मुझे पसीना बहुत आता है इससे छुटकारा पाने के लिए मेरी मदद कीजिए

सवाल

मुझे बहुत पसीना आता है और उस से बदबू भी बहुत आती है. इस की वजह कोई बीमारी तो नहीं और मुझे इस पसीने से कैसे छुटकारा मिले इस बारे में भी प्लीज मेरी हैल्प कीजिए?

जवाब

वैसे पसीना आना कोई बीमारी नहीं. अगर हम ओवरवेट हैं या हम बहुत साइक्लिंग या कुछ ज्यादा ऐक्सरसाइज करते हैं या फिर मौसम में बहुत ह्यूमिडिटी है तो भी पसीना आना बहुत ही नौर्मल है. मगर अगर आप के पसीने से कोई खास तरह की बदबू जैसे उस में से नमकीन मीठी इस तरह की फीलिंग आती है या आप का पसीना बहुत स्टिकी है तो यह बताता है कि हो सकता है आप को कोई बीमारी हो जैसेकि आप को लिवर डिजीज है या फिर आप की फिश लाइक्स स्मैल आती है तो आप को मैटाबोलिक डिसऔर्डर भी हो सकता है. अत: किसी फिजिशियन से कंसल्ट करें. लेकिन घर में इस बदबू से छुटकारा पाने के लिए आप रैगुलरली नहाएं. नहाने से आप के शरीर के ऊपर से पसीना तो हट जाता है लेकिन कोई अगर इन्फैक्शन होने का चांस हो तो वह भी खत्म हो जाता है.

दूसरा ऐसे कपड़े पहनें जो पसीने को सोख लें. कभीकभी हम नायलौन के कपड़े पहनते हैं और वे पसीना सोख नहीं पाएं तो पसीना बहता जाता है और ज्यादा पसीने से इन्फैक्शन होने का खतरा हो जाता है. जब बहुत गरमी हो तो कोशिश करें कि कूल और फ्रैश ऐन्वायरन्मैंट में रहें जैसेकि एसी में रहें तो भी पसीना कम आएगा. अपने शरीर पर चंदन और किसी ऐरोमैटिक तेल डाल कर एक पैक बना सकते हैं और नहाने के बाद उस पैक को लगा लें और फिर कुछ देर बाद धो लें. इस से भी पसीने की बदबू से आप को छुटकारा मिलेगा. अपने साथ बहुत सारे टिशू पेपर ले कर जाएं और उन से अपने फेस को हमेशा पोंछते रहें. खूब सारा पानी पीएं ताकि पसीने से आने वाले पानी की कमी को पूरा किया जा सके. गरमियों में फिश, ओनियन, गार्लिक या स्ट्रौंग स्मैल वाले स्पाइसेज को अवौइड करें या कम कर दें.

समस्याओं के समाधान ऐल्प्स ब्यूटी क्लीनिक की फाउंडर, डाइरैक्टर डा. भारती तनेजा द्वारा

पाठक अपनी समस्याएं इस पते पर भेजें : गृहशोभा, ई-8, रानी झांसी मार्ग, नई दिल्ली-110055.

स्रूस्, व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या 9650966493 पर भेजें.

 

सच्चाई: क्या सपना सचिन की शादी के लिए घरवलों को राजी कर पाई- भाग 1

पड़ोस में आते ही अशोक दंपती ने 9 वर्षीय सपना को अपने 5 वर्षीय बेटे सचिन की दीदी बना दिया था.

‘‘तुम सचिन की बड़ी दीदी हो. इसलिए तुम्हीं इस की आसपास के बच्चों से दोस्ती कराना और स्कूल में भी इस का ध्यान रखा करना.’’

सपना को भी गोलमटोल सचिन अच्छा लगा था. उस की मम्मी तो यह कह कर कि गिरा देगी, छोटे भाई को गोद में भी नहीं उठाने देती थीं.

समय बीतता रहा. दोनों परिवारों में और बच्चे भी आ गए. मगर सपना और सचिन का स्नेह एकदूसरे के प्रति वैसा ही रहा. सचिन इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए मणिपाल चला गया. सपना को अपने ही शहर में मैडिकल कालेज में दाखिला मिल गया था. फिर एक सहपाठी से शादी के बाद वह स्थानीय अस्पताल में काम करने लगी थी. हालांकि सचिन के पापा का वहां से तबादला हो चुका था. फिर भी वह मौका मिलते ही सपना से मिलने आ जाता था. सऊदी अरब में नौकरी पर जाने के बाद भी उस ने फोन और ईमेल द्वारा संपर्क बनाए रखा. इसी बीच सपना और उस के पति सलिल को भी विदेश जाने का मौका मिल गया. जब वे लौट कर आए तो सचिन भी सऊदी अरब से लौट कर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी कर रहा था.

‘‘बहुत दिन लगा दिए लौटने में दीदी? मैं तो यहां इस आस से आया था कि यहां आप अपनी मिल जाएंगी. मम्मीपापा तो जबलपुर में ही बस गए हैं और आप भी यहां से चली गईं. इतने साल सऊदी अरब में अकेला रहा और फिर यहां भी कोई अपना नहीं. बेजार हो गया हूं अकेलेपन से,’’ सचिन ने शिकायत की.

‘‘कुंआरों की तो साथिन ही बेजारी है साले साहब,’’ सलिल हंसा, ‘‘ढलती जवानी में अकेलेपन का स्थायी इलाज शादी है.’’

‘‘सलिल का कहना ठीक है सचिन. तूने अब तक शादी क्यों नहीं की?’’ सपना ने पूछा.

‘‘सऊदी अरब में और फिर यहां अकेले रहते हुए शादी कैसे करता दीदी? खैर, अब आप आ गई हैं तो लगता है शादी हो ही जाएगी.’’

‘‘लगने वाली क्या बात है, शादी तो अब होनी ही चाहिए… और यहां अकेले का क्या मतलब हुआ? शादी जबलपुर में करवा कर यहां आ कर रिसैप्शन दे देता किसी होटल में.’’

‘‘जबलपुर वाले मेरी उम्र की वजह से न अपनी पसंद का रिश्ता ढूंढ़ पा रहे हैं और न ही मेरी पसंद को पसंद कर रहे हैं,’’ सचिन ने हताश स्वर में कहा, ‘‘अब आप सम झा सको तो मम्मीपापा को सम झाओ या फिर स्वयं ही बड़ी बहन की तरह यह जिम्मेदारी निभा दो.’’

‘‘मगर चाचीचाचाजी को ऐतराज क्यों है? तेरी पसंद विजातीय या पहले से शादीशुदा बालबच्चों वाली है?’’ सपना ने पूछा.

‘‘नहीं दीदी, स्वजातीय और अविवाहित है और उसे भविष्य में भी संतान नहीं चाहिए. यही बात मम्मीपापा को मंजूर नहीं है.’’

‘‘मगर उसे संतान क्यों नहीं चाहिए और अभी तक वह अविवाहित क्यों है?’’ सपना ने शंकित स्वर में पूछा.

‘‘क्योंकि सिमरन इकलौती संतान है. उस ने पढ़ाई पूरी की ही थी कि पिता को कैंसर हो गया और फिर मां को लकवा. बहुत इलाज के बाद भी दोनों को ही बचा नहीं सकी. मेरे साथ ही पढ़ती थी मणिपाल में और अब काम भी करती है. मु झ से शादी तो करना चाहती है, लेकिन अपनी संतान न होने वाली शर्त के साथ.’’

‘‘मगर उस की यह शर्त या जिद क्यों है?’’

‘‘यह मैं ने नहीं पूछा न पूछूंगा. वह बताना तो चाहती थी, मगर मु झे उस के अतीत में कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं तो उसे सुखद भविष्य देना चाहता हूं. उस ने मुझे बताया था कि मातापिता के इलाज के लिए पैसा कमाने के लिए उस ने बहुत मेहनत की, लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया, जिस के लिए कभी किसी से या स्वयं से लज्जित होना पड़े. शर्त की कोई अनैतिक वजह नहीं है और वैसे भी दीदी प्यार का यह मतलब यह तो नहीं है कि उस में आप की प्राइवेसी ही न रहे? मेरे बच्चे होने न होने से मम्मीपापा को क्या फर्क पड़ता है? जतिन और श्रेया ने बना तो दिया है उन्हें दादादादी और नानानानी. फूलफल तो रही है उन की वंशबेल,’’ फिर कुछ हिचकते हुए बोला, ‘‘और फिर गोद लेने या सैरोगेसी का विकल्प तो है ही.’’

‘‘इस विषय में बात की सिमरन से?’’ सलिल ने पूछा.

‘‘उसी ने यह सु झाव दिया था कि अगर घर वालों को तुम्हारा ही बच्चा चाहिए तो सैरोगेसी द्वारा दिलवा दो, मु झे ऐतराज नहीं होगा. इस के बावजूद मम्मीपापा नहीं मान रहे. आप कुछ करिए न,’’ सचिन ने कहा, ‘‘आप जानती हैं दीदी, प्यार अंधा होता है और खासकर बड़ी उम्र का प्यार पहला ही नहीं अंतिम भी होता है.’’

‘‘सिमरन का भी पहला प्यार ही है?’’ सपना ने पूछा.

सचिन ने सहमति में सिर हिलाया, ‘‘हां दीदी, पसंद तो हम एकदूसरे को पहली नजर से ही करने लगे थे पर संयम और शालीनता से. सोचा था पढ़ाई खत्म करने के बाद सब को बताएंगे, लेकिन उस से पहले ही उस के पापा बीमार हो गए और सिमरन ने मु झ से संपर्क तक रखने से इनकार कर दिया. मगर यहां रहते हुए तो यह मुमकिन नहीं था. अत: मैं सऊदी अरब चला गया. एक दोस्त से सिमरन के मातापिता के न रहने की खबर सुन कर उसी की कंपनी में नौकरी लगने के बाद ही वापस आया हूं.’’

‘‘ऐसी बात है तो फिर तो तुम्हारी मदद करनी ही होगी साले साहब. जब तक अपना नर्सिंगहोम नहीं खुलता तब तक तुम्हारे पास समय है सपना. उस समय का सदुपयोग तुम सचिन की शादी करवाने में करो,’’ सलिल ने कहा.

‘‘ठीक है, आज फोन पर बात करूंगी चाचीजी से और जरूरत पड़ी तो जबलपुर भी चली जाऊंगी, लेकिन उस से पहले सचिन मु झे सिमरन से तो मिलवा,’’ सपना ने कहा.

