Monsoon Special: इन 4 चीजों का खाना मतलब बरसात में बीमारियों को दावत

बरसात केवल गर्मी से राहत लेकर नहीं आता बल्कि ढेर सारी बीमारियां भी लेकर आता है. ऐसे में आपको इस मौसम में सतर्क रहने की जरूरत होती है. साफ-सफाई के अलावा अपने खान-पान पर भी ध्यान देने की जरूरत है.बरसात के मौसम में हवा में काफी नमी रहती है. ऐसे में रोगजनक कीटाणुओं से बीमार होने का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे मौसम में कुछ ऐसे फूड्स हैं जिनसे परहेज करना चाहिए. आइए, जानते हैं कि वे फूड्स कौन-कौन से हैं.

1. हरी पत्तेदार सब्जियां

सेहतमंद रहने के लिए अक्सर हरी पत्तेदार सब्जियों के सेवन की सलाह दी जाती है. लेकिन मानसून में आपको इनसे परहेज करना चाहिए. दरअसल, ऐसी सब्जियों की पत्तियों पर कीट चिपके होते हैं. जो सेहत के लिए सही नहीं होते. ऐसे में बरसात के मौसम में पत्तागोभी, पालक, फूलगोभी से परहेज करना ही बेहतर होता है.

2. फलों के जूस

बरसात के नम वातावरण में रखी हर चीज को खाने से परहेज करना चाहिए. इसमें सड़कों के किनारे मिलने वाले फल और फलों के जूस भी शामिल हैं. फलों के जूस पीना यूं तो सेहत के लिए बेहद फायदेमंद है. लेकिन बरसात के मौसम में खुले नम वातावरण में रखे जूस जर्म्स से भरपूर होते हैं. ऐसे में बेहतर यही है कि आप घर पर फलों का जूस निकालकर पिएं.

3. सी-फूड्स

मानसून मछली और झींगा आदि का प्रजननकाल होता है. ऐसे में इस दौरान इनसे परहेज करना बेहतर होता है. इसके बदले बरसात में आप चिकन, मटन या अन्य नॉन-वेजिटेरियन विकल्पों पर विचार कर सकते हैं. अगर आपको फिर भी सी-फूड्स खाने का मन है तो इस बात का ख्याल रखें कि वह एकदम ताजा हो और अच्छी तरह से पका हो.

4. तली-भुनी चीजें

मानसून के मौसम में हमारी पाचन शक्ति काफी कमजोर हो जाती है. ऐसे में तली-भुनी चीजें खाने से गैस संबंधी विकार या पेट की समस्या होने की संभावना होती है. इसके अलावा ज्यादा नमक वाली चीजें खाने से शरीर में पानी की कमी का भी खतरा होता है.

किसी से नहीं कहना: भाग 4- उर्वशी के साथ उसके टीचर ने क्या किया?

डिनर के बाद महेश ने उर्मी को उस के घर छोड़ दिया. बिस्तर पर लेट कर उर्वशी अपनी योजना को सफल होता देख खुश हो रही थी, किंतु आगे अब क्या और कैसे करना है, यह उस के समक्ष चुनौतीभरा कठिन प्रश्न था.

दूसरे दिन उर्वशी ने महेश को फोन कर के कहा, ‘‘हैलो महेश मैं 1 सप्ताह के लिए अपने घर जा रही हूं…’’

महेश ने बीच में ही उसे टोकते हुए कहा, ‘‘उर्मी, 1 सप्ताह, मैं कैसे रहूंगा तुम्हारे बिना?’’

‘‘महेश हमेशा साथ रहना है तो यह जुदाई तो सहन करनी ही होगी. मैं हमारी शादी की बात करने जा रही हूं, आखिर मुझे भी तो जल्दी है न.’’

उर्वशी के मुंह से यह बात सुन कर महेश खुश हो गया. उर्वशी अपने घर चली गई, महेश से यह कह कर कि उसे फोन नहीं करना.

1 सप्ताह का कह कर गई उर्वशी 15 दिनों तक भी वापस नहीं आई.

इधर महेश की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. उर्वशी यही तो चाहती थी, अभी तक

सबकुछ उस की योजना के मुताबिक ही हो रहा था. 15 दिनों बाद उर्वशी वापस आई और उस ने महेश को फोन लगा कर बोला, ‘‘महेश एक बहुत ही दुखद समाचार ले कर आई हूं, शाम को डिनर पर मिलो तो तुम्हें सब विस्तार से बताऊंगी.’’

शाम को डिनर पर उर्वशी को उदास देख कर महेश ने पूछा, ‘‘क्या हुआ उर्मी? घर पर मना तो नहीं कर दिया न?’’

बहुत ही उदास मन से उर्वशी ने उसे बताया, ‘‘महेश मेरे पापा ने मेरी शादी तय कर दी है.’’

‘‘यह क्या कह रही हो उर्मी? तुम से बिना पूछे वे ऐसा कैसे कर सकते हैं?’’

‘‘मुझे नहीं पता था महेश कि मेरे महल्ले में रहने वाला राकेश बचपन से मुझे प्यार करता है. मैं ने तो कभी उस के साथ बात भी नहीं करी. एक दिन उस ने मेरे पापा से मिल कर कहा मैं आप की बेटी से बहुत प्यार करता हूं और उस से शादी करना चाहता हूं. मैं उस के लिए कुछ भी कर सकता हूं.

‘‘मेरे पापा ने यों ही उस से पूछ लिया कि क्या कर सकते हो तुम उस के लिए?

‘‘राकेश ने कुछ देर सोच कर कहा कि मैं शादी से पहले ही अपना बंगला, सारी दौलत आप की बेटी के नाम कर सकता हूं.

‘‘मेरे पापा चौंक गए और उन्होंने कहा कि यह क्या कह रहे हो? कथनी और करनी में बहुत फर्क है.

‘‘तब महेश उस ने सच में अपना बंगला मेरे नाम पर लिख दिया हालांकि मेरे पापा ने उसे मना भी किया. पापा के मुंह से यह सब सुनने के बाद मैं कुछ कह ही नहीं पाई, क्योंकि मेरे मम्मीपापा दोनों बहुत ही खुश थे.

‘‘मुझे समझते हुए उन्होंने कहा कि उर्मी जो लड़का तुम्हें इतना प्यार करता है, सोचो तुम्हें कितना खुश रखेगा. मैं कुछ नहीं कह पाई महेश.

महेश ने बौखला कर कहा, ‘‘इस में कौन सी बड़ी बात है उर्मी, मैं भी अपनी पूरी दौलत तुम्हारे नाम कर सकता हूं.

प्यार के आगे दौलत की औकात ही क्या और फिर तुम भी तो मेरी ही रहोगी न.’’

अपनी योजना को सफल होता देख उर्वशी ने खुश हो कर कहा, ‘‘मैं जानती हूं महेश, लेकिन राकेश ने तो अपनी सारी दौलत मेरे नाम कर दी है, उसे कैसे मना करें?’’

‘‘उर्वशी तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हारे पापा से मिल कर उन्हें समझऊंगा और जो कुछ भी राकेश ने दिया है उसे वापस कर देंगे.’’

इस तरह बातें करते हुए दोनों ने डिनर पूरा किया और फिर महेश ने उर्वशी को घर छोड़ दिया. महेश की पत्नी पूजा को उस के अफेयर के बारे में पता था. इसीलिए उन के घर में रोज झगड़ा होता रहता था.

महेश जैसे ही अपने घर पहुंचा पूजा ने गुस्से में पूछा, ‘‘इतनी देर कहां थे महेश? कोई फोन नहीं, कोई खबर नहीं, आखिर ऐसा क्यों कर रहे हो? तुम्हें क्या लगता है, मुझे कुछ पता नहीं, धोखा देना और गलतियां करना तो तुम्हारी आदत ही है.’’

पूजा बहुत ही स्वाभिमानी लड़की थी. उस ने महेश की इस हरकत के लिए उसे धिक्कारते हुए कहा, ‘‘महेश तुम एकसाथ 2 लड़कियों को धोखा दे रहे हो. कौन है उस से मुझे कोई मतलब नहीं, मुझे मतलब है तुम से और यह धोखा तुम मुझे दे रहे हो. मैं तुम्हारे जैसे घटिया धोखेबाज इंसान के साथ नहीं रह सकती. मैं उन लड़कियों में से नहीं हूं, जो पति को परमेश्वर मान कर इस तरह के अत्याचार घूंघट में रह कर ही सहन कर लेती हैं. यदि तुम्हें मुझ से नहीं किसी और से प्यार है तो मैं तुम्हें आजाद करती हूं. इतने सालों में शायद मेरा प्यार तुम्हें कम पड़ गया. अच्छा ही हुआ हमें अभी तक कोई संतान नहीं हुई वरना शायद मेरे पैरों में बेडि़यां पड़ जातीं.’’

महेश पूजा की बातों का कोई जवाब नहीं दे पाया. उस पर तो अभी केवल उर्मी के प्यार का नशा चढ़ा हुआ था. उर्वशी के मन में चल रहे षड्यंत्र से अनजान महेश उसी के साथ उस के मातापिता के पास गया. वहां पहुंच कर महेश ने उर्मी के पिता के समक्ष अपने प्यार का इजहार किया और शादी का प्रस्ताव रखा.

किंतु उर्वशी के पिता विवेक ने उसे टोकते हुए कहा, ‘‘यह संभव नहीं है, मैं ने उर्मी का रिश्ता तय कर दिया है, वह लड़का राकेश उसे बहुत प्यार करता है. मेरे मना करने के बाद भी उस ने अपनी सारी दौलत इस के नाम कर दी है, मैं उसे कैसे मना कर सकता हूं महेश? ’’

‘‘लेकिन उर्मी तो मुझ से प्यार करती है न अंकल, राकेश से नहीं. यह तो उर्मी के साथ भी अन्याय ही होगा. यदि आप अपनी बेटी को खुश देखना चाहते हैं तो आप वह रिश्ता तोड़ दीजिए, मैं उर्मी से बहुत प्यार करता हूं और उस के बिना जी नहीं पाऊंगा. मैं भी अपनी पूरी दौलत उर्मी के नाम लिखने को तैयार हूं.’’

विवेक अब कुछ नहीं कह पाए और उन्होंने हां कह दी, क्योंकि इस षड्यंत्र में वे शुरू से ही उर्वशी के साथ थे.

महेश बहुत ही जोश में था, वह तुरंत ही वहां से जाने लगा और जातेजाते उस ने उर्मी से कहा, ‘‘उर्मी आई लव यू, तुम्हारे लिए मैं कुछ

भी कर सकता हूं कुछ भी. मैं कल ही अपने वकील को साथ ले कर वापस आऊंगा और अपनी पूरी जायदाद तुम्हारे नाम कर दूंगा. फिर हमें विवाह के बंधन में बंधनेसे कोई भी रोक नहीं पाएगा.’’

1 दिन की कह कर गया महेश 3 दिन तक वापस नहीं आया और न ही उस का कोई फोन आया. इधर उर्वशी और उस के मातापिता बेचैन होने लगे, उन्हें लगने लगा कि महेश कहीं कुछ समझ तो नहीं गया.

उर्वशी बारबार उसे फोन कर रही थी, किंतु उस का फोन स्विच औफ ही आ रहा था. देखतेदेखते पूरा सप्ताह बीत गया, किंतु महेश नहीं आया तब उर्वशी घबरा कर वापस देवास आ गई और महेश से मिलने उस के शोरूम पहुंच गई.

सेल्समैन ने उसे देखते ही कहा, ‘‘उर्मी मैडम महेश सर के मातापिता  की कार दुर्घटना में मृत्यु हो गई है. यह समाचार मिलते ही वह जबलपुर चले गए और उन का मोबाइल भी बंद आ रहा है.’’

इतना सुन कर उर्वशी ने खेद व्यक्त किया और अपने घर चली गई. उस के मन में यह संतोष था कि जैसा वह सोच रही थी वैसा कुछ नहीं है. महेश को कुछ भी पता नहीं चला, उस की योजना असफल नहीं हुई.

