Raksha Bandhan: कच्ची धूप- भाग 1-कैसे हुआ सुधा को गलती का एहसास

‘‘सुनिए, केशव का फोन आया था, शालिनी की शादी है अगले महीने. सब को आने को कह रहा था,’’ देररात फैक्टरी से लौटे राघव को खाना परोसते हुए सुधा ने औपचारिक सूचना दी.

‘‘ठीक है, तुम और सौम्या हो आना. मेरा जाना तो जरा मुश्किल होगा. कुछ रुपएपैसे की जरूरत हो तो पूछ लेना, आखिर छोटा भाई है तुम्हारा,’’ राघव ने डाइनिंग टेबल पर बैठते हुए कहा.

‘‘रुपएपैसे की जरूरत होगी, तभी इतने दिन पहले फोन किया है, वरना लड़का देखने से पहले तो राय नहीं ली,’’ सुधा ने मुंह बिचकाते हुए कहा.

सुधा का अपने मायके में भरापूरा परिवार था. उस के पापा और चाचा दोनों ही सरकारी सेवा में थे. बहुत अमीर तो वे लोग नहीं थे मगर हां, दालरोटी में कोई कमी नहीं थी. सुधा दोनों परिवारों में एकलौती बेटी थी, इसलिए पूरे परिवार का लाड़प्यार उसे दिल खोल कर मिलता था. चाचाचाची भी उसे सगी बेटी सा स्नेह देते थे. उस का छोटा भाई केशव और बड़ा चचेरा भाई लोकेश दोनों ही बहन पर जान छिड़कते थे.

सुधा देखने में बहुत ही सुंदर थी. साथ ही, डांस भी बहुत अच्छा करती थी. कालेज के फाइनल ईयर में ऐनुअल फंक्शन में उसे डांस करते हुए मुख्य अतिथि के रूप में पधारे बीकानेर के बहुत बड़े उद्योगपति और समाजसेवक रूपचंद ने देखा तो उसी क्षण अपने बेटे राघव के लिए उसे पसंद कर लिया.

रूपचंद का मारवाड़ी समाज में बहुत नाम था. वे यों तो मूलरूप से बीकानेर के रहने वाले थे मगर व्यापार के सिलसिले में कोलकाता जा कर बस गए थे. हालांकि, अपने शहर से उन का नाता आज भी टूटा नहीं था. वे साल में एक महीना यहां जरूर आया करते थे और अपने प्रवास के दौरान बीकानेर ही नहीं, बल्कि उस के आसपास के कसबों में भी होने वाली सामाजिक व सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल हुआ करते थे. इसी सिलसिले में वे नोखा के बागड़ी कालेज में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित थे.

‘सुधा की मां, तुम्हारी बेटी के तो भाग ही खुल गए. खुद रूपचंद ने मांगा है इसे अपने बेटे के लिए,’ पवन ने औफिस से आ कर शर्ट खूंटी पर टांगते हुए कहा.

‘मेरी प्यारी बहनिया बनेगी दुलहनिया…’ कह कर केशव ने सुधा को चिढ़ाया तो सुधा ने लोकेश की तरफ मदद के लिए देखा.

‘सज के आएंगे दूल्हे राजा, भैया राजा, बजाएगा बाजा…’ लोकेश ने हंसते हुए गाने को पूरा किया तो सुधा शर्म के मारे चाची के पीछे जा कर छिप गई. मां ने बेटी को गले लगा लिया. और पूरे परिवार ने एकसाथ मिल कर शादी की तैयारियों पर चर्चा करते हुए रात का खाना खाया.

2 कमरों के छोटे से घर की बेटी सुधा जब आलीशान बंगले की बहू बन कर आई तो कोठी की चकाचौंध देख कर उस की आंखें चौंधिया गईं. उस के घर जितनी बड़ी तो बंगले की लौबी थी. हौल की तो शान ही निराली थी. महंगे सजावटी सामान घर के कोनेकोने की शोभा बढ़ा रहे थे. सुधा हर आइटम को छूछू कर देख रही थी. हर चीज उसे अजूबा लग रही थी. ससुराल के बंगले के सामने सुधा को अपना घर ‘दीन की बालिका’ सा नजर आ रहा था.

पवन ने बेटी की शादी अपने समधी की हैसियत को देखते हुए शहर के सब से महंगे मैरिज गार्डन में की थी, मगर पगफेरे के लिए तो सुधा को अपने घर पर ही जाना था. उसे बहुत ही शर्म आ रही थी राघव को उस में ले जाते हुए.

सुधा जैसी सुंदर लड़की को पत्नी के रूप में पा कर राघव तो निहाल ही हो गया. उस के साथ कश्मीर में हनीमून के 15 दिन कैसे बीत गए, उसे पता ही नहीं चला. रूपचंद ने जब कामधंधे के बारे में याद दिलाया तब कहीं जा कर उसे होश आया. वहीं अपने मायके के परिवार में हवाईयात्रा कर हनीमून पर जाने वाली सुधा पहली लड़की थी. यह बात आज भी उसे गर्व का एहसास करा जाती है.

खूबसूरत तो सुधा थी ही, पैसे की पावर ने उस का दिमाग सातवें आसमान पर पहुंचा दिया. रूपचंद की बहू बन कर वह अपनेआप को अतिविशिष्ट समझने लगी थी. सुधा अपनी ससुराल के ऐशोआराम और रुतबे की ऐसी आदी हुई कि अब उस का नोखा जाने का मन ही नहीं करता था. उसे मायके के लोग और वहां का घर बहुत ही हीन लगने लगे. उस ने धीरेधीरे उन से दूरी बनानी शुरू कर दी.

जब भी नोखा से किसी का फोन आता, तो उसे लगता था जैसे किसी तरह की मदद के लिए ही आया है और वह बहुत ही रुखाई से उन से बात करती थी. केशव भी सब समझने लगा था, वह बहुत जरूरी हो, तो ही बहन को फोन करता था. लोकेश तो उस के बदले रवैये से इतना आहत हुआ कि उस ने सुधा से बात करनी ही बंद कर दी.

शादी के बाद 1-2 बार तो मां के बुलाने पर सुधा राखी बांधने नोखा गई मगर उस का व्यवहार ऐसा होता था मानो वहां आ कर उस ने मायके वालों पर एहसान किया हो. बातबात में अपनी ससुराल की मायके से तुलना करना मां को भी कमतरी का एहसास करा जाता था. एक बार सुधा अपनी रौ में कह बैठी, ‘मेरा जितना पैसा यहां राखी बांधने आने पर खर्च होता है उतने में तो केशव के सालभर के कपड़ों और जूतों की व्यवस्था हो जाए. नाहक मेरा टाइम भी खराब होता है और तुम जो साड़ी और नकद मुझे देते हो, उसे तो ससुराल में दिखाते हुए भी शर्म आती है. अपनी तरफ से पैसे मिला कर कहना पड़ता है कि मां ने दिया है.’ यह सुन कर मां अवाक रह गईं. इस के बाद उन्होंने कभी सुधा को राखी पर बुलाने की जिद नहीं की.

लोकेश की शादी में पहली बार सुधा राघव के साथ नोखा आई थी. उस के चाचा अपने एकलौते दामाद की खातिरदारी में पलकपांवड़े बिछाए बैठे थे. वे जब उन्हें लेने स्टेशन पर पहुंचे तो उन्हें यह जान कर धक्का सा लगा कि सुधा ने नोखा के बजाय बीकानेर का टिकट बनवाया है. कारण था मायके के घर में एसी का न होना. उन्होंने कहा भी कि आज ही नया एसी लगवा देंगे मगर अब सुधा को तो वह घर ही छोटा लगने लगा था. अब घर तो रातोंरात बड़ा हो नहीं सकता था, इसलिए अपमानित से चाचा ने माफी मांगते हुए राघव से कहा, ‘दामाद जी, घर बेशक छोटा है हमारा, मगर दिल में बहुत जगह है. आप एक बार रुक कर तो देखते.’ राघव कुछ कहता इस से पहले ही ट्रेन स्टेशन से रवाना हो चुकी थी.

सुधा ठीक शादी वाले दिन सुबह अपनी लग्जरी कार से नोखा आई और किसी तरह बरात रवाना होने तक रुकी. जितनी देर वह वहां रुकी, सारा वक्त अपनी कीhttps://audiodelhipress.s3.ap-south-1.amazonaws.com/Audible/ch_a108_000001/1043_ch_a108_000006_kachhi_dhoop_gh.mp3मती साड़ी और महंगे गहनों का ही बखान करती रही. बारबार गरमी से होने वाली तकलीफ की तरफ इशारा करती और एसी न होने का ही रोना रोती रही. सुधा की मां को बेटी का यह व्यवहार बहुत अखर रहा था.

