पुरानी साड़ियों को नया रूप देने के 7 टिप्स

साड़ी प्रत्येक भारतीय नारी के व्यक्तित्व में चार चांद लगा देती है इससे इंकार नहीं किया जा सकता. अवसर चाहे छोटा हो या बड़ा साड़ी में नारी सुंदर और आकर्षक तो  लगती ही है. हर महिला की कवर्ड में भांति भांति की साड़ियां होती ही हैं परन्तु समस्या तब आती है जब हम नई और आधुनिक फैशन की साडियां खरीद लाते हैं परन्तु कवर्ड में रखीं कुछ पुरानी साड़िया सालों साल तक यूज में नहीं आ पातीं या फिर एक दो बार पहनने के बाद ही आउट ऑफ़ फैशन हो जातीं हैं.

क्योंकि आजकल साड़ियों का फैशन बहुत जल्दी जल्दी चेंज होता है और ऐसे में पुरानी फैशन की साड़ियों को आप पहन भले ही लें पर इन्हें पहनने के बाद आप आउट डेटिड लगने लगतीं हैं दूसरे कम प्रयोग की जाने के कारण ये हमें नई सी ही लगतीं हैं इसलिए इन्हें किसी को देने का भी मन नहीं करता तो क्यों न इनका रियूज किया जाए. रियूज करने से अपनी पसंद की साड़ी को आप नया रूप तो दे ही पाएंगी साथ ही पैसे की बचत भी कर सकेंगी. आज हम आपको पुरानी साड़ियों को नया रूप देने के ऐसे ही कुछ टिप्स बता रहे हैं.

  1. लेसेज चेंज करें

कुछ समय पूर्व तक जहां साड़ियों में अच्छी खासी चमक वाले चौड़े बोर्डर वाली हैवी साड़ियों का फैशन था वहीं आजकल 1 इंच के पतले गोटा पत्ती के तिकोने बोर्डर वाली साड़ियां फैशन में हैं इसलिए अपनी वार्डरोब की चौड़े बोर्डर वाली साड़ियों के बोर्डर को निकलकर पतला सा  लेस या बोर्डर लगाकर मोडर्न लुक दें.

2. ब्लाउज अपडेट करें

आजकल लाईट साड़ी और हैवी ब्लाउज का फैशन है. अपनी वार्डरोब की साड़ियों के मैचिंग ब्लाउज के स्थान पर जेकोर्ड, चिकन वर्क, मिरर वर्क और हैवी इम्ब्रोइडरी वाले कंट्रास ब्लाउज केरी करें और अपनी साड़ी को दें नया सा लुक.

3. मैक्सी या गाउन बनवाएं

कई बार वार्डरोब में कुछ ऐसी साड़ियां होती हैं जो बिल्कुल ही आउटडेटिड होतीं हैं और जिन्हें आप अपनी कवर्ड से हटा भी नहीं पा रहीं हैं ऐसी साड़ियों से आप बहुत सुंदर सा गाउन बनवाएं. आजकल गाउन काफी फैशन में भी हैं. बस इस बात का ध्यान रखें कि कॉटन, ऑरगेंजा, और बहुत अधिक फूलने वाले फेब्रिक के स्थान पर फाल वाले फेब्रिक का गाउन बनवाएं.

4. सूट सिलवायें

आजकल प्लेन सूट के साथ हैवी दुपट्टे का फैशन ट्रेंड में है. बोर्डर वाली साड़ी का बोर्डर हटाकर आप इससे सूट बनवाएं और यदि पल्ला हैवी है तो मैचिंग कपड़ा लगाकर डिजाइनर दुपट्टा बनवाएं. ध्यान रखें कि प्लेन साड़ी का बॉटम और टॉप एक जैसा वहीँ प्रिंटेड साड़ी का टॉप और दुपट्टा बनवाएं इसके साथ प्लेन बॉटम केरी करें. आप चाहें तो इसके साथ रेडीमेड पेंट या लेगिंग्स का प्रयोग भी कर सकतीं हैं.

5. कुशन्स और दीवान सेट

साटन, सिल्क, बनारसी फेब्रिक वाली साड़ियों से आप बहुत सुंदर कुशन्स बनवा सकतीं हैं वहीँ इसके प्लेन वाले पोर्शन से दीवान सेट बना सकतीं हैं साड़ी यदि बोर्डर वाली है तो इसके बोर्डर को दीवान की चादर में लगायें.

6. लहंगा और स्कर्ट

लहंगा और स्कर्ट बनाने के लिए किसी भी फेब्रिक वाली साड़ी का प्रयोग किया जा सकता है. आजकल कली वाली, ओरेव और सादा चुन्नट वाली स्कर्ट बहुत चलन में हैं. साड़ी के पल्ले का प्रयोग ब्लाउज बनाने में किया जा सकता है. इसके साथ मैचिंग चुन्नी केरी करके आप किसी भी पार्टी में अपना जलवा बिखेर सकतीं हैं.

7. डायनिंग टेबल सेट

बनारसी, सेटिन और कढ़ाई वाली साड़ियों से आप बहुत सुंदर डायनिंग टेबल सेट भी बना सकतीं हैं इसके लिए आप पल्ले से रनर और शेष पोर्शन से डायनिंग टेबल की चेयर्स के सीट कवर बनवाइए.

बालों के लिए अंडे के फायदे

आहार लाभ के लिए अंडे खाने के फायदे लंबे समय से और अच्छे कारण से बताए गए हैं, लेकिन जब बालों के लिए अंडे के सौंदर्य के लाभों की बात आती है, तो ये शानदार सामग्रियां काफी प्रभावी होती हैं. अंडे बहुमुखी सामग्री हैं, जिन का उपयोग अकेले या अन्य सामग्रियों के साथ मिल कर किया जा सकता है, ताकि सेवन करने पर या बालों या त्वचा पर शीर्ष पर लगाने पर अधिकतम लाभ मिल सके.

हालांकि वे बदबूदार और गंदा होने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन उन का उपयोग करना सार्थक है, सिर्फ इसलिए क्योंकि यह एकमात्र घटक आप के बालों की सभी समस्याओं को एक पल में हल कर सकता है. आइए देखें कि अंडों में क्याक्या होता है, आप को उन्हें प्रभावी ढंग से कैसे उपयोग करने की आवश्यकता है और वे आप की ड्रेसिंग टेबल के लिए उपयोगी क्यों हो सकते हैं.

कच्चे अंडे वास्तव में बालों की देखभाल के लिए प्रकृति का उपहार हैं. यह सुपरफूड सभी प्रकार के बालों के लिए उपयुक्त है और अंडे की सफेदी और जर्दी दोनों ही फायदे से भरपूर हैं.

अंडे की जर्दी विशेष रूप से पोषक तत्वों से भरपूर होती है और बायोटिन, विटामिन ए, डी, ई, के और फोलेट से भरपूर होती है. अंडे की जर्दी में भी लेसिथिन होता है. एक अंडे में 8.3 ग्राम प्रोटीन होता है. अंडे का आधा प्रोटीन सफेद भाग में होता है और दूसरा आधा अंडे की जर्दी में होता है. अंडे की सफेदी में सेलेनियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम और फास्फोरस भी होता है.

इस के अलावा अंडे कुल मिला कर आयरन, कौपर और जिंक के साथसाथ ढेर सारे विटामिन बी भी प्रदान करते हैं, जो बालों के स्वास्थ्य के लिए सब से आवश्यक हैं. विटामिन बी1 (थियामिन), बी2 (राइबोफ्लेविन) और बी5 (पैंटोथेनिक एसिड) बालों के लचीलेपन, मजबूती और समग्र स्वास्थ्य के लिए अच्छे हैं. बायोटिन या विटामिन बी7 बालों के विकास के लिए विशेष रूप से आवश्यक हैं, जबकि फोलिक एसिड की कमी से समय से पहले बाल सफेद हो सकते हैं.

यदि अंडे घासपोषित या फ्रीरेंज हैं, तो आप के पास ओमेगा 3 फैटी एसिड से भरपूर पदार्थ भी होगा. यह बहुत सारे पोषक तत्व हैं. ये सभी बालों की देखभाल के कई लाभों के लिए महत्वपूर्ण हैं, और ये सभी एक छोटे अंडे में पाए जाते हैं.

जर्दी प्राकृतिक वसा के साथ आती है और सब से प्राकृतिक तरीके से मौइस्चराइजिंग लाभ प्रदान करती है, बिना किसी हानिकारक कृत्रिम क्रीम, रसायन या पैराबेंस के. इस लिहाज से यह अंडे की सफेदी से अधिक गुणकारी है, क्योंकि इस में अधिक पोषक तत्व होते हैं.

हालांकि गोरों को पूरी तरह से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. इन में बैक्टीरिया को खाने वाले एंजाइम होते हैं, जो स्कैल्प को ताजा और साफ रखते हैं और अवांछित तेल और ग्रीस को भी हटा देते हैं. अपने बालों को स्वस्थ रखने के लिए अंडे की सफेदी और अंडे की जर्दी दोनों का उपयोग करना महत्वपूर्ण है, लेकिन आप इसे कैसे करते हैं, यह काफी हद तक आप के बालों के प्रकार पर निर्भर करता है.

सामान्य बालों के लिए, पूरे अंडे – सफेदी और जर्दी को मिश्रित कर के उपयोग करें. यदि आप के तैलीय बाल हैं, तो दोमुंहे बालों को रोकने के लिए अपने स्कैल्प पर अंडे की सफेदी और बालों के सिरों पर जर्दी का उपयोग करें.

आप पूरे अंडे के साथ अंडे के मास्क का उपयोग सप्ताह में एक बार से अधिक नहीं कर सकते हैं. सूखे और भंगुर बालों के लिए, जितना संभव हो सके, जर्दी के उपयोग पर ध्यान दें. अच्छी सफाई और डिटौक्स के लिए अपने स्कैल्प पर सप्ताह में केवल एक बार अंडे की सफेदी का प्रयोग करें.

अंडे बालों में प्रोटीन की मात्रा को फिर से भरने के लिए अच्छे होते हैं. यह ऐसे कैसे करता है? जैसा कि हम सभी जानते हैं, दिखाई देने वाले बाल मृत कोशिकाओं से बने होते हैं. बालों का विकास खोपड़ी के नीचे, बालों के रोम में होता है. जब नई बाल कोशिकाएं बनती हैं, तो पुरानी मृत कोशिकाएं ऊपर की ओर धकेल दी जाती हैं – और इसीलिए बाल बढ़ते हैं.

दरअसल, बाल केराटिन नामक प्रोटीन से बने होते हैं. मानव शरीर ही पूरी तरह से प्रोटीन से बना है यानी इस की पूरी संरचना प्रोटीन से ही बनी है. हम जो भी प्रोटीन खाते हैं, वह अमीनो एसिड में टूट जाता है, जिस का उपयोग लिवर विभिन्न प्रोटीन बनाने के लिए करता है. तो, खोपड़ी क्षेत्र के नीचे, लाखों बाल रोम होते हैं, जो हमें भोजन से प्राप्त अमीनो एसिड से केराटिन बनाते हैं. इन कोशिकाओं में बालों का विकास होता है और इसी तरह बाल बनते हैं.

इसलिए बालों के प्रत्येक स्ट्रैंड को एकसाथ रखने के लिए प्रोटीन वास्तव में महत्वपूर्ण है. यदि आप को अपने आहार में इस की अपर्याप्त मात्रा मिल रही है, तो संभावना है कि आप कमजोर, भंगुर और ढीले बालों से पीड़ित होंगे, जो झड़ जाते हैं. सप्ताह में दो या तीन बार अंडे का मास्क लगाने के साथसाथ अंडे के साथ आहार लेने से यह सुनिश्चित होगा कि आप के केराटिन के स्तर को बरकरार रखने और आप के बालों को सही आकार में रखने के लिए आप को प्रोटीन की पर्याप्त खुराक मिलेगी.

घर पर आजमाने के लिए अंडे का मास्क

  1. पूरा अंडा और अरंडी का तेल मौइस्चराइजिंग मास्क 

दो बड़े चम्मच अरंडी के तेल के साथ दो साबुत अंडे लें और एक कटोरे में तब तक अच्छी तरह मिलाएं, जब तक कि आप को एक चिकना मिश्रण न मिल जाए. इसे पूरे स्कैल्प और बालों पर लगाएं, यह सुनिश्चित करें कि प्रत्येक स्ट्रैंड अच्छी तरह से कोट हो जाए. सिलोफन पेपर में लपेटें और आधे घंटे के लिए छोड़ दें. अपने नियमित शैंपू से अच्छी तरह धोएं और बायोटिनयुक्त कंडीशनर का प्रयोग करें.

2. क्षतिग्रस्त बालों के लिए, अंडे की जर्दी व दही का मास्क 

तीन अंडे की जर्दी लें, उस में बराबर मात्रा में फुलफैट दही मिलाएं और एक ब्लेंडर में तब तक पीसें, जब तक कि आप को एक चिकना मिश्रण न मिल जाए. पूरे बालों पर लगाएं, यह सुनिश्चित करते हुए कि सिरों पर ध्यान केंद्रित करें, जहां सब से अधिक नुकसान होने की संभावना है. 15-30 मिनट के लिए छोड़ दें, और फिर अपने हाथ का उपयोग कर के मिश्रण को बालों से बाहर निकालें. अपने नियमित शैंपू से अच्छी तरह धो लें.

