बरखा बिस्ट का जन्म और पालन-पोषण हिसार, हरियाणा के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. उन्होंने अपनी शुरुआती पढाई कोलकाता और पुणे से किया है. ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौरान ही बरखा ने मॉडलिंग करना शुरू कर दिया था. वर्ष 2000 में बरखा ने एनडीए क्वीन ब्यूटी पेजेंट में भाग लिया और उस ब्यूटी पेजेंट की विनर बनी, जिससे बरखा को अभिनय क्षेत्र में आने की प्रेरणा मिली .
मॉडलिंग में आने के बाद बरखा ने अभिनय के क्षेत्र में जाने का फैसला किया, लेकिन उनके पिता को यह मंजूर नहीं था. हालाँकि, वह उनकी इच्छा के विरुद्ध गई और अभिनय में अपना करियर बनाने के लिए मुंबई चली आई. उनके पिता ने उनसे तब बात करना बंद कर दिया था और उन्होंने भी लगभग दो महीने तक अपने पिता से बात नहीं की. हालाँकि, उनकी माँ और बहन के समझाने के बाद उनके पिता मान गए.
मुंबई में रहने के दौरान उन्हें अपना पहला टीवी शो कितनी मस्त है जिंदगी में उदिता का किरदार निभाया. इसके बाद उन्होंने कई शो कसौटी ज़िंदगी की, क्या होगा निम्मो का और काव्यांजलि जैसे कई शो में कैमियो की भूमिका की है.
काम के दौरान बरखा का परिचय अभिनेता और को स्टार इंद्रनील सेनगुप्ता से हुआ, प्यार हुआ और शादी की. इन्द्रनील से शादी से पहले उन्होंने अपने पूर्व प्रेमी करण सिंह ग्रोवर से सगाई की थी, लेकिन यह रिश्ता 2006 में समाप्त हो गया था. इन्द्रनील से शादी के बाद बरखा एक बेटी मीरा की माँ बनी, लेकिन आपसी मन मुटाव के चलते वर्ष 2021 में दोनों अलग हो गए, लेकिन इन्द्रनील के साथ बरखा की जान – पहचान अभी भी जारी है, वे अपने बेटी से मिलने, बीच – बीच में आते रहते है.
अभिनय के अलावा बरखा ने कॉमेडी सर्कस के अजूबे और पॉपकॉर्न जैसे शो को भी होस्ट किया हैं. वर्ष 2008 में डांस शो सास बनाम बहू में उन्होंने एक प्रतियोगी के रूप में भाग लिया. बरखा बिष्ट वर्ष 2010 की बॉलीवुड फिल्म “राजनीति” के “इश्क बरसे” गाने में भी दिखाई दी. इन दिनों बरखा की हॉरर फिल्म 1920: हॉरर्स ऑफ़ द हार्ट रिलीज हो चुकी है, जिसमे उन्होंने माँ की भूमिका निभाई है. उन्होंने खास गृहशोभा के लिए बात की आइये जानते है, बरखा की जर्नी और सिंगल मदर बनने की कहानी, उनकी जुबानी.
इस फिल्म को करने की खास वजह के बारें में पूछने पर बरखा कहती है कि मैंने हॉरर जोनर में कोई फिल्म पहले नहीं की थी, इसे ट्राई करने की इच्छा से इसे किया. इसके अलावा ये निर्देशक विक्रम भट्ट की फ्रेंचाइजी फिल्म है, इसलिए करना जरुरी लगा. मुझे हॉरर फिल्म देखना बहुत पसंद है और मुझे डर भी नहीं लगता. इस बार मैंने हॉरर फिल्म में अभिनय कर दर्शकों को डराने का जिम्मा लिया है.
बरखा खुद माँ है, ऐसे में माँ की भूमिका निभाना उनके लिए मुश्किल नहीं था, लेकिन फ़िल्मी माँ और रियल माँ में अंतर अवश्य होता है. वह कहती है कि माँ के इमोशन को पर्दे पर दिखाना आसान होता है, सारे इमोशन नैचुरल तरीके से आते है. रिलेटेबल चरित्र भी होता है, जो अपने बेटी को प्यार करती है, उसे प्रोटेक्ट करती है, उसका ख्याल रखती है, जो भी हो जाय, पर उसका ध्यान रखना नहीं छोडती. ऐसा मैं अपनी 11 साल की बेटी मीरा के लिए भी करती हूँ, लेकिन ड्रामा पर्दे पर अधिक होता है, रियल में इतना नहीं होता.
