ओ पिंजरा खोल: अनंत तोरुल को ब्लैकमेल क्यों करने लगा था

तोरुल रसोई में पानी पीने गई तो उस के कानों में एक जानीपहचानी सी आवाज आई, ‘‘अरे विनोद भाई साहब की बड़ी बेटी नीलक्षी को देखा? कितनी सुंदर हैं, ऐसा लगता है कुदरत ने उसे फुरसत में बनाया है.’’तभी भावना चाची हंसते हुए बोली, ‘‘अरे तभी तो अपनी तोरुल को बनाने में कुदरत ने जल्दबाजी करी.’’तोरुल यह सुन कर बिना पानी पीए ही उलटे पैर लौट आई. भीगी आंखें लिए जब तोरुल बाहर पहुंची तो मम्मी बोली, ‘‘अरे तोरुल सारा दिन मुंह पर 12 क्यों बजे रहते हैं.’’तोरुल बिना कुछ बोले ऊपर चली गई.

तोरुल 19 वर्षीय लड़की थी जो अपनी बूआ की बेटी के विवाह में अपने परिवार के साथ आई हुई थी. बचपन से तोरुल अपनी बड़ी बहन नीलक्षी के वजूद के साए में जी रही थी. उस का अपना कोई वजूद ही नहीं था. नीलक्षी को हलके रंग पसंद हैं तो तोरुल भी वही पहनती थी बिना यह जाने कि गहरे रंग उस के गहरे रंग को और दबा देते हैं.

नीलक्षी को नीले, हरे, लाल रंग के लाइनर पसंद हैं तो तोरुल भी वही लगाती है. नीलक्षी को पेंटिंग करना पसंद है तो तोरुल भी करती है. उस का अपना कोई वजूद ही नहीं था. तोरुल वह सब करती जो नीलक्षी करती.तोरुल की आवाज बेहद सुरीली थी, मगर वह बस अकेले में गुनगुनाती थी.

उस के अंदर आत्मविश्वास की बेहद कमी थी. उसे लगता कि अगर वह गाएगी तो लोग उस का मजाक बनाएंगे. जब शाम को शादी में गीतसंगीत हुआ तो नीलक्षी की बेसुरी आवाज तोरुल की सुरीली आवाज भी दब गई.

तभी बूआ बोली, ‘‘अरे तोरुल तू गा न. तेरी आवाज तो बड़ी सुरीली लगती है.’’तोरुल इस से पहले कुछ बोलती मम्मी बोली, ‘‘अरे तोरुल को कहां कुछ आता है? यह तो नीलक्षी के सहारे ही सब करती है.’’बूआ बोली,‘‘ अरे भाभी गाने दो न इसे.’’तोरुल की आवाज पहले फटे बांस जैसी बजी मगर बाद में उस ने सुर संभाल लिए.

उस के बाद एक के बाद एक तोरुल ने अपने गानों से महफिल में रंग जमा दिया.नीलक्षी बोली, ‘‘अरे इस कोयल के बारे में हमें तो अब तक पता ही नहीं था.’’तोरुल को नीलक्षी का कटाक्ष सम झ आ गया. उसे पता था उस की आवाज के कारण नहीं बल्कि उस के गहरे रंग के कारण उसे नीलक्षी ने इस उपाधि से नवाजा है.

पनीली आंखें लिए वह अंदर ही जा रही थी कि तभी पीछे से एक आवाज ने उसे रोक लिया, ‘‘सुनिए आप ने क्या कहीं ट्रेनिग ली हुई है?’’तोरुल ने जैसे ही पीछे मुड़ कर देखा, ‘‘अरे आप की तो आंखें भी बेहद संगीतमय हैं, सागर की लहरों जैसी.’’तोरुल को सम झ नहीं आया कि वह इस बात का क्या जवाब दे, इसलिए वह बिना कुछ कहे तीर की तरह भीतर चली गई.

रात में मेहंदी थी, अपनी बूआ के कहने पर तोरुल ने बूआ की ही महरून जयपुरी चुनर की साड़ी पहन ली. साथ में मोतियों की लड़ी, आंखों में काजल और होंठों पर हलकी सी लिपस्टिक. जब तोरुल बहार आई तो सब की निगाहें एकाएक उस पर टिक गईं.

भावना चाची के मुंह से एकाएक निकल गया, ‘‘तोरुल, तुम ने अपना यह रूप कहां छिपा रखा था?’’रात में तोरुल ने अपनी आवाज और नाच से समां बांध दिया. 2 गहरी काली आंखें लगातार तोरुल का पीछा कर रही थीं.

जब तोरुल अंदर पानी पीने गई तो वही गहरी आवाज फिर से आई, ‘‘सुनिए, आप अपना नंबर देंगी क्या? मैं ने आप का वीडियो बनाया है, आप को भेज दूंगा.’’तोरुल ने जब उसे प्रश्नवाचक नजरों से देखा तो वह बोला, ‘‘मेरा नाम अनंत है, आप जिस की शादी में आई हैं वह मेरी मौसी की बेटी है.’’तोरुल हंसते हुए बोली, ‘‘और मेरी बूआ की बेटी है.’’तोरुल और अनंत ने एकदूसरे को अपना नंबर दे दिया. अनंत पूरे विवाह में तोरुल के इर्दगिर्द घूमता रहा.

अनंत एक मल्टीनैशनल फर्म में इंजीनियर और दिखने में बेहद खूबसूरत था. ऊंचा कद, गोरा रंग और तीखे नैननक्श. विवाह से आने के बाद भी अनंत और तोरुल के बीच कुछ दिनों तक बातचीत होती रही. तोरुल के व्यवहार से अनंत को सम झ आ गया था कि तोरुल के अंदर आत्मविश्वास की बेहद कमी है और वह तोरुल को जैसा चाहे अपने इशारों पर नचा सकता है. अनंत का जब मन करता तो वह घंटों तोरुल से बात करता और कभी वह पूरा दिन गायब रहता.

अनंत तोरुल से गाने की फरमाइश करता तो कभी तसवीरों की और अगर तोरुल अनंत को न भेजती तो वह उस से हफ्तों बात न करता. धीरेधीरे अनंत और तोरुल के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं. तोरुल अब पूरी तरह से अनंत पर निर्भर हो गई थी, मगर अनंत अब तोरुल से बोर हो गया था.

अनंत की बहुत कोशिशों के बावजूद भी तोरुल आलिंगन और चुंबन से आगे नहीं बढ़ रही थी. इसलिए उस ने उस से थोड़ी दूरी बना ली, मगर तोरुल को अनंत का व्यवहार सम झ नहीं आ रहा था. जब भी तोरुल अनंत को मैसेज करती, उस का एक ही जवाब आता, ‘‘बिजी, विल रिप्लाई.’’तोरुल को ऐसा लगने लगा कि वह कैसे अनंत के बिना रह पाएगी?

अनंत ही तो था जो उसे वैलिडेशन देता, जिस के कारण तोरुल को लगता कि वह भी कुछ है.1 महीने से ऊपर हो गया था अनंत का न कोई मैसेज आया और न ही कोई फोन. आखिरकार थक हार कर तोरुल ने अनंत को फोन लगाया तो 2-3 रिंग के बाद अनंत ने कौल लिया.

तोरुल ने उतावले होते हुए कहा, ‘‘कहां गायब थे तुम इतने दिनों से?’’अनंत ने रुखाई से कहा, ‘‘क्या हुआ तोरुल, मैं क्या तुम्हारा बौयफ्रैंड हूं? मैं ने क्या तुम से कोई वादा किया था?’’तोरुल एकाएक सकपका गई, ‘‘अनंत, अगर तुम्हें बुरा लगा हो तो, आई एम सौरी.’’अनंत बोला, ‘‘तोरुल हम मिले और कुछ टाइम साथ गुजारा, कुछ दिन बातें भी कर लीं, मगर अब तो हमारे बीच में कुछ भी नया नहीं है डिस्कस करने के लिए. हमारे बीच में कोई रिश्ता नहीं था बस टाइम पास था.’’अनंत के फोन रखते ही तोरुल की आंखों से आंसू  झर झर बहने लगे.

उसे सम झ नहीं आ रहा था कि वह कैसे अनंत को खुश करे.अगले दिन तोरूल ने हिम्मत करते हुए अपनी टौपलैस तसवीर अनंत को भेज दी. अनंत का थम्सअप आ गया और हार्ट इमोजी.तोरुल एकाएक खुशी से उछल पड़ी. उसे लगा अनंत की भी उस से कुछ उम्मीदें हैं और अगर उसे इस से खुशी मिलती है तो उसे ऐसा करना चाहिए.

अनंत को अच्छे से पता था कि वह तोरुल की कमजोरी है. इसलिए अनंत अपने हिसाब से जैसा चाहे वैसा व्यवहार तोरुल के साथ करता और यह बात बड़े फख्र से वह अपने दोस्तों को बताता. जब मरजी अनंत कौल करता, जब मरजी बात बंद कर देता.

तोरुल को वह बराबर उस की बड़ी बहन से कंपेयर करता और उसे कमतरी का एहसास दिलाता.अनंत को मालूम था कि उसे तोरुल जैसी सीधीसादी लड़की नहीं मिलेगी जो उस के इशारों पर कठपुतली की तरह चलती है.

इसलिए अनंत न तो तोरुल को छोड़ पा रहा था और न ही उसे स्वीकार कर पा रहा था.अनंत का जब मन करता तोरुल को वीडियो कौल करता और वह उसे न्यूड होने के लिए कहता. तोरुल का अंदर से मन नहीं करता था मगर अनंत को खोने के डर के कारण वह सबकुछ करती.

