ज्ञानोद: भाग 1

यहसुनने को बेताब मैं ने हमेशा  की तरह रिसीवर उठा कर हैलो कहा तो दूसरी तरफ से आवाज आई मैं भगतजी से बात कर सकती हूं?’’ मैं ने रौंग नंबर कह कर रिसीवर रख दिया. रोहित जब से अमेरिका गया है, शनिवार की सुबह 6 बजे उस का फोन आ जाता है. कभीकभी बीचबीच में भी आ जाता है. यह पूछने के लिए कि मां , मैं ने फला सब्जी बनाई है, नमक ज्यादा हो गया. क्या करू तो कभी पूछेगा मां, सब्जी तीखी हो गई है क्या करूं?

मैं उस के सवालों के जवाब दे कर उदास हो जाती सोचती बेचारा बच्चा, अकेला क्याक्या करेगा… उसे पढ़ना भी है, काम भी करना है, घर भी संभालना है.तब रिया कहती कि ठीक है न मां, हम सब से दूर जाने का निर्णय भी तो भैया का ही था. शुरूशुरू में तो 4 लड़के मिल कर एक घर में रहते थे, तो आपस में काम बांट लेते थे. पर अब रोहित अलग घर ले कर रहने लगा था.  वहां बाइयां नहीं मिलतीं, सभी काम खुद करने पड़ते है. लेकिन मुझे अपने बेटे पर बहुत गर्व है. इतनी छोटी उम्र में उस ने अपने दम पर घर भी खरीद लिया. जब से उस ने घर लिया है, बारबार आग्रह करता है कि हम उस के पास आ कर रहें मगर भला हम रिया को अकेले छोड़ कर कैसे जा सकते हैं.

इंजिनियरिंग की पढ़ाई पूरी होते ही, आगे एम.एस. की पढ़ाई करने के लिए रोहित अमेरिका चला गया. जब उस ने अमेरिका जाने की इच्छा जाहिर की थी, तो उसे इतनी दूर भेजने की मेरी बिलकुल इच्छा नहीं थी. पर मैं उस की प्रगति के मार्ग में बाधक नहीं बनाना चाहती थी, मुझे ज्ञात है कि बच्चों की पढ़ाई आजकल कितनी महंगी हो गई है. एक व्यक्ति की आय में महंगी पढ़ाई का खर्च उठा पाना नामुमकिन है. इसीलिए तो मैं ने नौकरी शुरू कर दी थी. रवि के वेतन से घर सुचारु रूप से चल रहा था.

मेरा पूरा वेतन बच्चों की पढ़ाई में खर्च हो जाता था. बच्चे भी तो कितने होनहार हैं. दोनों ने अपनीअपनी मंजिल खुद तय कर ली थी. उन के मंजिल की तलाश में मैं एक साधक मात्र थी. दोनों बच्चे बहुत मेहनती थे. रोहित तो फिर भी मस्ती कर लेता था, लेकिन रिया ने कभी मुझे शिकायत का मौका नहीं दिया.

अमेरिका जाने के बाद शुरू के 2 साल तो रोहित पढ़ाई में व्यस्त रहा, इसलिए भारत नहीं आ सका. इस के बाद उस ने नौकरी करते हुए अपनी पढ़ाई भी जारी रखी. फिर हर साल 3 सप्ताह के लिए भारत आने लगा. रोहित जब भी घर आता, मैं सब कुछ उस की पसंद का बनाती. मेरा ज्यादा समय रसोई में ही बीतता, वह दोस्तों, रिश्तेदारों से मिलने जाते. इस तरह 3 हफ्ते पंख लगा कर उड़ जाते, फिर मैं उस के अगले साल आने का इंतजार करती.

मेरी शादीशुदा जिंदगी उतनी खुशहाल नहीं थी. ससुराल में सब से प्यार के दो मीठे बोल सुनने को तरस जाती थी मैं, जिन में रवि भी शामिल थे. ऐसे में कोख में नवीन सृजन की आहट पा कर मेरी जिंदगी में जैसे बहार आ गई. रोहित के जन्म के 2 साल के अंतराल पर जब रिया का जन्म हुआ तो मैं निहाल हो गई. दोनों बच्चों के पालनपोषण में मैं अपनी जिंदगी की सारी कडवाहट भूल गई.

मैं ने 2 साल पहले रिया की भी शादी कर दी. रिया के लिए मुझे जैसे योग्य वर की तलाश थी, राजीव के रूप में बिलकुल वैसा ही बेटे जैसा दामाद मिला मुझे. मुझे ऐसा लगने लगा कि दुनिया भर की खुशियां मुझे हासिल हो गई हैं. बेटी को विदा करने के बाद हम पतिपत्नी रोहित के पास अमेरिका चले गए. रोहित का इतना सुंदर घर, उस की प्रतिष्ठा वगैरह देख कर हम फूले नहीं समाए.

मैं सोचने लगी, मेरे लिए बहू लाना कोई मुश्किल काम नहीं होगा. ऐसे प्रतिभाशाली उच्च शिक्षा प्राप्त लड़के के लिए लड़कियों की भला क्यों कमी होगी. हम 2 महीने अमेरिका में रहे. इस बीच मैं ने कई बार  रोहित से उस की शादी की बात उठानी चाही, पर हर बार बात को टाल जाता था. उस ने हमें कई जगहों के दर्शन कराए, पर फिर भी मुझे रोहित का व्यवहार कुछ बदलाबदला सा लगा.

इस बीच कभीकभार उस के मित्र, जिन में लड़कियां भी शामिल थीं, घर आते थे. मैं उन सब का स्वागत करती थी. उन्हें भोजन करा कर ही घर भेजती थी. मुझे लगता, बेचारे ये बच्चे, रोहित की तरह घर से दूर रहते हैं, इन्हें भी तो घर में बने लजीज भोजन की तलब होती होगी.

रोहित के इन मित्रों में एक मैक्सिकन लड़की लिंडा, अकसर उस के घर आती थी. दोनों सहकर्मी थे, साथ में मिल कर प्रोजैक्ट तैयार करते थे. इसलिए मुझे भनक तक नहीं लगी कि दोनों एक दूसरे को चाहते भी थे. रोहित ने मुझे बताया कि लिंडा काफी पढ़ीलिखी, सुलझे विचारों वाली लड़की है. उस के पिता के बारे में पूछने पर रोहित ने बताया कि उस की मां का पिता से तलाक हो चुका है. लिंडा मां के साथ रहती है.

मैं दकियानूसी बिलकुल नहीं हूं. मैं ने तो सोच रखा था कि बच्चे अपना जीवनसाथी खुद चुन लेते हैं, तो मैं हर हाल में उन का साथ दूंगी. उन के रास्ते का रोड़ा नहीं बनूंगी. मैं अकसर रोहित से कहती थी, ‘‘बेटे, तुम किसी भारतीय लड़की से शादी करना, पर विदेशी लड़कियों से दूर रहना.’’

