नया पड़ाव: भाग 4- जब पत्नी को हुआ अपनी गलती का अहसास

राकेश की निष्ठुरता पर भी खूब क्रोध आता. उन के शाम को जल्दी आ जाने पर भी खीजी हुई मैं रसोई से ही चाय बना कर पिंकी के हाथ भिजवा देती और स्वयं काम में उलझ रहती. थोड़ी देर पिंकी के साथ गुप्पें लड़ा कर राकेश फिर बाहर चले जाते.

मुझे महसूस होता मेरे अंदर एक बांध है जो किसी दिन टूट जाएगा तो सबकुछ उस में बह जाएगा. पर यह बांध कभी टूट नहीं पाया. ठंडी रिक्तता हम दोनों के बीच बनी रही.

रंजू ने इस बीच बीटैक कर ली थी. देहरादून के रिसर्च इंस्टिट्यूट में जब उस की नौकरी लग गई तो मैं और पिंकी काफी अकेले पड़ गए. अकसर रंजू से मोबाइल पर बात होती रहती थी. उसे मेरी बहुत याद आती थी.

फिर एक दिन रंजू का मैसेज आया, ‘‘मैं ने अपनी पसंद की एक ईसाई लड़की से कचहरी में शादी करर ली है. ऐसा इसलिए किया क्योंकि शायद पता चलने पर आप और पिताजी इस के लिए कभी राजी न होते. कुछ दिन बाद छुट्टियां मिलने पर आप का आशीर्वाद लेने आऊंगा.’’

मैसेज पढ़ कर मैं तो एकदम से टूट ही गई. कैसे पलपल घुटघुट कर सारी इच्छाएं और उमंगें मैं ने रंजू पर कुरबान कर दी थीं और उस ने मुझे शादी कर के कैसे सूचना भेजी है. अपनी इस जीवनसंध्या में जब मैं पिंकी के ससुराल जाने के बाद रंजू की बहू से ही दिल बहलाने के ढेरों ख्वाब संजो रही थी, वे सारे उस के पत्र ने बिखेर कर रख दिए. उस की उम्र ही अभी क्या थी जो शादी कर ली. शहरों में तो लड़के 30-32 में शादी करते हैं.

राकेश तो मैसेज पढ़ कर खूब हंसे.

बोले, ‘‘देख लिया बच्चों पर बेहद कुरबान होने का नतीजा. न तुम इधर की रहीं, न उधर की. और भुगतोे.’’

राकेश तो कह कर रोज की तरह लापरवाही से बाहर चले गए, पर मैं बहुत रोई थी. काफी दिन उदास रही. मन ही मन रोती रही. गुस्से के मारे रंजू को बधाई भी नहीं दी. पिंकी उन दिनों मैडिकल की पढ़ाई कर रही थी. अब जिंदगी के इस पड़ाव पर आ कर मैं अकेली रह गई थी तो इस के लिए किस को दोष देती. शायद इस में राकेश का कम और मेरा ज्यादा दोष था या सिर्फ मेरा ही था.

तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया. मैं अपने में लौट आई. राकेश घूम कर लौट आए थे. मुझे उदास देख कर लापरवाही से बोले, ‘‘क्यों भई, यह उदासी कैसी है? अरे हां, मैं तो तुम्हें शाम को बताना ही भूल गया. मैं तो खाना खा कर आया हूं, तुम खा लो. फिर जरा मेरी तैयारी करनी है. 3-4 दिन के लिए दफ्तर की तरफ से मुझे कल लखनऊ जाना है,’’ कह कर वे स्वयं भी अपना सामान अटैची में रखने लगे.

मैं असमंजस में पड़ कर सामान रखवाने लगी कि पीछे से अकेली कैसे रहूंगी. खैर, मैं ने

खाना यों ही समेट कर रख दिया. भूख न जाने कहां उड़ गई थी. पूरी रात न जाने कैसेकैसे संकल्प करती रही.

सुबह मैं ने उन्हें विदा किया. पर अब मैं उदास नहीं थी. सोचा, जैसे भी हो जो गुजर गया है उस लौटाना होगा मुझे. आगत के सामने नए सिरे से खड़े हो सकने की सामर्थ्य तो पैदा करनी ही होगी अपने अंदर. राकेश के साथ हर पल गुजारने के लिए उन के मनमुताबिक बनना ही होगा मुझे.

दोपहर को बाजार जा कर अच्छी सी

दुकान से पैर और हाथ साफ करने का सारा सामान, कोल्ड क्रीम, हैंड लोशन, ग्लिसरीन, गुलाबजल, नेलपौलिश, इत्र यहां तक कि बाल काले करने का तेल भी खरीद लाई. एक पास के ब्यूटी सैलून में गई और बालों से ले कर पैरों तक को ट्रीट कराया. 3-4 घंटे लगे और कुछ हजार का बिल भी आया पर मुझे संतोष था कि मैं सही कर रही हूं.

फिर पता ही नहीं चला कि 4 दिन कैसे गुजर गए. मैं शीशे के आगे स्वयं जाजा कर कायाकल्प पर हैरान होती रहती. आखिर राकेश दौरे से लौटे. दरवाजा खुलते ही मुझे देख कर हैरान हो गए.

मैं उन से लिपट कर बोली, ‘‘भूल गई थी मैं कि जीवनसाथी जीवनसाथी ही होता है. हम दोनों की ही जीवनसंध्या अब करीब है. जिंदगी के इस पड़ाव पर हमें एकदूसरे की सख्त जरूरत है. अब से हर पल मैं तुम्हारी हूं.’’

सुन कर और हाथ की अटैची नीचे रख कर राकेश ने मुझे गरमजोशी से गले लगा लिया.

मानसून में गर्भवती महिलाएं और नवजात बच्चे की सेहत का ध्यान रखें कुछ ऐसे

बारिश के मौसम में वायरल इंफेक्शन या फ्लू जैसी बीमारियों का कहर बढ़ जाता है. इस मौसम में हेल्दी रहने के लिए सभी लोगों को सावधानियां बरतनी पड़ती है. खासकर गर्भवती महिलाओं को मानसून में स्पेशल केयर की जरूरत होती है. अगर आप प्रेग्नेंट हैं, तो प्रेग्नेंसी से जुड़ी कुछ अहम बातों का खास ख्याल रखकर मानसून का आनंद उठा सकती हैं.

इस बारें में पुणे की मदरहुड अस्पताल की वरिष्ठ सलाहकार प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. शालिनी विजय कहती है कि अन्य मौसम की तुलना में मानसून के दौरान संक्रमण का खतरा अधिक रहता है. इस मौसम में डेंगू और मलेरिया भी तेजी से फैलने लगता है, ऐसे में प्रेग्नेंसी के दौरान बीमार पड़ने से गर्भ में पल रहे बच्चे की सेहत पर भी सीधा असर पड़ सकता है. इसलिए मानसून के दौरान गर्भवती महिलाएं या जिसने बच्चे को जन्म दिया हो, उन्हें खुद की और नवजात की सेहत का ध्यान रखना काफी जरूरी हैं. कुछ विशेष सुझाव निम्न है,

  1. डाइट पर रखे ध्यान
  • इस मौसम में बाकी मौसम की तरह सब्जियां नहीं मिलती, हरी साग-सब्जियां भले ही मिल जाय, लेकिन उसमे कई तरह के कीड़े या उनके अंडे हो सकते है,
  • अगर हरी पत्तेदार सब्जियां खाने का मन है, उन्हें ठीक तरीके से थोड़े गर्म पानी से धो लें,
  • गर्भवती महिलाओं को जंक फूड मानसून में अवॉयड करना चाहिए,
  • प्रेग्नेंसी में फल खाएं, लेकिन इसे अच्छी से धो लें,
  • बारिश में पानी फिल्टर या उबालकर ही पिएं, इसके अलावा घर में निकालकर फ्रेश फ्रूट्स के जूस पिएं, नींबू और नारियल पानी भी पी सकती है.

2. खतरा इन्फेक्शन का

  • मानसून में इंफेक्शन से बचने के लिए साफ-सफाई का ध्यान जरूरी होता है, क्योंकि इस समय वातावरण में नमी बढ़ जाती है, ऐसे में जरा भी गंदगी स्किन इंफेक्शन बढ़ा सकती है.
  • थोड़ी सी भी नमी वाले कपडे न पहने,
  • इसके अलावा जिन महिलाओं को ऑपरेशन से बच्चे हुए हैं टांका ताजा है, वे उस स्थान को एकदम सूखा रखें, अन्यथा टांके टूट सकते हैं.
  • पानी में नीम की पत्तियां डालकर भी नहाना भी एक अच्छा विकल्प हैं, इससे जर्म्स पनपने का खतरा कम होता हैं.

3. नवजात का खास ख्याल रखना जरुरी

इसके आगे डॉक्टर शालिनी कहती है कि मानसून में डिलीवरी के बाद नवजात की सेहत का ध्यान रखना भी सबसे अधिक आवश्यक है, क्योंकि जन्म के बाद बच्चा एक अलग माहौल में रहता है और उससे बाहर के मौसम से सामंजस्य बिठाने में समय लगता है. इस मौसम में महिलाएं जब बच्चों को स्तनपान कराती हैं, तो उन्हें ध्यान रखना चाहिए कि दूध के साथ पसीना बच्चे के मुंह में न चली जाए, क्योंकि मानसून चिपचिपी गर्मी का समय है, पसीना आना स्वाभाविक है. ऐसे में स्टरलाइज किये हुए कॉटन बॉल से निप्पल के चारों ओर साफ़ कर लें. नवजात के लिए भी हर तरह सावधानियां उसे सेहतमंद बनाती है, इसलिए पेरेंट्स को इसका खास ध्यान रखनी चाहिए,

  • मानसून के दौरान इन्फेक्शन वाली बिमारी बढने का खतरा अधिक होने की वजह से नवजात शिशु के बीमार होने की संभावना अधिक होती हैं. इस वजह से माता-पिता के रूप में, बच्चे को मानसून की इन्फेक्शन से बचाने के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है. कुछ सावधानियां निम्न है,
  • बरसात में बच्चे को बिमारी के संक्रमण से बचाने के लिए बीमार व्यक्ति के संपर्क से बच्चे को दूर रखें.
  • बारिश में छाता, रेनकोट और रेनबूट का इस्तेमाल करें.
  • इस मौसम में तापमान बदलता रखता हैं. इसलिए नमी को दूर रखने के लिए बच्चे को आरामदायक सूती कपड़े पहनाएं, लेकिन जब मौसम सर्द हो जाए, तो हमेशा बनियान या जैकेट साथ रखें, ताकि जरुरत के अनुसार उन्हें पहना सकें.
  • हमेशा सुनिश्चित करें कि शिशु के कपड़े पूरी तरह सूखे हों. बारिश में कपड़े नमी जल्दी सोख लेते हैं, जिससे फंगल इन्फेशन होने का खतरा रहता है.
  • इसके अलावा बच्चे को इस मौसम में एक मिनट के लिए भी गीला डायपर न पहनाए.
  • बरसात में, बच्चे अन्य मौसमों की तुलना में अधिक पेशाब करते हैं, जिससे त्वचा पर चकत्ते हो सकते हैं. यहां तक कि हल्का नम डायपर भी त्वचा पर चकत्ते पैदा कर सकता है साथ ही नवजात शिशुओं को ठंड का एहसास करा सकता है. इसलिए याद रखें कि जैसे ही आपको लगे कि शिशु की नैपी गीली या गंदी है, उसे तुरंत बदल दें.
  • बुखार, शारीरिक दर्द, छींक और अन्य लक्षण मानसून से संबंधित बीमारियों की विशेषता हैं और ये वायरल संक्रमण होने का लक्षण हैं. ऐसा होने पर बच्चे के डॉक्टर से संपर्क करें और बीमारी से लड़ने के लिए उचित सावधानी बरतें,
  • मच्छर के काटने से नवजात शिशु को गंभीर परेशानी हो सकती है. बच्चे के लिए मच्छरदानी का इस्तेमाल करें, ताकि वह अच्छी नींद ले सके. शाम होने पर मच्छर से बचाने के लिए बच्चों को पूरे कपडे पहनाएं.
  • नवजात बच्चे को रोजाना नहाने की आवश्यकता नहीं होती हैं, क्योंकि वह ज्यादातर घर के अंदर ही रहते है. मानसून में शिशु को सप्ताह में दो से तीन बार नहलाना जरूरी होता है, अगर बच्चे को बाहर लेकर गए, तो घर पर वापस आने पर उसे गर्म पानी से नहलाना अच्छा होता है.

