इस दीवाली गिफ्ट करें बजट फ्रैंडली प्लांट्स

फैस्टिव सीजन पर गिफ्ट्स का आदानप्रदान तो चलता रहता है. कभी चौकलेट तो कभी मिठाई, कभी गैजेट्स तो कभी होम ऐप्लायंसिस लोग गिफ्ट के रूप में देते हैं. लेकिन अब समय बदल रहा है जिस के साथ हमारा और हमारे तौरतरीकों का बदलना भी बेहद जरूरी है. गिफ्ट का अर्थ ही होता है किसी को कुछ ऐसा देना जिस से प्राप्तकर्ता के चेहरे पर मुसकान भी आए और साथ ही गिफ्ट उस के लिए उपयोगी भी साबित हो. ऐसे में क्यों न फैस्टिवल को ग्रीन फैस्टिवल बनाते हुए उपहार में पौधे दिए जाएं जो आप के साथसाथ पर्यावरण के लिए भी लाभकारी हों.

वर्तमान हालात को देखा जाए तो पौधों को गिफ्ट के विकल्प में देखना वक्त की जरूरत है. ‘स्टेट औफ इंडियाज ऐन्वायरन्मैंट’ यानी एसओई के जून, 2019 में जारी किए गए डाटा के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष 12.5त्न लोगों की मृत्यु खराब एअर क्वालिटी यानी वायु प्रदूषण से होती है, साथ ही 5 वर्ष से कम उम्र के औसत 8.5त्न बच्चे वायु प्रदूषण से मौत के मुंह में जाते हैं.

यह बात तो किसी से छिपी नहीं है कि प्रतिवर्ष त्योहारों के सीजन खासकर दीवाली के बाद कितनी तेजी से वायु प्रदूषण होता है और हफ्तों तक धुएं का काला साया देश पर मंडराता है. ऐसे में जरूरी है कि हम सभी अपनीअपनी तरफ से हर वह काशिश करें जो वातावरण के लिए भी उचित हो.

त्योहारों के सीजन में हम अपने जानपहचान वालों को तरहतरह के पौधे गिफ्ट में दे सकते हैं. ये पौधे हमारी जेब पर भी ज्यादा भारी नहीं पड़ते और पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने में भी मददगार साबित होते हैं.

गिफ्ट में इन्हें दें

गिफ्ट के तौर पर देने के लिए स्नेक प्लांट एक अच्छा विकल्प हो सकता है. इस पौधे को एअर प्यूरीफायर के नाम से जाना जाता है. यह न केवल बेहद सुंदर है बल्कि पर्यावरण की दृष्टि से बेहद लाभकारी भी है. इसे बैडरूम में रखना सब से उपयोगी है क्योंकि यह रात में औक्सीजन रिलीज करता है. इस की खास बात यह भी है कि इसे वक्तबेवक्त पानी नहीं देना पड़ता बल्कि मिट्टी सूखने पर ही इसे पानी देना होता है.

ऐसा ही एक और विकल्प है पेपरोमिया. यह अपने सहकर्मियों या दोस्तों को देने के लिए अच्छा है. इसे वे चाहें तो घर या औफिस में भी रख सकते हैं. यह आकर्षक होने के साथसाथ लो मैंटेनैंस भी है. इस पर भी बहुत ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं पड़ती. यह खूबसूरत भी होता है और जगह भी कम घेरता है. अगर आप के किसी दोस्त को गार्डनिंग का शौक है और वह पौधे पर विशेष ध्यान दे सकता है तो आप उसे अंथुरियम नमक पौधे भी दे सकते हैं जिस के लाल रंग के फूलों की खूबसूरती पूरे वातावरण में जान डाल देती है.

तो चेहरे पर मुसकान आ जाए

एअर प्लांट डैजर्ट रोज, पानीटेल पाम, बिगोनिया, चाइनीज ऐवरग्रीन, मनी प्लांट, ऐलोवेरा और जेड प्लांट जैसे कुछ पौधे हैं जो कम देखभाल में भी अच्छी तरह पनप जाते हैं और घर की खूबसूरती को भी बढ़ाते हैं.

इन के अलावा हम कुछ ऐसे पौधे जो बड़े हो कर छायादार पेड़ बन जाते हैं, को भी लोगोें को गिफ्ट में दे सकते हैं. इन में नीम, जामुन, महुआ, आम, सेमल, अशोक आदि पेड़ खास हैं जिन्हें हम थोड़ा खुली जगह जैसे अपने आंगन, सड़क किनारे लगा सकते हैं.

आप इन पौधों को अच्छी पैकिंग में दे सकते हैं. पैकिंग से तात्पर्य कागज लपेट देने से नहीं है. आप सुंदर फ्लौवर पौट या प्लांट पौट ले सकते हैं. पौट के चारों तरफ चौकलेट््स भी लगा सकते हैं.

कुछ नया करने में झिझक कैसी     

फैस्टिवल पर लोगों को चाहे वे रिश्तेदार हों या औफिस के कर्मचारी उन्हें या तो चमचमाते उपहार चाहिए या मिठाई अथवा जेब भरने वाली रकम. मगर पौधे भी गिफ्ट में दिए जा सकते हैं इस तरफ कोई ध्यान नहीं देता, जबकि पर्यावरण के नारे लगाने सभी को पसंद हैं.

पिछली दीवाली के मौके पर एक कंपनी ने अपने कर्मचारियों को मिठाई के बदले अच्छे से पौट में पौधे गिफ्ट में दिए. बहुत से कर्मचारियों को तो समझ में ही नहीं आया कि ऐसा क्यों किया गया. नतीजा यह निकला कि ज्यादातर कर्मचारियों के गिफ्ट में मिले पौधे उन की अनदेखी की वजह से समय से पहले ही मुरझा गए.

ऐसे में हम सभी की यह कोशिश होनी चाहिए कि हम न केवल खुद नेचर फ्रैंडली गिफ्ट्स दें बल्कि अपने सगेसंबंधियों को भी इसी तरह के गिफ्ट्स देने के लिए प्रेरित करें. आज की गई यह शुरुआत हमारे कल को बेहतर बनाएगी.

कर ले तू भी मुहब्बत

लेखिका- मेहा गुप्ता

टैडी बियर: भाग 3- क्या था अदिति का राज

 

फिर वह नीलांजना के पास आ कर बोला, ‘‘तुम यहां कैसे? मतलब यहां किसलिए?’’

अर्णव के हैरानपरेशान चेहरे को देख नीलांजना की हंसी छूटने लगी. वह कुछ समझता उस से पहले ही धु्रव अर्णव के कंधे पर हाथ रखते हुए नीलांजना से बोला, ‘‘यह मेरा साला यानी अदिति का भाई है और अर्णव यह मेरी कजिन.’’

‘‘ओह नो…’’

‘‘अर्णव के हावभाव देख कर आदिति सहसा बोली, ‘‘नीलांजना यह तुम लाई हो… क्या तुम ही इस की….’’

‘‘हां भाभी मैं ही इस की ऐक्स गर्लफ्रैंड हूं… सौरी भाभी, प्रोग्राम तो अर्णव को परेशान करने का था, पर आप गेहूं के साथ घुन सी पिस गईं.’’

‘‘ओहो नीलांजना, बस अब बहुत हुआ… तेरे और अर्णव के चक्कर में मेरी प्यारी बीवी परेशान हो रही है. बस अब खोल दे सस्पैंस,’’ धु्रव ने कहा.

नीलांजना अर्णव और अदिति की बेचारी सी सूरत देख अपनी हंसी रोकते हुए बोली, ‘‘हुआ यों कि जब आप का और धु्रव भैया का फोटो सोशल साइट पर वायरल हुआ था तब मुझे इस टैडी को देख कर कुछ शक हुआ था, क्योंकि इस टैडीबियर को मैं ने अपने हाथ से बनाया था, इसलिए आसानी से पहचान लिया. और तो और इस के गले में मेरा वही रैड स्कार्फ बंधा था जो अर्णव को बहुत पसंद था. पोल्का डौट वाला रैड स्कार्फ… याद है अर्णव तुम उस स्कार्फ में देख कर मुझ पर कैसे लट्टू हो जाते थे,’’ कह वह जोर से हंसी तो अर्णव का चेहरा शर्म से लाल हो गया.

अर्णव किसी तरह अपनी झेंप मिटाते हुए बोला, ‘‘दीदी, कम से कम स्कार्फ तो हटा देतीं.’’

यह सुन कर अदिति शर्म से दुहरी होती हुई बोली, ‘‘तुम दोनों के सामने मेरी और अर्णव की करामात यों सामने आएगी, सोचा नहीं था.’’

‘‘भाभी प्लीज… ये सब मजाक था. आप दोनों को शर्मिंदा करना हमारा कोई मकसद थोड़े ही था… आप भाईबहन की क्यूट बौंडिंग पर हम भाईबहन थोड़ी मस्ती करना चाहते थे. पहले भैया राजी नहीं थे. मुझ पर नाराज भी हुए कि मैं ने अर्णव को तंग करने के लिए टैडी क्यों मांगा… भैया आप से बहुत प्यार करते हैं भाभी… आप की शादी को पूरा 1 साल हो गया है. मैं इंडिया आती आप से मिलती अर्णव भी मिलता तो सब सामने आता ही… ऐसे में फन के लिए मैं ने अपने ध्रुव भैया को पटाया कि चलो थोड़ी मौजमस्ती के साथ यह बात खुले… मेरी ऐंट्री धमाके के साथ हो तो मजा आ जाए…’’ नीलांजना ने अदिति का हाथ पकड़ कर कहा.

अदिति कुछ शर्मिंदगी से बोली, ‘‘जो भी कहो, पर मेरी चोरी धु्रव के सामने इस तरह आएगी मैं सोच भी नहीं सकती थी.’’

यह सुन कर धु्रव ने उसे गले से लगाते हुए कहा, ‘‘दिल तो तुम ने मेरा कभी का चुरा लिया था मेरी जान और हां हमारे प्यार के प्रूफ के लिए किसी टैडीवैडी की जरूरत नहीं… हां बाय द वे नीलांजना ने हमारी शादी के पहले ही मुझे सब बता दिया था. पहले जाहिर करता तो पता नहीं तुम कैसे रिएक्ट करतीं. अब 1 साल में तुम्हें अपने प्रेम में पूरी तरह गिरफ्त में लेने के बाद मैं ने मस्ती करने की गुस्ताखी की है,’’ धु्रव कानों को पकड़ते हुए बोला.

अदिति को अब भी मायूस खड़े देख कर नीलांजना बोली, ‘‘भाभी प्लीज, आप ऐसे सैड ऐक्सप्रैशन मत दो. ऐसे ऐक्सप्रैशन तो मैं अर्णव के चेहरे पर देखना चाहती थी, पर क्या बताऊं, अब उस में भी मजा नहीं, क्योंकि अभीअभी आते समय प्लेन में एक इंडियन से मेरी मुलाकात हो गई. खूब बातें भी हुईं… लगता है वह मुझ में रुचि ले रहा है. फोन नंबर दिया है… देखते हैं क्या होता है?’’ कह कर वह बिंदास हंस दी.

‘‘अदिति सच कहूं तो आज से कुछ साल बाद हम यह किस्सा सुनेंगे, सुनाएंगे और हंसेंगे…’’ धु्रव बोला.

नीलांजना भी कहने लगी, ‘‘भाभी, आप और भैया तथा इस टैडी का फोटो वायरन होने के बाद ही मैं ने अर्णव के प्रति पाली नाराजगी और कुछ आप को तंग करने की गुस्ताखी में अर्णव से टैडी मांगा था. अर्णव कुछ समझ नहीं पाया पर मेरे इस व्यवहार पर इतना नाराज हुआ कि उस ने मुझे दिए सारे गिफ्ट मांग लिए. आस्ट्रेलिया में होने के कारण शादी में मैं नहीं आई, पर कभी न कभी तो मैं अर्णव से मिलती ही, तब सब जान ही जाते… भैया शादी के पहले से ही सब जानते थे. हम ने तय किया था कि किसी ऐसे ही मजेदार मौके पर इस बात का खुलासा करेंगे.’’

