ब्रजभूषण शरण सिंह बनाम पहलवान: न्याय में देरी क्यों?

सैंकड़ों ऐसे मामले हैं जिन में किसी युवती या औरत की बिना सुबूत शिकायत पर बलात्कारछेड़छाड़बैड टच पर पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया और वह महीनों सालों जेल में छोड़ा. आश्चर्य की बात है कि देश के लिए दुनिया भर से तरहतरह के गोल्डसिल्वरब्रौंज मेडल लाने वाली पहलवान लड़कियों के खुले आरोपों के बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने ब्रजभूषण शरण सिंहजो रैसलिंग फेडरेशन औफ इंडिया का प्रमुख है और  वह भाजपा नेता हैको पुलिस छू तक नहीं रही.

भारतीय जनता पार्टी काबिले तारीफ है कि वह अपने कर्मठ सपोर्टर की इस हद तक सुरक्षा करती है कि जब 2 महीने से ये रैसलर युवतियां जंतरमंतर पर बैठ कर धरना दे रही हैं तो भी नेता को बचाने की कोशिश हो रही है. जब इन रैसलर्म और उन के मर्थकों ने संसद पर 28 मई को जाने की कोशिश की तो पुलिस ने उन की जम कर ऐसी धुनाई की जो उन्होंने ओलंपिक और दूसरे खेल टूर्नामैंटों ने नहीं सही हो. उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.

यही नहीं उन के जेल में ले जाते समय बस में खींचे फोटो को फोटोशौप से मुरझाए चेहरों को मुस्कराते चेहरे बना दिए गए और पार्टी के विशाल डवैल सिस्टम में डाल कर साबित करने की कोशिश थी कि ये लड़कियां बस में पुलिस के पहरे में पिकनिक पर जा रही हैं.

असल में देश में कुश्ती को कोई खास इज्जत आज भी नहीं दी जाती क्योंकि इस में आने वाली लड़कियां समाज के पिछड़े वर्गों से आती हैं. जो बात आमिर खां ने अपनी फिल्म दंगल’ में दिखाई थी वही असल में हो रहा है कि ये पिछड़ी लड़कियां हावी न हो सकें. मामला चाहे बलात्कार का हो या न हो.

अगर सरकाररैसलिंग फेडरेशन और बाकी खेल फेडरेशन इस मामले में चुप हैं तो इसलिए कि सब बंटे हुए हैं और किसी को भी लड़कियों की छेडख़ानी पर कोई फर्क नहीं पड़ता.

पहलवानों की कुश्तियां हमेशा इस देश में गरीबों का खेल समझ गया है. यह तो सिर्फ क्रिकेट है जो अंग्रेजी नबाबों का खेल था जिस में अच्छे घरों के लोग गए थेहांकीफुटबालहमारे अमीरों के खेल नहीं है. महिला क्रिकेट को भी वह भाव नहीं मिलता जो पुरुष क्रिकेट को मिलता है क्योंकि उस में पिछड़ी जातियों की लड़कियां हैं.

एक तो कुश्ती जैसा खेल की खिलाड़ी और ऊपर से लड़कियांउन्हें भला भाव कैसे दिया जा सकता है. यहां तो ऊंची जातियों की औरतों को भी पैर की जूती समझा जाता है और उन्हें सेवा करने की ट्रेङ्क्षनग जन्म होते ही दी जाती है. अच्छी औरत वही है जो पितापतिसांसससुरघर में मंदिरपंडोंपुजारियों और बच्चों की सेवा करे. वह आवाज उठाए तो चाहे चाहे जितनी जोर की होदबानी ही होगी. जंतरमंतर पर बैठी रैसलर्स अपना धर्म भूल गई हैं कि वे टुकड़ों के बदले सेवा के लिए हैबराबरी की इज्जत पाने का हक नहीं मांग सकती है.

बेजान बालों को इन तरीकों से बनाए खूबसूरत, इस्तेमाल करें ये चीजें

सभी महिलाओं की चाहत होती है सिल्की और शाइनी बाल. महिलाएं सिल्की बालों के लिए तरह-तरह के केमिकल युक्त प्रोडक्ट इस्तेमाल करते है. ऐसे में बालों की देखभाल करना बेहद कठिन होता है. अक्सर वर्किंग महिलाओं अपने बालों की केयर करने का समय नहीं मिलता है. इसीलिए आज हम आपको बताएंगे सिल्की बालों के लिए अचूक उपाय.

आज हम बताएंगे घर पर आसान तरीके से सिल्की नेचुराल बाल कैसे बनाए?

अक्सर महिलाएं अपने बालों को सिल्की बनाने के लिए कई तरह की चीजें इस्तेमाल करती है. हमारे आस-पास कई चीजें हैं जिनकी मदद से हम नेचुराल सिल्की बाल बनाया जा सकता है.

  1. बालों को सिल्की बनाने में अंडा आपके बेहद काम आ सकता है. ऐसे में आप हफ्ते में दो बार इसका इस्तेमाल अपने बालों पर कर सकते हैं. ऐसा करने से बालों की चमक लौट आ सकती है.

2. दही के इस्तोमाल से भी अपने बालों को शायनी और चमकदार बना सकते हैं. ऐसे में आप एक कटोरी में दही और शहद को मिलाएं और बने मिश्रण को अपने बालों पर लगाएं. उसके बाद अपने बालों को साधारण पानी से धो लें. ऐसा करने से बालों को सिल्की बनाया जा सकता है.

3. सोने से पहले आप अपने बालों में नारियल तेल और एलोवेरा जेल को मिलाकर लगाएं और अगले दिन उठकर अपने बालों को साधारण पानी से धो लें. ऐसा करने से बालों को सिल्की बनाया जा सकता है.

4. मेथी के इस्तेमाल से भी बालों को शाइनी बनाया जा सकता है. ऐसे में आप मेथी को पानी में भिगोएं और बने मिश्रण को पीस लें. अब अपने बालों पर लगाएं. ऐसा करने से बालों को शाइनी बनाया जा सकता है.

5. बालों को शाइनी बनाने के लिए आप अपने बालों में जैतून का तेल और नारियल का तेल भी बना सकते हैं. ऐसा करने से भी बालों को शाइनी बनाया जा सकता है.

Father’s day Special: जिंदगी के सफर में मां जितने ही महत्वपूर्ण है पापा

आमतौर पर समाज में, साहित्य में या विभिन्न किस्म की संवेदनाओं के बीच यही मान्यता है कि संतान के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका ‘मां’ की है. इसमें कोई दो राय नहीं कि दुनिया में ‘मां’ की जगह कोई नहीं ले सकता. लेकिन इतना ही बड़ा सच यह भी है कि दुनिया में ‘पिता’ की भी कोई जगह नहीं ले सकता. भले मुहावरों में, कविताओं में पिता की भूमिका ने वह जगह न पायी हो, जो जगह मां की भूमिका को हासिल है लेकिन सच्चाई यही है कि जीवन में जितनी जरूरी मां की सीखें हैं, उतनी ही जरूरी पिता की मौन देखरेख है. भले पिता मां की तरह अपने बच्चों को दूध न पिलाए, उन्हें दुलराए न, उनके साथ बहुत देर तक मान मनौव्वल का खेल न खेले, लेकिन वह भी अपनी संतान से उतना ही प्यार करता है और जीवन में उसकी उतनी ही महत्ता भी है.

जिन बच्चों के सिर से बचपन में ही पिता का साया उठ जाता है, उन बच्चों में 90 फीसदी से ज्यादा बच्चे अंतर्मुखी हो जाते हैं. ऐसे बच्चे अकसर बहुत आत्मविश्वास के साथ समाज का और अपनी कठिन परिस्थितियों का सामना नहीं कर पाते. दरअसल पिता उनमें दुनिया से टकराने का आत्मविश्वास देता है. मां अगर संयम सिखाती है तो पिता की मौजूदगी बच्चों में प्रतिरोध का जज्बा भरती है. अगर मां नहीं होती तो बच्चे जीवन जीने के तौर तरीके कायदे से नहीं सीख पाते. अगर पिता नहीं होते तो बच्चे जीवन का सामना ही बमुश्किल कर पाते हैं. मां की देखरेख में पले बच्चों में आत्मविश्वास की कमी तो होती ही है, वे तमाम बार अपनी बात को सार्वजनिक तौरपर व्यवस्थित ढंग से रख तक नहीं पाते.

कहने का मतलब यह है कि जिंदगी में मां और बाप दोनो की ही बराबर की जरूरत होती है. पर अगर गहराई से देखें तो पिता की जरूरत थोड़ी ज्यादा होती हैय क्योंकि पिता की बदौलत ही बच्चे दुनिया से दो चार होने, उससे मुकाबला करने की हिम्मत और हिकमत पाते हैं. अगर बचपन में ही सिर से पिता का साया उठ जाता है, तो बच्चों का बचपन खो जाता है. खेलन, कूदने की उम्र में बड़े बूढ़ों की तरह चिंताएं करनी पड़ती हैं, कई बार उन्हीं की तरह घर चलाने के लिए मां का हाथ बंटाना पड़ता है यानी खेलने, कूदने की उम्र में ही नौकरी या चाकरी करनी पड़ती है. ज्यादातर बार पिता के न रहने पर बच्चों की पढ़ाई या तो आधी अधूरी रह जाती है या जैसे सोचा होता है, वैसी नहीं हो पाती. हां, कई मांएं अपवाद भी होती हैं जो बच्चों को पिता की गैर मौजूदगी का एहसास नहीं होने देतीं.

पिता की मौजूदगी में बच्चों में एक अतिरिक्त किस्म का आत्मविश्वास रहता है. किसी ने बिल्कुल सही कहा है कि पिता भोजन में नमक की तरह होते हैं, खाने में अगर नमक न हो तो खाना कितना ही बढ़िया, कितना ही कीमती क्यों न हो, बेस्वाद लगता है? लेकिन जब खाने में नमक की उपयुक्त मात्रा होती है तो कई बार हमें इसका एहसास तक नहीं होता. कई बार हम यह याद ही नहीं कर पाते कि हम जो कुछ खा रहे हैं उसमें नमक का भी कुछ महत्व है. पिता की मौजूदगी भी जीवन ऐसी ही होती है. जब होते हैं तो कभी यह ख्याल ही नहीं होता कि पिता के महत्व को समझें. मगर जब नहीं होते तो हर पल, हर कदम उनके न होने का दुख उठाना पड़ता है, परेशानी भोगनी पड़ती है. हर संतान को एक न एक दिन अपनी जिंदगी की जिम्मेदारी या अपने जीवन का भार खुद ही उठाना पड़ता है. मगर जब तक पिता होते हैं, वह भले कुछ न करते हों, संतानें तमाम तरह के दायित्व बोझों से मुक्त रहती हैं. उनमें एक बेफिक्री रहती है. पिता मनोवैज्ञानिक रूप से संतानों की जिम्मेदारी उठाते हैं.

