Big Boss 19: कुनिका सदानंद को 27 साल लिवइन में रहने के बाद मिला धोखा

Big Boss 19: बिग बॉस एक ऐसा शो है जहां अच्छे-अच्छों की जन्म कुंडली खुल कर सामने आती है. 4 महीने के शो में कंटेस्टेंट के रूप में रहने वाले बॉलीवुड और टीवी स्टार कई बार खुद ही अपनी जन्म कुंडली दुनिया के सामने खोल कर रख देते हैं, क्योंकि बिग बॉस के घर में उनके पास टाइम पास करने के लिए बातें करने के अलावा कोई चारा नहीं होता. कई बार बिग बॉस भी टीआरपी के चक्कर में नएनए हथकंडे अपना कर विवादस्पद प्रतियोगी की पोल खोल कर रख देते हैं. जिसे कंटेस्टेंट कई बार छुपाने की कोशिश करते रहते हैं.

बिग बॉस 19 को शुरू हुए 12 दिन भी नहीं हुए कि एक-एक करके घर में आए प्रतियोगियों की के कई राज बाहर आने लगे हैं. इसी सिलसिले में 61 साल की एक्ट्रैस कुनिका दूसरे प्रतिभागियों के सामने अपनी फ्लॉप लव लाइफ शेयर करती नजर आई.

कुनिका ने बातों बातों में अपने साथ बैठी अन्य प्रतियोगियों को अपनी जिंदगी में मिले प्यार और धोखे के बारे में बताया. उन्होंने कहा कि उनकी लव लाइफ में काफी सारे उतार चढ़ाव हुए, उनकी दो शादियां हो चुकी है. इस शादी से दो बेटे होने के बावजूद कुनिका का रिश्ता 27 सालों तक एक फेमस सिंगर के साथ रहा. अब यह बात जगजाहिर है.

यह सिंगर पहले से शादीशुदा था और अपनी पत्नी के साथ ही रह रहा था लेकिन फिर भी कुनिका उस आदमी के साथ 27 साल तक लिव इन रिलेशनशिप में रही लेकिन वहां भी उनको धोखा मिला क्योंकि वह सिंगर कुनिका और पत्नी के अलावा एक अन्य लड़की के साथ तीसरी सेटिंग में भी लगा हुआ था. जब कुनिका को इस बात का पता चला तो उन्होंने उस सिंगर के साथ लिव इन रिलेशनशिप वाला रिश्ता भी खत्म कर दिया. इतना सब होने के बाद भी एक्ट्रेस ने हार नहीं मानी है.

बिग बॉस 19 के प्रीमियर के दौरान होस्ट सलमान खान के सामने भी यह बात सामने आई की इस एक्ट्रैस को 20 से 24 साल के लड़के प्रपोज करते हैं और उनके पीछे पड़े होते हैं. मजे की बात तो यह है कि बिग बॉस 19 के प्रीमियर के फर्स्ट एपिसोड में एक जवान लड़के को बुला भी लिया गया था जो अपने आप को कुनिका का आशिक बता रहा था. ऐसे में जब कुछ जवान लड़कों ने कुनिका को मम्मी कहना शुरू किया तो वह बेहद नाराज हो गई और उन्होंने गुस्से में कहा कि मम्मी नहीं कहो.

ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि हमारी उम्रदराज हीरोइनें जवान हीरोइनों से कम है क्या?, ठीक वैसे ही जैसे यह कहावत मशहूर है कि ‘हमारी छोरी छोरों से कम है क्या ? ’. बिग बॉस की इस हॉट लेडी ने यह तो साबित कर ही दिया कि दिल जवान होना चाहिए उम्र सिर्फ एक नंबर है.

Big Boss 19

Shital Babar: लड़की के आत्मनिर्भर बनने पर क्या कहती हैं ज्वैलरी डिजाइनर

Shital Babar: अगर आप ने जिंदगी में कुछ करने को ठान लिया है, तो समस्याएं कितनी भी आएं, आप उन से निकल कर सफलता प्राप्त कर लेते हैं, ऐसा ही कुछ कर दिखाया है सातारा की शीतल बाबर ने, जो एक ज्वैलरी डिजाइनर होने के साथसाथ मेकअप आर्टिस्ट और हेयर ड्रैसर भी हैं.

उन के लिए यहां तक पहुंचना आसान नहीं था, क्योंकि वे अभी तक सिंगल हैं और उन्हें आसपास के सभी रिश्तेदारों से बारबार शादी कर घर बसाने के लिए कहा जाता था, लेकिन शीतल खुद को स्थापित कर एक बिजनैस वूमन बनना चाहती हैं, जिस में शादी उन की प्रायोरिटी नहीं.

उन के इस काम में उन की मां आशा हनुमंत बाबर और भाई अमोल हनुमंत बाबर का बहुत हाथ रहा है, जिन्होंने हमेशा उन्हें कुछ मनमुताबिक काम करने की आजादी दी है.

मिली प्रेरणा

शीतल कहती हैं कि मुझे बचपन से ही अपना कुछ करने की इच्छा थी. मैं ड्राइंग, पेंटिंग और क्राफ्ट का काम शुरू से करती आई हूं. मेकअप के भी वर्कशौप अटेंड किए, जहां मुझे महाराष्ट्रियन नथ बनाने की कला सिखाई गई, जिस में मुझे ज्वैलरी बनाने की बेसिक का पता चला. इस के बाद मैं कई नथ बना कर सोशल मीडिया पर डाल दी. मैं ने केवल 5 महाराष्ट्रियन नथ बनाने की कला सीखी और उसी के आधार पर कई नए डिजाइन बना लिए, जो मेरे फ्रैंड सर्कल में सभी को पसंद आ रहे थे. मेरे कई ग्राहक बन गए. मेरे नथ के ग्राहक विदेशों में भी हैं.

मिला परिवार का सहयोग

शीतल कहती हैं कि मेरे परिवार वालों ने हमेशा मुझे हर काम में सहयोग दिया है. उन्होंने लड़की समझ कर मुझे मेरे काम को करने से मना नहीं किया. यही वजह थी कि मैं ने कंप्यूटर एप्लिकेशन में पढ़ाई सातारा से पूरी की है. इस के बाद मैं मुंबई अपने परिवार के साथ शिफ्ट हुई. इस के बाद मैं ने कुछ दिनों तक मुंबई में शेयर मार्केट में भी काम किया है. फिर बैंकिंग में पोस्ट डिप्लोमा करने के बाद कुछ दिनों बाद मुझे एक बैंक में जौब लग गई. जौब करतेकरते मुझे लगा कि मुझे कुछ अपना काम करना है. ऐसे में मैं ने अपना कुछ करने का प्लान बनाया.

छोटे बजट से व्यवसाय

शीतल कहती हैं कि मैं सातारा में अपने घर में अकेली रहती हूं और शांति से पूरा काम करती हूं, क्योंकि क्रिएटिविटी के लिए शांत वातावरण चाहिए. वहां मेरे आसपास मेरे रिश्तेदार हैं, उन का सहयोग मेरे साथ पूरा रहता है.

व्यवसाय की शुरुआत में मैं ने जौब से जमा किए हुए पूंजी से किया. इस में मैं पहले कम रा मैटीरियल मंगवाती थी, फिर सब के और्डर मिलने पर उन्हे सप्लाई कर जो पैसा मिलता था, उस से फिर से रा मैटीरियल मंगवाती थी. ऐसा करतेकरते मेरे व्यवसाय के ग्राहक बढ़ते गए. पहले जितना कमाया, उतने खर्च कर देती थी. कुछ बचता नहीं था. धीरेधीरे ग्राहक बढ़े और अब लाभ होने लगा. मेरे ब्रैंड का नाम ‘साज नथ शीतल’ है.

मेरे इस व्यवसाय में सातारा की एक फ्रैंड ने बहुत सहयोग दिया है. उन की प्रिंटिंग प्रेस है. उन्होंने विजिटिंग कार्ड, प्रिंटिंग मैटीरियल आदि सब फ्री में बना कर दिया, ताकि मैं व्यवसाय शुरू कर सकूं. अब मैं उन्हें पैसे देती हूं. मैं महीने में ₹25 से 30 हजार तक प्रौफिट कमा लेती हूं, जो मेरे लिए बहुत है.

मार्केटिंग करना नहीं था आसान

वे कहती हैं कि शुरू में मैं मार्केटिंग को ले कर काफी चिंतित थी, लेकिन एक दिन पहले जो 5 नथ मैं ने वर्कशौप के दौरान बनाने सीखे थे, वहां से कुछ रा मैटीरियल खरीद लिए थे, उसी से मैं ने कई नथ खुद बनाया और उस के पिक्चर्स सोशल मीडिया पर डाल दिए. दोस्तों से ले कर कई नए लोगों ने मेरे क्रिएशन की तारीफ की और तुरंत खरीद लिए. मेरे सारे नथ आधे घंटे में बिक गए. इस से मुझे प्रेरणा मिली. इस के बाद मैं ने कई ब्यूटी पार्लर वालों से संपर्क किया और अब नथ के साथसाथ मैं ने गले का हार, कान की बाली, हाथ के कंगन, अंगूठी आदि सब बनाने लगी, क्योंकि इन सब को बनाने की कला मैं ने कई वर्कशौप से सीख लिए थे. ज्वैलरी बना कर मैं ने ब्यूटी पार्लर वालों को भी को बेचना शुरू कर दिया है और अब मेरे ग्राहकों की लिस्ट लंबी हो गई है.

जरूरी है मनी का फ्लो होना

शीतल कहती हैं कि ज्वैलरी डिजाइनर के साथसाथ मैं मेकअप आर्टिस्ट और हेयर ड्रैसर भी हूं, क्योंकि मैं ने उस की ट्रैनिंग भी ली है. वहां भी मैं ब्राइड को मेरे ज्वैलरी से सजाती हूं. मेरे 3 काम एकसाथ चलते हैं, क्योंकि इस से मेरे व्यवसाय में मनी फ्लो होता रहता है. इस में मैं ब्राइड को सजाना, बेबी शावर, मौडल के मेकअप आदि सब करती हूं. मैं कस्टमाइज्ड ज्वैलरी भी बनाती हूं.

पौकेट फ्रैंडली है दाम

शीतल को एक पूरा सेट बनाने में 2 से 3 दिन लगते हैं, जबकि 1 नथ बनाने में आधा घंटा लगता है. इस में तार और मोती की सजावट खास होती है. 1 नथ की कीमत ₹500 से ₹800 तक होती है. नथ मेकिंग का किट मिलता है, जिस में तार, बीड्स, मोती आदि कई चीजें होती हैं, जिसे डिजाइन के अनुसार बनाया जाता है. इस काम में बारीकी और सफाई का होना आवश्यक होता है.

वे कहती हैं कि मैटीरियल पुणे और अन्य जगहों से औनलाइन मंगवाया जाता है, जिसे ग्राहकों की मांग के अनुसार उन्हें बना कर भेजती हूं. इस में मैं इस बात का ध्यान रखती हूं कि मुझे और्डर देने के बाद ग्राहक पूरे पैसे जमा करें, ताकि बाद में किसी प्रकार का झमेला न हो.

अभी तक मैं ने जो भी और्डर बना कर भेजे हैं, ग्राहक हमेशा संतुष्ट रहा है  इस से मेरा कारोबार बढ़ने में आसानी रही है. मैं रोज 5 से 6 घंटे तक काम करती हूं, लेकिन त्योहारों में रातरात भर बैठ कर काम करना पड़ता है, क्योंकि मार्केट में ज्वैलरी की मांग अधिक होती है और कमाई भी उन दिनों अधिक होती है.

वेराइटी के लिए मैं सोशल मीडिया के पेज पर जाती हूं और उस से अपना अलग क्रिएशन बनाती हूं, किसी की कौपी नहीं करती.

शादी करना मेरे लिए जरूरी नहीं

शादी न करने की वजह के बारे में पूछने पर शीतल हंसती हुई कहती हैं कि मैं शादी करना चाहती हूं, लेकिन मेरे व्यवसाय को ले कर टोकाटाकी करने वाला लड़का मुझे नहीं चाहिए. मुझे मेरे काम को सपोर्ट करने वाला पति चाहिए और वह उम्र के किसी भी पड़ाव में मिलेगा, मैं शादी कर लूंगी. अभी तक मुझे एक भी वैसा लड़का मिला नहीं है. मेरा आज के लड़कों के लिए मेरा अनुभव बहुत खराब है. उन की सोच मेरी सोच से अलग है. कुछ लड़कों ने तो मेरे रंगरूप, मेरी जौब, व्यवसाय आदि को देख कर रिजैक्ट किया है.

इसलिए शादी कर मैं अपने व्यवसाय को नष्ट नहीं करना चाहती. एक लड़की का शादी कर घर के काम करने की सलाह आज भी लड़के देते हैं, जो मुझे पसंद नहीं, क्योंकि एक लड़की हर तरह के काम कर सकती है, जबकि लड़के नहीं कर पाते.

मेरे रिश्तेदार मेरी शादी को ले कर पहले चिंतित थे, आज नहीं, क्योंकि कम उम्र में शादी कर मेरे परिवार की लड़की और दोस्त काफी परेशान हैं. कुछ ने तो डिवोर्स तक ले लिया है.

इस के अलावा जब मैं कालेज में थी तब मेरे पिता की मृत्यु हो गई थी, ऐसे में मैं ने अपने छोटे भाई और मां को संभाला है. आज मैं खुश हूं कि वे सभी अब सैटल्ड हैं और मेरा व्यवसाय भी शुरू हो गया है.

आगे की योजनाएं

शीतल अब अपना एक मेकअप और ज्वैलरी की अकादमी सातारा में खोलना चाहती हैं, जिस में छोटे शहरों और गांव की लड़कियां प्रशिक्षण प्राप्त कर आत्मनिर्भर बनें. समय मिलने पर वे खेतों पर काम करती हैं या फिर खुद को अपडेट करती हैं.

इस प्रकार शीतल बाबर की जीवनी, आज की लड़कियों के लिए प्रेरणादायक है, जिस में उन का आत्मविश्वास और दृढ़शक्ति उन्हें आगे ले जा रही है. वे केवल एक व्यवसाय ही नहीं चलातीं, बल्कि आसपास की लड़कियों को वर्कशौप के जरीए आत्मनिर्भर भी बना रही हैं, ताकि वे किसी भी परिस्थिति को बखूबी संभाल सकें.

