कसौटी: क्यों झुक गए रीता और नमिता के सिर

मां के फोन वैसे तो संक्षिप्त ही होते थे पर इतना महत्त्वपूर्ण समाचार भी वह सिर्फ 2 मिनट में बता देंगी, मेरी कल्पना से परे ही था. ‘‘शुचिता की शादी तय हो गई है. 15 दिन बाद का मुहूर्त निकला है, तुम सब लोगों को आना है,’’ बस, इतना कह कर वह फोन रखने लगी थीं.

‘‘अरे, मां, कब रिश्ता तय किया है, कौन लोग हैं, कहां के हैं, लड़का क्या करता है?’’ मैं ने एकसाथ कई प्रश्न पूछ डाले थे. ‘‘सब ठीकठाक ही है, अब आ कर देख लेना.’’

मां और बातें करने के मूड में नहीं थीं और मैं कुछ और कहती तब तक उन्होंने फोन रख दिया था. लो, यह भी कोई बात हुई. अरे, शुचिता मेरी सगी छोटी बहन है, इतना सब जानने का हक तो मेरा बनता ही है कि कहां शादी तय हो रही है, कैसे लोग हैं. अरे, शुचि की जिंदगी का एक अहम फैसला होने जा रहा है और मुझे खबर तक नहीं. ठीक है, मां का स्वास्थ्य इन दिनों ठीक नहीं रहता है, फिर शुचिता की शादी को ले कर पिछले कई सालों से परेशान हो रही हैं. पिताजी के असमय निधन से और अकेली पड़ गई हैं. भाई कोई है नहीं, हम 3 बहनें ही हैं. मैं, नमिता और शुचिता. मेरी और नमिता की शादी हुए काफी अरसा हो गया है पर पता नहीं क्यों शुचिता का हर बार रिश्ता तय होतेहोते रह जाता था. शायद इसीलिए मां इतनी शीघ्रता से यह काम निबटाना चाह रही हों.

जो भी हो, बात तो मां को पूरी बतानी थी. शाम को मैं ने फिर शुचिता से ही बात करनी चाही थी पर वह तो शुरू से वैसे भी मितभाषी ही रही है. अभी भी हां-हूं ही करती रही. ‘‘दीदी, मां ने बता तो दिया होगा सबकुछ…’’ स्वर भी उस का तटस्थ ही था.

‘‘अरे, पर तू तो पूरी बात बता न, तेरे स्वर में भी कोई खास उत्साह नहीं दिख रहा है,’’ मैं तो अब झल्ला ही पड़ी थी. ‘‘उत्साह क्या, सब ठीक ही है. मां इतने दिन से परेशान थीं, मैं स्वयं भी अब उन पर बोझ बन कर उन की परेशानी और नहीं बढ़ाना चाहती. अब यह रिश्ता तो जैसे एक तरह से अपनेआप ही तय हो गया है, तो अच्छा ही होगा,’’ शुचिता ने भी जैसेतैसे बात समाप्त ही कर दी थी.

राजीव तो अपने काम में इतने व्यस्त थे कि उन को छुट्टी मिलनी मुश्किल थी. मेरा और बच्चों का रिजर्वेशन करवा दिया. मैं चाह रही थी कि 4-5 दिन पहले पहुंचूं पर मैं और नमिता दोनों ही रिजर्वेशन के कारण ठीक शादी वाले दिन ही पहुंच पाए थे. मेरी तरह नमिता भी उतनी ही उत्सुक थी यह जानने के लिए कि शुचि का रिश्ता कहां तय हुआ और इतनी जल्दी कैसे सब तय हो गया पर जो कुछ जानकारी मिली उस ने तो जैसे हमारे उत्साह पर पानी ही फेर दिया था.

जौनपुर का कोई संयुक्त परिवार था. छोटामोटा बिजनेस था. लड़का भी वही पुश्तैनी काम संभाल रहा था. उन लोगों की कोई मांग नहीं थी. लड़के की बूआ खुद आ कर शुचिता को पसंद कर गई थीं और शगुन की अंगूठी व साड़ी भी दे गई थीं.

‘‘मां,’’ मेरे मुंह से निकल गया, ‘‘जब इतने समय से रिश्ते देख रहे हैं तो और देख लेते. आप को जल्दी क्या थी. ऐसी क्या शुचि बोझ बन गई थी? अब जौनपुर जैसा छोटा सा पुराना शहर, पुराने रीतिरिवाज के लोग, संयुक्त परिवार, शुचि कैसे निभेगी उस घर में.’’ ‘‘सब निभ जाएगी,’’ मां बोलीं, ‘‘अब मेरे इस बूढ़े शरीर में इतनी ताकत नहीं बची है कि घरघर रिश्ता ढूंढ़ती रहूं. इतने बरस तो हो गए, कहीं जन्मपत्री नहीं मिलती, कहीं दहेज का चक्कर… और तुम दोनों जो इतनी मीनमेख निकाल रही हो, खुद क्यों नहीं ढूंढ़ दिया कोई अच्छा घरबार अपनी बहन के लिए.’’

मां ने तो एक तरह से मुझे और नमिता दोनों को ही डपट दिया था. यह सच भी था, हम दोनों बहनें अपनेअपने परिवार में इतनी व्यस्त हो गई थीं कि जितने प्रयास करने चाहिए थे, चाह कर भी नहीं कर पाए.

खैर, सीधेसादे समारोह के साथ शुचिता ब्याह दी गई. मैं और नमिता दोनों कुछ दिन मां के पास रुक गए थे पर हम रोज ही यह सोचते कि पता नहीं कैसे हमारी यह भोलीभाली बहन उस संयुक्त परिवार में निभेगी. हम लोग ऐसे परिवारों में कभी रहे नहीं. न ही हमें घरेलू काम करने की अधिक आदत थी. पिताजी थे तब काफी नौकरचाकर थे और अभी भी मां ने 2 काम वाली बाई लगा रखी थीं और खाना भी उन्हीं से बनवा लेती थीं.

फिर शुचि का तो स्वभाव भी सरल सा है. तेजतर्रार सास, ननदें, जेठानी सब मिल कर दबा लेंगी उसे. जब चचेरा भाई रवि विदा कराने गया तब हम लोग यही सोच कर आशंकित थे कि पता नहीं शुचि आ कर क्या हालचाल सुनाए. पर उस समय तो उस की सास ने विदा भी नहीं किया. रवि से यह कह कर कि महीने भर बाद भेजेंगी, अभी किसी बच्चे का जन्मदिन है, उसे भेज दिया था.

उधर रवि कहता जा रहा था, ‘‘दीदी, शुचि दीदी को आप ने कैसे घर में भेज दिया, वह घर क्या उन के लायक है. छोटा सा पुराने जमाने का मकान, उस में इतने सारे लोग…अब आजकल कौन बहुओं से घूंघट निकलवाता है, पर शुचि दीदी से इतना परदा करवाया कि मेरे सामने ही मुश्किल से आ पाईं. ‘‘ऊपर से सास, ननदें सब तेजतर्रार. सास ने तो एक तरह से मुझे ही झिड़क दिया कि बहू से घर का कामकाज तो होता नहीं है, इतना नाजुक बना कर रख दिया है लड़की को कि वह चार जनों का खाना तक नहीं बना सकती, पर गलती तो इस की मां की है जो कुछ सिखाया नहीं. अब हम लोग सिखाएंगे.

‘‘सच दीदी, इतनी रोबीली सास तो मैं ने पहली बार देखी.’’ रवि कहता जा रहा है और मेरा कलेजा बैठता जा रहा था कि इतने सीधेसादे ढंग से शादी की है, कहीं लालची लोग हुए तो दहेज के कारण मेरी बहन को प्रताडि़त न करें. वैसे भी दहेज को ले कर इतने किस्से तो आएदिन होते रहते हैं.

