Rose Day 2024: रोज डे पर अपने पार्टनर को फील कराएं सबसे खास, गुलाब के साथ दें ये गिफ्ट्स

Rose Day 2024: आज से वैलेंटाइन वीक की शुरुआत हो चुकी है. यह वीक प्यार करने वालों के लिए बहुत ही स्पेशल होता है. 7 फरवरी यानी आज रोज डे मनाया जा रहा है. इस दिन कपल एक-दूसरे को गुलाब देकर अपने दिल का हल बयां करते हैं. अगर आप भी अपने पार्टनर को गुलाब देने जा रहे हैं, तो इसके साथ कुछ गिफ्ट्स भी देकर आप उन्हें स्पेशल फील करवा सकते हैं. तो आज हम आपको इस आर्टिकल में कुछ गिफ्ट आइडियाज बताएंगे, जो कपल के लिए बहुत ही शानदार साबित हो सकते हैं.

गुलदस्ता

रोज डे के दिन अपने पार्टनर को गुलाब देना काफी रोमांटिक होता है, लेकिन इसके अलावा आप अपने पार्टनर को आर्टिफिशियल गुलदस्ता भी दे सकते हैं और इसमें हर गुलाब में एक छोटा सा नोट या संदेश अपने पार्टनर के लिए रख सकते हैं. बेशक यह गिफ्ट आपके प्यार को काफी पसंद आएगा.

बौटल मैसेज

दिल का हाल बयां करने के लिए रेड रोज किसी को देना प्यार जाहिर करने का काफी अच्छा तरीका है. आप इस खास दिन पर हाल-ए-दिल बयां करने के लिए अपने पार्टनर को बॉटल मैसेज भी गिफ्ट कर सकते हैं. आपको मार्केट में एक से बढ़कर एक बौटल मैसेज मिल जाएंगे.

गुलाब के आकार की ज्वेलरी

इस दिन आप पार्टनर को स्पेशल फील करवाने के लिए गुलाब की आकृति वाला ज्वेलरी दें. यह ब्रासलेट, लौकेट या कोई अन्य ज्वेलरी भी गिफ्ट कर सकते हैं.

फोटो फ्रेम

रोज डे पर आप अपने पार्टनर को फोटो फ्रेम भी दे सकते हैं. इस फ्रेम में आप अपनी और पार्टनर की फोटोज लगा सकते हैं. यह गिफ्ट आप दोनों के लिए यादगार साबित होगा.

घर को गुलाबों से सजाएं

आप बाहर जाने के बजाय घर पर ही रोमांटिक डिनर कर सकते हैं. इसके लिए आप अपने घर को गुलाबों से सजाएं, इसके अलावा डिनर टेबल को भी गुलाब की पंखुड़ियों से सजाएं. आप अपने पार्टनर की मनपसंद खाना बनाएं और दोनों रोमांटिक डिनर करें. इसके अलावा आप अपने पार्टनर रेजिन की-चेन गिफ्ट कर सकते हैं. यह गुलाब की पंखुड़ियों से तैयार किया जाता है.

ईशा देओल-भरत तख्तानी हुए अलग, 12 साल बाद हुआ तलाक

ईशा देओल और भरत तख्तानी ने 7 फरवरी को आधिकारिक तौर पर घोषणा की कि वे शादी के 12 साल बाद अलग हो रहे हैं. पिछले कुछ हफ्तों से ऐसी अफवाहें चल रही थीं कि दोनों अलग हो गए हैं. हाल ही में ईशा और भरत के अलगाव को लेकर एक पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी. यह पोस्ट इस बात पर आधारित थी कि कैसे ईशा को पिछले कुछ हफ्तों से भरत के बिना सार्वजनिक रूप से देखा गया था.

ईशा देओल और भरत तख्तानी की शादी के 12 साल बाद हुए अलग

शादी के 12 साल बाद ईशा देओल की लाइफ एक नए मोड पर आ गई है. भरत तख्तानी और ईशा देओल की लव स्टोरी के बाद अब उनकी तलाक की खबरें भी काफी सुर्खियां बटोर रही हैं. मीडिया के साथ बातचीत में, ईशा देओल ने कहा, “हम कैस्केड नामक इंटर-स्कूल प्रतियोगिता में मिले थे, जिसे मेरे स्कूल ने आयोजित किया था. मैंने टिशू के एक टुकड़े पर अपना फोन नंबर लिखा और उसे दे दिया. तब मेरे पास ब्रेसिज़ थे. इसलिए, मैं हमेशा कहता हूं कि वह ब्रेसिज़ के साथ मुझसे सच्चा प्यार करता था. उसे मैं बहुत प्यारी लगती थी.”

 

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उन्होंने आगे कहा, “मेरी मां के कमरे में हमारा एक फोन था और उसमें कोई एक्सटेंशन नहीं था. उस समय बात करना बहुत मुश्किल हुआ करता था. उस उम्र में, यह मोह और मासूमियत थी. वह खूबसूरत था. बेशक, हम संपर्क में थे.” कॉलेज में, और फिर 18 साल की उम्र में मेरा कामकाजी जीवन शुरू हुआ. यह ख़त्म हो गया, लेकिन मुझे ख़ुशी है कि हम वापस आ गए, और वह मेरा जीवन साथी है.

रूपाली गांगुली ने अपने पति संग मनाई 11वीं वेडिंग एनिवर्सरी, फोटोज ने जीता फैंस का दिल

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ से घर-घर पहचान बनाने वाली एक्ट्रेस रुपाली गांगुली आज टीवी की टॉप एक्ट्रेसेस में एक है. रुपाली अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ को अलग रखती है. एक्ट्रेस की कल यानि 6 फरवरी को शादी सालगिरह थी. इस मौके पर एक्ट्रेस ने अपने पति के साथ क्वालिटी टाइम स्पेंड किया. पति के साथ एक्ट्रेस की तस्वीरें काफी वायरल हो रही हैं. रुपाली ने इस खास मौके पर पति के संग एक तस्वीर शेयर की है.

समंदर किनारे घूमती नजर आईं रुपाली- अश्विन

टीवी एक्ट्रेस रूपाली गांगुली ने अपने ऑफिशियल इंस्टाग्राम अकाउंट पर कुछ फोटोज शेयर की हैं, जिसमें वह अपने पति अश्विन के वर्मा संग काफी बेहद खुश नजर आ रही हैं. वहीं ये तस्वीरें मुंबई के किसी बीच की हैं. तस्वीरों के बैक ग्राउंड में समंदर साफ दिख रहा है.

रुपाली ने पति संग दिए पोज

‘अनुपमा’ फेम एक्ट्रेस रुपाली गांगुली की बीते दिन 6 फरवरी को वेडिंग एनिवर्सरी थी. इस खास मौके पर एक्ट्रेस अपने पति संग टाइम स्पेंड करती नजर आईं. एक्ट्रेस ने अपने इंस्टा अकाउंट पर तस्वीरे साझा की हैं. रुपाली पति अश्विन संग समंदर किनारे एन्जॉय करती नजर आ रही है. यहां पर रुपाली गांगुली और अश्विन वर्मा ने खूब मस्ती की. दोनों अपनी फोटो में एक से बढ़कर एक पोज देते हुए दिख रहे हैं, फैंस ने लुटाया प्यार. इन फोटोज में रुपाली और अश्विन एकदूसरे के आंखों में सपने में खोए हुए है. वहीं रुपाली ग्रीन ड्रेस में काफी सुंदर लग रही हैं. एक्ट्रेस ने नो मेकअप लुक कैरी किया है.

 

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फैंस ने लुटाया प्यार

रुपाली गांगुली और उनके पति अश्विन की फोटोज को काफी पसंद कर रहे है. इन तस्वीरों को देखने के बाद हर कोई उन्हें शादी की सालगिरह की बधाई दे रहे हैं. वहीं इन फोटोज से पहले एक्ट्रेस ने एक वीडियो शेयर किया था. जिसमे उन्होंने बताया कि हर रिश्ते में दो लोग होते हैं, जिसमें एक शांत होता है और दूसरे एक्टिव. एक्ट्रेस के मुताबिक, अपने रिश्ते में वह एक्टिव हैं.

Valentine’s Day 2024: क्विकी- आखिर उसने क्या फैसला लिया

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मुझे कभी-कभी वैजाइनल ब्लीडिंग होती है, ये खतरे की बात तो नहीं है

सवाल

मैं 32 वर्षीय कामकाजी महिला हूं. मुझे 2 माहवारी के बीच भी कभीकभी वैजाइनल ब्लीडिंग होती है. कहीं कोई खतरे की बात तो नहीं?

जवाब

वैजाइना से ब्लीडिंग केवल माहवारी के दौरान ही होनी चाहिए. 2 माहवारी के बीच ब्लीडिंग होना किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकता है. आप तुरंत किसी अच्छे डाक्टर को दिखाएं, जरूरी जांच कराएं और उपचार शुरू करें. मेनोपौज के बाद, 2 माहवारी के बीच या शारीरिक संबंध बनाने के बाद अगर ब्लीडिंग हो तो महिलाओं को इसे गंभीरता से लेना चाहिए क्योंकि ऐसा होना असामान्य ब्लीडिंग की श्रेणी में आता है जो कैंसर का एक सामान्य लक्षण है.

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मेरी मां को ओवेरियन कैंसर था. जांच कराने पर पता चला कि मेरे शरीर में बीआरसीए जीन मौजूद हैं. मेरा परिवार पूरा हो गया है. क्या मैं अपनी ओवरीज निकलवा सकती हूं ताकि ओवेरियन कैंसर का खतरा खत्म हो जाए?

