अपनापन: भाग 3-मोनिका को विनय की सेक्रेटरी क्यों पसंद नहीं थी?

लेकिन मेरी तो आंखें आत्मग्लानि के कारण ऊपर नहीं उठ रही थीं. बिना किसी को ठीक से जानेपहचाने हम कैसे उस के बारे में ऐसीवैसी धारणा बना लेते हैं? मोनिका के काम करने के तरीके, उस की झट से सही निर्णय लेने की योग्यता और उस के व्यवहार ने एक ही नजर में जब मुझे इतना प्रभावित कर दिया है, तो अगर दिन भर इस के साथ काम करने वाले विनय इस की तारीफ करते हैं तो उस में गलत क्या है? मैं तो बस मूरत बनी उसे सुन रही थी और देख रही थी.

मैं अंकित के पास जाने के लिए उठी ही थी कि जय बोला, ‘‘अब घबराने की कोई बात नहीं. बच्चों को तो चोटें लगती ही रहती हैं. थोड़ी देर बाद हम उसे घर ले जाएंगे. 2-4 दिन आराम करेगा, आप की देखरेख में रहेगा तो जल्दी ही भलाचंगा हो कर दौड़ने लगेगा.’’

कितना अपनापन, कितना माधुर्य, कितनी सांत्वना थी उस के शब्दों में.

‘‘आप की तो सारी शर्ट ही खराब हो गई है,’’ जय की शर्ट पर लगे अंकित के खून के धब्बे देख कर मैं ने कहा.

‘‘कोई बात नहीं, अंकित के सामने शर्ट क्या महत्त्व रखती है? वैसे भी मैं इसे बहुत पहन चुका हूं. अब अलमारी से बाहर करने ही वाला था,’’ वह कितने अपनत्व से बात टाल गया था जबकि साफ नजर आ रहा था कि शर्ट नई भले ही नहीं थी, लेकिन बहुत अच्छी हालत में थी.

तभी नर्स ने बाहर आ कर हमें पुकारा. मैं जय के साथ अंदर गई. डाक्टर ने कुछ जरूरी दवाएं लिखीं और अंकित को कुछ दिन आराम करने की हिदायत दे कर उसे ले जाने के लिए कह दिया.

घर पहुंचते ही अंकित को बिस्तर पर ठीक से लेटा कर मैं ने उस को धन्यवाद करते हुए उसे 1 कप चाय के लिए रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वह नहीं रुका.

अंकित नीम बेहोशी की हालत में सो रहा था. सारा घर बिखरा पड़ा था. यहां तक की बैडरूम में टूटे कांच के बहुत से टुकड़े भी बिखरे पड़े थे. लेकिन मेरा किसी काम में मन ही नहीं लग रहा था. रहरह कर एक ही विचार मन में आ रहा था कि आज जय समय पर न आता या मोनिका पल भर में हमारी मदद के लिए इतना सब न सोचती तो कितना बड़ा अनर्थ हो सकता था. फोन अगर विनय भी उठाते तो भी वे इतनी जल्दी घर नहीं पहुंच सकते थे, क्योंकि उन का औफिस घर से दूर है.

कांच के उन टुकड़ों को उठाते हुए मुझे ऐसा लग रहा था जैसे वे मोनिका के कारण मेरे और विनय के बीच खिंची दीवार के टुकडे़ हैं, जो मोनिका से मिलने के बाद टूट कर बिखर गई है. उन टुकड़ों को बीनते हुए 1-1 टुकड़े में मुझे अपना बड़ा ही भद्दा अक्स दिखाई दे रहा था. मैं ने जल्दी से उन्हें इकट्ठा कर के घर से दूर फेंक दिया, लेकिन यह नहीं समझ पा रही थी कि मैं विनय का सामना कैसे करूंगी?

अंकित अब ठीक हो गया है. मैं ने घर पूरी तरह से सैट कर लिया है. मेरे विशेष आग्रह पर जय और मोनिका आज हमारे घर डिनर पर आ रहे हैं. मैं ने अपने हाथों से तरहतरह के व्यंजन तैयार किए हैं. अब मोनिका के बारे में मेरी सोच बिलकुल बदल गई है. दूसरे शब्दों में कहूं तो मोनिका ने ही अपने व्यवहार से मुझे ऐसा करने पर मजबूर कर दिया है. औरत हूं न, ईर्ष्या होना स्वाभाविक है.

लेकिन सच कहूं तो किसी से बिना मिले, बिना जाने हमें किसी के बारे में कोई राय नहीं बनानी चाहिए. मैं कितनी गलत थी, यह सोचसोच कर मन आत्मग्लानि से भर जाता है. उस दिन की घटना ने मेरी समझ पर पड़ा नासमझ का परदा हटा कर मुझे एक नई सोच दी है. एक ऐसी नजर दी है जिस से व्यक्ति की सही पहचान कर सकूं.

मैं यह सब सोच ही रही थी कि दरवाजे की घंटी बज उठी. दरवाजा खोला तो जय और मोनिका हाथों में फूलों का बहुत ही सुंदर गुलदस्ता और अंकित के लिए गिफ्ट लिए मुसकराते हुए खड़े थे. वे हम सब से बड़े प्यार से मिले.

दोनों की शादी को अभी 2 वर्ष ही हुए हैं, लेकिन दोनों में आपसी प्यार और समझबूझ देखते ही बनती है. थोड़ी देर बाद जय और विनय ड्राइंगरूम में बैठ गए. मोनिका मेरे पास किचन में आ गई. हालांकि सब कुछ तैयार था फिर भी क्रौकरी सैट करने और खाना लगाने में मेरे बारबार मना करने पर भी वह मेरा हाथ बंटाती रही और बातचीत भी करती रही.

देर तक घुलमिल कर बातें करते हुए वह एकाएक बोली, ‘‘अगर आप को बुरा न लगे तो क्या मैं आप को भाभी कह सकती हूं?’’

इस से पहले कि मैं कुछ बोलती वह झेंपते हुए बोली, ‘‘यह तो मैं ऐसे ही कह रही थी, क्योंकि मेरा कोई भाई नहीं है न…फिर भी अगर आप को…’’ कहतेकहते वह रुक गई.

‘‘मुझे भला क्यों बुरा लगेगा? तुम बिलकुल मुझे भाभी कह सकती हो. विनय तो इकलौते हैं न, इसलिए मेरी ससुराल मेरे सिर्फ बूढ़े सासससुर हैं. वे भी गांव में रहते हैं. इसी बहाने कोई अपना यहां भी होगा,’’ कहते हुए मैं ने उसे गले से लगा लिया. सचमुच एक जादू सा था उस के व्यक्तित्व में.

अब घर चल : जब रिनी के सपनों पर फिरा पानी

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क्यों जरूरी है बौडी पौलिशिंग

दमकता और चमकता शरीर कौन नहीं चाहता. लेकिन बदलते मौसम के साथ शरीर खुद को जल्दी एडजस्ट नहीं कर पाता, जिस कारण कभी रूखी, कभी औयली, कभी बेजान, कभी टैनिंग स्किन हो जाती है. ऐसे में जरूरी है हर बदलते मौसम के साथ बौडी पौलिशिंग करवाने की.

गरमी के मौसम में पूरे शरीर की रंगत एकजैसी नहीं रहती. त्वचा पर कहीं ब्लैक पैचेज बन जाते हैं, तो कहीं त्वचा सन टैन हो जाती है. बहुत देर एसी में बैठने से त्वचा का मौइश्चराइजर कम होने लगता है, जिस से त्वचा शुष्क लगने लगती है. ऐसे में बौडी पौलिशिंग करा कर त्वचा का ग्लो वापस पाया जा सकता है. आइए, बौडी पौलिशिंग के बारे में विस्तार से जानते हैं :

क्या-क्या होता है प्रयोग

बौडी पौलिशिंग में पूरे शरीर की पौलिशिंग की जाती है. इस के लिए खास तरह के प्रोडक्ट्स प्रयोग किए जाते हैं, जैसे बौडी क्रीम, बौडी औयल, बौडी सौल्ट, बाम, बौडी पैक, ऐक्सफौलिऐशन क्रीम आदि.

बौडी स्क्रब भी पौलिशिंग का एक हिस्सा है. इस से त्वचा के रोमछिद्रों की गंदगी भी साफ हो जाती है. फलों के तेल, फलों के बीज के टुकड़ों या ओटमील से बना स्क्रब त्वचा की रंगत को निखारने में सहायक होता है.

इन के अलावा कुछ खास फूलों का जूस भी शरीर पर लगाया जाता है. फूलों के जूस में आर्किड फ्लौवर्स का जूस खासकर प्रयोग किया जाता है. यह बौडी पर मैडिसिन का काम करता है, क्योंकि इस से दाने व फुंसियां आदि ठीक हो जाते हैं. यह पूरी तरह प्राकृतिक उपचार होता है, इसलिए शरीर पर इस का कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता.

