  7. यह शरीर के आकार में भी संतुलन बनाए रखने के लिए सहायक है.
  8. फिजियोथेरैपी पेट की मांसपेशियों को सुचारु बनाए रखने में भी प्रभावकारी है.

ध्यान दें

गर्भावस्था के दौरान व्यायाम अच्छा है, लेकिन जरूरी नहीं है कि हर तरह का व्यायाम हर किसी के लिए फायदेमंद हो. गर्भावस्था और किसी भी प्रकार की शारीरिक बीमारी जैसे उच्च रक्तचाप, हृदय संबंधी बीमारी, एक से ज्यादा बार गर्भपात होना, गर्भाशय के द्रव में होने वाले बदलाव आदि में व्यायाम करना जोखिम भरा काम है. इस स्थिति में अपनी इच्छा से कोई व्यायाम न करें. गर्भकाल के शुरुआत से ही स्त्रीरोग विशेषज्ञा के निर्देशानुसार ही व्यायाम करें.

– डा. अरुण कुमार पी.टी, चीफ फिजियोथेरैपिस्ट, लक्ष्मी हौस्पिटल, कोच्चि

कोशिशें जारी हैं: शिवानी और निया के बीच क्या था रिश्ता

‘‘पहलीबार पता चला कि निया तुम्हारी बहू है, बेटी नहीं…’’ मिथिला शिवानी से कह रही थी और शिवानी मंदमंद मुसकरा रही थी.

‘‘क्यों, ऐसा क्या फर्क होता है बेटी और बहू में? दोनों लड़कियां ही तो होती हैं. दोनों ही नौकरियां करती हैं. आधुनिक डै्रसेज पहनती हैं. आजकल यह फर्क कहां दिखता है कि बहू सिर पर पल्ला रखे और बेटी…’’

‘‘नहीं… फिर भी,’’ मिथिला उस की बात काटती हुई बोली, ‘‘बेटी, बेटी होती है और बहूबहू. हावभाव से ही पता चल जाता है. निया तुम से जैसा लाड़ लड़ाती है, छोटीछोटी बातें शेयर करती है, तुम्हारा ध्यान रखती है, वैसा तो सिर्फ बेटियां ही कर सकती हैं. तुम दोनों की ऐसी मजबूत बौंडिग देख कर तो कोई सपने में भी नहीं सोच सकता कि तुम दोनों सासबहू हो. ऐसे हंसतीखिलखिलाती हो साथ में कि कालोनी में इतने दिन तक किसी ने यह पूछने की जहमत भी नहीं उठाई कि निया तुम्हारी कौन है. बेटी ही समझा उसे.’’

‘‘ऐसा नहीं है मिथिला. यह सब सोच की बातें हैं. कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर लड़कियां ठीक ही होती हैं. लेकिन जिस दिन लड़की पहला कदम घर में बहू के रूप में रखती है, रिश्ते बनाने की कोशिश उसी पल से शुरू हो जानी चाहिए, क्योंकि हम बड़े हैं, इसलिए कोशिशों की शुरूआत हमें ही करनी चाहिए और अगर उन कोशिशों को जरा भी सम्मान मिले तो कोशिशें जारी रहनी चाहिए. कभी न कभी मंजिल मिल ही जाती है. हां, यह बात अलग है कि अगर तुम्हारी कोशिशों को दूसरा तुम्हारी कमजोरी समझ रहा है तो फिर सचेत रहने की आवश्यकता भी है,’’ शिवानी ने अपनी बात रखी.

‘‘यह तो तुम ठीक कह रही हो… पर तुम दोनों तो देखने में भी बहनों सी ही लगती है. ऐसी बौंडिग कैसे बनाई तुम ने? प्यार तो मैं भी करती हूं अपनी बहू से पर पता नहीं हमेशा ऐसा क्यों लगता है कि यह रिश्ता एक तलवार की धार की तरह है. जरा सी लापरवाही दिखाई तो या तो पैर कट जाएगा या फिसल जाएगा. तुम दोनों कितने सहज और बिंदास रहते हो,’’ मिथिला अपने मन के भावों को शब्द देती हुई बोली.

‘‘बहू तो तुम्हारी भी बहुत प्यारी है मिथिला.’’

‘‘है तो,’’ मिथिला एक लंबी सांस खींच कर बोली, ‘‘पर सासबहू के रिश्ते का धागा इतना पतला होता है शिवानी कि जरा सा खींचा तो टूटने का डर, ढीला छोड़ा तो उलझने का डर. संभलसंभल कर ही कदम रखने पड़ते हैं. निश्चिंत नहीं रह सकते इस रिश्ते में.’’

‘‘हो सकता है… सब के अपनेअपने अनुभव व अपनीअपनी सोच है… निया के साथ मुझे ऐसा नहीं लगता,’’ शिवानी बात खत्म करती हुई बोली.

‘‘ठीक है शिवानी, मैं चलती हूं… कोई जरूरत हो तो बता देना. निया भी औफिस से आती ही होगी,’’ कहती हुई मिथिला चली गई. शिवानी इतनी देर बैठ कर थक गई थी, इसलिए लेट गई.

शिवानी को 15 दिन पहले बुखार ने आ घेरा था. ऐसा बुखार था कि शिवानी टूट गई थी. पूरे बदन में दर्द, तेज बुखार, उलटियां और भूख नदारद. निया ने औफिस से छुट्टी ले कर दिनरात एक कर दिया था उस की देखभाल में. उस की हालत देख कर निया की आंखें जैसे हमेशा बरसने को तैयार रहतीं. शिवानी का बेटा सुयश मर्चेंट नेवी में था. 6 महीने पहले वह अपने परिवार को इस कालोनी में शिफ्ट कर दूसरे ही दिन शिप पर चला गया था. 4 साल होने वाले थे सुयश व निया के विवाह को.

शिवानी के इतना बीमार पड़ने पर निया खुद को बहुत अकेला व असहाय महसूस कर रही थी. पति को आने के लिए कह नहीं सकती थी. वह बदहवास सी डाक्टर, दवाई और शिवानी की देखरेख में रातदिन लगी थी. इसी दौरान पड़ोसियों का घर में ज्यादा आनाजाना हुआ, जिस से उन्हें इतने महीनों में पहली बार उन दोनों के वास्तविक रिश्ते का पला चला था, क्योंकि सुयश को किसी ने देखा ही नहीं था. निया जौब करती, शिवानी घर संभालती. दोनों मांबेटी की तरह रहतीं और देखने में बहनों सी लगतीं.

निया की उम्र इस समय 30 साल थी और शिवानी की 52 साल. हर समय प्रसन्नचित, शांत हंसतीखिलखिलाती शिवानी ने जैसे अपनी उम्र 7 तालों में बंद की हुई थी. लंबी, स्मार्ट, सुगठित काया की धनी शिवानी हर तरह के कपड़े पहनती. निया भी लंबी, छरहरी, सुंदर युवती थी. दोनों कभी जींसटौप पहन कर, कभी सलवारसूट, कभी चूड़ीदार तो कभी इंडोवैस्टर्न कपड़े पहन कर इधरउधर निकल जातीं. उन के बीच के तारतम्य को देख कर किसी ने यह पूछना तो गैरवाजिब ही समझा कि निया उस की कौन है.