‘‘ओह,’’ कह कर अदिति ने अपना सिर पकड़ लिया. फिर अर्णव को धौल जमाती हुए कहने लगी, ‘‘सब तेरी वजह से हुआ है.’’

अर्णव को अपनी पीठ सहलाते देख कर धु्रव हंसते हुए बोला, ‘‘अरे सुनो अदिति, जब टैडी वाली बात सामने आई है तो अब मैं भी कन्फेस कर लूं…’’

‘‘क्या…अब क्या रह गया है,’’ हैरानी से अदिति ने पूछा.

धु्रव हंस कर बोला, ‘‘तुम्हें पहली बार मैं ने जो ड्रैस दी थी. अरे वही पिंक वाली

ड्रैस जो तुम्हारे ऊपर बड़ी फबती दिखती है, जिसे पहन कर टैडी और मेरे साथ तुम ने फोटो खचवाया था, जो वायरल हुआ था सोशल साइट पर…’’

‘‘हांहां, समझ गई तो?’’

उस का मुंह आश्चर्य से खुला देख नीलांजना हंसते हुए बोली, ‘‘भाभी, वह ड्रैस मैं ने अपने लिए औनलाइन मंगवाई थी, पर टाइट पड़ गई… रिटर्न औप्शन भी नहीं था. भैया आप को गिफ्ट देना चाहते थे तो मैं ने कहा इसे दे दो. पैसे बच जाएंगे और ड्रैस भी काम आ जाएगी.’’

‘‘ओह, नो,’’ अदिति सिर थामते हुए बोली. फिर सहसा हंसते हुए कहने लगी, ‘‘फिर तो नीलांजना, हम दोनों तुम्हारे कर्जदार हैं. ये ड्रैस के लिए और मैं टैडीबियर के लिए,’’ फिर सहसा धीमेधीमे हंसते हुए धु्रव को देख नकली गुस्से से बोली, ‘‘और हां, तुम ने उस ड्रैस के लिए कैसेकैसे स्वांग रचे थे… क्या कहा था कि यह ड्रैस देखते ही मैं फिदा हो गया और यह भी कि ड्रैस तुम्हारे लिए बनी हुई लगती है.’’

‘‘हां, तो सही तो कहा था… तभी तो नीलांजना को टाइट पड़ गई…’’ धु्रव की बात सुन कर सब जोर से हंस पड़े. अदिति भी.

तभी अर्णव की आवाज आई, ‘‘दीदी,

10 बजे गए हैं, कुछ खाने को दो. और

हां नीलांजना काफी देर हो गई तुम्हारा कोई फोन नहीं आया. शायद जहाज में बैठे सहयात्री ने तुम्हारे साथ टाइम पास किया होगा. तभी फोन नहीं किया… देख लो, औप्शन अभी भी तुम्हारे सामने है,’’ अर्णव ने शरारत से कहा.

यह सुन ‘‘अर्णव के बच्चे,’’ कहते हुए नीलांजना ने टैडी उस पर दे मारा.

घर की इस गहमागहमी में धु्रव कुछ रूठी हुई अदिति को मनाते हुए कह रहा था,, ‘‘बड़ा शोर है यहां… अगले साल इन हड्डियों से बचने के लिए हम हनीमून पर कहीं बाहर चले जाएंगे…’’

‘‘सच?’’ अदिति ने नकली गुस्सा फेंक कर मुसकराते हुए उसे बाहों में भर लिया.

एकदूसरे से छिपाए गए बड़े झूठ यहां खुले थे, पर जो सच इन के दिलों में बंद था वह यह कि दोनों एकदूसरे से बेइंतहा प्यार करते थे. तभी तो एक के बाद एक हुए खुलासे पर दोनों को हंसी आ रही थी. शादी की पहली सालगिरह की दूसरी सुबह यकीनन यादगार थी.

दुनिया अगर मिल जाए तो क्या: भाग-3

ओनीर चुप रहा तो सहर को इस बात का दुख हुआ कि ओनीर ने यह नहीं कहा कि नहीं, मेरे लिए प्रेम ज्यादा जरूरी है. दोनों थोड़ी देर बाद एक जगह रेत पर बैठ गए. अंधेरा हो गया था. इतने में सहर का फोन बजा, ‘‘हां, मम्मी, आती हूं, ओनीर के साथ हूं. आप की मीटिंग कैसी रही? आती हूं, मम्मी. हां, अब सैलिब्रेट करेंगे.’’

ओनीर ने अंदाजा लगाया कि सहर और उस की मम्मी की बौंडिंग बहुत अच्छी है. वह जानता था कि कुछ साल पहले सहर के पिता नहीं रहे थे. उस की मम्मी वर्किंग थीं. सहर एक गहरी सांस ले कर चांद को देखने लगी. इस समय बीच पर बहुत ही खुशनुमा सा, कुछ रहस्यमयी सा माहौल होता है. छोटे बच्चे इधरउधर दौड़ते रहते हैं. इस समय जवान जोड़ों की बड़ी भीड़ होती है.

अंधेरे में दूर तक लड़केलड़कियां एकदूसरे से लिपटे, अपने प्रेम में खोए दुनिया को जैसे नकारने पर तुले होते हैं. ऐसा लगता है फेनिल लहरें हम से छिपमछिपाई खेल रही हैं, पास आती हैं, फिर अचानक चकमा दे

कर दूर हो जाती हैं. ओनीर ने कहा, ‘‘क्या सोचने लगी?’’

‘‘सितारों की गलियों में फिरता है तन्हा चांद भी,

किसी इश्क का मारा लगता है!’’

अब ओनीर से रुका न गया. उस ने सहर की हथेली अपने गीले से हाथ में पकड़ी और उस पर अपना प्यार रख दिया. सहर बस मुसकरा दी, शरमाई भी. कुछ पल यों ही गुजर गए. कोई कितना भी हाजिरजवाब हो, कुछ पल कभीकभी सब को चुप करवा देते हैं. सहर को भी कुछ सम?ा नहीं आ रहा था कि क्या कहे, बस,

बोल पड़ी, ‘‘कभी घर आओ, मम्मी से मिलवाती हूं.’’

‘‘आऊंगा. आओ, कुछ खाते हैं, फिर घर चलते हैं. तुम्हें देर हो रही होगी.’’

कुछ दिन और बीते, दोनों फोन पर टच में थे. अब जौब ढूंढ़ी जा रही थी. बहुत सारे औप्शंस दिख भी रहे थे. चैताली

की मदद से सहर उसी कालेज में

प्रोफैसर बन गई. चैताली और भी स्टूडैंट्स को गाइड कर रही थीं कि उन्हें क्या

करना चाहिए.

एक दिन ओनीर सहर से मिला.

सहर ने अपने जौब की खुशी में दोस्तों

को पार्टी के लिए बुलाया था. सहर ने ओनीर को छेड़ा, ‘‘हम लोग तो नौकरी ही ढूंढ़ रहे थे, तुम्हारा क्या हुआ, कौन से इतिहास के पन्ने पलट कर दोबारा क्रांति लाओगे?’’

नितारा भी उस के पीछे पड़ गई, ‘‘बताओ न, कौन सी पार्टी जौइन कर रहे हो?’’ ओनीर और सहर प्रेम की राह पर साथ बढ़ चुके हैं, यह अब सब को पता था. ओनीर ने झेंपते हुए कहा, ‘‘मैं ने भी प्रोफैसर पद के लिए ही अप्लाई किया है, वेट कर रहा हूं.’’

सब उस का मुंह देखने लगे. सहर की आंखों में एक संतोष उभरा.

ओनीर को अच्छा लगा कि सहर को उस के कैरियर की इस चौइस से खुशी हुई है. दोस्त हंसने लगे. ‘एक ही कालेज में प्रोफैसर बन जाओ दोनों, मजा आएगा.’ यों ही हंसीमजाक होता रहा. फिर सब चले गए. ओनीर रुका रहा. कुछ इधरउधर की बात करने के बाद सहर ने कहा,

‘आओ, किसी दिन आ कर मम्मी से मिल लो.’

‘‘ठीक है, कल आता हूं.’’

‘‘मम्मी की कल छुट्टी है, लंच पर आ जाओ.’’

‘‘ठीक है.’’

निकहत ने सहर से पूरी बात सुनी. वह बहुत खुश हुई. शानदार लंच मांबेटी ने मिल कर बनाया. उधर ओनीर अपनी उल?ानों में बुरी तरह बेचैन था. उसे सहर से प्यार था. वह उस से शादी करना चाहता था. उस ने जब अपने मम्मीपापा से इस बारे में बात

की तो उस के घर में एक तूफान आ

गया. उस के पिता विकास एक न्यूज चैनल में काम करते थे. मम्मी हाउसवाइफ थीं. किटी पार्टी, भजन, सत्संग वाली महिला

थीं वे.

दोनों ने सहर के बारे में सुन कर ओनीर को बुरी तरह दुत्कारा, छोटी बहन की शादी का वास्ता दिया. ओनीर को सहर के साथ आगे बढ़ना मुश्किल लगा. इस घर में तो सहर कभी खुश नहीं रह सकती थी, क्या करे. अब सहर को छोड़ नहीं सकता था पर मातापिता के प्रति भी फर्ज था. वही सदियों पुराना सवाल उस के सामने मुंहफाड़े खड़ा था कि फर्ज या प्रेम.

सहर के घर की डोरबैल बजाते हुए ओनीर ने नेमप्लेट पर लिखे नाम पढ़े, मानव नौटियाल, निकहत रिजवी, सहर रिजवी नौटियाल. उसे हंसी आ गई. अजीब ही परिवार था. सब की एक अलग ही अपनी पहचान थी. कैसी होंगी सहर की मम्मी! दरवाजा निकहत ने ही खोला. उन की एक स्माइल से ही ओनीर के सारे भ्रम, दुविधा दूर हो गए. वह सहज हो गया. निकहत ने उस से बहुत स्नेह, अपनेपन से बातें कीं.

सहर ने भी उस का खूब वैलकम किया. खानापीना बहुत अच्छे, स्नेहिल माहौल में हुआ. घर की साजसज्जा बहुत सलीके से, सुरुचिपूर्ण हुई थी. जब तक खाना खा कर सब फ्री हुए, तीनों के हंसीमजाक ऐसे हो रहे थे जैसे तीनों कब से एकदूसरे को जानते हैं.

निकहत बहुत जौली नेचर की महिला थीं. हर फील्ड की उन्हें खूब जानकारी थी. औस्कर में दीपिका के ब्लैक गाउन से ले कर ‘नाटूनाटू…’ तक बात करते हुए वे खूब उत्साहित थीं. वहीं, महाराष्ट्र की पलपल बदलती राजनीति पर उन की खूब पकड़ थी. ओनीर को बहुत अच्छा लग रहा था. उस ने पूछ लिया, ‘‘आंटी, आप मुंबई की, अंकल उत्तराखंड के? आप लोग कहां मिले? आप लोगों की शादी आराम से

हो गई?’’

निकहत का स्वर धीमा हो गया. चेहरा अचानक कुछ उदास हुआ. एक गहरी सांस ले कर बोलीं,

‘‘हमारे समाज में ऐसी शादियां आसानी से कहां हो सकती हैं. पढ़ेलिखे, आधुनिक बनते लोग जाति पर अटके रहते हैं.’’

यह सुन कर ओनीर मन ही मन कुछ शर्मिंदा सा हुआ पर परवरिश ने जोर मारा. मातापिता को याद किया. खुद को समझ लिया कि जाति का भी महत्त्व है. संस्कार चहक उठे. प्रेम कहीं दुबक गया.

निकहत आगे बताने लगीं, ‘‘जब बाबरी मसजिद के समय दंगों का माहौल था. मुझे अंदाजा नहीं था कि क्या होने वाला है. क्या हो सकता है. मैं किसी काम से घर से निकली हुई थी कि पता चला, मैं जिस जगह थी, वहां कर्फ्यू लगा दिया गया है. हम 2 बहनें ही थीं. मैं बड़ी थी. मैं एक जगह डरी खड़ी थी. मैं ने स्कार्फ पहना हुआ था. अपने सिर को ढक रखा था. तभी एक बाइक मेरे पास आ कर रुकी.

