इन महिलाओं को होती है डाइबिटीज की परेशानी

पुरुष हो या महिलाएं सबके लिए डाइबिटीज किसी चुनौती से कम नहीं है. इस परेशानी से बचने के लिए जरूरी है कि आप शांत रहें, कूल रहें किसी भी तरह की परेशानी में अपना पौजिटिव अप्रोच रखें. आपके स्वभाव में कई तरह की गंभीर बीमारियों का राज झुपा है.

हाल ही में हुई एक स्टडी में ये बात सामने आई है कि जो महिलाएं पौजिटिव अप्रोच के साथ अपना जीवन गुजारती हैं, उनमें टाइप-2 डायबिटीज होने का खतरा बहुत कम होता है. यह दावा मेनोपौज के बाद महिलाओं पर की गई स्टडी में किया गया है.

इस स्टडी में वूमेन हेल्थ इनिशिएटिव के आंकड़ो का इस्तेमाल भी किया गया है. इस शोध में करीब एक लाख तीस हजार महिलाओं को शामिल किया गया था. इन महिलाओं को शुरू में डाइबिटीज की परेशानी नहीं थी. लेकिन बाद में इनमें से कइयों को डाइबिटीज की परेशानी हुई.

स्टडी में सकारात्मक और नकारात्मक स्वभाव की महिलाओं की तुलना की गई. शोध में शामिल एक एक्सपर्ट की माने तो किसी भी व्यक्ति का व्यक्तित्व जीवनभर एक समान ही रहता है. यही कारण है कि नेगेटिव स्वभाव वाली महिलाओं को पॉजिटिव स्वभाओं वाली माहिलाओं के मुकाबले डायबिटीज का खतरा अधिक होता है.

उन्होंने आगे बताया कि महिलाओं के व्यक्तित्व से हमें ये जानने में मदद मिलेगी कि उन्होंने डायबिटीज होने की कितनी संभावना है. स्टडी के नतीजों में यह भी सामने आया कि मेनोपौज के बाद नेगेटिव स्वाभाव और डायबिटीज होने का गहरा संबंध है.

धुआं-धुआं सा: भाग 1- क्या था विशाखा का फैसला

सोचा था जब मैं परिपक्व हो जाऊंगा, तब अपने अंदर चले आ रहे इस द्वंद्व का समाधान भी खोज लूंगा. मुझे हमेशा से एक धुंध, एक धुएं में जीने की आदत सी पड़ गई है. कुछ भी साफ नहीं, न अंदर न बाहर. अकसर सोचता रह जाता हूं कि जो कुछ मैं महसूस करता हूं, वह क्यों. दूसरों की भांति क्यों नहीं मैं. सब अपनी दुनिया में खोए… मग्न… और शायद खुश भी. लेकिन एक मैं हूं जो बाहर से भले ही मुसकराता रहूं पर अंदर से पता नहीं क्यों एक उदासी घेरे रहती है. अब जबकि मेरी उम्र 35 वर्ष के पार हो चली है, तो मुझे अपनी पसंद, नापसंद, प्रेरणाएं, मायूसियों का ज्ञान हो गया है. लेकिन क्या खुद को समझ पाया हूं मैं!

आज औफिस की इस पार्टी में आ कर थोड़ा हलका महसूस कर रहा हूं. अपने आसपास मस्ती में नाचते लोग, खातेगपियाते, कि तभी मेरी नज़र उस पर पड़ी. औफिस में नया आया है. दूसरे डिपार्टमैंट में है. राघव नाम है. राघव को देखते ही भीतर कुछ हुआ. जैसे कुछ सरक गया हो. कहना गलत न होगा कि उस की दृष्टि ने मेरी नज़रों का पीछा किया. कभी जैंट्स टौयलेट में तो कभी बोर्डरूम में, कभी कैफ़ेटेरिया में तो कभी लिफ्ट में – मैं ने हर जगह उस की दृष्टि को अपने इर्दगिर्द अनुभव किया. यह सिलसिला पिछले कुछ दिनों से यों ही चला आ रहा था.

वैसे मुझे यह शक होता भी क्योंकि मैं औरतों में रुचि नहीं रखता जबकि 12वीं में ही मैं ने गर्लफ्रैंड बना ली थी. कालेज में भी एकदो अफेयर हुए. पर मेरा दिल अकसर लड़कों की ओर देख धड़कता रहता. होस्टल में मेरा एक बौयफ्रैंड भी था, सब से छिप कर. तब मुझे लगता था कि मैं इस से प्यार तो करता हूं पर यह बात मैं किसी से कह नहीं सकता. उस जमाने में यह जग उपहास का कारण तो था ही, गैरकानूनी भी था. और फिर हमारा धर्म, और उस के स्वघोषित रक्षक जो इस समाज की मर्यादा बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं, यहां तक कि हिंसा पर भी उतर सकते हैं, उन से अपनी रक्षा कर पाना मेरे लिए संभव न था. चुप रहने में ही भलाई थी. फिर मेरा दिमाग कहता कि यह मेरे दिल की भटकन है. मैं केवल नए पार्टनर टटोल रहा हूं. कभी लड़की की तरफ आकर्षित होता हूं तो कभी किसी लड़के की तरफ आसक्ति हो जाती.

अब तक मुझे लगता था कि मैं बाइसैक्सुअल हूं – मतलब, औरतें भी पसंद हैं और मर्द भी. तभी तो मैं ने शादी की. बाहर से देखने पर मेरी ज़िंदगी हसीन थी – एक खूबसूरत साथ देने वाली बीवी, 2 नन्हेंप्यारे बच्चे. गृहस्थी में वह सब था जिस की कोई कल्पना करता है. मुझे याद है कि जब मातापिता शादी के लिए ज़ोर दे रहे थे, रिश्तों की कतार लगा करती थी, तब मुझे अपने अंदर छाई यह बदली अकसर कंफ्यूज कर दिया करती. मैं किसी लड़की को पसंद नहीं कर पाता. और समय मांगता. लेकिन जब विशाखा से मिला तो लगा जैसे इस से अच्छी दोस्त मुझे ज़िंदगी में नहीं मिल सकती. और मेरा यह निर्णय गलत नहीं रहा. विशाखा मुझे अच्छी तरह समझती है. मेरे मन की तहों में घुस कर वह मेरी हर परेशानी हर लेती है. मेरे लिए उस से अच्छी दोस्त इस संसार में नहीं है. हमारे बच्चों और हमारी गृहस्थी को उस ने बखूबी संभाल रखा है.

मगर जैसे मेरा दिल राघव को देख कर उछलने लगता है, वैसे कभी विशाखा को देख कर नहीं उछला. हां, हम पतिपत्नी हैं. हमारे बीच हर वह संबंध है जो पतिपत्नी के रिश्ते में होता है, परंतु वह जज़्बा नहीं, जो होना चाहिए. हमारे रिश्ते में पैशन नहीं, जनून नहीं, फुतूर नहीं. कभी रहा ही नहीं. एक ड्यूटी की तरह मैं अपने फर्ज़ निभाता रहा हूं. पर विशाखा ने कभी शिकायत नहीं की. शायद हिंदुस्तानी औरतों को यही घुट्टी बचपन से पिलाई जाती है कि पति को खुश रखना उन की ज़िम्मेदारी है, उन्हें खुश करना पति की नहीं. पति की हां में हां मिलाना, पति के हिसाब से जीना, उसे हर सुख देना, उस की परेशानियों को दूर करना – ये सब पत्नी के खाते में आता है.

लोकलाज और मातापिता के अरमानों का खयाल करते हुए मेरी शादी हो गई. तब उम्र कुछ अधिक नहीं थी हम दोनों की. समाज में मुझे वह सब मिला जो कोई चाहता है. स्थिर, आबाद, स्थायी जीवन को जीते हुए धीरेधीरे मैं मरने सा लगा. कहने को मैं हमेशा वफादार रहा, परंतु मेरी नज़रें दूसरे दिलकश मर्दों को चोरी से देखते रहना नहीं छोड़ सकीं. समय बीतने के साथ मुझे अपनी सैक्सुएलिटी पर शक बढ़ता गया. सब के सामने मैं खुश था, एक अच्छा जीवन व्यतीत कर रहा था, मगर मेरा एक हिस्सा सांस नहीं ले रहा था. लगता जैसे मेरे हाथों से सबकुछ छूट रहा है.