1 सप्ताह और बीतने के बाद महेश देवास वापस आया और सब से पहले उर्मी से मिलने उस के घर पहुंच गया.

नमस्ते जी: भाग 2- आज उस ने अपनी बड़ी लड़की को काम पर क्यों भेजा…

एक दिन दोपहर में लगभग ढाई बजे के आसपास जब मैं अंकिता को दूध पिला रही थी तो प्रीति मेरे पास कमरे में आई. वैसे तो यह समय उस का आराम करने का होता था. उस की सांस कुछ फूली हुई सी थी और उस के सिर के बाल बेतरतीब से फैले हुए थे. मैं ने उस को नीचे से ऊपर तक निहारा तो लगा कि उस के साथ कुछ हुआ है. मैं ने पूछा था, ‘प्रीति, तुम इतनी घबराई हुई सी क्यों लग रही हो? क्या बात है?’

‘मेमसाहिब, आप कोई और काम करने वाली ढूंढ़ लो. मैं अब आप के घर काम नहीं कर सकती.’

‘क्यों प्रीति, ऐसा क्या हुआ जो तुम अचानक इस तरह दोपहर में काम छोड़ कर जा रही हो? तुम्हारे साथ हम सब अच्छे से बरताव करते हैं. तुम्हें यहां किसी तरह की कोई रोकटोक भी नहीं है. अपनी इच्छा से काम करती हो. जब मन में आता है तब घर घूम आती हो. फिर आज अचानक ऐसा क्यों…’

प्रीति तब कुछ नहीं बोल पाई थी. बस, वापस मुड़ कर अपनी चुनरी के एक कोने को मुंह में दबाए भाग ली थी वह. मैं कुछ भी नहीं समझ पाई थी. अंकिता को सोता छोड़ कर मैं दूसरे कमरे में आ गई थी जहां नितिन सोए थे. मैं ने उन्हें जगाया तो आंख भींचते हुए बोले, ‘क्या बात है छुट्टी वाले दिन तो आराम कर लेने दिया करो?’

मैं ने सारा वृतांत उन्हें सुनाते हुए पूछा, ‘तुम्हें कुछ समझ में आ रहा है कि प्रीति ऐसे अचानक क्यों भाग गई?’

‘प्रीति अपने घर चली गई? मैं आराम करने के लिए जब कमरे में आया था तब तो वह बरामदे में लेटी हुई थी. हो सकता है सोते हुए उस ने कोई बुरा स्वप्न देख लिया हो. शायद डर गई हो, बेचारी. कहीं तुम ने या मां ने तो कुछ नहीं कह दिया? काम करते वक्त उसे कुछ कह तो नहीं दिया आज सुबह या कल शाम को?’

‘नहीं तो, इतने दिन हो गए भला आज तक कुछ कहा है, जो आज. हां, हो सकता है सोते हुए उस ने कोई बुरा स्वप्न देखा हो. खैर, चलो छोड़ो, मैं शाम को उस के घर हो आऊंगी.’

यह कह कर मैं अपने कमरे में आ तो गई लेकिन मुझे चैन नहीं पड़ा रहा था. मैं बैड पर लेटेलेटे सोचती रही कि आखिर ऐसा क्या हुआ होगा जो वह भरी दोपहर में घर वापस जाने को मजबूर हो गई? मांजी से पूछा तो उन्होंने कह दिया कि उन की तो आज प्रीति से कोई बात ही नहीं हुई.

मुझे जब असमंजस में और अधिक नहीं रहा गया तो मैं प्रीति के घर पहुंच गई थी. प्रीति एक कोने में अलग सी बैठी थी. मुझे दहलीज पर देख कर भी कुछ नहीं बोली, वैसे ही बैठी रही थी, वरना तो उठ कर मेरा स्वागत करती थी. मैं ने जब काम छोड़ने के बारे में जानना चाहा तो उस की मां ने इतना ही कहा था, ‘मेमसाहिब, अब प्रीति तुम्हारे घर काम नहीं करेगी. अब यह गांव जाएगी इस की वहां शादी तय हो गई है.’

‘ऐसे अचानक, कैसे?’

‘बस, मेमसाहिब, हम गरीब लोगों के साथ कब, कैसे, क्या गुजर जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता. आप ठहरे बड़े आदमी, हम छोटे लोग भला क्या कह सकते हैं? बाकी अब प्रीति आप के घर नहीं जाएगी.’

मेरी लाख कोशिशों के बावजूद प्रीति ने काम छोड़ने का कारण नहीं बतलाया और मैं अपना सा मुंह ले कर वापस घर आ गई थी. घर आ कर मैं कुछ देर तक सोचती रही थी.

‘आखिर ऐसा क्या हुआ होगा जो प्रीति यों काम छोड़ कर चली गई और अब उस की शादी करने की बातें हो रही हैं. जिस के लिए उसे गांव भेजा जा रहा है. अभी तो प्रीति की उम्र 13 वर्ष की ही होगी, फिर इतनी जल्दी वह भी एकाएक.’

जब समझ में कुछ नहीं आया तो मैं नितिन के पास आ गई और उन से किसी दूसरी काम वाली लड़की का इंतजाम करने को कहा.

अनमने मन से नितिन ने कहा, ‘हां, देखता हूं. इतनी जल्दी थोड़ी ही काम वाली लड़कियां मिलती हैं, वह भी तुम्हारी पसंद की.’

तब मैं ने कहा था, ‘कोई बात नहीं. कैसी भी ले आओ, चलेगी. बच्चों का ध्यान कैसे रखना है, वह सबकुछ मैं समझा दूंगी.’

अगले ही दिन नितिन ने अपनी जानकारी में कइयों को काम वाली के बारे में कह दिया था. उस के 4-5 दिन के बाद शर्माजी के यहां काम करने वाली बाई ने ‘डोर बेल’ बजाई तो सास ने उस के पास जा कर पूछा था, ‘हां रमा, क्या बात है. कैसे आई हो?’

‘बीबीजी को एक लड़की चाहिए न बच्चों की देखभाल के लिए, सो उसी की खातिर आई थी.’

मैं ने घर के अंदर से ही कह दिया था. ‘हां रमा, चाहिए. लेकिन कौन है?’

‘मेमसाहिब, मेरी बड़ी लड़की 14-15 साल की है मगर…’

‘मगर क्या?’ सास ने पूछा था.

‘जी वह पैर से थोड़ी अपाहिज है. लेकिन घर का सारा काम कर लेती है. मेरी 4 लड़कियां उस से छोटी हैं. वही मेरे पीछे से घर का सारा काम करती है और अपनी छोटी बहनों की देखभाल भी. अब खर्चा बढ़ गया है न. शर्माजी की बीवी ने कहा था कि आप को तो सिर्फ काम वाली 2 घंटे सुबह और 2 घंटे शाम को चाहिए तो वह इतना वक्त निकाल लेगी.’

तब तक मैं भी अपनी सास के पास आ कर खड़ी हो गई थी. मैं ने उस से पूछा था कि महीने के हिसाब से कितने पैसे लोगी? हम उसे दोनों समय खाना तो देंगे ही साथ में कपड़े भी दे देंगे.

उस ने कहा था कि जो मरजी दे देना मांजी. वैसे मैं एक घर में बरतन करने का 300 रुपए लेती हूं.

मैं ने तपाक से कहा था, ‘अच्छा चल, कुल मिला कर महीने के 500 रुपए दे देंगे. अगर ठीक है तो आज शाम से ही भेज दो.’

500 रुपए सुन कर उस ने झट से हां की और हमारा अभिवादन कर के चली गई.

शाम को उस ने अपनी बड़ी लड़की को हमारे यहां काम के लिए भेज दिया था. लड़की का हुलिया दयनीय था. मोटेमोटे काले होंठ, उभरे हुए दांत जिन पर गंदगी साफ देखी जा सकती थी, मैलेकुचैले कपड़े. छाती पर इतना ही उभार था कि बस यह महसूस किया जा सके कि लड़की है. मेरे नाम पूछने पर उस ने अपना नाम आयशा बतलाया था. उसे देख कर मैं मन ही मन सोचने लगी कि ‘यह क्या काम करेगी? पहले तो मुझे ही इस के लिए कुछ करना पड़ेगा.’

मैं ने तब नहाने का साबुन व बदलने के लिए दूसरे कपड़े देते हुए उसे ताकीद की थी कि पहले तुम अच्छे से नहा कर आओ और दांत साफ करना मत भूलना. उस ने मुझ से कपड़े और साबुन लिए और पूछा, ‘आंटीजी, बाथरूम किस तरफ है?’

मैं चौंक गई थी. ‘अरे, तुम अपने घर जा कर नहा कर आओ.’

तब उस ने कहा था कि आंटी, हमारे घर बाथरूम कहां. मैं तो अंधेरा होने पर ही घर के आंगन में नहा लेती हूं या फिर सूरज निकलने से पहले.

मैं सोच में पड़ गई थी कि क्या करूं, क्या न करूं? यह कैसी मुसीबत आ गई. मांजी को पता चल गया तो. खैर, उसे चुपचाप बाथरूम में भेज मैं आंगन में बिछी चारपाई पर अंकिता को ले कर बैठ गई थी. वह थोड़ी ही देर में नहा कर बाहर आ गई थी. मैं ने उसे उस का सारा काम समझाते हुए उस से पहले बाथरूम की जम कर सफाई करवाई थी.

आयशा मेरी सोच से अधिक समझदार निकली. जो भी कहती वह उसे आगे से आगे, बिना ज्यादा बुलवाए, पूरा कर देती थी. जब भी उस को समय मिलता तो वह अंकिता को ले मेरे पास आ बैठती और कहती थी, ‘आंटी आप कितनी सुंदर हैं. आप क्या लगाती हैं अपने मुंह पर? कौन सी क्रीम लगाती हैं? कौन सा तेल इस्तेमाल करती हैं? आप के बालों से बहुत अच्छी महक आती रहती है.’

आयशा मेरी तारीफ करनी शुरू कर देती थी तो रुकती ही नहीं. मैं उसे अब अकसर शैंपू, तेल, साबुन, क्रीम दे दिया करती. उसे नए कपड़े भी सिलवा कर दे दिए थे. मेरे कहने से दांत मंजन करतेकरते न जाने कब आयशा आंख में अंजन भी करने लगी थी.

दीक्षा डगर: बांए हाथ से दुनिया मुट्ठी में

अपनी कमी को कोई अगर अपनी ताकत बना ले तो फिर उसका नाम दीक्षा डगर ही हो सकता है. दीक्षा ने जहां परिवार का नाम रोशन किया है वही देश का परचम भी अनेक दफा लहराया है. दीक्षा जन्मजात श्रवण बाधित है मगर उसने अपनी कमी को अपनी कमजोरी कभी नहीं माना  और ऐसा मुकाम हासिल किया है जो शारीरिक अक्षमता से घिरे अवसाद ग्रस्त लोगों के लिए एक नजीर है.

आइए आज आपको हम मिलाते हैं हरियाणा में झज्जर की रहने वाली प्रतिभाशाली गोल्फ खिलाड़ी दीक्षा डागर से. जिन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए  अपना दूसरा ‘लेडीज यूरोपीय टूर’ खिताब जीत लिया है. तेईस वर्षीय दीक्षा डागर ‘टिपस्पोर्ट चक लेडीज ओपन में चार शाट की जीत के साथ खिताब अपने नाम कर इतिहास में अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज करा लिया.

दीक्षा डागर के बारे में आपको हम   बताते चले कि आप बाएं हाथ से खेलती है . और पहले पहल मात्र 19 वर्ष की उम्र में  2019 में एलईटी खिताब जीता था लंदन- में वह अरेमैको टीम सीरीज में विजयी टीम का हिस्सा रही. अब तक आप दो व्यक्तिगत खिताब के अलावा नौ बार शीर्ष दस में आ चुकी हैं।l. इनमें में चार बार तो वर्तमान सीजन में ही किया है.