हद तो तब हो गई जब सौम्या पैदा होने वाली थी. सामाजिक रीतिरिवाजों के चलते सुधा की मां ने उसे पहले प्रसव के लिए मायके बुला भेजा. कोलकाता जैसे महानगर की आधुनिक सुविधाएं छोड़ कर नोखा जैसे छोटे कसबे में अपने बच्चे को जन्म देना नईनई करोड़पति बनी सुधा को बिलकुल भी गवारा नहीं था, मगर मां के बारबार आग्रह करने पर, सामाजिक रीतिरिवाज निभाने के लिए, उसे आखिरकार नोखा जाना ही पड़ा.

सुधा की डिलीवरी का अनुमानित समय जून के महीने का था. उस ने पापा से जिद कर के, आखिर एक कमरे में ही सही, एसी लगवा ही लिया. सौम्या के जन्म के बाद घरभर में खुशी की लहर दौड़ गई. हर कोई गोलमटोल सी सौम्या को गोदी में ले कर दुलारना चाहता था मगर सुधा ने सब की खुशियों पर पानी फेर दिया. यहां भी उस का अपनेआप को अतिविशिष्ट समझने का दर्प आड़े आ जाता. वह किसी को भी सौम्या को छूने नहीं देती थी, कहती थी, ‘गंदे हाथों से छूने पर बच्ची को इन्फैक्शन हो जाएगा.’

Film review OMG 2: फिल्म यौन शिक्षा की जरूरत बयां कर रही या फिर धर्म पर अंधश्रद्धा की बात, जानिए सबकुछ यहां…

रेटिंग : 5 में साढ़े 3 स्टार

निर्माता : अरूणा भाटिया, विपुल डी शाह, राजेश बहल व अश्विन वर्दे।

क्रिएटिव निर्माता : डा. चंद्रप्रकाश द्विवेदी

लेखक व निर्देशक : अमित राय

कलाकार : अक्षय कुमार, पंकज त्रिपाठी, यामी गौतम, पवन मल्होत्रा, गोविंद नामदेव, अरूण गोविल, सिमरन राजपूत, ब्रजेंद्र काला,आरुष वर्मा, पराग छापेकर (पत्रकार से बने अभिनेता), गीता अग्रवाल व अन्य.

अवधि : 2 घंटे 37 मिनट

सैंसर प्रमाणपत्र : ‘ए’ वयस्क

यूएई सैंसर बोर्ड : 12+

भारत में आज भी सैक्स हौआ है. घर हो या स्कूल, समाज का कोई भी तबका सैक्स को ले कर बात नहीं करता. सैक्स को वर्जित माना जाता है.

एक उम्र के बाद हर लड़के व लड़कियों को स्कूल में सही यौन शिक्षा देने की मांग लंबे समय से उठती आई है, मगर हमारी सरकार इस संबंध में मौन है.

यहां तक कि भारत का ‘केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड’ यानि सैंसर बोर्ड के लिए भी सैक्स व यौन शिक्षा हौआ ही है. यह वही सैंसर बोर्ड है, जोकि धर्म के बाजार को आगे बढ़ाने के मकसद से ‘आदिपुरुष’ जैसी फिल्म को ‘यू’ प्रमाणपत्र दे कर पारित करता है.

मगर यौन शिक्षा की जरूरत की बात करने वाली फिल्म ‘ओह माय गौड 2’’  को ‘ए’ यानि वयस्क प्रमाणपत्र देता है.

हमारा सैंसर बोर्ड यह भूल गया कि कामसूत्र से ले कर पंचतंत्र की कहानियों में यौन शिक्षा की बात की गई है. वहीं इसलामिक देश ‘यूएई’ के सैंसर बोर्ड ने ‘ओह माय गौड 2’ को 12+ का प्रामणपत्र दिया है यानि 12 साल से बड़े बच्चे यूएई में इस फिल्म को देख सकते हैं, मगर भारत में 18 साल से कम उम्र के बच्चे नहीं देख सकते. अब भारत के सैंसर बोर्ड को सही कहा जाए या ‘यूएई’ के सैंसर बोर्ड को, इस पर खुल कर बात की जानी चाहिए.

अब धीरेधीरे समाज में यह मांग उठने लगी है कि सैंसर बोर्ड में सिनेमा की समझ रखने वाले ऐसे लोगों को रखा जाना चाहिए, जो बदलते समाज के बदलते आदर्शों और बदलती सामाजिक जरूरतों को समझ सकते हों. दूसरी बात, फिल्म के निर्माताओं ने जम कर प्रचार किया कि उन की फिल्म को 70 कट दिए गए, तो वहीं यूएई के अनुसार फिल्म को महज 1 कट दिया गया है, जोकि सही है क्योंकि ‘ओह माय गौड 2’ में पहले अक्षय कुमार शिव के किरदार में थे, पर भारतीय सैंसर बोर्ड ने बदलवा कर शिव का दूत कहलावा दिया.

माना कि फिल्मकार ने यौन शिक्षा जैसे मुद्दे को फिल्म में उठाया है. मगर इन की नियति पर सवाल उठ रहे हैं. फिल्म के निर्माता अक्षय कुमार व क्रिएटिव निर्माता डा. चंद्रप्रकाश द्विवेदी हैं. ये दोनों आरएसएस और भाजपा भक्त हैं. ऐसे में फिल्म ‘ओह माय गौड 2’ धर्म का बाजार न हो, यह कैसे हो सकता है.

इस फिल्म को शिव के उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर के अलावा उज्जैन शहर में फिल्माया गया है. फिल्म में सनातन धर्म व हिंदू धर्म का खुल कर प्रचार किया गया है. लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यौन शिक्षा व सैक्स जैसे मुद्दे पर मनोरंजक फिल्म बनाने का शायद यही एकमात्र जरिया है. अथवा यों कहें कि इन दिनों देश में जिस तरह का धार्मिक माहौल बन गया है, उसे देखते हुए इस फिल्म को विशाल दर्शक वर्ग तक पहुंचाने के लिए यही ढांचा उपयुक्त है.

बहरहाल, फिल्म 11 अगस्त, 2023 से सिनेमाघरों में पहुंच चुकी है और इस फिल्म को हर किशोरवय उम्र के लड़केलड़कियों, स्कूलों के शिक्षकों व मातापिता को जरूर देखनी चाहिए. यदि इस फिल्म को 7वीं कक्षा के बाद के छात्रछात्राओं को स्कूल व कालेज में दिखाई जाए, तो गलत नहीं होगा.

फिल्म ‘ओह माय गौड 2’ पूरी तरह से अंतर्विरोधों वाली फिल्म है. फिल्म के अंदर एक तरफ अदालती दृश्यों में सैक्स व यौन शिक्षा को ले कर वैज्ञानिक किताबों, वैज्ञानिक पोस्टरों, खजुराहो, कामशास्त्र की बातें की जा रही हैं, तो वहीं शिव, शिव में आस्था, शिव के दास, महाकाल मंदिर, भैरव नाथ मंदिर, सनातन धर्म व संस्कृति, शिवलिंग आदि की बातें की जा रही हैं. शिव के दूत के रूप में अक्षय कुमार, कांति मुद्गल बने पंकज त्रिपाठी से एक जगह कहते हैं कि ईश्वर पर विश्वास खो कर आप ने सबकुछ गलत कर डाला. मतलब कि फिल्म देख कर बाहर निकलने वाले कुछ लोग सवाल कर रहे थे कि यह फिल्म यौन शिक्षा की जरूरत बयां कर रही थी या धर्म पर अंधश्रृद्धा की बात कर रही है.

यहां इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि वर्तमान सरकार ने सब से पहले वाराणसी में काशी कौरीडोर का निर्माण किया और फिर उस से 4

गुना बड़ा उज्जैन शहर में ‘महाकाल कौरीडोर’ बनाया गया, जिस का लोकार्पण 11 अक्तूबर, 2023 को किया गया और उस के बाद वहीं पर फिल्म ‘ओह माय गौड’ का फिल्मांकन किया गया है. स्वाभाविक तौर पर यह फिल्म मध्य प्रदेश सरकार से मिली सब्सिडी पर बनी होगी.

