रिश्तों का बंधन: भाग 2- विजय ने दीपा की फोटो क्यों जलाई

दीपा अब अपने आने वाले जीवन के बारे में सोच रही थी. वह अपने पापा से दूर नहीं रहना चाहती थी. सोचा कि वह इस बारे में विजय से बात करेगी.

अगर वह उस के साथ रहने को तैयार हो जाता है, तो उसे अपने पापा की कोई चिंता नहीं रहेगी और उस की किश्ती को किनारा मिल जाएगा.

विजय की फैमिली का बिजनैस है और उस के घर वाले चाहते हैं कि वह अपने घर के बिजनैस में हाथ बंटाए और जल्दी से शादी कर अपना घर बसाए. उस के पिता चाहते हैं कि वे विजय की शादी अपने दोस्त राजीव की बेटी शिवानी से कर अपनी दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल दें, लेकिन विजय ने शादी करने से यह कह कर इनकार कर दिया है कि जब तक वह खुद अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता, वह शादी नहीं करेगा. वह दीपा से अपने प्यार के बारे में किसी को कुछ नहीं बता सका. लेकिन मांबाप की जिद और बूढ़ी दादी के आगे उसे झुकना पड़ा और आखिर वह राजीव परिवार के यहां पुणे में लड़की देखने जाने को तैयार हो गया.

दोनों ही परिवारों को यकीन था कि शिवानी जैसी सुंदर और होशियार लड़की को देख कर विजय न नहीं कर सकता.
विजय सच में शिवानी को देखता ही रह गया. शिवानी भी पहली नजर में ही उसे अपना दिल दे बैठी और मन ही मन उसे अपना पति मान लिया लेकिन उस वक्त उस का दिल टूट गया जब विजय ने शादी करने से इनकार कर दिया. किसी की समझ में नहीं आया कि उस ने ऐसा क्यों किया.
अपनी छोटी बहन रोली के बहुत पूछने पर विजन ने अपने और दीपा के प्यार के बारे में बताया और कहा कि वह उसी से शादी करेगा.

उधर शिवानी अब खोईखोई सी रहने लगी थी. राजीव उसे बहुत समझते और विजय को भूल जाने को कहते हैं रहे, लेकिन शिवानी ने तो चुप्पी साध रखी थी. राजीव अब विजय के बारे में पता लगाने की कोशिश की और उन्हें पता चलता है कि विजय मुंबई में किसी लड़की के साथ घूमताफिरता है और उस का दीवाना सा लगता है तो उन्होंने यह बात शिवानी को बताई.
‘‘बेटी, मैं ने पता लगाया है विजय मुंबई में किसी लड़की के साथ घूमताफिरता है. तुम अपने दिल से उस का खयाल निकाल दो. मुझे तो लगता है कि विजय का करैक्टर…’’
‘‘नहीं पापा, विजय ऐसा नहीं है, मैं अच्छी तरह जानती हूं और आप से वादा करती हूं कि मैं जल्द ही उसे उस लड़की के चंगुल से छुड़ा कर आजाद करा लूंगी.’’
‘‘लेकिन तुम ऐसा कैसे करोगी? तुम यहां पुणे में और वह मुंबई में.’’
‘‘आप चिंता मत करिए पापा, वहां मेरी एक बहुत पुरानी बचपन की सहेली रहती है. वह मेरी मदद करेगी.’’
‘‘क्या नाम है उस का?’’
‘‘दीपा.’’
दीपा शिवानी का खत पा कर हत्प्रभ रह गई. बचपन की सहेली शिवानी. हमेशा वह उसे दीदीदीदी कहती रहती थी.
और उसे बचपन की शरारतों से ले कर कालेज हौस्टल तक की सारी बातें याद आ गईं…
शिवानी ने लिखा था कि वह एक विजय से शादी करना चाहती है और वह उसे किसी तरह से उस लड़की से मुक्ति दिला दे जो उस के पीछे पड़ी है. विजय का पूरा हुलिया, फोटो, फोन नंबर घर का पता साथ भेजा था.
दीपा की आंखों में आंसू आ गए, ‘‘क्या
मेरी जिंदगी में वीरनी ही लिखी है? शिवानी
को कैसे बताऊं कि कैसे विजय को पा कर मेरी सूनी जिंदगी में कुछ हलचल हो रही है, कैसे बताऊं कि मैं भी विजय के बिना नहीं रह सकती. कैसे बताऊं कि वह लड़की कोई और नहीं मैं
ही हूं.’’
दीपा को लगा जैसे वह एक ऐसे भंवर में फंस गई है, जहां से निकल नहीं पाएगी. शिवानी, जिसे उस ने हमेशा अपनी छोटी बहन ही समझ. बचपन से ले कर कालेज हौस्टल तक कैसे वे दोनों रातरात भर जाग कर हंसीमजाक करती रहती थीं.

मोटी नाक पर पतले फ्रेम का चश्मा लगाने वाली टीचर को देखदेख कर हंसा करती थीं. आज हालात ने उसे ऐसे मोड़ पर ला कर खड़ा कर दिया है, जहां से उसे कुछ सुझाई नहीं पड़ रहा है. क्या वह शिवानी को अपने और विजय के प्रेम के बारे में सबकुछ लिख दे कि वह भी विजय के बिना नहीं रह सकती और फिर उस ने फैसला कर मैसेज भेजने के लिए लैपटौप खोला और जैसे ही उस ने वर्ड फाइल पर क्लिक किया उस की पुरानी यादें ताजा हो गईं…

एक सांकल सौ दरवाजे: भाग 1- सालों बाद क्या अजितेश पत्नी हेमांगी का कर पाया मान

19 साल की लड़की 43 साल की स्त्री को भला क्या समझेगी, ऐसा सोच कर मेरी समझ पर आप की कोई शंका पनप रही है तो पहले ही साफ कर दूं कि जिस स्त्री की चर्चा करने जा रही हूं, उस की यात्रा का एक अंश हूं मैं. उसी पूर्णता, उसी उम्मीद की किरण तक बढ़ती हुई, चलती हुई हेमांगी की बेटी हूं मैं.

43 साल की हेमांगी व्यक्तित्व में शांत, समझ की श्रेष्ठता में उज्ज्वल और कोमल है. वह विद्या और सांसारिक कर्तव्य दोनों में पारंगत है. तो, हो न. तब फिर क्यों भला मैं उस की महानता का बखान ले कर बैठी? यही न, इसलिए, कि 19 साल की उस की बेटी अपने जीवनराग में गहरी व अतृप्त आकांक्षाएं देख रही है, एक छटपटाहट देख रही है अपने जाबांज पंख में, जो कसे हैं प्रेम और कर्तव्य की बेजान शिला से. यह बेटी साक्षी है दरवाजे के पीछे खड़े हो कर उस के हजारों सपनों के राख हो कर झरते रहने की.

तो फिर, नहीं खोलूं मैं सांकल? नहीं दूं इस अग्निपंख को उड़ान का रास्ता?

आइए, समय के द्वार से हमारे जीवनदृश्य में प्रवेश करें, और साक्षी बनें मेरे विद्रोह की अग्निवीणा से गूंजते प्रेरणा के सप्तस्वरों के, साक्षी बनें मेरे छोटे भाई कुंदन के पितारूपी पुरुष से अपनी अलग सत्तानिर्माण के अंतर्द्वंद्व के, मां के चुनाव और पिता के असली चेहरे के.

हम मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के रामनगर कालोनी के पैतृक घर में रहते हैं. इस एकमंजिले मकान में 2 कमरे, एक सामान्य आकार का डाइनिंग हौल और एक ड्राइंगरूम है. बाहर छोटा सा बरामदा और 4र सीढ़ी नीचे उतर कर छोटेछोटे कुछ पौंधों के साथ बाहरी दरवाजे पर यह घर पूरा होता है.

48 साल के मेरे पापा अजितेश चौधरी सरकारी नौकरी में हैं. उन का बेटा कुंदन यानी मेरा भाई अभी 10वीं में है. मैं, कंकना, उन की बेटी, स्नातक द्वितीय वर्ष की छात्रा. हम दोनों भाईबहनों का शारीरिक गठन, नैननक्श मां की तरह है. सधे हुए बदन पर स्वर्णवर्णी गेहुंएपन के साथ तीखे नैननक्श से छलकता सौम्य सारल्य. यह है हमारी मां हेमांगी. 43 की उम्र में जिस ने नियमित व्यायाम से 32 सा युवा शरीर बरकरार रखा है. हमेशा मृदु मुसकान से परिपूर्ण उस का चेहरा जैसे वे अपनी विद्वत्ता को विनम्रता से छिपाए रहती हो.

मेरी ममा हम दोनों भाईबहनों के लिए हमेशा खास रही. ममा को हम मात्र स्त्री के रूप में ही नहीं समझते बल्कि एक पूर्ण बौद्धिक व्यक्तित्व के रूप में.