सिंगल मदर अभिनेत्री बरखा बिस्ट सभी से क्या कहना चाहती हैं, पढ़े इंटरव्यू

बरखा बिस्ट का जन्म और पालन-पोषण हिसार, हरियाणा के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. उन्होंने अपनी शुरुआती पढाई कोलकाता और पुणे से किया है. ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौरान ही बरखा ने मॉडलिंग करना शुरू कर दिया था. वर्ष 2000 में बरखा ने एनडीए क्वीन ब्यूटी पेजेंट में भाग लिया और उस ब्यूटी पेजेंट की विनर बनी, जिससे बरखा को अभिनय क्षेत्र में आने की प्रेरणा मिली .

मॉडलिंग में आने के बाद बरखा ने अभिनय के क्षेत्र में जाने का फैसला किया, लेकिन उनके पिता को यह मंजूर नहीं था. हालाँकि, वह उनकी इच्छा के विरुद्ध गई और अभिनय में अपना करियर बनाने के लिए मुंबई चली आई. उनके पिता ने उनसे तब बात करना बंद कर दिया था और उन्होंने भी लगभग दो महीने तक अपने पिता से बात नहीं की. हालाँकि, उनकी माँ और बहन के समझाने के बाद उनके पिता मान गए.

 

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मुंबई में रहने के दौरान उन्हें अपना पहला टीवी शो कितनी मस्त है जिंदगी में उदिता का किरदार निभाया. इसके बाद उन्होंने कई शो कसौटी ज़िंदगी की, क्या होगा निम्मो का और काव्यांजलि जैसे कई शो में कैमियो की भूमिका की है.

काम के दौरान बरखा का परिचय अभिनेता और को स्टार इंद्रनील सेनगुप्ता से हुआ, प्यार हुआ और शादी की. इन्द्रनील से शादी से पहले उन्होंने अपने पूर्व प्रेमी करण सिंह ग्रोवर से सगाई की थी, लेकिन यह रिश्ता 2006 में समाप्त हो गया था. इन्द्रनील से शादी के बाद बरखा एक बेटी मीरा की माँ बनी, लेकिन आपसी मन मुटाव के चलते वर्ष 2021 में दोनों अलग हो गए, लेकिन इन्द्रनील के साथ बरखा की जान – पहचान अभी भी जारी है, वे अपने बेटी से मिलने, बीच – बीच में आते रहते है.

अभिनय के अलावा बरखा ने कॉमेडी सर्कस के अजूबे और पॉपकॉर्न जैसे शो को भी होस्ट किया हैं. वर्ष 2008 में डांस शो सास बनाम बहू में उन्होंने एक प्रतियोगी के रूप में भाग लिया. बरखा बिष्ट वर्ष 2010 की बॉलीवुड फिल्म “राजनीति” के “इश्क बरसे” गाने में भी दिखाई दी. इन दिनों बरखा की हॉरर फिल्म 1920: हॉरर्स ऑफ़ द हार्ट रिलीज हो चुकी है, जिसमे उन्होंने माँ की भूमिका निभाई है. उन्होंने खास गृहशोभा के लिए बात की आइये जानते है, बरखा की जर्नी और सिंगल मदर बनने की कहानी, उनकी जुबानी.

इस फिल्म को करने की खास वजह के बारें में पूछने पर बरखा कहती है कि मैंने हॉरर जोनर में कोई फिल्म पहले नहीं की थी, इसे ट्राई करने की इच्छा से इसे किया. इसके अलावा ये निर्देशक विक्रम भट्ट की फ्रेंचाइजी फिल्म है, इसलिए करना जरुरी लगा. मुझे हॉरर फिल्म देखना बहुत पसंद है और मुझे डर भी नहीं लगता. इस बार मैंने हॉरर फिल्म में अभिनय कर दर्शकों को डराने का जिम्मा लिया है.

बरखा खुद माँ है, ऐसे में माँ की भूमिका निभाना उनके लिए मुश्किल नहीं था, लेकिन फ़िल्मी माँ और रियल माँ में अंतर अवश्य होता है. वह कहती है कि माँ के इमोशन को पर्दे पर दिखाना आसान होता है, सारे इमोशन नैचुरल तरीके से आते है. रिलेटेबल चरित्र भी होता है, जो अपने बेटी को प्यार करती है, उसे प्रोटेक्ट करती है, उसका ख्याल रखती है, जो भी हो जाय, पर उसका ध्यान रखना नहीं छोडती. ऐसा मैं अपनी 11 साल की बेटी मीरा के लिए भी करती हूँ, लेकिन ड्रामा पर्दे पर अधिक होता है, रियल में इतना नहीं होता.

 

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आगे बरखा कहती है कि फिल्म और रियल लाइफ में बदला व्यक्ति कई बार लेता है. रियल लाइफ में अगर किसी बेटी के साथ भी कुछ गलत होता है और उसमे बदला लेने की सामर्थ्य है, तो वह अवश्य बदला लेती है, क्योंकि रिवेंज यानि बदला एक इमोशन है, ये किसी के साथ कभी भी हो सकता है.

हॉरर फिल्मों की शेल्फ लाइफ बहुत कम होती है, क्योंकि एक बार देखने के बाद लोग उसे देखना पसंद नहीं करते, इस बारें में बरखा कहती है कि आज केवल हॉरर फिल्में ही नहीं, हर फिल्म की शेल्फ लाइफ कम हो चुकी है. कोविड के बाद से सारे थिएटर की फिल्में सफर कर रही है. आज किसी भी फिल्म को दुबारा देखने की इच्छा नहीं होती. हर जोनर के पिक्चर की सेल्फलाइफ छोटी हो गई है, लेकिन हॉरर की एक कमिटेड ऑडियंस है और उन्हें ऐसी फिल्में देखना पसंद है, साथ ही ऐसी फिल्में कम बनती है, लेकिन ये फिल्म सबको अच्छी लग रही है. फिल्म का अच्छा होना, ऑडियंस को एंगेज कर पाना ही किसी फिल्म की सफलता का राज है.

ओटीटी पर फिल्मों का अधिक सक्रिय होने की वजह से फिल्मों का स्तर कम होता जा रहा है, इस बात से आप कितनी सहमत रखती है? बरखा कहती है कि ये सारी चीजे डिमांड और सप्लाई पर आधारित होती है, जब डिमांड बढ़ता है तो सप्लाई को भी बढ़ाना पड़ता है, और यहाँ ये एक क्रिएटिव फील्ड है, कोई प्रोडक्ट नहीं. डिमांड बढ़ने से कुछ फिल्मों के कंटेंट अच्छी न होने पर भी बन जाती है. ये हर चीज के लिए दुनिया में लागू होती है. ओटीटी का भी यही हाल हो रहा है, क्योंकि क्रिएटिव फील्ड में मशीन की तरह क्रिएटिविटी को दिखाया नहीं जा सकता.

इसलिए इसमे गिरावट आ रही है, जबकि लोगों की आशाएं बहुत अधिक हो चुकी है, क्योंकि उन्होंने वैसी अच्छी फिल्में पहले देखी है. यहाँ ये भी समझना जरुरी है कि जो लोग वैसी फिल्में या वेब सीरीज बना रहे है, उन्हें भी पता नहीं है कि उनका काम सही नहीं हो रहा है, उनके हिसाब से वे सही फिल्म बना रहे है. दर्शक ही ऐसी फिल्मों को नकार सकते है. देखा जाय तो क्रिएटिव फील्ड सबसे अधिक अनस्टेबल है. कंटेंट की अभी बहुत अधिक जरुरत है, आज निर्माता, निर्देशक किसी भी आईडिया के पीछे भाग रहे है, वे फटाफट कुछ बनाकर डाल देते है, जबकि कंटेंट अच्छी नहीं होती है.

 

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एक्टिंग के अलावा बरखा अभी एक सिंगल माँ है, क्योंकि वह एक्टर इन्द्रनील दासगुप्ता से अलग हो चुकी है. वह कहती है कि मेरी बेटी 11 साल की है, जिसका बहुत ख्याल रखना पड़ता है. आज के बच्चों के पास सबकुछ जानने का बहुत बड़ा माध्यम है, उन्हें मुझे वक्त देने की जरुरत होती है, उन्हें मोनिटर करना पड़ता है. सिंगल मदर का स्ट्रगल बहुत अधिक होता है, पर ये मेरे और मेरी बेटी के जीवन का नया फेज है, इसमें गलत या सही करते हुए मैं आगे बढ़ रही हूँ और अच्छा करने की कोशिश कर रही हूँ.

इसके आगे वह कहती है कि सिंगल मदर बनना आसान नहीं होता, कई बार मैं रियेक्ट कर देती हूँ, फिर सोची कि जिसे जो कहना है कहें. मेरी जिंदगी को मुझे जीना है जिसमे मेरी एक बेटी है. हम दोनों को एक दूसरे से अच्छी बोन्डिंग हो इसकी कोशिश रहती है.

इतने सालों की जर्नी कैसी रही, कोई रिग्रेट है क्या? वह कहती है कि मुझे किसी प्रकार की कोई रिग्रेट नहीं है. मैंने टीवी, वेव फिल्म्स, फिल्में आदि सब कर चुकी हूँ. यंग लड़की से शुरू कर अब माँ का भी अभिनय कर रही हूँ. मुझे कोई कंप्लेन नहीं रहा, आज भी अच्छा काम कर रही हूँ. कोई रिग्रेट नहीं है.

