लड़कों में क्या ढूंढ़ती हैं लड़कियां

‘‘क्या      यार, तुम इतनी अपसैट क्यों हो?’’ नितिन ने अपनी गर्लफ्रैंड निशा से पूछा.निशा रोंआसी हो कर बोली, ‘‘तुम कभी मेरी बात नहीं मानते. मैं कितनी दफा कह चुकी हूं कि अपने आवारा, शराबी, दोस्तों का साथ छोड़ दो खासकर दीपू मु   झे अजीब नजरों से घूरता रहता है.’’‘‘घूरने की चीज हो तो घूर लेता है. सब मानते हैं कि मेरी गर्लफ्रैंड पूरे कसबे में सब से सुंदर है. पर इस बात का घमंड मत रखो क्योंकि तेरे बौयफ्रैंड जैसा दिलदार और स्मार्ट भी पूरे इलाके में कोई नहीं. तभी तो सारे लड़के मेरे आगेपीछे घूमते रहते हैं. मेरे जैसा रईस बाप किसी का नहीं है.

मैं रोज ब्रैंडेड कपड़े पहनता हूं, इंग्लिश में बातें कर लेता हूं और शरीर ऐसा तगड़ा कि 10 को एक हाथ से गिरा दूं. तू और क्या चाहती है? चल आ जा मेरे घर पर. तु   झे भी पूरा संतुष्ट नहीं किया तो मेरा नाम नहीं,’’ कहते हुए उस ने निशा का हाथ जोर से पकड़ते हुए अपनी तरफ खींचा तो उस ने मुंह फेर लिया.यह देख कर नितिन के अहम को चोट लग गई. उसे एक जोर का थप्पड़ जड़ता हुआ बोला, ‘‘अरे तू चाहती क्या है. मुझ से मुंह फेर रही है तो और कौन चाहिए तु   झे?’’‘‘मैं इज्जत चाहती हूं. अपना आत्मसम्मान चाहती हूं. मैं तेरे हाथ की कठपुतली नहीं हूं. मुझे सही अर्थों में प्यार करने वाला चाहिए न कि मु   झ पर हक जमाने वाला. कोई ऐसा जो मेरी केयर करे, मेरी बात सुने. भले ही उस के पास पैसे कम हों, मगर दिल का अच्छा हो, शरीफ हो, लफंगे दोस्तों और नशे से दूर हो. आज के बाद मु   झे हाथ मत लगाना. फोन भी मत करना. मैं तु   झ से अब कभी नहीं मिलना चाहती, ‘‘कह कर और उस का हाथ झटक कर निशा अपने घर आ गई.

इधर नितिन के अहम को गहरी चोट लगी. कई दिनों तक उसे यकीन ही नहीं हुआ कि इतने स्मार्ट और रईस लड़के को कोई लड़की कैसे छोड़ सकती है. वह नहीं सम   झ पाया कि लड़कियों के दिल को पैसा, घमंड और जबरदस्ती नहीं बल्कि प्यार और शराफत से जीता जा सकता है. लड़कियों को वे लड़के पसंद आते हैं जो उन की केयर करते हैं न कि मारतेपीटते हैं.युवा लड़कों के मन में इस बात को ले कर उल   झन रहती है कि लड़कियों को कैसे लड़के पसंद होते हैं.

अकसर देखा जाता है कि कुछ लड़के छिछोरे किस्म के होते हैं तो कुछ शांत स्वभाव के भी होते हैं. ऐसे में कई लड़के यह सम   झने लगते हैं कि वे अपने छिछोरेपन से या अमीरी का जलवा दिखा कर लड़कियों को पटा लेंगे लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं होता.अगर आप के पास बहुत ज्यादा पैसा नहीं है या आप बहुत ज्यादा सुंदर नहीं हैं तो चल सकता है, लेकिन अगर आप के गुण अच्छे नहीं हैं तो ज्यादातर लड़कियां आप को अस्वीकार ही करेंगी.

भले ही हर लड़की एकजैसी नहीं होती. सब की अपनी अलग सोच और अलग पसंद होती है. पर इन बेसिक चीजों पर हर लड़की का ध्यान जाता है:फन लविंग बौयजलड़कियों को अच्छी सैंस औफ ह्यूमर वाले लड़के अच्छे लगते हैं. मतलब जो लड़के खुद भी हंसतेमुसकराते रहते हैं और अपने मजाकिया अंदाज और बातों से दूसरों को भी हंसाते रहते हैं वे लड़कियों को बहुत अच्छे लगते हैं.

1.अच्छी ड्रैसिंग सैंस

लड़कियों का ध्यान लड़के की ड्रैसिंग सैंस पर भी जाता है. अगर आप हमेशा यों ही ऐसेवैसे या बिना प्रैस किए अटपटे कपड़े पहन कर घूमते रहते हैं तो आप लड़कियों की पसंद नहीं हो सकते क्योंकि उन्हें स्मार्ट और अच्छी ड्रैसिंग सैंस वाले लड़के भाते हैं.

2. प्यार करने वाले

लड़कियां हमेशा ऐसा लड़का ढूंढ़ना चाहती हैं जिस का स्वभाव बहुत ही केयरिंग और लविंग हो. जिन लड़कों की नाक पर हमेशा गुस्सा रहता है और जो चिड़चिड़े स्वभाव के होते हैं लड़कियां उन से दूर ही रहना पसंद करती हैं. बातचीत का आकर्षक लहजा और तमीज से बोलने की आदत भी लड़कियों को आकर्षित करती है.

3. नशाखोर न हो

90% से ज्यादा लड़कियां किसी ऐसे लड़के के साथ दोस्ती करना चाहती हैं जो किसी प्रकार का नशा न करता हो, फिर नशा चाहे कैसा भी हो. चाहे वह शराब हो, बीड़ीसिगरेट हो, नईनई लड़कियों का हो या फिर गुटका बगैरा क्योंकि ऐसे लड़के जब नशे में होते हैं तो उन का मिजाज और व्यवहार पूरी तरह बदल जाता है. ऐसे में लड़कियां कोई जोखिम नहीं लेना चाहतीं.

4. इनोसैंट लड़के

हालांकि लड़कियों को स्मार्ट और इंटैलिजैंट लड़के पसंद होते हैं पर वे ऐसे लड़कों से भी बचने का प्रयास करती हैं जो बहुत ज्यादा दिमाग लगाते हैं. मतलब जो कुछ ज्यादा ही चालाक होते हैं और हर बात में अपनी चतुराई का नमूना पेश करने की कोशिश करते हैं. लड़की चाहती है कि जिस लड़के के साथ वह जुड़े वह दिल से उस रिश्ते को निभाए दिमाग से नहीं. यही कारण है कि दिल से सोचने वाले और इनोसैंट लड़के लड़कियों को ज्यादा अच्छे लगते हैं.

5. स्मार्ट और बुद्धिमान

लड़कियां अपने बौयफ्रैंड को स्मार्ट और इंटैलिजैंट भी देखना पसंद करती हैं. बेवकूफ और बचकानी हरकतें करने वाले लड़के के साथ कोई भी लड़की दोस्ती नहीं करना चाहती.

6. जो डरपोक न हों

लड़कियां ऐसे लड़कों से दोस्ती करना चाहती हैं जो बहादुर हों. किसी भी डरपोक लड़के के साथ कोई लड़की दोस्ती नहीं करना चाहेगी क्योंकि हर लड़की चाहती है कि वह जिस लड़के के साथ हो वह उसे पूरी तरह सुरक्षित महसूस कराए.

7. जो घरेलू कामकाज में इंटरैस्ट लेते हों

अगर आप छोटेमोटे घरेलू कामकाज में रुचि लेते हैं तो यह आप के एक लिए प्लस पौइंट हो सकता है क्योंकि लड़कियां ऐसे लड़के पसंद करती हैं जो घर के कामकाज में हाथ बंटाते हैं. ऐसे लड़कों को वे अपने भावी पति के रूप में देखना पसंद करती हैं.

8. फिट बौडी वाले लड़के

फिटनैस किसी भी लड़के की पर्सनैलिटी में चार चांद लगाता है और लड़कियां भी इस चीज पर खूब ध्यान देती हैं. अगर आप बिलकुल फिट बौडी के मालिक हैं तो यकीन मानिए लड़की आप को मना नहीं कर पाएगी. लड़कियों को ऐसे लड़के बिलकुल पसंद नहीं होते जिन की तोंद निकली हुई हो.

9. जो इज्जत करना जानते हों

अगर आप लड़कियों की इज्जत करना नहीं जानते और उन लड़कियों के साथ अटपटी हरकतें करते रहते हैं तो आप उन की पसंद कभी नहीं हो सकते. सब से पहले लड़कियों की इज्जत करना सीखिए, उन से तमीज से बात करें, उन्हें फौर ग्रांटेड न लें और उन की भावनाओं की कदर करना शुरू कीजिए. आत्मसम्मान हर लड़की के लिए सब से पहले आता है.

10. आत्मविश्वास और सकारात्मक अप्रोच

जिन लड़कों में आत्मविश्वास की कमी होती है और जो हमेशा नकारात्मक बातें करते रहते हैं ऐसे लड़कों से लड़कियां बचना चाहती हैं. लेकिन अगर आप आत्मविश्वास से भरपूर हैं और यह हमेशा आप के चेहरे और बातों से    झलकता है तो आप किसी भी लड़की को आसानी से पसंद आ सकते हैं.

11. दूसरों की मदद करने वाले

हैल्पफुल नेचर वाले लड़के लड़कियों की पहली पसंद होते हैं. उन्हें यह देख कर अच्छा लगता है कि कोई लड़का सब की मदद के लिए हमेशा तैयार रहता है.