रोहित मेरे बातों को हंस कर टाल दिया करता था. मुझे गोरी लड़कियों से परहेज नहीं था, पर उन की उन्मुक्त सभ्यता और संस्कृति से मुझे डर लगता था. तलाक लेना वहां आम बात है. 2 महीने अमेरिका में रह कर जब हम स्वदेश लौटे, तो मेरा सर्वोपरि कार्य था, रोहित के लिए जल्दी से जल्दीजल्दी लड़की ढूंढ़ना. उस की सहमति से मैं ने बहू ढूंढ़ने का काम शुरू किया. पर मैं ने इस काम को जितना आसान सोचा था, उतना था नहीं, मैं रोहित के लिए घरेलू लड़की तो नहीं चाहती थी. ऐसी लड़की भी नहीं चाहती थी, जो घर के बजाय नौकरी को अहमियत दे. रोहित की पसंद एक आधुनिक तेजतर्रार लड़की थी. उस की पसंद को मद्देनजर रखते हुए, एक संस्कारी लड़की की तलाश इतनी आसान नहीं थी पर मैं भी हार मानने वालों में से नहीं थी. मैं जी जान से जुट गई अपने मकसद को कामयाबी का चोला पहनाने में.

इस सिलसिले में मैं कुछ लड़कियों और उन के परिवार वालों से भी मिली. बात आगे बढ़ती, उस से पहले ही एक दिन रोहित का फोन आया. कहने लगा, मां, मैं लिंडा को बेहद चाहता हूं. उस से शादी करना चाहता हूं.

सुन कर मैं हैरान रह गई, गुस्सा भी आया, मुझे रोहित पर कि अगर ऐसी बात थी, तो मुझे पहले क्यों नहीं बताया? लड़की ढूंढ़ने के लिए मुझे अपनी सहमति क्यों दी? मैं एक अच्छी लड़की की तलाश में दिनरात एक कर रही थी. खैर, अपनेआप को संयत कर के मैं ने रोहित से पूछा, ‘‘लिंडा के मातापिता का तलाक क्यों हुआ था क्या तुम ने कभी लिंडा से यह जानने की कोशिश की?’’

रोहित ने जवाब दिया, ‘‘लिंडा के पिता किसी और को चाहते थे. उन्होंने उस की मां से कह दिया कि वे उन के साथ नहीं रहना चाहते. तो इस में उस की मां का क्या दोष?’’

मैं सोचने लगी दोष चाहे माता या पिता किसी का भी हो, लिंडा का तो बिलकुल नहीं था. मेरे विचार से रोजमर्रा की जिंदगी में बच्चों को माता और पिता दोनों की आवश्यकता होती है. इन में से किसी एक की अनुपस्थिति से बच्चों का जीवन सामान्य नहीं रह पाता. ऐसे में तलाकशुदा मातापिता की बेटियों ने खुद जो भुगता होता है, वे कभी नहीं चाहेगी कि उन की संतान वहीं सब भुगते. इसीलिए वे परिवार में पूरा तालमेल बैठाने की पूरी कोशिश करेंगी. इस हिसाब से मुझे लिंडा को अपने परिवार में शामिल करने में कोई एतराज नहीं था.

इस के पहले कि मैं अपना निर्णय रोहित को सुना पाती, रोहित ने मुझे बताया कि लिंडा भी तलाकशुदा है. सुन कर कुछ अच्छा नहीं लगा. फिर भी मैं ने रोहित से उस के तलाक का कारण जानना चाहा.

रोहित ने कहा, ‘‘दोनों में बनी नहीं. छोड़ो न मां, कितनी पूछताछ करती हो. क्या यह काफी नहीं कि हम एकदूसरे को चाहते हैं?’’

मैं रोहित की इच्छा के आगे झकने ही वाली थी कि उस ने फिर एक तीर छोड़ा ‘‘मां, लिंडा के 1 बेटा भी है.’’

सुन कर दिल में एक हूक सी उठी, मैं ने रोहित से कहा, ‘‘बेटा, लिंडा को अपने पिता का प्यार मुहैया नहीं हुआ था, फिर क्या तलाक लेते हुए उस ने अपने बच्चे के बारे में नहीं सोचा और उसे भी पिता के प्यार से वंचित कर दिया? ‘आपस में बनी नहीं’ यह तो कोई कारण हुआ नहीं तलाक लेने का’ इतनी विषमताओं के बीच क्यों करना चाहते हो शादी लिंडा से? मेरी मानो तुम इन पचड़ों में न पड़ो.’’

रोहित ने कोई विवाद नहीं किया. उस ने चुपचाप मेरी बात मान ली. मुझे अपने बेटे पर गर्व महसूस हुआ. मैं ने सोचा, कितनी आसानी से उस ने मेरी बात समझ ली. कुछ वक्त बीत जाने के बाद मैं ने रोहित से फिर पूछा, ‘‘बेटे, क्या मैं फिर से लड़की की तलाश शुरू करूं.’’

इस पर रोहित ने कहा, ‘‘जैसा ठीक समझे .’’ मैं बस उस की सहमति चाहती थी. सहमति मिलने की देर थी कि बिना वक्त गंवाए मैं ने लड़की की तलाश शुरू कर दी. पर हमारे जल्दी मचाने से क्या होता है, होता तो वही है, जो नियति द्वारा निर्धारित होता है. 4-5 महीने निकल गए, पर मुझे सफलता हासिल नहीं हुई.

पेचीदा हल: नई जिंदगी जीना चाहता था संजीव

कशमकश- भाग 1: क्या बेवफा था मानव

सिंगापुर हवाईअड्डे से स्कूल की दूरी अच्छीखासी थी. एयरपोर्ट पर ही वसुधा को लेने आए ट्रैवल एजेंट ने स्कूल की तारीफों के पुल बांधने शुरू कर दिए, ‘‘मैडम, ऐसा स्कूल आप को दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा. बच्चे का पूरा ध्यान रखते हैं. और शायद यह दुनिया का पहला स्कूल है जो अस्पताल से जुड़ा हुआ है. बच्चे की सेहत का पूरा ध्यान रखा जाता है, पेरैंट्स को टैंशन लेने की जरूरत नहीं. आप देखिएगा कुछ ही सालों में न आप अपने बच्चे को पहचान पाएंगे और न ही आप का बच्चा आप को.’’ जवाब में वसुधा ने एक फीकी मुसकान फेंकी और मन ही मन कहा, ‘देख पाएगा, तो जरूर पहचान पाएगा.’

‘‘मम्मी, पानी,’’ नन्हे करण का हाथ आगे था. वसुधा ने थर्मस से पानी डाला और गिलास आगे बढ़ा दिया जिसे बच्चे ने एक सांस में ही खाली कर दिया, ‘‘मम्मी, हम कहां जा रहे हैं? यह कौन सी जगह है.’’

‘‘हम सिंगापुर पहुंचे हैं और तुम्हारे नए स्कूल में जा रहे हैं, जहां तुम्हें ढेर सारे खिलौने मिलेंगे, अच्छेअच्छे दोस्त मिलेंगे, खूब मस्ती होगी…’’

‘‘अच्छा,’’ करण कुछ सोच में था, ‘‘सिंगापुर – वही जहां नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सैकंड वर्ल्ड वार में दिल्ली चलो का नारा दिया था.’’