तोरुल को महसूस होता था जैसे वह एकसमान हों. मगर अनंत तोरुल से कहता, ‘‘मैं तो फिर भी तुम से सैक्स करने के लिए नहीं कह रहा हूं क्योंकि तुम अपनी बड़ी बहन की तरह नाजुक और गोरी नहीं हो. तुम्हें न्यूड देख कर खुद को तुम्हारे लिए तैयार करने की कोशिश करता क्योंकि हौटनैस तो तुम्हारे अंदर जीरो है.’’अनंत भले ही यह तीखी बात मजाकमजाक में कहता मगर तोरुल अंदर से टूट जाती.

वह खुद में सिमट जाती. एक दिन तो हद हो गई. तोरुल बाहर थी मगर अनंत के कहने पर वह वाशरूम में जा कर अनंत की जरूरतों को पूरा कर रही थी. तोरुल एक भंवरजाल में फंस गई. नीलक्षी से कहती तो बात मम्मीपापा तक पहुंचने का डर था.

बारबार अनंत का यह कहना कि तोरुल जैसी सामान्य शक्लसूरत की लड़की को कोई दूसरा बौयफ्रैंड नहीं मिल पाएगा, तोरुल को कोई कदम उठाने से रोक रहा था.इस बात का असर तोरुल के जीवन के हर पहलू पर पड़ रहा था.

बोलती तो वह पहले भी कम थी, मगर अब एकदम चुप हो गई थी.तोरुल के एग्जाम शुरू होने वाले थे,मगर उस की तैयारी जीरो थी. उसे मालूम था अगर परिणाम अच्छा नहीं रहा तो भविष्यअंधकार में होगा. तोरुल ने निश्चय कर लियाथा कि अब 1 माह तक वह अनंत से दूरी बना कर रखेगी.

1 हफ्ता हो गया था. तोरुल का न कोई मैसेज न कोई कौल, तोरुल का यह व्यवहारअनंत के लिए अजीब था. खुद से पहल करते हुए अनंत का इगो आड़े आ रहा था. उस ने रोब जमाते हुए तोरुल को मैसेज किया, ‘‘मेरी जूनियर मु झे से मिलना चाह रही है.

उसे मु झ पर क्रश है, तुम्हारा तो कुछ अतापता नहीं है, क्या मिल लूंउस से? बहुत सुंदर, नाजुक और गोरी है और एकदम परफैक्ट फिगर, कुछ तसवीरें भी भेजी हैं उस ने.’’तोरुल को एकाएक अनंत के व्यवहार से घृणा सी हो गई, इसलिए उस ने मैसेज किया, ‘‘तुम्हारी जिंदगी,तुम्हारी मरजी.’’अनंत को तोरुल से ऐसे व्यवहार की उम्मीद नहीं थी, इसलिए बोला, ‘‘तुम्हें कोई नहीं मिलेगा, चलो जल्दी से वीडियो कौल पर आओ, मु झे तलब हो रही है.’’तोरुल बोली, ‘‘अनंत, मेरे एग्जाम करीब हैं, मैं कुछ नहीं करूंगी.’’‘‘अगर, तुम कुछ नहीं करोगी, तो मैं उस जूनियर से बोल देता हूं,’’

अनंत बोला.तोरुल ने बिना कोई जवाब दिए, फोन एक तरफ रख दिया.10 दिन बीत गए थे, तोरुल को लगा वह अब पहले से अधिक खुश है. उसे कोई ऐसा काम नहीं करना पड़ रहा जो वह करना नहीं चाहती थी.तोरुल अपनेआप में खुश थी. न जाने उस के अंदर क्या बदलाव आ गया था कि उसे किसी वैलिडेशन की जरूरत महसूस नहीं हो रही थी.

वह अपने रंग और वजन के साथ खुश थी. तोरुल को अपनेआप से प्यार हो गया था. अनंत के जिंदगी में आने के बाद ही तोरुल ने अपनी कीमत को जाना था. रात के 11 बज रहे थे. अनंत ने तोरुल को मैसेज किया, ‘‘न्यूड भेजो, मन कर रहा है.’’तोरुल ने टैक्स्ट पढ़ कर डिलीट कर दिया. उसे अपना समय और ऊर्जा अनंत जैसे लड़कों में लगाने का अब कोई मन नहीं था.

अनंत ने अगले दिन कौल किया, यहअनंत की चौथी कौल थी, इसलिए तोरुल नेउठा ली.अनंत गुर्राते हुए बोला, ‘‘बहुत पंख लग गए हैं तुझे.

फटाफट फोटो भेज वरना मैं तेरी पहले की तसवीरें इंटरनैट पर डाल दूंगा.’’तोरुल पहले तो डर गई मगर फिर हिम्मत जुटाते हुए बोली, ‘‘हजारों तसवीरें पड़ी हैं इंटरनैट पर, एक मेरी भी सही और तुम यह करो तो सही मैं तुम्हें जेल की हवा खिलाती हूं.’’एकाएक अनंत ने अपना स्वर बदल दिया, ‘‘अरे पगली… बाबू मान जा, तुम तो मेरा काला हीरा हो.’’तोरुल ने कहा, ‘‘देर से ही सही, तुम्हारा असली चेहरा पहचान तो आ गया.’’अनंत ने रामबाण फेंका, ‘‘रह लोगी तुम मेरे बिना, हर कोई लड़का मेरी तरह नहीं होता है.

सब लड़कों को गोरी, पतली और लंबी गर्लफ्रैंड चाहिए होती है.’’तोरुल सधे स्वर में बोली, ‘‘तुम भी ढूंढ़ लो अनंत. मैं ने खुद को सुंदरता और उस पर आधारित रिश्तों के पिंजरे से आजाद कर लिया है. जैसी हूं जो भी हूं मैं खुद के लिए काफी हूं,’’ और फिर फोन रखने के बाद आत्मविश्वासी कदमों के साथ तोरुल ने वैलिडेशन का पिंजरा तोड़ दिया. अब वह आत्मविश्वास के पंखों के साथ खुले आसमान में उड़ गई जहां वह खुल कर सांस ले सकती थी.

अपनापन: भाग 1-मोनिका को विनय की सेक्रेटरी क्यों पसंद नहीं थी?

हम ने अभी 2 माह पहले ही अपने इस नए घर में शिफ्ट किया है. विनय के औफिस में उन दिनों काम बहुत था. कुछ विदेशी क्लाइंट आए हुए थे, इसलिए वे सुबह जल्दी ही घर से निकल जाते और उन के वापस आने का भी कोई समय तय नहीं रहता था.

अंकित के स्कूल की छुट्टियां चल रही थीं, इसलिए मैं पूरा दिन घर को सजानेसंवारने और सामान को सैट करने में जुटी रहती. दिन कब बीत जाता कुछ पता ही नहीं लगता. अभी यहां कोई कामवाली बाई भी नहीं मिली, जो मेरी कुछ मदद ही कर देती.

भीड़भाड़ वाले शहर से दूर यह नया बस रहा सैक्टर है. इक्कादुक्का कोठियों में ही लोग रह रहे हैं. ज्यादातर घर अभी बन ही रहे हैं. आसपड़ोस में कोई है ही नहीं. दूरदूर जो इक्कादुक्का कोठियां आबाद भी हैं, उन में रहने वालों से जानपहचान करने का अभी समय ही नहीं मिला.

वैसे हम भी इतनी जल्दी इस सुनसान सी जगह में शिफ्ट नहीं करना चाहते थे, लेकिन एक तो अपने नए बने घर का शौक दूसरा हम जिस किराए के घर में रह रहे थे उस का लीज टाइम खत्म हो चुका था, इसलिए हम ने यहीं आना तय कर लिया.

उस दिन मैं किचन में क्रौकरी, बरतन, दालों के डब्बे आदि लगाने में व्यस्त थी, तभी बैडरूम से आई जोरदार धमाके की आवाज ने मुझे चौंका दिया. घबराई हुई जब मैं बैडरूम में पहुंची तो वहां का मंजर देख कर मुझे चक्कर सा आ गया. मैं ने तुरंत स्वयं को संभाला क्योंकि यह घबराने का नहीं बल्कि अंकित को संभालने का समय था.

मुझे समझते देर नहीं लगी कि अंकित शायद मेरी मदद करने के खयाल से अपने खिलौनों और किताबों के डब्बों का सामान अलमारी के ऊपर रख रहा था कि स्टूल से उस का पैर फिसल गया. वह जहां गिरा था वहां कांच के फूलदान और शोपीस रखे हुए थे. उस के उन पर गिरने से वे टूट गए और कांच के टुकड़े उस के हाथपैरों में कई जगह चुभ गए. इस से उस को कई जगह से खून बहने लगा.

उसे प्यार से ‘कुछ नहीं हुआ घबराओ नहीं,’ कहते हुए मैं ने उसे वहां से उठाया और उस के जख्मों को डिटौल से साफ करने लगी. एक जगह पर गहरा घुसा कांच का टुकड़ा बाहर निकाला तो वहां से खून की तेज धार बह निकली, जिसे देख कर मैं घबरा गई.

इस नई जगह पर आसपास डाक्टर कहां मिलेगा? औटो या टैक्सी

भी कैसे और कहां आएगी? अंकित का चेहरा दर्द से पीला पड़ता जा रहा था. ऐसे में मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा था. अब तक सारे घरेलू उपचार मैं आजमा चुकी थी, लेकिन हालत बिगड़ती ही जा रही थी. मैं ने घबरा कर विनय को फोन मिला ही दिया, यह जानते हुए भी कि वे इस समय बहुत जरूरी मीटिंग में होंगे.