लेकिन आज की पार्टी ने जैसे मेरे मन पर जमीं सारी काई धो डाली. पिछले कुछ महीनों से, जब से राघव कंपनी में आया, तब से मेरा दिल इस काई पर अकसर फिसलता रहा था. जब भी राघव मेरे सामने आता, मेरा दिल उस की ओर भागने लगता. और मुझे विश्वास था कि उस के दिल का भी यही हाल है. कई महीनों की लुकाछिपी के बाद, आज राघव ने मुझे अकेले में घेर लिया. उस के हाथ मेरे बदन पर रेंगने लगे. मुझे कुछ होने लगा. ऐसा जैसा आज तक नहीं हुआ. नहीं, नहीं, हुआ है – कालेज में. आज राघव के स्पर्श से एक लंबे अरसे की मेरी तड़प को सुकून मिला. मैं तो इस भावना को भूल ही गया था. विशाखा के साथ जो कुछ होता, उसे केवल कर्तव्यपरायणता का नाम दिया जा सकता है. प्यार का एहसास, इश्क की लालसा और सारे बंधन तोड़ देने की धुन मुझे राघव के साथ अनुभव होने लगी. राघव अविवाहित था. उस के लिए किसी का साथ अपने जीवनसाथी से धोखा न था. मेरे लिए था. मुझे आगे बढ़ने से पहले विशाखा का चेहरा नज़र आने लगा. मुझे कुछ समय रुकना पड़ेगा. लेकिन अब विशाखा को मेरी सचाई से अवगत कराने का वक्त आ गया है. मेरा दिल बारबार मुझे विशाखा को अपनी भावनाएं बताने की ज़िद करने लगा. मैं यह भी समझता हूं कि हो सकता है कि इस सचाई की मुझे एक बड़ी कीमत चुकानी पड़े. इसी डर की वजह से मैं आज तक एक खोल के अंदर दुबका रहा. चुप रहा कि कोई मेरी असलियत जान न पाए, स्वयं मैं भी नहीं. परंतु अब मुझ से रुकना मुश्किल होने लगा.

मैं विशाखा को तकलीफ नहीं पहुंचाना चाहता था. मगर मुझे भी एक ही जीवन मिला है जो तेज़ी से निकलता जा रहा है. यू लिव ओनली वंस – मैं अपने मन में दोहराता जा रहा था. तभी विशाखा कमरे में दाखिल हुई. हर रात काम खत्म कर के हाथों पर लोशन लगाना उसे अच्छा लगता है. ड्रैसर के सामने बैठी वह अब अपने बाल काढ़ कर चोटी बनाने लगी.

“तुम से कुछ बात करनी है,” मैं ने कहा.

“हम्म?” वह बस इतना ही बोली.

अपनी पूरी हिम्मत जुटा कर मैं ने विशाखा के सामने अपनी सैक्सुएलिटी का सच परोस दिया, “मैं स्ट्रेट नहीं हूं, विशाखा…” उस ने कुछ नहीं कहा. ऐसा लगा जैसे उसे इस बात को सुनने की उम्मीद थी, न जाने कब से. शायद वह जानती थी मेरे सच को. बस, मेरे कहने का इंतज़ार कर रही थी. विशाखा ने बिस्तर पर अपनी साइड बैठते हुए मेरी ओर देखा. आंखों में एक सूनापन, एक खामोशी… उस की भावनाहीन शून्य दृष्टि देख कर मुझे अंदर तक कुछ काट गया.

“कुछ कहोगी नहीं?” मैं ने पूछा.

“क्या कहूं, क्या सुनना चाहते हो?”

“विशाखा,” उस का हाथ अपने हाथों में लेते हुए मैं ने कहा, “तुम मेरी सब से अच्छी दोस्त हो, तुम से अधिक मुझे कोई नहीं समझता. यह सचाई मैं ने केवल तुम्हें बताई है. इस पूरी दुनिया में तुम्हारे सिवा कोई मेरा इतना अपना नहीं.”

“मैं समझती हूं, इसीलिए चुप हूं.”

जाने क्यों लोग- भाग 3: क्या हुआ था अनिमेष और तियाशा के साथ

उस रात न.. न… करने पर भी अनिमेष तियाशा को उस के फ्लैट में छोड़ गए. दूसरे दिन रविवार की छुट्टी थी. सुबह के 8 भी न बजे थे कि दरवाजे पर नितिन को देख कर चौंक गई. जो बीता सो बीत गया कह कर वह चैप्टर बंद करना चाहती थी. नितिन को सामने पा कर दुविधा में पड़ गई. न चाहते हुए भी उसे बैठने को कहना पड़ा. तियाशा भी बैठ गई और सीधे पूछ लिया, ‘‘क्या जरूरत थी यहां आने की? सुना लोग बातें बना रहे हैं?’’

‘‘सुना तो सही है, मैं आता भी नहीं, लेकिन एक काम है.’’

‘‘कहो.’’

‘‘प्लीज तुम पारुल और उस की मां से कह दो कि मेरा इस में कोई हाथ नहीं, तुम ने ही खुद जोर दिया था कि मैं तुम्हारे साथ घूमूंफिरूं.’’

‘‘अरे. यह क्या? क्या साधारण सी दोस्ती को तुम भी इतना कुरूप बनाओगे और पारुल कौन है? कभी तुम ने मुझे बताया नहीं?’’

‘‘पारुल मेरी मंगेतर है. 2 महीने बाद हमारी शादी है इसलिए नहीं बताया था, सोचा था तुम बुरा मान जाओगी.’’

‘‘अरे. बुरा क्यों मानती? क्या तुम भी

वही समझते हो जो लोग बता रहे हैं और अब बता रहे हो क्योंकि पानी सिर के ऊपर से गुजर रहा है? तुम्हीं बताओ नितिन, क्या मैं ने तुम्हें

मेरे साथ उठनेबैठने की जबरदस्ती की है? फिर उन्हें ऐसा क्यों कहूं. मेरा तुस से अन्य कोई

संबंध भी नहीं सिवा एक सामान्य सी दोस्ती के. तुम लोगों के सामने यह तो साबित नहीं करो

कि हम दोनों के बीच कोई अनुचित संबंध है… इस में मैं ने तुम्हे विक्टिम बनाया है. नहीं, मैं ऐसा नहीं कहूंगी.’’

‘‘देखो तियाशा उम्र में तुम मुझ से बड़ी

हो. इसलिए लिहाज कर रहा हूं, तुम्हारा साथ देने की वजह से मैं फालतू बदनाम हो रहा हूं. लोगों की बातें सुनसुन कर पारुल का शक पक्का हो गया है, तुम नहीं कहोगी तो मैं सुगंधा या

मल्लिक से कहलवा लूंगा. तुम्हारे फोन पर मैं

उस का नंबर भेज रहा हूं, बात कर लेना, मेरी शादी अगर कैंसिल हुई तो यह तुम्हारे लिए बहुत बुरा होगा.’’

यद्यपि तियाशा को कुछ भी अच्छा नहीं

लग रहा था, लेकिन जिंदगी जब खुद को ही

दांव पर लगा देती है तो आप को खेलना तो

पड़ता ही है, चाहे इस खेल से निकलने के लिए ही सही.

बड़ी ऊहापोह थी और उस से भी ज्यादा थी गहरी चोट. नितिन का हंसनाबोलना

केयर करना याद आता रहा. पर अब तियाशा क्या करे? अगर नितिन की शादी टूटती है तो इस की जिम्मेदारी उस की होगी और इस के लिए उस के आसपास का समाज उस का दुश्मन बन बैठेगा, लेकिन सब से बड़ी दुश्मन तो होगी वह खुद ही खुद की. उस का धिक्कार उसे एक पल को भी चैन लेने देगा?

उस ने एक झटके में एक निर्णय लिया और अनिमेष को फोन लगाया. कुछ ही देर में औटो पकड़ कर वह रूबी मोड़ के पास अनिमेष के फ्लैट में थी. हलकीफुलकी बातचीत और अनिमेष की ओर से दोस्ती की पहल ने अब तक तियाशा को बहुत हद तक सहज कर दिया था. दोनों ने मिल कर चीज सैंडविच बनाए और रविवार की सुबह निकल पड़े बाबूघाट की ओर. गंगा नदी में बाबूघाट से हावड़ा तक ढेरों स्टीमर चलते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में फेरी कहा जाता है. इसी फेरी में दोनों आसपास बैठे थे. कुनकुनी धूप जैसे आपसी पहचान में विश्वास का तानाबना बुन रही हो. रविवार होने की वजह से फेरी में

2-4 लोग ही इधरउधर बिखरे बैठे थे.