जवाब

ओवरी निकालने की सर्जरी यानी ऊफोरेक्टोमी किसी महिला के एक या दोनों तरफ के अंडाशयों को हटाने के लिए की गई एक सर्जिकल प्रक्रिया है. डाक्टर कई मामलों में ऊफोरेक्टोमी की सलाह देते हैं. जैसे जब एक महिला में बीआरसीए जीन मौजूद होता है जो स्तन और ओवरी के कैंसर के होने के लिए सब से आम उत्तरदायी जीन है. ऐसे मामलों में महिला के अंडाशय हटाने से उसे कैंसर होने के खतरे को कम किया जा सकता है. आप का परिवार पूरा हो चुका है और आप में बीआरसीए जीन भी मौजूद हैं तो आप को यह सर्जरी करा लेनी चाहिए. इस सर्जरी के बाद ओवेरियन कैंसर का खतरा 95त्न तक कम हो जाता है.

समस्याओं के समाधान ऐल्प्स ब्यूटी क्लीनिक की फाउंडर, डाइरैक्टर डा. भारती तनेजा द्वारा      

पाठक अपनी समस्याएं इस पते पर भेजें : गृहशोभा, ई-8, रानी झांसी मार्ग, नई दिल्ली-110055.

स्रूस्, व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या 9650966493 पर भेजें.      

 

इज्जत बड़ी या राजनीति

महिला पहलवानों ने खुल्लमखुल्ला सड़कों पर उतर कर भारतीय कुश्ती संघ के पूर्र्व अध्यक्ष बृजभूषण सिंह के खिलाफ सैक्सुअल हैरेसमैंट के आरोपों पर भारतीय जनता पार्टी के कानों पर महीनों जूं तक नहीं रेंगी. शायद वह महिला पहलवानों को नीची जाति की औरतें समझ कर उन्हें इस लायक नहीं समझ रहे थी कि एक सनातन तिलकधारी सांसद के खिलाफ कुछ किया जाए जो भक्त भी पैदा करता है और वोट भी बटोरता है.

बड़ी मुश्किल से वह संघ से निकाला गया. सरकार ने वर्ल्ड रैसलिंग फैडरेशन की ‘रैसलिंग फैडरेशन औफ इंडिया’ की मान्यता को खत्म करने के बाद मरे दिल से यह कदम उठाया पर बृजभूषण सिंह का दबदबा कायम रहा और ‘रैसलिंग फैडरेशन औफ इंडिया’ के चुनावों में बृजभूषण सिंह फिर छा गया. उस के घर से चल रहा रैसलिंग फैडरेशन बृजभूषण सिंह के दोस्त के ही हाथों में गया और वह भी 47 में से 40 वोटों से.

हार कर पहलवानों ने रैसलिंग से रिटायर होने की घोषणा करनी शुरू कर दी, पदक लौटाने शुरू कर दिए. ये टोकन स्टैप हर उन अखबारों में भी सुर्खियां बनने लगे जो भाजपा समर्थक हैं. अब भाजपा को होश आया है और उस ने स्पोर्ट्स मिनिस्ट्री के माध्यम से इस नए चुने पैनल को सस्पैंड कर दिया है.

रैसलर्स के कुछ आंसू तो पोंछे गए हैं पर यह समझ लें कि यह कदम केवल मई, 2024 तक के लिए चुनावों में भाजपा विपक्ष को कुछ कहने के लिए एक मुद्दा नहीं देना चाहती. वह नहीं चाहती कि राम मंदिर के उद्घाटन के समय शनि का कोई काला साया भाजपा पर पड़े. वह केवल कुछ समय चाहती है.

रैसलर्स या कुश्ती हमारे देश में जागीरदारों और अमीरों का प्रिय खेल रहा है पर वे खुद नहीं खेलते थे. वे खिलवाते थे और देखते थे. आज भी स्थिति बदली नहीं है. रैसलर पहलवान धन और धर्म की रक्षा का काम करते थे, करते हैं और करते रहेंगे. वे और कुछ ज्यादा न सोचें, यह संदेश साफ है. रही बात सैक्सुअल हैरेसमैंट की तो न भूलें कि इंद्र ने अहिल्या को छला और दोषी अहिल्या थी, द्रौपदी को जूए पर लगाया गया और युधिष्ठिर अपराधी नहीं थे, प्रेम निवेदन पर शूर्पणखा की नाक कटी थी, नाक काटने वाला दोषी नहीं था. बृजभूषण सिंह कुछ समय के लिए पद और प्रभाव त्याग रहा है, वनवास मिला है, फिर लौटेगा उसी दमखम से.

Valentine’s Day 2024: वैलेंटाइन डे के लिए सबसे खास ये 5 ग्रूमिंग टिप्स

वैलेंटाइन डे , जिसे साल का सबसे ज्यादा रोमांटिक डे कहां जाए तो गलत नहीं होगा. क्योंकि इस दिन आप अपने मन में छिपे अपने पार्टनर के प्रति प्यार को खुलकर व बिना झिझक के दर्शा सकते हैं. वैसे तो प्यार के इजहार के लिए कोई खास दिन की जरूरत नहीं होती. लेकिन जब वह दिन है ही तो फिर अपने पार्टनर से खुल कर अपने मन का हाल क्यों न कहां जाए या फिर क्यों न मिलकर इस दिन को सेलिब्रेट  किया जाए. लेकिन जितना ये दिन खास है उतना ही आपको भी इस दिन का लेकर खुद को पहले से तैयार करके खुद की ग्रूमिंग पर ध्यान देना चाहिए. ताकि जब आप पार्टनर के सामने जाएं तो वे बस आपको देखता ही रहे. यकीन मानिएं एक बार आप पार्टनर की नजरों में छा गई फिर तो आपका दिन ही बन जाएगा. तो फिर जानते हैं कि इस दिन को लेकर आपकी तैयारी कैसी हो.

1. प्री डेट प्रेपरेशन 

अगर आप अपने पार्टनर के सामने यूं ही चली जाएंगी , तो बात नहीं बनेगी. इसलिए जरूरी है  प्री डेट प्रेपरेशन . इसमें आपको अपनी स्किन में नई जान डालने के लिए प्रयास करना होगा. ताकि आपकी स्किन फिर से खिल उठे. क्योंकि रोजमर्रा की भागदौड़ व प्रदूषण के कारण स्किन की रौनक चली जाती है, जिसे हमें अपने स्किन केयर रूटीन से ही ठीक करने की जरूरत होती है. ऐसे में आपके लिए जरूरी है कि आप अपने फेस की क्लींजिंग करें , जिससे डेड स्किन रिमूव होने के कारण स्किन से सारी गंदगी निकल सके और जिसके कारण आपकी स्किन ग्लो करने के साथ फ्रेश लुक देने लगे. इसके लिए आप मार्केट में आसानी से मिलने वाले फेसियल क्लीन्ज़र को टाई कर सकती हैं. ये सभी स्किन टाइप पर सूट करते हैं . इसके बाद आप स्किन पर डी टेन पैक अप्लाई करें और देखें कि स्किन पर अलग ही चमक देखने तो मिलेगी.

2. बालों की भी स्टाइलिंग जरूरी 

रोमांटिक डे हो और आप यूं ही अपने बालों को बांध कर पार्टनर से मिलने चली जाएं या फिर अपना वही पुराना सा हेयर स्टाइल लेकर पहुंच जाएं तो आप इस स्पेशल डे पर भी पार्टनर की नजरों में नीरस ही दिखेंगी. ऐसे में आप अपने बालों को नया स्टाइल दें या फिर हेयर स्टाइल को चेंज करें. आप इस दिन बालों को स्ट्राइटिंग , कर्लिंग या फिर हाइलाइट्स करवाकर भी नया लुक पा सकती हैं. यहां तक कि आप अपने फेसकट के हिसाब से हेयर कट करवाकर अपने पूरे फेस के गेटअप को चेंज करके पार्टनर को चौका सकती हैं. यकीन  मानिए आपका नया लुक पार्टनर को खूब पसंद आएगा. क्योंकि जिस तरह हम एक चीज को देखदेख कर ऊब जाते हैं उसी तरह ही पार्टनर को भी आपके लुक में बदलाव देखने की चाहा होगी.

3. फेस बोडी को रखे क्लीन 

यहां क्लीन से मतलब फेस की क्लींजिंग से नहीं है बल्कि फेस व बॉडी के हेयर्स को क्लीन करने से है. क्योंकि मौसम सुहावना है , ऐसे में आपकी होट सी ड्रैस के साथ अगर आपके हाथ या पैरों या फिर फेस पर हेयर्स नजर आए तो पार्टनर का फोकस आप से ज्यादा आपकी इन चीजों पर होगा. इसलिए आईब्रो, फोरहैड , अपरलिप्स के साथ अगर चेहरे पर हेयर्स हैं तो उन्हें या तो ब्लीच से हाईड करें या फिर फेस वैक्स से क्लीन करें. हाथपैरों के बालों को भी क्लीन करना न भूलें.  जिसे देखकर आपका पार्टनर आपको छुहे बिना नहीं रह पाएगा और आपका भी खुद को देखकर कॉन्फिडेंस बढ़ेगा.