उन के फोन उठाते ही मैं एक ही सांस में सब कुछ कह गई. मुझ पर एकएक पल भारी पड़ रहा था. भूमिका बांधने का तो समय ही नहीं था. मेरी बात पूरी होते ही उधर से आवाज आई ‘‘ओह, सर तो बहुत जरूरी मीटिंग में हैं. मैं देखती हूं क्या कर सकती हूं, आप घबराएं नहीं.’’

इतना सुनते ही मैं जैसे आसमान से जमीन पर आ गिरी. यह तो विनय की सेके्रटरी मोनिका की आवाज थी. जब से यह विनय के औफिस में आई है, मेरे और विनय के बीच एक अदृश्य दीवार बन कर खड़ी हो गई है.

जबजब विनय उस की बात करते हैं, उस के काम के तरीके की तारीफ करते हैं, उस से फोन पर बात करते हैं, तो उस अदृश्य दीवार की चौड़ाई बढ़ती जाती है. मैं अपने भीतर एक अजीब सी घुटन महसूस करने लगती हूं. इसलिए जब कभी भी विनय औफिस के बारे में बातें करते हैं, मेरी निगाहें उन के चेहरे पर, उन के कपड़ों पर, उन के शरीर पर जैसे कुछ ढूंढ़ने सी लगती हैं. मैं एकटक उन के चेहरे के भावों को पढ़ने लगती हूं. बातोंबातों में उन्होंने कितनी बार मोनिका का नाम लिया, मन ही मन गिनने लगती हूं. ऐसे में उन की बातों में मेरा ध्यान ही नहीं रहता.

अपनी बसीबसाई गृहस्थी और अंकित के भविष्य की चिंता मुझे घेरे रहती है. बातचीत के दौरान विनय कभी कुछ पूछ बैठें, तो मेरे पास उन के सवाल का ठीक उत्तर नहीं होता. वे शुरूशुरू में तो ‘तुम कहां खोई हो’ कह कर रह जाते थे, लेकिन अब धीरेधीरे मेरे इस व्यवहार से खीजने लगे हैं. मेरे इस बरताव से तंग आ कर मेरी निगाहों की भाषा पढ़ने लग गए हैं, इसलिए अब वे पहले की तरह मुझ से घंटों औफिस की बातें नहीं करते. भले ही काम के बढ़ जाने का बहाना कर के देरेदेर तक औफिस में रहते हैं, लेकिन मुझे पूरा यकीन है कि वे मुझ से दूर इसी मोनिका के साथ अपना ज्यादा समय बिताना चाहते हैं.

मेरा मन हर पल अजीब सी ऊहापोह में उलझ रहता है. कभी मन कहता है, विनय ऐसे नहीं हैं. वे मुझे धोखा नहीं दे सकते. वे भला अपनी सुखी गृहस्थी और इकलौते बेटे को क्यों छोडेंगे? लेकिन दूसरे ही पल खयाल आता है कि आजकल आए दिन कैसाकैसा तो देखने और सुनने को मिलता है. एक पत्नी के रहते आदमी दूसरी शादी रचा रहे हैं.

अपने से छोटी उम्र की लड़कियों से रोमांस करते फिर रहे हैं. आजकल हवा ही ऐसी चल रही है. क्या पता विनय घर से बाहर क्या करते हैं. कहीं बातोंबातों में मोनिका का नाम ले कर मेरी प्रतिक्रिया तो जानना नहीं चाहते?

गट्टे का पुलाव और शाही भिंडी

घर पर बनाएं चटपटे जायकेदार ये रेसिपी बच्चों से लेकर बड़े तक को पसंद करेंगे डिश. आज ही बनाएं ये रेसिपी.

 1. स्पाइसी रैसिपीज गट्टे का पुलाव

सामग्री  

1. 2 कप बेसन

 2.   थोड़ा सा दही

 3.   1/2 छोटा चम्मच अजवाइन

 4.   1/2 छोटा चम्मच लालमिर्च

 5. 1 बड़ा चम्मच प्याज चौकोर कटा

 6.  2 प्याज पिसे 

 7.  4-5 कलियां लहसुन पिसा

 8.   1 इंच टुकड़ा अदरक का कसा हुआ

 9.  4-5 बड़ी इलायची 

10.  4-5 छोटी इलायची

 11.   2 छोटे टुकड़े दालचीनी 

12.  4-5 लौंगद्य  5-6 साबूत कालीमिर्च 

 13. चुटकीभर हींग

14.   2 छोटे चम्मच धनिया पाउडर

15.  1/2 छोटा चम्मच गरममसाला

16. 1/2 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर

17.   1/2 छोटा चम्मच हलदी पाउडर

18.   थोड़ी सी धनियापत्ती कटी

19.  थोड़ी सी हरीमिर्च कटी हुई

 20.  2-3 तेजपत्ते 

21. घी या तेल आवश्यकतानुसार

 22.  1/4 कप घी 

 23.  1 कप चावल

 24.   नमक स्वादानुसार.

विधि

बेसन को छान कर उस में नमक, लालमिर्च, अजवाइन और इच्छानुसार चौकोर कटा प्याज डाल कर पानी की मदद से बेसन का रोल बना कर भाप में पकाएं. पानी से निकाल कर अलग रखें व ठंडा होने पर गोलगोल कतले काटें. घी गरम करें व सुनहरा लाल होने तक तल कर अलग रखें. घी गरम करें व लालमिर्च व साबूत खड़ा गरममसाला डाल कर चटकाएं. दही में सारा पाउडर मसाला व नमक डालें. पिसा प्याज, लहसुन व अदरक डाल कर अच्छी तरह भूनें. दही में मिला मसाला डाल कर अच्छी तरह भूनें. गट्टों वाला उबला पानी लगभग 21/2 प्याले डाल कर उबालें व गट्टे गलाएं. 1 बड़ा चम्मच तेल या घी गरम करें. तेजपत्ते डाल कर करारे करें फिर चावल और गट्टे डाल कर ढक कर पुलाव तैयार करें. हरीमिर्चों व धनियापत्ती से सजा कर परोसें.

2. शाही भिंडी

सामग्री

 1.  250 ग्राम भिंडी लंबे टुकड़ों में कटी

 2. 1-2 हरीमिर्चें

 3. 1 प्याज कटा 

 4. 1 टमाटर कटा

 5. 1 चम्मच काजू का पाउडर 

 6. 1 बड़ा चम्मच क्रीम 

 7. 1/2 छोटा चम्मच अजवाइन 

 8. चुटकीभर हींग 

 9. 1/4 छोटा चम्मच हलदी पाउडर 

 10. 1 बड़ा चम्मच धनिया पाउडर 

 11. 1/4 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर 

 12. 1/4 छोटा चम्मच गरममसाला पाउडर

 13. तलने के लिए पर्याप्त तेल 

 14. थोड़ी सी धनियापत्ती कटी 

 15. थोड़ा सा बारीक अदरक कटा

 16.  3-4 कलियां लहसुन 

 17. नमक स्वादानुसार.

विधि

कड़ाही में तेल गरम कर के भिंडी तल कर निकाल लें. इसी तेल में प्याज भून लें. तले हुए प्याज को टमाटर, अदरक, लहसुन व हरीमिर्चों के साथ पीस लें. कड़ाही में तेल गरम कर के अजवायन डालें. फिर सारे मसाले डाल कर भून लें. मसाला जब तेल छोड़ने लगे तब नमक, काजू का पाउडर डाल कर तली भिंडी मिला कर अच्छी तरह भून कर धनियापत्ती से सजा कर परोसें.

मेरे फेस पर मुहांसे हो रहे हैं, मैं क्या करूं मुझे उपाय बताएं

सवाल

मैं बैंगलुरु से दिल्ली शिफ्ट हो गई हूं इसलिए मुझे मुंहासे होने लगे हैं जो पहले कभी नहीं हुए. जो खाना मैं बैंगलुरु में खाती थी अब भी वही खाती हूं. मैं क्या करूं.

जवाब

कई बार वातावरण बदलने से औयल ग्लैंड्स ज्यादा ऐक्टिव हो जाते हैं. इसलिए सफाई और भी जरूरी है. तैलीय त्वचा को मुंहासों से बचाने के लिए उस की नियमित सफाई करनी जरूरी है. चेहरे को साफ करने के लिए स्किन टोनर का इस्तेमाल कर सकते हैं. घर पर स्किन टोनर बनाने के लिए नीम व पुदीने की पत्तियों को पानी में भिगो दें. सुबह पानी को इतना उबालें कि पानी एकतिहाई रह जाए. इसे छान लें और ठंडा कर लें. स्किन टौनिक से त्वचा साफ करने से मुंहासों की समस्या से छुटकारा मिल सकता है.

मुंहासों को दूर करने के लिए  1/2 चम्मच अखरोट गिरी का पाउडर और 1 चम्मच चावल का आटा लें. इस में 1/2 चम्मच मूली का रस और 1 चम्मच छाछ या गुलाब की बूंदें मिला कर पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को चेहरे पर लगाएं. सूखने पर ठंडे पानी से धो लें इस से आप के मुंहासे कम होंगे और चेहरे पर निखार भी आएगा.

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मेरे बाल बहुत कर्ली हैं जो देखने में अच्छे नहीं लगते. उन्हें सीधा करने का कोई तरीका बताएं?