‘‘हां तो मैडम तियाशा आप ने कहा नितिन की धमकी से आप डरी हुई हैं, सोचिए तो मेरी पत्नी जब मेरी 10 साल की बेटी को छोड़ कर एक मुसलिम कश्मीरी शादीशुदा आदमी के साथ भाग जाती है, जोकि उस के साथ ही काम करता था और इस वजह से मुझे मेरे ब्राह्मण समाज से कठोर धमकी मिलती रही, समाज से मुझे बहिष्कृत कर दिया गया, मैं ने अकेले कैसे खुद को इन चीजों से उबारा? जबकि स्थितियां मेरी नाक के नीचे कब पैदा हुईं मुझे मालूम ही नहीं चला. वह तो भागने के आखिरी दिन तक मुझ से वैसे ही प्रेम और विश्वास से मिलती रही जैसे शुरुआती दिनों में था.

‘‘मैं जहां एक तरफ पत्नी के विश्वासघात और ब्राह्मण समाज के अडि़यल रवैए के दबाव में बुरी तरह टूट चुका था, वहीं दूसरी ओर उस कश्मीरी के अपनी बीवी को छोड़ कर भागने की वजह से उस की बीवी अपने घर वालों को ले कर अकसर मेरे घर पहुंच जाती कि उस के शौहर का पता लगाने में उस की मदद करूं. मुझ पर सब का दबाव था कि मैं अपनी बीवी की तलाश करूं.

‘‘अरे यह रिश्ता अब मैं जबरदस्ती ढो ही नहीं सकता था, बल्कि अपनी बीवी

को कभी देखना भी नहीं चाहता था मैं. इसलिए नहीं कि उस ने किसी और से प्रेम किया, इसलिए कि उसे मेरा प्रेम समझ ही नहीं आया था. मुझ से छिपाया. मुझे एक बार भी मौका नहीं दिया कि मैं उसे फिर से हासिल कर लूं.

‘‘वाकई जब हिस्से में रात आती है तो सूरज न सही चांद तो मिलता ही है और जब इतनी रोशनी मिल जाती है तो जीतने की हिम्मत रखने वाले सुबह होने तक सूरज हासिल कर ही लेते हैं. तो न केवल मैं ने उसे भुलाया, समाज से लड़ी, उस कश्मीरी की बीवी को दिलाशा दिया और आगे अपने पैरों पर खड़े होने के लिए उसे कुछ दिया ताकि वह अपना बुटीक खोल कर अपना खोया आत्मविश्वास लौटा सके. हालांकि उस ने

2 साल के अंदर खुद की कमाई से मेरा कर्ज लौटा दिया और मुझे बड़ा भाई सा मान दे कर मेरे प्रति कृतज्ञता जताई. मैं ने अपनी बेटी को भी पढ़ा लिखा कर अपने पैरों पर खड़ा कर दिया. हां, यह बात अलग है कि बेटी अब हम से कोई रिश्ता नहीं रखती.’’

‘‘अरे, क्यों?’’

‘‘उस का मानना है कि मुझे उस के लिए ही सही उस की मां को ढूंढ़ना चाहिए था, पर तियाशा आप ही बताओ, वह भागी थी, हम तो वहीं थे, याद करती अगर बेटी को तो संपर्क कर सकती थी न. मुझ से न सही, बेटी से ही. यह थी मेरी सोच, जिसे मैं नहीं बदलूंगा. तो क्या अब इतनी कहानी सुनने के बाद आप फिर भी अपना निर्णय, अपनी जिंदगी लोगों के भरोसे छोड़ेंगी? लोग ऐसे खाली नहीं होते तियाशा जी. जब दूसरों के टांग खींचने की बारी आती है, लोग खुदवखुद फ्री हो जाते हैं.’’

‘‘पारुल को कैफियत देने नहीं जाऊंगी मैं और न ही नितिन की किसी धमकी से डरूंगी. अगर किसी को कुछ पूछना होगा तो वह खुद ही आएगा.’’

‘‘यह हुई न बात. अब एक बात और क्यों न हो जाए.’’

तियाशा अब थोड़ा खिलखिला कर हंस पड़ी.

अनिमेष ने बड़े स्नेह से उस की ओर देखते हुए कहा, ‘‘हमारी इस दोस्ती को एक प्यारे से रिश्ते का नाम देने की मेरी बड़ी तमन्ना है. अगर मैं जल्दीबाजी कर रहा हूं तो खफा मत होना, मैं बहुत सारा समय देने को तैयार हूं.’’

‘‘कौन सा नाम?’’ समझते हुए भी तियाशा शरारत से पूछ कर मुसकराई.

अब तक स्टीमर दूसरे घाट पर आ गया था. अनिमेष ने तियाशा का हाथ पकड़ कर घाट में उतारते हुए कहा, ‘‘यही, जिसे वसंत मंजरी

कहते हैं, पपीहा की पीहू और दिल का मचलना कहते हैं.’’

‘‘पर लोग,’’ मुसकराते हुए थोड़ी सी शंका भरी नजर रख दी तियाशा ने अनिमेष की पैनी आंखों में.

उस की हथेली पर अपना दबाव बनाते हुए अनिमेष ने जवाब दिया, ‘‘कल फिर

लोगों के सामने औफिस में बात पक्की कर

देता हूं.’’

तियाशा के हुए अनिमेष. किसी का कोई सवाल?

तियाशा खिलखिला कर हंस रही थी.

यह सुरमई शाम हंस रही थी, ये गोधूलि की लाली हंस रही थी. डूबता सा सूरज भरोसे की मुसकान दे कर जा रहा था, कल से साथ चलने के लिए.

जाने क्यों लोग- भाग 2: क्या हुआ था अनिमेष और तियाशा के साथ

औफिस आई तो उस के बौस को बुलावा था. तियाशा कैबिन में गई.  बौस अनिमेष, उम्र 45 के आसपास, चेहरे पर घनी काली दाढ़ी, बड़ीबड़ी आंखें, रंग गोरा, हाइट ऊंची… तियाशा ने उन्हें इतने ध्यान से देखा नहीं था कभी.

बौस ने अपने जन्मदिन पर उसे घर बुलाया था, छोटी सी पार्टी थी. औफिस से निकल कर उस ने एक बुके खरीदा और घर आ गई.

किंशुक के जाने के बाद अब तक जैसेतैसे जिंदगी काट रही थी वह. ऐसे भी समाज में कहीं किसी शुभ कार्य में सालभर जाना नहीं होता है. कहते हैं मृत्यु जैसे शाश्वत सत्य के कारण लोगों के मंगल कार्य में बांधा पड़ती है. और बाद के दिनों में? विधवा है. अश्पृश्य वैधव्य की शिकार. अमंगल की छाया है उस के माथे पर. पारंपरिक भारतीय समाज डरता है ऐसी स्त्री से कि क्या पता संगति से उन के घर भी अनहोनी हो जाए. उस पर दुखड़ा रो कर भीड़ जुटाने वाली स्त्री न हो और लोगों को सलाह देने, दया दिखाने का मौका न मिले तो वह तो और भी बहिष्कृत हो जाती है. पड़ोस में कई शुभ समारोह तो हुए, लेकिन तियाशा बुलाई न गई. अकेलापन उस का न चाहते हुए भी साथी हो गया है.

शादी से पहले तियाशा स्वाबलंबी थी. एक प्राइवेट कालेज में लैक्चरर थी. तब की बात कुछ अलग थी, मगर शादी के इन 7 सालों में जैसे वह किंशुक नाम के खूंटे से टंग कर रह गई थी. बाहर जाने के नाम पर किंशुक ने ही तो तनाव भरा था उस में. हमेशा कहता कि अब तुम कहां जाओगी, मैं ही जाता हूं. आखिरी दिनों के दर्दभरे एहसासों के बीच भी कहता कि दवा खत्म हो गई है, थोड़ी देर में मैं ही जाता हूं. काश, किंशुक समझ पाता कि इस तरह उसे आगे अकेले कितनी परेशानी होगी. दुविधा, भय और लोगों से मेलजोल में अपराध भावना हावी हो जाएगी उस की चेतना पर. अब देखो कितनी दूभर हो गई है रोजमर्रा की जिंदगी उस की. न तो खुल कर किसी से दिल का हाल कह पाती है और न ही अनापशनाप सवालों के तीखे जवाब दे पाती है.

नीली जौर्जट साड़ी और पर्ल के हलके सैट के साथ जब वह निकलने को तैयार हुई तो आइने के सामने एक पल को ठहर गई वह.

‘‘बहुत सुंदर तिया. जैसे रूमानी रात ने सितारों के कसीदे से सजा आसमान ओढ़ रखा हो,’’ उसे नीली साड़ी पहना देख किंशुक ने कहा था कभी. खुद के सौंदर्य पर खुश होने के बदले ?िझक सी गई वह.