4. आउटफिट्स भी हो परफेक्ट 

स्पेशल डे के लिए आपके  आउटफिट्स आपकी पार्टनर की चोइज के हिसाब से होने चाहिए. जैसे अगर आप उन्हें परपोज़ करने जा रही हैं तो आप स्टाइलिश के साथसाथ थोड़े सादगी भरे कपड़े पहनें. और अगर आपका पार्टनर होट है तो फिर हॉट व सैक्सी सी बैकलेस ड्रेस भी टाई कर सकती हैं. कोशिश करें कि आपकी और पार्टनर की ड्रेस में टूनिंग हो , जैसे आप एक जैसा या मिलताजुलता कलर टाई कर सकती हैं. कोशिश करें आप जो भी आउटफिट्स टाई करें वो हटकर व यूनिक हो . तभी आप उन पर अपना इम्प्रैशन जमा पाएंगी और आपका ये दिन खास बन पाएगा.

5. मेकअप से दें फाइनल टचअप 

चाहे आप बहुत ही सादगी के साथ रहना पसंद करती हो, लेकिन वैलेंटाइन वाले दिन आप खुद को लाइट मेकअप से सवारे. ताकि आपका फेस नेचुरल लुक देते हुए ग्लोइंग लगे. इसके लिए आप सबसे पहले फेस को टोनर से क्लीन करें. फिर स्किन को मॉइस्चरिजे करने के बाद स्किन पर प्राइमर अप्लाई करें. अगर आप फाउंडेशन नहीं लगाना चाहतीं तो आपको आज मार्केट में ऐसे प्राइमर भी मिल जाएंगे, जो चेहरे के दाग धब्बों को छुपाकर चेहरे की चमक को बढ़ाने का काम करते हैं. या  फिर आप इजी अप्लाई के लिए प्राइमर वाले कॉम्पैक्ट पाउडर का भी इस्तेमाल कर सकती हैं. आखिर में आंखों को सवार कर अपने लिप्स पर अपनी पसंद का शेड लगाकर पार्टनर को करें इम्प्रेस.

वर्जनाएं लुभाती हैं: क्या हुआ था पत्नी को पति के अतीत के संबंध पता चला

रात 10 बजे जब गरिमा ने घर के सब काम समेटने के बाद अपना मोबाइल औफ करते हुए कहा, ‘‘चलो भई, इसे भी बंद कर देती हूं, अब सोया जाए,’’

यह सुन कर ड्राइंगरूम में बैठे उस के पति आलोक और बच्चों सोनू, पिंकी ने हैरतभरी खुशी से एकसाथ कहा, ‘‘वाह, क्या बात है.’’

गरिमा हंसी, ‘‘चलो, अब तुम लोग अपनी पढ़ाई कर लो, हम लोग सोते हैं.’’

सोनू ने पूछा, ‘‘आप अपना सीरियल नहीं देखेंगी मौम?’’

‘‘नहीं भई, बकवास सीरियल और गोदी मीडिया के न्यूज चैनल देखने छोड़ दिए,’’ दोनों में भक्तिभरी पड़ी है.

पिंकी भी बोल पड़ी, ‘‘बकवास सीरियल? मौम, वह सीरियल तो आप

5 साल से लगातार देख रही हैं… नानी के यहां से आते ही छोड़ दिए सब सीरियल.’’

आलोक मुसकराए, ‘‘भई,

1 हफ्ता मायके रह कर तुम में इतने अच्छे बदलाव आ सकते हैं तो जाती रहा करो. इतने बढि़या बदलाव के लिए ट्रेन छोड़ो मैं तुम्हें प्लेन से भेजा करूंगा?’’

गरिमा खुल कर हंसी, ‘‘इस की जरूरत नहीं पड़ेगी, अब तुम भी अपना लैपटौप बंद करो और चलो सोते है,’’ कह कर गरिमा आलोक को बैडरूम में चलने का

इशारा करते हुए शरारत से मुसकरा दी तो आलोक ने झठ से गोद में रखा हुआ लैपटौप बंद किया और उठ गए.

सोनू बोला, ‘‘मौम, आप इस बार नानी के यहां से कितनी खुश, कितनी फ्रैश लौटी हैं न? हमेशा ऐसे ही रहा करो आप… पहले कैसी बोरिंग सी शक्ल ले कर

रात 12 बजे तक बेकार सीरियल देखती रहती थीं और पापा लैपटौप पर आंखें गड़ाए रहते थे.’’

‘‘हां बेटा, अब तो छोड़ दिया न बोर होना. गुडनाइट बच्चो,’’ कह कर सोनू, पिंकी को प्यार करती हुईर् गरिमा बैडरूम में चली गई और दरवाजा बंद कर दिया.

आलोक अपना फोन बंद कर रख रहे थे. मुसकराते हुए कहा, ‘‘तुम्हें हुआ क्या है?’’

गरिमा ने कोई जवाब न दे कर गुनगुनाते हुए आलोक की पसंद की गुलाबी नाइटी पहन कर पूरे कमरे में भीनीभीनी सी मनमोहक खुशबू वाला रूमप्रैशनर स्पे्र किया

तो आलोक ने बैड से उठ कर गरिमा को अपनी बांहों में भर लिया. कहा, ‘‘गरिमा, सच कहूं? लगता है यह तुम नहीं, कोई और हो. इतनी रोमांटिक, इतनी

प्यारी… तुम पिछले कुछ सालों में कहां खो गई थी, डियर?’’

‘‘हां आलोक, मु झे भी ऐसा लगता है हम दोनों ही बहुत कुछ भूल चुके थे… अब खोए पलों को फिर से सहेजने की तमन्ना होती है.’’

‘‘हां, जब से आईर् हो, जीने का मजा ही कुछ और है, कितनी बोरिंग हो चुकी थी न हमारी लाइफ. एकदम मशीनी.’’

‘‘हां आलोक, मु झे भी यही लगता है हम कब के बिछुड़े जैसे अब मिले हैं. मु झे भी सब कुछ अब अच्छा लगता है,’’ और फिर दोनों ने काफी समय अच्छी

मीठी बातों में बिताया, फिर प्यार भरे पलों को पूरी तरह जी कर आलोक तो गरिमा की कमर में हाथ डालेडाले सो गए. पर गरिमा की आंखों में नींद नहीं थी.

गरिमा बहुत खुश थी, जीवन में आई नीरसता ऐसे गायब होगी यह तो सपने में भी नहीं सोचा था. मायके जाने से पहले यही दिनरात थे कि कटने को नहीं आते

थे. अब जब से लौटी है, हर शाम सुहानी लगती है, आलोक की बांहों में घिरने का इंतजार रहता है. तनमन एक नई डगर पर चलता चला जा रहा है. पिछले कई

सालों की सारी बो झलता एक रात से दूर हो जाएगी, एक रात उस के जीवन को उस के और आलोक के बीच पसरी वैवाहिक बो झलता को इस तरह दूर

करेगी, यह कब सोचा था उस ने. वह करवट ले कर एक बार फिर 20 दिन पहले के घटनाक्रम पर नजर डालने लगी.

कहीं भी नहीं लगता था उस का मन, शरीर घरबाहर के सारे कर्तव्य निभाता चला जा रहा था पर मन तो जैसे काष्ठ हो गया था. एक अजीब, उचाट सा वीराना

भर गया था मन के भीतर. नीरस सी उस दिनचर्या में न कोईर् उमंग थी, न उत्सुकता, न कोई आकर्षण, न कोई आमोदप्रमोद. सुबह उठना, गृहस्थी संभालना,

बच्चों को पालना, गाहेबगाहे पति की जरूरत पूरी कर निढाल हो कर सो जाना. दुनिया की नजर में वे आदर्श पतिपत्नी थे क्योंकि लड़ना झगड़ना उन्हें पसंद नहीं

था.

अचानक पिछले महीने रुड़की से मां और विनय भैया का बुलावा आ गया था. मां का 75वां जन्मदिन भैया ने घर पर ही शानदार दावत रख कर मनाने का फैसला

किया था. रेखा भाभी, उन के बच्चे रिंकी और मोनू ने बारबार आने का आग्रह किया, तो उस के पूछने पर आलोक ने कहा, ‘‘तुम ही चली जाओ, मेरी तो

जरूरी मीटिंग्स हैं.’’

पिंकी और सोनू की भी छुट्टियां नहीं थीं तो वह अकेली ही चली गई थी. सब उसे देख कर बहुत खुश हुए थे. पिताजी तो थे नहीं, छोटा सा ही परिवार था उन का.

भैया ने कालोनी के खास लोगों के लिए शानदार डिनर का आयोजन किया था. मां बहुत खुश थीं. सब बहुत अच्छी तरह से हुआ था. गरिमा को भी अपने रूटीन में

आया यह बदलाव अच्छी ही लग रह था. पिंकी, सोनू अब छोटे भी नहीं थे, घर की मेड मीना को ही खाना बनाने के लिए कह कर आई थी तो किसी बात की

ज्यादा चिंता भी नहीं थी. वैसे भी वह जानती थी कि सब लोग अपनी लाइफ में व्यस्त ही हैं, उस के 1 हफ्ते के लिए आने पर किसी को खास परेशानी नहीं होगी.

सब मेहमानों की आवभग करतेकरते उस की नजर ठहर गई थी. यह तो सोचा ही न था. अचानक सामने विशाल खड़ा दिखाई दिया था. पैंट की जेब में हाथ डाले

मुसकराता. सालों बाद देखा था उसे फिर भी अचानक कितना अपना सा लगा था वह. पूरा एक कालखंड ही बीत चुका था पर कुछ था जो आज भी वहीं रुका हुआ

था. बिजली के किसी तार की तरह जो मौका पाते ही फिर से जुड़ कर जीवंत हो उठा था, फिर तो बातें थीं जो खत्म नहीं हो रही थी. पुरानी यादों का अंतहीन

सिलसिला.