अकसर माना जाता है और किसी हद तक यह सही भी होता है जिन बच्चों की सिर से बचपन में ही पिता का साया उठ जाता है, उनमें एक खास किस्म की आवरगी, एक खास किस्म का बेफिक्रापन और एक खास किस्म की आपराधिक प्रवृत्ति पैदा हो जाती है. दरअसल ऐसे बच्चों की समाज के लोग ज्यादा परवाह नहीं करते, उन्हें बहुत प्यार और इज्जत नहीं देते, जिस कारण ऐसे बच्चे भी समाज की परवाह नहीं करते, उसकी ज्यादा इज्जत नहीं करते और धीरे धीरे उनके माथे पर किसी न किसी असामाजिक श्रेणी का ठप्पा लग जाता है. समृद्धि का एक आयाम मनोविज्ञान भी होता है, जब पिता होते हैं तो बच्चे खासकर लड़के मनोवैज्ञानिक रूप से खुद को जिंदगी के बोझ से लदा-फंदा नहीं पाते. उन्हें लगता है उनकी जिम्मेदारी उठाने के लिए पिता तो अभी मौजूद ही हैं. फिर चाहे भले पिता कुछ भी कर सकने की स्थिति में न हों लेकिन उनका होना ही बेटों के लिए एक बड़ा संबल होता है.

शास्त्रों में कहा गया है कि माता और पिता दोनो ही संतान के पहले गुरु होते हैं, यह सच भी है. लेकिन माता और पिता अपनी संतान को एक ही पाठ नहीं पढ़ाते, वे दोनो उनकी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए एक ही समय में अलग अलग और महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाते हैं. मां जहां बच्चों को पारिवारिक मूल्यों, मान मर्यादा, उठने बैठने, बोलने के तौर तरीके सिखाती है, वहीं पिता बच्चों को घर से बाहर जिंदगी से कैसे जूझें, कैसे टकराएं, कैसे उससे गले मिलें इस सबका पाठ पढ़ाते हैं. इसलिए माता पिता दोनो ही बच्चे के सबसे पहले गुरु होते हैं और दोनो ही उन्हें जिंदगी के दो अलग अलग और महत्वपूर्ण पाठ पढ़ाते हैं.

Father’s day Special: चेहरे की चमक- माता-पिता के लिए क्या करना चाहते थे गुंजन व रवि?

मेरे लिए गुंजन का रिश्ता मेरी सब से समझदार बूआ ने बताया था. बूआ गुंजन की मामी की सहेली हैं. आज शाम को वे लोग हमारे घर आ रहे हैं.

पापा टैंशन में आ कर खूब शोर मचा रहे थे, ‘‘अब तक बाजार से मिठाई भी नहीं लाई गई…मेरी समझ में नहीं आता कि कई घंटे लगाने के बाद भी तुम लोग वक्त से तैयार क्यों नहीं हो पाते हो…अब बाजार भी मुझ को ही जाना पड़ेगा… ड्राइंगरूम में जो भी फालतू चीजें बिखरी पड़ी हैं, इन्हें कहीं और उठा कर रख देना…पता नहीं तुम लोग वक्त से सारे काम करना कब सीखोगे?’’

पापा के इस तरह के लैक्चर आज दोपहर से राजीव भैया, नीता भाभी और मेरे लिए चल रहे थे. उन के बाजार चले जाने के बाद सचमुच घर में शांति महसूस होने लगी.

राजीव भैया की शादी के कुछ महीने बाद मां की मृत्यु हो गई थी. उन के अभाव ने पापा को बहुत चिड़चिड़ा और गुस्सैल बना दिया था. उन की कड़वी, तीखी बातें सुन कर नीता भाभी का मुंह आएदिन सूजा रहता था. अब तो वे पापा को जवाब भी दे देती थीं और भैया भी उन का पक्ष लेने लगे थे.

घर में बढ़ते झगड़ों को देख मैं पापा को शांत रहने के लिए बहुत समझाता, पर वे अपने अंदर सुधार लाने को तैयार नहीं थे.

‘घर में गलत काम होते मैं नहीं देख सकता. बदलना तुम लोगों को है, मुझे नहीं,’ पापा उलटा मुझे डांट कर चुप करा देते.

पापा के बाजार से लौटने तक मेहमान आ चुके थे. गुंजन की मम्मी के साथ उन के भैयाभाभी और बड़ी बेटी व दामाद आए थे.

पापा सब का अभिवादन स्वीकार करने के बाद सामान रखने घर के भीतर जाने लगे तो गुंजन की मम्मी ने हैरानी भरी आवाज में उन से पूछा, ‘‘आप राजेंद्र हो न? एसडी कालेज में पढ़े हैं न आप?’’

‘‘जी, लेकिन मैं ने…’’

‘‘तुम मुझे कैसे पहचान पाओगे? मैं अब मोटी हो गई हूं, बाल सफेद हो चले हैं और आंखों पर चश्मा जो लग गया है. अरे, मैं सीमा हूं…तब सीमा कौशिक होती थी. तुम मेरे नोट्स पढ़ कर ही पास होते थे. अब तो पहचान लो, भई,’’ सीमाजी ने हंसते हुए पापा की यादों को कुरेदा.

दिमाग पर कुछ जोर दे कर पापा ने कहा, ‘‘हां, अब याद आ गया,’’ और अपने हाथ में पकड़ा सामान मुझे देने के बाद वे गुंजन की मम्मी के सामने आ बैठे, ‘‘तुम इतनी ज्यादा भी नहीं बदली हो. तुम्हारी आवाज तो बिलकुल वही है. मुझे पहली नजर में ही पहचान लेना चाहिए था.’’

‘‘जैसे मैं ने पहचाना.’’

‘‘पता नहीं तुम ने कैसे पहचान लिया? मेरी शक्ल तो बिलकुल बदल गई है.’’

‘‘लेकिन तुम्हारे बेटे रवि में तुम्हारी उन दिनों की शक्लसूरत की झलक साफ नजर आती है. शायद इसी समानता ने तुम्हें पहचानने में मेरी मदद की. देखो, क्या गजब का संयोग है. मैं अपनी बेटी का रिश्ता तुम्हारे बेटे के लिए ले कर आई हूं.’’

‘‘मेरी समझ से यह अच्छा ही है क्योंकि कालेज में जैसा आकर्षक व्यक्तित्व तुम्हारा होता था, अगर तुम्हारी बेटी वैसी ही है तो मेरे बेटे रवि की तो समझो लाटरी ही निकल आई,’’ पापा के इस मजाक पर हम सब खूब जोर से हंसे तो सीमा आंटी एकदम शरमा गईं.

अब तक सब के मन की हिचक समाप्त हो गई थी. पापा सीमा आंटी के साथ कालेज के समय की यादों को ताजा करने लगे. उन के भैयाभाभी व बेटीदामाद ने मुझ से मेरे बारे में जानकारी लेनी शुरू कर दी. नीता भाभी नाश्ते की तैयारी करने अंदर रसोई में चली गईं. राजीव भैया खामोश रह कर हम सब की बातें सुन रहे थे.

उन लोगों के साथ 2 घंटे का समय कब गुजर गया, पता ही नहीं चला. पापा तो ऐसे खुश नजर आ रहे थे मानो यह रिश्ता पक्का ही हो गया हो.

सीमा आंटी ने चलने से पहले पापा के सामने हाथ जोड़ दिए और भावुक लहजे में बोलीं, ‘‘राजेंद्र, मेरे पास दहेज में देने को ज्यादा कुछ नहीं है. गुंजन के पापा के बीमे व फंड के पैसों से मैं ने बड़ी बेटी की शादी की है और अब छोटी की करूंगी. तुम्हारी कोई खास मांग हो तो अभी…’’

‘‘मुझे जलील करने वाली बात मत करो, सीमा,’’ पापा ने बीच में टोक कर उन्हें चुप करा दिया, ‘‘रवि को गुंजन पसंद आ जाए…और मुझे विश्वास है कि तुम्हारी बेटी इसे जरूर अच्छी लगेगी, तो यह रिश्ता मेरी तरफ से पक्का हुआ. दहेज में मुझे एक पैसा नहीं चाहिए. तुम दहेज की टैंशन मन से बिलकुल निकाल दो.’’

सीमा आंटी बोलीं, ‘‘राजेंद्र, किन शब्दों में तुम्हारा शुक्रिया अदा करूं? अब आप सब लोग हमारे घर कब आओगे?’’

‘‘अगले संडे की शाम को आते हैं,’’ पापा ने उतावली दिखाते हुए कहा.

‘‘ठीक है. अब हम चलेंगे. तुम से मिल कर मन बहुत खुश है और बड़ी राहत भी महसूस कर रहा है. तुम्हारा बेटा रवि हमें तो बहुत भाया है. मेरी दिली इच्छा है कि इस घर से हमारा रिश्ता जरूर जुड़ जाए.’’

पापा के चेहरे के भाव साफ बता रहे थे कि उन की वही इच्छा है जो सीमा आंटी की है.

उन सब के जाने के बाद राजीव भैया पापा से उलझ गए, ‘‘आप को यह कहने की क्या जरूरत थी कि हमें दहेज में एक पैसा भी नहीं चाहिए? उन्हें इंजीनियर लड़का चाहिए तो शादी अच्छी करनी ही पड़ेगी.’’

‘‘अपनी बेटी की अच्छी शादी तो हर मांबाप करते ही हैं. सीमा से जानपहचान ही ऐसी निकल आई कि अपने मुंह से कुछ मांग बताने पर मैं अपनी ही नजरों में गिर जाता,’’ पापा ने शांत स्वर में भैया को समझाया.

‘‘कालेज के दिनों में आप का उन के साथ कोई प्यार का चक्कर तो नहीं चला था न?’’ राजीव भैया ने उन्हें छेड़ा.

‘‘अरे, नहीं,’’ पापा एकदम से शरमाए तो हम तीनों ठहाका मार कर हंस पड़े थे.

‘‘आगे से बिलकुल दहेज न लेने की बात मत करना, पापा,’’ ऐसी सलाह दे कर राजीव भैया अपने कमरे में चले गए थे.