मानव थे. मानव ने अंदाजा लगा लिया कि मैं मुसलिम हूं. वे बोले, यहां मत रुको. मेरे सामने वाले फ्लैट में एक मुसलिम फैमिली रहती है, आप मु?ा पर तो यकीन नहीं करेंगी, अगर चाहो तो वहां रुक जाओ. सब ठीक हो जाए, तो अपने घर चली जाना. सामने वाली फैमिली बहुत अच्छी है, बुजुर्ग पतिपत्नी हैं. उन के इतना कहते ही कहीं शोर की आवाज हुई तो मैं घबरा गई.

‘‘उस समय कुछ और औप्शन नहीं था और दिल मानव पर विश्वास करने के लिए तैयार था. बगैर उन्हें जाने, उन का बात करने का ढंग और उन की आंखें जैसे एक सच्चे इंसान की तसवीर पेश कर रही थीं.

‘‘मैं यहीं आई थी सामने वाले फ्लैट में. तब मुझे पता नहीं था कि जिंदगी मुझे सामने वाले फ्लैट के रास्ते मानव के दिल और घर और फिर उस के जीवन तक ले आई है. बहुत दहशतभरा माहौल था. मैं 3 दिनों बाद बड़ी मुश्किल से अपने घर जा पाई थी.

खूब आगजनी हुई थी. वे 3 दिन मैं  लगातार मानव के फोन से ही अपने घरवालों के टच में थी. मेरे घर तक के रास्ते में बड़ी तोड़फोड़ हुई थी. कुछ लोग बड़े जिद्दी होते हैं, दिल के किसी कोने में रह ही जाते हैं. मानव ने मेरे दिल में उन दंगों के दौरान ऐसी जगह बनाई कि फिर मैं उस की मोहब्बत में सब भूल गई. सामने का फोन खराब था, वह अपने फोन से मेरे घरवालों से मेरी बात करवाता रहा. मेरे पास उस समय फोन नहीं था.

सामने वाले अंकलआंटी अब तो नहीं रहे पर जब तक वे रहे, मेरे सिर पर उन का हाथ हमेशा रहा. वह मेरे घर तक जा कर मुझे छोड़ कर आया पर मेरा एक जरूरी हिस्सा अपने साथ ले आया, मेरा दिल.’’

‘‘आप दोनों के घरवाले मान गए थे?’’

‘‘नहीं, कोई न माना. हम ने इंतजार किया कि वे हमें अपना आशीर्वाद दें पर कोई न माना. मानव का घर तो क्या, उत्तराखंड ही छूट गया. वे वहां फिर कभी नहीं गए. मेरे परिवार वालों ने भी हमें नहीं अपनाया पर हम क्या करते, न चाहते हुए भी उन के बिना जी ही लिए. कई बार प्रेम में बहुतकुछ छूटता है, बहुतकुछ मिलता भी है. हम ने बहुत प्यारमोहब्बत से अपना घरसंसार बसाया था. पर मानव के जाने के बाद, बस, अब सहर और मैं हूं. हमारा छोटा सा परिवार है जहां कम ही लोगों की आवाजाही है. अमजद इसलाम ने कहा है न-

‘‘कहां आके रुकने थे रास्ते, कहां मोड़ था उसे भूल जा. वो जो मिल गया उसे याद रख, जो नहीं मिला उसे भूल जा.’’

अब अचानक ओनीर को हंसी आ गई, बोला, ‘‘ओह, अब समझ. सहर ने यह शेरोशायरी कहां से सीखी.’’

निकहत और सहर भी इस बात पर हंस पड़ीं. तीनों और भी बहुत सी बातें करते रहे. फिर ओनीर उन से विदा ले अपने घर चला गया. उस के दिलोदिमाग की हालत अजीब थी. एक तरफ मातापिता और दूसरी तरफ सहर. क्या होगा! सोचने में कुछ दिन और बीत गए. इतने में ही उसे भी मुंबई के ही एक कालेज में जौब मिल गई.

सहर की खुशी का ठिकाना न था. ओनीर के घरवाले भी बहुत खुश हुए. ओनीर ने अब फिर उन से सहर से शादी के बारे में बात की. तो, घर का माहौल फिर बिगड़ गया. वह जा कर अपने बैडरूम में थका सा लेट गया. इतने में सहर का मैसेज आया. अब वह अकसर किसी भी गीत, शेर का कोई हिस्सा उसे भेजती रहती थी. उस का कहना था कि जब भी उसे ओनीर की याद आती है, वह ऐसा करती है.

सहर ने लिखा था, ‘‘ये दुनिया जहां आदमी कुछ नहीं है, वजह कुछ नहीं, दोस्ती कुछ नहीं है, जहां प्यार की कदर ही कुछ नहीं है, ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है!’’

सहर ने आगे लिखा था, ‘इश्क न हुआ कुहरा हो जैसे, तुम्हारे सिवा कुछ दिखता ही नहीं.’

ओनीर फोन अपने सीने पर रख कर ऐसे लेट गया जैसे यह फोन नहीं, सहर का हाथ हो. कई महीनों से उस के दिमाग में जो उधेड़बुन चल रही थी, अचानक जैसे उस ने विराम पाया. उसे लगा, हां, सहर का प्यार अगर उस से दूर हो जाए, सहर को खो कर उसे सबकुछ मिल भी जाए तो उस के लिए कितना बेमानी होगा. क्या करना है उसे इस दुनिया का. फिर उस के लिए जीवन कितना बेरंग होगा.

उस ने एक ठंडी सांस ली. घरवाले खुशीखुशी मान गए तो ठीक, वरना वह प्रेम पर बढ़े अपने कदमों को किसी हाल में वापस नहीं रखेगा. उसे सहर के साथ बहुत दूर तक चलना है, चाहे कुछ भी हो जाए. फैसला हो चुका था. अब संस्कार दुबके थे. प्रेम मुसकरा रहा था.

उफ हो ही गया: उस रात नर्वस क्यों था मंयक

‘‘ऐसेकैसे किसी भी लड़की से शादी की जा सकती है? कोई मजाक है क्या?

जिसे न जाना न समझ उस के साथ जिंदगी कैसे निभ सकती है?’’ मयंक अपनी मां सुमेधा पर झंझलाया.

तभी पिता किशोर बातचीत में कूद पड़े, ‘‘जैसे हमारी निभ रही है,’’ किशोर ने प्यार से पत्नी की तरफ देखते हुए कहा तो गोरी सुमेधा गुलाबी हो गई.

मयंक से उन की यह प्रतिक्रिया कहां छिप सकी थी. यह अलग बात है कि उस ने अपनी अनदेखी जाहिर की.

‘‘आप तो बाबा आदम के जमाने के दिव्य स्त्रीपुरुष हो. वह सेब आप दोनों ने ही तो खाया था. आप का मुकाबला यह आज के जमाने का तुच्छ मानव नहीं कर सकता,’’ मयंक ने अपने दोनों हाथ जोड़ कर जिस नाटकीय अंदाज में अपना ऐतराज दर्ज कराया उस पर किसी की भी हंसी छूटना स्वाभाविक था.

‘‘तो ठीक है करो अपनी पसंद की लड़की से शादी. हमें बुलाओगे भी या किसी दिन सामने ही ला कर खड़ी कर दोगे,’’ सुमेधा चिढ़ कर बोली तो मयंक नाक सिकोड़ कर गरदन झटकता हुआ अपने कमरे में घुस गया.

यह आज का किस्सा नहीं है. यह तो एक आम सा दृश्य है जो इस घर में पिछले 2 सालों से लगभग हर महीने 2 महीने में दोहराया जा रहा है. सुमेधा और किशोर का बेटे पर शादी करने का दबाव बढ़ता ही जा रहा है. वैसे उन का ऐसा करना गलत भी नहीं है.

‘‘तीस का होने जा रहा है. अभी नहीं तो फिर कब शादी करेगा? शादी के बाद भी तो

कुछ साल मौजमजे के लिए चाहिए कि नहीं? फिर बच्चे कब करेगा? एक उम्र के बाद बच्चे होने में भी तो दिक्कत आने लगती है. फिर काटते रहो अस्पतालों के चक्कर और लगाते रहो डाक्टरों के फेरे. चढ़ाते रहो अपनी गाड़ी कमाई का चढ़ावा इन आधुनिक मंदिरों में,’’ सुमेधा गुस्से से बोली.

मयंक का खीजते हुए अपने कानों में इयरफोन ठूंस लेना घर में एक तनाव को पसार देता है. फिर शुरू होती है उस तनाव को बाहर का रास्ता दिखाने की कवायद. सुमेधा की रसोई में बरतनों की आवाजें तेज होने लगती हैं और राकेश का अंगूठा टीवी के रिमोट के वौल्यूम वाले बटन को बारबार ऊपर की तरफ दबाने लगता है.

घर का तनाव शोर में बदल जाता है तो मयंक गुस्से में आकर टीवी बंद कर देता है और मां को कमर से पकड़ कर खींचता हुआ रसोई से बाहर ले आता है. कुछ देर के सन्नाटे के बाद मयंक अदरक वाली चाय के 3 कप बना कर लाता है और उस की चुसकियों के साथ आपसी तनाव को भी पीया जाता है. सब सहज होते हैं तो घर भी सुकून की सांस लेता है.

आज भी यही हुआ. लेकिन आज बात इस से भी कुछ आगे बढ़ी. सुमेधा आरपार वाले मूड में थी. बोली, ‘‘बहुत बचपना हो गया मयंक. अब शादी कर ही लो. चलो, हमारी न सही अपनी पसंद की लड़की ही ले आओ. लेकिन उम्र को बुढ़ाने में कोई सम?ादारी नहीं है.’’

सुमेधा ने हथियार डालते हुए कहा तो मयंक मन ही मन अपनी जीत पर खुश हुआ. पलक ?ापके बिना ही कालेज की साथी और अपने साथ काम करने वाली कई लड़कियां 1-1 कर उस के सामने से रैंप वाक करती गुजरने लगीं.

‘‘तो अब आप सास बनने की तैयारी कर ही लो,’’ मयंक ने कुछ इस अंदाज में कहा मानो लड़की दरवाजे पर वरमाला हाथ में लिए खड़ी उसी का इंतजार कर रही है. मामले में सुलह होती देख कर राकेश ने भी राहत की सांस ली.

मां की चुनौती स्वीकार करते ही मयंक के जेहन में अपनी पहली क्रश मोहिनी की तसवीर कौंध गई. लेकिन मोहिनी से संपर्क टूटे तो 5 साल बीत गए. अब तो सोशल मीडिया पर भी संपर्क में नहीं है.

सोशल मीडिया का खयाल आते ही मयंक ने मोहिनी को सर्च करना शुरू किया. न जाने कितने फिल्टर लगाने के बाद आखिर मोहिनी उसे मिल गई. प्रोफाइल खंगालते ही उसे झटका सा लगा. लेटैस्ट अपडेट में उस ने अपने हनीमून की मोहक तसवीरें लगा रखी थीं. मयंक का दिल टूटा तो नहीं लेकिन चटक जरूर गया.

कालेज में फाइनल ईयर वाली शालिनी के साथ भी कुछ इसी तरह का अनुभव उसे हुआ. शालिनी की गोद में गोलमोल बच्चे को देख कर उस ने आह भर ली.

‘मां सही कह रही है. मेरी शादी की ट्रेन अपने निर्धारित समय से साल 2 साल लेट चल रही है. मुझे अपनी ट्रेन भाग कर ही पकड़नी पड़ेगी,’ सोचते हुए मयंक ने स्कूलकालेज की साथियों को छोड़ कर अपनी सहकर्मियों पर ध्यान केंद्रित करना तय किया.

सब से पहले सूई वृंदा पर ही जा कर अटकी. मयंक वृंदा की नशीली आंखों को याद कर उन में गोते लगाने लगा. उस ने वृंदा को फोन लगाया, ‘‘हैलो वृंदा, आज शाम औफिस के बाद पार्किंग में मिलना. कौफीहाउस चलेंगे,’’ मयंक ने मन ही मन उसे प्रपोज करने की भूमिका साधते हुए कहा.

वृंदा ने उस का प्रस्ताव स्वीकार कर के उसे पहले पायदान पर जीत का एहसास दिलाया.