हाल की खिताबी दौड़ में दीक्षा ने दिन की शुरुआत पांच शाट की बढ़त के साथ की थी. अंतिम राउंड में  69 का स्कोर किया और हफ्ते में सिर्फ एक बार ही बोगी लगी. मजे की बात यह है कि केवल पहला और अंतिम शाट ड्राप किया. दीक्षा की थाईलैंड की ट्रिचेट से टक्कर थी. और अंतिम दिन नाइन शाट से शुरुआत की थी. खेल के दिन  दीक्षा शानदार लय में थीं. ट्रिचेट दूसरे स्थान पर रहीं, जबकि फ्रांस की सेलिन हचिन को तीसरा स्थान मिला. रावल विरोन क्लब में हवाओं के बीच भी अच्छा प्रदर्शन किया. वह इस हफ्ते 2021 में यहां संयुक्त चौथे स्थान पर रहीं थी.

दीक्षा डागर भारत की दूसरी महिला गोल्फर हैं, जिसने एलईटी टूर पर खिताब जीता है. इससे पहले अदिति अशोक ने 2016 में इंडियन ओपन जीता था. दीक्षा डागर ने पहला खिताब मार्च 2019 में दक्षिण अफ्रीकी ओपन के रूप में जीत दर्ज की थी . दीक्षा दो बार डेफलपिक (बधिरों के लिए ओलंपिक) में दो बार पदक जीत चुकी हैं. 2017 में रजत पदक और 2021 में स्वर्ण पदक हासिल किया था। उसके बाद उन्होंने तोक्यो ओलंपिक में भाग लिया और ऐसी पहली गोल्फर बनीं, जिसने डेफ ओलंपिक और मुख्य ओलंपिक दोनों जगह हिस्सा लिया. उन्होंने 2018 एशियाई खेलों में भी शिरकत की थी.

दीक्षा डागर को जन्म से ही सुनने में दिक्कत है. वह छह साल की उम्र से ही मशीन की मदद से सुनती रही हैं. उनके भाई योगेश डागर भी बहरेपन की समस्या से ग्रसित हैं. मानो अपनी अदम्य जिजीविषा से दीक्षा ने बहरेपन की चुनौतियों पर काबू पा लिया और महिला गोल्फ में अपना नाम कमाने के लिए ज्यादातर लिप- रोडिंग या साइन लैंग्वेज का सहारा लिया. परिजन बताते हैं कि जब वह कुछ महीने की थी, तब बहरेपन के संकेत मिले थे. वह आवाज का जवाब नहीं दे पाती थी.

इस बीच चिकित्सा तकनीक में भी सुधार हुआ था. पूर्व स्क्रैच गोल्फर रहे उनके पिता कर्नल नरेन्द्र डागर ने उन्हें गोल्फ की शुरुआती बारीकियां सिखाई.  आखिकार दीक्षा ने अभूतपूर्व प्रदर्शन किया और सफलता के झंडे गाड़ दिए .माता-पिता ने हमेशा सुनने की अक्षमता को गंभीरता से न लेने में उनकी मदद की.  पिता नरेंद्र अपने दोनों बच्चों को एक सामान्य जीवन देने के लिए दृढ़ थे.

उन्होंने सोचा कि खेल उनके  आत्मविश्वास को बढ़ाने में मदद करेगा. ऐसे में उनके परिवार ने उनकी पढ़ाई को लेकर ज्यादा चिंता नहीं की. क्योंकि, वह टेनिस, तैराकी और एथलेटिक्स में वह पारंगत हो गई थी. और दीक्षा ने दिखा दिया कि बाएं हाथ से भी वह कैसे कमाल दिखा सकती

बांझपन के भावनात्‍मक और मनोवैज्ञानिक दबाव: इनके साथ तालमेल बैठाने और सपोर्ट के संसाधन

आज के समाज में बांझपन (इंफर्टिलिटी) तेजी से चिंता का विषय बनता जा रहा है. विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के एक आकलन के मुताबिक, भारत में बांझपन की समस्‍या 3.9% से 16.8% तक है. बांझपन (इंफर्टिलिटी) की बढ़ती वजह आज के दौर लोगों की दबाव से भरपूर जीवनशैली और स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक आदतों से दूर होने को माना जा रहा है. आधुनिक युग में पुरुषों और औरतों पर वर्क-लाइफ संतुलन बनाने का काफी दबाव है, उस पर अल्‍कोहल और कैफीन का अत्‍यधिक मात्रा में सेवन, तथा बढ़ता धूम्रपान भी इंफर्टिलिटी का कारण बन रहा है.

डॉ राम्या मिश्रा, वरिष्ठ सलाहकार- फर्टिलिटी और आईवीएफ, अपोलो फर्टिलिटी (लाजपत नगर) का कहना है

बेशक, बांझपन (इंफर्टिलिटी) कोई रोग नहीं है लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इसकी वजह से प्रभावित व्‍यक्ति की भावनात्‍मक और मनोवैज्ञानिक सेहत पर असर पड़ता है. इसके कारण कई प्रकार के मनोवैज्ञानिक-भावनात्‍मक विकार या साइड इफेक्‍ट्स जैसे कि तनाव, अवसाद, नाउम्‍मीदी, अपरोधबोध, झुंझलाहट, चिंता और जीवन में किसी लायक न होने जैसा भाव पैदा होता है.

एनसीबीआई के मुताबिक, बांझपन (इंफर्टिलिटी) से जूझ रहे लोग कई बार दु:ख, अफसोस, अकेलेपन जैसी समस्‍याओं के अलावा मानसिक रूप से काफी परेशान भी महसूस करते हैं. इंफर्टिलिटी से गुज़र रहे व्‍यक्ति की सेहत इन तमाम कारणों से काफी प्रभावित हो सकती है, लेकिन इनसे निपटने और सांत्‍वना देने के लिए कई उपाय और सपोर्ट सिस्‍टम्‍स भी हैं, जो मददगार साबित हो सकते हैं.

  1. इंफर्टिलिटी का भावनात्‍मक तथा मनोवैज्ञानिक प्रभाव

हालांकि बांझपन (इंफर्टिलिटी) कोई जीवनघाती समस्‍या नहीं है, लेकिन इसे कपल्‍स के जीवन में तनावपूर्ण स्थिति के रूप में देखा जाता है। चूंकि हमारे समाज में, वैवाहिक जीवन में बच्‍चों का होना काफी महत्‍वपूर्ण घटना मानी जाती है, ऐसे में बांझपन के चलते तनाव की स्थिति काफी बढ़ सकती है. गर्भधारण नहीं कर पाने के चलते कपल्‍स अपरोध बोध, पश्‍चाताप, निराशा, दुख, चिंता और झुंझलाहट जैसी भावनाओं के ज्‍वार से जूझते हैं. उस पर उन्‍हें समाज के दबाव भी झेलने पड़ते हैं, जो उनकी पहले से तनाव की स्थिति को और बढ़ाता है तथा उनके आत्‍म-सम्‍मान की भावना भी घटाता है। इसका परिणाम यह होता है कि वे अपने खुद के महत्‍व को लेकर सवाल करने लगते हैं.

हालांकि बांझपन (इंफर्टिलिटी) की समस्‍या से पुरुष और महिलाएं दोनों ही जूझ सकते हैं, लेकिन अक्‍सर समाज में महिलाओं को ही इसके लिए जिम्‍मेदार ठहराया जाता है. विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन का कहना है कि बांझपन झेल रहे कपल्‍स की जिंदगी पर समाज का नकारात्‍मक असर पड़ता है, खासतौर से महिलाओं को इसका दबाव ज्‍यादा सहना पड़ता है और वे कई बार हिंसा, तलाक, सामाजिक तौर पर बेइज्‍़ज़ती, भावनात्‍मक दबाव, निराशा, चिंता तथा आत्‍म-सम्‍मान में कमी जैसी समस्‍याओं को सहने को मजबूर होती हैं.

बांझपन (इंफर्टिलिटी) की वजह से पैदा होने वाला निराशा का भाव आपको अवसाद के गर्त में डुबो सकता है जहां से वापसी या आत्‍म-सम्‍मान वापस प्राप्‍त करना काफी चुनौतीपूर्ण भी हो सकता है. लेकिन इससे निपटने के कई उपाय हैं और कई तरह के सपोर्ट भी उपलब्‍ध हैं जो कपल्‍स को बांझपन के दबावों से मुक्‍त रखने में मददगार साबित हो सकते हैं.

2. समस्‍या के साथ तालमेल बैठाने और सपोर्ट समाधान

1.सैल्‍फ-केयर

इसमें कोई शक नहीं कि खुद की देखभाल (सैल्‍फ केयर) सबसे बेहतरीन तरीका होता है अपना ख्‍याल रखने का. अपना मनपसंद मील बनाएं, सुकूनदायक संगीत को सुनें, सैर पर जाएं, रिलैक्सिंग स्‍नान करें और अच्‍छी नींद लें. अपने लिए कुछ समय निकालें और अपना ख्‍याल करें.

2. किसी नई हॉबी को अपनाएं

इंफर्टिलिटी से जूझते हुए बेशक, अपनी भावनाओं को समझना और संभावना काफी अहम् होता है, लेकिन लगातार उनके बारे में सोचते रहते से आप तनाव बढ़ाते हैं और एंग्‍ज़ाइटी भी लगातार बढ़ती रहती है. इसलिए यह जरूरी है कि आप अपने लिए कुछ समय निकालें, अपनी मनपसंद हॉबी को समय दें. कुछ ऐसा करें जिससे आपको सहजता हो और आप खुद को रिलैक्‍स महसूस करें, जैसे कि कुकिंग क्‍लास, म्‍युज़‍िक लैसन या पेंटिंग क्‍लास आदि से जुड़ें.

3. एक्‍सपर्ट की सहायता लें

अगर आपको लगता है कि आपके हालात बेकाबू हो रहे हैं, तो बेहतर होगा कि आप किसी हैल्‍थ प्रोफेशनल की मदद लें जो आपको सही तरीके से अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने के उपायों के बारे में बता सकते हैं और आपको खुद को सकारात्‍मक बनाने की दिशा भी दिखा सकते हैं. सच तो यह है कि किसी फर्टिलिटी स्‍पेश्‍यलिस्‍ट से परामर्श लेना सही फैसला हो सकता है, जो आपको कुछ अन्‍य तरीकों से गर्भधारण के बारे में जानकारी दे सकते हैं.

4. क्‍या करें कि सब ठीक रहे

आज के समय में बांझपन (इंफर्टिलिटी) की समस्‍या काफी व्‍यापक हो चली है जिसका लोगों के भावनात्‍मक तथा मनोवैज्ञानिक स्‍वास्‍थ्‍य पर विपरीत असर पड़ता है. इसका नकारात्‍मक असर तनाव, स्‍वभाव में चिडचिड़ापन, नाउम्‍मीदी का भाव, अपरोधबोध, निराशा और एंग्‍जाइटी बढ़ाता है. जब आप खुद को व्‍यस्‍त रखने के लिए किसी नई हॉबी को अपनाते हैं, सैल्‍फ-केयर पर ध्‍यान देते हैं और अपने हालात से निपटने के लिए प्रोफेशनल मार्गदर्शन लेते हैं, तभी आपको इस पूरे हालात के बारे में सकारात्‍मक परिप्रेक्ष्‍य दिखायी देता है.