आजादी के 76 साल औरतें आज भी बदहाल

मणिपुर में कुकी समुदाय की 2 महिलाओं को निर्वस्त्र कर के घुमाने और उन के साथ यौन हिंसा ने पूरे देश का सिर शर्म से झुका दिया. जिस तालिबानी संस्कृति की हम आलोचना करते हैं यह उस से भी बड़ी घटना है. मणिपुर हिंसा के 83वें दिन 2 महिलाओं के साथ जो हुआ उस के वीडियो बनाए गए और फिर उन्हें सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया जिस से समाज की मानसिकता का ही पता चलता है. यह किसी आदिम युग की घटना लगती है. इस घटना ने साबित कर दिया कि आजादी के 76 सालों के बाद भी महिलाओं को ले कर हमारी सोच नहीं बदली है. देश में 760 साल पहले महिलाओं की जो हालत थी वही आज भी कायम है.

इन महिलाओं को नग्न कर के सड़क पर घुमाते हुए दिखाया जा रहा है. उन के यौन अंगों से छेड़छाड़ की जा रही है. यह वीडियो पूरी दुनिया में चर्चा का विषय बन गया. पूरी दुनिया ने देख लिया कि भारत में महिलाओं की क्या हालत है. 83 दिनों से सो रही डबल इंजन सरकार को सोता देख कर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लिया. चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने केंद्र और राज्य सरकार को सख्त काररवाई करने का निर्देश दिया. चीफ जस्टिस को यहां तक कहना पड़ा कि या तो सरकार काररवाई करे वरना हम खुद इस मामले में हस्तक्षेप करेंगे.

मानवजीवन का उल्लंघन

चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि हमारा विचार है कि अदालत को सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से अवगत कराया जाना चाहिए ताकि अपराधियों पर हिंसा के लिए मामला दर्ज किया जा सके. मीडिया में जो दिखाया गया है और जो दृश्य सामने आए हैं, वे घोर संवैधानिक उल्लंघन को दर्शाते हैं और महिलाओं को हिंसा के साधन के रूप में इस्तेमाल कर के मानवजीवन का उल्लंघन करना संवैधानिक लोकतंत्र के खिलाफ है.

यह वीडियो 4 मई का बताया जा रहा है जब हिंसा शुरुआती चरण में थी. महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाने का आरोप मैतई समुदाय के लोगों पर लगा. इस मामले में पुलिस ने अज्ञात हथियारबंद बदमाशों के खिलाफ थौबल जिले के नोंगपोक सेकमाई पुलिस स्टेशन में अपहरण, सामूहिक दुष्कर्म और हत्या का मामला दर्ज किया. हर घटना की ही तरह इस घटना में भी लीपापोती शुरू हो गई.

यह कोई नई घटना नहीं है. मणिपुर में दंगों की ही तरह गुजरात के दंगे भी लंबे समय तक चले थे. इन में भी महिलाओं के साथ बुरा व्यवहार किया गया. इस में सब से प्रमुख नाम बिलकिस बानो का आता है. 21 साल के बाद भी बिलकिस बानो को न्याय नहीं मिल सका. उस के दोषियों को ही रिहा कर दिया गया. 2002 में हुए गोधरा कांड के दौरान बिलकिस बानो से रेप किया गया था और उस के परिवार के लोगों की हत्या कर दी गई थी.

प्रधानमंत्री से सवाल

15 अगस्त, 2022 को गुजरात हाई कोर्ट ने दोषियों को समय से पहले ही रिहा कर दिया था, जिस के बाद बानो ने 30 नवंबर, 2022 को इस के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए याचिका दायर की.

2002 में गुजरात में हुए गोधरा कांड के बाद प्रदेश में दंगे भड़क गए थे. दंगाई बिलकिस बानो के घर में घुस गए थे, जिन से बचने के लिए बानो अपने परिवार के साथ एक खेत में छिप कर बैठ गई थी. इस दौरान दंगाइयों ने 21 साल की बिलकिस जो 5 महीने की गर्भवती थी, उस के साथ गैंगरेप किया. उन दंगाइयों ने उस की मां समेत 3 और महिलाओं के साथ भी दुष्कर्म किया और परिवार के 7 लोगों की हत्या कर दी.

इस दौरान बानो के परिवार के 6 सदस्य भी गायब हो गए जिन का कभी पता नहीं चल सका. इस के बाद गैंगरेप के आरोपियों को 2004 में गिरफ्तार किया गया. वहीं 2008 में स्पैशल कोर्ट ने 11 दोषियों को उम्रकैद की सजा दी थी. लेकिन गुजरात हाई कोर्ट ने उन्हें समय से पहले ही 15 अगस्त को रिहा कर दिया. बिलकिस बानो को आज भी न्याय की तलाश है. गुजरात दंगों के दौरान नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे. मणिपुर दंगों के दौरान वे देश के प्रधानमंत्री हैं. 83वें दिन बीत जाने पर भी हिंसा जारी है. देश के लोग प्रधानमंत्री से सवाल कर रहे हैं और वे चुप हैं.

जाति और धर्म की राजनीति

760 साल यानी मध्यकालीन युग में भारत में महिलाओं की जो हालत थी उस में 76 सालों में कोई बदलाव नहीं हुआ है. जाति और धर्म को ले कर रूढि़वादी विचारधारा आज भी कायम है. मणिपुर में 2 महिलाओं के साथ जो हुआ उस का भी जातिगत आधार है. मैतई समाज के लोगों ने कुकी समाज से बदला लेने के लिए उन के समाज की महिलाओं का अपमान करने के लिए यौन हिंसा की. इस के पहले उत्तर प्रदेश में हाथरस कांड हुआ जहां दलित लड़की की लाश को पुलिस ने बिना घर वालों की मरजी के जलवा दिया.

इस से पता चलता है कि 76 साल बाद देश में महिलाओं के वही हालत है जो 760 साल पहले थी. महिलाओं को बराबरी का हक नहीं था. पढ़ाई नहीं कर सकती थीं. उन के पहनावे पर भी रोक थी. आज भी लड़कियों और महिलाओं के पहनावे को ले कर टिप्पणियां की जाती हैं. अगर कम कपड़े पहने लड़की के साथ छेड़छाड़ हो जाती है तो दोष लड़के का नहीं लड़की के कपड़ों का दिया जाता है. मौडर्न कपडे़ पहनने वाली लड़कियों को अच्छा नहीं माना जाता. असल में यह पुरानी पुरुषवादी मानसिकता की निशानी है.

नहीं था स्तन ढकने का अधिकार

केरल में महिलाओं को स्तन ढक कर रखने का अधिकार नहीं था. इस के लिए उन को टैक्स चुकाना पड़ता था. एड़वा जाति की महिला नंगेली ने टैक्स दिए बगैर अपने स्तन ढकने का फैसला कर लिया. कर मांगने आए अधिकारी ने जब नंगेली की बात को नहीं माना तो नंगेली ने अपने स्तन खुद काट कर उस के सामने रख दिए. इस साहस के बाद खून ज्यादा बहने से नंगेली की मौत हो गई.

150 से 200 साल पहले की ही बात है. केरल के बड़े हिस्से पर त्रावणकोर के राजा का शासन था. जातिवाद की जड़ें बहुत गहरी थीं और निचली जातियों की महिलाओं को उन के स्तन न ढकने का आदेश था. इस को न मानने वालों को ‘ब्रैस्ट टैक्स’ यानी ‘स्तन कर’ देना पड़ता था. असल में उस दौर में पहनावे से ही व्यक्ति की जाति की पहचान की जाती थी.

‘ब्रैस्ट टैक्स’ का मकसद जातिवाद के ढांचे को बनाए रखना था. गरीब समुदायों के लिए टैक्स देना मुमकिन नहीं था. लिहाजा, वे स्तन नहीं ढकती थीं. केरल के हिंदुओं में नायर जाति को शूद्र माना जाता था. इन से निचले स्तर पर एड़वा और फिर दलित समुदायों को रखा जाता था. स्तन कर का नाम मलयालम में ‘मुलक्करम’ था.

राजा की ओर से नियुक्त टैक्स कलैक्टर

बाकायदा दलितों के घर आ कर इस कर की वसूली करता था. उस समय केरल में महिला हो या पुरुष, उच्च वर्ण हो या निम्न, सभी मुंडू (धोती) पहनते थे. इस वस्त्र से कमर से नीचे का हिस्सा ढका जाता था, जबकि महिला हो या पुरुष कमर से ऊपर बिना कपड़े के रहते थे.

क्या कहते हैं आंकड़े

महिलाओं की हालत बयां करती बहुत सारी कहानियां इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं. इसी युग में गरीब और कमजोर वर्ग की महिलाओं को दासी बनाने की प्रथा भी थी जो बड़े घरों की लड़कियों के साथ ससुराल तक जाती थीं. राजा की हैसियत इस बात से आंकी जाती थी कि उस ने अपनी बेटी की सेवा के लिए कितनी दासियां भेजी हैं. आजादी के बाद भले ही दासी बनाने की प्रथा बंद हुई हो पर बाकी महिलाओं की हालत में सुधार नहीं हुआ है. आज भी कमजोर वर्ग की महिलाएं पैसे के लिए घर की गंदगी साफ करने से ले कर दूसरे काम तक करती हैं. गंदगी साफ करने का काम जाति विशेष की महिलाएं ही करती हैं.

इस के बाद भी गरीब और कमजोर वर्ग की महिलाओं के साथ अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं. भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के अनुसार 2020 की तुलना में 2021 में महिलाओं के खिलाफ अपराध की घटनाओं में 15.3 फीसदी की वृद्धि हुई है. राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के अनुसार 2011 में 2,28,650 से अधिक घटनाएं दर्ज की गईं, जबकि 2021 में 4,28,278 घटनाएं दर्ज की गईं. भारत में 10 वर्ष से कम उम्र की लगभग 7.84 मिलियन बच्चियों की शादी हो जाती है.

जीवनसाथी के चुनाव का अधिकार

उत्तराखंड में पौड़ी गढ़वाल के नगर पालिका अध्यक्ष और भाजपा नेता यशपाल बेनाम की लड़की मोनिका ने उत्तर प्रदेश के मुसलमान परिवार के लड़के मोनिस से शादी का निमंत्रण कार्ड ही छपवाया था. कार्ड सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. इस के बाद उन दोनों के परिवार पर इतना दबाव पड़ा कि उन को शादी कैंसिल करनी पड़ी. इस तरह की घटनाएं तमाम हैं. ये बताती हैं कि लड़कियों के लिए अपने जीवनसाथी का चुनाव करना मुमकिन नहीं है.

शादी में दहेज का दानव आज भी कायम है. 76 सालों में इस में सुधार नहीं आया. साल दर साल इस तरह की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं. 2016 से 2021 के बीच 6 साल की अवधि में देश में महिलाओं के खिलाफ अपराध के करीब 22.8 लाख मामले दर्ज हुए. इन में से लगभग 7 लाख यानी करीब 30त्न आईपीसी की धारा 498ए के तहत दर्ज किए गए थे. धारा 498ए किसी महिला के खिलाफ पति या उस के रिश्तेदारों की कू्ररता से संबंधित है.

आंकडे़ बताते हैं कि बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों में भी कहीं ज्यादा दहेज उत्पीड़न के मामले हैं. एक अध्ययन में पाया गया कि 8,000 गर्भपातों में से 7,997 कन्या भू्रण के थे. राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार 2014 से 2018 के बीच 5 वर्षों की अवधि में देश में एसिड हमलों के 1,483 मामले दर्ज किए गए.

जायदाद में नहीं है अधिकार

मध्यकाल में महिलाओं की स्थिति बहुत खराब थी. उन को पत्नी और बहन के रूप में सम्मान दिया जाता था. महिलाओं को मानसिक रूप से हीन सम?ा जाता था. उन का काम आंख मूंद कर अपने पतियों की आज्ञा का पालन करना था. उन्हें वेदों की पहुंच से वंचित रखा गया था. इस के अलावा लड़कियों की विवाह योग्य आयु कम थी ताकि उन के लिए शिक्षा के अवसर खत्म हो जाएं. लड़की की शादी के बाद जब वह ससुराल जाती थी तो उस के साथ दासियां भी जाती थीं जो वहां उस की सेवा करती थीं.

जाति और महिलाओं की सामाजिक स्थिति का अटूट संबंध है. जाति को पुन: उत्पन्न करने के लिए सजातीय विवाह और अन्य सामाजिक तकनीकों का उपयोग महिलाओं के शरीर को यौन रूप से वश में करने के लिए किया जाता था. इस वजह से मध्ययुगीन काल से जाति व्यवस्था की  कठोरता देखने को मिलती है. यह अभी भी किसी न किसी रूप में कायम है. 11वीं शताब्दी तक विधवाओं को जलाना, सती प्रथा, पूरे भारत में आम थी आज भले ही सती प्रथा खत्म हो गई हो पर समाज में विधवाओं को अधिकार नहीं हैं. उन का एक तरह से सामाजिक बहिष्कार ही होता है.

पुनर्विवाह और समाज

लड़कियों को भले ही संविधान ने उन के पिता की जायदाद में हिस्सा दे दिया हो पर अभी भी समाज इस को अच्छा नहीं मानता है. भाई के रहते पिता की जायदाद में बेटी हिस्सा न ले इस का सामाजिक दबाव रहता है. पितृसत्ता उसी तरह से समाज में कायम है जैसे 760 साल पहले कायम थी. 800-1200 के दौरान महिलाओं की स्थिति खतरनाक थी. लड़कियों की शादी 6 से 8 साल की उम्र के बीच कर दी जाती थी. आज भी 18 साल होतेहोते अधिक संख्या में शादियां हो जाती हैं.

पुनर्विवाह को अच्छा नहीं माना जाता है. यदि मजबूरी में पुनर्विवाह करना भी पडे़ तो उस में पहले विवाह जैसा उत्साह नहीं रहता. वह केवल खानापूर्ति भर रहता है. महिलाओं पर आमतौर पर अविश्वास किया जाता है. उन का जीवन पिता, भाई, पति या पुत्र जैसे पुरुषों द्वारा नियंत्रित किया जाता है. पत्नी का नाम पति के नाम के साथ खेती की पैत्रक जमीन में एकसाथ नहीं आता. पत्नी के नाम खेती की जमीन तभी आएगी जब उस का पति जिंदा नहीं रहता है. भूमि संपत्ति अधिकारों के विस्तार के साथसाथ महिलाओं के संपत्ति अधिकार भले ही कागज पर बड़े हों पर सामाजिक रूप से इस को स्वीकार नहीं किया गया है.