कौफी के घूंट के साथ कुछ इधरउधर की बातें चल रही थीं. आखिरी घूंट भर कर कप को मेज पर रखने के बाद मयंक ने अपनी आंखें वृंदा के चेहरे पर गड़ा दीं. वृंदा का कप अभी भी उस के होंठों से ही लगा था. उस ने कप के ऊपर से झंकती अपनी मोटीमोटी आंखों की भौंहों को चढ़ाते हुए इशारे से पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

मयंक ने इनकार में सिर हिला दिया. वह उस के कप नीचे रखने का इंतजार कर रहा था. जैसे ही उस ने कप नीचे रखा मयंक ने उस का हाथ थाम लिया, ‘‘आई लव यू.’’

मयंक ने जिस तरह कहा उसे सुन कर वृंदा अचकचा गई. फिर कुछ समझ तो मुसकरा दी, ‘‘मैं भी,’’ और उस ने आंखें  झुका कर अपनी स्वीकृति दे दी.

मयंक अपनी सफलता पर फूला नहीं समाया.

‘‘शादी करोगी मुझ से?’’ उत्साह में आए मयंक ने अगला प्रश्न दागा.

यह प्रश्न वृंदा को सचमुच गोली जैसा ही लगा. वह आश्चर्य से मयंक की तरफ देखने लगी. फिर बोली, ‘‘शादी नहीं कर सकती,’’ वृंदा ने ठंडा सा उत्तर दिया जिस की मयंक को कतई उम्मीद नहीं थी.

‘‘लेकिन अभी तो तुम ने कहा कि तुम भी मुझ से प्यार करती हो,’’ मयंक अब भी उस के जवाब पर विश्वास नहीं कर पा रहा था.

‘‘तो मैं कहां इनकार कर रही हूं. लेकिन शादी और प्यार 2 बिलकुल अलग तसवीरें हैं. शादी कोई बच्चों का खेल नहीं है. बहुत सी अपेक्षाओं, कर्तव्यों और जिम्मेदारियों का मिलाजुला नाम है शादी. मु?ो नहीं लगता कि मैं अभी ऐसी किसी भी स्थिति में पड़ने के लिए तैयार हूं. तुम अपने पेरैंट्स से कहो न कि तुम्हारे लिए कोई अच्छी सी लड़की तलाश करें. यकीन मानो इस मामले में उन की परख बहुत ही व्यावहारिक होती है. मैं तो अपने लिए ऐसा ही करने वाली हूं.’’

वृंदा की बेबाक टिप्पणी सुन कर मयंक को लगा जैसे उस ने किसी पत्थर के सनम को प्यार का फूल चढ़ाया है. वह अपना सा मुंह ले कर रह गया.

कुछ दिन देवदास का किरदार जीने के बाद मयंक को रीना का खयाल आया. रीना एक बहुत ही दिलचस्प लड़की है. मौडर्न सोसाइटी में एकदम फिट बैठने वाली. उस के साथ शामें बहुत ही शानदार गुजरती हैं. लेकिन इस के साथ ही उसे रीना का पी कर बहकना भी याद आ गया और वह उस की शादी की उम्मीदवारी से हट गई. रीना के बाद श्यामा और फिर इसी तरह मेघा भी दावेदारी से बाहर हो गई.

मयंक सकते में था कि शादी की बात आते ही वह इतनी दूर की क्यों सोचने लगा. कहां तो उसे यह वहम था कि वह चाहे तो शाम से पहले किसी भी लड़की को दुलहन बना मां के सामने ला कर खड़ी कर दे और कहां वह किसी एक नाम को अंतिम रूप नहीं दे पा रहा.

कई दिनों की माथापच्ची के बाद मयंक ने हार स्वीकार कर ली कि ऐसी लड़की जो खुद उस की पसंद की हो और मां की उम्मीदों पर भी खरी उतरे तलाश करना कम से कम उस के लिए तो आसान काम नहीं ही है. आखिर उस ने यह विशेषाधिकार फिर से मां को ही दे दिया. सुमेधा तो जैसे तैयार ही बैठी थी. झट काम्या की तसवीर और बायोडाटा मयंक के सामने रख दिया.

मुसकराती हुई आंखों वाली इंजीनियर काम्या मयंक को तसवीर देखने मात्र से ही अपनी सी लगने लगी. उसे इस एहसास पर आश्चर्य भी कम नहीं था. पूरा बायोडाटा पढ़ने के बाद पता चला कि काम्या मल्टीनैशनल कंपनी में जौब करती है. यह पढ़ते ही मयंक के जेहन में एक बार फिर से अपनी सहकर्मी लड़कियां डूबनेउतराने लगीं.

‘‘पता नहीं यह कैसी होगी? वृंदा, रीना जैसी या फिर मोहिनी शालिनी जैसी. क्या शादी निभा पाएगी या कहीं मैं ही न निभा पाया तो?’’ जैसे कई खयाल मन में उथलपुथल मचाने लगे. मयंक ने एक आजमाइश की सोची.

‘‘मुझे आप की पसंद पर एतराज नहीं लेकिन मैं इसे अपने तरीके से भी परखना चाहता हूं,’’ मयंक ने कहा तो सुमेधा चौंकी.

‘‘तुम्हारा तरीका कौन सा है?’’ सुमेधा ने पूछा.

‘‘वह काम्या समझ जाएगी,’’ मयंक ने कहा तो सुमेधा ने काम्या की मम्मी से बात कर के मयंक से मिलने की इजाजत ले ली.

आपस में बात कर के शनिवार शाम को दोनों ने एक क्लब में मिलना तय किया. काम्या जींस और खुले गले के टौप में काफी आकर्षक लग रही थी और मयंक की कल्पना से विपरीत भी.

कुछ देर की बातचीत के बाद मयंक ने सिगरेट सुलगा ली. 1-2 कश के बाद उस ने काम्या की तरफ बढ़ा दी.

‘‘पीती हो?’’ मयंक ने पूछा.

‘‘यदि पीना आप के लिए सही है तो मेरे लिए गलत कैसे हो सकता है,’’ कह कर उसे गहरी आंखों से देखती काम्या ने सिगरेट अपनी उंगलियों में थाम ली और कश खींचने लगी.

मयंक उसे घूर रहा था, ‘‘अल्कोहल?’’ मयंक के इस बार पूछने में एक खीज भी शामिल थी.

काम्या मुसकरा दी, ‘‘सेम आंसर.’’

मयंक को माथे पर कुछ नमी सी महसूस हुई. उस ने टिशू पेपर उठा कर बूंदों को थपथपाया. काम्या अब भी शांत थी.

‘‘बेचारी भोली मां. इस के प्रपोजल फोटोग्राफ पर री?ा गई. काश, हकीकत जान पाती,’’ मयंक को सुमेधा के चयन पर तरस आ रहा था.

2-4 मुलाकातों के बाद भी मयंक काम्या को लेकर कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाया. वह न तो उस के व्यवहार को ठीक से समझ पाया और न ही उस के बारे में कोई अच्छी या बुरी राय अपने मन में बना पाया. हर बार काम्या उसे पिछली बार से अलग एक नए ही अवतार में नजर आती. हार कर उस ने हर परिणाम भविष्य पर छोड़ दिया. इस एक मात्र निर्णय से ही उसे कितना सुकून मिला यह सिर्फ वही जान सका.

सगाई में हरेपीले लहंगे में सजी, लंबे बालों को फूलों की वेणी में बांधे काम्या उसे इस ट्रैडिशनल ड्रैस में भी उतनी ही सहज लग रही थी जितनी किसी वैस्टर्न ड्रैस में.

काम्या उसे एक पहेली सी लग रही थी और वही क्यों, काम्या से मिलने के बाद उसे तो सभी लड़कियां पहेली सी उलझ हुई ही लगने लगी थीं.

इसी पहेली की उलझन में भटकता मयंक एक रोज काम्या को अपनी शेष जिंदगी की हमसफर बना कर घर ले आया.

शादी के बाद जब उस के दोस्त उसे कमरे में छोड़ने की औपचारिकता कर रहे थे तब मयंक सचमुच ही बहुत नर्वस महसूस कर रहा था. इतना संकोच तो उसे अपनी सब से पहली गर्लफ्रैंड का हाथ पकड़ने पर भी नहीं हुआ था.

एक ही रात में ऐसा कुछ हो गया कि काम्या उसे अपने सब से अधिक नजदीक लगने लगी.

‘‘क्या तन से जुड़ाव ही मन से जुड़ाव की पहली सीढ़ी होती है?’’ यह प्रश्न मयंक के सामने आ कर खड़ा हो गया लेकिन वह कोई जवाब नहीं दे पाया. अब तक तो वह इस का उलट ही सही समझता आ रहा था. उस की थ्योरी के अनुसार तो पहले दिल मिलने चाहिए थे. शरीर का मिलन तो उस के बाद होता है. आज उसे समझ में आया कि थ्योरी पढ़ने और प्रैक्टिकल करने में कितना अंतर होता है.

हनीमून पर काम्या का साथ उस में एक अलग ही ऊर्जा का संचार कर रहा था. अनजानी काम्या उसे तिलिस्म से भरी किसी बंद किताब सी लग रही थी जिसे पन्ने दर पन्ने पढ़ना बेहद रोमांचकारी था. उस की आदतें, उस का व्यवहार, उस की पसंदनापसंद यानी काम्या से जुड़ी हर छोटी से छोटी बात भी मयंक को कुतूहल का विषय लग रही थी. उस में उस की दिलचस्पी बढ़ती ही जा रही थी.

‘‘आजकल सिगरेट नहीं पीते क्या?’’ एक शाम काम्या ने पूछा.

‘‘जो आदत मैं तुम्हारे लिए बुरी समझता हूं, वो मेरे लिए अच्छी कैसे हो सकती है?’’ मयंक ने जवाब दिया तो काम्या मुसकरा दी.

‘‘और अल्कोहल?’’ काम्या ने फिर पूछा.

‘‘सेम आंसर,’’ मयंक मुसकराया.

सुन कर काम्या पति के जरा और पास खिसक आई. हनीमून खत्म हो गया. दोनों ने अपनाअपना औफिस फिर से जौइन कर लिया. मयंक अब पूरे 10 घंटे काम्या से दूर रहता. वह काम्या के दिल का हाल तो नहीं जानता था लेकिन खुद वह लगभग हर 10 मिनट के बाद उस के बारे में सोचने लगता. काम्या कभी उसे बिस्तर पर लेटी उस का इंतजार करती नजर आती तो कभी चुपचाप बिस्तर पर पटका उस का गीला तौलिया उठा कर तार पर टांगने जाती दिखाई देती. कभी वह मां के साथ टेबल पर नाश्ता लगा रही होती तो कभी अपनी अलमारी में से पहनने के लिए कपड़े चुनने में मदद के लिए उस की तरफ देखती आंखों ही आंखों में सवाल करती और उस से सहमति लेती महसूस होती.

मयंक को इस तरह का अनुभव पहली बार हो रहा था. ऐसा नहीं है कि प्यार ने उस की जिंदगी में दस्तक पहली बार दी हो, लेकिन यह एहसास पिछली हर बार से अलग होता. यहां खोने या ब्रेकअप का डर नहीं है. नाराजगी के बाद मानने या न मानने की चिंता के बाद भी नहीं. किसी के देख लेने और पकड़े जाने की घबराहट नहीं है. दो घड़ी एकांत की तलाश में शहर के कोने खोजने की छटपटाहट नहीं है.

‘यह प्यार का कौनसा रूप है? इतनी लड़कियों से रिलेशन के बाद भी यह सौम्यता कभी महसूस क्यों नहीं हुई? रिश्ता इतना मुलायम क्यों नहीं लगा?’ मयंक सोचता और इतना सोचने भर से ही काम्या फिर से उस के खयालों में दखलंदाजी करने लगती.

मयंक का औफिस के बाद दोस्तों के साथ चिल करना भी इन दिनों काफी कम हो गया था. हर शाम वह खूंटा तुड़ाई गाय सा काम्या के पास दौड़ पड़ता.

