मुझे लगा, अब उस का सास शिकायतनामा भी धीरेधीरे बंद हो जाएगा, लेकिन इस बार बड़े दिनों की छुट्टियों में वह ससुराल जा कर लौटी, तो शिकायत का एक नया सूत्र मिल गया था. फोन उठाते ही बोली, ‘‘जानती हो मम्मी, मेरी देवरानी भी पढ़ीलिखी है. चाहे तो वह भी घर से बाहर कहीं कोई काम कर सकती है. पर उसे कोई घर से बाहर कुछ नहीं करने देगा. वह बाहर जाएगी, तो मम्मीजी की गृहस्थी का बोझ भला कौन ढोएगा.’’
मैं ने हांहूं कर के फोन रख दिया. सोचा, अब तो उस गृहस्थी में देवरदेवरानी के बच्चों का ही अधिक काम रहता है, जिस में अपर्णाजी भी दिन भर छोटी बहू के साथ घर के कामों में लगी रहती हैं. चंद्रा के ससुरजी बच्चों का होमवर्क ही नहीं करवाते, अपितु उन्हें स्कूल बस तक पहुंचाने और वापस लाने का काम भी वे ही करते हैं. साथ ही, सब्जी, राशन आदि लाने का बाहरी काम भी तो वे ही किया करते हैं. लेकिन मेरी बिटिया रानी कहां कुछ सुननेसमझने के लिए तैयार थी?
अचानक मेरे पति का तबादला चंद्रा की ससुराल के शहर में ही हो गया. अब तो उन के घर आनाजाना लगा ही रहता. एक दिन मैं ने सुष्मिता से पूछा, ‘‘तुम भी तो पढ़ीलिखी हो, क्या तुम्हारा घर से बाहर कोई काम करने का मन नहीं करता?’’
वह हंसी, ‘‘मौसीजी, अभी तो मेरे बच्चे बहुत छोटे हैं, नौकरी करने से ज्यादा जरूरी है उन की देखभाल करना. फिर अभी इन्हें जितना वेतन मिल रहा है, वह काफी है. उस से अधिक की तो अभी दरकार नहीं और फिर ये शाम को अपनी छुट्टी के बाद पापाजी के बिजनैस में भी उन की मदद करते हैं. बच्चों को तो एकदम समय नहीं दे पाते. मैं भी यदि नौकरी में व्यस्त हो जाऊं, तो बच्चों का खयाल कौन रखेगा? यों तो मांजी भी मुझ से कहती रहती हैं कि यदि मेरा भी नौकरी करने का मन हो, तो मैं कर सकती हूं, वे घर और बच्चों को संभाल लेंगी, पर सच कहूं मौसीजी, अभी तो घर से बाहर कुछ करने का मेरा जरा भी मन नहीं है. हां, जब बच्चे बड़े हो जाएंगे, तब अगर मन होगा, तो देखा जाएगा.’’
चंद्रा को मैं ने सुष्मिता की ये बातें बतलाईं, तो वह कुछ मानने को तैयार ही नहीं हुई. बस अपना ही राग अलापती रही. वह तो बस अपनी सास के पीछे पड़ी हुई थी. अपने पति के कान भी उन की मां के विरुद्ध भरने में लगी हुई थी.
धीरेधीरे उसे कामयाबी मिलती गई. श्रीकांतजी उस की झूठी बातों को भी सच्ची समझने लगे और इस संबंध में अपनी मां से भी सवालजवाब करने लगे. चंद्रा की बात पर विश्वास कर के वे यह समझने लगे कि उन की मां बहुओं पर जुल्म ढाया करती है. बिटिया के फोन से मुझे सारी खबरें मिलती रहती थीं, पर मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पाती थी.
अपर्णाजी के पेट में दर्द रहता था. जांच के लिए वे अपने पति के साथ कोलकाता गईं. डाक्टर ने पेट दर्द का कारण बतलाया पेट में वायु या गैस बनना. उन्हें कुछ दवा देने के साथ यह निर्देश भी दिया गया कि वे भूखी न रहें और सुबह का नाश्ता तो जितनी जल्दी हो सके कर लिया करें. उन की बात मान कर उन्होंने दूसरे दिन जल्दी नाश्ता कर लिया, तो ठीक रहीं. यह सब उन्होंने मुझे फोन पर बतलाया.
