धूप में मेरे पूरे चेहरे पर छोटे-छोटे दाने निकल आते हैं, मै क्या करूं?

सवाल-

मैं 18 वर्ष की हूं. धूप में मेरे पूरे चेहरे पर छोटेछोटे दाने निकल आते हैं. कृपया इस समस्या से मुक्ति पाने का कोई घरेलू उपचार बताएं?

जवाब-

नीम व तुलसी का फेस पैक लगाएं. इस से स्किन के अंदर जो गंदगी है वह साफ हो जाएगी. हफ्ते में 1 बार जैल स्क्रब जरूर लगाएं. खाने में चिकनाई का कम इस्तेमाल करें और बाहर निकलने से पहले मुंह ढक लें.

गरमी के मौसम में स्किन काफी नाजुक और संवेदनशील हो जाती है. इस मौसम में स्किन के धूप के संपर्क में रहने से स्किन संबंधी कई समस्याएं होने लगती हैं. ऐसे में उस के प्रति थोड़ी सी भी लापरवाही आप की सुंदरता को बिगाड़ सकती है. गरमी में स्किन प्रौब्लम्स से बचने के उपाय बता रही हैं यावाना ऐस्थैटिक क्लीनिक की कंसल्टैंट डर्मैटोलौजिस्ट डा. माधुरी अग्रवाल और सोहम वैलनैस क्लीनिक की ब्यूटी ऐक्सपर्ट दिव्या ओहरी:

सनबर्न

सनबर्न सूर्य की हानिकारक किरणों के अत्यधिक संपर्क में आने के कारण स्किन पर होने वाली प्रतिक्रिया है. इस के लगातार संपर्क में आने से स्किन रूखी, बेजान और झुर्रियों वाली हो जाती है. गंभीर रूप से सनबर्न होने पर स्किन में छाले भी पड़ जाते हैं. कभीकभी स्किन छिल भी जाती है.

सनबर्न के लिए घरेलू उपाय

  1. सनबर्न का प्राथमिक उपचार घर से शुरू किया जा सकता है. इस के लिए ठंडे पानी से नहाना या दिन में बारबार सनबर्न से प्रभावित पार्ट पर ठंडी गीली पट्टियां लगाना जलन और दर्द को कम करने में काफी सहायक होता है.
  2. सनबर्न के कारण स्किन पर काले चकत्ते हो गए हैं, तो प्रभावी हिस्से पर बर्फ रगड़ने से निशान काफी हद तक कम हो जाते हैं.
  3. आलू दर्दनिवारक का काम करता है. यह त्वचा पर हलकी जलन, खरोंच, घाव, जलने वाली जगह पर लगने से आराम देता है. आलू को काट कर सनबर्न वाली जगह लगाने से काफी आराम मिलता है. आप चाहें तो आलू का छिलका उतार कर पेस्ट बना कर रुई से लगा सकती हैं.
  4. पुदीने की पत्तियों का रस निकाल कर झुलसी त्वचा पर नियमित लगाने से आराम मिलता है. इस के अलावा 1 चम्मच उरद दाल को दही के साथ पीस कर झुलसी त्वचा पर लगाने से भी राहत मिलती है.

Winter Special: नीबू से बनाएं ये टेस्टी अचार

सर्दियों के मौसम में नीबू बहुतायत से मिलते हैं, उपलब्धता अधिक होने के कारण ही इन दिनों नीबू काफी सस्ते दामों पर भी मिलते हैं. नीबू विटामिन सी का प्रचुर स्रोत होने के साथ साथ पोटेशियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, और मिनरल्स से भी भरपूर होता है. इसमें उपलब्ध विटामिन सी हमारे रोग प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करता है. यह पाचन तंत्र को दुरुस्त करने, वजन घटाने, और ब्लड सर्कुलेशन को नियंत्रित करने का काम करता है . किसी भी खाद्य पदार्थ में जाकर यह उसके स्वाद और पौष्टिकता दोनों को ही बढ़ा देता है. इससे अचार और शर्बत बनाए जाते हैं. आज हम आपको नीबू से बनाये जाने वाले कुछ स्वादिष्ट अचार को बनाना बता रहे हैं , तो आइए देखते हैं कि इन्हें कैसे बनाते हैं-

-नीबू का स्लाइस्ड अचार

कितने लोगों के लिए              10/12

बनने में लगने वाला समय        20 मिनट

मील टाइप                            वेज

सामग्री

बिना दाग धब्बे वाले नीबू       500 ग्राम

सरसों का तेल                     400 ग्राम

अचार का तैयार मसाला      250 ग्राम

हींग                                  1/4 टीस्पून

गोल कटी हरी मिर्च             8

विधि

नीबू को धो पोंछकर पतले पतले गोल स्लाइस में काट लें. जितना सम्भव हो उतने बीज अलग कर दें. सरसों के तेल को अच्छी तरह गर्म करके गैस बंद कर दें. जब तेल गुनगुना सा रहे तो हींग डालकर अचार का मसाला, नीबू और कटी हरी मिर्च डाल दें. अच्छी तरह चलाकर तैयार अचार को कांच के जार में भरकर धूप में रखें. 15-20 दिन बाद प्रयोग करें.

-नीबू का इंस्टेंट अचार

कितने लोगों के लिए              10

बनने में लगने वाला समय      40 मिनट

मील टाइप                           वेज

सामग्री

नीबू                                  500 ग्राम

शकर                                 400 ग्राम

काला नमक                     1 टेबलस्पून

काली मिर्च पाउडर            1टीस्पून

लाल मिर्च पाउडर             1/2 टीस्पून

कश्मीरी लाल मिर्च पाउडर   1 टीस्पून

सादा नमक                     1टीस्पून

भुना जीरा पाउडर            1/2 टीस्पून

विधि

नीबू को धोकर साफ सूती कपड़े से पोंछकर छोटे छोटे टुकड़ों में काट लें. हाथ से इनके बीज भी निकाल दें. ध्यान रखें बीज नीबू से पूरी तरह अलग हो जाएं अन्यथा अचार कड़वा हो जाएगा. अब नीबू और शकर को मिक्सी में पल्स मोड पर बारीक पीस लें.

तैयार मिश्रण को एक कांच या स्टील के बाउल में डालें. एक चौड़े मुंह के भगौने में पानी गर्म होने गैस पर रखें. भगौने के तले में एक स्टैंड या कटोरी इस प्रकार रखें कि इसके ऊपर जब आप कांच का बाउल रखें तो वह आधा पानी में डूबा रहे.अब तैयार नीबू और शकर के मिश्रण में शेष सभी मसाले मिलाएं…अब इसे लगातार चलाते हुए लगभग 25 मिनट तक पकाएं. अब तक नीबू का रंग पूरी तरह बदल जायेगा. जब अचार पूरी तरह ठंडा हो जाये तो कांच के जार में भरें. आप इसे बनने के तुरंत बाद ही प्रयोग कर सकतीं हैं.

-नीबू का मीठा नमकीन अचार

कितने लोगों के लिए               10-12

बनने में लगने वाला समय        20 मिनट

मील टाइप                            वेज

सामग्री

नीबू                                 500 ग्राम

पिसी शकर                              300 ग्राम

काली मिर्च                      1 टीस्पून

काला नमक                    डेढ़ टीस्पून

भुना जीरा पाउडर          1 टीस्पून

बड़ी इलायची पाउडर       1/2 टीस्पून

जायफल पाउडर             1/4 टीस्पून

विधि

नीबू को धो पोंछकर 8 टुकड़ों में काट लें. इन्हें एक बड़े बाउल में डालें. अब इन कटे नीबुओं में समस्त सामग्री को भली भांति मिलाएं. कांच के जार में भरकर 15-20 दिन तक धूप में रखें, 2-3 दिन के अंतर पर हिलाते रहें. 20 दिन बाद तैयार अचार को पूरी परांठा के साथ सर्व करें.

ध्यान रखने योग्य बातें

-अचार बनाने के लिए नीबू ताजे, बिना दाग धब्बे व पतले छिल्के वाले और अच्छे रस वाले ही लें.

-अचार को भरने के लिए कांच के जार का प्रयोग करें, इससे अचार जल्दी खराब नहीं होता और पकता भी जल्दी है.