शिवानी लेटी हुई सोच रही थी कि कई महिलाएं यह रोना रोती हैं कि उन की बहू उन्हें नहीं समझती. लेकिन न हर बहू खराब होती है, न हर सास. फिर भी अकसर पूरे परिवार की खुशी के आधार, इस प्यारे रिश्ते के समीकरण बिगड़ क्यों जाते हैं. जबकि दोनों की जान एक ही इंसान, बेटे व पति के पास ही अटकी रहती है और उस इंसान को भी ये दोनों ही रिश्ते प्यारे होते हैं. इस एक रिश्ते की खटास बेटे का सारा जीवन डांवाडोल कर देती है, न पत्नी उसे पूरी तरह पा पाती है और न मां.

बहू जब पहला कदम घर में रखती है तो शायद हर सास यह बात भूल जाती है कि वह अब हमेशा के लिए यहीं रहने आई है, थोड़े दिनों के लिए नहीं और एक दिन उसी की तरह पुरानी हो जाएगी. आज मन मार कर अच्छीबुरी, जायजनाजायज बातों, नियमों, परंपराओं को अपनाती बहू एक दिन अपने नएपन के खोल से बाहर आ कर तुम्हारे नियमकायदे, तुम्हें ही समझाने लगेगी, तब क्या करोगे?

बेटी को तुम्हारी जो बातें नहीं माननी हैं उन्हें वह धड़ल्ले से मना कर देती है, तो चुप रहना ही पड़ता है. लेकिन अधिकतर बहुएं आज भी शुरूशुरू में मन मार कर कई नापसंद बातों को भी मान लेती हैं. लेकिन धीरेधीरे बेटे की जिंदगी की आधार स्तंभ बनने वाली उस नवयौवना से तुम्हें हार का एहसास क्यों होने लगता है कुछ समय बाद. उसी समय समेट लेना चाहिए था न सबकुछ जब बहू ने अपना पहला कदम घर के अंदर रखा था.

दोनों बांहों में क्यों न समेट लिया उस खुशी की गठरी को? तब क्यों रिश्तेदारों व पड़ोसियों की खुशी बहू की खुशी से अधिक प्यारी लगने लगी थी. बेटी या बहू का फर्क आज के जमाने में कोई खानपान या काम में नहीं करता. फर्क विचारों में आ जाता है.

बेटी की नौकरी मेहनत और बहू की नौकरी मौजमस्ती या टाइमपास, बेटी छुट्टी के दिन देर तक सोए तो आराम करने दो, बहू देर तक सोए तो पड़ोसी, रिश्तेदार क्या कहेंगे? बेटी को डांस का शौक हो और घर में घुंघरू खनकें तो कलाप्रेमी और बहू के खनकें तो घर है या कोठा? बेटी की तरह ही बहू भी नन्हीं, कोमल कली है किसी के आंगन की, जो पंख पसारे इस आंगन तक उड़ कर आ गई है.

आज पढ़लिख कर टाइमपास नौकरी करना नहीं है लड़कियों के शौक. अब लड़कियों के जीवन का मकसद है अपनी मंजिल को हर हाल में पाना. चाहे फिर उन का वह कोई शौक हो या कोई ऊंचा पद. वे सबकुछ संभाल लेंगी यदि पति व घरवाले उन का बराबरी से साथ दें, खुले आकाश में उड़ने में उन की मदद करें.

ऐसा होगा तो क्यों न होगी इस रिश्ते की मजबूत बौंडिंग. सास या बहू कोई हव्वा नहीं हैं, दोनों ही इंसान हैं. मानवीय कमजोरियों व खूबियों से युक्त एवं संवेदनाओं से ओतप्रोत. शिवानी अपनी सोचों के तर्कवितर्क में गुम थी कि तभी बाहर का दरवाजा खुला, आहट से ही समझ गई शिवानी कि निया आ गई. एक अजीब तरह की खुशी बिखेर देती है यह लड़की भी घर के अंदर प्रवेश करते ही. निया लैपटौप बैग कुरसी पर पटक कर उस के कमरे में आ गई.

‘‘हाय ममा.. हाऊ यार यू…,’’ कह कर वह चहकती हुई उस से लिपट गई.

‘‘फाइन… हाऊ वाज युअर डे…’’

‘‘औसम… पर मैं ने आप को कई बार फोन किया, आप रिसीव नहीं कर रही थीं. फिर सुकरानी को फोन कर के पूछा तो उस ने बताया कि आप ठीक हैं. वह लंच दे कर चली गई थी.’’

‘‘ओह, फोन. शायद औफ हो गया है.’’ शिवानी मोबाइल उठाती हुई बोली, ‘‘चल तेरे लिए चाय बना देती हूं.’’

‘‘नहीं, चाय मैं बनाती हूं. आप अभी कमजोर हैं. थोड़े दिन और आराम कर लीजिए’’, कह कर निया 2 कप चाय बना लाई और चाय पीतेपीते दिन भर का पूरा हाल शिवानी को सुनाना शुरू कर दिया.

‘‘अच्छा अब तू फ्रैश हो जा बेटा. चेंज कर ले. सुकरानी भी आ गई. मनपसंद कुछ बनवा ले उस से.’’

‘‘ममा, सुकरानी के हाथ का खा कर तो ऊब गई हूं. आप एकदम ठीक हो जाओ. कुछ ढंग का खाना तो मिलेगा,’’ वह शिवानी की गोद में सिर रख कर लेट गई और शिवानी उस के बालों को सहलाती रही.

जब सुयश शिप पर होता था तो निया शिवानी के साथ ही सो जाती थी. खाना खा कर दिन भर की थकी हुई निया लेटते ही गहरी नींद सो गई. उस का चेहरा ममता से निहारती शिवानी फिर खयालों में डूब गई. ‘कौन कहता है कि इस रिश्ते में प्यार नहीं पनप सकता… उन दोनों का जुड़ाव तो ऐसा है कि प्यार में मांबेटी जैसा, समझदारी में सहेलियों जैसा और मानसम्मान में सासबहू जैसा.’

छत को घूरतेघूरते शिवानी अपने अतीत में उतर गई. पति की असमय मृत्यु के बाद छोटे से सुयश के साथ जिंदगी फूलों की सेज नहीं थी उस के लिए. कांटों से अपना दामन बचाते, संभालते जिंदगी अत्यंत दुष्कर लगती थी कभीकभी. वह ओएनजीसी में नौकरी करती थी. पति के रहते कई बार घर और सुयश के कारण नौकरी छोड़ देने का विचार आया. पर अब वही नौकरी उस के लिए सहारा बन गई थी. सुयश बड़ा हुआ. वह उसे मर्चेंट नेवी में नहीं भेजना चाहती थी पर सुयश को यह जौब बहुत रोमांचक लगता था. सुयश लंबे समय के लिए शिप पर चला जाता और वह अकेले दिन बिताती.