सुबह 9 बजे का समय था. कालेज के लिए निकल रही थी मैं. घर में रोज की तरह कोलाहल का माहौल था.

पापा सरकारी कार्यालय में सहायक विकास अधिकारी थे. वे अपने बौस के अन्य 10 मातहतों के साथ उन के अधीन काम करते थे. लेकिन घर पर मेरी ममा पर उन का रोब किसी कलैक्टर से कम न था.

‘हेमा, टिफिन में देर है क्या? यार, घर पर और तो कुछ करती नहीं हो, एक यह भी नहीं हो रहा है, तो बता दो,’ पापा बैडरूम से ही चीख रहे थे.

‘दे दिया है टेबल पर,’ ममा ने बिना प्रतिक्रिया के सूचना दी.

‘दे दिया है, तो जबान पर ताले क्यों पड़े थे?’

‘चाय ला रही थी.’

‘लंचबौक्स भरा बैग में?’

‘रख रही हूं.’

‘सरकारी नौकरी है, समझ नहीं आता तुम्हें? यह कोई चूल्हाचौका नहीं है. मिनटमिनट का हिसाब देना पड़ता है.’

ममा टिफिन और पानी की बोतल औफिस के बैग में रख नियमानुसार पापा की कार भी पोंछ कर आ गई थी. और पापा टिफिन के लिए बैठे रहे थे.

यह रोज की कहानी थी, यह जतलाना कि मां की तुलना में पापा इस परिवार के ज्यादा महत्त्वपूर्ण सदस्य हैं. उन का काम ममा की तुलना में ज्यादा महत्त्व का है. यह दृश्य हमारे ऊपर विपरीत ही असर डालता था. इस बीच भाई और हम अपना टिफिन ले कर चोरों की तरह घर से निकल जाते.

रात को पापा की गालीगलौज से मेरी नींद उचट गई. रात 12 बजे की बात होगी. मैं शोर सुन ममा की चिंता में अपने कमरे के दरवाजे के बाहर आ कर खड़ी हो गई. ममा पापा के साथ बैडरूम में थी. ममा शांत लेकिन कुछ ऊंचे स्वर में कह रही थी- ‘आप के हाथपैर अब से मैं नहीं दबा पाऊंगी.

‘आप की करतूतों ने बरदाश्त की सारी हदें तोड़ दी हैं. आप की जिन किन्हीं लड़कियों और महिलाओं से संपर्क हैं, वे आप की कमजोरियों का फायदा उठा रही हैं. आप अपने औफिस की महिला कलीग को अश्लील वीडियो साझा करते थे, मैं ने सहा. किस स्त्री को क्या गिफ्ट दिया, बदले में आप को क्याक्या मिला, मैं ने अनदेखा किया और चुप रही. लेकिन अब आप सीमा से आगे निकल कर उन्हें घर तक लाने लगे हैं. क्या संदेश दे रहे हैं हमें? घर पर ला कर उन महिलाओं के साथ आप का व्यवहार कितना भौंडा होता है, क्या बच्चों से छिपा है यह?’

आज पहली बार ममा ने हिम्मत कर अपना विरोध दर्ज कराया था. पहली बार उस ने पापा के हुक्म को अमान्य कर के अपनी बात रखी थी. लेकिन यह इतना आसान नहीं था.परिणाम भयंकर होना ही था. मेरे पापा ऐसे व्यक्ति थे जो उन की गलती बताने वाले का बड़ा बुरा हश्र करते थे, और तब जब उन के कमरे में ममा का सोना उन की सेवा के लिए ही था.

झन से जिंदगी कांच की तरह टूट कर बिखर गई. आशा, भरोसा, उम्मीद का दर्पण चकनाचूर हो गया.

पापा ने ममा को जोरदार तमाचे मारे, ममा दर्द से बिलख कर उन्हें देख ही रही थी कि पापा ने ममा के पेट पर जोर का एक पैर जमाया. ममा ‘उफ़’ कह कर जमीन पर बैठ गई.

मैं जानती हूं यह दर्द उस के शरीर से ज्यादा मन पर था. आत्मसम्मान और आत्महनन की चोट वह नहीं सह पाती थी.

‘अब एक भी आवाज निकाली तो जबान खींच लूंगा. मैं कमाता हूं, तुम लोग मेरे पैसे पर ऐश करते हो, औकात है नौकरी कर के पैसे घर लाने की? जिस पर आश्रित हो, उसी को आंख दिखाती हो? जो मरजी होगी वह करूंगा मैं. अफसर हूं मैं. तुम क्या हो, एक नौकरी कर के दिखाओ तो समझूं.’

‘मेरी नौकरी पर पाबंदी तो आप ने ही लगा रखी है?’

‘अच्छा? नौकरी करना क्यों चाहती हो मालूम नहीं है जैसे मुझे. सब बहाने हैं गुलछर्रे उड़ाने के. तुम्हें लगता है नौकरी के बहाने मैं मौज करता हूं, तो तुम भी वही करोगी?’ पापा के पास जबरदस्त तर्क थे, जिसे सौफिस्ट लौजिक कहा जा सकता है. ग्रीक दर्शन में सौफिस्ट तार्किक वाले वे हुआ करते थे, जो निरर्थक और गलत बौद्धिक तर्कजाल से सामने वाले को बुरी तरह बेजबान कर देते थे.

 

उड़ान: क्या प्रतिभा परंपरा रूढ़िवादी परंपरा को बदल पाई?

प्रतिभा नाम मु?ो कैसे मिला, मालूम नहीं. इसे सार्थक करने का जिम्मा कब लिया, यह भी नहीं मालूम पर इतना जरूर मालूम है कि मैं रूपवती नहीं हूं. मेहनत से प्राप्त सफलता और सफलता से प्राप्त आत्मविश्वास की सीढि़यां चढ़ कर मैं ने अपने साधारण से व्यक्तित्व में चार नहीं तो तीन चांद अवश्य लगा दिए हैं. यद्यपि मैं 7 और 11 वर्षीया 2 प्यारी बेटियों की मां भी बन चुकी हूं, लेकिन हमेशा दुबलीपतली रही, इसलिए उम्र में कभी 22 से बड़ी नहीं लगी.

मेरे पति एक कंपनी में काम करते हैं और मैं विश्वविद्यालय में प्राध्यापिका हूं. मेरे पति
को इसीलिए मेरा नौकरी करना खूब पसंद है.

12 बरस बीत गए हैं उन से मेरी शादी को. तभी से शिकागो में हूं. मु?ो यहां के जर्रेजर्रे से प्यार हो चुका है, लेकिन मेरे पति अपनी नौकरी से खुश नहीं हैं, इसलिए बदलना चाहते हैं. अत: कब, कहां जाना होगा, फिलहाल कुछ पता नहीं है.

यों तो अपने देश की याद आना कोई नई बात नहीं है, मगर इन की नौकरी की उधेड़बुन में देश की इतनी याद आई कि जाड़ों की छोटी सी 2 हफ्ते की छुट्टियों में भी मैं सपरिवार भारत चली आई. आज वापस जा रही हूं. सबकुछ कितना बदलता जा रहा है, इस बात का एहसास मु?ो तब हुआ जब मु?ो अपनी कार में हवाईअड्डे छोड़ने जा रहे पिताजी ने अचानक कहा, ‘‘प्रतिभा, वह बंगला देख रही हो, उस कालोनी के कोने पर. वहां धनश्याम रहता है, अपनी बीवी और 2 बच्चों के साथ. अपनी मां से अलग हो गया है वह.’’

इतना बड़ा घर, कितनी शानशौकत के साथ रहते होंगे वहां. शायद 4-5 नौकर उन लोगों के आगेपीछे घूमते होंगे, लेकिन अपनी बुढि़या मां से अलग हो गए हैं. पलभर को सोचने लगी, क्या ये वही घनश्याम हैं, जिन्हें अपनी विधवा मां से विशेष प्रेम था. कई भाईबहनों में सब से छोटे थे घनश्याम. धीरेधीरे सब मां को छोड़ कर अपनेअपने घरसंसार में जब गए. घनश्याम ही बचे थे, जो अपनी मां को हमेशा साथ रख कर उन की सेवा करना चाहते थे.
कार में बैठेबैठे उन दिनों के दृश्य आंखों के सामने घूमने लगे, जब मेरा छोटा भाई सुमेश हवाईजहाज बनाता था- कागज और लकड़ी के बने मौडल हवाईजहाज. उन की उड़ान देख कर मेरा दिल भी दूर आकाश में उड़ने लगता था. मैं मन ही मन जैसे गाने लगती थी, ‘‘मोनो मोर में घेरो शोंगी, उड़े चाले दीग दीगां तेरो पाड़े…’’

छोटा सा हवाईजहाज होता था सुमेश का. कुछ ही देर में नीचे आने लगता था और उस के साथ ही जमीन पर आ जाता था मेरा मन. 16 बरस की ही तो थी तब मैं. उड़ान का मतलब भी सही ढंग से नहीं जानती थी तब.