12. अपने काम पर ध्यान देने वाले

जो लड़के आवारागर्दी करते फिरते हैं लड़कियां उन्हें बिलकुल पसंद नहीं करतीं. उन्हें ऐसे लड़के पसंद होते हैं जिन का अपनी लाइफ में कोई मकसद होता है. ऐसे लड़के जिन का ध्यान हमेशा अपने लक्ष्य पर होता है और जो उस के लिए कड़ी मेहनत करते हैं लड़कियों की पहली पसंद होते हैं.

13. शरीफ लड़के

ज्यादातर लड़कियां ऐसे लड़कों की तरफ आकर्षित होती हैं, जो जैंटलमैन हों, जो स्वभाव से बहुत ही सरल और सीधे हों, लेकिन जरूरत पड़ने पर आक्रामक रुख भी अपना सकें. ज्यादातर लड़कों की शराफत लड़कियों को आकर्षित करती है. उन्हें शरमाने वाले लड़के भी पसंद होते हैं. अगर कोई लड़का सब से शरमाता है केवल एक ही लड़की के सामने खुल कर बोलता है तो उस के दिल में जगह बनानी आसान होती है.

14. स्वभाव में गंभीरता

लड़कियां ऐसे लड़कों को पसंद करती हैं जो अपना आत्मसम्मान बनाए रखें. अगर आप ने अपनी फीलिंग्स एक बार उन्हें बता दी हैं तो उन से हर समय उस का जवाब न मांगें. वे किसी बात से परेशान हैं तो उन्हें सलाह देने के बजाय उन की बात सुनें. लड़कियां कई बार सिर्फ इतना चाहती हैं कि कोई लड़का ध्यान दे कर उन की बातें सुनें और उन्हें समझाए.

15. खयाल रखने वाला

लड़कियों को ऐसे लड़के पसंद आते हैं जो केयरिंग हों. लड़कों का केयरिंग स्वभाव लड़कियों को उन के प्रति आकर्षित करता है. हर लड़की को कूल डूड लड़के ही पसंद आते हैं. लड़कियों को हमेशा उन की प्रशंसा करने वाले लड़के अच्छे लगते हैं और वे जो उन के कहे बिना उन की तारीफ करें. लड़कियां चाहती हैं कि अगर वे किसी दिन अधिक आकर्षक लगें, फिट और स्मार्ट दिखें या कोई नया हेयरकट करवाएं तो बौयफ्रैंड उन की प्रशंसा जरूर करें.

मेरे हाथों और बाजुओं पर टैनिंग हो गई है, सबकुछ कर लिया लेकिन फर्क नहीं दिखा, कोई उपाय बताएं?

सवाल

मेरी उम्र 47 साल है. मेरे हाथों और बाजुओं पर टैनिंग हो गई है. सबकुछ कर के देख लिया पर फर्क नहीं पड़ा. स्किन स्पैशलिस्ट से भी मिल चुकी हूं. उन से भी निराशा ही हाथ लगी. हाथ देखने में बहुत बुरे लगते हैं. कोई उपाय बताएं?

जवाब

आप किसी स्किन क्लीनिक से स्किन पौलिशिंग ट्रीटमैंट ले सकती हैं. यह टैनिंग को रिमूव कर के स्किन पर चमक लाता है. इस के अलावा आप जब भी धूप में निकलें अपनी बौडी के खुले भागों पर एसपीएफ युक्त सनस्क्रीन जरूर लगा लें. घरेलू उपाय के तौर पर संतरे के सूखे छिलके, सूखी गुलाब और नीम की पत्तियां सभी समान मात्रा में लें और दरदरा पीस लें. इस के एक चम्मच पाउडर में 1 चम्मच कैलेमाइन पाउडर, 1/2 चम्मच चंदन पाउडर और खीरे का रस मिला कर पेस्ट बना करे रोजाना अपनी बांहों पर इस से स्क्रब करें. कुछ ही दिनों में त्वचा साफ दिखने लगती है.

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बालों के लिए अच्छा सीरम खरीदना हो तो किन बातों का ध्यान रखना जरूरी है?

जवाब

बालों के लिए हेयर सीरम खरीदने से पहले आप को जानना होगा कि आप किस काम के लिए सीरम खरीद रही हैं. बाजार में 2 तरह के सीरम मिलते हैं. एक स्टाइलिंग के लिए और दूसरा पोषण के लिए. अगर आप के बाल ड्राई हैं तो उन के लिए हेयर स्टाइलिंग सिरम खरीदना होगा. अगर आप के बाल गिर रहे हैं तो आप को पोषण की जरूरत है. उस के लिए पोषण वाला सीरम लेने की जरूरत है. स्टाइलिंग वाला सीरम आप के बालों को सौफ्ट व चमकदार बनाता है. स्टाइल करने में हैल्प करता है. पोषण वाला सीरम आप के बालों को पोषण देता है. इस को स्कैल्प के ऊपर लगा कर मसाज करनी चाहिए. चाहें तो इसे स्पा क्रीम के साथ मिला कर भी इस्तेमाल कर सकती हैं.

समस्याओं के समाधान ऐल्प्स ब्यूटी क्लीनिक की फाउंडर, डाइरैक्टर डा. भारती तनेजा द्वारा द्य पाठक अपनी समस्याएं इस पते पर भेजें : गृहशोभा, ई-8, रानी  झांसी मार्ग, नई दिल्ली-110055. स्रूस्, व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या 9650966493 पर भेजें.

 

आशा है सब सुखद होगा

बहुतसमय बाद दीदी के घर जाना हुआ. सोम का केरल तबादला हो गया था इसलिए इतनी दूर से जम्मू आना आसान नहीं था. जब दीदी के बेटे की शादी हुई थी तब बच्चों की सालाना परीक्षा चल रही थी. मैं तब नहीं आ पाई थी और फिर सोम को भी छुट्टी नहीं थी. मौसी के बिना ही उस के भानजे की शादी हो गई थी. मैं इस बार बहुत सारा चाव मन में लिए मायके, ससुराल और दीदी के घर आई. मन में नई बहू से मिलने की चाह सब से ज्यादा थी.

हम ने बड़े जोश और उत्साह से दीदी के घर में पैर रखा. सुना था बड़ी प्यारी है दीदी की बहूरानी. मांबाप की लाडली और एक ही भाई की अकेली बहन. दीदी सास बन कर कैसी लगती होंगी, यह देखने की भी मन में बड़ी चाह थी.

अकसर ऐसा होता है कि सास बन कर

एक नारी सहज नहीं रह पाती. कहींकहीं कुछ सख्त हो जाती है मानो अपनी सास के प्रति दबीघुटी कड़वाहट बहू से बदला ले कर निकालना चाहती हो.

बड़ा लाड़प्यार किया दीदी ने, सिरआंखों पर बैठाया. मगर बहू कहीं नहीं नजर आई मुझे.

‘‘अरे दीदी बहुत हो गई आवभगत… यह बताओ हमारी बहू कहां है?’’

मु?ो दीदी आंखें चुराती सी लगीं. मेरा और सोम का चेहरा देख कर भी अनदेखा करती हुई सी दीदी पुन: इधरउधर की ही बातें करने लगीं, तो सोम से न रहा गया. उन्होंने कहा, ‘‘दीदी, आप कुछ छिपा तो नहीं रहीं… कहां हैं बहू और राजू?’’

‘‘वे हमारे साथ नहीं रहते… बड़े घर की लड़की का हमारे घर में मन नहीं लगा.’’

यह सुन कर हम दोनों अवाक रह गए.

‘‘बड़े घर की लड़की है, मतलब?’’ मैं ने कहा, ‘‘रिश्ता बराबर वालों के साथ नहीं किया

था क्या?’’

दीदी चुप थीं. जीजाजी की नजरों में दीदी के लिए नाराजगी साफ नजर आने लगी थी मुझे

अफसोस हुआ सब जान कर. मध्यवर्गीय

परिवार है जीजाजी का जहां 1-1 पैसा सोचसम?ा कर खर्च किया जाता है.

जिस लड़की ने कभी पानी का गिलास उठा कर खुद नहीं पीया, दीदी उस से सुबह 4 बजे उठ कर सारा घर संभालने की उम्मीद कर रही थीं.

‘‘हम भी तो करते थे,’’ की तर्ज पर दीदी का तुनकना जीजाजी को और भड़का गया.

‘‘तुम टाटाबिरला की बेटी नहीं थीं, जिस के घर में नौकरों की फौज होती है. तुम्हारी मां भी दिन चढ़ते ही घर की चक्की में पिसना शुरू करती थीं और मेरी मां भी. नौकरानी के नाम पर दोनों घरों में एक बरतन मांजने वाली होती थी. तुम्हारा जीवनस्तर हम से मेल खाता था. पाईपाई बचा कर खर्च करना दोनों ही घरों की आदत भी थी और जरूरत भी. इसीलिए तुम ने निभा लिया.

‘‘और वह बच्ची भी तो किसी तरह निभा ही रही थी. दबी आवाज में उस ने मुझ से कहा भी था कि पापा मुझे रसोई के काम की आदत नहीं है… रसोइया और फुलटाइम नौकर रख लीजिए.’’

‘‘क्व4-5 हजार हर महीने मैं कहां से लाती?’’

‘‘तो उस घर की लड़की इस घर में क्यों लाईं जहां नौकरों के नाम पर क्व20-25 हजार हर महीने खर्च किए जाते हैं. रिश्ता और दोस्ती सदा बराबर वालों में करनी चाहिए. मैं सदा समझता रहा, मगर तब तुम्हें लालच था अमीर घर का.’’