-रेडीमेड अचार के मसाले के स्थान पर आप घर में बनाये मसाले का ही प्रयोग करे .

-यदि आप हैल्थ कॉन्शस हैं तो शकर के स्थान पर गुड़ का प्रयोग करें.

-अचार के जार को ऐसे स्थान पर रखें जहां पर अच्छी धूप आती हो…दो तीन दिन के अंतराल पर इसे चलाते रहें ताकि तले का अचार पक जाए.

-सीधे गैस पर पकाने के स्थान पर आप भगौने में पानी के ऊपर कटोरा रखकर अचार पकाएं सीधे पकाने से अचार में कड़वाहट आ सकती है.

केसर से लेकर तेजपत्ता तक, इन 12 मसालों से बनाएं अपनी सेहत

भारतीय भोजन में मसालों का इस्तेमाल हजारों सालों से हो रहा है. इन के इस्तेमाल का मकसद सिर्फ भोजन के स्वाद को बढ़ाना ही नहीं होता, ये भोजन के विकारों को कम कर के उन के गुणों को भी बढ़ाते हैं. साथ ही सेहत से जुड़ी छोटे स्तर पर होने वाली समस्याओं का निदान भी इन मसालों में होता हैं.

हालांकि आज के युग में मिर्चमसाले, घीतेल का प्रयोग दिनबदिन कम होता जा रहा है. कैलोरी की मात्रा तथा आहार की पौष्टिकता ही भोजन की परख है. पर निरंतर हो रहे कई शोधों से पता चलता है कि यदि किसी मसाले का उपयुक्त मात्रा में भोजन में समावेश किया जाए तो वह सेहत के लिए अच्छा रहता है.

आइए जानें कुछ प्रचलित मसालों के बारे में और यह कि उन का कैसे इस्तेमाल कर स्वाद के साथ सेहत का भी ध्यान रखा जा सकता है.

1. दालचीनी

दालचीनी एक ऐसा मसाला है जो गरम तासीर वाला तथा गरम मसाले का अंश है. अगर पुलाव बना रही हों तो उस के साथ खाए जाने वाले रायते में इस का चुटकी भर पाउडर डालें, स्वाद बढ़ जाएगा. ब्रैड पर मक्खन के ऊपर इस का थोड़ा सा पाउडर बुरकें, कौफी के ऊपर चुटकी भर डालें और चौप बनाते समय भी इस को थोड़ा सा डालें स्वाद बढ़ जाएगा. सेब की खीर या मिल्कशेक बनाते समय भी इस के पाउडर को प्रयोग में लाएं.

2. कालीमिर्च

कालीमिर्च गरममसाले का अंश तो है ही, साथ ही इस का प्रयोग सब्जी में साबूत मसाले डालते समय और पाश्चात्य व्यंजनों व सलाद आदि में पिसी कालीमिर्च पाउडर के रूप में होता है. कालीमिर्च 2 प्रकार की होती है. एक तो वह जिस में इस के अधपके दानों को सुखा कर रखा जाता है तो वे काले हो जाते हैं और दूसरी वह जब इस के दाने पूरी तरह पक जाते हैं, तो उस की ऊपरी सतह यानी काला छिलका आसानी से उतर जाता है. पक जाने पर कालीमिर्च की अपेक्षा सफेदमिर्च में ज्यादा गुण पाए जाते हैं.

पकौड़े बनाते समय सफेदमिर्च व कालीमिर्च पाउडर डालें. दाल में तड़का लगाते समय मोटी कुटी कालीमिर्च के 4-5 दाने डालें. स्वाद बढ़ जाएगा. सूप में फ्रैश पिसी कालीमिर्च और मठरी बनाते समय भी कालीमिर्च पाउडर डाल सकते हैं. इस से स्वाद अच्छा आएगा. लड्डू बनाते समय सफेद व कालीमिर्च का पाउडर डालें.

3. अर्जुन की छाल

यह एक प्रकार का पेड़ है, जो हिमालय की तलहटी, उत्तर प्रदेश, बंगाल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार आदि में बहुतायत में पाया जाता है. इस पेड़ की छाल खूब प्रयोग में लाई जाती है. इस पर हुए शोधों से पता चला है कि यह विटामिन ई के बराबर ऐंटीऔक्सिडैंट का काम करती है, इसलिए इस का पाउडर बना कर प्रयोग में लाया जाता है.

1 लिटर पानी में 1 से 2 चम्मच छाल पाउडर डाल कर पानी आधा रहने तक उबालें और दिन में 2 बार पिएं. इस के अलावा इसे टोमैटो जूस व दूध में डाल कर भी पिया जा सकता है और चाय में भी इस का प्रयोग किया जा सकता है.

4. कलौंजी

कलौंजी के दाने सरसों के बीज की तरह होते हैं. उन में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट अच्छी मात्रा में पाया जाता है. इस के अलावा कैल्सियम, पोटैशियम, मैग्नीशियम आदि भी उन में होते हैं. कलौंजी का स्वाद प्याज, कालीमिर्च और ओरिगैनो का मिलाजुला होता है. वैसे कई अचारों में इस का प्रयोग होता है, लेकिन इस के बिना आम का अचार अधूरा लगता है. इस के अलावा नान, पूरी बनाते समय इस के थोडे़ दाने डालने से उन का स्वाद अच्छा रहता है. इस के थोड़े से दाने डाल कर चाय बना कर पीने से मानसिक तनाव में कमी आती है. कलौंजी का तेल भी कई तरह से प्रयोग में लाया जाता है. अगर कुछ नया करना चाहें तो पंचमेल दाल में इस का तड़का लगाएं. अच्छा स्वाद आएगा.

5. जायफल व जावित्री

जायफल व जावित्री गरम मसाले का एक हिस्सा होते हैं. इन का प्रयोग विशेष डिशेज में ही होता है, लेकिन औषधि के रूप में इन का प्रयोग खूब किया जाता है. जायफल सुगंधित होता है और भारी जायफल ही अच्छा माना जाता है. जायफल के फल की छाल ही जावित्री कहलाती है.

बच्चे को जुकाम हो तो थोड़ा सा जायफल पत्थर पर घिस कर 1 बड़े चम्मच दूध में मिला कर पिलाने से उसे राहत मिलती है. नींद न आने की स्थिति में दूध में जायफल पाउडर, केसर और छोटी इलायची पाउडर डाल कर उबालें और सोते समय पी लें. साबूत मसालों का सब्जी में तड़का लगाते समय जावित्री का छोटा सा टुकड़ा डालें, तो अच्छा स्वाद आएगा.

6. जीरा

किचन में इस्तेमाल होने वाले मसालों में जीरा एक महत्त्वपूर्ण चीज है. यह तीखा और मीठी सुगंध वाला होता है. भारतीय भोजन के अलावा मैक्सिकन भोजन में भी जीरे का बहुत प्रयोग किया जाता है. जीरे में भरपूर आयरन पाया जाता है और यह पाचन में भी सहायक होता है.

जीरे का प्रयोग कई तरह से किया जाता है. एक तो दाल, सब्जी व चावल में तड़का लगाने के लिए, उस के अलावा कच्चा मसाला भूनते समय जीरा पाउडर के रूप में. छाछ, रायता, दहीभल्ला आदि में भुना हींगजीरा, पाउडर के रूप में इस्तेमाल होता है. जीरा किसी भी रूप में इस्तेमाल करें, यह सेहत के लिए अच्छा होता है. यह डायबिटीज के रोगियों व कब्ज की शिकायत वालों के लिए भी लाभकारी है. सर्दियों में इस का नियमित सेवन अच्छा रहता है.

7. राई

यह दालसब्जी में तड़का लगाने के लिए तथा अचारों में मसाले के साथ प्रयोग किया जाने वाला महत्त्वपूर्ण मसाला है. इस के उपयोग से आमाशय व आंतों पर उत्तेजक प्रभाव पड़ता है. फलस्वरूप भूख खुल जाती है. राई मुख्यतया 2 प्रकार की होती है. एक काली और दूसरी पीली. काली राई आमतौर पर तड़के के काम आती है. दक्षिण भारतीय व्यंजनों में उस का इस्तेमाल खूब किया जाता है. जबकि पीली राई, जिसे सरसों के दाने भी कहते हैं, का इस्तेमाल अचार, कुछ दही के रायतों, चटनी, कांजी आदि में पाउडर बना कर किया जाता है. समुद्री भोजन के साथ जब सरसों के दानों को पकाया जाता है, तो मछली आदि में ओमेगा-3 की मात्रा बढ़ जाती है.