उन्हीं दिनों सुमेश को उस के एक कनाडियन दोस्त ने एक हवाईजहाज बनाने की किट भेंट की थी. उस से एक बड़ा सा हवाईजहाज बन सकता था. मैं उसे बनता देखने को बहुत उत्सुक थी. कई दिन इंतजार करना पड़ा था उस के लिए मु?ो. जब पूरा हुआ तो दिल की दिल में ही रह गई. वह उड़ा ही नहीं. उसे ठीक करना हमारे घर में तो किसी को आता नहीं था. घर के पास स्थित विश्वविद्यालय के हाबी वर्कशौप में ऐसे ही छोटे बाग में उड़ाने लायक हवाईजहाज कुछ छात्र बनाते थे. प्रोफैसर पिताजी ने अपने एक विद्यार्थी से सुमेश का हवाईजहाज आ कर देखने को कहा.

शाम को दरवाजे की घंटी बजी. दरवाजा खोलने को मैं ही उठी. उन साहब ने नाम बताया, ‘घनश्यामदास,’ नाम गले में ही अटक कर रह गया, लेकिन होंठों पर मुसकराहट तैर गई. वही तो आए थे सुमेश का हवाईजहाज ठीक करने. संतुलन में कुछ गड़गड़ी थी. करीब आधा घंटा लगा उसे घिसघिसा कर ठीक करने में. अगली शाम उन्होंने ही डोर संभाल रखी थी, उड़ते हवाईजहाज की. हवाईजहाज के साथसाथ मैं भी मन ही मन उड़ती रही आकाश में.

उस के बाद तो घनश्याम जब तक वहां पढ़ते रहे, हफ्ते में 2-4 बार जरूर आते थे हमारे घर. मैं जब तक दिखाई नहीं पड़ती थी, उन की आंखें मु?ो खोजती फिरती थीं. जब मैं मिल जाती तो उन की एक मुसकराहट मु?ो उन के पास खींच ले जाती थी. आते तो थे वे पिताजी और सुमेश से बतियाने, लेकिन बात मू?ा से कर जाते थे. मैं चुप ही रहती. चाह कर भी कुछ नहीं कह पाती थी. शायद एक अदना सी लड़की की इच्छाओं को जानना भी कौन चाहता था. जो उड़ भी सकती है, इस की किस को परवाह थी. सब अपनी मरजी के मालिक जो ठहरे.

अचानक मेरी बड़ी बिटिया को याद आया, ‘‘मां, मेरा टैनिस रैकेट तो रख लिया है
न आप ने?’’

घनश्याम टैनिस अच्छा खेलते थे. उस शाम भी उन का भी सिटी टूरनामैंट का टैनिस का फाइनल मैच था. खूब भीड़ इकट्ठी थी चारों ओर. मैं सब से आगे की पंक्ति में पिताजी के पास ही बैठी थी. मैच का समय हुआ और वे कोर्ट पर आए. तालियों के साथ आई कुछ आवाजें भी, ‘‘मक्खन लगाओ तो ऐसा जो नंबर भी मिलें और ससुराल भी.’’

उन्होंने मेरी ओर देखा जैसे सहमति मांग रहे हों. उस मैच में वे कड़े संघर्ष में हार गए. मुंह लटका कर जा रहे थे.

मैं ने साहस बंधाया, ‘‘आप टैनिस तो बहुत अच्छा खेलते हैं.’’ मैच के बाद अपने भाई, भाभी और 8 वर्षीय भतीजे को ले कर वे हमारे घर आए. मैं ने सब को आइसक्रीम परोसी. वे दूसरे नंबर पर बैठे थे. उन से पूछा, ‘‘और लेंगे?’’

बोले, ‘‘जितनी श्रद्धा हो दे दीजिए.’’

याद नहीं कि उन्हें और दे पाई या नहीं, लेकिन जब उन के भतीजे तक पहुंची और पूछा कि और दूं क्या तो वह बोला, ‘‘जितनी श्रद्धा थी वह चचाजान को दे आईं, मु?ो क्या देंगी.’’

सब लोग हंस पड़े और मैं लजा कर बाहर दौड़ गई. मन उड़ान भर उठा 7वें आसमान की ओर. जबजब उन के रिश्तेदार शहर में आते थे, वे उन्हें हमारे घर अवश्य लाते.

पिताजी ने कार रोक कर सामान की जांच की. छोटी सी कार पर इतना सारा सामान ज्यादा हो गया था. कभी कुछ खिसकने लगता तो कभी कुछ.

सुमेश बोला, ‘‘पिताजी, सामान तो नहीं, लगता है हमारे जीजाजी कार को भारी पड़ रहे हैं. ये न होते तो एक बक्सा और कार में रख लेते.’’

सब लोग हंस पड़े. गजब की विनोदप्रियता थी उन में. बात किसी और से कहते, किस्सा किसी और का होता, पर लाद देते थे मु?ा पर. मैं सब के सामने खिसियानी सी हो उठती.

एक बार सुनाया, ‘‘कुछ दिन हुए मैं अपने बरामदे में खड़ा था. नीचे सड़क पर एक साहिबा जा रही थीं. उन की साड़ी अपने ब्लाउज से अलग रंग की थी, मगर साथ चलते साहब के सूट से अवश्य मेल खाती थी.’’
मु?ो याद आया कि 2 दिन पहले पीला लहंगा, हरा ब्लाउज और मैरून रंग की चुन्नी में मैं ही तो गुजरी थी उन के छात्रावास के सामने से. एक नजर देखा भी था बरामदे में खड़े साहब को मैरून सूट में.

उस दिन में पिछवाड़े से घर में घुसी ही थी कि वे सामने के लौन में बैठे नजर आए. मैं पहुंची तो बड़े अंदाज से मेरी तरफ देखते हुए बोले, ‘‘भई, आज तो बिहारी की नायिका को भी मात कर दिया, चश्मा लगा कर ढूंढ़ने से भी नहीं मिलीं. कहां खो गई थीं.’’

मैं सम?ा गई कि यहां बैठने से पहले जनाब मु?ो सारे घर में ढूंढ़ आए हैं. एक दीपावली पर मेरा बनाया बधाई का कार्ड उन्हें पूरे परिवार की तरफ से भेजा था. शाम को घर आए. सुमेश और मैं ही थे घर पर. बोले, ‘‘एक बात है हमें सुंदरसुंदर बधाई के कार्ड तो मिल जाया करेंगे दोस्तों को भेजने के लिए.’’
ऐसे होते थे उन के व्यंग्य. एक बार कहने लगे कि मु?ो लेडी अरविन से होमसाइंस का कोर्स करना चाहिए. दिल्ली में उन के घर के पास था न यह कालेज. शायद इसीलिए कहा था. वे अपनी पढ़ाई पूरी कर के वापस जो लौटने वाले थे. जी में तो आया पूछूं, ‘‘कोई कमी है क्या वहां लड़कियों की?’’

पिताजी ने पूछा, ‘‘कोई कौफी पीएगा? यहां इंडियन कौफीहाउस में कौफी अच्छी मिलती है.’’ ‘‘पिताजी, कौफी पीना मु?ो अच्छा नहीं लगता. अलबत्ता कुछ खा सकती थी, लेकिन देर हो रही है. अब सीधे पालम ही चलिए,’’ मैं ने कहा और कार आगे बढ़ने लगी.

एक शाम वे अपने कमरे में नैस्कैफे का डब्बा लाए. बड़े उत्साह से फेंट कर कौफी बनाई. आंखों ही आंखों में एक आग्रह था. उन्होंने एक प्याला मेरी ओर बढ़ाया. मैं ने कभी कौफी नहीं पी थी. उन के आग्रह के बावजूद सब घर वालों के सामने उन के हाथ से कप लेने की हिम्मत नहीं संजो पाई.

सालभर पलक ?ापकते ही निकल गया. मैं 16 से 17 साल की हो गई थी. विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग विभाग में प्रवेश ले लिया था. उन्होंने एक और किस्सा सुना दिया, ‘‘एक बार एक श्रीमतीजी ने रेडियो से प्रोत्साहित हो कर घर का बिगड़ा बजट सुधारने की ठानी. इधर पतिदेव दफ्तर में गए और वह घर के पुराने अखबार इकट्ठे कर के लिफाफे बनाने में लग गई. दिनभर न खाने की सुध रही न पीने की. शाम तक किसी तरह 100 लिफाफे बना डाले. 5 रुपए के बिके. जब शाम को पतिदेव लौटे तो खाना नदारद. तब तय किया कि बाहर रेस्तरां में चल कर खा लिया जाए. 16 रुपए का बिल आया. इस से तो वह घर रह कर बढि़या खाना बनाती, जिस से पतिदेव खुश हो कर अगले दिन दोगुने उत्साह से दफ्तर जाते, दोगुना काम करते और समय से पहले ही अगली तरक्की पा जाते, मैं ने सोचा.