डेली दिनचर्या के बारें में बरखा का कहना है कि मेरी जिंदगी अभी आम महिला की जिंदगी हो चुकी है, जिसमे सुबह उठकर बच्चे को स्कूल भेजना, उसकी पढाई देखना, आदि करना पड़ता है. इसके बाद जो समय बचता है, अभिनय और सोशल लाइफ, फ्रेंड्स, ट्रेवलिंग आदि करती हूँ. आगे 3 से 4 साल तक मेरा फोकस पूरी तरह से बेटी पर रहेगा. सभी माओं से मेरा कहना है कि बच्चे को कभी रोके नहीं, जितना हो सकें प्रोटेक्ट करें. प्रोटेक्ट का अर्थ यहाँ यह है कि उसे इतना आत्मनिर्भर और समझदार बना दें, ताकि बड़े होकर किसी भी परिस्थिति में बच्चे खुद को प्रोटेक्ट कर सकें, क्योंकि एक उम्र के बाद बच्चे खुद सारी चीजे करते है और ये जरुरी भी है. पेरेंट्स का साथ बच्चों के साथ केवल थोड़े समय के लिए ही होता है, इसलिए उनका साथ इस समय अवश्य देते

बरखा बिस्ट का जन्म और पालन-पोषण हिसार, हरियाणा के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. उन्होंने अपनी शुरुआती पढाई कोलकाता और पुणे से किया है. ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौरान ही बरखा ने मॉडलिंग करना शुरू कर दिया था. वर्ष 2000 में बरखा ने एनडीए क्वीन ब्यूटी पेजेंट में भाग लिया और उस ब्यूटी पेजेंट की विनर बनी, जिससे बरखा को अभिनय क्षेत्र में आने की प्रेरणा मिली .

 

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मॉडलिंग में आने के बाद बरखा ने अभिनय के क्षेत्र में जाने का फैसला किया, लेकिन उनके पिता को यह मंजूर नहीं था. हालाँकि, वह उनकी इच्छा के विरुद्ध गई और अभिनय में अपना करियर बनाने के लिए मुंबई चली आई. उनके पिता ने उनसे तब बात करना बंद कर दिया था और उन्होंने भी लगभग दो महीने तक अपने पिता से बात नहीं की. हालाँकि, उनकी माँ और बहन के समझाने के बाद उनके पिता मान गए.

मुंबई में रहने के दौरान उन्हें अपना पहला टीवी शो कितनी मस्त है जिंदगी में उदिता का किरदार निभाया. इसके बाद उन्होंने कई शो कसौटी ज़िंदगी की, क्या होगा निम्मो का और काव्यांजलि जैसे कई शो में कैमियो की भूमिका की है.

काम के दौरान बरखा का परिचय अभिनेता और को स्टार इंद्रनील सेनगुप्ता से हुआ, प्यार हुआ और शादी की. इन्द्रनील से शादी से पहले उन्होंने अपने पूर्व प्रेमी करण सिंह ग्रोवर से सगाई की थी, लेकिन यह रिश्ता 2006 में समाप्त हो गया था. इन्द्रनील से शादी के बाद बरखा एक बेटी मीरा की माँ बनी, लेकिन आपसी मन मुटाव के चलते वर्ष 2021 में दोनों अलग हो गए, लेकिन इन्द्रनील के साथ बरखा की जान – पहचान अभी भी जारी है, वे अपने बेटी से मिलने, बीच – बीच में आते रहते है.

अभिनय के अलावा बरखा ने कॉमेडी सर्कस के अजूबे और पॉपकॉर्न जैसे शो को भी होस्ट किया हैं. वर्ष 2008 में डांस शो सास बनाम बहू में उन्होंने एक प्रतियोगी के रूप में भाग लिया. बरखा बिष्ट वर्ष 2010 की बॉलीवुड फिल्म “राजनीति” के “इश्क बरसे” गाने में भी दिखाई दी. इन दिनों बरखा की हॉरर फिल्म 1920: हॉरर्स ऑफ़ द हार्ट रिलीज हो चुकी है, जिसमे उन्होंने माँ की भूमिका निभाई है. उन्होंने खास गृहशोभा के लिए बात की आइये जानते है, बरखा की जर्नी और सिंगल मदर बनने की कहानी, उनकी जुबानी.

इस फिल्म को करने की खास वजह के बारें में पूछने पर बरखा कहती है कि मैंने हॉरर जोनर में कोई फिल्म पहले नहीं की थी, इसे ट्राई करने की इच्छा से इसे किया. इसके अलावा ये निर्देशक विक्रम भट्ट की फ्रेंचाइजी फिल्म है, इसलिए करना जरुरी लगा. मुझे हॉरर फिल्म देखना बहुत पसंद है और मुझे डर भी नहीं लगता. इस बार मैंने हॉरर फिल्म में अभिनय कर दर्शकों को डराने का जिम्मा लिया है.

 

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बरखा खुद माँ है, ऐसे में माँ की भूमिका निभाना उनके लिए मुश्किल नहीं था, लेकिन फ़िल्मी माँ और रियल माँ में अंतर अवश्य होता है. वह कहती है कि माँ के इमोशन को पर्दे पर दिखाना आसान होता है, सारे इमोशन नैचुरल तरीके से आते है. रिलेटेबल चरित्र भी होता है, जो अपने बेटी को प्यार करती है, उसे प्रोटेक्ट करती है, उसका ख्याल रखती है, जो भी हो जाय, पर उसका ध्यान रखना नहीं छोडती. ऐसा मैं अपनी 11 साल की बेटी मीरा के लिए भी करती हूँ, लेकिन ड्रामा पर्दे पर अधिक होता है, रियल में इतना नहीं होता.

आगे बरखा कहती है कि फिल्म और रियल लाइफ में बदला व्यक्ति कई बार लेता है. रियल लाइफ में अगर किसी बेटी के साथ भी कुछ गलत होता है और उसमे बदला लेने की सामर्थ्य है, तो वह अवश्य बदला लेती है, क्योंकि रिवेंज यानि बदला एक इमोशन है, ये किसी के साथ कभी भी हो सकता है.

हॉरर फिल्मों की शेल्फ लाइफ बहुत कम होती है, क्योंकि एक बार देखने के बाद लोग उसे देखना पसंद नहीं करते, इस बारें में बरखा कहती है कि आज केवल हॉरर फिल्में ही नहीं, हर फिल्म की शेल्फ लाइफ कम हो चुकी है. कोविड के बाद से सारे थिएटर की फिल्में सफर कर रही है. आज किसी भी फिल्म को दुबारा देखने की इच्छा नहीं होती. हर जोनर के पिक्चर की सेल्फलाइफ छोटी हो गई है, लेकिन हॉरर की एक कमिटेड ऑडियंस है और उन्हें ऐसी फिल्में देखना पसंद है, साथ ही ऐसी फिल्में कम बनती है, लेकिन ये फिल्म सबको अच्छी लग रही है. फिल्म का अच्छा होना, ऑडियंस को एंगेज कर पाना ही किसी फिल्म की सफलता का राज है.

ओटीटी पर फिल्मों का अधिक सक्रिय होने की वजह से फिल्मों का स्तर कम होता जा रहा है, इस बात से आप कितनी सहमत रखती है? बरखा कहती है कि ये सारी चीजे डिमांड और सप्लाई पर आधारित होती है, जब डिमांड बढ़ता है तो सप्लाई को भी बढ़ाना पड़ता है, और यहाँ ये एक क्रिएटिव फील्ड है, कोई प्रोडक्ट नहीं. डिमांड बढ़ने से कुछ फिल्मों के कंटेंट अच्छी न होने पर भी बन जाती है. ये हर चीज के लिए दुनिया में लागू होती है. ओटीटी का भी यही हाल हो रहा है, क्योंकि क्रिएटिव फील्ड में मशीन की तरह क्रिएटिविटी को दिखाया नहीं जा सकता. इसलिए इसमे गिरावट आ रही है, जबकि लोगों की आशाएं बहुत अधिक हो चुकी है, क्योंकि उन्होंने वैसी अच्छी फिल्में पहले देखी है. यहाँ ये भी समझना जरुरी है कि जो लोग वैसी फिल्में या वेब सीरीज बना रहे है, उन्हें भी पता नहीं है कि उनका काम सही नहीं हो रहा है, उनके हिसाब से वे सही फिल्म बना रहे है. दर्शक ही ऐसी फिल्मों को नकार सकते है. देखा जाय तो क्रिएटिव फील्ड सबसे अधिक अनस्टेबल है. कंटेंट की अभी बहुत अधिक जरुरत है, आज निर्माता, निर्देशक किसी भी आईडिया के पीछे भाग रहे है, वे फटाफट कुछ बनाकर डाल देते है, जबकि कंटेंट अच्छी नहीं होती है.

एक्टिंग के अलावा बरखा अभी एक सिंगल माँ है, क्योंकि वह एक्टर इन्द्रनील दासगुप्ता से अलग हो चुकी है. वह कहती है कि मेरी बेटी 11 साल की है, जिसका बहुत ख्याल रखना पड़ता है. आज के बच्चों के पास सबकुछ जानने का बहुत बड़ा माध्यम है, उन्हें मुझे वक्त देने की जरुरत होती है, उन्हें मोनिटर करना पड़ता है. सिंगल मदर का स्ट्रगल बहुत अधिक होता है, पर ये मेरे और मेरी बेटी के जीवन का नया फेज है, इसमें गलत या सही करते हुए मैं आगे बढ़ रही हूँ और अच्छा करने की कोशिश कर रही हूँ.

इसके आगे वह कहती है कि सिंगल मदर बनना आसान नहीं होता, कई बार मैं रियेक्ट कर देती हूँ, फिर सोची कि जिसे जो कहना है कहें. मेरी जिंदगी को मुझे जीना है जिसमे मेरी एक बेटी है. हम दोनों को एक दूसरे से अच्छी बोन्डिंग हो इसकी कोशिश रहती है.

इतने सालों की जर्नी कैसी रही, कोई रिग्रेट है क्या? वह कहती है कि मुझे किसी प्रकार की कोई रिग्रेट नहीं है. मैंने टीवी, वेव फिल्म्स, फिल्में आदि सब कर चुकी हूँ. यंग लड़की से शुरू कर अब माँ का भी अभिनय कर रही हूँ. मुझे कोई कंप्लेन नहीं रहा, आज भी अच्छा काम कर रही हूँ. कोई रिग्रेट नहीं है.

डेली दिनचर्या के बारें में बरखा का कहना है कि मेरी जिंदगी अभी आम महिला की जिंदगी हो चुकी है, जिसमे सुबह उठकर बच्चे को स्कूल भेजना, उसकी पढाई देखना, आदि करना पड़ता है. इसके बाद जो समय बचता है, अभिनय और सोशल लाइफ, फ्रेंड्स, ट्रेवलिंग आदि करती हूँ. आगे 3 से 4 साल तक मेरा फोकस पूरी तरह से बेटी पर रहेगा. सभी माओं से मेरा कहना है कि बच्चे को कभी रोके नहीं, जितना हो सकें प्रोटेक्ट करें. प्रोटेक्ट का अर्थ यहाँ यह है कि उसे इतना आत्मनिर्भर और समझदार बना दें, ताकि बड़े होकर किसी भी परिस्थिति में बच्चे खुद को प्रोटेक्ट कर सकें, क्योंकि एक उम्र के बाद बच्चे खुद सारी चीजे करते है और ये जरुरी भी है. पेरेंट्स का साथ बच्चों के साथ केवल थोड़े समय के लिए ही होता है, इसलिए उनका साथ इस समय अवश्य देते रहे.