सैलून में पैसे खर्च किए बिना, फ्रेंच मैनीक्योर करें घर पर

अगर आप फ्रेंच मैनीक्योर कराना चाह रहे हैं लेकिन सैलून के ख़र्चे से परेशान हो गए हैं तो आपके लिए एक बेहतर उपाय है आप घर पर भी फ्रेंच मैनीक्योर कर सकते हैं. आपके प्राकृतिक नाखून आपकी सुंदरता बढ़ाते हैं और आपकी पर्सनैलिटी को निखारने में भी मदद करते हैं. हमारे नाखूनों का भी त्वचा की तरह ध्यान रखने की आवश्यकता होती है लेकिन हमारे पास हमेशा नाखूनों की देखभाल के लिए नेल सैलून जाने का समय नहीं होता है. इसीलिए हम आपको यहां घर पर ही फ्रेंच मैनीक्योर की विधि बताएंगे जो आपके नाखूनों को स्वस्थ और साफ रखने में मदद करेगी. इस विधि से न केवल आप सैलून का खर्चा बचाएंगे बल्कि दिन भर में आपके पास अन्य गतिविधियों के लिए भी समय रहेगा.

 फ्रेंच मैनीक्योर घर पर कैसे करें

अगर आपने पहले कभी फ्रेंच मैनीक्योर नहीं किया है तो यह आपके लिए जानना आवश्यक है कि फ्रेंच मैनीक्योर में आमतौर पर हल्का गुलाबी बेस और सफेद टिप्स शामिल होती है। यह आपके नाखूनों को क्लासी लुक देती है। आइए जानते है इसके बारे में.

  1. अपने नाखून तैयार करें

एक बाउल में गर्म पानी ले और उसमें हाथों को 1 या 2 मिनट के लिए डूबा कर रखें। ऐसा करने से सभी तेल और शुष्क त्वचा से छुटकारा पाने में मदद मिलती है और आपका मैनीक्योर लंबे समय तक टिका रहता है. जब आप अपने नाखून को तैयार करते हैं तो यह ध्यान दें कि वे समान आकार के हो और साफ-सुथरे हो. गलत तरीके से कटे हुए नाखून आपके लुक को खराब कर सकते हैं.

2. बेस कोट अप्लाई करें

अब आपको अपने नाखूनों पर बेस कोट लगाने की जरूरत है. फ्रेंच मैनीक्योर के लिए यह स्टेप महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे आपके प्राकृतिक नाखून मुलायम दिखेंगे.

3. सिरों पर काम करें

अपने नाखूनों के सिरों पर सफेद नेल पॉलिश का इस्तेमाल करें. ब्रश की सहायता से चिकनी और सामान रेखा बनाएं अतिरिक्त पॉलिश को क्यू-टिप से साफ करें और अपने नाखूनों को सूखने दें.

4. ओवर टॉप नेल पॉलिश अप्लाई करें

इसके लिए आपको बेबी पिंक नेल पॉलिश का इस्तेमाल करना है. यह शेड सभी रंगों को एक साथ मिला देगा जिससे आपका मैनीक्योर और अधिक सुंदर दिखेगा.

5. टॉप कोट अप्लाई करें 

अपने मैनीक्योर को सेट करने के लिए अपने नाखूनों पर एक पारदर्शी टॉप कोट लगाएं. इसके सूखने के बाद हाइड्रेशन के लिए इसमें क्यूटिकल ऑयल मिलाएं.

6. रिवर्स फ्रेंच मैनीक्योर

रिवर्स फ्रेंच मेनीक्योर काफी फेमस नेल ट्रेंड् है. इसमें आपको अधिक समय भी नहीं लगता और यह करने में भी आसान होता है.

कैसे करें

 1. बेस कोट लगाएं

सबसे पहले बेस कोट की एक पतली परत लगाने से शुरुआत करें. इससे नेल पॉलिश आपके नाखूनों पर आसानी से चिपक जाती है. यह आपके नाखूनों को दाग लगने से बचाता है.

2. पहला नेल कलर लगाएं

आप अपनी पसंदीदा नेल पॉलिश ले सकते हैं. इसकी एक अच्छी पतली परत अपने नाखूनों पर लगाएं.

3. दूसरा नेल कलर लगाएं

इसके लिए थोड़ी मात्रा में पोलिस ले और अपनी क्यूटिकल के आकार से मेल खाने के लिए ब्रश को ध्यान से इस्तेमाल करें. पहले रंग को दिखाने के लिए छोटी सी जगह छोड़ दें.

4. टॉप कोट लगाएं

मैनीक्योर को सेट करने के लिए ध्यान रखें कि टॉप कोट ऐसे लगाएं कि वह लंबे समय तक चले.

अपने अपने सच: भाग 3- पहचान बनाने के लिए क्या फैसला लिया स्वर्णा की मां ने?

मेरा एक कमरे वाला घर आ गया तो उन्होंने स्वयं नीचे उतर कर मेरी तरफ की खिड़की खोली, ‘आओ, स्वर्णा…’ इतना सम्मान…

‘चाय नहीं लेंगे सर?’ मैं ने संकोच छोड़ आग्रह सा किया, ‘मां दरवाजे पर खड़ी हैं, उन से नहीं मिलेंगे…?’

वे सिर्फ मुसकराते रहे. फिर कभी आने को कह गाड़ी आगे बढ़ा ले गए.

लतिका के पापा को देख कर मां बहुत खुश हुईं और पूछ बैठीं, ‘कौन था यह आलीशान गाड़ी वाला?’

‘मेरी सहेली लतिका के पापा,’ मैं उत्साह से सराबोर थी, ‘मैं ने जिंदगी में ऐसा शानदार बंगला नहीं देखा मम्मी, जैसा इन का है…और पता है मम्मी, इन्होंने नाश्ते में मुझे क्याक्या खिलाया?’ इस तरह मां को मैं बहुत कुछ बता गई. पर उन की जांघ मेरी नंगी जांघ से सटी रही, मुझे यह छुअन अद्भुत लगी, इस बात को मैं ने छिपाए रखा और इस अनुभव को मैं गोल कर गई.

मैं सोच रही थी कि देर से आने के लिए मां मुझे जरूर डांटेंगी पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, उलटे वे बहुत खुश हुईं और बोलीं, ‘चलो, बड़े लोगों के संपर्क में आ कर तुझे कुछ उठनेबैठने का ढंग आ जाएगा.’

उस के बाद कई बार लतिका के साथ मैं और उस के पापा रेस्तराओं में गए. किताबों के मेले में गए. किला और जू देखने गए. हर जगह वे जिद कर के कुछ न कुछ मुझे खरीदवा देते जिसे एक संकोच के साथ ही मैं घर ला पाती.

जीवन में अपने पापा का अभाव ऐसे में मुझे बेहद खलता. काश, लतिका की तरह मुझे भी पापा का लाड़प्यार मिला होता. मेरी मां अगर ऐसा न करतीं तो हम भी अपने पापा के साथ कितने खुश होते. दूसरे क्षण ही, मैं यह भी सोच जाती कि लतिका के पापा एक तरह से मेरे  भी तो पापा ही हुए. पापा जितनी ही उम्र होगी इन की. बस, व्यवहार बहुत अलग किस्म का है. एकदम लाड़प्यार भरा.

एक दिन मां ने खुश हो कर मुझे बताया, ‘ले, तेरी एक और इच्छा मैं पूरी कर रही हूं. हम जल्दी ही एक छोटे लेकिन अपने फ्लैट में जाने वाले हैं.’

‘फ्लैट और वह भी हमारा अपना… इतने पैसे कहां से आए आप के पास?’ मैं ने कुपित स्वर में मां से पूछा तो वे अचकचा गईं.

‘तुझे आम खाने से मतलब है या पेड़ गिनने से?’ उन्होंने एक प्रकार से मुझे डांटा और कहा, ‘बस, कल तक उस फ्लैट में हमें पहुंचना है, इसलिए आज से ही अपना सामान ठीक से समेटना शुरू कर दे…लतिका के पापा ने तुझे ढेरों कपड़े ले दिए हैं…उन को ठीक से पैक करना…’

एक दिन लतिका ने स्कूल में बताया,

‘हम लोग बाहर पिकनिक पर चलेंगे. पापा अपनी गाड़ी से हमें ले चलेंगे…खूब मजा करेंगे हम लोग…’

सुन कर मैं एकदम उत्साह और खुशी से उछल पड़ी, ‘लेकिन मम्मी पता नहीं तैयार होंगी मुझे कहीं भेजने को.’

‘उन्हें मना लेना,’ लतिका बोली, ‘कहना, मैं साथ चल रही हूं, पापा साथ होंगे फिर डर किस बात का…?’

नए फ्लैट की एक चाबी मां के पास रहती थी, और दूसरी मेरे पास. हम लोग अपनेअपने वक्त पर आजादी के साथ नए घर में आजा सकते थे. मुझे देर होती तो, मां चिंता नहीं करती थीं, वे जानती थीं कि मेरे साथ लतिका होगी, या उस के पापा.

उस दिन अपने खयालों में खोई मैं ने धीरे से दरवाजा खोला तो एकदम चौंक सी गई. मां बिस्तर पर किसी के साथ सोई थीं. मैं एकदम हड़बड़ा कर अपने कमरे में चली गई. वहां देर तक थरथर कांपती रही. जो देखा क्या वह सच था? कहीं आंखों को धोखा तो नहीं हुआ था? मां के साथ कोई आदमी ही था या वे अकेली थीं?

लेकिन मां तो इस समय अस्पताल में होती हैं. यहां कैसे आ गईं? इस आदमी को इस से पहले तो कभी मां के साथ नहीं देखा. फिर…? अनजाने भय और आशंका ने मुझे जकड़ लिया. चुपचाप कांपती मैं देर तक कमरे में बैठी रही.

जब कमरे से बाहर निकली तो सामने मां एकदम सहज सी दिखीं. मुझे देख कर मुसकराईं, ‘आज तू स्कूल से जल्दी आ गई.’

‘हां, किसी की मौत हो गई तो स्कूल में छुट्टी हो गई.’

मैं उदास थी पर मां हंस रही थीं. मन हुआ पूछूं, कौन था वह? पर पूछने का साहस नहीं जुटा सकी.

‘कभीकभी ये आया करेंगे…’ मेज पर खाना लगाती हुई मां बोलीं. मैं समझ गई थी, मां उसी आदमी के बारे में कह रही हैं, ‘यह फ्लैट इन्होंने ही दिया है हमें…दिल्ली के बड़े बिल्डर हैं. बहुत अच्छे आदमी हैं.’

खाने के बाद मैं बोली, ‘मैं लतिका के साथ इन छुट्टियों में पहाड़ पर घूमने जाऊंगी…लतिका के पापा, मैं और लतिका…आप जाने देंगी?’ फिर कुछ सोच कर मैं बोली, ‘लतिका के पापा ने कहा है कि खर्चे की फिक्र न करूं मैं… लतिका के साथ होटल में रहूंगी. उस के पापा अलग कमरे में रहेंगे…गरम कपड़े वे ही खरीद देंगे.’

जाने क्यों यह सब सुन कर मां बहुत खुश हुईं और बोलीं, ‘बहुत अच्छे आदमी लगते हैं लतिका के पापा…एकदम लतिका की तरह ही तुझे प्यार करते हैं.’

मेरा मन हुआ कि मैं मां से अपने भीतर का सच उगल दूं… वे भले ही मुझे अपनी बेटी लतिका की तरह प्यार करते हों पर मुझे न जाने क्यों बहुत अच्छे लगते हैं… इतने अच्छे कि जी चाहता है उन्हें बांहों में भर कर सीने में भींच लूं.

हालांकि अपने इस निजी एहसास से मैं स्वयं झेंप जाती. मेरी रगों में गरम खून लावे की तरह धधकने लगता.

लतिका के पापा के साथ भेजने के लिए मां इतनी उतावली क्यों हो रही हैं? इसलिए तो नहीं कि पीछे उन्हें भी अकेले रहने का मौका मिलेगा और वह ‘बिल्डर’ मां के पास दिन में भी बेखटके आ सकेगा. यह सोचते ही मन में अजीब सी कसमसाहट हुई. पर मेरे पास उन्हें रोकने के लिए कोई तर्क नहीं था. कैसे रोकती?