साफ था कि उन्हें मेरी पढ़ाईलिखाई रास नहीं आ रही थी. चाहते थे कि थोड़ाबहुत पढ़ कर ही किसी के ड्राइंगरूम की शोभा बढ़ाऊं. बिना अपने को वचनबद्ध किए ही मु?ा से इतना बड़ा वचन मांग रहे थे.
इच्छा तो हुई कि कह दूं कि तो आज ही ब्याह रचा लो, फिर तुम्हारी ही सुनूंगी वरना जिस दिन तैयार हो जाओ उस दिन बात करना. लेकिन साहस नहीं कर पाई इतना सब कहने का. वे भी शायद जवाब की आशा नहीं करते थे. वे तो बस उड़ना और उड़ाना जानते थे. शायद किसी से उधार मांग रखी थी वह मुसकराहट, जो बाद में मिलने पर कभी चेहरे पर नजर नहीं आई.

मालूम नहीं कैसे मैं बड़ी हो गई. ‘टर्निंग पौइंट’ की शर्ले मैक्लीन को भी मात दे कर आगे बढ़ गई और अपने बालू के ढेर पर बनाए सब सपनों को ताक पर रख कर इंजीनियर बन गई. इन 4 बरसों में शायद 4 बार भी उन से मुलाकात नहीं हुई. 2 मुलाकातें तो मैं ने ही कोशिश कर के दिल्ली में की थीं. सारा वातावरण ऐसा था कि लगता था जैसे अनचाहे और अनजाने ही बांध दी जाऊंगी उन से किसी भी दिन. मन में जानती थी कि एक मुसकराहट पर मरा जा सकता है, लेकिन जिंदगी नहीं बिताई जा सकती. यही मकसद था मेरा उन से मिलने का. लेकिन उन्होंने कुछ कहा ही नहीं. मैं भी शब्दों में कंजूसी कर गई. मन की बात मन ही रख कर चली आई. कितना अच्छा होता यदि वे कुछ शुरुआत करते और मैं कह पाती, ‘‘आप ने महसूस किया है कि कितने अलग हैं हम दोनों एकदूसरे से?’’

शायद इतना कहना ही काफी होता, अपनी हार को जीत में बदलने के लिए ‘मना’ करना जितना अहं को संतुष्ट करता है. ‘न’ सुनना उतना ही ठेस पहुंचा सकता है. नहीं सम?ाती थी मैं उस दिन तक.
सम?ा तब, जब मैं ने एक दिन पिताजी की मेज पर रखा देखा उन की शादी का निमंत्रण पत्र. उसी के पास रखा था, एक पत्र जो उन्होंने कुछ अरसा पहले लिखा होगा. प्रत्यक्ष था कि पापा ने मेरा प्रस्ताव रखा होगा उन के सामने.

उन का जवाब था, ‘‘शी इज टू ऐजुकेटेड फौर मी,’’ (वह मेरे हिसाब से बहुत ज्यादा पढ़ीलिखी है) मु?ो लगा जैसे मेरा अधिकार उन्होंने छीन लिया हो. वही तो लगाते थे हमारे घर के चक्कर और घंटों बैठे रहते थे. वही तो कहानी सुनाते थे दुनियाभर की. फिर वही मुकर गए.

कोई दलील नहीं चली उस दिन मन के आगे. बहुत बुरा लगा. हार जो गई थी. क्या बीतती होगी उन बेचारियों पर जो 25 बार संवारीसजाई जाती हैं ताकि उन्हें देखने आने वाला ‘हां’ कर दे. तभी एक ?ाटके के साथ कार रुकी. हम पालम पहुंच गए थे. मन की उड़ान एक ?ाटके में छिन्नभिन्न हो गई.

सामान ले कर हम ने सब से विदा ली. पिताजी ने कहा, ‘‘बड़ी कमजोर लग रही हो. अपनी सेहत का खयाल रखा करो.’’ पिताजी को मैं कमजोर लग रही थी. एक बार भी उन्होंने यह नहीं कहा, ‘‘प्रतिभा, बड़ी खुशी हुई यह सुन कर हमारी बिटिया को सर्वश्रेष्ठ नए नागरिक का खिताब मिला,’’ इतने अखबारों में मेरी खबर छपी बढि़या फाटो के साथ और पिताजी को बस एक बात ही नजर आई कि कमजोर लग रही हूं.

मेरी चुप्पी सुमेश ने तोड़ी, ‘‘पिताजी, प्रतिभा ने अपनी जिंदगी इतनी क्रियाशील बना रखी है कि मांस चढ़े कहां से. यदि प्रतिभा न रही तो जीजाजी को 3-3 बीवियां रखनी होंगी उस की कमी को पूरा करने के लिए. एक बीवी नौकरी करेगी, दूसरी परिवार और घर की देखभाल और तीसरी उन के सामाजिक और राजनीतिक जीवन की सहचरी होगी.’’

मैं ने चलते हुए सास के पैर छुए तो उन्होंने गले से लगा लिया. हम लोग पालम के इंदिरा गांधी इंटरनैशनल एअरपोर्ट की भीड़ को चीरते हुए सिक्युरिटी से गुजर कर हवाईजहाज में जा बैठे. कितनी इज्जत है मेरी ससुराल में. शायद इसलिए न कि हर छोटी से छोटी रूढि़ को निभाने से मेरी इज्जत पर आंच नहीं आती.
हवाईजहाज ने दौड़ लगाई और पीछे छूटने लगे वह बंगला जो मन पर हावी होने लगे था.

मैं आधुनिक जगत में इतना गहरे पैठ चुकी हूं कि सिर ढकने और पैर छूने से मु?ो रूढि़वादी कहलाए जाने का डर नहीं लगता. आज मेरी इज्जत बनी है इंजीनियरी की ठोस बुनियाद पर. पर सोचती हूं कि क्या मैं आज विजय के साथ जुड़ कर जीत गई? क्या मेरी जीत का आधार वह चुनौती नहीं थी जो घनश्याम के इनकार से 12 वर्ष पूर्व मेरी जिंदगी में प्रणय व प्यार की जगह अनजाने सामने आ खड़ी हुई थी?

रिश्तों का बंधन: भाग 1- विजय ने दीपा की फोटो क्यों जलाई

‘‘डैडी,मैं ने रेस्तरां बेच दिया है.’’
रिटायर्ड कर्नल विमल उस वक्त बालकनी में बैठे अखबार पढ़ रहे थे जब उन की लड़की दीपा ने उन से यह बात कही. उन्होंने एक सरसरी सी नजर अपनी बेटी पर डाली जो उन के लिए केतली से कप में चाय डाल रही थी.
‘‘हम अगले हफ्ते शिमला वापस जा रहे हैं.’’

दीपा की इस बात का भी विमल ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘डैडी चाय,’’ दीपा ने चाय का प्याला उन की ओर बढ़ा दिया.
‘‘डैडी, क्या मैं ने कुछ गलत किया?’’

‘‘नहीं, बिलकुल गलत नहीं,’’ विमल ने एक घूंट चाय सिप करते हुए कहा.

‘‘लेकिन आप ने पूछा नहीं कि मैं ने यह फैसला क्यों लिया और वह भी बिना आप से पूछे?’’
विमल ने चाय का प्याला टेबल पर रख दिया और प्यार से अपनी बेटी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘क्योंकि मैं जानता हूं कि मेरी बेटी जो भी कदम उठाती है, सोचसमझ कर ही उठाती है.’’

‘‘डैडी,’’ दीपा के मुंह से हलकी कराह जैसी आवाज निकली और वाह अपने डैडी के गले से लिपट गई, ‘‘आई लव यू डैडी,’’ उस के मुंह से निकला.

कर्नल विमल रिटायर्ड आर्मी औफिसर थे. दुश्मन से मोरचा लेते हुए वे अपना एक हाथ और एक पैर गंवा चुके थे. उन की पत्नी अपने पति का यह हाल नहीं देख सकीं और सदमे में चल बसी थीं. दीपा उन की इकलौती बेटी थी, जो अपनी पढ़ाई पूरी कर के विदेश जाना चाहती थी, लेकिन अब उस ने अपना फैसला बदल दिया था और एक रेस्तरां चलाती थी.

विमल ने कई बार उस से शादी कर अपना घर बसाने की बात कही, पर उस ने हमेशा मना कर दिया. वह अपने अपाहिज पिता को अकेले इस तरह छोड़ कर जाने को तैयार नहीं थी. विमल को दीपा पर पूरा भरोसा था, इसलिए उन्हें उस के इस फैसले पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ. शिमला में उन का पुराना मकान था. दीपा ने उन से वहीं वापस जाने की बात कही थी.

