हमसफर: भाग 1- प्रिया रविरंजन से दूर क्यों चली गई

भूली तो कुछ भी नहीं, सब याद है. वह दिन, वह घटना, वह समय जब रविरंजन से पहली मुलाकात हुई थी. चित्र प्रदर्शनियां मु  झे सदा आकर्षित करती रहीं. मैं घंटों आर्ट गैलरी में घूमा करती. कलाकार की मूक तूलिका से उकेरे चित्र बोलते से जीवंत नजर आते. उन चित्रों में जिंदगी के सत्य को खोजती, तलाशती मैं उन्हें निहारती रह जाती. ऐसी ही एक आर्ट गैलरी में एक ऐसे व्यक्ति से मुलाकात हुई कि मेरी जीवनधारा ही बदल गई. वे थे रविरंजन.

राष्ट्रीय कला दीर्घा में नएपुराने नामी चित्रकारों की प्रदर्शनी लगी थी. बिक्री के लिए भी नयनाभिराम चित्र थे. मैं ने एक चित्र पसंद किया, पर कीमत अधिक होने के कारण मु  झे छोड़ना पड़ा. वहीं रविरंजन भी कुछ चित्र खरीद रहे थे. मेरी पसंद का चित्र भी उन्होंने खरीद लिया. फिर पैक करवा कर बोले, ‘‘मैडम, यह मेरी ओर से,’’ तो मैं एकदम अचकचा गई, ‘‘नहींनहीं, हम एकदूसरे को जानतेपहचानते नहीं, फिर यह

किस लिए?’’ और तत्काल पार्क की हुई अपनी गाड़ी की ओर बढ़ गई. वे भी मेरे पीछेपीछे निकले. मेरे विरोध को नजरअंदाज करते हुए उन्होंने वह चित्र अपने ड्राइवर से मेरी गाड़ी में रखवा दिया. साथ में उन का कार्ड भी था. उस रात मैं सो न सकी. रहरह कर रविरंजन का प्रभावशाली और सुंदर व्यक्तित्व आंखों के सामने तैर जाता.

दूसरे दिन औफिस में भी मन विचलित सा रहा तो रविरंजन के कार्ड से उन के औफिस नंबर पर ही उन्हें फोन लगाया. सोचा पता नहीं कौन फोन उठाएगा पर फोन उठाया रविरंजन ने ही. मैं ने उन्हें कल वाले चित्र के लिए शुक्रिया कहा तो वे बोले, ‘‘फोन पर शुक्रिया नहीं प्रियाजी. न मैं आप का घर जानता हूं न आप मेरा. देखिए, हम आज शाम पार्क ऐवेन्यू में मिलते हैं,’’ और इस के साथ ही फोन कट गया.

शाम 5 बजे हम कौफी हाउस में मिले. पहली ही मुलाकात में रविरंजन इतने अनौपचारिक हो बैठेंगे, ये मैं ने सोचा ही नहीं था. इस के बाद हमारी मुलाकातें बारबार होने लगीं, बल्कि एक तरह से हम दोनों हर रोज मिलने लगे.

मेरे शांत जीवन में न जाने कैसी हलचल शुरू हो गई. मैं ने अपनेआप को बहुत संभाला,  पर रविरंजन में ऐसा आकर्षण था कि मैं उन की ओर खिंचती चली गई. सारी बंदिशें तोड़ने को दिल मचलने लगा, पर अंकुश था उम्र का. ऐसी चंचलता ऐसी भावुकता शोभा नहीं देगी. फिर ऊंचे पद पर एक जिम्मेदार औफिसर हूं मैं. मेरे लिए जरूरी था संयम और अपनी चाहतों पर काबू रखना.

यह वय:संधि होती बड़ी अजीब है. फिर चाहे किशोरावस्था और युवावस्था के बीच की हो अथवा जवानी और प्रौढावस्था के बीच की. मैं तो सोच रही थी कि उम्र के उफान का समय बीत चुका है. मन ही मन यह तय कर चुकी थी कि अब कोई और राह चुनूंगी पर अब हो तो रहा कुछ और था.

मैं शुरू से ही स्वतंत्र स्वभाव की थी. उम्र होने पर जब मां ने विवाह पर जोर दिया कि पढ़ाई पूरी हुई विवाह कर घर बसा, तो इतनी ही बात पर मैं मां की विरोधी हो गई. सीधे पिता से कहा कि मैं विवाह नहीं करना चाहती, नौकरी करना चाहती हूं. आम औरतों जैसी जिंदगी मैं नहीं जीना चाहती.

पिता ने साथ दिया. वे सम  झ गए कि बेटी इतनी सम  झदार हो चुकी है कि अपना निर्णय वह खुद ले सकती है. उन्होंने सहमति दे दी. तब से मैं दिल्ली में नौकरी कर रही हूं. पर इसे एक संयोग ही कहेंगे कि अपनी विचारधारा के एकदम विपरीत मैं रवि के प्रेमपाश में ऐसी बंधी कि उस से निकलना मेरे लिए मुश्किल हो गया.

‘‘रवि, हम एकदूसरे के बारे में तो कुछ जानते ही नहीं,’’ एक दिन मैं ने कहा.

वे बोले, ‘‘क्या इतना काफी नहीं कि मैं तुम से प्यार करता हूं और तुम मु  झ से?’’

‘‘फिर भी मैं बता देना चाहती हूं कि मेरी मां और मेरे भाई को मेरा नौकरी करना तक पसंद नहीं. मेरा यहां अकेले रहना भी पसंद नहीं और अब बिना विवाह के तुम्हारे साथ ऐसे संबंधों को तो वे कतई पसंद नहीं करेंगे. पिता की सहमति न होती, उन्होंने मेरा साथ न दिया होता तो आज जहां मैं हूं, नहीं होती. पर अब पिता नहीं रहे तो मां और भाई का प्रतिरोध बढ़ता जा रहा है. वे अब भी विवाह करने पर जोर देते रहते हैं. इसलिए आज मैं सोच रही हूं कि मेरे सपनों का पुरुष मिल गया है. रवि, तुम मिले तो लगा कि स्त्रीपुरुष के संबंधों का यह रिश्ता कितना गरिमामय होता है. मैं तो स्वतंत्र जीवन को बड़ी नियामत सम  झती थी पर लगता है कि जीवन में बंधन भी कम आकर्षक नहीं होते.’’

‘‘प्रिया, मैं बता दूं तुम्हें कि मैं विवाहित हूं. मेरी पत्नी है, बेटा है. फिर भी मेरा अंतर खाली ही रहा. तुम मिलीं तो तुम ने भरा उसे. मैं तुम से दूर नहीं रह पाऊंगा,’’ कहते हुए रवि ने मु  झे अपनी बांहों में समेट लिया. मैं ने तनिक भी विरोध नहीं किया, यह जान कर भी कि वे शादीशुदा हैं. फिर बहुत से पल हम ने एकदूसरे के बाहुपाश में बंधेबंधे गुजार दिए.

फिर होश में आए तो रवि ने गहरी नजरों से मु  झे देखा और बोले, ‘‘अच्छा, अब

चलता हूं मैं,’’

उन्होंने अपना सारा सामान, लाइटर, सिगरेट केस, चश्मा आदि समेटा और ब्रीफकेस में डालते हुए बोले, ‘‘आज बहुत देर हो गई.’’

मैं गाड़ी तक उन्हें छोड़ने आई तो बोली, ‘‘दफ्तर से ही आ रहे थे क्या? क्या घर पहुंचने पर मौका निकालना मुश्किल हो जाता है? तुम्हारी पत्नी तो जानती है कि तुम्हारी शामें कहां गुजरती हैं? तुम्हीं ने तो बताया था कि औफिस के बाद अकसर तुम क्लब चले जाते हो.’’

‘‘हां, लेकिन न जाने कैसे वह हम पर शक करने लगी है. अच्छा है, कभी न कभी तो उसे जानना ही है. कभी तनाव का मौका आया तो मैं उसे सब कुछ बता दूंगा,’’ कह कर रवि ने मेरी ओर देखा और गाड़ी स्टार्ट कर दी.

मैं ने कलाई घड़ी पर नजर डाली और सोचा थोड़ा बाहर चहलकदमी कर आऊं. खुली हवा में माइंड फ्रैश हो जाएगा. बाहर निकली तो देखा पड़ोस के गेट पर 3 महिलाएं खड़ी बतिया रही थीं. अपनी ओर मेरा ध्यान खींच उन में से एक बोली, ‘‘घूमने जा रही हैं बहनजी? आप तो दिखती ही नहीं. आप क्या यहां अकेली रहती हैं?’’

‘‘जी हां कहिए…’’

‘‘आज आप के वो कुछ जल्दी चले गए. हम उन्हें अकसर आप के घर आतेजाते देखती हैं. आप उन से शादी क्यों नहीं कर लेतीं, ये रोज का आनाजाना तो छूट जाता?’’

मेरा चेहरा राख हो गया. कोई जवाब देते नहीं बना. बिना कुछ बोले मैं घर लौट आई. मैं महसूस कर रही थी कि उन महिलाओं की व्यंग्य और परिहास भरी दृष्टि मेरी पीठ पर चिपकी होगी. मैं उन को करारा जवाब भी दे सकती थी, जैसे आप को दूसरों की पर्सनल लाइफ से क्या लेनादेना, पर नहीं दे सकी. मु  झे तो ऐसा लगा जैसे किसी ने चोरी करते हुए पकड़ लिया हो.

उस के बाद से जब भी मैं घर से निकलती आसपास की व्यंग्य भरी नजरें मु  झे घूरने लगतीं. इसलिए औफिस जातेआते वक्त मैं गाड़ी गैराज से निकालने के पहले उस के शीशे चढ़ा देती. पड़ोसियों को पूछताछ के अवसर ही नहीं देती.