कहानी : फिल्म ‘ओह माय गौड 2’ की कहानी उज्जैन, मध्य प्रदेश में रह रहे कांति शरण मुद्गल (पंकज त्रिपाठी) के साधारण परिवार से शुरू होती है. शिवभक्त कांति शरण मुद्गल के परिवार में पत्नी (गीता अग्रवाल), एक बेटा विवेक (आरुष वर्मा ) और एक बेटी (अन्वेषा विज) है. कांति शरण महाकाल मंदिर के बाहर फूल, मालाएं व प्रसाद बेचने की दुकान चलाते हुए हंसीखुशी अपना जीवन बिता रहे हैं. उन्होंने मंदिर के मुख्य पुजारी (गोविंद नामदेव) की मदद से अपने बेटे विवेक का दाखिला एक इंटरनैशनल स्कूल में करा रखा है, जिस के संचालक अटल नाथ माहेश्वरी (अरूण गोविल) हैं. पर कांति शरण मुद्गल की जिंदगी में तब भूचाल आ जाता है, जब उन के बेटे विवेक का एक तथाकथित (स्कूल के टौयलेट में हस्तमैथुन करते हुए ) अश्लील वीडियो सोशल मीडिया पर उस के कालेज के एक सहपाठी दुश्मनी के चलते वायरल कर देता है. जिस के बाद स्कूल के संचालक विवेक पर सामाजिक अपराध करने का आरोप लगा कर स्कूल से निकाल देते हैं.

समाज में हरकोई उसे, उस की बहन व मातापिता को तंग करने लगते हैं, जिस से विवेक डिप्रैशन में चला जाता है और खुद ट्रेन के आगे अपनी जान देने का भी प्रयास करता है, मगर शिव का दूत (अक्षय कुमार) उसे मरने से बचा लेता है और फिर वह कांति शरण मुद्गल को समझाता है कि वह भगवान शिव पर विश्वास रखे। जो भगवान शिव पर विश्वास रखता है, वह शिव का दास होता है.

वह कांति शरण को उन के बेटे का सम्मान वापस दिलाने के लिए उन्हें सही राह दिखाता है. तब कांति शरण मुद्गल खुद अपने उपर स्कूल के संचालक, डाक्टर (ब्रजेंद्र काला), मैडिकल स्टोर के मालिक (पराग छापेकर), नीमहकीमों, जड़ीबूटी विक्रेताआ आदि पर अदालत में मुकदमा कर देते हैं.

स्कूल की तरफ से अटल नाथ की बहू व मशहूर ऐडवोकेट कामिनी माहेश्वरी (यामी गौतम) मुकदमा लड़ती हैं, जबकि कांति शरण अपनी पैरवी स्वयं करते हैं. अदालत में जज पुरूषोत्तम नागर (पवन राज मल्होत्रा), ऐडवोकेट कामिनी माहेश्वरी के तर्क को नजरअंदाज कर इस मुकदमे की सुनवाई करते हैं. कांति शरण वैज्ञानिक व धार्मिक तर्क देते हुए आरोप लगाते हैं कि उन के बेटे विवेक की जो हालत है, उस के लिए स्कूल दोषी है क्योंकि स्कूल ने उन के बेटे को सैक्स की सही शिक्षा नहीं दी.

अदालत में मुकदमा चलता रहता है। बीचबीच में शिव का दूत कांति शरण को सलाह देते रहता है. अदालत के अंदर कई मोड़ आते हैं. पर अंततः जीत कांति शरण मुद्गल की होती है. विवेक का खोया हुआ आत्मसम्मान उसे मिल जाता है.

लेखक व निर्देशन : मराठी फिल्म ‘टिंग्या’ के अलावा हिंदी फिल्म ‘रोड टू संगम’ का निर्देशन कर चुके अमित राय, जो पूरे 13 साल बाद एक उद्देश्यपूर्ण फिल्म ‘ओह माय गौड 2’ का लेखन व निर्देशन किया है. जोकि एक बेहतरीन कहानी पर सशक्त, साहसी व संवेदनशील पटकथा वाली रोचक फिल्म है. फिल्मकार ने फिल्म

में एकदम वास्तविक अंदाज में भारतीय समाज की सोच व कार्यशैली को पेश किया है. पूरी फिल्म वास्तविक लोकेशन पर फिल्माई गई है, इस कारण भी वास्तविकता का एक पुट आ ही जाता है. फिल्मकार ने स्कूल में यौन शिक्षा के बहाने सत्यपरक व सामाजिक विषमताओं की बात की है. फिल्म बाल मनोविज्ञान को समझने की भी बात करती है. आखिर एक बालक जब एक नृत्य के कार्यक्रम से महज इसलिए निकाल दिया जाता है कि उस का ‘लिंग’ छोटा है, तब वह ‘लिंग’ को बड़ा करने के सवाल व जिज्ञासा के साथ अपने स्कूल शिक्षक से ले कर कई लोगों से बात करता है. कोई भी उस की जिज्ञासा को शांत नहीं करता, तब वह गलत राय के अनुसार हस्तमैथुन करने लग जाता है. इसे फिल्मकार ने जिस सहजता से चित्रित किया है, उस के लिए अमित राय बधाई के पात्र हैं.

उन्होंने निडर हो कर सामाजिक पाखंड को भी उजागर किया है. अमित राय ने इस बात का स्पष्ट चित्रण किया है कि ‘यौन शिक्षा ’ के विरोध में हर धर्मावलंबी है. फिल्म के क्लाइमैक्स में जब जज का बेटा यौन शिक्षा के समर्थन में खड़ा दिखता है तो यह संकेत है कि गुजरती पीढ़ी को नई पीढ़ी के साथ कदमताल कितना जरूरी है. लेकिन यह फिल्म इस बात पर मौन है कि यौन शिक्षा किस तरह से दी जाए कि वह अश्लील न लगे. इतना ही नहीं फिल्म का क्लाइमैक्स काफी घटिया है.

फिल्मकार ने इस बात को नजरंदाज कर दिया कि स्कूल संचालक ने स्कूल के अंदर अवैध तरीके से अश्लील वीडियो का फिल्मांकन करने वाले छात्र के खिलाफ काररवाई क्यों नहीं की? क्या यह अपराध नहीं है?

अभिनय : किशोरवय बालक व बालिका के मध्यवर्गीय पिता कांति शरण मुद्गल, जोकि अपने बेटे के सम्मान को वापस लाने की लड़ाई लङते हैं, उस किरदार में पंकज त्रिपाठी ने जान डाल दी है. मूलतया बिहारी होते हुए भी पंकज त्रिपाठी ने मालवा की बोली को बहुत बेहतरीन तरीके से पकड़ा है. वैसे भी पंकज त्रिपाठी मंझे हुए कलाकार हैं. लेकिन अपने ‘छोटे’ लिंग को बड़ा करने की फिक्र में दरदर भटकते, फिर सामाजिक अपराध के दोषारोपण के साथ स्कूल से बाहर निकाले जाने के बाद अपमान सहते हुए डिप्रैशन का शिकार होने व अपने पिता की लड़ाई देख कर डिप्रैशन से उबरने वाले विवेक के किरदार को जितनी सहजता व डूब कर किशोरवय के बाल कलाकार आरूष वर्मा ने निभाया है, वह सभी अतिसक्षम कलाकारों पर भारी पड़ गया है. यदि आरूष का अभिनय निम्नस्तर का होता, तो फिल्म का प्रभाव नहीं होता. अन्वेषा विज ने अपने कठिन किरदारों में शानदार संभावनाएं दिखाई हैं.

ऐडवोकेट कामिनी माहेश्वरी के किरदार में यामी गौतम जमी हैं. पर कई दृश्यों में वह मात खा गई हैं. अक्षय कुमार के हिस्से कम दृश्य आए, यह अच्छा ही है. पत्रकार से अभिनेता बने पराग छापेकर महज शोपीस ही हैं. महाकाल मंदिर के मुख्य पुजारी के किरदार में गोविंद नामदेव अपनी छाप छोड़ जाते हैं.

इस के अलावा ब्रजेंद्र काला, गीता अग्रवाल व अन्य कलाकारों के हिस्से कुछ खास नही आया. कुछ साल पहले प्रदर्शित फिल्म ‘जौली एलएलबी’ में सौरभ शुक्ल ने जज को एक नया रंग दिया था. कुछ हद तक जज पुरूषोत्तम नगर ने उसी अंदाज में अपना पुट डालते हुए निभाया है. मगर जज को हिंदी समझ में नहीं आती है, यह बात कुछ अजीब सी लगती है, जिस के लिए लेखक व निर्देशक दोषी हैं.

तीज स्पेशल: 12 साल छोटी पत्नी- भाग 3-सोच में फर्क

वह हंस पड़ी, “खबर मिल गई आप को?”

“हां, स्पेशल इनविटेशन है. मालती और आंटी तो स्वागत की तैयारियों में जुटी होंगी?”

“हां, भाभी को सब से पहले पार्लर जाना याद आया.”

“सच…?”