झूठ पुरुष ही क्यों बोलते हैं

सुरेश ने फोन पर नीलम से कहा कि उसे घर आने में देर होगी और आज रात की पार्टी में नहीं जा सकेगा. नीलम को पहले तो गुस्सा आया, लेकिन फिर सुरेश के काम की व्यस्तता को समझ कर चुप रह गई. वह अपनी सहेली से फोन पर बात कर ही रही थी कि अचानक दरवाजे की घंटी बजी. दरवाजा खोला, तो सामने सुरेश हंसता हुआ खड़ा था क्योंकि उसे पता था कि नीलम गुस्सा होगी.

अब नीलम ने सहेली के साथ बात करना बंद किया और सुरेश को डांटने लगी कि यह कैसा झूठ है, जो मुझे तकलीफ दे? सुरेश ने हंसते हुए जवाब दिया कि मैं तुम्हें सरप्राइज देना चाहता था, इसलिए ऐसा किया. अब नीलम मान गई और दोनों पार्टी में चले गए.

यह मजेदार, छोटा सा झूठ था और सरप्राइज होने की वजह से सब ठीक हो गया, लेकिन ऐसी कई घटनाएं देखी गई हैं, जहां झूठ बोलने की आदत ने सारे रिश्ते खत्म कर दिए.

‘सफेद झूठ,’ ‘झूठ बोले कौआ काटे,’ ‘आमदनी अठन्नी’ आदि कई ऐसी फिल्में हैं, जो झूठ बोलने को ले कर ही कौमेडी के रूप में बनाई गईं और दर्शकों ने इन फिल्मों को पसंद किया क्योंकि ये परदे पर थीं, रियल लाइफ में नहीं. मगर झूठ बोलने की आदत कई बार जीवन के लिए खतरनाक भी हो जाती है और इस झूठ को सच साबित करने में सालों लग जाते हैं.

बारबार झूठ बोलना

यह सही है कि हर धर्म में झूठी बातों का शिकार महिलाएं ही हुई हैं. इन्हें कहने वाले पुरुष ही हैं क्योंकि महिलाएं संवेदनशील होती हैं और इन धर्मगुरुओं की बातों को सहजता से मान लेती हैं. मसलन, बीमार होने पर भी व्रत या उपवास करना, अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए नंगे पांव मीलों चलना आदि सभी निर्देशों को महिलाएं सच्चे मन से पूरा करती हैं.

रिसर्च में भी यह बात सामने आई है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में झूठ कम बोल पाती हैं. असल में अधिकतर महिलाएं पुरुषों से अधिक सैंसिटिव और ईमानदार होती हैं. उन पर लोग आसानी से ट्रस्ट कर सकते हैं. इसलिए उन्हें अधिक झूठ बोलने की जरूरत नहीं पड़ती. जैंडर को ले कर शोध करने पर यह भी पाया गया कि झूठ बोलने से अगर झूठ बोलने वाले को फायदा होता है, तो वह बारबार झूठ बोलता है. पुरुषों के लगातार झूठ बोलने की वजहें 3 हैं. शेम, प्रोटैक्शन ऐंड रैपुटेशन.

क्या कहते हैं मनोवैज्ञानिक

असल में अपना रियल चेहरा छिपाने के लिए लोग झूठ बोलते हैं ताकि दूसरे की भावनाओं को ठेस न पहुंचे. इस के अलावा दूसरों को इंप्रैस करने, उत्तरदायित्व से पल्ला झड़ने, कुकर्मों को छिपाने के लिए सामाजिक पहलुओं से दूर भागने, कनफ्लिक्ट को दूर करने आदि कई कारणों से झूठ बोलते हैं. मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि झूठ बोलना लाइफ की एक कंडीशन है.

मस्तिष्क की ऐक्टिविटी के बारे में बात की जाए तो पता चलता है कि झूठ बोलने से हमारे मस्तिष्क के कुछ पार्ट स्टिम्युलेट भी हो जाते हैं. इन में पहले फ्रंटल लोब यानी मस्तिष्क के सब से आगे के हिस्से में क्षमता सचाई को आसानी से दबाने की होती है और यह झूठ को एक इंटैलेक्चुअल तरीके से रखने की क्षमता रखता है. दूसरा लिंबिक सिस्टम, जो अधिकतर ऐंग्जौइटी की वजह से होता है. इस में झूठ बोलना एक धोखा भी माना जाता है और व्यक्ति कई बार अपराधबोध या स्ट्रैस्ड से ग्रस्त हो कर भी झूठ बोलता है. तीसरा टैंपोरल लोब में व्यक्ति झूठ बोलने के बाद आनंद महसूस करता है. झूठ बोलने पर हमारा ब्रेन सब से अधिक व्यस्त रहता है.

झूठ बोलने का सहारा

इस बारे में काउंसलर राशिदा कपाडि़या कहती हैं कि सर्वे में भी यह स्पष्ट है कि झूठ बोलने की आदत लड़कों को बचपन से ही शुरू हो जाती है और यह झूठ वे अपनी मां से अधिकतर बोलते हैं. इस की वजह यह है कि पुरुष संबंधों में कड़वाहट नहीं चाहते क्योंकि सही बात शायद उन के पार्टनर को पसंद न हो, तर्कवितर्क चल सकता है, इसलिए उसे अवौइड करने के लिए पुरुष झूठ का सहारा लेते हैं. इस के अलावा किसी काम को अवौइड करना या सोशल इवेंट में नहीं जाना, हो तो झूठ बोलते रहते हैं, साथ ही पुरुषों का इगो बड़ा होता है. वे अपनी कमजोरियां दिखाना नहीं चाहते. इस वजह से भी झूठ बोलते हैं.

कई बार किसी दूसरे शौक को पूरा करने के लिए झूठ बोलने का सहारा लिया जाता है, साथ ही यह भी देखा गया है कि पुरुषों को गिल्ट फीलिंग महिलाओं की अपेक्षा कम होती है. महिलाओं में अपराधबोध अधिक होता है. वे झूठ बोल कर अधिक समय तक नहीं रह पातीं और सच बोल देती हैं. पुरुष इमोशनल कम होते हैं और प्रैक्टिकल अधिक सोचते हैं. झूठ बोलना उन के लिए बड़ी बात नहीं होती क्योंकि व्यवसाय या जौब में वे छोटाछोटा झूठ बोलते रहते हैं. पुरुषों का झूठ पकड़ना आसान नहीं होता क्योंकि वे बहुत सफाई से झूठ बोल लेते हैं और महिलाएं भी उस पर आसानी से विश्वास कर लेती हैं.

समझौता नहीं आजादी चुनें

तू नहीं तो कोई और सही, कोई और नहीं तो कोई और सही बहुत लंबी है यह जिंदगी, मिल जाएंगे हम को लाखों हसीं.

कुछ ऐसी ही कहानी रही है गुरुग्राम में रहने वाली अनीता की. अनीता एक पंजाबी परिवार की 22 साल की खूबसूरत, लंबी, गोरी लड़की थी जिसे कोई एक बार देख ले तो देखता रह जाए. वह जितनी आकर्षक थी उतनी ही चुलबुली भी. खूब बातें करती थी और नाजुक होने के बावजूद दबंग भी थी. बचपन से उसे अपने लिए इतनी तारीफें सुनने को मिली थीं कि उस के चेहरे से साफ ?ालकता था. उस के पिता बिजनैसमैन थे. घर में पैसों की कोई कमी नहीं थी. मगर एक हादसे में उस के पिता की मौत हो गई. उस वक्त अनीता 17 साल की थी और उस की बड़ी बहन 20 साल की.

पिता के जाने के बाद मां ने अनीता की बहन की शादी जल्दी करा दी ताकि जवान लड़की के साथ कुछ ऊंचनीच न हो जाए. फिर मां अनीता के लिए भी लड़का देखने लगी. पिता के बाद उन की हैसियत किसी बड़े घर में रिश्ते की तो थी नहीं सो मां ने एक साधारण परिवार में उस की शादी करा दी. लड़का प्राइवेट स्कूल में टीचर था. घर में आर्थिक तंगी थी. घर भी छोटा सा था जिस में ननद, देवर और सासससुर समेत कुल 6 प्राणी रहते थे. अनीता ने आगे पढ़ने की इच्छा जताई तो सास ने मना कर दिया.

प्रैगनैंसी सुखद नहीं रही

अनीता के लिए वहां 1-1 दिन काटना कठिन होने लगा. पति देखने में साधारण था. उसे गुस्सा बहुत जल्दी आता था. छोटीछोटी बात पर दोनों लड़ने लगते. पति मारपीट भी करता था. अंत में अनीता ने उस शादी से निकलना ही बेहतर सम?ा और क्व2 लाख ले कर आपसी सहमति से अलग हो गई.

अनीता ने जल्द ही दूसरी शादी कर ली. दूसरे पति की आर्थिक स्थिति थोड़ी बेहतर थी. पैसों की कमी नहीं थी और घर में सदस्य भी कम थे. सिर्फ देवर और ससुर साथ रहते थे. अनीता उस घर में खुश थी. जल्द ही वह प्रैगनैंट भी हो गई. उस दौरान उस के चेहरे पर हमेशा मुसकान खिली रहती. मगर जल्द ही उस की मुसकान छिन गई जब उस का मिसकैरेज हो गया. कुछ समय बाद वह फिर से प्रैगनैंट हुई. मगर इस बार उस की कोख में एक स्पैशल चाइल्ड था जिसे पति के कहने पर उसे अबौर्ट कराना पड़ा. तीसरी बार की प्रैगनैंसी भी उस के लिए सुखद नहीं रही क्योंकि यह बच्चा भी मैंटली रिटार्डेड था.

मगर इस बार अनीता अड़ गई और बच्चे को जन्म दिया. उसे अपने बच्चे से बहुत प्यार था. मगर घर में और कोई उसे पसंद नहीं करता था. अनीता के पति ने उस से साफसाफ कह दिया कि वह बच्चे को ऐसे संस्थान में भेज दे जहां इस तरह के बच्चे रहते हैं. मगर अनीता की ममता ने यह बात स्वीकार नहीं की. पति द्वारा ज्यादा जोर दिए जाने और मानसिक रूप से टौर्चर किए जाने पर उस ने पति के बजाय बेटे को चुना और दूसरी बार फिर से तलाक ले कर अलग हो गई.

इस बार उसे पति से क्व3-4 लाख मिले जिन्हें उस ने बेटे के नाम जमा करा दिया. इतना कुछ सहने के बाद अब अनीता के चेहरे की चमक कम हो चुकी थी. वह थोड़ी परेशान भी रहने लगी थी, मगर उस ने हिम्मत नहीं हारी और एक बार फिर से शादी का फैसला लिया. लड़का उस की सहेली का परिचित था जो काफी अमीर और 2 बच्चों का पिता था. अनीता ने इस रिश्ते के लिए हामी भर दी.

तीसरे पति के साथ भी उस की ज्यादा समय तक निभ नहीं सकी. तीसरे पति की 2 संतानें पहले से थीं. दोनों बच्चे टीनएजर थे और वे अनीता के छोटे बच्चे को काफी परेशान करते थे. अनीता जब इस बात की शिकायत करती तो उस का पति बच्चे को स्पैशल चाइल्ड के स्कूल में भेजने की बात करने लगता. उस के बच्चे के साथ भेदभाव किया जाता. पति प्रौपर्टी डीलर था. घर में  पैसों की कमी नहीं थी. मगर उसे बच्चे पर रुपए खर्च करने से रोका जाता.