‘‘तो लड़की न देते हमारे घर में… वही पड़ताल कर लेते हमारे

घर की.’’

‘‘उन्हें लायक समझदार लड़का मिल रहा था, जिस ने शादी के

6 महीने बाद ही उन का कारोबार संभाल लिया था. उन की पड़ताल तो सही थी. उन की इच्छा पूर्ण हो गई. वे खुश हैं. दुखी तुम हो,’’ कह दनदनाते हुए जीजाजी उठ कर घर से बाहर चले गए.

पता चला शादी के 2-3 महीने बाद ही राजू मेधा को ले कर अलग घर में चला गया था. क्या करता वह? पहले ही दिन से दीदी की बहू से इतनी अपेक्षाएं हो गई थीं. जराजरा बात पर अपमानित होना उसे नागवार गुजर रहा था.

राजू ने समझाया था मां को, ‘‘क्या बात है मां अपनी पसंद की बहू लाईं और अब वही तुम्हें पसंद नहीं… इस तरह क्यों बात करती हो उस से जैसे वह नासमझ बच्ची हो. 26-27 साल की एमबीए लड़की बहू बना कर लाई हो और उस से उम्मीद करती हो 4-5 साल बच्ची की तरह जराजरा बात तुम से पूछ कर करे… अब तुम्हारा जमाना नहीं रहा जब घर वाले जहां बैठा देते थे बेबस बहू वहीं बैठ जाती थी.’’

‘‘नहीं बेटा, बेबस वह क्यों होने लगी. बेबस तो मैं हूं, जिस ने बेटा पालपोस कर किसी को सौंप दिया.’’

‘‘मां, कैसी बेसिरपैर की बातें कर रही हो?’’

जीजाजी पलपल जलती में पानी डालने का अथक प्रयास करते रहे थे, मगर आग दिनप्रतिदिन प्रचंड होती चली गई.

‘‘तुम पीछे की ओर देख कर आगे नहीं बढ़ सकती हो दीदी. जिस काम की उम्मीद तुम बहू से करती रही हो वही तो तुम कम पढ़ीलिखी भी करती रही हो न. उस का एमबीए करना किस काम आया जरा सोचो न? बच्चे कमाते हैं. अगर क्व5 हजार का नौकर अपनी जेब से रख सकते हैं तो तुम्हें क्या एतराज है?’’

दीदी चुपचाप सुनतीं मुंह फुलाए बैठी रहीं.

‘‘राजू और बहू को फोन करो. हम उन से मिलना चाहते हैं. या तो वे यहां चले आएं या फिर हमें

अपना पता बता दें हम उन के घर चले जाते हैं,’’ सोम ने अपना निर्णय सुना दिया.

यह सुनते ही दीदी का पारा सातवें आसमान जा पहुंचा. बोलीं, ‘‘कोई नहीं जाएगा उन के घर और न ही वह लड़की यहां आएगी.’’

‘‘देखा शोभा इस का रवैया? राजू बेचारा 2 पाटों में पिस रहा है. अरे, जैसा घर, जैसी लड़की तुम ने पसंद की राजू ने हां कर दी… अब चाहती हो बच्चे साथसाथ भी न रहें… यह कैसे संभव है? जीना हराम कर दिया है तुम ने सब का… न मुझे उन से मिलने देती हो न उन्हें यहां आने देती हो.’’

जीजाजी इकलौती संतान के वियोग में पागल से होते जा रहे थे. सदा अपनी ही चलाने वाली दीदी सम?ा नहीं पा रही थीं कि वे बबूल की फसल बो कर आम नहीं खा सकतीं. पिछले 7-8 महीने से लगातार इस तनाव ने जीजाजी की सेहत पर भी बुरा असर डाला था. मेज पर दवाओं का ढेर लगा था.

‘‘मैं अपने घर की समस्या किसकिस के पास ले जाऊं? कौन समझएगा इस औरत को जब मैं ही न सम?ा सका? मेधा हर रोज फोन कर के हमारा हालचाल पूछती है. राजू ने तो अपना घर भी ले लिया है.’’

दीदी का तमतमाया चेहरा देख सोम और मैं सम?ा नहीं पा रहे थे कि क्या करें. आज के परिवेश में इतनी सहनशीलता किसी में नहीं रही जो तनाव को पी जाए.

तभी सोम ने इशारा कर के मुझे बाहर बुलाया और कुछ सम?ाया. फिर जीजाजी को भी बाहर बुला लिया.

दीदी अंदर बरतन समेट रही थीं.

10 मिनट के बाद मैं अंदर चली आई और सोम जीजाजी के साथ राजू के घर चले गए.

‘‘कहां गए दोनों?’’ विचित्र सा भाव था दीदी की आंखों में.

‘‘जीजाजी की छाती में दर्द होने लगा है… कितना परेशान हो गए हैं राजू की वजह से. सोम उन्हें डाक्टर के पास ले गए हैं,’’ मैं ने झूठ बोला.

सुन कर दीदी घबरा गईं. मगर बोली कुछ भी नहीं.

‘‘हर वक्त कलहक्लेश हो घर में तो ऐसा होता ही है. इस में नया क्या है… सहने की भी एक हद होती है. तुम तो रोपीट लेती हो, जीजाजी तो रो भी नहीं सकते फिर बीमार नहीं होंगे तो क्या होगा? अगर कुछ ऊंचनीच हो गई तो क्या होगा, जानती हो? जवानी में भी आजकल लोगों में सहनशीलता नहीं रही और तुम 60 साल के आदमी से यह आस लगाए बैठी. क्या तुम्हारी जिद पर अपना बुढ़ापा खराब कर लें वे?’’

‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’

‘‘मतलब यह है कि बेकार की जिद छोड़ो और बच्चों से मिलनाजुलना शुरू करो. तुम नहीं मिलना चाहतीं तो जीजाजी को तो मत रोको. अगर दिल का रोग लग गया तो हाथ मलती रह जाओगी दीदी… अकेली रह जाओगी. तब पछतावे के सिवा कुछ हाथ नहीं लगेगा. बहू अमीर घर की है उस का रहनसहन वैसा है तो क्या यह उस का दोष हो गया? अपने जैसे घर की कोई क्यों नहीं ले आईं, जिस का जीवनस्तर तुम से मिलताजुलता होता और तुम्हारे मन में भी कोई हीनभावना न आती.

‘‘दीदी, क्या यही सच नहीं है कि तुम बड़े घर की बच्ची को पचा नहीं पाई हो. जो लड़की अपने पिता के काम में सहयोग कर के इतना कमा रही थी उस ने तुम जैसे मध्यवर्गीय परिवार में शादी को हां कर दी सिर्फ इसलिए कि इस घर की सादगी और संस्कार उसे पसंद आ गए थे. राजू उसे अच्छा लगा था और…’’

‘‘बस करो शुभा… तुम भी राजू की बोली मत बोलो,’’ दीदी बीच ही में बोल पड़ीं.

‘‘इस का मतलब मैं ने भी वही समझ है, जो राजू को समझ में आया है… मेधा एक अच्छी लड़की है… वह तो तुम्हें अपनाना चाहती है. बस, तुम्हीं उस की नहीं बनना चाहती हो.’’

दीदी कुछ बोलीं नहीं.

‘‘तुम दोनों अब बूढ़े हो रहे हो… शरीर कमजोर होगा तब बच्चों का सहारा चाहिए… बच्चे न बुलाएं तो भी समझ में आता है. तुम्हारे बच्चे सिरआंखों पर बैठाते हैं.’’

आधा घंटा चुप्पी छाई रही. सोम का फोन आया. उन्होंने कुछ और समझाया मुझे.

‘‘जीजाजी की छाती में बहुत दर्द हो रहा है क्या? राजू को बुला लिया क्या आप ने? अच्छा किया. हम भला इस शहर में किसे जानते हैं,’’ मेरा स्वर कुछ ऊंचा हो गया तो दीदी के भी कान खड़े हो गए.

‘‘राजू को बुला लिया… क्या मतलब? उसे बुलाने की क्या जरूरत थी,’’ दीदी ने पूछा.

मैं अवाक रह गई कि दीदी को जीजाजी की तबीयत की चिंता नहीं. राजू को क्यों बुला लिया बस यही प्रश्न किया. मैं हैरान थी कि एक औरत इतनी भी जिद कर सकती है. बहू से नफरत इतनी ज्यादा कि पति जाए तो जाए बेटा घर न आए. मैं ने उसी पल यह निर्णय ले लिया कि दीदी की जिद को खादपानी डाल कर एक विशालकाय पेड़ नहीं बनने देना. एक स्त्री का त्रियाहठ इतना नहीं बढ़ने देना कि घर ही तबाह हो जाए.

दीदी को जीजाजी की पीड़ा समझ में नहीं आ रही तो वही भाषा बोलनी पड़ेगी जिसे दीदी समझे. 2 घंटे बाद स्थिति बदल चुकी थी. राजू और मेधा हमारे सामने थे. आते ही उस ने मेरे और दीदी के पांव छुए.

‘‘पापा को हलका दिल का दौरा पड़ा है मम्मी… मौसाजी और डाक्टर साहब उधर हैं… चलिए, आप भी वहां.’’

दीदी को हम पर शक था तभी तो वे यह सुन कर भी इतनी परेशान नहीं हुई थीं.

‘‘हांहां, चलो दीदी राजू के घर,’’ मैं ने झट से कहा.

राजू और मेधा अंदर कमरे में चले गए और जब बाहर आए तब उन के हाथ दीदी और जीजाजी के अटैची थे.