रवि के दिल में मेरे लिए क्या स्थान है? क्या वे मु  झे भी वही मर्यादा देंगे, जो अपनी पत्नी को देते हैं? मैं अकसर सोचती. रवि ने मु  झ से एक बार कहा था कि संबंध केवल साथ रहने से ही नहीं बनता. सच्चा साथ तो मन का होता है. अधिकतर लोग जीवन भर साथ रहते हैं मगर सभी एकदूसरे के नहीं हो पाते. मेरा दांपत्य जीवन वर्षों से इतना कोल्ड है कि पूछो मत. पत्नी को भी इस का एहसास है. पर और दंपतियों की तरह शारीरिक संबंध हमारे बीच है, चाहे मन मिले

चाहे न मिले. प्रिया, अगर तुम मु  झे पहले मिली होतीं तो…’’

‘‘क्यों, क्या मैं अभी तुम्हारी और तुम मेरे नहीं हो?’’

‘‘नहीं, अगर नियति ने तुम्हें ही मेरे लिए बनाया होता तो हमारा इस तरह घड़ी दो घड़ी

का साथ न हो कर जीवन भर का साथ होता.

मुझे मन मार कर तुम से अलग हो जाने की जरूरत न पड़ती.’’

सच कह रहे थे रवि. न चाहते हुए भी रवि को जाने देना, क्या दूसरी औरत की

भूमिका नहीं निभा रही मैं? कभीकभी अपनेआप से बड़ी कोफ्त होती. किस मायाजाल में फंस गई मैं? इतना भी नहीं सोचा कि विवाहित पुरुष पूरा मेरा नहीं होगा. प्यार एक छलावा मात्र बन जाएगा मेरे लिए.

ज्ञानोद: भाग 2

अपने बच्चे को इस तरह आहत देख कर मेरा दिल भी रो उठा. जी चाहा गले से लगा कर उसे प्यार करूं. कितनी मजबूर थी मैं, अमेरिका इतनी दूर है कि जब जी चाहा नहीं जाया जा सकता. एक तो छुट्टी मिलनी मुश्किल है, ऊपर से पैसे भी कितने लगेंगे. मन मार कर फोन और ईमेल से ही समझौता करना पड़ा. दिन में 2 बार फोन कर के मैं रोहित को हिम्मत बंधाती रही. पर दिन और रात का ये फर्क, अमेरिका और भारत के बीच मेरे काम को और मुश्किल कर देता था.

जब रोहित मुश्किल के इस दौर से गुजर रहा था, फोन करने के लिए भारत में 5 बजने का इंतजार करता रहता था. कई दिन मेरे नित्यकर्मों से निबटने के पहले उस का फोन आ जाता था. उस वक्त उस के मित्रों ने भी उस से किनारा करना शुरू कर दिया था.

दूसरों के सुख में तो सभी सहभागी होते हैं, पर दूसरों के दुख को कोई अपना ही बांटता है. सेवानिवृत्त होने मेरे सिर्फ 2 महीने ही बचे थे. ऐसे में मेरा जाना नामुमकिन था. इन सब मामलों से रवि ने अपने को दूर ही रखा. वैसे भी शादीब्याह का मामला हो या बच्चों की पढ़ाई का मैं ही सब कुछ संभालती थी. हां अंत में ये अपनी मुहर जरूर लगा देते.  मुझ से कहते, ‘‘तुम ही संभालो उसे, वह तुम्हारे ज्यादा करीब है.’’

इस में रोहित ने मेरी मदद की. उस ने मुझे अक्षरश: समझ दिया कि मुझे लिंडा से क्या कहना है. मैं ने लिंडा को फोन कर के कहा, ‘‘मुझे तुम दोनों की शादी से कोई एतराज नहीं है, अगर तुम हां कहो तो मेरे परिवार में तुम्हारा स्वागत होगा,’’

लिंडा ने तेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया. तब मैं ने उस से कहा, ‘‘अगर चाहो तो थोड़ा वक्त ले सकती हो, हम तुम्हारे जवाब का इंतजार करेंगे, हम तुम्हारे बच्चे को भी अपनाने को तैयार हैं.’’

इस पर लिंडा ने मुझे धन्यवाद कहा, इस के बाद भी रोहित ने कहा कि लिंडा उस से  कभीकभार ही बात करती है.

मैं ने रोहित को इतना मायूस पहले कभी नहीं देखा था. अपने बेटे की इस हालत पर मैं भी बहुत दुखी थी. मैं उसे विश्वास दिलाती रही कि वह चिंता न करे सब कुछ ठीक हो जाएगा.

एक दिन रोहित को लिंडा का संदेश मिला, लिंडा ने लिखा था, ‘‘मैं अपने नए साथी से शादी कर रही हूं, अब मेरी जिंदगी में तुम्हारी कोई जगह नहीं है.’’

लिंडा के इस संदेश से रोहित की रहीसही आशा भी टूट गई. खबर पढ़ते ही उस ने मु?ो फोन किया. उस वक्त अमेरिका में तो दिन था, पर यहां रात के करीब 3 बज रहे थे. मैं फोन के बजने की आवाज सुन कर गहरी नींद से चौंक कर उठी, रोहित का ही फोन था, बेहद कमजोर आवाज में कहा, ‘‘मां, सब कुछ खत्म हो गया. लिंडा मुझे छोड़ कर जा चुकी है,’’

रोहित मुझे हमेशा की तरह फोन करता रहा. पर कभी उस ने मुझ से नाराजगी नहीं दर्शायी. मैं भी यही सोचती रही कि वह लिंडो को भूल गया है. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. एक दिन अचानक दिन में रोहित का फोन आया. मैं ने सोचा कि इस वक्त तो अमेरिका में आधी रात होगी.

रोहित ने इस वक्त क्यों फोन किया? शायद वह उलझन में होगा और उसे नींद नहीं आ रही होगी. मुझ से कहने लगा, ‘‘मां, मैं लिंडा को भुला नहीं पा रही हूं. उस के बिना जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकता, अब मैं उस के विरुद्ध आप से या पापा से कुछ नहीं सुनना चाहता. मुझे सिर्फ और सिर्फ लिंडा से ही शादी करनी है, यह मैं तय कर चुका हूं.’’

रोहित का दृढ़ निश्चय जान कर मैं ने भी हथियार डाल दिए. मैं ने कहा, ‘‘यदि तुम निश्चय कर ही चुके हो तो जैसी तुम्हारी मर्जी’’

दूसरे दिन फिर रोहित का फोन आया. इस बार उस की आवाज में काफी नाराजगी थी. कहने लगा, ‘‘मां, लिंडा मुझ से कितनी मिन्नतें करती रहीं, पर आप ने मेरे दिमाग में लिंडा के खिलाफ जहर घोला जिस की वजह से मैं ने उसे ठुकराया.

अब वह कहती है कि उस ने किसी से दोस्ती कर ली है. इस से पहले कि उस की दोस्ती प्यार में बदले, मे आप ही को उसे मनाना होगा मां. मैं ने उस से कहा था कि मैं मातापिता की इच्छा के विरुद्ध नहीं जा सकता, इसलिए उसे मेरी बातों पर विश्वास नहीं रहा. मां, तुम्हें उसे विश्वास दिलाना होगा कि बहू के रूप में स्वीकार करने में तुम्हें कोई आपत्ति नहीं है वरना मैं उसे खो दूंगा.’’

मुझे इस तरह रोहित की तरफ से लिंडा से बात करना बहुत अटपटा लग रहा था. मेरे लिए उस के अंगरेजी उच्चारण को सम?ाना टेढ़ी खीर थी. समझ में नहीं आ रहा था कि लिंडा से क्या कहूं?

धीरेधीरे रोहित का फोन आना कम होता गया. फिर उस ने फोन करना बिलकुल बंद कर दिया. मेरे बारबार फोन करने पर भी फोन नहीं उठाता था. एक दिन उस ने फोन उठाया, पर मुझे काफी भलाबुरा कहने लगा, ‘‘मां, आप लोगों की  वजह से मैं न लिंडा को खोया. यह तो मेरी जिंदगी की बात थी.

फिर मैं ने आप लोगों की बात मानी ही क्यों? हमेशा से ही आप लोग मेरी जिंदगी में दखल देते आए हो. अब तो आप खुश हो न मां कि आप को किसी से कहना नहीं पड़ेगा कि तुम्हारे बेटे ने, तलाकशुदा व बच्चे की मां से शादी की. तुम्हें मेरी खुशी की परवाह नहीं है, लोग क्या कहेंगे इस की ज्यादा परवाह है.’’

रोहित ने कितने इलजाम लगाए थे मुझ पर. यहां तक कि मेरी परवरिश पर भी उस ने प्रश्नचिह्न लगाया था. सुन कर मुझे इतनी पीड़ा हुई कि आंसुओं का सैलाब सा उमड़ पड़ा फिर जल्द ही अपने को संभाल कर मैं ने रोहित से कहा, ‘‘मुझ पर इस तरह इलजाम मत लगाओ बेटा, तुम हम से इतनी दूर रहते हो…भला हम कैसे तुम्हारी जिंदगी में दखल दे सकते हैं? जो कुछ भी हुआ उसे बदला तो नहीं जा सकता? उस से सीख जरूर ली जा सकती है…लिंडा जिस तरह जिंदगी में आगे बढ़ चुकी है, तुम्हें भी आगे बढ़ना चाहिए,’’

इस पर रोहित और भड़क गया, कहने लगा, ‘‘मां बस करो, यह दर्शाना छोड़ दो कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं. एक हीरे को कांच समझ कर मैं ने ठुकरा दिया और इस की वजह सिर्फ आप और आप हो. मेरे लाख कहने पर भी कि लिंडा मुझे पसंद है, आप लोग समझते रहे कि पश्चिम कि लड़कियां अच्छी नहीं.’’