सांभर, दाल, उपमा आदि में काली राई का तड़का अच्छा रहता है. पीली राई का तड़का ढोकला, खांडवी आदि में किया जाता है. इस के अलावा इंस्टैंट मिर्च के अचार, लौकी के रायते में इस का पाउडर डालने से उन का स्वाद और बढ़ जाता है.

8. अजवाइन

यह पाचक, रुचिकर, गरम और तीखी होती है. इस के सेवन से गैस, गले की खराश आदि में काफी लाभ मिलता है. अजवाइन में कालीमिर्च तथा राई की उष्णता, चिरायते जैसी कड़वाहट (चिरायता एक पौधा है) और हींग की खूबियां, ये तीनों गुण होते हैं. अजवाइन का बघार देने से सब्जी का स्वाद व सुगंध बढ़ती है. यह सभी मसालों में श्रेष्ठ है, क्योंकि गरिष्ठ भोजन में इस का प्रयोग करने से उसे पचाने में आसानी होती है.

अरवी, केले की सब्जी, ग्वार की फली, जिमीकंद वगैरह में जब इस का छौंक लगाया जाता है तो उन का स्वाद तो बढ़ जाता ही है उन्हें पचाने में भी आसानी रहती है. तैयार राजमा में अजवाइन और कसूरी मेथी का तड़का स्वाद को बढ़ा देता है. इसी तरह काबुली चनों के मसाले में इस का पाउडर डालें या परांठों में इस को डालें, स्वाद और सेहत दोनों के लिए अच्छा रहेगा.

9. फ्लैक्स सीड्स (अलसी के बीज)

फ्लैक्स सीड्स (अलसी के बीज) का महत्त्व अब प्रकाश में आया है. पहले तो इन्हें जानवरों को खाने के लिए दिया जाता था, हाल के वर्षों में हुए शोधों से पता चला है कि इन में ओमेगा-3 फैटी एसिड प्रचुर मात्रा में पाए जाता है, जो सामान्यतया मछली में मिलता है. शाकाहारी लोगों के लिए अलसी के बीज सेहत के लिए बहुत फायदेमंद हैं.

इन बीजों को हलकी गैस पर रोस्ट कर के उन का पाउडर बनाएं. फिर उस को सलाद में डाल लें अथवा सब्जी के शोरबे में मिलाएं. रायते पर बुरकें अथवा आटे में मिलाएं. सेहत के लिए अच्छा रहेगा. जिन महिलाओं के जोड़ों में दर्द रहता है, उन के लिए तो यह बहुत फायदेमंद है. लेकिन इस का सेवन 1 दिन में 2 बड़े चम्मच से ज्यादा नहीं करना चाहिए.

10. केसर

सब से महंगे मसालों में एक है केसर. सर्दियों में जुकामखांसी में, तो गरमियों में ठंडाई में इस का सेवन बखूबी होता है. खजूर, मुनक्के और बादाम के साथ पके दूध में इस के चंद रेशे डालें क्योंकि यह एक बेहतरीन टौनिक होता है. इस की खूबी यह है कि जब ठंडी खीर या दूध में यह डाला जाता है तो यह ठंडक पहुंचाता है और सर्दी के मौसम में यदि यह गरम दूध में डाला जाए तो चमत्कारी गरमी पहुंचाता है. इस को शाही सब्जी, जाफरानी और पुलाव में भी प्रयोग करते हैं. इस के चंद धागों को गुलाबजल या कुनकुने दूध में भिगो कर 10 मिनट रखें फिर उसी में घोट कर डाल दें. स्वाद व खुशबू दोनों बढ़ जाएंगे.

11. सौंफ

सौंफ भी हमारे मसालों में खूब प्रयोग में आती है. मुखशुद्धि के अलावा सूखी सौंफ पाचनतंत्र पर प्रभावशाली असर डालती है. हमारी कई पारंपरिक सब्जियों में इस का प्रयोग पाउडर के रूप में होता है. साथ ही कई अचारों में भी इस को डालते हैं. मुख्यतया यह 2 प्रकार की होती है. एक मोटी सौंफ, जो भोजन के काम आती है और दूसरी बारीक सौंफ जिस को मुखशुद्धि के लिए प्रयोग में लाते हैं. इस के सेवन से कब्ज, पेटदर्द, गले की खराश, पित्त ज्वर, हाथपांव में जलन आदि में राहत मिलती है.

इस को करेले, गोभी व अचारी सब्जी आदि में प्रयोग किया जाता है. पंचफोड़न में भी सौंफ होती है. कुल मिला कर इस का प्रयोग सेहत और भोजन की स्वादिष्ठता को बढ़ाने के लिए होता है.

12. तेजपत्ता

इस का उपयोग भी लौंग, दालचीनी या बड़ी इलायची की भांति सुगंध व स्वाद बढ़ाने के लिए किया जाता है. विशेष रूप से इस का सेवन कफ प्रधान रोगों, अपचता, उदर रोग व पाचनतंत्र संबंधी रोगों के लिए फायदेमंद रहता है. लेकिन इस के ज्यादा पुराने पत्तों से खुशबू निकल जाती है.

सब्जी में खड़े गरम मसाले के साथ व पुलाव में इस का प्रयोग खूब होता है. पिसा मसाला भूनने से पहले कड़ाही में तेल में इस के 2-3 पत्ते डालें फिर मसाला भून कर सब्जी डालें. स्वाद बढ़ जाएगा.

उपरोक्त मसालों के अलावा और भी बहुत से मसाले ऐसे हैं. जिन का प्रयोग सब्जी बनाते समय होता है. जैसे मेथीदाना, खसखस, हरड़, हींग, मिर्च, बड़ी और छोटी इलायची, हलदी पाउडर, धनिया पाउडर आदि. ये सभी स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद हैं. बस जरूरत इस बात की होती है कि इन सब का प्रयोग सीमित मात्रा में सही तरीके से किया जाए. इस के अलावा मसालों को सही तरीके से रखें ताकि उन की खुशबू बरकरार रहे.

सिचुएशनशिप है लेटैस्ट रिलेशनशिप ट्रैंड

कुछ साल पहले तक लड़केलड़की या पुरुषमहिला के बीच प्यार के माने अलग थे. रिश्ते की शुरुआत बात करने से होती थी. उस के बाद दोस्ती होना, एकदूसरे के लिए अट्रैक्शन और फीलिंग्स महसूस करना, फिर डेटिंग और प्यार में पड़ना बहुत सहज और इमोशनल घटना होती थी. इस के बाद दोनों शादी के सपने देखते थे और पूरी जिंदगी साथ गुजारने का वादा करते थे. तब अपने पेरैंट्स से मिलवाने का शगल शुरू होता था.

वह ऐसा वक्त था जब लोग प्यार के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे और रिश्ता भावनाओं से भरपूर होता था. मगर आज के डिजिटल युग में सबकुछ बदलने लगा है. तेज रफ्तार मौडर्न जैनरेशन को हर चीज बदलने और कुछ नया पिक करने की आदत है. आज जो मोबाइल बहुत उत्साह से खरीदा है एकडेढ़ साल के अंदर वही मोबाइल आंखों में खटकने लगता है. उसे किनारे कर नए मौडल का मोबाइल लेने की होड़ लग जाती है. इसी तरह उन्हें रिश्ते भी बदलने की लत लगती जा रही है. एक ही रिश्ते को जिंदगीभर कौन ढोए?

क्या पता कल कोई और खूबसूरत लड़की मिल जाए, कल कोई ज्यादा पसंद आ जाए, ज्यादा कूल, रिच और स्मार्ट मिल जाए. बस इसी चक्कर में वे रिश्तों में भी कमिटमैंट से बचने लगे है.