पौलिशिंग का प्रोसैस

बौडी पौलिशिंग में सब से पहले शरीर की नौर्मल क्लींजिंग की जाती है. उस के बाद पूरे शरीर को स्क्रब किया जाता है. यह स्क्रब चेहरे पर प्रयोग होने वाले स्क्रब से सौफ्ट होता है और बिलकुल हलके हाथों से शरीर पर किया जाता है. इस से शरीर की डैड स्किन निकल जाती है और शरीर साफ हो जाता है. इस के बाद स्टीमर से स्टीम दी जाती है. स्टीम देने के बाद बाम, नीबू या वैजिटेबल जूस, पपीता, टमाटर, संतरे आदि से शरीर की मसाज की जाती है.

फिर अल्ट्रासोनिक मशीन से विटामिन व न्यूट्रिशंस त्वचा में पहुंचाए जाते हैं. इस के बाद औयल क्रीम से मसाज करने पर शरीर स्मूद हो जाता है और आप रिलैक्स फील करती हैं. चूंकि शरीर को क्लींजिंग, स्क्रब व मसाज देने से शरीर के रोमछिद्र खुल जाते हैं, इसलिए पूरे शरीर पर पैक लगा कर शरीर को फौयल पेपर से रैप कर दिया जाता है और उस के ऊपर गरम पानी में भीगा व निचोड़ा तौलिया लपेटा जाता है. शरीर को 20 मिनट के लिए ऐसे ही छोड़ देते हैं. इस के बाद शरीर को साफ कर के एसपीएफ क्रीम लगाई जाती है. इस पूरे प्रोसैस में 2-3 घंटे का समय लगता है.

पौलिशिंग के प्रकार

ब्राउनशुगर और जोजोबा औयल : ब्राउनशुगर और जोजोबा औयल की समान मात्रा में विटामिन ई के कैप्सूल डाल कर जो मिश्रण तैयार किया जाता है, उस से अगर पौलिशिंग की जाए तो त्वचा में प्राकृतिक नमी बरकरार रहती है.

  1. स्ट्राबैरी और शुगर 

स्ट्राबैरी और शुगर का स्क्रब, जिस में औलिव औयल की समान मात्रा हो, का शरीर पर उपयोग किया जाता है.

2. बेकिंग सोडा और ऐलोवेरा 

बौडी पौलिशिंग के लिए बेकिंग सोडा और ऐलोवेरा का भी उपयोग किया जाता है. बेकिंग सोडा एक्ने और मुंहासे दूर करने का काम करता है, ऐलोवेरा शरीर की प्राकृतिक मौइश्चराइजिंग का काम करता है.

3. हर्बल

इस के लिए तैयार किए जाने वाले पौलिशिंग मैटीरियल में रोजमैरी, लैवेंडर या त्वचा के प्रकार के अनुसार हर्बल औयल मिलाया जाता है. पौलिशिंग के दौरान शरीर तो तरोताजा हो ही जाता है, हर्बल औयल की प्राकृतिक सुगंध मन को खुशनुमा एहसास दिलाती है.

पौलिशिंग के फायदे

बौडी पौलिशिंग के निम्न फायदे हैं:

  •  बौडी पौलिशिंग द्वारा शरीर की फर्स्ट लेयर यानी डैड स्किन हट जाती है.
  •  सैकंड लेयर तक क्रीम पहुंचाई जाती है ताकि शरीर को उचित पोषण मिल सके.
  •   अगर आप स्ट्रैस में हैं, तो इस से आप को रिलैक्स मिलेगा.
  •  पूरी बौडी की रंगत एकजैसी हो जाती है.
  •   शरीर साफ हो जाता है व शाइन करने लगता है.

सावधानियां

बौडी पौलिशिंग कराने के बाद कुछ बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है:

  •   2-3 दिन धूप में न निकलें. अगर जरूरी हो तो पूरा शरीर कवर कर लें.
  •   शरीर पर सनबर्न या अन्य किसी कारण से जलने या चोट के ताजे निशान हों तो पौलिशिंग न कराएं.
  •  पौलिशिंग कराने के लगभग 20 मिनट बाद साधारण पानी से स्नान कर सकती हैं. इस से पौलिशिंग के दौरान शरीर में लगे रह गए पदार्थ साफ हो जाते हैं.

कार्निवोर डाइट के फायदे

आजकल मसल्स बनाने का शौक हर किसी को है इसलिए कार्निवोर डाइट का चलन बढ़ रहा है. चूंकि हाई प्रोटीन डाइट हैल्थ के लिए फायदेमंद मानी जाती है इसलिए लोग हाई प्रोटीन के लिए इन दिनों कार्निवोर डाइट फौलो कर रहे हैं ताकि शरीर में मसल्स को बिल्डअप करने में प्रोटीन अधिक सक्रिय भूमिका निभा पाएं. वजन कम करने और मसल्स बनाने में हाई प्रोटीन और लो कार्ब्स डाइट अहम भूमिका निभाती है.

कार्निवोर डाइट क्या होती है

कार्निवोर डाइट बेहद स्ट्रिक्ट और मुश्किल डाइट होती है जिसे स्ट्रिकली फौलो करना पड़ता है. जो लोग कीटो डाइट नहीं अपना पाते वे भी इस डाइट का चुनाव कर सकते हैं. इस डाइट में केवल ऐसे खाद्यपदार्थों को शामिल किया जाता है जो मांस से संबंधित होते हैं जैसे चिकन, मछली और अंडे. इस डाइट का वजन कम करने और औटोइम्यून स्थिति को सुधारने के लिए प्रयोग किया जाता है. यह हाई प्रोटीन डाइट होने की वजह से मसल्स को तेजी से टोन करती है जिस से व्यक्ति स्लिम और फिट नजर आता है.

  •  कार्निवोर डाइट एक प्रकार की जीरो कार्ब्स डाइट है जिस में प्रोटीन और फैट शामिल किया जाता है.
  •  कार्निवोर डाइट पूरी तरह से मांसाहारी डाइट है. इस से कई हैल्थ प्रौब्लम्स से छुटकारा मिल जाता है.
  •  इस डाइट में लैक्टोज वाले डेयरी पदार्थों के सेवन को खत्म या सीमित करने की सलाह दी जाती है जैसेकि दूध और डेयरी उत्पादों में पाई जाने वाला शुगर इत्यादि.
  • इस डाइट में फल और सब्जियों का पूरी तरह से परहेज किया जाता है.
  • यह डाइट डायबिटिक लोगों की ब्लड शुगर को कंट्रोल करती है क्योंकि हाई प्रोटीन दे कर शरीर को बारबार होने वाली क्रेविंग से बचाया जाता है

कार्निवोर डाइट में इन चीजों से परहेज करने की सलाह दी जाती है जैसे सब्जियां, फल, सीड्स, नट्स, अनाज, पास्ता, अल्कोहल. इस डाइट में मुख्य रूप से मांस से संबंधित फूड आइटम्स को शामिल किया जा सकता है. अंडे, मांस, चिकन, बोन मैरो बोन मैरो सूप, घी, बटर, मछली, क्रेब, प्रान आदि.

कार्निवोर डाइट के फायदे

कार्निवोर डाइट वजन घटाने से ले कर टेस्टोस्टेरौन के हाई लैवल को कंट्रोल करने में भी फायदेमंद हो सकती है. यह एक ऐंटीइनफ्लैमेटरी डाइट होती है जो ऐंग्जौइटी, चिंता, आर्थ्राइटिस, डायबिटीज और मोटापे से छुटकारा दिला सकती है.

कार्निवोर डाइट के नुकसान

  •  इस में फैट, कोलैस्ट्रौल और सोडियम की मात्रा उच्च होती है.
  • कुछ सूक्ष्म पोषक तत्त्वों और लाभकारी चीजों की कमी हो सकती है.
  • शरीर को सही मात्रा में फाइबर नहीं मिल पाता है.

अबौर्शन महिला का हक है

एक एक छोटे क्लीनिक का स्त्रीरोग विभाग का आउटडोर. बाहर एक मेज पर हाउस सर्जन बैठी हैं, अंदर चैंबर में चीफ सर्जन. एक बाब कट बालों और जींसटौप पहने युवती आती है और हाउस सर्जन की मेज पर फाइल रख बिना किसी भूमिका के कहती है, ‘‘मुझे अबौर्शन कराना है.’’

हाउस सर्जन पूछती है, ‘‘अबौर्शन क्यों करवाना चाहती है?’’

‘‘बच्चा नहीं चाहती इसलिए और क्यों?’’ जवाब मिलता.

‘‘नहीं चाहती तो गर्भधारण ही क्यों किया था?’’

‘‘कौन सा चाह कर किया था, यह तो हो गया,’’ फिर थोड़ा    झुं   झलाते हुए बोली, ‘‘आप मु   झे चीफ सर्जन के पास ले चलेंगी?’’

वह युवती चीफ को बताती है, ‘‘मैं एक मल्टी नैशनल कंपनी में ऐग्जीक्यूटिव हूं, विवाह नहीं किया है. अपनी पसंद के लड़के के साथ रह रही हूं. चूक से गर्भ ठहर गया है. अबौर्शन करवाना है.’’