शुचि से मिलना भी नहीं हो पाया. मां से भी इस बारे में अधिक बात नहीं कर पाई. वैसे भी हृदय रोग की मरीज हैं वे.

शुचि से फोन पर कभीकभार बात होती तो जैसा उस का स्वभाव था हांहूं में ही उत्तर देती. बीच में दशहरे की छुट्टियों में फिर मां के पास जाना हुआ था. सोचा कि शायद शुचि भी आए तो उस से भी मिलना हो जाएगा पर मां ने बताया कि शुचि की सास बीमार हैं…वह आ नहीं पाएगी.

‘‘मां, इतने लोग तो हैं उस घर में फिर शुचि तो नईनवेली बहू है, क्या अब वही बची है सास की सेवा को, जो चार दिन को भी नहीं आ सकती,’’ मैं कहे बिना नहीं रह पाई थी. मुझे पता था कि उस की ननदें, जेठानी सब इतनी तेज हैं तो शुचि दब कर रह गई होगी. उधर मां कहे जा रही थीं, ‘‘सास का इलाज होना था तो पैसे की जरूरत पड़ी. शुचि ने अपने कंगन उतार कर सास के हाथ पर धर दिए…सास तो गद्गद हो गईं.’’

मैं ने माथे पर हाथ मारा. हद हो गई बेवकूफी की भी. अरे, छोटीमोटी बीमारी का तो इलाज यों ही हो जाता है फिर पुश्तैनी व्यापार है, इतने लोग हैं घर में… और सास की चतुराई देखो, जो थोड़ा- बहुत जेवर शुचि मायके से ले कर गई है उस पर भी नजरें गड़ी हैं. उधर मां कहती जा रही थीं, ‘‘अच्छा है उस घर में रचबस गई है शुचि…’’

मां भी आजकल पता नहीं किस लोक में विचरण करने लगी हैं. सारी व्यावहारिकता भूल गई हैं. शुचि के पास कुछ गहनों के अलावा और है ही क्या. मेरा तो मन ही उचट गया था. घर आ कर भी मूड उखड़ाउखड़ा ही रहा. राजीव से यह सब कहा तो उन का तो वही चिरपरिचित उत्तर था.

‘‘तुम क्यों परेशान हो रही हो. सब का अपनाअपना भाग्य है. अब शुचि के भाग्य में जौनपुर के ये लोग ही थे तो इस में तुम क्या कर सकती हो और मां से क्या उम्मीद करती हो? उन्होंने तो जैसे भी हो अपना दायित्व पूरा कर दिया.’’ फोन पर पता चला कि शुचि बीमार है, पेट में पथरी है और आपरेशन होगा. दूसरी कोई शिकायत हो सकती है तो पहले सारे टेस्ट होंगे, बनारस के एक अस्पताल में भरती है.

‘‘तुम लोग देख आना, मेरा तो जाना हो नहीं पाएगा,’’ मां ने खबर दी थी. नमिता भी छुट्टी ले कर आ गई थी. वहीं अस्पताल के पास उस ने एक होटल में कमरा बुक करा लिया था.

‘‘रीता, मैं तो 2 दिन से ज्यादा रुक नहीं पाऊंगी, बड़ी मुश्किल से आफिस से छुट्टी मिली है,’’ उस ने मिलते ही कहा था. ‘‘मैं भी कहां रुक पाऊंगी, छोटू के इम्तहान चल रहे हैं, नौकर भी आजकल बाहर गया हुआ है. बस, दिन में ही शुचि के पास बैठ लेंगे, रात को तो जगना भी मुश्किल है मेरे लिए,’’ मैं ने भी अपनी परेशानी गिना दी थी.

सवाल यह था कि यहां रुक कर शुचि की देखभाल कौन करेगा? कम से कम 10 दिन तो उसे अस्पताल में ही रहना होगा. अभी तो सारे टेस्ट होने हैं. हम दोनों शुचि को देखने जब अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि उस की दोनों ननदें आई हुई हैं. बूढ़ी सास भी उसे संभालने आ गई हैं और उन लोगों ने काटेज वार्ड के पास ही कमरा ले लिया था.

दबंग सास बड़े प्यार से शुचि के सिर पर हाथ फेर रही थीं. ‘‘फिक्र मत कर बेटी, तू जल्दी ठीक हो जाएगी, मैं हूं न तेरे पास. तेरी दोनों ननदें भी अपनी ससुराल से आ गई हैं. सब बारीबारी से तेरे पास सो जाया करेंगे. तू अकेली थोड़े ही है.’’

उधर शुचि के पति चम्मच से उसे सूप पिला रहे थे, एक ननद मुंह पोंछने का नैपकिन लिए खड़ी थी. ‘‘दीदी, कैसी हो?’’ शुचि ने हमें देख कर पूछा था. मुझे लगा कि इतनी बीमारी के बाद भी शुचि के चेहरे पर एक चमक है. शायद घरपरिवार का इतना अपनत्व पा कर वह अपनी बीमारी भूल गई है.

पर पता नहीं क्यों मेरे और नमिता के सिर कुछ झुक गए थे. कई बार इनसानों को समझने में कितनी भूल कर देते हैं हम. मैं ऐसा ही कुछ सोच रही थी.

रिश्तों का बंधन: भाग 3- विजय ने दीपा की फोटो क्यों जलाई

उस दिन होली थी. होस्टल की सभी लड़कियां रंगगुलाल में रंगी बाहर शोर मचा रही थीं. दीपा को तेज बुखार था. शिवानी उस के सिरहने बैठी थी. बर्फ की पट्टी उस के माथे पर रखी थी.
‘‘जा दीपा, मैं बिलकुल ठीक हूं, सभी फ्रैंड्स तेरा वेट कर रही होंगी.’’
‘‘दीदी, बिलकुल चुप, मुझे कोई रंगवंग नहीं खेलना. मेरी दीदी यहां बुखार में तप रही और मैं रंग खेलूं.’’
‘‘लेकिन शिवानी…’’
‘‘लेकिनवेकिन कुछ नहीं दीदी. मैं अपनी दीदी को ऐसी हालत में छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी.’’
‘‘मुझे कुछ नहीं हुआ है, जरा सा बुखार है, थोड़ी देर में उतर जाएगा. तू जा,’’ दीपा ने जोर दे कर कहा.
शिवानी ने उस के मुंह पर हाथ धर दिया था. बोली, ‘‘दीदी, अगर तुम्हारी जगह मैं इस तरह बिस्तर पर पड़ी होती तो क्या आप मुझे छोड़ कर जातीं?’’
दीपा एकटक उस की ओर देखती रही. उस की आंखों में आंसू आ गए और फिर उस ने शिवानी को अपने गले से लगा लिया.
यादों के इस भंवर से निकल कर दीपा ने अब फैसला कर लिया था. वह शिवानी की जिंदगी संवार कर रहेगी.