लतिका के पापा लतिका और मुझे ले कर एक मौल में गए. गरम कपड़े खरीदवाए. मैं तो चुप ही रही. बड़े महंगे कपड़े थे…एकदम नए फैशन के.

‘तुम अपनी पसंद क्यों नहीं बतातीं, स्वर्णा…?’ लतिका के पापा ने जिन नजरों से मेरी ओर देखा, उस से मैं लाल पड़ गई, ‘आप की पसंद खुद ही बहुत अच्छी है…आप को जो ठीक लगे, ले दीजिए…’ कहती हुई मैं झेंप गई.

लतिका अपनी कोई खास ड्रैस पसंद करने जब दूसरी गैलरी में गई तो वे मौका पा कर नजदीक आ कर हौले से बोले, ‘मैं चाहता हूं कि तुम यह ड्रैस मेरे साथ एक दिन पहाड़ पर पहनो…पर लतिका को न दिखाना,’ ड्रैस देख कर मैं एकदम सकपका सी गई.

मन में आया, कहूं कि लतिका को न दिखाया तो पहाड़ पर पहन भी कैसे सकूंगी? वह तो साथ होगी…और वह साथ होगी तो देखेगी ही. फिर भी मैं ने चुपचाप एक बड़े बैग में वह ड्रैस रख ली.

मौल से वापसी के समय मैं लतिका और उस के पापा के बीच बैठी. मुझे उन का साथ बहुत अच्छा लग रहा था. एकदम गुनगुना, प्यार भरा, अपनत्व भरा और तनबदन महकादहका देने वाला.

लतिका चहक रही थी कि उस ने बहुत अच्छी ड्रैसें अपने लिए पसंद की हैं.

पहाड़ की यात्रा पर भी मैं लतिका और उस के पापा के बीच में ही बैठी. जाने क्यों ऐसा करने से मैं अपने को रोक नहीं पा रही थी. मैं हर समय उन के संग का सुख चाहती थी. आदमी का साथ, आदमी का कामुक स्पर्श कितना मादक होता है, उस का कैसा जादू भरा असर तन और मन पर होता है, इस का अनुभव जीवन में मैं पहली बार कर रही थी.

कहीं मन में गहरे यह भी चाह उठ रही थी कि काश, इस वक्त बस मैं होती और लतिका के पापा होते…

पहाड़ पर पहुंचतेपहुंचते लतिका को पता नहीं क्या हो गया कि उस का गला बैठ गया. शायद उसे सर्दी लग गई. माथा हलका गरम हो गया. होटल के कमरे में पहुंच कर पापा ने डाक्टर को बुला कर दिखाया तो डाक्टर ने फ्लू जैसा अंदेशा बता हमें डरा ही दिया. दवा दे कर लतिका को आराम करने के लिए कह दिया.

लतिका को अफसोस होने लगा कि इतने उत्साह के साथ वह पहाड़ पर आई और बीमार पड़ गई. वह बोली, ‘पर स्वर्णा, तू अपना मजा क्यों खराब करेगी? तू पापा के साथ घूमफिर… यहां सबकुछ देखने लायक है. पापा कई बार आ चुके हैं. तुझे सबकुछ बहुत अच्छी तरह घुमा देंगे…है न पापा…?’

 

लतिका आराम से रात भर सो सके इस के लिए डाक्टर ने उसे ऐसी दवा दे दी कि खाते ही वह नींद में बेसुध हो गई. मैं उस के पास पड़े सोफे पर बैठी रही और वहीं सोफे पर ही सोने के बारे में सोचने लगी कि कमरे का दरवाजा धीरे से खुला. लतिका के पापा थे. नजदीक आ कर बैठ गए. इधरउधर की बातों के बाद बोले, ‘लतिका सो गई?’ वे लगातार मेरी आंखों में देखे जा रहे थे. आदमी की निगाहों में ऐसा कौन सा सम्मोहन होता है कि लड़की का दिल उस के सीने से निकल कर आदमी के कदमों में जा गिरता है?

उन्होंने अपना एक हाथ बढ़ा कर मेरी कमर के इर्दगिर्द हौले से कसा और मुझे अपनी तरफ खींचा. मैं चाह कर भी उन्हें रोक न पाई. न जाने क्या हुआ कि मैं ने अपना सिर उन के कंधे पर रख दिया. वे देर तक मेरे बाल, मेरे गाल, मेरे होंठ, मेरी गरदन सहलाते रहे और फिर एकाएक उन्होंने झुक कर मेरी ठुड्डी ऊपर उठाई और मेरे नरमनरम होंठों का चुंबन ले लिया.

शायद यह मेरे अपनेआप को रोके रखने की अंतिम सीमा थी. उन के गले में बांहें डाल कर उन के सीने से सट कर मैं ने अपने चेहरे को छिपा लिया.

‘लतिका सोती रहेगी. तुम मेरे कमरे में चल सकती हो?’ उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाते हुए कहा.

मैं ने जवाब नहीं दिया. सिर्फ उठ कर उन के साथ चलने को तैयार हो गई.

पूरा गलियारा पार कर उन का कमरा था. उन्होंने मुझे सीधे अपने बिस्तर पर बैठा लिया और ताबड़तोड़ मेरे होंठ, मेरा माथा, मेरा सिर, मेरी गरदन, मेरी हथेलियां, मेरी उंगलियां चूमते चले गए और मैं उन्हें रोकना चाह कर भी नहीं रोक सकी.

धौंकनी की तरह चलती अपनी सांसों पर किसी तरह काबू पा कर अपना तपता चेहरा एकदम उन के नजदीक ले जा कर पूछा, ‘मुझे आप हमेशा इतना ही प्यार  करेंगे?’

‘मैं तो हैरान हूं जो इस उम्र में तुम्हारी जैसी कमसिन लड़की बांहों में भरने को मिल गई.’

उठ कर लतिका के पापा ने फूलदान में से गुलाब के कई फूल निकाले और मेरे पैरों में रखे.

अंतिम सीमा थी यह. रुक नहीं सकी फिर. उन्हें अपने साथ बिस्तर पर खींच लिया और बोली, ‘इतना मान मत दीजिए मुझे…इस काबिल नहीं हूं…अपने पांव की धूल को सिर पर जगह मत दीजिए…’

‘तुम्हारी जगह कहां है यह तुम क्या जानो मेरी जान,’ वे तड़प उठे. उन की थरथराती उंगलियों ने मेरे सारे कपड़े एकएक कर उतारने शुरू कर दिए और मैं अपनी आंखों को बंद किए लजाती- शरमाती, अपनी अनछुई काया को अपने हाथों से ढांपने का असफल प्रयास करती रही.

अपने साथ कंबल में दबोच लिया उन्होंने मुझे और मैं उन के सीने में समा कर अपना होश खो बैठी.

‘मुझे इतना ही प्यार करोगी, स्वर्णा? ऐेसे ही देहसुख दोगी?’ वे बोले, ‘हालांकि शुरू में मुझे अजीब लग रहा था…मेरी बेटी लतिका की सहेली हो, उसी की हमउम्र. मन में बहुत संकोच हो रहा था, पर जब तुम्हारी आंखों में भी अपने लिए चाहत देखी तो हौसला हुआ और मैं ने तुम्हारी तरफ हाथ बढ़ा दिया…’

‘जीवन में पिता का अभाव बहुत गहरे अनुभव किया है, सर…हमेशा हसरत रही कि कोई पिता जैसा व्यक्ति मेरे जीवन में भी हो जो मेरी हर इच्छा, चाहत को पूरी करे…मेरी परवा एक संरक्षक की तरह करे और मैं उस की बांहों में अपना सर्वस्व भूल जाऊं…खो जाऊं…मुझे गहरी सुरक्षा का एहसास हो…और आप की वे बांहें जब मेरी तरफ उठीं तो मैं उन में समा गई.’

‘जानती हो स्वर्णा…मुझे पत्नी का सुख पिछले कई साल से नहीं मिला,’ वे मुझे अपनी बांहों में कसे चूमते रहे. मेरे बाल कानों पर टांकते रहे, ‘पैसे की कमी नहीं है. चाहता तो बाजार में एक से एक कमसिन लड़कियां आजकल मिल जाती हैं…पर मन नहीं हुआ. बहुत बड़ा एहसान है मुझ पर तुम्हारा कि तुम्हारी जैसी लड़की मुझे मन से मिली…यह एहसान मैं ताजिंदगी नहीं भुला सकूंगा…’

वे मेरे सीने के उभारों से खेलते रहे. मैं इठलाती, हंसती उन की तरफ ताकती रही. वे बोले, ‘लतिका 2 साल की थी जब पत्नी को दिल की बीमारी ने जकड़ लिया. डाक्टर ने मना कर दिया…शारीरिक संबंध मत बनाना. उस से उत्तेजना उत्पन्न होगी. बिस्तर पर ही मर जाएगी…इसलिए भयवश उसे तब से छुआ तक नहीं…और…स्वर्णा…कोई आदमी बिना औरत के जिस्म को पाए कब तक अपने को रोके रख सकता है? एक विश्वामित्र ही क्यों…अनेक कई विश्वामित्र होंगे दुनिया में जो औरत की आंच से मोम की तरह पिघल कर बहे होंगे.’

‘औरत भी तो आदमी की देह की आंच से ऐसे ही पिघल कर बहने लगती है जैसे मैं बहकती हुई बह गई…पागल बनी,’ हंसने लगी मैं.

बस, इस के बाद मैं ने उन के सीने में मुंह छिपा लिया और आराम से निश्ंिचत हो सोने लगी. उन की मजबूत बांहें मुझे कसती रहीं. निचोड़ती रहीं. भींचभींच कर पीसती रहीं और मुझे लगता रहा जैसे कोई सलमान खान जैसा हृष्टपुष्ट जवान हीरो मुझे अपनी मांसल बांहों में चिडि़या के बच्चे की तरह दबोचे है.

काफी रात गए आंख खुली तो बोली, ‘अब आप मुझे अपने कमरे में जाने दीजिए. लतिका जाग गई तो क्या सोचेगी?’

‘ठीक है. जाओ, पर याद रखना, अब हर रात हमारी ऐसे ही बीते…और मौका मिलते ही तुम बिना मेरी प्रतीक्षा किए मेरे पास चली आना…’ ढिठाई से हंसने लगे तो मैं ने झुक कर उन के होंठ चूम लिए, ‘गुड नाइट, सर.’

3 दिन की योजना बना कर आए थे. पूरे 2 दिन तो लतिका बिस्तर पर ही पड़ी रही. मजबूरन उस के पापा के साथ मैं अकेली ही घूमने गई. और घूमी क्या… सच तो यह है कि आदमी का पूरा सुख लेने की चाहत ने मुझे बाहर के नजारे देखने ही नहीं दिए. हर वक्त मन में होता, वे बांहों में कस लें, चूम लें. वे मेरे बाल सहलाएं. गाल सहला कर मेरे रसीले होंठ पी डालें.

तीसरे दिन लतिका किसी तरह साथ चली पर ऐसे स्थानों पर ही जहां उसे ज्यादा चढ़नाउतरना नहीं पड़े. वह जल्दी थक कर बैठ जाती थी. हम लोग मजे करते किसी ऐसे एकांत में पहुंच जाते जहां से वह दिखाई न देती और हम एकदूसरे की बांहों में खो जाते.

हंस दिए लतिका के पापा, ‘तुम्हें नहीं लगता स्वर्णा कि हम लोग यहां हनीमून पर आए हैं और तुम मेरी बीवी हो.’

वापस लौटने पर मां ने मुझे बहुत गहरी नजरों से एक बार ऊपर से नीचे तक देखा तो मैं सिहर सी गई. क्या देख रही हैं मां? कहीं सबकुछ जान तो नहीं लेंगी? बहुत तेज नाक है उन की. जहां कोई गंध नहीं होती वहां भी गंध सूंघ लेने में माहिर…

‘ऐसे क्या देख रही हैं आप?’ न जाने क्यों झेंपती हुई हंस दी.