Shital Babar

Social Story in Hindi: जूता शास्त्र

Social Story in Hindi: पता नहीं लोग कहां से टूटे, फटेपुराने जूते उठा लाते हैं और मंचों पर फेंकने लगते हैं. कुछ को जूते लग भी जाते हैं तो कुछ माइक स्टैंड का सहारा ले कर बच भी जाते हैं. जोश में कुछ लोग अपने नए जूते भी उछाल देते हैं. मैं ने भी बचपन में कई बार इमली और अमिया तोड़ने के लिए पत्थर की जगह चप्पलें उछालीं. पर जब वे चप्पलें पेड़ पर अटक गईं और लाख कोशिशों के बाद भी नीचे नहीं गिरीं, तो चप्पलें उछालना छोड़ दिया, क्योंकि चप्पलों का उछालना कई बार बड़ा महंगा पड़ा.

लोग चप्पलजूतों की जगह सड़े टमाटर और सड़े अंडे उछालते हैं, जो सामने वाले को घायल कम रंगीन अधिक कर देते हैं. महंगाई का जमाना है. पुराने जूते काम आ सकते हैं पर सड़े टमाटर फेंकने के अलावा और किसी काम के नहीं रहते. अब इन्हें कहां फेंका जाए, यह आप की जरूरत पर निर्भर करता है.

सड़कों पर जूते चलना आम बात है. सड़कों पर न चलेंगे तो और कहां चलेंगे? हां, जूते स्वयं नहीं चलते, चलाए जाते हैं. चाहे हाथ से चलाए जाएं या फिर पांव से, पर चलेंगे जरूर. पहले जब जूतों का चलन नहीं था तब जूतों से संबंधित मुहावरे भी नहीं बने थे. एक स्पैशल अस्त्रशस्त्र से भी लोग अछूते थे. लड़ाई के लिए बेशक हाथ में कुछ हो या न हो, पर पैरों में जूते हों तो काम चल जाता है. पैर से निकाला और चालू. चलाने के लिए किसी बटन को दबाने की आवश्यकता नहीं. एक जूता चलता है तो सैकड़ों जूते चलने को बेताब हो जाते हैं.

किसी दिलजले ने औरत को पांव की जूती का खिताब दे दिया, पर वह यह भूल गया कि जब पांव की जूती सिर पर विराजमान होती है तो क्या हश्र होता है.

लोग अपना उल्लू सीधा करने के लिए चांदी का जूता भी चलाते हैं, जिस की मार बड़ी मीठी और सुखदाई होती है. यह तो भुक्तभोगी ही समझ सकता है. वैसे भी आजकल चांदी के दाम आसमान छू रहे हैं.

 

एक बार मैं जूते खरीदने एक दुकान पर गई. छूटते ही दुकानदार ने पूछा, ‘‘बहनजी, कौन से दिखाऊं, पहनने वाले या खाने वाले?’’

पहले मैं जरा चौंकी, फिर उत्सुकता जगी तो बोली, ‘‘और क्याक्या क्वालिटी है? कोई लेटैस्ट ट्रैंड?’’ मुझे भी आनंद आने लगा था.

दुकानदार बोला, ‘‘देखिए मैडम, जूता

खाने की नहीं खिलाने की चीज है. जूता ऐसा शस्त्र है जिस का अपना शास्त्र है,’’ और फिर वह अलगअलग बैंरड के जूते निकाल कर दिखाने लगा.

‘‘देखिए मैडम, यह एक नया बैंरड है, इज्जत उतार जूता. टारगेट को हिट कर के वापस आने की पूरी गारंटी है. आजकल इस की बहुत डिमांड है. यह दूसरा देखिए, जूता नहीं मिसाइल है. बेशर्मों की धज्जियां उड़ा दे, उन्हें धो कर रख दे.’’

मुझे सोच में डूबा देख कर दुकानदार बोला, ‘‘मैडम, जूते किस के लिए लेंगी आप, अपने लिए या साहब के लिए?’’

मैं ने चौंक कर दुकानदार की ओर देखा. उस की आंखों की चमक बता रही थी कि जूतों की खरीदारी में ही समझदारी है. वे चाहे साहब के सिर की सवारी करें या मैडम के पैरों की.

जूतों का ऐसा शास्त्र मेरे सामने पहले नहीं आया था. तभी कुछ सिरफिरे जूता ले कर मंत्रियों पर दौड़ पड़ते हैं. जूता और जूते वाला दोनों रातोंरात प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंच जाते हैं. अंतर्राष्ट्रीय ख्याति वाले बन जाते हैं. संसद में जूतों का चलना मीडिया वाले खूब दिखाते हैं.

जूतों की 3 बहनें जूतियां, चप्पलें और सैंडल हैं, जो अकसर जूतों की मर्दानगी के साथसाथ स्वयं भी 2-4 हाथ आजमा लेती हैं. वैसे ज्यादातर सैंडल, चप्पलें और जूतियां ही शो केस में सजीधजी मुसकराती, ललचाती रहती हैं. किशोरियां उन की मजबूती पर कम, खूबसूरती पर अधिक ध्यान देती हैं, इसीलिए हाथ में कम लेती हैं. जैसे नईनई जूतियां ज्यादा चरमराती हैं, वैसे ही चप्पलें भी जल्दी उखड़ जाती हैं. खैर, यह तो पहननेपहनाने या खरीदने वाले जानें पर मैं तो कहूंगी कि बाप के पैर का जूता अब बेटे के पैर में आ कर गायब होने लगा है. इस का दुनिया में शोर मचा है.

बस, अब जूतों की बात इतनी ही, क्योंकि पतिदेव के हाथों में जूतों का डब्बा मुझे दिखने लगा है. अभीअभी बाजार से लौटे हैं. पता नहीं ऊंट किस करवट बैठे.

Social Story in Hindi

Social Story: अंधेरे उजाले- कैसा था बोल्ड तनवी का फैसला

Social Story: सुदेश अपनी पत्नी तनवी के साथ एक होटल में ठहरा था. होटल के अपने कमरे में टीवी पर समाचार देख वह एकदम परेशान हो उठा. राजस्थान अचानक गुर्जरों की आरक्षण की मांग को ले कर दहक उठा था. वहां की आग गुड़गांव, फरीदाबाद, गाजियाबाद, दनकौर, दादरी, मथुरा, आगरा आदि में फैल गई थी.

वे दोनों बच्चों को घर पर नौकरानी के भरोसे छोड़ कर आए थे. तनवी दिल्ली अपने अर्थशास्त्र के शोध से संबंधित कुछ जरूरी किताबें लेने आई थी. सुदेश उस की मदद को संग आया था. 1-2 दिन में किताबें खरीद कर वे लोग घर वापस लौटने वाले थे लेकिन तभी गुर्जरों का यह आंदोलन छिड़ गया.

अपनी कार से उन्हें वापस लौटना था. रास्ते में नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद का हाईवे पड़ेगा. वाहनों में आगजनी, बसों की तोड़फोड़, रेल की पटरियां उखाड़ना, हिंसा, मारपीट, गोलीबारी, लंबेलंबे जाम…क्या मुसीबत है. बच्चों की चिंता ने दोनों को परेशान कर दिया. उन के लिए अब जल्दी से जल्दी घर पहुंचना जरूरी है.

‘‘क्या होता जा रहा है इस देश को? अपनी मांग मनवाने का यह कौन सा तरीका निकाल लिया लोगों ने?’’ तनवी के स्वर में घबराहट थी.

वोटों की राजनीति, जातिवाद, लोकतंत्र के नाम पर चल रहा ढोंगतंत्र, आरक्षण, गरीबी, बेरोजगारी, बढ़ती आबादी आदि ऐसे मुद्दे थे जिन पर चाहता तो सुदेश घंटों भाषण दे सकता था पर इस वक्त वह अवसर नहीं था. इस वक्त तो उन की पहली जरूरत किसी तरह होटल से सामान समेट कर कार में ठूंस, घर पहुंचना था. उन्हें अपने बच्चों की चिंता लगातार सताए जा रही थी.

फोन पर दोनों बच्चों, वैभव और शुभा से तनवी और सुदेश ने बात कर के हालचाल पूछ लिए थे. नौकरानी से भी बात हो गई थी पर नौकरानी ने यह भी कह दिया था कि साहब, दिल्ली का झगड़ा इधर शहर में भी फैल सकता है… हालांकि अपनी सड़क पर पुलिस वाले गश्त लगा रहे हैं…पर लोगों का क्या भरोसा साहब…

आदमी का आदमी पर से विश्वास ही उठ गया. कैसा विचित्र समय आ गया है. हम सब अपनी विश्वसनीयता खो बैठे हैं. किसी को किसी पर भरोसा नहीं रह गया. कब कौन आदमी हमारे साथ गड़बड़ कर दे, हमें हमेशा यह भय लगा रहता है.

सामान पैक कर गाड़ी में रखा और वे दोनों दिल्ली से एक तरह से भाग लिए ताकि किसी तरह जल्दी से जल्दी घर पहुंचें.

बच्चों की चिंता के कारण सुदेश गाड़ी को तेज रफ्तार से चला रहा था. तनवी खिड़की से बाहर के दृश्य देख रही थी और वह तनवी को देख कर अपने अतीत के बारे में सोचने लगा.

शहर में हो रही एक गोष्ठी में सुदेश मुख्य वक्ता था. गोष्ठी के बाद जलपान के वक्त अनूप उसे पकड़ कर एक युवती के निकट ले गया और बोला, ‘सुदेश, इन से मिलो…मिस तनवी…यहां के प्रसिद्ध महिला महाविद्यालय में अर्थशास्त्र की जानीमानी प्रवक्ता हैं.’

‘मिस’ शब्द से चौंका था सुदेश, एक पढ़ीलिखी, प्रतिष्ठित पद वाली ठीकठाक रंगरूप की युवती का इस उम्र तक ‘मिस’ रहना, इस समाज में मिसफिट होने जैसा लगता है. अब तक मिस ही क्यों? मिसेज क्यों नहीं? यह सवाल सुदेश के दिमाग में कौंध गया था.

‘और मिस तनवी, ये हैं मिस्टर सुदेश कुमार…यहां के महाविद्यालय में समाज- शास्त्र के जानेमाने प्राध्यापक, जातिवाद के घनघोर आलोचक….अखबारों में दलितों, पिछड़ों और गरीबों के जबरदस्त पक्षधर… इस कारण जाति से ब्राह्मण होने के बावजूद लोग इन की पैदाइश को ले कर संदेह जाहिर करते हैं और कहते हैं, जरूर कहीं कुछ गड़बड़ है वरना इन्हें किसी हरिजन परिवार में ही पैदा होना चाहिए था.’

अनूप की बातों पर सुदेश का ध्यान नहीं था पर ‘कुमार’ शब्द उस ने जिस तरह तनवी के सामने खास जोर दे कर उच्चारित किया था उस से वह सोच में पड़ गया था.

अनूप ने कहा, ‘है तो यह अशिष्टता पर मिस तनवी की उम्र 28-29 साल, मिजाज तेजतर्रार, स्वभाव खरा, नकचढ़ा…टूटना मंजूर, झुकना असंभव. इन की विवाह की शर्तें हैं…कास्ट एंड रिलीजन नो बार. पति की हाइट एंड वेट नो च्वाइस. कांप्लेक्शन मस्ट बी फेयर, हायली क्वालीफाइड…सेलरी 5 अंकों में. नेचर एडजस्टेबल. स्मार्ट बट नाट फ्लर्ट. नजरिया आधुनिक, तर्कसंगत, बीवी को जो पांव की जूती न समझे, बराबर की हैसियत और हक दे. दकियानूस और अंधविश्वासी न हो.

अनूप लगातार जिस लहजे में बोले जा रहा था उस से सुदेश को एकदम हंसी आ गई थी और तनवी सहम सी गई थी, ‘अनूपजी, आप पत्रकार लोगों से मैं झगड़ तो सकती नहीं क्योंकि आज झगडं़ूगी, कल आप अखबार में खिंचाई कर के मेरे नाम में पलीता लगा देंगे, तिल होगा तो ताड़ बता कर शहर भर में बदनाम कर देंगे…पर जिस सुदेशजी से मैं पहली बार मिल रही हूं, उन के सामने मेरी इस तरह बखिया उधेड़ना कहां की भलमनसाहत है?’

‘यह मेरी भलमनसाहत नहीं मैडम, आप से रिश्तेदारी निभाना है…असल में आप दोनों का मामला मैं फिट करवाना चाहता हूं…वह नल और दमयंती का किस्सा तो आप ने सुना ही होगा…बेचारे हंस को दोनों के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभानी पड़ी थी…आजकल हंस तो कहीं रह नहीं गए कि नल और दमयंती की जोड़ी बनवा दें. अब तो हम कौए ही रह गए हैं जो यह भूमिका निभा रहे हैं.

‘आप जानती हैं, मेरी शादी हो चुकी है, वरना मैं ही आप से शादी कर लेता…कम से कम एक बंधी हुई रकम कमाने वाली बीवी तो मुझे मिलती. अपने नसीब में तो घरेलू औरत लिखी थी…और अपन ठहरे पत्रकार…कलम घसीट कर जिंदगी घसीटने वाले…हर वक्त हलचल और थ्रिल की दुनिया में रहने वाले पर अपनी निजी जिंदगी एकदम रुटीन, बासी…न कोई रोमांस न रोमांच, न थ्रिल न व्रिल. सिर्फ ड्रिल…लेफ्टराइट, लेफ्ट- राइट करते रहो, कभी यहां कभी वहां, कभी इस की खबर कभी उस की खबर…दूसरों की खबरें छापने वाले हम लोग अपनी खबर से बेखबर रहते हैं.’

बाद में अनूप ने तनवी के बारे में बहुत कुछ टुकड़ोंटुकड़ों में सुदेश को बताया था और उस से ही वह प्रभावित हुआ था. तनवी उसे काफी दबंग, समझदार, बोल्ड युवती लगी थी, एक ऐसी युवती जो एक बार फैसला सोचसमझ कर ले तो फिर उस से वापस न लौटे. सुदेश को ढुलमुल, कमजोर दिमाग की, पढ़ीलिखी होने के बावजूद बेकार के रीतिरिवाजों में फंसी रहने वाली अंधविश्वासी लड़कियां एकदम गंवार और जाहिल लगती थीं, जिन के साथ जिंदगी को सहजता से जीना उसे बहुत कठिन लगता था, इसी कारण उस ने तमाम रिश्ते ठुकराए भी थे. तनवी उसे कई मानों में अपने मन के अनुकूल लगी थी, हालांकि उस के मन में एक दुविधा हमेशा रही थी कि ऐसी दबंग युवती पतिपत्नी के रिश्ते को अहमियत देगी या नहीं? उसे निभाने की सही कोशिश करेगी या नहीं? विवाह एक समझौता होता है, उस में अनेक उतारचढ़ाव आते हैं, जिन्हें बुद्धिमानी से सहन करते हुए बाधाओं को पार करना पड़ता है.