‘‘आज तो देर हो गई है, कल ले चलूंगा आप को उस के घर. मगर उस से पहले आप मम्मी से बात कर लेना,’’ कह कर सचिन चला गया. सपना ने अशोक दंपती को फोन किया.

‘‘कमाल है सपना, तु झे डाक्टर हो कर भी इस रिश्ते से ऐतराज नहीं है?  तु झे नहीं लगता ऐसी शर्त रखने वाली लड़की जरूर किसी मानसिक या शारीरिक रोग से ग्रस्त होगी?’’ चाची के इस प्रश्न से सपना सकते में आ गई.

‘‘हो सकता है चाची…कल मैं उस से मिल कर पता लगाने की कोशिश करती हूं,’’ उस ने खिसियाए स्वर में कह कर फोन रख दिया.

5 ब्राइडल मेकअप ट्रैंड

समय के साथ मेकअप ट्रैंड में काफी तरह के बदलाव हुए हैं, फिर चाहे वह साधारण मेकअप हो, रैंप मेकअप या फिर ब्राइडल मेकअप. आजकल ब्राइडल मेकअप का जो ट्रैंड है उस में रंग को निखारने से ज्यादा नैननक्श को हाईलाइट किया जा रहा है.

मेकअप ट्रैंड

मेकअप में भी कई तरह के मेकअप होते हैं, लेकिन ब्राइडल मेकअप में सिमर वाला या ग्लौसी मेकअप ज्यादा फबता है. इस बारे में ब्यूटी ऐक्सपर्ट डा. वीना का कहना है, ‘‘किसी भी मेकअप का अच्छा परिणाम मेकअप करने के तरीके पर निर्भर करता है. अधिकतर ब्राइडल मेकअप की शुरुआत बेस से करती हैं, लेकिन यदि आई मेकअप से इस की शुरुआत की जाए तो अच्छी फिनिशिंग आती है.

ब्राइडल आई मेकअप में आजकल कैंची आई मेकअप का काफी ट्रैंड है. आंखों के मेकअप की शुरुआत आईबेस से करनी चाहिए ताकि मेकअप करने के बाद आंखों पर रेखाएं न पड़ें. आईबेस बाजार में कुछ ही ब्रैंडों में मौजूद है.

‘‘आईबेस के बाद आइब्रो के नीचे वाले हिस्से को लाइट कलर के आईशैडो से हाईलाइट करना चाहिए. कलर का चुनाव ड्रैस में मौजूद रंगों के हिसाब से करें. इस के बाद आईलिड पर डार्क कलर का आईशैडो और कलर पैसिंल से आईलाइनर लगाएं. फिर हाईलाइटिंग के लिए इस्तेमाल किए गए कलर को लाइनर के ऊपर भी लगाएं, थोड़ा सा आईलिड के बीच वाले हिस्से में नैचुरल कलर का आईशैडो लगा कर उसे भी मर्ज करें. फिर लाइनर के ऊपर ब्लैक आईलाइनर लगा कर उसे डार्क करें. आंखों के नीचे के हिस्से में काजल लगाने के बाद उस के ऊपर कलरफुल पैंसिल भी चलाएं और अंत में मसकारा लगाएं.

‘‘आई मेकअप के बाद आंखों को छोड़ कर बाकी पूरे चेहरे को क्लींजिंग मिल्क से साफ करें. फिर टोनर और मौइस्चराइजर लगाने के बाद बेस लगाएं. बेस को ब्रश की सहायता से लगाना चाहिए. इस से रेखाएं नहीं पड़ती हैं. चेहरे और गरदन के रंग में फर्क होने पर स्किन टोन के हिसाब से अलगअलग बेस कलर का इस्तेमाल करना चाहिए.

उस के बाद आवश्यक जगहों में कंसीलर लगाना चाहिए. नैननक्श को शेप देने के लिए भी कंसीलर का इस्तेमाल करना चाहिए. उस के बाद आवश्यक जगहों में कंसीलर लगाना चाहिए. इस के बाद कौंपैक्ट लगाएं. उसे गीला कर के भी लगाया जा सकता है.

‘‘ब्राइड्स को मैट लिपिस्टक लगाने की जगह शाइनिंग वाली लिपस्टिक लगाएं. केक को रूई के माध्यम से चेहरे पर लगाएं. अब स्पंज से उसे पूरे चेहरे पर अच्छे से मिलाएं. लिप मेकअप के लिए लिप लाइनर से होंठों के ऊपर आउटलाइन बनाएं और अंदर शाइनिंग वाली लिपस्टिक लगाएं. लिपस्टिक के बाद गालों पर ब्लश लगा कर फाइनल टच दें.

‘‘बिंदियों में आजकल स्टर्ड और गोल डिजाइनर बिंदियां ज्यादा फैशन में हैं और ये अच्छी भी लगती हैं. चेहरा चौड़ा है तो आप गोल की जगह लंबी डिजाइनर बिंदी लगाएं. आईब्रो के ऊपर बिंदी न लगाएं. आजकल यह फैशन में नहीं है.

हेयरस्टाइल: ब्राइडल मेकअप तभी पूरा होता है जब उस के साथ सही हेयरस्टाइल हो. दुलहन के ऊपर हाई बन ज्यादा अच्छा लगता है. लेकिन अगर समय की कमी या बाल छोटे हैं तो आप राउंड फ्लौवर बन भी बना सकती हैं. इस के लिए आगे के बालों में पफ बनाया जाता है. पीछे के बालों में पोनी बना लें और उस के ऊपर नकली बाल लगा कर बैंड के साथ बांध दें.

फिर बालों को 2 भागों में बांट कर ढीलीढीली चोटी बना लें, नीचे 2 इंच बाल छोड़ दें. इस के बाद बालों के एक सिरे को पकड़ कर दूसरे सिरे को ऊपर की ओर ले जाएं. उस से एक बंच तैयार हो जाएगा. उसे राउंड शेप में फोल्ड कर के चारों और अच्छे से पिनअप कर दें. बचे हुए बालों को बीच में एस शेप में फोल्ड करते हुए पिनअप करें.

मेकअप और हेयरस्टाइल कंप्लीट होने के बाद ज्वैलरी पहनें. अच्छा रहेगा यदि पल्लू को जूड़े के ऊपर पिनअप करें.

ग्लौसी पाउट: आजकल ब्राइड्स लिप्स को नैचुरल ग्लौसी लुक देना ज्यादा पसंदकर रही हैं. पीच, पिंक और रैड कलर ग्लौसी लुक के लिए पहली पसंद बने हुए हैं. मेकअप आर्टिस्ट ग्लौसी पाउट लुक इसलिए भी दे रही हैं ताकि होंठों की नमी लंबे समय तक बरकरार रहे.

स्किन बेस मेकअप: शाइन फ्री और पाउडरी मेकअप अब उतना पसंद नहीं किया जाता. इन की जगह अब ग्लोई, क्रीमी मेकअप ने ले ली. ऐसा मेकअप पसंद किया जा रहा है जो स्किन टोन से मैच करता हो. इस में खास बात यह है कि फाउंडेशन मौइस्चराइजिंग होना चाहिए.

मिनिमलिस्टिक लुक: कुछ ब्राइड्स को मिनिमलिस्टिक लुक पसंद आ रहा है. इस में हैवी मेकअप, भारी ज्वैलरी आदि से ब्राइड्स बचती हैं.

सौ बातों की एक बात यह है कि लुक चाहे जो अपना लें लेकिन यदि आप ने अपनी फिटनैस पर काम नहीं किया है तो इन लुक्स का पूरा फायदा नहीं मिल पाएगा.

सही पकड़े हैं: भाग 1- कामवाली रत्ना पर क्यों सुशीला की आंखें लगी थीं

‘‘अदिति, हम कह रहे थे न, तेरी मेड ठीक नहीं लगती, थोड़ी नजर रखा कर उस पर, मगर तू है एकदम बेपरवाह. किसी दिन हाथ की बड़ी सफाई दिखा दी उस ने तो बड़ा पछताएगी तू. हम सही पकड़े हैं.’’ 4 दिनों से बेटी के घर आईं सुशीला उसे दस बार सचेत कर चुकी थीं. ‘‘अरे मां, रिलैक्स, आप फिर शुरू हो गईं, सही पकड़े हैं. कुछ नहीं कोई ले जाता, ले भी जाएगा तो ऐसा क्या है, खानेपीने का सामान ही तो है. हर वक्त उस पर नजर रखना अपना टाइम बरबाद करना है. आप भी न, अच्छा, मैं जाती हूं. 1 घंटा लग जाएगा मुझे. प्लीज, रत्ना (मेड) को अपना काम करने देना. वह चाय बना लाए तो मम्मीजीपापाजी के साथ बैठ कर आराम से पीना. आज छुट्टी है, बंटू, मिंकू और आप के दामाद तरुण की भी. वे देर तक सोते हैं, जगाना नहीं.’’

अदिति चली गई तो सुशीला ने गोलगोल आंखें नचाईं, ‘हमें क्या करना है जैसी भी आदत डालो, हम तो कुछ भी सब के भले के लिए ही कहते हैं.’ मेड थोड़ी देर बाद चाय टेबल पर रख गई. सुशीला भी अदिति के सासससुर तारा और तेजप्रकाश संग बैठ चाय की चुस्कियां लेने लगीं, पर शंकित आंखें मेड की गतिविधियों पर ही चिपकी थीं.

‘‘आजकल लड़कियां काम के लिए बाहर क्या जाने लगीं, घर के नौकरनौकरानी कब, क्या कर डालें, कुछ कहा नहीं जा सकता. हमें तो जरा भी विश्वास नहीं होता इन पर. निगाह न रखो तो चालू काम कर के चलते बनते हैं,’’ सुशीला बोल पड़ीं. ‘‘ठीक कह रही हैं समधनजी. लेकिन मैं पैरों से मजबूर हूं. क्या करूं, पीछेपीछे लग कर काम नहीं करा पाती और इन्हें तो अपने अखबार पढ़नेसुनने से ही फुरसत नहीं,’’ तारा ने पेपर में आंखें गड़ाए तेजप्रकाश की ओर मुसकराते हुए इशारा किया. तेजप्रकाश ने पेपर और चश्मा हटा कर एक ओर रख दिया और सुशीला की ओर रखे बिस्कुट अपनी चाय में डुबोडुबो कर खाने लगे.