भैया ने आवाज दी तो उसे उठ कर जाना पड़ा, फिर वह और लोगों से मिलने में व्यस्त हो गई. अचानक नजर उठाने पर ठीक सामने उसे अपनी ओर देखते पाया

था. जब वह उसे जानती थी तो वह एक युवा लड़का था, आज उस की जगह एक पुरुष खड़ा था लेकिन समय चाहे इंसान के चेहरे और शरीर पर कितना ही प्रहार

करे, इंसान की भावभंगिमांए वही रहती हैं. उस की वे भेदती, मन का हाल पढ़ लेने में सक्षम नजरें वह कहीं भी पहचान सकती है. वह फिर उसी के पास जा कर

बैठ गई.

उस ने गरिमा के परिवार के बारे में पूछा, पूछने पर अपने बारे में भी बताया, ‘‘पत्नी दोनों बेटों के साथ मायके गई हुई है,’’ फिर पूछा, ‘‘जाने से पहले

घर मिलने आओगी?’’

वह चुप रही तो विशाल हंस पड़ा, ‘‘वैसे तुम कुछ ज्यादा नहीं बदली हो, वैसी ही सुंदर हो और अब शर्म भी वैसी ही रही है.’’

 

गरिमा भी इस बात पर मुसकरा पड़ी. अच्छा लगा यह सुन कर. वह सब

से बाद में सब से विदा ले कर उसे धीरे से मिलने आने के लिए कह और अपना मोबाइल नंबर दे कर चला गया. आंटीअंकल तो नहीं रहे थे अब, पर मां को आज

भी उस से विशेष स्नेह था. अकसर उस की बातें करती रहती थीं. उन की दोस्ती कभी इस बिंदु तक पहुंची ही नहीं थी जहां वादे किए जाते हैं, प्रीतप्यार की,

स्त्रीपुरुष संबंधों की सम झ ही नहीं थी तब, वह अच्छा लगता था बस. और जब तक यह बात सम झ आई, वह बाहर पढ़ने जा चुका था. जो भी कुछ था वह

मन के भीतर ही रहा था. किसी ने कभी कुछ साफसाफ कहा ही नहीं था.

अब इस उम्र में मिलने पर फिर कुछ ही पलों के सामीप्य से दोनों के दिलों में अव्यक्त स्निग्धता, अनोखा आकर्षण और चंचल कामना के भाव अंकुरित हो उठे थे.

गरिमा ने अगले 2 दिन तो अपनेआप को रोके रखा. अपनी पुरानी सहेलियोें के घर मिलने आतीजाती रही पर मुंबई वापस आने के 1 दिन पहले वह खुद को रोक

नहीं पाई. विशाल उसे नंबर दे ही गया था. उस ने विशाल को फोन किया कि मैं कल जा रही हूं तो उस के आग्रह पर उस से मिलने उस के घर जाने के लिए तैयार

हो ही गई. जानती थी कि वह अकेला है पर बिना उस से मिले जाने के लिए मन नहीं माना. अब पता नहीं कब आना हो, बस मन हुआ उस के साथ कुछ समय

बिताए, बातें करे, कुछ अपनी कहे, कुछ उस की सुने, उस को ले कर देखे गए किशोरावस्था के जो सपने आंखों ही आंखों में दम तोड़ चुके थे, अब उस से

मिलने पर कुछ था जो जिंदा हो गया था, कुछ था जो मन उस की तरफ खिंच रहा था.

गरिमा ने उस शाम मां से कहा, ‘‘मां, मैं जरा बाजार का एक चक्कर लगा कर आती हूं,’’ और विशाल के घर की तरफ कदम बढ़ा दिए.

जीवन का रास्ता ऐसा सपाट नहीं होता जिस में दूर तक देखा जा सके. अनेक अंधे मोड़ होते हैं. इस में कभी भी, कहीं भी मुड़ जाता है जीवन बिना किसी पूर्व

चेतावनी के. उसे उस दिन वैसा ही लग रहा था जैसे कोई षोडशी अपने घर वालों से चोरीचोरी अपने प्रिय से मिलने जाती है. उसे अपने इस खयाल पर हंसी भी आई

थी. विशाल ने बताया था कि वह 7 बजे तक औफिस से आता है. उस समय 8 बज रहे थे जब गरिमा ने विशाल के घर की डोरबैल बजाई. दोनों एकदूसरे के सामने

खड़े थे, मौन. उसे लगा था जैसे कुछ बेहद तरल पारे जैसा पकड़ से बाहर, निहायत चंचल सा ऐसा कुछ मन में है जो विश्लेषित नहीं हो पा रहा है.

विशाल दोनों के लिए जूस ले कर आया था. वह गरिमा से मुंबई जाने के बारे में पूछता रहा. वह सकुचाई सी जवाब देती रही. पहली बार किसी परपुरुष के साथ ऐसे

अकेली बैठी थी. कितना सन्नाटा, कितनी शांति थी चारों तरफ. काफी देर तक दोनों आम सी बातें करते रहे. फिर उन के बीच काफी पलों तक एक मौन बहता रहा

और कुछ देर बाद उस मौन का स्पर्श गरिमा को अपने हाथों पर महसूस हुआ जो धीरेधीरे देह से गुजरता हुआ उस के मन को भिगोता चला गया.

दोनों ही इस मौन की नदी में एकसाथ उतर चुके थे और बहाव में खुद को समर्पित कर दिया था. उस ने खुद को रोकने की बहुत कोशिश की पर पानी के तेज बहाव

में जैसे बेकाबू हो बहता ही चला जा रहा था उस का मन. क्या करती, वर्जनाएं लुभाती हैं. उस ने वह फल चखा था जो वर्जित था, एक मां के लिए, एक पत्नी के

लिए, एक बेटी के लिए.

विशाल के उठ कर जाने के बाद वह काफी देर आंखें मूंदे लेटी रही, अपने भीतर समाई उस अपरिचित सी परिचित खुशबू को महसूस करती रही. जब तक गरिमा ने

खुद को संभाला, विशाल उस के लिए पानी ले कर आया. गरिमा की झुकी गरदन देख कर विशाल ने उस की ठोढ़ी उठाते हुए कहा, ‘‘सौरी गरिमा, खुद पर

काबू नहीं रख पाया.’’

गरिमा ने कोई जवाब तो नहीं दिया पर कोई आक्रोश, नाराजगी भी नहीं दिखाई. वह शांत चुपचाप बैठी थी.

‘‘हर उम्र का अपना एक सच होता है गरिमा… वह हमारी किशोरावस्था का सच था, आज का सच यह है कि हम दोनों को अपनेअपने परिवार से निष्ठा निभानी

है और बु झे मन से भी नहीं बल्कि खुशीखुशी.’’

‘‘हां, तुम ठीक कह रहे हो, चलती हूं,’’ कह कर गरिमा मां के घर जाने के लिए निकल गई. वह अपनी मनोदशा पर हैरान थी. जो हुआ था उसे उस पर कोई

मलाल न था. वह तो खुद को नई ही ऊर्जा से भरा हुआ महसूस कर रही थी. पहले से अधिक युवा, आकर्षक, सरस. यह क्या हो गया था.

गरिमा को खाली हाथ आया देख मां ने पूछा, ‘‘क्या हुआ? कुछ पसंद नहीं आया?’’

‘‘नहीं मां, ऐसे ही टहल कर आ गई, थोड़ा लेटती हूं,’’ कह कर वह मां के बैडरूम में ही जा कर लेट गई. इस समय उसे कुछ एकांत चाहिए था. उस के

नीरस, उदास जीवन में भी कोई मोड़ आ सकता है, ऐसा उस ने कब सोचा था. फिर वह सोचने लगी कि मुंबई जा कर क्या आलोक को सबकुछ बता कर माफी

मांग ले? फिर दिमाग में आया पति अपने अतीत के प्रेमसंबंधों की तो खूब शोखियां बघारता है, वहीं अगर पत्नी भावुकतावश या दिल का बो झ कम करने के

लिए अपने अतीत का एक भी पन्ना खोल दे तो उस का तो जीना मुश्किल कर ही देता है साथ ही उस का पूरा वैवाहिक जीवन भी असुरक्षित हो जाता है.

यह क्षमादान पाने और तनावमुक्त होने की भावुकता किसी संभावित विस्फोट और

मानप्रतिष्ठा को बनाए रखेगा. मानती हूं कि पतिपत्नी के बीच पनपते रिश्ते में सचाई, ईमानदारी और विश्वास का होना बहुत जरूरी है. विवाह के बाद किसी तरह

के झूठ और फरेब को प्रश्रय नहीं देना चाहिए पर अपने स्व का पूर्णत: त्याग भी तो नहीं कर सकती. नहीं, इस शाम को वह पूरा जीवन सीप में बंद मोती की

तरह अपने दिल में बंद ही रखेगी.