पापा ने बुरा सा मुंह बनाते हुए मुझ से कहा, ‘‘तेरा बड़ा भाई उन लोगों में से है जिन का पेट कभी नहीं भरता. लेकिन तू चिंता न कर बच्चे, अगर सीमा की बेटी सूरत, सीरत से अच्छी हुई तो मैं तेरे भाई की एक न सुनते हुए रिश्ता पक्का कर दूंगा.’’

‘‘ठीक कह रहे हैं आप, पापा. सीमा आंटी के नोट्स पढ़ कर आप ने जो गे्रजुएशन किया है, अब उस एहसान का बदला चुकाने का वक्त आ गया है. आप गुंजन को देखे बिना भी अगर इस रिश्ते को ‘हां’ करना चाहें तो मुझे कोई ऐतराज नहीं होगा.’’

मेरी इस बात को सुन पापा बहुत खुश हुए और दिल खोल कर खूब हंसे भी.

रविवार को हम लोग शाम के 5 बजे के करीब सीमा आंटी के घर पहुंच गए. उन के भैयाभाभी और बेटीदामाद ने हमारा स्वागत किया. कुछ देर बाद गुंजन भी हम सब के बीच आ बैठी थी.

पहली नजर में उस ने मुझे बहुत प्रभावित किया. वह मुझे सुंदर ही नहीं बल्कि स्मार्ट भी लगी. हम सब के साथ खुल कर बातें करने में वह जरा भी नहीं हिचक रही थी.

मेरे बारे में कुछ जानने से ज्यादा उसे पापा से अपनी मम्मी के कालेज के दिनों की बातें सुनने में ज्यादा दिलचस्पी थी. पापा एक बार उन दिनों के बारे में बोलना शुरू हुए तो उन्हें रोकना मुश्किल हो गया. उन के पास सुनाने को बहुत कुछ ऐसा था जिस से हम दोनों भाई भी परिचित नहीं थे. पापा को खूब बोलते देख राजीव भैया मन ही मन कुढ़ रहे थे, यह उन के हावभाव से साफ जाहिर हो रहा था. मुझे तो पापा के चेहरे पर नजर आ रही चमक बड़ी अच्छी लग रही थी. उन के कालेज के दिनों की बातें सुनने में मुझे सचमुच बहुत मजा आ रहा था.

‘‘उन दिनों साथ पढ़ने वाली लड़कियों के साथ लड़कों का बाहर घूमने या फिल्म देखने का सवाल ही नहीं पैदा होता था. लड़कियां कभी कालेज की कैंटीन में चाय पीने को तैयार हो जाती थीं तो लड़के फूले नहीं समाते थे.’’

‘‘तब अधिकतर एकतरफा प्यार हुआ करता था. कोई हिम्मती लड़का ही गर्लफ्रैंड बना पाता था, नहीं तो अधिकतर अपने दिल की रानी के सपने देखते हुए ही कालेज की पढ़ाई पूरी कर जाते थे,’’ पापा ने बड़े प्रसन्न व उत्साहित लहजे में हम सब को अपने समय की झलक दिखाई थी.

‘‘तब लड़कों के मुंह से प्यार का इजहार करने की हिम्मत तो यकीनन कम होती थी पर वे प्रेमपत्र खूब लिखा करते थे. गुमनाम प्रेमपत्र लिखने की कला में तो राजेंद्र, तुम भी माहिर थे,’’ सीमा आंटी ने अचानक यह भेद खोला तो पापा एकदम से घबरा उठे थे.

‘‘मैं ने किसे गुमनाम प्रेमपत्र लिखा था?’’ पापा ने अटकते हुए पूछा.

‘‘अनिता तुम्हारे सारे प्रेमपत्र हम सहेलियों को पढ़ाया करती थी.’’

‘‘जब मैं ने किसी पत्र पर अपना नाम लिखा ही नहीं था तो तुम कैसे कह सकती हो कि वे…अरे, यह तो आज मैं ने अपनी पोल खुद ही खोल दी.’’

पापा हम से आंखें मिलाने में शरमा रहे थे. हमारी हंसी बंद होने में नहीं आ रही थी. मुझे शरमातेमुसकराते पापा उस वक्त बहुत ही प्यारे लग रहे थे.

चायनाश्ते के बाद गुंजन और मुझे आपस में खुल कर बातें करने के लिए पास के पार्क में भेज दिया गया. पार्क में पहुंचते ही गुंजन ने साफ शब्दों में मुझ से कहा, ‘‘मेरी बात का बुरा न मानना, मैं तुम से अभी शादी नहीं कर सकती.’’

‘‘अभी से तुम्हारा क्या मतलब है?’’ मैं ने कुछ चिढ़ कर पूछा.

‘‘मुझे पहले एमबीए करना है और बहुत अच्छे कालेज से करना है. उतनी तैयारी शादी के बाद नहीं हो सकती है.’’

‘‘यह बात तुम ने पहले सब को क्यों नहीं बताई?’’

‘‘मम्मी शादी करने के लिए मेरे पीछे पड़ी रहती हैं. उन से जान छुड़ाने के लिए मैं 2-3 महीनों में एक लड़के से मिलने का नाटक कर लेती हूं.’’

‘‘और तुम्हें उसे रिजैक्ट करना होता है…जैसे अब मुझे करोगी. वाह, तुम ने अपने मनोरंजन के लिए बढि़या खेल ढूंढ़ा हुआ है.’’

‘‘अगर तुम्हें पूरी तरह से रिजैक्ट करूंगी भी तो आज नहीं, कुछ दिनों के बाद करूंगी.’’

‘‘क्या मतलब?’’ मैं ने चौंक कर उलझन भरे स्वर में पूछा.

‘‘मैं तसल्ली से तुम्हें सब समझाती हूं,’’ उस ने उत्साहित अंदाज में मेरा हाथ पकड़ा और पास में पड़ी बैंच की तरफ बढ़ चली.

उस बैंच पर घंटे भर बैठने के बाद हम दोनों घर लौट आए थे. जब हम ने ड्राइंगरूम में कदम रखा तब सब की नजरें हम पर टिकी यह सवाल पूछ रही थीं, ‘क्या तुम दोनों ने एकदूसरे को पसंद कर लिया है?’

गुंजन का इशारा पाने के बाद मैं ने सब को सूचित किया, ‘‘अभी हम दोनों किसी फैसले पर नहीं पहुंच पाए हैं. एकदूसरे को समझने के लिए हमें कुछ और वक्त चाहिए.’’

‘‘रवि वैसे दिल का बहुत अच्छा है पर थोड़ा पुराने खयालों का है. मेरे लिए अपना कैरियर…’’

‘‘जरूरत से कुछ ज्यादा ही अहमियत रखता है,’’ रवि ने मुसकराते हुए गुंजन को टोका, ‘‘इस मसले पर हमारे बीच काफी बहस हुई है, लेकिन वह बहस एकदूसरे को नापसंद करने का कारण नहीं बनी है. अगली कुछ मुलाकातों में अगर हम ने अपने मतभेद सुलझा लिए तो दोनों परिवारों के बीच में रिश्ता जरूर बन जाएगा.’’

‘‘आजकल के बच्चों की बस पूछो मत,’’ पापा ने माथे पर बल डाल कर सीमा आंटी से कहा, ‘‘मेरी समझ से गुंजन बहुत अच्छी लड़की है. मैं घर जा कर रवि से बात करता हूं. इसे मेरी खुशी की चिंता होगी तो जल्दी ही तुम तक खुशखबरी पहुंच जाएगी.’’

पापा के यों हौसला बढ़ाने पर सीमा आंटी मुसकराईं तो पापा का चेहरा भी खिल उठा था.

घर लौटने के बाद से पापा ने सवाल पूछपूछ कर मेरा दिमाग खराब कर दिया. ‘‘क्या कमी नजर आई तुझे गुंजन में? वह सुंदर है, स्मार्ट है, शिक्षित है और अच्छा कमा रही है. और क्या चाहिए तुझे?’’

‘‘वक्त, पापा, वक्त. हम एकदूसरे को और ज्यादा अच्छी तरह से समझना चाहते हैं.’’

‘‘मन में बेकार की उलझन पैदा करने का क्या फायदा है? वह अच्छी लगी है न तुझे?’’

‘‘दिल की तो वह बहुत अच्छी है पर…’’

‘‘बस, शादी के लिए हां करने को यही बात काफी है. बाद में किसी भी शादी को सफल बनाने के लिए पतिपत्नी दोनों को समझौते तो करने ही पड़ते हैं.’’

‘‘आप गुंजन को समझाने के लिए भी कुछ बातें बचा लो, पापा,’’ मैं उन के पास से जान बचा कर भाग खड़ा हुआ था.

गुंजन और मेरी अगली मुलाकात उस के घर में सीमा आंटी के जन्मदिन पर अगले शनिवार को हुई. हमें किसी ने बुलाया नहीं था. मैं ने पापा को जिद कर के तैयार किया और सुंदर सा फूलों का गुलदस्ता ले कर हम उन के घर पहुंच गए. अपने आने की सूचना सिर्फ आधे घंटे पहले मैं ने फोन पर गुंजन को दी थी.

उन लोगों के यहां हमारी खातिर करने की कोई तैयारी नहीं थी. गुंजन की दीदी और जीजाजी देर से डिनर पर आने वाले थे. तब मैं ने बाजार से खानेपीने का सामान लाने की जिम्मेदारी ले ली. गुंजन भी मेरे साथ बाजार चली आई थी. वे लोग नहीं चाहते थे कि खानेपीने की चीजों पर मैं खर्च करूं. हम लोग लौट कर घर आ गए. घर में पार्टी की गहमागहमी थी.

पापा की आवाज अच्छी है. उन्होंने हमारी फरमाइश पर 4 पुराने फिल्मी गाने सुनाए तो पार्टी में समा बंध गया. सीमा आंटी के बनाए सूजी के हलवे की जितनी तारीफ की जाए कम होगी.

वे सचमुच बहुत स्वादिष्ठ खाना बनाती हैं, इस का एहसास हमें डिनर करने के समय हो गया था. हम तो डिनर के लिए रुकना ही नहीं चाहते थे पर गुंजन ने जबरदस्ती रोक लिया था. उस की दीदी व जीजाजी के साथ भी उस रात हमारे संबंध और ज्यादा मधुर हो गए.

 

डिनर के बाद गुंजन और मैं घर के बाहर की सड़क पर घूमने निकल आए. मैं उस की मम्मी की और गुंजन मेरे पापा के व्यक्तित्व व व्यवहार की खूब तारीफ कर रहे थे. अचानक उस ने मेरा हाथ पकड़ा और बगीचे में खुलने वाली खिड़की की तरफ चल पड़ी.