इसलिए वह सुयश पर शादी के लिए दबाव डालने लगी. तब सुयश ने निया के बारे में बताया. निया उस के दोस्त की बहन थी. निया मराठी परिवार से थी और वह हिमाचल के पहाड़ी परिवार से. सुन कर ही दिल टूट गया उस का. पता नहीं कैसी होगी? पर विद्रोह करने का मतलब इस रिश्ते में वैमनस्य का पहला बीज बोना.

उस ने कुछ भी बोलने से पहले लड़की से मिलने का मन बना लिया पर जब निया से मिली तो सारे पूर्वाग्रह जैसे समाप्त हो गए. लंबी, गोरी, छरहरी, खूबसूरत, सौम्य, चेहरे पर दिलकश मुसकान लिए निया को देख कर विवाह की जल्दी मचा डाली. निया अपने मम्मीपापा की इकलौती लाडली बेटी थी. अच्छे संस्कारों में पली लाडली बेटी को प्यार लेना और देना तो आता था पर जिम्मेदारी जैसी कोई चीज लेना आजकल की बच्चियों को नहीं आता. बिंदास तरह से पलती हैं और बिंदास तरह से रहती हैं.

और इस बात को बेटी न होते हुए भी, बेटी की मां जैसा अनुभव कर शिवानी ने निया के गृहप्रवेश करते समय ही गांठ बांध लिया. दोनों बांहों से उस ने ऐसा समेटा निया को कि उस का माइनस तो कुछ दिखा ही नहीं, बल्कि सबकुछ प्लसप्लस होता चला गया. निया देर से सो कर उठती, तो घर में काम करने वाली के पेट में भी मरोड़ होने लगती पर शिवानी के चेहरे पर शिकन न आती.

निया के कुछ कपड़े संस्कारी मन को पसंद न आते पर पड़ोसियों से ज्यादा परवाह बहूबेटे की खुशियों की रहती. उन दोनों को पसंद है, पड़ोसी दुखी होते हैं तो हो लें. कुछ महीने रह कर सुयश 6 महीने के लिए शिप पर चला गया. निया अपनी जौब छोड़ कर आई थी इसलिए वह अपने लिए नई जौब ढूंढ़ने में लगी थी. शिवानी ने सुयश के जौब में आने के बाद रिटायरमैंट ले लिया था. वह अब दौड़तीभागती जिंदगी से विराम चाहती थी. फिलहाल जो एक कोमल पौधा उस के आंगन में रोपा गया था, उसे मजबूती देना ही उस का मकसद था.

पर सुयश के शिप पर जाने के बाद निया मायके जाने के लिए कसमसाने लगी थी. शिवानी इसी सोच में थी कि अब उसे अकेले नहीं रहना पड़ेगा. पर जब निया ने कहा, ‘‘ममा, जब तक सुयश शिप में है, मैं मुंबई चली जाऊं? सुयश के आने से पहले आ जाऊंगी?’’

न चाहते हुए भी उस ने खुशीखुशी निया को मुंबई भेज दिया. यह महसूस कर कि अभी वह बिना पति के इतना लंबा वक्त उस के साथ कैसे बिताएगी. नए रिश्ते को, नए घर को अपना समझने में समय लगता है. सुयश के आने से कुछ दिन पहले ही निया वापस आई. हां, वह मुंबई से उसे फोन करती रहती और वह खुद भी उसी की तरह बिंदास हो कर बात करती. अपने जीवन में उस की खूबी को महसूस कराती. घर में उस की कमी को महसूस कराती पर अपनी तरफ से आने के लिए कभी नहीं कहती.

सुयश ने भी कुछ नहीं कहा. निया वापस आई तो शिवानी ने उसे बिछड़ी बेटी की तरह गले लगा लिया. सुयश कुछ महीने रह कर फिर शिप पर चला गया. पर इस बार निया में परिवर्तन अपनेआप ही आने लगा था. स्वभाव तो उस का प्यारा पहले से ही था पर अब वह उस के प्रति जिम्मेदारी भी महसूस करने लगी थी. इसी बीच निया को जौब मिल गई.

शिवानी खुद ही निया के रंग में रंग गई. निया ने जब पहली बार उस के लिए जींस खरीदने की पेशकश की तो उस ने ऐतराज किया, ‘‘ममा पहनिए, आप पर बहुत अच्छी लगेगी.’’

और उस के जोर देने पर वह मान गई कि बेटी भी होती तो ऐसा ही कर सकती थी. समय बीततेबीतते उन दोनों के बीच रिश्ता मजबूत होता चला गया. औपचारिकता के लिए कोई जगह ही नहीं रह गई. कोशिश तो किसी भी रिश्ते में सतत करनी पड़ती है. फिर एक समय ऐसा आता है जब उन कोशिशों को मुकाम हासिल हो जाता है.

जितना खुलापन, प्यार, अपनापन, विश्वास, उस ने शुरू में निया को दिया और उसे उसी की तरह जीने, रहने व पहनने की आजादी दी, उतना ही वह अब उस का खयाल रखने लगी थी. बेटी की तरह उस की छोटीछोटी बातें अकसर उस की आंखों में आंसू भर देती. कभी वह उस को शाल यह कह कर ओढ़ा देती, ‘‘ममा ठंड लग जाएगी.’’ कभी उस की ड्रैस बदला देती, ‘‘ममा यह पहनो. इस में आप बहुत सुंदर लगती हैं. मेरी फ्रैंड्स कहती हैं तेरी ममा तो बहुत सुंदर और स्मार्ट है.’’

निया ने ही उसे ड्राइविंग सिखाई. हर नई चीज सीखने का उत्साह जगाया. वह खुद ही पूरी तरह निया के रंग में रंग गई और अब ऐसी स्थिति आ गई थी कि दोनों एकदूसरे को पूछे बिना न कुछ करतीं, न पहनतीं. हर बात एकदूसरे को बतातीं. इतना अटूट रिश्ता तो मांबेटी के बीच भी नहीं बन पाता होगा. सोच कर शिवानी मुसकरा दी.

सोचतेसोचते शिवानी ने निया की तरफ देखा. वह गहरी नींद में थी. उस ने उस की चादर ठीक की और लाइट बंद कर खुद भी सोने का प्रयास करने लगी. दूसरे दिन रविवार था. दोनों देर से सो कर उठीं.

दैनिक कार्यक्रम से निबट कर दोनों बैडरूम में ही बैठ कर नाश्ता कर रही थीं कि उन की पड़ोसिनें मिथिला, वैशाली, मधु व सुमित्रा आ धमकीं. निया सब को नमस्ते कर के उठ गई.

‘‘अरे वाह, आओआओ… आज तो सुबहसुबह दर्शन हो गए. कहां जा रही हो चारों तैयार हो कर?’’ शिवानी मुसकरा कर नाश्ता खत्म करती हुई बोली.