‘‘हां, यह जगह वही है. अब तुम थोड़ी देर सुस्ता लो. फ्लाइट में भी नहीं सोए थे, तबीयत खराब हो जाएगी.’’

स्कूल के रिसैप्शन पर एक लड़की वसुधा का इंतजार कर रही थी, ‘‘मैं हूं रमया, मानव सर की असिस्टैंट. सर, आप का ही इंतजार कर रहे हैं.’’

‘‘फ्लाइट लेट हो गईर् थी,’’ वसुधा ने कहा लेकिन दिमाग उस का मानव नाम पर अटका हुआ था. कितना परिचित नाम है. पिं्रसिपल के कमरे में प्रवेश करते ही वसुधा की सांस अटक सी गई, विशाल कमरा, पीछे दीवार पर एक बड़ी तसवीर और आगे एक बड़ी सी मेज, सोफे और इन सब के बीच एक कुरसी पर मानव… वही चेहरा, वही ललाट, वही माथा और वही गहरी आंखें – वसुधा सकपका सी गई. ‘‘वैलकम मिस्टर करण,’’ पिं्रसिपल का ध्यान अपने छात्र पर ही था.

‘‘थैंक्यू सर, करण कुरसी खींच कर उस पर बैठ चुका था.’’

‘‘तो आप दिल्ली से आए हैं?’’ पिं्रसिपल ने मुसकरा कर पूछा तो झट से करण ने जवाब दिया, ‘‘यस सर, हम दिल्ली में रहते हैं. वैसे, हम बीकानेर के राजघराने से हैं. आप कभी गए हैं वहां?’’

जवाब में मानव ने मुसकराहट फेंकी. फोन की घंटी बज रही थी, मानव ने फोन उठा कर बात करनी शुरू कर दी. ‘तो क्या मानव जानबूझ कर उसे अनदेखा कर रहा है, क्या वह अभी भी…’ वसुधा मन ही मन खुद से सवालजवाब कर रही थी कि अचानक एक शोर ने उस का ध्यान खींचा-खेलखेल में करण ने पेपरवेट नीचे गिरा दिया था जो लुढ़कते हुए अलमारी के कोने में छिप गया था. करण उठ कर गया और चुपचाप पेपरवेट वापस मेज पर रख दिया.

‘‘ओह गुड,’’ पिं्रसिपल मानव ने मुसकरा कर कहा,’’ बिना सहारे के तुम ने अपनेआप पेपरवेट मेज पर रख दिया. दिस इज इंप्रैसिव.’’

‘‘मैं अंधा थोड़े ही हूं. मम्मी तो बस वैसे ही मुझे देखदेख कर रोती रहती हैं. आप ही समझाइए न, मम्मी को.’’  ‘‘जरूर बेटा. तुम अभी छोटे हो, तुम्हें नहीं पता कि अपनों के आंसुओं में कितना प्यार, कितनी भावनाएं होती हैं. इस का इल्म मुझ से ज्यादा किसी को नहीं होगा जिस की आंखों के जाने पर किसी की आंखों से एक बूंद अश्क भी नहीं बहा.’’

वसुधा को काटो तो खून नहीं, तो क्या मानव नेत्रहीन है? आंखों की खूबसूरती वही जो कालेज के जमाने में थी. मगर उस खूबसूरती की अब कोई कीमत नहीं थी. यह सब कैसे हुआ, कब हुआ. ऐसे कई सवाल वसुधा को झकझोर रहे थे. इस से पहले कि बातों का सिलसिला कुछ आगे बढ़ता, मानव ने इजाजत मांगी और लाइब्रेरी की ओर बढ़ गया.

ऐडमिशन की औपचारिकताएं पूरी होने के बाद वसुधा अपने कमरे की बालकनी में बैठी दूर पहाड़ों की ओर टकटकी लगाए थी. बादलों का एक झुरमुट आया और उसे भिगोने लगा. वसुधा ने आगे बढ़ कर खिड़की को बंद करने की कोशिश की, मगर तेज हवा की वजह से वह ऐसा नहीं कर पाई और अतीत में खो गई.

पहाड़ों से उसे खास प्यार था. शायद इसी वजह से उस ने छुट्टियों में कश्मीर घूमने का कार्यक्रम बनाया था. उस के पति आनंद ने दफ्तर से काफी सारी छुट्टियां ले ली थीं. कितना खुश था नन्हा करण. श्रीनगर का हर कोना उन्होंने देखा. शिकारे में सैर की. हाउसबोट में सारे दिन आनंद और करण धमाचौकड़ी करते, शाम को डलझील के किनारे सैर करते.

ऐसी ही एक शाम थी जब वे डल झील के किनारे घूम रहे थे कि कुछ लड़के पास से गुजरते फौज के एक कारवां पर अकारण पत्थरों की बरसात करने लगे, फौजी दस्ते हथियारों से लैस होने के बावजूद चुपचाप चलते जा रहे थे कि अचानक एक दुबलेपतले लड़के ने एक फौजी की वरदी पर हाथ डाल दिया. जवान ने लड़के की कलाई पकड़ ली और वह घिसटता चला जा रहा था. जवान ने एक हाथ से उसे पकड़े रखा और वह लड़का अपनी पूरी ताकत व जोरआजमाइश के बावजूद अपनी कलाई नहीं छुड़ा पाया.

कारवां के कप्तान ने आखिर उसे छुड़ाया और कहा, ‘‘हम चाहें तो अभी तुम्हें मजा चखा सकते हैं, मगर हम तुम्हें एक और मौका देते हैं. मत करो ऐसा काम, वरना भूखे मर जाओगे, तुम्हारे आका ऐयाशी करते जाएंगे और तुम मरते जाओगे. ये जो पर्यटक हैं, पहाड़ देखने के लिए कुल्लू जा सकते हैं, शिमला, मनाली, मसूरी, आबू, दार्जिलिंग, यहां तक कि स्विट्जरलैंड भी जा सकते हैं. मगर सोचो, ये अगर यहां नहीं आएंगे तो तुम्हारा क्या होगा, दानेदाने को मुहताज हो जाओगे.’’ यह कह कर कप्तान ने लड़के को छोड़ दिया.

लड़का एक ओर गिरा. मगर गिरते ही एहसानफरामोश दल ने पत्थर की बारिश कर दी. एक पत्थर करण को जा लगा और उस की आंखों से खून बहने लगा. फौज के कप्तान ने कारण को घायल देखा तो नारे लगाती भीड़ में घुस गया और पत्थरों की बौछारों के बीच करण, वसुधा और आनंद को बचा कर जीप में बैठा कर अस्पताल की तरफ चल पड़ा.

अस्पताल पहुंचते ही फौरन करण का इलाज शुरू हो गया. ‘बच्चे की आंखों का कार्निया डैमेज हो चुका है, अगर कुछ देर और हो जाती तो औप्टिकल नर्व भी कट सकती थी. फिलहाल, बच्चा देख नहीं पाएगा,’ डाक्टर ने राय जाहिर की.

‘क्या कोई उम्मीद नहीं,’ आनंद ने हौले से पूछा.