अनिमेष के घर के, दफ्तर के लगभग सारा स्टाफ  ही जुटा था, जिस में नितिन भी था. बधाई दे कर वह एक किनारे बैठ गई. उम्मीद थी नितिन उसे अकेला देख कर उस के पास जरूर आएगा. लेकिन 30 साल का नौजवान नितिन उसे देख कर अनायास ही अनदेखा करता रहा.

तभी हायहैलो करते सुगंधा उस के पास आ बैठी. 34 के आसपास की सुगंधा अपने चौंधियाते शृंगार से सभी का ध्यान आकर्षित कर रही थी. आते ही सवाल दागे, ‘‘तियाशा नितिन आज कहां रह गया? दिखा नहीं आसपास?’’

पूछ रही थी या तंस कस रही थी? बड़ी कोफ्त हुई तियाशा को, लेकिन वह सहज रहने का अभिनय करती सी बोली, ‘‘हमेशा मेरे ही पास क्यों रहे?’’

कह तो दिया उस ने लेकिन क्या पता क्यों नितिन का व्यवहार उसे खटक गया था. आखिर उसे अनदेखा करने या तिरछी नजर देख कर मुंह फेर लेने जैसी क्या बात हुई होगी.

सुगंधा का अगला सवाल खुद उत्तर बन कर आ गया था, ‘‘और कौन घास डालता है उसे? वैसे अच्छा ही है, औफिस में तुम्हें साथ देने को कोई तो मिल जाता है.’’

इसे आखिर मुझ से चिढ़ किस बात की है. तियाशा मन ही मन दुखी होती हुई भी सहज रही.

तभी अंजलि दौड़ती हुई आ गई, ‘‘कहां छिप कर बैठी हो सुगंधा. कब से ढूंढ़ रही हूं तुम्हें,’’ अंजलि जोश में थी.

‘‘क्यों?’’

‘‘देखो मेरे इस हार को, हीरे का है, किस ने दिया पूछो?’’

‘‘और किस ने? तुम्हारे पतिदेव ने. कल हम लोग भी गए थे खरीदारी करने. उन्होंने बहुत कहा, पर मैं ने लिया नहीं, 2 तो पड़े हैं ऐसे ही. क्यों तियाशा तुम्हारा यह हार रियल पर्ल का है? वैसे पर्ल ही सही है आजकल. चोरउच्चक्कों का जमाना है, तुम बेचारी अकेली हो, क्यों भला गहने जमाओ.’’

‘‘अरे इसे क्यों पूछ रही हो, इस बेचारी को हीरे का हार ले कर देगा कौन?’’

‘‘अपने नितिन को कहना पड़ेगा, फ्री में बहुत घूम चुका,’’ सुगंधा ने रसभरी चुटकी ली.

सुगंधा और अंजलि हंसते हुए उठ कर चली गईं, लेकिन पीछे बैठी तियाशा की रगरग में दमघोंटू धुआं भर गईं.

अकेली चुप बैठी भी वह लोगों की नजर में

ज्यादा आ रही थी. औफिस के स्टाफ में से अधिकांश उस से ज्यादा घुलेमिले नहीं थे. अनिमेष गैस्ट संभालते हुए भी तियाशा को बीचबीच में देख लेते. वह कभी किसी को देख कर झेंप से भरी हुई मुसकराती, तो कभी अपने फोन पर जबरदस्ती व्यस्त होने का दिखावा करती. सब को खाने के बुफे की ओर भेज कर अनिमेष तियाशा के पास आ गए. दोनों को ही समझ नहीं आ रहा था कि बात कैसे शुरू की जाए. हौल अब लगभग खाली हो गया था. ज्यादातर लोग खापी कर घर निकल गए थे, कुछेक बचे लोग खाने की जगह इकट्ठा थे.

अनिमेष ने कहा, ‘‘चलिए आप भी, खाना खा ले.’’

वैसे अनिमेष ने कहा तो सही, लेकिन उन की इच्छा थी कि वे कुछ देर तियाशा के साथ अकेले बैठें, उस से बातें करें, उस के बारे में जानें.

उधर तियाशा को अनिमेष का साथ बुरा तो नहीं लग रहा था? लेकिन वह नितिन को ले कर परेशान सी थी. आखिर हंसताबोलता इंसान अचानक मुंह फेर कर बैठ जाए यह तो बेचैन करने वाली बात है न.

‘‘क्या हुआ, लगता है आप को मेरी पार्टी में आनंद नहीं आया? क्या मैं आप को परेशान कर रहा हूं?’’

यह अब दूसरी परेशानी. बौस है, कहीं खफा हो गया तो मुश्किलें और भी बढ़ जाएंगी. अत: अपनी उदासीनता छिपाते हुए उस ने कहा, ‘‘ऐसा नहीं है सर… वह आज तबीयत कुछ

ठीक नहीं.’’

‘‘तबीयत ठीक नहीं या नितिन को ले कर आप के बारे में लोग पीठ पीछे बातें बना रहे हैं इसलिए?’’

अब यह तो वाकई नई बात थी. तियाशा को तो मालूम नहीं था कि उस के पीछे नितिन के साथ उस का नाम जोड़ा जा रहा है.

तियाशा को अपना अकेलापन खलता था. कोई ऐसा नहीं था जो उस से खुले दिल से बात करे. इस समय नितिन से बातें करना, कभी उसे अपने घर बुलाकर साथ चाय पीना या कभी साथ कहीं शौपिंग पर चले जाना उसे मानसिक रूप से अच्छा महसूस कराता, मगर कभी यह बात दिल में नहीं आ पाई कि इस नितिन के साथ उस का नाम जोड़ कर पीठ पीछे बुराई की जाएगी. बेचारे मृत किंशुक को लोग किस नजर से देखेंगे… सभी तो यही सोच रहे होंगे कि किंशुक के मरते ही साल भर के अंदर कम उम्र के लड़के के साथ गुलछर्रे उड़ा रही है.

उस के चेहरे के उतरते रंग को अनिमेष कुछ देर देखते रहे, फिर कहा, ‘‘चलिए खाने पर चलते हैं… लोगों से डरना बंद करिए, आप अगर मेरी जिंदगी जानेंगी तो आप को अपनेआप ही रश्क हो आएगा. आइए…’’

सच, तियाशा को रहरह कर यह खयाल आ रहा था कि अनिमेष सर इस घर में अकेले क्यों दिखाईर् दे रहे हैं, इन की बीवी या बच्चे कहां हैं? पर संकोची स्वभाव की होने के कारण किसी से पूछ नहीं पाई.’’

वसीयत: भाग 3- भाई से वसीयत में अपना हक मांगने पर क्या हुआ वृंदा के साथ?

‘‘चल उठ… बहुत सोचने लगी है… ऐसे ही सोचती रही तो प्रियांश की परवरिश कैसे करेगी? यह देख (दीदी ने बेल को फिर से कपड़े सुखाने वाले तार पर लपेटते हुए कहा). ले मिल गया सहारा. अब फिर से हरी हो जाएगी यह बेल.’’

‘‘दीदी, काश जिंदगी भी इतनी ही आसान हो सकती…’’

‘‘यदि कोशिश की जाए तो कुछ मुश्किलें तो अब भी कम हो सकती हैं वृंदा…’’ दीदी की आवाज अचानक गंभीर हो गई.

‘‘मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझी दीदी?’’

‘‘वृंदा, अमृत भैया की बेरुखी किसी से छिपी नहीं… आज संकट की इस घड़ी में उन्हें जहां सब से आगे होना चाहिए था, वहीं वे मुंह चुराते घूम रहे हैं. हैरत की बात तो यह है कि

मां भी खामोश हैं… क्या मजबूरी है उन की, मैं नहीं जानती?’’

‘‘दीदी, एक तो बुढ़ापा ऊपर से बिना पति के भला इस से बढ़ कर मजबूरी और क्या हो सकती है. आखिर उन का बुढ़ापा तो भैया की पनाह में ही कटना है न?’’

‘‘इस का मतलब बेटी के एहसासों की कोई कीमत नहीं… आखिर उस के प्रति भी कुछ जिम्मेदारी बनती है उन की. घर उन का है…

पापा की पैंशन है… कौन सा वे भैया के सहारे जी रही हैं?’’

‘‘दीदी, मां समाज को तो नहीं बदल सकतीं न… जहां आज भी बेटियों की अपेक्षा बेटों के साथ रहने में ही मातापिता का सम्मान कायम माना जाता है.’’