‘‘हम सोच रहे थे शिवानी कि कालोनी का एक गु्रप बनाया जाए, जिस से साल में आने वाले त्योहार साथ में मनाएं मिलजुल कर,’’ मिथिला बोली.

‘‘इस से आपस में मिलनाजुलना होगा और जीवन की एकरसता भी दूर होगी,’’ वैशाली बात को आगे बढ़ाते हुए बोली.

‘‘हां और क्या… बेटेबहू तो चाहे साथ में रहें या दूर अपनेआप में ही मस्त रहते हैं. उन की जिंदगी में तो हमारे लिए कोई जगह है ही नहीं… बहू तो दूध में पड़ी मक्खी की तरह फेंकना चाहती है सासससुर को,’’ मधु खुद के दिल की भड़ास उगलती हुई बोली.

‘‘ऐसा नहीं है मधु… बहुएं भी आखिर बेटियां ही होती हैं. बेटियां अच्छी होती हैं फिर बहुएं होते ही वे बुरी कैसे बन जातीं हैं, मां अच्छी होती हैं फिर सास बनते ही खराब कैसे हो जाती हैं? जाहिर सी बात है कि यह रिश्ता नुक्ताचीनी से ही शुरू होता है. एकदूसरे की बुराइयों, कमियों और गलतियों पर उंगली रखने से ही शुरुआत होती है.

‘‘मांबेटी तो एकदूसरे की अच्छीबुरी आदतें व स्वभाव जानती हैं और उन्हें इस की आदत हो जाती है. वे एकदूसरे के स्वभाव को ले कर चलती हैं पर सासबहू के रूप में दोनों कुछ भी गलत सहन नहीं कर पाती हैं. आखिर इस रिश्ते को भी तो पनपने में, विकसित होने में समय लगता है. बेटी के साथ 25 साल रहे और बहू 25 साल की आई, तो कैसे बन पाएगा एक दिन में वैसा रिश्ता.’ उस रिश्ते को भी तो उतना ही समय देना पड़ेगा. कोशिशें निरंतर जारी रहनी चाहिए. एकदूसरे को सराहने की, प्यार करने की, खूबसूरत पहलुओं को देखने की,’’ शिवानी ने अपनी बात रखी.

‘‘तुम्हें अच्छी बहू मिल गई न… इसलिए कह रही हो. हमारे जैसी मिलती तो पता चलता,’’ सुमित्रा बोली.

‘‘लेकिन बेटे की पत्नी व बहू के रूप में देखने से पहले उसे उस के स्वतंत्र व्यक्तित्व के साथ क्यों नहीं स्वीकार करते? उस की पहचान को प्राथमिकता क्यों नहीं देते? उस पर अपने सपने थोपने के बजाए उस के सपनों को क्यों नहीं समझते? उस के उड़ने के लिए दायरे का निर्धारण तुम मत करो. उसे खुला आकाश दो जैसे अपनी खुद की बेटी के लिए चाहते हो, उस के लिए नियम बनाने के बजाए उसे अपने जीवन के नियम खुद बनाने दो, उसे अपने रंग में रंगने के बजाए उस के रंग में रंगने की कोशिश तो करो, तुम्हें पता नहीं चलेगा, कब वह तुम्हारे रंग में रंग गई.

‘‘आखिर सभी को अपना जीवन अपने हिसाब से जीने का पूरा हक है. फिर बहू से ही शिकायतें व अपेक्षा क्यों?’’ बड़े होने के नाते आज उस की गलतसही आदतों को समाओ तो सही, कल इस रिश्ते का सुख भी मिलेगा. कोशिश तो करो. हालांकि, देर हो गई है पर कोशिश तो की जा सकती है. रिश्तों को कमाने की कोशिशें सतत जारी रहनी चाहिए सभी की तरफ से,’’ शिवानी मुसकरा कर बोली.

‘‘मैं यह नहीं कहती कि इस से हर सासबहू का रिश्ता अच्छा हो जाएगा पर हां, इतना जरूर कह सकती हूं कि हर सासबहू का रिश्ता बिगड़ेगा नहीं,’’ उस ने आगे कहा.

चारों सहेलियां विचारमग्न सी शिवानी को देख रहीं थी और बाहर से उन की बातें सुनती निया मुसकराती हुई अपने कमरे की तरफ चली गई.

Valentine’s Day 2024: बनें एक-दूजे के लिए

विवाह के पहले और विवाह के बाद जीने के उद्देश्य अलगअलग प्रकार के होते हैं. विवाह से पहले हम सैल्फ सैंटर्ड लाइफ जीते हैं. विवाह के बाद एकदूजे के लिए जीने का अभ्यास करना ही पतिपत्नी की सफलता का मानदंड होता है. आइए जानते हैं कि हम कैसे स्वस्थ मानसिकता के साथ परिस्थितियों के अनुकूल या प्रतिकूल होने पर दोनों स्थितियों में अपनी सही सोच के साथ जीवन के इस अहम पड़ाव पर स्थिरता और खुशनुमा पारिवारिक माहौल बना कर अपने लाइफपार्टनर के सुखदुख के साथी बनें:

क्या करें

एकदूसरे के लिए पर्याप्त समय सुनिश्चित करें, समय बात सुनने का, समय साथ रहने का, युगलरूप में काम में हाथ बंटाने का. जल्दीबाजी छोड़ कर धैर्य के साथ यह सब करने का पर्याप्त समय होना चाहिए.

जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति  करते हुए टीम भावना से छोटीछोटी बातों को भी ऐंजौय करें.

सभी के साथ रिलेशनशिप को मुसकरा कर उत्साह के साथ जीएं. ऐसा करेंगे तो संपर्क में आने वाले सभी लोग मुसकराहट और उत्साह के साथ पेश आएंगे.

इन शब्दों का इस्तेमाल उचित अवसर पर करते रहें- धन्यवाद, हां, डियर, आप ठीक हैं, क्षमा कीजिए, मैं गलत था, आई एम सौरी आदि.

महीने में कम से कम 1 दिन पूरा समय एकदूसरे के साथ बिताएं. जो दोनों को रुचिकर लगे वैसा कार्यक्रम बना कर उस में समय व्यतीत करें.

जो भी बात अच्छी लगे उस के लिए एकदूसरे से धन्यवाद की अभिव्यक्ति करें.

अपनी बातचीत में हास्य का पुट भरें. यहां तक कि यदि मतभेद हो तो उस का अंत भी हास्य के पुट के साथ करें.

टोटल मेकओवर और ड्रैस एकदूसरे की पसंद के अनुसार हो. इस से एकदूसरे के लिए आकर्षण बढ़ता है.

हमेशा खुश रहने का फैसला करें. पौजिटिव सोच अपना कर अपनी भावनाओं को नियंत्रण में रखें.

सामान्य जीवन बिताने के लिए भीड़ में समय बिताने से बचें. सरल तरीके से जीएं. जीवन जटिल न हो तो अच्छा है.

वार्त्तालाप करें वह स्नेह और प्यार की भावना के साथ करें. एकदूसरे को समझने की ईमानदारी से कोशिश करें.