‘आस तो रखिए, मगर उम्मीद नहीं. शायद कभी कोई ऐसा डोनर मिल जाए, जिस की आंखों का यह हिस्सा सही हो तो उस के कार्निया की मदद से इस की आंखों की रोशनी आ जाए. मगर पूरी तरह से मैचिंग हो जाए तभी ऐसा मुमकिन हो पाएगा.’

फोन की बजती घंटी वसुधा को अतीत से वापस वर्तमान में ले आई. फोन पर दूसरी ओर आनंद था जो करण की खैरियत पूछ रहा था. वसुधा चाह कर भी आनंद से मानव का जिक्र नहीं कर पाई.

फिटनैस की डांस थेरैपी

डांस करना महज एक कला या शौक ही नहीं, बल्कि यह उपचार की एक पद्धति भी है. आधुनिक शोध और अध्ययनों ने इस बात की पुष्टि की है कि नृत्यशैली चाहे जो हो, डांस करने वाले की सेहत पर उस के सकारात्मक असर होते हैं और यह व्यक्ति को ताउम्र स्वस्थ, निरोगी तथा दीर्घायु वाला बना सकती है. अब तो इसे एक थेरैपी के तौर पर अपनाया जाने लगा है. बिना दवा के उपचार की यह पद्धति विश्वभर में लोकप्रिय होती जा रही है.

अब डांस सिर्फ ऐंटरटेनमैंट नहीं बल्कि मानसिक और शारीरिक बीमारियों के इलाज का जरिया भी है, जिस के लिए बाकायदा डिगरी और ट्रेनिंग लिए थेरैपिस्ट मौजूद हैं. यही नहीं, यह थेरैपी बच्चों के स्कूलों, हौस्पिटल, डीऐडिक्शन सैंटर और डांस इंस्टिट्यूट का हिस्सा बन चुकी है. प्राइवेट कंपनियों ने अपने कर्मचारियों के तनाव को कम करने और परफौर्मैंस को बढ़ाने के लिए औफिस में ही डांस थेरैपी सेशन शुरू कर दिए हैं. स्पैशल ऐजुकेटर और हैल्थ प्रोफैशनल्स को थेरैपी सिखाई जा रही है. इस से डिप्रैशन और पार्किंसन जैसी मानसिक बीमारियों व शारीरिक अक्षमता जैसी समस्याओं का भी इलाज किया जा रहा है.

डांस के फायदे

डांस मूवमैंट फेसिलिटेटर निरमेथा जैन के अनुसार, शरीर के लिए मूवमैंट बेहद जरूरी है. पैदा होने से पहले ही बच्चा मूवमैंट के जरिए अपनी बात कहने लगता है. जब हम बड़े होने लगते हैं, शरीर का हिलना कम हो जाता है. जिस से हमारे ऐक्सप्रैशन जाहिर होने कम हो जाते हैं. डांस इसी ऐक्सप्रैशन को मूवमैंट के जरिए रिलीज करता है.

मुंबई की देविका मेहता गरबा से अपने पेरैंट्स का इलाज करती हैं. उन्होंने साइकोलौजी की पढ़ाई की है. वे कहती हैं, ‘‘गरबे के मूवमैंट जन्म से मृत्यु तक के सारे जीवनचक्र को दिखाते हैं. ताली बजाने से ऐक्युप्रैशर पौइंट्स चार्ज होते हैं. झुकने और उठने से शरीर की कनैक्टिविटी बनी रहती है, हाथों और आंखों का कोऔर्डिनेशन सुधरता है और कम्युनिकेशन बेहतर होता है.’’

निकिता मित्तल फिजियोथेरैपिस्ट थीं. पीडिएट्रिक रिहेबिलिटेशन सैंटर में नौकरी करती थीं. उन्हें डांस थेरैपी के बारे में पता चला. अब वे अपंग बच्चों के लिए पुणे में डांस थेरैपी एकेडमी चलाती हैं. निकिता कहती हैं, ‘‘अपंग बच्चे सोचते हैं कि वे अक्षम हैं. डांस उन का ध्यान बांट कर उन से वही काम करवाता है. इमोशनल और फिजिकल हैल्थ को ध्यान में रख कर वे हर बच्चे को कोर्स करवाती हैं.’’

व्हीलचेयर पर बैठे अपने भाई से त्रिपुरा कश्यप को डांस थेरैपी सीखने का आइडिया मिला. उन का भाई म्यूजिक सुनते ही व्हीलचेयर पर बैठेबैठे कमर से ऊपर के हिस्से को हिलाता था. त्रिपुरा के पास क्लासिकल डांस में डिगरी थी, उन्होंने साइकोलौजी से मास्टर किया और फिर अमेरिका जा कर डांस थेरैपी की ट्रेनिंग ली. वे वृद्धाश्रमों में बुजुर्गों को भी थेरैपी देती हैं और अपंग बच्चों के लिए भी सेशन कराती हैं. वे दिल्ली, बेंगलुरु, पुणे और हैदराबाद में भी वर्कशौप आयोजित करती हैं.

डांस कई समस्याओं का हल

वैज्ञानिकों ने शोध में पाया कि नृत्य से तनाव, थकान और सिरदर्द जैसी समस्याओं से नजात मिल सकती है. इस के अलावा, यह थेरैपी मैंटल हैल्थ और सैल्फ एस्टीम में भी अपना योगदान देती हैं, व्यक्ति मानसिक रूप से फ्री होता है और उस में समस्याओं का सामना करने की ज्यादा क्षमता उत्पन्न हो जाती है.

स्वीडन की ओरेबी यूनिवर्सिटी हौस्पिटल की फिजिकल थेरैपिस्ट अन्ना डुबर्ग और कई चिकित्सकों ने लड़कियों पर एक अध्ययन किया. इस में 112 युवतियों को शामिल किया गया. जिन की उम्र 13 से 19 वर्ष के बीच थी. 8 महीने तक किए गए इस अध्ययन में 91 फीसदी युवतियों पर इस का असर पौजिटिव पाया गया.

डांस द्वारा हम चुस्तदुरुस्त रह सकते हैं. डांस मोटापे को हावी नहीं होने देता और इस से शरीर के प्रत्येक अंग का व्यायाम होता है तथा शरीर लचीला होता है. इस से हाथ, पैर, कमर, पेट, गरदन, आंखें आदि सभी में लोच बढ़ती है. रक्त का संचार शरीर में नियमित रहता है.

डांस से ताउम्र जोश बरकरार

तन और मन की स्वस्थता के लिए डांस बहुत जरूरी है. इस से शरीर तो स्वस्थ और मजबूत बनता ही है, साथ ही मन भी प्रफुल्लित रहता है. डांस से मानसिक परेशानियां और उलझनें दूर होती हैं तथा आत्मविश्वास में वृद्धि होती है. चिरयौवन के लिए डांस का बड़ा योगदान है. इस से शरीर पर उम्र का प्रभाव देर से आता है. इस से तन और मन में ताउम्र जोश और उमंग बनी रहती है.

बीमारियों का इलाज भी

डांस के जरिए न केवल मनोरंजन बल्कि औटिज्म, डिप्रैशन, मोटापा और मधुमेह जैसी बीमारियों का इलाज भी हो सकता है. गौरतलब है कि कुछ डांस एक्युपंक्चर के सिद्धांत पर आधारित हैं और इस के जरिए कई बीमारियों का इलाज हो सकता है.