‘‘मेरी छोटी बहन कितनी समझदार हो गई है. चल छोड़ ये सब वृंदा… मैं ने, मृदुला ने और तुम्हारे दोनों जीजाजी ने यह तय किया है कि वे भैया से बात करेंगे. आज समय बदल चुका है. कानून ने भी बेटियों को पिता की पूंजी में बराबर का हक देने की बात को स्वीकार किया है.’’

‘‘पगली, ये रिश्तेनाते, सगेसंबंध होते किसलिए हैं? वक्तबेवक्त सहारे के लिए ही न? जो बुरे वक्त में काम न आए वह भला कैसे अपना वृंदा?’’

आखिर सब ने मिल कर भैया को समझाने का प्रयास किया कि संपत्ति में से वृंदा को कुछ हिस्सा दे दिया जाए, कृष्णा और मृदुला दीदी ने यहां तक कह दिया कि वे अपने लिए कुछ नहीं मांग रहीं, कहे तो लिख कर दे दें. मगर आज वृंदा पर जो विपदा आई है, उस में तुम्हें खुद आगे हो कर यह कदम उठाना था.

मगर भैया नहीं चाहते थे कि पिताजी की जायदाद में से मेरा भी हिस्सा कर दिया जाए. तभी किसी ने उन्हें अकेले में ले जा कर सलाह दी, ‘‘खैर मनाओ, बाकी दोनों बहनें कुछ नहीं मांग रहीं. मान जा वरना कोर्ट की बारी आई तो हो सकता है 4 हिस्से बराबर के करने पड़ें.’’ तब बुझे मन से भैया को यह निर्णय स्वीकार करना पड़ा. भाभी पर तो मानो वज्रपात हो गया.

खैर, पिताजी के मकान का एक हिस्सा मेरे नाम करा दिया गया. मैं विवश न चाहते हुए भी इस बेरुखी भरे माहौल में अपने स्वाभिमान को गिरवी रख मायके आ गई, इस उम्मीद के साथ कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा.

आखिर खून का रिश्ता है… पानी में लकड़ी पड़ भी गई तो पानी भला कहां दूर होने वाला, कुछ नहीं तो अपनों के करीब रहूंगी. मगर यह मेरी भूल थी. यहां तो रिश्तों की परिभाषा ही बदल चुकी थी. कोई अपना न रहा था.

दौलत के हिस्से ने घर के बंटवारे के साथ ही दिल के बीच भी दीवार खींच दी थी. मेरे स्वाभिमान को यह जरा भी गंवारा न था. मगर लाचार थी. कोई और चारा भी तो न था, वहीं बच्चों को ट्यूशन पढ़ानी शुरू कर दी. पासपड़ोस के लोगों ने इस में मेरी मदद की. बेगानों की मदद से जिंदगी को पटरी पर लाने का प्रयास कर रही थी.

भाभी खुद कभी न बोलतीं. जितना मैं बोलती उस का भी बड़ी बेरुखी से जवाब देतीं. भैया तो मानो आज भी नाराज हैं. मां जो अकसर शाम को लौन में कुरसी डाल कर बैठती थीं, मेरे जाने के बाद कम ही बैठतीं.

शायद बहूबेटी के झंझटों से मुक्त रहना चाहती थीं. मुझे दुख नहीं, बल्कि तरस आता मां पर, लगता मेरे कारण बंट कर रह गई हैं वे

2 आवाजों के बीच. भैया के बच्चे मोंटी और पारुल बड़े थे. अपने और पराए के भेद को जानने लगे थे. अत: कभी मेरी तरफ खेलने न आते. किंतु इन सब चालों से अनजान प्रियांश जब भी उन्हें खेलते देखता उन के साथ हो लेता.

एक दिन जाने कैसे प्रियांश बच्चों के कमरे से खेलतेखेलते एक खिलौना उठा लाया. आखिर बच्चा ही तो था. मैं बच्चों को ट्यूशन पढ़ा रही थी कि भाभी के प्रेम वचन सुनाई दिए, ‘‘घर पर तो हमारे अधिकार जमा ही लिया अब क्या धीरेधीरे घर का सारा सामान भी हड़पने का इरादा है?’’

मैं ने स्थिति को समझते हुए बीच में बोलना उचित नहीं समझा. आखिर बच्चा ही सही गलती प्रियांश की ही थी. फिर आए दिन इस तरह की कोई घटना होने लगी. समय के साथ यह एहसास भी हुआ कि यह सब अनायास नहीं, बल्कि सोचीसमझी साजिश है.

एक दिन शाम के समय भाभी लगभग चीखते हुए आ पहुंचीं, ‘‘तुम यहां कमाई में लगी रहो और तुम्हारा कुलदीपक हमारे यहां बैठा नुकसान करता रहे… ये सब नहीं चलेगा… देखो कितना सुंदर फ्लौवरपौट था. तोड़ दिया न इस उज्जड ने… कितना महंगा था, अब मैं और बरदाश्त नहीं कर सकती.’’

मैं कुछ कहती उस से पहले ही मोंटी बोल पड़ा, ‘‘मगर मम्मी यह तो कल पारूल से टूटा था.’’

‘‘चुप रह शैतान… तुझे पता भी है कुछ?’’

अपना दांव बिखरते देख भाभी बड़बड़ाती हुई अंदर चली गईं. आखिर मोंटी बच्चा ही तो था. अत: बोल गया बच्चे की बोली. चाहती तो बहुत कुछ कह सकती थी, मगर वक्त ने मेरे मुंह पर मजबूरी और एहसानों का ताला जो जड़ दिया था.

खैर, मुझे भाभी के इरादे अच्छी तरह समझ आ गए. रहना तो मैं खुद भी नहीं चाहती थी ऐसे किसी का कृपापात्र बन कर, मगर जीजीजीजाजी ने जो मेरे खातिर इन लोगों से बुराई मोल ली थी उस का मान तो रखना ही था.

अब मैं संभल गई. बच्चों को पढ़ाते वक्त प्रियांश को भी अपने साथ ले कर बैठती. किसी न किसी तरह उसे उलझाए रखती ताकि फिर न झंझट को न्योता दे आए.

 

मगर बच्चे की चपलता को भला कौन बांध सका है. इधर भाभी जोकि फिराक में ही बैठी थीं. पिछले 2 दिनों से मांजी की तबीयत खराब थी. इतना तेज बुखार कि मुझे ट्यूशन की भी छुट्टी करनी पड़ी. मैं उन्हीं की देखभाल में लगी थी कि जाने कब प्रियांश मेरी कैद से निकल भाभी के घर पहुंच गया.

उस का ध्यान तब आया जब उस के जोरजोर से रोने की आवाजें आने लगीं. किसी अनिष्ट की आशंका से मैं जल्द ही उस ओर भागी. मेरा बच्चा पीठ और पैरों को हाथ लगालगा रो रहा था. भाभी ने न जाने किस अपराध के लिए उसे स्केल से इस कदर पीटा कि निशान उभर आए थे पीठ और पैरों पर. कभी पीठ को हाथ लगा कर तड़पता तो कभी पैरों को पकड़ कर.

‘‘क्या कोई इतना भी निष्ठुर हो सकता है?’’ गोदी में लिटा कर उसे हलकेहलके थपकियां देने के अलावा मैं कर भी क्या सकती थी. वह सो गया. उस का मासूम पीड़ा से भरा चेहरा मेरे सामने था.

मस्तिष्क में अनंत सवालों के बादल घुमड़ रहे थे कि कानून की मोटीमोटी किताबों में जाने कितनी धाराएं बनेंगी और बदलेंगी. बेटी को बाप की वसीयत में बराबर की हिस्सेदारी मिली यह खबर अखबारों की सुर्खियों में ही भली लगती हैं. वास्तविकता तो यही है जो उस के साथ घट रही है.

क्या वास्तव में बाप की वसीयत से बेटी का हिस्सा निकालना इतना तकलीफदेह है? इस हकीकत को नकारा नहीं जा सकता कि अगर वह हिस्सा लेती है तो उसे प्यारमुहब्बत की दौलत को खोना होगा, क्योंकि आज बाबुल के मन का आंगन इतना संकुचित हो चुका है कि वहां प्यार या पूंजी में से कोई एक ही समा सकता है. चाहे वह एक बेटी के द्वारा अपनी परेशानियों में उठाया गया कदम ही क्यों न हो?