“हां भाभी, मुझे तो लगता है कि वे यहां भाभी से मिलने ही आते हैं,” कह कर नीरा जोर से हंसी, तो मैं ने झूठ ही डांटा, “खबरदार, अपनी भाभी का मजाक नहीं बनाते.”

“आप से ही कह सकती हूं, वे तो भाभी से फोन पर भी टच में रहते हैं, उन का कहीं शिविर होने वाला है, भाभी वहां जा कर रहने की सोच रही हैं, आजकल भाभी सचमुच बहुत एक्साइटेड घूम रही हैं.”

“नीरा, यह बहुत चिंता की बात है. कुछ तो करना चाहिए.”

“हमारे यहां कुछ नहीं हो सकता, भाभी. सब की आंखों पर पट्टी बंधी है, उन के आने के टाइम पर मैं तो अपने फ्रैंड के घर चली जाऊंगी, मैं ने सोच लिया है, मैं तो मेंटली इन ड्रामों से थक चुकी हूं. अच्छाभला नाम है, नीलेश. दुनिया को पत्थर की दुनिया कहते हैं, तो पत्थर वाले बाबा हो गए. आशीर्वाद देने के बहाने जिस तरह से छूते हैं न, घिन आने लगती है. पर अपने घर वालों का क्या करूं?”

“मेरे पास एक आइडिया है, साथ दोगी? फिलहाल तो मालती के सिर से इन का भूत उतारना बहुत जरूरी है, नहीं तो शिविर में जा कर बैठ जाएगी. और आंटी झींकती भी रहेंगी और कुछ कह भी न पाएंगी.”

“बोलो भाभी, क्या करना है?”

मैं ने और नीरा ने बहुत देर तक काफी बातें की, अच्छाखासा प्रोग्राम बनाया और फोन रख दिया.

सुधीर के घर जाने वाले दिन जब मैं बिना कोई तमाशा किए आराम से तैयार होने लगी, तो जयराज को बड़ी हैरानी हुई, बोल ही पड़े, “क्या हुआ? बड़ी शांति से जाने के लिए तैयार हो रही हो?”

यह सुनते ही मुझे हंसी आ गई, तो वे और चौंके, ध्यान से मुझे देखा, उन की आंखों में तारीफ के भाव देख मैं हंस पड़ी, “हां, हां, जानती हूं कि अच्छी लग रही हूं.”

“तुम तो ऐसे तैयार हो गई हो, जैसे किटी पार्टी में जा रही हो.”

“नीलेश ने बुलाया है, सजना तो पड़ेगा ही,” मुझे शरारत सूझी, तो वे बुरा मान गए, “कैसी बकवास करती हो?”

“32-35 साल में बाबा बन गया तो अरमान तो खत्म नहीं हो गए होंगे न? वरना मुझे विशेष रूप से बुलाने का क्या मतलब था? पुरुष भक्त काफी नहीं हैं?”

“जिस ने घरसंसार न बसाया हो, उस के लिए ऐसी बातें करनी चाहिए? कितना त्यागपूर्ण जीवन जीते हैं. सबकुछ तो त्याग रखा है. तुम जैसी महिलाओं के कारण धर्म खतरे में है,” जयराज ने जब यह ताना कसा, मुझे बहुत तेज गुस्सा आया. मैं ने अपने मन में और पक्का ठान लिया कि मिस्टर नीलेश का तो भांडा फोड़ कर के रहूंगी. मैं चुप रही. मालती के घर पहुंचे, ऐसे दृश्य तो अब मेरे लिए आम रह ही नहीं गए हैं, पूरी तरह बाबाओं के प्रति अंधश्रद्धा में डूबे पति के कारण मैं ये अनुभव काफी झेल चुकी हूं. मालती जिस तरह से तैयार थी और जिस तरह से उस की नजर इस फर्जी बाबा को निहार रही थी, मुझे समझने के लिए कुछ शेष न रहा था.

किचन में मेरी और नीरा की कुछ जरूरी बातें हुईं. मैं नीलेश को प्रणाम करने उस के पास गई, उस पर अपना जाल फेंका, उसे तो फंसना ही था, नीरा दूर खड़ी मेरा और नीलेश का वीडियो बना रही थी, जो हम बाद में मालती को दिखाने वाले थे. पुरुष बस 3-4 ही थे, जो एक कोने में बैठे थे.

सजीसंवरी महिलाओं पर नीलेश की नजरें यहां से वहां घूम रही थीं, आशीर्वाद देने के बहाने उस ने मुझे कई बार छुआ, मन हुआ कि एक जोर का थप्पड़ मार कर सारी मस्ती भुला दूं, पर इस से क्या होता. लोग मुझे बुराभला कहते और फिर यह मजमा कहीं और लगता.

अभी मेरा एक ही उद्देश्य था कि मालती के सिर से नीलेश का भूत उतरे. वह मेरी अच्छी दोस्त थी, पर इस समय इस कपटी के हाथों कोई नुकसान न उठा ले, बस यही चिंता थी मुझे. वैसे वीडियो बन गए थे, जैसे मुझे चाहिए थे. जब सब हो गया, नीलेश और उस के साथी चले गए, हमें खाने के लिए रोक लिया गया था. सब से फ्री हो कर मैं, नीरा और मालती थोड़ी देर साथ आ कर बैठे, फिर नीरा ‘चाय बना कर लाती हूं,’ कह कर बाहर चली गई. मैं ने बात छेड़ी, “कहो, कैसा रहा बाबा का दर्शन?”

वह यों शरमा गई, तो मेरा दिमाग घूम गया, “क्यों भाई, तुम्हारा चेहरा क्यों शर्म से लाल हो रहा है?”

“मुझे नीलेश के प्रवचन अच्छे लगते हैं, मैं कुछ दिन उन के शिविर में जा कर रहने वाली हूं.”

“बच्चों की पढ़ाई का क्या होगा? तुम्हारा घर कौन देखेगा?”

“सब ईश्वर की मरजी से ही तो होता है.”

“ईश्वर क्या तुम्हारे बच्चों का होमवर्क करवाएंगे?”

“जयराज भाई जैसी भक्ति क्यों नहीं रखती तुम?” उस ने चिढ़ कर कहा. मैं ने तो आज ठान ही लिया था, ”इसलिए, क्योंकि ये बाबा उन की कमर नहीं सहलाते, बहाने से बारबार उन्हें नहीं छूते. हम महिलाओं को जो इन महापुरुषों के स्पर्श से घिन आती है, उस का जयराज जैसों को कहां अंदाजा होता है? क्यों इन पर मोहित हुई चली जा रही हो? ये वीडियो देखोगी? आज का ही है. ये देखो, कितनी बार मेरे करीब आने की कोशिश की है आज इस लंपट ने. देखो,” कहते हुए मैं ने उसे वीडियो दिखाए, जहां वह नीलेश मुझ पर लट्टू होहो कर पास आए जा रहा था.

यह वीडियो देख मालती का मुंह लटक गया. मैं ने कहा, “दोस्त हो मेरी. तुम्हें मूर्खता करते हुए नहीं देख सकती. और जयराज पति हैं, इन सब बातों पर रोज तो उन से नहीं लड़ सकती न. फिर भी कोशिश तो कर ही रही हूं, आज जा कर ये वीडियो उन्हें भी दिखाऊंगी. तुम जैसे भक्तों को सुधारने में जितनी मेहनत करनी पड़े करूंगी.”

इतने में नीरा चाय ले कर आ गई. मैं ने उसे इशारे से बता दिया कि काम हो गया है. थोड़ी देर हलकीफुलकी बातें कर के हम वहां से चलने के लिए निकले.

जयराज ने विदा लेते हुए मालती से कहा, “भाभी, अच्छा आयोजन था. ऐसे ही फिर किसी प्रोग्राम में जल्दी मिलते हैं.”

मालती ने बेदिली से कहा, “नहीं, भाईसाहब. किसी और दिन ऐसे ही मिल लेंगे, मिलने के लिए ऐसे ही आयोजन रह गए हैं क्या?”

मालती के इस जवाब पर जयराज ने मुझे घूर कर देखा. मैं जोर से हंस पड़ी, कहा, “और क्या, आ जाओ हमारे घर वीकेंड पर. साथ डिनर करते हैं. सेलिब्रेट करते हैं,” सब के मुंह से एकसाथ निकला, “क्या सेलिब्रेट करना है?”

नीरा और मैं बस खुल कर हंस दिए, कहा कुछ नहीं. मालती भी समझ गई थी और फिर वह भी हंस पड़ी.