क्लासिकल डांस की भावभंगिमाएं व्यायाम पर आधारित होती हैं. अंगों के संचालन से संपूर्ण शरीर का व्यायाम होता है. भरतनाट्यम में तो आंखों, पलकों और पुतलियों का भरपूर व्यायाम होता है. कथक नृत्य में भी ग्रीवाभेद व नेत्र संचालन किया जाता है. डांस के दौरान गरदन की भी अच्छी कसरत हो जाती है. इस से गरदन सुडौल और सुराहीदार होती है. डांस से शरीर सुडौल और चेहरे पर निखार आता है. कमर, नितंब, स्तन आदि अंगों में कसाव आता है तथा वे सही आकार में आ जाते हैं.

ऐरोबिक्स तो नाचते हुए सेहत बनाने का एक सर्वमान्य तरीका है, जिस के माध्यम से कई लोग अपनी सेहत बना रहे हैं. ऐरोबिक्स से न केवल शरीर में स्फूर्ति आती है बल्कि मन की शांति तथा दिमागी कार्यक्षमता भी बढ़ती है.

डांस से पौजिटिव सोच

डांस व्यक्ति की सोच को सकारात्मक बनाता है तथा मन को शांति प्रदान करता है. इस से शरीर को नई ऊर्जा मिलती है और व्यक्ति खुद को पहले से अधिक चुस्तदुरुस्त पाता है. कसरत करने से दिल की मांसपेशियां उतनी सक्रिय नहीं होतीं, लेकिन डांस करने से रोमरोम फड़क उठते हैं.

शोध से पता चला है कि डांस मांसपेशियों की ऊर्जा बढ़ाता है, श्वसन प्रक्रिया को नियमित करता है तथा ब्लडप्रैशर पर सकारात्मक प्रभाव डालता है. यही नहीं, इस से घबराहट व बेचैनी दूर होती और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता बढ़ती है.

यदि वर्जिश संगीतमय हो तो व्यायाम के लाभ दोगुने हो जाते हैं. सुरताल के साथ किए जाने वाले व्यायाम को ऐरोबिक्स कहते हैं. इस की बाजार में सीडी तथा डीवीडी मिलती हैं. ऐरोबिक्स के लिए पौपसंगीत की धुनें ठीक रहती हैं.

वैज्ञानिक विश्लेषणों से पता चलता है कि भागदौड़ की जिंदगी में यदि मनपसंद डांस दैनिक जीवन में आत्मसात किया जाए, तो हर दर्द में दवा की जरूरत नहीं पड़ती.

Dipika Kakar-Shoaib Ibrahim ने दिखाया बेटे रुहान का चेहरा, फैंस हुए खुश

‘ससुराल सिमर का’ फेम एक्ट्रेस दीपिका कक्कड़ को मां बनें काफी समय हो गया है. उन्होंने 21 जून को बेटे को जन्म दिया था. वहीं एक्ट्रेस एक्टिंग छोड़ चुकी है ब्लॉग्स के जरिए वह चर्चा में बनीं रहती है. वह अक्सर वह अपनी निजी जीवन की तमाम अपडेट दे फैंस के साथ साझा करती रहती है. एक्ट्रेस के पति शोएब इब्राहिम दीपिका पर खूब प्यार लुटाते है. काफी समय से दीपिका कक्कड़ और शोएब इब्राहिम ने बेबी रुहान का चेहरा छुपा रखा था. काफी समय बाद कपल ने अपने बच्चे की तस्वीर साझा की है.

दिखाई रुहान की पहली तस्वीर

दीपिका कक्कड़ और शोएब इब्राहिम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर अपने बेबी की तस्वीर शेयर की. शोएब ने कैप्शन में लिखा है कि, आप सभी से रुहान की पहचान करा रहे है. दुआओं में शामिल रखिएगा. व्लॉग मेरे यूट्यूब चैनल पर लाइव है.

इस पोस्ट के साथ एक प्यारी तस्वीर नजर आ रही है. जिसमें दीपिका और शोएब बेबी रुहान को गोद में लिए हैं. दोनो ही बेबी के सिर पर किस कर रहे है. ये तस्वीर बहुत ही प्यारी है. फैंस इस तस्वीर को काफी पसंद कर रहे है. दरअसल, कपल ने इस पोस्ट पर कमेंट सेक्शन को बंद कर रखा है. वह नहीं चाहते उनका बच्चा किसी ट्रोलिंग का शिकार हो.

 

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खास अंदाज में बताया बेबी का नाम

जानकारी के लिए बता दे कि, अपने व्लॉग में दीपिका और शोएब ने अपने बेटे का नाम खास अंदाज में बताया था. फैमिली के सदस्य ने हाथ में नाम के अक्षर पकड़े नजर आए थे. दोनों ने बाद में रिवील किया था कि बेबी का नाम रुहान रखा था.

19 दिनों तक अस्पताल में रहीं थी दीपिका

एक्ट्रेस की डिलीवरी के बाद की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल काफी वायरल हुई थीं. फैंस बेबी और दीपिका की हेल्थ को लेकर काफी चिंतित थे. 21 जून को दीपिका कक्कड़ ने बेबी को जन्म दिया था. बेबी की प्रीमेच्योर डिलीवरी की वजह से उसे अंडर ऑबसर्वेशन रखा गया था. वो अस्पताल से 19 दिनों बाद डिस्चार्ज हुई. फिलहाल वो अब अपने बेबी के साथ अच्छा वक्त बिता रही हैं.

‘एनिमल’ से अनिल कपूर का फर्स्ट लुक हुआ रिवील, जानें कब होगा टीजर रिलीज

अनिल कपूर ने गुरुवार को संदीप रेड्डी वांगा की फिल्म ‘एनिमल’ से अपना लुक जारी किया. 66 वर्षीय अभिनेता ने फिल्म में रणबीर कपूर के पिता की भूमिका निभा रहे है. नए पोस्टर में अनिल काफी गंभीर और ‘बीमार’ दिख रहे हैं.

‘एनिमल’ से अनिल कपूर का फर्स्ट लुक

एनिमल से अनिल का पहला लुक उन्हें सोफे की कुर्सी पर बैठे और कैमरे में घूरते हुए दिखा जा सकता है. उन्होंने ऑपन खुला हुआ नीला ट्रैक सूट पहना हुआ है. दिलचस्प बात यह है कि वह न केवल गंभीर दिख रहे है, बल्कि सचमुच बीमार भी दिख रहे है. वहीं इस पोस्टर में अनिल की आंखें सूजी हुई और काली पड़ गई हैं. उन्होंने आईवी ड्रिप भी लगाई है, जिससे पता चलता है कि वह अस्वस्थ हैं. सोफे के पीछे वॉलपेपर लगा है जिसमें बहुत सारे रंग-बिरंगे फूल हैं.

अनिल ने गुरुवार को सोशल मीडिया पर पोस्टर साझा किया. उन्होंने फिल्म में अपने किरदार का परिचय कैप्शन में दिया, “एनिमल का बाप…बलबीर सिंह!”