आत्ममंथन के उन पलों में गरिमा को इस सच का अनुभव हुआ कि बीता हुआ समय इतिहास होता है जो कभी वापस नहीं आता, आने वाला कल एक रहस्स्य है,

सिर्फ वर्तमान ही सत्य है, मेरा पति ही आज है, मेरा सच है, आलोक का प्यार तो उस के मन में रचाबसा हुआ है. फिर वह इस अध्याय को वहीं समाप्त सम

झ कर सुगंधित एहसास से महकती मुंबई लौट आई. कितना कुछ संजो लाई है वह… उस की याद को दीए की लौ सा मन में संजो लाई है, आश्चर्य. यह लौ तपिश

नहीं देती, ठंडक पहुंचाती है मन को, सुकून देती है.

गरिमा जब से आई है, कितनी उत्साहित, ऊर्जा से भरी रहती है. वापस आने पर पहले की तरह जब भी वह आलोक की व्यस्तता, उदासीनता से दुखी होती है,

उस की आंखों के आगे विशाल के साथ बिताए वे पल फिर जीवित हो उठते हैं. तीव्र आवेगी प्यार का स्वाद कभी न चखा होता तो जान ही न पाती कि प्यार जब

तेज बारिश की तरह बरसता है तो डुबो देता है या बहा ले जाता है. वह तनमन से पूर्णतय सुखी घूमती है घर में इधर से उधर, बिना किसी अपराधबोध के.

गरिमा के भीतर आए सुखद परिवर्तन पर आलोक और बच्चे हैरान हैं और वह ऊर्जा से भरी हुई पिछले उबाऊ दिनों की यादों से दूर आगे बढ़ी चली जा रही करवट ले कर उस ने गहरी नींद में सोए आलोक के शांत चेहरे का देखा तो मन ही मन मुसकरा कर नींद के आगोश में डूबती चली गई.

स्वीट सिक्सटीन: क्या कविता अच्छी मां बन पायी?

‘‘डाक्टरसाहब…’’ पीछे से किसी ने आवाज दी. मुड़ कर देखा तो 22-23 वर्ष की एक युवती हाथ के संकेत से किसी को बुला रही थी. भीड़ भरा रास्ता था. मैं यह जानने के लिए इधरउधर देखने लगा कि वह किसे बुला रही है.

‘‘अरे साहब, मैं आप को ही बुला रही हूं,’’ वह जरा तेज आवाज में बोली.

अगलबगल के लोग कभी उसे और कभी मु  झे घूरने लगे. उस के कटे बाल, बिना बांहे का ब्लाउज, शिफौन की साड़ी और दमकता हुआ इकहरा बदन किसी को भी आकर्षित करने के लिए काफी था. मेरे कदम उस की ओर बढ़ गए. करीब जा कर देखा तो पहचान गया. खुशी से बोला, ‘‘तो आप हैं?’’

‘‘तो आप क्या सम  झे थे?’’ वह हंस पड़ी. फिर बोली, ‘‘इतने दिनों बाद मिले हैं, छोड़ूंगी नहीं. चलिए, घर चल कर बातें करेंगे.’’

मैं खुद भी उस से बातें करने को उत्सुक था. कई बातें थीं जो उसे देखते ही मन में घुमड़ने लगी थीं.

‘‘बैठिए,’’ कार का दरवाजा खोल कर उस ने पहले मु  झे बैठाया, फिर खुद चालक की सीट पर बैठ कर बोली, ‘‘रास्ते में बातें न करना क्योंकि मैं ने हाल ही में कार चलानी सीखी है. कहीं ध्यान बंट गया तो दुर्घटना हो जाएगी.’’शद्मरू

उस से मेरी पहली मुलाकात पटना मैडिकल कालेज के अस्पताल में हुई थी. यह 16 साल पहले की बात है. मैं प्लास्टिक सर्जरी विभाग में हाउस सर्जन था. एक दिन वार्ड मेें प्रवेश करते ही मेरी निगाह पलंग नंबर 2 पर बैठी एक नई मरीज पर ठहर गई. वह कोई 12-13 साल की किशोरी थी. मैं सीधा उसी के पास पहुंचा.

‘‘क्या तकलीफ है तुम्हें,’’ मैं ने प्यार से पूछा.

‘‘कुछ भी नहीं,’’ वह मुसकराई.

मु  झे लगा शायद अभी उस के दूध के दांत भी नहीं टूटे हैं.

‘‘तो फिर यहां अस्पताल में क्यों आई हो?’’ मैं भी मुसकरा दिया.

‘‘यह देखने के लिए कि अस्पताल में कैसा लगता है,’’ उस ने तुरंत उत्तर दिया.

मैं पलंग के साथ लगा चार्ट देखने लगा. उस में मरीज की उम्र 16 वर्ष लिखी थी. मैं ने सोचा कि  शायद वह मरीज की छोटी बहन है. काफी दिनों से वार्ड में कोई अच्छी सूरत से अंदाज लगा कर इस की बड़ी बहन को देखने को उत्सुक हो उठा.

‘‘तुम्हारी बहन कहां है,’’ मैं ने व्यग्र हो कर पूछा.

‘‘कौन बहन?’’

‘‘जो यहां भरती है.’’

‘‘अच्छा वह… आप से मतलब…’’ वह शैतानी से बंद होंठों में मुसकराई.

‘‘मैं डाक्टर हूं, मरीजों का हाल देखने के वक्त मरीज को बिस्तर पर होना ही चाहिए,’’ मैं ने उस पर रोब   झाड़ते हुए कहा. मैं उस की बहन को जल्द से जल्द देखने को उत्सुक था.

‘‘आप डाक्टर हैं?’’

‘‘हां.’’

‘‘मैं ही मरीज हूं,’’ वह रहस्यमय ढंग से हंसी.

अब मु  झे खीज होने लगी, ‘‘तुम मरीज को बुलाती क्यों नहीं.’’

‘‘तुम डाक्टर को बुलाओ, मैं मरीज को बुला दूंगी.’’ वह नाक सिकोड़ कर मुसकराई.

वार्ड के अन्य मरीज बड़ी दिलचस्पी से हमारी बातें सुन रहे थे. पलंग नंबर एक के मरीज ने कुछ बोलना चाहा, पर इस लड़की ने उसे डांट दिया, ‘‘तुम चुप रहो.’’

मैं खिसियाया सा डाक्टर कक्ष में आ गया. राजम्मा मु  झे देख कर प्यार से मुसकराई, लेकिन  उस समय मु  झे उस की मुसकान भी अच्छी न लगी.

‘‘नर्स, पलंग नंबर 2 की मरीज कहां है. उसे बोलो कि पलंग पर रहे,’’ यह कहता हुआ मैं दूसरे कक्ष में चला गया.

थोड़ी देर बाद मरीजों की मरहमपट्टी के लिए वार्ड में गया. तब भी वही लड़की बिस्तर पर बैठी हुई थी. मु  झे देख कर उस ने नाक सिकोड़ी तो मैं और चिढ़ गया.

‘‘पलंग नंबर 2 की मरीज कहां है?’’ मैं ने राजम्मा से पूछा.

‘‘वहां बैठी तो है.’’ राजम्मा ने आश्चर्य से मु  झे देखा.

मैं ने फिर ध्यान से उस लड़की को देखा. छोटा सा गोल चेहरा. 2 बड़ीबड़ी शरारती आंखें, छोटी सी नाक और 2 लंबी चोटियां. बिना बांहों के फ्रौक में वह छोटी सी बच्ची लग रही थी.

मु  झे ध्यान से अपनी ओर देखते हुए पा कर उस ने होंठों को गोल कर धीरे से सीटी बजा दी. मु  झे उस की हर हरकत बचकानी लग रही थी. किसी भी तरह यकीन नहीं हो रहा था कि वह 16 वर्ष (चार्ट में लिखी उम्र) की होगी.

डैसिंग करने के बाद मैं फिर उस के पास गया. पूछा, ‘‘तुम 16 साल की हो?’’ मैं अपने आश्चर्य को दबा नहीं पा रहा था.

उस ने पलकें   झपका कर स्वीकृति दी.

‘‘क्या तकलीफ है?’’

‘‘यह तो देख लिया कि मैं 16 साल की हूं. यह नहीं देखा कि मु  झे क्या तकलीफ है,’’ जवाब देने में उस ने एक पल भी नहीं लगाया.

उस की बातों से   झुं  झला कर मैं ने पुन: चार्ट देखा. चार्ट के अनुसार उस का 1 पांव

जल गया था. उस के अंदर पस पड़ गई थी, जिस से उसे चलने में तकलीफ होती थी. मैं ने पांव दिखाने को कहा तो उस ने दिखा दिया. उंगलियों के बीच 1-2 छेद भी हो गए थे. दबाने पर उस में से मवाद निकल पड़ता था. मैं ने उस पर पट्टी बांध दी. उस की हाजिरजवाबी के कारण कुछ और पूछने की हिम्मत नहीं हुई.

पट्टी बांध कर लौटा तो फिर ध्यान बराबर उसी लड़की पर जा रहा था. खयालों में खो कर मैं कई बार अपनेआप मुसकरा उठा. बराबर एक ही वाक्य होंठों पर आता यह तो बिलकुल बच्ची है.

दूसरे दिन वह अस्पताल के बरामदे में ही दिख गई. उस ने स्कर्टब्लाउज पहन रखा था तथा वही 2 चोटियां कर रखी थीं. वह मेरी ओर ही देख रही थी.

‘‘कहो, कैसी हो?’’ मैं ने करीब जा

कर कहा.

‘‘ठीक हूं, डाक्टर.’’

‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘पलंग नंबर 2, जैसे जेल में कैदी नंबर फलांफलां होता है वैसे ही अस्पताल में मेरा नाम पलंग नंबर 2 है.’’