शाह फैमिली को धमकी देगी डिंपल, अनुपमा निकालेगी हेकड़ी

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ के अपकमिंग एपिसोड में होगा हाई वोल्टेज ड्रामा. शो के मेकर्स सीरियल को नंबर वन बनाने के लिए जद्दोजहद कर रहे है. टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ में आए दिन नए-नए ट्विस्ट देखने को मिलते है. ‘अनुपमा’ के ट्विस्ट ने दर्शकों का दिमाग हिला रखा है. टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ में अपकमिंग एपिसोड में काफी धमाकेदार होने वाला है.

डिंपल को पड़ा जोरदार चांटा

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ के अपकमिंग एपिसोड देखने को मिलेगा कि कपाड़िया हाउस में अनुज अपने भाई अंकुश पर भड़कता है क्योंकि वह रॉमिल को सिर पर चढ़ा रहा है. इस दौरान अनुज सबको बोलता है कि उसे पता है कि घर और बिजनेस में क्या हो रहा है और जल्द ही मीटिंग के लिए तैयार हो जाए

वहीं दूसरी तरफ शाह हाउस में ड्रामा होगा. डिंपल परिवार वालों के खिलाफ हद से ज्यादा बदतमीजी करेगी, जिस वजह से अनुपमा उसको जोरदार चांटा जड़ देती है. समर अपनी मां से सवाल पूछने की हिम्मत करता है, लेकिन अनुपमा उसे पूरे 101 थप्पड़ मारने की धमकी देकर चुप करवा देती है.

 

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डिंपल से सवाल करेगी अनुपमा

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ में आगे देखने को मिलेगा कि अनुपमा डिंपल को जवाब देते हुए कहती है, ‘तुझे मुझसे बात करनी है तो सिर्फ मुझतक रहे. मेरे पति और मां-पिता पर गई, तो ऐसे ही जवाब मिलेगा.’

इसके बाद अनुपमा डिंपल से कहेगी कि मुझे जरा भी शौक नहीं है किसी और की गृहस्थी में टांग घुसाने की. तुम लोग अच्छी तरह घर क्यों नहीं संभालते हो. मैं तुम लोगों के भरोसे तो अपने बा-बाबूजी को नहीं छोड़ सकती. इस घर में सबने तुझे अपनाने की कोशिश की. तूने इस घर के लिए क्या किया है. ‘ अनुपमा समर और डिंपल को ताना मारते हुए कहते हैं कि तुम लोगों को साइकिल चलाने तक आती नहीं है और हवाई जहाज चलाना है.

 

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वहीं शो में आगे देखने को मिलेगा कि डिंपल अपना हिस्सा मांगती है. जब तक हमें अपना हिस्सा नहीं मिलेगा. तब तक हम तो यहां से नहीं जाएंगे.’ यह सब सुनकर सब लोग डिंपल की तरफ देखने लगते है. इसके बाद डिंपल कहती है- अगर हमें अपना हिस्सा नहीं मिलेगा तो अदालत हमें अपना हक दिला देगी. इसके बाद अनुपमा घर का बंटवारा करती है और उन्हें घर में हर एक सामान के पैसे देने के लिए कह देती है.

व्हीट ग्रास जूस के अद्भूत फायदे, जूस से करें दिन की शुरूआत, रहेंगे तरोताजा

स्वस्थ रहने के लिए हम सभी क्या-क्या नहीं करते. हम सभी चाहते है हमारा शरीर फिट और स्वस्थ रहे है। हैल्थी रहने के लिए पोषक तत्वों का होना बेहद जरूरी है.

व्हीट ग्रास जूस में सबसे ज्यादा पोषक तत्व मौजूद होते है, इसके साथ ही आप हाइड्रेटेड रहना चाहते है तो व्हीट ग्रास जूस का सेवन जरूर करें. गर्मियों के सीजन में बॉडी को हाइड्रेटेड रखना बहुत जरूरी है. व्हीट ग्रास में कई सारे पोषक तत्व पाए जाते हैं. इसमें कई विटामिन, आवश्यक अमीनो एसिड और आयरन, जिंक और मैग्नीशियम जैसे अन्य खनिज भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं.

व्हीट ग्रास जूस का सेवन करने से प्रतिरक्षा और प्रजनन क्षमता में सुधार, वजन घटाने में सहायक, कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने समेत कई अन्य लाभ प्रदान करता है.

व्हीट ग्रास जूस के अद्भूत फायदे

  1. रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है

व्हीट ग्रास जूस एक फायदेमंद इम्युनिटी बूस्टर है और बिमारियो-रोगों को दूर करता है. इसमें पाए जाते है महत्वपूर्ण एंजाइमों और अमीनो एसिड से भरपूर है. जो आपके बॉडी के हानिकारक प्रदूषकों और कार्सिनोजेन्स के दुषप्रभावों बचाता है.

2. वजन घटाने में सहायक

व्हीट ग्रास जूस में सेलेनियम नामक खनिज होता है, जो थायरॉयड ग्लैंड के कमकाज को बेहतर बनाने में मदद करता है. व्हीट ग्रास वजन बनाए रखने में भी मदद करता है. इसके साथ ही व्हीट ग्रास में पाए जाने पोषक तत्व आपके फूड क्रेविंग और ओवरईटिंग से दूर रखता है. वजन कम करने के लिए आपको रोजना खाली पेट एक गिलास जूस पीना चाहिए.

3. पाचन में सहायक

व्हीट ग्रास जूस में अधिक मात्रा में एंजाइम और फाइवर के कारण आपके पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मदद करता है. यह सूजन, गैस और कब्ज जैसी समस्याओं को रोकने में मदद करता है.

4. बॉडी को डिटॉक्स करता है

गलत खान-पान की आदत और गलत जीवनशैली की वजह से लोग अस्वस्थ रहते है. व्हीट ग्रास में क्लोरोफिल होता है जो शरीर में रक्त और लीवर को डिटॉक्स करने मदद करता है और सेल्स को मजबूत करता है. व्हीट ग्रास जूस पीने से रक्त कोशिका की संख्या बढ़ती है और ब्लड के स्तर में भी वृद्धि होती है.

BB OTT 2: ट्विटर पर ट्रेंड हुए एल्विश, अभिषेक के फैंस को लगा झटका

सलमान खान का कॉन्ट्रोवर्शियल रियलिटी शो बिग बॉस ओटीटी 2 को दर्शकों से खूब प्यार मिल रहा है. बिग बॉस ओटीटी 2 फिनाले के पड़ाव पर पहुंच गया है. बिग बॉस ओटीटी 2 टॉप 5 कंटेस्टेंट्स मिल गए है. फाइनल में मनीषा रानी, एल्विश यादव, पूजा भट्ट, अभिषेक मल्हान और बेबिका धुर्वे पहुंच गए हैं.

बिग बॉस ओटीटी 2 में एल्विश यादव ने बतौर वाइल्ड कार्ड कंटेस्टेंट एंट्री ली थी और तभी से एल्विश का नाम ट्विटर पर छाया हुआ है. वहीं, एल्विश के फैंस ने उनको अपना विनर मान लिया है. दरअसल, बिग बॉस ओटीटी 2 के ग्रैंड फिनाले से सिर्फ दो दिन रह गए है. ऐसे में एल्विश के फैंस ने ट्विटर पर #ElvishForTheWin और #VoteForElvish ट्रेंड करवाया है.

ट्विटर पर एल्विश यादव छाए हुए है

बिग बॉस ओटीटी 2 में एल्विश यादव ने बतौर वाइल्ड कार्ड कंटेस्टेंट आए है. वहीं अभिषेक मल्हान शुरुआत से ही घर में स्टॉग कंटेस्टेंट साबित हुए है. दोनों कंटेस्टेंट्स की सोशल मीडियो पर तगड़ी फैन फॉलोइंग है. इस बीच एल्विश यादव के फैंस ट्विटर पर गदर मचा दी है. एल्विश के फैंस उनको विनर बनाने के लिए पूरा जोर लगा रहे है. ट्विटर पर छाया #ElvishForTheWin और #VoteForElvish ट्रेंड. लाखों संख्या में ट्वीट किए जा रहे है. इसके साथ ही कुछ लोग फैंस से एल्विश के लिए ज्यादा से ज्यादा वोट करने की अपील कर रहे हैं. एक यूजर ने लिखा, ‘एल्विश का दिल बहुत बड़ा है… लेकिन फुकरा आत्म-मुग्ध, असुरक्षित और अहंकारी व्यक्ति है… एल्विश सच्चा विजेता है.’ इसी तरह के और भी ट्वीट आ रहे हैं.