अब वह विजय से खिंचीखिंची सी रहने लगी. विजय दीपा के इस व्यवहार से
परेशान हो गया कि आखिर दीपा को अचानक यह क्या हो गया और एक दिन विजय ने आखिर दीपा से पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है दीपा, तुम इतनी गुमसुम क्यों रहने लगी हो? मेरे फोन का भी जवाब नहीं देती हो. क्या हो गया है तुम्हें?’’
दीपा चुप थी.
विजय कह रहा था, ‘‘देखो दीपा, मैं जानता हूं कि तुम अपने डैडी को ले कर परेशान हो कि शादी के बाद उन का खयाल कौन रखेगा, लेकिन तुम्हें चिंता करने की कोई जरूरत नहीं. मैं ने मम्मीपापा से बात कर ली है, हमारी शादी के बाद अंकल हमारे साथ ही हमारे घर रहेंगे.’’
‘‘शादी, किस की शादी?’’ दीपा के बोल फूटे.
‘‘अरे, हमारी और तुम्हारी और किस की?’’
दीपा जोर से हंस पड़ी और फिर बोली, ‘‘तुम ने यह सोच भी कैसे लिया कि में तुम्हारे साथ शादी करने जा रही हूं?’’
‘‘यह तुम क्या कह रही हो दीपा? हम लोगों ने साथ मिल कर भविष्य के सपने संजोए हैं. अब तुम यह कैसा मजाक कर रही हो?’’
‘‘यह मजाक नहीं, वह मजाक था जो तुम ने सोचा,’’ दीपा ने कहा.
‘‘क्या तुम कह रही हो दीपा?’’
‘‘तुम लड़कों के संग यही प्रौब्लम रहती है. जरा सी जानपहचान हो गई, थोड़ा सा साथ हंसबोल लिए, बस उसे मुहब्बत प्यार का रंग
देने लगे.’’
विजय को यकीन नहीं हो रहा था. वह एकटक दीपा को देख रहा था. बोला, ‘‘नहीं दीपा, ऐसा नहीं हो सकता. तुम ऐसा नहीं कर सकतीं. कह दो यह सब ?ाठ है,’’ विजय ने भावावेश में दीपा के कंधे ?ाक?ोर दिए.
‘‘छोड़ो मुझे, मुझे घर जाना है, पापा की दवा का टाइम हो गया.’’

विजय दीपा को जाते देखता रह गया. उसे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस दीपा ने उस के साथ जीनेमरने के वादे किए थे. वह इस तरह… इस के आगे वह कुछ सोच भी नहीं सका.
दीपा पापा विमल को दवा देने के बाद बालकनी में बैठी ढलते सूरज को देख रही थी. शायद उस की नियति का सूरज भी ऐसे ही ढल गया था.

उस की आंखों में आंसू थे और दिल में कभी न थमने वाला तूफान.
विमल अपने कमरे में खिड़की से बेटी के बहते आंसुओं को साफ देख रहे थे. वे अपने कमरे से निकल दीपा के कमरे में गए तो वहां उन्हें शिवानी के लैपटौप पर ईमेल दिखा जो दीपा ने विजय को भेजा था. वे सब समझ गए और अपनी बेटी के प्यार के बलिदान को देख उन की आंखें भी भर आईं.
उधर विजय काफी गुमसुम रहने लगा. घर के सभी लोग परेशान थे. उस ने घर से बाहर आनाजाना भी बंद कर दिया.

उस के दिमाग में बारबार दीपा की बातें गूंज रही थीं. उसे लगा कि अगर ऐसा ही होता रहा तो वह पागल हो जाएगा. क्या दीपा का इतना इंटिमेट होना, साथसाथ घूमना, प्यार की बातें करना, क्या यह सब दिखावा था या फिर किसी और बात से दीपा परेशान हो रही?

उसे इस का पता लगाना ही होगा. वह बारबार दीपा को फोन लगाता, लेकिन दीपा हर बार फोन काट देती. वह उस के रेस्तरां में भी गया, लेकिन वहां ताला लगा था. उस की हालत को देख कर उस के घर वाले भी परेशान हो रहे थे, उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें. उन्होंने ने भी दीपा से कितनी बार
कौंटैक्ट करने की कोशिश की, लेकिन दीपा ने किसी से बात नहीं करी और अचानक एक दिन विजय यह कह कर घर में सब को चौंका दिया कि वह शिवानी से शादी करने को तैयार है.

विजय अब हमेशा के लिए दीपा को भूल जाना चाहता था. उस ने अपने कमरे में दीपा की सारे फोटोज की होली जला डाली. कंप्यूटर और फोन से भी फोटोज डिलीट कर डालीं.
शिवानी को जब पता चला कि विजय उस के साथ शादी करने को राजी हो गया है,
तो उस को लगा जैसे सारे संसार की खुशियां उस के कदम चूम रही हों. दीपा के प्रति दिल का प्यार आंसुओं में बन कर उमड़ पड़ा. अगर दीपा उस की मदद न करती, तो विजय के संग उस की शादी का सपना मात्र सपना ही बन कर रह जाता.
शिवानी ने अपनी और विजय की शादी के बारे में दीपा को मैसेज किया कि तुम्हें
अपनी छोटी बहन की शादी में हर हाल में शामिल होना ही पड़ेगा, न कोई बहाना नहीं चलेगा.
पहला मैसेज, फिर दूसरा, फिर तीसरा. शिवानी परेशान थी कि आखिर दीपा जवाब क्यों नहीं देती? फोन भी नहीं उठाती. कहीं अंकल को तो कुछ नहीं… नहीं, ऐसा कुछ नहीं है, जरूर कोई ऐसी सीरियस बात है, जिसे दीपा मुझे बता कर मुझे परेशानी में नहीं डालना चाहती. मैं उसे अच्छी तरह जानती हूं, वह अपनी परेशानी कभी किसी के संग शेयर नहीं करती. मुझे उस के पास मुंबई जाना होगा,..
तभी उसे दीपा का दो लाइन का मैसेज मिला खत मिला, ‘सौरी डियर, कुछ उलझनों के कारण मेरा शादी में आना संभव नहीं है. मेरी और पापा की शुभकामनाएं.’
‘ऐसा कैसे हो सकता है?’ शिवानी ने सोचा, ‘जो दीपा कालेज में उस के बिना खाना तक नहीं खाती थी, उस की बीमारी में सारीसारी रात उस के सिरहाने बैठ कर काट देती थी, वह उस की शादी में नहीं आएगी, ऐसा नहीं हो सकता. मुझे उस से बात करने के लिए मुंबई जाना ही पड़ेगा.’

एक दिन दीपा जब रेस्तरां में थी, शिवानी वहां पहुंच गई. दीपा को देख कर वह
चौंक गई कि क्या यह वही दीपा है, जिस के चेहरे पर हर वक्त मुसकान रहती थी, चेहरा खिलाखिला रहता था यह तो लगता है जैसे वर्षों से बीमार हो, आंखें निस्तेज हो गईर् थीं. चेहरा बुझबुझ सा लग रहा था.
‘‘यह क्या हाल बना रखा है आप ने दीदी?’’ शिवानी दीपा के गले से लिपट कर रो रही थी.
‘‘अरे यह क्या, तू क्यों रो रही है? मैं बिलकुल ठीक हूं पगली, थोड़ा काम का प्रैशर और पापा की तबीयत को ले कर परेशान हूं और कुछ नहीं. खैर, यह सब छोड़ और अपनी बता. अपनी शादी की तैयारियों को छोड़ कर यहां क्या कर रही है? यह रोनाधोना बंद कर और गरमगरम चाय पीती हैं.’’
फिर दीपा ने नौकर को चाय लाने को
कहा और शिवानी को सोफे पर बैठाया, ‘‘और बता, घर में अंकलआंटी सब कैसे हैं…’’
दीदी, आप ने यह सोच भी कैसे लिया कि आप के आए बिना मैं शादी कर लूंगी?’’ शिवानी ने उस की बात काटते हुए कहा.
‘‘मैं ने तुझ को बताया न कि मैं आप की छोटी बहन हूं और भलीभांति जानती हूं कि आंख में आंख डाल कर जब बात करती हूं, तो सच ही बोलती है, लेकिन आज आप की नजरें इतनी झुकीझुकी सी क्यों हैं?’’
‘‘तू बेकार की बात कर रही है. मैं भला झूठ क्यों बोलूंगी और वह भी तुझ से. ले चाय पी कर अपना मूड ठीक कर ले.’’
‘‘दीदी, मैं साफसाफ कह देती हूं कि अगर आप शादी में शामिल नहीं होंगी, तो मैं फेरे पड़ने से पहले ही जहर खा लूंगी,’’ और इस के पहले कि दीपा कुछ कह या समझ पाती, शिवानी वहां से चली गई.
शिवानी तो यह सब कह कर चली गई, लेकिन दीपा के दिल को बुरी तरह झकझोर गई. वह किसी भी हालत में विजय का सामना नहीं करना चाहती थी.