‘3 दिन में ही तू एकदम औरत बन कर लौटी है स्वर्णा,’ वे हंस दीं, ‘लग रहा है, टूर पर नहीं गई थी, हनीमून पर गई थी लतिका के पिता के साथ…’

‘नहीं, मम्मी, वह बात नहीं…’ हकला गई मैं. फिर मेरी नजरें अपने फ्लैट में वह सब ढूंढ़ने लगीं जो मां से गलती से छूट गया होगा, उस आदमी…उस बिल्डर के साथ रहते हुए…रात को और दिन को भी. पीछे कोई रोकटोक तो थी नहीं…मुझ से कह रही हैं कि मैं लड़की से एकदम औरत बन कर लौटी हूं और वे खुद क्या बन गई होंगी इस बीच…?

2 दिन भी लतिका के पापा से बिना मिले बिताना मेरे लिए कठिन हो गया. मन हर वक्त चाहता कि किसी बहाने उन के पास पहुंच जाऊं. उन की बांहों में समा जाऊं…क्या एक बार प्यास जागने पर हर औरत की यही दशा होती है?

4 दिन बाद मैं खुद ही लतिका से बोली, ‘आज तेरे घर चलूंगी.’

एक बार पैनी नजरों से लतिका ने मुझे देखा, ‘क्यों…? क्या पापा की याद सता रही है?’ और एकदम हंस पड़ी.

‘कैसे हैं पापा…?’ यह पूछते ही मेरी सांस की गति तेज हो गई.

‘शाम को संग चल कर खुद देख लेना…फिर वही तुझे तेरे घर पहुंचा देंगे…’ और लतिका ने मुझे मोबाइल फोन पकड़ाया, ‘पापा ने दिया है तेरे लिए. कहा है, जब मन करे, उन से बात कर लिया कर.’

लतिका के साथ उस के घर पहुंची तो उस के पापा वहीं थे. लतिका की मम्मी की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई थी. डाक्टर आए हुए थे. दवा दे रहे थे. लतिका उन के पास चली गई.

मैं अकेली लौबी में छूट गई. ऐसा अकेलापन मुझे अपनी अवहेलना-सा प्रतीत हुआ. लगा, सब मुझे अनदेखा कर रहे हैं, मैं अनचाहे वहां मौजूद हूं. उठ कर जाने की सोचने लगी कि लतिका के पापा डाक्टरों को छोड़ने के लिए बाहर निकले.

वापस आए तो मेरी तरफ देख कर पहले की तरह मुसकराए नहीं. गंभीर बने रहे.

‘क्या मम्मी की तबीयत ज्यादा गड़बड़ है?’ मैं ने पूछा.

‘अपनी मां से जा कर पूछना?’ लतिका के पापा कठोर स्वर में बोले, ‘यहां आईं और लतिका की मम्मी से न जाने क्याक्या कह गईं. मैं सामने पड़ा तो सीधे सौदे पर उतर आईं…मुझे नहीं पता था, वे अपनी बेटी का सौदा मुझ से करेंगी…धंधा करती हैं क्या? घर में चकला खोल कर बैठ जाओ तुम लोग… खूब आमदनी होगी मांबेटी की. दोनों अभी जवान हो, पूरी दिल्ली लूट लो…’

बोलते चले गए लतिका के पापा. मैं हड़बड़ा कर उठी और बिना कुछ और आगे सुने, उन के बंगले से बाहर भाग आई…जो आटो मिल गया, उसी में बैठ कर घर आई.

मां सामने पड़ गईं तो एकदम अपनी सारी किताबें उन के ऊपर फेंक कर मार दीं, ‘आप लतिका की मम्मी से मिलने गई थीं?’

‘हां, गई थी. तेरी तरह और तेरे बाप की तरह बेवकूफ नहीं हूं मैं,’ मां भी गुस्से से बोलीं, ‘मुफ्त में बूढ़े बिलौटे को अपनी मलाई चाटने दूं, यह कच्ची गोली मैं नहीं खेलती, समझी…मुझे इस मलाई की कीमत चाहिए…बिना मोल तो आजकल शुद्ध हवा और पानी तक नहीं मिलता…तू तो जवान होती लड़की है…वह खूसट मुझे बिना कुछ दिए मेरा खजाना लूटेगा? हरगिज नहीं.’

यह मेरी ही मां हैं? फटीफटी आंखों से उन के तमतमाए चेहरे की तरफ कुछ पल देखती रही…फिर न जाने क्या सोच कर घर छोड़ कर बाहर निकल आई. निकल तो आई पर बाहर आ कर सोचने लगी कि अब जाऊं कहां? दिल्ली है यह. एक से एक दुराचारी, दुष्ट, हत्यारे और बलात्कारी सड़कों पर घात लगाए डोल रहे हैं.

कुछ सोच कर पापा को फोन लगाया तो पता चला कि उन का ट्रांसफर दूसरे शहर में हो गया है. जिस ने फोन उठाया था उसी से पापा का नया नंबर मिला था. पापा का फोन देर से लगा. दूसरी ओर से हलो होते ही मैं सुबक उठी, ‘पापा…मैं बहुत अकेली रह गई हूं. कोई नहीं है अब मेरे साथ…प्लीज, मुझे अपने पास बुला लीजिए,’ और पापा ने इनकार नहीं किया. यहां, उन के पास आ गई.

किसी से नहीं कहना: भाग 3- उर्वशी के साथ उसके टीचर ने क्या किया?

नौकरी जौइन करने का वक्त आ गया और उर्वशी घर में सभी का आशीर्वाद ले कर चली गई.

औफिस जौइन करने के बाद वह उस स्कूल में पहुंची, जहां उस के बचपन की खौफनाक यादें जुड़ी हुईर् थीं. शिक्षिका के पद के लिए आवेदन पत्र देने के बहाने से वह कुछ टीचर्स से मिली और बातों ही बातों में खेलकूद की बातें छेड़ते हुए महेश के विषय में पूछ लिया. तब उसे पता चला कि महेश अब एक बहुत बड़े स्पोर्ट्स शोरूम का मालिक है.

महेश के विषय में यह सुन कर उर्वशी का खून खौल उठा. वह सोचने लगी कि उस की जिंदगी बरबाद करने वाला मौज की जिंदगी जी रहा है, किंतु अपनी उस गलती पर अब उसे अवश्य ही पछताना होगा.

इतना बड़ा जानामाना शोरूम ढूंढ़ने में उर्वशी को समय नहीं लगा. शोरूम के अंदर जैसे ही वह पहुंची उसे सामने ही महेश शान से बैठा हुआ दिखाई दिया. उसे देखते ही वह पहचान गई, वह थोड़ा सहम गई, किंतु तुरंत ही उस ने अपनेआप को संभाल लिया.

एक साधारण सी ड्रैस में बिना मेकअप के भी वह बहुत सुंदर लग रही थी. उर्वशी को देखते ही महेश की आंखें उस पर जा टिकीं. महेश को अनदेखा कर अंदर जा कर उस ने सेल्स मैन से कहा, ‘‘जी बैडमिंटन के रैकेट दिखाइए.’’

‘‘जी मैडम अभी दिखाता हूं.’’

तब तक महेश वहां आ गया और सेल्स मैन से बोला, ‘‘तुम बैंक जा कर चैक जमा कर के आओ, कस्टमर को मैं अटैंड करता हूं.’’

‘‘कहिए मैडम क्या चाहिए आप को?’’

‘‘जी बैडमिंटन के रैकेट दिखाइए,’’ उर्वशी ने जवाब दिया.

‘‘जी जरूर, क्या मैं पूछ सकता हूं, आप किस स्कूल की तरफ से आई हैं?’’

‘‘जी नहीं, मैं किसी भी स्कूल से नहीं आई हूं, मुझे अनाथालय के बच्चों के लिए कुछ सामान चाहिए.’’

‘‘अरे वाह तो समाजसेविका हैं आप.’’

‘‘जी आप ऐसा समझ सकते हैं.’’

‘‘वाह आप बहुत अच्छा काम कर रही हैं, मैं आप को 20% का डिस्काउंट भी दूंगा.’’

‘‘आप बस जल्दी से मेरा सामान पैक करवा दीजिए.’’

अपना सामान ले कर उर्वशी बाहर निकल गई और एक गहरी सांस लेते हुए सोचने लगी कि जिस सुंदरता के पीछे उस का बचपन, हंसनाखेलना इस इंसान ने छीना था, उसी सुंदरता से वह भी उस की सारी खुशियां छीन लेगी.

अब उर्वशी हर 3-4 दिन में महेश के शोरूम पर आने लगी तथा कुछनकुछ खरीद कर वह अनाथालय के बच्चों में बांट दिया करती थी. अपने शोरूम में उर्वशी को देखते ही महेश का चेहरा खिल जाता था.

अब तक 3 महीने बीत चुके थे और उर्वशी उस से बहुत अच्छी तरह बात करने लगी थी. वह जब भी कुछ खरीदने आती महेश तुरंत उसे अटैंड करने स्वयं चला आता.

धीरेधीरे बातचीत का सिलसिला बढ़ने लगा और दोस्ती में बदल गया. उर्वशी ने महेश को अपना नाम उर्मी बताया था. अब तक वे दोनों एकदूसरे का फोन नंबर भी ले चुके थे. महेश महसूस कर रहा था कि उसे उर्मी की तरफ से बराबर लिफ्ट मिल रही है. अत: उस की हिम्मत भी बढ़ रही थी. अब उसे उर्मी का बेसब्री से इंतजार रहता था जिसे उर्वशी समझ रही थी. इसलिए अपनी योजना को आगे बढ़ाते हुए उर्वशी ने शोरूम पर आना बंद कर दिया ताकि महेश की बेचैनी बढ़ती जाए, वह उस का इंतजार करता रहे.

1 सप्ताह तक उस के नहीं आने पर महेश ने उसे फोन कर ही लिया, ‘‘हैलो उर्मी क्या हो गया है. तुम कितने दिनों से शोरूम पर नहीं आई?’’

‘‘मेरी तबीयत थोड़ी खराब है, महेश.’’

‘‘अरे मुझे क्यों नहीं बताया तुम ने? डाक्टर को दिखाया या नहीं? मैं ले कर चलता हूं, तुम अपने घर का पता भेजा, मैं तुरंत आ जाऊंगा.’’

‘‘नहींनहीं महेश उस की जरूरत नहीं है, मैं ने डाक्टर को दिखा लिया है, अब मैं ठीक हूं कल मैं खुद शोरूम पर आऊंगी.’’

‘‘अच्छा ठीक है,’’ महेश ने जवाब दिया.

दूसरे दिन जब उर्वशी शोरूम पर आई, महेश का चेहरा खिल गया और उस ने कहा, ‘‘उर्मी, मैं रोज तुम्हारा रास्ता देख रहा था, तुम ने बहुत इंतजार करवाया… तुम्हें आज मेरे साथ डिनर पर चलना होगा.’’

उर्वशी ने पहले तो मना किया, किंतु महेश के ज्यादा आग्रह करने पर मान गई.

तब महेश ने कहा, ‘‘उर्मी, मैं तुम्हें लेने आ जाऊंगा.’’

बचपन में सुना हुआ यही वाक्य उसे याद आ गया और उस ने महेश से कहा, ‘‘ठीक है मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’

शाम को ठीक 7 बजे महेश उर्वशी को लेने आया. उर्वशी नीचे खड़ी उस का इंतजार कर रही थी और तब उसे बचपन की बीती घटना याद आने लगी.

नीली जींस, हलके गुलाबी रंग के कुरते और खुले हुए बालों में उर्वशी बहुत ही खूबसूरत लग रही थी.

उसे देखते ही महेश ने कहा, ‘‘उर्मी, तुम बहुत ही सुंदर लग रही हो.’’

‘‘थैंक यू महेश, तुम भी बहुत हैंडसम लग रहे हो,’’ ऐसा बोतले हुए उर्वशी कार में बैठ गई और दोनों होटल के लिए निकल गए.