टॉप 5 कंटेस्टेंट्स

वहीं बिग बॉस ओटीटी 2 के टॉप 5 में एल्विश यादव, अभिषेक मल्हान, मनीषा रानी, पूजा भट्ट और बेबिका धुर्वे ने अपनी जगह बनाई है. फैंस मनीषा रानी को टॉप 3 में देख रहे हैं. वहीं यह दावा किया जा रहा है कि बिग बॉस ओटीटी 2 में टॉप 3 की रेस में पूजा भट्ट और बेबिका धुर्वे पीछे रह जाएंगी. एल्विश यादव, अभिषेक मल्हान और मनीषा रानी आगे जाएंगे. इन तीनों में से ही कोई एक विनर हो सकता है.

क्या है परित्याग यानी डिजर्शन का कारण?

अविनाश की शादी के कुछ महीने बहुत आराम से बीते. लेकिन धीरेधीरे उसे अपने इस रिश्ते से उलझन सी महसूस होने लगी. कुछ महीने बाद अविनाश को अपनी पत्नी रिया का एक अलग ही रूप नजर आया. पहले तो अविनाश ने उसे प्यार से समझाने की कोशिश की, लेकिन उस के बाद भी उस का व्यवहार नहीं बदला और अकसर दोनों के बीच में मनमुटाव रहने लगे. यही नहीं, रिया का परिवार के हर सदस्य से किसी न किसी बात पर झगड़ा होता. और तो और वह अकसर नौकरचाकरों पर भी चिल्लाती रहती.

अविनाश ने बहुत बार चाहा कि इस रिश्ते को खत्म कर दे. पर घर के बड़ों ने हर बार समाज की दुहाई दे कर अविनाश की इस सोच को विराम लगा दिया. ऐसे ही कुछ साल और निकल गए. लेकिन पानी सिर के ऊपर से जाने लगा और एक दिन अविनाश बिना बताए रिया को उस के घर छोड़ कर चला गया. फिर उस ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

ऐक्सपर्ट के मुताबिक, यह अलगाव डिजर्शन होता है यानी एकतरफा फैसला. आइए जानते हैं इसे विस्तार से.

रिश्ते में ऐसे बहुत से पड़ाव होते हैं, जिस में प्यार और दुख जैसी अलगअलग भावनाओं को समयसमय पर महसूस किया जाता है. जब नईनई शादी होती है, तब दोनों पार्टनर एकदूसरे के साथ काफी प्यार और सुख से रहते हैं और उस समय रिश्ता काफी अच्छे से आगे बढ़ता है. लेकिन जैसे ही थोड़ा समय हो जाता है, तब असली जीवन की समस्याएं शुरू हो जाती हैं. और फिर दोनों पार्टनर को आपस में काफी मेलजोल बना कर रहने की जरूरत होती है.

कुछ पार्टनर दुख और क्लेश वाले जीवन के पड़ाव को झेल नहीं पाते और एकदूसरे से अलग भी नहीं हो पाते. ऐसे पार्टनर एकदूसरे को पता भी नहीं चलने देते, लेकिन अपने दिल में अपने पार्टनर की जगह को खत्म कर देते हैं.

एक रिश्ते में डिजर्शन का क्या मतलब है?

जब एक व्यक्ति खुद को अपने पार्टनर के प्रति किसी भी रूप से जिम्मेदार न समझे और अपनेआप को आजाद मान कर केवल अपने लिए ही सबकुछ करे, तो इसे डिजर्शन कहा जाता है. एक पार्टनर अपने घरपरिवार को छोड़ देता है और उस के पार्टनर को इस बारे में कुछ पता भी नहीं होता है. यह अचानक से होता है और इस में दूसरे पार्टनर की कोई सहमति नहीं होती है. कई जगह तो ऐसा करने वाले व्यक्ति पर आरोप लगा कर उसे सजा भी मिलती है.

अलग होने और डिजर्शन में क्या फर्क है?

डिजर्शन और सैपरेशन दोनों अलगअलग होते हैं. डिजर्शन में एक पार्टनर दूसरे को बिना बताए अलग होता है. इस में दूसरे पार्टनर की सहमति नहीं होती है. वह आपस में बातचीत भी नहीं करते हैं.

सैपरेशन में दोनों पार्टनर एकदूसरे की सहमति से और बातचीत कर के एक सहमत फैसला ले कर एकदूसरे से अलग होते हैं. अगर दोनों में सहमति नहीं भी होती है तो भी पार्टनर अपने पार्टनर को बताने के बाद ही अलग होता है.

अगर पार्टनर ने डिजर्शन का फैसला लिया है, तो उस के वापस आने की उम्मीद काफी कम होती है और वह अकसर वापस नहीं आता है, जबकि सैपरेशन में अगर पार्टनर फिर से खुश हो जाए और एकदूसरे से सहमत हो जाएं तो वह वापस आ सकता है.

डिजर्शन के कारण

  1. किसी और वजह से डाइवोर्स न हो पाना 

जब पार्टनर एक रिश्ते से बाहर निकलना चाहता है और उसे कोई कारण या बहाना नहीं मिल रहा है, तो अकसर वह खुद को शर्मिंदा होने से बचाने के लिए रिश्ते से भागना ही बेहतर समझता है.

2. पतिपत्नी का एकसाथ रहना असंभव हो गया हो

जब पति और पत्नी एकदूसरे के साथ न रह पा रहे हों और उन का एकसाथ रहना सभी के लिए समस्या बन रहा हो तो भी इस तरह के नतीजे सामने आते हैं.

3. शारीरिक और मानसिक रूप से क्रूरता का सामना करना 

जब एक पार्टनर अपने पार्टनर को शारीरिक या मानसिक रूप से दुख पहुंचाता है, तो वह पार्टनर किसी को बिना बताए अलग होना ही बेहतर समझता है.

4. धोखे में रहना

जब एक पार्टनर अपने पार्टनर को बारबार धोखा दे रहा हो और इस चीज को अपनी आदत बना ले तो भी दूसरा पार्टनर परेशान हो कर उसे बिना बताए उस से अलग हो जाता है.

क्या कहता है कानून

हिंदू विवाह अधिनियम,1955 में विवाह विच्छेद के बहुत से आधार हैं. अधिनियम की धारा 13(1) (आईबी) एक के मुताबिक, परित्याग (डिजर्शन)- के अंतर्गत पति या पत्नी में से किसी ने अपने साथी को छोड़ दिया हो और विवाह विच्छेद की अर्जी दाखिल करने से पहले वे लगातार दो वर्षों से अलग रह रहे हों. तो यह विवाह विच्छेद मान्य है. ‘परित्याग’ शब्द का मतलब मैरिज के दूसरे पक्ष द्वारा याचिकाकर्ता का परित्याग है.

अब टर्म इंश्योरेंस खरीदने वाली महिलाओं की संख्या 9 प्रतिशत से बढ़ कर 12 प्रतिशत हुई

टर्म इंश्योरैंस परिवार के लिए एक सिक्योरिटी लेयर के रूप में काम करता है और परिवार के कमाऊ सदस्य के जल्दी निधन की स्थिति में परिवार की वित्तीय स्थिरता को बनाए रखने में सहायक होता है. समय के साथसाथ महिलाओं की भूमिकाएं और जिम्मेदारियां बदल रही हैं. अब कामकाजी महिलाएं भी परिवार में कमाने वाले सदस्य की भूमिका निभा रही हैं. साथ ही, गृहिणियां भले आय अर्जित नहीं करती हैं, लेकिन वे अपने योगदान के माध्यम से अपने घरों में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.

पौलिसी बाजार के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2019 में टर्म इंश्योरैंस खरीदने वालों में महिलाओं की संख्या 9 प्रतिशत और पुरुषों के लिए यह आंकड़ा 91 प्रतिशत था. हालांकि कोरोना महामारी के बाद से महिलाओं में टर्म इंश्योरैंस के प्रति जागरूकता बढ़ी है और वर्ष 2023 में यह आंकड़ा 9 प्रतिशत से बढ़ कर 12 प्रतिशत हो गया है.

इतना ही नहीं, Q1 वित्तीय वर्ष 24 में, 31-50 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं द्वारा खरीदी गई पौलिसियों की हिस्सेदारी 57 प्रतिशत (उच्चतम) थी, जबकि 18-30 वर्ष की आयु वर्ग की महिलाओं की हिस्सेदारी 41 प्रतिशत रही. इस का मतलब यह है कि वित्तीय स्थिरता आते ही महिलाएं टर्म प्लान में निवेश के बारे में अधिक जागरूक हो जाती हैं.