‘‘आप तो बस भाईसाहब. भाभीजी तो पांव से परेशान हैं पर आप को तो देखना चाहिए. मगर आप तो बैठे रहते हो जैसे कोई घर का बंदा अंदर काम कर रहा हो. हम आप को एकदम सही पकड़े हैं,’’ सुशीला कुछ उलाहना के अंदाज में बोलीं. उन की आंखें चकरपकर चारों ओर रत्ना को आतेजाते देख रही थीं. रत्ना कपप्लेट ले जा चुकी थी. ‘काफी देर हो चुकी, पता नहीं क्या कर रही होगी,’ उन्हें और बैठना बरदाश्त नहीं हुआ. वे उठ खड़ी हुईं और उसे किचन में पोंछा लगाते देख यहांवहां दिखादिखा कर साफ करवाने लगीं. ‘‘ढंग से किया कर न, कोई देखता नहीं तो क्या मतलब है, पैसे तो पूरे ही लेती हो न?’’ उन का बारबार इस तरह से बोलना रत्ना को कुछ अच्छा नहीं लगता.

‘‘और कोई तो ऐसे नहीं बोलता इस घर में, अम्माजी आप तो…’’ रत्ना हाथ जोड़ कर माथे से लगा लिया करती. कभी अकेले में अन्य सदस्यों से शिकायत भी करती. 10 बज गए, मिंकी और बंटू का दूध और सब का नाश्ता बना मेज पर रख कर रत्ना चली गई तो सुशीला ढक्कन खोलखोल कर सब चैक करने लगीं.

‘‘अरे, दूध तो बिलकुल छान कर रख दिया पगलेट ने, जरा भी मलाई नहीं डाली बच्चों के लिए. ऐसे भला बढ़ेंगे बच्चे.’’ वे दोनों गिलास उठा कर किचन में चली आईं. दूध के भगौने में तो बिलकुल भी मलाई नहीं थी. ‘जरूर अपने बच्चों के लिए चुरा कर ले जाती होगी, कोई देखने वाला भी तो नहीं, बच्चों का क्या, वैसे ही पी जाते होंगे,’ सुशीला मन ही मन बोलीं. तभी प्लेटफौर्म पर वाटर डिस्पोजर की आड़ में से झांक रहे मलाई के कटोरे पर उन की नजर पड़ी. वे भुनभुनाईं, ‘सही पकड़े हैं, महारानीजी हड़बड़ी में ले जाना भूल गई.’ उन्होंने गोलगोल आंखें घुमाईं और एक चम्मच मलाई मुंह में डाल कर बाकी मलाई दूध के गिलासों में बांटने जा रही थीं कि तेजप्रकाश आ पहुंचे, कटोरा हाथ में लेते हुए बोले, ‘‘अरे, क्या करने जा रही थीं बहनजी. बच्चे तो मलाई डला दूध मुंह भी नहीं लगाएंगे, थूथू करते रहेंगे. मौडर्न बच्चे हैं.’’

‘‘तभी तो रत्ना की ऐश है. मलाई का कटोरा छिपा कर अपने घर ले जा रही थी, पर भूल गई. हम सही पकड़े हैं.’’ ‘‘अरे, नहीं बहनजी, मैं ने ही उस से कह रखा है, हफ्तेभर बाद तारा सारी इकट्ठी मलाई का घी बनाती है. घर के घी का स्वाद ही और है. आप तारा के पास बैठिए, मैं इसे डब्बे में डाल कर आता हूं.’’

‘‘यह भी ठीक है,’’ वे बालकनी में तारा के पास आ बैठीं. ‘‘हम से तो यह खटराग कभी न हुआ.’’

‘‘कैसा खटराग?’’ ‘‘यह देशी घी बनाने का खटराग, भाईसाहब बता रहे हैं, हफ्ते में एक बार आप बना लेती हैं.’’

‘‘हां, इस बार ज्यादा दिन हो गए. दूध वाला अब सही दूध नहीं ला रहा, इतनी मलाई ही नहीं आती.’’ ‘‘अरे नहीं, आज भी मलाई से तो पूरा कटोरा भरा हुआ था. हमें तो लगता है आप की रत्ना ही पार कर देती होगी, कल से चौकसी रखते हैं, रंगेहाथ पकड़ेंगे.’’

बंटू, मिंकी और तरुण भी ब्रश कर के आ गए थे. ‘गुडमौर्निंग दादू, दादी, नानी, सही पकड़े हैं,’ कहते हुए बंटू, मिंकी उन से लिपट कर खिलखिला उठे.

‘‘गुडमौर्निंग टू औल औफ यू. आइए, चलिए सभी नाश्ता करते हैं, अदिति पहुंच ही रही होगी. चलोचलो बच्चो…’’ तरुण ने मां को सहारा दिया और डायनिंग टेबल तक ले आया. ‘‘भाईसाहब तो फीकी चाय पीते होंगे?’’ सुशीला ने केतली से टिकोजी हटाते हुए पूछा.

‘‘बहनजी, बस 2 चम्मच चीनी,’’ स्फुट स्वरों में बोल कर कप में डालने का इशारा किया तेजप्रकाश ने. ‘‘नहीं, बिलकुल नहीं मम्मीजी, पापा को शुगर बरसों से है, कंट्रोल कर के रखा है, तब भी बौर्डर पर ही है. एक बार इन्हें दिल में बहुत जोर का दर्द उठा, डाक्टर के पास गए नहीं, पर प्रौमिस किया कि अब से मक्खन, चीनी नहीं खाएंगे. बस, तब से मक्खन वगैरा भी बंद. मां को तो शुगर नहीं है पर वे एहतियात के तौर पर अपनेआप ही नहीं लेतीं. आप बैठिए मम्मीजी, मैं निकालता हूं,’’ तरुण ने कहा.

‘‘अरे गैस थी, खाली पेट में वही चढ़ गई थी. खामखां लोगों ने एनजाइना समझ लिया और जबरदस्ती प्रौमिस ले लिया,’’ तेजप्रकाश ने सफाई दी. ‘‘ऐसे कैसे? शुक्र मनाइए कि खयाल रखने वाला परिवार मिला है, भाईसाहब. इतना लालच ठीक नहीं. जबान पर तो कंट्रोल होना ही चाहिए एक उम्र के बाद. वैसे भी, हमें इस उम्र में खुद भी अपना ध्यान रखना चाहिए,’’ सुशीला ने शुगरपौट तरुण की ओर बढ़ा दिया. तेजप्रकाश ने चीनी की ओर बढ़ता

हुआ अपना हाथ मन मसोस कर पीछे खींच लिया. ‘‘तब तो चीनी का बहुत कम ही खर्चा आता होगा यहां. मिंकू, बंटू को देख रही हूं दूध में चीनी नहीं लेते पर सुबह से कई सारी चौकलेट खाने से उन का शुगर का कोटा पूरा हो जाता होगा, दामादजी भी बस आधा चम्मच, अदिति तो पहले ही वेट लौस की ऐक्सरसाइज व डाइट पर रहती है,’’ सुशीला सस्मित हो उठीं.

जिम से लौटी अदिति ने भी हाथ धो कर टेबल जौइन कर लिया, ‘‘अरे मम्मी, कहां हिसाबकिताब ले कर बैठ गईं. चीनी हो या चावल, अपनी रत्ना बड़ी परफैक्ट है, सब हिसाब से ही लाती, खर्च करती है. हम तो कभीकभी ही दुकान जा पाते हैं, उसी ने सब संभाला हुआ है.’’ वह चेयर खींच कर आराम से बैठ गई और कप में अपने लिए चाय डाल कर चीनी मिलाने लगी. तभी तेजप्रकाश ने उस से इशारे से रिक्वैस्ट की तो उस ने चुपके से आधा चम्मच चीनी तेजप्रकाश के कप में मिला दी.

‘‘हांहां, क्यों नहीं, सिर पर बिठा कर रखो महारानीजी को. एक दिन वही ऐसा गच्चा देगी तब समझ में आएगा. और भाईसाहब ने 2 शुगरफ्री डाले हैं. तू ने उन के कप में चीनी क्यों मिलाई अदिति?’’ सुशीला बोली थीं. ‘‘अरे मम्मी, अभी पापाजी का सबकुछ नियंत्रण में है, बिलकुल फिट हैं. काफी वक्त से कोई दर्द भी उन्हें दोबारा नहीं हुआ. बैलेंस के लिए सबकुछ थोड़ाथोड़ा खाना सही है. लाल और हरीमिर्च भी तो आप मानती नहीं, बहुत सारी खाती रही हैं खाने में ऐक्स्ट्रा नमक के साथ, वह क्या है? खाने के बाद एक चम्मच मलाईचीनी, रबड़ीचीनी या मक्खनचीनी के बिना आप का पेट साफ नहीं होता, वह क्या है? जबकि डाक्टर की रिपोर्ट है आप के पास. आप को सब मना है. बीपी भी है और आप को हार्ट प्रौब्लम भी. अच्छा है कि आप मेरे पास हैं, सब बंद है.’’

‘‘अरे तू हमारी कहां ले बैठी, वह तो 4-5 साल पहले की बात है. मुंह बंद कर, चुपचाप अपना नाश्ता कर,’’ सुशीला ने आंखें नचाते हुए अदिति को कुछ ऐसे डांटा कि सभी मुसकरा उठे. ब्रेकफास्ट के बाद, तरुण और अदिति स्टोर जा कर महीनेभर का कुछ राशन और हफ्तेभर की सब्जी व फल ले आए. सुशीला डायनिंग टेबल पर फैले विविध सामानों को किचन में ले जा कर सहेजती रत्ना को बड़े गौर से देख रही थीं. रत्ना दोबारा लंच बनाने आ चुकी थी.

नारियल – भाग 2: जूही और नरेंद्र की गृहस्थी में नंदा घोल रही थी स्वार्थ का जहर

धीरेधीरे नंदा की रुचि, जूही भाभी के बजाय नरेंद्र में बढ़ती गई और नरेंद्र की नंदा में. कई बार जब दोनों की आंखें बोलती होतीं तो जूही की दृष्टि भी उन पर पड़ जाती. परंतु वह उसे अपने मन का वहम समझ लेती या सोचती कि यदि उस की शंका निर्मूल हुई तो नंदा के दुखी हृदय को ठेस पहुंचेगी और नरेंद्र भी उस के बचपने वाले सवाल से उस की अक्ल के विषय में क्या सोचेगा?

पर एक दिन वह सन्न रह गई थी जब उस ने देखा था कि बत्ती चली जाने पर अंधेरे में नरेंद्र ने नंदा को अपनी बांहों के घेरे में ले लिया था और तभी बिजली आ गई थी.