 

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अनिल का ‘एनिमल’ लुक पर आया रिएक्शन

अनिल के बेटे और एक्टर हर्ष वर्धन कपूर ने अपने इंस्टाग्राम पोस्ट पर चार झुकने वाले इमोजी और दो आग वाले इमोजी कमेंट किए. अनिल के दामाद और थैंक यू फॉर कमिंग के निर्देशक करण बुलानी ने भी इंस्टाग्राम पोस्ट पर इमोजी कमेंट किया. अनिल की थैंक यू फॉर कमिंग की सह-कलाकार भूमि पेडनेकर और उनकी बहन समीक्षा पेडनेकर ने भी इंस्टाग्राम टिप्पणी में कुछ झुकने वाले इमोजी कमेंट किया.

जानें रणवीर कपूर की एनिमल फिल्म के बारे में

एनिमल एक गैंगस्टर एक्शन थ्रिलर है जिसमें रश्मिका मंदाना, बॉबी देओल, तृप्ति डिमरी, शक्ति कपूर और सुरेश ओबेरॉय भी हैं. यह अनिल और रणबीर के पिता-पुत्र के रिश्ते के इर्द-गिर्द घूमती है और अंडरवर्ल्ड के खिलाफ सेट है, जिसके अंत में रणबीर एक मनोरोगी बन जाता है. यह भूषण कुमार की टी-सीरीज़ और सिने1 स्टूडियो द्वारा सह-निर्मित है.  अर्जुन रेड्डी (2017) और कबीर सिंह (2019) के निर्देशक संदीप रेड्डी वांगा द्वारा ‘एनिमल’ निर्देशित किया जा रहा है.

यह शुरुआत में सनी देओल की ब्लॉकबस्टर गदर 2 के साथ 11 अगस्त को रिलीज होने वाली थी. हालांकि, वीएफएक्स के लंबित काम के कारण, इसे दिसंबर तक बढ़ा दिया गया था. इस फिल्म की टीजर 28 सितंबर को रिलीज होगा.

फेसबुक फ्रैंडशिप: भाग 2- वर्चुअल दुनिया में सचाई कहां है

उन्हें फेसबुक का पता चलेगा तो वह अकाउंट भी बंद हो जाएगा. चार बातें अलग सुनने को मिलेंगी. वे कहेंगे स्वतंत्रता दी है तो इस का यह मतलब नहीं कि तुम लड़कों से फेसबुक के जरिए मित्रता करो. उन से मिलो…और प्लीज, तुम जाओ यहां से, मैं नहीं जानती तुम्हें. क्या घर से मेरा निकलना बंद कराओगे? घर पर पता चल गया तो घर वाले नजर रखना शुरू कर देंगे.’’ फिर, घर वालों का प्रेम, विश्वास और भी बहुतकुछ कह कर लड़की चली गई.तब लड़के के मन में खयाल आया कि एक ही शहर के होने में बहुत समस्या है.

जो लड़की की समस्या है वही लड़के की भी है. लड़के ने हिम्मत कर के पूछ तो लिया, लेकिन लड़की ने कहा कि फेसबुक फ्रैंड हो तो फेसबुक पर मिलो. अपनी बात कहने के बाद लड़के ने भी सोचा कि यदि उसे भी कोई घर का या परिचित देख लेता तो प्रश्न तो करता ही. भले ही वह कोई भी जवाब दे देता लेकिन वह जवाब ठीक तो नहीं होता. यह तो नहीं कह देता कि फेसबुक फ्रैंड है. बिलकुल नहीं कह सकता था. फिर बातें उठतीं कि जब इस तरह की साइड पर लड़कियों से दोस्ती हो सकती है तो और भी अनैतिक, अराजक, पापभरी साइट्स देखते होंगे.

गे.’’लड़के ने कहा, ‘‘मुझे घर वालों से झूठ बोलना पड़ेगा और पैसों का इंतजाम भी करना पड़ेगा. हां, संबंध बनने के बाद शादी के लिए तुरंत मत कहना. मैं अभी कालेज कर रहा हूं. प्राइवेट जौब में पैसा कम मिलेगा. और आसानी से मिलता भी नहीं है काम, लेकिन मेरी कोशिश रहेगी कि…’’ लड़की ने बात काटते हुए कहा, ‘‘तुम आ जाओ. पैसों की चिंता मत करो. मेरे पास अच्छी सरकारी नौकरी है.
शादी कर भी ली तो तुम्हें कोई आर्थिक समस्या नहीं होगी.’’‘‘मैं कोशिश करता हूं.’’ और लड़के ने कोशिश की. घर में झूठ बोला और अपनी मां से इंटरव्यू देने जाने के नाम पर रुपए ले कर दिल्ली चला गया. पिताजी घर पर होते तो कहते दिखाओ इंटरव्यू लैटर.

लौटने पर पूछेंगे तो कह दूंगा कि गिर गया कहीं या हो सकता है कि लौटने पर सीधे शादी की ही खबर दें. लड़का दिल्ली पहुंचा 6 घंटे का सफर कर के.घर पर तो जा नहीं सकते. घर का पता भी नहीं लिखा रहता है फेसबुक पर. सिर्फ शहर का नाम रहता है.

यह पहले ही तय हो गया था कि दिल्ली पहुंच कर लड़का फोन करेगा. और लड़के ने फोन कर के पूछा, ‘‘कहां मिलेगी?’’‘‘कहां हो तुम अभी?’’‘‘स्टेशन के पास एक बहुत बड़ा कौफी हाउस है.’’‘‘मैं वहीं पहुंच रही हूं.’’लड़के के दिल की धड़कनें बढ़ने लगीं. उस के सामने लड़की का सुंदर चेहरा घूमने लगा. लड़के ने मन ही मन कहा, ‘‘कदकाठी अच्छी हो तो सोने पर सुहागा.’’

ऐसे में दूसरे शहर की वीर, साहसी, दलबल, विचारधारा, जाति, धर्म सब देखते हुए जिस में चेहरे का मनोहारी चित्र तो प्रमुख है ही, फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजी जाती है और लड़की की तरफ से भी तभी स्वीकृति मिलती है जब उस ने सारा स्टेटस, फोटो, योग्यता, धर्म, जाति आदि सब देख लिया हो. और वह भी किसी कमजोर व एकांत क्षणों से गुजरती हुई आगे बढ़ती गई हो.

लड़की क्यों इतना डूबती जाती है, आगे बढ़ती जाती है. शायद तलाश हो प्रेम की, सच्चे साथी की. उसे जरूरत हो जीवन की तीखी धूप में ठंडे साए की.और जब बराबर लड़की की तरफ से उत्तर और प्रश्न दोनों हो रहे हो. मजाक के साथ, ‘‘मेरे मोबाइल में बेलैंस डलवा सकते हो?’’ और लड़के ने तुरंत ‘‘हां’’ कहा. लड़की ने हंस कर कहा कि मजाक कर रही हूं.