कसबे में तनवी का वह निर्णय खलबली मचा देने वाला साबित हुआ था. देखा जाए तो बात मामूली थी, ऐसी घटनाएं अकसर शादीब्याह में घट जाया करती हैं पर मानमनौवल और समझौतों के बाद बीच का रास्ता निकाल लिया जाता है. तनवी ने बीच के सारे रास्ते अपने फैसले से बंद कर दिए थे.

तनवी की शादी जिस लड़के से तय हुई थी वह भौतिक विज्ञान के एक आणविक संस्थान में काम करने वाला युवक था. बरात दरवाजे पर पहुंची. औपचारिकताओं के लिए दूल्हे को घोड़ी से उतार कर चौकी पर बैठाया गया. लकड़ी की उस चौकी के अचानक एक तरफ के दोनों पाए टूट गए और दूल्हे राजा एक तरफ लुढ़क गए. द्वारचार के उस मौके पर मौजूद बुजुर्गों ने कहा कि यह अपशकुन है. विवाह सफल नहीं होगा. दूल्हे राजा उठे और लकड़ी की उस चौकी में ठोकर मारी, एकदम बौखला कर बोले, ‘ऐसी मनहूस लड़की से मैं हरगिज शादी नहीं करूंगा. इस महत्त्वपूर्ण रस्म में बाधा पड़ी है. अपशकुन हुआ है.’

क्रोध में बड़बड़ाते दूल्हे राजा दरवाजे से लौट गए. ‘मुझे नहीं करनी शादी इस लड़की से,’ उन का ऐलान था. पिता भी बेटे की तरफ. सारे बुजुर्ग भी उस की तरफ. रंग में भंग पड़ गया.

बाद में पता चला कि चौकी बनाने वाले बढ़ई से गलती हो गई थी. जल्दबाजी में एक तरफ के पायों में कीलें ठुकने से रह गई थीं और इस मामूली बात का बतंगड़ बन गया था.

तनवी ने यह सब सुना तो फिर उस ने भी यह कहते हुए शादी से इनकार कर दिया, ‘ऐसे तुनकमिजाज, अंधविश्वासी और गुस्सैल युवक से मैं हरगिज शादी नहीं करूंगी.’

तनवी के इस फैसले ने एक नया बखेड़ा खड़ा कर दिया. लड़के वालों को उम्मीद थी कि लड़की वाले दबाव में आएंगे. अपनी इज्जत का वास्ता देंगे, मिन्नतें करेंगे, लड़की की जिंदगी का सवाल ले कर गिड़गिड़ाएंगे.

तनवी के पिता और मामा लड़के के और उन के परिवार वालों के हाथपांव जोड़ने पहुंचे भी, किसी तरह मामला सुलटने वाला भी था पर तनवी के इनकार ने नई मुसीबत खड़ी कर दी. पिता और मामा ने तनवी को बहुत समझाया पर वह किसी प्रकार उस विवाह के लिए राजी नहीं हुई. उस ने कह दिया, ‘जीवन भर कुंआरी रह लूंगी पर इस लड़के से शादी किसी भी कीमत पर नहीं करूंगी. नौकरी कर रही हूं. कमाखा लूंगी, भूखी नहीं मर जाऊंगी, न किसी पर बोझ बनूंगी. उस का निर्णय अटल है, बदल नहीं सकता.’

कसबे में तमाम चर्चाएं चलने लगीं…लड़की का पहले से किसी लड़के से संबंध है. कसबे के किन्हीं परमानंद बाबू ने इस अफवाह को और हवा दे दी. बताया कि जिस कालिज में तनवी नौकरी करती है, उस के प्रबंधक के लड़के के साथ वह दिल्ली, कोलकाता घूमतीफिरती है. होटलों में अकेली उस के साथ एक ही कमरे में रुकती है. चालचलन कैसा होगा, लोग स्वयं सोच लें. कसबे के भी 2-3 युवकों से उस के संबंध होने की बातें कही जाने लगीं. दूसरे के फटे में अपनी टांग फंसाना कसबाई लोगों को खूब आता है.

पत्रकार अनूप तनवी का रिश्ते में कुछ लगता था. उस विवाह समारोह में वह भी शामिल हुआ था इसलिए उसे सारी घटनाओं और स्थितियों की जानकारी थी.

‘बदनाम हो जाओगी. पूरी जाति- बिरादरी में अफवाह फैल जाएगी. फिर तुम से कौन शादी करेगा?’ मामा ने समझाना चाहा था.

सुदेश ने अनूप से शंका प्रकट की, ‘ऐसी जिद्दी लड़की से शादी कैसे निभेगी, यार?’

‘सुदेशजी, इस बीच गुजरे वक्त ने तनवी को बहुत कुछ समझा दिया होगा. 28-29 साल कुंआरी रह ली. बदनामी झेल ली. नातेरिश्तेदारों से कट कर रह ली. इन सब बातों ने उसे भी समझा दिया होगा कि बेकार की जिद में पड़ कर सहज जीवन नहीं जिया जा सकता. सहज जीवन जीने के लिए हमें अपना स्वभाव नरम रखना पड़ता है. कहीं खुद झुकना पड़ता है, कहीं दूसरे को झुकाने का प्रयत्न करना पड़ता है. इस सिलसिले में तनवी से बहुत बातें हुई हैं मेरी. उसे भी जिंदगी की ऊंचनीच अब समझ में आने लगी है.’

अनूप के इतना कहने पर भी सुदेश के भीतर संदेह का कीड़ा हमेशा रेंगता रहा. एक तरफ तनवी का दृढ़निश्चयी होना सुदेश को प्रभावित करता था. दूसरी तरफ उस का अडि़यल रवैया उसे शंकालु भी बनाता था.

अपनी सारी शंकाओं को उस दिन रिश्ता पक्का करने से पहले सुदेश ने अनूप के सामने तनवी पर जाहिर भी कर दिया था. तनवी सचमुच गंभीर थी, ‘मैं जैसी हूं, आप जान चुके हैं. विवाह का मतलब मैं अच्छी तरह जानती हूं. बिना समझौते व सामंजस्य के जीवन को नहीं जिया जा सकता, यह भी समझ गई हूं. मेरी ओर से आप को कभी शिकायत का मौका नहीं मिलेगा.’

‘विवाहित जिंदगी में छोटीमोटी नोकझोंक, झगड़े, विवाद होने स्वाभाविक हैं. मैं कोशिश करूंगा, तुम्हारी कसबाई घटनाओं को कभी बीच में न दोहराऊं…उन बातों को तूल न दूं जो बीत चुकी हैं.’

‘मैं भी कोशिश करूंगी, जिंदगी पूरी तरह नए सिरे से, नई उमंग और नए उत्साह के साथ शुरू करूं…इतिहास दोहराने के लिए नहीं होता, दफन करने के लिए होता है.’

मुसकरा दिया था सुदेश और अनूप भी खुश हो गया था.

अचानक तनवी ने कुछ पूछा तो अतीत की यादों में खोया सुदेश उसे देख कर हंस दिया.

उन की शादी को पूरे 8 साल गुजर गए थे. 2 बच्चे थे. शुभा 7 साल की, वैभव 5 साल का. ऐसा नहीं है कि इन 8 सालों में उन के बीच झगड़े नहीं हुए, विवाद नहीं हुए. पर पुराने गड़े मुर्दे जानबूझ कर न सुदेश ने उखाड़े न तनवी ने उन्हें उखड़ने दिया. जीवन के अंधेरे- उजाले संगसंग गुजारे.

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Family Kahani: जन्मपत्री- बूआ के मनसूबों पर कैसे पानी फिर गया

Family Kahani: ‘‘ये  लो और क्या चाहिए…पूरे 32 गुण मिल गए हैं,’’

गंगा बूआ ने बड़े गर्व से डाइनिंग टेबल पर नाश्ता करते हुए त्रिवेदी परिवार के सामने रश्मि की जन्मपत्री रख दी.

‘‘आप हांफ क्यों रही हैं? बैठिए तो सही…’’ चंद्रकांत त्रिवेदी ने खाली कुरसी की ओर इशारा करते हुए कहा.

‘‘चंदर, तू तो बस बात ही मत कर. जाने कौन सा राजकुमार ढूंढ़ कर लाएगा बेटी के लिए. कितने रिश्ते ले कर आई हूं…एक भी पसंद नहीं आता. अरे, नाक पर मक्खी ही नहीं बैठने देते तुम लोग… बेटी को बुड्ढी करोगे क्या घर में बिठा कर…?’’ गोपू के हाथ से पानी का गिलास ले कर बूआ गटगट गटक गईं.

चंद्रकांत, रश्मि और उस का भाई विक्की यानी विकास मजे से कुरकुरे टोस्ट कुतरते रहे. मुसकराहट उन के चेहरों पर पसरी रही पर चंद्रकांत त्रिवेदी की पत्नी स्मिता की आंखें गीली हो आईं. आखिर 27 वर्ष की हो गई है उन की बेटी. पीएच.डी. कर चुकी है. डिगरी कालेज में लेक्चरर हो गई है. अब क्या…घर पर ही बैठी रहेगी?

चंद्रकांत ने तो जाने कितने लड़के बताए अपनी पत्नी को पर स्मिता जिद पर अड़ी ही रहीं कि जब तक लड़के के पूरे गुण नहीं मिलेंगे तब तक रश्मि के रिश्ते का सवाल ही नहीं उठता. जो कोई लड़का मिलता स्मिता को कोई न कोई कमी उस में दिखाई दे जाती. चंद्रकांत परेशान हो गए थे. वे शहर के जानेमाने उद्योगपति थे. स्टील की 4 फैक्टरियों के मालिक थे. उन की बेटी के लिए कितने ही रिश्ते लाइन में खड़े रहते पर पत्नी थीं कि हर रिश्ते में कोई न कोई अड़ंगा लगा देतीं और उन का साथ देतीं गंगा बूआ.

गंगा बूआ 80 साल से ऊपर की हो गई होंगी. चंद्रकांत ने तो अपने बचपन से उन्हें यहीं देखा था. उन के पिता शशिकांत त्रिवेदी की छोटी बहन हैं गंगा बूआ. बचपन में ही बूआ का ब्याह हो गया था. ब्याह हुआ और 15 वर्ष की उम्र में ही वह विधवा हो गई थीं. मातापिता तो पहले ही चल बसे थे, अत: अपने इकलौते भाई के पास ही वे अपना जीवन व्यतीत कर रही थीं.

घर में कोई कमी तो थी नहीं. अंगरेजों के जमाने से 2-3 गाडि़यां, महल सी कोठी, नौकरचाकर सबकुछ उन के पिता के पास था. फिर शशिकांत इतने प्रबुद्ध निकले कि जयपुर शहर के पहले आई.ए.एस. अफसर बने. उन के ही पुत्र चंद्रकांत हैं. चंद्रकांत की पत्नी स्मिता वैसे तो शिक्षित है, एम.ए. पास हैं पर न जाने उन के और गंगा बूआ के बीच क्या खिचड़ी पकती रहती है कि स्मिता की हंसी ही गायब हो गई है. उन्हें हर पल अपनी बेटी की ही चिंता सताती रहती है. चंद्रकांत ने अपनी बूआ के साथ अपनी पत्नी को हमेशा खुसरपुसर करते ही पाया है.

गंगा बूआ के मन में यह विश्वास पत्थर की लकीर सा बन गया है कि उन का वैधव्य उन की जन्मपत्री न मिलाने के कारण ही हुआ है. उन के पिता व भाई आर्यसमाजी विचारों के थे और कुंडली आदि मिलाने में उन का कोई विश्वास नहीं था. शशिकांत के बहुत करीबी दोस्त सेठ रतनलाल शर्मा ने अपने बेटे संयोग के लिए गंगा बूआ को मांग लिया था और फिर बिना किसी सामाजिक दिखावे के उन का विवाह संयोग से कर दिया गया था. शर्माजी का विचार था कि वे अपनी पुत्रवधू को बिटिया से भी अधिक स्नेह व ममता से सींचेंगे और उस को अच्छी से अच्छी शिक्षा देंगे, लेकिन विवाह के 8 दिन भी नहीं हुए थे कि कोठी के बड़े से बगीचे में नवविवाहित संयोग सांप के काटने से मर गया. जुड़वां भाई सुयोग चीखें मारमार कर अपने मरे भाई को झंझोड़ रहा था. पल भर में ही पूरा वातावरण भय और दुख का पर्याय बन गया था.

गंगोत्तरी ठीक से विवाह का मतलब भी कहां समझ पाई थी तबतक कि वैधव्य की कालिमा ने उसे निगल लिया. कुछ दिन तक वह ससुराल में रही. सेठ रतनलाल के परिवार के लोगों ने गंगोत्तरी का ध्यान रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी परंतु वहां वह बहुत भयभीत हो गई थी. मस्तिष्क पर इस दुर्घटना का इतना भयानक प्रभाव पड़ा था कि रात को सोतेसोते भी वह बहकीबहकी बातें करने लगी. थक कर इस शर्त पर उसे उस के मातापिता के पास भेज दिया गया कि वह उन की अमानत के रूप में वहां रहेगी.

गंगोत्तरी की पढ़ाई फिर शुरू करवा दी गई. कुछ सालों बाद शर्माजी ने संयोग के जुड़वां भाई सुयोग से उस का विवाह करने का प्रस्ताव रखा. कुछ समय तक सोचनेसमझने के बाद त्रिवेदी परिवार ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया परंतु गंगोत्तरी ने जो ‘न’ की हठ पकड़ी तो छोड़ने का नाम ही नहीं लिया.

बहुत समझाया गया उसे पर तबतक वह काफी समझदार हो चुकी थी और उसे विवाह व वैधव्य का अर्थ समझ में आने लगा था. उस का कहना था कि एक बार उस के साथ जो हुआ वही उस की नियति है, बस…अब वह पढ़ेगी और शिक्षिका बन कर जीवनयापन करेगी. फिर किसी ने उस से अधिक जिद नहीं की. इस प्रकार मातापिता की मृत्यु के बाद भी गंगोत्तरी इसी घर में रह गई. चंद्रकांत से ले कर उन के बच्चे, घर के नौकरचाकर, यहां तक कि पड़ोसी भी उन्हें प्यार से गंगा बूआ कह कर पुकारने लगे थे.