छोटीछोटी बातें खटकने लगीं

अनीता को इस तरह की छोटीछोटी बातें खटकने लगीं. एक बार ?ागड़ा शुरू हुआ तो फिर बढ़ता ही गया. बहुत जल्दी अनीता की सम?ा में आ गया कि वह इस शादी को और नहीं खींच सकती. वह अपने आत्मसम्मान और अपने बच्चे का अपमान नहीं देख पाई और अंत में भारी मन से तलाक लेने का फैसला कर लिया.

इस तलाक में अनीता को काफी रुपए मिले जिन्हें उस ने भविष्य के लिए जमा कर लिए. फिर गुरुग्राम की एक अच्छी सोसाइटी में एक किराए का 2 बीएचके फ्लैट ले कर अकेली अपने बेटे के साथ रहने लगी. इनकम के लिए उस ने फ्रीलांस ट्रांसलेटर का काम शुरू किया और अपने बल पर बच्चे का पालनपोषण करने लगी.

तलाक से गुजरने के बाद की मानसिक स्थिति

तलाक से गुजरने वाला शख्स क्या सहता है इस की कल्पना भी नहीं की जा सकती. अनीता के लिए भी वह दौर इतना मुश्किल रहा कि वह भावनात्मक रूप से काफी टूट गई थी. हर बार हालात ऐसे बने कि उसे अलग होने के इस कठिन और कड़वे अनुभव से गुजरने पर मजबूर होना पड़ा. डिवोर्स लेना किसी भी तरह से आसान नहीं होता है क्योंकि एक रिश्ते से प्यार, भावनाएं, यादें, जिम्मेदारियां, परिवार जैसी कई चीजें जुड़ी होती हैं.

हर बार अनीता के अंदर अजीब सी उथलपुथल मची रहती थी. उसे गुस्सा, उदासी और पछतावा सब एकसाथ महसूस होता. कई बार अपनी शादी को निभाने की कोशिश और उसे खत्म करने के फैसले के बीच वह खुद को फंसी हुई भी महसूस करती थी. तलाक के दौरान और उस के बाद कई दफा उसे डिप्रैशन भी महसूस हुआ. वह अंदर ही अंदर दिल के किसी कोने में अपनी शादी को बचाने की उम्मीद रखती पर वास्तव में ऐसा हो पाना संभव नहीं होता. उसे सम?ा आता गया कि वह चाहे कुछ भी कर ले लेकिन अपने रिश्ते को टूटने से नहीं बचा सकेगी. उसे पता था कि उस के पास चीजों को जाने देने के अलावा और कोई चारा नहीं है.

अपने फैसलों से खुश

अनीता ने अपने तीनों तलाक स्वीकार कर लिए थे. वह अब अपने अतीत के दर्दों को भुला कर जीवन के नए पहलू की तरफ आगे बढ़ने की कोशिश करने लगी और इस में सफल भी हो चुकी है. वह हर वक्त अपने दुखों के बारे में सोचने की जगह बच्चे के साथ अपनी जिंदगी को ऐंजौय करने लगी है. वह अब छोटीछोटी चीजों से हमेशा अपनेआप को खुश रखने की कोशिश करती है. उस ने प्रौपर्टी डीलिंग का बिजनैस भी शुरू कर लिया है और घर से ही काम करती है ताकि बेटे को पूरा समय दे सके. कुछ लोग उस के इस कदम को सही नहीं मानते. मगर वह अपने फैसलों से खुश है.

अगर कोई स्त्री तलाक लेती है तो लोग अकसर उसे ही दोषी करार देते हैं. वे कहने लगते हैं कि वह निभाना नहीं जानती होगी. जरूर उस का चक्कर चल रहा होगा या फिर वह बां?ा होगी. लोग यह नहीं सोच पाते कि समस्या पुरुष या उस के परिवार में भी हो सकती है. मुमकिन है कि उस के साथ अत्याचार हो रहा हो या फिर उस के बढ़ते कदमों को रोका जा रहा हो या वह वहां खुश नहीं हो. आखिर औरत हमेशा अपने आत्मसम्मान को दांव पर लगा कर रिश्ते निभाने की कोशिश क्यों करती रहे? एक बार तलाक तो फिर भी समाज द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है? मगर जब बात 2 या 3 तलाक की हो तब लोग औरतों को ही दोषी मान लेते हैं. उन के फैसले पर उंगली उठाई जाती है. श्वेता तिवारी का उदाहरण भी कुछ ऐसा ही है.

श्वेता तिवारी की 2 शादियां और तलाक

टीवी ऐक्ट्रैस श्वेता तिवारी ने भी 2 शादियां कीं, लेकिन दोनों ही शादियां उन के लिए जी का जंजाल बन गईं. पहली शादी राजा चौधरी से हुई जिस पर श्वेता ने घरेलू हिंसा के आरोप लगाए और तलाक ले लिया. राजा से इन्हें 1 बेटी पालक है. इस के बाद श्वेता ने अभिनव कोहली से दूसरी शादी की और बेटे रेयांश का जन्म हुआ. लेकिन यह शादी भी नहीं टिक पाई. अभिनव पर भी श्वेता ने घरेलू हिंसा, गालीगलौज के आरोप लगाए और अलग रहने लग गईं. मिडल क्लास फैमिली की होने की वजह से उन के परिवार ने हमेशा उन्हें शादी न तोड़ने की सलाह दी और कहा था कि एडजस्ट करो. लेकिन वे ऐसे रिश्ते में नहीं रहना चाहती थीं जिस में सम्मान न मिले.

2 शादियां टूटने के बाद लोग श्वेता को तीसरी शादी न करने की सलाह देते हैं. इस पर श्वेता का कहना है कि अगर आप 10 साल तक लिव इन रिलेशनशिप में रहें तो कोई सवाल नहीं करेगा. लेकिन आप 2 साल में शादी तोड़ दें तो लोग सवाल करेंगे कि तुम कितनी शादियां करोगी? कई लोग मु?ो यह भी सलाह देते हैं कि तुम तीसरी शादी मत कर लेना. मगर क्यों? यह मेरा डिसीजन है. मेरी लाइफ है. इंसान को दूसरी क्या 5वी शादी में भी दिक्कत हो तो उसे अलग हो जाना चाहिए.

सवाल यह उठता है कि हम भला दिक्कतों के साथ क्यों जीएं और ये नंबर्स हैं ही क्यों? आप कई अफेयर्स करें तो ठीक है फिर कई शादियां करने में दिक्कत क्यों? गलत व्यक्ति तो आप को दूसरी या तीसरी शादी में भी मिल सकता है. ऐसे में एक ही व्यक्ति के साथ बारबार समस्याओं का सामना करने से अच्छा है कोई दूसरी समस्या डिस्कवर करो. जहां भी समस्या आए तो छोड़ो और आगे बढ़ो.

क्यों न नई शुरुआत करें

दरअसल, जब औरत समझते के बजाय आजादी चुनती है तो पुरातनपंथी लोगों को बहुत कड़वा लगता है. वे औरत को दोष देने लगते हैं. मगर हकीकत में खुश रहने का हक सब को है. किसी अनहैप्पी मैरिज में बने रह कर परेशान रहने के बजाय क्या यह अच्छा नहीं कि स्त्री उस बंधन को तोड़ कर नई शुरुआत करे? तलाक के बाद जिंदगी खत्म नहीं हो जाती. वह दूसरी या तीसरी बार शादी क्यों नहीं कर सकती? उसे भी हक है कि वह अपने लिए बेहतर लाइफ पार्टनर की तलाश करे ताकि उस की जिंदगी की हर कमी पूरी हो सके. अगर ऐसा नहीं हो पाता और उसे बारबार तलाक लेना पड़ता है तो भी इस में गलत क्या है? आखिर दमघोटू माहौल में रह कर मैंटली, फिजिकली सिक होने से तो अच्छा है कि वह बेहतर औप्शन की तलाश करे. कम से कम उस के पास कोशिश करने का हक तो है ही.

अकसर लोगों को कहते सुना जाता है कि पतिपत्नी का रिश्ता तो 7 जन्मों का होता है. हिंदू विवाह में पति और पत्नी के बीच जन्मजन्मांतरों का संबंध माना जाता है जिसे किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ा जा सकता. अग्नि के 7 फेरे ले कर और धु्रव तारे को साक्षी मान कर 2 तन और मन एक बंधन में बंध जाते हैं. हिंदू धर्म में तलाक और लिव इन रिलेशनशिप वगैरह सही नहीं माने जाते हैं. यह मान्यता दृढ़ होती है कि एक बार जिस व्यक्ति का किसी से विवाह हो जाता है तो मृत्युपर्यंत जारी रहता है और उस विवाह में पवित्रता होनी जरूरी होती है.

आंकड़े क्या कहते हैं

यही वजह है कि भारत में तलाक दर  लगभग 1.1त्न होने का अनुमान है जो पूरी

दुनिया में सब से कम है. दुनियाभर में अधिकांश तलाक महिलाओं द्वारा शुरू किए जाते हैं जबकि भारत में ज्यादातर पुरुष ही तलाक की पहल

करते हैं.

एक स्टडी भी कहती है कि दूसरी शादी में तलाक की दर पहली शादी की तुलना में 60त्न से अधिक होती है. ऐसा इसलिए क्योंकि ज्यादातर लोग तनाव में पुनर्विवाह का फैसला करते हैं जो उन्हें कभी भी खुश नहीं रहने देता है. ऐसे में अगर आप भी दूसरी शादी का विचार कर रहे हैं तो कुछ बातों पर पहले से विचार करें:

आप की मरजी या परिवार का प्रैशर

इस में कोई दोराय नहीं कि पार्टनर से अलग होने के बाद की जिंदगी किसी के लिए भी आसान नहीं होती. जिन चीजों की जिम्मेदारी पहले पतिपत्नी मिल कर उठाते थे अलग होने के बाद वह सब अकेले ही मैनेज करना पड़ता है. ऐसे में अगर आप खुद दूसरी शादी करना और पिछला सब भूल कर आगे बढ़ना चाहते हैं तो यह उचित है. लेकिन यदि केवल परिवार के प्रैशर में आ कर दूसरी शादी करने को तैयार होते हैं तो संभव है कि आप आगे चल कर एडजस्ट न कर पाएं. याद रखें परिवार या आप के दोस्त आप को दूसरी शादी के लिए मोटिवेट कर सकते हैं. लेकिन यह आप को खुद तय करना होता है कि आप अपनी लाइफ से क्या चाहते हैं.

पुरानी कड़वाहट साथ ले कर न जाएं

जब लोग पुनर्विवाह करते हैं तो अकसर पुराने रिश्ते की कड़वाहट और कुछ बातों को ले कर पूर्वाग्रह उन के दिलोदिमाग में कायम रहते हैं जो किसी भी नए रिश्ते को मजबूत बनने से रोकने के लिए काफी हैं. इसी तरह अगर आप अभी भी अपने एक्स की यादों से घिरे हुए हैं तो ये कभी आप को नए रिश्ते में बंधने नहीं देंगी. इसलिए खुद को थोड़ा समय दें.