‘‘मैं कुछ देखना और तुम्हें दिखाना चाहती हूं,’’ मैं कुछ पूछूं, उस से पहले ही उस ने मुझे अपने मन की बात बता दी थी.

बैठक में रोशनी होने के कारण हम तो अंदर का दृश्य साफ देख सकते थे पर अंदर बैठे लोगों के लिए हमें देखना संभव नहीं था.

बैठक में गुंजन के जीजाजी किसी पत्रिका के पन्ने पलट रहे थे. उस की बहन टीवी देख रही थी. सीमा आंटी और पापा आपस में बातें करने में पूरी तरह से मशगूल थे.

अचानक पापा की किसी बात पर सीमा आंटी खिलखिला कर हंस पड़ीं. पापा ने अपनी मजाकिया बात को कहना जारी रखा तो सीमा आंटी के ऊपर हंसी का दौरा सा ही पड़ गया था.

वे बारबार इशारे कर पापा से चुप होने का अनुरोध कर रही थीं पर वे रुकरुक कर कुछ बोलते और सीमा आंटी फिर जोर से हंसने लगतीं.

‘‘मैं ने अपनी मम्मी को इतना खुश पहले कभी नहीं देखा,’’ गुंजन भावुक हो उठी.

‘‘इस वक्त दोनों के चेहरों पर कितनी चमक है,’’ मैं ने प्रसन्न स्वर में कहा, ‘‘लगता है कि हम ने इन दोनों के बारे में जो सपना देखा है, वह बिलकुल ठीक है.’’

‘‘इस उम्र में ही तो इंसान को एक हमसफर की सब से ज्यादा जरूरत होती है.’’

‘‘मुझे तो लगता है कि ये दोनों एकदूसरे से शादी करने का फैसला कर ही लेंगे.’’

‘‘जब तक ये ऐसा फैसला नहीं करते, हम अपनी शादी के मामले को लटकाए रख कर इन्हें मिलनेजुलने के मौके देते रहेंगे.’’

‘‘तुम्हारी जैसी समझदार दोस्त को पा कर मुझे बहुत खुशी होगी. इन दोनों की शादी कराने का तुम्हारा आइडिया लाजवाब है, गुंजन.’’

‘‘तुम्हारे भैयाभाभी इस शादी का ज्यादा विरोध तो नहीं करेंगे?’’ गुंजन की आंखों में चिंता के भाव उभरे.

‘‘भैया को इस बात की चिंता तो जरूर सताएगी कि सीमा आंटी हमारी नई मां बन कर पापा की जायदाद में हिस्सेदार बन जाएंगी.’’

‘‘फिर बात कैसे बनेगी?’’

‘‘तुम्हारे इस सवाल का जवाब सीमा आंटी और पापा के चेहरे की चमक दे रही है. उन की खुशी और हित को ध्यान में रख मैं अपना हिस्सा भैया के नाम कर दूंगा,’’ इस निर्णय को लेने में मेरे दिल ने रत्ती भर हिचकिचाहट नहीं दिखाई थी.

‘‘तुसी तो गे्रट हो, दोस्त.’’

‘‘थैंक यू,’’ पापा के सुखद भविष्य की कल्पना कर मैं ने जब अचानक गुंजन को गले से लगाया तब हम दोनों की पलकें नम हो रही थीं.

कर्तव्य: जब छूटा आदिल के पिता का साथ

आदिल के अब्बू की तबीयत आज कुछ ज्यादा ही खराब लग रही थी, इसलिए उस ने आज खबरों के लिए फील्ड पर न जा कर सरकारी अस्पताल के डाक्टर वर्माजी से मिलने अपने अब्बू को ले कर अस्पताल पहुंच गया था.

आदिल के अब्बू को दमे की दिक्कत थी, जिस की वजह से वे बहुत ही परेशान रहते थे. डाक्टर वर्मा की दवा से उन को फायदा था, इसलिए वह अब्बू का इलाज उन से ही करा रहा था.

जब आदिल अस्पताल पहुंचा, तो डाक्टर साहब अभी अपने कमरे में नहीं बैठे थे. पड़ोस में अधीक्षक साहब के औफिस से हंसीमजाक की आवाजें आ रही थीं. उस ने अंदाजा लगा लिया कि डाक्टर साहब अधीक्षक साहब के साथ बैठे होंगे.

आदिल अब्बू को एक बैंच पर लिटा कर खुद भी वहीं एक बैंच पर बैठ गया. तभी उस की नजर एक औरत पर पड़ी, जो अपने बीमार बच्चे को गोद में ले कर इधरउधर भटक रही थी, लेकिन काफी वक्त बीत जाने के बाद भी उस के बच्चे को अभी तक किसी डाक्टर ने नहीं  देखा था.

वह औरत अस्पताल में मौजूद स्टाफ से अपने बच्चे के इलाज के लिए गुहार लगा रही थी कि डाक्टर साहब को बुला दो, लेकिन कोई उस की बात सुनने को तैयार नहीं था. शायद उस का बच्चा काफी बीमार था, लेकिन कोई भी उस की मदद के लिए सामने नहीं आया था.

आदिल उस औरत को देख कर इतना तो समझ गया था कि वह काफी गरीब है, वरना वह इस कदर परेशान नहीं हो रही होती. अगर वह पैसे वाली होती, तो अभी तक बाहर के किसी प्राइवेट अस्पताल में जा कर अपने बच्चे को दिखा देती.

जानते हैं, सरकारी अस्पतालों की हालत. सरकार सरकारी अस्पताल इसीलिए खुलवा रही है कि गरीबों और बेबसों का मुफ्त इलाज हो सके, लेकिन इन भ्रष्ट डाक्टरों के चलते सरकारी अस्पताल इन की कमाई का अड्डा बन गए हैं, क्योंकि इन की इनसानियत मर चुकी है और वे गरीबों का खून चूसने से भी बाज नहीं आते.

आदिल ने एक नजर सामने लगी दीवार घड़ी पर डाली, जो सुबह के  11 बजने का संकेत दे रही थी. अस्पताल में मरीजों की भीड़ भी बढ़ती जा रही थी, लेकिन अभी तक किसी कमरे में कोई डाक्टर नहीं बैठा था, जिस से उस औरत के साथसाथ बाकी मरीज भी परेशान हो रहे थे.

आदिल को आज तक सरकारी महकमे का काम करने का तरीका समझ नहीं आया कि जनता के रुपयों से वे लोग तनख्वाह पाते हैं, लेकिन इस के बावजूद कभी कोई जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाना चाहते.

आदिल एक टैलीविजन चैनल का पत्रकार होने के चलते कई बार सरकारी अस्पतालों की इस तरह की खबरें चला चुका है, लेकिन फिर भी हाल नहीं बदले, क्योंकि कमीशनबाजी के चलते ऊपर से नीचे तक सभी भ्रष्ट बैठे थे, जिन का हिस्सा पहले ही पहुंच जाता था.

लेकिन बारबार खबरें चलाने के चलते उन लोगों ने आदिल के लिए जरूर परेशानी खड़ी कर दी थी. एक बार उस ने इसी अस्पताल की एक खबर डाक्टरों के द्वारा कमीशनबाजी के चलते बाहर के मेडिकल दुकानों की लिखी जाने वाली दवाओं पर चला दी थी, उसी दौरान उस को कुछ दवाओं की जरूरत पड़ गई थी, जो साधारण सी दवाएं थीं, लेकिन फिर भी उस की खबर चैनल पर चलने से नाराज किसी मैडिकल वाले ने उसे वे दवाएं नहीं दी थीं. इस के बाद उस ने किसी दूसरे पत्रकार साथी को भेज कर वे दवाएं मंगवाई थीं.

उस वक्त उसी पत्रकार ने आदिल को समझाया था कि ज्यादा बड़े पत्रकार मत बनो, पूरा सिस्टम भ्रष्ट है. तुम इन को नहीं सुधार सकते, लेकिन तुम जरूर किसी दिन इन के चक्कर में आ कर बहुतकुछ गंवा दोगे.

उस हादसे के बाद अब आदिल अस्पताल की कोई भी नैगेटिव खबर जल्दी नहीं चलाता था कि दोबारा वह इस तरह की मुसीबत में पड़े.

‘‘बाबूजी, हमारे बच्चे को बचा लो. इसे बहुत तेज बुखार हो गया है. इस के सिवा हमारा कोई भी नहीं है.’’

तभी किसी की आवाज सुन कर आदिल की तंद्रा टूटी. उस ने देखा कि वही औरत अपने बच्चे को ले कर उस के पास आ गई थी और रोरो कर वह उस से मदद की गुहार लगा रही थी.

उस औरत को अपने पास देख आदिल जरूर समझ गया था कि अस्पताल में मौजूद किसी शख्स ने उसे बता दिया था कि वह एक पत्रकार है.

उस औरत के आंसू और बच्चे के लिए तड़प उस से अब देखी नहीं जा रही थी. उस का चेहरा गुस्से से लाल होता जा रहा था, लेकिन वह यह भी अच्छी तरह जानता था कि अगर उस ने किसी तरह का कोई कदम उठाया, तो उस के लिए बहुत ही घातक साबित होगा, क्योंकि वह जानता था कि ये डाक्टर रूपी गिरगिट हैं, जो रंग बदलते देर नहीं करेंगे, जिस का नतीजा भी उस को भुगतना पड़ सकता है.

आदिल ने एक नजर बैंच पर लेटे अपने अब्बू पर डाली, जो उस की ओर ही देख रहे थे. उस की मनोदशा को वे अच्छी तरह से समझ रहे थे.

‘‘जो होगा देखा जाएगा,’’ आदिल ने मन ही मन तय किया. वह बैंच से उठा और मोबाइल का कैमरा चालू कर उस बेबस मां और उस के बीमार बच्चे के साथसाथ अस्पताल में मौजूद मरीजों की लगी भीड़ की एक वीडियो क्लिप बना ली. यही नहीं, उस ने एक बयान भी उस औरत का कैमरे में ले लिया कि वह कब से अपने बीमार बच्चे को ले कर भटक रही है वगैरह. फिर आदिल ने अधीक्षक के औफिस के पास पहुंच कर एक वीडियो अधीक्षक और डाक्टरों की पार्टी करते बना ली और चैनल पर खबर भेज कर खबर ब्रेक करा कर ट्वीट भी करा दी.

खबर चैनल पर चलने के बाद  5 मिनट भी नहीं गुजरे कि अस्पताल में हड़कंप मच गया.

औफिस के अंदर बैठे अधीक्षक व डाक्टर हड़बड़ाते हुए बाहर निकले और उस औरत के बच्चे को दाखिल कर उस के इलाज में जुट गए. यह देख कर आदिल को सुकून मिला कि अब वह बच्चा बच जाएगा.