जूही को लगा था जैसे उस के पैरों के नीचे काला सांप आ गया हो, जिसे उस ने दूध पिलाया, वही सर्पिणी बन कर  उस की सुखी गृहस्थी में दंश मार चुकी थी. जिस नरेंद्र को पूर्णरूप से पाने के लिए उस ने संयुक्त परिवार की जड़ों में मट्ठा डाला, वही पराया हो गया. वह जज्ब न कर सकी, ‘तुम लोग इतने नीचे गिर जाओगे, मैं सोच भी नहीं सकती थी.’

फिर उस ने नंदा की ओर देख कर कहा, ‘निकल जा मेरे घर से, और फिर कभी यहां कदम रखने की कोशिश मत करना.’’

नरेंद्र ने बजाय लज्जित होने के त्योरियां चढ़ा लीं और कड़े स्वर में कहा था, ‘घर आए मेहमान से तमीज से बात करना सीखो. रही बात इस के यहां आने की, तो तुम कौन होती हो इसे निकालने वाली? यह घर मेरा है और यहां किसी का आनाजाना मेरी इच्छा से होगा. जिसे यह मंजूर हो, वही यहां रह सकता है, नहीं तो अपना रास्ता देखे.’

जूही समझ गईर् कि रास्ता देखने का संकेत उसी की ओर है. वह सोचने लगी, ‘तो ये इतने आगे निकल चुके हैं. इस घर के स्वप्न को संजोने वाली जूही घर के लिए इतनी महत्त्वहीन हो चुकी है कि एक बेहया औरत के लिए उस की कुरबानी बेधड़क दी जा सकती है?’

फिर तो नरेंद्र के आने के बाद नंदा का उन के घर आना आम बात हो गई. नरेंद्र पर जूही के अनुनयविनय का प्रभाव न होना था, न हुआ. उस ने साफ कह दिया, ‘तुम्हें घर में रहना हो, तो रहो, नहीं तो मैं नंदा के साथ बाकायदा अदालती शादी कर के उसे घर ले आऊंगा और तुम्हें दूसरा रास्ता चुनना होगा.’

इस दूसरे रास्ते के खयाल से ही जूही विकल हो जाती थी. मायके वाले कितने दिन रखेंगे? भाभियों के ताने सुन कर बेशर्मी की रोटियां वह कितने दिन खा सकेगी? भाइयों के अपने परिवार हैं, भाभियों की अपनी इच्छाएं हैं. किसी के लिए कोई क्यों अपनी इच्छाओं का गला घोंटेगा?

जूही का मन डूब रहा था. उसे पार लगाने वाला कोई हाथ दिखाई नहीं पड़ता था. इस दुर्दिन में उस का ध्यान अपनी सास पर गया. एकदम कड़े मिजाज की सास के सामने नरेंद्र भी तो भीगी बिल्ली जैसा बना रहता था. यहां आने के समय भी तो वह उन से मुंह खोल कर कुछ कह नहीं पाया था. अगर वे यहां होतीं, तो क्या नरेंद्र की ऐसी हिम्मत पड़ती या नंदा दिन में 10 बार घर के चक्कर लगा पाती? वह अपराधभाव से ग्रस्त हो गई. यह स्थिति तो वास्तव में उस के न्यारे रहने के काल्पनिक सुख के लिए बोले गए झूठ से ही बनी है. अगर वे आ जाएं तो अब भी बात बन सकती है. मगर वे आएं तो कैसे? वह उन से कहे भी तो किस मुंह से?

अगर वह सास को यहां लाना भी चाहे, तो क्या वे मान जाएंगी? उस के हृदय के दूसरे पक्ष ने उसे आश्वस्त किया कि तू ने अपने स्वार्थ के आगे सास की ममता देखी ही कहां? जब एक बार उसे डायरिया हो गया था, तो हालत खराब हो जाने पर सास ही तो पूरी रात उस के सिरहाने बैठ कर जागती रही थीं.

बहुत सोचसमझ कर उस ने सारी स्थिति पत्र में लिख कर अंत में लिख दिया, ‘वैसे तो मैं स्वयं आप को लेने आती, मगर किस मुंह से आऊं? यह जान लीजिए कि मेरे वहां से हटते ही घर में मेरा रहना भी दूभर हो जाएगा. मैं छोटी हूं. मुझ से गलती हो सकती है, लेकिन उसे क्षमा तो बड़े ही करते हैं. यदि आप नहीं आईं तो मैं समझूंगी, मां की ममता अब दुनिया में नहीं रही, क्योंकि मेरी मां तो है नहीं, मैं आप को ही मां समझती हूं.’

5वें दिन ही हरीश और नवल के साथ मांजी का भारीभरकम स्वर दरवाजे पर सुनाई पड़ा, ‘‘अब दरवाजा खोलोगी भी या नहीं, बस में बैठेबैठे पांव ही टूट गए.’’

उस समय नरेंद्र और नंदा भी घर पर ही थे. मांजी की गंभीर वाणी सुन कर नरेंद्र के चेहरे की हवाइयां उड़ने लगीं. उस ने नंदा को जल्दी से जाने का इशारा कर दिया. पर नंदा जाती तो तब, जब निकलने का दूसरा दरवाजा होता. वह हकबकाई सी खड़ी थी. जूही को तो जैसे मरुस्थल में प्यास से बिलखते व्यक्ति की तरह किसी जलधारा का कलकल स्वर सुनाई दे गया था. उस ने जल्दी से दरवाजा खोला और सास के पैरों पर मत्था रख दिया. वे जोर से बोलीं, ‘‘अरे, अब यह सब नौटंकी बाद में करना. पहले मेरा झोला थाम. मेरे हाथ दुखने लगे हैं,’’ फिर उन्होंने आवाज दी, ‘‘नरेंद्र, नवल के सिर से टोकरी उतार. और हरीश, तू भी अपना मरतबान रख. उजबक की तरह मुंह फाड़े क्या देख रहा है,’’ इस के साथ ही वे आंगन में पड़े पलंग पर बैठ गईं. उन की भीमकाय काया से पलंग चरमरा उठा. उन की तनी आंखों, कड़कदार आवाज और पलंग की चरमराहट ने मिल कर जैसे एक आतंक की सृष्टि कर दी.

नंदा को लगा, शेरनी के आने पर तो परिंदे चीख कर भाग जाते हैं, लेकिन इन के सामने तो चीखने की भी हिम्मत नहीं पड़ेगी. उसे लगा, मांजी की दृष्टि उस को तोल रही है, जैसे कोई बच्चा किसी ढेले को फेंकने से पहले उसे तोलता है. उस का यह असमंजस भांप कर नरेंद्र ने नंदा को जाने का हाथ से इशारा किया. नंदा को जैसे जान मिल गई. उस ने एक कदम ही उठाया होगा कि मांजी अपनी बुलंद आवाज में बोलीं, ‘‘ठहरो, अभी कहां जाओगी. जरा इस को भी मेरी लाई मिठाइयां और फल खाने को दो. यह किस की लड़की है? इतनी बड़ी हो गई, अभी इस की शादीवादी नहीं हुई क्या, देखने से तो ऐसा ही लगता है.’’

अपने चरित्र पर ही संदेह: भाग 3- क्यों खुद पर शक करने लगे रिटायर मानव भारद्वाज

एक दिन परेशान थे मानव, आंखों में बसी चिरपरिचित सी शक्ति कहीं खो गई थी.

‘‘आप को क्या लगता है, मैं लड़ाका हूं, सब से मेरा झगड़ा लगा रहता है. मैं हर जगह सब में कमियां ही निकालता रहता हूं. वसुधा बेटा, जरा समझाना. 2 रातों से मैं सो नहीं पा रहा हूं.’’

मानव के मन की पीड़ा को जान कर मैं व वसुधा अवाक् थे. ऐसा क्या हो गया. पता चला कि मानव ने उस वृद्ध दंपती से अपनी रचनाओं के बारे में एक ईमानदार राय मांगी थी. 2 दिन पहले उन के घर पर कुछ मेहमानों के साथ मानव और मीना भाभी भी थीं.

‘‘मानव, आप की रचनाएं तो कमाल की होती हैं. आप के पात्रों के चरित्र भी बड़े अच्छे होते हैं मगर आप स्वयं इस तरह के बिलकुल नहीं हैं. आप की आप के रिश्तेदारों से लड़ाई, आप की आप के समधियों से लड़ाई इसलिए होती है कि आप सब में नुक्स निकालते हैं. आप तारीफ करना सीखिए. देखिए न हम सदा सब की तारीफ ही करते रहते हैं.’’

85 साल के वृद्ध इनसान का व्यवहार चार लोगों के सामने मानव को नंगा सा कर गया था.

‘‘मेरी रचनाओं के पात्रों के चरित्र बहुत अच्छे होते हैं और मैं वैसा नहीं हूं… वसुधा, क्या सचमुच मैं एक ईमानदार लेखक नहीं…अगर मैं ने कभी उन्हें अपना बुजुर्ग समझ उन से कोई राय मांग ही ली तो उन्होंने चार लोगों के सामने इस तरह कह दिया. अकसर वहां मैं वह सब नहीं खाता जो वे मेहमान समझ कर परोस देते हैं… मुझे तकलीफ होती है… तुम जानती हो न… हैरान हूं मैं कि वे मुझे 3 साल में बस इतना ही समझे. क्या मेरे लिए अपने मन में इतना सब लिए बैठे थे. यह दोगला व्यवहार क्यों? कुछ समझाना ही चाहते थे तो अकेले में कह देते. अब उस 85-87 साल के इनसान के साथ मैं क्या माथा मारूं कि मैं ऐसा नहीं हूं या मैं वैसा हूं. क्या तर्कवितर्क करूं?

‘‘मैं चापलूस नहीं हूं तो कैसे सब की तारीफ करता रहूं. जो मुझे तारीफ योग्य लगेगा उसी की करूंगा न. और फिर मेरी तारीफ से क्या बदलेगा? मेरी समस्याएं तो समाप्त नहीं हो जाएंगी न. मुझे किसी की झूठी तारीफ नहीं करनी क्योंकि मुझे किसी से कोई स्वार्थ हल नहीं करना. क्या सचमुच मैं जो भी लिखता हूं वह सब झूठ होता है क्योंकि मेरे अपने चरित्र में वह सब है ही नहीं जो मेरे संदेश में होता है.

‘‘मैं ने उस पल तो बात को ज्यादा कुरेदा नहीं क्योंकि 4-5 लोग और भी वहां बैठे थे. मैं ने वहां सब के साथ कौफी नहीं पी, जूस नहीं पिया. पकौड़ों के साथ चटनी नहीं खाई, क्योंकि मैं वह ले ही नहीं सकता. वे जानते हैं फिर भी कहते रहे मैं किसी का मान ही नहीं रखता…जरा सा खा लेने से खिलाने वाले का मन रह जाता है. अपनी कहानियों में तो मैं क्षमा कर देता हूं जबकि असल जिंदगी में मैं क्षमा नहीं करता. क्या ऐसा सच में है, वसुधा?’’