यद्यपि गंगा बूआ अब काफी बूढ़ी होे गई हैं, फिर भी घर की हर समस्या के साथ वे जुड़ी रहती हैं. उन्होंने स्मिता को अपना उदाहरण दे कर बड़े विस्तार से समझा दिया था कि घर की इकलौती लाड़ली रश्मि का विवाह बिना जन्मपत्री मिलाए न करे. बस, स्मिता के दिलोदिमाग पर गंगा बूआ की बात इतनी गहरी समा गई कि जब भी उन के पति किसी रिश्ते की बात करते वे गंगा बूआ की ओट में हो जातीं. उन्होंने ही गंगा बूआ को हरी झंडी दिखा रखी थी कि वे स्वयं जा कर पीढि़यों से चले आ रहे पंडितों के उस परिवार के श्रेष्ठ पंडित से जन्मपत्रियों का मिलान करवाएं जिसे बूआ शहर का श्रेष्ठ पंडित समझती हैं. वैसे स्मिता का विवाह भी तो बिना जन्मपत्री मिलाए हुआ था और वह बहुत सुखी थीं पर रश्मि के मामले में गंगा बूआ ने न जाने उन्हें क्या घुट्टी पिला दी थी कि बस…

आज गंगा बूआ सुबह ही नहाधो कर ड्राइवर को साथ ले कर निकल गई थीं. बूआ बेशक विधवा थीं, पर सदा ठसक से रहती थीं. ड्राइवर के बिना घर से बाहर न निकलतीं. उन के पहनावे इतने लकदक होते जो उन के व्यक्तित्व में चार चांद लगा देते थे. कहीं भी बिना जन्मपत्री मिलाए विवाह की बात होती तो वे अपना मंतव्य प्रकट किए बिना न रहतीं.

घर के सदस्य बेशक गंगा बूआ की इस बात से थोड़ा नाराज रहते पर कोई भी उन का अपमान नहीं कर सकता था. सब मन ही मन हंसते, बुदबुदाते रहते, ‘आज फिर गंगा बूआ रश्मि की जन्मपत्री किसी से मिलवा कर लाई होंगी…’ सब ने मन ही मन सोचा.

गोपू ने बूआ के सामने नाश्ते की प्लेट रख दी थी और टोस्टर में से टोस्ट निकाल कर मक्खन लगा रहा था, तभी बूआ बोलीं, ‘‘अरे, गोपू, मैं किस के दांतों से खाऊंगी ये कड़क टोस्ट, ला, मुझे बिना सिंकी ब्रेड और बटरबाउल उठा दे और हां, मेरा दलिया कहां है?’’

गोपू ने बूआ के सामने उन का नाश्ता ला कर रख दिया. आज बूआ कुछ अलग ही मूड में थीं.

‘‘क्यों स्मिता, तुम क्यों चुप हो और तुम्हारा चेहरा इतना फीका क्यों पड़ गया है?’’ बूआ ने एक चम्मच दलिया मुंह में रखते हुए स्मिता की ओर रुख किया.

स्मिता कुछ बोली तो नहीं…एक नजर बूआ पर डाल कर मानो उन से आंखों ही आंखों में कुछ कह डाला.

‘‘देखो चंदर, मैं ने इस लड़के के परिवार को शाम की चाय पर बुला लिया है…’’ उन्होंने अपने बैग से लड़के का फोटो निकाल कर चंद्रकांत की ओर बढ़ाया.

‘‘पर बूआ आप पहले रश्मि से तो पूछ लीजिए कि वह शाम को घर पर रहेगी भी या नहीं,’’ चंद्रकांत ने धीरे से बूआजी के सामने यह बात रख दी, ‘‘और हां, यह भी बूआजी कि उसे यह लड़का पसंद भी है या नहीं,’’

‘‘देखो चंदर, आज 3 साल से लड़के की तलाश हो रही है पर इस के लिए कोई अच्छे गुणों वाला लड़का ही नहीं मिलता. और ये बात तो तय है कि बिना कुंडली मिलाए न तो मैं राजी होऊंगी और न ही स्मिता, क्यों स्मिता?’’ एक बार फिर बूआ ने स्मिता की ओर नजर घुमाई.

स्मिता चुप थीं.

नाश्ता कर के सब उठ गए और अपनेअपने कमरों में जाने लगे.

‘‘मैं जरा आराम कर लूं…थक गई हूं,’’ इतना बोल कर बूआ ने भी अपना बैग समेटा, ‘‘स्मिता, बाद में मेरे कमरे में आना.’’ बूआजी का यह आदेश स्मिता को था.

तभी चंद्रकांत ने पत्नी की ओर देख कर कहा, ‘‘स्मिता, तुम जरा कमरे में चलो. तुम से कुछ जरूरी बात करनी है.’’

स्मिता आंखें नीची कर के बूआ की ओर देखती हुई पति के पीछे चल दीं. बूआ को लगा, कुछ तो गड़बड़ है. वातावरण की दबीदबी खामोशी और स्मिता की दबीदबी चुप्पी के पीछे मानो कोई गहरा राज झांक रहा था.

वे सुबह से उठ कर, नित्य कर्म से निवृत्त हो कर बाहर निकलने में ऐसी निढाल हो गई थीं कि कुछ अधिक सोचविचार किए बिना उन्होंने अपने कमरे में जा कर स्वयं को पलंग पर डाल दिया. आज वैसे भी रविवार था. सब घर पर ही रहने वाले थे. थोड़ा आराम कर के लंच पर बात करेंगी. शाम को आने का न्योता तो दे आई हैं पर ‘मीनूवीनू’ तो तय करना होगा न. बूआजी बड़ी चिंतित थीं.

गंगा बूआ पूरे जोशोखरोश में थीं. उत्साह उन के भीतर पंख फड़फड़ा रहा था पर थकान थी कि उम्र की हंसी उड़ाने लगी थी. पलंग पर पहुंचते ही न जाने कब उन की आंख लग गई. जब वे सो कर उठीं तो दोपहर के साढ़े 3 बजे थे.

‘कितना समय हो गया. मुझे किसी ने उठाया भी नहीं,’ बूआ बड़बड़ाती हुई कपड़े संभालती कमरे से बाहर निकलीं.

‘‘अरे, गोपू, कमली…कहां गए सब के सब…और आज खाने पर भी नहीं उठाया मुझे,’’ बूआ नौकरों को पुकारती हुई रसोईघर की ओर चल दीं. उन्हें गोपू दिखाई दिया, ‘‘गोपू, मुझे खाने के लिए भी नहीं उठाया. और सब लोग कहां हैं?’’

‘‘जी बूआ, आज किसी ने भी खाना नहीं खाया और सब बाहर गए हैं,’’ गोपू का उत्तर था.

‘बाहर गए हैं? मुझे बताया भी नहीं,’ बूआ अपने में ही बड़बड़ाने लगी थीं.

‘‘बूआजी, मैं महाराज को बोलता हूं आप का खाना लगाने के लिए. आप बैठें,’’ यह कहते हुए गोपू रसोईघर की ओर चला गया.

कुछ अनमने मन से बूआ वाशबेसिन पर गईं, मुंह व आंखों पर पानी के छींटे मारते हुए उन्होंने बेसिन पर लगे शीशे में अपना चेहरा देखा. थकावट अब भी उन के चेहरे पर विराजमान थी. नैपकिन से हाथ पोंछ कर वे मेज पर आ बैठीं. गोपू गरमागरम खाना ले आया था.

खाना खातेखाते उन्हें याद आया कि वे पंडितजी से कह आई थीं कि घर पर चर्चा कर के वे लड़के वालों को निमंत्रण देने के लिए चंदर से फोन करवा देंगी. आखिर लड़की का बाप है, फर्ज बनता है उस का कि वह फोन कर के लड़के वालों को घर आने का निमंत्रण दे. खाना खातेखाते बूआ सोचने लगीं कि न जाने कहां चले गए सब लोग…अभी तो उन्हें सब के साथ बैठ कर मेहमानों की आवभगत के लिए तैयारी करवानी थी.

‘खाना खा कर चंदर को फोन करूंगी,’ बूआ ने सोचा और जल्दीजल्दी खाना खा कर जैसे ही कुरसी से खड़ी हुईं कि उन की नजर ने ‘ड्राइंगरूम’ के मुख्यद्वार से परिवार के सारे सदस्यों  को घर में प्रवेश करते हुए देखा.

और…यह क्या, रश्मि ने दुलहन का लिबास पहन रखा है? उन्हें आश्चर्य हुआ और वे उन की ओर बढ़ गईं. स्मिता के अलावा परिवार के सभी सदस्यों के चेहरे पर हंसी थी और आंखों में चमक.

‘‘लो, बूआजी भी आ गईं,’’ चंद्रकांत ने एक लंबे, गोरेचिट्टे, सुदर्शन व्यक्तित्व के लड़के को बूआजी के सामने खड़ा कर दिया.

‘‘रश्मिज ग्रैंड मदर,’’ चंद्रकांत ने कहा तो युवक ने आगे बढ़ कर बूआ के चरणस्पर्श कर लिए.

गंगा बूआ हकबका सी गई थीं.

‘‘बूआजी, यह सैमसन जौन है. आज होटल ‘हैवन’ में इस की रश्मि से शादी है. चलिए, सब को वहां पहुंचना है.’’

‘‘पर…ये…वो जन्मपत्री…’’ बूआजी हकबका कर बोलीं, फिर स्मिता पर नजर डाली. उस का चेहरा उतरा हुआ था.

‘‘अरे, बूआजी, जन्मपत्री तो इन की ऊपर वाले ने मिला कर भेजी है. चिंता मत करिए. चलिए, जल्दी तैयार हो जाइए. सैमसन के मातापिता भी होटल में ठहरे हैं. उन से भी मिलना है. फिर वे लोग अमेरिका वापस लौट जाएंगे.’’

चंद्रकांत बड़े उत्साहित थे. फिर बोले, ‘‘देखिएगा, किस धूमधाम से भारतीय रिवाज के अनुसार शादी होगी.’’

बूआजी किंकर्तव्यविमूढ़ सी खड़ी रह गई थीं. उन की नजर में रश्मि की जन्मपत्री के टुकड़े हवा में तैर रहे थे.

Family Kahani

Romantic Story in Hindi: मौन- एक नए रिश्ते की अनकही जबान

Romantic Story in Hindi: सर्द मौसम था, हड्डियों को कंपकंपा देने वाली ठंड. शुक्र था औफिस का काम कल ही निबट गया था. दिल्ली से उस का मसूरी आना सार्थक हो गया था. बौस निश्चित ही उस से खुश हो जाएंगे.

श्रीनिवास खुद को काफी हलका महसूस कर रहा था. मातापिता की वह इकलौती संतान थी. उस के अलावा 2 छोटी बहनें थीं. पिता नौकरी से रिटायर्ड थे. बेटा होने के नाते घर की जिम्मेदारी उसे ही निभानी थी. वह बचपन से ही महत्त्वाकांक्षी रहा है. मल्टीनैशनल कंपनी में उसे जौब पढ़ाई खत्म करते ही मिल गई थी. आकर्षक व्यक्तित्व का मालिक तो वह था ही, बोलने में भी उस का जवाब नहीं था. लोग जल्दी ही उस से प्रभावित हो जाते थे. कई लड़कियों ने उस से दोस्ती करने की कोशिश की लेकिन अभी वह इन सब पचड़ों में नहीं पड़ना चाहता था.

श्रीनिवास ने सोचा था मसूरी में उसे 2 दिन लग जाएंगे, लेकिन यहां तो एक दिन में ही काम निबट गया. क्यों न कल मसूरी घूमा जाए. श्रीनिवास मजे से गरम कंबल में सो गया.

अगले दिन वह मसूरी के माल रोड पर खड़ा था. लेकिन पता चला आज वहां टैक्सी व बसों की हड़ताल है.

‘ओफ, इस हड़ताल को भी आज ही होना था,’ श्रीनिवास अभी सोच में पड़ा ही था कि एक टैक्सी वाला उस के पास आ कानों में फुसफुसाया, ‘साहब, कहां जाना है.’

‘अरे भाई, मसूरी घूमना था लेकिन इस हड़ताल को भी आज होना था.’

‘कोई दिक्कत नहीं साहब, अपनी टैक्सी है न. इस हड़ताल के चक्कर में अपनी वाट लग जाती है. सरजी, हम आप को घुमाने ले चलते हैं लेकिन आप को एक मैडम के साथ टैक्सी शेयर करनी होगी. वे भी मसूरी घूमना चाहती हैं. आप को कोई दिक्कत तो नहीं,’ ड्राइवर बोला.

‘कोई चारा भी तो नहीं. चलो, कहां है टैक्सी.’

ड्राइवर ने दूर खड़ी टैक्सी के पास खड़ी लड़की की ओर इशारा किया.

श्रीनिवास ड्राइवर के साथ चल पड़ा.

‘हैलो, मैं श्रीनिवास, दिल्ली से.’

‘हैलो, मैं मनामी, लखनऊ से.’

‘मैडम, आज मसूरी में हम 2 अनजानों को टैक्सी शेयर करना है. आप कंफर्टेबल तो रहेंगी न.’

‘अ…ह थोड़ा अनकंफर्टेबल लग तो रहा है पर इट्स ओके.’

इतने छोटे से परिचय के साथ गाड़ी में बैठते ही ड्राइवर ने बताया, ‘सर, मसूरी से लगभग 30 किलोमीटर दूर टिहरी जाने वाली रोड पर शांत और खूबसूरत जगह धनौल्टी है. आज सुबह से ही वहां बर्फबारी हो रही है. क्या आप लोग वहां जा कर बर्फ का मजा लेना चाहेंगे?’

मैं ने एक प्रश्नवाचक निगाह मनामी पर डाली तो उस की भी निगाह मेरी तरफ ही थी. दोनों की मौन स्वीकृति से ही मैं ने ड्राइवर को धनौल्टी चलने को हां कह दिया.

गूगल से ही थोड़ाबहुत मसूरी और धनौल्टी के बारे में जाना था. आज प्रत्यक्षरूप से देखने का पहली बार मौका मिला है. मन बहुत ही कुतूहल से भरा था. खूबसूरत कटावदार पहाड़ी रास्ते पर हमारी टैक्सी दौड़ रही थी. एकएक पहाड़ की चढ़ाई वाला रास्ता बहुत ही रोमांचकारी लग रहा था.

बगल में बैठी मनामी को ले कर मेरे मन में कई सवाल उठ रहे थे. मन हो रहा था कि पूछूं कि यहां किस सिलसिले में आई हो, अकेली क्यों हो. लेकिन किसी अनजान लड़की से एकदम से यह सब पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था.

मनामी की गहरी, बड़ीबड़ी आंखें उसे और भी खूबसूरत बना रही थीं. न चाहते हुए भी मेरी नजरें बारबार उस की तरफ उठ जातीं.

मैं और मनामी बीचबीच में थोड़ा बातें करते हुए मसूरी के अनुपम सौंदर्य को निहार रहे थे. हमारी गाड़ी कब एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर पहुंच गई, पता ही नहीं चल रहा था. कभीकभी जब गाड़ी को हलका सा ब्रेक लगता और हम लोगों की नजरें खिड़की से नीचे जातीं तो गहरी खाई देख कर दोनों की सांसें थम जातीं. लगता कि जरा सी चूक हुई तो बस काम तमाम हो जाएगा.