आज शाम जैसे ही घर में घुसा, काम्या के पिताजी को बैठे देख कर चौंक गया. नमस्ते कर के भीतर गया तो देखा कि काम्या अपने कपड़े जमा रही थी.

‘‘ये कपड़े क्यों जमा रही हो?’’ मयंक ने पूछा.

‘‘मम्मी का फोन आया था कि शादी के बाद आई ही नहीं. आगे 2 दिन छुट्टी है, तो पापा को भेज दिया लिवाने के लिए,’’ काम्या ने सूटकेस बंद करते हुए कहा.

‘‘लेकिन मैं ने वीकैंड प्लान कर रखा था. तुम ने मुझे बताया तक नहीं,’’ अपना प्लान चौपट होते देख कर मयंक खीज गया.

‘‘वीकैंड तो आते ही रहेंगे. हम फिर कभी चल लेंगे. इस बार मां से मिलने का बहुत मन है,’’ काम्या ने बहुत ही सहजता से कहा.

मयंक का मुंह लटक गया. वह यह सोच कर ही बोरियत महसूस करने लगा कि 2 दिन अकेला घर में बैठ कर करेगा क्या? क्या काम्या वाकई उस के लिए इतनी जरूरी हो गई है? क्या वह उस का आदी होने लगा है?

काम्या अपने पापा के साथ चली गई. शादी के बाद पहली बार वह अपने बिस्तर पर अकेला लेटा. कंबल में से आती काम्या के शरीर की खुशबू उसे बेचैन करने लगी तो वह बैड पर काम्या वाली साइड जा कर लेट गया और उस के तकिए को कस कर जकड़ लिया. लंबीलंबी सांसें ले कर उस की महक को अपने भीतर उतारने लगा. फिर अपनी इस बचकानी हरकत पर खुद ही झेंप गया.

किसी तरह रात ढली और दिन निकला. मां चाय लेकर आई तो वह बड़ी मुश्किल से बिस्तर से निकल पाया. काम्या अब भी तकिए की शक्ल में उस की बगल में मौजूद थी. शाम होतेहोते न जाने कितने ही पल ऐसे आए जब काम्या उसे शिद्दत से याद आई.

आज नहाने के बाद मयंक ने अपना गीला तौलिया खुद ही बालकनी में जा कर धूप में डाला. अपना बिस्तर भी समेटा और गंदे मौजे भी धुलने के लिए लौंड्री बैग में रखे. मां के साथ टेबल पर खाना लगवाया और शाम को चाय के साथ काम्या की पसंद की मेथी मठरी भी खाई. ये सब करते हुए उसे लग रहा था मानो वह काम्या को पलपल अपने पास महसूस कर रहा हो.

सच ही कहा है किसी ने कि जब हम अपने प्रिय व्यक्तियों से दूर होते हैं तो उन की आदतों को अपना कर उन्हें अपने पास महसूस करने की कोशिश करते हैं. शायद मयंक भी यही कर रहा था. टहलते हुए पास के बाजार गया तो एक दुकान पर लालकाले रंग का लहरिए का दुपट्टा टंगा हुआ देखा.

इस से पहले मयंक ने कभी कोई जनाना आइटम नहीं खरीदी थी बल्कि वह तो खरीदने वाले अपने दोस्तों का जीभर कर मजाक भी उड़ाता था, लेकिन आज पता नहीं क्यों वह यह दुपट्टा खरीदने का लोभ संवरण नहीं कर पाया. शायद काम्या ने कभी लहरिए पर अपनी पसंद जाहिर की थी.

मयंक को लग रहा था जैसेकि ये सब बहुत फिल्मी सा हो रहा है लेकिन वह भी न जाने किस अज्ञात शक्ति से प्रेरित हुआ ये मासूम हरकतें बस करता ही चला जा रहा था.

‘कहीं मुझे प्यार तो नहीं हो गया?’ सोच मयंक को खुद पर शक हुआ.

‘हो सकता है कि मांपापा के बीच भी इसी तरह प्यार की शुरुआत हुई हो,’ सोच कर उस ने मुसकराते हुए टीवी औन किया.

‘‘हो गया है तुझ को तो प्यार सजना… लाख कर ले तू इनकार सजना…’’ गाना बज रहा था. मयंक ने काम्या के तकिए को फिर से खींच कर भींच लिया और आंखें बंद कर लेट गया. उफ, कमबख्त प्यार हो ही गया.

यह कैसा प्रेम: आलिया से क्यों प्यार करता था वह

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गुलाबी कागज: हरा भरा जीवन हुआ बदरंग

विनती एक एटीएम से दूसरे एटीएम बदहवास सी भागी जा रही थी. कहीं कैश नहीं था. मां नारायणी और बड़ी बहन माया अस्पताल में बेचैनी से उस की प्रतीक्षा कर रही थीं. बाबूजी की तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही थी पर डाक्टर 500 व 1,000 रुपए के पुराने नोट लेने को तैयार न थे. कल ही तो माया का इन पुराने नोटों की खातिर एक रिश्ता टूटा था. कहां तो आज माया डोली में बैठ कर विदा होने को थी और कहां बाबूजी ने सल्फास की गोलियां खा कर खुद अपनी विदाई का प्रबंध कर लिया था.

विनती के आगे लाइन में 30-40 लोग, बड़ी मुश्किल से मिले कैश वाले एटीएम के सामने खड़े थे. ‘जब तक उस का नंबर आए, कहीं कैश ही न खत्म हो जाए,’ वह यही सोच रही थी. आगे खड़े लोगों से आगे जाने के लिए उस की मिन्नतें कोई सुनसमझ नहीं रहा था. समझता भी कैसे, सब की अपनीअपनी विकराल जरूरतें मुंहबाए जो खड़ी थीं. तभी शोर मचा कि सुबह 5 बजे से लाइन में लगी घुटनों के बल जमीन पर बैठी वह वृद्ध, गरीब अम्मा चल बसी, भूखीप्यासी. वह किसी बड़े आदमी की मां तो न थी जो भरपेट पकवान खा कर 5-6 सेवकों के सहारे से नोट बदलवाने आती. कलेजा उछल कर मानो हलक में अटक गया. ‘ऐसे ही बाबूजी के साथ कहीं कुछ बुरा न हो गया हो,’ विनती इस आशंका से कांप उठी. उस ने माया दीदी को फिर फोन लगाया था.

कौल लगते ही पहले उधर से आवाज आई थी, ‘‘विनती, पैसे मिल गए क्या?’’

‘‘नहीं दीदी, अभी 30-40 लोग आगे हैं बस, हमारी बारी तक कैश खत्म नहीं होना चाहिए. बाबा को देखना…भैया के नोट बदले? फोन आया क्या?’’

‘‘कुछ जतन कर जल्दी, अनिल भी अभी तक हजार के उन नोटों में 2 भी कहीं नहीं बदल पाया. मां फिर बेहोश हो गई थीं. किसी तरह पानी के छींटे मारे तब होश आया. बहुत घबराहट हो रही है उन्हें. बाबूजी के पास ही लिटा दिया है. क्या करूं, कुछ समझ नहीं आ रहा.’’

‘‘बैंक खुल गया है, अभीअभी 10 लोग अंदर गए हैं. देखो, शायद अब जल्दी नंबर आ जाए.’’

‘‘तू कोशिश करती रह,’’ फोन कट गया था.

उधर, अनिल धक्कामुक्की में लाइन में चौथे नंबर पर पहुंच चुका था. तभी 4 लोग लंबी सी गाड़ी से उतरे और बिना रोकटोक के बैंक में घुस गए. ‘‘बैंक के अफसर तो नहीं लगते,’’ अनिल ने बाहर चौकीदारी पर तैनात बैंककर्मी को टोका था.

‘‘अंदर क्यों जाने दिया इन्हें, हम इतनी देर से लाइन में लग कर बड़ी मुश्किल से यहां पहुंचे हैं. यह तो गलत बात है.’’ सभी क्रोध और विरोध में धक्का दे कर  बैंक के अंदर घुसना चाह रहे थे. भगदड़ सी मच गई. पुलिस और बैंककर्मी के सहयोग से वे 4 लोग अंदर हो लिए तो गेट बंद कर पुलिस वालों ने लगभग सवा सौ आदमियों पर लाठियां भाजनीं शुरू कर दीं. अनिल जो आगे ही खड़ा था, उसे भी लाठी लगी. उस का माथा फूट गया. वह बैंक की सीढि़यों पर ही गिर गया. रूमाल बांध कर किसी तरह उस ने खून के रिसाव को रोका और वहीं डट कर बैठ गया, कुछ भी हो नोट बदल कर ही जाऊंगा. डंडे खा कर बाकी लोग लाचारगी में शांत हो गए थे. तभी गेट खुला, वे चारों लोग बाहर हो लिए थे. गेटकीपर ने फिर गेट बंद कर दिया और कैश खत्म की तख्ती लटकाने लगा.

‘‘यह क्या, अभी तो बताया था आप ने लंच तक काफी लोग निबट जाएंगे आज इतना कैश है, फिर…?’’

‘‘भाई मेरे, उन्होंने नंबर पहले किसी से लगवा रखे थे. 2 लाख रुपए बचे थे.

50-50 हजार रुपए के 4 चैक से उन्होंने नोट निकाल लिए. हम मना तो नहीं कर सकते ऐसे में किसी को.’’

‘‘यह बेईमानी है.’’

‘‘जनता के साथ सरासर धोखा है.’’

‘‘रोजरोज के बदलते नियमोंफैसलों से थक कर परेशान हैं हम. क्यों नहीं सभी सही नोटों पर एक्सपाइरी छाप देते और आरबीआई की स्टैंप लगाते जाते, इस तरह का कोई आसान हल ढूंढ़ते पहले.’’

‘‘हम सब भी देश की प्रगति चाहते हैं, कालाधन बंद हो, पर उचित व्यवस्था तो पहले कर लेनी चाहिए थी.’’

‘‘न पर्याप्त नए नोट ही छपे, न एटीएम ही काम कर रहे.’’

‘‘पर नकली नोट बड़ी तेजी से छप कर मार्केट में आ जाते हैं, कमाल है, कालेधन पर ऐसे नियंत्रण होगा?’’

‘‘उस पर से, कमीशन पर पैसे बदलने के नएनए खुलते जा रहे धंधोंहथकंडों का क्या?’’

चारों ओर मचे शोर में अनिल की आवाज भी कहीं शामिल हो कर खो रही थी. उस का सिर घूमने लगा. वह सिर पकड़ कर थोड़ी देर को बैठना चाहता था, पर नहीं, उसे किसी भी हालत में नोट बदल कर बाबा के पास पहुंचना ही होगा, यों बैठ नहीं सकता. वह निकल पड़ा दूसरी ब्रांच, दूसरे एटीएम की ओर. उस की बाइक की तरह उस का सिर भी तेजी से घूम रहा था. परेशानियों के साथ घाव अपना शिकंजा कसता ही जा रहा था. बैलेंस बिगड़ा, अचानक वह डिवाइडर से टकराया और फिर बाइक कहीं, हैलमेट कहीं, वह सड़क पर गिर पड़ा. पीछे से आ रही तेज रफ्तार किसी अमीरजादे की, बीएमडब्लू उसे बेफिक्री से हिट कर सरपट जा चुकी थी. वह औंधेमुंह अचेतन सड़क पर पड़ा था. कुछ लोग इकट्ठे हो गए. पुलिस ने आ कर काम शुरू कर दिया, तो एटीएम कार्ड के साथ एक हजार रुपए के 5 नोट और आधारकार्ड मिल गए थे.

इधर, विनती लाइन में लगी 10वें नंबर पर आ गई थी. ‘इस बार 10 लोगों को अंदर किया तो मुझे भी पैसे मिल जाएंगे,’ यह सोच कर उसे थोड़ी आस बंधी.