रोमांचकारी अनुभव

लोगों को सबकुछ तुरंत चाहिए और मन भर जाए तो तुरंत स्क्रौल करते हुए आगे बढ़ जाते हैं. डिजिटल युग की वजह से आज औप्शन बहुत हैं इसलिए एक के पीछे समय बरबाद करना नहीं चाहते. यही वजह है कि आज रिलेशनशिप ट्रैंड में काफी बदलाव आए हैं. आज युवाओं की रिलेशनशिप्स में कमिटमैंट की कमी दिखने लगी है. वे सिचुएशनशिप के कौंसैप्ट को फौलो करने लगे हैं.

2011 में जस्टिन टिम्बरलेक और मिला कुनिस की फिल्म ‘फ्रैंड्स विद बैनिफिट्स’ आई और इस के साथ रिलेशनशिप में फ्रैंड्स विद बैनिफिट्स का कौंसैप्ट युवाओं में लोकप्रिय बन गया था. उसी साल एश्टन कचर और नताली पोर्टमैन ने भी युवा मिलेनियल्स को नौनकमिटल रिलेशनशिप का स्वाद दिया यानी बिना ज्यादा तनाव लिए या इमोशनल हुए रोमांस या प्यार के संबंधों में आगे बढ़ना.

यह नया और रोमांचकारी अनुभव था. सार्वजनिक रूप से एक जोड़े की तरह न तो साथ होने का दिखावा करना, न कोई रोमांटिक डायलौग बोलना, न इमोशनली जुड़ना और न ही कुछ और लागलपेट. बस सीधे संबंध बनाना और जिंदगी ऐंजौय करना.

इस नौनकमिटल रिलेशनशिप का एक नया रूप हाल ही में सामने आया है. जेन जेड और मिलेनियल्स ने अपने रोमांटिक संबंधों को परिभाषित करने के लिए अन्य कई भ्रामक शब्दों के एक समूह के बीच हमें एक और नया शब्द दिया है और वह है सिचुएशनशिप. यह शब्द 2019 में खासा लोकप्रिय हुआ. रिएलिटी टीवी शो लव आइलैंड की प्रतिभागी अलाना मौरिसन ने अपनी डेटिंग हिस्ट्री बताने के लिए इस ‘सिचुएशनशिप’
शब्द का इस्तेमाल किया था.

एक नया ट्रैंड

यही वजह है कि युवा पीढ़ी के बीच रिलेशनशिप का एक नया ट्रैंड बहुत तेजी से पौपुलर हो रहा है और वह है सिचुएशनशिप जिस में रिलेशनशिप में की जाने वाली किसी भी चीज का कोई प्रैशर नहीं होता खासतौर से कमिटमैंट का. रिश्ते तभी तक टिकते हैं जब तक सब सही चल रहा हो.

आज पुरुषों से ले कर महिलाओं तक डेटिंग ऐप का इस्तेमाल कर रही हैं. लोग सिंगल रहना ज्यादा पसंद कर रहे हैं और अगर शादी के बाद आपस में बन नहीं रही तो एकदूसरे को ?ोलने के बजाय अलग होने में बिलकुल संकोच नहीं कर रहे हैं. मतलब सबकुछ एकदम क्लीयर कट.

ऐसे ही नए नए ट्रैंड्स में एक और टर्म बहुत तेजी से पौपुलर हो रही है और वह है सिचुएशनशिप.

क्या है सिचुएशनशिप

सिचुएशनशिप हिंदी के 2 शब्दों ‘सिचुएशन’ और ‘रिलेशनशिप’ को मिला कर बनाया गया है. सिचुएशनशिप में सबकुछ परिस्थिति पर निर्भर करता है. रोमांस और फिजिकल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 2 लोग साथ में आ सकते हैं. दोनों एकदूसरे के साथ घूमने जा सकते हैं, लंच या डिनर कर सकते हैं. इस रिश्ते को कोई नाम नहीं दिया जाता है. कई बार लोग सिचुएशनशिप में एकदूसरे के साथ सिर्फ वक्त बिताने के लिए भी साथ आ सकते हैं. इस रिश्ते में साथी बिना कुछ ऐक्सप्लेन किए दूसरे साथी को छोड़ सकता है.

सरल शब्दों में कहें तो सिचुएशनशिप एक अपरिभाषित रिश्ता है जहां लोग अंतरंग होते हैं लेकिन एक व्यक्ति तक सीमित होने या उस के साथ रिश्ते में बंधना पसंद नहीं करते हैं. यानी सिचुएशनशिप एक ऐसी डेटिंग है जिस में 2 लोग बिना किसी वादे या कमिटमैंट के एकसाथ रहते हैं.

वे इस रिश्ते के बारे में न तो किसी को बताना चाहते और न ही इसे कोई नाम देना चाहते हैं.
2 लोग एकदूसरे की जरूरत को पूरा करने के लिए साथ में रहते हैं. सिचुएशनशिप में कुछ भी परिभाषित नहीं है. आप इसे गोइंग विथ फ्लो कह सकते हैं. मिजाज बदला और पार्टनर भी बदल गए. कुछ ऐसा ही फलसफा है इस रिश्ते का. कुछ मामलों में यह सही है तो कुछ मामलों में बहुत गलत.

क्यों पसंद कर रहे हैं सिचुएशनशिप में रहना

नई जैनरेशन किसी भी शर्त पर अपनी आजादी के साथ सम?ाता नहीं करना चाहती है. युवा अपने मुताबिक जीवन जीना चाहते हैं और खुद को स्वतंत्र रखना चाहते हैं. दरअसल, जब आप किसी रिश्ते में होते हैं तो अपने साथी की बातों पर ध्यान देना होता है जिस से उन की आजादी छिन जाती है. इस के साथ ही लव रिलेशनशिप एक जिम्मेदारी भरा रिश्ता होता है.

इसलिए जब कोई इंसान कमिटमैंट या जिम्मेदारी जैसी चीजों से बचना चाहता है तो वह सिचुएशनशिप में रहना पसंद करता है क्योंकि इस में साथी से कोई वादा या कमिटमैंट करने की आवश्यकता नहीं होती है. इस में 2 लोग केवल एकदूसरे के साथ लव रिलेशनशिप के फायदों को शेयर करने के लिए साथ होते हैं.
इस के अलावा जब किसी इंसान को अपने पहले प्यार में धोखा या सफलता नहीं मिलती तो वह मात्र ऐंजौयमैंट के लिए सिचुएशनशिप में आना पसंद करता है.

सिचुएशनशिप और रिलेशनशिप में क्या अंतर

जब 2 लोगों के बीच गहरा प्यार होता है तो वे रिलेशनशिप में आते हैं यानी इस में 2 लोगों के रिश्ते को प्यार का नाम दिया जाता है. जो लोग इस रिश्ते में होते हैं वे एकदूसरे को अपने दोस्तों और परिवार वालों से मिलाना पसंद करते हैं. वे एकदूसरे को गर्लफ्रैंड और बौयफ्रैंड के रूप में मिलवाते हैं. इस में दोनों लोगों के बीच प्यार होता है और वे फ्यूचर के बारे में बात करना पसंद करते हैं.

वे एकदूसरे के साथ अपना जीवन बिताना चाहते हैं. जब 2 लोग रिलेशनशिप में होते हैं तो उन का रिश्ता शादी तक पहुंच सकता है. इस में दोनों को एकदूसरे के सवालों के जवाब देने होते हैं. एकदूसरे की जिम्मेदारियां उठानी पड़ती है, एकदूसरे की जरूरतों का खयाल रखना होता है.

वहीं आज के डिजिटल युग में ‘सिचुएशनशिप’ वर्ड काफी ट्रैंड कर रहा है. इस का मतलब है कि 2 लोग किसी सिचुएशन में एकसाथ रहते हैं.  इस में 2 अनजान लोग भी एकदूसरे के साथ जुड़ सकते हैं. सिचुएशनशिप की सब से बड़ी विभिन्नता है कि इस में कोई वादा नहीं होती है. सिचुएशनशिप में दोनों ही पार्टनर पर्सनल सवालों से मुक्त रहते हैं.