फाइल देख चीफ पूछती है, ‘‘चूक हो गई तो अभी तक क्या रही थी? 20 सप्ताह हो गए.’’

‘‘जी, काम ही ऐसा है. समय ही नहीं मिला. अभी भी दिक्कत है. अगर शनिवार को अबौर्शन कर दें तो सोमवार को औफिस चली जाऊं.’’

उसे मालूम है 20 सप्ताह तक गर्भपात कराना महिला का अधिकार है. वह पहले भी करवा चुकी है. सब जानती है.

चीफ उसे कानून विशेषज्ञ के पास भेज देती है. वे देख कर कहते हैं कि निरोध की असफलता से ठहरा गर्भ गिराना केवल विवाहित महिला में ही मान्य है.

वह बहस करती है कि कानून पढ़ा देते हैं. वह चली जाती है, और पति का नाम लिख दूसरी फाइल बनवाती है और कानून विशेषज्ञ को आ कर बताती है कि चीफ सर्जन मान गई हैं.

अस्पताल ने नई सोनोग्राफ मशीन ली है जिस से थ्री डाइमैंशनल वीडियोग्राफी हो सकती है. महिला उस की लिखित में अनुमती देती है. अबौर्शन होता है, उसका वीडियो बनता है. अबौर्शन के बाद चीफ सर्जन और सभी उसे देखने बैठते हैं. स्क्रीन पर नन्हे शिशु का चित्र उभरता है. हरकत करते नन्हे हाथपांव, बंद पलकें, होंठ, नाकनक्स. नीचे से औजार आता है, बच्चा बचने की कोशिश करता है और उस के बाद आताजाता औजार और छटपटाहट.

चीफ वीडियो बंद करने को कहती है. कहती है कि उस ने सैकड़ों अबौर्शन किए हैं, लेकिन इस में क्या होता है यह देखा पहली बार. जी खराब हो गया. वह तो अब गर्भपात कर ही नहीं पाएगी. फिर थोड़ी देर कुछ सोच कर कहती है, ‘‘यह तो औरत का हक है कि वह कब और कैसे अबौर्शन कराए. सरकार, समाज, अदालत और कानून को हक नहीं कि औरतों के अधिकार को कुचले.’’

फिर मुड़ कर हाउस सर्जन से कहा, ‘‘ऐसे मामलों में ज्यादा मीनमेख न निकाला करो. जब तक औरत की जान को खतरा न हो अबौर्शन कराना उस का हक है जैसे एक औरत का बच्चा पैदा करने का. हमें कोई हक नहीं कि जब तकनीक उपलब्ध है तो हम अपनी मोरैलिटी लोगों पर थोपें. बेकार में एक औरत अनचाहे बच्चेको जन्म देगी तो जिंदगीभर दोनों दुखी ही रहेंगे,’’ कह कर चीफ सर्जन ने अपने चैंबर में जा कर दरवाजा बंद कर लिया.

कंफर्ट फूड की बात ही अलग है

कभी-कभी नॉनवेज फूड खाने की बजाय कुछ ऐसा खाने का मन करता है जो थोड़ा स्पाइसी भी हो और कंफर्ट फूड का मजा भी दे. ऐसे में जैकफ्रूट यानी कटहल से बेहतर भला और कौन सी डिश होगी. कटहल की डिश बनाने का खयाल जैसे ही दिमाग में आता है वैसे ही वो मां के हाथ की बनाई कटहल की सब्जी भी याद आ जाती है. साथ ही याद आती है वो मीठी सी नोकझोंक कि मुझे तो कटहल का बीज ज्यादा परोसना या फिर मुझे तो कटहल सिर्फ चावल के साथ खाना है.

इन सब के बीच मां कैसे स्वाद और मीठी नोकझोंक का संतुलन बना लेती थी, सोच कर आज भी मुस्कुराहट आ ही जाती है.स्वाद की उस याद को फिर से जगाने के लिए कटहल की करी बनाइए और मसालों के संतुलन को सनराइज़ पर छोड़ दीजिए. सनराइज़ गरम मसाला आपकी कटहल करी में स्वाद का ऐसा जादू चलाएगा कि मीठी नोकझोंक का वो दौर डाइनिंग टेबल पर फिर वापस आएगा. कोई राइस के साथ मांगेगा तो कोई कहेगा कि मुझे तो थोड़ा ही मिला. तो आइए, जगाते हैं कटहल करी के स्वाद का जादू.

कटहल करी

सामग्री

1. 500 ग्राम कटहल क्यूब्स में कटा

2. 1/2  चम्मच हल्दी पाउडर

3. प्याज कटे

4. 1 चम्मच अदरकलहसुन का पेस्ट

5. 2 टमाटरों का पेस्ट

6. 1 बड़ा चम्मच सनराइज़ गरम मसाला

7. तेल जरूरतानुसार

8. नमक स्वादानुसार.

विधि

पैन में थोड़ा सा तेल गरम कर कटहल क्यूब्स को हल्का तल लें. अब बचे तेल में प्याज पारदर्शी होने तक भूनें. अदरकलहसुन का पेस्ट भी मिला दें और चलाते हुए भूनें. अब हल्दी और सनराइज़ गरम मसाला मिलाकर धीमी आंच पर तेल छोड़ने तक भूनें. टमाटर का पेस्ट मिलाकर कुछ देर भूनें फिर कटहल क्यूब्स को इसमे मिक्स कर दें. मध्यम आंच पर अच्छी तरह चलाते हुए भूनें. अब नमक और जरूरतानुसार पानी मिलाकर कटहल मुलायम होने तक पकाएं. धनियापत्ती से गार्निश कर लच्छा परांठा या फिर चावल के साथ परोसें.

मौनसून में ऐसे करें घर की देखभाल

चिलचिलाती गरमी के बाद अपने साथ राहत की बरसात ले कर आ गया है मौनसून का मौसम. यह बारिश में भीगी मिट्टी की सौंधी सुगंध के साथ चाय का लुत्फ लेने का दौर है. इस सीजन में वीकैंड के सैरसपाटे पर निकलते ही हर तरफ छाई हरियाली भी आप का मन मोह लेती है फिर चाहे आप पहाड़ों पर जाएं या मैदानों की सैर पर निकलें.दूसरी तरफ बरसात के मौसम की अपनी चुनौतियां भी हैं. कभीकभी बारिश इतनी मूसलाधार होती है कि सड़कें नदियां बन जाती हैं और आप घर से निकल ही नहीं पाते. ऐसे दिनों में वर्क फ्रौम होम से भी काम चलाना पड़ सकता है. बेहतर होगा कि मौनसून के मौसम में आप घर पर ही अपना वर्क स्टेशन तैयार कर लें ताकि जरूरत पड़ने पर काम चल सके.

इस मौसम में गरम सूप और और खुशबूदार कौफी से भरी थर्मस के साथ गरम और ऊर्जावान रहें. अपने पास अतिरिक्त कपड़े और जूते रखें ताकि भले ही बारिश आप का मूड खराब कर दे, लेकिन यह आप का दिन खराब न कर पाए. हर समय पास में एक फोल्डेबल छाता और मच्छर भगाने वाला स्प्रे रखना न भूलें.

  1. मौनसून में रहें खुश

मौनसून के मौसम के दौरान बादलों के घिर आने से मन कभीकभी दबादबा या उदास महसूस कर सकता है. इस स्थिति को दूर भगाने के लिए बेहतर होगा कि आप अपने घर या वर्कस्पेस को उज्ज्वल और रोशनी से भरपूर रखें, रोशनी अपने मानस को खुशी महसूस करने के लिए प्रेरित करती है. फ्लोर लैंप एक शानदार तरीका है.वह न केवल पर्याप्त रोशनी प्रदान करता है बल्कि कमरे को बड़ा और अधिक बड़ा महसूस भी करवाता है. यदि आप का कमरा छोटा है तो आप वौल लैंप या टेबल लैंप लगा सकती हैं. मौसम खुलने पर घर की खिड़कियां खोलें और धूप अंदर आने दें.

2. छोटीछोटी बातों का रखें खयाल

बात जब रहने की जगह को तरोताजा रखने की हो रही है तो छोटीछोटी बातों पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है जैसे नमी सोखने वाली नेफ्थलीन बौल्स. इन बौल्स को प्लास्टिक या कांच के खुले कंटेनर में रखें. आरामदायक और आकर्षक माहौल बनाने के लिए गर्मजोशी भरी पीली रोशनी का विकल्प चुनें, जो कमरे को आरामदायक टच देती है. इस के अलावा नमी को अपनी अलमारी में जाने से रोकने के लिए शटर को फोम टेप या डस्ट सील से सील करें.

जहां तक इलैक्ट्रौनिक गैजेट्स की बात है, तो उन्हें कभी भी खुली हवा में न छोड़ें. नमी निकालने के लिए उन्हें नियमित रूप से चलाती रहें ताकि वे गरम होते रहें. फफूंद से निबटने के लिए अपने सोफे की सतह को गरम करने के लिए वैक्यूम क्लीनर के गरम ब्लोअर का उपयोग करें और फिर इसे सूखे कपड़े से धीरे से पोंछ लें. ये छोटेछोटे लेकिन बहुत कारगर उपाय आप को मौनसून के मौसम में अपने रहने की जगह को स्वच्छ और आकर्षक बनाए रखने में मदद करेंगे.