मोनालिसा मिश्रा ने संबंधित विषय पर कई शोधपत्र लिखे हैं जिन का सार संक्षेप में प्रस्तुत है. वैवाहिक जीवन में प्रवेश करने पर इस पर ध्यान देना बहुत लाभदायक रहेगा:

अच्छे संवाद और वार्त्तालाप: एकदूसरे से बातें करने में संकोच न करें. बातें कीजिए. एकदूसरें की बात ध्यान से सुनें. सीक्रेट भी शेयर करें. किंतु विवेक के साथ. बातें करते समय आईकौंटैक्ट का भी ध्यान रखें. संवाद और वार्त्तालाप मधुर हो. मुद्दे बना कर क्रोध और झगड़ा न करें: क्रोध झगड़े में आग में घी का काम करता है. जब क्रोध में हों तो संवाद स्थगित कर दें. बातचीत के लिए सौहार्दपूर्ण माहौल का इंतजार करें. एकदूसरे के लिए त्याग की भावाना रखें. मिथ्या भ्रम न पालें कि हर बात आप की मानी जाए. गिव ऐंड टेक की पौलिसी अच्छी पौलिसी है. तनावरहित होने पर सभी बातें उचित नजरिए के साथ ली जा सकती हैं. अपने लाइफपार्टनर को उत्साहित करते रहें. उस के हर अच्छे कार्य की सराहना करें. उस की सहायता करें. क्षमाशील बनें. उस की योग्यता बढ़ाने के लिए हमेशा प्रयत्न करें. उसे वयस्क रूप में लें. किडिंग से परहेज करें.

क्रिया और प्रतिक्रिया: मानवी रिलेशंस के लेखकों का मत है कि हर व्यवहार और कार्य की प्रतिक्रिया स्वाभाविक होती है, इसलिए प्रतिक्रिया उचित सीमा के भीतर और समय के अनुसार होनी चाहिए. ऐसा न हो अपनी बात मनवाने में आप संबंध बिगाड़ लें. किसी भी कीमत पर संबंध बनाए रखना वैवाहिक जीवन का आधार होता है, यह ध्यान रखें. उचित मानसिकता के साथ शांति बनाए रखें.संबंध में संतुष्टि प्रमुख है: चिंता दीमक की तरह हानिकारक होती है. किसी भी समस्या को आवश्यकता से अधिक तूल न दें. संबंध बनाए रखने में अपनी जिम्मेदारी निभाएं. अपने लाइफपार्टनर का सैल्फ कौन्फिडैंस बनाए रखें. उसे कमजोर बना कर कुछ हासिल नहीं होने वाला है. समयसमय पर विश्वास की अभिव्यक्ति करते रहें. मतभेद की स्थिति में मतभेद न पैदा होने दें. गौतम बुद्ध ने कहा है कि विजयी बनने के लिए दूसरे को हर्ट नहीं करना चाहिए.

परफैक्ट मैच बनने के लिए निम्न सुझाव अमल में लाएं:

विवाह दीर्घकालीन समन्वय और नजदीकी रिश्ता है, जो एकदूसरे की पसंद पर आधारित है. इसे खुले दिलदिमाग से स्वीकारें.

नजरिए को लचीला रखें ताकि पार्टनर के दृष्टिकोण और भावनाओं का आदर कर सकें. ऐसा करने से प्यार पनपता रहेगा. रिश्ता बनाने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है.

वैवाहिक संतुष्टि को बढ़ाने के लिए एकदूसरे को इमोशनल सपोर्ट दें ताकि आपसी सूझबूझ से भावनात्मक जुड़ाव बना रहे. इस से कर्तव्यबद्धता और कमिटमैंट जैसे गुणों का विकास होगा.

पार्टनर की अपेक्षाओं पर खरे उतरें. उस की मानसिकता को पहचानें. संदेह द्वारा असंतुष्टि और असुरक्षा की भावना एकदूसरे को न दें.

अपने लाइफपार्टनर के बारे में कोई गलत धारणा न बनाएं. तथ्यों के बिना अर्थपूर्ण बातचीत होना संभव नहीं होता है. महत्त्वपूर्ण डिस्कशन पतिपत्नी अकेले में ही करें. किसी अन्य व्यक्ति से समस्या पर विचारविमर्श न करें. अपनी प्राइवेसी बनाए रखें.

अवास्तविक अपेक्षाएं रखेंगे तो दुख ही मिलेगा. गिव ऐंड टेक की भावना होगी तो अपेक्षाएं अवश्य पूरी होंगी. धैर्य बनाए रखें.

प्रसिद्ध कवि रूप नारायण त्रिपाठी की निम्न पंक्तिया सुखी वैवाहिक जीवन के लिए प्रेरक हैं:

जहां पर फूल खिलते हैं उसे उद्यान कहते हैं,
जहां पर रूप जलता है उसे श्मशान कहते हैं,
मगर उद्यान और श्मशान में बस फर्क इतना है,
कि हम उजड़े हुए उद्यान को श्मशान कहते हैं.

अब आप ही फैसला करें कि अपने जीवन को आप ने महकता हुआ उद्यान बनाना है या उन खुशियों से वंचित रहना है जिन के आप सही माने से हकदार हैं.

Valentine’s Day 2024: कठपुतली- शादी के बाद मीता से क्यों दूर होने लगा निखिल?

जैसे ही मीता के विवाह की बात निखिल से चली वह लजाई सी मुसकरा उठी. निखिल उस के पिताजी के दोस्त का इकलौता बेटा था. दोनों ही बचपन से एकदूसरे को जानते थे. घरपरिवार सब तो देखाभाला था, सो जैसे ही निखिल ने इस रिश्ते के लिए रजामंदी दी, दोनों को सगाई की रस्म के साथ एक रिश्ते में बांध दिया गया.

मीता एक सौफ्टवेयर कंपनी में काम करती थी और निखिल अपने पिताजी के व्यापार को आगे बढ़ा रहा था.

2 महीने बाद दोनों परिणयसूत्र में बंध कर पतिपत्नी बन गए. निखिल के घर में खुशियों का सावन बरस रहा था और मीता उस की फुहारों में भीग रही थी.

वैसे तो वे भलीभांति एकदूसरे के व्यवहार से परिचित थे, कोई मुश्किल नहीं थी, फिर भी विवाह सिर्फ 2 जिस्मों का ही नहीं 2 मनों का मिलन भी तो होता है.

विवाह को 1 महीना पूरा हुआ. उन का हनीमून भी पूरा हुआ. अब निखिल ने फिर काम पर जाना शुरू कर दिया. मीता की भी छुट्टियां समाप्त हो गईं.

‘‘निखिल पूरा 1 महीना हो गया दफ्तर से छुट्टी किए. आज जाना है पर तुम्हें छोड़ कर जाने को मन नहीं कर रहा,’’ मीता ने बिस्तर पर लेटे अंगड़ाई लेते हुए कहा.