धर्म नहीं चाहता औरतों की आजादी

केरल के सबरीमला मंदिर, महाराष्ट्र के शनि शिगणापुर मंदिर और मुंबई के हाजी अली में भी महिलाओं के प्रवेश को ले कर विवाद रहा है. सबरीमला में 10 से 50 साल तक की उम्र की महिलाओं के प्रवेश की मनाही है. इस की वजह यह है कि इस उम्र की महिलाएं माहवारी वाली होती हैं. मंदिरों में इस अवस्था में महिलाओं का प्रवेश वर्जित होता है. इस को महिलाओं के मन में इस तरह से भर दिया गया है कि घरों में भी वे इस अवस्था में पूजा नहीं करतीं. माहवारी के दिनों में महिलाओं को अछूत माना जाता है. आज भी वे इस अवस्था में खाना नहीं बनातीं. अचार नहीं छूतीं.

सबरीमला में यह परंपरा 500 साल पुरानी, शनि शिगणापुर मंदिर में इसे 400 साल पुरानी और हाजी अली के बारे में भी ऐसे ही कुछ दावे हैं यानी 76 साल आजाद रहने के बाद भी हालात नहीं बदले हैं. आदमियों ने परंपरा का नाम ले कर महिलाओं के साथ भेदभाव जारी रखा है. इस दौर में वे खुद बदल गए हैं यानी आदमियों के लिए परंपरा नहीं है. आदमियों के लिए समुद्र पार न करने की परंपरा थी, मगर आज वे विदेश जाते हैं. परंपरा तो मंदिरोंमसजिदों में लाउडस्पीकर लगाने की भी नहीं थी यह भी होता है. पैसा ले कर कथा सुनाने की परंपरा नहीं थी. इस के बाद भी यह होता है.

यह कैसी सोच

कई लोग यह तर्क देते हैं कि आजादी के बाद यानी 76 सालों में महिलाओं की हालत में बहुत बदलाव हुए हैं. महिलाएं नौकरी करने, सिनेमा देखने, वायुसेना में भरती होने, संसद और विधानसभाओं में जा रही हैं. देखने वाली बात यह है कि कितनी महिलाएं यहां जा पा रही हैं. पुरुषों से तुलना करें तो यह संख्या बेहद कम है. महिला की पवित्रता का पैमाना महिला नहीं पुरुष तय करते हैं. जो मासिकधर्म महिलाओं की प्रजनन क्षमता का सूचक है, जिस के कारण पुरुष भी इस धरती पर पैदा होते हैं धर्म के कारण उसी को अपवित्र माना जाता है. गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर की देवी की तब पूजा करना पुरुषों के लिए सब से पवित्र है, जब औरतें रजोधर्म से मानी जाती हैं.

स्वास्थ्य के हिसाब से महिलाओं की हालत सब से खराब है. भारत का मातृ मृत्यु अनुपात 2014-16 में 130 प्रति 1,00,000 जीवित से गिर कर 2017-19 में 103 हो गया है. भारत में 57त्न महिलाएं ऐनीमिया की शिकार हैं. 2019 और 2021 के बीच किए गए ‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5’ में कहा गया है कि भारत में 23.3त्न महिलाओं की शादी 18 साल की उम्र से पहले हो गई थी.

आज भारत में महिलाएं अपने मासिकधर्म के दौरान सुरक्षा के स्वच्छ तरीकों का कम उपयोग करती हैं. नैपकिन, सैनिटरी नैपकिन, टैंपोन का प्रयोग मासिकधर्म के दौरान प्रयोग 70 फीसदी महिलाएं नहीं करती हैं.

धर्म की ऐसी पाबंदियां सामंती परंपराओं के अवशेष, उन के अपने मूल्य हैं जो धर्म का मुखौटा ओढ़ कर समाज को अपने वश में किए हुए हैं. धर्म का किसी तर्क, किसी वैज्ञानिक सोच से कोई लेनादेना नहीं होता है. वह पूरी तरह से आस्था पर टिका रहता है. सामंतवाद महिला के हर तरह के इस्तेमाल में विश्वास रखता है. सामंतवाद राजनीति को भी अनुकूल लगता है. इसलिए राजनीति भी धर्म के बारे में पंडेपुजारियों की तरह ही सोचती है. इसी कारण देश के आजाद होने के बाद भी सामंतवाद किसी न किसी रूप में कायम है. वह महिलाओं को किसी भी तरह से आजादी नहीं देना चाहता है.

यह बात और है कि कुछ महिलाओं ने अपनी ताकत से अपने हक लेने का काम किया है, जिस के उदाहरण महिलाओं की तरक्की की मिसाल के रूप में दिए जाते हैं. जिन महिलाओं ने पितृसत्ता से अधिकार छीन कर लेने हैं उन को शिक्षित और जागरूक होना पड़ेगा. धर्म की जंजीरों को तोड़ कर सोचना पड़ेगा. जब तक वे धर्म और रूढि़वादिता की शिकार रहेंगी उन की तरक्की नहीं होगी.

सैक्स के लिए महिलाओं का प्रयोग

पुरुषों के द्वारा महिलाओं का प्रयोग सैक्स के लिए हमेशा से होता आ रहा है. मध्ययुग में दसियों और रखैलों के साथ ऐसा होता था. जो लोग दासी और रखैल नहीं रख सकते थे वे बाजार जाते थे और वहां औरतों का प्रयोग सैक्स के लिए करते थे. यहां भी एक भेदभाव था. आदमी के लिए बाजार और दासियां रखैल थीं लेकिन महिलाओ को ऐसा करने की आजादी नहीं थी.

महिलाओं को दास के रूप में खरीदा और बेचा जा सकता था और उन्हें सब से गंदे काम करने के लिए मजबूर किया जाता था. उन के साथ शारीरिक और यौन शोषण भी किया जाता था. शाही दरबारों में पेशेवर नर्तकियों के साथसाथ देवदासियां या मंदिरों की वेश्याओं के रूप में कार्यरत महिलाओं का एक बड़ा वर्ग था. सैक्स के लिए नीची जाति की महिलाओं से भले ही परहेज नहीं था पर समाज के सामने उन को बराबरी का हक देने के लिए कोई तैयार नहीं था.

आज भी महिलाओं को अपमानित करने के लिए उन के साथ यौन हिंसा होती है. कई बार महिलाओं को सजा देने के लिए उन के कपड़े उतार कर टहलाया जाता है. मणिपुर की घटना अकेली घटना नहीं है. बिहार, उत्तर प्रदेश में इस तरह के कई उदाहरण हैं जहां महिलाओं के बाल काट कर उन को नंगा कर के अपमानित किया गया. कई इस तरह की घटनाएं भी देखने को मिलती हैं जिन में लड़की अगर इनकार कर दे तो उस के साथ बलात्कार किया जाता है. कई बार उन के चेहरों पर तेजाब फेंक कर बदला लिया जाता है. सैक्स के लिए आज भी महिलाओं का प्रयोग होता है. सैक्स की जरूरतों को पूरा करने के लिए महिलाओं के खिलाफ यौन अपराध बढ़ रहे हैं.

इन में ‘महिलाओं के शील भंग’ यानी आईपीसी की धारा 354 के तहत 2016 से 2021 के बीच 5.2 लाख मामले दर्ज किए गए. ये महिलाओं के खिलाफ अपराध से जुड़े कुल मामलों के 23 फीसदी हैं. अपराध, अपहरण और बंधक बनाने की करीब 4.14 लाख घटनाओं के साथ औसतन 18 फीसदी मामले दर्ज किए गए. इन 6 सालों में भारत में बलात्कार के लगभग 1.96 लाख मामले दर्ज किए गए, जो 2016-2021 में महिलाओं के खिलाफ कुल अपराधों में लगभग 8.6त्न थे.

महंगे पैट्स पालना महंगा

डौग शो को देखने पहुंचे तो वहां उपस्थित डौग जो अपने मालिकों के साथ आए थे, उन्हें देख चकित रह गई. एक से बढ़ कर एक स्टाइलिश ढंग से सजे, कीमती कपड़ों से लैस, परफ्यूम से महकते और जूते, कौलर, नैकटाई, रिंग जैसी ऐक्सैसरीज से सज्जित उन पेट्स को देखना किसी स्वप्नलोक से कम नहीं. उन के नेम टैग भी बहुत ही आकर्षक और वे इस तरह से अपने मालिक के साथ खड़े होते हैं मानो किसी फिल्म की शूटिंग में आए हों और अपनी बारी आने का इंतजार कर रहे हों.

पग, अमेरिकन पिट, लेबराडोर, बौक्सर, डेशुंड, अफगान हाउंड, कैरेवान हाउंड, आइरिश वुल्फ हाउंड, जरमन शेपर्ड, डाबरमैन जैसे महंगे पैट्स वहां मौजूद थे, जो शानदार गाडि़यों में बैठ कर आए थे. डौग शो में आ कर उन्हें सर्वप्रथम आने के लिए किसी तरह की ट्रिक नहीं दिखानी थी बल्कि उन का चयन उन के कोट साइज, आदत और पसंद के हिसाब से होना था.

तभी वहां से गुजरती एक महिला को कहते सुना, ‘‘कितने मजे हैं इन पैट्स के. आलीशान गाडि़यों में घूमते हैं, बड़ीबड़ी कोठियों में रहते हैं और हम से भी महंगा खाना खाते हैं. कितना कठिन है आज के जमाने में एक बच्चे को पालना और लोग पैट्स पालते हैं.’’

उस के कहने के अंदाज से झलक रहा था कि पैट्स पर इतना पैसा खर्चना की बात उसे अखर रहा था.

बन गए हैं स्टेटस सिंबल

जो अर्फोड कर सकता है, अकेलापन महसूस करता है वह पैट्स रख रहा है तो इस में बुरा क्या है? इस में जलने की बात क्या है? अगर अच्छी ब्रीड के महंगे पैट्स खरीदते हैं तो उन्हें पालने में एक बड़ी रकम जो क्व30-40 हजार महीना हो सकती है, खर्च करनी पड़ सकती है. अब जिस के पास इतना पैसा है तो वह खर्च भी करेगा क्योंकि आज के लाइफस्टाइल में अगर एक तरफ पैट्स सुरक्षा की दृष्टि से जरूरत है तो दूसरी ओर वे स्टेटस सिंबल भी हैं.

चीन में एक तिब्बती मस्टिफ 1 करोड़ पाउंड में बिका. यह बहुत ही आक्रामक गार्ड डौग है. जाहिर सी बात है कि जिस ने उसे खरीदा होगा वह कोई मामूली आदमी तो होगा नहीं बल्कि महंगे पैट पलाने की हैसियत रखता होगा. कोई भी पैट जितना कीमती होता है या बेहतरीन नस्ल का उसे पालने, उस के रखरखाव में 50 हजार रुपये तक खर्च हो सकते हैं.

क्या कहते हैं ऐक्सपर्ट

समाजशास्त्रियों का मानना है कि मर्सिडीज और सौलिटेयर्स को पीछे छोड़ते हुए पैट्स लेटैस्ट स्टेटस सिंबल बनते जा रहे हैं और उन के मालिकों को उन के लिए महंगे प्रोडक्ट्स और सर्विसेज लेने में कोई असुविधा महसूस नहीं होती है. यही वजह है कि इस समय भारत में यह बाजार 300 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है और उन के लिए ब्रैंडेड फूड से ले कर इस समय यहां पपकेक, बैड तो उपलब्ध हैं ही, साथ ही उन के बर्थडे की पार्टी किसी लग्जरी रिजोर्ट में करवाने का इंतजाम भी किया जाता है.

आजकल हर बाजार में जो नई दुकानें ज्यादा चमचमा रही हों, समझ लें कि वे पैट्स का सामान बना रही हैं जिन में फर्राटेदार अंगरेजी बोलने वाली औरतें बिना दाम पूछे पैकेट पर पैकेट खरीद रही होंगी.

कानन मल्होत्रा जो अपने पैट ल्हासा एप्सो के बिना एक पल भी नहीं रह सकती हैं कहती हैं, ‘‘मेरा पैट मेरी बेटी की तरह है और उस की आदतें बिलकुल मेरा जैसा हैं. मेरे पति ने 5 साल पहले उसे मुझे गिफ्ट में दिया था. वह घर से बाहर बिना जूता पहने नहीं निकलती है. मैं ग्रूमिंग के लिए महीने में 2 बार स्पा ले जाती हूं.’’

एक बड़ा बाजार

मेटिंग वैबसाइट से ले कर स्पैशल बेकरी व घर पर ही आ कर ग्रूमिंग सर्विस की सुविधाओं से ले कर पैट्स को साथ ले कर छुट्टियां बिताने के लिए ट्रैवल एजेंट्स के पैकेज सबकुछ मौजूद है. जैकोब और क्रिश्चियन आडीगियर जैसे इंटरनैशनल ब्रैंड उन के लिए कपड़ों से ले कर ज्वैलरी और फर्नीचर तक डिजाइन करते हैं. जगहजगह उन के लिए ऐसे फन रिजोर्ट बने हुए हैं जहां पैट्स के पेरैंट्स यानी मालिक के शहर से बाहर जाने पर उन्हें वहां छोड़ा जा सकता है.