इस रिश्ते में दोनों लोग बिना किसी शर्त के एकसाथ रहते हैं और अच्छा समय बिताते हैं. रिलेशनशिप में 2 लोग प्यार की वजह से एकदूसरे के साथ जुड़े होते हैं, जबकि सिचुएशनशिप में 2 लोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए जुड़े होते हैं. सिचुएशनशिप में दोनों भविष्य के बारे में बातचीत से बचते हैं. लंबे समय के लिए योजनाओं, वादों या सपनों की चर्चा नहीं करते क्योंकि वे उस रिश्ते को लंबे समय तक निभाने की नहीं सोचते. सिचुएशनशिप में भावनात्मक संबंध और इंटिमेसी हो सकती है लेकिन यह प्यार के नौर्मल रिश्तों में अकसर पाई जाने वाली गहराई के स्तर तक नहीं पहुंच सकती है.

सिचुएशनशिप के फायदे

फ्लैक्सिबिलिटी: सिचुएशनशिप में फ्लैक्सिबिलिटी होती है मतलब कोई वादा, दिखावा नहीं करना पड़ता और न ही एकदूसरे से सवालजवाब का चक्कर होता है. इस माने में यह अच्छा है. आप अपने हिसाब से रिश्ते को मोल्ड कर सकते हैं. कमिटमैंट के दबाव के बिना कनैक्शन तलाशने की स्वतंत्रता होती है.
कम दबाव: सिचुएशनशिप में आप के ऊपर कोई बर्डन नहीं होता कि ऐसा ही करना पड़ेगा या रिश्ता निभाना ही पड़ेगा यानी इस में किसी के ऊपर किसी भी तरह का प्रैशर नहीं होता. आप अपनी मरजी और खुशी से इस रिश्ते में होते हैं. सम?ा न आए तो साथी को बिना कुछ ऐक्सप्लेन किए छोड़ भी सकते हैं. यह उन व्यक्तियों के लिए विशेष रूप से आकर्षक है जिन के जीवन में अन्य प्राथमिकताएं होती हैं. जो अपने
कैरियर या लाइफस्टाइल से सम?ाता नहीं करना चाहते या किसी और की वजह से जिंदगी का मकसद या जीने का तरीका नहीं बदलते.

नुकसान: मगर सच यह भी है कि भले ही साथ रहने का प्रैशर और जिम्मेदारियों के बो?ा से दूर सिचुएशनशिप एक बहुत सुखद स्थिति लग सकती है लेकिन यह बहुत कठिन रास्ता होता है जिस पर अगर सावधानी से न चला जाए तो जख्मी होने का खतरा रहता है. मुश्किल तब आती है जब इस में शामिल 2 लोगों में से किसी एक की भावनाएं गंभीर होने लगें और वह अपनेआप से कमिटमैंट चाहने लगे.

बानो के न्याय में शामिल हुई तीन महिलाएं

एक महिला सम्मान की हकदार है, भले ही उसे समाज में कितना भी ऊंचा या नीचा क्यों न माना जाए, चाहे वह किसी भी धर्म को मानती हो या किसी भी पंथ को मानती हो . क्या महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराधों में दोषियों की सजा कम करके और उन्हें आजादी देकर सजा माफ की जा सकती है?’

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को गुजरात राज्य द्वारा अगस्त 2022 में बिलकिस बानो के साथ सामूहिक बलात्कार और दो महीने के शिशु सहित उसके परिवार की हत्या के लिए आजीवन कारावास की सजा पाए 11 लोगों को दी गई सामूहिक छूट के आदेश को रद्द कर दिया जिन्हे गुजरात सरकार द्वारा “अच्छे व्यवहार” के आधार पर रिहा कर दिया गया था.

सुश्री बानो, जो उस समय गर्भवती थीं, और उनके परिवार के साथ जो हुआ उसे” सांप्रदायिक घृणा से प्रेरित वीभत्स और शैतानी अपराध” बताते हुए न्यायमूर्तिबी.वी. नागरत्ना और उज्जल भुइयां की पीठ ने गुजरात में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार को तीखी फटकार लगाई . सोमवार का फैसला केंद्र के लिए एक झटका साबित हुआ जिसने पुरुषों की समयपूर्व रिहाई को मंजूरी दे दी थी .

यथास्थिति का आदेश देते हुए, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने तर्क दिया कि दोषियों को फिर से छूट का आवेदन करने के लिए भी पहले उन्हें जेल में वापस आना होगा . साथ ही अदालत ने कहा कि दोषियों को सजा में छूट देने का अधिकार गुजरात के पास नहीं था और आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 432( 7)( बी) के तहत गुजरात “उपयुक्त सरकार” नहीं थी, जिस में सजा को निलंबित करने और माफ करने की शक्ति का विषय शामिल था .

यह मामला अगस्त 2004 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गुजरात से महाराष्ट्र स्थानांतरित कर दिया गया था . यह देखते हुए कि सुश्री बानो को एक अनाथ का जीवन जीने के लिए मजबूर किया गया था . ग्रेटर मुंबई में सीबीआई के विशेष न्यायाधीश ने जनवरी 2008 में 11 लोगों को दोषी ठहराया था और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी .

इसलिए, अदालत ने यह स्पष्ट किया की वह महाराष्ट्र राज्य था, जहां 11 लोगों पर मुकदमा चलाया गया और सजा सुनाई गई थी न कि गुजरात, जहां अपराध हुआ था या दोषियों को कैद किया गया था, जो धारा 432 के तहत छूट देने के लिए” उचित सरकार” थी .

इस केस को देखते हुए महिलाओं के मन में सर्वप्रथम यह सवाल ज़रूर होगा की केसे अकेली बिल्किस ने कोर्ट में यह लड़ाई लड़ी होगी? तो जान लीजिए की बिलकिस का साथ के लिए आगे आयीं थी यह तीन महिलाएं-

लखनऊ विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रूप रेखा वर्मा लखनऊ के लिए उड़ान भरने के लिए दिल्ली हवाई अड्डे पर थीं, तभी उन्हें एक मित्र का फोन आया और उन्होंने प्रोफेसर से पूछा कि क्या वह जनहित याचिका दायर करने के लिए याचिकाकर्ता बनेंगी . दोषियों को हत्या का भी दोषी पाया गया था. वर्मा तुरंत सहमत हो गए और सह- याचिकाकर्ता बनने के लिए अगले दिन कूरियर के माध्यम से उन्होंने अपना आधार कार्ड भेजा .

इस समय तक, सीपीआई( एम) की सुभाषिनी अली- जो 2002 में सामूहिक बलात्कार और हत्याओं के दो दिन बाद गुजरात के एक राहत शिविर में बिलकिस बानो से मिली थीं, पहले ही फैसला कर चुकी थीं की वह इस लड़ाई में बिलिस के लिए याचिकाकर्ता बनेंगी .

अब, टीम तीसरे याचिकाकर्ता की तलाश कर रही थी  और उसे वह पत्रकार रेवती लौल के रूप में मिली . रेवती लौल गुजरात में एनडीटीवी के पत्रकार थीं और घटना घटने के बाद उन्होंने बिलकिस से मुलाकात की थी. उन्होंने’ एनाटॉमी ऑफ हेट’ नाम से एक किताब भी लिखी है .

इस तरह बिलकिस बानो के न्याय की भागीदार हुईं तीन महिलाएं . जिन्होंने बानो की यह लड़ाई जारी रखी . इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने बिलकीस के पक्ष मे फैसला लेकर और उसे न्याय दिलाकर कई महिलाओं का न्यायालय के न्याय पर खोया हुआ विश्वास बहाल किया है.

Saras Salil Cine Award: दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ को इस फिल्म के लिए मिला बेस्ट एक्टर का अवार्ड

‘5वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड’ में इस बार भारी संख्या में आवेदन आए थे. लेकिन जूरी द्वारा फिल्मों में ऐक्टिंग, ऐडिटिंग, संगीत, मारधाड़, कथापटकथा इत्यादि के आधार पर जिन लोगों का चयन किया गया, उस में सब से ऊपर नाम दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ और आम्रपाली दुबे का रहा, क्योंकि इन दोनों सितारों को ऐक्टिंग की ओवरआल श्रेणी में बैस्ट ऐक्टर का अवार्ड दिया गया.