वह विजय के सामने अपने को बहुत बेबस और कमजोर महसूस करने लगेगी. और तब उस दिन उस ने अपने पापा से कहा कि उस ने रेस्तरां बेच दिया है और वे लोग अगले दिन, शिवानी के शादी के पहले ही, वहां से शिमला शिफ्ट हो रहे हैं.
विमल ने अपनी बेटी की उदास आंखों में देखा. बिन मां की बेटी को इस हाल में देख कर उन की आंखें छलछला आईं फिर उन्होंने फोन उठा लिया.
अगले दिन रक्षाबंधन था. सुबह दीपा सामान पैक करा नीचे गाड़ी में रखवा रही थी. पापा अभी अंदर ही थे. दीपा उन्हें बुलाने जाने के लिए मुड़ी ही थी कि पीछे से उसे चिरपरिचित आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘दीदी’’

वह चौंक कर पीछे मुड़ी तो सामने शिवानी और विजय को खड़ा पाया. आश्चर्य से
उस का मुंह खुला का खुला रह गया. शिवानी रोत हुए उस के गले से लग गई.
‘‘क्या हुआ शिवानी, तू रो क्यों रही है? घर में सब ठीक तो है और विजय तुम तुम यहां?’’ ‘‘बस दीदी बस, अब कुछ न कहो.’’
‘‘आखिर बात क्या है, कुछ बताएगी भी कि यों ही रोरो कर मुझे ही रुलाएगी?’’
‘‘आप ने ऐसा क्यों किया दीदी, क्यों किया?’’
‘‘मैं ने ऐसा क्या किया शिवानी? मुझ
से कोई भूल हो गई हो तो माफी मांगती हूं
तुझ से.’’
‘‘नहीं दीदी, भूल आप से नहीं भूल तो मुझ से हुई जो मैं आप को समझ ही न पाई.’’
दीपा की कुछ समझ में नहीं आ रहा था. शिवानी रोये जा रही थी.
किसी अनहोनी आशंका से दीपा घबरा रही थी, ‘‘शिवानी,’’ दीपा ने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरा.
‘‘दीदी,’’ शिवानी बोली, ‘‘आप ने मुझ पहले क्यों नहीं बताया?’’
‘‘मैं ने पहले तुझे क्या नहीं बताया?’’
‘‘यही कि आप और विजय एकदूसरे से बहुत प्यार करते हैं.’’

दीपा यह सुनते ही चौंक गई. वह विजय
की ओर देखने लगी और फिर कहा,
‘‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं दीपा, हम लोग सिर्फ दोस्त…’’
‘‘बस अब और झूठ नहीं दीदी. आप मेरे लिए अपनी जिंदगी की खुशियों
का गला घोंटने चली थीं, लेकिन मैं ऐसा कभी नहीं
होने दूंगी.’’
‘‘लेकिन दीपा…’’
‘‘दीदी, जब आप ने मुझे लिखा कि आप मेरी शादी में नहीं आ सकतीं, तभी मुझे लगा कि कहीं न कहीं इस शादी को ले कर कुछ गड़बड़ जरूर है और इसी का पता लगाने के लिए मुंबई आई थी और पहले आप के घर पर गई थी, वहां अंकल ने मु?ो सबकुछ बता दिया था और यह भी भी कि आप शहर छोड़ कर जा रहे हैं.
दीपा आश्चर्य से सब सुन रही थी और तभी उस के पापा बाहर आते दिखाई दिए हैं. दोनों की नजरें मिलीं और दीपा दौड़ कर अपने पापा से लिपट जाती है… दोनों की आंखों में खुशी के आंसू थे.
शिवानी और विजय उन के करीब आ गए. फिर शिवानी बोली, ‘‘आप लोग अपनी अमानत संभालो दीदी,’’ शिवानी विजय का हाथ दीपा के हाथ में पकड़ाते हुई बोली.
दीपा के हाथ में विजय का हाथ आ गया तो दीपा की नजर विजय की कलाई पर पड़ी. उस में राखी बंधी चमक रही थी. एक बहन के प्यार की अनमोल निशानी. शिवानी और विजय के बीच अब एक नया और अनमोल रिश्ता था कभी न टूटने वाला.

 

क्या अनुज-अनुपमा कभी नहीं होंगे साथ? Adya ने अपने पापा से मांग लिया ये वादा!

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ में काफी ड्रामा देखने को मिल रहा है. आए दिन नए-नए ट्विस्ट देखने को मिल रहे है. सीरियल में अनुज और अनुपमा की मुलाकात की कहानी चल रही है. ‘अनुपमा’ के अपकमिंग एपिसोड में अनु- अनुज एकदूसरे से मिल जाएंगे. वहीं एपिसोड में दिखाते है कि  अनु- अनुज एकदूसरे को देखकर इमोशनल हो जाएंगे. इसी बीच वहां मौजूद लोगों अनु- अनुज से पूछते है कि क्या आप दोनों एक दूसरे को जानते हो. तब अनुपमा कहेगी- वह यह मीटिंग नहीं कर सकती , उसकी तबियत ठीक नहीं है. अनुपमा इतना कहकर वहां से निकाल जाएगी और अनुज भी वहां से निकाल जाता है.

क्या मिलकर भी कभी नहीं मिलेंगे अनुज-अनुपमा

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ के अपकमिंग एपिसोड में देखने को मिलेगा कि अनुपमा से मिलने के बाद अनुज गाड़ी में बैठकार पुरानी यादों में खो जाता है. उधर अनुपमा भगवान से शिकायत करती है कि उसकी जिंदगी ठहरे पानी की तरह थी, तो फिर यह तूफान क्यों. अनु-अनुज अपने-अपने में खोए होते हैं. उसी दौरान श्रुति, मीटिंग वाली जगह पहुंचती है वहां देखती है कोई भी मौजूद नहीं है. श्रुति बार-बार अनुज को फोन करती है लेकिन अनुज कॉल पिक नहीं करता.

 

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वनराज के कानों में गूंजेगा अनुपमा का नाम

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ में आगे देखने को मिलेगा कि शाह हाउस में फिर से बापू जी एंट्री हो जाती है. बापूजी पूरे परिवार को जोड़ने की कोशिश करते है. इसी दौरान वनराज घर तोड़कर टॉवर बनाने की बात बापूजी से करता है और बापूजी, वनराज की बात मान जाते है और कहते हैं मैं और लीला किसी भी पेपर पर आंख बंद करके साइन कर देंगे. लेकिन तुम्हें अनुपमा के साइन भी लेने होंगे. क्योंकि बिल्डर अनुपमा की भी NOC मांग सकते है. वनराज पहले खुश होता है बाद में अनुपमा का नाम सुनकर गुस्सा हो जाएगा और कहता है यह औरत जिंदगी से जाकर भी जाती क्यों नहीं.

आद्या ने अनुज से मांगा वादा

‘अनुपमा’ में आगे देखने के मिलेगा कि आद्या को अनुज और अनुपमा की मुलाकात के बारे में पता चल जाएगा. जिसके बाद वह अपने पापा से नाराज होती है और अनुज से वादा के लिए कहती है कि वह अनुपमा से कभी नहीं मिलेंगे.