आसान नहीं है पालना

टीवी पर दिखाए जाने वाले पैडीग्री फूड के विज्ञापन से यह तो साबित हो ही जाता है कि पैट्स भी एक शानदार जीवन जीने का अधिकार रखते हैं और उन के मालिक इस बात को ले कर कौंशस हो चुके हैं कि उन्हें अपने पैट्स को बढि़या से बढि़या चीजें व सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए. पेडीग्री फूड का 500 ग्राम का पैकेट 100 रुपए का आता है और 1,000 रुपए तक उस की कीमत है.

इस के अतिरिक्त डौग च्यू जिन का आकार हड्डी, जूतों आदि जैसा होता है, वे भी मिलते हैं. वे भी 25 से 600 रुपए के बीच आते हैं. उन के लिए हेयर ब्रश, टूथब्रश, टूथपेस्ट, नेलकटर, शैंपू, हेयर टौनिक, परफ्यूम सब मिलते हैं.

महंगे पैट्स रखने के शौकीन लोगों के लिए उन्हें पालना भी महंगा ही साबित होगा, लेकिन यह भी सच है कि जो लोग उन्हें पालने की क्षमता रखते हैं, वही उन्हें खरीदते भी हैं. जिस तरह वे अपने बच्चों पर पैसा खर्चते हैं और उन्हें हर सुविधा देने के लिए तत्पर रहते हैं वैसे ही वे अपने पैट्स का भी ध्यान रखते हैं और उन के लिए बेहतरीन चीजें खरीदने में पीछे नहीं रहते हैं.

13 Baby Health tips: Monsoon बेबी स्किन केयर

बारिश का मौसम बहुत सुहावना होता है, मगर इस मौसम बच्चों से लेकर बड़ों तक को अपनी सेहत की खास देखभाल की जरूरत होती है. दरअसल, बारिश में मच्छरों और गंदे पानी से पैदा होने वाली बीमारियों से इन्फैक्शन का खतरा बढ़ जाता है. वैसे बरसात के खूबसूरत मौसम को बच्चे बहुत ऐंजौय करते हैं क्योंकि यह उन के लिए बहुत रोमांचक और मजेदार होती है. लेकिन मौनसून में बेबीज की स्किन को खास देखभाल की जरूरत होती है. उन की स्किन काफी नाजुक होती है.

ऐसे में जरा सी लापरवाही से काफी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. इस मौसम में कई बार बच्चे बारिश के पानी में भीग जाते हैं, जिस कारण उन की स्किन में खुजली, रैशेज और त्वचा पर दानों की समस्या हो सकती है. इसलिए उन की स्किन की स्पैशल केयर बहुत जरूरी है.

  1. मौइस्चराइजिंग लोशन का प्रयोग करें

बच्चों की स्किन बहुत ही मुलायम और सैंसिटिव होती है. जब मौसम में अधिक ह्यूमिडिटी बढ़ जाती है तो बच्चों को अधिक खुजली और रैशेज की समस्या होने लगती है. इस से उन्हें राहत दिलाने के लिए आप एक मौइस्चराइजिंग लोशन का प्रयोग कर सकती हैं जो उन की स्किन को इस मौसम में ड्राई होने से और रैशेज आने से बचा सकता है. कुछ अच्छे मौइस्चराइजिंग लोशन ये हैं:

बेबी हग डेली मौइस्चराइजिंग लोशन, सेटाफिल बेबी डेली लोशन विद शीया बटर, हिमालया हर्बल बेबी लोशन, अवीनो बेबी डेली मौइस्चराइजिंग लोशन, मामाअर्थ मौइस्चराइजिंग डेली लोशन व्हाइट, चिकू बेबी मोमैंट्स बौडी लोशन, बेबी डव लोशन मौइस्चर, जौनसन बैबी लोशन फौर न्यू बोर्न आदि.

2. डायपर गीला न छोड़ें

बेबी को सूखा रखने के लिए उसे डायपर पहनाया जाता है, लेकिन कई बार इसे चैक न करने पर बेबी कई घंटों तक गीले डायपर में ही पड़ा रहता है. इसलिए कुछ अंतराल पर उस की नैपी को जरूर चैक करती रहें. बारिश में वातावरण में नमी बढ़ने से शिशुओं को भी डायपर रैशेज होने का खतरा रहता है.

इसलिए अपने बच्चे के डायपर को समयसमय पर बदलती रहें. उसे कुछ देर तक डायपर मुक्त रखें, साथ ही हवा की आवाजाही के लिए कौटन डायपर का प्रयोग करें. कुछ अच्छे डायपर ब्रैंड्स हैं: हिमालया बेबी डायपर, मैमीपोको पैंट, लिटिल ऐंजल डायपर, मीमी बेबी डायपर, सुपर बौटम्स नैप्पीज, पैंपर्स ऐक्टिव बेबी डायपर, पैंपर प्रीमियम केयर डायपर पैंट, हग्गीज वंडर पैंट्स डायपर आदि.

3. उपयोग किए जाने वाले प्रोडक्ट्स को जांचें

बेबीज के लिए मार्केट में मिलने वाले प्रोडक्ट्स ध्यान से खरीदें. आमतौर पर शिशुओं के कौस्मैटिक उत्पादों में पाया जाने वाला फेनोक्सीथेनौल बच्चे की त्वचा में ऐलर्जी पैदा कर सकता है. इसलिए किसी भी प्रोडक्ट में मौजूद इनग्रीडिऐंट्स जरूर पढ़ें और सुरक्षित प्रोडक्ट्स ही लें. हमेशा प्रोडक्ट के लेबल को देखें और पैराबेन, अल्कोहल आर्टिफिशियल कलर, सुगंध और डाई वाले उत्पादों से भी बचें.

4. मच्छरों से बचाएं

बारिश के मौसम में मच्छरों की संख्या भी अधिक बढ़ जाती है. इसलिए बच्चे को मौनसून में मच्छरों के काटने से बचाएं. उन की कोमल त्वचा पर जब मच्छर काटता है तो उन्हें बहुत तेज दर्द अनुभव होता है. उन की स्किन पर लाल निशान या सूजन भी हो सकती है.

इस मौसम में डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियां फैल जाती हैं. इन से बचाने के लिए आप को अपने बच्चों को मच्छरों से दूर रखना होगा. जब भी आप अपने बच्चे को सुलाती हैं तो यह ध्यान करें कि उस के बैड पर मच्छर का नैट जरूर लगा कर रखें.

बच्चों की स्किन पर कोई ऐसा डेलिकेट गैरविषैले और डीईईटी मुक्त मच्छर प्रतिरोधी लगाएं जो उन्हें मच्छरों से बचा सकें और घर में साफसफाई का भी ध्यान रखें ताकि घर में अधिक मच्छर न पनप सकें. बच्चों को शाम के वक्त घर के बाहर न ले कर जाएं. अगर ले कर जाना जरूरी हो तो पूरे कपड़े पहनाएं ताकि बच्चे मच्छर से बच सकें.

5. शरीर की मालिश

बरसात के मौसम में नहाने से पहले अपने बच्चे की मालिश जरूर करें. जैतून का तेल या बादाम का तेल सर्दियों में शिशु की मालिश के दौरान त्वचा के लिए फायदेमंद होता है खासकर जैतून का तेल एक बहुत ही समृद्ध मौइस्चराइजर है और ओमेगा 3, 6 और 9 का एक अच्छा स्रोत है जो त्वचा को हाइड्रेट करता है और त्वचा की प्राकृतिक नमी को सील करता है.

चाहें तो बच्चे की त्वचा की मालिश अच्छे प्राकृतिक तेलों जैसे कि वर्जिन कोकोनट औयल बेस्ड बेबी औयल से करें. इस में कई पोषक तत्त्व होते हैं जो आप के बच्चे की स्किन को आवश्यक और सुरक्षित पोषण प्रदान करते हैं.

6. हाथों की सफाई भी जरूरी

अपने बेबी के नाखूनों को हमेशा छोटा रखें. हाथों की गंदगी से बच्चों की सेहत पर भी असर पड़ सकता है. पेरैंट्स भी अपने हाथों को अच्छे हैंड वाश से धोते रहें और बच्चों को भी ऐसा ही सिखाएं खासकर खाने से पहले उन्हें हाथ धोने को जरूर कहें.

7. स्किन को ड्राई रखें

मौनसून के मौसम में उमस काफी ज्यादा रहती है, जिस कारण पसीना आता रहता है और कई बार बारिश में भीगने के कारण भी स्किन भीग जाती है. ऐसे में कोशिश करें कि स्किन को पहले साफ पानी से वाश करें, फिर सूखा टौवेल ले कर बच्चों की स्किन को साफ करें. स्किन को ड्राई रखने की कोशिश करें.

8. कौटन के कपड़े पहनाएं

मौनसून के मौसम में बच्चों को कौटन के कपड़े ही पहनाएं क्योंकि इस तरह के कपड़े आसानी से पसीने को सोख लेते हैं और स्किन भी सांस ले पाती है. बच्चों को इस मौसम में टाइट कपड़े पहनाने से बचें क्योंकि टाइट कपड़े पहनाने से उन की स्किन पर रैशेज हो सकते हैं.

9. बेबी का सामान शेयर न करें

इस मौसम में जरा सी लापरवाही के कारण बेबी की स्किन पर कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं. बेबी को साफसुथरा रखने के साथसाथ उस के पर्सनल सामान की भी नियमित सफाई करती रहें. बेबी के तौलिए, कपड़े और कंघी को किसी को भी देने से बचें.

10. ऐंटीफंगल पाउडर का प्रयोग करें

बच्चों की स्किन की देखभाल के लिए ऐंटीफंगल पाउडर का भी इस्तेमाल किया जा सकता है. इस पाउडर को लगाने से स्किन पर बैक्टीरिया का विकास नहीं होगा, साथ ही बच्चों को नहलाने के समय पानी में ऐंटीसैप्टिक लिक्विड का भी इस्तेमाल करें.

11. क्लींजर का इस्तेमाल करें

मौनसून में उमस के कारण बच्चों की स्किन ड्राई हो सकती है. ऐसे में उन की स्किन पर साबुन का इस्तेमाल न करें क्योंकि यह बच्चों की स्किन को और अधिक ड्राई कर सकता है. बच्चों की स्किन का पीएच बैलेंस बनाए रखने के लिए औयल फ्री क्लींजर का इस्तेमाल करें.

12. बच्चों के कपड़े सूखे रखें

अगर बच्चे बारिश के मौसम में भीग जाते हैं या कपड़े धोने के बाद वे अच्छे से सूख नहीं पाते हैं तो आप को उन्हें ऐसे ही अलमारी में नहीं रख देना चाहिए. आप को बच्चों के कपड़ों को अच्छी तरह से सुखाना चाहिए और अगर सूख नहीं रहे हैं तो प्रैस कर सुखा लें क्योंकि अगर वे गीले कपड़े पहनेंगे तो इन के शरीर पर खुजली और रैशेज आदि की समस्या देखने को मिल सकती है.

13. स्वस्थ आहार

मौनसून में बच्चों को स्वस्थ और संतुलित आहार देना बहुत महत्त्वपूर्ण है. इस मौसम में खांसी, जुकाम और बुखार जल्दी हो जाता है. बच्चों को विटामिन सी और जीवाणुरोधी खाद्यपदार्थ जैसे अमरूद, आंवला, नारंगी, पपीता आदि का सेवन कराना चाहिए. बच्चों को फल और गरम सूप दें. पानी को उबाल कर देना एक अच्छा तरीका है. पानी को उबालने पर उस के अंदर के कीटाणु भी मर जाते हैं.

गर्मियों में मेरे होंठों के नीचे और ऊपर काली लाइन बन जाती है, मैं इसे दूर कैसे करूं?

सवाल

गरमी में मेरे ऊपरी और निचले होंठों पर एक काली लाइन बन जाती हैजो देखने में बहुत खराब लगती है. इसे कैसे दूर किया जा सकता है?

जवाब

गरमी के मौसम में काफी उमस हो जाती है जिस के कारण पसीना निकलता है. इस पसीने को साफ करने के लिए कई बार हाथों से ही चेहरे को रगड़ कर पसीना साफ कर लिया जाता है. इस से यह हिस्सा रगड़ा जाता है और काला पड़ जाता है जोकि देखने में बिलकुल अच्छा नहीं लगता है. होंठों के नीचे और ऊपर के हिस्से के कालेपन को दूर करने के लिए आप नीबू और चीनी से बना स्क्रब लगा सकती हैं जो काफी फायदेमंद है. नीबू में साइट्रिक ऐसिड होता है जो एक नैचुरल ब्लीचिंग एजेंट की तरह काम करता है और काली स्किन को गोरा बनाने का काम करता है. वहीं  चीनी एक नैचुरल ऐक्सफ्लोएटर है जो डैड स्किन हटाता है. चीनी स्किन को मौइस्चराइज कर सौफ्ट बनाती है.

समस्याओं के समाधान

ऐल्प्स ब्यूटी क्लीनिक की फाउंडर, डाइरैक्टर डा. भारती तनेजा द्वारा द्य

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हाट बाजार- भाग 1: दो सरहदों पर जन्मी प्यार की कहानी

भारत बंगलादेश की सीमा. घने जंगल, ऊंचेऊंचे वृक्ष, कंटीली झाडि़यां, किनारा तोड़ कर नदियों में समाने को आतुर पोखर और ऊंचीनीची पथरीली, गीली धरती. इसी सीमा पर विपरीत परिस्थितियों में अपनीअपनी सीमाओं की रक्षा करते हुए बीएसएफ और बंगलादेश राइफल्स के जवान. सीमा पर बसे लोगों की शक्लसूरत, कदकाठी, रूपरंग और खानपान एक ही था और दोनों तरफ के रहने वालों के एकदूसरे की तरफ दोस्त थे, रिश्तेदार थे और आपसी मेलजोल था.