आज समाज और कानून के भय से उस ने यह हिस्सा भी पा लिया तो क्या? उस के लिए उसे अपनों के अपनत्व की आहुति देनी पड़ेगी, यह उस ने कभी सोचा न था. ऐसा क्यों है कि जिस बेटी को बचपन में बड़े नाजों से पाला जाता है उसी बेटी के ब्याह होते ही उस के प्रति न केवल लोगों का बल्कि उस के जन्मदाताओं के नजरिए में भी परिवर्तन आ जाता है. जब बेटियां अपने मायके की खुशहाली की खातिर अपना तनमनधन सब समर्पित कर सकती हैं तो अपनी मुसीबतों के पलों में उन की ओर उम्मीद भरी आंखों से निहारने पर यह तिरस्कार क्यों?

जाने क्यों लोग- भाग 1: क्या हुआ था अनिमेष और तियाशा के साथ

लंबी,छरहरी, गोरी व मृदुभाषिणी 48 साल की तियाशा इस फ्लैट में अब अकेली रहती है, मतलब रह गई है.

आई तो थी सपनों के गुलदान में प्यारभरी गृहस्थी का भविष्य सजा कर, लेकिन एक रात गुलदान टूट गया, सो फूल तूफानी झेंकों में उड़ गए.

तियाशा के पिता ने 2 शादियां की थीं.

बड़ी मां के गुजरने के बाद उस की मां से ब्याह रचाया था उस के पिता ने. उस की मां ने उस के सौतेले बड़े भैया को भी उसी प्यार से पाला था जैसे उसे. लेकिन मातापिता की मृत्यु के बाद भाभी की तो जैसे कुदृष्टि ही पड़ गई थी उस पर. अच्छीभली प्राइवेट कालेज में वह लैक्चरर थी. मगर उस की 32 की उम्र का रोना रोरो कर उसे चुनाव का मौका दिए बगैर उस की शादी जैसेतैसे कर दी गई.

शादी के समय किंशुक उस से 8 साल बड़ा था, एक बीमार विधवा मां थी उस की, जिन की तीमारदारी के चलते इकलौते बेटे ने अब तक शादी नहीं की थी. मगर जाने क्या हुआ, सास के गुजरने के 2 साल के अंदर ही किंशुक को हार्ट की बीमारी का पता चला. फिर तो जैसे शादी के 5 साल यों पलक झपकते गुजर गए कि कभी किंशुक का होना सपना सा हो गया.

7 बजने को थे. औफिस जाने की तैयारी में लग गई. आसमानी चिकनकारी कुरती और नीली स्ट्रैचेबल डैनिम जींस में कहना न होगा बहुत स्मार्ट लग रही थी. किंशुक उस का स्मार्ट फैशनेबल लुक हमेशा पसंद करता था.

औफिस पहुंच कर थोड़ी देर पंखे के नीचे सुस्ता कर वह अपने काम पर ध्यान देने की कोशिश करती. कोशिश ही कर सकती है क्योंकि घोषाल बाबू, मल्लिक यहां तक कि अंजलि और सुगंधा भी उसे काम में मन लगाने का मौका दें तब तो.

यह राज्य सरकार का डिस्ट्रिक्ट ऐजुकेशन औफिस है. यहां किंशुक ने लगभग 19 साल नौकरी की. तियाशा को 10 महीने होने को

आए इस औफिस में किंशुक की जगह नौकरी करते हुए.

आज भी जैसे ही वह अपनी कुरसी पर आ कर बैठी मल्लिक और घोषाल बाबू ने एकदूसरे को देखा. मल्लिक की उम्र 45 और घोषाल की 48 के आसपास होगी. इन तीनों के अलावा इस औफिस में स्टाफ की संख्या 22 के आसपास होगी. मल्लिक ने तियाशा की ओर देखते हुए घोषाल से चुटकी ली कि कोलकाता के लोगों को बातबात पर बड़ी गरमी लगती है. भई, क्या जरूरत है बस में धक्के खाने की. हम और हमारी बाइक काम न आ सके तो लानत है.

पास से गुजरती अंजलि और सुगंधा मल्लिक आंख मारती हंसती निकल गईं.

तियाशा की रगरग में जहरीली जुगुप्सा सिहरती रही. वह अपने कंप्यूटर की स्क्रीन में धंसने की कोशिश करती रही, असहज महसूस करती रही.

ललिता ने तियासा को बताया था कि वह वहां वहीखाता, फाइल आदि टेबल तक पहुंचाने का काम करती थी. अन्य के मुकाबले किंशुक ललिता को उस की उम्र का लिहाज कर अतिरिक्त सम्मान देता था. आज किंशुक की विधवा के प्रति वह स्नेह सा महसूस करती. अकसर कहती, ‘‘बेटी यहां सारे लोग सामान्य शिक्षित, बड़े ही पारंपरिक पृष्ठभूमि के हैं, अगर तुम केश बांध कर, फीके रंग की साड़ी में आती, रोनी सी सूरत बनाए रखती, किसी से बिना हंसेमुसकराए सिर झका कर काम कर के निकल जाती तो शायद तुम्हें ऐसी बातें सुनने को नहीं मिलतीं. सब के साथ सामान्य औपचारिकता निभाती हो, मौडर्न तरीके की ड्रैसें पहनती हो… लोगों को खटकता है.’’

लब्बोलुआब यह कि पति की मृत्यु के बाद भारतीय समाज में स्त्री को अब भले ही जिंदा न जलना पड़े, पर जिंदा लाश बन कर रहना ही चाहिए. उस का सिर उठा कर जीना, दूसरे के सामने अपना दर्द छिपा कर मुसकराना, स्वयं के हाथों अपनी जिंदगी की बागडोर रखना लोगों को गवारा नहीं. वह हमेशा सफेद कफन ओढ़े रहे, निराश्रितपराश्रित जैसे व्यवहार अपनाए, तभी वह प्रमाणित कर पाएगी कि उस का चरित्र सच्चा है और वह पति के सिवा किसी अन्य को नहीं चाहती. और तो और गलत भी क्या है अगर पति के जाने के बाद कोई स्त्री अपने लिए खुशी ढूंढ़ती है. क्यों जरूरी है कि वह ताउम्र किसी का गम मनाती रहे?

तियाशा का मन विद्रोह कर उठता है. पत्नी की मृत्यु पर तो सारा समाज एक पुरुष को सहानुभूति के नाम पर खुली छूट दे देता है. तब वह बेचारा, सहारे का हकदार, मनोरंजन के लिए किसी भी स्त्री में दिलचस्पी लेने की स्वतंत्रता का विशेषाधिकार पाने वाला होता है. लेकिन एक स्त्री अपने जीवने को सामान्य ढर्रे पर भी चलाने की कोशिश करने की हकदार नहीं. उसे एक कदम पीछे चलना होगा. उसे हमेशा प्रमाणित करना होगा कि पति के बिना उस का अपना कोई वजूद नहीं है.

इन दिनों जाने क्यों उसे ज्यादा गुस्सा आने लगा है. इस वजह कुछ जिद भी. नितिन की यहां नई जौइनिंग से उन के मन ही मन अपना मन बहलाना शुरू किया है. अच्छा लड़का है, सुंदर है, स्मार्ट है… क्या हुआ यदि उस से 7-8 साल छोटा है. इन लोगों की तरह पूर्वाग्रह से ग्रस्त तो बिलकुल भी नहीं.

काफी है एक दोस्त की हैसियत से उस से थोड़ी बातचीत कर लेना. फिर और लोग भी क्या बात करेंगे उस से? न तो उस के पास पति या ससुराल वालों की निंदा के विषय हैं और न ही मायके वालों की धौंस और रुतबे का बखान. बच्चे के कैरियर को ले कर दिखावे की भी होड़ नहीं. फिर लोग उसे ही तो अपना विषय बनाए फिरते हैं. कौन है जिस से वह अपना दुखसुख बांटे?

दोपहर के ब्रेक में आजकल वह नितिन से कैंटीन जाने के लिए पूछती तो वह

भी यहां नया और अकेला होने के कारण सहर्ष राजी हो जाता. कुछ हैवी स्नैक्स के साथ 2 कप कौफी उन दोनों के बीच औपचारिकता की दीवार ढहा कर थोड़ाथोड़ा रोमांच और ठीठोली भर रही थी. एक इंसान होने के नाते तियाशा को अच्छा लगने का इतना तो अधिकार था, फिर भी वह खुद को हर वक्त सांत्वना देती रहती जैसेकि वह किंशुक को धोखा दे देने के बोझ से खुद को उबारना चाहती हो.

कुछ पल जो जिंदगी में नितिन के साथ के थे, क्योंकि इस साथ में आपसी दुराग्रह नहीं था, सामाजिक परंपरागत कुंठा नहीं थी, यद्यपि इस दोस्ती को ले कर भी चुटीली बातों का बाजार गरम ही रहता.