‘‘चलिए मम्मी… पापा को पूरा आराम चाहिए और पूरी देखभाल… जो आप अकेली नहीं कर पाएंगी… चलिए उठिए न मम्मी क्या सोच रही हैं पापा को आप की जरूरत है… जल्दी उठिए.’’

राजू ने हाथ पकड़ कर उठाया और फिर हम सब बाहर खड़ी गाड़ी में आ बैठे. लगभग आधे घंटे के बाद हम राजू के घर के बाहर खड़े थे. खुशी के अतिरेक में मेरी आंखें भर आईं कि राजू इतना बड़ा हो गया है कि अपने घर के बाहर खड़ा हमारा गृहप्रवेश करा रहा है. बड़े स्नेह और सम्मान से मेधा दीदी को उन के कमरे में ले गई.

‘‘मम्मी, यह रहा आप का कमरा,’’ मेधा का चेहरा संतोष से दमक रहा था, ‘‘यह आप की अलमारी, यह बाथरूम, सामने दीवार पर टीवी… और भी आप जो चाहेंगी आ जाएगा.’’

‘‘तेरे पापा कहां हैं?’’ दीदी का स्वर कड़वा ही था.

‘‘वह उधर कमरे में लेटे हैं… डाक्टर और मौसाजी भी वहीं हैं.’’

तनिक सी चिंता उभर आई दीदी के माथे पर. फिर तुरंत वह उन के पास पहुंच गईं. वास्तव में जीजाजी लेटे हुए थे.

डाक्टर उन्हें समझ रहे थे, ‘‘तनाव से बचिए आप. खुश रहने की कोशिश कीजिए… क्या परेशानी है आप को जरा बताइए न? आप का बेटा होनहार है. बहू भी इतनी अच्छी है. आप की कोई जिम्मेदारी भी नहीं है तो फिर क्यों दिल का रोग लगाने जा रहे हैं आप?’’

जीजाजी चुप थे. दीदी की आंखें भर आई थीं. शायद अब दीदी को बीमारी का विश्वास हो गया था. सोम मुझे देख कर मंदमंद मुसकराए. मेधा सब के लिए चाय और नाश्ता ले आई. जीजाजी के लिए सूप और ब्रैड. चैन दिख रहा था अब जीजाजी के चेहरे पर… आंखें मूंदे चुपचाप लेटे थे. शुरुआत हो चुकी थी. आशा है, परिणाम भी सुखद ही होगा.

विमोहिता: कैसे बदल गई अनिता की जिंदगी

सोने की सास: भाग 2- क्यों बदल गई सास की प्रशंसा करने वाली चंद्रा

नई ओर बहू सुष्मिता मेरी अचरज से देख रही थी कि मैं मां हो कर भी अपनी ही बेटी के विरुद्ध बोल रही थी.

चंद्रा और श्रीकांतजी को 2 दिनों के बाद कोलकाता लौटना था. उन के लौटने से पहले मैं ने समधनजी से कहा, ‘‘चंद्रा में अभी थोड़ा बचपना है. आप उस की बातों पर ध्यान मत दिया कीजिए.’’

वे हंसती हुई बोलीं, ‘‘वह जैसी भी है, अब मेरी बेटी है. आप उस की चिंता मत कीजिए.’’

मुझे लगा, जैसे मुझ पर से कोई बोझ उतर गया. फिर सोचा, चंद्रा तो कोलकाता जा रही है और उस की सास यहां रहेंगी. धीरेधीरे संबंध खुदबखुद सुधर जाएंगे.

दिन बीत रहे थे. बिटिया ने कोलकाता से फोन किया, ‘‘पापा के साथ आओ न मेरा घर देखने.’’

मैं बोली, ‘‘अभी तेरे पापा को दफ्तर से छुट्टी नहीं मिलेगी. हम फिर कभी आएंगे. पहले तुम अपने सासससुर को बुलाओ न अपना घर देखने के लिए? अब तो वहां का घर संभालने तुम्हारी देवरानी भी आ गई है.’’

‘‘नहीं मां, वे आएंगी तो मेरी गृहस्थी में 100 तरह के नुक्स निकालेंगी. मैं नहीं बुलाऊंगी उन्हें.’’

‘‘अरे, बिटिया रानी, कैसी बात कर रही हो? वे आखिर तुम्हारे पति की मां हैं.’’

‘‘हुंह मां. तुम नहीं जानतीं कैसे पाला है उन्होंने इन को. तुम्हें पता है, वे इन्हें बासी रोटियों का नाश्ता करा कर स्कूल भेजती थीं.’’

‘‘अरे पगली, बासी रोटियों का नाश्ता करने में क्या बुराई है? राजस्थानी घरों में बासी रोटियों का नाश्ता ही किया जाता है. बचपन में हम भाईबहन भी बासी रोटियों का नाश्ता कर के ही स्कूल जाते थे. सच कहूं, तो मुझे तो अभी भी बासी रोटियां खूब अच्छी लगती हैं पर तुम्हारे पापा बासी रोटियां नहीं खाना चाहते, इसीलिए यहां नाश्ते में ताजा रोटियां बनाती हैं.’’

‘‘एक यही बात नहीं और भी बहुत बातें हैं, फोन पर क्याक्या बतलाऊं?’’

‘‘सुनो चंद्रा, कोई भी मांबाप अपनी संतान को अपने जमाने के चलन और अपनी सामर्थ्य के अनुसार बेहतर से बेहतर ढंग से पालना चाहता है.’’

‘‘तुम फिर उन्हीं का पक्ष लेने लगीं.’’

‘‘अच्छा, बाद में मिलने पर सुनूंगी और सब. अभी फोन रखती हूं. श्रीकांतजी के आने का समय हो रहा है, तुम भी चायनाश्ते की तैयारी करो,’’ कह कर मैं ने फोन रख दिया.

समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे समझाऊं अपनी इस नादान बिटिया को. जमाईजी भी ऐसी बातें क्यों बताते हैं इस नासमझ लड़की को.

 

कुछ दिनों बाद आखिर अपर्णाजी अपने बेटेबहू के घर गईं. जितने दिन वे वहां रहीं, शिकायतों का सिलसिला थमा रहा. सासूजी वापस गईं, तब चंद्रा और श्रीकांतजी भी उन के साथ गए, क्योंकि वहां एक चचेरे देवर का विवाह था. उस के बाद जब चंद्रा लौटी, तो फिर उस की शिकायतों का सिलसिला शुरू हो गया. एक दिन कहने लगी, ‘‘मां तुम्हें पता है, मेरी सासूजी मेरी देवरानी को कितना दबा कर रखती हैं?’’

मैं चौंकी, ‘‘लेकिन वे तो फोन पर तुम्हारी और तुम्हारी देवरानी की भी सदा तारीफ ही किया करती हैं.’’

‘‘तारीफ करकर के ही तो उस बेचारी का सारा तेल निकाल लेती हैं.’’

‘‘देखो बिटिया, गृहस्थी में काम तो सभी के घर रहता है. तुम्हारी 2 जनों की गृहस्थी में भी काम तो होंगे ही.’’

वह चिढ़ कर बोली, ‘‘उन्हें प्यारी भी तो वही लगती है. असल में जो पास रहता है, वही  प्यारा भी लगता है. दूर वाला तो मन से भी दूर हो जाता है.’’

‘‘क्या कह रही हो चंद्रा, मांबाप के लिए तो उन के सभी बच्चे बराबर होते हैं. वैसे, मुझे तो लगता है कि दूर रहने वालों की याद मांबाप को अधिक सताती है.’’

उस ने कहा, ‘‘अच्छा, छोड़ो यह सब. अब बतलाओ, तुम लोग कब आ रहे हो?’’

‘‘तुम्हारे पापा से बात करती हूं.’’

आखिर हम ने चंद्रा के यहां जाने का कार्यक्रम बना ही लिया. वहां जा कर 4-5 दिन तो ठीकठाक गुजरे. उस के बाद देखा कि वह हमेशा श्रीकांतजी पर रोब जमाती रहती. जबतब मुंह फुला कर बैठ जाती. वे बेचारे खुशामद करते आगेपीछे घूमते रहते. उसके झगड़े की मुख्य वजह होती थी कि वे दफ्तर देर से लौटते समय उस का बताया सामान लाना क्यों भूल गए या देर से क्यों आए अथवा अमुक काम उस के मनमुताबिक क्यों नहीं किया?

हम लोग उसे समझाने की कोशिश करते कि नौकरी वाले को तो काम अधिक होने की वजह से देर हो ही जाती है, इस में उन का भला क्या दोष. घर आने की हड़बड़ी में कभीकभी बाजार का भी कोई काम छूट सकता है, इस बात के लिए इतना गुस्सा करना भी ठीक नहीं. लेकिन श्रीकांत अपने भुलक्कड़ स्वभाव से मजबूर थे, तो वह अपने गुस्सैल स्वभाव से.

एक दिन मैं ने उसे फिर समझाना चाहा, तो वह बिगड़ कर बोली, ‘‘अब तुम भी मेरी सास की तरह बातें करने लगीं. वे हम दोनों के बीच पड़ती हैं, तो मुझे एकदम अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘जैसे मैं तुम्हारी मां हूं, वैसे ही वे दामादजी की मां हैं. बच्चों को आपस में लड़तेझगड़ते देख कर मांबाप को तकलीफ तो होती ही है. फिर इस झगड़े का तुम दोनों के स्वास्थ्य पर भी तो बुरा असर पड़ सकता है. समझाना हमारा फर्ज है बाकी तुम जानो.’’