तुम तो इसलिए भी तैयार हो गए कि इस बहाने मोबाइल नंबर मिल जाएगा. चाहिए नंबर?‘‘हां.’’‘‘क्यों?’’‘‘बात करने के लिए.’’‘‘लेकिन समय, जो मैं बताऊं.’’‘‘मंजूर है.’’और लड़की ने नंबर भी भेज दिया. अब मोबाबल पर भी अकसर बातें होने लगीं. बातों से ज्यादा एसएमएस. बात भी हो जाए और किसी को पता भी न चले. बातें होती रहीं और एक दिन लड़की की तरफ से एसएमएस आया.‘‘कुछ पूछूं?’’‘‘पूछो.’’‘‘एक लड़की में क्या जरूरी है?’’‘‘मैं समझ नहीं.’’‘‘सूरत या सीरत?’’लड़के को किताबी उत्तर ही देना था हालांकि देखी सूरत ही जाती है.

सिद्धांत के अनुसार वही उत्तर सही भी था. लड़के ने कहा, ‘‘सीरत.’’‘‘क्या तुम मानते हो कि प्यार में उम्र कोई माने नहीं रखती?’’‘‘हां,’’ लड़के ने वही किताबी उत्तर दिया.‘‘क्या तुम मानते हो कि सूरत के कोई माने नहीं होते प्यार में?’’‘‘हां,’’ वही थ्योरी वाला उत्तर.और इन एसएमएस के बाद पता नहीं लड़की ने क्या परखा, क्या जांचा और अगला एसएमएस कर दिया.

‘‘आई लव यू.’’लड़के की खुशी का ठिकाना न रहा. यही तो चाहता था वह. कमैंट्स, शेयर, लाइक और इतनी सारी बातें, इतना घुमावफिराव इसलिए ही तो था.

लड़के ने फौरन जवाब दिया, ‘‘लव यू टू.’’ रात में दोनों की एसएमएस से थोड़ीबहुत बातचीत होती थी, लेकिन इस बार बात थोड़ी ज्यादा हुई. लड़की ने एसएमएस किया, ‘‘तुम्हारी फैंटेसी क्या है?’’‘‘फैंटेसी मतलब?’’‘‘किस का चेहरा याद कर के अपनी कल्पना में उस के साथ सैक्स…’’लड़के को उम्मीद नहीं थी कि लड़की अपनी तरफ से सैक्स की बातें शुरू करेगी, लेकिन उसे मजा आ रहा था.

कुछ देर वह चुप रहा. फिर उस ने उत्तर दिया, ‘‘श्रद्धा कपूर और तुम.’’लड़की की तरफ से उत्तर आया, ‘‘शाहरुख.’’फिर एक एसएमएस आया, ‘‘आज तुम मेरे साथ करो.’’ लड़की शायद भूल गई थी उस ने जो चेहरा फेसबुक पर लगाया है वह उस का नहीं है. एसएमएस में लड़की ने आगे लिखा था, ‘‘और मैं तुम्हारे साथ.’’‘‘हां, ठीक है,’’ लड़के का एसएमएस पर जवाब था.‘‘ठीक है क्या? शुरू करो, इतनी रात को तो तुम बिस्तर पर अपने कमरे में ही होंगे न.’’‘‘हां, और तुम?’’‘‘ऐसे मैसेज बंद कमरे से ही किए जाते हैं. ये सब करते हुए हम अपने मोबाइल चालू रख कर अपने एहसास आवाज के जरिए एकदूसरे तक पहुंचाएंगे.’’‘‘ठीक है,’’ लड़के ने कहा. फिर उस ने अपने अंडरवियर के अंदर हाथ डाला. उधर से लड़की की आवाजें आनी शुरू हुईं. बेहद मादक सिसकारियां.

फिर धीरेधीरे लड़के के कानों में ऐसी आवाजें आने लगीं मानो बहुत तेज आंधी चल रही हो. आंधियों का शोर बढ़ता गया.लड़के की आवाजें भी लड़की के कानों में पहुंच रही थीं, ‘‘तुम कितनी सुंदर हो. जब से तुम्हें देखा है तभी से प्यार हो गया. मैं ने तुम्हें बताया नहीं. अब श्रद्धा के साथ नहीं, तुम्हारे साथ सैक्स करता हूं इमेजिन कर के.

काश, किसी दिन सचमुच तुम्हारे साथ सैक्स करने का मौका मिले.’’लड़की की आंधीतूफान की रफ्तार बढ़ती गई, ‘‘जल्दी ही मिलेंगे फिर जो करना हो, कर लेना.’’थोड़ी देर में दोनों शांत हो गए. लेकिन अब लड़का सैक्स की मांग और मिलने की बात करने लगा. जिस के लिए लड़की ने कहा, ‘‘मैं तैयार हूं. तुम दिल्ली आ सकते हो. हम पहले मिल लेते हैं वहीं से किसी होटल चलें चलेंगे.’’

लड़के ने कहा, ‘‘मुझे घर वालों से झूठ बोलना पड़ेगा और पैसों का इंतजाम भी करना पड़ेगा. हां, संबंध बनने के बाद शादी के लिए तुरंत मत कहना. मैं अभी कालेज कर रहा हूं. प्राइवेट जौब में पैसा कम मिलेगा. और आसानी से मिलता भी नहीं है काम, लेकिन मेरी कोशिश रहेगी कि…’’ लड़की ने बात काटते हुए कहा, ‘‘तुम आ जाओ. पैसों की चिंता मत करो. मेरे पास अच्छी सरकारी नौकरी है.

शादी कर भी ली तो तुम्हें कोई आर्थिक समस्या नहीं होगी.’’‘‘मैं कोशिश करता हूं.’’ और लड़के ने कोशिश की. घर में झूठ बोला और अपनी मां से इंटरव्यू देने जाने के नाम पर रुपए ले कर दिल्ली चला गया. पिताजी घर पर होते तो कहते दिखाओ इंटरव्यू लैटर. लौटने पर पूछेंगे तो कह दूंगा कि गिर गया कहीं या हो सकता है कि लौटने पर सीधे शादी की ही खबर दें.

लड़का दिल्ली पहुंचा 6 घंटे का सफर कर के.घर पर तो जा नहीं सकते. घर का पता भी नहीं लिखा रहता है फेसबुक पर. सिर्फ शहर का नाम रहता है. यह पहले ही तय हो गया था कि दिल्ली पहुंच कर लड़का फोन करेगा. और लड़के ने फोन कर के पूछा, ‘‘कहां मिलेगी?’’‘‘कहां हो तुम अभी?’’‘‘स्टेशन के पास एक बहुत बड़ा कौफी हाउस है.’’‘‘मैं वहीं पहुंच रही हूं.’’लड़के के दिल की धड़कनें बढ़ने लगीं. उस के सामने लड़की का सुंदर चेहरा घूमने लगा. लड़के ने मन ही मन कहा, ‘‘कदकाठी अच्छी हो तो सोने पर सुहागा.’’

घर पर बनाएं चटपटे बनाना कबाब और ककड़ी के अप्पे.