सुपर क्यूट है राह की मम्मी आलिया, फिल्म फेयर अवार्ड में दिखाया साड़ी में जलवा

इन दिनों फिल्म फेयर अवार्ड्स 2024 का जलवा हर जगह दिख रहा है. जहां बौलीवुड की तमाम हस्तियां शिरकत कर रही है. रेड कार्पेट पर सब धमाकेदार एंट्री कर रही है. ऐसे में आलिया भट्ट के लुक के चर्चे हर जगह हो रहे है. आलिया भट्ट रेड कार्पेट पर क्रीम कलर की साड़ी पहने हुए दिखाई दी है. जहां उनकी यूनिक साड़ी ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया.

साड़ी पहनकर ढाया कहर

जी हां, आलिया भट्ट फिल्म फेयर अवार्ड में क्रीम कलर की खूबसूरत साड़ी पहने नजर आई. एक्ट्रेस की ये खूबसूरत साड़ी में आते ही फोटो सोशल मीडिया पर छा गई. आलिया इन तस्वीरों में काफी फ्रेश नजर आ रही है. आलिया भट्ट ने फिल्म फेयर के ग्रैंड इवेंट में धमाकेदार एंट्री मारी. एक्ट्रेस की इन तस्वीरों ने फैंस का दिल जीत लिया.

आलिया भट्ट इस दौरान बेहद खूबसूरत और प्यारी लगीं. अदाकारा आलिया भट्ट की इन तस्वीरों को देख फैंस ने जमकर कमेंट्स कर रहे हैं. और कह रहे है कि वे कितनी प्यारी लग रही हैं. आलिया से साड़ी में ढेर सारी फोटो क्लिक करवाई है. आलिया भट्ट की खूबसूरती पर लोगों की नजर टिकी रह गई. आलिया की ये तस्वीरें इंस्टाग्राम पर आते ही छाने लगी है.

 

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फोटो हुई वायरल

आलिया भट्ट की इन तस्वीरों पर लोग जमकर कमेंट्स कर रहे हैं. एक यूजर ने कमेंट कर लिखा कि वो कितनी एनर्जेटिक लग रही हैं. आलिया भट्ट के इस स्टाइल पर फैंस वारे-वारे गए. उनकी ये तस्वीरें फैंस के बीच आते ही वायरल होने लगी हैं. बता दें कि आलिया भट्ट की ये फ्रंट कट साड़ी लोगों का ध्यान खींच ले गई. एक्ट्रेस ने इसे ऑफ शोल्डर ब्लाउज के साथ कैरी किया था.

 

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मुझे टौंसिल हो गए है ऐसे में मुझे कोई उपाय बताएं

सवाल

मुझे टौंसिल की समस्या है. मेरे टौंसिल में बारबार इन्फैक्शन हो जाता है, जिस के कारण मुझे निगलने में बहुत समस्या होती है और बुखार भी हो जाता है. टौंसिल के कारण कानों के पास भी दर्द होता है. डाक्टर ने मुझे औपरेशन की सलह दी, लेकिन मैं औपरेशन नहीं करवाना चाहती हूं. मुझे बताएं कि बिना औपरेशन कराए टौंसिल से कैसे छुटकारा पाया जाए.?

जवाब

टौंसिल अकसर आयोडीन की कमी, ठंडागरम का एकसाथ सेवन, बहुत ज्यादा ठंडा, ज्यादा तैलीय और मसालेदार खाना या सर्दीजुकाम के कारण होते हैं. यदि आप इन चीजों पर ध्यान दे रही हैं तो आज से ही बताई गई चीजों का पालन शुरू कर दें. हालांकि टौंसिल से हमेशा के लिए छुटकारा पाना चाहती हैं तो औपरेशन करवाना ही पड़ेगा. बिना औपरेशन के टौंसिल को सिर्फ कुछ वक्त के लिए रोका जा सकता है या जल्दी ठीक किया जा सकता है. टौंसिल के दौरान हलदी एक दवा का काम करती है. हर दिन हलदी वाला कुनकुना दूध पीएं. हलदी को टौंसिल की जगह लगा कर मुंह बंद कर बैठ जाएं. हलदी धीरेधीरे गले से नीचे उतरने लगेगी. इस से आप को राहत मिलेगी. रोज दिन में 2 बार कुनकुने पानी में नमक डाल कर गरारे करें. चाय की पत्ती भी टौंसिल से छुटकारा पाने में मदद करती है. इसलिए चायपत्ती को पानी के साथ उबाल कर छान लें. उस पानी से गरारे करें, आराम मिलेगा. घरेलू नुसखों के साथ मैडिकल ट्रीटमैंट भी करवाएं. दवा और खानपान पर ध्यान दे कर टौंसिल के संक्रमण से बचा जा सकता है.

 

Winter Special: घर में बनाएं Orange से ये टेस्टी रेसिपीज

ओरेंज अर्थात संतरा में एंटीओक्सिडेंटस, हाई फायबर, विटामिन बी काम्प्लेक्स और विटामिन सी जैसे पौष्टिक तत्व भरपूर मात्रा में पाये जाते हैं जो इम्युनिटी और स्टेमिना बढाने, वजन को संतुलित करने और हीमोग्लोबिन की कमी को दूर करने में सहायक होते हैं. ओरेंज का गूदा ही नहीं बल्कि इसके छिल्के भी चेहरे के सौन्दर्य को निखारने का काम करते हैं. इन दिनों संतरा भरपूर मात्रा में बाजार में मिल रहा है. आज हम आपको संतरे से बनने वाली कुछ रेसिपीज को बनाना बता रहे हैं जिन्हें बनाना तो बहुत आसान हैं ही साथ ही ये बहुत स्वादिष्ट भी होती हैं. तो आइये देखते हैं कि इन्हें कैसे बनाते हैं-

-आरेंज रबड़ी

कितने लोगों के लिए           6

बनने में लगने वाला समय       30 मिनट

मील टाइप                     वेज

सामगी

आरेंज                             1 किलो

फुल क्रीम दूध                       2 लीटर

शकर                              250 ग्राम

मिल्क पाउडर                       2 टेबल स्पून

बारीक कटे पिस्ता                   1 टेबलस्पून

विधि-

अब आरेंज का ज्यूस निकालकर छलनी से छान लें. ओरेंज जूस में शकर डालकर लगभग एक तार की चाशनी बनने तक पकाकर ठंडा कर लें. एक भारी तले के भगौने में दूध डालकर गैस पर चढा दें. मद्धिम आंच पर दूध को उबलने दें. बीच बीच में दूध के उपर आयी मलाई को कलछी से कड़ाही के किनारों पर एकत्र करती जाएं. इससे रबड़ी के लच्छे बनेंगें. जब दूध एकदम गाढा होने लगे तो मिल्क पाउडर मिलाकर गैस बंद कर दें. ठंडा होने पर किनारों पर लगे लच्छों को कलछी से खुरच लें और संतरे की चाशनी को तैयार रबड़ी में अच्छी तरह मिला लें. कटे पिस्ता से सजाकर सर्व करें.

-ऑरेंज खीर

कितने लोगों के लिए                  6

बनने में लगने वाला समय             30 मिनट

मील टाइप                           वेज

सामग्री

फुल क्रीम दूध                    1 लीटर,

मिल्कमेड                        1 कप

रेशे निकले ऑरेंज के बारीक टुकड़े     1 कप

अधपके चावल                    1/4 कप

इलायची पाउडर                   1/4 टी स्पून,

बारीक कटी मेवा                   1 टेबल स्पून

विधि-

दूध में चावल डालकर दूध के आधा होने तक पकाएं. अब मिल्कमेड, मेवा और इलायची पाउडर डालकर पुनः 10 मिनट तक धीमी आंच पर पकाएं. ठंडा होने पर ऑरेंज के टुकड़े डालें फ्रिज में ठंडा होने पर सर्व करें.