जवाब

परमानैंट स्ट्रेटनिंग कराना आप के लिए सही रहेगा क्योंकि कर्ली बालों को टैंपरेरी स्ट्रेटनिंग करने पर उसे रोजरोज स्ट्रेट करना पड़ेगा और बारबार हीट लगने से बाल खराब हो जाते हैं, जबकि आजकल परमानैंट स्ट्रेटनिंग में यूज होने वाले प्रोडक्ट्स बालों को न्यूट्रिशन प्रदान करते हैं और बाल स्ट्रेट रहने के साथसाथ खूबसूरत भी दिखेंगे.

समस्याओं के समाधान ऐल्प्स ब्यूटी क्लीनिक की फाउंडर, डाइरैक्टर डा. भारती तनेजा द्वारा

पाठक अपनी समस्याएं इस पते पर भेजें : गृहशोभा, ई-8, रानी  झांसी मार्ग, नई दिल्ली-110055.

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चेहरे के लिए माइक्रोनीडलिंग: युक्तियां और देखभाल

माइक्रोनीडलिंग एक अभिनव कॉस्मेटिक प्रक्रिया है जो ‘सूक्ष्म चोट’ पहुंचाने के लिए छोटी, उथली सुइयों से ढके एक उपकरण का उपयोग करती है. यह त्वचा को कोलेजन उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए प्रेरित करता है.

इस तरह, यह केवल 4-5 उपचार सत्रों के बाद चिकनी, मुलायम और अधिक युवा दिखने वाली त्वचा को बढ़ावा देता है! इसका उपयोग कई चिंताओं के लिए प्रभावी ढंग से किया जा सकता है, जिनमें शामिल हैं:

  • महीन रेखाएँ और गहरी झुर्रियाँ
  • मुँहासे या सर्जरी के कारण होने वाले निशान
  • त्वचा रंजकता की समस्या
  • त्वचा जिसने अपनी कोमल, युवा उपस्थिति खो दी है.

माइक्रोनीडलिंग उपचार से पहले और बाद में अपनी त्वचा की देखभाल कैसे करें-

माइक्रोनीडलिंग एक अत्यंत सुरक्षित और प्रभावी कॉस्मेटिक प्रक्रिया है. हालांकि, सभी उपचारों की तरह, तेजी से ठीक होने और सर्वोत्तम परिणामों के लिए प्रक्रिया से पहले और बाद में अपनी त्वचा की विशेष देखभाल करना आवश्यक है.

  1. पूर्व-उपचार युक्तियां

अपना उपचार सत्र शुरू करने से छह महीने पहले एक्यूटेन से बचें.

अपने उपचार से 5-7 दिन पहले ऐसे सामयिक एजेंटों का उपयोग न करें जो आपकी त्वचा की संवेदनशीलता को बढ़ा सकते हैं जैसे रेटिनोइड्स, एक्सफोलिएंट्स, सामयिक एंटीबायोटिक्स या एसिड.

अपने माइक्रोनीडलिंग सत्र से कम से कम 3 दिन पहले तक इबुप्रोफेन, मोट्रिन या एडविल जैसी सूजन-रोधी दवाएं न लें. ये प्राकृतिक सूजन प्रक्रिया में हस्तक्षेप करेंगे जो आपकी त्वचा के कायाकल्प के लिए महत्वपूर्ण है.

अपनी प्रक्रिया से कम से कम 2 सप्ताह पहले तक आईपीएल/लेजर प्रक्रियाओं, असुरक्षित धूप में निकलने या धूप से जलने से बचें.

5-7 दिन पहले तक उपचारित क्षेत्र पर वैक्सिंग, डिपिलिटरी क्रीम या इलेक्ट्रोलिसिस नहीं.

त्वचा की जलन से बचने के लिए प्रक्रिया के दिन शेविंग न करें. यदि उपचार क्षेत्र में घने बाल मौजूद हैं, तो अपनी नियुक्ति के लिए पहुंचने से एक दिन पहले शेव कर लें.

एक सप्ताह पहले तक रक्त को पतला करने वाले एजेंटों से बचें क्योंकि चोट लगना माइक्रोनीडलिंग का एक आम दुष्प्रभाव है.

2. उपचार का दिन 

माइक्रोनीडलिंग उपचार की प्रक्रिया को पूरा होने में आमतौर पर 60 मिनट तक का समय लगता है.

3. उपचार के बाद युक्तियां

प्रक्रिया के बाद एक सप्ताह तक कोई भी सूजनरोधी दवा न लें. या अपने डॉक्टर से पहले कंसल्ट करें. अपने चेहरे पर बर्फ का प्रयोग न करें और अर्निका/ब्रोमेलैन के प्रयोग से बचें. ये प्राकृतिक सूजन प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर सकते हैं जो आपकी त्वचा के कायाकल्प के लिए महत्वपूर्ण है.

कम से कम 2 सप्ताह तक सन टैनिंग और सीधी धूप में लंबे समय तक रहने से बचें. 24 घंटों के बाद, हमेशा सनब्लॉक (30 एसपीएफ़ या अधिक) का उपयोग करें और यदि आप बाहर हैं तो टोपी पहनें.

यदि आपको कोई दर्द महसूस हो तो टाइलेनॉल जैसी दर्दनिवारक दवा का प्रयोग करें.

उपचार प्रक्रिया: माइक्रोनीडलिंग उपचार के बाद क्या अपेक्षा करें-

  • दिन 1-3

धूप की कालिमा जैसा प्रभाव सामान्य है. आपकी त्वचा तंग, शुष्क या छूने पर संवेदनशील महसूस हो सकती है. त्वचा को हल्के क्लींजर, ठंडे पानी से धोकर और उपचार के बाद 4 घंटे से पहले केवल अपने हाथों से थपथपाकर सुखाएं.

कुछ लालिमा भी मौजूद हो सकती है और कुछ मामलों में, रोगियों को हल्की चोट का अनुभव हो सकता है जो 5-7 दिनों तक रह सकता है और 2-4 दिनों तक अस्थायी सूजन हो सकती है.

टिप : 48 घंटों तक पसीना बहाने वाले कठिन व्यायामों के साथ-साथ जकूज़ी, सौना और भाप स्नान से बचें. 24 घंटे के बाद केवल मिनरल मेकअप का प्रयोग करें.

  • दिन 2-7

उपचार के 3-5 दिन बाद छीलना शुरू हो सकता है. आप त्वचा में रूखापन और पपड़ी देखेंगे, जो त्वचा कोशिकाओं के बढ़ते कारोबार के कारण होता है. उपचारित त्वचा को न चुनें, खरोंचें या रगड़ें नहीं.

टिप : आपको पुरानी त्वचा को प्राकृतिक रूप से निकलने देना चाहिए और इसे हर समय नमीयुक्त रखना चाहिए. अपने त्वचा विशेषज्ञ से बात करें कि किन उत्पादों का उपयोग करना है.

  • दिन 5-7

जब आपकी त्वचा में जलन बंद हो जाए तो आप अपने नियमित त्वचा देखभाल उत्पादों को फिर से शुरू कर सकते हैं. हमारे अधिकांश रोगियों ने अपने अंतिम उपचार के बाद के महीनों में त्वचा में निरंतर सुधार देखा है.

उसकी गली में- भाग 1 : आखिर क्या हुआ उस दिन

बगल वाले कमरे में इंसपेक्टर बलराज एक मुलजिम की जम कर पिटाई कर रहा था. उस की पिटाई से मुलजिम जोरजोर चीख रहा था, ‘‘साहब, मैं ने कुछ नहीं किया. मुझे माफ कर दो, मैं बेकसूर हूं.’’

वह एक शहरी थाना था. वहां मेरे अलावा दूसरा इंसपेक्टर बलराज था. थाने में ही डीएसपी का भी औफिस था. इंसपेक्टर बलराज बेहद सख्त था. गाली उस के मुंह से बातबात में निकलती थी. कई मुलजिम तो डर के मारे झूठे इलाजम को भी अपने  सिर ले लेते थे. लेकिन मुझे वह ‘बाऊजी थानेदार’ कह कर पुकारता था, लेकिन पीठ पीछे मेरा मजाक उड़ाता था.

जिस मुलजिम की वह पिटाई कर रहा था, उस की आवाज आई, ‘‘साहब, बहुत जोर से पेशाब लगा है. मुझे जाने दीजिए.’’ पता नहीं क्यों मुलजिम की आवाज में मुझे एक अजीब सा दर्द महसूस हुआ. सर्दियों के दिन थे, शाम भी होने वाली थी. मैं ने खिड़की पर पड़ी चिक से देखा, 2 सिपाही सहारा दे कर उस मुलजिम को छत पर बने पेशाबखाने ले जा रहे थे. उस की हालत देख कर ही लग रहा था कि उस की जम कर खातिरदारी की गई थी.

पुलिस भाषा में पिटाई को खातिरदारी कहते हैं. मैं खाली बैठा था, टहलता हुआ बाहर चला गया. अचानक मुझे छत पर धमाचौकड़ी की आवाज आती महसूस हुई. ऊपर कौन भाग रहा है, जानने के लिए मैं छत पर चला गया. छत कोई 20 फुट ऊंची थी. ऊपर पहुंच कर मैं ने मुलजिम को मुंडेर की ओर भागते देखा. उसे पकड़ने के चक्कर में एक सिपाही गिर पड़ा था. मैं समझ गया कि मुलजिम पुलिस से छूट कर छत से नीचे छलांग लगाना चाहता है.