आप लोग कितना जानते हो उन की सभ्यता और संस्कृति के बारे में? इतने दिनों में मैं ने  उन्हें जितने करीब से जाना है, दिनप्रतिदिन मेरा उन से लगाव बढ़ ही रहा है. वे आप लोगों की तरह दकियानूसी नहीं है.’’ रोहित के इन इलजामों से मैं काफी आहत हो गई थी? मैं ने हमेशा ही बच्चों का भला चाहा था. रोहित के जिद पकड़ने पर क्या मैं ने उस का साथ नहीं दिया था? मैं ने उसे फिर से समझने की कोशिश की.

कांता मौसी का उदाहरण दिया. कांता मौसी का बेटा करण बिना मांबाप को बताए विदेशी लड़की से शादी कर के उसे घर ले आया. कांता मौसी ने जब दरवाजा खोला तो करण ने उन की बहू का परिचय उन से कराया. बेहोश हो कर गिर पड़ी थीं मौसी. फिर बाद में मौसी ने बहू को अपना लिया था. उन के 3 बच्चे भी हुए काफी साल बाद. बच्चों में से 2 तो किशोरावस्था तक पहुंच चुके थे, तीसरा अभी छोटा था.

तभी अचानक एक दिन उन की बहू घर छोड़ कर अपने देश लौट गई. बाद में पता

चला उस ने वहीं दूसरी शादी कर ली. मेरे ऐसे उदाहरणों का रोहित पर कोई असर नहीं हुआ, उलटे उस ने मुझे दोषी ठहराया कि मैं चुनचुन कर ऐसे उदाहरण उस के सामने पेश करती हूं.

रोहित ने मुझे फोन करना बिलकुल बंद कर दिया, न ही मेरे फोन का जवाब देता था. कुछ दिन बाद मैं ने उसे संदेश भेजा, ‘‘बेटा, अगर तुम्हें लगता है कि जो कुछ तुम्हारी जिंदगी में घटित हुआ, उस की जिम्मेदार मैं हूं तो मैं तुम से माफी मांगती हूं. विश्वास करो, आगे से मैं तुम्हें कोई राय नहीं दूंगी. तुम अपने जीवनसाथी का चुनाव करने में स्वतंत्र हो. मैं तुम्हारी हर शर्त को मानने को तैयार हूं. मुझे मेरा पुराना हंसताखेलता रोहित वापस कर दो. पहले की तरह मुझे फोन किया करो.’’ मगर मेरी किसी भी दलील या मिन्नत का रोहित पर कोई असर नहीं हुआ.

मेरी दुखों की साथी मेरी बेटी रिया है. मैं ने उस से पूछा, ‘‘बेटी सचसच बताओ, क्या मैं अच्छी मां नहीं हूं? मु?ा से कहां चूक हो गई कि रोहित आज मुझ से घृणा करने लगा है?’’

तब रिया ने कहा, ‘‘मां अपने आप को दोषी समझना बंद करो. आप ने कोई गलती नहीं की है.’’

जिस रिया को मैं ऊंचनीच समझाया करती थी वह मुझे समझने लगी, ‘‘मां, आप चिंता न करो. अभी रोहित बहक गया है. जिस दिन उस की अक्ल ठिकाने आएगी, उसे अपने कहे पर पछतावा होगा. जब आप ने कुछ गलत किया ही नहीं है, तो दुखी क्यों होती हो?’’

मुझे दुखी देख कर रिया ने रोहित से संपर्क साधने की कोशिश की. 1-2 बार उस ने रिया के फोन का जवाब भी दिया. पर जब भी रोहित उस से हमारे खिलाफ कुछ कहता, रिया के लिए वह बरदाश्त से बाहर हो जाता. दोनों की बातों का अंत झगड़े के रूप में होता रोहित के इस बरताव से मुझे बेहद दुख पहुंचा था. जब तब उस के बारे में सोचसोच कर मेरी आंखें भर आती थीं.

एक दिन मैं ने रवि से पूछा, ‘‘मैं हमेशा बकबक करती रहती हूं. आप पर इन सब बातों का असर नहीं होता?’’

तब रवि ने कहा, ‘‘रोहित के बरताव से दुख मुझे भी हुआ है. बच्चों के प्रति मैं ने अपना फर्ज ठीक तरह से पूरा किया है. इस के बावजूद रोहित मुझे गलत समझता है, तो ऐसा ही सही, मैं क्यों सोचसोच कर परेशान होऊं?’’

कहां तो मैं बच्चों की मुसीबत में पाल बन कर खड़ी रहती थी और आज कितनी असहाय और कमजोर पड़ गई हूं.

एक साल बीत गया रोहित का कोई फोन नहीं आया. एक रिया ही थी जो मेरा दुख सम?ाती थी. एक दिन रिया ने मुझे उदास देख कर चुटकी ली, ‘‘मां, भैया के इस बरताव का सब से ज्यादा फायदा किसे हुआ है जानती हो? मुझे हुआ है. तुम मेरे पास हो वरना 6 महीने तो तुम बेटे के पास ही रहतीं.’’

रक्षाबंधन का त्योहार आने वाला था. इसी बहाने रिया ने सोचा भैया को राखी भेज कर उस से संबंध सुधारने की कोशिश करेगी. रिया ने 1 महीने पहले ही राखी खरीद ली ताकि समय पर उसे मिल सके. रिया ने रोहित को फोन किया तो उसी कठोरता से रोहित ने पूछा, ‘‘क्या है? क्यों फोन किया?’’

कशमकश- भाग 2: क्या बेवफा था मानव

अगले दिन वसुधा ने मानव को दफ्तर की तरफ जाते देखा तो वह भी पीछेपीछे पहुंच गई. मानव अपनी कुरसी पर बैठ ही रहा था कि एक बरसों से अनजान मगर सदियों से परिचित खुशबू ने उसे पलभर के लिए चौंका दिया, संयत हो कर मानव ने धीरे से कहा, ‘‘आओ वसुधा, सबकुछ हो गया न, कोई दिक्कत तो नहीं हुई? करण कहां है?’’

सबकुछ ठीक हो गया मगर ठीक कुछ भी नहीं है. मैं समंदर में गोते लगाती एक ऐसी नैया हूं जिस का न कोई किनारा है न साहिल. नियति एक के बाद एक मेरी परीक्षाएं लेती आ रही है और यह सिलसिला चलता जा रहा है, थमने का नाम ही नहीं ले रहा. कभी नहीं सोचा था कि तुम से यों अचानक मुलाकात हो जाएगी. जो कुछ कालेज में हुआ उस के बाद तो मैं तुम से नजर ही नहीं मिला सकती, कितने बड़े अपराधबोध में जी रही हूं मैं.’’

‘‘तुम्हें एक अपराधबोध से तो मैं

ने बिना कहे ही मुक्त कर

दिया. जब मेरी आंखें ही नहीं तो नजर मिलाने का तो प्रश्न ही नहीं,’’ मानव ने एक फीकी मुसकान फेंकते हुए कहा.

‘‘मगर, तुम्हारी आंखें?’’ वसुधा ने रुंधे गले से पूछा.

‘‘लंबी कहानी है. मगर सार यही है कि पहली बार एहसास हुआ कि जातपांत के सदियों पुराने बंधन से हमारा समाज पूरी तरह से मुक्त नहीं हुआ है. जातिवाद के जहर को देश से निकलने में अभी कुछ वक्त और लगेगा. जब तुम्हारे रिश्तेदारों ने हमें बीकानेर फोर्ट की दीवार पर देखा तो वे अपना आपा खोने लगे. तुम्हारी बेवफाई ने आग में घी का काम किया. तुम ने तो बड़ी आसानी से यह कह कर दामन छुड़ा लिया कि मैं ने तुम्हें मजबूर किया मिलने के लिए और तुम्हारा मेरा कोई रिश्ता नहीं, मगर मुझ से वे बड़ी बेरहमी से पेश आए.’’

‘‘मैं डर गई थी. मेरे पिता और भाई जातपांत को नहीं मानते, लेकिन आसपास के गांव और दूर के रिश्तेदार उन पर हावी हो गए थे. मुझ से उन्होंने कहा कि अगर मैं यह कह दूं कि तुम मुझे जबरदस्ती मिलने को मजबूर कर रहे हो तो उस से बिरादरी में उन की इज्जत बच जाएगी और इस के एवज में वे तुम्हें छोड़ देंगे, वरना वे तुम्हारी जान लेने को आमादा थे. जब सारी बात का मेरे पिता और भाइयों को पता चला तो वे बहुत शर्मिंदा भी हुए और उन्होंने अपने तमाम रिश्तेदारों से रिश्ता तक तोड़ दिया. उन्हें सलाखों के पीछे भी पहुंचा दिया. मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी. तुम वहां से जा चुके थे. तुम्हें ढूंढ़ने की हमारी सारी कोशिशें नाकाम साबित हुईं.’’

‘‘तुम्हारे सामने तो उन्होंने मुझे छोड़ दिया मगर तुम्हारे ओझल होते ही उन की हैवानियत परवान चढ़ गईर् और वह खेल तब तक चलता रहा जब तक कि मेरी सांसें न उखड़ गईं. मरा जान कर छोड़ गए वे मुझे. डाक्टरों ने किसी तरह से मुझे बचा लिया, मगर मेरी आंखें न बचा पाए. फिर उस के बाद जिंदगी ने करवट बदली. अंधा होने के बाद मैं ने पढ़ाई जारी रखी और आज ब्रेल लिपि के जरिए हासिल की गई मेरी उपलब्धियों ने मुझे यहां तक पहुंचा दिया.’’