‘‘अस्पताल के बाहर का नाम क्या है?’’

‘‘बाहर की बात बाहर ही छोड़ आई हूं.’’

मु  झे गुस्सा आ गया. सोचा कि अजीब लड़की है, कोई बात सीधे ढंग से करती ही नहीं.

‘‘अच्छा, अपने पलंग पर चलो. डाक्टर के आने का समय हो गया है.’’

वह एक पैर से कूदती हुई नजरों से ओ  झल हो गई. मु  झे लगा जैसे कोई छोटी सी चिडि़या फुदकती हुई गुजर गई है.

‘‘तुम एक पैर से कूद कर क्यों चलती हो?’’ बाद में उस के पांव पर पट्टी बांधते हुए मैं ने पूछा.

‘‘दोनों पैंरो से चलने में दर्द जो होता है.’’

‘‘तुम दोनों पैरों से धीरेधीरे चला करो, ज्यादा दर्द नहीं होगा.’’

‘‘न बाबा, मु झे बहुत दर्द होता है.’’

मेरे सम  झाने पर भी वह एक पैर से ही चलती रही. कुल मिला कर वह मु  झे अच्छी लगती थी. धीरेधीरे हम दोनों में लगाव बढ़ता गया. कभीकभी वह मेरे कंधे पर हाथ रख कर एक पांव से कूदती हुई सारे वार्ड का चक्कर भी लगा लेती. वह बड़े डाक्टर की खास मरीज थी. अब मेरी भी दोस्त बन जाने के कारण सभी उस का खूब ध्यान रखते थे. स्वभाव से अच्छी होने के कारण उस ने छोटेबड़े सभी का दिल जीत रखा था. उस से नाराज थी तो केवल राजम्मा, जो सोचती थी कि उस के आने से मैं उस का न रहा, हालांकि मैं पहले भी राजम्मा का न था.

एक दिन वह मु  झे कहीं न दिखी. पूरे वार्ड का चक्कर लगाने के बाद मैं बरामदे में गया तो देखा वह बैठी रो रही है.

‘‘अरे, क्या हुआ?’’ मैं ने उस के निकट आ कर पूछा.

‘‘देखते नहीं कि कितना खून निकल

रहा है.’’

उस के पैर में शायद चोट लग गई थी, घाव से खून निकल रहा था.

‘‘चोट कैसे लगी?’’

‘‘फिसल गई,’’ वह फिर सुबक पड़ी.

‘‘बहुत दर्द हो रहा है?’’ मैं ने हमदर्दी

से पूछा.

‘‘दर्द तो अधिक नहीं हो रहा है, पर खून बहुत निकल रहा है,’’ और वह और जोर से रोने लगी.

‘‘अच्छा उठो, मेरा सहारा ले कर चलो, पट्टी बांध देता हूं. ठीक हो जाएगा.’’

‘‘कैसे चलूं. दर्द होगा.’’

‘‘दूसरा पैर ठीक है न, उस से चलो.’’

‘‘नहीं, दर्द होगा.’’

‘‘अच्छा रुको, मैं पहिए वाली कुरसी मंगवाता हूं.’’

‘‘नहीं, आप मत जाओ,’’ उस ने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया. रोरो कर उस की आंखें लाल हो रही थीं. न जाने कब से रो रही थी और कोई रास्ता न देख कर मैं ने उसे अपनी बांहों में उठा लिया और मरहमपट्टी करने वाले कमरे में ले जा कर बैंच पर बैठा दिया. बैठाते वक्त उस के गालों पर पहली बार मैं ने शर्म की लाली देखी. उस की आंखें   झुकी हुई थीं.

लड़कियों के 16वें साल के विषय में सुना तो बहुत कुछ था, पर भावनात्मक स्तर पर पहली बार कुछ महसूस कर रहा था. वह बहुत सुंदर लग रही थी. मैं खड़ा मुग्धभाव  से उसे देखता रहा और वह लजाती रही.

तभी राजम्मा आ गई. उस का चेहरा क्रोध से लाल हो रहा था. पट्टी बांधने में उस ने मदद की, पर पूरा समय वह नाराज दिखती रही. राजम्मा के गुस्से से कविता थोड़ा सहम गई. डाक्टर के डर से राजम्मा कविता को कुछ कहती न थी, पर उस का व्यवहार उस के प्रति रूखा ही रहा.

उस दिन के बाद कविता मु  झे देखते ही   झेंप जाती. उसे बांहों में उठाने की बात बड़े डाक्टर को भी पता चल गई थी. एक दिन उन्होंने पूछा भी, ‘‘क्यों डाक्टर सतीश, यह कविता वाली क्या बात है?’’

‘‘सर, कुछ परिस्थिति ही ऐसी बन गई थी,’’ शर्म से मेरा चेहरा लाल हो गया.

‘‘भई, तुम्हारे दिल में कोई बात हो तो कहो, मैं उस के पिताजी से बात करूंगा.’’

‘‘नहीं, वह तो बिलकुल बच्ची है, मैं ऐसी बात सोच भी नहीं सकता,’’ मैं हकलाया.

‘‘वह बच्ची है, पर तुम तो नहीं. यहां उस की जिम्मेदारी मु  झ पर है,’’ उन्होंने कुछ गंभीरता से कहा.

इस घटना के बाद से मैं कविता के करीब बहुत कम जाता. इस बीच मैं ने एक बात और महसूस की और वह यह कि उस से मिलने उस के मातापिता नहीं आते थे. एक दिन उस से पूछा भी था, पर वह चुप रही.

कुछ दिनों के बाद बड़े डाक्टर ने बताया कि उस की मां नहीं है और पिता अपने व्यापार में इतने व्यस्त रहते हैं कि बेटी के लिए समय ही नहीं निकाल पाते.

एक दिन अचानक ही उस के पिता आए और उसे ले गए. उस दिन मैं छुट्टी पर था. जाते समय उस से मेरे खयालों की तंद्रा टूटी. कार एक खूबसूरत बंगले के बाहर खड़ी थी.

बंगले के अंदर प्रवेश करते ही लगभग 14-15 वर्ष के एक लड़के और 11-12 वर्ष की एक लड़की पर दृष्टि पड़ी. दोनों दौड़ कर कविता से लिपट गए.

‘‘मां, मेरा सामान लाई हो,’’ दोनों ने लगभग एकसाथ पूछा.

‘‘हांहां, सब लाई हूं. पहले इन से मिलो, ये डाक्टर सतीश हैं. तुम्हारे नए चाचा,’’ फिर मु  झ से बोली, ‘‘ये मेरा बेटा मन और मेरी बेटी मीत हैं.’’

मैं चौंक पड़ा. वह अपने बेटे से कुछ ही वर्ष बड़ी लग रही थी. मन में सोचा शायद ये इस के सौतेले बच्चे हों.

दोनों बच्चे मु  झे नमस्ते कह कर वार्ड से चले गए.

‘‘ये दोनों बच्चे तुम्हारे पति की पहली पत्नी से हैं?’’

‘‘ओह नहीं… पहले मु  झे 16 साल की नहीं मानते थे और आज मेरे बच्चों को ही दूसरों का बता रहे हो श्रीमानजी… ये मेरे अपने बच्चे हैं.’’

मु  झे लगा वह फिर मु  झ से कोई शरारत कर रही है.

‘‘अच्छा बताओ तुम मेरी उम्र कितनी सम  झते हो?’’ मेरी निगाहों में भरे संदेह को पढ़ कर वह बोली.

‘‘अधिक से अधिक 22 वर्ष,’’ मैं ने अपना अनुमान बताया.

‘‘धत, मैं इन बातों से खुश नहीं होती. जनाब, मेरी उम्र 32 वर्ष है.’’

मैं ने ध्यान से हिसाब लगाया तो वह सचमुच 32 साल की थी. लेकिन लगता था जैसे वक्त ने उस के मासूम चेहरे पर कोई छाप ही न छोड़ी हो.

अचानक मु  झे अपनी मोटी पत्नी का ध्यान हो आया. वह अभी 28 वर्ष की ही है, लेकिन लोग उसे मेरी भाभी सम  झते हैं.

‘‘पटना से यहां आते ही पिताजी ने मेरी शादी कर दी. आज के युग में भी तमाम बालविवाह होते हैं. 18 वर्ष की उम्र में मैं मां बन गई. आज मेर बेटा 14 वर्ष का और बेटी 12 वर्ष की है,’’ कविता ने बताया.

‘‘तुम्हारे पति कहां हैं?’’

‘‘वे हमें छोड़ हैं,’’ उस के चेहरे पर उदासी तैर आई.

मैं ने कुछ और पूछ कर उस का दिल दुखाना उचित न सम  झा.

नौकर नाश्ता लगा गया. नाश्ते के बाद मैं लौटने लगा तो उस ने कहा कि मैं अपनी पत्नी के साथ उस के घर आता रहूं.

रात में घर वापस आने में थोड़ी देर हो गई, पत्नी के खर्राटों की आवाज बैठक तक आ रही थी. मन उस के प्रति क्रोध और उपेक्षा से भर गया. कपड़े बदल कर बिस्तर पर लेटा तो पुन: कविता के खयाल ने आ घेरा. सोचने लगा, ‘आज अचानक इतने दिनों बाद मिले भी तो किस रूप में. बेचारी को वैधव्य का जीवन व्यतीत करना पड़ रहा है. 2 बच्चे हैं, उन्हीं के सहारे जीवन काट रही है. काश, मैं ने उस के साथ विवाह की बात से इनकार न किया होता तो आज वह भी सुखी होती और मैं भी. आज वह पति खो चुकी है और मु  झे पसंद की पत्नी नहीं मिली. क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मैं अपनी पत्नी से तलाक ले लूं और कविता के दुखों को समेट लूं? उस का और मेरा दोनों का जीवन सुखमय हो जाएगा. काश, ऐसा हो सकता. यदि कविता तैयार हो तो मैं उसे अवश्य अपना लूंगा.’