-आरेंज स्टार्स

सामग्री

ऑरेंज ज्यूस                           1 कप,

पिसी शकर                            100 ग्राम,

मैदा                                  एक कप,

सूजी                                 आधा कप,

आरेंज एसेंस                           1 बूंद

ऑरेंज खाने वाला रंग                    1 बूंद 1 टी स्पून

तेल मोयन के लिए                     1 टेबल स्पून

तलने के लिए पर्याप्त मात्रा में तेल

विधि-मैदा में मोयन का तेल, सूजी, पिसी शकर, आरेंज एसेंस, ज्यूस और रंग डालकर कड़ा गूंथ लें. आधा घंटे तक सूती कपड़े से ढककर रख दें ताकि सूजी फूल जाए. अब इसे चकले पर बेलकर स्टार शेप में काट लें. तैयार स्टार्स को गरम तेल में सुनहरा होने तक तलकर बटर पेपर पर निकालकर एअरटाइट जार में भरकर प्रयोग करें.

 

एक सांकल सौ दरवाजे: भाग 2- सालों बाद क्या अजितेश पत्नी हेमांगी का कर पाया मान

मैं ममा की जिंदगी करीब से भोग रही थी. कहें तो भाई भी. शायद इसलिए उस में पिता की तरह न होने का संकल्प मजबूत हो रहा था.

लेकिन ममा? क्या मैं जानती नहीं रातें उस की कितनी भयावह होती होंगी जब वह अकेली अपनी यातनाओं को पलकों पर उठाए रात का लंबा सफ़र अकेली तय करती होगी.

इकोनौमिक्स में एमए कर के उस की शादी हुई थी. पति के रोबदाब और स्वेच्छाचारी स्वभाव के बावजूद जैसेतैसे उस ने डाक्ट्रेट की, नेट परीक्षा भी पास की जिस से कालेज में लैक्चरर हो सके. और तब. पलपल सब्र बोया है.

दुख मुझे इस बात का है कि इतना भी क्या सब्र बोना कि फसल जिल्लत की काटनी पड़े.

पापा चूंकि बेहद स्वार्थी किस्म के व्यक्ति हैं, ममा पर हमारी जिम्मेदारी पूरी की पूरी थी.

याद आती है सालों पुरानी बात. नानी बीमार थीं, ममा को हमें 2 दिनों के लिए पापा के पास छोड़ कर उन्हें मायके जाना पड़ा. तब भाई 6ठी और मैं 10वीं में थी. हमारी परीक्षाएं थीं, इसलिए हम ममा के साथ जा न पाए.

2 दिन हम भाईबहनों ने ठीक से खाना नहीं खाया. जैसेतैसे ब्रैडबिस्कुट से काम चलाते रहे. ममा को याद कर के हम एकएक मिनट गिना करते और पहाड़ सा समय गुजारते.

पापा होटल से अपनी पसंद का तीखी मसालेदार सब्जियां मंगाते जबकि हम दोनों मासूम बच्चों के होंठ और जीभ भरपेट खाना खाने की आस में जल कर भस्मीभूत हो जाते. आश्चर्य कि मेरे पापा हमारा बचा खाना भी खा लेते, लेकिन कभी पूछते भी नहीं कि हम ने फिर खाया क्या?

ममा हमारे लिए छिपा कर अलग खाना बनाती थी, ताकि पापा के लिए बना तीखा मसालेदार खाना हमें रोते हुए न खाना पड़े. शायद ममा जानती थी, बच्चों को अभी संतुष्ट हो कर भरपेट खाना खाना ज्यादा जरूरी है. और ऐसे भी ममा हमें खाना बनाना भी सिखाती चलती ताकि बाहर जा कर हमें दूसरों पर निर्भर न रहना पड़े.

मैं बड़ी हो रही थी, मुझ में सहीगलत की परख थी. ताज्जुब होता था पापा के विचारों पर. वे मौकेबेमौके खुल कर कहते थे कि अगर उन के घर में रहना है तो किसी और की पसंद का कुछ भी नहीं चलेगा, सिवा उन की पसंद के.

इंसान एक टुकड़ा जमीन के लिए आधा इंच आसमान को कब तक भुलाए रहे?

उसे जीने को जमीन चाहिए तो सांस लेने को आसमान भी चाहिए.

भले ही हम छोटे थे, ममा के होंठ कई सारी मजबूरियों की वजह से सिले थे. लेकिन हम अपनी पीठ पर लगातार आत्महनन का बोझ महसूस करते. क्या मालूम क्यों पापा को ममा के साथ प्रतियोगिता महसूस होती. ममा की शिक्षा, उन के विचार और भाव से पापा खुद को कमतर आंकते, फिर शुरू होती पापा की चिढ़ और ताने. जब भी वह नौकरी के लिए छटपटाती, पापा उसे दबाते. जब चुप बैठी रहती, उसे अपनी अफसरी दिखा कर कमतर साबित करते. यह जैसे कभी न ख़त्म होने वाला नासूर बन गया था.

भाई अब 10वीं देने वाला था और मैं स्नातक द्वितीय वर्ष की परीक्षा देने वाली थी. बहुत हुआ, और कितना सब्र करे. आखिर कहीं ममा की भी धार चूक न जाए.

आज जो कुछ हुआ वह एक लंबी उड़ान से पहले होना ही था. ममा को अब खुद की जमीन तलाश करनी ही होगी. तभी हमें भी अपना आसमान मिलेगा. मुझे अब ममा का इस तरह पैरोंतले रौंदा जाना कतई पसंद नहीं आ रहा था.

दूसरे दिन औफिस से आते वक्त पापा के साथ औफिस की एक कलीग थीं.

हम तो यथा संभव उस के साथ औपचारिक भद्रता निभाते रहे, लेकिन वे दोनों अपनी अतिअभद्रता के साथ ममा का मजाक बनाते रहे.

मेरे 48 वर्षीय पिता अचानक ही अब अपने सौंदर्य के प्रति अतियत्नवान हो गए थे. सफेद होती जा रही अपनी मूंछों को कभी रंगते, कभी सिर के बालों को. कुल मिला कर वयस्क होते जा रहे शरीर के साथ युद्ध लड़ रहे थे, ताकि ममा की जिंदगी में तूफान भर सकें.

मुझे और ममा को ले कर उन्हें एक असहनीय कुतूहल होता और हम अयाचित विपत्तियों के डर से बचने के लिए अपनी आंखें ही बंद कर लेते.

हम बच्चे ऐसे भी पापा से कतराने लगे थे, और पढ़ाई हो न हो, अपने कमरे में बंद ही रहते. रह जाती ममा, जिस की आंखों के सामने अब नित्य रासलीला चलती.

भाई मेरा चिंतित था. और मैं भी. यह घर नहीं, एक टूटती दीवार थी. हर कोई इस से दूर भागता है. और हम थे कि इसी टूटती दीवार को पकड़ कर गिरने से बचने का भ्रम पाले थे. करते भी क्या, यही तो अपना था न.

कहना ही पड़ता है, जिस पति के सान्निध्य में प्रेम और भरोसे की जगह गुलामी का एहसास हो, बिस्तर पर सुकून की नींद की जगह रात बीत जाने की छटपटाहट हो, उस स्त्री के जीवन में कितनी उदासी भर चुकी थी, यह कहने भर की बात नहीं थी.

मेरे पापा एक सरकारी मुलाजिम थे. ठीकठाक देखने में, अच्छी तनख्वाह, एक ढंग का पैतृक घर. उच्चशिक्षित सीधी सरल सुंदर पत्नी, 2 आज्ञाकारी बच्चे. इस के बावजूद पापा में क्या कमी थी कि हमेशा ममा को कमतर साबित कर के ही खुद को ऊंचा दिखाने का प्रयास करते रहते. हम सब के अंदर धुंएं की भठ्ठी भर चुकी थी.