विमल ने दीपा का चेहरा उठाया और उस की भीगी पलकों को देखते हुए बोले, ‘‘यह क्या बेटी तेरी आंखों में आंसू? तुझे याद नहीं, मैं ने तेरी मां को उस के आखिरी समय पर क्या वचन दिया था कि मैं तेरी आंखों में कभी आंसू नहीं आने दूंगा.

दीपा ने विमल की ओर देखा, फिर अपने रूमाल से उन की भीग आई आंखों को पोंछते हुए अपने कमरे में चली गई और पलंग पर लेट कर एक मैगजीन उठा कर उस के पन्ने पलटने लगी, लेकिन उस का ध्यान मैगजीन में नहीं लग रहा था. धीरेधीरे उसे अपनी जिंदगी के कुछ पिछले पन्ने पलटते दिखाई पड़े…
उस दिन बारिश बहुत हुई थी और दीपा का रेस्तरां पूरी तरह खाली था. कोईर् वर्कर भी नहीं आया था. दीपा अकेली बैठी रेडियो सुन रही थी. तभी उस की नजर अपने रेस्तरां के बाहर खड़े एक युवक पर पड़ी, जो बुरी तरह पानी में भीगा हुआ था और ठंड से जकड़ा जा रहा था. दीपा ने उसे अपने काउंटर से ही आवाज दी, ‘‘हैलो, अंदर आ जाओ.’’

युवक ने शायद सुना नहीं.
दीपा ने दोबारा उसे आवाज दी, ‘‘हैलो, मैं आप ही से कह रही हूं, अंदर आ जाओ वरना बीमार हो जाओगे.’’

अब की युवक ने मुड़ कर देखा तो दीपा को अपनी ओर इशारा करते हुए पाया. वह अंदर चला गया.
‘‘बैठ जाओ, बहुत भीग गए हो,’’ दीपा उठ कर उस के पास आई और एक कुरसी उस के करीब खिसका दी.
‘‘थैंक यू,’’ युवक बोला. लेकिन तब तक दीपा अंदर जा चुकी थी और जल्द ही 2 कप चाय ले कर आ गई और उस के पास ही कुरसी पर बैठ गई और उस के पास चाय का प्याला
रख दिया.
युवक ने पहले चाय की ओर, फिर दीपा की ओर देखा और सकुचाते हुए बोला, ‘‘इस की क्या जरूरत थी, आप ने बेकार ही तकलीफ की.’’
‘‘फार्मैलिटी दिखाने की जरूरत नहीं है. मैं देख रही हूं कि तुम सर्दी में ऐंठे जा रहे हो. अगर गरमागरम चाय नहीं पी तो निश्चय ही निमोनिया हो जाएगा तुम्हें.’’
युवक ने जल्दी से कप उठा लिया और चाय पीने लगा. उसे लगा जैसे इस सर्दी में उसे चाय नहीं अमृत मिल गया है.
‘‘और हां, मैं ने तुम पर कोईर् एहसान नहीं किया है चाय पिला कर. दरअसल, मुझे भी चाय की तलब हो रही थी, लेकिन आलस के मारे उठा नहीं गया. तुम देख रहे हो न कि आज यहां कोई वर्कर नहीं आया है, सो चाय खुद ही बनानी पड़ी. तुम्हारे साथसाथ मुझे भी चाय मिल गई. वैसे इस भरी बरसात में जनाब आप हैं कौन और कौन सा शिकार करने निकले थे?’’

युवक दीपा की इतनी बेबाकी पर हंस पड़ा और बोला, ‘‘मेरा नाम विजय है और मैं एक काम की तलाश में निकला था.’’

‘‘इतनी बरसात में काम की तलाश करना, वाह कमाल है. क्या रोटीवोटी के लाले पड़ रहे हैं?’’
नहीं… नहीं ऐसी कोई बात नहीं है. दरअसल, मेरे डैडी चाहते हैं कि मैं उन के बिजनैस में उन का हाथ बंटाऊ, लेकिन मैं अपनेआप अपने पैरों पर खड़े होना चाहता हूं, इसलिए काम के लिए मुझे बारिश या तूफान की कोई परवाह नहीं होती.’’

‘‘हूं,’’ दीपा उस की ओर देखती हुई बोली, ‘‘खयाल अच्छा है और विचार भी तुम्हारे ऊंचे हैं. तुम्हारा यह कहना भी सही है कि हर किसी को खुद अपने बल पर अपन भविष्य बनाना चाहिए.’’
‘‘आप को देख कर तो ऐसा ही लगता है कि इतने छोटा लेकिन प्यारा सा रेस्तरां आप ने खुद ही खड़ा किया है…’’
‘‘दीपा, मेरा नाम दीपा है और मैं ही अकेली इस रेस्तरां को पिछले कई सालों से चला रही हूं. मैं ने इस के लिए किसी की मदद नहीं ली, बस मेरे डैडी का आशीर्वाद है जो मैं रोज सुबहशाम उन से लेती हूं.’’
दीपा और विजय की यह छोटी सी मुलाकात धीरेधीरे बढ़ती गई और पता नहीं

कब इन मुलाकातों का दौर प्यार में बदल गया. दीपा को लगा जैसे उसे जीने के लिए एक और सहारा मिल गया हो. उस ने अपनी और विजय की मुलाकात और प्यार के बारे में विमल को सबकुछ बता दिया. विमल को यह जान कर बहुत खुशी हुई. उन्हें लगा जैसे दीपा और विजय की शादी कर वह अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएगा.

‘‘डैडी, आज मैं बहुत खुश हूं,’’ दीपा उस दिन अपने डैडी से लिपट कर बोली थी. विमल ने उस दिन अपनी बेटी की आंखों में एक नई और अनोखी चमक देखी थी.
दीपा उन्हें विजय से अपनी पहली मुलाकात से ले कर अब तक की सारी कहानी सुना चुकी थी.

विमल बहुत खुश थे. बोली, ‘‘तुझे विजय पसंद है न?’’

दीपा मुंह से कुछ नहीं बोली, बस सिर हिला दिया.
‘‘फिर ठीक है, बात पक्की.’’
दीपा चौंक उठी.
‘‘मैं अब विजय के घर वालों से बात कर चट मंगनी कर पट ब्याह रचा कर अपनी इस प्यारी सी गुडि़या को विदा कर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाऊंगा.’’
‘‘क्या मैं आप को बो?ा लगने लगी हूं डैडी, जो इतनी जल्दी आप मुझे अपने से दूर करना चाहते हैं?’’
‘‘अरे पगली, अभी तूने ही तो कहा है न कि विजय तुझे बहुत पसंद है.’’
‘‘हां डैडी, लेकिन इस का यह मतलब तो नहीं कि आप मुझे घर से ही निकाल दें. जाइए, मैं आप से नहीं बोलती.’’

पति राधव चड्ढा के साथ रोमांटिक डिनर डेट पर गई Parineeti Chopra, देखें फोटो

परिणीति चोपड़ा और राघव चड्ढा को काफी लंबे समय बाद मुंबई में एक साथ देखा गया. दोनों ने नवविवाहित जोड़े के रूप में अपना पहला नया साल लंदन और ऑस्ट्रिया में एक साथ मनाया. अभी हाल ही में एक्ट्रेस परिणीति चोपड़ा ने एक्टिंग के साथ-साथ सिंगिग क्षेत्र में भी काम करना चाहती है. यह खबर सुनकर परिणीति के फैंस खुशी से झूम उठे. इस बीच सोशल मीडिया पर एक वीडियो काफी तेजी से वायरल हो रहा है. इस वीडियो में परिणीति चोपड़ा अपने पति और आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा के साथ दिखाई दीं. परिणीति चोपड़ा और राघव चड्ढा का ये वीडियो आते ही सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है.

परिणीति चोपड़ा पति राघव चड्ढा के साथ डिनर डेट

वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि परिणीति पति के साथ काफी खुश नजर आ रही है. जहां परिणीति ने पाउडर ब्लू ड्रेस और क्रीमी ओवरकोट पहने देखा गया, वहीं राघव फॉर्मल ब्लैक शर्ट और मस्टर्ड पैंट में नजर आए.

 

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परिणीती सिंगिग में रखेंगी कदम

परिणीति रोमांटिक आउटिंग ऐसे समय में हुआ है जब एक्ट्रेस ने गुरुवार को अपने गायन की शुरुआत की घोषणा की. उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें उन्होंने एक स्टूडियो में अपने गायन के पर्दे के पीछे की क्लिप साझा कीं. वीडियो में उन्हें 2017 की रोमांटिक फिल्म मेरी प्यारी बिंदु से ‘माना के हम यार नहीं’ गाते हुए भी दिखाया गया है, जिसमें उनके साथ आयुष्मान खुराना भी हैं.