रोज-रोज एक ही तरह का खाना खा कर पक गए हैं. खाना खाने को लेकर बच्चों ने नाक में दम कर रखी है. आप परेशान हो गए रोज नया क्या बनाएं, तो चिंता छड़िए गृहशोभा की खास फूड रेसिपी को नोट कर लें. आज ही अपने घर में बनाएं चटपटे बनाना कबाब और ककड़ी के अप्पे. आइए रेसिपी देखते है.

  1. चटपटे बनाना कबाब

सामग्री

 1.   6 कच्चे केले 

 2. 1/2 कप आलू उबले मैश किए

 3.  2 बड़े चम्मच मैदा 

 4. 1 कप ब्रैडक्रंब्स

 5. 1/4 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर 

 6. 1/2 छोटा चम्मच जीरा पाउडर 

 7. 1 छोटा चम्मच चाटमसाला

 8.  2 हरीमिर्चे बारीक कटी 

 9.  1 छोटा चम्मच अनारदाना दरदरा 

 10.  तेल तलने के लिए

 11. नमक स्वादानुसार.

विधि

केलों को आधा उबालें और छील कर मैश कर के आलू के साथ मिला लें. हरीमिर्च व सारे मसाले भी इन के साथ अच्छी तरह मिला लें. तैयार मिश्रण से नीबू के आकार की बौल्स बनाएं और दबा कर कबाब बना लें. मैदे में 4 बड़े चम्मच पानी मिला कर घोल बना लें. कड़ाही में तेल गरम करें. 1-1 कबाब को मैदे के घोल में डुबो कर ब्रैड क्रंब्स में रोल कर के मध्यम आंच पर उलटपलट कर सुनहरा होने तक तलें. चटपटे बनाना कबाब तैयार हैं. इन्हें छोले या चटनी के साथ गरमगरम सर्व करें.

2. ककड़ी के अप्पे

सामग्री

1.   2 कप ककड़ी कद्दूकस की 

 2. 1 कप सूजी

3.  1/2 कप दही 

4. 2 बड़े चम्मच पालक कटा

5.  2 हरीमिर्चें कटी द्य

6.  1 छोटा चम्मच अदरक कटा

7. 1/2 छोटा चम्मच चाटमसाला

8.  1/2 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर 

9. 1/4 छोटा चम्मच बेकिंग सोडा 

10. 1 बड़ा चम्मच तेल

11. नमक स्वादानुसार.

विधि

कद्दूकस की ककड़ी एक बाउल में डाल कर सूजी और दही के साथ मिला लें. तेल, प्याज, टोमैटो सौस और बेकिंग सोडा छोड़ कर बाकी सारी सामग्री इस में अच्छी तरह मिला कर 15 मिनट के लिए रख दें. अब अप्पा पैन के सभी खानों में 2-2 बूंद तेल डालें. ककड़ी के मिश्रण में बेकिंग सोडा मिला कर 1-1 बड़ा चम्मच इन में डालें. ढक कर 2-3 मिनट तक धीमी आंच पर पकाएं. प्रत्येक अप्पे पर 2-2 बूंद तेल टपका कर पलटें. 2 मिनट और बिना ढके पकाएं. प्याज और टोमैटो सौस के साथ सर्व करें.

असफलता से मिली सीख खोलती है जीत का रास्ता

हर किसी व्यक्ति को अपने जीवन में कभी ना कभी हार का सामना करना ही पड़ता है फिर वह चाहें करियर में हो बिज़नेस में हो, किसी रिश्ते में हो या जीवन की किसी भी परिस्थिति में. लेकिन यह हार हमें कुछ ना कुछ नया सबक अवश्य सिखाती है और अक्सर वहीं लोग अधिक कामयाब होते हैं जो अपनी हार से सीख लेते हैं ना की अपनी किस्मत को कोसते हैं. वृंद सतसई का दोहा, करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान. रसरी आवत-जात ते सिल पर पड़त निशान. इस बात के लिए बिलकुल सटीक हैं कि यदि हम असफलता के बाद भी निरंतर प्रयास करते हैं तो कठिन से कठिन  कार्य भी आसान बन जाता है इसलिए जरूरी  हैं कि अपनी  गलतियों से सीख लें  और जीवन में सकरात्मक  सोच के साथ आगे बढ़ते रहें. क्योंकि आपकी सही सोच आपके लक्ष्य को पाने में मदद करती है.तो चलिए जानते हैं कुछ ऐसे टिप्स एंड ट्रिक्स जो आपको सफल बनाने में मदद करते हैं.

गलतियों से लें सीख

यदि हम अपनी हार को खुद पर हावी कर लेते हैं तो हमें सिर्फ निराशा ही हाथ लगती हैं लेकिन यदि अतीत में की गई  गलती से हम सबक लेते हैं तो निश्चित ही कामयाबी एक ना एक दिन हमारे कदम चूमती हैं. इसलिए अपने अतीत में की गई  गलती का पछतावा न करें  बल्कि अपनी खामियों और खूबियों को जाने व उन पर और काम करें व सकरात्मक  बदलाव के साथ आगे बढ़े.

डरना मना है

एक मूवी का बहुत ही फेमस डायलॉग हैं “जो डर गया सो मर गया ” और यह सही भी है जो इंसान डर  के सामने घुटने टेक लेता है और पीछे हट जाता है वो अपना आत्म विश्वाश बिलकुल खो देता है रोजमर्रा के कामकाजों तक में निर्णय लेने में वह असहज महसूस करते हैं  इसलिए जरूरी है कि  असफलता से डरें नहीं बल्कि डट कर सामना करें और सफल बने.

अपने सपने का पीछा करें

परिस्थिति कोई भी हो लेकिन असफलता मिलने पर हमें अपने सपनो को बिखरने  नहीं देना चाहिए बल्कि अपने अनुभवों से सीख लेनी चाहिए क्योंकि दोबारा प्रयास करतें समय आपकी शुरुआत शून्य से नहीं बल्कि अनुभव से होती है. इसलिए अपने सपने को पूरा करे बिना हार न  माने.

कम्फर्ट ज़ोन से हट कर कुछ नया करो

असफलता  हमें सिखाती है  कि हमें अपने कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकल कर कुछ अलग कुछ नया करना है कुछ लोग किसी भी काम को करने से पहले ही उससे डरने लगते हैं लेकिन हमें नकरात्मक विचारों को त्याग कर  सकरात्मक सोच के साथ कुछ नया करने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि जब तक  नया करने की कोशिश नहीं करेंगे तब तक हम आगे नहीं बढ़ सकते. साथ ही हमें कभी भी किसी और के जीवन से खुद की तुलना नहीं करनी चाहिए क्योंकि हर किसी व्यक्ति की क्षमता अलग होती है.

अक्षरज्ञान ही नहीं जूनून भी है जरूरी

हमें सफल बनने के लिए केवल डिग्री की आवश्यकता नहीं होती बल्कि जूनून की अवश्यकता होना बेहद  जरूरी है. कुछ लोग बिना किसी डिग्री के भी कामयाब होते हैं तो कुछ लोग पढ़े लिखें होने के बाद भी नाकामयाब रहते हैं सफलता के लिए, इंसान के अंदर जूनून और आगे बढ़ने की भूख होनी चाहिए. फिर कामयाबी आपके कदम अवश्य  चूमेगी.

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