ऋषभ गर्ग, हैड टर्म इंश्योरैंस, पौलिसी बाजार डौट कौम का कहना है कि कामकाजी महिलाओं के लिए टर्म कवर जरूरी है. कामकाजी महिलाएं या तो प्राथमिक या सहअर्जक के रूप में अपने परिवार के वित्त में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. अगर किसी कमाने वाले सदस्य के साथ कुछ दुर्भाग्यपूर्ण होता है तो परिवार उस महत्वपूर्ण आय को खो देता है, जो कर्ज चुकाने, बच्चों की उच्च शिक्षा की लागत को पूरा करने या बुजुर्ग मातापिता के पालनपोषण की ओर जाती थी.

टर्म प्लान से भुगतान वित्तीय बफर के रूप में काम कर सकता है, इसलिए आदर्श रूप से कामकाजी पुरुषों के समान कामकाजी महिलाओं के पास भी अपनी वार्षिक आय का 10 गुना कवर होना चाहिए.

गृहिणियां और उन का आर्थिक महत्व

भारत में अनुमानित 150 मिलियन गृहिणियां हैं, जो आय अर्जित कर घर में योगदान नहीं देती हैं, लेकिन वे घर का प्रबंधन करने और परिवार के सदस्यों की देखभाल करने में काफी योगदान देती हैं. गृहिणी की अनुपस्थिति में परिवार के सदस्य, बच्चे की देखभाल, घरेलू बिल और अन्य विविध लागतों को कवर करते हैं. कामकाजी महिलाओं के लिए टर्म इंश्योरैंस हमेशा से एक सीधा प्रस्ताव रहा है.

लेकिन जब गृहिणियों की बात आती है, तो बीमाकर्ता मुख्य रूप से संभावित नैतिक जोखिम के कारण उन्हें टर्म कवर देने से हिचकते हैं. मगर गृहिणियां भी अब टर्म इंश्योरैंस का विकल्प चुन सकती हैं, भले ही उन के पति के पास यह पौलिसी हो या नहीं.

होममेकर्स को उन की घरेलू आय के आधार पर टर्म कवर दिया जाता है. 18 से 50 वर्ष की आयु के बीच की गृहिणी, जो स्नातक हैं या 10वीं या 12वीं पास हैं, और जिन की न्यूनतम घरेलू आय 5 लाख रुपए है, वे एक करोड़ रुपए तक का टर्म कवर खरीद सकती हैं.

पौलिसी बाजार के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 75 प्रतिशत गृहिणियों ने 25 से 50 लाख के टर्म कवर को खरीदा, वहीं अगर कामकाजी महिलाओं की बात करें, तो 5 में से 2 कामकाजी महिलाओं ने 50 लाख रुपए से ले कर एक करोड़ रुपए तक के टर्म कवर में निवेश किया और प्रत्येक 4 में से एक महिला ने एक करोड़ रुपए से अधिक के टर्म कवर का विकल्प चुना.

जैसेजैसे महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती जा रही हैं, उन के परिवार के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए टर्म इंश्योरैंस प्रोडक्ट्स में उन्हें शामिल करने की आवश्यकता बढ़ती जा रही है.

कीमतों की तुलना करना

अवधि चुनते समय इस बात पर विचार करें कि आप अपनी वित्तीय जिम्मेदारियों जैसे बच्चों की शिक्षा, शादी और होम लोन चुकाना आदि को कब तक पूरा कर पाएंगे. कार्यकाल समाप्त होने तक आप के जीवनसाथी और आप के पास रिटायरमैंट के दिनों के लिए पर्याप्त पैसा होना चाहिए.

टर्म इंश्योरैंस पौलिसी खरीदते समय आप को खरीदने से पहले विभिन्न इंश्योरैंस कंपनियों के प्रीमियम की तुलना करनी चाहिए. पौलिसी बाजार के आंकड़ों के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाओं की पालिसी 9 से 28 फीसदी तक सस्ती हो सकती हैं.

औयली स्किन से परेशान हैं

हरकोई चाहता है कि उस का चेहरा सुंदर दिखे लेकिन कई बार सीबम का उत्पादन अधिक होने के कारण औयली, मुंहासे, ब्लैकहैड्स और व्हाइटहैड्स जैसी त्वचा संबंधी समस्याएं हो सकती हैं.

प्रदूषण और धूलमिट्टी से औयली स्किन वाले लोगों के त्वचा पर उभार भी आ सकता है. अगर आप भी ऐसी समस्याओं से परेशान हैं, तो यहां आप के लिए बैस्ट तरीके दिए गए हैं :

  1. क्लींजिंग करें

चेहरे के औयल को बैलेंस करने के लिए क्लींजिंग करें. अपने चेहरे पर जमी गंदगी और तेल से छुटकारा पाने के लिए दिन में 2 या 3 बार चेहरे को साफ करना बेहद जरूरी है. औयली स्किन के लिए ऐसे क्लींजर का उपयोग करें जो औयल फ्री हो. क्लींजर का उपयोग करते हुए ध्यान रखें कि ऐसी क्लींजिंग टैकनिक्स का सहारा न लें जो आप की स्किन की प्राकृतिक नमी को खत्म कर देती है.

ऐसे प्रोडक्ट्स को आजमाएं जिन में सैलिसिलिक एसिड, नीम, हलदी, टी ट्री औयल, शहद वगैरह हो.

2. स्क्रबिंग 

सप्ताह में 1 या 2 बार स्क्रब जरूर करना चाहिए. इस से चेहरे की गंदगी और डैड स्किन सैल्स को खत्म करने में मदद मिलेगी, जिस से पिंपल्स, व्हाइटहैड्स और ब्लैकहैड्स से छुटकारा मिल सकता है. इसलिए अपनी स्किन की देखभाल के लिए अपनी दिनचर्या में ऐक्सफोलिएशन को शामिल करें. ध्यान रखिए कि त्वचा को कठोर तरीके से न रगड़ें.

3. फेस मास्क का उपयोग 

ऐक्सफोलिएशन के बाद फेस मास्क जरूर लगाएं. आप को हफ्ते में चंदन, मुलतानी युक्त फेस पैक का इस्तेमाल करना चाहिए. इन से आप के चेहरे का अतिरिक्त तेल अवशोषित हो जाता है.

4. अल्कोहल फ्री टोनर का इस्तेमाल करें 

आप को प्रतिदिन अल्कोहल फ्री टोनर का इस्तेमाल करना चाहिए. इस से स्किन का अतिरिक्त तेल हटाने में मदद मिलती है। गुलाबजल एक अच्छा टोनर है.

5. मोइश्चराइजर लगाना न भूलें 

औयली स्किन को मोइस्चराइजिंग और हाइड्रेशन की जरूरत होती है. औयली स्किन के लिए औयल फ्री, वाटर बेस्ड मोइस्चराइजर चुनना चाहिए.

6. रोजाना सनस्क्रीन लगाएं 

औयली स्किन वाले लोग सनस्क्रीन लगाना स्किप कर देते हैं क्योंकि इस से उन की स्किन चिपचिपी हो सकती है. सनस्क्रीन न लगाने से पिगमैंटेशन, दागधब्बे हो सकते हैं. इसलिए अपनी स्क्रीन पर वाटर बेस्ड सनस्क्रीन लगाएं. जंकफूड खाने से बचें, पानी का अधिक से अधिक सेवन करें जिस से आप हाइड्रेटेड रहेंगे और टौक्सिंस को बाहर निकाल पाएंगे.

अपनी डाइट में फल और हरी सब्जियों को शामिल करें. ये सभी चीजें फौलो करने से आप की स्किन के औयल को बैलेंस किया जा सकता है.

बंटवारा- भाग 4: क्या थी फौजिया की कहानी

इधर, अफशां को काफी देर से बेबे की कोठरी में दरवाज़ा बंद कर के बैठे हुए देख कर रजिया की छोटी भाभी ने फ़ौरन अपनी सास के कान भरे और दरवाज़ा खुलवाने को कहा. फौजिया दनदनाती हुई आई और दरवाज़े पर लात मार कर रजिया से दरवाज़ा खोलने को कहा. तो झट से अपना फोन कुरते की जेब में डाल कर अफशां बेबे से शीरमाल की रैसिपी पूछने लगी और रजिया ने दरवाज़ा खोल दिया.

बीकानेर में अपने घर में बैठे किशनचंद मेघवाल ने पोते से पूछा कि उन की बीरी को भारत लाने   का प्रबंध कैसे किया जाएगा? संजय ने अपने दादू को हौसला देते हुए कहा कि वह जल्दी ही भारतीय विदेश मंत्रालय में इस बारे में पत्र लिखेगा और दादू को उन की बीरी से मिलवाने का प्रयत्न करेगा.