मेरी इस बात का चंद्रा पर कुछ प्रभाव तो पड़ा. अब वह जमाईजी पर कम ही नाराज होती है पर सास की बुराई का सिलसिला चलता रहा. श्रीकांतजी के सामने भी वह उन की मां की निंदा करती. जब अपने बारे में कहने को अधिक नहीं बचता, तो अपनी देवरानी को माध्यम बना कर वह सास में खोट निकालती रहती. एक दिन कहने लगी, ‘‘उस बेचारी को तो सब के खाने के बाद अंत में बचाखुचा खाना मिलता है.’’

मैं ने सोचा, इस की हर बात तो झूठ नहीं हो सकती. मैं इस की सास से मिली ही कितना हूं, जो उन्हें पूरी तरह से जान सकूं.

आखिर हमारी छुट्टी पूरी हुई और हम दोनों अपने घर लौट आए.

कुछ ही दिनों बाद सूचना मिली कि बिटिया की सास अपर्णाजी बीमार हैं. चंद्रा और श्रीकांतजी उन्हें देखने गए थे. हमारा कार्यक्रम देर से बना इसलिए जब हम पहुंचे तब तक वे दोनों वापस जा चुके थे. अपर्णाजी की तबीयत भी कुछ सुधर गई थी, पर कमजोरी काफी थी और डाक्टर ने अभी उन्हें कुछ दिन आराम करने की सलाह दी थी.

मैं ने गौर किया, चंद्रा की देवरानी जितनी हंसमुख है, उतनी ही कर्मठ भी. वह बड़े मन से अपनी सास अपर्णाजी की सेवा में लगी रहती. मैं ने यह भी देखा कि वह खाना सब से आखिर में खाती. सास बिस्तर पर पड़ीपड़ी उसे पहले खाने के लिए कहती रहतीं.

एक दिन मैं ने भी टोका, ‘‘सुष्मिता बेटा, तुम भी सब के साथ खा लिया करो न. रोजरोज देर तक भूखे रहना ठीक नहीं है.’’

वह हंसती हुई बोली, ‘‘बच्चे स्कूल से देर से आते हैं इसलिए उन्हें खिलाए बिना मुझ से खाया ही नहीं जाता. कभी ज्यादा भूख लग जाए, तो उन से पहले खाने बैठ जाऊं तो ग्रास मेरे गले से नीचे नहीं उतरता.’’

‘‘हां, मां का मन तो कुछ ऐसा ही होता है,’’ मैं बोली.

बच्चे खाने में देर भी बहुत लगाते. दोनों ही छोटे थे और उन्हें बहलाफुसला कर खिलाने में काफी समय लग जाता था.

बिटिया रानी को यह सब बतलाती, तो वह कहती, ‘‘अरे, तुम नहीं जानतीं मेरी सास का असली रूप. उन के डर से ही तो वह बेचारी दिनरात भूखीप्यासी लगी रहती है और सब से आखिर में खाती है.’’

बहुओं के प्रति उस की सास के निश्छल स्नेह में मुझे तो कोई बनावट नजर नहीं आई थी, लेकिन मेरी बिटिया रानी को कौन समझाए, वह तो अपने पति श्रीकांतजी के कान भी उन की मां के विरुद्ध झूठीसच्ची बातें कह कर भरती रहती. नमकमिर्च लगा कर कही गई उस की झूठी बातों पर धीरेधीरे जमाईजी यकीन भी करने लगे थे.

जमाईजी और बच्चे सुबह के गए शाम को घर लौटते थे. चंद्रा अकेली घर पर ऊबती रहती थी. एक दिन मैं ने उस से कहा, ‘‘तुम भी कहीं कोई काम क्यों नहीं खोज लेतीं. इस से वक्त तो अच्छा कटेगा ही, तुम्हारी पढ़ाईलिखाई भी काम में आ जाएगी.’’

मेरी बात उसे जंच गई. वह अखबारों में विज्ञापन देख कर नौकरी के लिए आवदेन करने लगी. संयोगवश उसे उस की योग्यता के अनुरूप नौकरी मिल गई.

अब वह व्यस्त हो गई. चुगलीचर्चा का वक्त उसे कम ही मिलता था. अपने पति से

भी उस की अच्छी पटने लगी. निंदा के बदले उन की प्रशंसा ही करती कि वे घर के कामों में भी उस की मदद करते हैं, क्योंकि सुबह दोनों को लगभग साथ ही निकलना होता है.

उसकी गली में- भाग 2 : आखिर क्या हुआ उस दिन

इस की वजह यह थी कि केस मेरे पास आने से उस की बेइज्जती हुई थी. थाने में 4-5 सिपाही उस के पक्के चमचे थे. मैं ने विलायत को लौकअप के बजाय अलग कमरे में सुलाया था. जाहिर है, उस के फरार होने से मेरी ही बदनामी होनी थी. मुलजिम तो दीवार तोड़ कर जा नहीं सकता था. मुझे यकीन हो गया कि उसे भगाने में बलराज की ही साजिश थी. मैं विलायत अली के घर पहुंचा. उस के बूढ़े बाप ने दरवाजा खोला. मुझे देख कर वह कांपने लगा. मांबहन भी बाहर आ गईं. सभी बुरी तरह से डरे हुए थे. मां ने पूछा, ‘‘थानेदार साहब, मेरा पुत्तर तो अच्छा है न?’’

उस की बात का जवाब दिए बिना मैं ने फौरन घर की तलाशी ली. पर विलायत अली वहां नहीं था. मैं ने उस की मां से कहा, ‘‘तेरे पुत्तर को मेरी मेहरबानी रास नहीं आई. वह थाने से फरार हो गया है. सचसच बता दे कि वह कहां छिप सकता है? इसी में उस की खैर है.’’ ‘‘मुझे नहीं मालूम वह कहां है. पर मैं तुम से कुछ नहीं छिपाऊंगी. उस की पूरी कहानी बताए देती हूं. साहब मेरा बेटा विलायत स्कूल के सामने ठेली लगा कर कुल्फी बेचता था. पता नहीं कैसे स्कूल की एक मास्टरनी सुलेखा का दिल उस पर आ गया. कुछ दिन तो यह सब चला, फिर उस मास्टरनी ने सब कुछ भुला कर किसी और से शादी कर ली.

‘‘इस से मेरे बेटे को इतनी ठेस पहुंची कि वह फकीरों की तरह मारामारा फिरने लगा. उस ने अपना कामधंधा सब छोड़ दिया. सुबह को घर से जाता तो शाम को ही घर आता. 4-5 दिन पहले पुलिस उसे चोरी के आरोप में पकड़ ले गई. साहब, मैं दावे से कह सकती हूं कि मेरा बेटा चोरी हरगिज नहीं कर सकता. मुझे तो इस में उस मास्टरनी की ही साजिश लगती है.’’

उस की बात सुन कर मैं बाहर आ गया. मेरा इरादा मास्टरनी के घर जाने का था. मास्टरनी की गली में नुक्कड़ पर पान की दुकान थी. वहीं पर मैं ने जीप रुकवा ली. पान वाला मुझे जानता था. मैं ने उस से विलायत अली और मास्टरनी के बारे में पूछा तो उस ने मास्टरनी के बारे में मुझे ढेर सारी जानकारी दी. मैं पान वाले की दुकान पर खड़ा था, तभी मास्टरनी के घर से एक आदमी साइकिल ले कर निकला. पता चला कि वह उस मास्टरनी का पति नजीर था, जो इनकम टैक्स विभाग में चपरासी था. उस के पीछेपीछे मास्टरनी भी दरवाजे तक आ गई. मैं देख कर हैरान रह गया कि अदने और साधारण से आदमी से खूबसूरती की मल्लिका मास्टरनी ने शादी कैसे कर ली?

और तो और, वह उम्र में भी उस से काफी बड़ा था. उस की पहली बीवी मर चुकी थी. यह मकान उस ने 4-5 महीने पहले ही लिया था. इस से पहले वह एक कमरे में किराए पर रहता था. चपरासी की नौकरी में उस ने इतना आलीशान मकान कैसे खरीद लिया, इस बात की मुझे हैरानी हो रही थी. अभी मैं सोच ही रहा था कि गनपतलाल लपक कर मेरे पास आया. मैं उसे अच्छी तरह से जानता था. उस का अपनी पार्टी में अच्छा रसूख था. हाथ मिला कर वह मुझ से घर चलने का अनुरोध करने लगा. मैं ने उस से कहा कि मैं नजीर के बारे में मालूम करने आया था. इस पर उस ने कहा, ‘‘फिर तो आप मेरे साथ चलिए. उस के बारे में मुझ से ज्यादा कौन बता सकता है.’’

मेरा मकसद विलायत तक पहुंचना था. सोचा कि शायद गनपतलाल से ही उस के बारे में कोई जानकारी मिल जाए, इसलिए मैं उस के साथ उस की कोठी में चला गया. मेरे पूछने पर उस ने बताया, ‘‘नजीर काफी तेज बंदा है. वह मेरे पास अकसर आताजाता रहता है. इनकम टैक्स में चपरासी है, पर उस की काफी पैठ है. शायद उस ने अभी कोई लंबा हाथ मारा है, जो कोठी खरीद ली है. खान साहब, इस की बीवी बड़ी खूबसूरत है. पता नहीं इस ने क्या चक्कर चलाया कि उस ने इस से शादी कर ली.’’ मैं ने पूछा, ‘‘आप इस की बीवी के बारे में कुछ जानते हों तो बताएं.’’