रात इन्हीं विचारों में गुजर गई. सुबह नहाधो कर सीधा कविता के बंगले पर पहुंचा. रास्ताभर सोचता रहा कि किस प्रकार बात आरंभ करूंगा.

बैठक से कैरम खेलने की आवाज आ रही थी, मु  झे देखते ही मन और मीत ने नमस्ते की.

‘‘चाचाजी, आज आप हमारे साथ खेल कर मां को मात दिला दें.’’

‘‘मैं हमेशा इन से जीतती हूं, ये दोनों शैतान मु  झ से जीतने के लिए खूब बेईमानी भी करते हैं,’’ कविता ने कहा.

बिना बांहों की गुलाबी मैक्सी में वह बहुत ही सुंदर लग रही थी. यह सम  झना मुश्किल था कि तीनों में   झूठ कौन बोल रहा है.

‘‘हाय,’’ अचानक कविता उठी और दरवाजे की ओर दौड़ी. वह दरवाजे पर खड़े एक खूबसूरत नौजवान से लिपट कर रोने लगी. वह नौजवान उस की पीठ थपथपा रहा था. दोनों बच्चे होंठों ही होंठों में मुसकरा रहे थे. चंद लमहों के बाद वह संभली.

‘‘पिताजी, यात्रा कैसी रही?’’ मन ने पूछा.

पिताजी यानी यह कविता का पति है. मैं आश्चर्य से उसे देख रहा था.

‘‘राकेश, ये डाक्टर सतीश हैं और सतीश ये मेरे पति राकेश हैं,’’ कविता ने हमारा परिचय कराया.

दोनों बच्चे और कविता सामान ले कर अंदर जा चुके थे. ‘‘आप कविता के पति हैं, लेकिन कविता तो कह रही थी…’’

‘‘कि मैं उसे छोड़ कर चला गया हूं,’’ राकेश ने ठहाका लगाया, ‘‘जब भी मैं बाहर जाता हूं वह हर किसी से यही कहती है. इस में उस का दोष नहीं है, वह मु  झ से एक पल भी अलग नहीं रह सकती. जब मैं बाहर जाता हूं तो वह यह महसूस करती है कि मैं हमेशा के लिए उसे छोड़ गया हूं.’’

मेरा खूबसूरत स्वप्न बीच में ही टूट गया था. लेकिन यह सोच कर मु  झे संतोष हो रहा था कि कविता के सम्मुख अपना प्रणय प्रस्ताव रखने से मैं बालबाल बच गया.

‘‘चलो, नहा लो. मु  झे मालूम था कि आज तुम आओगे. मैं ने तुम्हारी पसंद का खाना भी बनाया है,’’ कविता ने कहा. पति से मिलने के बाद वह और भी सुंदर लग रही थी.

‘‘क्षमा कीजिए.’’ कह कर राकेश अंदर

चले गए.

कविता बैठी मु  झ से बातें करती रही. कुछ देर बाद बोली, ‘‘खाना खा कर ही जाना. मैं तुम्हें आज ऐसे नहीं जाने दूंगी.’’

शायद जिंदगी में पहली बार मु  झे घर के से माहौल में स्वादिष्ठ भोजन मिला.

‘‘तुम्हारे खानसामा तो कमाल का खाना बनाया है,’’ मैं ने कहा.

‘‘खाना मैं ने बनाया है, जनाब, पति और बच्चों की हर सेवा मैं स्वयं कररती हूं,’’ कविता के होंठों पर प्यारभरी मुसकान थी.

घर लौटते समय मैं सोच रहा था कि कविता एक वफादार पत्नी और मां है. फिर भी कितना बचपना है उस में शतरंज के खेल में वह बच्चों से भी  झगड़ रही थी. शायद 16वां साल उस में स्थाई रूप से बस गया है. काश, हम सब भी अपनी किशोरावस्था को अपने साथ जीवनभर ले कर चलते. जीवन कितना खुशगवार होता न. 65 साल का मैं जब 12 साल की पोती के साथ शतरंज पर लड़ता, मुझे लगा कितना अच्छा रहता.

गर्भ की दुनिया: गर्भवती होने के बाद वृंदा के साथ क्या हुआ

‘‘वृंदा गर्भ में शिशु का आना अगर कुदरत की कृपा है तो उस की देखभाल करना मातापिता का परम कर्तव्य सम झी,’’ अहिल्या देवी ने सम झाते हुए अपनी बेटी वृंदा से कहा.

वृंदा अपने उभरे हुए पेट को आंचल से ढकते हुए प्रतिउत्तर में इतना ही कह पाई, ‘‘दरअसल, पेट के अंदर गर्भाशय के आसपास बड़ी आंत, छोटी आंत एवं

किडनियां होती हैं. ऐसे में मान के चलिए वे सभी आपस में पड़ोसियों की तरह रहते हैं एवं अपना दुखसुख बांटते हैं.’’

गर्भ में पल रहा शिशु मांबेटी की सारी बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था.

‘‘बड़ी आंत दीदी, यह वृंदा कौन है?’’ गर्भाशय में पल रहे शिशु ने अपनी पड़ोसिन बड़ी आंत से पूछा.

‘‘बुद्धू, वृंदा तुम्हारी मां का नाम है,’’ बड़ी आंत ने इठलाते हुए कहा.

‘‘अभी बुलाने से कुछ नहीं होगा ,जब तुम बाहर निकलोगी तब वह सुनेगी,’’ छोटी आंत ने बीच में ही टोका.

‘‘बाहर कब निकलूंगा?’’ शिशु ने फिर पूछा.

‘‘और 3 महीने के बाद,’’ दोनों आंतों ने एकसाथ कहा.

रसोई में मेथी का साग पक रहा

था जिस की महक से वृंदा को उलटी

आने लगी.

‘‘कोई मु झे ऊपर खींच रहा है… मु झे बचाओ छोटी आंत दीदी, बड़ी आंत दीदी बचाओ,’’ शिशु छटपटाने लगा.

‘‘लो कर लो बात हम तो खुद ही परेशान रहते हैं तुम्हारी वजह से. हम क्या बचाएं तुम्हें. तुम्हारी वजह से तुम्हारी मां कभी खट्टा खाती है तो कभी मीठा और

कभी तीखी मिर्ची.’’

‘‘खट्टामीठा तक तो ठीक लेकिन उफ यह मिर्ची तो दम निकल देती है,’’ बड़ी आंत ने शिकायत करते हुए कहा.

जैसे ही उलटियां खत्म हुईं, ‘‘अब जा कर कहीं जान में जान आई,’’ शिशु ने राहत की सांस ली.

‘‘दीदी, सुना आप लोगों ने… कुछ सुरीला सा सुनाई दे रहा है मु झे, बहुत अच्छा लग रहा है.’’

‘‘तुम सुनो हम तो यह सब सुनते ही रहते हैं हमेशा,’’ छोटी आंत ने इठलाते हुए कहा.

‘‘यह मंदिर की घंटी की आवाज है तुम्हारी मां तुम्हारे लिए भगवानजी से प्रार्थना कर रही होगी,’’ बड़ी आंत ने कहा.

‘‘प्रार्थना क्या होती है,’’ शिशु ने जानना चाहा.

‘‘बुद्धू, कुछ नहीं जानता,’’ शिशु द्वारा बारबार प्रश्न पूछे जाने से तंग आ कर किडनी ने कहा जिसे मुश्किल से आराम करने का मौका मिला था.

‘‘मैं जानता नहीं… जानती हूं,’’ शिशु ने गरदन टेढ़ी कर जवाब दिया.

‘‘तुम्हारी मां तुम्हारी सलामती के लिए भगवानजी से प्रार्थना कर रही होगी,’’ बड़ी आंत ने बात आगे बढ़ाई.

‘‘मैं तो सही से ही हूं मु झे क्या हुआ है,’’ शिशु ने अंगड़ाई लेते हुए कहा.

तभी वृंदा ने डाक्टर द्वारा दी गई विटामिन की गोलियां खाईं.

‘‘आ छि:.. छि:… मां ने क्या खाया पता नहीं मु झे तो बहुत कड़वी लगी,’’ शिशु ने मुंह बनाते हुए कहा.

‘‘दवाइयां खाई होंगी तभी तो तुम स्वस्थ और तंदुरुस्त रहोगे,’’ किडनी ने सफाई का काम करते हुए कहा.

‘‘उफ, मु झे सांस लेने में दिक्कत हो रही है,’’ शिशु ने शोर मचाया.

‘‘अरे बावले, वह कोई काम कर रही होगी जिस में उन को मेहनत लग रही होगी इसीलिए ऐसा हो रहा है तुम चिंता मत करो,’’ छोटी आंत ने अपना दिमाग

लगाया.

वृंदा रोज रात को केसर वाला दूध पीती थी ताकि उस का बच्चा सुंदर और स्वस्थ पैदा हो.

‘‘रोज रात को जो मां पीती है न वह मु झे बहुत अच्छा लगता है,’’ शिशु ने होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा.