वसुधा की आंखों से आंसुओं की बरसात जारी थी, ‘‘शायद नियति ने मुझ से बदला लिया. तुम्हारी आंखों की रोशनी छीनने के अपराध में मुझे यह सजा दी कि मेरे करण की भी आंखें छीन ली. मुझे सिर्फ एक ही शिकायत है. गलती मेरी थी मगर सजा उस मासूम को क्यों मिली. अपराध मेरा था तो अंधेरों के तहखाने में मुझे डाला जाना चाहिए था, कुसूर मेरा था तो सजा की हकदार मैं थी, करण नहीं.’’

‘‘दिल छोटा न करो वसुधा और खुद को गुनाहगार मत समझो. करण के साथ जो हुआ वह एक हादसा था. मुझे यकीन है वह देख पाएगा. मैं ने उस की मैडिकल हिस्ट्री पढ़ी है. तुम्हे धैर्य रखना होगा. विश्वास के दामन को मत छोड़ो. देखना, एक सुबह ऐसी भी आएगी जब करण उगते हुए सूरज की लालिमा को खुद देखेगा,’’ मानव ने पूरे यकीन के साथ कहा.

‘‘और तुम? तुम कब देख पाओगे अपनी वसुधा को?’’ वसुधा ने ‘अपनी वसुधा’ शब्द पर जोर दे कर कहा.

‘‘वसुधा,’’ मानव की आवाज में कंपन था, ‘‘ऐसा सोचना भी मत. तुम एक ब्याहता स्त्री हो. तुम्हारा अपना एक परिवार है. आनंद जैसा अच्छे व्यक्तित्व का पति है. मैं जानता हूं वह तुम्हें बहुत चाहता है. किसी और के बारे में सोचना भी तुम्हारे लिए एक अपराध है.’’

‘‘मैं इनकार नहीं कर रही, मगर सचाई यह भी है कि मैं ने सिर्फ तुम्हें चाहा है. तुम्हें देखते ही मेरे सोए जज्बात फिर जाग उठे हैं. बुझे हुए अरमानों ने फिर से अंगड़ाइयां ली हैं,’’ वसुधा एक पल को रुकी, फिर मानो फैसला सुनाते हुए बोली, ‘‘अब मेरेतुम्हारे बीच में कोई नहीं आ सकता. तुम्हारा अंधापन भी नहीं. अगर आज मुझे यह मौका मिल रहा है तो मैं क्यों न फिर से अपनी खोई हुई खुशियों से अपने दामन को भरूं. आखिर, क्या गुनाह किया है मैं ने?’’

‘‘ऐसा सोचना भी हर नजरिए से गलत होगा,’’ मानव ने कुछ कहना चाहा.

‘‘क्या गलत है इस में?’’ क्या औरत को इतना हक नहीं कि वो अपना जीवन वहां गुजारे जहां उस का मन चाहे, उस शख्स के साथ गुजारे जिस की तसवीर उस ने बरसों से संजो रखी थी. क्या मैं दोबारा अपनी चाहत का गला घोट दूं?’’

‘‘तुम दोबारा बेवफाई भी नहीं कर सकती. पहली बार किया गुनाह, गलती हो सकती है, दोबारा किया गुनाह एक सोचासमझा जुर्म होता है और मेरा प्यार इतना गिरा हुआ नहीं है कि तुम्हें गुनाहगार बना दे.’’

अगले दिन फिर वसुधा मानव के आने से पहले ही उस के दफ्तर में पहुंच गई, साफसफाई करवाई, मेज पर ताजे फूलों का गुलदस्ता रखा और मानव का इंतजार करने लगी. इंतजार करतेकरते दोपहर हो गई. लंचटाइम में रमया जब दफ्तर में आई तो वसुधा को वहां पा कर चकित रह गई. ‘‘सर तो आज दफ्तर नहीं आएंगे, किसी कौन्फ्रैंस में गए हैं,’’ रमया ने यह कहा तो वसुधा ने एक ठंडी सांस ली, मायूसी से अपना बैग उठाया और अपने कमरे की ओर चल पड़ी.

शाम को रमया ने मानव को सारी बात बताई तो मानव चिंतित हो गया. उसे वसुधा से ऐसे व्यवहार की अपेक्षा न थी. आखिर क्यों वसुधा उम्र के इस पड़ाव में ऐसी नादानी कर रही है? उस ने तो वसुधा की याद को मौत आने तक अपने सीने में दफन कर लिया था. क्यों वसुधा पुराने जख्मों को हरा कर रही है? क्यों नहीं सोच रही कि उस की गृहस्थी है. पति है, बच्चा है…अगले दिन जब उस ने फिर वसुधा को पाया तो उस की परेशानी और बढ़ गई. ‘‘तुम चाहो तो वापस दिल्ली लौट सकती हो, यहां करण…’’

‘‘जानती हूं, यहां करण की देखभाल होती रहेगी और वक्त आने पर आंखों के बारे में भी कुछ अच्छी खबर मिल जाएगी, मगर मैं दिल्ली तुम्हारे बगैर नहीं जाऊंगी. वहां जा कर आनंद से तलाक…’’ वसुधा कुछ कहना चाह रही थी मगर रमया को आते देख ठिठक गई.

वसुधा के आने का सिलसिला थमने का नाम ही नहीं ले रहा था. रमया के हिस्से का काम भी वह बड़ी मुस्तैदी से करती. काम के बीच वह कई बार खुद के और मानव के रिश्ते के बारे में जिक्र छेड़ देती जिसे वह किसी तरह से टाल देता.

फेसबुक फ्रैंडशिप: भाग 3- वर्चुअल दुनिया में सचाई कहां है

लड़का कौफीहाउस में काफी देर इंतजार करता रहा. तभी उसे सामने आती एक मोटी सी औरत दिखी जिस का पेट काफी बाहर लटक रहा था. हद से ज्यादा मोटी, काली, दांत बाहर निकले हुए थे. मेकअप की गंध उसे दूर से आने लगी थी. ऐसा लगता था कि जैसे कोई मटका लुढ़कता हुआ आ रहा हो. वह औरत उसी की तरफ बढ़ रही थी.

अचानक लड़के का दिल धड़कने लगा इस बार घबराहट से, भय से उसे  कुछ शंका सी होने लगी. वह भागने की फिराक में था लेकिन तब तक वह भारीभरकम काया उस के पास पहुंच गई.

‘‘हैलो.’’‘‘आप कौन?’’ लड़के ने अपनी सांस रोकते हुए कहा.‘‘तुम्हारी फेसबुक…’’‘‘लेकिन तुम तो वह नहीं हो. उस पर तो किसी और की फोटो थी और मैं उसी की प्रतीक्षा में था,’’ लड़के ने हिम्मत कर के कह दिया. हालांकि वह सम?ा गया था कि वह बुरी तरह फंस चुका है.‘‘मैं वही हूं. बस, वह चेहरा भर नहीं है. मैं वही हूं जिससे इतने दिनों से मोबाइल पर तुम्हारी बात होती रही.

प्यार का इजहार और मिलने की बातें होती रहीं. तुम नंबर लगाओ जो तुम्हें दिया था. मेरा ही नंबर है. अभी साफ हो जाएगा. कहो तो फेसबुक खोल कर दिखाऊं?’’‘‘कितनी उम्र है तुम्हारी?’’ लड़के ने गुस्से से कहा. लड़के ने उस के बालों की तरफ देखा. जिन में भरपूर मेहंदी लगी होने के बाद भी कई सफेद बाल स्पष्ट नजर आ रहे थे.

‘‘प्यार में उम्र कोई माने नहीं रखती, मैं ने यह पूछा था तो तुम ने हां कहा था.’’‘‘फिर भी कितनी उम्र है तुम्हारी?’’‘‘40 साल,’’ सामने बैठी औरत ने कुछ कम कर के ही बताया.‘‘और मेरी 20 साल,’’ लड़के ने कहा.‘‘मुझे मालूम है,’’ महिला ने कहा.‘‘आप ने सबकुछ झूठ लिखा अपनी फेसबुक पर. उम्र भी गलत. चेहरा भी गलत?’’‘‘प्यार में चेहरे, उम्र का क्या लेनादेना?’’‘‘क्यों नहीं लेनादेना?’’ लड़के ने अब सच कहा. अधेड़ उम्र की सामने बैठी बेडौल स्त्री कुछ उदास सी हो गई.‘‘अभी तक शादी क्यों नहीं की?’’‘‘की तो थी, लेकिन तलाक हो गया. एक बेटा है, वह होस्टल में पढ़ता है.’’‘‘क्या?’’ लड़के ने कहा,

‘‘आप मेरी उम्र देखिए? इस उम्र में लड़के सुरक्षित भविष्य नहीं, सुंदर, जवान लड़की देखते हैं. उम्र थोड़ीबहुत भले ज्यादा हो लेकिन बाकी चीजें तो अनुकूल होनी चाहिए. मैं ने जब अपनी फैंटेसी में श्रद्धा कपूर बताया, तभी तुम्हें समझ जाना चाहिए था.’’‘‘तुम सपनों की दुनिया से बाहर निकलो और हकीकत का सामना करो? मेरे साथ तुम्हें कोई आर्थिक समस्या नहीं होगी. पैसों से ही जीवन चलता है और तुम मुझे यहां तक ला कर छोड़ नहीं सकते.’’लड़के को उस अधेड़ स्त्री की बातों में लोभ के साथ कुछ धमकी भी नजर आई.‘‘मैं अभी आई, जाना नहीं.’’