‘‘हां, दिल तो मेरा भी नहीं, पर मजबूरी है. काम तो करना है न,’’ निखिल ने जवाब दिया. तो मीता मुसकरा दी.

अब रोज यही रूटीन रहता. दोनों सुबह उठते, नहाधो कर साथ नाश्ता कर अपनेअपने दफ्तर रवाना हो जाते. शाम को मीता थकीमांदी लौट कर निखिल का इंतजार करती रहती कि कब निखिल दफ्तर से आए और कब दो मीठे बोल उस के मुंह से सुनने को मिलें.

एक दिन वह निखिल से पूछ ही बैठी, ‘‘निखिल, मैं देख रही हूं जब से हमारी शादी हुई है तुम्हारे पास मेरे लिए वक्त ही नहीं.’’

‘‘मीता शादी करनी थी हो गई… अब काम भी तो करना है.’’

निखिल का जवाब सुन मीता मुसकरा दी और फिर मन ही मन सोचने लगी कि निखिल कितना जिम्मेदार है. वह अपने वैवाहिक जीवन से बहुत खुश थी. वही करती जो निखिल कहता, वैसे ही रहती जैसे निखिल चाहता. और तो और खाना भी निखिल की पसंदनापसंद पूछ कर ही बनाती. उस का स्वयं का तो कोई रूटीन, कोई इच्छा रही ही नहीं. लेकिन वह खुद को निखिल को समर्पित कर खुश थी. इसलिए उस ने निखिल से कभी इन बातों की शिकायत नहीं की. वह तो उस के प्यार में एक अनजानी डोर से बंध कर उस की तरफ खिंची जा रही थी. सो उसे भलाबुरा कुछ महसूस ही नहीं हो रहा था.

वह कहते हैं न कि सावन के अंधे को सब हरा ही हरा दिखाई देता है. बस वैसा ही हाल था निखिल के प्रेम में डूबी मीता का. निखिल रात को देर से आता. तब तक वह आधी नींद पूरी भी कर चुकी होती.

एक बार मीता को जम्हाइयां लेते देख निखिल बोला, ‘‘क्यों जागती हो मेरे लिए रात को? मैं बाहर ही खा लिया करूंगा.’’

‘‘कैसी बात करते हो निखिल… तुम मेरे पति हो, तुम्हारे लिए न जागूं तो फिर कैसा जीवन? वैसे भी हमें कहां एकदूसरे के साथ बैठने के लिए वक्त मिलता है.’’ मीता ने कहा.

विवाह को 2 वर्ष बीत गए, किंतु इन 2 वर्षों में दोनों रात और दिन की तरह हो गए. एक आता तो दूसरा जाता.

एक दिन निखिल ने कहा, ‘‘मीता तुम नौकरी क्यों नहीं छोड़ देतीं… हमें कोई पैसों की कमी तो नहीं. यदि तुम घर पर रहो तो शायद हम एकदूसरे के साथ कुछ वक्त बिता सकें.’’

जैसे ही मीता ने अपनी दफ्तर की कुलीग नेहा को इस बारे में बताया, वह कहने लगी, ‘‘मीता, नौकरी मत छोड़ो. सारा दिन घर बैठ कर क्या करोगी?’’

मगर मीता कहां किसी की सुनने वाली थी, उसे तो जो निखिल बोले बस वही ठीक लगता था. सो आव देखा न ताव इस्तीफा लिख कर अपनी बौस के पास ले गई. वे भी एक महिला थीं, सो पूछने लगीं, ‘‘मीता, नौकरी क्यों छोड़ रही हो?’’

‘‘मैम, वैवाहिक जीवन में पतिपत्नी को मिल कर चलना होता है, निखिल तो अपना कारोबार दिन दूना रात चौगुना बढ़ा रहा है, यदि पतिपत्नी के पास एकदूसरे के लिए समय ही नहीं तो फिर कैसी गृहस्थी? फिर निखिल तो अपना कारोबार बंद करने से रहा. सो मैं ही नौकरी छोड़ दूं तो शायद हमें एकदूसरे के लिए कुछ समय मिले.’’

बौस को लगा जैसे मीता नौकरी छोड़ कर गलती कर रही है, किंतु वे दोनों के प्यार में दीवार नहीं बनाना चाहती थीं, सो उस ने मीता का इस्तीफा स्वीकार कर लिया.

अब मीता घर में रहने लगी. जैसे आसपास की अन्य महिलाएं घर की साफसफाई, साजसज्जा, खाना बनाना आदि में वक्त व्यतीत करतीं वैसे ही वह भी अपना सारा दिन घर के कामों में बिताने लगी. कभी निखिल अपने बाहर के कामों की जिम्मेदारी उसे सौंप देता तो वह कर आती, सोचती उस का थोड़ा काम हलका होगा तो दोनों को आपस में बतियाने के लिए वक्त मिलेगा. उस की दफ्तर की सहेलियां कभीकभी फोन पर पूछतीं, ‘‘मीता, घर पर रह कर कैसा लग रहा है?’’

‘‘बहुत अच्छा, सब से अलग,’’ वह जवाब में कहती.

दीवानी जो ठहरी अपने निखिल की. दिन बीते, महीने बीते और पूरा साल बीत गया. मीता तो अपने निखिल की मीरा बन गई समझो. निखिल के इंतजार में खाने की मेज पर ही बैठ कर ऊंघना, आधी रात जाग कर खाना परोसना तो समझो उस के जीवन का हिस्सा हो गया था.

अब वह चाहती थी कि परिवार में 2 से बढ़ कर 3 सदस्य हो जाएं, एक बच्चा हो जाए तो वह मातृत्व का सुख ले सके. वैसे तो वह संयुक्त परिवार में थी, निखिल के मातापिता भी साथ में ही रहते थे, किंतु निखिल के पिता को तो स्वयं कारोबार से फुरसत नहीं मिलती और उस की मां अलगअलग गु्रप में अपने घूमनेफिरने में व्यस्त रहतीं.

‘‘निखिल कितना अच्छा हो हमारा भी एक बच्चा हो. आप सब तो पूरा दिन मुझे अकेले छोड़ कर बाहर चले जाते हो… मुझे भी तो मन लगाने के लिए कोई चाहिए न,’’ एक दिन मीता ने निखिल के करीब आते हुए कहा.

जैसे ही निखिल ने यह सुना वह उस के छिटकते हुए कहने लगा, ‘‘मीता, अभी मुझे अपने कारोबार को और बढ़ाना है. बच्चा हो गया तो जिम्मेदारियां बढ़ जाएंगी और फिर अभी हमारी उम्र ही क्या है.’’

मीता ने उसे बहुत समझाया कि वह बच्चे के लिए हां कह दे, किंतु निखिल बड़ी सफाई से टाल गया, बोला, ‘‘क्यों मेरा हनीमून पीरियड खत्म कर देना चाहती हो?’’

उस की बात सुन मीता एक बार फिर मुसकरा दी. बोली, ‘‘निखिल तुम बहुत चालाक हो.’’