आज नितिन औफिस नहीं आया था, फिर भी रहरह तियाशा की नजर दरवाजे की तरफ घूम जातीं. दोपहर तक उस के दिल ने राह देखना जब बंद नहीं किया तो वह झल्ला पड़ी और ब्रेक होते ही कैंटीन की तरफ खुद ही चल दी. उम्मीद थी वह खुद को एक बेहतर ट्रीट दे कर साबित कर देगी कि वह नितिन के लिए उतावली नहीं है. दिल उदास था, जाने क्यों अकेलापन छाया रहा. मन मार कर सकुचाते हुए उस ने नितिन को कौल किया. कौल उस ने पहली बार किया था, लेकिन नितिन ने कौल नहीं उठाया. यह भले ही सामान्य सी बात रही हो, लेकिन तियाशा को खलता रहा. हो सकता है इस चिंता के पीछे लोगों का उस पर अतिरिक्त ध्यान देना रहा हो.

मॉडल और अभिनेत्री अनुप्रिया गोयनका, त्यौहार को कैसे मनाती है, पढ़ें इंटरव्यू

मॉडलिंग से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली विनम्र, सांवली रंगत, छरहरी काया की धनी अभिनेत्री अनुप्रिया गोयनका कानपुर की है. उन्हें बचपन से ही अभिनय की इच्छा थी, जिसमे उनके माता – पिता ने साथ दिया. विज्ञापनों में काम करते हुए उन्हें कई भूमिकाएं मिली, जिसमें फिल्म ‘टाइगर जिन्दा है, ‘पद्मावत’ और ‘वार’ में उसकी भूमिका को दर्शकों ने सराहा. अनुप्रिया को इंडस्ट्री में जो भी काम मिलता है, उसे अच्छी तरह करना पसंद करती है. फिल्मों के अलावा उन्होंने कई वेब सीरीज में भी काम किया है. डिजनी प्लस हॉटस्टार पर उनकी वेब सीरीज ‘सुल्तान ऑफ़ दिल्ली’ रिलीज पर है, जिसे लेकर वह बहुत उत्साहित है. उन्होंने ज़ूम पर अपनी जर्नी और सपने को साकार करने की संघर्ष को लेकर बात की आइये जानते है, उनकी कहानी उनकी जुबानी.

अभिनय को दी है प्राथमिकता

काफी सालों तक इंडस्ट्री में रहने के बावजूद उन्हें उस हिसाब से फिल्मों में कामयाबी न मिलने की वजह के बारें में पूछने पर अनुप्रिया कहती है कि मैं हमेशा से थोड़ी क्वालिटी वर्क करने के पक्ष में हूँ. भूमिका छोटी हो या बड़ी,  उस विषय पर मैंने कभी अधिक जोर नहीं दिया. मेरे लिए चरित्र और जिनके साथ काम कर रही हूँ वह अच्छा होना बहुत जरुरी है. जहाँ मुझे लगता है कि मैं कुछ उनसे सीखूंगी, नया चरित्र है, या काम करने में मज़ा आएगा, वहां मैं काम करना पसंद करती हूं. मैं रोमांटिक, ग्रामीण और कॉमेडी फिल्म करना चाहती हूँ. इसके अलावा मुझे पीरियड फिल्म बहुत पसंद है. अलग और क्वालिटी वर्क, जो अलग हो, उसे करना पसंद करती हूँ. मेरे पास जो स्क्रिप्ट आती है, उसमें से मैं अच्छी भूमिका को खोजकर काम करती हूँ.

मेहनत जरुरी

किसी भी नई भूमिका के लिए अनुप्रिया बेहद मेहनत करती है, वह कहती है कि हर फिल्म की एक ख़ास जरुरत होती है जैसे फिल्म ‘वॉर’ के लिए शारीरिक रूप से फिट महिला चाहिए था, उसके लिए मैंने काफी वर्क आउट किया, क्लासेज लिए. एक्शन फिल्म के लिए फिटनेस जरुरी होता है. पद्मावत फिल्म में मैंने रानी नागमती की भूमिका के लिए बहुत रिसर्च किया. मैं खुद भी राजस्थान से हूँ, इसलिए वहाँ की रीतिरिवाज से परिचित थी. फिर भी मैंने संवाद बोलने के तरीके को अच्छी तरह से सीखा. इस तरह से मैंने हर किरदार के साथ पूरी तरह से न्याय देने की कोशिश किया है और उसके लिए जो भी जरुरी हो उसे अवश्य करती हूँ, ताकि भूमिका सजीव लगे.

 

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सपना एक महिला की  

वेब सीरीज सुल्तान ऑफ़ दिल्ली में अनुप्रिया शंकरी की भूमिका निभा रही है, जो  60 की दशक में क्राइम से सम्बंधित है. इस कहानी में स्वाधीनता के बाद लोगों ने किस प्रकार अपनी उम्मीदों को पूरा करने की कोशिश में लगे है, जिसमे एक नारी, पुरुषों की दुनिया में अपने अस्तित्व को बनाये रखने की कोशिश करती है. इसमें सबसे बड़ी उसकी हथियार उसकी सेक्सुअलिटी और सेंसुअलिटी है. दिमाग से तीखी भी है. वह ऐसी औरत है, जो अपनी मोरालिटी की वजह से पीछे नहीं हटती, जिसने सारी दुनिया देखीं है, उसे काफी चीजों का सामना करना पड़ा है. उससे निकलकर कैसे वह अपनी वजूद को साबित करना चाहती है और कई बार वह सिद्ध भी कर देती है कि वह पुरुषों से पीछे नहीं, बराबर है. उसकी कोशिश है कि वह सुल्तान भले ही न बने , लेकिन सुल्तान की साथी बनकर सभी पर राज्य करें.

 

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चुनौतीपूर्ण भूमिका

अनुप्रिया आगे कहती है कि इसमें चुनौती इंटिमेट सीन्स का था, जिसे कठिन परिस्थिति में शूट किया गया.  इसे करीब 45 डिग्री की तापमान के साथ – साथ उसमे तकनिकी चीजो का अधिक प्रयोग हुआ है. राजकोट में 5 घंटे की इस शूटिंग को गर्मी में करना मुश्किल था. इमोशनली भी कठिन था, क्योंकि इसके तुरंत बाद मुझे शादी के गेटअप में आना था. ये मेरे लिए यादगार दृश्य है और जब तक कुछ नया अभिनय न कर लूँ, ये दृश्य मेरे जीवन का सबसे अधिक कठिन और यादगार सीन ही रहेगा.

सपने देखना आवश्यक

सपने हर कोई देखता है, क्या आप अपने सपने तक पहुंच पाई? अनुप्रिया कहती है कि सपने तो मैंने देखे है और इसमें अगर जद्दोजहत न हो, तो जिंदगी का मजा कम रह जाता है. सब सही होने पर सिंपल लाइफ शुरू होता है. मेरे हिसाब से एक सपना पूरा होने पर दूसरा सामने आ जाता है. मैंने जो सोचा था उससे कही अधिक मुझे मिला है, मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं एक जानी – मानी एक्ट्रेस बनूँगी, मेरे कई लाख फैन फोलोवर्स होंगे. दर्शक मेरे काम की तारीफ करेंगे. ये मेरी एक जर्नी है, जिसमें मैंने धीरे – धीरे कामयाबी पाई है. मैंने अच्छे फिल्म मेकर्स और को स्टार के साथ काम किया है. मैंने जो सोचा उसी चरित्र को मैंने किया. इसके अलावा मेरे 4 से 5 मेरे लक्ष्य है, जिसे मैं पाना चाहती हूँ. जिसमे स्मिता पाटिल की ‘ मिर्च मसाला, रेखा की उमराव जान जैसे उन फिल्मों की इंतजार में हूँ और वैसी फिल्मों में काम करने की इच्छा रखती हूँ.

किये संघर्ष

अनुप्रिया कहती है कि मुझे यहाँ इंडस्ट्री में कोई जानने वाला नहीं है, ऐसे में मेरे लिए कोई कहानी लिखी नहीं जायेगी. मुझे काम ढूढना पड़ा और सब कुछ सीखना पड़ा. टाइगर जिन्दा है और पद्मावत फिल्म के बाद ऑडिशन देने की संख्या कम हो गयी है. ये मेरे लिए सबसे अधिक राहत है. इसके अलावा अभी भी आगे काम के लिए निर्देशकों से मिलना पड़ता है, पर मैं फिल्मों के अलावा विज्ञापनों में भी काम करती हूँ. आउटसाइडर के कलाकार का लर्निंग पीरियड हमेशा चलता ही रहता है.