अपने भारीभरकम शरीर के साथ स्त्री उठी और लेडीज टौयलेट की तरफ बढ़ गई. लड़के की दृष्टि उस के पृष्ठभाग पर पड़ी. काफी उठा और बेढंगे तरीके से फैला हुआ था. लड़का इमेजिन करने लगा जैसा कि फैंटेसी करता था वह रात में.लटकती, बड़ीबड़ी छातियों और लंबे उदर के बीच में वह फंस सा गया था और निकलने की कोशिश में छटपटाने लगा. कहां उस की वह सुंदर सपनीली दुनिया और कहां यह अधेड़ स्त्री. उस के होंठों की तरफ बढ़ा जहां बाहर निकले बड़बड़े दांतों को देख कर उसे उबकाई सी आने लगी.

अपने सुंदर 20 वर्ष के बेटे को देख कर मां अकसर कहती थी, मेरा चांद सा बेटा. अपने कृष्णकन्हैया के लिए कोई सुंदर सी कन्या लाऊंगी, आसमान की परी. इस अधेड़ स्त्री को मां बहू के रूप में देखे तो बेहोश ही हो जाए? लड़के को लगा फिर एक आंधी चल रही है और अधेड़ स्त्री के शरीर में वह धंसता जा रहा है. अधेड़ के शरीर पर लटकता हुआ मांस का पहाड़ थरथर्राते हुए उसे निगलने का प्रयास कर रहा है.

उसे कुछ कसैलाविषैला सा लगने लगा. इस से पहले कि वह अधेड़ अपने भारीभरकम शरीर के साथ टौयलेट से बाहर आती, लड़का उठा और तेजी से बाहर निकल गया. उस की विशालता की विकरालता से वह भाग जाना चाहता था. उसे डर नहीं था किसी बात का, बस, वह अब और बरदाश्त नहीं कर सकता था.

बाहर निकल कर वह स्टेशन की तरफ तेज कदमों से गया. उस के शहर जाने वाली ट्रेन निकलने को थी. वह बिना टिकट लिए तेजी से उस में सवार हो गया. सब से पहले उस ने इंटरनैट की दुनिया से अपनेआप को अलग किया. अपनी फेसबुक को दफन किया.

अपना मेल अकाउंट डिलीट किया. अपने मोबाइल की सिम निकाल कर तोड़ दी. जिस से वह उस खूबसूरत लड़की से बातें किया करता था जो असल में थी ही नहीं. झूठफरेब की आभासी दुनिया से उस ने खुद को मुक्त किया.

अब उसे घर पहुंचने की जल्दी थी, बहुत जल्दी. वह उन सब के पास पहुंचना चाहता था, उन सब से मिलना चाहता था, जिन से वह दूर होता गया था अपनी सोशल साइट, अपनी फेसबुक और ऐसी ही कई साइट्स के चलते. वह उस स्त्री के बारे में बिलकुल नहीं सोचना चाहता था.

उसे नहीं पता था कि लेडीज टौयलेट से निकल कर उस ने क्या सोचा होगा. क्या किया होगा? बिलकुल नहीं. लेकिन सुंदर लड़की बनी अधेड़ स्त्री तो जानती होगी कि जिस के साथ वह प्रेम की पींगे बढ़ा रही है, वह 20 वर्ष का नौजवान है और आमनासामना होते ही सारी बात खत्म हो जाएगी.

सोचा तो होगा उस ने. सोचा होता तो शायद वह बाद में स्थिति स्पष्ट कर देती या महज उस के लिए यह एक एडवैंचर था या मजाक था. कही ऐसा तो नहीं कि उस ने अपनी किसी सहेली से शर्त लगाई हो कि देखो, इस स्थिति में भी जवान लड़के मुझ पर मरते हैं. यह भी हो सकता है कि उसे लड़के की बेरोजगारी और अपनी सरकारी नौकरी के चलते कोई गलतफहमी हो गई हो. कहीं ऐसा तो नहीं कि वह केवल शारीरिक सुख के लिए जुड़ रही हो, कुछ रातों के लिए.

हां, इधर लडके को याद आया कि उस ने तो शादी की बात की ही नहीं थी. वह तो केवल होटल में मिलने की बात कर रही थी. शादी की बात तो मैं ने शुरू की थी. कहीं ऐसा तो नहीं कि अधेड़ स्त्री अपने अकेलेपन से निबटने के लिए भावुक हो कर बह निकली हो.

अगर ऐसा है, तब भी मेरे लिए संभव नहीं था. बात एक रात की भी होती तब भी मेरे शरीर में कोई हलचल न होती उस के साथ. उसे सोचना चाहिए था. मिलने से पहले सबकुछ स्पष्ट करना चाहिए था.

वह तो अपने ही शहर में थी, मैं ने ही बेवकूफों की तरह फेसबुक पर दिल दे बैठा और घर से झूठ बोल कर निकल पड़ा. गलती मेरी भी है. कहीं ऐसा तो नहीं…सोचतेसोचते लड़का जब किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा तो फिर उस के दिमाग में अचानक यह खयाल आया कि पिताजी के पूछने पर वह क्या बहाना बनाएगा और वह बहाने के विभिन्न पहलुओं पर विचार करने लगा.

घर में झटपट से बनाएं साबूदाना फ्रूट बाउल

सुबह के ब्रेकफास्ट से लेकर रात के डिनर तक हर गृहिणी की एक ही समस्या होती है कि आज क्या बनाया जाए. लौकी, तोरई, कद्दू, पालक जैसी हरी सब्जियां औऱ बहुत तली भुनी, मिर्च मसाले वाली सब्जियों को भी रोज नहीं खाया जा सकता. ऐसे में बच्चों की डिमांड होती है टेस्टी खाना की. टेस्टी फूड हेल्दी नहीं होते ऐसे में माएं परेशान रहती है घर में टेस्टी और हेल्दी क्या बनाएं और बच्चे बड़े ही प्यार से खाएं हेल्दी डिश. तो लेड़ीज बिलकुल चिंता ना करें. घर में झटपट से बनाएं साबूदाना फ्रूट बाउल  और स्वीट पोटैटो सूप. ये रही रेसिपी, बच्चों से लेकर बड़े भी बड़े प्यार से खाएंगे.

  1. साबूदाना फ्रूट बाउल

सामग्री

1.   1/2 कप साबूदाना

2. 1/2 कप नारियल का दूध

 3. 3 बड़े चम्मच कंडैंस्ड मिल्क

 4.   थोड़े काजूबादाम के टुकड़े

5.   थोड़े से कटे फल सेब, अनार, संतरा, पाइनऐप्पल.

विधि

साबूदाने को पानी में भिगो कर उबाल लें. छलनी में डाल कर ठंडे पानी से धो लें. एक कड़ाही में कंडैंस्ड मिल्क और नारियल का दूध डाल कर गरम करें. फिर साबूदाना डाल कर 1-2 मिनट तक चला लें. फिर कटे फल और काजूबादाम डाल कर परोसें.

 2. स्वीट पोटैटो सूप

सामग्री

1.  2 शकरकंदी

 2.   1 बड़ा चम्मच हरी शिमलामिर्च कटी

 3.  1 बड़ा चम्मच लाल शिमलामिर्च कटी

 4.  1 बड़ा चम्मच पीली शिमलामिर्च कटी

 5.  1/4 छोटा चम्मच कालीमिर्च पाउडर 

 6. 1 बड़ा चम्मच मक्खन

 7.   1/2 छोटा चम्मच चीनी

 8.   5-6 छोटेछोटे टुकड़े पनीर के

 9.  1 चुटकी दालचीनी पाउडर

10.   नमक स्वादानुसार.

विधि

1 शकरकंदी को छील कर पतलेपतले स्लाइस में काट लें. 1 शकरकंदी को उबाल कर छिलका निकाल कर मैश कर लें. कड़ाही में मक्खनगरम कर सभी शिमलामिर्च और शकरकंदी के स्लाइस डाल कर भूनें. नमक, कालीमिर्च और1 कप पानी डालें. शकरकंदी के पकने पर पनीर के टुकड़े, चीनी और मैश शकरकंदी डालें.ऊपर से 1 चुटकी दालचीनी पाउडर डाल कर गरमगरम परोसें.

सैलिब्रिटी आशियाना जो बना खास

आजकल होम इंटीरियर डैकोर यानी ऐथनिक लुक और कौंटैंपरेरी स्टाइल का ट्रैंड है. इस के लिए महंगे साजोसामान या फर्नीचर की आवश्यकता नहीं होती. अपनी रुचि, कलात्मकता, प्रबंधकीय दक्षता, नई सोच और जीवनशैली के आधार पर घर को मन मुताबिक बनाया जा सकता है. घर के इंटीरियर को देख कर व्यक्ति के व्यक्तित्व का कुछ हद तक अनुमान लगाया जा सकता है क्योंकि इंटीरियर व्यक्ति के व्यक्तित्व का आईना होता हैआज इंटीरियर डिजाइनिंग में मिनिमलिस्ट, पेस्टल क्लर्स का जमाना है. कियारा अडवानी ने अपने घर में आइवरी रंग चूज किया है. जौन अब्राहम और जैक्लीन फर्नांडीस ने भी अपने घर में सफेद रंग कराया है और कई मौडर्न डिजाइन के फ्लौवर पौट्स और ग्रीन प्लांट्स से रंग का टच दिया है.अब शीशे की बड़ी खिड़कियों में पतले शीयर परदों का जमाना है, हैवी रंगीन परदों का नहीं. स्क्रीन के कलाकार भी दिनभर ग्रीनरूम में समय बिताने के बाद जब घर आते हैं तो उन का सुंदर घर उन्हें सुकून देता है. ये पल उन के अपने होते हैं. जहां न तो संवाद और न ही किसी दृश्य की शूटिंग के चर्चे होते हैं.