दिनेशलाल यादव ‘निरहुआ’ को जहां उन की फिल्म ‘माई प्राइड औफ भोजपुरी’ में की गई ऐक्टिंग के लिए बैस्ट ऐक्टर का अवार्ड दिया गया, वहीं आम्रपाली दुबे को फिल्म ‘दाग एगो लांछन’ के लिए बैस्ट ऐक्ट्रैस का अवार्ड दिया गया. रजनीश मिश्र को ‘माई प्राइड औफ भोजपुरी’ के लिए बैस्ट डायरैक्टर और बैस्ट म्यूजिक डायरैक्टर का अवार्ड मिला.

‘5वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड’ में सब से ज्यादा अवार्ड निशांत उज्ज्वल को मिला. उन्हें विभिन्न कैटेगिरी में कुल 3 अवार्ड मिले, जिस में ‘माई प्राइड औफ भोजपुरी’ को बैस्ट फिल्म का, ‘विवाह 3’ के लिए बैस्ट संपूर्ण मनोरंजन प्रदान करने वाली फिल्म और बैस्ट डिस्ट्रीब्यूटर के अवार्ड से नवाजा गया. ‘माई प्राइड औफ भोजपुरी’ के लिए ही जनार्दन पांडेय ‘बबलू पंडित’ को बैस्ट लाइन प्रोड्यूसर, प्यारेलाल यादव ‘कविजी’ को बैस्ट गीतकार, प्रियंका सिंह को बैस्ट सिंगर, दिलीप यादव को बैस्ट ऐक्शन, कानू मुखर्जी को बैस्ट कोरियोग्राफर, ज्योति देशपांडेय को बैस्ट फिल्म निर्माता का अवार्ड दिया गया. ‘दाग एगो लांछन’ फिल्म के लिए जितेंद्र सिंह ‘जीतू’ को बैस्ट ऐडिटर, प्रेमांशु सिंह को बैस्ट डायरैक्टर भोजपुरी फैमिली वैल्यूज मूवी, मनोज कुशवाहा को ‘दाग एगो लांछन’ के लिए बैस्ट स्टोरी, विक्रांत सिंह को बैस्ट सैकंड लीड ‘दाग एगो लांछन’ के लिए प्रदान किया गया. ‘विवाह 3’ के आधार पर महेंद्र सेरला बैस्ट डीओपी रहे, वहीं ऐक्ट्रैस पाखी हेगड़े को महिला प्रधान फिल्मों में विशिष्ट योगदान के लिए अवार्ड दिया गया. saras salil award

सिनेमाघरों में लंबे समय तक चलने वाली भोजपुरी फिल्म ‘हीरा बाबू एमबीबीएस’ के हीरो विमल पांडेय को बैस्ट क्रिटिक ऐक्टर का अवार्ड प्रदान किया गया. इसी फिल्म से अखिलेश पांडेय को बैस्ट डायरैक्टर क्रिटिक अवार्ड से नवाजा गया.

इन लोगों को भी ओवरआल कैटेगिरी में मिला अवार्ड

ओवरआल कैटेगिरी में जिन्हें अवार्ड मिले, उन में संजय पांडेय को ‘संघर्ष 2’ में किए गए अभिनय के लिए बैस्ट विलेन का अवार्ड दिया गया, जबकि ‘सिंह साहब द राइजिंग’ के लिए बैस्ट ऐक्टर इन सपोर्टिंग रोल के लिए सुशील सिंह को अवार्ड प्रदान किया गया. विजय श्रीवस्तव को ‘डार्लिंग’ फिल्म के लिए बैस्ट आर्ट डायरैक्टर का अवार्ड मिला.

इस के अलावा राहुल शर्मा को फिल्म ‘डार्लिंग’ के लिए बैस्ट डैब्यू ऐक्टर, रंजन सिन्हा को बैस्ट पीआरओ, आनंद त्रिपाठी को बैस्ट फिल्म पत्रकार, सीपी भट्ट को फिल्म ‘पड़ोसन’ के लिए बैस्ट कौमेडियन, अनारा गुप्ता को फिल्म ‘सनक’ के लिए बैस्ट आइटम नंबर का अवार्ड, रवि तिवारी को फिल्म ‘आसरा’ के लिए बैस्ट असिस्टैंट डायरैक्टर का अवार्ड दिया गया. इस के अलावा फिल्म ‘दादू आई लव यू’ के लिए आर्यन बाबू को बैस्ट चाइल्ड ऐक्टर मेल, ‘अफसर बिटिया’ फिल्म के लिए आयुषी मिश्रा बैस्ट चाइल्ड ऐक्टर फीमेल, प्रमिला घोष को बैस्ट स्टेज परफौर्मेंस, विजय यादव को बैस्ट फोक डांस ‘फरूआही’ के लिए प्रदान किया गया.

राकेश त्रिपाठी और कन्हैया विश्वकर्मा को ‘अफसर बिटिया’ के लिए बैस्ट डैब्यू डायरैक्टर का अवार्ड दिया गया, जबकि ‘आसरा’ फिल्म से बैस्ट डैब्यू ऐक्ट्रैस का अवार्ड सपना चैहान को, हितेश्वर को बैस्ट भोजपुरी रैपर का अवार्ड प्रदान किया गया.

Winter Special: सर्दियों में चाहती हैं निखरी त्वचा, तो चेहरे पर लगाएं गुड़ से बने ये फेस पैक

Winter Special: सर्दियों में गुड़ खाना सेहत के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है. यह पाचन तंत्र को स्वस्थ रखने में मदद करता है, इसके अलावा गुड़ खाने से इम्युनिटी भी बूस्ट होती है, लेकिन क्या आप जानते हैं स्किन के लिए भी गुड़ बहुत ही लाभकारी  है. आप इससे तरह-तरह के फेस पैक बना सकते हैं. जिनके इस्तेमाल से झुर्रियों से लेकर दाग-धब्बों से छुटकारा पा सकते हैं. आइए जानते हैं, घर पर गुड़ से फेस पैक कैसे बनाएं.

गुड़, शहद और नींबू का पैक

इस फेस पैक को बनाने के लिए एक छोटे बाउल में 1 चम्मच पिसा हुआ गुड़, 1 चम्मच शहद और नींबू का रस मिक्स करें. इन सभी सामग्रियों का स्मूद पेस्ट तैयार कर लें. अब इस पैक को चेहरे पर लगाएं, करीब 15-20 मिनट बाद गुनगुने पानी से धो लें. आप इस फेस पैक का इस्तेमाल हफ्ते में एक-दो बार कर सकते हैं, इससे आपकी त्वचा मुलायम और चमकदार होगी.

गुड़, टमाटर और हल्दी पाउडर

आप इस फेस पैक के इस्तेमाल से मुंहासे और दाग-धब्बों से राहत पा सकते है. इस फेस पैक को बनाने के लिए एक बाउल में हल्दी पाउडर, टमाटर का रस और गुड़ का पाउडर मिक्स करें. इसमें नींबू का रस डालें और इस पेस्ट को चेहरे पर लगाएं, लगभग 10-15 मिनट बाद पानी से धो लें. ग्लोइंग स्किन के लिए आप हफ्ते में 2-3 बार इस पैक का इस्तेमाल जरूर करें.

गुड़, अंगूर और चायपती का फेस पैक

यह फेस पैक एक एंटी एजिंग के रूप में काम करता है. इस पैक को बनाने के लिए एक बाउल में अंगूर का गूदा लें, इसमें काली चाय, एक चुटकी हल्दी और गुड़ पाउडर मिक्स करें. इस पैक को चेहरे पर लगाएं, सूखने के बाद गुनगुने पानी से धो लें.

गुड़ और गुलाब जल

चेहरे पर मौजूद फाइन लाइन्स को कम करना चाहते हैं, तो इस फेस पैक का जरूर इस्तेमाल करें, इसे बनाने के लिए एक छोटे बाउल में गुड़ का पाउडर लें, इसमें गुलाब जल मिक्स कर पेस्ट बना लें, इस पैक को हफ्ते में एक-दो बार लगाएं. आपको इससे फर्क नजर आएगा.