दरअसल, जब हम किसी रिश्ते में अपना 100त्न देते हैं और अचानक से वह रिश्ता खत्म हो जाता है तो वहां कौन्फिडैंस, ऐक्सपैक्टेशंस और सोचनेसम?ाने की क्षमता न के बराबर रह जाती है. ऐसे में सब से जरूरी यही है कि कोई भी फैसला लेने से पहले खुद को थोड़ा समय दें. सोचसम?ा कर फैसला लें और फिर पूरी कोशिश करें कि यह रिश्ता सफल हो जाए.

सोचसमझ कर लें फैसला

दूसरी शादी में डर का होना लाजिम है. लेकिन आप को अपने पार्टनर से अपने विचारों और इच्छाओं को व्यक्त करना होगा. बताना  होगा कि जिंदगी से और लाइफपार्टनर से आप की क्या उम्मीदें हैं. बहुत से लोग अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं जिस की वजह से भी वे दूसरी शादी करने पर विचार करते हैं. हालांकि ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि बिना सही सोचविचार किए पुनर्विवाह से आप की परेशानी कम होने वाली नहीं है.

नए रिश्ते के लिए ईमानदारी

किसी भी नए रिश्ते में बंधने के लिए ईमानदारी का होना बेहद जरूरी है. अगर आप नए रिश्ते की शुरुआत करने की सोच रहे हैं तो खुद से सवाल करिए कि क्या आप वाकई में बच्चों की जिम्मेदारी से ले कर पार्टनर की उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए तैयार हैं? पिछले रिश्ते में कहां क्या गलती हुई, इसे जितना खुल कर आप अपने साथी से डिसकस करेंगे उतना ही आप अपने पार्टनर से जुड़ाव महसूस करेंगी.

किन हालात में महिलाओं के लिए तलाक ही अच्छा है

हमारे देश में लड़की और शादी को इस तरह से लिया जाता है जैसे लड़की का जन्म ही शादी करने के लिए हुआ हो. शादी के बंधन में बंध कर ही उस का जीवन सार्थक होता है और ऐसे में अगर वह तलाक ले ले तो यह उस की जिंदगी की एक बड़ी असफलता समझ जाता है. तलाकशुदा महिला को शादीशुदा जितना सम्मान नहीं मिलता. तलाक के बाद महिला मातापिता पर बोझ समझ जाती है. उस के नाम से डिवोर्सी का टैग जुड़ जाता है. तलाक के बाद अलग तरह की परेशानियां शुरू हो जाती हैं इसलिए महिलाएं अपनी शादी को हर तरह से निभाने की कोशिश करती हैं. मगर किसी भी चीज की सीमा होती है. इन स्थितियों पर तलाक लेना ही बेहतर है:

दहेज की मांग की जा रही हो: अगर शादी के बाद भी आप को दहेज के लिए बातें सुनाई जाती हैं, रातदिन ताने दिए जाते हैं और आप को नीचा दिखाया जाता है तो ऐसे घर में रहना उचित नहीं. दहेज के लोभियों का क्या भरोसा कब वे हिंसक हो उठें और आप की जान पर बन आए. वैसे दहेज लेना और देना दोनों ही कानूनी जुर्म हैं. फिर भी हमारे समाज में दहेज का लालच खत्म नहीं हुआ है. कई दफा दहेज के बिना शादी तो हो जाती है, लेकिन पैसों की मांग शादी के बाद होती है. लड़की पर दबाव बनाया जाता है कि वह अपने घर से पैसे लाए और जब ऐसा नहीं होता तो उस पर अत्याचार किए जाते हैं. शादी बचाने और मातापिता की इज्जत का खयाल कर लड़कियां सब सहती हैं. मगर याद रखें जिस घर में इंसान से ज्यादा पैसे को अहमियत दी जाए वहां आप सुरक्षित नहीं.

घरेलू हिंसा की जा रही हो: अगर शादी के बाद अगर आप के साथ किसी भी प्रकार की हिंसा मसलन मारपीट, यौन शोषण या गालीगलौज की जा रही है तो आप को बिना समय गंवाए तलाक का फैसला ले लेना चाहिए. याद रखें शादी कर के पति पत्नी का मालिक नहीं हो जाता. किसी को यह हक नहीं कि आप पर हाथ उठाए. बहुत सी महिलाएं सालों मारपीट सहती हैं. मगर ऐसी जिंदगी का क्या फायदा? घुटघुट कर जीने और रोज मरने से अच्छा है अलग हो जाना.

बेइज्जती की जाती हो: शब्दों के तीर अकसर बहुत गहरे जख्म देते हैं. अगर घर में महिला के साथ दुर्व्यवहार हो रहा हो, पति खुद गलती मानने के बजाय हर बात के लिए पत्नी को ही दोषी ठहराए, उस की कीमत न समझे, उसे हलके में ले, उस के काम को अहमियत न दे, उस पर बारबार चिल्लाए, गाली दे, नीचा दिखाए तो इस रिश्ते को तोड़ देना ही बेहतर है. रोजरोज की मानसिक प्रताड़ना झेल कर कोई खुश नहीं रह सकता. बेहतर है कि अलग हो जाएं.

पति बेवफा हो: अगर किसी महिला को यह पता चलता है कि उस के पति का किसी और के साथ अफेयर है तो एक बार तो वह खुद को समझ कर पति से अपने प्यार की दुहाई देगी. ऐसे में अगर पति अपनी गलती मान कर उस औरत से मिलना छोड़ दे तो बात संभल जाती है. अकसर लड़के घर वालों के दबाव में आ कर शादी तो कर लेते हैं, लेकिन शादी के बाद भी वे अपने प्यार से अलग नहीं हो पाते. कई बार पति अपनी पत्नी से बोर हो कर भी बाहर खुशियां ढूंढ़ता है. ऐसे रिश्तों में बहुत कोफ्त होती है. बेवफाई रिश्तों के भरोसे को खत्म कर देती है और कोई भी रिश्ता बिना भरोसे के चल नहीं सकता. इसलिए महिला के लिए बेहतर यही होता है कि वह ऐसे रिश्ते से अलग हो जाए.

जब रिश्ते में केवल नकारात्मकता हो: अगर आप को पति के साथ नकारात्मकता महसूस होने लगे, आप दोनों हर बात पर झगड़ने लगें और पति का करीब आना भी आप को बरदाश्त न हो तो जाहिर है ऐसा रिश्ता अंदर से खोखला हो चुका होता है. अगर आप को लगता है कि आप के पास अपने साथी से जुड़ी नकारात्मक बातें सकारात्मक बातों की तुलना में ज्यादा हैं तो आप को तलाक की जरूरत है.

 ये 3 कारण बनते हैं कपल्स के बीच तलाक की मुख्य वजह

‘जर्नल औफ सैक्स ऐंड मैरिटल थेरैपी’ में प्रकाशित एक शोध में कपल्स के बीच तलाक की मुख्य वजहों को जानने की कोशिश की गई. इस के लिए 2371 लोगों को शामिल कर उन से कुछ सवाल पूछे गए और उस आधार पर तलाक के कारण बताए गए:

कम्युनिकेशन गैप: ज्यादातर कपल्स में तलाक का कारण कम्युनिकेशन गैप होता है. रिसर्च के अनुसार 44त्न रिलेशनशिप में डिवोर्स का कारण कम्युनिकेशन गैप होता है. दरअसल, बातचीत से ही रिश्तों में मधुरता आती है और मतभेद दूर किए जाते हैं. संवाद की कमी रिश्ते को खोखला कर देती है.

रिश्ते में इंटिमेसी की कमी: रिसर्च में शामिल लगभग 47त्न प्रतिभागियों का कहना था कि लो इंटिमेसी के चलते उन का तलाक हुआ है. इंटिमेसी की कमी सिर्फ उम्रदराज कपल्स में ही नहीं बल्कि युवाओं में भी होती है, जिस का कारण तलाक के रूप में दिख रहा है. इस के पीछे तनाव, खराब खानपान और अनियमित दिनचर्या जैसे कई कारण जिम्मेदार हैं.

पार्टनर के लिए सम्मान, भरोसे या सहानुभूति का अभाव: शोध में शामिल करीब 34त्न महिलाओं ने अपने पति से इन 3 चीजों के अभाव का दावा किया, जिन के चलते उन में से कुछ महिलाओं ने अपने पति से तलाक ले लिया और कुछ ने दूसरी शादी कर ली.

दूसरी शादी करने से पहले खुद से पूछें कुछ सवाल: प्यार, सम्मान, मुसकान, भावनात्मक जुड़ाव, विश्वास और जीवन भर के साथ का इरादा एक शादीशुदा रिश्ते में इन बातों का होना बेहद जरूरी है. कुछ कपल्स जहां जिंदगी में आए हर उतारचढ़ाव को पार करते हुए आगे बढ़ते रहने का प्रयास करते हैं तो कइयों का साथ बीच में ही छूट जाता है. जब प्यार की डोर कमजोर होती है तो जिंदगी की मुश्किलें और गलतफहमियां बड़ी आसानी से रिश्ते में दरार ले आती हैं. इस तरह जब भी कोई रिश्ता टूटता है तो वे सपने भी टूट जाते हैं जिन्हें दोनों ने मिल कर संजोया था.

शादीशुदा रिश्ते के बिखर जाने के बाद जिम्मेदारियों का बो?ा न केवल एक इंसान पर आ जाता है बल्कि कठिन राहों में अकेले आगे बढ़ना भी मुश्किल लगने लगता है. ऐसे समय में ज्यादातर लोग दोबारा शादी करने का विचार करते हैं. मगर अकसर दूसरी या तीसरी शादी करने से पहले व्यक्ति के मन में थोड़ी असमंजस की स्थिति होती है क्योंकि उसे पता नहीं होता है कि इस शादी का परिणाम क्या होगा. उसे डर रहता है कि कहीं पहले की तरह यह रिश्ता भी दर्द की सौगात दे कर खत्म न हो जाए.

Monsoon Special: घर पर बनाएं प्याज कचौड़ी और राइस लौलीपौप

Monsoon सीजन चल रहा है. बरसात के मौसम में कचौड़ी और पकौड़े खाने का अलग स्वाद होता है. बारिश के मौसम में चटपटा खाने के मन बहुत करता है. Monsoon में घर पर बनाएं प्याज कचौड़ी और राइस लौलीपौप.

  1. प्याज कचौड़ी

सामग्री खोल की

1. 200 ग्राम मैदा
2. 50 मिलीलीटर रिफाइंड तेल
3. नमक स्वादानुसार.

सामग्री भरावन की

1. 1 बड़ा कप प्याज कटा
2. 4 उबले आलू
3. 1 छोटा चम्मच अदरक कटा
4. 1 छोटा चम्मच हरीमिर्च कटी
5. 1 बड़ा चम्मच धनियापत्ती
6. 1 बड़ा चम्मच काजू टुकड़ा
7. 1 बड़ा चम्मच किशमिश
8. 1/2 छोटा चम्मच अमचूर पाउडर
9. 1/2 छोटा चम्मच गरममसाला
10. 1/2 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर
11. 1 छोटा चम्मच दरदरा धनिया
12. तलने के लिए रिफाइंड औयल
13. नमक स्वादानुसार

विधि

खोल की सामग्री को मिला कर आवश्यकतानुसार पानी मिला कर कड़ा गूंध लें. गीले कपड़े से ढक कर रख दें. आलुओं को छील कर मैश कर लें. भरावन की शेष सामग्री मिला लें. गुंधे मैदे को लचीला व मुलायम होने तक थोड़ा और मसलें. तैयार मैदे की लोइयां बनाएं. प्रत्येक लोई को हथेली पर फैला कर आवश्यकतानुसार भरावन भरें. दबा कर कचौरी का आकार दें. कड़ाही में तेल गरम कर के मंदी आंच पर सुनहरा होने तक तलें. इमली की चटनी के साथ सर्व करें.