‘‘चलिएचलिए, 10-12 लोग अंदर आ जाइए.’’ बैंककर्मी की आवाज आते ही रेले के साथ विनती भी अंदर हो ली. जब तक उसे पैसे मिल नहीं गए, धुकधुक लगी रही. चैक से मिल गए थे उसे 2 गुलाबी कागज यानी 2 हजार रुपए. ‘2 पिंक नोट, कितने कीमती, बाबा की जान बचा सकेंगे.’ उस ने राहत की सांस ली.’ ‘जल्दी पहुंचना होगा. दीदी को बता दूं पैसे मिल गए,’ पर मोबाइल डिस्चार्ज हो चुका था. वह तेजी से भागी. परेशान मन उस से तेज भाग रहा था. ‘क्या पता भैया ही नोट बदलवा कर पहले पहुंच गए हों और बाबा का उपचार हो रहा हो. काश, ऐसा ही हुआ हो’, रास्तेभर ऐसा ही सोचतेसोचते वह अस्पताल में लगभग भागती हुई घुसी.

गुलाबी कागज हाथ में भींचे हुए वह कैश काउंटर पर पहुंची थी. पीछे से किसी ने उस के कंधे पर हाथ रखा था. उस की माया दीदी थी, ‘‘बाबा, हमें छोड़ कर चले गए दुनिया से, विनती.’’ वह विनती से लिपट कर फफक कर रो पड़ी. हृदयविदारक चीख निकली थी दोनों बहनों की. बाबूजी की छाती पर सिर रखे अम्मा उन्हें बारबार उठ जाने के लिए कह रही थीं.

‘‘तैयार नहीं हुए? माया की बरात आने वाली है. देखो, सब बाहर तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं, जल्दी करो.’’ सदमे का उन के दिमाग पर असर हो गया था. वे बकझक करने लगी थीं.

इधर, माया का मोबाइल बजा था. ‘‘कहां था? कब से फोन लगा रही तुझे. सब ख़त्म हो गया, बाबूजी नहीं रहे. अन्नू, आ जा बहुत हो गई नोट बदली. सरकार ने तो हम सब की जिंदगी बदल कर रख दी.’’ एक सांस में बोल कर माया रोए जा रही थी तो विनती ने फोन ले कर अपने कानों से लगाया तो आवाज सुनाई दी, ‘‘मैडम, बात सुनिए, मैं पुलिस इंस्पैक्टर यादव, सफदर जंग अस्पताल से बोल रहा हूं. अनिल के सिर पर गंभीर चोटें आई हैं, यहां इमरजैंसी में भरती है, इलाज चल रहा है, फौरन पहुंचें.’’

हृदय चीत्कार उठा. सुनते ही विनती ने उन पिंक नोटों को मुट्ठी में भींच लिया जैसे वे अब केवल कागज हों…गुलाबी कागज, जिन का कुछ रंग उतर कर उस की हथेली पर आ गया था, जिस ने उन के हरेभरे जीवन को बदरंग कर दिया. आंसुओं में भीगे शून्य में ताकते कई चेहरे इसी तरह स्याह, सफेद व बेरंग होते रहे, फिर चाहे अस्पताल हो, बैंक एटीएम हो या और कोई जगह. पर फर्क किसे पड़ा? किसे पड़ना चाहिए था? कौन देखता है? बस, जनता के सेवकों की तानाशाही राजनीति जारी है, वह बखूबी चलनी चाहिए. विनती की मुट्ठी का मुड़ातुड़ा नोट जैसे यही बयान किए जा रहा था.

तेंदूपत्ता : क्या था शर्मिष्ठा का असली सच

शर्मिष्ठा ने कार को धीमा करते हुए ब्रैक लगाई. झटका लगने से सहयात्री सीट पर बैठी जेनिथ, जो ऊंघ रही थी, की आंखें खुल गईं, उस ने आंखें मिचका कर आसपास देखा. समुद्रतट के साथ लगते गांव का कुदरती नजारा. बड़ेबड़े, ऊंचेऊंचे नारियल और पाम के पेड़, सर्वत्र नयनाभिराम हरियाली.

‘‘आप का गांव आ गया?’’

‘‘लगता तो है.’’ सड़क के किनारे लगे मील के पत्थर को पढ़ते शर्मिष्ठा ने कहा. दोढाई फुट ऊंचे, आधे सफेद आधे पीले रंग से रंगे मील के पत्थर पर अंगरेजी और मलयाली भाषा में गांव का नाम और मील की संख्या लिखी थी.

‘‘यहां भाषा की समस्या होगी?’’ जेनिथ ने पूछा.

‘नहीं, सारे भारत में से केरल सर्वसाक्षर प्रदेश है. यहां अंगरेजी भाषा सब बोल और समझ लेते हैं. मलयाली भाषा के साथसाथ अंगरेजी भाषा में बोलचाल सामान्य है.’’

‘‘तुम यहां पहले कभी आई हो?’’

‘‘नहीं, यह मेरा जन्मस्थान है, ऐसा बताते हैं. मगर मैं ने होश अमेरिका की ईसाई मिशनरी में संभाला था.’’ शर्मिष्ठा ने कहा.

‘‘तुम्हारी मेरी जीवनगाथा बिलकुल एकसमान है.’’

कार से उतर कर दोनों ने इधरउधर देखा. चारों तरफ फैले लंबेचौड़े धान के खेतों में धान की मोटीभारी बालियां लिए ऊंचेऊंचे पौधे लहरा रहे थे.

समुद्र से उठती ठंडी हवा का स्पर्श मनमस्तिष्क को ताजा कर रहा था. धान के खेतों से लगते बड़ेबड़े गुच्छों से लदे केले के पेड़ भी दिख रहे थे.

एक वृद्ध लाठी टेकता उन के समीप से गुजरा.

‘‘बाबा, यहां गांव का रास्ता कौन सा है?’’ थोड़े संकोचभरे स्वर में शर्मिष्ठा ने अंगरेजी में पूछा.

लाठी टेक कर वृद्ध खड़ा हो गया, बोला, ‘‘आप यहां बाहर से आए हो?’’ साफसुथरी अंगरेजी में उस वृद्ध ने पूछा.

‘‘जी हां.’’

‘‘यहां किस से मिलना है?’’

‘‘कौयिम्मा नाम की एक स्त्री से.’’

‘‘वह नाथर है या नादर? इस गांव में 2 कौयिम्मा हैं. एक सवर्ण जाति की है, दूसरी दलित है. पहली, आजकल सरकारी डाकबंगले में मालिन है, खाली समय में तेंदूपत्ते तोड़ कर बीडि़यां बनाती है. दूसरी, मरणासन्न अवस्था में बिस्तर पर पड़ी है.’’

फिर उस वृद्ध ने उन को एक कच्चा वृत्ताकार रास्ता दिखाया जो सरकारी डाकबंगले को जाता था. दोनों ने उस वृद्ध, जिस का नाम जौन मिथाई था और जो धर्मांतरण कर के ईसाई बना था, का धन्यवाद किया.

कार मंथर गति से चलती, डगमगाती, कच्चे रास्ते पर आगे बढ़ चली.

डाकबंगला अंगरेजों के जमाने का बना था व विशाल प्रागंण से घिरा था. चारदीवारी कहींकहीं से खस्ता थी. मगर एकमंजिली इमारत सदियों बाद भी पुख्ता थी. डाकबंगले का गेट भी पुराने जमाने की लकड़ी का बना था. गेट बंद था.

कार गेट के सामने रुकी. ‘‘यहां सुनसान है. दोपहर ढल रही है. यहां कहीं होटल होता?’’ जेनिथ ने कहा.

शर्मिष्ठा खामोश रही. उस ने कार से बाहर निकल डाकबंगले का गेट खोला और प्रागंण में झांका, सब तरफ सन्नाटा था.

एक सफेद सन के समान बालों वाली स्त्री एक क्यारी में खुरपी लिए गुड़ाई कर रही थी. उस ने सिर उठा कर शर्मिष्ठा की तरफ देखा और सधे स्वर में पूछा, ‘‘आप किस को देख रही हैं?’’

‘‘यहां कौन रहता है?’’

‘‘कोई नहीं. सरकारी डाकबंगला है. कभीकभी कोई सरकारी अफसर यहां दौरे पर आते हैं. तब उन के रहने का इंतजाम होता है,’’ वृद्ध स्त्री ने धीमेधीमे स्वर में कहा.

‘‘आप कौन हो?’’

‘मैं यहां मालिन हूं. कभीकभी खाना भी पकाना पड़ता है.’’

‘‘आप का नाम क्या है?’’

‘‘मैं कौयिम्मा नाथर हूं’’

शर्मिष्ठा खामोश नजरों से क्यारी में सब्जियों की गुड़ाई करती वृद्धा को देखती रही.

उस को अपनी मां की तलाश थी. मगर उस का पूरा नाम उस को मालूम नहीं था. कौयिम्मा नाथर या कौयिम्मा नादर.

‘‘आप को यहां डाकबंगले में  ठहरना है?’’ वृद्धा ने हाथ में पकड़ी खुरपी को एक तरफ रखते हुए कहा.

‘‘यहां कोई होटल या धर्मशाला है?’’

‘‘नहीं, यहां कौन आता है?’’

‘‘खानेपीने का इंतजाम क्या है?’’

‘‘रसोईघर है, मगर खाली बरतन हैं. लकड़ी से जलने वाला चूल्हा है. गांव की हाट से सामान ला कर खाना पका देते हैं.’’

‘‘बिस्तर वगैरा?’’

‘‘उस का इंतजाम अच्छा है.’’

‘‘यहां का मैनेजर कौन है?’’

‘‘कोई नहीं, सरकारी रजिस्टर है. ठहरने वाला खुद ही रजिस्टर में अपना नाम, पता, मकसद सब दर्ज करता है,’’ वृद्धा साफसुथरी अंगरेजी बोल रही थी.

‘‘आप अच्छी अंगरेजी बोलती हैं. कितनी पढ़ीलिखी हैं?’’

‘‘यहां मिडिल क्लास तक का सरकारी स्कूल है. ज्यादा ऊंची कक्षा तक का होता तो ज्यादा पढ़ जाती,’’ वृद्धा ने अपने मात्र मिडिल कक्षा यानी 8वीं कक्षा तक ही पढ़ेलिखे होने पर जैसे अफसोस किया.

शर्मिष्ठा और उस की अमेरिकन साथी जेनिथ को मात्र 8वीं कक्षा तक पढ़ीलिखी स्त्री को इतनी साफसुथरी अंगरेजी बोलने पर आश्चर्य हुआ.

वृद्धा ने एक बड़ा कमरा खोल दिया. साफसुथरा डबलबैड, पुराने जमाने का

2 बड़ेबड़े पंखों वाला खटरखटर करता सीलिंग फैन, आबनूस की मेज, बेत की कुरसियां.

चंद मिनटों बाद 2 कप कौफी और चावल के बने नमकीन कुरमुरे की प्लेट लिए कौयिम्मा नाथर आई.

‘‘आप पैसा दे दो, मैं गांव की हाट से सामान ले आऊं.’’

शर्मिष्ठा ने उस को 500 रुपए का एक नोट थमा दिया. एक थैला उठाए कौयिम्मा नाथर सधे कदमों से हाट की तरफ चली गई.

कौयिम्मा नाथर अच्छी कुक थी. उस ने शाकाहारी और मांसाहारी भोजन पकाया. मीठा हलवा भी बनाया. खाना खा दोनों सो गईं.

शाम को दोनों घूमने निकलीं. कौयिम्मा नाथर साथसाथ चली. बड़े खुले प्रागंण में ऊंचेऊंचे कगूंरों वाला मंदिर था.

‘‘यह प्राचीन मंदिर है. यहां दलितों प्रवेश निषेध है.’’

थोड़ा आगे खपरैलों से बनी हौलनुमा एक बड़ी झोंपड़ी थी. उस के ऊपर बांस से बनी बड़ी बूर्जि थी. उस पर एक सलीब टंगी थी.

‘‘यह चर्च है. जिन दलितों को मंदिर में प्रवेश नहीं मिलता था, वे सम्मानजनक जीवन जीने के लिए हिंदू धर्म को छोड़ कर ईसाई बन गए. उन सब ने मिल कर यह चर्च बनाया. हर रविवार को ईसाइयों का एक बड़ा समूह यहां मोमबत्ती जलाने आता है,’’ कौयिम्मा नाथर के स्वर में धर्मपरिवर्तन के लिए विवश करने वालों के प्रति रोष झलक रहा था.