वह कुछ सोचते हुए बोला, ‘‘खान साहब, मैं उस की मां को ही बुलवा लेता हूं. आप जो चाहें, उसी से पूछ लेना.’’ कह कर उस ने अपने एक आदमी को कुछ कह कर भेज दिया. करीब 10 मिनट में उस का आदमी एक बूढ़ी औरत को बुला लाया. वह औरत डरीसहमी थी. उस के माथे पर पट्टी बंधी थी. मैं ने पूछा, ‘‘अम्मा, कल रात एक मुलजिम थाने से फरार हुआ है. मैं ने सुना है कि तुम्हारी बेटी का उस से नाम जोड़ा जाता रहा है.’’

मेरी इस बात से उस का चेहरा उतर गया, वह दुखी हो कर बोली, ‘‘साहब, मेरी बेटी का उस से कोई ताल्लुक नहीं था, वह लड़का ही उस के पीछे पड़ा था. अब शादी के बाद वह बात भी खत्म हो गई,’’

उस की बात से मैं संतुष्ट नहीं था. इसलिए वहां से 12 बजे के करीब मैं थाने आ गया. थाने में सब के मुंह पर हवाइयां उड़ रही थीं. मैं डीएसपी साहब के कमरे में पहुंचा. बलराज मुंह फुलाए एक कोने में खड़ा था. डीएसपी साहब काफी गुस्से में थे. मेरे सैल्यूट के जवाब में बोले, ‘‘क्या रिपोर्ट है नवाज?’’

मैं ने कहा, ‘‘सर, सुबह से उसी कोशिश में लगा हुआ हूं, पर अभी कुछ पता नहीं चला.’’

‘‘नवाज खां, कोशिश नहीं, मुझे रिजल्ट चाहिए और मुलजिम मिलना चाहिए. तुम्हें पता नहीं कि यहां क्या हुआ? आधे घंटे पहले थाने के सामने 2 हजार आदमी जमा हो गए थे. वे मांग कर रहे थे कि पुलिस के जुल्म से जो आदमी मरा है, उस की मौत की जिम्मेदार पुलिस है. मरने वाले की लाश हमें दो.’’ डीएसपी साहब ने गुस्से में कहा.

बलराज तीखे स्वर में बोला, ‘‘यह सब नवाज खान की नरमी की वजह से हुआ.’’

‘‘खामोश रहो,’’ मैं डीएसपी साहब की मौजूदगी में चिल्ला पड़ा, ‘‘यह मेरी नरमी की वजह से नहीं, तुम्हारी सख्ती का नतीजा है. तुम ने उसे जानवरों की तरह मारा. तुम ने उस से पैसे वसूल किए. तुम्हारे मातहत ने उस की मांबहन को तंग किया. सिर्फ तुम्हारी वजह से वह छत से कूद कर खुदकुशी कर रहा था. गनीमत समझो कि टाहम पर पहुंच कर मैं ने उसे बचा लिया, वरना तुम्हारी तो बेल्ट उतर चुकी होती.’’ मेरा गुस्सा देख कर बलराज चुप हो गया. इस बार डीएसपी साहब नरमी से बोले, ‘‘देखो, आपस में अंगुलियां उठाने से कोई फायदा नहीं. यह हमारी इज्जत का सवाल बन गया है. कुछ सियासी लोग मामले को हवा दे रहे हैं. इस वक्त साढ़े 12 बजे हैं. कल सुबह साढ़े 10 बजे तक मुलजिम मिल जाना चाहिए. हमारे पास 22 घंटे हैं. उसे ढूंढ़ कर लाना तुम दोनों की जिम्मेदारी है. इस बारे में जो मदद चाहिए, वह मिलेगी. एसपी साहब भी कौन्टैक्ट में हैं.’’

मैं अपने कमरे में गया. एएसआई विलायत अली के 4 दोस्तों को पकड़ लाया था, पर उन से कोई खास बात मालूम नहीं हो सकी थी. बस यही पता चला कि विलायत स्कूल के सामने कुल्फी बेचता था. मास्टरनी जुलेखा उसी स्कूल में पढ़ाती थी. एक दिन वह स्कूल से निकल कर तांगे में बैठी तो घोड़ा बिदक कर भागा. विलायत अली फौरन तांगे के पीछे भागा. कुछ दूर दौड़ कर वह उस पर चढ़ गया. तांगा एक पुलिया से टकराया और नहर में गिर गया. जुलेखा पानी के तेज बहाव में बहने लगी. बड़ी मुश्किल से विलायत ने उसे बचा कर बाहर निकाला.

तुम बिन जिया जाए कैसे- भाग 2

प्रेम बोला, ‘‘मैं तो ठीक हूं पर तू कितनी अच्छी तरह जी रहा है वह मैं देख रहा हूं. पतिपत्नी में नोकझोंक चलती रहती है. इस का यह मतलब थोड़े न है कि दोनों अपनेअपने रास्ते बदल लें. अब भी कहता हूं जा कर भाभी को ले आओ.’’

थोड़ी देर बैठने के बाद प्रेम यह कह कर वहां से चला गया कि उस की पत्नी उस का इंतजार कर रही होगी. रात को अमन को नींद नहीं आ रही थी. वह सोच रहा था कि क्या उस ने अपर्णा को मायके जाने को मजबूर किया या वह खुद अपनी मरजी से गई? और संजू, वह बेचारा क्यों पिस रहा है उन के बीच? उस का कभी मन होता कि जा कर अपर्णा को मना कर ले आए, फिर मन कहता नहीं बिलकुल नहीं, खुद गई है तो खुद ही वापस आएगी. उसे फिर अपर्णा की जलीकटी बातें याद आने लगीं…

‘‘जब तुम्हारे औफिस में मीटिंग थी और डिनर भी वहीं था तो मुझे बताया क्यों नहीं? कब से भूखीप्यासी तुम्हारे इंतजार में बैठी हूं… और अभी आ कर बोल रहे हो कि खा कर आया हूं. आखिर समझते क्या हो अपनेआप को? क्या तुम मालिक हो और मैं तुम्हारी नौकरानी?’’

अमन के औफिस से आते ही चिल्लाते हुए अपर्णा ने कहा.

‘‘ऐसी बात नहीं है अपर्णा, मुझे तो पता भी नहीं था कि आज औफिस में डिनर का भी प्रोग्राम है. जब मुझे पता चला तो मैं तुम्हें फो  करने ही जा रहा था, पर नमनजी मुझे खींच कर खाने के लिए ले गए और फिर मेरे दिमाग

से बात निकल गई,’’ अमन ने सफाई देते हुए कहा. मगर अपर्णा कहां सुनने वाली थी. कहने लगी, ‘‘नहीं अमन, बात वह नहीं है. बात यह है कि तुम कमा कर लाते हो न इसलिए अपनी मन की करते हो… जानबूझ कर मुझे सताते हो… जानते हो जाएगी कहां?’’

‘‘अरे, मैं कह रहा हूं न कि मुझे पता नहीं था कि वहां डिनर का भी प्रोग्राम है. कब से दिमाग खराब किए जा रही हो… जाओ जो समझना है समझो,’’ अमन ने खीजते हुए कहा.

‘‘इस में समझना और समझाना क्या है? देखना, एक दिन मैं तुम्हें और इस घर को छोड़ कर चली जाऊंगी. तब तुम्हें पता चलेगा… तुम यह न समझना कि मेरा कोई ठिकाना नहीं है… क्योंकि अभी भी मेरा मायका है जहां मैं जब चाहूं जा कर रह सकती हूं,’’ अपर्णा गुस्से से बोली.

आखिर सहन करने की भी एक सीमा होती है. अब अमन का गुस्सा 7वें आसमान पर पहुंच चुका था. अत: बोला, ‘‘जाओ, मैं भी तो देखूं, मेरे अलावा कौन तुम्हारे नखरे उठाता है… मेरी भी जान छूटेगी… तंग आ गया हूं मैं तुम्हारे रोजरोज के झगड़ों से.’’

अपर्णा यह सुन कर अवाक रह गई, ‘‘क्या कहा तुम ने जान छूटेगी तुम्हारी

मुझ से? तो फिर ठीक है, मैं कल ही जा रही हूं अपनी मां के घर और तब तक नहीं आऊंगी जब तक तुम खुद लेने नहीं आओगे.’’

‘‘मैं लेने आऊंगा, भूल जाओ… खुद ही जा रही हो तो खुद ही आना… न आना हो तो मत आना,’’ अमन ने दोटूक शब्दों में कहा.

‘‘क्या तुम मुझे चैलेंज कर रहे हो?’’

‘‘यही समझ लो.’’

‘‘तो फिर ठीक है, अब मैं इस घर में तभी पांव रखूंगी जब तुम मुझे लेने आओगे,’’ कह वह दूसरी तरफ मुंह कर सो गई. पूरी रात दोनों दूसरी तरफ मुंह किए सोए रहे. सुबह भी दोनों ने एकदूसरे से बात नहीं की. अमन के औफिस जाते वक्त अपर्णा ने सिर्फ इतना कहा कि घर की दूसरी चाबी लेते जाना.

आज अपर्णा और संजू को गए 2 महीने हो चुके थे पर न तो अपर्णा की आने की कोई उम्मीद दिख रही थी और न ही अमन की उसे बुलाने की… पर तड़प दोनों रहे थे. और बेचारा संजू… उसे किस गलती की सजा मिल रही थी…

शाम को औफिस से आते ही अमन ने हमेशा की तरह अपने दोस्त को फोन लगाया, ‘‘हैलो विकास, क्या कर रहा है यार? अगर फुरसत हो तो आ जा… बाहर से ही कुछ खाना और्डर कर देंगे.’’

‘‘ठीक है, देखता हूं,’’ विकास बोला.

विकास ने भी आते ही यही बात दोहराई कि अपर्णा के न रहने से उस का घर घर नहीं लग रहा है.