मगर मीता अकेले घर में कैसे वक्त बिताए हर इंसान की अपनी दुनिया होती है. वह भी अपनी दुनिया बसाना चाहती थी, किंतु निखिल की न सुन कर चुप हो गई और निखिल अपनी दुनिया में मस्त.

एक दिन मीता बोली, ‘‘निखिल, मैं सोचती थी कि मैं नौकरी छोड़ दूंगी तो हमें एकसाथ समय बिताने को मिलेगा, किंतु तुम तो हर समय घर पर भी अपना लैपटौप ले कर बैठे रहते हो या फिर फोन पर बातों में लगे रहते हो.’’

उस की यह बात सुन निखिल बिफर गया. गुस्से में बोला, ‘‘तो क्या घर बैठ कर तुम्हारे पल्लू से बंधा रहूं? मैं मर्द हूं. अपनेआप को काम में व्यस्त रखना चाहता हूं, तो तुम्हें तकलीफ क्यों होती है?’’

मीता निखिल की यह बात सुन अंदर तक हिल गई. मन ही मन सोचने लगी कि इस में मर्द और औरत वाली बात कहां से आ गई.

हां, जब कभी निखिल को कारोबार संबंधी कागजों पर मीता के दस्तखत चाहिए होते तो वह बड़ी मुसकराहट बिखेर कर उस के सामने कागज फैला देता और कहता, ‘‘मालकिन, अपनी कलम चला दीजिए जरा.’’

कभी वह रसोई में आटा गूंधती बाहर आती तो कभी अपनी पसंदीदा किताब पढ़ती बीच में छोड़ती और मुसकरा कर दस्तखत कर देती.

मीता का निखिल के प्रति खिंचाव अभी भी बरकरार था. सो आज अकेले में मुसकुराने लगी और सोचा कि ठीक ही तो कहा निखिल ने. घर के लिए ही तो काम करता है सारा दिन वह, मैं ही फालतू उलझ बैठी उस से.

शाम को जब वह आया तो वह पूरी मुसकराहट के साथ उस के स्वागत में खड़ी थी, लेकिन निखिल का रुख कुछ बदला हुआ था. मीता उस के चेहरे के भाव पढ़ कर समझ गई कि निखिल उस से सुबह की बात को ले कर अभी तक नाराज है. सो उस ने उसे खूब मनाया. कहा, ‘‘निखिल, क्या बच्चों की तरह नाराज हो गए? हम दोनों जीवनपथ के हमराही हैं, मिल कर साथसाथ चलना है.’’

लेकिन निखिल के चेहरे पर से गुस्से की रेखाएं हटने का नाम ही नहीं ले रही थीं. क्या करती बेचारी मीता. आंखें भर आईं तो चादर ओढ़ कर सो गई.

निखिल अगली सुबह भी उसे से नहीं बोला. घर से बिना कुछ खाए निकल गया.

आज पहली बार मीता का दिल बहुत दुखी हुआ. वह सोचने लगी कि आखिर ऐसा भी क्या कह दिया था उस ने कि निखिल 3 दिन तक उस बात को खींच रहा है.

अब वह घर में निखिल से जब भी कुछ कहना चाहती उस का पौरुषत्व जाग उठता. एक दिन तो गुस्से में उस के मुंह से निकल ही गया, ‘‘क्यों टोकाटाकी करती रहती हो दिनरात?

तुम्हारे पास तो कुछ काम है नहीं…ये जो रुपए मैं कमा कर लाता हूं, जिन के बलबूते पर तुम नौकरों से काम करवाती हो, वो ऐसे ही नहीं आ जाते. दिमाग खपाना पड़ता है उन के लिए.’’

आज तो निखिल ने सीधे मीता के अहम पर चोट की थी. वह अपने आंसुओं को पोंछते हुए बिस्तर पर धम्म से जा पड़ी. सारी रात उसे नींद नहीं आई. करवटें बदलती रही. उसे लगा शायद निखिल ने गुस्से में आ कर कटु शब्द बोल दिए होंगे और शायद रात को उसे मना लेगा. लेकिन इस रात की तो जैसे सुबह ही नहीं हुई. जहां वह करवटें बदलती रही वहीं निखिल खर्राटे भर कर सोता रहा.

अब तो यह खिटपिट उन के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन गई थी. इसलिए उस ने निखिल से कई बातों पर बहस करना ही बंद कर दिया था. कई बार तो वह उस के सामने मौन व्रत ही धारण कर लेती.

सिनेमाहाल में नई फिल्म लगी थी. मीता बोली, ‘‘निखिल, मैं टिकट बुक करा देती हूं. चलो न फिल्म देख कर आते हैं.’’

‘‘तुम किसी और के साथ देख आओ मीता, मेरे पास बहुत काम है,’’ कह निखिल करवट बदल कर सो गया.

मीता ने उसे झंझोड़ कर बोला, ‘‘किस के साथ देख आऊं मैं फिल्म? कौन है मेरा तुम्हारे सिवा?’’

निखिल चिढ़ कर बोला, ‘‘जाओ न क्यों मेरे पीछे पड़ गई. बिल्डिंग में बहुत औरतें हैं. किसी के भी साथ चली जाओ वरना कोई किट्टी जौइन कर लो… मैं ने तुम्हें कितनी बार बताया कि मुझे हिंदी फिल्में पसंद नहीं.’’

मीता उस की बात सुन एक शब्द न बोली और अपनी पनीली आंखों को पोंछ मुंह ढक कर सो गई. आज मीता को अपने विवाह के शुरुआती महीनों की रातें याद हो आईं. कितनी असहज सी होती थी वह जब नया विवाह होते ही निखिल रात को उसे पोर्न फिल्में दिखाता था. वह निखिल का मन रखने को फिल्म तो देख लेती थी पर उसे उन फिल्मों से बहुत घिन आती थी.

कई बार थके होने का बहाना बना कर सोने की कोशिश भी करती, लेकिन निखिल अकसर उस पर दबाव बनाते हुए कहा करता कि इफ यू टेक इंट्रैस्ट यू विल ऐंजौय देम. वह अकसर जब फिल्म लगाता वह नानुकर करती पर निखिल किसी न किसी तरह उसे फिल्म देखने को राजी कर ही लेता. उस की खुशी में ही अपनी खुशी समझती.

कई बार तो वह सैक्स के दौरान भी वही चाहता जो पोर्न स्टार्स किया करतीं. मीता को लगता क्या यही विवाह है और यही प्यार का तरीका भी? उस ने तो कभी सोचा भी न था कि विवाहोपरांत का प्यार दिली प्यार से इतना अलग होगा, लेकिन वह इन 2 बरसों में पूरी तरह से निखिल के मन के सांचे में ढल तो गई थी, लेकिन इस सब के बावजूद निखिल क्यों उखड़ाउखड़ा रहता है.

मीता को मन ही मन दुख होने लगा था कि जिस निखिल के प्यार में वह पगलाई सी रहती है, उसे मीता की जरा भी फिक्र नहीं शायद… माना कि पैसा जरूरी है पर पैसा सब कुछ तो नहीं होता. कल तक हंसमुख स्वभाव वाले निखिल के बरताव में इतना फर्क कैसे आ गया, वह समझ ही न पाई.