मैं तेजी से उस की तरफ दौड़ा. तब तक वह मुंडेर पर पांव रख चुका था, वह छलांग लगाता, उस के पहले ही मैं ने पीछे से उसे पकड़ लिया. नीचे सड़क पर लोगों का आनाजाना चालू था. मैं उसे घसीटता हुआ पीछे ले आया. सड़क के लोग घबरा कर ऊपर देख रहे थे. वह जोरों से चीख रहा था, ‘‘मुझे छोड़ दो, मुझे मर जाने दो.’’

वह जैसे पागल हो रहा था. दोनों सिपाहियों ने मुश्किल से उसे काबू में किया. देखतेदेखते छत और सड़क पर मजमा लग गया. जैसे ही उसे नीचे लाया गया, गुस्से से पागल हो कर इंसपेक्टर बलराज उस पर टूट पड़ा. मुलजिम की मां और बहन थाने में बैठी थीं. वे रोने लगीं. पिटतेपिटते मुलजिम बेहोश हो गया, पर बलराज के हाथ नहीं रुक रहे थे. मैं ने किसी तरह बलराज को रोका.

मुलजिम का नाम विलायत अली था. वह शहर का ही रहने वाला था. उस की मां और बहन हाथ जोड़ कर रोते हुए मुझ से कह रही थीं कि विलायत बेकसूर है. दोनों लोगों के घरों में काम कर के गुजारा करती हैं. बलराज ने उन से 5 सौ रुपए मांगे थे. घर के जेवर, बरतन आदि बेच कर उन्होंने रुपए दे दिए थे. इस के बावजूद भी वह विलायत को नहीं छोड़ रहे. अब वह और पैसे मांग रहे हैं. वे और पैसे कहां से लाएं.

बलराज विलायत अली के खिलाफ फरारी का नया मामला दर्ज कर रहा था, जबकि 20 फुट ऊंची उस बिल्डिंग से किसी मरेकुचे आदमी का कूदना असंभव लगता था. सही में तो जुल्म से घबरा कर खुदकुशी का मामला बनना चाहिए था. मैं सबकुछ देख और समझ रहा था. अगर मैं कुछ कहता तो बलराज और नाराज हो जाता. इसलिए मैं चुप रहा.

विलायत की मां और बहन ने जो बातें बताई थीं, उस से साफ लग रहा था कि उसे जबरदस्ती फंसाया जा रहा था. मुझे यहां आए अभी एक महीना ही हुआ था.

मैं अपने कमरे में पहुंचा तो वहां विलायत की मां बेहोश पड़ी थी, बहन रो रही थी. बहन हाथ जोड़ कर बोली, ‘‘थानेदार साहब, मेरी मां और भाई को उस जालिम से बचा लीजिए. आप जहां कहेंगे, जिस के पास कहेंगे, मैं चली जाऊंगी. बस मेरे भाई पर रहम करें.’’

उस की बात सुन कर मैं चौंका. उस की बातों से लगा, उसे कोई कहीं भेजना चाहता था? वजह साफ थी, लड़की जवान थी. देखने में भी अच्छी थी. मैं ने पूछा, ‘‘किसी ने तुम से कहीं चलने को कहा था क्या?’’

‘‘हां, कल एक सिपाही ने थानेदार के घर जा कर भाई की जमानत की बात करने को कहा था.’’

‘‘क्या तुम उस के यहां गई थी, फिर क्या हुआ?’’

‘‘हां, मैं गई थी उस सिपाही के साथ. मेरी मां भी साथ थी. उस ने हमें बहुत डरायाधमकाया. इस के बाद उस सिपाही की नीयत खराब हो गई. उस ने मां को कोई फार्म लाने के लिए बाहर जाने को कहा तो मैं उस की मंशा समझ कर मां के साथ बाहर चली गई.’’ उस की बात सुन कर मुझे उस पुलिस वाले पर बहुत गुस्सा आया. अब तक उस की बूढ़ी मां होश में आ चुकी थी. मैं ने उन दोनों को तसल्ली दी. इस के बाद मैं एक निर्णय ले कर डीएसपी साहब के पास जा कर बोला, ‘‘जनाब, विलायत का केस मैं हैंडल करना चाहता हूं. बलराज के पास वक्त नहीं है, जिस की वजह से वह इस केस पर ठीक से ध्यान नहीं दे पा रहे हैं.’’

‘‘नवाज, यह कोई खास मामला नहीं है. उसी के पास रहने दो. ऐसा करने से आपस में खटास पैदा हो सकती है.’’

मुझे उन से इस जवाब की उम्मीद नहीं थी. मैं समझ गया कि बलराज मुझ से पहले डीएसपी साहब से मिल कर गया है. मैं कुरसी से उठ ही रहा था कि डीएसपी साहब के फोन की घंटी बज उठी. बीच में उठ कर जाना ठीक नहीं था, इसलिए मैं बैठ गया. करीब 10 मिनट बात होती रही. डीएसपी साहब फोन पर बड़े अदब से बात कर रहे थे. बातचीत से लग रहा था कि फोन शायद एसपी या डीआईजी का था. फोन पर बात खत्म होते ही डीएसपी साहब ने चेहरे का पसीना पोंछने के बाद कहा, ‘‘नवाज खां, यह केस तुम हैंडल करो. बलराज से सारा रिकौर्ड ले लो.’’ उन्होंने कहा कि थाने की छत पर जो तमाशा हुआ, उसे देखने के लिए सड़क पर चल रहे लोग जमा हो गए थे. ट्रैफिक जाम हो गया था. उस भीड़ में किसी मंत्री की गाड़ी थी. उस के पीछे एक जीप में प्रैस वाले थे. उन लोगों ने उस हाथापाई की फोटो खींच ली थी.

इस घटना से मंत्रीजी बेहद नाराज हो गए. उन्होंने सारा मामला खुद देखा था. इस थाने के मारपीट के पहले भी 1-2 मामले उछले थे. उन्होंने ही डीआईजी साहब से कहा है कि इस केस की सख्ती से जांच की जाए और जिस की वजह से यह सब हुआ है, उस के खिलाफ सख्ती से काररवाई की जाए. मैं चलने लगा तो उन्होंने मुझ से इसंपेक्टर बलराज को भेजने को कहा. मैं ने बलराज को उन का मैसेज दे दिया. विलायत अली की हालत काफी खराब थी. मैं ने करीब के क्लीनिक से डाक्टर बुला कर उसे दवा दिलवाई और हल्दी मिला दूध दे कर उसे लौकअप के बजाय कमरे में सुला कर क्वार्टर पर चला आया. उस की निगरानी के लिए एक सिपाही की ड्यूटी लगा दी थी.

अगले दिन सवेरेसवेरे एक सिपाही ने मेरा दरवाजा खटखटाया और खबर दी कि मुलजिम विलायत अली जेल से फरार हो गया है. मैं सोच में पड़ गया. उस की हालत ऐसी नहीं थी कि वह भाग जाता. उसे काफी अंदरूनी चोटें लगी थीं.

यह मामला बड़े अफसरों तक पहुंच चुका था. मैं फटाफट थाने पहुंच गया. मैं सीधे उस कमरे में पहुंचा, जहां विलायत अली को सुलाया गया था. मैं ने देखा, कंबल, बिस्तर सब वैसा ही पड़ा था. कमरे की दीवार में करीब डेढ़ फुट का सुराख था.

जो सिपाही ड्यूटी पर था, उस से बात की तो उस ने बताया कि किसी वक्त उस की आंख लग गई और वह फरार हो गया. एकदम से मुझे खयाल आया कि कहीं बलराज ने ही तो नहीं मुलजिम को फरार करा दिया.

सोने की सास: भाग 1- क्यों बदल गई सास की प्रशंसा करने वाली चंद्रा

मेरी नवविवाहिता पुत्री चंद्रा जब पहली बार अपनी ससुराल में कुछ दिन बिता कर लौटी, तो अपनी सास की प्रशंसा करते नहीं थकती थी. उस की जिन 2 सहेलियों को अपनीअपनी सासों से शिकायत थी, उन के बारे में वह कहा करती थी, ‘‘नीता और गुड्डो की सासुओं को तो मेरी सास से मिला देना चाहिए, तब उन्हें पता चलेगा कि सास क्या होती है.’’

लेकिन दूसरी बार जब चंद्रा कुछ अधिक दिन बिता कर ससुराल से लौटी, तो प्रशंसा का स्थान निंदा ने ले लिया था. मैं आहत सी हो गई. सोचने लगी, इस की सास अपर्णाजी ऊपर से तो बड़ी भली लगती हैं, पर इस की बातों से तो लगता है कि अंदर से वे महाखोटी हैं.

मैं कुछ पूछूं या न पूछूं, बिटिया दिन भर उन की शिकायत करती रहती. कभीकभी मुझे लगता, चंद्रा कुछ ज्यादा ही बोल रही है. एक दिन वह बोली, ‘‘मैं तो वहां भरपेट खाना भी नहीं खाती.’’

‘‘क्यों? क्या वहां कोई तुम्हें खाने से रोकता है? तुम ने तो पहले बतलाया था कि वहां खाने की मेज पर तुम लोग सब अपने हाथ से अपने मन का ले कर खाते हो.’’

‘‘मन का कुछ बने, तब न कोई मन का खाए. मेरी पसंद का कुछ रहता ही नहीं.’’

‘‘बातबात में तुम बता दिया करो कि तुम्हें क्या पसंद है और क्या नापसंद. वैसे घरपरिवार में सब की पसंद का तो रोज एक साथ बन नहीं सकता. कुछ औरों की पसंद की चीजें भी खाना सीखो.’’

वह बिगड़ उठी, ‘‘तुम भी उन्हीं की तरह बोलने लगीं. जो चीज नहीं भाए, उसे कैसे खाए आदमी?’’