थोड़ी देर बैठने के बाद वह भी जाने लगा तो अमन बोला, ‘‘अरे बैठ न यार… क्या जल्दी है… मैं ने पिज्जा और्डर किया है खा कर जाना.’’

तो विकास कहने लगा, ‘‘नहीं रुक पाऊंगा यार… तुम्हें तो पता है मेरी बेटी मेरे बगैर सोती नहीं है और पिज्जा तो मैं खाता ही नहीं हूं… चल गुडनाइट,’’ कह वह चला गया.

‘यही सब दोस्त, कभी घंटों मेरे घर में गुजार देते थे और आज एक पल भी रुकना इन्हें भारी पड़ने लगा है,’ किसी तरह पिज्जे का 1 टुकड़ा अपने मुंह में डाला, पर खाया नहीं गया. कितने प्यार से उस ने पिज्जा और्डर किया था पर अब खाने का मन नहीं कर रहा था. तभी उसे याद आ गया कि कैसे संजू पिज्जा खाने के लिए बेचैन हो उठता था.

बड़ी मुश्किल से देर रात गए अमन को नींद आई. सुबह वक्त का पता ही नहीं चला कि कब घड़ी ने 8 बजा दिए. जल्दी से तैयार हो कर बिना कुछ खाएपिए औफिस चल दिया. जातेजाते पलट कर एक बार पूरे घर को देखा और फिर कुछ सोचने लगा… शायद उसे भी अब यह एहसास होने लगा था कि अपर्णा के बिना यह घर कबाड़खाना बन चुका है. धिक्कार रहा था वह खुद को. शाम को जब वापस घर आया तो और दिनों के मुकाबले आज मन बिलकुल बुझाबुझा सा लग रहा था. न तो टीवी देखने का मन हो रहा था और नही कुछ और करने का. आज उसे अपर्णा और संजू की बहुत कमी खल रही थी. घर काटने को दौड़ रहा था. सोचा दोस्तों से ही बातें कर ले पर किसी का फोन नहीं लग रहा था, तो कोई फोन नहीं उठा रहा था. वह समझ गया, भले ही लोग बीवीबच्चों से परेशान हो जाते हों पर अगर वे न हों तो फिर जिंदगी बेमानी बन कर रह जाती है.

उधर अपर्णा भी कहां खुश थी. कहने को तो वह अपने मायके आई थी, पर यहां भी रोज किसी न किसी बात को ले कर उस की भाभी सुमन बखेड़ा खड़ा कर देती थी. बातबात पर यह कह कर उसे ताना मारती, ‘‘पता नहीं कैसे लोग लड़झगड़ कर मायके पहुंच जाते हैं… भूल जाते हैं कि यह उन का अपना घर नहीं है

राघव चड्ढा-परिणीति चोपड़ा की शादी का कार्ड हुआ वायरल,चंडीगढ़ में होगा रिसेप्शन

बॉलीवुड एक्ट्रेस परिणीति और आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा जल्द ही शादी के बंधन में बधने जा रहे है. रिपोर्ट्स के मुताबिक परिणीति चोपड़ा और राघव चड्ढा 23-24 सितंबर को उदयपुर में शादी के बंधन में बंधेंगे. वहीं चंडीगढ़ में शादी का भव्य रिसेप्शन ताज होटल, चंडीगढ़ में आयोजित करेंगे. यह जोड़ा अपनी शादी को लेकर काफी गुपचुप रहा है. हालांकि  राघव और परिणीति की आधिकारिक शादी का रिसेप्शन कार्ड खूब वायरल हो रहा है और यह जोड़े की तरह ही बहुत सुंदर है. शादी के रिसेप्शन कार्ड में सफेद खूबसूरत सुनहरी नक्काशी के साथ उनके नाम सबसे स्टाइलिश तरीके से लिखे गए हैं.

शादी के रिसेप्शन के निमंत्रण में लिखा है, “राघव चड्ढा के माता-पिता अलका और सुनील चड्ढा आपको 30 सितंबर 2023 को ताज चंडीगढ़ में अपने बेटे राघव और रीना और पवन चोपड़ा की बेटी परिणीति के रिसेप्शन लंच के लिए आमंत्रित करते हैं.”

राघव-परिणीति की शादी के रिसेप्शन आमंत्रण की एक झलक 

वायरल हुआ राघव-परिणीति की शादी का कार्ड. किसी एक मीडिया हाउस ने परिणीति-राघव के रिसेप्शन कार्ड की झलक दिखाई है. जो बेहद ही खूबसूरत है. व्हाइट और गोल्डन थीम के इस कार्ड में उनके वेडिंग रिसेप्शन की डिटेल है जो चंडीगढ़ के ताज होटल में होगा वो भी 30 सितंबर को. यानि इससे साफ है कि शादी का जश्न कई दिनों तक चलने वाला है.

 

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शादी में शामिल होगें ये मेहमान

रिपोर्ट्स के मुताबिक, आम आदमी पार्टी (आप) के सांसद राघव चड्ढा और बॉलीवुड अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा जल्द ही 23 और 24 सितंबर को राजस्थान के उदयपुर के लीला पैलेस और द ओबेरॉय उदयविलास में शादी के बंधन में बंधेंगे.

शादी समारोह में करीब 200 मेहमान और 50 से ज्यादा वीवीआईपी मेहमान शामिल होंगे. अतिथि सूची में आप सुप्रीमो और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके पंजाब समकक्ष भगवंत मान भी शामिल हैं. परिणीति चोपड़ा की चचेरी बहन प्रियंका चोपड़ा और उनके पति निक जोनास और उनकी बेटी मालती भी इस अवसर की शोभा बढ़ाएंगी.

जी सत्तर नहीं सतरह: सही उम्र नहीं बताना

कोई युवती जब पहली बार मां बनने जाती है तो वह कुछ घबराई, शरमाई सी सारे शरीर को लूज कुरते में छिपाए घूमती है. एक समय ऐसा भी आता है जब उस के और कुरते के सम्मिलित प्रयत्न असफल हो जाते हैं और सबको समाचार मिल जाता है कि वह मां बनने जा रही है. इस का अर्थ है कि वह अब विवाहित है और गुलछर्रे नहीं उड़ा सकती.

वैसे भी युवतियां होश संभालते ही अपनी उम्र छिपाने के प्रयत्न आरंभ कर देती हैं, पर समय बीतने के साथ असफल होती जाती हैं. युवतियां चाहे कितना ही जिम जाएं, ब्यूटीपार्लर जाएं, कितने ही चुस्त कपड़े पहनें, किसी भीतरह से अपने को बनाएंसंवारें, बाल रंगें उन के चेहरे की 1-1 रेखा उनकी उम्र की चुगली करती रहती है.

साधारणतया 70: स्त्रियां अपनी उम्र कम कर के बताने के रोग से पीडि़त होती हैं. इन में से कुछ युवतियों को शृंगार की कला से चिढ़ होती है, इसीलिए उन का चेहरा उन की सही उम्र का खुला विज्ञापन होता है. 10% युवतियां चेहरे पर हलकी सी रेखा के दिखाई देते ही खतरे के अलार्म को सुन लेती हैं.

शृंगारप्रसाधनों की तह गहरी करने लगती हैं ताकि समय के पद्चिह्न छिप जाएं. व्यायाम करने लगती हैं. भोजन में चरबी और कार्बोहाइडे्रट वाली वस्तुएं लेना बंद कर देती हैं और उबली हुई बिना नमक की सब्जी पर संतोष करने लगती हैं.

10% स्त्रियां यद्यपि अपनी उम्र कम कर के बताना पसंद नहीं करतीं, पर उम्र पर बहस छिड़ जाए तो मौन धारण करना श्रेयस्कर मानती हैं. बाकी 10% वे युवतियां हैं, जिन्हें अपनी उम्र कम कर के नहीं बतानी पड़ती क्योंकि लोग खुद ही उन्हें कम उम्र वाली सम झते हैं.

इन 10% स्त्रियों की सही उम्र जानने के पश्चात जब कोई प्रशंसा करते हुए कहता है, ‘‘ओह, आप 34 की हैं, पर आप 24-25 से अधिक की नहीं लगतीं’’ या कोई कहे, ‘‘आप कहती हैं तो मान लेती हूं कि आप 30 वर्ष की हैं, पर मैं दावे से कहती हूं कि कोई आप को 18 से अधिक का नहीं कह सकता.’’इस प्रशंसा को सुन कर कोई भी युवती खुशी से फूली नहीं समाती, जबकि दूसरी युवतियों के मुंह लटक जाते हैं. संक्षेप में यह कि युवती चाहे अपनी उम्र स्वयं कम करे अथवा दूसरे उस की उम्र कम कर दें, वह कम उम्र दिखाई देना ही पसंद करती है.

युवतियों की इस स्वभावगत विशेषता पर गंभीरता से सोचने का अवसर तब मिला जब मु झे 3 महीने के लिए कंपनी ने कोलकाता ट्रांसफर किया. वर्क फ्रौर्म होम था और अकेले समय काटना मुश्किल हो रहा था इसलिए समय काटने के लिए हम ने एक प्राइवेट स्कूल में अस्थायी नौकरी स्वीकार कर ली.पहली भेंट स्कूल की सब से अनुभवी शिक्षिका अतिका बेगम से हुई.

46 वर्ष की थीं, पर 6 वर्ष इस सफाई से कम कर दिए थे कि प्रमाणपत्र भी गवाही देने पर विवश हो गया था. बड़ी ही मुंहफट. उम्र की बात चली नहीं किसब से पहले मैदान में उतर आतीं कि वाह कमलजी, 4 बच्चों की मां बन गईं, फिर भी आप का 22 वर्षीय युवती कहलाने का शौक गया नहीं. क्या सब की आयु स्कूल में आने के समय गलत लिखा दी गई थी. रजिया तुम 22 वर्ष की कैसे हो सकती हो. 20-21 वर्ष तो ग्रैजुएशन की उम्र है? एम.ए., एम.एड. की डिगरी क्या मां के पेट से ले कर जन्मी थी?