पापा घर पर नहीं थे. ममा हमारे कमरे में आई, बोली, ‘मेरा एक दोस्त है भोपाल के कालेज में प्रिंसिपल. मैं उसे अपनी नौकरी के सिलसिले में मेल करना चाहती हूं. अगर तुम दोनों भाईबहन हिम्मत करो, तो मैं नौकरी के लिए कोशिश करूं. हां, हिम्मत तुम्हें ही करनी होगी. मैं इस घर में रह कर नौकरी कर नहीं पाऊंगी, तुम जानते हो. और बाहर गई, तो घर नहीं आ पाऊंगी.

‘क्या तुम दोनों अपनीअपनी परीक्षाएं होने तक यहां किसी तरह रह लोगे? जैसे ही तुम्हारी परीक्षाएं हो जाएंगी, मैं तुम दोनों को अपने पास बुला लूंगी. और कितना सहुं, कहो? यह तुम्हारे व्यक्तित्व पर भी बुरा प्रभाव डाल रहा है. मैं एक अच्छी गृहस्थी चाहती थी, प्यार और समानता से परिपूर्ण. मगर तुम्हारे पापा का मानसिक विकार यह घर तोड़ कर ही रहेगा. तुम दोनों अब बड़े हो चुके हो, विपरीत परिस्थिति की वजह से परिपक्व भी. इसलिए तुम जो कहोगे…?’

ममा ने सारी बातें एकसाथ हमारे सामने रखीं. फिर स्थिर आंखों से हमें देखने लगीं. कोई आग्रह या दबाव नहीं था. ममा की यही बातें उन्हें पापा से अलग ऊंचाई देती थीं.

भाई ने कहा- ‘मुझे तो लगता है हम अपनी जिंदगी में बदलाव खुद ही ला सकते हैं. अगर बैठे रहे तो कुछ भी नहीं बदलेगा. हम हमेशा यों ही दुखी ही रह जाएंगे.’

‘मुझे भी यही लगता है, भाई सही कह रहा है. तुम पापा के अनुसार ही तो चल रही हो, वे तब भी नाखुश हैं. और तो और, अपनी मनमरजी से ऐसी हरकत कर रहे हैं जिस से हम सभी परेशान हैं. भला यही होगा तुम नौकरी ढूंढ कर बाहर चली जाओ.’

 

Winter Special: सर्दियों में बालों में तेल लगाने के अनगिनत फायदे

सालों से बालों में तेल लगाने की परंपरा रही है. तेल लगाने से बालों की जड़े मजबूत होती है. मस्तिष्क शांत रहता है. ब्लड सकुलेशन बढ़ता है. जिस से बालों का झडऩा और सफेद होना दोनों में कमी आती है. यह सोचना कि आप काम करने वाली लड़कियों को अमीर घरों की लड़कियों की तरह तेल न लगा कर खासतौर पर यह बाते और हिरोइनों के लागते हुए प्रोडक्ट जो विज्ञापन में ही दिखते है लगाने चाहिए गलत है. बढ़ता अमीरीगरीबी या जाति नहीं देखों.

आज के भागमभाग की जीवन शैली में बालों का झडऩा और जल्दी सफेद होना आम है. ऐसे में नियमित तेज लगाने से आप मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ हो सकते है. लाभ निम्न है –

– मानसिक तनाव का कम होना.

– ताजगी महसूस करना.

– नींद का पूरा होना आदि.

औयङ्क्षलग कब और कैसे करें, इस बारे में जानकारी आवश्यक है मसाज अगर हमारे सिर, कान के पीछे और सभी प्रेशर प्वाइंट को ध्यान मेंं रख कर किए जाये तो इस का लाभ तुरंत मिलता है. मसाज से केवल बाल ही नहीं चेहरे पर भी ग्लो आता है. क्योंकि सिर की त्वचा चेहरे की एक्टेन्डेड त्वचा होती है.

बालों की रोज औयङ्क्षलग अच्छी मानी जाती है पर सप्ताह में दो दिन आवश्यक है. इस से बाल मुलायम और चमकदार रहते है. डैमेज बालों की लगातार रिपेयङ्क्षरग होती रहती है. साथ ही प्रदूषण से भी बाल डैमेज नहीं होते. क्योंकि तेल बालों के प्रौटीन को बनाये रखती है जिस से बाल हैल्दी और स्ट्रौंग रहते है. हर मौसम में औयङ्क्षलग अच्छा होता है.

वैसे तो बालों में तेल हर कोई अपने सुविधानुसार लगाता है. पर कुछ तरीके निम्र है जो प्रभावशाली होने के साथसाथ हेयर फौण को रोकता है.

– औयल को लगाने से पहले थोड़ा गरम करें.

– हेयर को विभागों में बांट ले और हर भाग में अच्छी तरह औयल लगाए.

– एक साथ में अधिक तेल न लगाए, हर भाग में थोड़ा औयल ले कर उंगली के पोरों से मसाज करे, तेल से अधिक मसाज आवश्यक होता है.

– इस के लिए औयल में उंगली के पोरों को डुबाए और धीरेधीरे स्कास्प में मसाज करे.

– मसाज 10 से 15 मिनट तक करें ताकि बालों की जड़ों में तेल पहुंचे और आप ताजगी महसूस करे.

– मसाज के तुरंत बाद बालों को न धोए. कम से कम एक घंटे के बाद आप बाल धो सकती है पर पूरी रात तेल के रहने से फायदा अधिक होता है.

हमेशा अपने पिलो के कवर को साफ रखें ताकि तेल में रहने वाला कैक्टिरिया नुकसान न पहुंचाए. घर में अपने लिए अलगअलग पिलो न रखें तो साफ धुला पिलो कवर जरूर रखें. पिलो कवर को हर रोज धोएं अगर उसी पिलो को किसी और ने भी इस्तेमाल किया है.

इसी तरह सिर पर ले जाने वाली चुन्नी या बैंड भी धोएं क्योंकि तेल लगाने की वजह से बैक्टीरिया जल्दी मल्टीप्लाई करता है.

हमेशा अच्छे शैंपू और कंडीशनर का प्रयोग करें. बालों को प्राकृतिक वातावरण में सूखने दें. ब्लोअर या ड्रायर का इस्तेमाल कम करें. इस से बाल रुखें और बेजार हो सकते है.

 

Valentine’s Day 2024: अनोखी- भाग 1- प्रख्यात से मिलकर कैसा था निष्ठा का हाल

पत्तियोंके  झुरमुट में फिर सरसराहट हुई. प्रख्यात ने सिर घुमा कर फिर देखने की कोशिश की. लग रहा था कोई उसे छिप कर देख रहा है. तभी पीछे शर्ट में कुछ चुभा. उस का हाथ  झट पीछे चला गया. जंगली घास की वह गेहूं जैसी बाली कैसे उस

की टीशर्ट में ऊपर पहुंच गई. उस ने निकाल कर एक ओर फेंक तो दी पर फिर सोचने लगा कि यह आई कहां से? इस तरह का कोई पौधा भी यहां नहीं दिख रहा. फिर उस ने सरसरी निगाह चारों ओर डाली.

‘‘क्या ढूंढ़ रहा है यार?’’ तभी बचपन से ग्रैजुएशन तक का साथी सिकंदर वहां आ पहुंचा.

‘‘तू अब आ रहा है? आधे घंटे से बोर हो कर वीडियो देखे जा रहा था… वह याद है तु झे वह जंगली घास की बाली हम बचपन में खेलखेल में एकदूसरे की ड्रैस में चुपके से घुसा देते थे. वही मेरी शर्ट में अभी न जाने कहां से आ गईर् थी… वही देख रहा था,’’ कह वह हंसा.