छोटी आंत बड़ी आंत दोनों हंसने लगीं.

‘‘हां, वह तो हमें भी अच्छा लगता है और हमें ही क्यों किडनी दोनों जुड़वां भाइयों को भी अच्छा लगता है. दूध पीने से शरीर स्वस्थ और पाचनतंत्र भी ठीकठाक

रहता है. तभी तो हम दूध को बैलेंस डाइट कहते हैं यानी संतुलित आहार.’’

‘‘वाह… वाह… आज तो मेरी पड़ोसिन बड़े ज्ञान की बातें कह रही हैं,’’ दाईं किडनी ने जो छोटी आंत की प्रशंसक थी ने मुसकराते हुए कहा.

रविवार का दिन था. वृंदा के पति मोहन ने टीवी पर डरावनी फिल्म चला रखी थी जिसे देख वृंदा बारबार डर रही थी, जिस का असर शिशु पर हो रहा था. बच्चा

सहम कर शांत हो गया.

थोड़ी देर बाद बड़बड़ाने लगा, ‘‘यह किस की हथेली का स्पर्श है… यह स्पर्श तो

थोड़ा अलग है मां जैसा कोमल नहीं है.’’

‘‘यह अवश्य तुम्हारे पिता होंगे.’’

‘‘अच्छा हां पहले भी कई बार इस स्पर्श को मैं ने महसूस किया है,’’ शिशू मुसकराने लगा है और हाथपैर चलाने लगा, जिसे महसूस कर वृंदा मोहन की हथेली

पकड़ कर पेट पर यहांवहां रखने लगी.

‘‘बेबी किकिंग, किकिंग,’’ बोल कर दोनों हंसने लगे.

थोड़ी देर बाद.

‘‘इतना शोर तो कभी नहीं होता है आज क्या हो गया है,’’ शिशु ने सहमते हुए कहा.

‘‘मु झे भूख लगी है. लगता है कई दिन से मां ने खाना नहीं खाया.’’

‘‘सही कह रहे हो शायद तुम्हारी मां किसी बात से दुखी है.’’

‘‘यह दुख क्या होता है दीदी?’’

‘‘दुख, दुख का मतलब अब इसे कैसे सम झाऊं,’’ छोटी आंत ने हैरान होते हुए कहा.

‘‘देखो जब तुम्हारी मां कड़वी दवाई पीती है तुम कैसा मुंह बना लेते हो, उदास हो जाते हो वही दुख है और जब तुम्हारी मां मीठा दूध पीती है तब तुम कितने

खुश हो जाते हो वही खुशी है. जब तुम बाहर निकलोगे तो और भी कई बातों का ज्ञान होगा तुम्हें,’’ बड़ी आंत ने बाखूबी मोरचा संभाला.

‘‘बाहर की दुनिया तो हम ने कभी नहीं देखी. हम तो हमेशा ही इस कोठरी में बंद रहते हैं लेकिन तुम तो नसीब वाला हो तुम्हें बाहर जाने का मौका मिलेगा…’’

‘‘हमें भूल मत जाना,’’ दोनों किडनियों ने एकसाथ कहा.

‘‘नहीं भूलूंगा,’’ शिशु ने आश्वासन दिया और सोने की कोशिश करने लगा.

‘‘मां इतनी तेज क्यों चल रही हो… मैं… मैं गिर जाऊंगा न.’’

और तभी बाहर में…

‘‘वृंदा, तुम्हें कई बार कहा है मु झे गंदे कपड़े पसंद नहीं. देखो मेरे सारे कपड़े गंदे पड़े हैं. क्या पहन कर मैं आफिस जाऊं बताओ?’’ मोहन ने चिल्लाते हुए

कहा.

‘‘कल तबीयत थोड़ी ठीक नहीं लग रही थी इसीलिए नहीं धो पाई लाइए आज धो देती हूं.’’

‘‘बस बस तुम्हें तो बहाना चाहिए, तुम औरतों को केवल बहाना चाहिए. बहाना काम से छुट्टी मिलने का वरना 4 कपड़े धोने में क्या जाता है? बच्चा तो अभी

पेट में है तब तुम्हारे इतने नखरे हैं. बाहर आ जाए तो पता नहीं,’’ मोहन ने गुस्से से लाल होते हुए कहा.

वृंदा रोतेरोते कपड़े उठा कर जाने लगी.

‘‘बसबस रहने दो,’’ कहते हुए मोहन ने धक्का दे दिया, वृंदा लड़खड़ा कर गिर पड़ी.

गिरते वक्त उस का पेट ड्रैसिंग टेबल के कोने से टकराया जोर से चीख निकल गई और वृंदा बेहोश हो गई.

वृंदा को इस हालत में देख मोहन का गुस्सा छूमंतर हो गया. गले में घिघी बंध गई.

ओह, ‘‘सौरी वृंदा सौरी.’’

‘‘मैं भी कितना बेवकूफ हूं, छोटी सी बात को इतना बड़ा कर दिया,’’ मोहन बेहोश वृंदा को होश में लाने की कोशिश करते हुए बोला.

‘‘मां, मां, देखो वृंदा को क्या हो गया?’’ मोहन लगभग रोते हुए बोला.

तब तक अंदर बच्ची निस्तब्ध हो चुकी थी.

‘‘बड़ी दीदी, देखो न इस में कितनी देर से कुछ हलचल नहीं हुई,’’ छोटी आंत ने परेशान होते हुए कहा.

‘‘कोई न, सो रही होगी.’’

‘‘नहीं जीजी सोती भी है न तो करवट बदलती रहती है. मैं ने कई बार देखा है. देखो न जीजी देखो न.’’

‘‘अरे हां, क्या हुआ इसे. किसी अनहोनी की आशंका से दोनों सहम जाती हैं. बेहोश वृंदा को हौस्पिटल ले जाया गया. वस्तुस्थिति जान कर डाक्टर ने गुस्सैल

निगाह से मोहन की ओर देखा.’’

‘‘सिस्टर, पेशेंट को इमरजेंसी वार्ड में ले चलो,’’ डाक्टर ने चीखते हुए कहा.

‘‘ठीक तो हो जाएगा न मेरा बच्चा सही सलामत तो होगा न,’’ मोहन ने गिड़गिड़ाते हुए डाक्टर से पूछा.

डाक्टर ने उस की एक न सुनी और भागते हुए इमरजेंसी वार्ड में पहुंची.

बच्चा अंदर में निस्तेज पड़ा हुआ था किसी प्रकार की कोई हलचल न थी. काफी कोशिश करने के बाद वृंदा को होश आया.

‘‘मेरे बच्चे को बचा लीजिए मेरे बच्चे को बचा…’’ वृंदा इतना बोल कर रोने लगी.

‘‘हम कोशिश कर रहे हैं. हम अपनी

पूरी कोशिश कर रहे हैं. तुम बस अच्छा सोचो, तुम्हारे अच्छा सोचने से बच्चे पर अच्छा असर पड़ेगा. तुम्हारे पेट में चोट लगने की वजह से बच्चा अपने जगह से

अलग हो चुका है, इनफैक्ट उल्टा हो चुका है,’’ डाक्टर ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा.

‘‘अब क्या होगा?’’ पतिपत्नी ने एकसाथ कहा.

‘‘देखती हूं कुछ सीनियर डाक्टर आ रहे हैं. हो सकता है हमें आज ही बच्चे को बाहर निकालना पड़े या हो सकता है स्थिति सामान्य

हो जाए.’’

अल्ट्रासाउंड कर बच्चे की स्थिति देखी गई. उचित

उपचार हुआ और बच्चे के दिल की धड़कने सुनाई देने लगी.

‘‘जीजी देखो न मुन्नी वापस आ गया गई,’’ छोटी आंत जो बारबार उसे निहार रही थी खुश हो कर बोली.

‘‘कुछ बोलती क्यों नहीं? क्या हुआ था तु झे,’’ बड़ी आंत ने दुलारते हुए कहा.

‘‘कुछ नहीं, किसी ने मु झे जोर से धक्का दे दिया और उस के बाद क्या हुआ मु झे पता नहीं,’’ शिशु ने रोआंसा होते हुए कहा.

‘‘आप को पता है उस के बाद क्या हुआ?’’ शिशु ने दोनों से पूछा.

‘‘ज्यादा कुछ तो नहीं लेकिन बस तुम एकदम शांत हो गई थी.’’

‘‘मु झे याद आ रहा है इन दिनों कई हाथों

ने मु झे अजीब तरीके से सहलाया और न जाने

मेरे ऊपर किस किस तरह की दवा लगाई गई,

तब जा कर सब ठीक हुआ,’’ शिशु ने आपबीती सुनाई.

इस घटना के बाद हर छोटेछोटे आहट पर वह सहम जाती थी, शांत हो जाती थीं और आखिर में वह दिन आया जब उसे गर्भ से बाहर निकलना था. छोटी आंत

और बड़ी आंत ने मुसकरा कर उसे विदा किया.

 

किडनी भाइयों ने, ‘‘अलविदा मेरे नन्हे दोस्त,’’ कह कर रुखसत किया.

मुन्नी अब एक नए संसार में आ चुकी थी. आज वह अपने मां के गोद में लेटी हुई थी जो चिरपरिचित थी, लेकिन जैसे ही मोहन के गोद में गई तो नैपी बदलवाने

की फरमाइश कर बैठी.

सभी ने एक साथ हंसते हुए कहा, ‘‘अब हुए असल में कपड़े गंदे.’’

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