दोनों ही तरफ के बाशिंदों की एक पैंडिंग मांग थी कि सीमा पर एक हाट हो जहां दोनों ही ओर के छोटेबड़े व्यापारी अपनेअपने माल की खरीदफरोख्त कर सकें. उन का दावा था कि ऐसा हाट बनाने से गैरकानूनी ढंग से चल रही कार्यवाहियां रुक जाएंगी और किसान एवं खरीदारों को सामान की असली कीमत मिलेगी. राजनैतिक स्तर पर वार्त्ताओं के लंबेलंबे कई दौर चले. कई बार लगा कि ऐसा कोई हाट नहीं बन पाएगा और योजना सिर्फ कागजों तक ही सीमित हो कर रह जाएगी. लेकिन अंतत: दोनों सरकारों को जनता की मांग के सामने झुकना ही पड़ा और दोनों सीमाओं के बीच वाले इलाके पर हाट के लिए जगह का चुनाव कर दिया गया. तय यह भी हुआ कि उस जगह पर एक पक्का बाजार बनेगा जहां सीमा के दोनों तरफ के लोग एक छोटी सी प्रक्रिया के बाद आराम से आ जा सकेंगे और जब तक पक्का हाट नहीं बनता तब तक वहीं एक कच्चा बाजार चलता रहेगा.

टैंडर की औपचारिकता के बाद कोलकाता की एक कंपनी ‘शाहिद ऐंड कंपनी’ को काम का ठेका सौंप दिया गया और कंपनी का मालिक शाहिद अपने साथी मिहिर के साथ भारतबंगलादेश सीमा पर तुरुगांव तक पहुंच गया, जहां से बीएसएफ के जवानों की एक टुकड़ी उन्हें वहां ले गई जहां हाटबाजार का निर्माण करना था. जगह देख कर शाहिद और मिहिर दोनों ही चक्कर खा गए.

‘‘क्या बात है बड़े मियां, किस सोच में पड़ गए?’’ शाहिद को यों हैरान देख कर टुकड़ी के कमांडर ने पूछा और फिर उस के मन की बात जान कर खुद ही बोल पड़ा, ‘‘काम मुश्किल जरूर है मगर नामुमकिन नहीं. बस आप को इस उफनती जिंजीराम नदी का ध्यान रखना है और जंगली जानवरों से खुद को बचाना है, जो यदाकदा आप के सामने बिन बुलाए मेहमानों की तरह टपक पड़ेंगे.’’

‘‘मेहमान वे नहीं हम हैं कप्तान साहब. हम उन के इलाके में बिना उन की इजाजत के अपनेआप को उन पर थोप रहे हैं. खैर, वर्क और्डर के मुताबिक यहां 50 दुकानें, एक मीटिंग हौल, एक छोटा सा बैंक काउंटर और एक दफ्तर बनना है,’’  शाहिद ने नक्शे पर नजर गड़ाते हुए कहा.

‘‘बिलकुल ठीक कहा आप ने इंजीनियर साहब. मगर काम शुरू करने से पहले एक जरूरी बात आप को बता दूं,’’ कप्तान मंजीत ने बड़ी संजीदगी से कहा, ‘‘इस इलाके को जहां हम सब खड़े हैं, ‘नो मैन लैंड’ कहते हैं यानी न भारत न बंगलादेश. काफी संवेदनशील जगह है यह. बंगलादेशियों की लाख कोशिशों के बावजूद हम ने यहां उन के गांव बसने नहीं दिए. इसे वैसे ही रखा जैसे अंतर्राष्ट्रीय कानून में उल्लेखित है. इसलिए यहां आप और आप के मजदूर सिर्फ अपने काम से काम रखेंगे और भूल कर भी आगे जाने की कोशिश नहीं करेंगे. बंगलादेशी यों तो हमारे दोस्त हैं, लेकिन कभीकभी दुश्मनों जैसी हरकतें करने से गुरेज नहीं करते हैं. शक ने अभी भी उन के दिमाग से अपना रिश्ता नहीं तोड़ा है. तभी तो इस काम के लिए फौज का महकमा होते हुए भी समझौते के तहत हमें आप जैसे सिविलियंस की सेवाएं लेनी पड़ीं.’’

शाहिद ने अगले दिन से ही अपना काम शुरू कर दिया. लेकिन सप्ताह में 2 दिन काम की गति तब कम हो जाती जब वहां कच्ची दुकानों में दुकानदारों और ग्राहकों का हुजूम इकट्ठा हो जाता. भारतीय दुकानदार जहां कपड़े, मिठाइयां और बांस के बने खिलौने वगैरह बेचते, वहीं बंगलादेशी व्यापारी मछली और अंडे इत्यादि अधिक से अधिक मात्रा मेें ला कर बेचते. लेनदेन दोनों तरफ की करैंसी में होता. शाहिद ने वहीं पास के गांव में एक छोटा सा घर ले लिया और अपने अच्छे व्यवहार से धीरेधीरे लोगों का दिल जीत लिया. घर के कामकाज के लिए उस ने एक बुजुर्ग महिला मानसी की सेवाएं ली थीं. मानसी दाईमां का काम करती थी. मगर उम्र के तकाजे की वजह से उस ने वह काम बंद कर दिया था. मानसी को शाहिद प्यार से मानसी मां कहता.

एक दिन बरसात ने पूरे इलाके को अपनी आगोश में जकड़ लिया. उस वक्त नदी पूरे उफान पर थी और उस का पानी लकड़ी के बने पुल तक पहुंच रहा था. बंगलादेशी व्यापारियों में चिंता बढ़ती जा रही थी. शाहिद की नजरें बेबस लोगों को देख रही थीं कि अचानक उस की नजरें ठिठक गईं. एक लड़की अपने सामान और पैसों को बरसात के पानी और तेज हवा से बचाने का असफल प्रयास कर रही थी. देखते ही देखते हवा का एक तेज झोंका आया, तो लड़की का संतुलन बिगड़ा और उस के हाथ का थैला और सामान की गठरी छिटक के दूर जा गिरी. शाहिद को न जाने क्या सूझा. उस ने पल भर में उफनते पानी में छलांग लगा दी और इत्तफाक से बिना ज्यादा मशक्कत के दोनों ही चीजें हासिल करने में सफल हो गया.

‘‘ये लीजिए अपना सामान,’’ शाहिद ने सामान लड़की को थमाते हुए कहा.

‘‘जी धन्यवाद,’’ लड़की ने कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहा. कुछ देर के इंतजार के बाद बरसात का प्रकोप कम हुआ, तो एकएक कर के सभी बंगलादेशी शुक्र मनाते हुए अपनी सीमा की ओर बढ़ने लगे. लड़की जातेजाते कनखियों से शाहिद को देखती जा रही थी. धीरेधीरे लड़की की नाव शाहिद की आंखों से ओझल होने लगी, लेकिन शाहिद एकटक जाती हुई नौका को तब तक निहारता रहा जब तक मिहिर की कर्कश आवाज ने उस की तंद्रा भंग नहीं कर दी.

उस दिन के बाद हर मंगलवार और शुक्रवार को शाहिद अपना सारा कामकाज छोड़ कर हाट में उस लड़की को ढूंढ़ता रहता. एक दिन वह अपना सामान बेचती हुई दिखी तो तुरंत उस के पास पहुंचा. उस ने नजरें उठा कर देखा तो वह तुरंत उस से बोला, ‘‘आज आप सिंदूर नहीं लाईं. मेरी मानसी मां ने मंगवाया था,’’ ऐसा उस ने बातचीत का सिलसिला शुरू करने के उद्देश्य से कहा था.

‘‘हां, लीजिए न,’’ लड़की ने शर्माते हुए कहा.

‘‘ये लीजिए क्व100. कम हों तो बता दीजिए.’’

‘‘मैं आप से पैसे कैसे ले सकती हूं. आप ने उस दिन मेरी कितनी मदद की थी.’’

‘‘अच्छा तो एक शर्त है. मैं खाने का डब्बा लाया हूं. मेरी मानसी मां ने बड़े प्यार से बनाया है. आप को भी थोड़ा खाना होगा.’’

‘‘खाना तो हम भी घर से लाए हैं,’’ लड़की ने हौले से कहा.

‘‘ठीक है. फिर हमारी मां का बनाया खाना आप खाइए और आप का लाया खाना मैं खाऊंगा,’’ शाहिद ने प्रसन्न होते हुए कहा.

‘‘ये क्या कर रही हो रुखसार?’’ एक भारीभरकम आवाज ने दोनों को खाना खाते देख कर टोका, ‘‘किस के साथ मिलजुल रही हो? जानती नहीं यह उस तरफ का है. जल्दी से खाना खत्म कर बाकी बचा माल बेचो. मुझ से इतना माल ढोने की उम्मीद मत करना.’’

‘‘माल तो तुम्हें ही ढोना पड़ेगा जमाल भाईजान. अब मैं तो उठाने से रही.’’ शाम को हूटर बजते ही सभी व्यापारी अपनाअपना माल समेटने लगे और देखते ही देखते सब की गठरियां तैयार हो गईं. रुखसार ने बड़े सलीके से गठरियां बांधीं और अपने भाई की राह देखने लगी. थोड़ी देर में एकएक कर के सभी जाने लगे. लेकिन जमाल का कहीं पता न था. तभी दूर खड़ा शाहिद रुखसार की परेशानी भांपते हुए करीब आया और बोला, ‘‘अगर जमाल नहीं आया तो कोई बात नहीं आप का सामान नाव में मैं रखवा देता हूं, आप परेशान न हों.’’

सूरजमुखी- भाग 1- राज ने ऐसा क्या किया कि छाया खुश हो गई

इंटर्नशिप के लिए आई छाया इस केस में डा. हितेश को असिस्ट कर रही है. बेहद जटिल केस था. रात के 8 बज गए थे. स्टाफ बस जा चुकी थी. अत: अस्पताल के कौर्नर वाले औटोस्टैंड पर खड़ी हो कर इंतजार करने के अलावा छाया के पास कोई चारा नहीं था.

तभी एक कार उस के नजदीक आ कर रुकी, ‘‘यदि आप बुरा न मानें तो मुझे आप को लिफ्ट देने में खुशी होगी.’’

‘‘लेकिन…’’

‘‘कोई बात नहीं. सच में अजनबी पर इतनी जल्दी भरोसा नहीं करना चाहिए. वैसे मैं आप को बता दूं कि आज औटो वालों की स्ट्राइक है… और कोई सवारी मिलना मुश्किल है.’’

‘‘जी, मैं मैनेज कर लूंगी…’’

‘‘देखिए आप को यहां अकेले खड़ा देख कर मेरे मन में मदद का जज्बा जागा और आप से पूछ बैठा… वरना…’’

उस की स्पष्टवादिता और अपनी मजबूरी समझ कर अब छाया मना न कर सकी. इस तरह छाया निशीथ से पहली बार मिली थी और फिर धीरेधीरे यह सिलसिला लंबा होता गया.

निशीथ छाया के अस्पताल से 4 किलोमीटर दूर जौब के साथसाथ रिसर्च सैंटर में भी काम करता था. अपनी थीसिस के सिलसिले में अकसर उस के अस्पताल आता तो छाया से उस का आमनासामना हो ही जाता. हर बार लोगों की भीड़ में मिले थे दोनों. इसी तरह

साल गुजर गया. अब छाया को लगने लगा था जैसे वह निशीथ के कदमों की आहट

हजारों की भीड़ में भी पहचानने लगी है… न जाने क्यों निशीथ के साथ घंटों बिताने की अजीब सी इच्छा उस के मन में जागने लगी थी. जब निशीथ की आंखें उस के चेहरे पर गड़ जातीं तो छाया की धड़कनें बढ़ जातीं…

वह नहीं जानती थी कि निशीथ के प्रति प्रेम का यह अंकुर कब उस के मन में फूटा. छाया के लिए प्रेम की यह अनुभूति बिलकुल अप्रत्याशित थी वरना जिंदगी में उस ने जो लक्ष्य अपने लिए तय किए थे उन्हें पाने के लिए मन का वैरागी होना आवश्यक था. बचपन से ही सोचा था कि डाक्टर बन कर लोगों की सेवा करेगी.

पिछले 6 सालों से छाया दुनिया के हर गम और खुशी से दूर अपने लक्ष्य के लिए समर्पित थी. इसीलिए निशीथ के प्रति प्रेम का यह एहसास सब्र के सारे बांध तोड़ गया.

छाया ने ही पहल की थी, ‘‘निशीथ, मैं अपनी सारी जिंदगी आप के साथ गुजारना चाहती हूं. क्या आप भी ऐसा महसूस करते हैं?’’

‘‘छाया ऐसा फैसला जल्दबाजी में करना समझदारी का काम नहीं है. थोड़ा वक्त गुजर जाने दो… एकदूसरे को समझपरख लेने दो,’’ निशीथ ने समझाया.

इस जवाब से छाया मायूस हो गई.

एक दिन निशीथ का फोन आया. बोला, ‘‘छाया तुम्हारी ओर अपने कदम बढ़ाने से पहले मैं चाहता हूं कि हम दोनों के परिवार आपस में मिल लें. अचानक बिना सोचेसमझे किए प्यार पर मेरा विश्वास नहीं है.’’

‘‘पर निशीथ…’’ छाया असमंजस में थी.

‘‘देखो छाया मैं अपने मातापिता की इकलौती संतान हूं… हमेशा से यही सीखा है कि कोई भी फैसला दिल से नहीं, दिमाग से लेना चाहिए. अत: आने वाली जिंदगी में न अपने लिए और न ही परिवार के लिए कोई परेशानी खड़ी करना चाहता हूं. अत: मेरे मातापिता का फैसला ही हमारे प्यार का भविष्य तय करेगा.’’

निशीथ के ये नपेतुले विचार छाया को अच्छे नहीं लगे, पर उस के प्रति अपने जज्बातों के सामने छाया ने घुटने टेक दिए.