केवल खाने की ही बात नहीं, बिटिया रानी किसी न किसी बात को ले कर दिन भर सास की बुराई करती ही रहती.

एक दिन मैं ने पूछा, ‘‘पहलेपहल क्या हुआ था? तुम्हें उन की बात पहली बार कब चुभी थी?’’

वह ठंडी सांस भर कर बोली, ‘‘क्या बताऊं पहलेपहल की बात. उन का तो रोज ही यही हाल रहता है. बातबात में मेरी तुलना ननद से करती रहती हैं. सांभवी तो यह काम ऐसे करती है, सांभवी तो यह काम वैसे करती है या फिर अपना उदाहरण देती रहती हैं कि यह काम मैं ऐसे करती हूं, वह काम मैं वैसे करती हूं. ऐसा लगता है, जैसे वे मांबेटी ही सब कुछ जानती हैं. मैं तो जैसे कुछ जानती ही नहीं.’’

‘‘कौन सा काम?’’

‘‘क्या बताऊं, यदि मुझ से दाल में पानी कम या ज्यादा हो जाता है, तो बड़ी मिठास से कहती हैं कि चंद्रा बिटिया, दाल में पानी नाप कर दिया करो, तब कमबेसी नहीं होगा. मैं और सांभवी तो हमेशा नाप कर पानी देते हैं.

‘‘अच्छा मां बतलाओ, इस से क्या फर्क पड़ता है? अगर कभी पानी ज्यादा हो जाता है, तो दाल बनने के बाद मैं ऊपरऊपर का कुछ पानी निकाल कर फेंक देती हूं और यदि दाल गाढ़ी लगती है, तो थोड़ा पानी और डाल देती हूं.’’

मैं धीरे से बोली, ‘‘लेकिन ऊपर से पानी डाली हुई दाल में वह स्वाद नहीं आता बेटी, हां यदि कभी गलती से दाल अधिक देर चढ़ी हुई रह गई और गाढ़ी हो गई, तो ऊपर से पानी डालना ही पड़ता है. यह भी है कि किसी घर में दाल गाढ़ी खाई जाती है, तो किसी घर के लोग पतली दाल पसंद करते हैं. तुम्हारी सास ठीक ही तो कहती हैं. आखिर दाल के अनुसार नाप कर पानी देने में हरज ही क्या है?’’

सुनते ही चंद्रा बिगड़ उठी. गुस्से में भर कर बोली, ‘‘तुम्हें तो उन्हीं की बात ठीक लगती है. तुम तो उन्हीं का पक्ष लिए जा रही हो,’’ कह कर चंद्रा ने रोना शुरू कर दिया.

मुझे लगा, यह बात का बतंगड़ बना रही है. पर ससुराल से आई बिटिया को रुलाना भी तो अच्छा नहीं लगता. उसे खुश रखने के लिए मैं उस की हां में हां मिलाने लगी. लेकिन जब भी ऐसी कोई बात सुनती, तो मुझे लगता कि यह तिल का ताड़ बना रही है, फिर भी चुपचाप सुनते रहने की कोशिश करती.

एक दिन उस ने कहा, ‘‘जानती हो मां, मेरी सास दूध की सारी मलाई निकाल कर जमा करती रहती हैं.’’

‘‘हां तो, मलाई खाना तो ठीक नहीं होता. उस से वजन ही बढ़ता है. इसलिए तो हम यहां बिना मलाई वाला दूध खरीदते हैं.’’

‘‘पर सुनो तो मां, कुछ मलाई इकट्ठी हो जाने पर वे उसे आंच पर चढ़ा कर उस का घी बना लेती हैं और फिर उस घी को दाल छौंकने के काम में लाती हैं.’’

‘‘ठीक तो है, उतना घी खाना भी चाहिए.’’

चंद्रा के चेहरे पर एक बार फिर पराजय मिश्रित क्रोध का भाव आया. फिर अपने को कुछ संयत कर के बोली, ‘‘मां तुम उन्हें नहीं जानतीं, वे खाना बनातेबनाते उसे जूठा भी कर देती हैं.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘वहां मेरी ससुराल में शाम के नाश्ते में अकसर गरम पकौडि़यां बनती हैं.’’

‘‘क्या तुम बनाती हो?’’

‘‘नहींनहीं, मेरी सास ही बनाती हैं. पर बनातेबनाते सब को देतेदेते बीच में कुछ पकौडि़यां तोड़ कर ठंडी कर लेती हैं और जब कड़ाही में दूसरी पकौडि़यां, सिंकती रहती हैं, तब वे तोड़ कर ठंडी की हुई उन पकौडि़यों को मुंह में उछालउछाल कर डालती हैं और चबातीखाती रहती हैं.’’

‘‘बेटा, मुंह से हाथ सटा कर खाने से हाथ जूठा होता है और उस जूठे हाथ से छूने से कोई चीज जूठी होती है. उछालउछाल कर खाने से न तो हाथ ही जूठा हुआ और न ही सारी पकौडि़यां.’’

‘‘लेकिन मां, मिठाई वगैरह वे एक ही प्लेट में सब के लिए टेबल पर रख देती हैं. उसी में से सब 1-1 उठा लेते हैं और फिर उसी में से 1 नौकरानी को भी दे देती हैं. यह क्या जूठा खिलाना नहीं हुआ?’’

‘‘नहीं रे, ऐसे भी क्या कभी कुछ जूठा होता है.’’

जब तक वह रही तब तक शिकायतों का सिलसिला चलता रहा और मैं उसे समझाने की कोशिश में लगी रही.

दामाद श्रीकांतजी एम.बी.ए. हैं, लेकिन नौकरी नहीं मिलने के कारण वे पिता के व्यवसाय में ही सहयोग कर रहे थे. अभी हाल में उन्हें कोलकाता में एक अच्छी नौकरी मिल गई. उन्होंने वहां एक किराए का घर खोज लिया, तो चंद्रा को भी वहीं ले गए.

जल्दी ही चंद्रा के देवर की शादी तय हो गई. शादी में अपर्णाजी ने हम दोनों से भी आने का आग्रह किया. उधर चंद्रा और दामादजी का भी अनुरोध था. हम चले गए.

शादी के घर में चंद्रा ने अपनी कर्मठता का खूब परिचय दिया. अपर्णाजी भी मौका मिलने पर चंद्रा की तारीफ करतीं. बचपन से ही उस में यह गुण था कि जो भी काम सीखती, चाहे वह खाना बनाना हो या बुनाईकढ़ाई, पूरी लगन से सीखती और फिर उसे सही ढंग से करने का प्रयास करती. अपर्णाजी कहतीं, ‘‘कपड़ोंगहनों में भी चंद्रा की पसंद कितनी अच्छी है. छोटी बहू को देने के लिए सारे कपड़ेगहने इसी की पसंद से आए हैं.’’

अपनी प्रशंसा सुन कर बिटिया रानी एक बार तो खुश हो जाती, पर फिर सास की कोई न कोई शिकायत मेरे कान में आ कर कह जाती. खैर, विवाह अच्छी तरह संपन्न हो गया. सारे मेहमान चले गए, पर अपर्णाजी ने हमें 2 दिन और रोक लिया.

एक दिन मैं ने देखा चंद्रा नई बहू के पास बैठी सासूमां के विरुद्ध उस के कान भर रही है. बिटिया के डर से उस के सामने तो मैं कुछ नहीं बोल पाई, पर वह उठ कर चली गई तो मैं उस की देवरानी सुष्मिता से बोली, ‘‘देखो बिटिया, तुम्हारी सास एक अच्छी महिला हैं. तुम किसी और की बातों में मत आओ. जब उन के साथ रहोगी, तो खुद ही उन्हें समझ जाओगी.’’

6 TIPS: ऐसे करें नए बेबी का स्वागत

विवाह प्रत्येक इंसान के जीवन का एक अहम पड़ाव होता है….विवाह के बाद जब दाम्पत्य जीवन में एक नए मेहमान के आगमन की सुगबुगाहट होती है तो पति पत्नी दोनों ही खुशियों से सराबोर हो उठते हैं. पहले जहां परिवारों में 4-5 बच्चे होते थे वहीं आज 1 या 2 ही बच्चे होते हैं. ऐसे में अपने आने वाले बच्चे को लेकर माता पिता का पजेसिव होना स्वाभाविक है. आजकल प्रति माह बच्चे का जन्म दिन मनाया जाना तो आम बात है पर इसके अतिरिक्त आप कुछ अन्य उपायों से भी अपने बच्चे के आगमन को यादगार बना सकते हैं.

1. यादों की डायरी बनाएं

प्रग्नेंट होने के दिन से ही आप एक डायरी बनाएं जिसमें इस अवस्था के अनुभवों को शेयर कीजिये. प्रतिदिन के अपने अनुभवों के साथ साथ आप इसमें अपने शरीर में होने वाले बदलावों, खान पान की आदतों में परिवर्तन, और गर्भ में होने वाले अनुभवों के बारे में विस्तार से लिखें. इसी डायरी में बेबी के जन्म के बाद के घटनाक्रम को अंकित करें मसलन उसके करवट लेने, चलने, खड़े होने, पलटने, बैठने, खड़े होने,चलने और दांत निकलने जैसी तमाम यादों को फोटो और उनकी तिथि लिखने के साथ साथ फोटोज भी लगाएं.