मानव की आंखें भर आई थीं.

‘‘मैं अपने उसूलों के साथ कोई समझौता नहीं करता…क्या यह बुरी बात है? मीना कहती है कि आप को अपने घर की बात उन से नहीं करनी चाहिए थी. क्या जरूरत थी उन से यह कहने की कि आप के रिश्तों में तनाव चल रहा है तभी तो उन्हें पता चला.

‘‘अरे, तनाव तो लगभग सभी घरों में होता है…कहीं कम कहीं ज्यादा…इस में नया क्या है. मेरा दोष इतना सा है कि मैं ने बुजुर्ग समझ कर उन से राय मांग ली थी कि मुझे क्या करना चाहिए…उस का उत्तर उन्होंने इस तरह चार लोेगों के सामने मुझे यह बता कर दिया कि मैं अपनी रचनाओं से मेल ही नहीं खाता.’’

मानव परेशान थे. वसुधा उन की बांह सहला रही थी.

‘‘चाचाजी, हर इनसान के पास किसी को नापने का फीता अलगअलग है. हो सकता है, जो समस्या आप के सामने है वह उन्होंने न झेली हो, लेकिन यह सच है कि उन्होंने समझदारी से काम नहीं लिया. आप स्पष्टवादी हैं और आज का युग सीधी बात करने वालों का नहीं है और सीधी बात आज कोई सुनना भी नहीं चाहता.’’

‘‘उन्होंने भी तो सीधी बात नहीं की न.’’

‘‘सीधी बात 3 साल की जानपहचान के बाद की. अरे, सीधी बात तो इनसान पहली व दूसरी मुलाकात में ही कर लेता है. 3 साल में भी अगर वे यही समझे तो क्या समझे आप को?’’

दूसरी सुबह मैं ने मानव को फोन किया था और पूछा था कि रात आप क्या कहना चाहते थे. जरा खुल कर समझाइए.

तब मानव ने बस इतना ही कहा कि मुझे सब की तारीफ करनी चाहिए. हर इनसान ठीक है. कोई भी गलत नहीं होता.

‘‘चाचाजी, आप परेशान मत होइए. मन की हम से कह लिया कीजिए क्योंकि नहीं कहने से भी आप बीमार हो सकते हैं. वैसे भी बाहर की दुनिया हम ने नहीं बनाई इसलिए सब के साथ हम एक जैसे नहीं रह सकते. आप के भीतर की दुनिया वह है जो आप लिखते हैं…सच में आप वही हैं जो आप लिखते हैं. आप ईमानदार हैं. आप का चरित्र वैसा है जैसा आप लिखते हैं.’’

‘‘समझ नहीं पा रहा हूं बेटी, क्या सच में…अपनेआप पर ही शक हो रहा है मुझे. 2-3 साल की हमारी जानपहचान में उन्होंने यही निचोड़ निकाला कि मैं वह नहीं हूं जो रचनाओं में लिखता हूं…तो शायद मैं वैसा ही हूं.’’

‘‘वे कौन होते हैं यह निर्णय लेने वाले…आप गलत नहीं हैं. आप वही हैं जो आप अपनी रचनाओं में होते हैं. जो इनसान आप को समझ ही नहीं पाया उन से दूरी बनाने में ही भलाई है. शायद वही आप की दोस्ती के लायक नहीं हैं. 60 साल जिन सिद्धांतों के साथ आप जिए और जिन में आप ने अपनी खुशी से किसी का न बुरा किया न चाहा, वही सच है और उस पर कहीं कोई शक नहीं है मुझे. अपना आत्म- विश्वास क्यों खो रहे हैं आप?’’

सहसा मानव का हाथ पकड़ कर वसुधा बोली, ‘‘चाचाजी, जो याद रखने लायक नहीं, उसे क्यों याद करना. उन्हें क्षमा कर दीजिए.’’

‘‘क्षमा तो उसी पल कर दिया था लेकिन भूल नहीं पा रहा हूं. अपना समझता रहा हूं उन्हें. 3 साल से हम मिल रहे हैं इस का मतलब इतना अभिनय कर लेते हैं वे दोनों.’’

‘‘3 साल आप की तारीफ करते रहे और आप समझ ही नहीं पाए कि उन के मन में क्या है…अभिनय भी अच्छा करते रहे. पहली बार ईमानदार सलाह दी और समझा दिया कि वे आप को पसंद ही नहीं करते. यही ईमानदारी आप नहीं सह पाए. आप के रास्ते सिर्फ 2 हैं ‘हां’ या ‘ना’…उन का रास्ता बीच का है जो आज का रास्ता है. जरूरत पड़ने पर दोनों तरफ मुड़ जाओ. चाचाजी, आप मुझ से बात किया करें. मैं दिया करूंगी आप को ईमानदार सलाह.’’

वसुधा मेरी बहू है. जिस तरह से वह मानव को समझा रही थी मुझे विश्वास नहीं हो रहा था. 30-32 साल की उम्र है उस की, मगर समझा ऐसे रही थी जैसे मानव से भी कहीं बड़ी हो.

सच कहा था एक दिन मानव ने. ज्यादा उम्र के लोग जरूरी नहीं समझदारी में ईमानदार भी हों. अपनी समझ से दूसरों को घुमाना भी समझदार ही कर सकते हैं. मानव आज परेशान हैं, इसलिए नहीं कि वे गलत समझ लिए गए हैं, उन्हें तो इस की आदत है, बल्कि इसलिए क्योंकि सिद्धांतों पर चलने वाला इनसान सब के गले के नीचे भी तो नहीं न उतरता. उन्हें अफसोस इस बात का था कि जिन्हें वे पूरी निष्ठा से अपना समझते रहे उन्होंने ही उन्हें इस तरह घुमा दिया. इतना कि आज उन्हें अपने चरित्र और व्यक्तित्व पर ही संदेह होने लगा.

नारियल: भाग 1- जूही और नरेंद्र की गृहस्थी में नंदा घोल रही थी स्वार्थ का जहर

नरेंद्र के जाते ही जूही सोच में मग्न पलंग पर ढेर हो गई. उसे न आकर्षक ढंग से सजाए 2 कमरों के इस मकान में रखे फूलदार कवर वाले सोफों में आकर्षण महसूस हो रहा था, न जतन से संवारे परदों में. दीवारों पर लगे सुंदर फोटो और एक कोने में सजे खिलौने जैसे मुंह चिढ़ा रहे थे. उसे लग रहा था जैसे कि नंदा की शरीर की महक अभी कमरे की आबोहवा में फैली हुई है और कभी प्रिय लगने वाली यह महक अब उसे पागल बनाए बिना न रहेगी. दिमाग की नसें जैसे फटना चाहती थीं. हवादार कमरे की खिड़कियों से आती सर्दी की हवाएं जैसे जेठ की लू बन कर रह गई थीं. जो कुछ हुआ था, उस की उम्मीद कम से कम जूही के भोले मन को कतई न थी.

हुआ यह कि कठोर अनुशासन वाली सास के घर में बाहर की हवा को तरस गईर् जूही में, नरेंद्र की नौकरी लगते ही अपना अधिकारबोध जाग गया कि अब वह इस घर के एकमात्र कमाऊ बेटे की पत्नी है. सास, ससुर, देवर, ननदें सभी उस के पति की कमाई पर गुलछर्रें उड़ाने को तैयार हैं. लेकिन वह उन्हें गुलछर्रे नहीं उड़ाने देगी और उड़ाने भी क्यों दे, आखिर इन लोगों ने उस के साथ कौन सी नेकी कर दी है. ननदें एकएक चीज ठुनकठुनक कर ले लेंगी, देवर गले पड़ कर अपनी जरूरतें पूरी करा लेंगे, पर यह नहीं सोचेंगे कि भाभी भी जीतीजागती इंसान है, उस का भी अपना सुखदुख है, उस की भी बाहर घूमनेफिरने की इच्छा होती होगी.

सारा काम उस ने अपने जिम्मे ले लिया तो सब आजाद हो गए. मरो, खपो, किसी को हाथ बंटाने की जरूरत ही नहीं महसूस होती. लता ने एक बार कह दिया था, ‘हमारी भाभी बहुत काम करती हैं. घर में किसी दूसरे को कोई काम छूने ही नहीं देतीं.’

‘तो कौन सा एहसान कर रही है किसी पर, मैं ने इसे घर दे दिया, पालपोस कर जवान बेटा दे दिया,’ सास तुनक कर बोली थीं.

जूही के मन में आया था कि वह भी उन्हीं की तरह हाथ नचा कर कह दे, ‘क्यों दिया था जवान बेटा, बैठाए रहतीं उसे अपनी गोद में, आंचल में छिपाए.’ पर कुछ सोच कर वह मन मसोस कर रह गई. ऐसे मौके पर सास की आंखों में उभरे लाललाल डोरे और फिर एक ठंडेपन से मार्मिक बात कह देने से उन के आतंक से पूरा घर खौफ खाता था, तो जूही ही इस का अपवाद कैसे होती?

हां, उस ने काम करने की रफ्तार बढ़ा दी थी. औफिस से लौटे नरेंद्र की चाय के बाद उस से भेंट तभी हो पाती जब रात के 10 बजे वह  ऊंघने लगता. अपने पांवों पर जूही के शीतल हाथों का स्पर्श पा कर वह चौंक उठता. जाड़े में यह स्पर्श एकाएक अटपटा सा लगता और वह उस के देर से आने पर और घर के काम को उस की तुलना में वरीयता देने पर झुंझलाता.

एक दिन जूही ने नरेंद्र से कहा, ‘घर में कलह न हो, इसलिए इतना काम करती हूं, पर मांजी रातदिन भुनभुनाया करती हैं कि यह तो दिनभर नरेंद्र की कमर से कमर जोड़े रहती है, कामधाम में मन ही नहीं लगता.’

नरेंद्र को मां की यह बात, पत्नी पर अत्याचार लगी. उस ने आश्चर्य से कहा, ‘अच्छा ऐसा कहती हैं?’

जूही ने अपने चेहरे पर जो भाव बना रखे थे, उन में आंखों का छलक आना कुछ कठिन नहीं था. उस ने कहा, ‘कहा तो बहुतकुछ जाता है, लेकिन सारी बातें सुना कर तुम्हारा दिल दुखी कर के क्या फायदा?’