मौनसून के मौसम में घर की देखभाल के लिए कुछ टिप्स:

  •  भारी परदों के स्थान पर    झीने परदे लगाएं ताकि रोशनी और हवा छनछन कर आती रहे. सूरज की रोशनी न केवल जगह को रोशन करती है, बल्कि कीटाणुओं के विकास को रोक कर इसे प्राकृतिक रूप से साफ भी रखती है. हर हफ्ते अपनी चादरें बदलना याद रखें और नियमित रूप से तौलिए और हाथ तौलिए को नए से बदलें. यह सरल दिनचर्या आप के घर में ताजा और स्वच्छ वातावरण बनाए रखने में मदद करेगी.
  •  मनभावन सुगंध ला कर अपने घर में दुर्गंध से छुटकारा पाएं. गुलाब या लैवेंडर जैसी तरोताजा कर देने वाली सुगंधित मोमबत्तियां या आवश्यक औयल डिफ्यूजर का उपयोग करें. ताजा सुगंध के लिए सूखे फूलों या सुगंधित जड़ीबूटियों से भरे पाउच को अपनी अलमारी, रसोई और जूतों के रैक के पास लटकाएं.द्य बालकनियों के कोनों और किनारों पर सुगंधित कैंडल लगाने से बदबू को हटाने में मदद मिल सकती है. अपने पूरे घर में एक सुंदर खुशबू के लिए उन्हें लिविंगरूम और आसपास के कमरों के बीच में लटकाएं या रखें. यह सरल उपाय आप के घर को मनमोहक खुशबू से भर देंगे और तनाव से भी दूर रखेंगे.
  •  स्टोरेज स्पेस को भी कुछ सरल उपाय अपना कर नमी से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है. जंग से बचने के लिए दरवाजे के कब्जोंजोड़ों आदि पर अच्छी तरह से तेल लगा कर रखें. अपने वार्डरोब को सूखा और ताजा रखने के लिए नेफ्थलीन बौल्स और कपूर आदि  का उपयोग करें. नमी को रोकने के लिए पर्याप्त वैंटीलेशन होना जरूरी है.
  •  अपने वार्डरोब और अलमारियों के बीच स्पेस बनाएं. उन्हें दीवारों से कुछ इंच की दूरी पर रखें खासकर बरसात के मौसम में जब दीवारें नम हो जाती हैं. नमी सोखने के लिए अपनी अलमारी में नेफ्थलीन या कपूर की गोलियां रखें. सिल्वरफिश से बचने के लिए नीम की पत्तियों या लौंग का उपयोग करें.
  •  अपने घर में अच्छी रोशनी वाला और खुशनुमा माहौल बनाएं. फ्लोर लैंप न केवल रोशनी देते हैं बल्कि आप के स्थान को अधिक खुला भी महसूस कराते हैं. यदि पास जगह कम है, तो वौल लैंप और टेबल लैंप को सही जगह पर लगाएं. प्राकृतिक रोशनी आने और अपने घर को रोशन करने के लिए धूप वाले दिनों में अपनी खिड़कियां खोलना न भूलें.
  •  मौनसून के दौरान अपने लकड़ी के फर्नीचर का खयाल रखें. इसे साफ रखने के लिए नियमित रूप से धूल हटाएं और वैक्यूम करें. खासतौर पर नक्काशी वाली सतहों पर दाग बनने से रोकने के लिए धूल    झाड़ना बहुत जरूरी है. अपने लकड़ी के फर्नीचर की सुरक्षा के लिए मौसम रोधी पौलिश लगाएं. ऐसा आउटडोर फर्नीचर चुनें जो बरसात के मौसम का सामना कर सके.
  •  ऐसी तमाम जगहों पर नजर रखें, जहां नमी बन सकती है जैसे फर्श, दीवारों और छतों की दरारों में पौधे उग आने की जांच करें. ये नमी बना सकते हैं. किसी भी तरह की नमी को तुरंत हटाएं और आगे की समस्याओं को रोकने के लिए वाटरपू्रफिंग तकनीक लागू करें.
  •  सुरक्षित रहते हुए बारिश का आनंद लेने के लिए अपनी बालकनी में बैठने की जगह को कवर करें. बाहर पड़े फर्नीचर को बारिश से बचाने के लिए छतरियों या अच्छी क्वालिटी वाली कवरिंग का उपयोग करें. वाटरपू्रफ कुशन, आउटडोर गलीचे और सागौन या ऐल्यूमिनियम जैसी चीजों को अपनाने पर जोर दें.
  •  मौनसून के मौसम में अपने मूड को बेहतर बनाने के लिए प्रेरणा देने वाले रंगों का उपयोग करें. नीरस मौसम में खुश रहने के लिए घर में पीले, नारंगी और हरे जैसे वाइब्रैंट कलर चयन करें. आप फर्नीचर के कवर, परदे या सजावट में इन रंगों को शामिल कर सकती हैं.
  •  कम रखरखाव वाले हाउस प्लांट के साथ अपने घर में इनडोर हरियाली लाएं. ये न केवल हवा को शुद्ध करते हैं बल्कि ताजगी और शांति का एहसास भी दिलाते हैं. फर्न, स्नेक प्लांट या पीस लिली जैसी किस्मों को चुनें जिन्हें बरसात के मौसम में बहुत कम देखभाल की आवश्यकता होती है. प्राकृतिक वातावरण के लिए उन्हें खिड़कियों के पास या ऐसी जगह रखें जहां सूरज की रोशनी आती हो.

हेयर फॉल बहुत हो रहा है, कोई उपाय बताएं?

सवाल

बारिश का मौसम है. मेरे बाल बहुत गिरने लग गए हैं. मैं क्या करूं?

जवाब

बारिश के मौसम में जब बाल बारिश में भीगते हैं तो उन्हें सुखा लेते हैं, धोते नहीं. इस से बालों के बीच में औयल और गंदगी पानी डालने से जमा हो जाती है. इस से इन्फैक्शन या डैंड्रफ होने लग जाता है. इसलिए बाल गिरने लगते हैं. जब भी बाहर से बारिश में भीग कर आएं उस वक्त शैंपू करना जरूरी है ताकि बाल पूरी तरह साफ हो जाएं और इन्फैक्शन का खतरा न रहे. खाने पर ध्यान दें. बाल प्रोटीन से बने होते हैं. अत: खाने में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाएं ताकि बालों को पूरा न्यूट्रिशन मिले और वे गिरने बंद हो जाएं. औयली हेयर हैं तो हेयर टौनिक से उन की मसाज करें. यदि बाल ड्राई हों तो अनियन सीड हेयर औयल से  मसाज करने से बाल गिरना कम हो जाते हैं.

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मेरी चिन पर बहुत बाल उग आए हैं जो दाढ़ी जैसे लगते हैं. घर से बाहर निकलना अच्छा नहीं लगता और पीसीओडी की समस्या भी है. मैं क्या करूं?

जवाब

आप ने अपनी समस्या का कारण खुद ही बता दिया है. आप की बालों की समस्या के पीछे पीसीओडी ही है. पीसीओडी में आप की ओवरी में सिस्ट बन जाता है जिस से हारमोंस इंबैलेंस हो जाते हैं. इसी वजह से फेस पर बाल आने लगते हैं. आप को डाक्टर से मिल कर आयुर्वेदिक या होम्योपैथिक दवा लेनी चाहिए. बालों को हटाने के लिए इंटेंस पल्स लाइट या लेजर ट्रीटमैंट कराना अच्छा रहेगा. 6 से 8 सिटिंग्स के बीच में आप के बाल इतने कम हो जाएंगे कि दिखाई नहीं देंगे. आप चाहें तो कभीकभी ब्लीच भी कर सकती हैं ताकि वह बिलकुल दिखाई न दे.

समस्याओं के समाधान ऐल्प्स ब्यूटी क्लीनिक की फाउंडर, डाइरैक्टर डा. भारती तनेजा द्वारा
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बिन सजनी घर: मौली के मायके जाने के बाद समीर का क्या हुआ

टिंगटौंग, टिंगटौंग…लगातार बजती दरवाजे की घंटी से समीर हड़बड़ा कर उठ बैठा. रात पत्नी मौली को मुंबई के लिए रवाना कर एयरपोर्ट से लौटा तो घोड़े बेच कर सोया था. आज दूसरा शनिवार था, औफिस की छुट्टी जो थी, देर तक सोने का प्लान किस कमबख्त ने भंग कर दिया. वह अनमनाया सा स्लीपर के लिए नीचे झुका, तो रात में उतार फेंके बेतरतीब पड़े जूतेमोजे ही नजर आए. घंटी बजे जा रही थी, साथ ही मेड की आवाज-

‘‘अब जा रही हूं मैं, साहब, 2 बार पहले भी लौट चुकी हूं.’’ समीर ने घड़ी देखी, उफ, 10 बज गए, मर गया, ‘‘अरे रुको, रुको, आता हूं.’’ वह नंगेपांव ही भागा. मोजे के नीचे बोतल का ढक्कन, जो कल पानी पी कर बेफिक्री से फेंक दिया था, पांव के नीचे आया और वह घिसटता हुआ सीधा दरवाजे से जा टकराया. माथा सहलाते हुए दरवाजा खोला, तो मेड ने गमले के पास पड़ी दूध की थैली और अखबार उसे थमा दिए.