मंथर गति से चलती तीनों गांव घूमने लगीं. सारा गांव बेतरतीब बसा था. कहींकहीं पक्के मकान थे, कहींकहीं खपरैलों से बनी छोटीबड़ी झोंपडि़यां.

एक बड़े मकान के प्रागंण में थोड़ीथोड़ी दूरी पर छोटीछोटी झोंपडि़यां बनी थीं.

‘‘प्रागंण की ये झोंपडि़यां क्या नौकरों के लिए हैं?’’

‘‘नहीं, ये बेटी और जंवाई की झोंपड़ी कहलाती हैं.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘अधिकांश इलाके में मातृकुल का प्रचलन है. यहां बेटियों के पति घरजंवाई बन कर रहते आए हैं. अब इस परंपरा में धीरेधीरे परिवर्तन आ रहा है,’’ कौयिम्मा नाथर ने बताया.

‘‘मगर अलगअलग स्थानों पर झोंपडि़यां?’’

‘‘यहां बेटियां बहुतायत में होती हैं. आधा दर्जन या दर्जनभर बेटियां सामान्य बात है. शादी की रस्म साधारण सी है. जो पुरुष या लड़का, बेटी को पसंद आ जाता है उस से एक धोती लड़की को दिला दी जाती है. बस, वह उस की पत्नी बन जाती है.’’

‘‘और अगर संबंधविच्छेद करना हो तो?’’

‘‘वो भी एकदम सीधे ढंग से हो जाता है. पति का बिस्तर और चटाई लपेट कर झोंपड़ी के बाहर रख दी जाती है. पति संबंधविच्छेद हुआ समझा जाता है. वह चुपचाप अपना रास्ता पकड़ता है.’’

कौयिम्मा नाथर ने विद्रूपताभरे स्वर में कहा, ‘‘मानो, पति नहीं कोई खिलौना हो जिस को दिल भरते फेंक दिया जाता है.’’ वृद्धा ने आगे कहा, ‘‘मगर इस खिलौने की भी अपनी सामाजिक हैसियत है.’’

‘‘अच्छा, वह क्या?’’ जेनिथ, जो अब तक खामोश थी, ने पूछा.

‘‘मातृकुल परंपरा में भी पिता नाम के व्यक्ति का अपना स्थान है. समाज में अपना और संतान का सम्मान पाने के लिए किसी भद्र पुरुष की पत्नी होना या कहलाना जरूरी है.’’

शर्मिष्ठा और जेनिथ को कौयिम्मा नाथर का मंतव्य समझ आ रहा था.

‘‘आप का मतलब है कि स्त्री के गर्भ में पनप रहा बच्चा चाहे किसी असम्मानित व्यक्ति का हो मगर बच्चे को समाज में सम्मान पाने के लिए उस की माता का किसी सम्मानित पुरुष की पत्नी कहलाना जरूरी है,’’ जेनिथ ने कहा.

कौयिम्मा नाथर खामोश रही. शाम का धुंधलका गहरे अंधकार में बदल रहा था. तीनों डाकबंगले में लौट आईं.

अगली सुबह कौयिम्मा नाथर उन को नाश्ता करवाने के बाद तेंदूपत्ते की पत्तियां गोल करती, उन में तंबाकू भरती बीडि़यां बनाने बैठ गई. दोनों अपनेअपने कंधे पर कैमरा लटकाए गांव की तरफ निकलीं.

एक भारतीय लड़की और एक अंगरेज लड़की को गांव घूमते देखना ग्रामीणों के लिए सामान्य ही था. ऐसे पर्यटक वहां आतेजाते रहते थे.

चर्च का मुख्य पादरी अप्पा साहब बातूनी था. साथ ही, उस को गांव के सवर्ण या उच्च जाति वालों से खुंदक थी. सवर्ण जाति वालों के अनाचार और अपमान से त्रस्त हो कर उस ने धर्मपरिवर्तन कर ईसाईर् धर्म अपनाया था.

उस ने बताया कि कौयिम्मा नाथर एक सवर्ण जाति के परिवार से है जो गरीब परिवार था. गांव में सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन थी. जिस को आजादी से पहले तत्कालीन राजा के अधिकारी और कानूनगो ने जबरन गांव के अनेक परिवारों के नाम चढ़ा दी थी.

विवश हो उन परिवारों को खेती कर या मजदूरों से काम करवा कर राजा को लगान देना पड़ता था. एक बार लगान की वसूली के दौरान कानूनगो रास शंकरन की नजर नईनई जवान हुई कौयिम्मा नाथर पर पड़ी. उस ने उस को काबू कर लिया था.

जब उस को गर्भ ठहर गया तब कानूनगो ने कौयिम्मा को अपने एक कारिंदे कुरू कुनाल नाथर से धोती दिला दी थी. इस प्रकार कुरू नाथर कौयिम्मा का पति बन कर उस की झोंपड़ी में सोने लगा था.

जब कौयिम्मा नाथर को बेटी के रूप में एक संतान हो गई तब उस ने एक दोपहर कुरू कुनाल नाथर का बिस्तर और चटाई दरवाजे के बाहर रख दी. शाम को जब कुरू कुनाल नाथर लौटा तब उस को दरवाजा बंद मिला. तब वह चुपचाप अपना बिस्तर उठा किसी अन्य स्त्री को धोती देने चला गया.

बेटी का भविष्य भी मेरे ही समान न हो, इस आशय से कौयिम्मा नाथर ने एक रोज अपनी बेटी को ईसाई मिशनरी के अनाथालय में दे दिया था. वहां से वह बेटी केंद्रीय मिशनरी के अनाथालय में चली गई थी.

इतना वृतांत बताने के बाद पादरी खामोश हो गए. आगे की कहानी शर्मिष्ठा को मालूम थी. ईसाई मिशनरी के केंद्रीय अनाथालय से उस को अमेरिका में रहने वाले निसंतान दंपती ने गोद ले लिया था.

अब शर्मिष्ठा मल्टीनैशनल कंपनी में कार्यरत थी. जब उस को पता चला था कि वह घोष दंपती की गोद ली संतान है तो वह अपने वास्तविक मातापिता का पता लगाने के लिए भारत चली आई.

माता का पता चल गया था. पिता दो थे. एक जिस ने माता को गर्भवती किया था. दूसरा, जिस ने माता को समाज में सम्मान बनाए रखने के लिए धोती दी थी.

अजीब विडंबनात्मक स्थिति थी. सारे गांव को मालूम था. कौयिम्मा नाथर का असल पति कौन था. धोती देने वाला कौन था. तब भी थोथा सम्मान थोथी मानप्रतिष्ठा.

रिटायर्ड कानूनगो बीमार पड़ा था. उस के बड़े हवेलीनुमा मकान में पुरुषों की संख्या की अपेक्षा स्त्रियों की संख्या काफी ज्यादा थी. अपने सेवाकाल में पद के रोब में कानूनगो ने पता नहीं कितनी स्त्रियों को अपना शिकार बनाया था. बाद में बच्चे की वैध संतान कहलाने के लिए उस स्त्री को किसी जरूरतमंद से धोती दिला दी थी.

बाद में वही संतान अगर लड़की हुई, तो उस को बड़ी होने पर कोई प्रभावशाली भोगता और बाद में उस को धोती दिला दी जाती.

यह बहाना बना कर कि वे दोनों पुराने जमाने की हवेलियों पर पुस्तक लिख रही हैं, शर्मिष्ठा और जेनिथ हवेली और उस के कामुक मालिक को देख कर वापस लौट गईं.

धोती देने वाला पिता मंदिर के प्रागंण में बने एक कमरे में आश्रय लिए पड़ा था. उस को मंदिर से रोजाना भात और तरकारी मिल जाती थी. उस की इस स्थिति को देख कर शर्मिष्ठा दुखी हुई. मगर वह क्या कर सकती थी. दोनों चुपचाप डाकबंगले में लौट आईं.

दोनों पिताओं में किसी को भी शर्मिष्ठा अपना पिता नहीं कह सकती थी. मगर क्या माता उस को स्वीकार कर अपनी बेटी कहेगी? यह देखना था.

‘‘मुझे अपनी मां को पाना है, वे इसी गांव की निवासी हैं, क्या आप मदद कर सकती हैं?’’ अगली सुबह नाश्ता करते शर्मिष्ठा ने वृद्धा से सीधा सवाल किया.

‘‘उस का नाम क्या है?’’

‘‘कौयिम्मा.’’

‘‘नाथर या नादर?’’

‘‘मालूम नहीं. बस, इतना मालूम है कि कौयिम्मा है. उस ने मुझे यहां कि ईसाई मिशनरी के अनाथालय में डाल दिया था.’’

‘‘अब आप कहां रहती हो?’’

‘‘मैं अमेरिका में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में हूं. मुझे गोद लेने वाले मातापिता अमीर और प्रतिष्ठित हैं.’’

‘‘मां को ढूंढ़ कर क्या करोगी?’’

‘‘मां, मां होती है.’’

बेटी के इन शब्दों को सुन कर मां की आंखें भर आईं, वह मुंह फेर कर बाहर चली आई. रसोई में काम करते कौयिम्मा सोच रही थी, क्या करे, क्या उस को बताए कि वह उस की मां थी. मगर ऐसे में उस का भविष्य नहीं बिगड़ जाएगा.

अनाथालय ने ब्लैकहोल के समान शर्मिष्ठा के बैकग्राउंड, उस के अतीत को चूस कर उस को सिर्फ एक अनाथ की संज्ञा दे दी थी. जिस का न कोई धर्म था न कोई जाति या वर्ग. वहां वह सिर्फ एक अनाथ थी.

अब वह एक सम्मानित परिवार की बेटी थी. वैल स्टैंड थी. कौयिम्मा नाथर द्वारा यह स्वीकार करने पर कि वह उस कि मां थी, उस पर एक अवैध संतान होने का धब्बा लग सकता था.

एक निश्चय कर कौयिम्मा नाथर रसोई से बाहर आई. ‘‘मेम साहब,

आप को शायद गलतफहमी हो गई है. इस गांव में 2 कौयिम्मा हैं. एक मैं कौयिम्मा नाथर, दूसरी कौयिम्मा नादर. दोनों ही अविवाहित हैं. आप ने गांव कौन सा बताया है?’’

‘‘अप्पा नाडू.’’

‘‘यहां 3 गांवों के नाम अप्पा नाडू हैं. 2 यहां से अगली तहसील में पड़ते हैं. वहां पता करें.’’

शर्मिष्ठा खामोश थी. जेनिथ भी खामोश थी. मां बेटी को अपनी बेटी स्वीकार नहीं कर रही थी. कारण? कहीं उस का भविष्य न बिगड़ जाए. पिता को पिता कैसे कहे? कौन से पिता को पिता कहे.

कार में बैठने से पहले एक नोटों का बंडल बिना गिने बख्शिश के तौर पर शर्मिष्ठा ने अपनी जननी को थमाया और उस को प्रणाम कर कार में बैठ गई. कार वापस मुड़ गई.

‘‘कोई मां इतनी त्यागमयी भी होती है?’’ जेनिथ ने कहा.

‘‘मां मां होती है,’’ अश्रुपूरित नेत्रों से शर्मिष्ठा ने कहा. कार गति पकड़ती जा रही थी.

Diwali Special: थोड़ी सी मिठास बनाए दीवाली खास…

दीवाली का त्योहार आ चुका है घरों में लोग सफाई कर रहे है. दीवाली त्योहार में पकवान के लिए बेहद खास है. मिठाई की मिठास से रिश्तों में रौनक आ जाती है. इस दीवाली अपने घर बनाए ये खास मिठाईयां जो स्वाद में एकदम हटके है. आइए आपको बताते है मिठाईयों की खास रेसिपी.

  1. खजूर की पोटली

सामग्री

1. 1 कप मैदा

 2. 1/4 कप सूजी

 3. 1/4 कप घी

 4. 1 कप दूध

 5.  50 ग्राम मावा

6. 2 बड़े चम्मच पिसी चीनी

 7. 1/4 कप खजूर

 8. 1/2 छोटा चम्मच इलायची पाउडर

 9. 1/3 कप चीनी

10.  थोड़ा सा केसर.