  1. रंगों की भूमिका

बिना इंटीरियर के घर आश्रम जैसा प्रतीत होता है. इंटीरियर से पता चलता है कि आप की जीवनशैली किस प्रकार की है ऐसे में यह जरूरी है कि आप अपने घर के कमरों की सजावट पर खास ध्यान दें. रंगों की भूमिका इंटीरियर करते वक्त सब से खास होती है. रंग ऐसे हों कि आंखों को चुभें नहीं.आज हलके रंग जो आंखों को आराम दें खास पसंद हैं. इन में सफेद औफ व्हाइट प्रमुख है.

इन के अलावा फूल बहुत पसंद किए जा रहे हैं. घर में हर तरफ  लटकने वाले फूलों के गमलों से काफी सजावट की जाती है. फूल आदि के पौधे हमेशा तरोताजा रखते हैं इन्हें आगेपीछे कर आप सजावट में नवीनता ला सकती हैं.घर हर व्यक्ति का सपना होता है फिर घर चाहे छोटा हो या बड़ा, उस में व्यक्ति 2 घंटे रहे या 4 घंटे, उसे जो शांति वहां मिलती है.

उसे बयां करना मुश्किल है. सैलिब्रिटीज अपने घर को फैलाने के लिए रंग औफ व्हाइट रखते हैं जिस में हलके हरे रंग का टच होता है. बैडरूम को थोड़ा ब्राइट रंग देते हैं जिस में एक दीवार पर कोई रंग होता है, पेंट किया होता है. इस के अलावा बैडरूम के ऊपर छत में चांदतारे सजाते हैं ताकि अगर रात में लाइट बंद कर दी जाए तो ऐसा लगे कि खुले आसमान के नीचे सो रहे हैं.

2. क्लासिक लुक

इस के अलावा युवा सैलिब्रिटीज हर जगह सौफ्ट टौएज बहुत रखते हैं चाहे टीवी के ऊपर हों या ड्राइंगरूम में. हर तरह के सौफ्ट टौएज से सजाए परदों का रंग दीवारों से मैच करता होता है, जो मस्टर्ड रंग के होते हैं.हलके रंग का प्रयोग करने से सैलिब्रिटीज घर को स्पेशियस बनाते हैं. रंग का टच देने के लिए गोल्डन और लाल रंगों का भी प्रयोग करा जा सकता है. घर का फर्नीचर ब्राउन और लाइट कलर का हो. घर के लैंप शेडों के क्लासिक लुक पर आधारित हो सकते हैं.रंगों के साथसाथ रोशनी की भी सही व्यवस्था हर कमरे में की जानी जरूरी है. घर को सुंदर और आकर्षक बनाने के लिए क्रिस्टल कलैक्शन कर सकते हैं. इन की साफसफाई घर वालों को खुद ही करनी चाहिए. सजावट में बीचबीच में कुछ न कुछ बदलाव अवश्य करते रहें.

3. सपनों सा बनाएं

घरकलाकारों को सिर्फ अभिनय का शौक ही नहीं होता है बल्कि उन्हें घर को सजाने में भी आनंद आता है. उन्हें घर में हर चीज को देख कर खुशी मिलती है जिसे शब्दों में बताना मुश्किल है. हर सैलिब्रिटी अभिनेत्री हाउस मेकर भी होती है. घर में नौर्मल फील हो. पार्टी में चीजें टूटें नहीं, यह खयाल रखें.कई सैलिब्रिटीज को इंटीरियर करना सब से अधिक पसंद होता है. पूरे दिन की थकान के बाद जब वे घर आते हैं तो वे अपने घर का माहौल ऐसा चाहते हैं जहां उन्हें हर वस्तु को देख कर सुकून और खुशी मिले और अपना खुद का योगदान दिखे.

बेटी की पिता बनने की खुशी को अभिनेता मोहित रैना ने कैसे शेयर किया, पढ़ें इंटरव्यू

मोहित रैना एक मॉडल और अभिनेता है. उन्होंने कई टीवी धारावाहिकों, फिल्मों और वेब सीरीज में काम किया है. वे हर अभिनय को चुनौतीपूर्ण समझते है और उसे सजीव करने के लिए कड़ी मेहनत करते है. वर्ष 2002 मे वह मॉडलिंग से कैरियर की शुरुआत करने के लिए मुंबई आए, क्योंकि उन्हें लगता था कि मॉडलिंग उन्हें अभिनय में काम दिलाएगी और उन्होंने इसके लिए अपने 107 किलोग्राम के वजन को 29 किलोग्राम घटाया, ताकि वह साल 2005 ग्रासिम मिस्टर इंडिया मॉडलिंग प्रतियोगिता में भाग ले सकें. उन्होंने उस प्रतियोगिता भाग लिया और उसमें टॉप पांच प्रतियोगिता में रहे, जिससे उन्हें इंडस्ट्री में पहचान मिली.

मोहित का अभिनय कैरियर साल 2004 में साइंस फिक्शन टीवी धारावाहिक ‘अंतरिक्ष’ से शुरू हुआ. इसके बाद उन्हें कई धारावाहिकों में काम करने का अवसर मिला और उन्होंने अपनी एक पहचान बनाई. सीरियल ‘चक्रवर्ती अशोक सम्राट’ में भी उन्होंने वयस्क सम्राट अशोक की भूमिका निभाई थी, जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया था. हिंदी फिल्म द सर्जिकल स्ट्राईक में भी उन्होंने कर्नल करण कश्यप की भूमिका निभाई, जो काफी लोकप्रिय रही. मोहित रैना की कई वेब सीरीज को दर्शकों ने खास पसंद किया है, जिसमे  ‘काफिर’, ‘भौकाल’, ‘मुंबई डायरीज 26/11’ आदि शामिल हैं.

वर्ष 2022 को उन्होंने गर्लफ्रेंड अदिति शर्मा से शादी की, जिसकी जानकारी मोहित रैना ने खुद सोशल मीडिया अकाउंट पर तस्वीरें शेयर कर दिया था. साल 2023 में वे बेटी के पिता बने है और खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे है. सूत्रों की माने तो इससे पहले मोहित रैना का अफेयर मौनी रॉय के साथ था, लेकिन किसी वजह के चलते दोनों का ब्रेकअप हो गया.

मोहित रैना की वेब सीरीज ‘द फ्रीलांसर’, डिजनी + हॉट स्टार पर रिलीज हो चुकी है, जिसमे उनके अभिनय सभी को पसंद कर रहे है. उन्होंने खास गृहशोभा से बात की, पेश है कुछ अंश.

इस वेब सीरीज में काम करने की उत्सुकता के बारें में मोहित का कहना है कि मेरे लिए ये बहुत अधिक उत्साह बढ़ने वाला रहा है, क्योंकि मैंने इससे पहले कभी ऐसी भूमिका नहीं निभाई है. ये जीरो टू हीरो की भूमिका है, जिसमें मैं महाराष्ट्र की एक पुलिस की भूमिका निभा रहा हूँ, जिसके जीवन में कुछ ऐसे हादसे होते है, जिसकी वजह से वह जीवन के एक डार्क फेज में चला जाता है, जहाँ उसकी मुलाकात अनुपम खेर, एक मेंटर से होती है और वे उस फेज से उन्हें निकालते है. ये कहानी जीवन की कई भावनाओं से गुजरता है, ये चुनौतीपूर्ण कहानी है, जिसे करने में अच्छा लगा. इस चरित्र से मैंने बहुत कुछ सीखा हूँ, हर किसी को कभी न कभी किसी डार्क फेज से गुजरने के लिए तैयार रहना पड़ता है. मेरे लिए भी चरित्र को समझना कठिन था.

 संघर्ष

मोहित कहते है कि मेरे रियल लाइफ में भी कई बार डार्क फेज आये जब लगा था कि एक्टिंग में  कुछ नहीं होगा, लेकिन समय के साथ – साथ मैंने धीरज रखा और मैं आगे बढ़ा. शुरू में मैं मनोरंजन की दुनिया में काम करना चाहता था और मॉडलिंग से मैंने काम शुरू किया, लेकिन बहुत जल्दी समझ में आया कि लोगों तक पहुँचने के लिए मुझे कुछ अच्छा अभिनय करना पड़ेगा, जो मुझे मिला.

बेटी की पिता बनने का अनुभव

मोहित अब बेटी के पिता बन चुके है और अपने अनुभव को शेयर करते हुए कहते है कि बेटी की पिता बनने का अनुभव बेहतरीन है, इसे रोज सुबह और शाम को जीता हूँ. इससे मैं अपने पेरेंट्स की मेहनत को समझ पाता हूँ. ये सही है कि जब तक कोई उस दौर से नहीं गुजरता, पेरेंट्स की बातें समझ नहीं सकता. मेरा वही दौर चल रहा है, आज लगता है कि पेरेंट्स की डांट-फटकार के पीछे भी कई सारी अच्छी बातें होती है, जिसकी वजह से मैं आज एक अच्छा इंसान बन पाया. मैं भी एक अच्छा पिता बनने की कोशिश में हूँ और बेटी की डायपर भी बदल रहा हूँ. मैं बच्चे के सारे काम करता हूँ और उसके साथ समय बिताता हूँ.

मेकर्स की है जिम्मेदारी

वेब सीरीज की कहानी में बदलाव बनाए रखना कितना जरुरी है? पूछने पर वे कहते है कि मेरे हिसाब से हर प्लेटफॉर्म पर हर तरह की कहानियों का समावेश होता है. ये सभी प्लेटफॉर्म फोलो करते है, जिसमें थ्रिलर, रोमांस, कॉमेडी आदि सब जरुरी होता है. इसे सभी जेनरेशन के देखने लायक बनाना प्रोड्यूसर और डायरेक्टर चाहते है, लेकिन कभी – कभी मेकर्स से गलती हो जाती है. देखा जाय तो कोशिश हमेशा अच्छी कहानियों के कहने की ही होती है.