सिकंदर भी हंसा. फिर बोला, ‘‘कितना रोया करता था तू. लाली अकसर तेरी स्कूल ड्रैस में डाल दिया करती थी… तू रोता तो हम सब खूब मजे लेते, हंसते. कितनी पुरानी बात याद आ गई… कहीं वही तो नहीं आ गई… कितने मस्तीभरे दिन थे… किसी बात की चिंता नहीं होती थी.’’

‘‘सच में यार सब से शरारती, अनोखी लाली ही तो थी. हर दिन डरता भी था फिर भी शरारतों का इंतजार भी करता. कब क्या कर दे… न जाने कहां होगी अब… जी ब्लौक से ही तो चढ़ती थी स्कूल बस में. उस की मम्मी हिदायतें देते हुए उसे बस में चढ़ातीं, ‘‘लाली, स्कूल से अब कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए…किसी बच्चे को तंग नहीं करना लाली… अपना ही टिफिन खाना लाली… तेरी पसंद का ही सब रखा है लाली… तू सुन रही है न लाली… भैया जरा इस पर ध्यान रखना,’’ प्रख्यात उस की मम्मी की नकल करते हुए बोल रहा था.

‘‘तो हम भी उसे लालीलाली ही चिढ़ा कर पुकारने लगे थे. उस का असली नाम… याद नहीं आ रहा…हां वह तु झे चिढ़ कर प्रख्यात की जगह खुरपी खाद कहती थी यह याद है… और मु झे सिकंदर बंदर. हा… हा…’’

‘‘तू भूल गया मैं नहीं भूला उस का निष्ठा नाम… मेरी बगल में ही तो बैठती थी. होमवर्क के लिए अपनी कौपी टीचर से छिपा मेरी ओर सरका देती. खुंदक बहुत आती थी मु झे उस पर उस की अचरज भरी शैतानियों पर.’’

‘‘लंच के समय तु झे ही अकसर अपना डब्बा खाली मिलता, तू बहुत रोता तो अपनी मम्मी का दिया पौटिष्क लंच थमा जाती कि मम्मी ने अच्छे वाले छोटे कटहल भी छील कर इस में रखे हैं.

‘‘तू चिढ़ जाता कि ततहल मैं नहीं खाता तो ततहल कहकह कर हंसती. मैं बौक्स में देख कर तु झे सम झाता कि पागल, यह लीची को छोटा कटहल कह रही है.

‘‘सुंदर तो है तू रोतड़ू पर पौष्टिक खाना क्यों नहीं खाता? ये बर्गर, नूडल्स क्यों खाता है रोज? लंबातगड़ा होगा तभी तो शादी करूंगी तु झ से. मेरा लंच खा कर यह टौफी खा लेना. वह बड़े प्यार से तेरी शर्ट की पौकेट में डाल देती और तू भोंदू जब खाता तो फिर रोता कि चीटिंग की. फिर

इस ने रैपर में पता नहीं क्या भर दिया. थूथू… फिर वह खूब हंसती. रैपर में कभी इमली तो कभी मिट्टी निकलती. ऐसे ही छेड़ा करती. कभी रूमाल में जुगनू, तितलियां पकड़ लाती… पूरी क्लास को कुतूहल से भर देती… जहां भी होगी अपनी शैतानियों से बाज नहीं आई होगी यह तो तय है…’’

‘‘हां, हाई स्कूल के बाद हम बौयज सीनियर स्कूल में शिफ्ट हुए, तब जा कर उस से पीछा छूटा… अब तो मेरा कमर्शियल लौ का रिसर्च वर्क भी पूरा होने को है, फिर भी उसे कभी देखा नहीं और तू तो कालेज का फुटबौल चैंपियन था ही. आज 7-8 सालों में स्टेट कोच बन बैठा. यहां बहुत कम रहा, दूसरे शहर ही चला गया, उसे तू देखता कहां से.’’

‘‘और तू किताबों में घुसा रहा कहीं और देखने की तु झे फुरसत कहां थी… हो गई होगी शादीवादी किसी दूसरे शहर में और हो लिए होंगे उसे उस के जैसे ही शैतान बच्चे… हा… हा… भिंडी की ढेंपियां चेहरे पर चिपका कर दूसरों को डराते होंगे.’’

‘‘क्या बात करता है 7-8 सालों में उस के बच्चे?’’

‘‘और क्या, गै्रजुएशन के बाद अकसर पेरैंट्स विदा कर देते हैं… लड़की के पीछे ही पड़ जाते हैं.’’

‘‘अरे, लड़की क्या लड़के के पेरैंट्स भी पीछे पड़ जाते हैं जैसे मेरे… तय भी कर रखी

है. जौब लगते ही छोड़ेंगे नहीं, शादी करा के ही दम लेंगे.’’

‘‘फिर तो बधाई हो. कौन है कहां की है बता तो सही? तेरे पेरैंट्स ने तो सही ही किया है… तू भी तो पढ़ता ही जा रहा है… तेरे सारे एलएलबी के साथी ग्रैजुएशन के बाद ही काम

पर लग गए… चल बता उस के बारे में,’’ सिकंदर ने पूछा.

‘‘अरे कुछ भी नहीं मालूम,’’ प्रख्यात बोला.

‘‘यह क्या बात हुई भला?’’

‘‘हमारे यहां सब थोड़े पुराने खयालों के हैं. सब अच्छी तरह देख कर खुद ही तय करते हैं.’’

‘‘अरे, ऐसे कैसे?’’

‘‘हूं यार, अगले महीने की 15 को सगाई करने वाले हैं. तभी देखूंगा तेरे साथ ही. तू तो होगा ही न?’’ प्रख्यात मुसकराया.

‘‘यह भी कोई कहने की बात है… अब मेरी सुन, मेरा तो संयोगिता हरण की योजना बन रही है. इश्क हो गया है मु झे,’’ सिकंदर कुछ रुक कर बोला.

‘‘क्या बात करता है फिर… बाज नहीं आएगा. इश्कबाज… पर सीधे से क्यों नहीं करता?’’ प्रख्यात मुसकराया.

‘‘सुदीपा नाम है. ब्राह्मण है और मैं सिकंदर ठाकुर… दोनों परिवार

राजी नहीं. इसलिए तेरी मदद चाहिए. तु झे करनी ही पड़ेगी. इस बार सच्चा इश्क हुआ है… सच कह रहा हूं.’’

‘‘अब यह कहां मिल गई तु झे?’’ प्रख्यात मुसकराया.

‘‘इतनी सिंपल, इतनी भोलीभाली कि  पहली नजर में बस गई. रिसैप्शनिस्ट है. पूरी टीम के लिए रूम्स बुक थे वहां, पर उस ने मु झे पहचाना नहीं. डेढ़ घंटे तक सारे प्रूफ लिए, तब कहीं अंदर जाने दिया मु झे. फिर बाद में मालूम होने पर कि मैं कौन हूं बड़ी माफी मांगी मु झ से. बस उस की मासूमियत पर दिल आ गया मेरा. यही मेरा प्यार है. तीसरे दिन उस से पूछ ही लिया कि मु झ से शादी करोगी तो वह शरमा गई. मतलब हां था. मगर दूसरे दिन ही उस ने अपनी परेशानी सकुचाते हुए बता दी कि हम ब्राह्मण परिवार से हैं और परिवार दूसरी कास्ट में मैरिज के सख्त खिलाफ है. खिलाफ तो हमारा परिवार भी है. ठाकुर ठाकुरों में ही ब्याह करते हैं… पर हमें ही कुछ करना पड़ेगा इस प्रथा को तोड़ने के लिए. हम भाग कर कोर्ट में रजिस्टर मैरिज करेंगे तब तो घर वालों को राजी होना पड़ेगा.’’

आगे पढ़ें- ‘‘अबे चल कोई फिल्म है क्या? मैं आंटी से बात करता हूं…

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