उस दिन हर संभव तैयारी के साथ छाया सपरिवार निशीथ के मातापिता से मिली थी. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. छाया जैसी सुंदर व डाक्टर लड़की भला किसे पसंद नहीं आती. पर तभी निशीथ की मां की एक बात अच्छेखासे माहौल को टैंस कर गई.

‘‘वैसे हमारे पास किसी चीज की कोई कमी नहीं. निशीथ की हर ख्वाहिश उस के बोलने से पहले पूरी करते आए हैं हम. पर अपनी बेटी को शानदार जिंदगी देने के लिए यानी निशीथ सा दामाद पाने के लिए आप ने भी तो कुछ सोचा होगा?’’ निशीथ की मां ने कहा.

‘‘जी, मैं समझा नहीं,’’ छाया के पिता दुविधा भरे स्वर में बोले.

‘‘देखिए, निशीथ अपनी एमबीए की पढ़ाई आस्ट्रेलिया से करना चाहता है… मैं चाहती हूं कि आप सगाई के बाद निशीथ को आस्ट्रेलिया भेज दें… शादी बाद में होती रहेगी,’’ निशीथ की मां बोलीं.

‘‘लेकिन…’’

निशीथ की मां बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘देखिए बाहर से आने के बाद इंडिया में स्टेटस और सैलरी दोनों ही दोगुनेचौगुने हो जाते हैं, फिर इस ऐशोआराम को आप की बेटी को ही तो भोगना है. अत: इतना तो आप का भी हक बनता है अपनी बेटी के भविष्य के लिए.’’

मन ही मन खर्च का हिसाब लगाने पर पिताजी के चेहरे पर आतेजाते भावों को छाया खुद देख रही थी. अपनी आर्थिक स्थिति से वह वाकिफ थी. 1 छोटे भाई और 1 बहन की जिम्मेदारी पापा के कंधों पर थी. अत: अपनेआप को वह रोक नहीं पाई. बोली, ‘‘निशीथ ये कैसी बातें हो रही हैं? क्या इसी तरह समझने और समझाने के लिए तुम ने मुझे यहां बुलाया था?’’

‘‘देखो छाया, यह दुनियादारी है… इन बातों को बड़ों को आपस में निबट लेने दो… इस में हम बच्चों का दखल ठीक नहीं.’’

निशीथ के जवाब ने छाया के तनबदन में आग लगा दी. दुनियादारी के नाम पर उस जैसे पढ़ेलिखे सभ्य इंसान से छाया ने यह आशा कभी नहीं की थी. अत: अपने पर भरसक कंट्रोल करने के बावजूद वह पापा से बोली, ‘‘उठिए पापा, हमें यह रिश्ता मंजूर नहीं.’’

‘‘हमें भी यह रिश्ता मंजूर नहीं… तुम ही मेरे बेटे के पीछे पड़ी थी,’’ निशीथ की मां ने सभ्यता का नकाब उतार फेंका.

कहासुनी के दौरान छाया ने अनेक बार निशीथ को देखा पर हर बार सिर झुकाए देख छाया को अपने प्यार पर शर्मिंदगी महसूस होने लगी. बात बिगड़ चुकी थी. आंखों में आंसू लिए वह घर की ओर चल दी.

मम्मापापा क्या कहते. सब चुप थे. स्वयं छाया का स्वाभिमान बुरी तरह आहत हुआ था. अत: घर आ कर सीधे अपने कमरे में चादर ओढ़ कर सो रही है, ऐसा मां को दिखाने की कोशिश करने लगी. अपने पहले प्यार का उसे इस तरह ठुकराना गहरे अवसाद में धकेल गया था. ‘रिजैक्ट’ जैसे वह कोई वस्तु है जिस पर निशीथ के परिवार ने रिजैक्टेड का लेवल लगा दिया. हाथ नींद की गोलियों की ओर बढ़ गए पर तभी मोबाइल की घंटी ने उस के हाथ रोक दिए, ‘‘डा. छाया तुरंत अस्पताल पहुंचो, इमरजैंसी है…’’

छाया कुछ कह पाती, उस से पहले ही फोन कट गया. उस की ऐसी मनोस्थिति में अस्पताल जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी.

बाढ़: क्या मीरा और रघु के संबंध लगे सुधरने

बौस ने जरूरी काम बता कर मीरा को दफ्तर में ही रोक लिया और खुद चले गए.

मीरा को घर लौटने की जल्दी थी. उसे शानू की चिंता सता रही थी. ट्यूशन पढ़ कर लौट आया होगा, खुद ब्रेड सेंक कर भी नहीं खा सकता, उस के इंतजार में बैठा होगा.

बाहर तेज बारिश हो रही थी…अचानक बिजली चली गई तो मीरा इनवर्टर की रोशनी में काम पूरा करने लगी. तभी फोन की घंटी बज उठी.

‘‘मां, तुम कितनी देर में आओगी?’’ फोन कर शानू ने जानना चाहा, ‘‘घर में कुछ खाने को नहीं है.’’

‘‘पड़ोस की निर्मला आंटी से ब्रेड ले लेना,’’ मीना ने बेटे को समझाया.

‘‘बिजली के बगैर घर में कितना अंधेरा हो गया है, मां. डर लग रहा है.’’

‘‘निर्मला आंटी के घर बैठे रहना.’’

‘‘कितनी देर में आओगी?’’

‘‘बस, आधा घंटा और लगेगा. देखो, मैं लौटते वक्त तुम्हारे लिए बर्गर, केले व आम ले कर आऊंगी, होटल से पनीर की सब्जी भी लेती आऊंगी.’’

बेटे को सांत्वना दे कर मीरा तेजी से काम पूरा करने लगी. वह सोच रही थी कि महानगर में इतनी देर तक बिजली नहीं जाती, शायद बरसात की वजह से खराबी हुई होगी.

काम पूरा कर के मीरा ने सिर उठाया तो 9 बज चुके थे. चौकीदार बैंच पर बैठा ऊंघ रहा था.

मीरा को इस वक्त एक प्याला चाय पीने की इच्छा हो रही थी, पर घर भी लौटने की जल्दी थी. चौकीदार से ताला बंद करने को कह कर मीरा ने पर्स उठाया और जीना उतरने लगी.

चारों तरफ घुप अंधेरा फैला हुआ था. क्या हुआ बिजली को, सोचती हुई मीरा अंदाज से टटोल कर सीढि़यां उतरने लगी. घोर अंधेरे में तीसरे माले से उतरना आसान नहीं होता.

सड़क पर खड़े हो कर उस ने रिकशा तलाश किया, जब नहीं मिला तो वह छाता लगा कर पैदल ही आगे बढ़ने लगी.

अब न तो कहीं रुक कर चाय पीने का समय रह गया था न कुछ खरीदारी करने का.

थोड़ा रुक कर मीरा ने बेटे को मोबाइल से फोन मिलाया तो टींटीं हो कर रह गई.

अंधेरे में अचानक मीरा को ऐसा लगा जैसे वह नदी में चली आई हो. सड़क पर इतना पानी कहां से आ गया…सुबह निकली थी तब तो थोड़ा सा ही पानी भरा हुआ था, फिर अचानक यह सब…

अभी वह यह सब सोच ही रही थी कि पानी गले तक पहुंचने लगा. वह घबरा कर कोई आश्रय स्थल खोजने लगी.

घने अंधेरे में उसे दूर कुछ बहुमंजिली इमारतें दिखाई पड़ीं. मीरा उसी तरफ बढ़ने लगी पर वहां पहुंचना उस के लिए आसान नहीं था.

जैसेतैसे मीरा एक बिल्ंिडग के नीचे बनी पार्किंग तक पहुंच पाई. पर उस वक्त वह थकान की अधिकता व भीगने की वजह से अपनेआप को कमजोर महसूस कर रही थी.

मीरा को यह स्थान कुछ जानापहचाना सा लगा. दिमाग पर जोर दिया तो याद आया, इसी इमारत की दूसरी मंजिल पर वह रघु के साथ रहती थी.

फिर रघु के गैरजिम्मेदाराना रवैये से परेशान हो कर उस ने उस के साथ संबंध विच्छेद कर लिया था. उस वक्त शानू सिर्फ ढाई वर्ष का था. अब तो कई वर्ष गुजर चुके हैं…शानू 10 वर्ष का हो चुका है.

क्या पता रघु अब भी यहां रहता है या चला गया, हो सकता है उस ने दूसरा विवाह कर लिया हो.

मीरा को लग रहा था कि वह अभी गिर पडे़गी. ठंड लगने से कंपकंपी शुरू हो गई थी.

एक बार ऊपर जाने में हर्ज ही क्या है. रघु न सही कोई दूसरा सही, उसे किसी का सहारा तो मिल ही जाएगा. उस ने सोचा और जीने की सीढि़यां चढ़ने लगी…फिर उस ने फ्लैट का दरवाजा जोर से खटखटा दिया.

किसी ने दरवाजा खोला और मोमबत्ती की रोशनी में उसे देखा, बोला, ‘‘मीरा, तुम?’’

रघु की आवाज पहचान कर मीरा को भारी राहत मिली…फिर वह रघु की बांहों में गिर कर बेसुध होती चली गई.

कंपकपाते हुए मीरा ने भीगे कपडे़ बदल कर, रघु के दिए कपडे़ पहने फिर चादर ओढ़ कर बिस्तर पर लेट गई.

कानूनी संबंध विच्छेद के वर्षों बाद फिर से उस घर में आना मीरा को बड़ा विचित्र लग रहा है, उस के  व रघु के बीच जैसे लाखों संकोच की दीवारें खड़ी हो गई हैं.

रघु चाय बना कर ले आया, ‘‘लो, चाय के साथ दवा खा लो, बुखार कम हो जाएगा.’’

दवा ने अच्छा काम किया…मीरा उठ कर बैठ गई.

रघु खाना बना रहा था.

‘‘तुम ने शादी नहीं की?’’ मीरा ने धीरे से प्रश्न किया.

‘‘मुझ से कौन औरत शादी करना पसंद करेगी, न सूरत है न अक्ल और न पैसा…तुम ने ही मुझे कब पसंद किया था, छोड़ कर चली गई थीं.’’

मीरा देख रही थी. पहले के रघु व इस रघु में बहुत बड़ा अंतर आ चुका है.

‘‘तुम ने खाना बनाना कब सीख लिया? सब्जी तो बहुत स्वादिष्ठ बनाई है.’’

‘‘तुम चली गईं तो मुझे खाना बना कर कौन खिलाता, सारा काम मुझे ही करना पड़ा, धीरेधीरे सारा कुछ सीख लिया, बरतन साफ करता हूं, कपड़े धोता हूं, इस्तिरी करता हूं.’’

‘‘आज बिजली को क्या हुआ, आ जाती तो मैं फोन चार्ज कर लेती.’’

‘‘तुम्हें शायद पता नहीं, पूरे शहर में बाढ़ का पानी फैल चुका है. बिजली, टेलीफोन सभी की लाइनें खराब हो चुकी हैं, ठीक करने में पता नहीं कितने दिन लग जाएं.’’

मीरा घबरा गई, ‘‘बाढ़ की वजह से मैं घर कैसे जा पाऊंगी…शानू घर में अकेला है.’’

‘‘शानू यानी हमारा बेटा,’’ रघु चिंतित हो उठा, ‘‘मैं वहां जाने का प्रयास करता हूं.’’

मीरा ने पता बताया तो रघु के चेहरे पर चिंता की लकीरें और अधिक बढ़ गईं. वह बोला, ‘‘मीरा, उस इलाके में 10 फुट तक पानी चढ़ चुका है. मैं उसी तरफ से आया था, मुझे तैरना आता है इसलिए निकल सका नहीं तो डूब जाता.’’

‘‘शानू, मेरा बेटा…किसी मुसीबत में न फंस गया हो,’’ कह कर मीरा रोने लगी.

‘‘चिंता करने से क्या हासिल होगा, अब तो सबकुछ समय पर छोड़ दो,’’ रघु उसे सांत्वना देने लगा. पर चिंता तो उसे भी हो रही थी.

दोनों ने जाग कर रात बिताई.

हलका सा उजाला हुआ तो रघु ने पाउडर वाले दूध से 2 कप चाय बनाई.

मीरा को चाय, बिस्कुट व दवा की गोली खिला कर बोला, ‘‘मैं जा कर देखता हूं, शानू को ले कर आऊंगा.’’

‘‘उसे पहचानोगे कैसे, वर्षों से तो तुम ने उसे देखा नहीं.’’

‘‘बाप के लिए अपना बेटा पहचानना कठिन नहीं होता, तुम ने कभी अपना पता नहीं बताया, कभी मुझ से मिलने नहीं आईं, जबकि मैं ने तुम्हें काफी तलाश किया था. एक ही शहर में रह कर हम दोनों अनजान बने रहे,’’ रघु के स्वर में शिकायत थी.

‘‘मैं ही गलती पर थी, तुम्हें पहचान नहीं पाई. मैं सोच भी नहीं सकती थी कि तुम इतना बदल सकते हो. शराब पीना और जुआ खेलना बंद कर के पूरी तरह से तुम जिम्मेदार इनसान बन चुके हो.’’

रघु ने बरसाती पहनी और छोटी सी टार्च जेब में रख ली.

मीरा, शानू का हुलिया बताती रही.

रघु चला गया, मीरा सीढि़यों पर खड़ी हो उसे जाते देखती रही.

आज दफ्तर जाने का तो सवाल ही नहीं था, बगैर बिजली के तो कुछ भी काम नहीं हो सकेगा.

मीरा ने पहले कमरे की फिर रसोई और बरतनों की सफाई का काम निबटा डाला. उस ने खाना बनाने के लिए दालचावल बीनने शुरू किए पर टंकी में पानी समाप्त हो चला था.