निखिल अपने लैपटौप पर काम करता तो मीता उस पर ध्यान देने लगी. उस ने थोड़ा से देखा तो पाया कि वह तो अपने कालेज के सहपाठियों से चैट करता.

एक दिन उस से रहा न गया तो बोल पड़ी, ‘‘निखिल, मैं ने तुम्हारा साथ पाने के लिए अपनी नौकरी तक छोड़ दी, पर तुम्हें मेरे लिए फुरसत नहीं और पुराने दोस्तों से चैट के लिए फुरसत है’’

निखिल तो जैसे गुस्से में आगबबूला हो उठा. चीख कर बोला, ‘‘जाओ फिर से कर लो नौकरी… कम से कम हर वक्त की बकबक से पीछा तो छूटेगा.’’

यह सुन मीता बोली, ‘‘तुम ने ही कहा था न मुझे नौकरी छोड़ने के लिए ताकि हम दोनों साथ में ज्यादा वक्त बिता सकें, लेकिन तुम्हें तो शायद मेरा साथ पसंद ही नहीं… पत्नी जो ठहरी… और जब मुझे नौकरी छोड़े 2 वर्ष बीत गए तो तुम कह रहे हो मैं फिर शुरू कर दूं ताकि तुम आजाद रहो.’’

मीता निखिल के बरताव से टूट सी गई थी. सारा दिन इसी उधेड़बुन में लगी रही कि उस की गलती क्या है? आज तक उस ने वही किया जो निखिल ने चाहा. फिर भी निखिल उसे क्यों ठुकरा देता है?

अब मीता अकसर निखिल के लैपटौप पर नजर रखती. कई बार चोरीछिपे उस का लैपटौप भी देखती. धीरेधीरे उस ने समझ लिया कि वह स्वयं ही निखिल के बंधन में जबरदस्ती बंधी है, निखिल तो किसी तरह का बंधन चाहता ही नहीं.

एक पुरुष को जीवन में सिर्फ 3 चीजों की ही तो जरूरत होती है- अच्छा खाना, अच्छा पैसा और सैक्स, जिन में खाना तो वह बना ही देती है वरना बड़ेबड़े रैस्टोरैंट तो हैं ही जिन में वह अपने क्लाइंट्स के साथ अकसर जाता है. दूसरी चीज है पैसा जो वह स्वयं कमा ही रहा है और पैसे के लिए तो उलटा मीता ही निखिल पर निर्भर है. तीसरी चीज है सैक्स. वैसे तो मीता उस के लिए जब चाहे हाजिर है, आखिर उसे तो पत्नी फर्ज निभाना है. फिर भी निखिल को कहां जरूरत है मीता की.

कितनी साइट्स हैं जहां न जाने कितनी तरह के वीडियो हैं, जिन में उन छरहरी पोर्न स्टार्स को देख कर कोई भी उत्तेजित हो जाए. उस के पास तो मन बहलाने के पर्याप्त साधन हैं ही. कहने को विवाह का बंधन प्रेम की डोर से बंधा है, लेकिन हकीकत तो यह है कि यह जरूरत की डोर है, जो इस रिश्ते को बांधे रखती है या फिर बच्चे जो स्वत: ही इस रिश्ते में प्यार पैदा कर देते हैं जिन के लिए निखिल राजी नहीं.

उदास सी खिड़की के साथ बने प्लैटफौर्म पर बैठी थी कि तभी घंटी बजी. उस ने झट से अपने बालों को आईने में देख कर ठीक किया. फिर खुद को सहज करते हुए दरवाजा खोला. सामने वाले फ्लैट की पड़ोसिन अमिता दरवाजे पर थी. बोली, ‘‘मेरे बच्चे का पहला जन्मदिन है, आप सभी जरूर आएं,’’ और निमंत्रणपत्र थमा गई.

अगले दिन मीता अकेली ही जन्मदिन की पार्टी में पहुंच गई. वहां बच्चों के लिए पपेट शो वाला आया था. बच्चे उस का शो देख कर तालियां बजाबजा कर खुश हो रहे थे.

पपेट शो वाला अपनी उंगलियों में बंधे धागे उंगलियों से घुमाघुमा कर लपेटखोल रहा था जिस कारण धागों में कभी खिंचाव पैदा होता तो कभी ढील और उस के इशारों पर नाचती कठपुतली, न होंठ हिलाती न ही मन की करती, बस जैसे उस का मदारी नचाता, नाचती.

आज मीता को अपने हर सवाल का जवाब मिल गया था. वह निखिल के लिए एक कठपुतली ही तो थी. अब तक दोनों के बीच जो आकर्षण और खिंचाव महसूस करती रही, वह उस अदृश्य डोर के कारण ही तो था, जिस से वह निखिल के साथ 7 फेरों की रस्म निभा बंध गई थी और उस डोरी में खिंचाव निखिल की पसंदनापसंद का ही तो था. वह नादान उसे प्यार का आकर्षण बल समझ रही थी. विवाहोपरांत वह निखिल के इशारों पर नाच ही तो रही थी. निखिल ने तो कभी उस के मन की सुध ली ही नहीं.

मीता ने गर्दन हिलाई मानो कह रही हो अब समझी निखिल, अगले दिन उस ने पुराने दफ्तर में फोन पर अपनी बौस से बात की. बौस ने कहा, ‘‘ठीक मीता, तुम फिर से दफ्तर आना शुरू कर सकती हो.’’ मीता अपनी राह पर अकेली चल पड़ी.

Valentine’s Day 2024: डेजर्ट में परोसें चौकलेट संदेश

बंगाली मिठाई संदेश कई तरह के होते हैं. तो क्यों ना इस बार चौकलेट संदेश ट्राय किया जाए. चौकलेट संदेश बनाना बेहद आसान है. आप चाहें तो इसे शुगरलेस भी बनाकर अपनी फैमिली और फ्रेंड्स को खिला सकते हैं.

हमें चाहिए

1 किलोग्राम ताजा छेना

250 ग्राम चीनी

100 ग्राम लिक्विड चौकलेट

30 ग्राम कोको पाउडर

30 ग्राम ड्रिंकिंग चौकलेट पाउडर

बनाने का तरीका

छेना और चीनी को एकसाथ मिला कर कड़ाही में चढ़ा कर लगातार चलाते हुए इस का पूरा पानी सुखा लें. इसे एक ट्रे या थाली में निकाल लें और ठंडा होने दें.

चौकलेट संदेश बनाने के लिए इस में लिक्विड चौकलेट और कोको पाउडर डाल कर अच्छी तरह गूंधते हुए मिला लें.

एक चौकोर ट्रे में घी लगा कर मिश्रण को जमा दें. अब ड्रिंकिंग चौकलेट पाउडर ऊपर से एकसमान डाल कर अच्छी तरह फैला दें. फिर चौकोर आकार में काट लें.

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