आगे बरखा कहती है कि फिल्म और रियल लाइफ में बदला व्यक्ति कई बार लेता है. रियल लाइफ में अगर किसी बेटी के साथ भी कुछ गलत होता है और उसमे बदला लेने की सामर्थ्य है, तो वह अवश्य बदला लेती है, क्योंकि रिवेंज यानि बदला एक इमोशन है, ये किसी के साथ कभी भी हो सकता है.
हॉरर फिल्मों की शेल्फ लाइफ बहुत कम होती है, क्योंकि एक बार देखने के बाद लोग उसे देखना पसंद नहीं करते, इस बारें में बरखा कहती है कि आज केवल हॉरर फिल्में ही नहीं, हर फिल्म की शेल्फ लाइफ कम हो चुकी है. कोविड के बाद से सारे थिएटर की फिल्में सफर कर रही है. आज किसी भी फिल्म को दुबारा देखने की इच्छा नहीं होती. हर जोनर के पिक्चर की सेल्फलाइफ छोटी हो गई है, लेकिन हॉरर की एक कमिटेड ऑडियंस है और उन्हें ऐसी फिल्में देखना पसंद है, साथ ही ऐसी फिल्में कम बनती है, लेकिन ये फिल्म सबको अच्छी लग रही है. फिल्म का अच्छा होना, ऑडियंस को एंगेज कर पाना ही किसी फिल्म की सफलता का राज है.
ओटीटी पर फिल्मों का अधिक सक्रिय होने की वजह से फिल्मों का स्तर कम होता जा रहा है, इस बात से आप कितनी सहमत रखती है? बरखा कहती है कि ये सारी चीजे डिमांड और सप्लाई पर आधारित होती है, जब डिमांड बढ़ता है तो सप्लाई को भी बढ़ाना पड़ता है, और यहाँ ये एक क्रिएटिव फील्ड है, कोई प्रोडक्ट नहीं. डिमांड बढ़ने से कुछ फिल्मों के कंटेंट अच्छी न होने पर भी बन जाती है. ये हर चीज के लिए दुनिया में लागू होती है. ओटीटी का भी यही हाल हो रहा है, क्योंकि क्रिएटिव फील्ड में मशीन की तरह क्रिएटिविटी को दिखाया नहीं जा सकता.
इसलिए इसमे गिरावट आ रही है, जबकि लोगों की आशाएं बहुत अधिक हो चुकी है, क्योंकि उन्होंने वैसी अच्छी फिल्में पहले देखी है. यहाँ ये भी समझना जरुरी है कि जो लोग वैसी फिल्में या वेब सीरीज बना रहे है, उन्हें भी पता नहीं है कि उनका काम सही नहीं हो रहा है, उनके हिसाब से वे सही फिल्म बना रहे है. दर्शक ही ऐसी फिल्मों को नकार सकते है. देखा जाय तो क्रिएटिव फील्ड सबसे अधिक अनस्टेबल है. कंटेंट की अभी बहुत अधिक जरुरत है, आज निर्माता, निर्देशक किसी भी आईडिया के पीछे भाग रहे है, वे फटाफट कुछ बनाकर डाल देते है, जबकि कंटेंट अच्छी नहीं होती है.
एक्टिंग के अलावा बरखा अभी एक सिंगल माँ है, क्योंकि वह एक्टर इन्द्रनील दासगुप्ता से अलग हो चुकी है. वह कहती है कि मेरी बेटी 11 साल की है, जिसका बहुत ख्याल रखना पड़ता है. आज के बच्चों के पास सबकुछ जानने का बहुत बड़ा माध्यम है, उन्हें मुझे वक्त देने की जरुरत होती है, उन्हें मोनिटर करना पड़ता है. सिंगल मदर का स्ट्रगल बहुत अधिक होता है, पर ये मेरे और मेरी बेटी के जीवन का नया फेज है, इसमें गलत या सही करते हुए मैं आगे बढ़ रही हूँ और अच्छा करने की कोशिश कर रही हूँ.