‘‘बाबूजी, मैं आप का यह एहसान कभी नहीं भूलूंगी,’’ कह कर वह औरत आदिल के पैर छूने लगी.

‘‘अरे, यह आप क्या कर रही हैं? उठिए, मैं ने कोई आप पर एहसान नहीं किया है. मैं ने केवल अपने कर्तव्य का पालन किया है,’’ आदिल ने उस औरत को उठाते हुए कहा.

तभी आदिल के अब्बू को दमे का अटैक पड़ गया और वे तड़पने लगे. यह देख कर उस ने तुरंत अब्बू का इन्हेलर निकाल कर उस में कैप्सूल लगा कर अब्बू के मुंह पर लगा दिया. अब्बू ने जोर से सांस खींचनी चाही, पर वे ऐसा नहीं कर सके.

यह देख कर आदिल तुरंत डाक्टर वर्मा को बुलाने पहुंच गया, जो किसी मरीज को देख रहे थे. उस ने अब्बू का हाल बता कर चलने के लिए कहा. लेकिन उन्होंने थोड़ा वक्त लगने की बात कह कर बाद में आने के लिए बोल दिया.

आदिल वापस अब्बू के पास आ गया, जो सांस न ले पाने के चलते काफी परेशान हो गए थे. वह थोड़ी देर तक बैठा उन के सीने को सहलाता रहा. उस के बाद फिर वह डाक्टर वर्मा को बुलाने पहुंच गया.

‘‘अरे, सौरी आदिल भाई, मैं तो भूल ही गया था. चलो, चलता हूं. कहां हैं तुम्हारे बाबूजी?’’ उसे देख कर डाक्टर वर्मा ने कहा और उस के साथ चल दिए.

‘‘आप के बाबूजी की तबीयत तो काफी ज्यादा खराब है. आप को इन  को जिला अस्पताल ले कर जाना पड़ेगा,’’ आदिल के अब्बू की हालत  देख कर डाक्टर वर्मा ने मानो ताना मार कर कहा.

डाक्टर की बात सुन कर आदिल समझ गया कि वे ऐसा क्यों कह रहे हैं. वह जानता था कि खबर चलने के बाद वे उस को परेशान जरूर करेंगे, क्योंकि अब्बू का यह अटैक तो कुछ भी नहीं था. इस से पहले जो अब्बू को  अटैक आए थे, वे भी ज्यादा तेज थे, तब तो उन्होंने महज एक इंजैक्शन लगा कर ही कंट्रोल कर लिया था, लेकिन अब वे उस से चिढ़ कर ही ऐसा कर  रहे हैं.

आदिल को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे, क्योंकि अब्बू की हालत वहां ले जाने वाली नहीं थी, अगर वह उन्हें यहां से ले जाता है तो भी वहां तक पहुंचतेपहुंचते काफी देर हो जाएगी.

‘‘बाबूजी, हमारी वजह से ही आप को परेशानी हो रही है. अगर आप हमारी मदद न करते तो ये डाक्टर साहब अब्बू को जरूर ठीक कर देते,’’ उसे परेशान देख कर उस औरत ने हाथ जोड़ते हुए उस से कहा.

तभी एक बार फिर आदिल के बाबूजी तड़पने लगे, लेकिन सामने खड़ा कोई भी डाक्टर या फिर कोई स्टाफ उन को देखने तक नहीं आया. तभी उस के अब्बू को जोर से खांसी आने लगी  और फिर वे शांत हो गए. उस के अब्बू हमेशा के लिए उसे छोड़ कर जा चुके थे, बहुत दूर.

आत्मग्लानि: क्या था पिता-पुत्री के रिश्ते का दूसरा पहलू?

‘‘ऋचा…’’ लगभग चीखते हुए मैं कमरे से निकली, ‘‘अब बस भी करो… कितनी बार समझाया है कि लड़कियों को ऐसे चिल्लाचिल्ला कर बात नहीं करनी चाहिए पर तुम्हारी खोपड़ी में तो मेरी कोई बात घुसती ही नहीं. कालेज नहीं जाना है क्या? और उत्तम, आप भी, बस हद करते हैं…जवान बेटी के साथ क्या कोई इस तरह…’’ मैं चाह कर भी अपनेआप को काबू में नहीं रख पाई और भर्राई आवाज में आधीअधूरी ही सही, मन की भड़ास निकाल ही दी.

शांत प्रकृति की होने के कारण क्रोधित होते ही मुझे घबराहट सी होने लगती है, इसलिए पलभर में ही लगने लगा कि अंदर कुछ टूटनेफूटने लगा है, ऐसा महसूस हो रहा था, मानो मैं अचानक ही असहाय सी हो गई हूं. ऋचा और उत्तम की धमाचौकड़ी और घर के कोने में दुबक कर एकदूसरे के कानों में गुपचुप बतियाने की प्रक्रिया ने मुझे निढाल करना शुरू कर दिया था. अपनी संवेदनशीलता से मैं स्वयं धराशायी हो गई. मेरी आंखें अनायास छलक उठीं.

‘‘मृदुला, क्या हो गया है तुम्हें?’’ उत्तम ने मेरे दोनों कंधों को थामते हुए पूछा, ‘‘मैं और ऋचा तो हमेशा से ऐसे ही थे. ऋचा कितनी भी बड़ी हो जाए पर मेरे लिए वह हमेशा वही रहेगी, नन्हीमुन्नी गुडि़या.’’

‘‘हां, यह तो ठीक है, पर…’’ मेरे होंठों पर अचानक जैसे किसी ने ताला लगा दिया. अंदर की बात अंदर ही अटकी रह गई. मैं सचाई नहीं बोल पाई. जिस सच के कड़वेपन को महसूस कर मैं अंदर ही अंदर तड़प रही थी उस बात को उजागर करने के खयाल मात्र से भी दिल सहम सा जाता था.

‘‘तुम बहुत चिड़चिड़ी होती जा रही हो. क्या बात है? लगता है, अंदर ही अंदर कोई सोच खाए जा रही है,’’ मेरे हाथों को अपने हाथ में लेते हुए उत्तम ने मुझे अपने साथ सोफे पर बिठा लिया, ‘‘हम दोनों एकदूसरे के सुखदुख के सहभागी हैं. मुझे बताओ, आखिर बात क्या है?’’

‘‘कुछ नहीं,’’ एक झटके में उत्तम के हाथों को मुक्त करते हुए मैं उठ खड़ी हुई. उत्तम की ऐसी चिकनीचुपड़ी बातों से अब मुझे नफरत सी होने लगी थी. सोचने लगी, ‘कितना झूठ बोलता है उत्तम. क्या जरूरत है उसे यह कहने की कि मैं उस के सुखदुख की साथी हूं. यदि ऐसा होता तो वह मेरे साथ बिताए जाने वाले लमहों को ऋचा के साथ न बांटता.’ मैं विकल हो उठी तो प्रयास किया कि सोफे पर पड़े बैग को कंधे पर लटकाते हुए तत्काल घर से बाहर निकल जाऊं पर ऋचा दरवाजे पर दोनों हाथ फैलाए खड़ी हो गई, ‘‘मां, पहले नाश्ता…’’

‘‘नहीं, मुझे भूख नहीं है.’’

‘‘ऐसे कैसे भूख नहीं है,’’ ऋचा ने मुझे धकेलते हुए खाने की मेज पर बिठा दिया, ‘‘मां, मुझे तो लगता है, आप रातदिन मेरी शादी को ले कर परेशान रहती हैं. पर अभी मेरी उम्र ही क्या है और फिर मैं कोई कालीकलूटी तो हूं नहीं जो लड़का मिलना मुश्किल हो जाएगा. क्यों पिताजी?’’ ठुनकती हुई ऋचा ने मुझे खुश करने का प्रयास करते हुए उत्तम से पूछा.

‘‘बिलकुल सही,’’ पलभर पहले मेरे चिंताग्रस्त चेहरे को ले कर बेहद गंभीर हो उठे उत्तम, ऋचा की बात सुन कर फिर से चुलबुले बन बैठे, ‘‘पर ऋचा, तुम्हारा शरीर जिस तरह से मोटा होता जा रहा है, उस से तो लगता है कि तुम्हें कोई अच्छा लड़का मिलने से रहा.’’

‘‘मां, देखो न. पिताजी हमेशा मुझे मोटी कह कर चिढ़ाते रहते हैं,’’ मेरी प्लेट में गाजर का हलवा परोसती हुई ऋचा बोली, ‘‘जानती हो मां, पिताजी ने मुझे एक भी चम्मच गाजर का हलवा खाने को नहीं दिया. इसीलिए तो मैं इन से लड़ रही थी. अब तुम्हीं बताओ, क्या मैं सचमुच इतनी मोटी हूं?’’ मैं ऋचा के सवाल का कोई जवाब न दे पाई. बस, आंखें तरेर कर उस की ओर देखते हुए जतला दिया कि मुझे उस का बातचीत करने का यह ढंग बिलकुल पसंद नहीं आया. नाश्ता गले के नीचे नहीं उतर रहा था. मैं उठ खड़ी हुई.

‘‘यह क्या मां, पूरा तो खा लो.’’

‘‘नहीं, बस…’’

‘‘रहने दे ऋचा, लगता है, तेरी मां डाइटिंग कर रही हैं. इन्हें शायद इस बात का डर है कि कहीं तुम खूबसूरती में इन से बाजी न मार लो,’’ और दोनों की खनकती हंसी अंगारों की तरह मेरे कानों से टकराई. मैं रोंआसी हो उठी. सोचा, दौड़ कर दमघोंटू माहौल से बाहर निकल जाऊं, पर अचानक बढ़ते कदम रुक गए, ‘‘ऋचा, तुम भी चलो न, तुम्हारे कालेज का तो समय हो गया है.’’