जिंदगी में आदमी भले कितनी भी ऊंचाई पर क्यों न हो पर नीचे देख कर गिरने का जो डर होता है, उस का पहली बार एहसास हो रहा था.

‘अरे भई, ड्राइवर साहब, धीरे… जरा संभल कर,’ मनामी मौन तोड़ते हुए बोली.

‘मैडम, आप परेशान मत होइए. गाड़ी पर पूरा कंट्रोल है मेरा. अच्छा सरजी, यहां थोड़ी देर के लिए गाड़ी रोकता हूं. यहां से चारों तरफ का काफी सुंदर दृश्य दिखता है.’

बचपन में पढ़ते थे कि मसूरी पहाड़ों की रानी कहलाती है. आज वास्तविकता देखने का मौका मिला.

गाड़ी से बाहर निकलते ही हाड़ कंपा देने वाली ठंड का एहसास हुआ. चारों तरफ से धुएं जैसे उड़ते हुए कोहरे को देखने से लग रहा था मानो हम बादलों के बीच खड़े हो कर आंखमिचौली खेल रहे होें. दूरबीन से चारों तरफ नजर दौड़ाई तो सोचने लगे कहां थे हम और कहां पहुंच गए.

अभी तक शांत सी रहने वाली मनामी धीरे से बोल उठी, ‘इस ठंड में यदि एक कप चाय मिल जाती तो अच्छा रहता.’

‘चलिए, पास में ही एक चाय का स्टौल दिख रहा है, वहीं चाय पी जाए,’ मैं मनामी से बोला.

हाथ में गरम दस्ताने पहनने के बावजूद चाय के प्याले की थोड़ी सी गरमाहट भी काफी सुकून दे रही थी.मसूरी के अप्रतिम सौंदर्य को अपनेअपने कैमरों में कैद करते हुए जैसे ही हमारी गाड़ी धनौल्टी के नजदीक पहुंचने लगी वैसे ही हमारी बर्फबारी देखने की आकुलता बढ़ने लगी. चारों तरफ देवदार के ऊंचेऊंचे पेड़ दिखने लगे थे जो बर्फ से आच्छादित थे. पहाड़ों पर ऐसा लगता था जैसे किसी ने सफेद चादर ओढ़ा दी हो. पहाड़ एकदम सफेद लग रहे थे.

पहाड़ों की ढलान पर काफी फिसलन होने लगी थी. बर्फ गिरने की वजह से कुछ भी साफसाफ नहीं दिखाई दे रहा था. कुछ ही देर में ऐसा लगने लगा मानो सारे पहाड़ों को प्रकृति ने सफेद रंग से रंग दिया हो. देवदार के वृक्षों के ऊपर बर्फ जमी पड़ी थी, जो मोतियों की तरह अप्रतिम आभा बिखेर रही थी.

गाड़ी से नीचे उतर कर मैं और मनामी भी गिरती हुई बर्फ का भरपूर आनंद ले रहे थे. आसपास अन्य पर्यटकों को भी बर्फ में खेलतेकूदते देख बड़ा मजा आ रहा था.

‘सर, आज यहां से वापस लौटना मुमकिन नहीं होगा. आप लोगों को यहीं किसी गैस्टहाउस में रुकना पड़ेगा,’ टैक्सी ड्राइवर ने हमें सलाह दी.

‘चलो, यह भी अच्छा है. यहां के प्राकृतिक सौंदर्य को और अच्छी तरह से एंजौय करेंगे,’ ऐसा सोच कर मैं और मनामी गैस्टहाउस बुक करने चल दिए.

‘सर, गैस्टहाउस में इस वक्त एक ही कमरा खाली है. अचानक बर्फबारी हो जाने से यात्रियों की संख्या बढ़ गई है. आप दोनों को एक ही रूम शेयर करना पड़ेगा,’ ड्राइवर ने कहा.

‘क्या? रूम शेयर?’ दोनों की निगाहें प्रश्नभरी हो कर एकदूसरे पर टिक गईं. कोई और रास्ता न होने से फिर मौन स्वीकृति के साथ अपना सामान गैस्टहाउस के उस रूम में रखने के लिए कह दिया.

गैस्टहाउस का वह कमरा खासा बड़ा था. डबलबैड लगा हुआ था. इसे मेरे संस्कार कह लो या अंदर का डर. मैं ने मनामी से कहा, ‘ऐसा करते हैं, बैड अलगअलग कर बीच में टेबल लगा लेते हैं.’

मनामी ने भी अपनी मौन सहमति दे दी.

हम दोनों अपनेअपने बैड पर बैठे थे. नींद न मेरी आंखों में थी न मनामी की. मनामी के अभी तक के साथ से मेरी उस से बात करने की हिम्मत बढ़ गई थी. अब रहा नहीं जा रहा था,  बोल पड़ा, ‘तुम यहां मसूरी क्या करने आई हो.’

मनामी भी शायद अब तक मुझ से सहज हो गई थी. बोली, ‘मैं दिल्ली में रहती हूं.’

‘अच्छा, दिल्ली में कहां?’

‘सरोजनी नगर.’

‘अरे, वाट ए कोइनस्टिडैंट. मैं आईएनए में रहता हूं.’

‘मैं ने हाल ही में पढ़ाई कंप्लीट की है. 2 और छोटी बहनें हैं. पापा रहे नहीं. मम्मी के कंधों पर ही हम बहनों का भार है. सोचती थी जैसे ही पढ़ाई पूरी हो जाएगी, मम्मी का भार कम करने की कोशिश करूंगी, लेकिन लगता है अभी वह वक्त नहीं आया.

‘दिल्ली में जौब के लिए इंटरव्यू दिया था. उन्होंने सैकंड इंटरव्यू के लिए मुझे मसूरी भेजा है. वैसे तो मेरा सिलैक्शन हो गया है, लेकिन कंपनी के टर्म्स ऐंड कंडीशंस मुझे ठीक नहीं लग रहीं. समझ नहीं आ रहा क्या करूं?’

‘इस में इतना घबराने या सोचने की क्या बात है. जौब पसंद नहीं आ रही तो मत करो. तुम्हारे अंदर काबिलीयत है तो जौब दूसरी जगह मिल ही जाएगी. वैसे, मेरी कंपनी में अभी न्यू वैकैंसी निकली हैं. तुम कहो तो तुम्हारे लिए कोशिश करूं.’

‘सच, मैं अपना सीवी तुम्हें मेल कर दूंगी.’

‘शायद, वक्त ने हमें मिलाया इसलिए हो कि मैं तुम्हारे काम आ सकूं,’ श्रीनिवास के मुंह से अचानक निकल गया. मनामी ने एक नजर श्रीकांत की तरफ फेरी, फिर मुसकरा कर निगाहें झुका लीं.

श्रीनिवास का मन हुआ कि ठंड से कंपकंपाते हुए मनामी के हाथों को अपने हाथों में ले ले लेकिन मनामी कुछ गलत न समझ ले, यह सोच रुक गया. फिर कुछ सोचता हुआ कमरे से बाहर चला गया.

सर्दभरी रात. बाहर गैस्टहाउस की छत पर गिरते बर्फ से टपकते पानी की आवाज अभी भी आ रही है. मनामी ठंड से सिहर रही थी कि तभी कौफी का मग बढ़ाते हुए श्रीनिवास ने कहा, ‘यह लीजिए, थोड़ी गरम व कड़क कौफी.’

तभी दोनों के हाथों का पहला हलका सा स्पर्श हुआ तो पूरा शरीर सिहर उठा. एक बार फिर दोनों की नजरें टकरा गईं. पूरे सफर के बाद अभी पहली बार पूरी तरह से मनामी की तरफ देखा तो देखता ही रह गया. कब मैं ने मनामी के होंठों पर चुंबन रख दिया, पता ही नहीं चला. फिर मौन स्वीकृति से थोड़ी देर में ही दोनों एकदूसरे की आगोश में समा गए.

सांसों की गरमाहट से बाहर की ठंड से राहत महसूस होने लगी. इस बीच मैं और मनामी एकदूसरे को पूरी तरह कब समर्पित हो गए, पता ही नहीं चला. शरीर की कंपकपाहट अब कम हो चुकी थी. दोनों के शरीर थक चुके थे पर गरमाहट बरकरार थी.

रात कब गुजर गई, पता ही नहीं चला. सुबहसुबह जब बाहर पेड़ों, पत्तों पर जमी बर्फ छनछन कर गिरने लगी तो ऐसा लगा मानो पूरे जंगल में किसी ने तराना छेड़ दिया हो. इसी तराने की हलकी आवाज से दोनों जागे तो मन में एक अतिरिक्त आनंद और शरीर में नई ऊर्जा आ चुकी थी. मन में न कोई अपराधबोध, न कुछ जानने की चाह. बस, एक मौन के साथ फिर मैं और मनामी साथसाथ चल दिए.

Romantic Story in Hindi

Family Story in Hindi: मुंहबोली बहनें

Family Story in Hindi: आज अनाइका के मुंह से यह सुन कर कि कल रोहन भैया उस के घर गए थे, मेरा दिमाग खराब हो गया. मैं ने मन ही मन तय किया कि आज कालेज से सीधा ताईजी के घर जाऊंगी और रोहन भैया की अच्छी खबर लूंगी. नाक में दम कर रखा है भैया ने अपनी हरकतों से. लाख बार समझा चुकी हूं उन्हें, पर उन के कान पर जूं तक नहीं रेंगती.

अपनी इज्जत का तो फालूदा बना ही रहे हैं साथ ही मेरी भी छीछालेदर करवा रहे हैं. कालेज में सारा दिन मैं तमतमाई सी ही रही और कालेज छूटते ही मैं ने अपनी स्कूटी ताईजी के घर की ओर मोड़ ली. ताईजी मुझे देख कर बहुत खुश हुईं, ‘‘अरे सोनाली, तू इस समय? लगता है सीधा कालेज से ही आ रही है, तब तो तुझे भी जोर की भूख लगी होगी. चल, फटाफट हाथमुंह धो कर आ जा, मैं रोहन का खाना ही लगाने जा रही थी, वह भी बस अभीअभी कालेज से आया है.’’

‘‘ताईजी, खाना तो आप रोहन भैया को ही खिलाइए, मैं तो आज उन का खून पी कर ही अपना पेट भरूंगी,’’ कह कर मैं धड़धड़ाती हुई रोहन भैया के कमरे में घुस गई. ‘‘अरे मम्मा, आप ने इस भूखी शेरनी को मेरे कमरे में क्यों भेज दिया? यह तो लगता है मुझे कच्चा ही चबाने आई है,’’ मेरे तेवर और हावभाव देख कर रोहन भैया पलंग और कुरसी लांघते हुए भाग कर किचन में ताईजी की बगल में आ खड़े हुए.

‘‘ताईजी, आप रोहन भैया को समझा दीजिए, मेरा दिमाग और खराब न करें वरना मैं या तो इन्हें जान से मार डालूंगी या खुद आत्महत्या कर लूंगी, पक गई हूं मैं इन की हरकतों से.’’ ‘‘बहन, तू मुझे मारने का आइडिया दिमाग से निकाल दे, उस में काफी प्लानिंग की जरूरत पड़ेगी, ऐसा कर तू ही आत्महत्या कर ले, वही तेरे लिए सरल और परिवार के लिए कम दुखद होगा. मेरे पीछे क्यों पड़ी है तू? और हां, तुझे रस्सी, चूहा मारने की दवा या रेल समयसारिणी जो भी चाहिए बता देना, मैं सब उपलब्ध करा दूंगा. मेरे होते हुए तू भागदौड़ न करना,’’ रोहन भैया ने ऐसा कह कर मेरे गुस्से की आग में 4 चम्मच घी और उड़ेल दिए.

‘‘देखा ताईजी, कैसा जी जलाते हैं, भैया. आप भी इन्हें कुछ नहीं कहतीं इसीलिए तो बिगड़ते जा रहे हैं.’’ ‘‘हुआ क्या है, पहले तू मुझे कुछ बताए, तब तो मैं समझूं. तू तो जब से आई है बस, खूनखराबे की ही बातें किए जा रही है. मैं कुछ समझूं तब तो कुछ बोलूं,’’ ताईजी हंसते हुए बोलीं.

‘‘ताईजी, आप इन्हें समझा दीजिए कि मेरी सहेलियों का पीछा करना छोड़ दें,’’ सोनाली गुस्से से बोली. ‘‘ओए कद्दू, कौन करता है तेरी सहेलियों का पीछा? वही मेरे पीछे पड़ी रहती हैं. कोई कहती है, ‘रोहनजी, प्लीज मेरा लाइब्रेरी कार्ड बनवा दीजिए, रोहन भैया काउंटर पर बड़ी लंबी कतार लगी है, आप प्लीज मेरी फीस जमा करा दीजिए,’ अब कोई इतने प्यार से विनती करे तो मैं कोई पत्थर दिल तो हूं नहीं, जो पिघलूं न? छोटेमोटे काम कर देता हूं. क्या करूं मेरा दिल ही कुछ ऐसा है, किसी को मना कर ही नहीं पाता हूं,’’ अपनी विवशता बताते हुए रोहन बोला.

‘‘हां, जैसे मुझे समझ में नहीं आता कि आप क्यों उन का काम करते हैं. उन पर अच्छा प्रभाव डालने के लिए भला इस से अच्छा मौका और कहां मिलेगा आप को.’’ ‘‘अब तुम ही बताओ मम्मा, इस चुहिया की कुछ सहेलियां मेरे पास आ कर कहती हैं, प्लीज रोहन भैया, हमारा फलां काम करवा दीजिए तो मैं भला कैसे मना कर सकता हूं उन्हें? जब उन्होंने मुझे भैया कह दिया तो मेरी मुंहबोली बहनें हो गईं न और बहनों के प्रति भाई की कुछ जिम्मेदारी बनती है कि नहीं? और कुछ कहती हैं, ‘रोहनजी, प्लीज हमारा फलां काम… रोहनजी प्लीज’ कहने वालों के प्रति तो मेरी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि न जाने भविष्य में इन में से किस के साथ मेरा रिश्ता जुड़ जाए, इसलिए उन के काम तो मैं अपनी तथाकथित बहनों के काम से भी ज्यादा रुचि और मन से करता हूं.’’

‘‘रोहन, तू सचमुच बिगड़ रहा है, जरूरत से ज्यादा नटखटपन अच्छी बात नहीं है, सोनाली तेरी बहन है तो इस की सहेलियां भी तेरी छोटी बहन ही हुईं. तुझे हरएक के साथ तमीज से पेश आना चाहिए,’’ ताईजी उन्हें समझाते हुए बोलीं. ‘‘मम्मा, अब आप भी सोनाली की भाषा न बोलिए. जिस ने मुझे भैया कह दिया वह तो मेरे लिए सोनाली के ही समान हो जाती है पर जो खुद ही मुझे भैया न कहना चाहे, ‘रोहनजी प्लीज…’ कहे तो वहां मैं नटखट कैसे हो गया? नटखट तो वह हुई न?’’