‘‘क्या साहब, चोट लगी क्या?’’ खिसियाया सा ‘कोई नहीं’ के अंदाज में उस ने सिर हिलाया था. ‘‘मैं तो अब वापस घर को जाने वाली थी,’’ कह कर रामकली ने दांत निपोरे, ‘‘घर पर बच्चे खाने के लिए बैठे होंगे.’’

‘‘अरे मुझे क्यों थमा रही है, बाकी काम बाद में करना, पहले मुझे चाय बना दे और यह दूध भी उबाल दे. बाकी मैं कर लूंगा,’’ समीर माथा सहलाते स्लीपर ढूंढ़ता बाथरूम की ओर बढ़ गया. चाय तैयार थी. उस ने टीवी औन किया, न्यूज चैनल लगा, चाय की चुस्कियों के साथ पेपर पढ़ने लगा.

साहब, ‘‘मोटर सुबह नहीं चलाया क्या आप ने, पानी बहुत कम कम आ रहा, ऐसे तो काम करते घंटों लग जाएंगे, साहब.’’ समीर की जबान दांतों के बीच आ गई. शाम को मौली ने मेरे कपड़े धोए थे, बोला भी था कि सुबह मोटर याद से चला लेना वरना पानी नहीं मिलेगा?

‘‘मैं भूल गया, खाली किचेनकिचेन कर लो और जाओ. वैसे भी घर कोई गंदा नहीं रहता. मौली फुजूल में करवाती रहती है सफाई, कुछ ज्यादा ही शौक है उसे.’’ काम खत्म कर मेड जाने को हुई, ‘‘बाहर बालकनी से कपड़े याद से उतार लेना, साहब, अभी सूखे नहीं. बारिश वाला मौसम हो रहा है. दरवाजा बंद कर लो, साहब.’’ वह चली गई.

‘‘ठीक है, ठीक है, जाओ.’’ चलो बला टली. अब आराम से जैसे चाहे रहूंगा. वह सोफे पर कुशन पर कुशन लगा टांगें फैला कर लेट गया. कितना आराम है. वाह, 2 बजे मैच शुरू होने वाला है, अब मजे से देखूंगा. वरना मौली सोफे पर कहां लेटने देती. उस के दिमाग में अचानक आया कि रोहित, जतिन, सैम को भी साथ मैच देखने के लिए बुला लेता हूं, कुछ दिन तो पहले सी आजादी एंजौय करूं.

उस ने कौल किया तो एक के साथ दोदो और आ गए. ‘‘अरे वाह, यार रितेश, विवेक, मोहित तुम भी. अरे वाह, कमाल हो गया, यार, कितने दिनों बाद हम मिले.’’

‘‘तेरी तो शादी क्या हुई, दोस्तों को पराया ही कर दिया, और आज बुलाया है वह भी जब भाभी घर पर नहीं.’’ ‘‘तभी तो हिम्मत पड़ी बेचारे की,’’ सभी हंसने लगे.

‘‘यार, कहां भेज दिया भाभी को?’’ ‘‘और कहां, मुंबई यार, हफ्तेदस दिनों के लिए. मायका भी है और उस की सहेली की शादी भी.’’

‘‘तब तो आजादी, बेटा समीर, 10 दिन मजे कर.’’ ‘‘अच्छा, बोल, चाय या कौफी पीनी है तुम सब को? हां, तो किचेन उधर है और फ्रिज इधर. बना लो मेरे लिए भी.’’ समीर हंसा था.

फिर तो जिस का मन जो आया, जब आया, बनाया, खायापिया. खाना समीर ने बाजार से मंगवा लिया. डायनिंग टेबल तक कोई न गया, वहीं सोफे के पास सैंटर टेबल घसीट कर सब ने खापी लिया. मैच खत्म हुआ तो जीत का जश्न मनाने के लिए पिज्जापेस्ट्री की पार्टी हुई. सारे घर में हर प्रकार के जूठे बरतनों की नुमाइश सी लग गई. खानेपीने के सामान भी मनमरजी से बिखरे पड़े थे जैसे. उन के जाने के बाद समीर का ध्यान घर के बिगड़े नक्शे की ओर गया, शुक्र मनाया कि मौली घर पर नहीं है, वरना इतना एंजौय न कर पाता. वह अभी ही बिखरा हुआ सब सही करवाती. कोई नहीं, कल छुट्टी है. कौन सा औफिस जाना है, मिनटों में सब अस्तव्यस्त ठीक कर लूंगा कल.

तभी बिजली कड़की और घर की लाइट गुल हो गई. घुप अंधेरा. कोई सामान तो ठिकाने पर था नहीं. पौकेट में हाथ डाला तो मोबाइल भी नहीं था, जो टौर्च यूज कर लेता. शायद किचेन में रखी थी. वह तेजी से किचेन की ओर लपका तो टेबल से टकराया और नीचे गिर गया. उस ने उठने के लिए टेबल का सहारा लिया तो फैले रायते में हाथ सन गया. कटोरे का रायता टेबल से नीचे गिर कर कपड़ेजूते पर से होता कारपेट पर फैल गया था. ‘क्या मुसीबत है…चल कोई नहीं, 10 मिनट तो लगेंगे, हो जाएगा सब साफ,’ सोचते हुए सोफा कवर से हाथ साफ कर डाले. फिर ध्यान आया, अरे यार, एक और काम बढ़ा लिया. कोई नहीं, मेड को ऐक्स्ट्रा पैसे दे दूंगा, ऐसी क्या आफत है?

आखिरकार माचिसमोमबत्ती टटोलते हुए सही जगह पहुंच गया. ‘शुक्र है, मिल गई अपनी जगह,’ उस ने राहत की सांस ली, मोमबत्ती जलाई तो उस के चेहरे की मुसकराहट के साथ रोशनी चारों ओर फैल गई.

‘अब साले मेरा खून पी रहा था…’ उस ने पटाक से हाथ पर खून पीते मच्छर को मारा था. मौली 10 दिनों से सचेत कर रही थी समीर को. ‘इन्वर्टर का पानी कब से खत्म है, डाल दो वरना किसी दिन लाइट जाएगी तब पता चलेगा, मोटेमोटे मच्छर काटेंगे, पानी ला कर भी रख दिया.’ याद आया था समीर को. कैंडल एक ओर जमा कर, उस ने पानी डाल कर इन्वर्टर चालू किया, तो लाइट आ गई. कमरा प्रकाश से नहा गया. ‘जय हो मौली श्री की, यार तुम ने बौटल ला कर न रखी होती तो आज ये मच्छर मेरा कचूमर निकाल देते. डेंगू, चिकनगुनिया करवा ही डालते. उफ, नहीं … थैंक्यू मौली डियर.’

प्रकाश में कमरे में बिखरी गंदगी चमकने लगी और कारपेट पर फैला रायता भी. उस का ध्यान अपने कपड़ों की ओर गया. पहले तो इन्हें बदलता हूं…कहां गया वो स्लीपिंग सूट, नाहक ही वह खूंटी पर ढूंढ़ रहा था. वह बैड पर तो सिकुड़ा सा एक ओर पड़ा था जहां सुबह उतार कर फेंका था. मौली थोड़े ही यहां है जो झाड़ कर टांग देती. वह मुसकराया. मौली को याद करते हुए बिस्तर पर औंधा लेट गया.

बादल जोर से कड़के और मूसलाधार बारिश शुरू हो गई. ‘उफ, भूल गया’, हड़बड़ा कर खड़ा हो गया, ‘बालकनी से कपड़े ही नहीं उतारे.’

वह भागा, सारे कपड़े पानी से सराबोर थे. सुबह से कई बार बूंदाबांदी पहले ही झेल चुके थे. थोड़ी गंध सी आने लगी थी कपड़ों में. उस ने नाक सिकोड़ी, ‘उंह, कैसी अजीब गंध है. क्या दिमाग पाया है बेटा समीर, उतारने से फायदा क्या. और धुलने दे इन्हें बारिश के साफ पानी में. चल, सो जा.’ वह कमरे में आ कर वाशरूम गया. वहां तो और सड़ी सी गंध व्याप्त थी. ‘छिछि दिनभर यारों ने जाजा कर यह हाल किया है. शिट…’ फ्लश किया, तो हुआ ही नहीं, पानी ही नहीं था. सुबह

5 बजे मोटर औन करनी ही है बेटा समीर याद से, वरना तो गया काम से…’ वह अलार्म लगा बेफिक्री से सो गया. ‘‘साहब, कितनी गंदगी मचा दी एक दिन में, क्या हाल बना दिया घर का, सारे के सारे बरतन ही निकाल डाले. मुझ से तो न हो पाएगा, साहब. किसी और को बुला लो,’’ रामकली की किटकिट शुरू हो गई थी.