कुछ महीनों के प्रयास के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय से बात कर के अमीरन उर्फ़ लक्ष्मी के भारत लौटने का प्रबंध करवा दिया और सरकारी हुक्म होने के कारण बेबे के बेटे उस के भारत जाने में कोई रुकावट नहीं डाल सके. मगर अपनी मां को धमकी ज़रूर दे दी कि अगर वह हिंदुस्तान गई तो बेटे वापस उस को अपने घर में कभी नहीं आने देंगे. अपने देश जाने की ख़ुशी में बेबे ने बेटे की बात पर कोई ध्यान ही नहीं दिया और अपने टीन के बक्से में सफ़र पर ले जाने का सामान रखने लगी.

नियत दिन पर रजिया अपनी बेबे को ले कर अपना वादा पूरा करने के लिए चल पड़ी. उस के अब्बू ने तो साथ चलने से इनकार कर दिया, इसलिए अफशां ने अपने अब्बा से गुजारिश की तो अजीबुर्रहमान अमीरन और रजिया को ले कर कराची रेलवे स्टेशन पंहुच  गए. वहां पंहुचने पर पता चला कि दूतावास की तरफ से भारत जाने का प्रबंध केवल लक्ष्मी के लिए  किया गया है, इसलिए और कोई उस के साथ नहीं जा सकता है. रजिया ने बेबे की उम्र का हवाला देते हुए साथ जाने की इजाज़त मांगी लेकिन पाकिस्तान सरकार ने अनुमति नहीं दी. निराश रजिया ने भीगी आंखों से अपनी बेबे को रुखसत किया और अफशां के अब्बा के साथ अपने गांव वापस आ गई. अफशां द्वारा बेबे के आने की सूचना  मिलने पर संजय व उस के पापा अमृतसर के लिए रवाना हो गए.

इतना लंबा सफ़र अकेले तय करने में लक्ष्मी को बहुत घबराहट हो रही थी. तब उस के साथ सफ़र कर रही एक महिला ने उस से बातें करनी शुरू कीं और बेबे की कहानी सुनने के बाद उस ने रास्तेभर बेबे की पूरी देखभाल की और अमृतसर पर लक्ष्मी के परिवार वालों को उसे सौंप कर ही वहां से गई. अमृतसर स्टेशन पर कुछ रेलवे अधिकारियों के अलावा  प्रैस के संवाददाता और संजय एवं उस के पिता बरसों से बिछुड़ी लक्ष्मी की प्रतीक्षा में फूलों के गुलदस्ते ले कर खड़े थे.  संजय और उस के पिता ने आगे बढ़ कर लक्ष्मी के पैर छू कर जब अपना परिचय दिया तो लछमी ने आंखें मिचमिचाते हुए उन दोनों को पहचानने का प्रयास किया और फिर दोनों को कलेजे से लगा कर सिसकने लगी.

कुछ और घंटों की यात्रा पूरी करने के बाद लक्ष्मी जब अपने राजस्थान पंहुची तो इतने लंबे सफ़र से उस का तन तो थका हुआ था लेकिन अपनी धरती पर पांव रखने की ख़ुशी ने उस थकान को मन पर हावी होने ही नहीं दिया और घर के दरवाज़े पर अपनी प्रतीक्षा करते अपने किसना को देख कर तो उस के पैरों में जैसे पंख लग गए व उस ने अपने किसना को कलेजे से ऐसे चिपका लिया जैसे अब वह अपने भाई से कभी अलग नहीं होगी. घर के अंदर पंहुचने पर संजय की मां ने भी अपनी बरसों से बिछुड़ी बूआ सास के पांव छुए और उस का सत्कार किया.  चायनाश्ता करते हुए  जब लक्ष्मी ने बंसी, सरजू और लाली के बारे में पूछा, तब किशनचंद ने बताया कि बंसी भैया का 2 वर्ष पहले कैंसर से देहांत हो गया और उन के बच्चे जयपुर में कारोबार करते हैं. सरजू भैया मोर गांव में ही रहते हैं और लाली अपने परिवार के साथ कोटा में रहती है.

मोर गांव का नाम सुनते ही लक्ष्मी ने गांव जाने की रट पकड़ ली. तब किशनचंद ने कुछ दिनों बाद गांव ले चलने का आश्वासन दे कर अपनी बीरी को शांत किया. लेकिन 15 दिन निकल गए और अपनीअपनी व्यस्तताओं के चलते किसी का भी गांव जाना न हो सका. लक्ष्मी के अंदर भी अब कभीकभी अमीरन अपना सिर उठाने लगती और उसे अपने बच्चों, विशेषरूप से रजिया, की याद सताने लगती. मगर संकोचवश वह किसी को इस विषय में कुछ न बताती थी.

अचानक मार्च के महीने से दुनिया का माहौल एकदम बदल गया और हर तरफ कोरोना का डर व्याप्त हो गया. तब अमीरन ने लक्ष्मी को अपने टब्बर की तरफ से लापरवाह हो जाने के लिए फटकार लगाई और उस ने संजय से कहा कि वह उस की बात एक बार रजिया से करवा दे. संजय ने तुरंत फोन मिलाया तो अफशां ने अगले दिन बेबे के परिवार से बात करवाने का वादा किया.

अगले दिन अफशां ने रजिया के घर पंहुच कर बेबे से सब की बात करवानी चाही तो बेबे की बहु और पोताबहुएं तो काम के बहाने इधरउधर खिसक गईं और रजिया के भाई खेतों पर थे.  रजिया ने फोन अफशां के हाथ से ले कर अपनी बेबे से बात करने लगी तो बेबे भी खूब चटखारे ले कर अपने भाई व उस के परिवार के बारे में बताने लगी. तभी रजिया का अब्बा अकरम वहां आ गया और जब उसे पता चला कि रजिया फोन पर बेबे से रूबरू है तो उस ने बेटी के हाथ से फोन छीन कर अपनी मां को दोबारा फोन न करने की हिदायत देते हुए कहा कि वह अब पाकिस्तान वापस आने के बारे में सोचे भी न, क्योंकि इस परिवार के लिए वह मर चुकी है. फिर अकरम ने फोन काटा और अफशां के हाथ में थमा कर वहां से चला गया.

रजिया अपने अब्बू के व्यवहार से दुखी हो कर रोने लगी तो अफशां ने उसे दिलासा देते हुए कहा कि उसे जब भी बेबे से बात करनी हो, तो वह उस के घर आ कर आराम से बात कर सकती है.

अपने बेटे के ज़हरबुझे शब्दों से आहत लक्ष्मी फोन हाथ में पकडे निश्छल बैठी रह गई. यह देख कर संजय ने उसे बड़े प्रेम से समझाते हुए कहा कि ‘काका अपनी मां के यहां आ जाने से दुखी हो कर ऐसे बोल रहे होंगे, असलियत में नाराज़ नहीं होंगे.‘  उस की बात सुन कर लक्ष्मी ने अपने आंसू तो पोंछ लिए लेकिन मन ही मन वह जानती थी कि अकरम ने जो भी कहा है, उस का एकएक शब्द सच्चा है.

अब सीमापार लक्ष्मी का कोई टब्बर नहीं है. जीवन की यह कैसी विडंबना है कि जिस परिवार में जन्म लिया वह अब अपना हो कर भी अपना नहीं है और जो नाता ज़बरदस्ती जुड़ा था वह अधिक अपना था लेकिन उसे मानने से उस के अपने बेटे ने ही इनकार कर दिया. कहां जाए अब अमीरन का चेहरा ओढ़े यह लक्ष्मी. यह परिवार अब उस के भाई और बच्चों का है जिस पर उस का कोई अधिकार नहीं है और जिन पर अधिकार बनता है उन्होंने तो उस को जीतेजी ही मार दिया है. वह अब जाए तो कहां जाए? इस बंटवारे ने केवल ज़मीनें ही नहीं बांटी हैं बल्कि रिश्तों के भी टुकड़ेटुकड़े कर दिए हैं.

मन ही मन कुछ तय करने के बाद लक्ष्मी ने किशनचंद से बात की और कहा कि अब वह अपना बाकी जीवन अपने गांव में ही बिताना चाहती है, इसलिए उस को जल्द से जल्द गांव भेजने का प्रबंध करवा दिया जाए. बीरी की इच्छा पूरी करते हुए उसे (लक्ष्मी) को ले कर किशनचंद मोर गांव गए और वहां अपने पैतृक घर के एक हिस्से में लक्ष्मी के रहने का प्रबंध करवा कर लौट आए. और लछमी के गांव जाने के पूरे एक महीने बाद आज सुबहसुबह गांव से सरजू भैया का फोन आया कि बीरी सुबहसुबह परलोक सिधार गई.

आजीवन जो धरती उसे नसीब नहीं हुई, उस ने अंत में अपने अंक में उसे समेट लिया था.

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