इसके आगे वह कहती है कि सिंगल मदर बनना आसान नहीं होता, कई बार मैं रियेक्ट कर देती हूँ, फिर सोची कि जिसे जो कहना है कहें. मेरी जिंदगी को मुझे जीना है जिसमे मेरी एक बेटी है. हम दोनों को एक दूसरे से अच्छी बोन्डिंग हो इसकी कोशिश रहती है.
इतने सालों की जर्नी कैसी रही, कोई रिग्रेट है क्या? वह कहती है कि मुझे किसी प्रकार की कोई रिग्रेट नहीं है. मैंने टीवी, वेव फिल्म्स, फिल्में आदि सब कर चुकी हूँ. यंग लड़की से शुरू कर अब माँ का भी अभिनय कर रही हूँ. मुझे कोई कंप्लेन नहीं रहा, आज भी अच्छा काम कर रही हूँ. कोई रिग्रेट नहीं है.
डेली दिनचर्या के बारें में बरखा का कहना है कि मेरी जिंदगी अभी आम महिला की जिंदगी हो चुकी है, जिसमे सुबह उठकर बच्चे को स्कूल भेजना, उसकी पढाई देखना, आदि करना पड़ता है. इसके बाद जो समय बचता है, अभिनय और सोशल लाइफ, फ्रेंड्स, ट्रेवलिंग आदि करती हूँ. आगे 3 से 4 साल तक मेरा फोकस पूरी तरह से बेटी पर रहेगा. सभी माओं से मेरा कहना है कि बच्चे को कभी रोके नहीं, जितना हो सकें प्रोटेक्ट करें. प्रोटेक्ट का अर्थ यहाँ यह है कि उसे इतना आत्मनिर्भर और समझदार बना दें, ताकि बड़े होकर किसी भी परिस्थिति में बच्चे खुद को प्रोटेक्ट कर सकें, क्योंकि एक उम्र के बाद बच्चे खुद सारी चीजे करते है और ये जरुरी भी है. पेरेंट्स का साथ बच्चों के साथ केवल थोड़े समय के लिए ही होता है, इसलिए उनका साथ इस समय अवश्य देते
बरखा बिस्ट का जन्म और पालन-पोषण हिसार, हरियाणा के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. उन्होंने अपनी शुरुआती पढाई कोलकाता और पुणे से किया है. ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दौरान ही बरखा ने मॉडलिंग करना शुरू कर दिया था. वर्ष 2000 में बरखा ने एनडीए क्वीन ब्यूटी पेजेंट में भाग लिया और उस ब्यूटी पेजेंट की विनर बनी, जिससे बरखा को अभिनय क्षेत्र में आने की प्रेरणा मिली .
मॉडलिंग में आने के बाद बरखा ने अभिनय के क्षेत्र में जाने का फैसला किया, लेकिन उनके पिता को यह मंजूर नहीं था. हालाँकि, वह उनकी इच्छा के विरुद्ध गई और अभिनय में अपना करियर बनाने के लिए मुंबई चली आई. उनके पिता ने उनसे तब बात करना बंद कर दिया था और उन्होंने भी लगभग दो महीने तक अपने पिता से बात नहीं की. हालाँकि, उनकी माँ और बहन के समझाने के बाद उनके पिता मान गए.
मुंबई में रहने के दौरान उन्हें अपना पहला टीवी शो कितनी मस्त है जिंदगी में उदिता का किरदार निभाया. इसके बाद उन्होंने कई शो कसौटी ज़िंदगी की, क्या होगा निम्मो का और काव्यांजलि जैसे कई शो में कैमियो की भूमिका की है.
काम के दौरान बरखा का परिचय अभिनेता और को स्टार इंद्रनील सेनगुप्ता से हुआ, प्यार हुआ और शादी की. इन्द्रनील से शादी से पहले उन्होंने अपने पूर्व प्रेमी करण सिंह ग्रोवर से सगाई की थी, लेकिन यह रिश्ता 2006 में समाप्त हो गया था. इन्द्रनील से शादी के बाद बरखा एक बेटी मीरा की माँ बनी, लेकिन आपसी मन मुटाव के चलते वर्ष 2021 में दोनों अलग हो गए, लेकिन इन्द्रनील के साथ बरखा की जान – पहचान अभी भी जारी है, वे अपने बेटी से मिलने, बीच – बीच में आते रहते है.