मुझे पता था कि रोहन भैया से बहस में जीतना असंभव है. उन की वाक्पटुता ने ही तो उन के व्यक्तित्व में चार चांद लगा कर उन्हें हमारे कालेज का हीरो बना कर मेरे लिए मुसीबत खड़ी कर दी थी. कालेज में उन के चाहने वालों की एक लंबी कतार है.

इसीलिए बहुत सी युवतियां मुझे पुल बना कर उन तक पहुंचने की कोशिश में किसी न किसी बहाने मेरे आगेपीछे लग कर मेरा जीना मुश्किल करती रहती हैं. फिर जिन को रोहन भैया थोड़ा भी भाव दे देते हैं, वे तो तारीफों के पुल बांध कर उन्हें आकाश पर बैठा देतीं और जिन पर उन की नजरें इनायत नहीं होतीं वे उन में दस दोष निकाल देती हैं, मेरे लिए दोनों ही तरह की बातें सुनना बरदाश्त के बाहर हो जाता है और कई बार अनायास ही मैं लड़कियों से बहस कर बैठती हूं. ‘‘रोहन भैया, कालेज तक तो ठीक था पर अब तो आप ने मेरी सहेलियों के घर के चक्कर काटना और उन के घर जाना भी शुरू कर दिया है. आखिर क्या चाहते हैं आप?’’ सोनाली ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा.

‘‘ऐ छिपकली, तेरी कौन सी सहेली हूर की परी है जिस के घर के चक्कर मैं काटने लगा. जरा मैं भी तो सुनूं,’’ रोहन भैया अपनी हेकड़ी जमाते हुए बोले. ‘‘कल अनाइका के घर नहीं गए थे आप?’’ मैं ने खा जाने वाली नजरों से उन्हें घूरा.

‘‘अच्छा जिस के घर कल मैं गया था, उस का नाम अनाइका है? तब तो निश्चय ही वह हूर की परी होगी. अच्छा किया तुम ने मुझे बता दिया. अब कल उसे कालेज में गौर से देखूंगा,’’ कह कर रोहन भैया जोरजोर से हंसने लगे. ‘‘हद हो गई रोहन भैया, आप की बेशर्मी की,’’ मैं ने भी चिढ़ कर अपनी मर्यादा की सीमा लांघते हुए कहा.

‘‘देख सोनाली, मैं तेरी बात को हंस कर टाल रहा हूं तो इस का मतलब यह नहीं कि तू जो मन में आए बोलती जाए और एक बात साफसाफ सुन ले, मैं नहीं गया था किसी अनाइका के घर का चक्कर काटने. मैं अपने दोस्त संवेग के घर गया था. तेरी उस हूर की परी का घर भी वहीं था, उस ने मुझे देख कर अपने घर आने को कहा तो मैं चला गया. इस में मेरी क्या गलती है?’’ ‘‘आप की गलती यही है कि आप उस के घर गए. उस ने आप को बुलाया या आप वहां गए, मैं नहीं जानती पर आप का अनाइका के घर जाना ही आज कालेज में दिन भर चर्चा का विषय बना रहा था.

सब बोल रहे थे कि अनाइका और रोहन के बीच कुछ चल रहा है. आप सोच भी नहीं सकते कि यह सब सुन कर मेरा दिमाग कितना खराब होता है. रोज किसी न किसी के साथ आप का नाम जोड़ा जाता है. मुझे लग रहा था अब आप सुधर रहे हैं कि तभी अनाइका का नाम लिस्ट में जुड़ गया.’’

‘‘मेरे और अनाइका के बीच कुछ चल रहा है, यह बात अनाइका ने मुझे क्यों नहीं बताई? इतनी बड़ी बात मुझ से छिपा कर रखी? मुझे भी बता देती तो मैं थोड़ा अपने पर इतरा लेता,’’ रोहन भैया ने चिंतित मुद्रा में मुंह बना कर कहा, ‘‘सोनाली, कमी मुझ में नहीं उन लड़कियों की सोच में है. किसी से दो बातें कर लो तो सीधा ‘चक्कर चलना’ ही मान बैठती हैं.’’ रोहन भैया मेरी किसी बात को गंभीरता से लेने को तैयार ही नहीं थे. मैं झक मार कर वहां से उठ ही गई, ‘‘ठीक है रोहन भैया, आप के लिए तो हर बात बस, मजाक ही होती है, पर कालेज में होने वाली बातों का मुझ पर असर पड़ता है. कोई मेरे भाई के बारे में अनापशनाप कहे तो मैं बरदाश्त नहीं कर पाती हूं. अगले साल मैं अपना कालेज ही बदल लूंगी. न आप के कालेज में रहूंगी, न आप के बारे में कुछ सुनूंगी और न ही मेरा दिमाग खराब होगा,’’ कह कर मैं अपना बैग उठा कर वहां से निकल पड़ी.

‘‘ओए मधुमक्खी, कालेज बदलना तो अकेली ही जाना, अपनी सहेलियों को मत ले जाना वरना मेरे कालेज में तो पतझड़ आ जाएगा,’’ कह कर रोहन भैया फिर होहो कर के हंसने लगे. मुझे पता था कि रोहन भैया चिकने घड़े हैं. मेरी किसी बात का उन पर कोई असर नहीं पड़ेगा. फिर भी हर 10-15 दिन में मैं उन से इस बात को ले कर बहस कर ही बैठती थी.

12वीं के बाद बीकौम में जब मुझे दीनदयाल डिग्री कालेज में ऐडमिशन मिला था तो मैं फूली नहीं समाई थी. नामीगिरामी कालेज में ऐडमिशन पाने की खुशी के साथसाथ एक सुकून का एहसास यह सोचसोच कर भी हो रहा था कि रोहन भैया के होते हुए मुझे किसी काम के लिए भागदौड़ नहीं करनी पड़ेगी. मेरा सारा काम बैठेबिठाए हो जाएगा. रोहन भैया उसी कालेज से एमकौम कर रहे थे और कालेज में उन के रोब के किस्से उन के मुंह से सालों से सुनती चली आ रही थी.

कालेज पहुंची तो सचमुच रोहन भैया की कालेज में पहचान देख कर मैं दंग रह गई. छात्रसंघ के सक्रिय सदस्य होने के कारण सारे प्रोफैसर और विद्यार्थी न केवल उन्हें अच्छी तरह जानते थे बल्कि वाक्पटुता और आकर्षक व्यक्तित्व के कारण उन्हें पसंद भी बहुत करते थे. युवतियों के तो वे खासकर सर्वप्रिय नेता माने जाते थे. उन में वे किशन कन्हैया के नाम से मशहूर थे. लड़कियां उन के इर्दगिर्द मंडराने के अवसर तलाशती रहती थीं.

कालेज में उन के जलवे देख कर मैं भी अपना सिक्का जमाने के लिए सभी के सामने रोब जमाते हुए यह कहने लगी कि रोहन मेरे भैया हैं और मुझे बहुत प्यार करते हैं, लेकिन उस के बाद से ही मेरी मुसीबतों का सिलसिला शुरू हो गया. रोज कोई न कोई युवती अपना कोई न कोई काम ले कर मेरे पास हाजिर हो जाती कि मैं अपने भाई से उस का काम करवा दूं.

शुरूशुरू में तो मैं बड़े मन से सब के काम करवा देती थी, क्योंकि ऐसे छोटेमोटे काम करवाना रोहन भैया के बाएं हाथ का खेल था, पर धीरेधीरे मैं बोर हो कर जब उन्हें टालने लगी तब उन्होंने खुद रोहन भैया, रोहन भैया कह कर अपना काम निकलवाना शुरू कर दिया. युवतियां मुंह पर तो उन्हें भैया कहतीं लेकिन पीठ पीछे उन को देख कर आहें भरती थीं. ये सब देखसुन कर दिनप्रतिदिन मेरा दिमाग खराब होने लगा. ये रोहन भैया जो घर में एक गिलास पानी तक अपने हाथ से ले कर नहीं पीते हैं, इतनी समाज सेवा क्यों करते हैं, कालेज में ये सब भी मुझे बड़ी अच्छी तरह समझ में आने लगा था.

‘युवतियों को इंप्रैस करने की कला कोई रोहन से सीखे. रोहन से अपना काम करवाना हो तो किसी सुंदर युवती के माध्यम से कहलवाओ फिर देखो कैसे चुटकी बजाते काम हो जाता है,’ जैसी बातें जब मैं सुनती तो मुझे बहुत बुरा लगता. मुझे लगा कि रोहन भैया को पता नहीं होगा कि उन के बारे में ऐसीऐसी बातें की जाती हैं तो मैं उन्हें बता दूं ताकि वे संभल जाएं. पर धीरेधीरे मेरी समझ में आ गया कि दीवार से सिर टकराने का कोई फायदा नहीं है. उन के बारे में कोई क्या कह रहा है या क्या सोच रहा है इस का उन पर कोई फर्क नहीं पड़ता. वे करेंगे अपने मन की ही.

मैं ने रोहन भैया से इस बारे में कोई भी बात करना बंद कर दिया. मैं ने तो अब ध्यान देना ही बंद कर दिया पर मेरे नाम का इस्तेमाल कर रोहन भैया की न जाने कितनी मुंहबोली बहनें दिनप्रतिदिन बनती रहीं. कालेज की पढ़ाई खत्म होते ही साल भर के अंदर मेरी शादी भी हो गई. मेरी शादी के 3 साल बाद रोहन भैया की शादी तय होने की खबर जब मुझे मिली तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा. मुझे पक्का यकीन था कि रोहन भैया तो प्रेम विवाह ही कर रहे होंगे पर जब ताईजी ने बताया कि लड़की उन्होंने पसंद की है तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा.

भाभी सुंदर और समझदार थीं. शादी के बाद रोहन भैया के स्वभाव में भी बहुत परिवर्तन आ गया. अब वे काफी शांत और गंभीर रहने लगे थे. कालेज के समय वाली उच्छृंखलता अब कहीं उन के स्वभाव में नहीं दिखती थी. साल भर तक तो उन का दांपत्य जीवन बहुत अच्छी तरह चला पर अचानक न जाने क्या हुआ कि भैयाभाभी के बीच दूरियां बढ़ने लगीं. उन के बीच अकसर बहस होने लगी. ताईजी के लाख पूछने पर भी दोनों में से कोई भी कुछ बताने को तैयार नहीं होता. उसी दौरान मैं मायके गई थी तो ताईजी के यहां भी सब से मिलने चली गई. ताईजी ने उन लोगों के बिगड़ते रिश्ते के बारे में बताते हुए मुझे भाभी से बात कर के कारण जानने को कहा. पहले तो भाभी ने बात को टालना चाहा किंतु मेरे हठ पकड़ लेने पर उन्होंने जो कहा उस पर यकीन करना मुश्किल था.

भाभी ने कहा, ‘‘रोहन का शक्की स्वभाव उन के वैवाहिक जीवन पर ग्रहण लगा रहा है. मेरे एक मुंहबोले भाई को ले कर इन के मन में शक का कीड़ा कुलबुला रहा है. मैं उन्हें हर तरह से समझा चुकी हूं कि उस के साथ मेरा भाईबहन के अलावा और किसी तरह का कोई संबंध नहीं है पर इन्हें मेरी किसी बात पर यकीन ही नहीं है. मेरी हर बात के जवाब में बस यही कहते हैं, ‘ये मुंहबोले भाईबहन का रिश्ता क्या होता है मुझे न समझाओ. किसी अमर्यादित रिश्ते पर परदा डालने के लिए मुंहबोला भाई और मुंहबोली बहन का जन्म होता है.’ इन का कहना है कि या तो अपने मुंहबोले भाई से ही रिश्ता रख लो या मुझ से. अब तुम ही बताओ इतने सालों का रिश्ता क्या कह कर खत्म करूं? कितने अपमान की बात है मेरे लिए इतना बड़ा आरोप सहना.’’

मैं ने भाभी को आश्वस्त करते हुए कहा कि आप चिंता न करें मैं भैया से बात करती हूं. मैं जब रोहन भैया से इस बारे में बात करने गई तो बात शुरू करने से पहले ही उन्होंने मेरा मुंह यह कह कर बंद कर दिया, ‘‘सोनाली, अगर तुम मुझे कुछ समझाने आई हो तो बेहतर होगा कि वापस चली जाओ.’’ रोहन भैया के रूखे व्यवहार के आगे तो मेरी बात शुरू करने की हिम्मत ही नहीं हुई. बातबात पर उन से झगड़ने और बहस कर बैठने वाली मुझ सोनाली की बोलती ही बंद हो गई. पर बात चूंकि उन के वैवाहिक रिश्ते को बचाने की थी इसलिए हिम्मत कर के मैं उन के पास बैठ गई.

‘‘रोहन भैया, बात इतनी बड़ी नहीं है कि आप ने अपना और भाभी का रिश्ता दावं पर लगा दिया है. भाभी कह रही हैं कि उन का मुंहबोला भाई है तो उन की बात का आप यकीन क्यों नहीं करते? आखिर कालेज में आप की भी तो कई मुंहबोली बहनें थीं फिर…’’ मैं आगे कुछ और बोलूं उस से पहले ही रोहन भैया वहां से उठ खड़े हुए, ‘‘हां, सोनाली, मेरी कई मुंहबोली बहनें थीं और मैं कइयों का मुंहबोला भाई था इसीलिए इस रिश्ते की हकीकत मुझ से ज्यादा कोई नहीं जानता. कह दो अपनी भाभी से या तो मैं या वह मुंहबोला भाई, जिसे चुनना है चुन ले.’’ मैं अवाक सी भैया का मुंह देखती रह गई. कालेज वाले भैया तो वे थे ही नहीं जिन से मैं कुछ बहस कर सकती. ‘रोहन भैया, रोहन भैया’ कहने वाली कालेज की बहनों का उन्हें देख कर आहें भरना मैं भी कहां भूल पाई थी कि किसी तरह का तर्क दे कर उन की सोच को झुठलाने की कोशिश करने की हिम्मत जुटा पाती.