वहां महेश ने पहले से ही टेबल रिजर्व कर रखी थी. यह उन दोनों की साथ में पहली डिनर की शाम थी. डिनर के बाद महेश ने उर्वशी को उस के घर छोड़ दिया.

इस तरह डिनर पर जाना अब दोनों के लिए आम बात हो गई थी. महेश मन ही मन

सच में उर्वशी से प्यार करने लगा था. यदि वह 2 दिन भी नहीं दिखे तो महेश बेचैन हो जाता था. उस का तब किसी काम में मन नहीं लगता था. अब वह अपने प्यार का इजहार करना चाहता था.

अत: एक दिन उस ने उर्वशी से कहा, ‘‘उर्मी आज मैं ने कैंडल लाइट डिनर रखा है, तुम चलोगी न?’’

उर्वशी ने खुशीखुशी बिना संकोच के कहा, ‘‘क्यों नहीं? जरूर चलूंगी.’’

जब दोनों कैंडल लाइट डिनर पर गए, तब महेश ने पहली बार होटल में उर्वशी का हाथ अपने हाथों में ले कर कहा, ‘‘उर्मी, मैं तुम्हें प्यार करने लगा हूं’’

उर्वशी बिलकुल भी चौंकी नहीं और बोली, ‘‘मैं जानती हूं महेश, तुम्हारी आंखों में मुझे मेरे लिए प्यार दिखाई देता है, प्यार तो मैं भी तुम से करने लगी हूं, किंतु तुम्हारी पत्नी? वह भी तो है न? मैं किसी का जीवन बरबाद नहीं करना चाहती.’’

‘‘नहीं उर्मी मैं वैसे भी अपनी पत्नी से अलग होने वाला हूं, हमारे विचार बिलकुल नहीं मिलते. वह भी मेरे साथ नहीं रहना चाहती,’’ महेश ने झठ बोलते हुए सफाई दी.

उर्वशी कुछ देर सोचने के बाद बोली, ‘‘किंतु महेश मैं ने अपने भविष्य का फैसला अपने मम्मीपापा पर छोड़ा है.’’

‘‘हां तो ठीक है न, तुम कहो तो मैं तुम्हारे पापा से बात करने आ सकता हूं. इतना बड़ा शोरूम, बंगला, गाड़ी सब कुछ है मेरे पास, आखिर वे मना क्यों करेंगे?’’

‘‘ठीक है महेश, मैं कुछ ही दिनों में घर जाने वाली हूं, तब मैं पापा से बात करूंगी.’’

उर्वशी के मुंह से प्यार का इकरार सुनने के बाद वह उसे किस करने की कोशिश करने लगा, किंतु उर्वशी ने उसे मना करते हुए कहा, ‘‘नहीं महेश यह सब विवाह के बाद ही अच्छा लगता है, पता नहीं मेरे पापा तुम्हारे साथ विवाह के लिए हां बोलेंगे या नहीं और मैं किसी को भी धोखा नहीं दे सकती. यदि मेरी शादी किसी और के साथ होगी तो यह किस मुझे शर्मिंदा करेगी.’’

अपने आप को संभालते हुए महेश ने कहा, ‘‘हां तुम ठीक कह रही हो उर्मी, मैं बहक गया था पर शादी किसी और से, यह बात तुम सोच भी कैसे सकती हो. हम इतना प्यार करते हैं तो हमारा मिलन तो निश्चित ही है.’

नमस्ते जी: भाग 1- शाम को अचानक एक फोन आया और फिर..

हम दोनों पतिपत्नी सुबह बच्चों को तैयार कर स्कूल भेजने के बाद सैर करने की नीयत से जैसे ही कोठी के बाहर निकले कि पति की निगाहें गली में खड़ी धोबी की लड़की पर जा कर ठहर गईं. वह लड़की अकसर इस्तरी के लिए आसपास की कोठियों से कपड़े लेने आती थी. उसे देख कर नितिन का अंदाज बड़ा ही रोमांटिक हो आया. वे गाना ‘तुम को देखा तो ये खयाल आया, जिंदगी धूप तुम घना साया…’ गाते हुए उस की बगल से गुजरने लगे तो वह भी अपने एक खास अंदाज में मुसकरा दी. उन दोनों की नजरें मिलीं तो धोबी की लड़की ने धीरे से कहा, ‘‘नमस्ते जी.’’

नितिन की बाछें खिल उठीं. मानो कोई अप्सरा स्वर्ग से उतर कर उस के सामने खड़ी, उस का अभिनंदन कर रही हो. नितिन के कदम कुछ क्षणों के लिए ठहर से गए. बदले में उस ने भी मुसकराहट के साथ उस का अभिवादन स्वीकार करते हुए पूछा, ‘‘कैसी हो?’’

वह शोख अंदाज में फिर मुसकराई और धीरे से बोली, ‘‘ठीक हूं.’’

मुझे यह सब ठीक नहीं लगा तो थोड़ा आगे चलने के बाद मैं ने नितिन को टोक दिया.

‘‘तुम एक फैक्टरी के मालिक और एक हैसियतदार आदमी हो. तुम्हारा बस नमस्ते कहना ही काफी था. मगर गाना गाना, हंसना और ज्यादा मुंह लगाना ठीक नहीं. खासकर इस तरह की लड़कियों को. देखो, धोबी की लड़की है. इस्तरी के लिए घरघर कपड़े मांग रही है और हाथ में 8-10 हजार का मोबाइल लिए है…उसे देख कर कौन कहेगा कि यह धोबी की लड़की है.’’

‘‘तुम तो बस किसी के भी पीछे पड़ जाती हो. अरे, तुम्हारे जैसी किसी ‘मेम’ ने पुराना सूट दे दिया होगा और फिर फैशन करना कौन सी बुरी बात है? यह मोबाइल तो अब  आम हो गया है.’’

नितिन ने उस के पक्ष में यह सब कहा तो मुझे 3-4 दिन पहले का वह वाकया याद हो आया जब नितिन ने मुझे बालकनी में बुला कर कहा था.

‘देख निक्की, इस धोबी की लड़की को. यह जब हंसती है तो इस के दोनों गालों पर पड़ते हुए डिंपल कितने प्यारे लगते हैं? कितनी अच्छी ‘हाइट’ है इस की, उस पर छरहरा बदन कितनी सैक्सी लगती है यह?’ मेरे दिमाग में फिर एक और दास्तान ताजा हो आई थी.

अभी बच्चों की गरमियों की छुट्टियों में  मैं 15-16 दिन गांव में रह कर आई थी. पीछे से नितिन अकेले ही रहे थे. मैं जब गांव से वापस आई तो देखा कि साहब ने ढेर सारे कपड़े इस्तरी करा रखे थे. यहां तक कि जिन कपड़ोें को पहनना छोड़ रखा था, वे भी धुल कर इस्तरी हो चुके थे.

मैं ने चकित भाव से नितिन से पूछा, ‘‘ये इतने कपड़े क्यों इस्तरी करा रखे हैं? इन कपड़ों को दे कर तो मुझे बरतन लेने थे और तुम ने इन को धुलवा कर इस्तरी करवा दिया. और तो और जो पहनने…’’

मेरी बात को बीच में ही काट कर नितिन ने झट से कहा, ‘‘वह सब छोड़ो, एक बात याद रखना कि मेरे कपड़े इस्तरी करने के लिए उस लड़के को मत देना. वह ठीक से इस्तरी नहीं करता. वह जो सांवली लड़की कपड़े लेने के लिए आती है, उसे दिया करो. वह इस्तरी भी बढि़या करती है और समय पर वापस भी दे जाती है.’’

मैं कुछ परेशान सी यह सब अपने मन में याद करती हुई चली जा रही थी कि अचानक मेरी नजर नितिन के चेहरे पर पड़ी तो देखा कि वह मंदमंद मुसकरा रहे हैं. मैं ने टोक दिया, ‘‘क्या बात है, बड़े मुसकरा रहे हो. मेरी बात पर गौर नहीं किया क्या?’’

‘‘कौन सी बात?’’

‘‘यही कि थोड़ा रौब से रहा करो.’’

बात पूरी होने से पहले ही नितिन बोल पड़े, ‘‘निक्की, अगर तुम बुरा न मानो तो एक बात कहूं. तुम थोड़ी मोटी हो गई हो और वह धोबी की लड़की सैक्सी लगती है, शायद इसलिए.’’

यह सुन कर मेरा मूड खराब हो गया. मैं वापस घर चली आई. ऐसे ही दिन गुजर गया, रात हो आई. न मैं ने बात की न ही नितिन ने.

2 दिन बाद शाम को जालंधर से इन की किसी परिचित का फोन आ गया. नितिन व उस के बीच लगभग 6 मिनट फोन पर बातचीत चली थी. बातों को सुन कर पता चला कि किसी की बेटी का पी.जी. के तौर पर गर्ल्स हास्टल में रहने का प्रबंध कराना था. जब मैं ने पूछा कि कौन थी? किसे पी.जी. रखवाने की बात हो रही थी? तो नितिन टाल गए. मैं ने भी बात को अधिक बढ़ाना उचित नहीं समझा और घर के काम में लग गई.

नितिन कभी जूते पालिश नहीं करते. हमेशा मैं ही करती हूं लेकिन अगले दिन सुबह उठ कर खुद उन को जूते चमकाते देखा तो अचरज सा हुआ. मैं ने पूछा, ‘‘आज शूज बड़े चमकाए जा रहे हैं, क्या बात है?’’

‘‘गर्ल्स हास्टल का पता करने कई जगह जाना है.’’

यह सुन कर मैं ने अपनी मंशा जाहिर करते हुए कहा, ‘‘कहो तो मैं भी तुम्हारे साथ चलूं, एक से भले दो.’’

‘‘रहने दो, तुम नाहक ही थक जाओगी, फिर आजकल धूप भी तेज होती है.’’

‘‘हां, भई हां, मेरा तो रंग काला पड़ जाएगा. मैं छुईमुई की तरह हूं जो मुरझा जाऊंगी. साफसाफ यह क्यों नहीं कहते कि मुझे अकेले जाना है. मैं सब जानती हूं लेकिन पिछली बार जब मेरी सहेली ने अपनी बेटी को पी.जी. रखवाने के लिए फोन किया था तो तुम उन्हें ले कर अकेले ही गए थे. अब की बार मैं तुम्हारे साथ चलूंगी. मुझे अच्छा नहीं लगता, तुम्हारा जवान लड़कियों के ‘हास्टल’ में जा कर पूछताछ करना. मैं औरत हूं, मेरा पूछना हमारी सभ्यता के लिहाज से ठीक है.’’

‘‘नहीं…नहीं, मैं अकेला ही पता कर के आऊंगा,’’ यह कह कर नितिन गाना गाने लगे, ‘‘अभी तो मैं जवान हूं…अभी तो मैं…’’

नितिन को चिढ़ाने के अंदाज में मैं ने कहा, ‘‘अगर आज तुम अकेले गए तो मैं भी तुम्हारे पीछेपीछे आऊंगी और तुम यह मत सोचना कि मैं तुम्हें अब गुलछर्रे उड़ाने का मौका आसानी से दे दूंगी.’’

यह सुन कर नितिन एकदम गंभीर हो गए और सख्त लहजे में बोले, ‘‘बस निक्की, अब तुम आगे एक भी शब्द नहीं बोलोगी. अगर कुछ उलटा बोला तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

‘‘हां…हां, जानती हूं, और तुम कर भी क्या सकते हो, मुझ कमजोर को पीटने के अलावा. मगर आज मैं तुम्हें अकेले पी.जी. के बारे में पता करने नहीं जाने दूंगी, चाहे कुछ भी हो जाए. तुम जरा अकेले जा कर तो देखो?’’

एकदो भद्दी गाली देने के साथ दोचार थप्पड़ मार कर नितिन ने मुझे घसीटते हुए ला कर बिस्तर पर पटक दिया और दरवाजे को जोर से बंद करते हुए घर से बाहर निकल गए.