अभिनय के अलावा बरखा ने कॉमेडी सर्कस के अजूबे और पॉपकॉर्न जैसे शो को भी होस्ट किया हैं. वर्ष 2008 में डांस शो सास बनाम बहू में उन्होंने एक प्रतियोगी के रूप में भाग लिया. बरखा बिष्ट वर्ष 2010 की बॉलीवुड फिल्म “राजनीति” के “इश्क बरसे” गाने में भी दिखाई दी. इन दिनों बरखा की हॉरर फिल्म 1920: हॉरर्स ऑफ़ द हार्ट रिलीज हो चुकी है, जिसमे उन्होंने माँ की भूमिका निभाई है. उन्होंने खास गृहशोभा के लिए बात की आइये जानते है, बरखा की जर्नी और सिंगल मदर बनने की कहानी, उनकी जुबानी.
इस फिल्म को करने की खास वजह के बारें में पूछने पर बरखा कहती है कि मैंने हॉरर जोनर में कोई फिल्म पहले नहीं की थी, इसे ट्राई करने की इच्छा से इसे किया. इसके अलावा ये निर्देशक विक्रम भट्ट की फ्रेंचाइजी फिल्म है, इसलिए करना जरुरी लगा. मुझे हॉरर फिल्म देखना बहुत पसंद है और मुझे डर भी नहीं लगता. इस बार मैंने हॉरर फिल्म में अभिनय कर दर्शकों को डराने का जिम्मा लिया है.
बरखा खुद माँ है, ऐसे में माँ की भूमिका निभाना उनके लिए मुश्किल नहीं था, लेकिन फ़िल्मी माँ और रियल माँ में अंतर अवश्य होता है. वह कहती है कि माँ के इमोशन को पर्दे पर दिखाना आसान होता है, सारे इमोशन नैचुरल तरीके से आते है. रिलेटेबल चरित्र भी होता है, जो अपने बेटी को प्यार करती है, उसे प्रोटेक्ट करती है, उसका ख्याल रखती है, जो भी हो जाय, पर उसका ध्यान रखना नहीं छोडती. ऐसा मैं अपनी 11 साल की बेटी मीरा के लिए भी करती हूँ, लेकिन ड्रामा पर्दे पर अधिक होता है, रियल में इतना नहीं होता.
आगे बरखा कहती है कि फिल्म और रियल लाइफ में बदला व्यक्ति कई बार लेता है. रियल लाइफ में अगर किसी बेटी के साथ भी कुछ गलत होता है और उसमे बदला लेने की सामर्थ्य है, तो वह अवश्य बदला लेती है, क्योंकि रिवेंज यानि बदला एक इमोशन है, ये किसी के साथ कभी भी हो सकता है.
हॉरर फिल्मों की शेल्फ लाइफ बहुत कम होती है, क्योंकि एक बार देखने के बाद लोग उसे देखना पसंद नहीं करते, इस बारें में बरखा कहती है कि आज केवल हॉरर फिल्में ही नहीं, हर फिल्म की शेल्फ लाइफ कम हो चुकी है. कोविड के बाद से सारे थिएटर की फिल्में सफर कर रही है. आज किसी भी फिल्म को दुबारा देखने की इच्छा नहीं होती. हर जोनर के पिक्चर की सेल्फलाइफ छोटी हो गई है, लेकिन हॉरर की एक कमिटेड ऑडियंस है और उन्हें ऐसी फिल्में देखना पसंद है, साथ ही ऐसी फिल्में कम बनती है, लेकिन ये फिल्म सबको अच्छी लग रही है. फिल्म का अच्छा होना, ऑडियंस को एंगेज कर पाना ही किसी फिल्म की सफलता का राज है.