 

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उन्होंने एक भावुक नोट लिखा और बताया कि संगीत हमेशा से उनके लिए खुशी का स्थान रहा है. “संगीत, मेरे लिए, हमेशा मेरी ख़ुशी का स्थान रहा है.. मैंने दुनिया भर के अनगिनत संगीतकारों को मंच पर प्रदर्शन करते देखा है और अब आखिरकार उस दुनिया का हिस्सा बनने का समय आ गया है. मैं अपने जीवन में एक बिल्कुल नया अध्याय शुरू करने के बारे में बहुत भाग्यशाली और धन्य महसूस करती हूं और मैं ईमानदारी से वर्णन नहीं कर सकती कि मैं इस संगीत यात्रा को शुरू करने के लिए कितना उत्साहित हूं.

एकता कपूर के बेटे के बर्थडे पर सजी स्टार किड्स की महफिल, शिल्पा से लेकर तमाम स्टार्स पहुंचे

एकता कपूर ने अपने बेटे रवि के पांचवें जन्मदिन के लिए एक भव्य पार्टी की मेजबानी की और यह सितारों से भरा जश्न था. एकता को टेलीविजन क्वीन कहा जाता है क्योंकि वह एक दशक से अधिक समय से सुपरहिट धारावाहिक देने के लिए जानी जाती हैं. हालांकि, अभिनेत्री ने हमेशा अपने निजी जीवन को मीडिया से दूर रखा, लेकिन 2019 में चीजें बदल गईं और एकता ने सरोगेसी के माध्यम से अपने बच्चे के आगमन के साथ मातृत्व को अपनाने की खुशी साझा की.

एकता कपूर के बेटे रवि कपूर के बर्थडे पर सजी महफिल

एकता कूपर अपने बेटे रवि का 5वा बर्थडे की भव्य पार्टी की मेजबानी की है. इस दौरान एकता के बेटे के बर्थडे पार्टी में शिल्पा शेट्टी और राज कुंद्रा अपनी बेटी समीशा शेट्टी के साथ पहुंचे. इस पार्टी में शिल्पा काफी कूल अंदाज में नजर आई और राज कुंद्रा डैशिंग लुक में दिखाई दिए. वहीं समीशा शेट्टी बेहद क्यूट नजर आई.

 

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करण जौहर के बच्चे रुही और यश

एकता कपूर के बेटे के बर्थडे पार्टी में करण जौहर के क्यूट बच्चे रुही और यश पार्टी में पहुंचे. करण के दोनों ही बच्चे काफी प्यारे लग रहे थे. वहीं इस पार्टी में करण जौहर स्पॉट नहीं किए गए.

 

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करीना कपूर अपने बेटे जेह अली के साथ नजर आईं

इस पार्टी में करीना कपूर अपने छोटे बेटे जेह के साथ देखा गया. जेह अली खान व्हाइट कलर की शर्ट में नजर आए. जेह बेहद ही क्यूट नजर आ रहे थे.

 

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दादा और चाचा भी आए नजर

रवि के दादा और चाचा, जीतेंद्र और तुषार कपूर ने अपनी शानदार उपस्थिति से पार्टी की शोभा बढ़ाई. इवेंट से बाहर निकलने के दौरान पपराज़ी के लिए पोज़ देते हुए दोनों डैशिंग और आकर्षक लग रहे थे. जीतेंद्र की सुंदर मुस्कुराहट ने इस अवसर पर खुशी में चार चांद लगा दिए.

 

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ये सितारे भी आए नजर

रवि के बर्थडे पार्टी में नेहा धूपिया और अनिता हसनंदानी भी अपने बेटे के साथ पार्टी में पहुंची. पार्टी में झूले के खास अरेंजमेंट किया गया था, जिसपर सभी बच्चों ने जमकर मस्ती की.

जिंदगी का गणित: भाग 1

जिंदगी का गणित सीधा और सरल नहीं होता. वह बहुत उलझा हुआ और विचित्र होता है. रमा को लगा था, सबकुछ ठीकठाक हो गया है. जिंदगी के गणितीय नतीजे सहज निकल आएंगे. उस ने चाहा था कि वह कम से कम शादी से पहले बीए पास कर ले. वह कर लिया. फिर उस ने चाहा कि अपने पैरों पर खड़े होने के लिए कोई हुनर सीख ले. उस ने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया और उस में महारत भी हासिल कर ली.

फिर उस ने चाहा, किसी मनमोहक व्यक्तित्व वाले युवक से उस की शादी हो जाए, वह उसे खूब प्यार करे और वह भी उस में डूबडूब जाए. दोनों जीवनभर मस्ती मारें और मजा करें. यह भी हुआ. विनोद से उस के रिश्ते की बात चली और उन लोगों ने उसे देख कर पसंद कर लिया. वह भी विनोद को पा कर प्रसन्न और संतुष्ट हो गई पर…

शादी हुए 2 साल गुजरे थे. 7-8 माह का एक सुंदर सा बच्चा भी हो गया था. वह सबकुछ छोड़छाड़ कर और भूलभाल कर अपनी इस जिंदगी को भरपूर जी रही थी. दिनरात उसी में खोई रहती थी. वह पहले एक रेडीमेड वस्त्रों की निर्यातक कंपनी में काम करती थी. जब उस की शादी हुई, उस वक्त इस धंधे में काफी गिरावट चल रही थी. इसलिए उस नौकरी को छोड़ते हुए उसे कतई दुख नहीं हुआ. कंपनी ने भी राहत की सांस ली.

परंतु जैसे ही इधर फिर कारोबार चमका और विदेशों में भारतीय वस्त्रों की मांग होने लगी, इस व्यापार में पहले से मौजूद कंपनियों ने अपने हाथ आजमाने शुरू कर दिए.

राहुल इसी सिलसिले में कंपनी मैनेजर द्वारा बताए पते पर रमा के पास आया था, ‘‘उमेशजी आप के डिजाइनों के प्रशंसक हैं. वे चाहते हैं, आप फिर से नौकरी शुरू कर लें. वेतन के बारे में आप जो उपयुक्त समझें, निसंकोच कहें. मैं साहब को बता दूंगा…

‘‘मैडम, हम चाहते हैं कि आप इनकार न करें, इसलिए कि हमारा भविष्य भी कंपनी के भविष्य से जुड़ा हुआ है. अगर कंपनी उन्नति करेगी तो हम भी आगे बढ़ेंगे, वरना हम भी बेकारों की भीड़ के साथ सड़क पर आ जाएंगे. आप अच्छी तरह जानती हैं, चार पैसे कंपनी कमाएगी तभी एक पैसा हमें वेतन के रूप में देगी.’’

व्यापारिक संस्थानों में आदमी कितना मतलबी और कामकाजी हो जाता है, राहुल रमा को इसी का जीताजागता प्रतिनिधि लगा था. एकदम मतलब की और कामकाजी बात सीधे और साफ शब्दों में कहने वाला. रमा ने उस की तरफ गौर से देखा, आकर्षक व्यक्तित्व और लंबी कदकाठी का भरापूरा नौजवान. वह कई पलों तक उसे अपलक ताकती रह गई.

‘‘उमेशजी को मेरी ओर से धन्यवाद कहिएगा. उन के शब्दों की मैं बहुत कद्र करती हूं. उन का कहा टालना नहीं चाहती पर पहले मैं अपने फैसले स्वयं करती थी, अब पति की सहमति जरूरी है. वे शाम को आएंगे. उन से बात कर के कल उमेशजी को फोन करूंगी. असल में हमारा बच्चा बहुत छोटा है और हमारे घर में उस की देखभाल के लिए कोई है नहीं.’’

चाय पीते हुए रमा ने बताया तो राहुल कुछ मायूस ही हुआ. उस की यह मायूसी रमा से छिपी न रही.

‘‘कंपनी में सभी आप के डिजाइनों की तारीफ अब तक करते हैं. अरसे तक बेकार रहने के बाद  इस कंपनी ने मुझे नौकरी पर रखा है. अगर कामयाबी नहीं मिली तो आप जानती हैं, कंपनी मुझे निकाल सकती है.’’

जाने क्यों रमा के भीतर उस युवक के प्रति एक सहानुभूति सी उभर आई. उसे लगा, वह भीतर से पिघलने लगी है. किसीकिसी आदमी में कितना अपनापन झलकता है. अपनेआप को संभाल कर रमा ने एक व्यक्तिगत सा सवाल कर दिया, ‘‘इस से पहले आप कहां थे?’’

‘‘कहीं नहीं, सड़क पर था,’’ वह झेंपते हुए मुसकराया, ‘‘बंबई में अपने बड़े भाई के पास रह कर यह कोर्स किया. वहीं नौकरी कर सकता था परंतु भाभी का स्वभाव बहुत तीखा था. फिर हमारे पास सिर्फ एक कमरा था. मैं रसोई में सोता था और कोई जगह ही नहीं थी.