पोतेपोती की जिद के कारण उन्हें वहां कुछ दिन रुकना पड़ा. वे घर के काम में भी चंद्रा की मदद करने लगीं. जो भी विशेष व्यंजन उन्हें बनाने आते थे, वे उन्हें बना कर सब को खिलाना चाहती थीं. एक दिन उन्हें याद आया कि बेटे श्रीकांत को कटहल की सब्जी बचपन से ही बहुत पसंद है. कटहल का मौसम खत्म होने को था, पर दिनेशजी कहीं से कटहल खोज ही लाए. अपर्णाजी ने बड़े मनोयोग से कटहल काटा और सब्जी बना ली. अपने पति को टिफिन देने का काम चंद्रा स्वयं ही करना चाहती थी. 1-2 बार मां ने बेटे के लिए टिफिन तैयार कर दिया, तो चंद्रा नाराज सी लगी, अत: इस काम से दूर ही रहती थीं. उस दिन जब चंद्रा टिफिन तैयार कर रही थी, तो अपर्णाजी ने पास जा कर कहा, ‘‘श्रीकांत को कटहल की सब्जी बचपन से ही बहुत पसंद है, इसे टिफिन में दे देना.’’
चंद्रा बोली, ‘‘पहले की सब्जी भी तो फ्रिज में रखी है. पहले उसे खत्म होने दीजिए,’’ और उस ने श्रीकांत के टिफिन में पहले वाली सब्जी ही डाल दी.
अपर्णाजी ने सोचा, ठीक ही तो कह रही है, पहले की बनी सब्जी पहले खत्म होनी चाहिए. कटहल की सब्जी शाम को खा लेगा, इस में क्या हर्ज है.
शाम को चंद्रा ने दफ्तर से लौट कर कुछ और सब्जियां बना लीं और श्रीकांत को वे ही परोसीं. बाद में उस ने कटहल की सब्जी औरों की थालियों में डाली, पर श्रीकांत को नहीं दी. रोटियां बनाती हुईं अपर्णाजी सब कुछ देख रही थीं, पर बोलीं कुछ नहीं. उन्होंने सोचा, कल टिफिन में दे देगी, इस में क्या है.
दूसरे दिन अपर्णाजी जब रसोई में आईं, तब तक श्रीकांत का टिफिन भरा जा चुका था. उन्होंने दिनेशजी के लिए नाश्ता लगाने के लिए फ्रिज खोला, तो देखा रात वाली सब्जी समाप्त है और कटहल की सब्जी उतनी की उतनी फ्रिज में रखी है. उन्होंने सोचा, हड़बड़ी में शायद बहू श्रीकांत को कटहल की सब्जी देना भूल गई हो. कोई बात नहीं, वे सब्जी बदल देती हैं.
उन्होंने डब्बा खोला ही था कि चंद्रा आ गई और जोर से बोली, ‘‘यह आप क्या कर रही हैं मम्मीजी? मेरी जासूसी कर रही हैं? क्या मैं आप के बेटे को अच्छा खाना नहीं देती? आप सब्जी बदलने की कोशिश कर रही हैं,’’ बोलतेबोलते वह रोने लगी.
शोर सुन कर श्रीकांत आ खड़ा हुआ. बोला, ‘‘चंद्रा ने टिफिन दे तो दिया था, फिर तुम उसे खोल कर क्या देख रही हो? वह मेरी पत्नी है, कोई मेरी दुश्मन नहीं, जो मुझे खराब खाना देगी.’’
अपर्णाजी हैरान सी खड़ी थीं. वे किस से क्या कहें? इतना तो वे समझ चुकी थीं कि बहू को ईर्ष्यारूपी नागिन ने डस लिया है. उसे डर लग रहा है बेटे के प्रति मां के स्नेह से. इसीलिए उस ने श्रीकांत के कान भी मां के विरुद्ध भर दिए हैं, तभी तो वह मां से इस लहजे में बात कर रहा है.
आधे झूठ की चाशनी में डुबो कर चंद्रा ने मुझे यह वाकेआ सुनाया, तो भी सच मेरे सामने आ गया. मैं ने सोचा, अगर चंद्रा की सास शुद्ध सोने की बनी होतीं, तो भी मेरी बेटी उन में कोई न कोई खोट निकाल ही देती.
अब युग उलट गया है. महान वैज्ञानिक न्यूट्रन ने सच ही कहा था कि हर क्रिया की समान और विरोधी प्रतिक्रिया हुआ करती है. पहले बहुओं को उन की सास दबा कर रखती थी, अब बहुएं वही अपनी सास के साथ करना चाहती हैं. पहले मां करती थी कन्यादान, अब चाहेअनचाहे करना होता है उसे पुत्रदान. कल बेटी पराया धन थी और आज बेटा है.