2. बेबी नर्सरी प्लान करें

आने वाले बच्चे के लिए घर में अपने पार्टनर के साथ मिलकर क्यूट सी एक नर्सरी बनाएं. इसमें आप रंग बिरंगे खिलौने फ्लोरल मोटिफ के साथ साथ छोटे छोटे टेडीबियर और आवाज वाले खिलौनों को स्थान दें. बच्चे के लिए नर्सरी प्रिंट की चादर, तकिया बैग और गद्दियां भी लाएं.

3. खुशी को शेयर करें

परिवार में नए सदस्य का आगमन सोचकर ही मन खुशी से भर उठता है यदि आप इस खुशनुमा अवसर पर अकेले हैं तो अपनी खुशी को दोस्तों और नाते रिश्तेदारों के साथ जमकर शेयर कीजिये. केवल फोन पर शेयर करने के स्थान पर आप  इस खुशी को शेयर करने के लिए आप स्वयम अपना ऑनलाइन ई कार्ड डिजाइन करके व्हाट्सअप पर शेयर करें. आप चाहें तो इस अवसर पर अपने घनिष्ठ मित्रों के साथ एक छोटी सी पार्टी भी प्लान कर सकतीं हैं.

4. बेबी बंप से करें बातें

अपने आने वाले बेबी से बातें करने के लिए बेबी बंप को सहलाएं, बेबी के मूवमेंट को महसूस करें, और हर स्टेज की फोटो लेकर इस अवस्था को अविस्मरणीय बनाएं. पहले के जमाने मे जहां बेबी बंप को लेकर महिलाओं में झिझक होती थी वही आज बेबी बंप महिलाओं के लिए गर्व की बात है जिसे लेकर पति पत्नी दोनों ही बहुत उत्साहित होते हैं. आजकल तो प्री बेबी शावर शूट का चलन है जिससे इस अवधि को यादगार बनाया जा सकता है.

5. ये तैयारी भी करें

बेबी के फुटप्रिंट लेने के लिए एक सफेद सूती कपड़ा और कोई हल्का सा रंग लाकर रखें ताकि आप अपने नन्हे पैरों का प्रिंट ले सकें. आजकल फुटप्रिंट लेने के लिए ऑनलाइन किट मिलती है जिससे आप बड़ी आसानी से बेबी के फुटप्रिंट ले सकतीं हैं. इसके अतिरिक्त आप आटे या प्लास्टर ऑफ पेरिस से भी फुटप्रिंट ले सकतीं हैं. इन्हें यादगार बनाने के लिए आप इसे आगे चलकर फ्रेम करवा लें.

6. नाम सोचकर रखें

बच्चे के आगमन से पूर्व उसका नाम अवश्य सोच लें क्योंकि नाम के अभाव में बच्चे को देखने आने वाले आगन्तुक किसी भी नाम से उसे पुकारना प्रारम्भ कर देते हैं जिससे कई बार उसका नामकरण ही वह उल्टा सीधा नाम ही हो जाता है. यदि आप पहले ही कोई नाम सोचकर रखते हैं तो सभी उसे उसी नाम से पुकारते हैं.

तुम बिन जिया जाए कैसे- भाग 1

जब से अपर्णा अमन से लड़झगड़ कर अपने मायके चली गई थी तब से अमन खुद को दुनिया का सब से खुशहाल इनसान समझने लगा था. अब घर में न तो उसे कोई कुछ कहने वाला था और न ही हुक्म चलाने वाला. औफिस से आते ही आराम से सोफे पर पसर जाता. फिर कुछ देर बाद कपड़े उतार कर दरवाजे या डाइनिंग टेबल की कुरसी पर ही टांग देता. जूतों को भी उन के स्टैंड पर न रख कर डाइनिंग टेबल के नीचे सरका देता. खाना बनाने की तो कोई फिक्र ही नहीं थी. सुबह दूधब्रैड खा कर औफिस चला जाता और दोपहर का खाना औफिस की कैंटीन में खा लेता. रात के खाने की भी कोई चिंता नहीं थी. कभी बाहर से मंगवा लेता तो कभी एकाध दोस्त को भी अपने घर बुला लेता अथवा कभी किसी दोस्त के घर जा कर खा लेता था.

हमेशा की तरह आज अमन ने अपने दोस्त प्रेम को फोन कर के अपने घर बुलाया ताकि आराम से गप्पे मार सके. अपर्णा के जाने के बाद अमन की दिनचर्या कुछ ऐसी ही हो चुकी थी. बड़ा मजा आ रहा था उसे अपने मनमुताबिक जीने में. अपर्णा के रहते तो रोज किसी न किसी बात को ले कर घर में कलह होती रहती थी. मजाल जो अमन टीवी का रिमोट छू ले, क्योंकि अमन के औफिस से घर आने के समय अपर्णा का मनपसंद धारावाहिक चल रहा होता था. चिढ़ उठता था वह. उसे लगता जैसे यह घर सिर्फ अपर्णा का ही है और अपर्णा इस बात से चिढ़ उठती कि आते ही अमन अपने जूतेकपड़े खोल कर यहांवहां फैला देता.

‘‘यह क्या है अमन… देखो, तुम ने अपने कपड़े कहां लटका रखे हैं… तुम से

कितनी बार कहा है कि इस तरह कपड़े, जूते यहांवहां न रखा करो. पर तुम्हें समझाने का कोई फायदा नहीं,’’ कह अपर्णा ने अमन के जूते उठा कर जूता स्टैंड पर दे मारे.

‘‘अच्छा ठीक है कल से याद रखूंगा,’’ अमन अजीब सा मुंह बनाते हुए बोला.

‘‘तुम कभी याद नहीं रखोगे, क्योंकि तुम्हारी आदत बन चुकी है यह. अरे, कपड़े हैंगर में लगा कर रख दोगे तो क्या बिगड़ जाएगा… मोजे भी कभी दोनों नहीं मिलते… तंग आ गई हूं मैं तुम से… बीवी नहीं एक नौकरानी बना कर रख छोड़ा है तुम ने मुझे,’’ बड़बड़ाते हुए अपर्णा किचन में चली गई.

‘‘तो मैं क्या तुम्हारा नौकर हूं जो दिनरात तुम्हारी सुखसुविधा के लिए खटता हूं? अरे, मैं भी तो थक जाता हूं औफिस में… आ कर इसीलिए थोड़ा सुस्ताने लगता हूं. तुम्हारी तरह घर में आराम नहीं फरमाता हूं, समझी?’’ अमन भी गुस्से से बोला.

अपर्णा चाय के कप को लगभग टेबल पर पटकते हुए बोली, ‘‘क्या कहा तुम ने मैं घर में आराम फरमाती हूं? घर का काम क्या कोई और कर जाता है? तुम मर्दों को तो हमेशा यही लगता है कि औरतें घर में या तो टीवी देखती रहती हैं या फिर आराम. कभी एक रूमाल भी धोया है खुद? बस और्डर किया और सब हाजिर मिल जाता है… कितना भी खटो पर कोई कद्र नहीं है हमारी,’’ अपर्णा बोली.

अमन भी चुप रहने वाला नहीं था. बोला, ‘‘तो क्या घरबाहर सब मैं ही करूं? पता नहीं अपनेआप को क्या समझती है… जब देखो हुक्म चलाती रहती है. औफिस में बौस की सुनो और घर में बीवी की. सोचता हूं घर में चैन मिलेगा, पर वह भी मेरे हिस्से में नहीं है… इस से तो अच्छा है घर ही न आया करूं.’’

यह इन का रोज का झगड़ा था. प्रेम विवाह किया था दोनों ने. जीवन भर साथ जीनेमरने का वादा किया था. पर प्रेम तो कहीं दिख ही नहीं रहा था. बस विवाह किसी तरह निभ रहा था. इन का झगड़ा पासपड़ोस में चर्चा का विषय बन चुका था. हां, अमन था भी बेफिक्र इनसान. अपनी मस्ती में जीने वाला और उस की इसी बेफिक्री पर तो मरमिटी थी अपर्णा. तो आजक्यों उसे अमन की इस आदत से नफरत होने लगी? वैसे भी इनसान में सारी अच्छाइयां नहीं हो सकतीं न? अपर्णा को भी तो समझना चाहिए कि आखिर किस के लिए वह इतनी मेहनत करता… अपने परिवार के लिए ही न? क्याकभी किसी बात की कमी होने दी उस ने अपर्णा को? बस जबान से निकली नहीं और खरीद लाता… कभीकभी तो वह इस बात केलिए भी अमन से झगड़ पड़ती थी कि क्या जरूरत थी इतने पैसे खर्च करने की? तब अमन कहता कि कमाता किस के लिए हूं, तुम्हीं सब के लिए ही न?

मगर अपर्णा को इस बात का जरा भी एहसास नहीं था. जराजरा सी बात पर चिड़चिड़ा उठती थी. बेचारा अमन औफिस से थकाहारा यह सोच कर घर आता कि थोड़ा रिलैक्स करेगा पर सब बेकार. अपर्णा के तानाशाह व्यवहार के कारण उसे लगने लगा था कि या तो अपर्णा कहीं चली जाए या फिर वह खुद अपर्णा से दूर हो जाए. वह हमेशा उस वक्त को कोसता रहता था जब उस ने अपर्णा से शादी करने का फैसला किया था. तभी दरवाजे की घंटी बज उठी. उसे लगा जैसे किसी अंधेरी गली से बाहर निकल आया हो.

‘‘आओआओ प्रेम, बड़ी देर लगा दी?’’ अमन ने कहा.

घर के अंदर कदम रखते ही प्रेम ने एक नजर अमन के पूरे घर पर दौड़ाई और फिरबोला, ‘‘सच में अमन तुम्हारा घर, घर नहीं कबाड़खाना लग रहा… क्या यार कैसे रह लेते हो इस घर में? छोड़ो गुस्सावुस्सा और जाओ जा कर भाभी और संजू को ले आओ… भाभी के लिए न सही पर संजू के लिए ही अपना गुस्सा थूक दो.’’