बौखलाहट में मुझ पर न जाने कहां से पागलपन सा सवार हो गया. मैं ने उठ कर अपनी व नितिन की फ्रेमजडि़त तसवीर ली और फर्श पर दे मारी तथा साथ में रखा हुआ गुलदान दीवार पर और गुस्से में शादी वाली सोने की अंगूठी उतार कर दूर फेंकते हुए बैड पर धड़ाम से गिर पड़ी. फिर न जाने कब मैं अतीत की स्मृतियों के गहरे सागर में डूबती चली गई.

धीरेधीरे मुझे वे दिन याद आने लगे जब मात्र डेढ़ साल के अंतराल में मैं दूसरी बार मां बनी थी और मैं ने फूल सी कोमल नन्ही गुडि़या को जन्म दिया था. मेरी ननद 10 दिन से अधिक नहीं रुक पाई थीं. वैसे भी उन से जच्चा का काम नहीं होता था. अंकुर व अंकिता, दोनों को एकसाथ संभालना मेरे वश से बाहर था.

मैं ने अपने लिए किसी काम वाली को रखने की बात नितिन से कही तो उन्होंने पड़ोसियों के यहां काम करने वाली निर्मला की 12-13 साल की बेटी प्रीति को घर में मेरी मदद करने के लिए रख लिया था. धीरेधीरे बेटी गोद को समझने लगी थी. दिन छिपने के बाद वह तब तक चुप नहीं होती थी जब तक उसे कोई उठा कर छाती से न लगा ले. प्रीति के साथ वह हिलमिल गई थी. उस का स्पर्श पाते ही अंकिता एकदम चुप हो जाती थी जैसे कि उसे उस की मां ही मिल गई हो.

किसी से नहीं कहना: भाग 2- उर्वशी के साथ उसके टीचर ने क्या किया?

अपनी हवस शांत कर लेने के बाद महेश ने कहा, ‘‘उर्वशी, यह बात किसी को भी नहीं बताना, यह बात तुम अगर अपने घर पर बताओगी तो तुम्हारे मम्मीपापा तुम्हें बहुत मारेंगे.’’

महेश ने बारबार प्यार से कह कर उस के दिमाग में यह भर दिया कि यह बात किसी को भी नहीं बतानी है. कमजोर पड़ चुकी उर्वशी खुद से कपड़े भी नहीं पहन पा रही थी, वह लगातार रो रही थी, तब महेश ने खुद ही उसे कपड़े पहना दिए.

उर्वशी के कोमल होंठ नीले पड़ चुके थे, उस की ऐसी हालत देख कर महेश ने उसे समझया, ‘‘उर्वशी, अपने घर जा कर कहना कि रेस के समय तुम बहुत जोर से गिर गई थीं, इसलिए चोट लग गई है.’’

उर्वशी कितनी भी छोटी हो, किंतु वह यह तो समझ ही गई थी कि उस के साथ यह बहुत ही बुरा हुआ है. वहां से निकल कर महेश ने उर्वशी को उस के घर के पास ही छोड़ दिया और खुद तेजी से कार भगा कर चला गया.

उर्वशी किसी तरह से कराहती हुई घर पहुंची और बैल बजाई. विनीता दरवाजा खोलने आई और उर्वशी की ऐसी हालत देख कर उस के मुंह से चीख निकल गई, ‘‘क्या हुआ मेरी बच्ची को?’’

विनीता की चीख सुनते ही विवेक भी वहां आ गया और अपनी बेटी को इस हालत में देख कर वह भी घबरा गया. उर्वशी को विनीता ने गले से लगा लिया, वह जोरजोर से रो रही थी.

विवेक और विनीता हैरान थे, डरे हुए थे, ‘‘क्या हो गया बेटा?’’ वे बारबार पूछ रहे थे, किंतु उर्वशी कुछ भी नहीं बोल रही थी, केवल रोती ही जा रही थी.

आखिरकार उर्वशी ने उन्हें बताया, ‘‘मम्मी, मैं रेस के समय बहुत ज्यादा जोर से गिर गई थी. मुझे बहुत चोट आई है, सब दुख रहा है, मुझे नींद भी आ रही है, मुझे सोने दो मम्मा.’’

‘‘नहीं बेटा चलो पहले मैं तुम्हें नहला देती हूं, कपड़े बदल कर डाक्टर को भी दिखा देते हैं, तुम्हारे होंठों पर कितनी चोट लगी है,’’ कहते हुए उर्वशी का हाथ पकड़ कर विनीता उसे नहलाने ले गई.

उर्वशी को बाथरूम में नहलाते समय उस के कपड़ों पर खून के निशान देख कर विनीता चौंक कर चीख उठी, ‘‘उर्वशी बेटा यह ब्लड कैसे निकला तुम्हें?’’

विनीता घबरा गई और टौवेल में लपेट कर उर्वशी को बाहर ले आई. उस ने विवेक को उर्वशी के कपड़े दिखा कर रोते हुए कहा, ‘‘विवेक, हमारी बच्ची के साथ…’’

विवेक ने बीच में ही उसे रोक कर उर्वशी से पूछा, ‘‘बेटा, तुम्हारे साथ क्या हुआ? किसी ने तुम्हारे साथ गंदी बात की है क्या? किस ने किया, कौन था वह बताओ?’’

उर्वशी ने डरी हुई आवाज में कहा, ‘‘मैं रेस के समय गिर गई थी इसलिए लग गई है पापा.’’

तभी विनीता ने कहा, ‘‘उर्वशी बेटा सच बताओ, गिरने से ऐसी जगह पर चोट नहीं लगती.’’

उर्वशी ने कहा, ‘‘आप मुझे मारोगी न मम्मा.’’

‘‘मैं तुम्हें बिलकुल नहीं मारूंगी बेटा, कोई नहीं मारेगा, सब सचसच बताओ, तुम्हारे साथ क्या हुआ?’’

‘‘मम्मा महेश सर ने कहा था कि यह बात किसी को भी मत बताना वरना वे लोग तुम्हें मारेंगे.’’

विनीता ने बहुत प्यार से पटा कर उस से सारी बात पूछी. उर्वशी ने रोतेरोते सबकुछ बता दिया. मांबाप की तो मानो दुनिया ही लुट गई, अपनी बेटी की ऐसी दुर्दशा पर वे दोनों फूटफूट कर रोने लगे. वे खुद को दोषी समझने लगे कि उन्होंने उस इंसान पर भरोसा ही क्यों किया? उर्वशी के दादादादी भी अपनी पोती की ऐसी हालत देख कर रोने लगे.

तभी विवेक ने कहा, ‘‘विनीता, चलो पुलिस में शिकायत दर्ज करा देते हैं, उस पापी को इस कुकर्म की सजा मिलनी ही चाहिए.’’

किंतु विनीता ने साफ इनकार कर दिया, ‘‘नहीं, विवेक हम मध्यवर्गीय लोग हैं, यदि एक बार हमारी बच्ची के विषय में यह पता चल जाएगा तो समाज में उस का जीना मुश्किल हो जाएगा. लोग उसे अलग नजरों से देखेंगे और जब वह बड़ी होगी तो कौन करेगा इस दाग के साथ उस से शादी?’’

तभी विनीता ने उर्वशी से कहा, ‘‘उर्वशी बेटा यह बात किसी को भी मत बताना, अपने होंठों पर ताला लगा लो और जितनी जल्दी हो सके इसे भूलने की कोशिश करना.’’

विवेक ने जब डाक्टर के पास चलने को कहा तो बदनामी के डर से विनीता ने मना कर दिया और कहा, ‘‘घर पर ही दवा लगा कर ठीक करेंगे.’’

उर्वशी सोचने लगी कि जो बात उसे सर ने कही थी कि किसी को भी नहीं बताना, वही बात मम्मी भी कह रही हैं

अपनी मम्मी की बात मान कर उर्वशी ने अपने होंठों को तो सिल लिया, लेकिन अपने मन का वह क्या करे, जिस से वह घटना निकलती ही नहीं? उस भयानक घटना का खौफ हर समय उस के दिल में साया बन कर मंडराने लगा.

विवेक और विनीता ने मिल कर यह निर्णय लिया कि वे देवास छोड़ कर कहीं और चले जाएंगे ताकि नए माहौल में उर्वशी यह सब भूल जाए. जल्द ही विवेक ने स्कूल जा कर उर्वशी का नाम वहां से कटवा लिया और अपना ट्रांसफर भोपाल करवा लिया. वे देवास छोड़ कर चले गए.

शारीरिक तौर पर उर्वशी धीरेधीरे स्वस्थ हो रही थी, किंतु मानसिक तौर पर वह सदमे में ही थी. भोपाल आ कर उर्वशी को स्कूल में दाखिला मिल गया. पूरा परिवार हर समय उर्वशी को खुश रखने की कोशिश में लगा रहता था. लाख कोशिश के बाद भी उर्वशी के चेहरे पर पहले की तरह मुसकान नहीं आ पा रही थी.

उधर कुछ दिनों तक महेश छुट्टी पर ही रहा. जब उसे विश्वास हो गया कि उस के खिलाफ कहीं कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई है तभी उस ने पुन: स्कूल आना शुरू किया. तब उसे पता चला कि उर्वशी ने तो स्कूल छोड़ दिया है और वह लोग कहीं और चले गए हैं. अब महेश अपने द्वारा किए गए पाप के डर से मुक्त हो गया. ऐसे लोग शायद जानते हैं कि बदनामी के डर से पीडि़त लड़की का परिवार चुप्पी साध लेगा.

धीरेधीरे समय व्यतीत हो रहा था, उर्वशी अब बड़ी हो रही थी और बड़े होने के साथ ही वह यह भी समझ चुकी थी कि उस के साथ बलात्कार हुआ था. ‘किसी से भी कुछ नहीं कहना, अपने होंठों पर ताला लगा लो,’ ये शब्द उसे आज भी याद थे जो उसे परेशान कर देते थे, साथ ही उसे अपने पापा के शब्द भी याद थे कि उस पापी को इस कुकर्म की सजा मिलनी ही चाहिए. अभी तक वह अपने साथ हुई जबरदस्ती को भूल नहीं पाई थी.

वक्त के साथसाथ उर्वशी की नफरत भी बढ़ती ही जा रही थी. वह अपने मन में अब तक यह दृढ़ निश्चय कर चुकी थी कि किसी भी कीमत पर उस चरित्रहीन इंसान से बदला लेना ही है. उर्वशी की ऐसी मनोदशा से उस का परिवार अनजान था. वे सब इस भ्रम में थे कि उर्वशी उस घटना को भूल चुकी है, लेकिन नफरत और बदले का ज्वालामुखी जो उर्वशी के अंदर धधक रहा था, उस का शांत होना इतना आसान नहीं था.

धीरेधीरे 12 वर्ष बीत गए अब तक उर्वशी की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी. अपने कालेज के कैंपस में चयनित होने के उपरांत नौकरी के लिए उर्वशी ने देवास का चयन किया जहां वह इस खौफनाक घटना का शिकार हुई थी.

उर्वशी का यह निर्णय देख कर विवेक चिंताग्रस्त हो गए और फिर उर्वशी से पूछा, ‘‘बेटा उर्वशी देवास ही क्यों?’’

उर्वशी ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘‘पापा वही तो सब से पास है, जब भी मन करेगा आसानी से यहां आप के पास आ सकूंगी.’’

उर्वशी से बात करने के बाद रात में विवेक ने विनीता से कहा, ‘‘उर्वशी ने वही शहर क्यों पसंद किया, उस के पास और भी चौइस थी? मुझे चिंता हो रही है.’’

‘‘नहीं विवेक ऐसी तो कोई बात नहीं है, 12 वर्ष बीत गए हैं, तब वह बहुत छोटी थी, तुम बेकार में चिंता कर रहे हो.’’

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