किसी को भी उस पर शक नहीं करना चाहिए, क्योंकि मेकर्स बहुत जिम्मेदार होते है. डिजिटल मीडिया इतना स्ट्रोंग होने की वजह से उन्हें ये मौका मिला है कि किताबों में बंद कहानियों को ओटीटी पर दिखाया जाने लगा है. इसे ‘फॉर ग्रांटेड’ नहीं लेना है. कहानियों को कहने में गलतियाँ करने पर दर्शक उसे रिजेक्ट कर देते है और इन गलतियों से मेकर्स को सीख भी मिलती है. जिसे सुधार कर आगे बढ़ना है. दर्शक सबसे बड़ी आलोचक है, उनके हिसाब से ही एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री चलती है, क्योंकि वे सब्सक्रिप्शन, पैसे देकर लेते है, समय निकालकर हमें देखते है. उनके पैसों की वैल्यू देना हर मेकर्स की जिम्मेदारी होती है.

हायर एजुकेशन सरकार भी ले टैंशन

स्कूल के बाद एक सुनहरे भविष्य के निर्माण के लिए एक नवयुवा विश्वविद्यालयों की तरफ देखता है, जहां वह अपने इंटरैस्ट के अनुसार आगे उच्च शिक्षा हासिल कर सकता है. देश में लगभग हर साल लाखों स्टूडैंट्स 12वीं के एग्जाम के बाद विश्वविद्यालयों के लिए आवेदन की कतार में खड़े हो जाते हैं जिस में वे सफल होंगे, इस की संभावना 30 फीसदी से भी कम होती है.इस साल 2023 में करीब सवा सौ करोड़ से भी ज्यादा स्टूडैंट्स ने 12वीं का एग्जाम दिया, जिस में 80-90 प्रतिशत से भी अधिक पास हो गए. जाहिर है, इस के बाद ये सभी पास होने वाले छात्र देश के बड़ेबड़े कालेजों में एडमिशन की दौड़ में शामिल हो जाते हैं.

इस दौड़ में केवल वही छात्र जीत पाते हैं जिन की शिक्षा किसी सरकारी स्कूल से न हो कर बड़े प्राइवेट स्कूल से हुई हो क्योंकि उन की योग्यता अधिक होती है. एक सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला स्टूडैंट संसाधनों के अभाव व अध्यापक की कम रुचि के कारण उतना योग्य नहीं बन पाता जितना कि एक प्राइवेट स्कूल का स्टूडैंट.

ऐसे में वह अकसर एडमिशन की दौड़ में पीछे रह जाता है.भारत लगभग 1,000 विश्वविद्यालयों और 40,000 कालेजों के साथ दुनिया की सब से बड़ी उच्च शिक्षा प्रणाली होने का दावा करता है पर वास्तविकता यह है कि इतनी बड़ी चेन होते हुए भी अधिकतर छात्र उन कालेजों या कोर्सों में एडमिशन नहीं ले पाते जिन में वे लेना चाहते हैं और उन्हें अपने भविष्य व सपनों के साथ समझता करना पड़ता है.एनईपी 2020 (नई शिक्षा नीति) कहती है, हमें अपनी जीडीपी का कम से कम 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करना चाहिए जबकि अभी सरकार शिक्षा पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का केवल 2.9 प्रतिशत ही खर्च कर रही है. जबकि, काफी समय से शिक्षाविदों की मांग रही है कि शिक्षा बजट को 10 प्रतिशत तक बढ़ाए जाने की जरूरत है.

सरकार का कहना है शिक्षा का खर्च 2013 की तुलना में दोगुना कर दिया गया है लेकिन मंदिरों और सरकारी इमारतों पर किया गया खर्च जिस तरह दिखाई देता है, वह खर्च शिक्षा संस्थानों में दिखाई नहीं देता. आज भी 12वीं पास करने वाला स्टूडैंट असमंजस की स्थिति में यहांवहां भटकता रहता है जिन में से गरीब निम्न क्लास स्टूडैंट एडमिशन की उम्मीदें तक छोड़ देता है और कई मामलों में तो पढ़ाई तक.भारत के कालेजों में इतनी सीटें नहीं हैं.

आकांशा सरकारी स्कूल से बीए पास कर चुकी है और एक आर्कियोलौजिस्ट बनना चाहती है. राष्ट्रीय संग्रहालय संस्थान और इंस्टिट्यूट औफ आर्कियोलौजी में सीटें इतनी कम हैं कि उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं. 60 प्रतिशत नंबर के साथ उसे किसी सरकारी कालेज में एडमिशन मिलना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन सा लगता है.

कटऔफ की होड़ से तो वह पहले ही बाहर हो चुकी है. अब प्रवेश परीक्षा ही एक रास्ता है पर क्या वह एंट्रैंस पास कर पाएगी, इस में उसे शक है, क्योंकि सरकारी और निजी स्कूलों के भेद ने पहले ही उस जैसे कई स्टूडैंट्स को रेखा से बाहर कर दिया है. आकांशा के लिए चिंता की बात यह है कि अगर वह नहीं कर पाती तो फिर उस के पास क्या रास्ता है.इस साल करीब 3,04,699 विद्यार्थियों ने डीयू के केंद्रीय विश्वविद्यालय सीयूइटी के माध्यम से डीयू की प्रवेश परीक्षा में भाग लिया.

यहां हम केवल स्नातक या बीए की बात कर रहे हैं जबकि डीयू में केवल 59,554 सीटें ही हैं. ऐसे में जिन छात्रों का एडमिशन नहीं हो पाएगा, वे कहां जाएंगे. हर साल इसी तरह देश के युवाओं का एक बड़ा तबका उच्च शिक्षा की रेस से बाहर हो जाता है. इस की वजहों को सरकार दरकिनार कर जाती है. सरकारों का फोकस आज भी केवल मंदिर, स्टैच्यू आदि बनाने में है, न कि इन भटक रहे छात्रों के लिए उच्च शिक्षा के इंतजाम के लिए.

शिक्षा की गुणवत्ताएक रिपोर्ट में, सरकार के अनुसार, 2014 के बाद से भारत में 5709 कालेज, 320 नए विश्वविद्यालय खोले गए. अब देश में कुल 23 आईआईटी, 25 आईआईआईटी, 20 आईआईएम और 22 एम्स हैं. शिक्षा का बजट दोगुना कर दिया गया.

ये सब कागजों में दिखाई पड़ते हैं, धरातल पर नहीं.अगर यह सही है तो फिर देश से विदेश पढ़ने जाने वालों की संख्या 7 लाख क्यों पार कर गई. शिक्षा मंत्रालय के नए आंकड़ों के अनुसार, 2022 में 7,70,000 से अधिक भारतीय छात्र अध्ययन के लिए विदेश गए, जो 6 साल का उच्चतम स्तर है. इस की भी एक खास वजह है. यदि महानगरों के विश्वविद्यालयों को छोड़ दिया जाए तो देश के अन्य राज्यों की भारतीय शिक्षा व्यवस्था छात्रों को वह वातावरण और अवसर नहीं दे पाती जो विदेशी विश्वविद्यालय देते हैं.

भारत में शिक्षा की गुणवत्ता आजादी के बाद से जस की तस बनी हुई है, जो दुनिया के साथ तालमेल नहीं बैठा पाती. यही वजह है की नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार के अनुसार, 48 फीसदी इंजीनियरिंग छात्र बेरोजगार रह गए हैं. ये केवल सरकारी आकड़े हैं. सरकारी और वास्तविक आंकड़ों में कितना फर्क होता है, यह जगजाहिर है. वास्तविकता में 80 प्रतिशत से भी ज्यादा इस लायक नहीं कि एक इंजीनियर के तौर पर काम कर सकें. तो, वे यहांवहां छोटीमोटी नौकरियों में लगे हुए हैं.शिक्षा का कारोबारदेश के सरकारी विश्वविद्यालयों में फीस का क्या स्तर है, आप इसी से अनुमान लगा सकते हैं कि कुछ कालेजों में बीए कोर्स में फीस 1 लाख से 7 लाख रुपए तक पहुंच जाती है.

अगर मैडिकल और आईआईटी की बात करें तो फीस 40-45 लाख रुपए तक पहुंच जाती है. उन में प्रवेश लेने का सपना एक गरीब स्टूडैंट देख भी नहीं सकता और यदि वह देख भी लेता है तो उस के लिए वहां, जहां केवल मजबूत घरों से आने वाले छात्र ही पढ़ते हैं, के लिए शिक्षा हासिल करना वैसा ही है जैसा किसी युद्ध की तैयारी करना. जिस के कारण कितनी ही बार मानसिक तनाव में आ कर विद्यार्थी आत्महत्या तक कर लेते हैं.

भारत का शिक्षातंत्र दोहरी व्यवस्था पर काम करता है जिस में सरकारी और निजी दोनों ही शामिल हैं, जिस की वजह से निजी कालेजों का कारोबार बड़ी तेजी से फलफूल रहा है. यही कारण है कि सरकारें अपने देश में नए कालेजों पर ध्यान नहीं दे रही हैं और न ही पुराने कालेजों के विकास पर ध्यान देती हैं. और, इस तरह पुराने ढर्रे पर चल रहे कालेज नई तकनीकी दुनिया से पिछड़ जाते हैं.

सरकारी कालेजों में सीटें नहीं हैं और निजी कालेजों की फीस इतनी ज्यादा है कि आकांशा जैसे छात्रों को अपने सपनों को मार देना पड़ता है और ऐसे ही किसी विषय को चुनना पड़ता है जो उस की पसंद का नहीं है या केवल उस वक्त वह उपलब्ध हो. यदि उसे फिर भी वही करना है तो एक भारीभरकम फीस के साथ उसे निजी कालेज में एडमिशन लेना होगा.