फिर तो नरेंद्र की बढ़ती उत्सुकता जूही से कुछ मनगढ़ंत बातें उगलवा लेने में सफल रही. इन बातों में सर्वप्रमुख यह थी कि मांजी कह रही थीं, ‘अच्छा रहेगा, नरेंद्र के 10 साल तक कोई बालबच्चा ही न हो, नहीं तो उस की तनख्वाह उन्हीं पर खर्च होने लगेगी. तब जूही भी दिनभर घर का काम नहीं कर पाएगी.’

इस बात ने ऐसा रंग दिखाया कि नरेंद्र जूही की हर बात मानने को तत्पर हो गया. जूही ने भी उसे अपनेपन के ऐसे लटकेझटके दिखाए कि नरेंद्र को लगा, जैसे जूही के साथ अलग मकान ले कर रहने और दूसरी जगह तबादला करवा लेने में ही उस का हर तरह से कल्याण है. घर के लोग उसे नोच कर खा जाने वाले भेडि़ए लगे, जिन का उस से लगावमात्र उतना ही है, जितना हिंसक पशु का शिकार से होता है. जो मां पुत्र की कमाई के लिए उस का वंश चलते नहीं देखना चाहती, उसे मां कैसे कहा जाए? ऐसे लोगों का साथ जितनी जल्दी हो सके, छोड़ देना चाहिए.

फिर वे तबादले के बाद इस घर में आ गए. नरेंद्र और जूही 2 ही तो प्राणी थे. जूही में काम करने और व्यवस्था की आदत तो शुरू से ही थी. उस ने घर को फुलवारी की तरह सजा दिया. सीमित साधनों में जैसा रखरखाव और व्यवस्था जूही ने बना रखी थी उस से नरेंद्र के साथियों को सोचना पड़ता था कि घर तो नारी से ही आबाद होता है, किंतु वैसी गुणी नारी होनी चाहिए. वह नरेंद्र का ऐसा खयाल रखती कि उसे लगता, जैसे सच्चे अर्थों में जिंदगी तो अब शुरू की है.

नरेंद्र भी हर तरह से जूही का खयाल रखता, उस के जन्मदिन पर बढि़या पार्टी और यादगार उपहार देता. औफिस के बाद यदि समय होता तो जूही के साथ घूमने भी निकल जाता. वास्तव में इसी आजादी के लिए तो जूही ने अपने घर में अपने झूठ से कलह का माहौल बना दिया था.

कुछ दिनों बाद ही महल्ले की महिलाओं के साथ उस का दोस्ताना बढ़ सा गया था. किसी को वह स्वेटर का नया डिजाइन बताती तो किसी की साड़ी की फौल ठीक कर देती. रमाबाबू की विधवा बहन नंदा को उस के पास बैठ कर बात करने में विशेष शांति मिलती थी, क्योंकि और जगहों पर उसे पसंद नहीं किया जाता.

जूही नंदा को समझाती, ‘जिंदगी रोने से नहीं कटती है. कुछ काम करो और अपनी जिंदगी की नई शुरुआत करने पर भी गंभीरता से सोचो.’

एक दिन उस ने यह बात नरेंद्र की उपस्थिति में भी कही थी, ‘देखो, अभी क्या उम्र है, मुश्किल से 25 वर्ष की होगी और क्या गत बना रखी है अपनी? कुदरत ने गोरा संगमरमरी बदन, अच्छी कदकाठी और बोलती आंखें क्या इसलिए दी हैं कि इन्हें रोरो कर गला दिया जाए? खबरदार, जो आइंदा चेहरे पर मनहूसी छाई.’

फिर जब उस ने अपनी गुलाबी रंग की एक सुंदर साड़ी उसे पहनाई तो नरेंद्र को भी लगा, जैसे नंदा वाकई सुंदर कही जा सकती है, उस की आंखें वास्तव में आकर्षक हैं.

अभिनेता महेश ठाकुर ने न्यूज़ मीडिया को लेकर कही खरी-खरी बातें, क्या कहा उन्होंने, पढ़ें इंटरव्यू

28 साल से फिल्म इंडस्ट्री में काम कर चुके अभिनेता महेश ठाकुर से कोई अपरिचित नहीं. महेश ठाकुर की फिल्म ‘हम साथ साथ है’ काफी लोकप्रिय फिल्म रही. इस फिल्म में उन्होंने आनंद की भूमिका निभाई थी. इस ब्लाक-बस्टर हिट फिल्म के बाद उन्होंने कई टेलीविजन शो में काम किया है. हिंदी फिल्म के अलावा महेश ने तमिल, तेलगू और मलायलम फिल्मों में भी काम किया है.

महेश ने एमबीए की पढाई अमेरिका से की है, इसके बाद वे 80 की दशक में मुंबई आये और फिल्म इंडस्ट्री में काम करने की कोशिश करने लगे. महेश का फिल्मों में अभिनय के प्रति प्यार बचपन से था, यही वजह थी कि उन्होंने स्कूल, कॉलेज से थिएटर करना शुरू कर दिया था. उन्हें पहली फिल्म ‘जानेमन’ मिली जो फ्लॉप रही. इसके बाद उन्होंने टीवी का रुख किया और कई धारावाहिकों में काम किया. उस दौरान उन्हें फिल्म हम साथ साथ है में काम करने का ऑफर मिला. फिल्म हिट रही और महेश ठाकुर को इंडस्ट्री वालों ने पहचाना. इसके बाद वे आशिकी 2, सत्या 2, जय हो आदि कई फिल्मों में दिखाई पड़े. उन्होंने जीवन में जो चाहा, उन्हें मिला और वे इससे बहुत खुश है, उनके इस जर्नी में उन्हें पत्नी सपना मिली और वे दो बेटों के पिता बने. उनके अभी वे सोनी सब की धारावाहिक आंगन..अपनों का में एक पिता की भूमिका निभा रहे है. उन्होंने गृहशोभा के लिए खास बात की पेश है, कुछ खास अंश.

पिता बनना है गर्व  

धारावाहिक में एक बेटी की पिता की भूमिका निभाना महेश के लिए गर्व की बात है, क्योंकि एक बेटी परिवार में पेरेंट्स की सबसे अधिक नजदीक होती है और माता – पिता के मानसिक स्ट्रेंथ को बढाती है. वे कहते है कि बेटे हो या बेटी पिता बनना ही अपने आप में एक बड़ी बात होती है, क्योंकि बच्चे के जन्म के बाद ही कोई माता – पिता बन पाता है. इस तरह की कहानी मैंने पहले नहीं किया है, ये एक अलग कहानी है, जो टीवी पर दिखाई जा रही है. मुझे ऐसी कहानी का हिस्सा बनना अच्छा लग रहा है. इसमें कई इमोशनल सीन्स है, जिसमे मुझे चरित्र में घुसना पड़ता है, जो मुश्किल नहीं होता, क्योंकि अभिनय मैं काफी समय से कर रहा हूँ. एक्टिंग से अधिक ये स्किल होता है, जिसे करने के लिए मैं तैयार हूँ. इसे हर किसी के लिए आसान नहीं होता. इसमें सारे सीन्स बहुत ही इमोशनल है, जिसे करते हुए अनायास ही मेरे आँखों में आंसू आ जाते है.

सोच में बदलाव जरुरी

आज भी लड़कियों के जन्म होने पर कई पेरेंट्स दुखी होते है, क्या ऐसी किसी घटना को आपने अपने आसपास देखा है? महेश कहते है कि आर्थिक रूप से कमजोर या कुछ को बेटी की शादी में दहेज़ देना पड़ता है, ऐसे में उन्हें बेटी बोझ लगती है. ये मानसिकता है और इसे बदलना है. इसके अलावा लोगो की मानसिकता है कि शादी के बाद बेटी की जिम्मेदारी केवल ससुराल के लिए होनी चाहिए और कुछ नहीं. इस सोच को मैंने आसपास के लोगों में देखा है, इसे भी बदलना बहुत जरुरी है. एक बार शादी होने के बाद पेरेंट्स को छोड़कर बेटी की पूरी फोकस ससुराल पर चली जाती है, क्योंकि परिवार वाले यही चाहते है, इस सोच को बदलना है. समाज में इसे बैलेंस करने की जरुरत है. शादी होने के बाद बेटी को पराई कहने वालों के सोच को बदलना जरुरी है.

लड़की को न समझे कम  

कुछ परिवारों में आज भी लड़की पैदा होने पर पेरेंट्स दहेज़ जोड़ना शुरू कर देते है, जबकि आज की लड़की पढ़ी लिखी और कमाऊ होती है, क्या उसे व्याह कर ले जाने वाला पति और ससुराल वाले उसे ही दहेज़ समझे, क्या ऐसा होना संभव नहीं? इसमें जिम्मेदारी किसकी बनती है, समाज, परिवार या धर्म ? इस प्रश्न के जवाब में महेश कहते है कि आज लड़की ही दहेज़ होनी चाहिए, क्योंकि आज की लड़की हर क्षेत्र में पुरुषों की तरह ही काम करती है. साथ ही वह शादी के बाद प्यार को घर में लाती है. लड़की को कम समझना, ये परिवार और समाज की सोच है, जो काफी समय से चला आ रहा है, जिसे पूरी तरह से बदलना मुश्किल हो रहा है, लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव अवश्य आएगा.

मिला है सम्मान

महेश का जब अपना परिवार शुरू हुआ था, तो परिवार वाले इस काम को अच्छी दृष्टि से नहीं देखते थे. उन्हें इस बात की हमेशा चिंता रहती थी, लेकिन अब इंडस्ट्री में जीएसटी के आने पर उन्हें ऐसा महसूस नहीं होता. वे इसे एक अच्छा कदम मानते है. इस बदलाव के बारें में महेश कहते है कि पहले बड़े कलाकार को छोड़कर, बाकी कलाकारों को सम्मान नहीं मिलता था, लेकिन अब सभी एक्टर्स इनकम टैक्स के अलावा जीएसटी भी भरते है. मैं भी एक इंटरटैनर के रूप में सर्विस टैक्स भरता हूँ, जिससे मुझे ख़ुशी महसूस होती है, क्योंकि सरकार मेरे काम और मेरी इंडस्ट्री को रिकॉगनाइज कर रही है. अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ खान, सलमान खान जैसे कलाकार को ही पहले रेस्पेक्ट मिलता था, लेकिन अब मुझे भी एक कलाकार के रूप में सम्मान मिलता है. अब कलाकार के काम को सम्मानपूर्वक माना जाने लगा है. मेरे दोनों बेटे मेरे काम से प्रभावित है और अगर वे चाहे, तो पढ़ाई पूरी कर इस क्षेत्र में आ सकते है.