मेरे पास भाभी को समझाने के अलावा और कोई रास्ता शेष नहीं बचा था. रोहन भैया का शक उन के अपने अनुभव पर आधारित था. न जाने मुंहबोले भाईबहन के रिश्तों को उन्होंने किस तरह जिया था. दुनिया को तो वे अपने ही अनुभव के आधार पर देखेंगे. ‘‘रिश्ता बचाना है तो आप के सामने रोहन भैया की शर्त मानने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है भाभी, क्योंकि उन का शक उन के अनुभव पर आधारित है और अपने ही अनुभव को भला वे कैसे नकार सकते हैं. रिश्ता बचाने के लिए त्याग आप को ही करना पड़ेगा,’’ भारी मन से भाभी से यह सब कह कर मैं चुपचाप अपने घर की ओर चल दी.

Family Story in Hindi

Fictional Story: छंट गया कुहरा- विक्रांत के मोहपाश में बंधी जा रही थी माधुरी

Fictional Story: विक्रांत को स्कूटर से अंतिम बार जाते हुए देखने के लिए माधुरी बालकनी में जा कर खड़ी हो गई. विक्रांत के आंखों से ओझल होते ही उसे लगा जैसे सिर से बोझ उतर गया हो. अब न किसी के आने का इंतजार रहेगा, न दिल की धड़कनें बढ़ेंगी और न ही उस के न आने से बेचैनी और मायूसी उस के मन को घरेगी. यह सोच कर वह बहुत ही सुकून महसूस कर रही थी.

जब किसी के चेहरे से मुखौटा उतर कर वास्तविक चेहरे से सामना होता है तो जितनी शिद्दत से हम उसे चाहते हैं उसी अनुपात में उस से नफरत भी हो जाती है, एक ही क्षण में दिल की भावनाएं उस के लिए बदल जाती हैं. ऐसा ही माधुरी के साथ हुआ था.

माधुरी के विवाह को 5 साल हो गए थे. विवाह के बाद दिल्ली की पढ़ीलिखी, आधुनिक विचारों वाले परिवार में पलीबढ़ी माधुरी को उत्तर प्रदेश के छोटे से शहर में रहने से और अपने पति मनोहर के अंतर्मुखी स्वभाव के कारण बहुत ऊब और अकेलापन लगने लगा था.

विक्रांत मनोहर के औफिस में ही काम करना था. अविवाहित होने के कारण अकसर वह मनोहर के साथ औफिस से उस के घर आ जाता था. माधुरी को भी उस का आना अच्छा लगता था. फिर वह अकसर खाना खा कर ही जाता था. खातेखाते वह खाने की बहुत तारीफ करता, जबकि अपने पति के मुंह से ऐसे बोल सुनने को माधुरी तरस जाती थी.

उस के आते ही घर में रौनक सी हो जाती थी. माधुरी उस से किताबों, कहानियों, फिल्मों, सामाजिक गतिविधियों पर बात कर के बहुत संतुष्टि अनुभव करती थी. धीरेधीरे वह उस की ओर खिंचती चली गई. जिस दिन वह नहीं आता तो उसे कुछ कमी सी लगती, मन उदास हो जाता. धीरेधीरे माधुरी को एहसास होने लगा कि इस तरह उस का विक्रांत की ओर आकर्षित होना मनोहर के प्रति अन्याय होगा, यह सोच कर वह मन से बेचैन रहने लगी. उसे लगने लगा कि जैसे वह कोई अपराध कर रही है, विवाहोपरांत किसी भी परपुरुष से एक सीमा तक ही अपनी चाहत रखना उचित है, उस के बाद तो वह शादीशुदा जिंदगी के लिए बरबादी का द्वार खोल देती है.

सबकुछ समझते हुए भी पता नहीं क्यों वह अपनेआप को उस से मिले बिना रोक नहीं पाती थी. जादू सा कर दिया था जैसे उस ने उस पर. अब तो यह हालत थी कि जिस दिन वह नहीं आता था तो वह अपने पति से उस के न आने का कारण पूछने लगी थी.

एक साथ काम करते हुए मनोहर को आभास होने लगा था कि विक्रांत कुछ रहस्यमय है. औफिस में 1-2 और लोगों से भी उस ने पारिवारिक संबंध बना रखे थे, जिन के घर भी अकसर वह जाया करता था.

धीरेधीरे मनोहर को भी माधुरी का विक्रांत के प्रति पागलपन अखरने लगा था. उस ने माधुरी को कई बार समझाया कि उस का विक्रांत के प्रति इतना आकर्षण ठीक नहीं है. वह अकेला है, पता नहीं क्यों विवाह नहीं करता. उसे तो अपना समय काटना है. लेकिन उस की समझ में नहीं आया और दिनप्रतिदिन उस का आकर्षण बढ़ता ही गया. उस की प्रशंसा भरी बातों में वह उलझती ही जा रही थी. एक तरफ अपराधभावना तो दूसरी ओर उसे न छोड़ने की विवशता. दोनों ने उसे मानसिक रोगी बना दिया था.

मनोहर जानता था कि माधुरी उस के लिए समर्पित है. विक्रांत ने ही अपनी बातों के जाल से उसे सम्मोहित कर रखा है और उस दिन को कोसता रहता था जब वह पहली बार उसे अपने घर लाया था. हर तरह से समझा कर वह थक गया.

धीरेधीरे माधुरी को विक्रांत से रिश्ता रखना तनाव अधिक खुशी कम देने लगा था. जिस रिश्ते का भविष्य सुरक्षित न हो, उस का यह परिणाम होना स्वाभाविक है, लेकिन वह उस से रिश्ता तोड़ने में अपने को असमर्थ पाती थी. ऊहापोह में 3 साल बीत गए. इस बीच वह एक चांद सी बेटी की मां भी बन गई थी.

अचानक एक दिन माधुरी के साथ ऐसी घटना घटी जिस ने उस के पूरे वजूद को ही हिला कर रख दिया. मनोहर के औफिस जाते ही विक्रांत औफिस में ही काम करने वाले रमनजी की बेटी नेहा, उम्र यही कोई 20 वर्ष होगी को उस के घर ले कर आया. पूर्व परिचित थी और अकसर वह माधुरी के घर आती रहती थी.

विक्रांत का भी उस परिवार से घनिष्ठ संबंध था. विक्रांत आते ही बिना किसी भूमिका के बोला, ‘‘इस का गर्भपात करवाना है. इस के साथ बलात्कार हुआ है…’’

1 मिनट को माधुरी को लगा जैसे कमरे की दीवारें उस की आंखों के सामने घूम रही हैं. जब उस ने इस बात की पुष्टि की तब जा कर माधुरी को विश्वास हुआ. इस से पहले तो उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि विक्रांत जो कह रहा है वह सच है.

डाक्टर मित्र ने कहा, ‘‘10 दिन भी देर हो जाती तो गर्भपात नहीं हो सकता था… पर एक बार के बलात्कार से कोई लड़की गर्भवती नहीं होती, ये सब फिल्मों में ही होता है… इस के जरूर किसी से शारीरिक संबंध हैं.’’

यह सुन माधुरी का माथा ठनका कि अरे, जिस तरह विक्रांत को उस के चेहरे के हावभाव से नेहा के लिए परेशान देख रही हूं. वह सामान्य नहीं है. मैं तो सोच रही थी कि कितना भला है जो एक लड़की की मदद कर रहा है, पर अब डाक्टर के कहने पर मुझे कुछ शक हो रहा है कि यह क्यों नेहा को ले कर इतना परेशान है… तो क्या… उस ने मुझे अपनी परेशानी से मुक्ति पाने के लिए मुहरा बनाया है… उसे पता है कि मेरी एक डाक्टर फ्रैंड भी है… और यह भी जानता है कि मैं उस की मदद के लिए हमेशा तत्पर हूं. वह मन ही मन बुदबुदाई और फिर गौर से नेहा और विक्रांत का चेहरा पढ़ने लगी.

गर्भपात होते ही विक्रांत का तना चेहरा कितना रिलैक्स लग रहा था. उस के बाद वह माधुरी को साधिकार यह कह कर गायब हो गया था कि वह उसे उस के घर पहुंचा दे और किसी को कुछ न बताए. माधुरी का शक यकीन में बदल गया था.

माधुरी ने अपनी डाक्टर फ्रैंड की मदद से नेहा से हकीकत उगलवाने की ठान ली.

डाक्टर ने कड़े शब्दों में पूछा, ‘‘सच बता कि यह किस का बच्चा था?’’

उस ने पहले तो कुछ नहीं बताया. बस यह कहती रही कि कालेज के रास्ते में किसी ने उस के साथ बलात्कार किया था. लेकिन जब माधुरी ने उस से कहा कि सच बोलेगी तो वह उस की मदद करेगी नहीं तो उस की मां को सब बता देगी, तब वह धीरेधीरे कुछ रुकरुक कर बोली, ‘‘यह बच्चा विक्रांत अंकल का था. मैं उन की बातों से प्रभावित हो कर उन्हें चाहने लगी थी. उन्होंने मुझ से विवाह का वादा कर के मुझे समर्पण करने के लिए मजबूर कर दिया,’’ और वह रोने लगी.

‘‘उफ, अंकल के रिश्ते को ही विक्रांत ने दागदार कर दिया. कितना विश्वासघात किया उस ने उस परिवार के साथ, जिस ने उस पर विश्वास कर के अपने घर में प्रवेश करने की अनुमति दी. जिस थाली में खाया, उसी में छेद किया,’’ माधुरी यह अप्रत्याशित बात सुन कर बिलकुल सकते की हालत में थी. उस के दिमाग में विचारों का तूफान उठ रहा था. उस का मन विक्रांत के प्रति घृणा से भर उठा.

माधुरी का उतरा चेहरा देख कर उस की डाक्टर फ्रैंड थोड़ा मुसकराई और फिर बोली, ‘‘तू तो ऐसे परेशान है जैसे तेरे साथ ही कुछ गलत हुआ है?’’

‘‘तू सही सोच रही है…मेरा भी मानसिक बलात्कार उस ने किया है. अब मेरी आंखें खुल चुकी हैं. इतना गिरा हुआ इंसान कोई हो सकता है, मैं सोच भी नहीं सकती. मैं ने अपने जीवन के 3 साल उस के जाल में फंस कर बरबाद कर दिए.’’ माधुरी ने उसे भारी मन से बताया.

प्रतिक्रियास्वरूप उसे मुसकराते देख कर उसे अचंभा हुआ और फिर प्रश्नवाचक नजरों से उस की ओर देखने लगी तो वह बोली, ‘‘मैं सारी कहानी कल ही तुम तीनों के हावभाव देख कर समझ गई थी. आखिर इस लाइन में अनुभव भी कोई चीज है. तुझे पता है मेरे पति नील मनोवैज्ञानिक हैं. उन से मुझे बहुत जानकारी मिली है. ऐसे लोग बिल्ली की तरह रास्ता देख लेते हैं और वहीं शिकार के लिए मंडराते रहते हैं, शारीरिक शोषण के लिए कुंआरी लड़कियों को विवाह का झांसा दे कर अपना स्वार्थ पूरा करते हैं…विवाहित से ऐसी आशा करना खतरनाक होता है, इसलिए उन्हें मानसिक रूप से सम्मोहित कर के अपने टाइम पास का अड्डा बना लेते हैं…

‘‘उन्हें पता होता है कि स्त्रियां अपनी प्रशंसा की भूखी होती हैं, इसलिए इस अस्त्र का सहारा लेते हैं. ऐसे रिश्ते दलदल के समान होते हैं. जिस से अगर कोई समय रहते नहीं ऊबरे तो धंसता ही चला जाता है. शुक्र है जल्दी सचाई सामने आ गई, वरना….’’ माधुरी अवाक उस की बातें सुनती रही और उस की बात पूरी होने से पहले ही उस के गले से लिपट कर रोने लगी.

माधुरी ने थोड़ा संयत हो कर अपनी आवाज को नम्र कर के नेहा से पूछा, ‘‘जब इतना कुछ हो गया है तो तुम्हारा विवाह उस से करवा देते हैं. तुम्हारी मां से बात करती हूं.’’

‘‘नहीं…मैं उन से नफरत करती हूं, उन्होंने नाटक कर के मुझे फंसाया है. उन के और लड़कियों से भी संबंध हैं…उन्होंने मुझे खुद बताया है, प्लीज आप किसी को मत बताइएगा. उन्होंने कहा है कि यदि मैं किसी को बताऊंगी तो वे मेरे फोटो दिखा कर मुझे बदनाम कर देंगे,’’ और उस ने रोते हुए हाथ जोड़ दिए.

‘‘ठीक है, जैसा तुम कहोगी वैसा ही होगा,’’ माधुरी ने उसे सांत्वना दी.

अस्पताल से माधुरी नेहा को अपने घर ले आई, उस के आराम का पूरा ध्यान रखा. फिर उसे समझाते हुए बोली, ‘‘तुम्हें डरने की कोई जरूरत नहीं है, मैं हूं न. तुम्हें अपनी मां को सबकुछ बता देना चाहिए ताकि उस का तुम्हारे घर आना बंद हो जाए. नहीं तो वह हमेशा तुम्हें ब्लैममेल करता रहेगा. वह तुम्हारे फोटो दिखाएगा तो उस का भी तो नाम आएगा. फिर उस की नौकरी चली जाएगी, इसलिए वह कदापि ऐसा कदम नहीं उठा सकता. सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने के लिए तुम्हें धमका रहा है. तुम अपनी मां से बात नहीं कर सकती तो मैं करती हूं.’’ माधुरी से अधिक उस की पीड़ा को और कौन समझ सकता था.

माधुरी की बात सुन कर नेहा को बहुत हिम्मत मिली. वह उस से लिपट कर देर तक रोती रही.

माधुरी ने नेहा की मां को फोन कर के अपने घर बुलाया और फिर सारी बात बता दी. पूरी बात सुन कर उस की मां की क्या हालत हुई यह तो भुक्तभोगी ही समझ सकता है. माधुरी के समझाने पर उन्होंने नेहा को कुछ नहीं कहा पर उन को क्या पता कि जब वह खुद ही उस की बातों के जाल में फंस गई तो नेहा की क्या बात…

वे रोते हुए बोलीं, ‘‘आप प्लीज किसी को मत बताइएगा, नहीं तो इस से शादी कौन करेगा? आप का एहसान मैं जिंदगीभर नहीं भूलूंगी.

अब मेरे घर के दरवाजे उस के लिए हमेशा के लिए बंद.’’

माधुरी ने उन्हें आश्वस्त कर के बिदा किया. उन के जाने के बाद वह पलंग पर लेट कर फूटफूट कर बच्चों की तरह रोने लगी. पूरे दिन का गुबार आंसुओं में बह गया. अब वह बहुत हलका महसूस करने लगी. उसे लगा कि उस के जीवन पर छाया कुहरा छंट गया है, सूर्य की किरणें उस के लिए नया सबेरा ले कर आई हैं.

अब माधुरी शाम को अपने पति मनोहर के आने का बेसब्री से इंतजार करने लगी. पति के आते ही उस ने सारी बात बताते हुए कहा, ‘‘मुझे माफ कर दो, मैं भटक गई थी.’’