2. राइस लौलीपौप

सामग्री

1. 2 कप उबले चावल
2. 1/2 कप आलू उबले व मैश
3. 2 बड़े चम्मच हरी शिमलामिर्च बारीक कटी
4. 1 छोटा चम्मच हरीमिर्च बारीक कटी
5. 2 बड़े चम्मच टमाटर बारीक कटा
6. 2 बड़े चम्मच धनियापत्ती बारीक कटी
7. 1/2 छोटा चम्मच लालमिर्च पाउडर
8. 1 छोटा चम्मच धनिया पाउडर
9. 1/2 छोटा चम्मच अमचूर पाउडर
10. 1/2 छोटा चम्मच गरममसाला
11. 1 छोटा चम्मच चाटमसाला
12. 1/2 छोटा चम्मच सौंफ कुटी हुई
13. तलने के लिए तेल स्टिक्स
14. नमक स्वादानुसार

विधि

तेल तथा आइसक्रीम स्टिक्स को छोड़ कर बाकी सारी सामग्री एक बाउल में डाल कर अच्छी तरह मिला लें. आधा 1/2 चम्मच तेल मिला कर आटे की तरह गूंध लें. किसी किनारे वाली ट्रे में चिकनाई लगाएं और इस में चावल के मिश्रण को फैला कर 1/2 घंटा फ्रिज में रखें. फिर चाकू से मिश्रण के टुकड़े काटें. पैन में तेल गरम कर के टुकड़ों को मध्यम आंच पर दोनों ओर से सुनहरा होने तक फ्राई करें. हर टुकड़े में आइसक्रीम स्टिक फंसा कर हरी चटनी और सौस के साथ गरमगरम परोसें.

अनजाने पल: भाग 1- क्यों सावित्री से दूर होना चाहता था आनंद

औटो चेन्नई के अडयार स्थित पुष्पा शौपिंग कौंप्लैक्स से गुजर रहा था कि तभी नीलिमा पर नजर पड़ी. 3-4 बरस के एक लड़के का हाथ थामे वह दुकान से निकल रही थी. मैं अपनी उत्सुकता रोक न पाई. मातृत्व मानो बांध तोड़ कर छलछलाने को बेताब हो गया था.

मैं ने औटो रुकवाया और उसे पैसे दे कर उतर गई. धीरेधीरे उस के पास पहुंची और आवाज दी, ‘‘नीलिमा.’’

वह एकाएक चौंक कर मुड़ी, फिर तेजी से मुझ से लिपट गई और फूटफूट कर रोने लगी. भय से सिमट कर वह लड़का भी रोने लगा. मेरे शरीर के निस्तब्ध तार नीलिमा के स्पर्श से झनझना उठे. रोमरोम में एक अजीब सा आनंद समाने लगा. इतने बरसों बाद जिसे पाया था, उसे अपने से अलग करने का मन ही नहीं हो रहा था.

काफी देर रोने के बाद जब उस ने आवाज सुनी, ‘दीदी, मुझे डर लग रहा है, पिताजी के पास चलो.’ तभी वह संभली. आंसू पोंछ कर मेरी ओर देखा और मुसकराई. फिर बोली, ‘‘मां, हम यहां मलर अस्पताल में हैं. पिताजी 5वीं मंजिल पर कमरा नंबर 18 में हैं. देर हो रही है, मैं जाती हूं. हो सके तो शाम को आ जाइएगा. यह मेरा भाई अभय है,’’ फिर अपने भैया के कंधे पर हाथ रख वह मेरी नजरों से ओझल हो गई.

नीलिमा का आकर्षण इतना था कि मैं यह भूल ही गई कि मुझे विकास से सवेरा होटल में मिलना है. मैं सोचने लगी कि कहां मुझ से नफरत करने वाली उस दिन की गोरीचिट्टी खूबसूरत नीलू और कहां आज की दुख और वेदना का बोझ ढोए बचपन में ही प्रौढ़ता लिए यह नीलिमा. मैं ने शौपिंग कौंप्लैक्स से विकास को सूचना भिजवाई कि 15 मिनट में मैं आ रही हूं और जल्दी से औटो ले कर चल पड़ी.

अनायास मेरी आंखों में आनंद का चेहरा घूम गया. मेरे मांबाप ने उस का लंबा कद, गोरा रंग, मस्तीभरी जवानी और आकर्षक व्यक्तित्व देख कर मेरा विवाह उस से तय किया था. मैं ने हिंदी साहित्य में एमफिल किया था और एक कालेज में पढ़ाती थी. आनंद बैंक में अफसर था. हम दोनों ने एकदूसरे को पसंद कर के शादी की थी. शादी के तुरंत बाद उस का तबादला दिल्ली हो गया, इसलिए हम लोग वहां चले गए. शादी होते ही मैं ने नौकरी छोड़ दी थी, हालांकि आनंद को यह अच्छा नहीं लगा था. परंतु मैं तबादले के झमेलों में पड़ना नहीं चाहती थी.

दिल्ली जैसे महानगर में खर्चे तो बढ़ते ही जाते हैं, एक दिन आनंद ने ही बात छेड़ी, ‘सावित्री, सारा दिन घर में बैठे तुम्हें घुटन महसूस नहीं होती? मेरा दोस्त कह रहा था कि कालेज में हिंदी प्राध्यापक की जगह खाली है. कहो तो बात चलाऊं?’

मैं ने कहा, ‘वैसे मेरी नौकरी करने की अभी इच्छा नहीं है. घर पर भी तो बहुत सारे काम होते हैं. बुनाई, कढ़ाई आदि सीख रही हूं. ढंग से खाना बनाना भी तो अभी ही सीख रही हूं.’

आनंद को मेरी बात अच्छी नहीं लगी. उस ने कहा, ‘अभी तो हमारे बच्चे भी नहीं हैं. इतनी शिक्षा हासिल करने के बाद तुम्हारा इस तरह घर में बैठे रहना मुझे अच्छा नहीं लगता. फिर महंगाई भी कितनी है…तुम हाथ बंटाओगी तो हम घर के लिए कुछ चीजें खरीद सकेंगे.’ आनंद की बात उस समय मुझे भी अच्छी लगी. उसी ने दौड़धूप कर मुझे श्रीराम कालेज में नौकरी दिलाई.

दिन गुजरते गए. 8-9 वर्षों बाद ही नीलिमा का जन्म हुआ था. उस के जन्म के बाद से सबकुछ बदल गया. आनंद को बेटी से बहुत अधिक लगाव था. जब तक वह 5 साल की हुई, तब तक मेरी सास हमारे साथ रहीं. अकेली विधवा सास का हमें बहुत अधिक सहारा था. मेरी और पति की तनख्वाह से गृहस्थी की गाड़ी मौज से चल रही थी.

मैं ने पीएचडी के लिए रजिस्ट्रेशन करवा लिया था. कालेज में प्रिंसिपल की जगह खाली होने वाली थी. मेरी पीएचडी के खत्म होने में 6 महीने बाकी थे, इसलिए पूर्व प्रिंसिपल ने मेरी सिफारिश की थी. मैं जीजान से पीएचडी की समाप्ति में लगी थी. अचानक मेरी सास गुजर गईं.

आनंद को मां की मृत्यु से ज्यादा बेटी का अकेलापन खटकने लगा. उस ने मां की तेरहवीं होते ही कहा, ‘मैं चाहता हूं कि तुम नौकरी छोड़ दो. जब नीलू बड़ी हो जाए तो फिर नौकरी कर लेना.’

मैं चौंकी. फिर स्थिति को संभालते हुए कहा, ‘ऐसा कैसे हो सकता है, हम ऐशोआराम की जिंदगी के आदी हो चुके हैं. मेरी तनख्वाह नहीं होगी तो दिल्ली जैसे शहर में तुम्हारे अकेले की तनख्वाह से गुजरबसर कैसे होगी?’

‘कम से कम पीएचडी छोड़ दो. देर से घर आओगी तो नीलिमा बहुत दुखी हो जाएगी. वह दिनभर अकेली कैसे रह पाएगी.’

‘उसे तुम क्यों नहीं संभाल लेते. 4 महीने में मेरी थीसिस पूरी हो जाएगी. फिर जल्दी ही मैं प्रिंसिपल का पद संभाल लूंगी. कालेज की तरफ से वहीं घर भी मिल जाएगा. फिर नीलू की परवरिश में कोई बाधा नहीं आएगी.’

आनंद उस समय खामोश रह गया. परंतु उस के मन में ज्वालामुखी ने धधकना आरंभ कर दिया. मैं ने नीलू को कालेज के पास शिशु सदन में छोड़ना शुरू कर दिया. मैं रोज सवेरे उसे छोड़ आती और शाम को आनंद उसे ले आता.

मुझे थीसिस का काम खत्म कर लौटने में रात को देर हो जाती. नीलिमा उदास रहने लगी थी. उस की खामोशी मुझे कभीकभी बहुत अखरती, परंतु मैं अपनी थीसिस अधूरी नहीं छोड़ सकती थी.

हम दोनों के बीच अकसर मनमुटाव होता. वह अकसर कहता, ‘मांबाप के रहते दिनभर बच्ची इस प्रकार अनाथों की तरह रहे, मुझे अच्छा नहीं लगता.’

मैं तपाक से उत्तर देती, ‘तो मैं क्या करूं? यह तो होता नहीं कि कोई उचित सुझाव दो, बस सदा कोसते ही रहते हो.’

बात जब बहुत बढ़ जाती तो वह कहता, ‘तुम अपनी थीसिस को अपनी बेटी की परवरिश से ज्यादा जरूरी समझती हो? कैसी मां हो?’

मैं कहती, ‘तुम मुझ से जलते हो. तुम्हारा अहं इस बात की इजाजत नहीं देता कि मैं तुम से ऊंचे पद पर पहुंचूं. तभी तुम मुझे ताने देते रहते हो. यह मत भूलो कि मुझे नौकरी पर जाने को मजबूर तुम ने ही किया था.’

नीलिमा ही सदा हम दोनों के आपसी झगड़ों में बीचबचाव करती. वह सदा एक ही बात कहती, ‘मैं ने तो कभी कोई शिकायत नहीं की. मुझे ले कर आप लोग क्यों लड़ते रहते हैं.’

वैसे नीलिमा चिड़चिड़ी सी रहती, बातबात पर जिद करती. ऊपर से आनंद उसे मेरे विरुद्ध हमेशा कुछ न कुछ कह कर भड़काता रहता. मुझे घर के माहौल में घुटन सी होने लगती. परंतु थीसिस अधूरी छोड़ने के लिए मैं कतई तैयार न थी. मेरी बच्ची मेरे जिगर का टुकड़ा थी, उस के रोने की आवाज मुझे परेशान कर देती.