नकारात्मक चीजो की भरमार

इतने सालों में इंडस्ट्री में कहानी में आये बदलाव के बारें में महेश का कहना है कि आजकल चारों तरफ कहानियां ही कहानियां है. चीजे जो चल रही है, वे प्रोग्रेसिव नहीं है, अधिकतर रिग्रेसिव ही है, इसकी वजह टीआरपी है और उसके पीछे भागने पर कोई भी चीज रिग्रेसिव ही दिखेगी. आज जो भी शोज चल रहे है, सारे निगेटिव विचार वाले है, कुछ पोजिटिव नहीं है. निर्माता मानते है कि सकारात्मक चीजे नहीं चलती, क्योंकि दर्शकों के विचार को समझ पाना आज मुश्किल हो चुका है. नकारात्मक फिल्में और वेब सीरीज ही आज सुपर डुपर हिट हो रही है. इसमें अगर सभी निर्माता निर्देशक कहानीकार समूह में सकारात्मक चीजे आज की जेनरेशन को परोसेंगे, तो शायद ऐसी नकारात्मक माहौल से यूथ निकल पायेंगे और समाज में बदलाव आएगा. आपस में कॉम्पिटीशन करने पर कुछ नहीं बदल सकेगा. मेरे धारावाहिक की कहानी आज के परिवेश की है, जिसे हर कोई रिलेट कर सकता है.

वायलेंस है हिट  

वेब सीरीज का प्रचलन पिछले कुछ सालों में अधिक बढ़ा है. पहले और आज की कहानियों में बदलाव अधिक है. महेश कहते है कि वेब की भी कहानियां दर्शकों के अनुसार ही चल रही है. दो – तीन फिल्में जिसमे वायलेंस अधिक होने पर भी हिट हुई है. अभी आगे आने वाली फिल्मों को बनाने वाले सोच रहे होंगे कि इसमें 90 प्रतिशत वायलेंस है, तो आगे हम 100 प्रतिशत वायलेंस दिखायेंगे, क्योंकि दर्शकों को यही पसंद है, ऐसे में मनोरंजन गायब हो जायेगा और पैसा केसे बनाया जाय, उसके बारें में फिल्म निर्माता सोचने लगेंगे. मेरी शो में भी अगर टीआरपी नहीं आएगी, तो ये भी बंद हो जायेगी.

मीडिया को लेनी है जिम्मेदारी

महेश मानते है कि अच्छी मनोरंजक कहानियों को बढ़ावा देने के लिए सभी मीडिया पर्सन को समवेत रूप में आगे आने की जरुरत है. नकारात्मक शो हमेशा ही सबका ध्यान खींचती है और उसका असर समाज और परिवार पर पड़ता है. यही वजह है कि आज के यूथ की सहनशीलता में कमी आ चुकी है. न्यूज़ एजेंसियां भी इस दिशा में कम नहीं, हर चैनल पर युद्ध और उससे जुड़े न्यूज़ ही देखने को मिलते है, जिसमे कुछ भयावह तस्वीरों को दिखाकर लोगों को डराया जाता है. सभी चैनल इसे दिखाने की होड़ में रहते है.

किताबें पढ़ना जरुरी  

वे आगे कहते है कि देखा जाय तो किसी भी देश में, कही भी, किसी भी  बुद्धिजीवी की लिखी किताब में नकारात्मक बातें नहीं लिखी होती. रोज सुबह उठकर अगर एक अच्छी किताब केवल 15 मिनट के लिए कोई पढ़ लें, तो उसका दिन सुखद जायेगा. पर्सनल जीवन में किसी की भी इतनी तनाव नहीं होती, लेकिन दूसरों की जिंदगी में झांकना सबको पसंद होता है. मीडिया भी इसी को बढ़ावा देती है. पड़ोस में चोरी होने पर व्यक्ति खुद की ताले को मजबूत करता है और चोरी करने वाले की छानबीन नहीं करता, क्योंकि उन्हें किसी के बारें में नहीं, खुद के बारें में सोचना पसंद है. ये प्रभाव आज की यूथ पर गहरा हो रहा है, जिसका अंजाम कुछ सालों बाद सबको दिखेगा. इसलिए सभी को जागरूक होने की जरुरत है.

Dunki Movie Review: खोदा पहाड़ निकली मरी हुई चुहिया..

रेटिंग: पांच में से एक स्टार

 निर्माताः रेड चिलीज एंटरटेनमेंट, जियो स्टूडियोज, राज कुमार हिरानी फिल्म्स

लेखकःअभिजीत जोषी,राजकुमार हिरानी व कनिका ढिल्लों

निर्देशकः राज कुमार हिरानी

कलाकारःशाहरुख खान,विक्रम कोचर, विक्की कौशल, बोमन ईरानी, अनिल ग्रोवर, तापसी पन्नू, देवेन भोजानी,ज्योति सुभाष, अरूण बाली, अमर दीप झा

अवधिः दो घंटा 41 मिनट

फिल्म ‘डंकी’ के लेखक व निर्देशक ने इस फिल्म में इतनी गलतियां की हैं कि यह यकीन ही नही होता कि इस फिल्म के निर्देशक व सह लेखक राज कुमार हिरानी ने ही इससे पहले मुन्ना भाई एमबीबीएस’’, ‘‘लगे रहो मुन्नाभाई’,‘थ्री ईडिएट्स’, ‘पीके’ और ‘संजू’ जैसी फिल्में निर्देशित की थी? फिल्म ‘डंकी’ देखने के बाद दिमाग में एक ही बात आती है कि ‘डंकी’ से पहले राज कुमार हिरानी ने जितनी भी फिल्में निर्देशित की थीं,उनमें परोक्ष या अपरोक्ष रूप से विधु विनोद चोपडा का बहुत बड़ा योगदान रहा है.विधु विनोद चोपड़ा से अलग होकर राज कुमार हिरानी ने शाहरुख खान जैसे स्टार के साथ फिल्म ‘डंकी’ बनाकर अपने व शाहरुख खान के कैरियर पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगा दिया.‘पठान’ व ‘जवान’ के बाद ‘डंकी’ में एक बार फिर शाहरुख खान आर्मीमैन की भूमिका में हैं.तो वहीं राज कुमार हिरानी ने ‘थ्री ईडिएट्स’ और ‘पीके’ के कुछ दृश्यो को चुराकर फिल्म ‘डंकी’ में भी जबरन ठॅूंस दिया है.यह फिल्म बहुत बडी टार्चर / सिरदर्द है.उपर से शाहरुख खान और राज कुमार हिरानी दोनों का अहम उन पर इतना हावी है कि वह भी देश की वर्तमान सरकार की ही तरह वितरकों,सिनेमाघर मालिकों को धमकाते हुए जिस तरह से देश को उस वक्त दक्षिण व हिंदी सिनेमा के तोर पर बांटा है,जब ‘पैन इंडिया सिनेमा’ की बात की जा रही हो,यह अति अशोभनीय कृृत्य है.

हम बता दें कि हरियाणा और पंजाब में ‘डंकी मारना’ बहुत प्रचलित शब्द है.लोग बिना आवश्यक कानूनी काजात के गलत राह से चलकर विदेश पहुॅचने का प्रयास करते हैं,जिसे ‘डंकी मारना’ कहा जाता है.ऐसा कृत्य करने वाले पचहत्तर प्रतिशत लोग इंग्लैंड या अमरीका पहुॅचने से पहले ही मौत की नींद सो जाते हैं,उनके बारे में किसी को कुछ पता चही चलता.बाकी 25 प्रतिशत जो पहुॅच जाते हैं, वह विदेशो में नारकीय जिंदगी ही जीते हैं.फिल्म ‘डंकी’ की कहानी इसी पर है,मगर विषयवस्तु के साथ निर्देशक, एडीटर व सह निर्माता राज कुमार हिरानी तथा अभिनेता व सह निर्माता शाहरुख खान किसी भी स्तर पर न्याय नहीं कर पाए.

कहानीः

यह कहानी पंजाब के एक काल्पनिक गांव ललाटू से शुरू होती हैं.जहां युवा पीढ़ी कठिन जीवन व गरीबी से छुटकारा पाने के लिए यूके जाना चाहते हैं.यह लोग यूके का वीजा पाने की समस्या को छोटे-मोटे एजेंटों के माध्यम से सुलझाने के लिए प्रयासरत हैं.इसी गांव में एक दिन पठानकोट निवासी पूर्व सैनिक हरदयाल सिंह ढिल्लों उर्फ हार्डी (शाहरुख खान) पहुंचता है.जहां उनकी मुलाकात  ललाटू,पंजाब निवासी मन्नू (तापसी पन्नू), बुग्गू (विक्रम कोचर) और बल्ली (अनिल ग्रोवर) हैं.इन सभी की अपनी अपनी समस्याएं हैं.यह सभी इग्लैंड जाने के लिए वीजा चाहते हैं,मगर इन्हे वीजा नही मिलता.बुग्गू तो अपनी मां की गाढ़ी कमाई के डेढ़ लाख रूपए भी गंवा बैठता है.ललाटू में सुखी मंगल (विक्की कौशल) भी हैं,जो लंदन के वीजा के लिए जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं.उन्हें अपनी प्रेमिका को वहां से सकुशल वापस लेकर आना है.पर उसे आत्महत्या करने का रास्ता अपनाना पड़ता है.उसके बाद यह चारों गांव के दो युवाओं व चमेली को भी अपने साथ लेकर डंकी के रास्ते इंग्लैंड पहुॅचने के लिए निकलते हैं.मगर पानी के अंदर व जमीन के खतरनाक रास्तों पर चल अफगानिस्तान, ईरान, तुर्की होते हुए इंग्लैंड हार्डी,मन्नु,बुग्गूव बल्ली ही लंदन पहुॅच पाते हैं.

लेखन व निर्देशनः

अंग्रेजी भाषा में बात करने की समस्याएँ, व्यंग्यपूर्ण साक्षात्कार, अस्वीकृतियाँ, क्लासिक सब कुछ परोसा गया है.राज कुमार हिरानी की पिछली सफल फिल्मों को देखकर सभी यही कहेंगे कि इस तरह की चीजों को सहजता से अपनी शानदार कहानी में गंूठने में राज कुमार हिरानी को तो महारत हासिल है.मगर अफसोस फिल्म ‘डंकी’ में राज कुमार हिरानी बुरी तरह से मात खा गए हैं.राजकुमार हिरानी ने अपनी खासियत के अनुरूप इस फिल्म में भी  क्लासरूम, इंटरव्यू, हास्य, सादगी में हास्य जैसे कई दृश्य रखे हैं,पर हर दृश्य बहुत ही उछला हुआ है.कहीं कोई गहराई नही है.पूरी फिल्म में कहीं भी राज कुमार हिरानी के लेखन व निर्देशन की छाप नजर नही आती.