‘‘कोई नहीं, तू कर, हो जाएगा. आज पानी भरा हुआ है, तेजतेज आएगा. मैं सौ रुपए अलग से भी दे दूंगा.’’

रामकली एक घंटे तक काम करते हुए बड़बड़ाती ही रही. ‘जमादार को कूड़ा भी क्यों नहीं दिया, गंध मार रहा है.’ ‘कैसे काम कराती है मौली ऐसी गंवारों से, उफ,’ समीर पेपर ले कर बैठ गया.

‘‘साहब, कारपेट पकड़ लो, आज तो धूप खिली है, बाहर ही साफ कर दूंगी, सूख भी जाएगी. यहां नीचे का फर्श भी साफ हो जाएगा.’’ ‘‘क्या मुसीबत है, चलो जल्दी करो,’’ वह मुंह बनाते हुए उठने लगा.

‘‘साहब, कल के बरतन भी आप ने नहीं समेटे थे, आज के धुले बरतनों से तो पूरा पलेटफौर्म ही भर गया. अच्छे से सहेज लेना, साहब, बहुत संभाल कर धोए हैं, कांच ही कांच, रे बाबा.’’ दोनों कारपेट उठाए हुए धूप में आ गए थे. ‘‘ओ तेरी की, साहब, आप ने तो कपड़े भी नहीं उतारे तार पर से. क्या साहब? सब गंध मारने लगे, फिर से धोने पड़ेंगे, साहबजी.’’

‘‘6 पैंट, 6 शर्टें, स्लीपिंग सूट, चादरें, मौली को अभी ही सब धो कर जाना था, क्या करूंगा, कल तो औफिस है…शिट.’’ ‘‘सब ले जा कर मशीन में ही तो घुमाना है, साहब, ये पकड़ो,’’ उस ने कपड़े उतार कर समीर को पकड़ा दिए और अंदर काम निबटाने चली गई. समीर ने वाश्ंिग मशीन का ढक्कन खोला और सारे कपड़े उस में पटक दिए. पानी व साबुन डाला और मशीन सैट कर चालू कर दी. फोन पर ब्रैड, बटर, अंडे, मैगी और्डर कर के मंगा लिए. रामकली चली गई तो उस ने चल रहा हलका म्यूजिक लाउड कर लिया और अपना नाश्ता बनाने साफ किचेन में एक शेफ के अंदाज में घुसा.

‘आज बनाऊंगा अपना पहले वाला जिंजरगार्लिक औमलेट, करारे बटर टोस्ट और बेहतरीन कौफी. यार, इतने बरतन… मौली ही आ कर रखेगी, पर मैं पैन और चाय के लिए भगौना कहां से ढूंढ़ूं, मिल गया.’ उसे हैंडल दिखा, पकड़ कर जो खींचा, कई सारे बरतन धड़धड़ा कर नीचे गिर गए, जो कांच के थे, टूट गए थे. उस की जबान दांतों के बीच आ गई थी, मौली के मायके के महंगे वाले इंपौर्टेड सैट के 3 कप 2 गिलास एक प्लेट धराशायी पड़े थे. ‘अजब आफत है, कैसे बेतुके रख गई बेवकूफ मेड,’ उस ने पैर से टुकड़े एक ओर किए, बड़े टुकड़े डस्टबिन में डाले और मनोयोग से नाश्ता बनाने जुट गया.

‘वाह, क्या खुशबू है, क्या स्वाद.’ तभी मोबाइल बज उठा. उधर से मौली थी, बोली, ‘‘क्या चल रहा है?’’ ‘‘अभी अपना बढि़या सा ब्रैकफास्ट तैयार किया है, बाद में वेज तड़का मैगी का लंच.’’

‘‘इतनी लेट ब्रैकफास्ट, क्या बनाया शेफ साहब ने, जरा मैं भी तो सुनूं,’’ वह हंसी. ‘‘तुम होती तो हैरान होती, तुम होती तो खुश होती, तुम होती तो ये खाती, तुम होती तो वो…’’ वह अमिताभ बच्चन के डायलौग के अंदाज में बोलते हुए मुसकरा रहा था.

‘‘अच्छाअच्छा, बस. कल की तैयारी कर ली? कपड़े कल प्रैस होने के लिए दे दिए थे न?’’ वह हंसते हुए बोली. उसे ध्यान आया कपड़े, मशीन में कब से पड़े रह गए, भूल ही गया था, मरा…

‘‘हांहां डियर, बस, आता ही होगा चंदू. शायद वही आया, मैं बाद में बात करता हूं.’’ सच बोल कर मरता क्या, उस ने झट से झूठ बोल कर मौली के आगे अपनी साख बना ली. वाश्ंिग मशीन की ओर लपका. पानी ड्रेन आउट होने पर जो देखा, खाना बनाते वक्त लाउड म्यूजिक के शौक ने मार डाला था, कपड़ों पर नजर पड़ी तो सारा मूड खराब हो गया.

उस की नई गुलाबी शर्ट इतरा कर कई कपड़ों पे अपना रंग जमा चुकी थी. उस ने सिर पकड़ लिया. साफ पानी में 2 बार निकाला पर रंग न गया. उस के चेहरे का रंग अलबत्ता उड़ गया. मौली तो बेहद गुस्सा करेगी, बर्थडे पर उस की दी पैंटशर्ट दोनों ही खराब हो गईं. सारे कपड़े जल्दीजल्दी तार पर फैला डाले. इन में से तो कोई कल पहन के जाने लायक नहीं होंगी. कोई पहले की शर्टपैंट ही उस ने छांट कर प्रैस करवा ली. पर इस काम में पूरी अलमारी, पूरे कमरे की ऐसीतैसी हो गई थी. पर वह खुश था, चलो काम तो बन गया. उस ने पास बिखरे कपड़ों में से थोड़ेबहुत उठा कर अलमारी में ठूंस दिए.

शाम को दोस्तों का फिर जमघट लगना था. फिर नाइटशो, किसी इंग्लिश मूवी का प्रोग्राम था. लेकिन उस से पहले उन्हें, वादे अनुसार, अपने हाथों की बनी स्पैशल चिकनबिरयानी खिलानी थी. उस ने सोचा, शान में हांक दिया कि बड़ी अच्छी बनाता हूं. अब फंस गया बेटा समीर. तैयारी कर ले, वरना हो नहीं पाएगा. लगभग 2 घंटे बाद सारा घर ही उस की भीषण तैयारी से बन रही बिरयानी की गवाही दे रहा था. हौल में प्याजलहसुन के छिलके पौलिथीन में पड़े थे. अदरक के छिलके चेस की गोटियां बने टेबल पर चिपके पड़े थे. मौली के संजोए सारे मसाले कैबिनेट से बाहर आ कर गैसस्टोव के अगलबगल पूरे प्लेटफौर्म पर जैसे मार्चपास्ट करने निकले थे.

फ्रिज तो ऐसे मुंहबाए खड़ा था मानो डकैती पड़ गई हो, उस में इक्कादुक्का सामान ही नजर आ रहा था. कई प्रकार के बरतन और टूल्स, यूटेंसिल्स, गजेट इस्तेमाल करने में कोई कोताही नहीं बरती गई थी, जो उन की बेकाबू भीड़ बता रही थी. समीर ने गूंधे आटे का सांप बना बिरयानी के पतीले का मुंह बंद किया तो उस ने कार्य पूरा कर लेने की खुशी में गर्व से चौड़ी मुसकान चेहरे पर फैला ली. घड़ी में 7 बज रहे थे. वह बिरयानी दम पर कर नहाने के लिए बाथरूम में जा घुसा. शावर के नीचे 2 मिनट ही हुए होंगे, दरवाजे की घंटी बजी थी.

तौलिया लपेट कर उस ने दरवाजा खोला था. ‘‘बन गई तेरी बिरयानी? सामान तो खूब फैला रखा है,’’ दोस्तों ने कहा.

‘‘क्यों, लाजवाब खुशबू आ नहीं रही,’’ एक ने चुटकी ली तो सब हंस पड़े. ‘‘बस यार, आने ही वाली है खुशबू. थोड़ा सब्र करो. यार, तुम सब कोल्डडिं्रक निकालो. मैं बस अपने बदन की खुशबू का इंतजाम कर अभी आया,’’ समीर जोरों से हंसा.

पतीले का आटा मुंह खोल चुका था. बिरयानी की खुशबू आने लगी थी. समीर पतीला उठा कर डाइनिंग टेबल पर ही ले आया, ‘‘है न जोरदार खुशबू,’’ वह मुसकराया. किसी ने खीरा, किसी ने प्याज, किसी ने गाजर तो किसी ने टमाटर ढूंढ़ कर काटे, सलाद भी बन गया. सब ने अपनी प्लेटों में चाव से परोसा और खाने बैठ गए.