‘‘ऋचा को मैं छोड़ दूंगा, तुम जाओ,’’ ऋचा को अपने अंक में समेटते हुए उत्तम ने कहा तो उस का साहस और ऋचा की उन्मुक्तता ने मेरे तनबदन में आग लगा दी. लाचार सी अपनी ही पीड़ा से झुलसती मैं तेजी से घर से बाहर निकल गई. उस रोज दफ्तर में किसी काम में मन नहीं लगा. थोड़ाबहुत काम जैसेतैसे निबटा कर मैं निढाल सी कुरसी पर बैठी रही. चिंता में डूबे मेरे दिल और दिमाग में बारबार वही दृश्य आताजाता रहा, जब उत्तम ने ऋचा को अपने पास खींच लिया था. मन में कुलबुलाहट होने लगी कि पितापुत्री में ऐसे प्रेम प्रदर्शन का बुरा लगना अस्वाभाविक है. पर उत्तम तो ऋचा के सौतेले पिता हैं, यानी मेरे दूसरे पति. इस बात को मैं कभी भूल ही नहीं पाती थी. सालों पहले का दृश्य आंखों के आगे साकार हो उठा, जब उत्तम सागर की मौत की सूचना देने मेरे घर आया था. विधवा होने की सूचना मिलते ही मैं ने दीवारों से बांहें टकराते हुए चूडि़यां तोड़ डाली थीं. मुझे लगा था, मेरे साथ मेरी तरह चीत्कार कर रोने वाला उत्तम मेरी पीड़ा का सच्चा सहभागी है.

वह बोला, ‘भाभी, अब हम कैसे जीएंगे, सागर के बगैर तो मैं दो कदम भी नहीं चल सकता.’ उत्तम के असहनीय वार्त्तालाप ने मुझे मजबूर कर दिया था कि मैं तत्काल आंसू पोंछ डालूं और उस को संभालने का प्रयास करूं. बिना कुछ सोचेसमझे मेरे सीने से लग कर उस रोज वह इतना मासूम लगा था कि मैं देर तक उसे अपनी बांहों में समेटे रही. उस के आंसुओं ने मेरे आंचल से चुपके से दोस्ती कर ली थी.

उस के बाद उत्तम जब भी आता, कभी मेरे सिर पर हाथ फेर कर संरक्षक बन जाता तो कभी मेरे आगोश में छिप कर एक नन्हा बालक. तब ऋचा 2 साल की थी. ऋचा के पिता, यानी सागर ने मुझे कभी अकेले चलना नहीं सिखाया था. हर वक्त मेरे हाथों को अपने हाथों में लिए चलता था. मैं कभी अगलबगल देख कर यह जानने का प्रयास न करती कि जिस राह पर वह मुझे लिए जा रहा है, वह कहां जा कर खत्म होती है. मेरी आंखें तो सागर के तेजस्वी चेहरे पर टिकी रहती थीं. पर वह अचानक मुझे नन्ही ऋचा के सहारे ऐसी जगह छोड़ कर चला गया, जहां से न तो मुझे आगे का मार्ग पता था, न पीछे का. अचकचाई सी जब भी मैं इस अनजान शहर में इधरउधर नजर दौड़ाती तो सिवा उत्तम के कोई और मुझे नजर न आता जिसे मेरी आंखें पहचानती हों. मैं उत्तम के सहारे की मुहताज थी और वह मेरे सामीप्य का. इसीलिए तो एक दिन उस ने ‘भाभी’ और ‘आप’ की सारी सीमाओं को लांघ कर मेरे हाथों को थाम लिया और पूछा, ‘मुझ से शादी करोगी?’

मैं अचंभित, अवाक् सी उसे ताकती रह गई. मासूमियत से मेरे सीने से लग जाने वाला उत्तम कभी मेरे सामने यह प्रस्ताव रखेगा, इस की तो मैं ने कल्पना ही नहीं की थी. यदि कभी ऐसी कल्पना की होती तो उस के द्वारा पूछे जाने वाले इस संभावित प्रश्न का एक उचित उत्तर भी तैयार रखती. पर मैं ने तो इस बारे में कभी सोचा ही नहीं था. समझ में नहीं आ रहा था कि क्या जवाब दूं. मेरे जीवन से सागर की कमी की परिपूर्ति करने की इच्छा रखने वाला उत्तम उस समय मेरे लिए पूजनीय था या एक ओछी प्रवृत्ति वाला स्वार्थी इंसान, मैं समझ नहीं पा रही थी. मुझे सशंकित देख कर उस ने कहा था, ‘मृदुला, तुम्हारे साथ मेरा नाम जुड़ गया है. लोग तरहतरह की बातें बनाने लगे हैं. मेरी मां ने मेरा रिश्ता कहीं और करना चाहा था पर मैं उस के लिए तैयार नहीं था. तुम कभी यह न समझना कि मेरे मन में तुम्हारे प्रति जो स्नेह है उस में वासना छिपी है. पर किसी और से शादी कर के मैं तुम्हारी और ऋचा की देखभाल में असमर्थ हो जाऊंगा. मैं तुम दोनों को असहाय नहीं छोड़ सकता, इसीलिए यह प्रस्ताव रख रहा हूं.’’

मैं विस्मित सी उसे देखती रह गई. कितना अनोखा और निराला सा था, उस का प्रस्ताव. मेरी भावनाओं में, मेरे हृदय में और मेरी आंखों की गहराइयों में उस ने कब और कैसे कब्जा कर लिया, मैं जान ही न पाई. जब उस ने मेरे रोमरोम को जीत लिया था तो इनकार भला मैं किस मुंह से करती. उत्तम के सामने मेरा झुका हुआ सिर मेरी मौन स्वीकृति का सूचक बन गया था और समाज के रीतिरिवाजों और दकियानूसी परंपराओं से लड़ते हुए उत्तम ने मेरी मांग में तारे सजा दिए. उत्तम ने मेरी और ऋचा की जिंदगी में बहार ला दी थी. ऋचा के साथ कभी अनजाने कोई अन्याय न हो जाए, इस विश्वास को अंजाम देने के लिए उस ने कभी एक और बच्चे की इच्छा नहीं की. लेकिन मेरी खुशियों को रोशन रखने के लिए अपनी आकांक्षाओं से दीप जलाने वाला उत्तम अचानक बदलने लगा था. उस के जीवन से मेरा अस्तित्व धीरेधीरे खत्म होता जा रहा था. अब ऋचा ही उस की सबकुछ थी. यौवन की दहलीज पर खड़ी ऋचा को अच्छेबुरे की शिक्षा देतेदेते मैं हार गई थी. पर वह पिता के साथ करने वाली अपनी शरारतों में जरा सी भी कमी नहीं करती थी.

एक पुरुष और एक स्त्री के रिश्ते में थोड़ी सी दूरी कितनी जरूरी है, इस बात को ऋचा और उत्तम ने नजरअंदाज कर दिया था. उन दोनों के बीच का यह गहन रिश्ता मेरी नजरों में तब संदेहास्पद हो उठा था जब उत्तम ने पुरानी फैक्टरी का काम छोड़ कर एक नई फैक्टरी में नौकरी कर ली. इस नई फैक्टरी में हमेशा उस की शिफ्ट ड्यूटी रहती थी और जब रात की ड्यूटी रहती, तब ऋचा और उत्तम दोपहर को घर पर अकेले ही रहते थे क्योंकि ऋचा के कालेज का समय दोपहर के 1 बजे तक का ही था. इस एकांत ने उन के स्नेह में जरा सा परिवर्तन कर दिया था. अब वे एकदूसरे के परममित्र बन बैठे थे. सुबहशाम उत्तम ऋचा के आगेपीछे लगा रहता था. कभी उस के गोरे गालों पर चिकोटी काट लेता तो कभी उस की कमर में हाथ डाल कर उसे अपने अंक में भर लेता. जब भी उत्तम ऐसा करता, मेरे दिल पर जोर की चोट लगती. पहली बार मेरा माथा तब ठनका जब एक दोपहर सिरदर्द के कारण मैं जल्दी घर लौट आई थी और ऋचा को उस रोज अपने शयनकक्ष में सोया पाया. उस के बाद मेरे सिर में दर्द हुआ या नहीं, मुझे याद ही नहीं, क्योंकि जब कहीं गहरी चोट लगती है तब पहले वाली चोट की पीड़ा अपेक्षाकृत कम हो जाती है और यही मेरे साथ भी हुआ.

तब से मन में यही संशय भरा हुआ था कि कहीं सौतेले पिता और पुत्री के बीच कुछ अनैतिक तो नहीं? तब से मैं ने उन दोनों के व्यवहार पर अपनी तेजतर्रार नजरों से जासूसी शुरू कर दी और यही पाया कि वे एकांतप्रिय हो चले हैं. कुल 3 सदस्यों वाले छोटे से परिवार में भी उन्हें दखलंदाजी की बू आती थी. इसीलिए वे कभी छत पर तो कभी बगीचे के किसी कोने में दुबक जाते थे. कभी उन के बीच एक रहस्यमयी खामोशी तो कभी लोकलाज के सारे बंधनों को भूल कर वे एकदूसरे से आलिंगनबद्ध हो प्रेमालाप करते. उन के बीच मैं उपेक्षित थी, यह विचार मेरी आंखों को गीला किए जा रहा था. जी तो यही चाह रहा था कि खूब रोऊं, पर कार्यालय में मेरा रोना अशोभनीय कहलाता, इसीलिए अपनी भावनाओं को संयत करने का प्रयास किया. जब से मेरे मन में उत्तम और ऋचा को ले कर संशय जागा तब से मैं लगातार यह प्रयास कर रही थी कि ऋचा के लिए जल्दी ही योग्य लड़का तलाश लूं. सभी दोस्तों और रिश्तेदारों से मैं ने इस संबंध में बात की थी और सभी से यह आग्रह भी किया था कि ऋचा के लिए लड़का तलाशने में वे मेरी सहायता करें.

घड़ी पर ध्यान गया तो शाम के 5 बज गए थे. घर जाने का समय हो गया था. पर ‘घर’ शब्द से मुझे चिढ़ सी होने लगी थी. घर तो वह जगह होती है जहां हर कोने में स्नेह, विश्वास और त्याग की भावना भरी हुई हो. वह घर, जहां पलपल एक गोपनीयता का एहसास भरा हो, वहां जाने की इच्छा भला किसे होगी? पर जाना तो होगा ही, सोचते हुए मैं उठ खड़ी हुई. घर पहुंचने से पहले मैं ने निर्णय लिया कि ऋचा को अब घर पर नहीं रहने दूंगी और जब तक उस के लिए योग्य लड़का नहीं मिल जाता तब तक के लिए उस का दाखिला किसी लड़कियों के छात्रावास में करा दूंगी. इस के अलावा मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था. लेकिन मैं इस बात को ले कर भी चिंतित थी कि उत्तम को वजह क्या बताऊंगी. ऋचा को घर से दूर करने की बात पर वह जरूर नाराज हो जाएगा. हो सकता है, मुझ से लड़ भी पड़े.