Bigg Boss के मेकर्स पर भड़की आंकाक्षा पुरी, कहा- Kiss को किया प्रोमोट

सलमान खान का रियलिटी शो बिग बॉस ओटीटी 2 जबसे शुरु हुआ है तभी से सुर्खियों में बना हुआ. बिग बॉस ओटीटी 2 को जनता से खूब प्यार मिल रहा है. शो को दर्शक काफी प्यार दे रहे है. बिग बॉस ओटीटी 2 के पिछले हफ्ते में  आंकाक्षा पुरी बेघर हो गई है. बिग बॉस के हाउस से निकालकर आंकाक्षा पुरी शो के मेकर्स पर अपनी भड़ास निकाल रही हैं. बिग बॉस ओटीटी 2 में जद और आंकाक्षा पुरी के किस के बाद काफी हंगामा मचा हुआ है. बिग बॉस के घर से निकालकर आंकाक्षा जद से लेकर शो के मेकर्स पर भड़ास निकाल रही है.

आंकाक्षा बोली- Kiss को प्रोमोट किया

किस वाले टास्क पर आंकाक्षा का कहना है कि बिग बॉस हर गलत बात पर टोकते है. अगर उन्हें किस पर ऑब्जेक्शन था तो टोका क्यों नही. इसके साथ ही इस सीन का थमनेल बनाकर शो का प्रोमोशन किया जा रहा है. वहीं जद के लिए आंकाक्षा ने कहा कि मैं किस को दौरान बस लिप टच कर रही था लेकिन जद ज्यादा इन्वॉल्व हो गए.

बिग बॉस ने क्यों नहीं टोका

बिग बॉस ओटीटी 2 से आंकाक्षा पुरी के निकालते ही शो के मेकर्स पर भड़की और उन्होंने कहा कि शो का डबल स्टैंडर्ड है. आंकाक्षा नें एक इंटरव्यू में कहा कि अगर 30 सेकेंड्स दिक्कत थी तो उन्होने बोला क्यों नहीं. वैसे तो माइक पर बहुत सारी चीजें बोलते है कि हिंदी बोलो, इंग्लिश में मत बोलो, माइक ठीक करो और यह भी बोल देते ये टास्क मत करो. ऐसा कुछ नहीं बोला उन्होंने.

प्रोमोशन को लेकर नाराज आंकाक्षा

आंकाक्षा पुरी बिग बॉस ओटीटी से बाहर आते ही  उन्होंने कहा कि मैने जियो एप पर देखा कि टीजर बने हुए है. उसकी थमनेल बनाकर एपिसोड में लगे हुए है. मेरा और जद का किस हॉटेस्ट किस ऐवर, इसी वजह से मुझे डबल स्टैंडर्ड समझ नहीं आ रहा. इतना ही नहीं आंकाक्षा के कमेंट्स पर दर्शक भी सहमत नजर आ रहे है. इस्टा पोस्ट पर एक यूजर ने लिखा, सलमान और बिग बॉस को इतनी दिक्कत थी तो टास्क को तुरंत क्यो नहीं रोका.

Anupamaa: माया की मौत के बाद बरखा पार करेंगी सारी हदें

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ में आए दिन शो के मेकर्स नए-नए ट्विस्ट लेकर आते है. टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ में माया की मौत के बाद अनुपमा के अमेरिका जाने के प्लान पर पानी फिरने वाला है. जी हां, अनुपमा का अमेरिका जाने के सपने पर काले बादल मांडरते नजर आ रहे है. ऐसे में अनुपमा की जिंदगी में एक नई चुनौती आकर खड़ी हो गई है. एक बार फिरसे अनुपमा को अपने करियर और परिवार में से किसी एक को चुनना है. ‘अनुपमा’ के अपकमिंग एपिसोड में दर्शको को देखने को मिलेगा कि माया अनुपमा को बचाने के चक्कर में खुद ही अपनी जान गंवा देती है.

नीचता की सारी हदें पार करेगी बरखा

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ के मेकर्स शो में नए ट्विस्ट और टर्न्स लेकर आते ही रहते है. सीरियल ‘अनुपमा’ के अपकमिंद एपिसोड में दर्शकों को देखने को मिलेगा कि  अनुपमा को बचाने के चक्कर में माया की मौत हो जाती है. माया अस्पताल में दम तोड़ देती है.

‘अनुपमा’ के प्रोमो वीडियो में देखा जा सकता है कि परिवार के सभी लोग माया की शोक सभा में बैठे है. माया की अर्थी के सामने बैठकर भी बरखा अपनी घटिया चालें खेलने से बाज नहीं आती. वह कहेगी छोटी की किस्मत में मां का प्यार लिखा नहीं है. एक मां दुनिया छोड़कर चली गई वहीं दूसरी मां परिवार को छोडकर अमेरिका जा रही है. जब अनुपमा ये बातें सुनती है तो वह सोच में पड़ जाएगी. अनुज अपनी बेटी के लिए फ्रिकमंद हो जाएगा.

परिवार और करियर में किसे चुनेगी अनुपमा

सीरियल ‘अनुपमा’ के अपकमिंद एपिसोड में दर्शकों को देखने को मिलेगा कि  अनुपमा का एक्स पति वनराज शाह की वह अनुपमा से कहेगा कि वह लोगों की बातों पर ध्यान ना दें और अपने सपनों की उड़ान को रुकने ना दे. अनुपमा सबकी बातें सुन रही है और वह सोच में पड़ जाती है. आखिर अब फैसला अनुपमा को लेना है. परिवार और करियर के धर्मसंकट मे फंस गई अनुपमा.

नया पड़ाव: भाग 3- जब पत्नी को हुआ अपनी गलती का अहसास

कभीकभी मैं रोज के क्रम से ऊब कर कुछ मनोरंजन चाहती, छुट्टी वाले रोज राकेश को बच्चों के साथ कहीं पिकनिक पर चलने को कहती तो वे बगैर कुछ बोले विद्रूपता से हंस कर अकेले ही बाहर चले जाते. मैं उदासी से ऊब कर बच्चों से ही दिल बहला लेती.

इसी तरह दिन बीतते गए. पिंकी जब 3 साल की हो गई तो मैं ने उसे भी स्कूल में

डाल दिया. अब दोपहर का थोड़ा सा वक्त मुझे खाली मिल जाता था, पर मैं तब अपने पर ध्यान न दे कर बच्चों के कपड़े सीती, स्वैटर बुनती या फिर सो जाती.

शाम को बच्चे आते तो मैं फिर उन में रम जाती. गरम खाना बना कर देती. घर में मक्खन से घी बना कर पौष्टिक खाने का इंतजाम करती. उन्हें पढ़ाती और उस से वक्त बचता तो फटेउधड़े कपड़े ठीक करती.

अब तक मोबाइल भी चलाना सीख लिया था. मोबाइल पर बहनों, चचेरी बहनों, बूआ से खूब बातें करती क्योंकि वे सब या तो बच्चों की बातें करतीं या तीजत्योहार और पंडितों की. मुझे जैसी कसबाई लड़की को यही अच्छा लगता. पड़ोस में कोई भी खास संबंध नहीं बना क्योंकि हम लोग पिछड़ी जाति के माने जाते थे और पासपड़ोस के लोग ऊंची जातियों के थे जो घास नहीं डालते थे हमें.

राकेश रात को लौटते, थकेथके से, चुपचुप से. मैं समझती, काम की अधिकता इनसान को चुप रहना सिखा देती है. झटपट उन्हें गरम खाना परोस कर देती और एकाध बात का हांहूं में जवाब दे कर बिस्तर में घुस जाते. मैं जब तक सब कुछ समेट कर कमरे में आती, तब तक राकेश सो जाते.

बच्चे अपने पिता के आने पर सहम कर चुप हो जाते थे क्योंकि राकेश ने कभी उन्हें प्यार से पुचकार कर गोद में नहीं उठाया और न कोई लाड़प्यार किया. बच्चों को प्यार की कोई कमी महसूस न हो, इसलिए मैं उन्हें और भी ज्यादा प्यार करती, उन्हीं में रमी रहती.

राकेश के पिता भी ऐसे ही थे. हां राकेश ने शादी के शुरू के महीनों में बताया था कि शहर आने पर उसे पता चला कि मांबाप किस तरह बच्चों के दोस्त बन जाते हैं पर हमारे परिवारों में यह संभव नहीं था.

बच्चे धीरेधीरे बड़े होने लगे थे. मुझे एक दिन उड़तीउड़ती खबर मिली कि राकेश अपने दफ्तर की स्टैनोग्राफर के साथ शाम गुजारते हैं. सुन कर बहुत अटपटा सा लगा.

गृहस्थी चलाने में क्या सजसंवर कर औरत

प्रेमप्यार का नाटक कर सकती है भला? मुझे लगा, मर्द की इस विविधता की चाह तो मिटा पाना असंभव है. पत्नी आखिर पत्नी है और प्रेमिका प्रेमिका ही यही सोच कर मैं चुप्पी साध गई कि बात खुल जाने पर बच्चों पर हमारी बहस का बुरा प्रभाव पड़ेगा.

राकेश अकसर दफ्तर की तरफ से 3-4 दिनों के लिए टूर पर जाया करते थे. पर इस बात के पता चलने पर उन के दौरे पर जाने के बाद मन कहीं टिकता ही न था. क्या पता इस वक्त राकेश क्या कर रहे हों. यही सोचसोच कर मैं रातरातभर जागती रहती. 2-4 बार फोन आने पर वे हांहूं कर के बाद बंद कर देते. उन के  लौटने पर ही मन कुछ संयत होता.

दिन गुजरते रहे और मैं राकेश से दूर होती चली गई. रंजू और पिंकी दोनों अब जवान हो

गए थे. रंजू तो पिता से ज्यादा बात ही नहीं करता था. उन के आने पर चुपचाप अपने कमरे में खिसक जाता.

मगर एक दिन पिंकी ने पिता से पूछ ही लिया, ‘‘पिताजी, आप रात को इतनी देर से घर क्यों आते हैं? आखिर हमें भी तो आप थोड़ा वक्त दिया कीजिए. मेरी सब सहेलियों के पिता तो उन के साथ कैरम, बैडमिंटन बगैरा खेलते हैं.’’

तब राकेश झेंपते हुए बोले थे, ‘‘हां भई, अब तुम कहती हो तो जल्दी आ जाया करेंगे, अभी तक तुम्हारी मां ने तो हम से कभी कहा ही नहीं कि जल्दी आया करो. न तुम्हारी मां के पिता ने उन से कभी बात की होगी न मेरे पिता ने. अब जमाना बदल रहा है पर हम वहीं रह गए.’’

मैं तब कट कर रह गई. मगर उस दिन से राकेश शाम को जल्दी आने लगे थे. फिर भी बच्चों के सामने राकेश के सम्मुख मैं कम ही पड़ती थी. न जाने क्यों हीनता की भावना घर

कर गई थी मुझ में. राकेश की इधरउधर की ताक?ांक से भी मन कुछ चिढ़ सा गया था.

मौन गुस्सा दिखा कर राकेश को उन के व्यवहार की गलती बतातीबताती मैं उन से छिटकती

चली गई.

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