‘‘कैसी लगी?’’ समीर ने कौलर ऊंचा कर पूछा. ‘‘अबे नमक तो डाला ही नहीं, खुद खा कर देख, मिस्टर लाजवाब,’’ सब हंस पड़े.

‘‘ला भई, नमक ले आ,’’ ऊपर से डालडाल कर सब ने किसी तरह बिरयानी खाई और मूवी के लिए भागे. मूवी से लौट कर समीर ने जूतेमोजे उतारे और वैसे ही कपड़ों में बिस्तर पर पड़े गीले टौवेल के ऊपर ही सो गया. सुबह रामकली आई तो चारों ओर कूड़ा व फैला सामान देख कर उस की किटकिट शुरू हो गई.

‘‘साहब, ऐसे तो मैं काम नहीं कर पाऊंगी, रोजरोज इतना काम, मेमसाहब आ जाएं, तो बुला लेना. मैं जाती हूं.’’ ‘‘अरे, कहां जाती है, मैं दे दूंगा न फालतू पैसे. वो दोस्त आ गए तो क्या करूं, जल्दी निबटाओ, मुझे औफिस भी जाना है.’’

‘‘नहीं साहब, मुझे गांव जाना है, 8 बजे की ट्रेन पकड़नी है. मां की तबीयत खराब है, सोचा था काम जल्दी कर के बोल दूंगी. पर न हो पाएगा, साहब.’’ वह केवल सिंक के बरतन धो कर चली गई थी.

‘तू और तेरी मेमसाहब, चलो छुट्टी…’ मन में बुदबुदाते हुए उस ने दरवाजा बंद किया.

कोई सामान अपनी जगह नहीं था. पानी पीने को फ्रिज खोला तो एक बोतल भी नहीं मिली. बड़ी मुश्किल से वह तैयार हुआ. बाहर ही ब्रैकफास्ट कर लूंगा, कोई नहीं. वह औफिस के लिए निकल गया. औफिस में फोन आया था मौली का. मेरी बड़ी बूआ अपनी बेटी रिंकू को परीक्षा दिलाने के लिए रात की गाड़ी से दिल्ली पहुंच रही हैं. 4 दिन घर पर ही रुकेंगी, मैनेज कर लोगे न, बाद में मैं भी पहुंच ही जाऊंगी.’’ ‘‘हांहां, डोंट वरी,’’ नईनई शादी है यह नहीं बोलता तो मरता क्या.

‘‘थैंक्यू डियर, तुम्हारी पाककला शौक के बारे में सुन कर तुम से बहुत खुश हैं, बूआ, मैं ने उन्हें बताया था.’’ घर लौट कर उस ने अपनी समझ से घर को काफी दुरुस्त किया और लललाला करते हुए बूआजी को स्टेशन लेने चला गया.

चौथे दिन जब मौली ने घर में प्रवेश किया तो उस की चीख निकलतेनिकलते बची, मुंह खुला रह गया. वह फटीफटी आंखों से अपने प्यारे घर को पहचानने की कोशिश कर रही थी. क्या हौल, क्या किचेन, क्या बैडरूम, बाथरूम, देखे नहीं जा रहे थे उस से. अजीब सी गंध से जल्दी ही उस का मुंह क्या, नाक भी सिकुड़ चुकी थी. सुना ही था लोगों से आज देख भी लिया, बिन सजनी घर. ‘बाप रे, कैसे सफाईपसंद बूआ और रिंकू ने यहां 3 दिन गुजारे होंगे. यह क्या किया समीर ने.’

‘‘समीर, दिस इज टू मच, यार,’’ उस ने घर का बिगड़ा नक्शा दिखा कर पूछना चाहा था. ‘‘क्या करता, बदमाश मेड तुम ने रखी थी, छुट्टी ले कर चली गई. मैं क्या करता?’’ खैर, ये सब छोड़ो, बूआजी और रिंकू मार्केट से आती होंगी. तुम फ्रैश हो कर जल्दी आओ और खाना लगाओ, आज तुम्हारी पसंद का सब बाहर से ले आया हूं,’’ वह मुसकराया. मौली के आ जाने से आज वह बेहद खुश, बहुत चैन की सांस ले रहा था. ललललाला करते हुए उस ने लाउड म्यूजिक लगा दिया.

फ्रैश…ऐसे कबाड़ में? फ्रैश होने से पहले तो दसियों काम करने को दिख रहे हैं, समीर.’’ पर समीर को लाउड म्यूजिक में कुछ न सुनाई दिया. मौली ने सैंडल एक ओर कर चुन्नी कमर में बांधी और सब से पहले मेड का नंबर मिला दिया..

एक बार फिर: नवीन से दुखी विनीता आशीष से मिलते ही क्यों मचल उठी?

शाम ढलने लगी थी. तालाब के हिलते पानी में पेड़ों की लंबी छाया भी नाचने लगी थी. तालाब के किनारे बैठी विनीता अपनी सोच में गुम थी. वह 2 दिन पहले ही लखनऊ से वाराणसी अपनी मां से मिलने आई थी, तो आज शाम होते ही अपनी इस प्रिय जगह की ओर पैर अपनेआप बढ़ गए थे.

‘‘अरे, वीनू…’’ इस आवाज को विनीता पीछे मुड़ कर देखे बिना पहचान सकती थी कि कौन है. वह एक झटके से उठ खड़ी हुई. पलटी तो सामने आशीष ही था.

आशीष बोला, ‘‘कैसी हो? कब आईं?’’

‘‘2 दिन पहले,’’ वह स्वयं को संभालती हुई बोली, ‘‘तुम कैसे हो?’’

आशीष ने अपनी चिरपरिचित मुसकराहट के साथ पूछा, ‘‘कैसा दिख रहा हूं?’’

विनीता मुसकरा दी.

‘‘अभी रहोगी न?’’

‘‘परसों जाना है, अब चलती हूं.’’

‘‘थोड़ा रुको.’’

‘‘मां इंतजार कर रही होंगी.’’

‘‘कल इसी समय आओगी यहां?’’

‘‘हां, आऊंगी.’’

‘‘तो फिर कल मिलेंगे.’’

‘‘ठीक है,’’ कह कर विनीता घर चल दी.

घर आते समय विनीता का मन उत्साह से भर उठा. वही एहसास, वही चाहत, वही आकर्षण… यह सब सालों बाद महसूस किया था उस ने. रात को सोने लेटी तो पहला प्यार, जो आशीष के रूप में जीवन में आया था,

याद आ गया. याद आया वह दिन जिस दिन आशीष के दहेजलोभी पिता के कारण उन का पहला प्यार खो गया था. इस के बिना विनीता ने एक लंबा सफर तय कर लिया था. कैसे जी लिया जाता है पहले प्यार के बिना भी, यह वही जान सकता है, जिस ने यह सब झेला हो.

विनीता का मन अतीत में कुलांचें भरने लगा… आशीष के पिता ने एक धनी परिवार की एकमात्र संतान दिव्या से आशीष का विवाह करा कर अपनी जिद पूरी कर ली थी और फिर अपने मातापिता की इच्छा के आगे विनीता ने भी एक आज्ञाकारी बेटी की तरह सिर झुका दिया था.

विवाह की रात विनीता ने जितने आंसू थे आशीष की याद में बहा दिए थे, फिर वह पूरी ईमानदारी के साथ पति नवीन के जीवन में शामिल हो गई थी और आज विवाह के 8 सालों के बाद भी पूरी तरह नवीन और बेटी सिद्धि के साथ गृहस्थी के लिए समर्पित थी. इतने सालों में मायके आने पर 1-2 बार ही आशीष से सामना हुआ था और बात बस औपचारिक हालचाल पर ही खत्म हो गई थी.

कई दिनों से विनीता बहुत उदास थी. घर, पति, बेटी, रिश्तेनाते इन सब में उलझी खुद समय के किस फंदे में उलझी, जान नहीं सकी. अब जान सकी है कि दिलदिमाग के स्तर में समानता न हो तो प्यार की बेल जल्दी सूख जाती है… उसे लगता है दिन ब दिन तरक्की की सीढि़यां चढ़ता नवीन घर में भी अपने को अधिकारी समझने लगा है और पत्नी को अधीनस्थ कर्मचारी… उस की हर बात आदेशात्मक लहजा लिए होती है, फिर चाहे वे अंतरंग पल ही क्यों न हों. आज तक उस के और नवीन के बीच भावनात्मक तालमेल नहीं बैठा था.

नवीन के साथ तो तसल्ली से बैठ कर 2 बातें करने के लिए भी तरस जाती है वह. उसे लगता है जैसे उन का ढीला पड़ गया प्रेमसूत्र बस औपचारिकताओं पर ही टिका रह गया है. नवीन मन की कोमल भावनाओं को व्यक्त करना नहीं जानता. पत्नी की तारीफ करना शायद उस के अहं को चोट पहुंचाता है. विनीता को अब नवीन की हृदयहीनता की आदत सी हो गई थी. अतीत और वर्तमान में विचरते हुए विनीता की कब आंख लग गई, पता ही न चला.