विधि

एक बाउल में मैदा, सूजी और घी को मिलाएं फिर इस में थोड़ाथोड़ा दूध मिलाते हुए मुलायम आटा गूंध लें. भरावन तैयार करने के लिए मावा व खजूर को भून कर चीनी मिला कर ठंडा होने दें. फिर इस में इलायची पाउडर और केसर मिला कर अलग रख दें. गुंधे आटे की छोटीछोटी लोइयां बना कर उन्हें पूरियों की तरह बेल लें. अब प्रत्येक पूरी में भरावन भर कर पोटली का आकार दें और घी में सुनहरा होने तक तलें. अब एक पैन में 1/4 कप पानी और चीनी डाल कर चाशनी बना लें. चाशनी में सभी पोटली डिप कर सर्व करें.

2. केला पनीहारम

सामग्री

1. 50 ग्राम जामुन गुठली निकला

 2. 80 ग्राम पका केला

 3. 100 ग्राम मैदा

4.  60 मिलीलिटर दूध,

5. 50 ग्राम मक्खन

6. 5 ग्राम बेकिंग पाउडर

7. सजाने के लिए थोड़े से अनार के दाने.

विधि

एक बाउल में केले को मैश कर के अलग रख दें. अब दूसरे बाउल में दूध, मैदा, पिघला मक्खन और जामुन मिला लें. इस में मैश्ड केला और बेकिंग पाउडर मिलाएं. अब पनीहारम मोल्ड में बैटर डाल कर 5 मिनट तक पकाएं. जब एक तरफ से पक जाए तो पलट कर दूसरी तरफ से भी पकाएं. अनारदाने से सजा कर सर्व करें.

3. शबनम के मोती औन शौर्ट क्रस्ट बोट

सामग्री

1. 50 ग्राम मक्खन 

   2.100 ग्राम आइसिंग शुगर

  3. 100 ग्राम मैदा

  4. 1 अंडा,

 5. 50 ग्राम रबड़ी

6. 8 रसगुल्ले छोटे वाले

7. थोड़े से काजू.

8. रबड़ी की सामग्री

9. 150 मिलीलिटर दूध

10.  60 ग्राम शुगर

11. 1 टुकड़ा इलायची.

 रबड़ी  विधि

दूध में इलायची डाल कर उबालें. जब एकचौथाई दूध बच जाए तो उस में चीनी मिला कर फ्रिज में ठंडा होने के लिए रख दें.

विधि

आइसिंग शुगर और मक्खन को मिला लें. इस में अंडा डाल कर तब तक फेंटें जब तक कि मिश्रण पतला न हो जाए. इस के बाद इस में मैदा मिला कर 1 घंटे के लिए फ्रिज में रखें. फिर इस में मैदा मिला कर गूंध लें और 1 घंटे के लिए फिर से फ्रिज में रख दें. फिर इसे निकाल कर लोइयां बना कर बोट की शेप दे कर 160० सैंटीग्रेड पर बेक कर लें. तैयार बोट में रबड़ी भर कर ऊपर रसगुल्ले लगाएं. काजू से गार्निश करें.

टैडी बियर: भाग 2- क्या था अदिति का राज

 

देवांशी परेशान अदिति के कंधे पर हाथ रखती हुई बोली, ‘‘क्या वाकई, तुम्हारा प्यार छलावा था?’’

‘‘कैसी बात कर रही है? मेरी जान है धु्रव… प्यार करती हूं तभी तो उस के लिए ये सब कर रही हूं. हाय एक टैडीबियर हमारे प्यार को साबित करेगा… ये सब कितनी बेवकूफी है.’’

अदिति के मुंह से ये सब सुन कर देवांशी को पहले तो हंसी आई पर फिर गंभीर हो कर बोली, ‘‘सब जानती है तो क्यों ये सब धु्रव से छिपा रही है? वहां अर्णव परेशान है और यहां तुम.’’

‘‘फिर क्या करूं बता?’’ अदिति मायूसी

से बोली.

देवांशी कुछ सोचते हुए कहने लगी, ‘‘चलो, अब इतने झूठ बोले हैं तो एक और बोल दो. कह दो कि टैडी कोई बच्चा उठा ले गया या फिर तुम्हारी मम्मी ने किसी को दे दिया अथवा गुम हो गया.’’

अदिति चहकी, ‘‘हां देवांशी, यह गुम होने वाला आइडिया सब से अच्छा है, क्योंकि लेनेदेने वाले आइडिया में पाने की कोई न कोई गुंजाइश होती है पर गुम हुआ यानी मिलने की न के बराबर उम्मीद है,’’ यह कहते ही उत्साहित अदिति के चेहरे पर सुकून छा गया. जैसे कोई बहुत बड़ा निबटारा हो गया हो.

दूसरे दिन देवांशी को अदिति ने फोन पर सूचित किया कि उन की तरकीब काम

कर गई है. अर्णव ने अपने जीजू से माफी मांगते हुए टैडी के गुम होने की बात कह दी. धु्रव एक बार फिर बहकावे में आ गया… उस से झूठ बोलना अच्छा नहीं लगा. फिर भी अदिति खुश थी कि इस टैडी वाले प्रसंग से हमेशा के लिए पीछा छूटा…

इस बात को हफ्ता बीत गया. उन की शादी की सालगिरह आ गई. शादी की सालगिरह पर घरबाहर के बहुत सारे मेहमान आए. बड़ों के आशीर्वाद और संगीसाथियों की ढेर सारी बधाइयों के बीच दोनों यानी धु्रवअदिति सब के आकर्षण के केंद्र बने थे.

इस फंक्शन में अर्णव भी आया था. फंक्शन के बाद मौका पा कर अदिति ने अपने भाई को आड़े हाथों लिया.

तब उस ने भी इस बेवजह के अवांछित प्रसंग को ले कर और अपनी गर्लफ्रैंड के साथ

उस अपरिपक्व हरकत पर अफसोस जाहिर करते हुए इतने दिनों बाद उठी बात पर खुलासा किया, ‘‘दीदी, मेरी और अंजना की लड़ाई के बीच आप फंस गईं. हुआ यों कि ब्रेकअप के बाद… कुछ महीने सब ठीक रहा पर अचानक एक दिन उस ने मुझे से टैडी मांग लिया. मुझे भी बहुत अजीब लगा.

‘‘शुरू में मैं ने टाला आप की वजह से. पर वह जिद करने लगी कि उसे अपना टैडी चाहिए ही चाहिए. ऐसे में मैं ने सोचा कि कहीं उसे यह न लगने लगे कि मैं अब भी उस में रुचि रखता हूं… फिर एक दिन मेरा और आप का झगड़ा हो गया. बस उसी का फायदा उठा कर मैं ने तुम से जबरदस्ती टैडी मांग कर उस के हवाले कर के मुसीबत से पीछा छुड़ा लिया.’’

‘‘और मेरी मुसीबत बढ़ा दी पागल…’’

‘‘पर दीदी मैं ने भी उसे दिए सारे गिफ्ट मांग लिए थे.’’

‘‘पर उस से क्या अर्णव… ऐसा भी क्या टैडी से मोह जो उस के बगैर नहीं रह पाई… उस टैडी में कहीं तू तो नहीं दिखता था उसे?’’

‘‘अरे नहीं दीदी,’’ वह खिसिया कर बोला.

अदिति तुरंत उसे चिढ़ाती हुई कहने लगी, ‘‘फिर पक्का उस ने अपने दूसरे बौयफ्रैंड को टिका कर अपने पैसे बचाए होंगे… पर सच, तुम दोनों की बेवकूफी में मैं अच्छा फंसी.’’

‘‘अरे अब माफ भी कर दे न,’’ अर्णव प्यार से बोला.

‘‘किस बात की माफी मांगी जा रही है साले साहब?’’ अचानक ध्रुव की आवाज कानों में पड़ी. धु्रव को अचानक कमरे में आता देख दोनों संभल कर बैठ गए. अर्णव उठते हुए बोला, ‘‘कुछ नहीं जीजू, आज शाम को मैं देर से क्यों आया इस बात को ले कर आप की बीवी मुझे डांट रही है… अच्छा दीदीजीजू अब बाकी बातें कल करेंगे. थक गया हूं.’’ कह वह सोने चला गया.

दूसरे दिन सुबह सब सो रहे थे. लगातार बजती कौलबैल से अदिति की नींद खुली तो देखा दरवाजे पर अटैची के साथ खड़ी एक लड़की भाभी कहते हुए उस के गले लग गई. अदिति  को हैरानी से ताकते देख कर वह मुसकराई और फिर भीतर आते हुए बोली, ‘‘अरे भाभी, मैं नीलांजना… धु्रव भैया कहां हैं…?’’

अदिति को याद आई धु्रव की कजिन, जो शादी के एन मौके पर एमबीए करने के लिए आस्ट्रेलिया चली गई थी. अदिति से बात करते वह इधरउधर देखते हुए बड़े इत्मिनान और हक से भीतर आते बोली, ‘‘देखो भाभी, मुझ पर कबाब में हड्डी होने का आरोप न लगे, इसलिए मैं कल नहीं आई…’’

नीलांजना की बात पर अदिति कुछ कहती उस से पहले ही धु्रव की आवाज आ गई, ‘‘कबाब में हड्डी तो कल आ ही गई थी हमारे बीच तुम भी आ जाती तो कोई फर्क नहीं पड़ता.’’

धु्रव का इशारा अर्णव की तरफ है, यह समझ कर अदिति ने उसे घूरा तो गुस्ताखी माफ कहते हुए उस ने धीरे से कान पकड़ लिए.

‘‘क्या हुआ कोई और भी आया

है क्या?’’

नीला के पूछने पर अदिति ने कहा, ‘‘मेरा छोटा भाई आया है.’’

‘‘ओह, ग्रेट…’’ कहते हुए उस की नजर मेज पर बिखरे ढेर सारे गिफ्टों पर चली गई, ‘‘वाऊ, कितने सारे गिफ्ट हैं. अभी तक खोले नहीं… मेरा इंतजार कर रहे थे क्या? जानती हैं भाभी कि गिफ्ट खोलना मुझे बहुत अच्छा लगता है…’’ कहते हुए वह उत्साह से मेज की ओर बढ़ी तो अदिति ने उसे हैरानी से देखा. लगा ही नहीं कि वह नीलांजना से पहली बार मिल रही है.

धु्रव ने भी एक बार को उसे टोका, ‘‘अरे रुक जा…पहले कुछ खापी ले…’’

‘‘हांहां बस, चायबिस्कुट लूंगी. भाभी अगर आप बुरा न मानें तो क्या मैं गिफ्ट खोलू?’’ वह मेज के ऊपर रखे गिफ्ट उत्साह से देखती हुई बोली.

‘‘हांहां क्यों नहीं,’’ कहते हुए अदिति कुछ अजीब नजरों से उसे देख कर किचन में आ गई. चाय बना कर लाई तो देखा धु्रव के साथ बैठी नीला गिफ्ट देख कर उत्साहित हो रही थी. लगभग सभी गिफ्ट खुल चुके थे. सिर्फ एक बाकी था.

उसे अदिति की ओर बढ़ाते हुए नीला कहने लगी, ‘‘भाभी, इसे आप खोलो.’’

चाय की ट्रे रख कर अदिति ने उस गिफ्ट को चारों ओर से घुमा कर

देखा. उस पर किसी का नाम नहीं था. ‘‘किस का है, यह… कुछ पता ही नहीं चल रहा है,’’ कहते हुए अदिति ने उसे खोला तो हैरान रह गई. हूबहू वैसा ही टैडीबियर, जिसे वह इतने दिनों से ढूंढ़ती फिर रही थी…

धु्रव मुसकराते हुए बोल रहा था, ‘‘अच्छा तो यह अर्णव का सरप्राइज है,’’ धु्रव अदिति की तरफ देखते हुए बोला.

‘‘मुझे नहीं पता कहां से आया है यह… हाय, यह तो बिलकुल वैसा है,’’ अटपटाते हुए वह बोली. तभी अर्णव की आवाज आई, ‘‘वैसा ही नहीं, वही है दीदी,’’ कमरे में आते हुए अर्णव बोला. फिर वह हैरानी से कभी नीलांजना को तो कभी टैडी को देख रहा था.

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