‘‘भैया तो कुछ नहीं कहते थे, पर भाभी बिगड़ती रहती थीं. शायद सही भी था. यही दिन थे उन के खेलनेखाने के और उस में मैं बाधक था. वे चाहती थीं कि मैं कहीं और जा कर नौकरी करूं, जिस से उन के साथ रहना न हो. मजबूरन दिल्ली आया. 3-4 महीने से यहां हूं. हमेशा तनाव में रहता हूं.’’

‘‘लेकिन आप तो बहुत स्मार्ट युवक हैं, अच्छा व्यवसाय कर सकते हैं.’’

‘‘आप भी मेरा मजाक बनाने लगेंगी, यह उम्मीद नहीं थी. कंपनी की अन्य लड़कियां भी यही कह कर मेरा मजाक उड़ाती हैं. मुझे सफलता की जगह असफलता ही हाथ लगती है. पिछले महीने भी मैं ज्यादा व्यवसाय नहीं कर पाया था. तब उमेशजी ने बहुत डांट पिलाई थी. इतनी डांट तो मैं ने अपने मांबाप और अध्यापकों से भी नहीं खाई. नौकरी में कितना जलील होना पड़ता है, यह मैं अब जान रहा हूं.’’

मुसकरा दी रमा, ‘‘हौसला रखिए, ऐसा होता रहता है. ऊपर से जो हर वक्त मुसकराते दिखाई देते हैं, भीतर से वे उतने खुश नहीं होते. बाहर से जो बहुत संतुष्ट नजर आते हैं, भीतर से वे उतने ही परेशान और असंतुष्ट होते हैं. यह जीवन का कठोर सत्य है.’’

चलतेचलते राहुल ने नमस्कार करते हुए जब कृतज्ञ नजरों से रमा की ओर देखा तो वह सहसा आरक्त हो उठी. बेधड़क आंखों में आंखें डाल कर अपनी बात कह सकने की सामर्थ्य रखने वाली रमा को न जाने क्या हो गया कि वह छुईमुई की तरह सकुचा गई और उस की पलकें झुक गईं.

‘‘आप मेरी धृष्टता को क्षमा करें, जरूर आप का बच्चा आप की ही तरह बेहद सुंदर होगा. क्या मैं एक नजर उसे देख सकता हूं?’’ दरवाजे पर ठिठके राहुल के पांव वह देख रही थी और आवाज की थरथराहट अपने कानों में अनुभव कर रही थी.

रमा तुरंत शयनकक्ष में चली गई और पालने में सो रहे अपने बच्चे को उठा लाई.

‘‘अरे, कितना सुंदर और प्यारा बच्चा है,’’ लपक कर वह बाहर फुलवारी में खिले एक गुलाब के फूल को तोड़ लाया और रमा के आंचल में सोए बच्चे पर हौले से रख दिया. फिर उस ने झुक कर उस के नरम गालों को चूम लिया तो बच्चा हलके से कुनमुनाया. जेब से 50 रुपए का नोट उस बच्चे की नन्ही मुट्ठी में वह देने लगा तो रमा बिगड़ी, ‘‘यह क्या कर रहे हैं आप?’’

‘‘यह हमारे और इस बच्चे के बीच का अनुबंध है. आप को बीच में बोलने का हक नहीं है, रमाजी,’’ कह कर वह मुसकराया.

‘यह आदमी कोई जादूगर है. कंपनी की अन्य लड़कियों को तो इस ने दीवाना बना रखा होगा,’ रमा पलभर में न जाने क्याक्या सोच गई

घर पर बनाएं कोरियन राइस वाटर स्प्रे, इसके इस्तेमाल से चमक जाएंगे आपके बाल और स्किन

ग्लास स्किन, स्पॉटलेस चेहरे और निखरे रंग की जब भी बात होती है तो कोरियन ब्रांड्स का जिक्र जरूर होता है.कोरिया के लोगों की चमकती स्किन उनकी पहचान है.यही कारण है कि ब्यूटी प्रोडक्ट्स के समंदर में कोरियन ब्यूटी उत्पादों ने अपनी एक अलग और खास पहचान बना ली है.अपने शानदार रिजल्ट के कारण यह लोगों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं.दरअसल, कोरिया के लोग अपनी स्किन और बालों की देखभाल के लिए काफी सचेत रहते हैं.वे ब्रांडेड ब्यूटी प्रोडक्ट्स के साथ ही घर में बने कई डीआईवाई स्प्रे का उपयोग करते हैं.इनमें से सबसे प्रमुख है राइस वाटर.इस नेचुरल राइस वाटर स्प्रे से आपके बाल और स्किन दोनों को ही भरपूर फायदा मिलेगा.इस बजट फ्रेंडली स्प्रे से आपके बाल मजबूत होंगे और स्किन ग्लोइंग बनेगी.

क्यों महत्वपूर्ण है चावल का पानी

चावल का पानी कोरियन लोगों की ब्यूटी प्रोडक्ट श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.इसे बालों और त्वचा के लिए ‘अमृत’ माना जाता है.अमीनो एसिड और कई प्रकार के खनिज और विटामिन से भरपूर राइस वाटर बालों को जड़ों से मजबूत बनाता है.इससे बालों का टूटना, झड़ना, दोमुंह के बालों की समस्या दूर होती है.साथ ही इसके उपयोग से बाल बहुत तेजी से बढ़ते हैं.यह बालों में कोलेजन की मात्रा को बढ़ाने में मदद करता है जिससे बाल मजबूत होते हैं.वहीं चेहरे पर राइस वाटर लगाने से स्किन की झुर्रियां कम होती हैं, दाग धब्बे गायब होते हैं, एक्ने आदि की समस्याएं भी दूर होती हैं.राइस वाटर त्वचा को हाइड्रेट करता है.यह त्वचा में नमी बनाए रखने में मदद करता है, जिससे त्वचा कोमल और मुलायम बनी रहती है.इसमें एंटीऑक्सीडेंट और अन्य पोषक तत्व होते हैं जो त्वचा को स्वस्थ और चमकदार बनाते हैं.यह त्वचा में मेलेनिन की मात्रा को बढ़ाने में मदद करता है.यही कारण है कि इसके उपयोग से चेहरे पर चमक आती है.राइस वाटर त्वचा की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करता है.इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट त्वचा को नुकसान पहुंचाने वाले मुक्त कणों को बेअसर करने में मदद करते हैं.

ऐसे बनाएं राइस वाटर स्प्रे

सबसे पहले आप आधा कप सफेद या ब्राउन राइस लें.ध्यान रखें इसके लिए आप ऑर्गेनिक चावलों का ही उपयोग करें.अब चावलों को अच्छे से धो लें.फिर इन्हें एक अलग कटोरे में निकाल लें.अब चावलों में करीब 2 कप पानी डालें और इन्हें 2 घंटे के लिए छोड़ दें.इसके बाद चावलों को छान लें.इस पानी को किसी भी साफ एयरटाइट कंटेनर या बोतल में स्टोर करें.रातभर इन्हें खमीर उठने के लिए छोड़ दें.खमीर उठने के बाद इसमें एक टीस्पून अरंडी का तेल अच्छे से मिला लें और स्प्रे बोतल में भर लें.तैयार है आपका राइस वाटर स्प्रे।

ऐसे करें इस नेचुरल स्प्रे का उपयोग

यह एक स्प्रे आपके बालों और चेहरे दोनों के काम आएगा.अगर आप इसे बालों के लिए उपयोग में ले रहे हैं तो स्प्रे बोतल को अच्छे से मिक्स करके इसे बालों की जड़ों में स्प्रे करें.अच्छे रिजल्ट के लिए इस स्प्रे का रात में उपयोग करें और रातभर इसे अपना काम करने दें.सुबह आप बाल धो लें.अगर आप चेहरे पर उपयोग करना चाहते हैं तो आप रात को सोने से पहले चेहरे को अच्छे से धो लें.इसके बाद आवश्यकतानुसार राइस वाटर स्प्रे को चेहरे पर लगाएं.रातभर के लिए इसे छोड़ दें.सुबह चेहरा वाॅश कर लें.आपको कुछ ही समय में इसका रिजल्ट नजर आएगा।

मौइस्चराइजर लगाने के बाद भी हाथ ड्राय रहते हैं, मैं क्या करुं?

सवाल

मेरे हाथ काफी रूखे रहते हैं. मौइस्चराइजर लगाने के बाद भी ये सामान्य नहीं दिखते. कोई उपाय बताएं जिस से ये नर्ममुलायम बने रहें?

जवाब-

हाथों की स्किन में औयल ग्लैंड्स नहीं होने के कारण इन्हें औयल देना पड़ता है. इसलिए इन्हें मुलायम और चिकना बनाए रखने के लिए हाथ धोने के बाद हमेशा कोई थिक क्रीम लगाएं. यह आप की त्वचा में औयल को बनाए रखने में मदद करेगी.