खुश क्यों नहीं आप्रवासी भारतीय

‘वि देश’ शब्द पढ़ते ही आंखों के आगे सुख, आराम, अमीरी, आजादी और खुलेपन आदि को चित्र उभर आते हैं. इस आकर्षक शब्द के मोहजाल में विश्व का कोई एक देश नहीं बल्कि समूचा विश्व और वहां के हर वर्ग के लोग आकर्षित हैं. दूसरा देश कैसा है, वहां की चीजें कैसी हैं, वहां का वातावरण कैसा है, उस देश का इतिहास क्या रहा है और उस ने कितनी आधुनिक प्रगति की है आदि बातों को जानने, देखने के
लिए इनसान अपने मन में एक खिंचाव सा महसूस करता है.

नरेंद्र मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री जास्टिन ट्रूडो का खालिस्तान समर्थक कनाडा नागरिकों को ले कर पैदा हुआ विवाद वहां बसे 14-15 लाख भारतीय मूल के लोगों के लिए एक खतरा है क्योंकि वे अब न तो अपने रिश्तेदारों को बुला पा रहे हैं न भारत जाने का रिस्क ले रहे हैं.

अक्तूबर, 2023 में दोनों देशों ने वीजा देना बंद कर दिया था. अपनों से न मिल पाना दूसरे देश में रह रहे लोगों के लिए एक मानसिक जेल बन जाता है. जीवनसाथी के रूप में विदेशी औरत और पुरुष का आकर्षण कोई आधुनिक समय की देन नहीं है बल्कि यह आदिकाल में भी था. तभी तो किस्सेकहानियों में कहा जाता है कि अमुक देश के राजकुमार ने अमुक देश की राजकुमारी से विवाह रचाया था. वह दूसरे देश को देखने और सम?ाने का कुतूहल ही था जिस ने कोलंबस और वास्कोडिगामा को सागर में उतरने को मजबूर किया. दरअसल, नए की खोज और कुछ नया जानने की कल्पना करना इनसान की प्रकृति है.

क्यों जाते हैं विदेश

यह ‘विदेश’ का मोह अलगअलग लोगों को अलगअलग तरह का होता है. जहां विकसित देशों के लोग चमकदमक से दूर शांत प्रकृति की गोद में कुछ समय गुजारना चाहते हैं वहीं विकासशील देशों के लोग चमकदमक वाले देशों की चकाचौंध को नजदीक से देखना चाहते हैं. गरीब और पिछड़े देशों के लोग अपने आर्थिक स्तर को बढ़ाने के लिए विदेश जाते हैं.

इसे सीधेसीधे शब्दों में कहें तो अमेरिका, इंगलैंड, कनाडा और फ्रांस के लोग वातावरण व स्थान बदली के लिए विश्वपर्यटन पर निकलते हैं तो चीन, जापान व दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों के लोग यूरोप व अमेरिका के देशों को देखने के लिए जाते हैं जो वहां कुछ सप्ताह घूम कर वहां की ढेरों यादें और आनंद समेटे वापस घर लौट आते हैं.

गरीब देशों के लोग अपने आसपास की परिस्थितियों से भाग कर रोजीरोटी कमाने के लिए विदेश का रास्ता अपनाते हैं और वहीं बस जाते हैं. ऐसे लोगों को आप्रवासी कहा जाता है. कुछ लोग इन्हें रिफ्यूजी भी कहते हैं. इन में कुछ ऐसे लोगों की भी संख्या होती है जो समाज के बंधनों से घबरा कर विदेश भागते हैं.

भारत से विदेश गए लोगों का मुख्य ध्येय विदेशों में रह कर आर्थिक रूप से विकसित होना है. कुछ समय पहले एक सर्वे में यह भी पता चला है कि आप्रवासी भारतीयों को यदि अपने देश में वे सारी सुविधाएं मसलन अच्छी नौकरी, अच्छी डाक्टरी सुविधा, बच्चों के लिए उच्च शिक्षा, साफ शुद्ध खानेपीने की वस्तुएं मिलें तो ये लोग अपने देश में ही रहना ज्यादा पसंद करेंगे.

एक सच यह भी इसी के साथ एक सच यह भी है कि जब आज समूचा विश्व सिमट कर एक शहर के रूप में बदल गया है तो क्यों न ऐसे लोग उन का लाभ उठाएं जिन में संकल्प है, लगन, साधना करने की क्षमता है और वे महत्त्वाकांक्षी भी हैं पर भारतीय तो अपने देश में रह कर ‘विदेश’ की कल्पना सोनेचांदी के ढेर से या अति आधुनिक वस्तुओं से सजा जीवनस्तर से करता है.

दरअसल, विदेशी लड्डू उसे बड़ा मीठा और खत्म न होने वाला लगता है पर जो इस लड्डू का स्वाद ले रहा है उस के दिल से पूछिए कि उस लड्डू तक पहुंचने के लिए उसे क्याक्या करना पड़ा. कितने ऐसे लोगों को मैं ने देखा है कि घर को सही ढंग से चलाने और बच्चों को पढ़ाने के लिए उन्हें अपनी तमाम व्यक्तिगत खुशी को दांव पर लगाना पड़ा है.

आज भारतीय आप्रवासी विश्व के कोनेकोने में हैं. मेहनतकश मजदूर के रूप में खाड़ी के
देशों में जहां आप्रवासी भारतीयों की भरमार है वहीं उच्च शिक्षिति लोगों ने इंगलैंड, अमेरिका और कनाडा में अपनी अच्छीखांसा पहचान बना रखी है.

पैसा कमाना मुख्य ध्येय

सालों से यह सिलसिला चल रहा है कि जो छात्र अमेरिका पढ़ने जाते हैं, उच्च शिक्षा पाने के बाद वे वहीं के हो कर रह जाते हैं. आज इंगलैंड और अमेरिका में तो कुछ शहर ऐसे हैं जिन्हें छोटा भारत के रूप में देखा जाता है.

कुछ अपवादों को छोड़ दें तो आम भारतीय विदेशों में जाने से पहले यही सोचता है कि वह पैसा कमा कर अपने देश वापस आ जाएगा पर जब वहां जाने के बाद तमाम स्थानीय परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए वह अपने पैर जमा लेता है तब सोचता है कि जमेजमाए धंधे को छोड़ कर अब क्यों जाए. इन्हीं में ऐसे लोग जो नियम कानून, भाषा, वातावरण से घबरा जाते हैं वापस भी आ जाते हैं. पर एक बात तो जरूरी है कि
आप किसी भी देश में रोजगार की नीयत से जाएं, वहां के बारे में संपूर्ण जानकारी अवश्य रखें.

यदि भारतीय अंगरेजी भाषा वाले देश में आते हैं तो उन के लिए काम व परिस्थितियां दोनों आसान हो जातीं लेकिन विश्व में कुछ देश ऐसे भी हैं जहां अंगरेजी में कामकाज नहीं होता क्योंकि वे अपनी भाषा में इतने प्रगतिशील हैं कि उसी में सब काम करना चाहते हैं. ऐसे देशों में जाने से पहले वहां की भाषा का अच्छी तरह ज्ञान होना चाहिए. आप चाहें कि वहां पहुंच कर भाषा सीख कर सफलता पा लेंगे तो यह सोच गलत है
और सफलता पाने के लिए भारी संघर्ष करना पड़ सकता है.

भारत में वह बात नहीं विदेशों में हर शिक्षित को उस की शिक्षा के अनुसार काम नहीं मिलता. ऐसे आप्रवासी भारतीयों की हालत अलगअलग देशों में अलगअलग तरह की होती है. कई लोग तो नए देश और नए वातावरण में तालमेल न बैठा पाने के कारण उदास, चिड़चिड़े हो जाते हैं, कुछ खुद को कोसते हुए
देखे जा सकते हैं तो कुछ गलत जगह पर गलत बात करते हैं, उन्हें खुद ही सम?ा में नहीं आता कि ऐसे समय में क्या करना चाहिए.