उसे याद आया कि नीचे एक हैंडपंप लगा था. वह बालटी भर कर ले आई और खाना बना कर रख दिया.

पर रघु अभी तक नहीं आया था. मीरा को चिंता सताने लगी…पता नहीं वह उस के कमरे तक पहुंचा भी है या नहीं. किस हाल में होगा शानू.

मीरा कुछ वक्त पड़ोसिन के साथ गुजारने के खयाल से जीना उतरी तो यह देख कर दंग रह गई कि सभी फ्लैट खाली थे. वहां रहने वाले बाढ़ के डर से कहीं चले गए थे.

बाहर सड़क पर अब भी पानी भरा हुआ था, बरसात भी हो रही थी. अकेलेपन के एहसास से डरी हुई मीरा फ्लैट का दरवाजा बंद कर के बैठ गई.

रघु काफी देरी से आया, उस के जिस्म पर चोटों के निशान थे.

मीरा घबरा गई, ‘‘चोटें कैसे लग गईं आप को, शानू कहां है?’’

उस ने रघु की चोटों पर दवा लगाई.

रघु ने बताया कि उस के घर में शानू नहीं था, पुलिस ने बाढ़ में फंसे लोगों को राहत शिविरों में पहुंचा दिया है, शानू भी वहीं गया होगा.

मीरा की आंखों में आंसू भर आए, ‘‘मैं ने कभी बेटे को अपने से अलग नहीं किया था. खैर, तुम ने यह तो बताया नहीं, चोटें कैसे लगी हैं.’’

‘‘फिसल कर गिर गया था…पैर की मोच के कारण कठिनाई से आ पाया हूं.’’

मीरा ने खाना लगाया, दोनों साथसाथ खाने लगे.

खाना खाने के तुरंत बाद रघु को नींद आने लगी और वह सो गया. जब उठा तो रात गहरा उठी थी.

मीरा खामोशी से कुरसी पर बैठी थी.

‘‘तुम ने मोमबत्ती नहीं जलाई,’’ रघु बोला और फिर ढूंढ़ कर मोमबत्ती ले आया और बोला, ‘‘मैं राहत शिविरों में जा कर शानू की खोज करता हूं.’’

‘‘इतनी रात को मत जाओ,’’ मीरा घबरा उठी.

‘‘तुम्हें अब भी मेरी चिंता है.’’

‘‘मैं ने तुम्हारे साथ वर्षों बिताए हैं.’’

रघु यह सुन कर बिस्तर पर बैठ गया, ‘‘जब सबकुछ सही है तो फिर गलत क्या है? क्या हम लोग फिर से एकसाथ नहीं रह सकते?’’

मीरा सोचने लगी.

‘‘हम दोनों दिन भर दफ्तरों में रहते हैं,’’ रघु बोला, ‘‘रात को कुछ घंटे एकसाथ बिता लें तो कितना अच्छा रहेगा, शानू की जिम्मेदारी हम दोनों मिल कर उठाएंगे.’’

मीरा मौन ही रही.

‘‘तुम बोलती क्यों नहीं, मीरा. मैं ने जिम्मेदारियां निभाना सीख लिया है. मैं घर के सभी काम कर लिया करूंगा,’’ रघु के स्वर मेें याचक जैसा भाव था.

मीरा का उत्तर हां में निकला.

रघु की मुसकान गहरी हो उठी.

सुबह एक प्याला चाय पी कर रघु घर से निकल पड़ा, फिर कुछ घंटे बाद ही उस का खुशी भरा स्वर फूटा, ‘‘मीरा, देखो तो कौन आया है.’’

मीरा ने दरवाजा खोल कर देखा तो सामने शानू खड़ा था.

‘‘मेरा बेटा,’’ मीरा ने शानू को सीने से चिपका लिया. फिर वह रघु की तरफ मुड़ी, ‘‘तुम ने आसानी से शानू को पहचान लिया या परेशानी हुई थी?’’

‘‘कैंप के रजिस्टर मेें तुम्हारा पता व नाम लिखा हुआ था.’’

रघु राहत शिविर से खाने का सामान ले कर आया था, सब्जियां, दूध का पैकेट, डबलरोटी, नमकीन आदि.

उस ने शानू के सामने प्लेटें लगा दीं.

‘‘बेटा, इन्हें जानते हो.’’

शानू ने मां की तरफ देखा और बोला, ‘‘यह मेरे डैडी हैं.’’

‘‘कैसे पहचाना?’’

‘‘इन्होंने बताया था.’’

‘‘शानू, तुम्हें पकौड़े, ब्रेड- मक्खन पसंद हैं न,’’ रघु बोला.

‘‘हां.’’

‘‘यह सब मुझे भी पसंद हैं. हम दोनों में अच्छी दोस्ती रहेगी.’’

‘‘हां, डैडी.’’

मुसकराती हुई मीरा बाप- बेटे की बातें सुनती रही, कितनी सरलता से रघु ने शानू के साथ पटरी बैठा ली.

‘‘शुक्र है इस बरसात के मौसम का कि हम दोनों मिल गए,’’ मीरा बोली और रसोई में जा कर पकौडे़ तलने लगी.

उसे लग रहा था कि उस का बोझ बहुत कुछ हलका हो गया है. सबकुछ रघु के साथ बंट जो चुका है.

बीच का लंबा फासला न जाने कहां गुम हो चुका था. जैसे कल की ही बात हो.

घर तो इनसानों से बनता है न कि दीवारों से. पशु भी तो मिल कर रहते हैं. मीरा न जाने क्याक्या सोचे जा रही थी. बापबेटे की संयुक्त हंसी उस के मन में खुशियां भर रही थी.

प्यार का तीन पहिया

‘‘जी मैडम, कहिए कहां चलना है?’’

‘‘कनाट प्लेस. कितने रुपए लोगे?’’

‘‘हम मीटर से चलते हैं मैडम. हम उन आटो वालों में से नहीं हैं जिन की नजरें सवारियों की जेबों पर होती हैं. जितने वाजिब होंगे, बस उतने ही लेंगे.’’

मैं आटो में बैठ गई. आटो वाला अपनी बकबक जारी रखे हुए था, ‘‘मैडम, दुनिया देखी है हम ने. बचपन का समय बहुत गरीबी में कटा है, पर कभी किसी सवारी से 1 रुपया भी ज्यादा नहीं लिया. आज देखो, हमारे पास अपना घर है, अपना आटो है.’’

‘‘आटो अपना है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘बिलकुल मैडम, किस्तों पर लिया था. साल भर में सारी किस्तें चुका दीं. अब जल्द ही टैक्सी लेने वाला हूं.’’

‘‘इतने रुपए कहां से आए तुम्हारे पास?’’

‘‘ईमानदारी की कमाई के हैं, मैडमजी. दरअसल, हम सिर्फ आटो ही नहीं चलाते विदेशी सैलानियों को भारत दर्शन भी कराते हैं. यह देखो, हर वक्त हमारे आटो में दिल्ली के 3-4 मैप तो रखे ही होते हैं. विदेशी सैलानी एक बार हमारे आटो में बैठते हैं, तो शाम से पहले नहीं छोड़ते. मैं सारी दिल्ली दिखा कर ही रुखसत करता हूं उन्हें. इस से मन तो खुश होता ही है, अच्छीखासी कमाई भी हो जाती है. कुछ तो 10-20 डौलर अतिरिक्त भी दे जाते हैं. लो मैडम, आ गई आप की मंजिल. पूरे 42 रुपए, 65 पैसे बनते हैं.’’

‘‘50  रुपए का नोट है मेरे पास. बाकी लौटा दो,’’ मैं ने कहा.

‘‘मैडम चेंज नहीं है हमारे पास? आप देखो अपने पर्स में.’’

‘‘नहीं है मेरे पास. बाकी 500-500 के नोट ही हैं.’’

‘‘तो फिर छोड़ो न मैडमजी, बाद में कभी बैठ जाना. तब हिसाब कर लेंगे और वैसे भी इतना तो चलता ही है,’’ वह बोला.

‘‘ऐसे कैसे चलता है? पैसे वापस करो.’’

‘‘क्या मैडम, 5-6 रुपयों के लिए इतनी चिकचिक? 5-6 रुपए छोड़ने पर कौन सा आप गरीब हो जाओगी?’’

‘‘बात रुपयों की नहीं, नीयत की है.’’

‘‘क्या बात करती हो मैडम? कोई और आटो वाला होता तो 60-70 रुपए से कम में बैठाता ही नहीं.’’

‘‘हद करते हो,’’ कह कर मैं गुस्से में आटो से उतर गई और वह खीखी कर हंसता रहा.

औफिस आ कर भी काफी देर तक मेरा मूड अजीब सा रहा. क्या करूं? औफिस आते वक्त हड़बड़ी में आटो लेना ही पड़ता है पर इस तरह का कोई अनुभव हो जाए तो सारा दिन ही खराब हो जाता है.

शाम को जब मैं औफिस से निकली तो काफी थक चुकी थी. तबीयत भी ठीक नहीं थी. चलने का बिलकुल मन नहीं कर रहा था. मैट्रो स्टेशन औफिस से दूर है, इसलिए आटो ही देखने लगी. पास ही एक खाली आटो वाला दिखा. मैं ने जल्दी से उसे हाथ दिया. पर यह क्या, सामने वही आटो वाला था, जिस ने सुबह मेरा दिमाग खराब किया था.

मजबूरी थी, इसलिए मैं ने उसे चलने को कहा तो वह रूखे अंदाज में बोला, ‘‘मुझे नहीं जाना मैडम. आप दूसरा आटो देख लो.’’

मेरा मन किया कि उस का सिर फोड़ दूं. पर किसी तरह खुद पर कंट्रोल कर मैट्रो स्टेशन की तरफ बढ़ चली.

तभी उस की तेज, भद्दी आवाज सुनाई दी, ‘‘ओ वसुधाजी, अरे ओ वसुधाजी, आओ बैठो, मैं आप को छोड़ दूं.’’

मेरा मन गुस्से से जल उठा कि मैं ने कहा तो साफ इनकार कर गया और अब किसी लड़की को आवाजें लगा रहा है. फिर मैं ने पलट कर देखा तो पाया कि वह आटो ले कर जिस लड़की की तरफ बढ़ रहा है, वह वसुधा थी, जो एक पैर से अपाहिज थी और धीरेधीरे मैट्रो की तरफ बढ़ रही थी. वसुधा और मेरा परिचय मैट्रो में ही हुआ था. वह आटो वाले को इनकार करते हुए मेरे साथ मैट्रो स्टेशन की तरफ बढ़ चली.

लगभग साल भर में हम कई बार मिले थे. वह बहुत बतियाती थी और घरबाहर की बहुत बातें हम लोग शेयर कर चुके थे. अपाहिज होने के बावजूद उस में गजब का आत्मविश्वास था. वह जौब करती थी और दिल्ली में अपनी बूआ के साथ अकेली रहती थी. सीपी में उस का औफिस और घर करोलबाग में था, जहां मैं भी रहती थी. सफर में ही हमारी अच्छी दोस्ती हो गई थी.

अगले दिन हम दोनों औफिस से एक ही वक्त पर निकले. वह आटो वाला लपक कर आगे बढ़ा और हमारे करीब आटो रोकते हुए बोला, ‘‘वसुधाजी, बैठिए न… छोड़ दूंगा आप को.’’

वसुधा ने नकारात्मक मुद्रा में सिर हिलाते हुए कहा, ‘‘नहीं. तुम जाओ, मैं चली जाऊंगी.’’

आटो वाला अड़ा रहा, ‘‘आप ऐसा क्यों कह रही हैं? मैं इतना बुरा इंसान नहीं. बैठ जाओ, घर तक सलामत पहुंचा दूंगा.’’

वसुधा ने प्रश्नवाचक नजरों से मेरी तरफ देखा. मैं समझ नहीं सकी कि आखिर माजरा क्या है? फिर बोली, ‘‘चलो बैठ जाते हैं प्रीति. वैसे भी देर हो रही है.’’

मैं ने इनकार किया, ‘‘तू बैठ, मैं किसी और में चली जाऊंगी.’’

‘‘तो फिर मैं तेरे साथ ही चलती हूं,’’ और वह मेरे साथ हो ली.

तभी आटो वाला मुझ से बड़ी नम्रता से बोला, ‘‘बहनजी, प्लीज आप भी बैठ जाओ, वसुधाजी तभी बैठेंगी. किराया भी जितना मन करे दे देना. न भी दोगी तो भी चलेगा,’’ और फिर मेरी तरफ मुसकरा कर देखा.

उस की मुसकान मुझे व्यंग्यात्मक नहीं, सहज सरल लगी अत: मैं आटो में बैठ गई. रास्ते भर तीनों खामोश रहे. मैं सोच रही थी, आज इस की बकबक कहां गई. उस ने सीधे वसुधा के घर के आगे आटो रोका.

वह उतर गई, तो मुझ से बोला, ‘‘अब बताइए, आप को कहां छोड़ूं?’’

‘‘मैं चली जाऊंगी. पास ही है मेरा घर,’’ कह मैं ने पर्स निकाला.

‘‘रहने दीजिए. आप लोगों से क्या किराया लेना?’’ वह बोला.

‘‘क्या मैं इस दरियादिली की वजह जान सकती हूं?’’

‘‘आप वसुधाजी की सहेली हैं, तो जाहिर है मेरे लिए भी खास हैं… खैर, मैं चलता हूं,’’ और वह चला गया.

‘इस आटो वाले को वसुधा में इतनी दिलचस्पी क्यों? कहीं दोनों पुराने प्रेमी तो नहीं?’ मैं सोच में पड़ गई.