कुछ दिन पहले विनीता के पिता का देहांत हो गया था. अगले दिन सिद्धि को मां के पास छोड़ कर विनीता ‘थोड़ी देर में आती हूं’ कह कर तालाब के किनारे पहुंच गई. आशीष वहां पहले से ही उस की प्रतीक्षा कर रहा था. उस के हाथ में विनीता का मनपसंद नाश्ता था.

विनीता हैरान रह गई, पूछ बैठी, ‘‘तुम्हें आज भी याद है?’’

आशीष कुछ नहीं बोला, बस मुसकरा कर रह गया.

विनीता चुपचाप गंभीर मुद्रा में एक पत्थर पर बैठ गई. आशीष ने विनीता को गंभीर मुद्रा में देखा, तो सोच में पड़ गया कि वह तो हर समय, हर जगह हंसी की फुहार में भीगती रहती थी, सपनों की तितलियां, चाहतों के जुगनू उस के साथ होते थे, फिर आज वह इतनी गंभीर क्यों लग रही है? क्या इन सालों में उस की हंसी, वे सपने, वे तितलियां, सब कहीं उड़ गए हैं? फिर आशीष ने उसे नाश्ता पकड़ाते हुए पूछा, ‘‘लाइफ कैसी चल रही है?’’

‘‘ठीक ही है,’’ कह कर विनीता ने गहरी सांस ली.

‘‘ठीक ही है या ठीक है? दोनों में फर्क होता है, जानती हो न? उदास क्यों लग रही हो?’’

विनीता ने आशीष की आंखों में झांका, कितनी सचाई है, कोई छल नहीं, कितनी सहजता से वह उस के मन के भावों को पढ़ उस की उदासी को समझ कर बांटने की कोशिश कर रहा है. अचानक विनीता को लगा कि वह एक घने, मजबूत बरगद के साए में निश्चिंत और सुरक्षित बैठी है.

‘‘तुम बताओ, तुम्हारी पत्नी और बच्चे कैसे हैं?’’

‘‘दिव्या ठीक है, क्लब, पार्टियों में व्यस्त रहती है, बेटा सार्थक 6 साल का है. तुम्हारे पति और बच्चे नहीं आए?’’

‘‘नवीन को काम से छुट्टी लेना अच्छा नहीं लगता और सिद्धि को मां के पास छोड़ कर आई हूं.’’

‘‘तो क्या नवीन बहुत व्यस्त रहते हैं?’’

विनीता ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘क्या सोच रही हो वीनू?’’

विनीता को आशीष के मुंह से ‘वीनू’ सुन कर अच्छा लगा. फिर बोली, ‘‘यही, बंद मुट्ठी की फिसलती रेत की तरह तुम जीवन से निकल गए थे और फिर न जाने कैसे आज हम दोनों यों बैठे हैं.’’

‘‘तुम खुश तो हो न वीनू?’’

‘‘जिस के साथ मन जुड़ा होता है उस का साथ हमेशा के लिए क्यों नहीं मिलता आशू?’’ कहतेकहते विनीता ने आशीष को अपलक देखा, अभी भी कुछ था, जो उसे अतीत से जोड़ रहा था… वही सम्मोहक मुसकराहट, आंखों में वही स्नेहिल, विश्वसनीय भाव.

‘‘तुम आज भी बहुत भावुक हो वीनू.’’

‘‘हम कितनी ही ईमानदार कोशिश क्यों न करें पर फिर भी कभीकभी बहुत गहरी चोट लग ही जाती है.’’

‘‘लेकिन तुम्हारा और नवीन का रिश्ता दुनिया का सब से मजबूत रिश्ता है, यह क्यों भूल रही हो?’’

‘‘रिश्ते मन के होते हैं पर नवीन के मामले में न जाने कहां सब चुक सा रहा है,’’ आज विनीता आशीष से मिल कर स्वयं पर नियंत्रण न रख सकी. उस ने अपने मन की पीड़ा आशीष के सामने व्यक्त कर ही दी, ‘‘आशू, नवीन बहुत प्रैक्टिकल इंसान है. हमारे घर में सुखसुविधाओं का कोई अभाव नहीं है, लेकिन नवीन भावनाओं के प्रदर्शन में एकदम अनुदार है… एक रूटीन सा नीरस जीवन है हमारा.

‘‘हम दोनों के साथ बैठे होने पर भी कभीकभी दोनों के बीच कोई बात नहीं होती. वैसे जीवन में साथ रहना, सोना, खाना पारिवारिक कार्यक्रमों में जाना सब कुछ है पर हमारे रिश्ते की गरमी न जाने कहां खो गई है. मैं नवीन को अपने मन से बहुत दूर महसूस करती हूं. अब तो लगता है नवीन और मैं नदी के 2 किनारे हैं, जो अपने बीच के फासले को समेट नहीं पाएंगे… आज पता नहीं क्यों तुम से कुछ छिपा नहीं पाई.’’

‘‘पर हमें फिर भी उस फासले को पाट कर उन के पास जाने की कोशिश करनी होगी वीनू. मुझे अब तकलीफ नहीं होती, क्योंकि दिव्या के अहं के आगे मैं ने हथियार डाल दिए हैं. उसे अपने पिता के पैसों का बहुत घमंड है और उस की नजरों में मेरी कोई हैसियत नहीं है, लेकिन इस में मैं कुछ नहीं कर सकता. इन स्थितियों को बदला नहीं जा सकता. हमारा विवाह, जिस से हुआ है, इस सच को हम नकार नहीं सकते… नवीन और दिव्या जैसे हैं हमें उन्हें वैसे ही स्वीकार करना होगा. उन्हें बदलने की कोशिश करना मूर्खता है… बेहतर होगा कि हम उन के अनुसार स्वयं को ढाल लें वरना सारा जीवन कुढ़ते, खीजते और बहस में ही गुजर जाएगा.’’

‘‘लेकिन क्या यह समझौता करने जैसा नहीं हुआ? समझौते में खुशी व प्यार कहां होता है?’’

आशीष से विनीता की उदासी देखी नहीं जा रही थी. अत: उसे समझाते हुए बोला, ‘‘समझौता हम कहां नहीं करते वीनू? औफिस से ले कर अपने मित्रों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों के साथ हर जगह, हर मोड़ पर हम ऐडजस्ट करने के लिए तैयार रहते हैं और वह भी खुशीखुशी, तो फिर इस रिश्ते में समझौता करने में कैसी तकलीफ जिसे जीवन भर जीना है?’’

आशीष की बात सुनतेसुनते विनीता इसी सोच में डूब गई कि सुना था पहला प्यार ऐसी महक लिए आता है, जो संजीवनी और विष दोनों का काम करता है, मगर उन्हें अमृत नहीं विष मिला जिस के घूंट वे आज तक पी रहे हैं. निर्मल प्रेम का सागर दोनों के दिलों में हिलोरें ले रहा था. आशीष भी शायद ऐसी ही मनोस्थिति से गुजर रहा था.

विनीता ने आशीष को अपनी तरफ देखते पाया तो मुसकराने का भरसक प्रयत्न करती हुई बोली, ‘‘क्या हुआ, एकदम चुप्पी क्यों साध ली? क्या तुम भी ऐडजस्ट करतेकरते मानसिक रूप से थक चुके हो?’’

‘‘नहींनहीं, मैं आज भी यही सोचता हूं कि विवाह जीवन का बेहद खूबसूरत मोड़ है, जहां संयम और धैर्य बनाए रखने की जरूरत होती है. केवल समझौतावादी स्वभाव से ही इस मोड़ के सुंदर दृश्यों का आनंद लिया जा सकता है. मेरी बात पर यकीन कर के देखो वीनू, जीना कुछ आसान हो जाएगा… तुम स्वयं को संभालो, हम दोनों कहीं भी रहें, मन से हमेशा साथ रहेंगे. भला मन से जुड़े रिश्ते को कौन तोड़ सकता है? हमें तो एकदूसरे को विश्वास का वह आधार देना है, जिस से हमारे वैवाहिक जीवन की नींव खोखली न हो. हम अगली बार मिलें तो तुम्हारे चेहरे पर वही हंसी हो, जिसे इस बार तुम लखनऊ में छोड़ आई हो,’’ कहतेकहते आशीष के होंठों पर हंसी फैल गई, तो विनीता भी मुसकरा दी.

‘‘अब चलें, तुम्हारी बेटी इंतजार कर रही होगी? अगली बार आओ तो बिना मिले मत जाना,’’ आशीष हंसा.

दोनों अपनेअपने घर लौट गए. आशीष के निश्छल, निर्मल प्रेम के प्रति विनीता का मन श्रद्धा से भर उठा.

घर लौटते विनीता ने फैसला कर लिया कि वह नए सिरे से नवीन को अपनाएगी, वह जैसा है वैसा ही. प्रेम करने, समर्पण करने से कोई छोटा नहीं हो जाता. वह एक बार फिर से अप?ने बिखरे सपनों को इकट्ठा करने की कोशिश करेगी… मन में नवीन के प्रति जो रोष था, वह अब खत्म हो गया था.

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