‘‘तुम्हारी इस में कोई गलती नहीं. मैं जानता था देरसबेर तुम्हारी आंखें जरूर खुलेंगी. देखो विवाह को एक समझौता समझ कर चलने में ही भलाई है. हर चीज चाही हुई किसी को नहीं मिलती. मुझे भी तो तुम्हारी यह मोटी नाक नहीं अच्छी लगती तो क्या मैं सुंदर नाक वाली ढूंढ़ूं…’’

अभी उस की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि वह खिलखिला कर हंस पड़ी. फिर पति के गले से लिपट कर खुद को बहुत सुरक्षित महसूस कर रही थी. अगले दिन विक्रांत मनोहर के साथ आया. माधुरी उस के सामने नहीं आई तो वह सारी स्थिति समझ थोड़ी देर बाद लौट गया.

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Hair Extensions: पाएं मनचाहा हेयरस्टाइल

Hair Extensions: बाल हर लड़की की पर्सनैलिटी का एक अहम हिस्सा है. हर लड़की चाहती है कि उस के बाल लंबे, घने और खूबसूरत हों, लेकिन पौल्यूशन, स्ट्रैस और लाइफस्टाइल के कारण बालों का झड़ना और पतले होना नौर्मल है. ऐसे में हेयर ऐक्सटेंशन एक जादुई समाधान बन कर सामने आया है, जो कुछ ही घंटों में आप के लुक को बदल सकता है.

हेयर ऐक्सटेंशन क्या है

हेयर ऐक्सटेंशन असली या आर्टिफिशियल बालों से बनाए जाते हैं जिन्हें आप के नैचुरल बालों में जोड़ दिया जाता है ताकि बालों की लंबाई और घनापन बढ़ाया जा सके, जिस से आप के लुक को बदला जा सके और आजकल मौडल्स, सैलिब्रिटीज से ले कर आम लड़कियां भी इन का इस्तेमाल कर रही हैं.

हेयर टौपर्स

हेयर टौपर्स एक तरह का हेयरपीस या विग का छोटा हिस्सा होता है, जिसे उन लोगों के लिए बनाया गया है जिन के सिर के ऊपर के बाल पतले हो जाते हैं या बाल झड़ने की समस्या हो जाती है. यह आप के प्राकृतिक बालों के साथ मिल कर उन्हें घना और सुंदर लुक देता है. यह छोटा और हलका होता है लेकिन पूरे विग की तरह नहीं होता, सिर्फ सिर के ऊपर वाले हिस्से को कवर करता है जो आप को नैचुरल लुक देता है. इस में क्लिप्स लगे होते हैं जिन्हें बालों में लगा कर फिक्स कर सकते हैं.

स्टाइलिंग की सुविधा

हेयर टौपर को स्ट्रैट, कर्ल या अलगअलग हेयरस्टाइल में इस्तेमाल किया जा सकता है.

क्लिपइन बैंग्स

क्लिपइन बैंग्स एक तरह का हेयर ऐक्सटेंशन होता है, जो आप के माथे पर आगे की तरफ आने वाले छोटे बालों (फ्रिंग्स बैंग्स) जैसा लुक देता है. इसे क्लिप की मदद से बहुत आसानी से बालों में लगाया और निकाला जा सकता है. इस को आसानी से यूज किया जा सकता है. यह आप को बिना कटिंग के नया लुक देता है. आप बैंग्स ट्राई करना चाहती हैं लेकिन बाल कटवाने का रिस्क नहीं लेना चाहतीं, तो यह बैस्ट औप्शन है. नैचुरल लुक देता है और बेहतर क्वालिटी की क्लिपइन बैंग्स आप के असली बालों की तरह ही दिखते हैं. ये कई वैरायटी व अलगअलग स्टाइल में मिलते हैं, जैसेकि ब्लंट बैंग्स, साइड बैंग्स, लेयर्ड बैंग्स आदि. ये रीयूजेबल (बारबार इस्तेमाल होने वाले) होते हैं. एक बार खरीदने के बाद आप इन्हें कई बार अलगअलग मौकों पर लगा सकती हैं.

हेलो हेयर

हेलो हेयर एक तरह का हेयर ऐक्सटेंशन है, जिसे बिना क्लिप, गोंद या टेप के आसानी से लगाया जा सकता है. इस में एक पारदर्शी नायलोन वायर लगा होता है, जो सिर के ऊपर हैलो या मुकुट जैसा बना कर बैठता है और नीचे लंबे व घने बालों का लुक देता है. इसे पहनने और उतारने में सिर्फ 1 मिनट लगता है साथ ही इस से कोई नुकसान नहीं होता है. इस में गोंद, टेप या क्लिप का इस्तेमाल नहीं होता, इसलिए आप के असली बालों को कोई नुकसान नहीं होता. यह आप को नैचुरल लुक देता है और अच्छी क्वालिटी के हैलो हेयर आप के असली बालों से पूरी तरह मिक्स हो कर नैचुरल लगता है. साथ ही यह हलका होने के कारण सिर पर बोझ नहीं डालता और घंटों तक आसानी से पहना जा सकते है. हैलो हेयर को स्ट्रेट, कर्ल या अलगअलग हेयरस्टाइल में बदला जा सकता है.

हेयर ऐक्सटेंशन

हेयर ऐक्सटेंशन एक ऐसा हेयर प्रोडक्ट है, जिस की मदद से आप के बालों की लंबाई और घनापन (वौल्यूम) बढ़ाया जा सकता है. यह असली या नकली बालों से बने होते हैं और इन्हें आप के प्राकृतिक बालों में जोड़ कर नया और स्टाइलिश लुक दिया जाता है.

अगर आप को लंबे बाल तुरंत चाहिए और आप के बाल छोटे हैं तो ऐक्सटेंशन से तुरंत लंबे हो जाते हैं. यह पतले बालों में वौल्यूम देता है. ऐक्सटेंशन से नए हेयरस्टाइल, कर्ल्स, स्ट्रैट और अलगअलग लुक ट्राई कर सकते हैं. कुछ ऐक्सटेंशन तुरंत निकाल सकते हैं, तो कुछ लंबे समय तक लगाए जा सकते हैं. इस में आप को कलरिंग का औप्शन भी मिलता है जिस में बिना असली बालों को डाई किए, कलर वाले ऐक्सटेंशन से नया लुक पा सकते हैं.

स्ट्रैंडआउट्स

यह एक तरह का क्लिपइन रंगीन बालों का स्ट्रैंड होता है, जिसे आप अपने असली बालों में जोड़ कर तुरंत नया, ग्लैमरस और परफैक्ट लुक पा सकते हैं वह भी बालों को  बिना डाई और ख़राब करे बिना. यह एक मजेदार और लड़कियों का फेवरिट ट्रेंड है. यह उन के लिए परफैक्ट है जो जल्दीजल्दी नया हेयरकलर ट्राई करना चाहती हैं, लेकिन बालों को डैमेज होने से भी बचाना चाहती हैं.

Hair Extensions

Child’s Education: ऐजुकेशन को ले कर मांबाप का सख्त नजरिया क्यों

Child’s Education: आज का समय हो या पहले का, हर मांबाप की इच्छा होती है बच्चों को शिक्षित करना और इतना पढ़ानालिखाना कि बच्चा उच्च शिक्षा ले कर डाक्टर, इंजीनियर यहां तक कि आईएएस औफिसर बन जाए, ताकि उस की समाज में न सिर्फ रुतबा हो, बल्कि उन का बच्चा आलीशान जिंदगी भी जिएं.

हर मांबाप यही चाहते हैं कि जिस तरह उन को अपनी जिंदगी बसर करने के लिए पूरी जिंदगी संघर्ष करना पड़ा, ऐसा उन के बच्चों को न करना पड़े, जिस के चलते वे कर्ज ले कर भी अपने बच्चों को इतना शिक्षित बनाते हैं या बनाने की कोशिश करते हैं ताकि उन का बच्चा समाज में सम्मानित जिंदगी जी सकें. इस की वजह से वे कई बार अपने बच्चों की पढ़ाई को ले कर इतने कड़क हो जाते हैं कि बच्चा  कई बार डर के मारे गलत कदम उठा लेता है, जो एक बच्चे के लिए बहुत ज्यादा हानिकारक भी हो जाता है.

बच्चों में डर

कई बार मांबाप की यह इच्छा जिद में बदल जाती है और फिर डर के मारे या विद्रोही हो कर बच्चे मांबाप के खिलाफ चले जाते हैं या कई बार आत्महत्या तक कर लेते हैं, जो किसी भी हद तक सही नहीं है.

अगर मांबाप बच्चों को पढ़नेलिखने पर जोर देते हैं तो वह सिर्फ इसलिए कि उन का बच्चा अनपढ़ होने की वजह से बेवकूफ न बनें या कोई उन का फायदा न उठा सके.

एक पढ़ालिखा इंसान भले ही डाक्टर, इंजीनियर न हो लेकिन उसे इतना ज्ञान जरूर होता है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा है या क्या सही है और क्या गलत है. इसलिए शिक्षित होने के बाद एक बच्चा जब एक आदमी या औरत के रूप में समाज में सरवाइव करता है तो कोई उस का फायदा नहीं उठा पाता.

शिक्षा से मिलती है सही राह

इस के अलावा शिक्षा इंसान को सभ्य बनाती है और वह आत्मविश्वास के साथ किसी भी माहौल में अपनेआप को ऐडजस्ट कर सकता है.

लेकिन एक सच यह भी है कि हर बच्चा इंटेलिजेंट नहीं होता. कई बार कोई बच्चा तेज दिमाग नहीं होता, बल्कि उस की दिलचस्पी किसी अन्य क्षेत्र में होती है. वह अपनेआप को डाक्टर या इंजीनियर बनने के लायक नहीं समझता. ऐसे में मांबाप और बच्चे के बीच तालमेल नहीं बैठ पाता और ऐसे बच्चे मांबाप से बगावत तक कर देते हैं.

ऐसे में सवाल यह उठता है कि मांबाप बच्चों को शिक्षा का महत्त्व कैसे समझाएं? बिना बच्चों पर दबाव डाले, बच्चों की दिलचस्पी शिक्षा की तरफ कैसे ले जाएं?

मांबाप ऐक्टर हों, डाक्टर हों, वकील हों या इंजीनियर या फिर अनपढ़ ही क्यों न हों लेकिन वे अपने बच्चों को शिक्षित देखना चाहते हैं, क्योंकि हर मांबाप के मन में अपने बच्चों को ले कर बहुत उम्मीदें होती हैं. वे चाहते हैं कि उन का बच्चा अपने मांबाप का नाम रौशन करें, उन के बुढ़ापे का सहारा बनें. जैसे आज वह अपने बच्चों की उंगली पकड़ कर चला रहे हैं, वैसे कल बुढ़ापे में वे उन का हाथ पकड़ कर सहारा बनें.

इन सब बातों के अलावा मांबाप अपने बच्चों को शिक्षित इसलिए भी करना चाहते हैं ताकि वे एक अच्छा इंसान बन सकें. गौरतलब है कि पिता की उस बच्चों से ज्यादा उम्मीदें होती हैं जो तेज दिमाग का होता है और स्कूल में पढ़ाई के दौरान 70-80% या अधिक नंबर लाता है. ऐसे में मांबाप को लगता है कि अगर वे कोशिश करें तो उन का बच्चा हायर ऐजुकेशन में कमाल कर सकता है. वहीं अगर बच्चा डफर है और 40% तक ही उस का रिजल्ट होता है तो ऐसे बच्चों पर मांबाप ज्यादा दबाव भी नहीं डालते.

ऐसे में बच्चों को यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि वे कितनी मुश्किलों से अपने बच्चों की पढ़ाई का बंदोबस्त कर रहे हैं और अगर बच्चा अच्छी पढ़ाई करेगा तो आगे की जिंदगी में उस को बहुत सारे फायदे मिलेंगे.

मारपीट से नहीं प्यार से समझाएं

आप बच्चों को मारपीट कर नहीं बल्कि प्यार से समझा कर अगर पढ़ाई की तरफ ध्यान आकर्षित कराते हैं, तो बच्चा भी मांबाप की भावनाओं को समझ कर दिल से पढ़ाई करेगा. ज्यादा सख्ती या मारपीट बच्चों को या तो डरपोक बना देगा यह विद्रोही. दोनों ही सूरत में मांबाप से बच्चे दूर होते जाएंगे.

कई बार बच्चों को किसी और क्षेत्र में जैसे ग्लैमर वर्ल्ड या कोई और क्षेत्र में बहुत ज्यादा दिलचस्पी होती है लेकिन मांबाप बच्चों को इस के लिए सपोर्ट नहीं करते, क्योंकि उन का मानना होता है कि अगर बच्चा डाक्टर, इंजीनियर या किसी ऊंचे पद पर जाता है, तो वह बहुत ज्यादा नहीं तो कम से कम इतना तो कमा ही लेगा कि वह अपना और अपने परिवार का आसानी से गुजारा कर सके. ऐसा नहीं है कि किसी और क्षेत्र से जुड़ने पर उस में कमाई नहीं है या कोई और क्षेत्र अपनाने पर खाने के फांके पड़ जाएंगे, बल्कि कई क्षेत्र या बिजनैस ऐसे हैं जिन में काम कर के डाक्टर और इंजीनियर से ज्यादा कमाई हो सकती है.

इन क्षेत्रों में काम करने के लिए या पैसे कमाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ता है और इस की कोई गारंटी भी नहीं होती.

मेहनत से मिलती है कामयाबी

कोई ऐक्टर हो, मौडल हो, डाइरैक्टर हो और अगर वक्त ने साथ दिया तो एक फिल्म के ₹40-50 करोड़ भी कमा लेते हैं और अगर वक्त ने साथ नहीं दिया तो टेलैंट होने के बाद भी काम नहीं मिलता और घर बैठना पड़ता है. इसलिए वक्त को अपने पक्ष में करने के लिए कङी मेहनत करनी पङती है.

कहने का मतलब यह है कि मांबाप बच्चों पर प्रेशर इसलिए भी डालते हैं कि वे पढ़लिख कर कोई ऐसी नौकरी करें या काम करें, जिस में उन की लाइफ और भविष्य सुरक्षा और शांति के साथ गुजरे. एक बार मांबाप अपने लिए रिस्क लेने के लिए तैयार हो जाएंगे लेकिन बच्चों को ले कर वे बहुत इमोशनल होते हैं पर हमेशा अपने बच्चों को कामयाब देखना चाहते हैं.

यही वजह है कि हर मांबाप अपने बच्चों को उज्जवल भविष्य देने के लिए उच्च शिक्षा दिलाने पर जोर देते हैं ताकि बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो जाए.

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