यह बात अवश्य थी कि उन के अनुमान बहुधा सही निकलते. परिणाम यह होता किसब शिक्षिकाएं बिगड़ जातीं, ‘तुम्हारा चेहरा कहता है’ यह वह प्रमाणपत्र या अस्त्र था, जिसे प्रदान कर या प्रयोग वह विरोधी को परास्त कर दिया करती थी. एक दिन मुख्याध्यापिका प्रमिलाजी ने हमें बुला कर कहा, ‘‘आप जींस व टौप पहन कर स्कूल न आया कीजिए.

सलवारकुरता बहुत अच्छी पोशाक है. इस से छात्राओं पर प्रभाव भी अच्छा पड़ता है.’’हमारी शामत कि उस दिन हमारे 2 पीरियड खाली थे. कुमारी प्रमिला की ताकीद की बात चली तो विचित्र दृष्टि से हमें देखते हुए बोलीं, ‘‘यह तो गनीमत है कि आप अपनी उम्र से बहुत छोटी दिखाई देती हैं, अतिका बेगम आप को24 वर्ष की मानती हैं तो गलती नहीं करतीं.

मुझे तो आप 20 वर्ष की ही दिखाई देती हैं.’’उस की बात सुन कर मैं फूल गई. पर शीघ्र ही पता चला कि हमें बांस पर चढ़ा कर कोई भूमिका बांधी जा रही थी. वे बोलीं, ‘‘मु झे देखिए न, कदकाठी अच्छी है, सेहत भी माशाअल्लाह खूब है. अच्छा खातीपीती हूं, इसलिए रंग भी खुला हुआ है. बस, सब लोग कहते हैं मैं बुढ़ा गई हूं. अतिका बेगम ने सब को बहका दिया है कि मैं 30 वर्ष की हो गई हूं.’’

मैं ने बड़ी कठिनाई से हंसी रोकी. प्रकट में गंभीर हो कर कहा, ‘‘स्त्री जाति उम्र छिपाने के मामले में बदनाम है न…’’वे हमारी बात काट कर बोलीं, ‘‘तोबा है, क्या मैं भी  झूठ बोलूंगी… लाख कहा कि मैं25 वर्ष की हूं… मानती ही नहीं.’’

मेरे मन में आया कि कह दूं विश्वास दिलाने की आवश्यकता ही क्या है पर वे नाराज हो जाएंगी, इस भय से परामर्श दिया, ‘‘आप उन्हें अपना मैट्रिक का प्रमाणपत्र दिखा दीजिए.’’हमें आश्चर्य हुआ. शिकायत करती हुई सफूरा के मुख के भाव सहसा बदल गए, ‘‘छोडि़ए भी, कौन उन के मुंह लगे,  झूठे को संसार ही  झूठा दिखाई देता है. नरेंद्र मोदी ने कौन सा प्रमाणपत्र आज तक दिखाया है.’’

आमना 3 महीने की छुट्टी पर थीं. इन्हीं के स्थान पर हम काम कर रहे थे. आमना आपा भी अन्य स्त्रियों के समान अपनी आयु कम कर के बताती हैं. हमारी दीदी कुछ दिन के लिए आईं. जितना समय हम स्कूल में बिताते, दीदी आमना आपा के साथ गपशप किया करतीं.

एक रविवार को हम तीनों बैठे चाय पी रहे थे. सहसा आमना आपा बोलीं, ‘‘दीदी, यह बात मेरी सम झ में नहीं आती, आप मु झ से बड़ी हैं, फिर भी मु झे आमना आपा कहती हैं.’’हमारी बहन वैसे बड़े शांत स्वभाव की हैं, पर उस समय उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘‘मु झे अच्छी तरह याद है कि जिस वर्ष मैं ने अमरावती में नवीं कक्षा में प्रवेश लिया था, उसी वर्ष आप ने हायर सैकंडरी पास किया था,’’ दीदी की स्मरणशक्ति के संबंध में आमना आपा भ्रम में थीं.

अपना सा मुंह ले कर रह गईं. घर आ कर हम ने दीदी को खूब शाबाशी दी.हमारी प्रिय सखी फातिमाका विवाह हुआ. हम विवाह में न जा सके, पर  सप्ताह बाद उस की ससुराल पहुंचे. पुराने विचारों के लोग थे. अब तक  फातिमा लाल जोड़े में लिपटी दुलहन बनी बैठी थी.

वह तो क्या बात करती. उस की ननद पूरा  समय हम से बतियाती रही. हम ने दिल्लगी की, ‘‘अच्छा, आप मिठाई कब खिला रही हैं?’’मुंह बिचका कर बोलीं, ‘‘अभी मेरी उम्र ही क्या है. अभी तो मेरी पढ़ाई भी पूरी नहीं हुई.’’ फातिमा वहां से गई तो हम ने यों हीपूछ लिया, ‘‘आप के भैया और फातिमा की उम्र में तो बहुत अंतर होगा.’’फातिमा के पति ने पहली पत्नी की मृत्युके पश्चात यह विवाह किया था. उस की ननदने तुनक कर कहा, ‘‘जी नहीं, ऐसी कोई बात नहीं. देखिए, मैं 23 वर्ष की हूं भाभी (फातिमा) मु झ से 4-5 वर्ष बड़ी होंगी. मेरे भैया अभी35 वर्ष के भी नहीं हुए. यह तो कुछ विशेषअंतर नहीं.’’

फातिमा हम से 8 वर्ष छोटी थी. हम बचपन से उसे जानते थे. चाहते तो वहीं कह सकते थे, पर उस की ससुराल का ध्यान कर के चुप हो गए. फातिमा ने बाद में बताया कि उस की ननद अपनी उम्र को अपने भाई की उम्र बता गई थी. हमें बहुत हंसी आई.कुमारी आशा क्राफ्ट की शिक्षिका. सफूरा और उस की कभी नहीं पटती थी.

एक दिन दोनों में जोरदार  झड़प हो गई. आशा का हमारे साथ खाली पीरियड आया तो उस ने सफूरा की बातें बताईं कि तोबा ही भली. जलभुन कर यहां तक कह दिया, ‘‘संसार भर में अपने को 25 वर्ष की बताती है, मु झ से पूछो उस की उम्र.

मेरे बड़े भैया की सहपाठिनी थी. मेरे भैया छठे बच्चे के बाप बनने वाले हैं. पूरे 35 वर्ष के हैं.’’कुछ समय पश्चात हमें सफूरा ने पुस्तकालय में घेर लिया, ‘‘वह परकटी क्या कह रही थीआप से?’’हम ने उन के  झगड़े में न पड़ने के उद्देश्य से कह दिया, ‘‘वह आप के विषय में नहीं कह रही थी.’’‘‘नहीं कहा तो अब कहेगी. मैं उसे खूब जानती हूं. इस का बड़ा भाई मेरे साथ पढ़ा था, वह भी इसी के समान बदमाश था और यह आशा थी तो मु झ से 1 वर्ष पीछे पर मेरी कक्षा की लड़कियों से भी  झगड़ती थी.

मेरे लिए कहती फिरती है कि वर नहीं मिल रहा. मुझे नहीं मिलता न सही, यह क्यों बैठी है. यह क्यों नहीं कर लेती अपना विवाह?’’2 के  झगड़े में तीसरे का भला होना है. इस बात पर हम ईमान ले आए (दोनों की सही आयु का जो हमें पता चल गया). पुरुष भी इस मामले में पीछे नहीं. यद्यपि वे इतने बदनाम नहीं हैं. एक घटना हमें याद आ रही है.

3 कवि बैठे पी रहे थे. जब कुछ अधिक चढ़ गई तो एक कवि जो उन में सब से वयोवृद्ध थे, बोले, ‘‘मु झे तो लगता है मैं केवल 40 वर्ष का हूं और अभी जवान हूं.’’दूसरे अधेड़ आयु के कवि बोले, ‘‘मैं तो केवल 25 वर्ष का हूं. मु झे नई शक्ति का अनुभव हो रहा है.’’तीसरा कवि जो 17 वर्ष का किशोर था, दोनोंको अपलक निहारता हुआ बोला, ‘‘इस हिसाब से तो मैं अभी पैदा ही नहीं हुआ हूं.’’स्त्री का बोलना और आयु छिपाना संसारप्रसिद्ध है.

जब स्त्री अपनी उम्र कम करने पर आती है तो बोलती ही चली जाती है.गर्व से मुसकरा कर कहती है, ‘‘देखा हमारा कमाल. 50 को 25 चुटकी बजाते में कर दें. पर, सच यह है कि ये 17 साल के न हुए वरना कह देते कि अभी तो हम पैदा ही नहीं हुए.’’इस भ्रम में न रहिए कि स्त्रियां कभी मौन नहीं रहतीं. स्त्रियों की एक सभा में बातों के शोर से कान फटे जा रहे थे.

छत उड़ी जा रही थी. सहसा मेजबान महिला कमरे के भीतर आ कर बोलीं, ‘‘यहां उपस्थित स्त्रियों में जिन की आयु सब से अधिक हो वे कृपया मेरे पास तशरीफ ले आएं. कुछ परामर्श करना है.’’यह सुनते ही कमरे में मौन छा गया. ऐसे समय में भी भला कोई स्त्री आगे आई है? हमें तो नहीं पता.

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