आप हाथ धोने के लिए कौन सा साबुन इस्तेमाल करती हैं इस पर भी ध्यान दें. ज्यादातर साबुन आप के हाथों को रूखा बना देते हैं, इसलिए लिक्विड सोप ही बेहतर है. रात को आप थोड़ी सी वैसलीन अपने हाथों पर लगा कर इसे एक ओवरनाइट ट्रीटमैंट की तरह भी इस्तेमाल कर सकती हैं. बस हाथ धोने के बाद इसे अपने हाथों पर लगाएं और कौटन के दस्ताने पहन कर सो जाएं.

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बदलता मौसम सर्दी और गर्मी के बीच की कड़ी है. इस मौसम में तमाम पेड़ नयी कोंपलों की आस में अपने पुराने पत्ते गिरा देते हैं. इस मौसम को पतझड़ का मौसम भी कहते हैं. पतझड़ के महीने में चलने वाली तेज़ हवा जहाँ सुबह-शाम को खुशनुमा बनाती है, वहीँ ये स्किन में रूखापन भी पैदा करती है. हवाओं के कारण होंठ बार-बार ड्राय होते हैं और कभी-कभी तो उनमे गहरी दरारें भी पड़ जाती हैं जो ज़्यादा तकलीफदेय होती हैं.

पतझड़ के मौसम में ड्राय स्किन को स्निग्ध रखने के लिए यदि तेल या क्रीम का इस्तेमाल करें तो हवा में उपस्थित धूलकणों और गर्मी के कारण ये स्किन को और खराब करती है. इन दिनों में सूरज भी अपनी पूरी प्रचंडता दिखाने लगता है, इसकी अल्ट्रावायलेट किरणें स्किन पर मौजूद तेल के साथ मिल कर आपके पूरे कॉम्प्लेक्शन को बर्बाद कर देती हैं.

स्किन में अपनी नमी और कोमलता ही किसी स्त्री के सौंदर्य का आधार है. इस नमी और कोमलता को ड्राय मौसम में भी बनाये रखने के लिए विशेष देखभाल और घरेलू उपचार की आवश्यकता होती है. हर व्यक्ति की स्किन में ड्रायता का पैमाना अलग-अलग होता है. कुछ लोगों की स्किन कम रूखी होती है और कुछ की अधिक. मौसमों के बदलाव के साथ भी ड्रायता कम या ज़्यादा होती रहती है. जब रूखापन बहुत ज़्यादा होने लगे तो उपचार आवश्यक हो जाता है मगर इन उपचारों को जानने से पहले ये जानना बहुत ज़रूरी है कि अत्यधिक रूखेपन के क्या कारण हो सकते हैं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz   सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

Winter Special: सर्दियों में खूबसूरत और फ़ैशनेबल दिखने के लिए ट्राई करें ये आउटफिट्स

वैसे मेरा कहना ग़लत होगा की हम सभी को सर्दियों का मौसम पसंद नहीं है. ठंड का मौसम हर किसी को बहुत लुभाता है. रज़ाई मे बैठकर मूंगफली चबाना हो या सरसों द साग या मक्के की रोटी का मज़ा लेना हो ये सारे मज़े हम सभी सर्दियों मे ही ले सकते है. सर्दियों मे खाने के साथ साथ कपड़े पहने का एक अपना ही एक मज़ा होता है. ठंड मे बच्चे से लेकर बूढ़े , लड़के -लड़कियाँ सारे के सारे ठकपड़ों की खूब सारी लेयर पहने रहते है.  और अगर यहाँ कपड़ों की बात छेड़ ही दी गयी है तो गर्मी हो या सर्दी हम सभी को स्टाइलिश कपड़े पहनने का शौक़ होता है ख़ास कर लेडीस या लड़कीयो दोनो को. इंडिया मे ठंड के मौसम मे कोहरे के साथ साथ शादियां भी खूब होती है. ठंड का टाइम हो और साथ मे हमारे घर मे शादियाँ हो तब तो बहुत बड़ी परेशानी कपड़ों की होतीं है. गर्मियों में शादियों मे लहंगा , साड़ी , बैकलेस चोली या ब्लाऊज जैसे मन चाहे कपड़े पहन लेते है और इस बात का ग़म भी नहीं रहता की हमारे महंगे कपड़े दिख नहीं रहे है. लेकिन सर्दियों मे मेन प्रोब्लम यहीं होती है की कैसे हम सुंदर के साथ -साथ स्टाइलिश भी दिखे और हमें ठंड भी ना लगे , ऐसा होना थोड़ा मुश्किल होता है क्यूँकि यदि आप कोई बहुत सुंदर से साड़ी या ड्रेस पहनते है और साथ मेन उसके शाल या स्वेटर पहन ले तो आपके कपड़ों का सारा लुक ही चला जाता है.

वैसे घबराने की कोई बात नहीं है हम यहां आपको ऐसे ही कुछ स्टाइलिश और फ़ैशनेबल स्वेटर जैकेट के बारे मेन बताएँगे जो आपको इंडीयन और वेस्टर्न लुक दोनो ही दे सके.

1-स्वेटर वाले ब्लाउज

इंडिया मे महिलाओं की  बड़ी समस्या की सर्दियों मे किसी शादी या पार्टी मे साड़ी के साथ ब्लाउज की होती है क्यूँकि गर्मियों मे आप सिंपल ब्लाउज पहन सकती है साड़ी और ब्लाउज दोनो का शो अच्छा आता है लेकिन विंटर मे किसी शादी या पार्टी मे बिना स्वेटर के तो रहना मुश्किल हो जाता है और स्वेटर या शाल से लुक हो जाता है ख़राब इसलिए आप यदि साड़ी पहन्ने के शौक़ीन है तो आज कल स्वेटर वाले ब्लाउज प्रचलन में है आप इसे एक बार ट्राई करिए आपकी साड़ी का लुक बहुत खूबसूरत आएगा और ठंड से बचाव भी होगा.

2-ट्रेंच कोट

अधिकतर महिलायें शादियों मे साड़ियों को पहना पसंद करती है. आप यदि साड़ी पहने के शौकिन है तो सर्दियों में आपको इस बात का ख़ास ध्यान रखे की आप साड़ी मे कुछ ऐसा नया ट्राई करे जिससे आपको ठंड ना लगे उसके लिए आप ट्रेंच कोट साड़ी मे ट्राई कर सकते है. साड़ी के ऊपर ट्रेंच कोट पहने पर साड़ी बहुत ही सुंदर , एलीगेंट लगती है और आप सर्दी से भी बच सकती है.

3-अनारकली स्टाइलिश जैकेट

आप सिर्फ़ साड़ी नहीं इंडो वेस्टर्न ड्रेस को भी पहन सकती है थोड़ा सा चेंज  आपको भी अच्छा लगता है और दूसरों को देखने मे भी. सर्दियों मे आप यदि लहंगा या कोई प्यारी ड्रेस पहन रही है तो आप उसके ऊपर से अनारकली वाली स्टाइलिश जैकेट पहन सकते है जिसका बहुत यूनिक लुक आता है और बहुत ही खूबसूरत लगता है.

4-लेदर जैकेट

लेदर जैकेट का अपना एक अलग ही क़्रेज़ होता है. किसी भी कपड़ों के साथ आपकी ये लेदर जैकेट जंच ही जाती है. लहंगा हों या साड़ी या कोई इंडीयन या वेस्टर्न ड्रेस हो लेदर जैकेट ऊपर से पहन कर आप बहुत स्टाइलिश और अलग लुक देते है इसलिए सर्दियों मे आप लेदर जैकेट को ज़रूर ट्राई करियेगा.

5- वेलवेट या पश्मीना शॉल

यदि लहंगा ,साड़ी या सूट पहनते है आप तो दुप्पटें की बजाय आप वेलवेट या पश्मीना शॉल एक साइड डाल सकती है कुछ अलग दिखेगा और सुंदर भी। वेलवेट या पश्मीना शॉल आपको थोड़ा महंगा पड़ता है लेकिन इसका लुक बहुत अच्छा आता है. इसलिए विंटर मे आप ये ज़रूर ट्राई करिएगा.

6-श्रग

श्रग का अपने आप में ही अलग दिखता है बहुत ही ज़्यादा  स्टाइलिश और यूनिक. इंडियन लुक हो या जींस या वेस्टर्न ड्रेस मे आप श्रग पहने पर आप बहुत ही फ़ैशनेबल दिखती है और विंटर मे बहुत ज़्यादा उपयोगी भी है इसलिए आप अपनी अलमिरा मे इसे रखना ना भूले.

अब आपको परेशान होने की ज़रूरत नहीं होगी. विंटर में आप बस अपनी अलमिरा मे थोड़ा बदलाव लाइए और अपने लुक को चेंज करिए और दिखिए स्टाइलिश और फ़ैशनेबल.

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