अगले दिन जब मैं ने वसुधा से इस संदर्भ में बात की तो उस ने बताया, ‘‘ऐसा कुछ नहीं है. हां, कुछ दिनों से वह मेरे पीछे जरूर पड़ा है, पर कभी गलत हरकत नहीं की.’’

‘‘क्या तू भी उसे मन ही मन पसंद करती है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मेरा और उस का क्या मेल? वह एक तो आटो वाला, ऊपर से न जाने किस जाति का है… हम लोग कुलीनवर्ग के हैं. मैं अपाहिज हूं, तो इस का मतलब यह तो नहीं कि कोई भी मुझे अपने लायक समझने लगे.’’

मैं बोली, ‘‘ये छोटे लोग तो बस ऐसे ही होते हैं.’’

अगले दिन जानबूझ कर हम दूसरे रास्ते से निकले पर उस आटो वाले ने हमें ढूंढ़ ही लिया और आटो बगल में रोक कर बोला, ‘‘चलिए.’’

‘‘नहीं जाना,’’ हम ने रुखाई से कहा.

‘‘गरीब हूं, पर बेईमान नहीं. वसुधाजी ज्यादा चल नहीं सकतीं, मैं आटो ले आता हूं, तो इस में बुरा क्या है?’’

मैं ने वसुधा की तरफ देखा तो वह भी पसीज गई. हम दोनों एक बार फिर आटो में खामोश बैठे थे. सच, कभीकभी जिंदगी कितनी अजनबी लगती है. कौन किस तरह और कब हमारे जीवन से जुड़ जाए, कुछ पता नहीं.

अब तो रोज का नियम बन गया था. आटो वाला मुझे और वसुधा को घर छोड़ता पर एक रुपया भी नहीं लेता. रास्ते भर वह अपने बारे में बताता रहता. उस का नाम अभिषेक था और वह बिहार का रहने वाला था. 2 कमरे के घर में किराए पर रहता था.

उस दिन औफिस से निकलते हुए मैं ने वसुधा से कहा, ‘‘शुक्रवार की छुट्टी है, यानी कुल मिला कर 3 दिन की छुट्टियां लगातार पड़ रही हैं. कितना मजा आएगा.’’

मैं खुश थी पर वसुधा परेशान सी थी. बोली, ‘‘क्या करूंगी 3 दिन… समय काटना मुश्किल हो जाएगा.’’

‘‘ऐसा क्यों कह रही है? हम घूमने चलेंगे. खूब ऐंजौय करेंगे.’’

‘‘सच,’’ वसुधा का चेहरा खिल उठा.

शुक्रवार को सुबह हम लोटस टैंपल देखने के लिए निकले. इस के बाद कुतुबमीनार जाने की प्लानिंग थी. तभी अभिषेक आटो ले कर सामने आ खड़ा हुआ, ‘‘आइए मैं ले चलता हूं. कहां जाना है?’’

मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम आज सुबह ही आ गए हमारी खिदमत के लिए, माजरा क्या है?’’

‘‘क्या करूं मैडम, अपना मिजाज ही ऐसा है. आइए न.’’

उस ने फिर निवेदन किया तो मैं हंस पड़ी. बोली, ‘‘हम आज लोटस टैंपल और कुतुबमीनार जाने वाले थे.’’

‘‘तब तो आप दोनों को इस बंदे से बेहतर गाइड कोई मिल ही नहीं सकता. कुतुबमीनार ही क्यों, पूरी दिल्ली घुमाऊंगा. बैठिए तो सही.’’

हम दोनों बैठ गए.

‘‘आप को पता है कि कुतुबमीनार कब और किस के द्वारा बनवाई गई थी?’’ अभिषेक की बकबक शुरू हो गई.

‘‘जी नहीं, हमें नहीं पता पर क्या आप जानते हैं?’’ वसुधा ने पूछा.

‘‘बिलकुल. कुतुबमीनार का निर्माण दिल्ली के प्रथम मुसलिम शासक कुतुबुद्दीन ऐबक ने 1193 में आरंभ कराया था. पर उस समय केवल इस का आधार ही बन पाया. फिर उस के उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने इस का निर्माण कार्य पूरा करवाया.’’

‘‘अच्छा, पर यह बताओ, इसे बनवाने के पीछे मकसद क्या था?’’ मैं ने सवाल किया.

‘‘दरअसल, मुगल अपनी जीत सैलिब्रेट करने के लिए विक्ट्री टावर बनवाते थे. कुतुबमीनार को भी ऐसा ही एक टावर माना जा सकता है. वैसे आप के लिए यह जानना रोचक होगा कि कुतुबमीनार को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर के रूप में स्वीकृत किया गया है.’’

वसुधा और मैं एकदूसरे की तरफ देख कर मुसकरा पड़े, क्योंकि एक आटो वाले से इतनी ज्यादा ऐतिहासिक और सामान्यज्ञान की जानकारी रखने की उम्मीद हमें नहीं थी.

‘‘1 मिनट, तुम ने यह तो बताया ही नहीं कि कुतुबमीनार की ऊंचाई कितनी है?’’ वसुधा ने फिर से सवाल उछाला और फिर मेरी तरफ देख कर मुसकराने लगी, क्योंकि उसे पूरा यकीन था कि यह सब अभिषेक नहीं जानता होगा.

‘‘5 मंजिला इस इमारत की ऊंचाई 234 फुट और व्यास 14.3 मीटर है, जो ऊपर जा कर 2.75 मीटर हो जाता है और इस में कुल 378 सीढि़यां हैं.’’ आटो वाला गर्व से बोला.

अब तक हम कुतुबमीनार पहुंच चुके थे. अभिषेक हमारे साथ परिसर में गया और रोचक जानकारियां देने लगा. हम चकित थे. इतनी गूढ़ता से तो कोई गाइड भी नहीं बता सकता था.

परिसर में घूमते हुए वसुधा कुछ आगे निकल गई, तो अभिषेक तुरंत बोला, ‘‘अरे मैडम, उधर ध्यान से जाना… कहीं चोट न लग जाए.’’

‘‘बहुत फिक्र करते हो उस की. जरा बताओ, ऐसा क्यों?’’ मैं ने पूछा.

‘‘क्योंकि वे मुझे बहुत अच्छी लगती हैं.’’

‘‘पर क्यों?’’

‘‘उन की झील सी आंखें… वह सादगी…’’

वह और कुछ कहता, मैं उसे बीच में ही टोकती हुई बोली, ‘‘कभी सोचा है, तुम ने कि तुम दोनों में क्या मेल है? तुम ठहरे आटो वाले और वह है बड़े घराने की.’’

‘‘मैडमजी, ठीक कहा आप ने. कहां वे महलों में रहने वाली और कहां मैं आटो वाला. पर क्या मैं इंसान नहीं? क्या मेरी पहचान सिर्फ इतनी है कि मैं आटो चलाता हूं. आप को नहीं पता, मैं भी अच्छे परिवार से हूं. इतिहास में एम.ए. किया है, परिस्थितियोंवश हाथों में आटो आ गया.’’

तभी वसुधा आ गई और हमारी बात बीच में ही रह गई. अगले दिन जब मैं वसुधा से मिली तो अभिषेक से हुई बातचीत सुनाते हुए उसे समझाया, ‘‘एक बार तुझे अभिषेक के लिए सोचना चाहिए. इतना बुरा भी नहीं है वह… और तुझे कितना प्यार करता है.’’

‘‘देख प्रीति, यह संभव नहीं. मेरे घर वाले ऐसे बेमेल रिश्ते के लिए कभी तैयार नहीं होंगे और मेरा दिल भी इस की गवाही नहीं देता. क्या कहूंगी उन्हें कि एक आटो वाले से प्यार करती हूं? नहीं यार, कभी नहीं. इतना नहीं गिर सकती मैं. वह चाहे कितना भी काबिल हो, है तो एक आटो वाला ही न?’’

वसुधा का जवाब मुझे पता था, पर वह यह सब इतनी बेरुखी से कहेगी, यह मैं ने नहीं सोचा था. मैं समझ गई, वसुधा कभी उसे स्वीकार नहीं करेगी. मुझे भी वसुधा का फैसला सही लगा.

एक दिन सुबहसुबह ही वसुधा ने मुझे फोन किया, ‘‘प्रीति प्लीज, अभी जल्दी से मेरे घर आ जा. एक बहुत जरूरी बात करनी है.’’

उस की बेसब्री देख कर मैं जिन कपड़ों में थी, उन्हीं में उस के घर पहुंच गई. फिर पूछा, ‘‘क्या बात है? सब ठीक तो है? बूआजी कहां हैं?’’

वह मुझ से लिपटती हुई बोली, ‘‘बूआजी 4 दिनों के लिए मामाजी के यहां गई हैं.’’

मैं ने देखा, उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. मैं ने पूछा, ‘‘वसुधा, बता क्या हुआ? रो क्यों रही है?’’

‘‘ये खुशी के आंसू हैं. मुझे मेरा हमसफर मिल गया प्रीति,’’ वह बोली.

‘‘अच्छा… पर है कौन वह?’’

‘‘वह और कोई नहीं, अभिषेक ही है.’’

‘‘क्या? इतना बड़ा फैसला तू ने अचानक कैसे ले लिया? कल तक तो तू उस के नाम पर भड़क जाती थी?’’ मैं ने चकित हो कर पूछा.

वह मुसकराई, ‘‘प्यार तो पल भर में ही हो जाता है प्रीति. कल शाम तू नहीं थी तो मैं अकेली ही अभिषेक के आटो में बैठ गई. मुझे एक बैग खरीदना था. उस ने कहा कि मैं जनपथ ले चलता हूं. वहां से खरीद लेना.

‘‘बैग खरीद कर मैं लौटने लगी, तो अंधेरा हो चुका था. ओडियन के पास वह बोला कि क्या फिल्म देखना पसंद करेंगी मेरे साथ? घर में तो मैं अकेली ही थी. अब हां करने में क्या हरज था. हमें 6 बजे के टिकट मिले. 9 बजे तक फिल्म खत्म हुई तो गहरा अंधेरा था. उस ने एक पल भी मेरा हाथ न छोड़ा. प्यार और दुलार का ऐसा एहसास मैं ने जीवन में कभी नहीं महसूस किया था.

‘‘रास्ते में याद आया कि बूआजी की दवा लेनी है. एक मैडिकल शौप नजर आई तो मैं ने हड़बड़ा कर आटो रुकवाया और तेजी से उतरने लगी तभी लड़खड़ा कर गिर पड़ी. सिर पर चोट लगी थी. अत: मैं बेहोश हो गई. फिर मुझे कुछ याद नहीं. जब होश आया तो देखा, कि मैं अपने कमरे में एक शाल ओढ़े लेटी थी और मेरे कपड़े उतरे हुए थे. घुटने पर पट्टी बंधी थी. एक पल को तो लगा जैसे मेरा सब कुछ लुट चुका है. मैं घबरा गई पर फिर तुरंत एहसास हुआ कि ऐसा कुछ नहीं है. किसी तरह उठ कर बाथरूम तक गई तो देखा कि अभिषेक कीचड़ लगे मेरे कपड़े धो रहा था.

‘‘मैं खुद को रोक न सकी और पीछे से जा कर उस से लिपट गई. उस के बदन के स्पर्श से मेरे भीतर लावा सा फूट पड़ा. अभिषेक भी खुद पर काबू नहीं रख सका और फिर वह सब हो गया, जो शायद शादी से पहले होना सही नहीं था. पर मैं एक बात जरूर कह सकती हूं कि अभिषेक ने मुझे वह खुशी दे दी, जिस की मैं ने कल्पना भी नहीं की थी. अपाहिज होने के बावजूद मुझे ऐसा सुख मिलेगा, यह मेरी सोच से बाहर था.

‘‘उस का प्यार, उस की सादगी, उस की इंसानियत, उस के सारे व्यक्तित्व ने मुझ पर जैसे जादू कर दिया है. जरा सोच मैं जिस हालत में उस के पास थी, बिलकुल अकेली… किसी का भी दिल डोल जाता. पर उस ने अपनी तरफ से कोई गलत पहल नहीं की. क्या यह साबित नहीं करता कि वह नेकदिल और विश्वस्त साथी है? मैं अब एक पल भी उस से दूर रहना नहीं चाहती. प्लीज, कुछ करो कि हम एक हो जाएं. प्लीज प्रीति…’’

‘‘मैं थोड़ी देर अचंभित बैठी रही. वैसे मुझे वसुधा को खुश देख कर बहुत खुशी हो रही थी. फिर मैं ने वसुधा को समझाया, ‘‘सब से पहले तुम दोनों कोर्ट मैरिज के लिए कोर्ट में अर्जी दो. फिर मैं तुम्हारी बूआ व परिवार वालों को इस शादी के लिए तैयार करती हूं. थोड़े प्रतिरोध के बाद वसुधा के घर वाले मान गए.’’

हंसीखुशी के माहौल में अभिषेक और वसुधा का विवाह संपन्न हो गया. ‘मन’ फिल्म के आमिर खान की तरह अभिषेक ने वसुधा को गोद में उठाया कर फेरे निबटाए. बात यहीं खत्म नहीं हुई, शादी के बाद जब हनीमून से दोनों लौटे और मैं औफिस जाने के लिए अभिषेक की टैक्सी (अभिषेक ने नई टैक्सी ले ली थी) में बैठी तो अभिषेक ने चुटकी ली, ‘‘साली साहिबा, अब तो आप से मनचाहा किराया वसूल कर सकता हूं. हक बनता है मेरा.’’

मैं ने हंस कर कहा, ‘‘बिलकुल. पर साली होने के नाते मैं आधी घरवाली हूं. इसलिए तुम्हारी आधी कमाई पर मेरा हक होगा, यह मत भूलना.’’

मेरी बात सुन कर वह ठठा कर हंस पड़ा और फिर मैं ने भी हंसते हुए उस की पीठ पर धौल जमा दी.

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