इंगलैंड में आप्रवासियों और उन के बच्चों की स्थिति क्या है यह अब किसी से छिपा नहीं है. रंगभेद के शिकार बच्चे अपने भविष्य के लिए मातापिता को दोषी मानते हैं कि वे क्यों इंगलैंड आए थे. हां, अमेरिका और कनाडा का हाल इंगलैंड से बेहतर है जहां रंगभेद नहीं है और स्थानीय लोग खुले विचारों वाले और उच्च शिक्षित हैं.

यद्यपि मैं यह नहीं कह सकता कि वहां कर आप्रवासी सुखी है. इस धनी देश में भी विशाल मध्यवर्ग है, जो भारत की तरह ही चक्की के दो पाटों के बीच फंस कर गेहूं की तरह पिस रहा है. यहां के लोगों में जो खास बात देखने को मिलती है वह दिखावा है. वे बैंक से मोटी रकम उधार ले कर आलिशान घर, मोटर और तमाम दूसरी शानशौकत की चीजें बटोर तो लेते हैं, अपने को इतने कर्ज में डुबो लेते हैं कि मेहनत से
कमाई पूंजी का एक बड़ा हिस्सा कर्ज चुकाने में ही खर्च करना पड़ता है. पीड़ा यह है कि इस दिखावे की जिंदगी के लिए उन्हें लगातार अधिक काम करना पड़ता है.

अब तो उन के पास इतना भी समय नहीं है कि वे अपने बच्चों की देखभाल कर सकें. लिहाजा, भारत से अपने माता या पिता को बुला कर उन पर बच्चों की जिम्मेदारी सौंप कर कुछ निश्चिंत होना चाहते हैं. चूंकि उन की आर्थिक हैसियत ऐसी नहीं है कि वे नौकरानी रख सकें. अत: अपने बुजुर्गों से वे यह उम्मीद भी रखते हैं कि वे घर का सारा काम जैसे खाना बनाना, बाजार जा कर सब्जी लाना, बच्चो को स्कूल बस तक
छोड़ना और लाना आदि सभी काम करें.

रंगभेद व असमानता का सामना मातापिता को यह कह कर बुलाया जाता है कि आप यहां आएं और आराम करें पर जब धीरेधीरे उन पर जिम्मेदारियां थोपी जाती हैं तो वे अंदर ही अंदर घुटने लगते हैं और फिर जल्द ही इस फिराक में लग जाते हैं कि कैसे वापस भारत जाया जाए.

आप्रवासी भारतीयों के जवान बच्चे कभी घर तो कभी बाहर के माहौल के बीच टकराते रहते हैं. परंपरागत जीवन का बहिष्कार करने पर उन्हें बिगड़ैल और उद्दंड कहा जाता है. यदि बच्चे अपने संस्कारों के साथ जुड़ कर चलते हैं तो उन्हें आजाद खयाल अपने दोस्तों के बीच नीचा देखना पड़ता है. कई बच्चे आज्ञाकारी हो कर अपने अरमानों का खून कर देते हैं और कई अंतर्मुखी हो जाते हैं. घर का माहौल संघर्षमय है तो
कुछ बच्चे दूसरों के मुकाबले जीवन में संभावनाओं को न पा कर उदास हो जाते हैं.

आप्रवासियों के बच्चे शिक्षा ले कर काम की तलाश में निकलते हैं, यहां तक तो ठीक है पर जब उन्हें काम की तलाश में रंगभेद व असमानता का सामना करना पड़ता है तब वे तिलमिला उठते हैं क्योंकि वे अपने को किसी भी तरह आप्रवासी मानने को तैयार नहीं होते. वे अपने को उस देश का नागरिक मानते हैं
और इस से उन के अंदर जो विद्रोह पनपता है वह उन के बाकी के समूचे जीवन को प्रभावित करता है.

कहीं आप भी तो नहीं है तनाव के शिकार, इन आसान तरीकों से पाएं टेंशन से राहत

इन दिनों लोगो का  स्ट्रेस लेवल इस कदर बढ़ रहा है कि पीड़ित ख़ुदकुशी जैसा कदम उठाने से नहीं कतराता है.ऐसा ही एक मामला हाल ही में नोएडा के सेक्टर 142 क्षेत्र में सामने आया.आईटी कंपनी में काम करने वाली एक युवती जो कि उम्र में महज 22 साल की ही थी  और कंपनी में वेबसाइट बनाने का काम करती थी.उसने ऑफिस में ही फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. उसका शव उसकी  केबिन में ही लटका हुआ मिला.आजकल आए दिन इस तरह के मामले देखने को मिल  जाते हैं. यहां तक कि अर्ली टींस भी बात बात पर टेंशन जैसे शब्दों को अपनी आम बोली चाली में प्रयोग करते नहीं थकते. जिससे उनमें  भी टेंशन यानि तनाव बढ़ने लगता है. अधिकतर हम सभी जाने अनजाने में जाने कितनी बार इस वाक्य को दोहराते हैं कि ‘मुझे टेंशन हो रही है’ और इस बात को खुद पर इतना हावी कर लेते हैं कि नार्मल बात को भी हम एक चुनौती  की तरह  लेते हैं और अपने आप को तनावग्रस्त कर लेते हैं नतीजतन हम धीरे धीरे मानसिक रूप से कमजोर महसूस करने लगते हैं इसके लिए जरूरी अपने जीवन में कुछ आदतों में बदलाव करना. तो चलिए जानते हैं .

तनाव का जिक्र ना करें

आज कल ऐसा हर एक पीढ़ी के लोगो के साथ हो रहा है चाहे युवा हो या बूढ़ा पर बड़ों की बातों का असर बहुत जल्दी पड़ता है. हमारी सोच ही  हमारा जीवन जीने का तरीका बनती जाती है किसी भी बात को नेगेटिव विचार के साथ अंत ना करें बल्कि पॉजिटिव  सोच के साथ अंत करें.और जो बातें आपको तनाव पूर्ण बनाती हो उन से परहेज करें.

मन का काम जरूर करें

यदि आपको लगता है कि आप तनाव में हैं और आपका ध्यान ऐसी बातों से हट नहीं रहा है तो आप खुद को अपने पसंदिता काम में व्यस्त रखें. खुद को क्रिएटिव कामों में व्यस्त रखें.इससे दिमाग रिलैक्स होता है  फील गुड फैक्टर आता है. साथ ही अपना स्क्रीन टाइम कम करें, मोबइल का प्रयोग कम  करें .

स्वछता है जरूरी

जरूरी है कि हम शरारिक रूप से ही नहीं मानसिक रूप से भी स्वस्थ रहें. जिस तरह हमें अपने आस पास फैला हुआ कचरा पसंद नहीं होता उसी प्रकार हमें अपने दिमाग़ में कड़वी या कष्ट देने वाली बातों को इकठे नहीं होने देना चाहिए. अपनी परेशानी को किसी के साथ  साझा अवश्य करें इससे मन का बोझ  हल्का होता है और दिमाग़ भी.

एक्सरसाइज करें

एक्सरसाइज करना वैसे तो हर किसी के लिए बहतर ही होता है लेकिन यदि कोई तनावग्रस्त या डिप्रेशन में है तो रिलैक्स करना और थोड़ी एक्सरसाइज उसके लिए सबसे बेहतर है.

किताबें पढ़े

आजकल सभी डिजिटल मीडिया को अधिक तवज्जो देते हैं और ऑनलाइन अपने पसंदीदा टॉपिक या बुक  भी पढ़ लेते है देखा जाए तो यह गलत नहीं है लेकिन यदि हम किताबें पढ़ते है तो  उनसे एक जुड़ाव बनता है   जिससे दिमाग़ शांत और स्थिर होता है इसलिए अपनी पसंद की  किताबें पढ़े जिससे आप खुद को रिलैक्स महसूस कर पाएंगे. यह रीडिंग थेरेपी भी कहलाती है. हर समय मोबाइल के साथ बुक्स भी पास रखें.

संगीत सुने

संगीत सुनना एक बहुत अच्छी थेरेपी है इससे  आपके शरीर में कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) स्तर कम होते है. इसीलिए जब भी आप खुद तनाव ग्रस्त महसूस करें तो संगीत सुने या गाने गुनगुनाएं.यह  हमें तनाव मुक्त बनता है.

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