राज कुमार हिरानी और शाहरुख खान जिस वक्त ‘डंकी’ लेकर आए हैं,उस पर भी उंगली उठ रही है.क्योंकि भारत में वर्तमान भाजपा सरकार सीएए (  नागरिकता संशोधन अधिनियम), सीएबी(नागरिकता संशोधन विधेयक   ) को पारित कराने के लिए उत्सुक है. इसने पूरी तरह से समावेशी नहीं होने के कारण हंगामा खड़ा कर दिया,जो भारत के संविधान के खिलाफ है.

इस बार राज कुमार हिरानी ने चोरी करने में सारी हदें पार कर दी.अपनी पुरानी फिल्मों के दृष्य चुराने के साथ ही दूसरे सर्जक के भी दृश्य चुरा लिए.जिन लोगों ने एफसी मेहरा के सीरियल ‘‘जबान संभाल के’’ को देखा है,वह इस फिल्म में अंग्रेजी की कक्षा चला रहे गीतू गुलाटी (बोमन ईरानी)के साथ वाले दृष्यों को देखकर ‘जबान संभाल के’ को ही याद कर रहे थे.

कितनी अजीब बात है कि राजकुमार हिरानी को अपनी फिल्म ‘डंकी’ के समापन दृश्यों में मृत प्रवासियों की दुःखद वास्तविक तस्वीरें दिखानी पड़ीं,जिससे थिएटर से बाहर जाते समय दर्शक भावुक हो जाए.

यह वही राज कुमार हिरानी हैं,जिन्होने उस वक्त फिल्म ‘‘थ््राी ईडिएट्स’’ में 45-वर्षीय स्टार कलाकार आमीर खान को 20-वर्षीय छात्र के रूप में प्रस्तुत किया था,मगर ‘डंकी’ में वह शाहरुख खान को युवा पेश नही कर पाए,जबकि 15 साल बाद वीएफएक्स वगैरह की काफी अत्याधुनिक तकनीक भी आ गयी है.इससे शाहरुख खान की अभिनय की कमजोरी सामने आती है.कितनी अजीब बात है.राज कुमार हिरानी को यह भी नही पता कि एक फौजी को पता होता है कि गैर कानूनी तरीके से किसी भी देश की सीमा में घुसना कितना बड़ा अपराध है और उसकी कितनी बड़ी सजा है.मगर वह मन्नू,बुग्गू व बल्ली के साथ इस कृत्य को करता है.दूसरे देष के सैंनिकों की हत्याएं करता है.लेकिन इंग्लैंड में पहुॅचने के बाद अचानक एक आदर्शवादी भारतीय की तरह पेश आने लगते हैं.अदालत में बयान भी देते हैं कि उन्हे उनके भारत देश में कहीं कोई खतरा नही है..वगैरह वगैरह..क्या एक आदर्शवादी, कानून में यकीन करने वाला फौजी गैर कनूनी तरीके से कई देशों की सीमाएं पार कर इंग्लैंड जाएगा? वास्तव में यह शाहरुख खान व राज कुमार हिरानी के दोहरे व्यक्तित्व का परिचायक है.परिणामतः ‘डंकी’ महज हवा में ही बहती है.इसकी कहानी में कहीं कुछ भी ठोस नहीं है.

‘डंकी’ में न तो कहानी है,न पटकथा और न ही ऐसे संवाद हैं,जो दर्शकों को बांध कर रख सकें.फिल्म के घटनाक्रम विश्वसनीय नही बन पड़े हैं.

अभिनयः

फिल्म ‘डंकी’ में हार्डी के किरदार में शाहरुख खान हैं,मगर वह किसी भी दृश्य में हार्डी नजर ही नही आते.‘पठान’ व ‘जवान’ में वह कुछ विश्वसनीय लगे थे,पर यहां तो न वह लार्जर देन लाइफ हीरो हैं और न ही जमीन से जुड़े हुए हीरो हैं.अदालत में जब हार्डी कहता है कि वह अपने ‘वतन’ में खतरे में नही है,तो इस संवाद में जो वजन होना चाहिए था,वह नही है.ऐसा लगता है कि किसी ने उनके सिर पर बंदूक रखकर उनसे यह बुलावाया है.खैर,दर्शकों को इस बात से खुश होना चाहिए कि ‘पठान‘ और ‘जवान‘ के बाद ‘डंकी’ में शाहरुख एक बार फिर देशभक्त हैं,जो अपने देश, मौसा और सभी को गले लगाएंगे.2023 में ‘पठान’ हो या ‘जवान’ हो या ‘डंकी’ हर फिल्म में शाहरुख खान अभिनेता कम व्यवसायी के रूप मंे ही ज्यादा सामने आए हैं.इसके अलावा उन पर अहम भी हावी है.परिणामतः उनके अभिनय में निरंतर गिरावत आती जा रही है.फिल्म मन्नू के किरदार में इंटरवल से पहले तापसी पन्नू अपने अभिनय से प्रभावित करती हैं,मगर इंटरवल के बाद तो वह महज कैरीकेचर ही हैं.तापसी पन्नू ने बेमन ही काम किया है.सुखी के किरदार में विक्की कौशल ने जरुर बेहतरीन परफार्मेंस दी हैं.मगर इंटरवल से पहले ही उनका किरदार गायब हो जाता है.गुलाटी के किरदार मे बोमन इरानी भी अपनी छाप नही छोड़ पाए.

पार्टी में गाजर से मीठे में बनाएं ये टेस्टी डिशेज

क्रिसमस और न्यू ईयर जैसे ओकेजन्स पर दोस्तों और परिवारी जनों के साथ पार्टी तो होती ही है और यूं भी किसी भी खास अवसर पर पार्टी तो की ही जाती है. पार्टी हो या अन्य कोई अवसर हम भारतीयों में मीठे के बिना पार्टी अधूरी ही रहती है. बाजार से लाये गए मीठे में जहां मिलावट और हाइजीन की समस्या रहती है वहीं घर पर बनाई गई साधारण सी डिश में स्वाद और पौष्टिकता दोनों ही होते है तो क्यों घर पर ही थोड़ी सी कोशिश से कुछ ऐसा बनाया जाए जो पौष्टिक, स्वादिष्ट और इंस्टेंट हो और जिसे घर में उपलब्ध सामग्री से ही आसानी से बनाया भी जा सके. इस समय बाजार में गाजर भरपूर मात्रा में मिल रही है. गाजर मिनरल्स, आयरन, और फाइबर से भरपूर होने के साथ साथ विटामिन ए का प्रचुर स्रोत होती है इसलिए इसे अपनी डाइट में अवश्य शामिल करना चाहिए. आज हम आपको गाजर से 2 स्वीट डिशेज बनाना बता रहे हैं जिन्हें आप आसानी से बनाकर परिवार के सदस्यों को खिला सकतीं हैं तो आइए देखते हैं कि इन्हें कैसे बनाया जाता है-

  1. कैरेट मफिन्स

कितने लोगों के लिए         6

बनने में लगने वाला समय     30 मिनट

मील टाइप                        वेज

सामग्री

किसी गाजर   2 कप

मैदा  डेढ़ कप

ताजी मलाई   3/4 कप

गुनगुना दूध  3/4 कप

वनीला एसेंस  1/4 टीस्पून

पिसी शकर   1 कप

बेकिंग सोडा 1/4 टीस्पून

बेकिंग पाउडर  1 टीस्पून

नमक  1 चुटकी

नीबू का रस  1/2 टीस्पून

बारीक कटे पिस्ता   सजाने के लिए

मक्खन  1/2 टीस्पून

विधि

मैदा, बेकिंग पाउडर, बेकिंग सोडा, नमक, पिसी शकर को एक साथ एक बाउल में छान लें. अब इसमें मलाई और दूध को मिलाएं, ध्यान रखें कि हमे इसे केवल मिश्रण के एकसार होने तक मिलाना है बहुत अधिक मिलाने पर मलाई मक्खन में कन्वर्ट हो जाएगी. अब इसमें 1 कप किसी गाजर, नीबू का रस औए वनीला एसेंस मिलाएं. मफिन्स मोल्ड्स को ग्रीस करें और तैयार बैटर को मोल्ड्स ।के डालें. ओवन को 5 मिनट प्रीहीट करें और मोल्ड्स को ट्रे में रखकर 180 डिग्री पर 30 मिनट तक बेक करें. एक पैन में बटर डालकर किसी गाजर डाल कर गाजर के हल्का सा नरम होने तक पकाएं. जब गाजर सॉफ्ट हो जाये तो 1 चम्मच शकर डालकर पानी के सूखने तक पकाएं. जब मफिन्स ठंडे हो जाएं तो मोल्ड से निकलकर तैयार गाजर के गनाश और कुछ कटे मेवों से सजाकर सर्व करें.

2.कैरेमल कैरेट मखाना खीर

कितने लोगों के लिए  6

बनने में लगने वाला समय   30 मिनट

मील टाइप  वेज

सामग्री     

मखाना   150 ग्राम

किसी गाजर  2 कप

फुल क्रीम दूध 1 लीटर

शकर  1/2 कप

बारीक कटी मेवा  1 कप

इलायची पाउडर  1/4 टीस्पून

दालचीनी पाउडर  1/4 टीस्पून

घी 1 टीस्पून

विधि

मखानों को बिना घी डाले पैन में धीमी आंच पर  क्रिस्पी होने तक रोस्ट कर लें इसी तरह सभी मेवों को हल्का सा रोस्ट करके एक बर्तन में निकाल लें.

अब मखानों को दरदरा सा कूट लें. दूध में जब 3-4 उबाल आ जाएं तो रोस्टेड मखानों दो दूध में डालकर तब तक पकाएं जब तक कि दूध उबलकर आधा न रह जाये. फिर मेवा डालकर गैस को बंद कर दें. अब एक दूसरे पैन में घी डालकर इलायची पाउडर और दालचीनी पाउडर डालकर चलाएं और फिर किसी गाजर डाल दें. जब गाजर सॉफ्ट हो जाये तो शकर डालें. इसे तब तक पकाएं जब तक कि गाजर का पानी पूरी तरह सूख न जाए. अब इस गाजर के मिश्रण को तैयार खीर में अच्छी तरह मिला दें. ऊपर से कटी मेवा डालकर सर्व करें.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें