बड़े बेटे ने देखा कि पापा और मैडम बातें कर रहे हैं, तो वह फुर्र से बाहर भाग गया.
‘‘अरे…रे…रे… अमृत…’’
माही कप रख हड़बड़ी में उसे पकड़ने के लिए दौड़ी कि अचानक उस का पैर फिसल गया.
वह गिरती उस से पहले ही चंदन ने उसे थाम लिया, ‘‘क्या मुहतरमा, मेरे ही घर में अपने हाथपैर तुड़वाने के इरादे हैं?’’ कह उस ने उसे पलंग पर बैठाया.
जब चंदन ने माही को थामा तो उस के दिल की धड़कनें जोरजोर से चलने लगी थीं. वह मुंह पर हाथ रख अपनेआप को नौर्मल करती हुई उस से नजरें नहीं मिला पा रही थी. उस के पैर की अनामिका उंगली में थोड़ी चोट लग गई थी, जिसे वह सहलाने लगी थी.
‘‘उंगली दर्द कर रही है क्या?’’ चंदन ने पूछा.
‘‘हां.’’
‘‘लाओ ठीक कर दूं,’’ चंदन ने उंगली पकड़ कर एक झटके में खींची. माही की हलकी चीख निकली और उंगली बजी.
‘‘लो ठीक हो गई. तुम्हारे चेहरे से ज्यादा खूबसूरत तुम्हारे पैर हैं. बिलकुल रुई की तरह नर्म और सफेद,’’ पंजे पर हाथ फेरते हुए चंदन ने कहा.
माही सिहर गई और कुछ बोल भी गई वह, ‘‘आप की भी तो छाती के ये कालेकाले घने बाल आसमान में छाए काले बादलों की तरह सलोने हैं.’’
जब उसे इस बात का एहसास हुआ कि वह गलत बोल गई तो मारे शर्म के पानीपानी हो गई. बोली, ‘‘सौरीसौरी. मैं ने गलत… गलत…’’
चंदन के लिए यह तारीफ मौन प्रेम निवेदन के लिए काफी थी. उस ने उसे चूम लिया. आग के सामने घी कब तक जमा रहता? पिघल गई माही. दोनों जानसमझ रहे थे कि यह गलत है, मगर दोनों के दिल बेकाबू थे और…
जब प्रेम के बादल छंटे तो दोनों को अपनीअपनी गलती का एहसास हुआ. माही होस्टल चली आई. पर मन में डर बुरी तरह समा गया कि यह उस ने क्या कर दिया.
उस ने बच्चों को पढ़ाना छोड़ दिया. रीता जब मायके से आई तो पूछा. उस ने तबीयत खराब होने का बहाना बना दिया.
चंदन अपनेआप को अपराधी मानने लगा था और माही पश्चात्ताप की आग में जलने लगी थी. रातरात भर जगी रह कर अपनी गलती को याद कर आंसू बहाती. उस ने मम्मीपापा के विश्वास को तोड़ दिया. छोटी बहनों पर इस का क्या असर होगा? यह बात जानने पर उस की कितनी बदनामी होगी.
‘‘मामीजी, प्लीज यह बात मेरे मम्मीडैडी…’’ माही ने रोते हुए मेरे हाथ पकड़ लिए.
‘‘तुम मुझ पर विश्वास रखो. तुम्हारी यह बात मुझ तक ही सीमित रहेगी. इसे कोई दूसरा नहीं जान सकता. अभी कोई गड़बड़ वाली बात नहीं है न?’’ मैं आशंकित थी.
‘‘नहीं.’’
‘‘अब तुम इस बात को पूरी तरह से दिल से निकाल दो. हां, तुम ने बहुत बड़ी गलती की है, पर आगे से सचेत रहना नहीं तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा. तुम जल्दी से अपने 2-4 कपड़े बैग में रख लो. मेरे घर चलो.’’
‘‘पर…’’
‘‘परवर कुछ नहीं. मैं वार्डन से तुम्हारी 4-5 दिन की छुट्टी ले कर आ रही हूं. कल तुम्हें ले कर एक जगह जाना भी है. आज देर हो गई है, इसलिए कल चलेंगे,’’ कह कर मैं नीचे चली आई.
वार्डन ने कोई आपत्ति नहीं की.
रास्ते में मैं ने माही से मना कर दिया कि वह कोई भी बात माधवी पल्लवी से नहीं कहेगी, क्योंकि तीनों बैस्ट फ्रैंड थीं. सारी बातें शेयर करती थीं. हम जैसे ही घर पहुंचे मेरे तीनों बच्चे माही को देख खुशी से उछल पड़े.
सब ने उस की तबीयत के बारे में पूछा. उस ने मेरी तरफ ताकते हुए पढ़ाई की टैंशन का बहाना बनाया.
लेकिन मेरे पति कुछ भांप गए थे. मैं ने झूठ को इतने सच की चाशनी में डाल कर उन के सामने परोसा कि उन्हें विश्वास करना ही पड़ा, ‘‘तुम ने माही को यहां ला कर बहुत अच्छा किया.’’
झूठ बोलने के लिए मैं ने मन ही मन पति से माफी मांगी. क्या करती माही की जिंदगी बचाने के लिए मैं एक क्या हजार झूठ बोलने के लिए तैयार थी.
फोन कर दीदी से उस की पढ़ाई का बोझ बता दिया. मेरा पूरा ध्यान उसी पर था. वह बच्चों से बातें करते हुए उदास हो जाती थी. उस की उदासी गई नहीं थी.
सत्यम उसे खींचते हुए अपने कमरे में ले गया ताकि वह उस के मैथ के सारे प्रश्नों को हल कर दे. उस से बातें करने में तीनों बच्चों को खाने की सुध नहीं थी. फिर वह माधवीपल्लवी के साथ सोने चली गई.
मेरा दिल बहुत भारी हो गया था. नींद की जगह मेरी आंखों में माही ही घूमती रही. उस के और चंदन के बारे में ही सोचती रही. आजकल क्या हो गया है हमारी इस युवा पीढ़ी को? कुछ सोचविचार नहीं और झट से…
कहीं न कहीं हम मांएं भी तो दोषी हैं, जो अपनी बेटियों के साथ खुल कर बात नहीं करतीं और समस्या खड़ी हो जाने पर समाधान ढूंढ़ती हैं.
मेरी भी तो 2 बेटियां हैं. उन से खुल कर उन के दोस्तों या दूसरे पुरुषों के बारे में पूछना ही पड़ेगा. शर्म और संकोच करूंगी तो शायद माही से भी बढ़ कर ये दोनों ज्यादा गलत कर बैठेंगी. पहले की अपेक्षा अब मुझे अपने बच्चों से बहुत गहरी दोस्ती रखनी पड़ेगी ताकि वे छोटी से छोटी बात भी मुझ से शेयर करें.
मुझे या दूसरों को माही पर हंसने की क्या जरूरत? यह कोई नहीं जानता कि भविष्य में किस पर कितना बड़ा दाग लगेगा?
सुबह तीनों बच्चे स्कूलकालेज जाने से मना करने लगे कि वे दिन भर माही के साथ मस्ती करेंगे. मगर मैं ने उन्हें समझाबुझा कर भेज दिया.
सब के जाने के बाद मैं ने माही से कहा, ‘‘बेटा, जल्दी से तैयार हो जा. हमें लेडी डाक्टर के पास चलना है.’’
‘‘लेडी डाक्टर… क्यों मामीजी…?’’ लगा कि उसे चक्कर आ जाएगा.
‘‘मैं ने कल तुम से कहीं चलने के लिए कहा था न? मैं तुम्हारी हंसतीखेलती जिंदगी को ले कर कोई रिस्क नहीं लेना चाहती.’’
लेडी डाक्टर ने उस की पूरी जांच कर कहा, ‘‘सविताजी, घबराने वाली कोई बात नहीं है. अकसर युवावस्था में माहवारी अनियमित हो जाती है. मैं दवा लिख देती हूं… सब ठीक हो जाएगा. आप की भानजी कुछ कमजोर भी है. थोड़ा इस के खानेपीने पर ध्यान दीजिए.’’
खुशी के मारे मैं ने उन्हें बारबार धन्यवाद कहा. मेरे मन की सारी कुशंका दूर हो गई थी, इसलिए मैं बहुत खुश थी.
रास्ते में मैं ने माही के पसंद के पर्स और जूते खरीदे. उसे होटल में खाना खिलाया. उस की मनपसंद चौकलेट, आइसक्रीम खिलाई. मैं उस बुरी घटना से उस का पीछा छुड़ाने का प्रयास कर रही थी. वह भी अब खुश लग रही थी. खूब सारी शौपिंग कर हम घर पहुंचे.
अचानक माही मेरे गले से झूल गई, ‘‘थैंक्स मामीजी, आप से कल से बात करने से ले कर अब तक मैं बहुत हलकी लग रही हूं.
‘‘सच अगर आप मुझ से डांटडपट कर बात पूछतीं तो मैं अपने दिल की गहरी बात आप से कभी नहीं बताती. मन ही मन घुटती रहती और पता नहीं खुद को कितना नुकसान पहुंचाती.
‘‘आप ने बहुत अच्छे से मुझे संभाल लिया. आज मैं तनावमुक्त महसूस कर रही हूं.
‘‘मगर कभीकभी मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा है या यों कहिए अभी भी मैं अपनेआप को बहुत बड़ा गुनहगार मान रही हूं…’’ कहतेकहते उस की आंखें नम हो आईं.
‘‘बेटा, तू ने गलती तो बहुत बड़ी की है, जो माफी के भी काबिल नहीं है, फिर भी तुम्हें उस गलती का एहसास है, पश्चात्ताप हो रहा है, यह बहुत बड़ी बात है.
‘‘हां, एक बात और. ठीक है, तुम्हारी नादानी से संबंध बन गया, मगर उसी बात को ले कर हरदम दुख के सागर में डूबे रहना उदासपरेशान रहना, यह गलत है. भविष्य में ऐसी गलती न हो, बस इतना ध्यान रखना.
‘‘संबंधों का जुड़ाव तन से न हो कर मन से होता है. पतिपत्नी का रिश्ता हो या प्रेमीप्रेमिका का उन का पहला रिश्ता मन की गहराई से होता है, भावनात्मक रूप से होता है.
‘‘तुम्हारा चंदन के साथ ऐसा कोई भी रिश्ता नहीं था, तो फिर उसी बात पर झींकते रहने से क्या फायदा?
‘‘बस, तुम जल्दी से इस मानसिक व्यथा से निकलो और पूरे तनमन से पढ़ाई में जुट जाओ. मुझे इतना तो विश्वास है कि अब आगे तुम से ऐसी गलती नहीं होगी,’’ कह मैं ने उस के गाल थपथपाए.
‘‘एक बार फिर आप को थैंक्स, मामीजी. मुझे इस भंवरजाल से बाहर निकालने के लिए,’’ कहते हुए वह मुझ से लिपट गई.
तभी उस का मोबाइल बजा.
‘‘हाय ममा, मेरी बीमारी तो मामीजी ने चुटकी बजाते ठीक कर दी…’’ प्यार से मेरी तरफ ताकते हुए माही की खनकदार हंसी पूरे घर में गूंज गई.