‘अकेले हैं तो क्या गम है…’ गाना गाते हुए अमन हंस पड़ा. फिर कहने लगा, ‘‘हां, सही कह रहा है तू… संजू के बिना मन कभीकभी बेचैन हो उठता है, पर अपर्णा… पागल हो गया है क्या? भले ही घर कबाड़खाना लगे पर मेरे मन को कितना सुकून मिल रहा है यह तू क्या जाने… बहुत घमंड था उसे कि उस के बिना मैं 1 दिन भी नहीं रह पाऊंगा… अरे जरा उसे भी तो पता चले कि उस के बिना भी मैं अच्छी तरह जी सकता हूं. चल, छोड़ ये सब… बता तेरा कैसा चल रहा है?’’

पराया लहू- भाग 4: मायके आकर क्यों खुश नहीं थी वर्षा

अब दोनों के बीच में अदृश्य दीवार खड़ी हो गई. वर्षा मन ही मन कुढ़ती रहती. उस का मन अब सुधीर से बोलने को भी नहीं होता था. वह उस के प्रश्नों का उत्तर हां या न में दे कर सामने से हट जाती व अपनी तरफ से कोई बात नहीं करती.

भरत भी उस की आंखों में चुभने लगा था. उस का मन विद्रोह कर बैठता, ‘जब सुधीर उस के लव को नहीं स्वीकारता तो वही क्यों भरत को छाती से लगाती रहे? पराए जाए अपने तो नहीं बन सकते, भरत से कौन सा उस का लहू का रिश्ता है? बड़ा हो कर भरत भी उसे आंखें दिखाने लगेगा. फिर वह उसे अपना क्यों समझे?’

दोनों के मध्य पनपता अवरोध मांजी की पैनी निगाहों से नहीं छिप सका. वह बारबार पूछने लगीं, ‘‘बहू, जब से तुम मायके से लौटी हो तुम ने हंसना बंद कर दिया है. यह उदासी तुम्हारे होने वाले बच्चे के लिए अच्छी नहीं.’’

वर्षा खुद को सामान्य दिखाने का प्रयास करती रहती पर मांजी संतुष्ट नहीं हो पाती थीं.

कभी वह कुरेदतीं, ‘‘सुधीर ने कुछ कहा है क्या? वह भी आजकल खामोश रहता है. तुम दोनों में कोई अनबन तो नहीं हो गई?’’

वर्षा ने उन्हें इस डर से सबकुछ नहीं बताया कि मांजी ही कौन सी उस की सगी हैं. जब सुधीर ही उस का दर्द नहीं समझा तो मांजी कैसे समझेंगी.

वह मांजी से भी दूर रह कर अंतर्मुखी बनने लगी. एक सुबह उठ कर मांजी ने घर में ऐलान किया कि वे हरिद्वार गंगा स्नान को जाएंगी. प्रौढ़ावस्था में उन्हें मोहमाया के बंधन तोड़ कर आत्मिक शांति पाने के प्रयास शुरू करने हैं. मांजी का यह कथन सभी को अटपटा लगा क्योंकि वे अब तक धर्म, कर्म तथा पंडेपुजारियों को पाखंड की संज्ञा देती आई थीं पर हरिद्वार जाने पर आपत्ति किसी ने नहीं दिखाई. सुधीर ने भी कह दिया, ‘‘इसी बहाने प्राकृतिक दृश्यों को देख कर तुम्हारा स्वास्थ्य उत्तम हो जाएगा.’’

मांजी कार में बैठ कर अकेली ही हरिद्वार रवाना हो गईं. इस के बाद तो हरिद्वार जाना उन का नियम सा बन गया. वह महीने में 2-4 चक्कर हरिद्वार के लगाने लगीं.

वर्षा यह सोच कर अब और अधिक क्षुब्ध रहने लगी कि कैसे मांबेटे हैं जिन्हें सिर्फ अपने शौैकसिंगार व स्वास्थ्य का ही खयाल है, किसी और की जरा सी भी चिंता नहीं है. कम से कम मांजी को तो लव के बारे में कुछ पूछना चाहिए था, पर मांजी भी स्वार्थी ठहरीं. एक दिन उस ने फिर से मेरठ जाने का निश्चय किया. सुधीर से छिपा कर कुछ रुपए भी पर्स में रख लिए, सोचा कि लव की दवाइयां खरीदने में काम आ जाएंगे.

थोड़ी नानुकुर के बाद सुधीर ने उसे मेरठ जाने की इजाजत दे दी पर ड्राइवर को खूब समझा दिया कि उसे आज ही वर्षा को साथ ले कर लौटना है.

भरत को इस बार सुधीर ने नहीं जाने दिया. बहला दिया कि मां रात तक तो वापस लौट ही आएगी. सुधीर के कठोर व्यवहार से आहत वर्षा, रास्ते भर आंसू पोंछती रही.

मां और भाभी उसे देखते ही स्वागत के लिए लपकीं, लेकिन वर्षा तो अपने लव को हृदय से लगाने को व्याकुल थी, इसलिए घर में घुसते ही उतावलेपन से सीढि़यों की तरफ दौड़ पड़ी. परंतु छत पर पहुंचते ही जैसे उसे काठ मार गया, क्योंकि लव का कमरा खाली था. उस का बिस्तर व कोई सामान भी दिखाई नहीं दे रहा था. वह चकित सी खड़ी सोचती रही, कहां गया लव?

उस के मन में सैकड़ों आशंकाएं तैर उठीं, कहीं लव को कुछ हो तो नहीं गया?

मां व भाभी दोनों, उस के पीछेपीछे सीढि़यां चढ़ कर ऊपर आ पहुंचीं. वर्षा उन की तरफ मुड़ी व बदहवासी में चिल्लाने लगी, ‘‘मां, बताओ मेरे लव को क्या हुआ? वह कहां चला गया? तुम ने मुझे उस के बारे में कभी पत्र में भी कुछ नहीं लिखा. क्या हुआ मेरे बेटे को…’’ वह रो पड़ी.

‘‘दीदी, हमारी भी तो सुनो,’’ भाभी उस के आंसू पोंछने लगीं.

‘‘क्या तुम्हारी सास ने कभी कुछ नहीं बताया?’’

‘‘नहीं, वह क्यों बताएंगी? उन्हें लव से क्या लेनादेना? कहां है लव…’’

‘‘तुम्हारी सास ने उसे उचित देखभाल के लिए अस्पताल में भर्ती करा दिया है. वह कई बार यहां आ चुकी हैं व लव के इलाज पर पानी की तरह पैसा बहा रही हैं.’’

वर्षा घोर आश्चर्य से जकड़ गई कि क्या ऐसा होना संभव है? पर मांजी को लव की बीमारी के बारे में कैसे पता लगा? कहीं उन्होंने छिप कर तो नहीं सुन लिया था?

वह उसी वक्त अस्पताल जाने के लिए उतावली हो उठी, पर मां ने जबरदस्ती उसे एक प्याला चाय पिला दी. फिर उस के साथ सभी लोग अस्पताल पहुंच गए.

लव साफसुथरे वस्त्र पहने स्वच्छ सफेद शैया पर लेटा हुआ था, मां को देखते ही उठने का प्रयास करने लगा. वर्षा ने उसे सहारा दे कर बिठाया व स्नेह से उस का मुंह चूमने लगी, ‘‘मेरा राजा बेटा, ठीक तो है न?’’

वह लव को पहले की अपेक्षा स्वस्थ देख कर संतुष्टि का आभास कर रही थी.

‘‘दादीमां नहीं आईं?’’ लव इधरउधर देख कर पूछ बैठा.

‘‘वह आएंगी, बेटे,’’ वर्षा उसे प्रसन्न देख कर खुशी से गद्गद हुई जा रही थी.

‘‘देखो, दादी मां ने मुझे कितने पैसे दिए हैं, खिलौने व मिठाइयां भी दिलवाई हैं,’’ लव सारा सामान दिखाने लगा.

कुछ वक्त लव के साथ बिता कर वर्षा अस्पताल से मायके लौट आई. फिर दिल्ली लौटी तो आते ही सास के पैर पकड़ कर कृतज्ञता के बोझ से दब कर रो पड़ी, ‘‘मांजी, आप महान हैं, हरिद्वार जाने के बहाने मेरे लव पर प्यार लुटाती रहीं…पराए लहू पर…’’

‘‘लव पराया कहां है, मेरा पोता है. जब तुम हमारी हो गईं तो लव भी तो अपना हुआ,’’ मांजी ने उसे उठा कर छाती से लगा लिया.

‘‘लेकिन सुधीर उस से नफरत करते हैं,’’ कह कर वर्षा चिंतित हो उठी, ‘‘वह सुनेंगे तो नाराज हो उठेंगे.’’

‘‘सुधीर ने लव को घर में रखने से ही तो इनकार किया है, उस का खर्च उठाने से तो नहीं? मैं लव को छात्रावास में रख कर पढ़ाऊंगी, उसे अच्छा इनसान बनाने में कोई कमी नहीं छोडूंगी.’’

वर्षा जानती थी कि सुधीर में मांजी का कोई भी आदेश टालने की हिम्मत नहीं है. उस का मन सुखसंतोष से भर उठा था कि अब उस का लव अनाथ नहीं रहा. उस के सिर पर मांजी की सबल छत्रछाया मौजूद है.

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