ओटीटी पर फिल्मों का अधिक सक्रिय होने की वजह से फिल्मों का स्तर कम होता जा रहा है, इस बात से आप कितनी सहमत रखती है? बरखा कहती है कि ये सारी चीजे डिमांड और सप्लाई पर आधारित होती है, जब डिमांड बढ़ता है तो सप्लाई को भी बढ़ाना पड़ता है, और यहाँ ये एक क्रिएटिव फील्ड है, कोई प्रोडक्ट नहीं. डिमांड बढ़ने से कुछ फिल्मों के कंटेंट अच्छी न होने पर भी बन जाती है. ये हर चीज के लिए दुनिया में लागू होती है. ओटीटी का भी यही हाल हो रहा है, क्योंकि क्रिएटिव फील्ड में मशीन की तरह क्रिएटिविटी को दिखाया नहीं जा सकता. इसलिए इसमे गिरावट आ रही है, जबकि लोगों की आशाएं बहुत अधिक हो चुकी है, क्योंकि उन्होंने वैसी अच्छी फिल्में पहले देखी है. यहाँ ये भी समझना जरुरी है कि जो लोग वैसी फिल्में या वेब सीरीज बना रहे है, उन्हें भी पता नहीं है कि उनका काम सही नहीं हो रहा है, उनके हिसाब से वे सही फिल्म बना रहे है. दर्शक ही ऐसी फिल्मों को नकार सकते है. देखा जाय तो क्रिएटिव फील्ड सबसे अधिक अनस्टेबल है. कंटेंट की अभी बहुत अधिक जरुरत है, आज निर्माता, निर्देशक किसी भी आईडिया के पीछे भाग रहे है, वे फटाफट कुछ बनाकर डाल देते है, जबकि कंटेंट अच्छी नहीं होती है.
एक्टिंग के अलावा बरखा अभी एक सिंगल माँ है, क्योंकि वह एक्टर इन्द्रनील दासगुप्ता से अलग हो चुकी है. वह कहती है कि मेरी बेटी 11 साल की है, जिसका बहुत ख्याल रखना पड़ता है. आज के बच्चों के पास सबकुछ जानने का बहुत बड़ा माध्यम है, उन्हें मुझे वक्त देने की जरुरत होती है, उन्हें मोनिटर करना पड़ता है. सिंगल मदर का स्ट्रगल बहुत अधिक होता है, पर ये मेरे और मेरी बेटी के जीवन का नया फेज है, इसमें गलत या सही करते हुए मैं आगे बढ़ रही हूँ और अच्छा करने की कोशिश कर रही हूँ.
इसके आगे वह कहती है कि सिंगल मदर बनना आसान नहीं होता, कई बार मैं रियेक्ट कर देती हूँ, फिर सोची कि जिसे जो कहना है कहें. मेरी जिंदगी को मुझे जीना है जिसमे मेरी एक बेटी है. हम दोनों को एक दूसरे से अच्छी बोन्डिंग हो इसकी कोशिश रहती है.
इतने सालों की जर्नी कैसी रही, कोई रिग्रेट है क्या? वह कहती है कि मुझे किसी प्रकार की कोई रिग्रेट नहीं है. मैंने टीवी, वेव फिल्म्स, फिल्में आदि सब कर चुकी हूँ. यंग लड़की से शुरू कर अब माँ का भी अभिनय कर रही हूँ. मुझे कोई कंप्लेन नहीं रहा, आज भी अच्छा काम कर रही हूँ. कोई रिग्रेट नहीं है.
डेली दिनचर्या के बारें में बरखा का कहना है कि मेरी जिंदगी अभी आम महिला की जिंदगी हो चुकी है, जिसमे सुबह उठकर बच्चे को स्कूल भेजना, उसकी पढाई देखना, आदि करना पड़ता है. इसके बाद जो समय बचता है, अभिनय और सोशल लाइफ, फ्रेंड्स, ट्रेवलिंग आदि करती हूँ. आगे 3 से 4 साल तक मेरा फोकस पूरी तरह से बेटी पर रहेगा. सभी माओं से मेरा कहना है कि बच्चे को कभी रोके नहीं, जितना हो सकें प्रोटेक्ट करें. प्रोटेक्ट का अर्थ यहाँ यह है कि उसे इतना आत्मनिर्भर और समझदार बना दें, ताकि बड़े होकर किसी भी परिस्थिति में बच्चे खुद को प्रोटेक्ट कर सकें, क्योंकि एक उम्र के बाद बच्चे खुद सारी चीजे करते है और ये जरुरी भी है. पेरेंट्स का साथ बच्चों के साथ केवल थोड़े समय के लिए ही होता है, इसलिए उनका साथ इस समय अवश्य देते रहे.