घर पहुंची तो बरामदे में ही कुरतापाजामा पहने और शाल लपेटे बड़ी बेसब्री से चहलकदमी करता उत्तम नजर आया. उस को देखते ही मन में कड़वाहट सी भर गई. किस का इंतजार कर रहा है? यह जानने की उत्सुकता थोड़ीबहुत तो थी, पर पूछने की इच्छा ही नहीं हुई. मैं तेजी से शयनकक्ष में पहुंच कर निढाल सी बिस्तर पर गिर पड़ी और पता ही नहीं चला, कब आंख लग गई.

‘‘मृदुला, उठो न, सो क्यों रही हो?’’ मुझे झकझोरते हुए उत्तम ने उठा दिया.

‘‘थोड़ी देर सोना चाहती हूं, बड़ी थकान हो रही है,’’ मैं ने बेरुखी से अपनी बात कह दी और यह जतला दिया कि उस की बात मैं मानना नहीं चाहती.

‘‘मृदुला,’’ इस बार जरा सख्ती से उस ने मुझे खींच कर उठा दिया.

मैं अचकचाई सी उठ बैठी और उत्तम के इस अजीबोगरीब व्यवहार के कारण विस्मित सी उसे ताकती रह गई.

‘‘अभी तुम सो नहीं सकतीं. जल्दी से मुंहहाथ धो कर तैयार हो जाओ. नीचे मेहमान तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं.’’

‘‘कौन मेहमान?’’

‘‘हमारी ऋचा का भावी पति अपने मातापिता के साथ आया हुआ है.’’

‘‘क्या?’’ मैं आंखें फाड़े उत्तम को देखती रह गई, ‘‘तुम ने पहले क्यों नहीं बताया?’’

‘‘मैं तुम्हारा ही तो इंतजार कर रहा था. मैं और ऋचा मिल कर तुम्हें सरप्राइज देना चाहते थे, इसलिए तुम्हें पहले से नहीं बताया. इस लड़के को ऋचा ने स्वयं पसंद किया है. पिछले महीने जब उस ने मुझे यह बात बताई तब मैं ने निर्णय लिया कि अकेले ही पहले उस लड़के को परखूंगा और यदि वह हमारी बेटी के योग्य सिद्ध हुआ तो फिर तुम्हें बताऊंगा. ‘‘मैं पिछले 15 दिनों से इसी काम में लगा हुआ था. लड़का डाक्टर है. कई लोगों से मिल कर मैं ने पता लगाया और जब आश्वस्त हो गया तो आज उसे घर पर बुला लिया ताकि तुम उस से मिल कर बाकी की कार्यवाही करो.’’ मैं हैरानगी से उत्तम को देखती रह गई.

‘‘आज हम दोनों का इरादा तुम को सरप्राइज देने का था पर तुम इतनी थकीथकी सी लगीं कि पलभर के लिए तो हम भी परेशान हो गए. लड़के वाले शादी के लिए जल्दी कर रहे हैं. एक बार बेटी का बोझ सिर से उतर जाए, फिर मेरी जिंदगी में सिर्फ तुम ही तो रह जाओगी. ‘‘अभी शायद मेरा प्यार बंट गया है, इसलिए तुम्हारी तकलीफ को देख कर भी कुछ कर नहीं पा रहा था. पर कुछ दिनों बाद मेरी जिंदगी में तुम अकेली रह जाओगी, तब मैं तुम्हें कभी परेशान नहीं होने दूंगा. अच्छा, अब जल्दी से तैयार हो कर आ जाओ,’’ मेरे गालों को थपथपाता हुआ उत्तम बोला और बाहर निकल गया. ऋचा के प्रति उत्तम के निश्छल स्नेह को देख कर मेरा सिर शर्म से झुक गया. मैं सोचने लगी कि कितने गंदे हो गए थे मेरे विचार कि मुझे ‘सरप्राइज’ देने की उन की गुपचुप तैयारी में मुझे उन का आपत्तिजनक प्रेमालाप नजर आया. बहुत प्रयास किया कि अपनेआप को संभाल लूं पर रो ही पड़ी. जल्दी ही आंसुओं ने मन का सारा मैल धो डाला था.

अनुज और अपने परिवार से हमेशा के लिए दूर हो जाएगी अनुपमा! क्या रंग लाएगी मालती देवी की साजिश?

स्टार प्लस का सबसे पॉपुलर शो अनुपमा’ (Anupamaa) की टीआरपी लगातार बढ़ती जा रही है. लोगों के लिए ये शो टीवी का सबसे चहेता शो बना हुआ है.शो में आए दिन नए नए ट्विस्ट एंड टर्न्स देखने को मिलते रहते है. शो में अब की बात करें तो, इस समय दिखाया जा रहा है कि अनुज (गौरव खन्ना) को मालती देवी (अपरा मेहता) पर शक होता है जब वह उसे ‘यू आर दैट अनुज’ कहती है. हालांकि अनुपमा (रूपाली गांगुली) उसे बताती है कि हो सकता है कि उसने उसके बारे में पढ़ा हो.

इसके बाद दिखाया जाता है कि अनुज अनुपमा से कहता है कि वह उसे मिस करेगा. खैर, इस समय भीअनुज मालती देवी के बारे में सोचता रहता है, जबकि दूसरी तरफ वनराज काव्या की देखभाल करता दिखाई देता हैं, क्योंकि वह काव्या की गर्भावस्था की खबर सुनकर बहुत खुश है.

आगे ये देखना दिलचस्प होगा कि काव्या की प्रेग्नेंसी की खबर सुनकर लीला यानी बा खुश होंगी या नहीं?हालांकिइस बीच, नकुल अनुपमा से बदला लेने का फैसला करता है.

 

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आगे के ट्रैक में दिखाया जाता है कि मालती देवी (अपरा मेहता) अनुपमा को चेतावनी देती है कि उनका कॉन्टैक्ट खत्म कर दिया जाएगाऔर वह उसे बताती है कि कहीं भविष्य मेंअनुज उसकी कमजोरी न बन जाएं. आगे हम देख सकते हैं कि मालती अनुपमा को अपने परिवार से सारे संबंध तोड़ने के लिए उकसाती हैं. हो सकता है कि मालती ने अतीत में अपने सारे रिश्ते तोड़ दिए हों, इसलिए अब वह चाहती है कि अनुपमा भी ऐसा ही करे, लेकिन अनुपमा मालती जैसी नहीं है.वह हमेशा अपने रिश्तों, अपने करियर और अपने परिवार में संतुलन बनाए रखती है.

इसके बाद देखने को मिलता है कि मालती अनुपमा के लिए एक मायाजाल लाती हैं क्योंकि वह नहीं चाहतीं कि अनुज और अनुपमा फिर से मिलें. जैसा कि हम मालती की आँखों में देखते हैं, उनका अनुज के साथ कुछ संबंध हैलेकिन हो सकता है कि अपने करियर की वजह सेमालती अनुज को एक अनाथ आश्रम में छोड़दें. इसके अलावा वह ये भी चाहती हैं कि अनुपमा सब कुछ छोड़कर अमेरिका में बस जाएं और वहां जाकर अपनी एकेडमी संभालें. खैर, आने वाले ट्विस्ट को देखने के लिए हमें इंतजार करना होगा. अनुपमा अमेरिका जाएंगी या नहीं?

 

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अनुपमा के भविष्य ट्रैक मेंहमें देखने को मिलेगा कि अमेरिका जाने से पहले उसेयह पता चलेगा कि मालती अनुज की जैविक माँ है. इसके अलावा आगामी एपिसोड में वनराज का चरित्र सकारात्मक रूप से बदलवा देखने को मिलेगा. हो सकता है कि माया भी मान के प्यार को समझ ले और उससे पीछे हट जाए. खैर आने वाले ट्विस्ट और टर्न देखने के लिए इंतजार करते हैं. आगामी ट्रैक में हमे पता चलेगा कि क्या सच में बदल जाएगी माया? क्या अनुज अनुपमा को मालती देवी के जाल से बाहर निकाल पाएगा?

Summer spceial: गर्मियों में घर पर बनाएं, ये लो कैलोरी रेसिपीज

गर्मियों में दिन लंबे और गर्म होते हैं ऐसे में शाम होते होते भूख लगने लगती है. गर्मियों में चूंकि हमारी पाचन क्षमता बहुत कमजोर हो जाती है इसलिए आहार विशेषज्ञ इस मौसम में तले भुने की अपेक्षा हल्के फुल्के और पौष्टिक नाश्ते और भोजन करने की सलाह देते हैं ताकि हमारे शरीर को पर्याप्त पोषण भी मिले और स्वस्थ भी रहे. पोहा, उपमा, डोसा, इड्ली जैसे रूटीन के नाश्ते बनाकर यदि आप बोर हो गईं हैं तो आज हम आपके लिए लेकर आये हैं कुछ ऐसे हैल्दी नाश्ते जिन्हें आप घर में उपलब्ध सामग्री से बहुत आसानी से बना पाएंगी तो आइए देखते हैं कि इन्हें कैसे बनाया जाता है.

1.सोया ग्रेन्स उपमा

कितने लोगों के लिए –   4

बनने में लगने वाला समय  –  20 मिनट

मील टाइप –  वेज

सामग्री

  1. 1 कप अंकुरित मूंग                     
  2. 1 कप सोया ग्रेन्यूल्स                     
  3. 1/2 कप कॉर्न                                   
  4. 1/2 कप मटर                                   
  5. 1/2 कप मूंगफली दाना                         
  6. 100 ग्राम पनीर                                     
  7.  1 बारीक कटा प्याज                     
  8.  1 बारीक कटा टमाटर                   
  9. 4 बारीक कटी हरी मिर्च                   
  10. 1 टीस्पून बारीक कटी हरी धनिया   
  11.  1 टीस्पून  तेल       
  12. 1/4 टीस्पून जीरा                                       
  13. नमक  स्वादानुसार                                   
  14. 1/4 टीस्पून लाल मिर्च पाउडर                       
  15. 1/4 टीस्पून अमचूर पाउडर                           
  16. 1/4 टीस्पून गरम मसाला पाउडर                     
  17. 1/4 टीस्पून चाट मसाला                                 

विधि

सोया ग्रेन्यूल्स को आधे घण्टे के लिए गर्म पानी में भिगोकर हथेली से दबाकर निचोड़ लें और बारीक बारीक काट लें. अंकुरित मूंग, मटर, कॉर्न, मूँगफली दाना, कटे सोया ग्रेन्यूल्स और 1/2 चम्मच नमक प्रेशर कुकर में डालें. आधा कप पानी डालकर तेज आंच पर 1 सीटी ले लें. अब एक पैन में तेल गर्म करके जीरा, प्याज और हरी मिर्च भूनकर कटे टमाटर और सभी मसाले डाल दें. पनीर को छोटे छोटे टुकड़ों में काट लें. जब टमाटर अच्छी तरह गल जाएं तो उबले अनाज डाल दें. पनीर तथा चाट मसाला डालकर अच्छी तरह चलाएं. 2-3 मिनट पकाकर हरा धनिया डाल दें. चाय कॉफी के साथ सर्व करें.