जो फिर भी उस का सफल भविष्य सुनिश्चित नहीं करती क्योंकि बेरोजगारी का 8 प्रतिशत आंकड़ा देश के जो हालात प्रस्तुत करता है वह बहुत ही भयावह सा लगता है.भारत सरकार की एक रिपोर्ट बताती है कि 2015 और 2019 के बीच विदेश में पढ़ाई करने वाले केवल 22 प्रतिशत भारतीय छात्र घर लौटने पर रोजगार सुरक्षित करने में सफल रहे.

देश में हर साल जो लाखों छात्र 12वीं पास कर के निकलते हैं, देश की शिक्षा की लचर व्यवस्था के शिकार होते हैं. उच्च शिक्षा की जब बारी आती है तो देश एक बड़ा बाजार बन के सामने खड़ा हो जाता है. एक ऐसा बाजार जहां केवल वही लोग व्यापार कर सकते हैं जिन के पास अथाह पैसा है या जो सक्षम हैं. इस पर सरकारों को ध्यान देना चाहिए.

आस्ट्रिया, साइप्रस गणराज्य, चेक गणराज्य, डेनमार्क, फिनलैंड, जरमनी, ग्रीस, आइसलैंड, नौर्वे, पोलैंड, स्लोवाकिया, स्लोवेनिया और स्वीडन सहित कई अन्य देशों मे या तो शिक्षा मुफ्त है या केवल कुछ हिस्सा ही फीस के तौर पर देना पड़ता है. दुनिया के ये देश विकसित केवल इसलिए हैं क्योंकि उन का शिक्षा पर पूरा फोकस है. इसलिए, जरूरत है शिक्षा के अधिक से अधिक अवसर छात्रों को मुहैया कराए जाने की.

एडि़यों का ऐसे रखें खयाल

जिस तरह हमारा चमकता चेहरा हमारी पहचान बन जाता है उसी तरह हमारी दमकती एडि़यां भी हमारी पर्सनैलिटी को चारचांद लगाती हैं. कई बार आप ने देखा होगा कि कई लोग अपने पैरों को दूसरों से छिपाते हैं या अपनी फटी एडियों को बंद जूतियों में छिपाने की कोशिश करते हैं. कई महिलाएं घरेलू नुसखे अपनाते हुए थक भी जाती हैं लेकिन अपने पैरों को सौफ्ट और स्मूथ कर पाने की इच्छा पूरी नहीं कर पातीं. ऐसे में जरूरी है कि आप ऐसे उपकरणों का प्रयोग करें जिन के इस्तेमाल के बाद आप को अपनी एडि़यां छिपाने की जरूरत न पड़े और आप कम टाइम में मुलायम पैर पा सकें. तो चलिए आज हम आप को ऐसे कुछ कैलस रिमूवर के बारे में बताते हैं जिन के इस्तेमाल से आप के पैर चमक उठेंगे.

कैलस रिमूवर हैं क्या

यह एक छोटा सा रिचार्जेबल, कौम्पैक्ट और पोर्टेबल उपकरण है जिसे आप आसानी से कहीं भी कैरी कर सकती हैं. इस के इस्तेमाल से आप अपने पैरों की डैड स्किन, थिक स्किन और रफनैस प्रौब्लम से छुटकारा पा सकती हैं. जिन महिलाओं को पार्लर में जा कर पेडीक्योर करना मुसीबत लगता है उन के लिए यह एक बैस्ट आइटम है. इस के साथ कुछ रोलर भी आते हैं जिन्हें अपनी जरूरत के अनुसार आप इस्तेमाल कर सकती हैं. तो चलिए जानते हैं कुछ बैस्ट कैलस रिमूवर के बारे में जिन्हें आप औनलाइन व मार्केट से खरीद सकते हैं.

  1. लाइफलौंग एलएलपीसीडब्लू 04 

इस की खासीयत है कि इस रिमूवर को महज 30 मिनट चार्ज कर ही इसे 2 घंटे तक इस्तेमाल कर सकते हैं. यह पूरी तरह वाटरप्रूफ है. इस में 3 अटैचमैंट दिए गए हैं जिन से कम, मीडियम या बहुत ज्यादा डैड स्किन को निकाल सकते हैं. इस की कीमत 1,300 रुपए तक है.

2. एगेरो सीआर 3001

इस रिमूवर को 45 मिनट तक चार्ज कर 2 घंटे तक इस्तेमाल किया जा सकता है. यह रिचार्जेबल डिवाइस है, जिस में 2 अटैचमैंट हैं. इसे आप शौवर या ड्राई दोनों तरह से यूज कर सकते हैं. इस की कीमत 1,100 रुपए तक है.

3. आइग्रिड 

यह एक कम वजन वाला एलईडी लाइट के साथ आने वाला रिमूवर है. इस के साथ 3 रोलर मिलते हैं, जिन्हें आप उपयोग के बाद आसानी से साफ कर के दोबारा इस्तेमाल कर सकती हैं. इस की कीमत तकरीबन 900 से 1,100 रुपए तक है.

4. वैंडले (यूके) सीक्यूआर-एफसी 800

इस रिमूवर में 1,2000 एमएएच की बैटरी होती है. यह पौकेट साइज में आता है. इस से फाइन ग्राइंडिंग, मीडियम ग्राइंडिंग और रफ ग्राइंडिंग कर सकते हैं. यह 2 स्पीड वैरिएशन के साथ आता है. इस में डिजिटल डिस्प्ले भी होता है. यह 1,200 रुपए तक की कीमत में आसानी से मिल जाता है.

5. एमोप पेडी परफैक्ट 

यह एक इलैक्ट्रिक फुट फाइलर है. इसे बैटरी से औपरेट कर सकते हैं. यह 400 रुपए तक की कीमत में आसानी से मिल जाता है. यदि आप कम खर्चे में अपने पैरों से डैड स्किन हटाना चाहती हैं तो यह एक बढि़या औप्शन है.

अच्छे रिजल्ट के लिए आप कैलस रिमूवर को इस्तेमाल करने के बाद अपने पैरों पर अच्छा मोइस्चराजर लगाना न भूलें. साथ ही, अपने पैरों की सफाई सोने से पहले अवश्य करें जिस से ये रातभर में हील हो सकें और अपने रिमूवर रोलर्स को साफ कर के रखें.

मेरी शादी होने वाली है,मैं ऐसा क्या करूं जिस से हमारे बीच प्यार की गरमी यों ही बरकरार रहे?  

सवाल

मेरी उम्र 22 साल है और मैं ने अपना ग्रेजुएशन कंप्लीट कर लिया है. इसी साल मार्च में मेरी सगाई हो गई है और अक्तूबर में शादी है. मेरा मंगेतर विदेश में रहता है. मेरे वीजा का प्रौसेस चल रहा है ताकि मैं अक्तूबर में शादी के बाद नवंबर में पति के साथ विदेश चली जाऊं. मेरे और मेरे मंगेतर के बीच रोज 3-4 बार बात जरूर होती है. बहुत अच्छी सी फीलिंग है यह. ऐसा लगता है जैसे हम गर्लफ्रैँडबौयफ्रैंड हैं. हमारे बीच बहुत अच्छी बौंडिंग बन चुकी है. मैं अपने मंगेतर के प्यार में इतनी डूब चुकी हूं कि उस के सिवा मुझे और कोई नहीं दिखता. वह भी मुझ पर जीजान से फिदा है. कभीकभी मैं सोचती हूं कि यह हमारा प्यार शादी के बाद भी ऐसा ही रहेगा या शादी के बाद जब हम एक हो जाएंगे, वही पतिपत्नी वाला ठंडा प्यार रह जाएगा? मैं ऐसा हरगिज नहीं चाहती. मैं ऐसा क्या करूं जिस से हमारे बीच प्यार की गरमी यों ही बरकरार रहे?  

जवाब

प्यार का आप का यह पहला अनुभव है और उस में आप पूरी तरह डूबी हुई हैं. ऐसा होना कोई नई बात नहीं है. पहले प्यार का नशा ऐसा ही होता है और अच्छा भी है कि आप अपनी सगाई और शादी के बीच के टाइम को प्यार से भर रहे हैं.

आप चाहती हैं ऐसा ही प्यार शादी के बाद भी रहे. देखिए, जिंदगी के हर पड़ाव के साथ प्रेम का रूप भी बदल जाता है. अभी आप दोनों की शादी हुई नहीं है. प्यार करने के अलावा आप दोनों के पास दूसरा और कोई जरूरी काम नहीं है. लेकिन शादी के बाद कई जिम्मेदारियां आ जाती हैं जिन के बीच में प्यार का जोश ठंडा पड़ने लगता है लेकिन जिस तरह ज्वालामुखी ऊपर से ठंडा लेकिन अंदर आग जलती रहती है वैसी ही प्यार में अंदर की आग जलती रहनी चाहिए. उस के लिए अपनी आपसी बौंडिंग को मजबूत बनाए रखें.

प्यार में गर्मजोशी को बनाए रखें ताकि एकरूपता से बोरियत पैदा न हो. एकदूसरे पर विश्वास रखें. आपसी बहसबाजी से बचें. एकदूसरे की जरूरतों, कम्फर्ट का ध्यान रखें. यही छोटीछोटी बातें होती हैं जिन से पतिपत्नी के बीच प्यार की गर्मजोशी बनी रहती है. आप इन बातों को ध्यान में रखेंगी तो सब अच्छा रहेगा. विश यू वैरी हैप्पी मैरिड लाइफ.

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