इंटिमेट सीन्स समस्या नहीं

अन्तरंग दृश्यों को लेकर सहजता के बारें में पूछने पर अनुप्रिया कहती है कि मैं बहुत सहज हूँ, लेकिन सीन्स उस कहानी के साथ जाने की जरुरत होनी चाहिए. महिलाओं की कामुकता को उसकी गहराई को दिखाए बिना, मार्केटिंग के उद्देश्य से इंटिमेट सीन्स को दिखाने में मैं सहज नहीं और करना भी नहीं चाहूंगी. ऐसे दृश्य को बहुत ही मर्यादित तरीके से दिखाए जाने की जरुरत होती है, क्योंकि एक औरत में बहुत सारी चीजे होती है और उसे सम्हालना फिल्म मेकर का काम होता है.

 

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समय मिलने पर

अभी अनुप्रिया ह्यूमन ट्राफिकिंग पर कुछ काम करना चाहती है, जो देश में बहुत जरूरी है. इसके अलावा अनुप्रिया डांसिंग, सिंगिंग, पेंटिंग और गाने सुनती है.

महिलाओं के लिए अनुप्रिया का मेसेज है कि महिलाओं को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर होने की जरुरत है. जिससे उनकी सोच और विचार को रखने के साथ -साथ कुछ कहने की आज़ादी मिलती है. तभी वे एक अच्छे भविष्य का निर्माण कर सकती है.

त्यौहार, परिवार के साथ

त्यौहार को अनुप्रिया मनाना बहुत पसंद करती है, वह कहती है कि त्यौहार में शुरू से मैं अपने परिवार के साथ रहना पसंद किया है. उस दिन साथ मिलकर खाना खाते है. त्यौहार की सबसे अधिक खास बात उस दिन को परिवार के साथ सेलिब्रेट करना होता है. इसके अलावा इसमें घर की साफ – सफाई और नए कपडे पहनना आदि भी उत्साहवर्धक होते है, लेकिन इसका स्वरुप अब बदल चुका है. मोबाइल फ़ोन के ज़रिये ही त्यौहार मनाया जाता है, जो मुझे पसंद नहीं. थोड़े समय साथ मिलकर खुशियों को मनाना ही इसमें प्रमुख होना चाहिए, जिसे दूर – दूर रहकर अनुभव नहीं किया जा सकता. किसी भी रिश्ते की मजबूती साथ रहने से होती है.

अंडरआर्म्स के कालेपन को कैसे करें कम

आपके शरीर के अन्य हिस्सों की तरह अंडरआर्म्स की स्किन काली पड़ सकती है जो आपको स्लीवलेस कपड़े पहनने से रोक सकती है. यह अक्सर स्किन डियोड्रेंट, शेविंग या अन्य जलन पैदा करने वाले प्रोडक्ट्स को इस्तेमाल करने से हो सकता है इसीलिए महिलाएं तरह-तरह के केमिकल वाले प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करने लग जाती हैं. जिससे कई बार आपकी त्वचा को नुकसान हो सकता है इसीलिए यहां हम आपको ऐसे कुछ घरेलू उपाय बताएंगे जिनका उपयोग कर आप अंडरआर्म्स के कालेपन को दूर कर सकती हैं. तो देर किस बात की है आइए जानते है इसके बारे में-

  1. आलू

आलू को इवन स्किन टोन करने के लिए बेहतरीन उपाय माना जाता है. एक आलू को कद्दूकस कर लें और इसका रस निचोड़ लें और इस रस को अंडरआर्म्स पर लगाएं. 10 से 15 मिनट के बाद अंडरआर्म्स को ठंडे पानी से धो लें.

2. दूध के साथ गुलाब जल और संतरे का छिलका

संतरे के छिलके के पाउडर में एक चम्मच दूध और एक चम्मच गुलाब जल मिलाकर गाढ़ा पेस्ट बना लें. अब इस पेस्ट से अपने अंडरआर्म्स को धीरे-धीरे मालिश करें और 15 मिनट के बाद ठंडे पानी से धो लें.

3. नींबू

नींबू स्किन की गंदगी और कालेपन को दूर करने के लिए एक कारगर उपाय माना जाता है. इसका इस्तेमाल करने के लिए नींबू को काटकर अपने अंडरआर्म्स पर रगड़ें. अब 10 मिनट के बाद अपने अंडरआर्म्स को ठंडे पानी से धो लें. इसके बाद मॉइश्चराइजर का इस्तेमाल करें.

4. हल्दी और नींबू

एक बाउल में हल्दी के दो चम्मच को नींबू के रस में मिला लें. अब इस पेस्ट को अंडरआर्म्स पर लगा लें. 30 मिनट के बाद अंडरआर्म्स को ठंडे पानी से धो लें.

5. अंडे की जर्दी का तेल

जब आप सोने जाती हैं तो उससे पहले अंडरआर्म्स पर अंडे की जर्दी के तेल की मालिश करें और अगली सुबह अपने अंडरआर्म्स को पीएच बैलेंस वाले बॉडी वॉश से धो लें.

6. टी ट्री ऑयल

अंडरआर्म्स के कालेपन को दूर करने के लिए आप एक छोटी स्प्रे बोतल में टी ट्री ऑयल की 5 बंदे और 8 औंस पानी के साथ मिलाएं. नहाने के बाद डियोड्रेंट के स्थान पर इस स्प्रे का इस्तेमाल करें.

इन बातों का भी रखें ध्यान-

  • आप अपने डियोड्रेंट को चेंज कर प्राकृतिक विकल्प चुन सकती हैं.
  • शेविंग की जगह वैक्सिंग या लेजर हेयर रिमूवल ट्रीटमेंट करा सकती हैं.

कहीं पेनकिलर मेरी हेल्थ पर भारी तो नही पड़ेगी?

सवाल- 

मैं 25 साल का हूं. मैं एक फोटोग्राफर हूं, इसलिए मुझे पूरापूरा दिन खड़े हो कर फोटोशूट करना पड़ता है. कई बार बाहर भी जाना पड़ता है, जहां आराम के लिए वक्त ही नहीं मिल पाता है. ऐसे में मेरा शरीर दर्द से टूटने लगता है और सिरदर्द भी होता है, जिस के कारण मुझे पेनकिलर लेनी पड़ती है. मुझे डर है कि कहीं पेनकिलर मेरे स्वास्थ्य पर भारी न पड़ जाए. कृपया मुझे समस्या से छुटकारा पाने का समाधान बताएं?

जवाब- 

इस प्रकार की व्यस्त जीवनशैली के कारण युवा अकसर ऐसी समस्याओं की चपेट में आ जाते हैं. पूरा दिन एक ही मुद्रा में खड़े या बैठे रहने के कारण नसों पर दबाव पड़ता है, जिस से दर्द की शिकायत होती है. थकावट, भूखा रहने, कम पानी पीने और आराम न मिलने के कारण सिरदर्द की समस्या होती है. इस के जिम्मेदार हम खुद होते हैं. कामकाज को महत्त्व देने के चक्कर में खुद के स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दे पाते हैं. समस्या से छुटकारा पाना है तो सब से पहले शरीर को आराम देना सीखें. काम के बीच में कुछ वक्त निकाल कर शरीर को स्ट्रैच करें, समय पर खाना खाएं, पर्याप्त मात्रा में पानी पीएं और बीचबीच में बैठ कर शरीर को आराम दें. इस के अलावा रूटीन में ऐक्सरसाइज, पौष्टिक आहार आदि शामिल करें. समस्या ज्यादा होती है तो डाक्टर से परामर्श लें. इसे हलके में लेना भारी पड़ सकता है. किसी भी समस्या के लिए खुद से दवा कभी न लें. डाक्टर के परामर्श पर ही दवा का सेवन करें.

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आम तौर पर लोग सिर दर्द हो या पीठ में दर्द पेनकिलर बिना सोचे समझे ले लेते हैं. ये आदत आपके लिए कितना खतरनाक हो सकता है इसके बारे में शायद ही किसी ने सोचा होगा! हाल के एक रिसर्च से ये ज्ञात हुआ है कि पेनकिलर लेने से पुराने दर्द की समस्या जटिल रूप धारण कर सकती है. बार-बार दर्द निवारक दवायें पुराने यानि क्रॉनिक पेन का प्रॉबल्म बढ़ाने में अहम् भूमिका निभाती हैं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  गृहशोभा-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem
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