2. स्पाइसी सूजी सर्कल्स

सामग्री

  1.  4 ब्रेड स्लाइस                             
  2. 1 कप सूजी                                     
  3. 1/2 कप दही                                         
  4. 1/4 कप पानी                                       
  5.  2 उबले मैश किये आलू                               
  6. 2 हरी मिर्च                                     
  7. 1 टीस्पून बारीक कटा हरा धनिया             
  8. 1 टीस्पून तेल                                         
  9. 1/4 टीस्पून जीरा                                       
  10. 1/4 टीस्पून अमचूर पाउडर                           
  11. 1/4 टीस्पून लाल मिर्च पाउडर                       
  12. नमक  स्वादानुसार                                     
  13. 1 टीस्पून बटर                                         
  14. 1 टीस्पून हरी चटनी                       
  15. 1 टीस्पून इमली की लाल चटनी                     

विधि

सूजी को दही और पानी के साथ भिगोकर ढककर 15 मिनट के लिए रख दें ताकि सूजी फूल जाए. अब तेल में जीरा, हरी मिर्च व सभी मसाले डालकर आलू डालकर अच्छी तरह चलाएं. हरी धनिया डालकर फिलिंग तैयार कर लें. अब ब्रेड स्लाइस को गोल कटोरी से काटकर बटर लगाएं फिर हरी चटनी लगाकर आलू के मिश्रण की पतली परत फैलाएं, इसके ऊपर इमली की लाल चटनी की परत लगाएं इसी प्रकार सारे सर्कल्स तैयार कर लें. अब एक नॉनस्टिक पैन में बटर लगाकर तैयार सर्कल्स को ब्रेड की तरफ से तवे पर रखें. सूजी में थोड़ा सा नमक डालकर चलाएं और तैयार मिश्रण को ब्रेड के ऊपर लगे आलू की परत के ऊपर इस तरह से फैलाएं की पूरा सर्कल कवर हो जाएं. इसे ढककर 3-4 मिनट पकाएं. घी लगाकर पलटकर दोनों तरफ से सुनहरा होने तक पकाएं. बीच से काटकर हरी चटनी या टोमेटो सॉस के साथ सर्व करें.

5 Fitness tips: फिट रहना हर मौसम में जरुरी

फिटनेस पर ध्यान देना हमेशा जरुरी है और ये हर उम्र के व्यक्ति में होने की जरुरत है, कोविड के बाद से लोगों में फिटनेस को लेकर काफी जागरुकता बढ़ी है. फिटनेस ट्रेनर ‘महेश म्हात्रे’ कहते है कि अभी जिम में जाना लोग अधिक पसंद करते है, कोविड की लॉकडाउन वजह से पर्सनल ट्रेनर को हायर करना लोगों ने बंद कर दिया है. अब वे बड़े-बड़े जिम, लोकल जिम या फिटनेस क्लब में जाते है.

सप्लीमेंट लेना भी लोगों ने कम किया है, इसकी वजह आजकल अधिकतर लोगों में कार्डिएक अरेस्ट का खबरों में आना है. असल में लॉकडाउन से लोगों की एक्टिविटी में कमी आई है, डाइट सही नहीं है, क्योंकि घर पर रहकर लोगों ने  खाया अधिक और फिजिकल एक्टिविटीज कम किया.

इसके आगे ट्रेनर ‘महेश म्हात्रे’ कहते है कि जिम जाना अच्छी बात है, लेकिन वहां पर रखे वजन को कितना पकड़ना है, कैसे पकड़ना है, आदि की जानकारी होना जरुरत है. डम्बल को कैसे और किस एंगल में पकड़ना है, साँस कैसे लेनी या कैसे छोडनी है आदि की जानकारी होनी चाहिए, क्योंकि व्यायाम से शरीर में पम्पिंग होती है, इससे मसल्स बनते है. इसके अलावा सही समय में पानी पीना, रेस्ट करना आदि सब देखना पड़ता है. कुछ लोग किसी का सुनकर जिम चले जाते है और अपनी पैक बनाने की कोशिश करते है, लेकिन इसमें सबसे महत्वपूर्ण, सही डाइट और एक्सरसाइज होता है, इससे ही मसल्स बनते है.

इसके अलावा व्यक्ति की लाइफस्टाइल भी बहुत महत्वपूर्ण होती है, एक व्यक्ति एसी में बैठकर काम करता है और व्यायाम करता है. जबकि दूसरा दिनभर मेहनत से काम करने के बाद एक्सरसाइज करता है. जिम जाने के बाद वेट उठाना भी जरुरी होता है. मैंने इन सब चीजों की कोर्स और ट्रेनिंग ली है. मेरे पास कुछ क्लाइंट है, जिनका मैं पर्सनल ट्रेनर हूँ. इसमें अधिकतर महिलाएं है, इसके अलावा मैंने कई मराठी इंडस्ट्री के सेलेब्रिटी का भी फिटनेस ट्रेनर रह चुका हूँ. परुलेकर्स और बोवलेकर  दो जिम में मैं काम करता हूँ. नियमित फिटनेस के लिए जिम सही है, लेकिन बॉडी बिल्डिंग स्पोर्ट्स के लिए या मसल्स पाने के लिए लोकल जिम सबसे सही होता है. वहां पर वेट अलग होता है. नामचीन जिम में बॉडी बिल्डर तैयार नहीं हो पाता, वहां पर फिटनेस और सीधी-साधी बॉडी मिल सकती है, थोड़े हाई-फाई फील होता है, क्योंकि अधिक उपकरण , एसी और लाइट बहुत होता है.

1.हो जाती है हाथापाई

अभिनेता अक्षय कुमार जैसी फिट बॉडी जिसमे ड्रेस फिट बैठे, पेट पर थोड़ी एब्स दिखे और व्यक्ति स्मार्ट दिखे आदि के लिए एक इंस्ट्रक्टर की आवश्यकता होती है. इंस्ट्रक्टर की फीस लगभग 10 से 15 हज़ार तक होती है. सप्लीमेंट से केवल व्यक्ति को थोडा पुश मिलता है. असल में फिटनेस पूरी तरह से ‘माइंड गेम’ है. इसमें सप्लीमेंट से अधिक, साथ में डाइट होता है और  उसका रिजल्ट भी देखने को मिलता है. जो नैचुरल डाइट व्यक्ति लेता है, वही उसके फिटनेस को बनाए रखता है. कई बार सप्लीमेंट के साइड इफ़ेक्ट भी होते है मसलन सप्लीमेंट से किसी-किसी में सिरदर्द या चिडचिडापन की शिकायत हो सकती है, जिससे जिम में मारपीट तक हो जाया करती है. इसलिए जितना संभव हो नैचुरल डाइट पर ही व्यक्ति को निर्भर होना सही होता है.

2.अलग-अलग शरीर की अलग जरूरतें  

महेश कहते है कि एक साधारण व्यक्ति की कैलरी की नाप उसकी वेट और एज के हिसाब से निर्भर करता है. 30 से 40 तक के उम्र के व्यक्ति का 60 किलोग्राम से अधिक वजन होना ठीक नहीं, लेकिन इसमें उसकी हाइट भी देखना जरुरी होता है.

3.काम के हिसाब से चुने इंस्ट्रक्टर

पिछले दिनों कई सेलेब्स जिम करते वक़्त कार्डिएक अरेस्ट में मारे गए, इसकी वजह के बारें में पूछने पर महेश कहते है कि हमेशा सही बॉडी के लिए एक इंस्ट्रक्टर का होना आवशयक है, जिसे गुरु कहा जा सकता है. खासकर अगर व्यक्ति का काम काफी स्ट्रेस और मेहनत वाला है, तो इंस्ट्रक्टर उसे सही मात्रा में व्यायाम करने के तरीके बता सकता है.

4.सही डाइट सही व्यायाम

डाइट एक्सरसाइज का सबसे बड़ा पार्ट होता है. किसी भी व्यक्ति को मौसम के हिसाब से पाए जाने वाले फल और सब्जियां खाने की जरुरत होती है, अभी गर्मी में रस वाले फल जैसे संतरा, तरबूज, खरबूजा, मोसंबी, नारियल पानी, नीबू पानी आदि अपने बजट के हिसाब से ले सकते है, ताकि शरीर में पानी की कमी न हो. इसके अलावा सुबह में ब्रेकफास्ट अच्छा और हैवी लेना चाहिए, क्योंकि व्यक्ति पूरे दिन एक्टिव रहता है, दोपहर को थोडा कम बाजरी, नाचनी, आदि की दो रोटी, सब्जी, अंडा या केला आदि काफी होते है. 2 घंटे बाद थोड़ी ड्राईफ्रूट्स लिया जा सकता है. ड्राई फ्रूट्स दिन में 3 बार थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लें. सुबह 10 बजे, दोपहर 2 बजे और शाम को 6 बजे तक. 6 से 6.30 के बीच रात का भोजन ले लेना चाहिये. शाम के बाद बॉडी की एक्टिविटी कम हो जाती है. इसलिए भोजन भी उसी हिसाब से लें.

कभी भी वजन को जल्दी घटाने की कोशिश न करें, इसका प्रभाव डायरेक्टली और इनडायरेक्टली शरीर पर पड़ता है. दो से 3 किलोग्राम तक का वजन महीने में कम करना सही होता है. इसके अलावा चलना, तैरना, साइकलिंग करना आदि से भी शरीर फिट रहता है, आधे घंटे से 45 मिनट तक चलना हमेशा अच्छा होता है, सिंपल वाक सबके लिए सही होता है.

5.कुछ सावधानियां

महेश कहते है कि सही तरह से व्यायाम न करने पर शरीर में दर्द होता है, जिससे कई लोग डर कर जिम छोड़ देते है. व्यायाम से पहले स्ट्रेचिंग करना बहुत जरुरी होता है. इसके अलावा 16 साल की उम्र में वजन कभी न उठाये, पहले मसल्स को ओपन करने के बाद ही वजन, इंस्ट्रक्टर के अनुसार उठाएं. नहीं तो मसल्स में चोट लगने के अलावा हाइट में कमी आती है. वैसे तो हर मौसम में फिट रहना जरुरी है, लेकिन गर्मी का महिना अधिक गर्म होने से हर व्यक्ति को अधिक असहजता होती है, इसलिए इस मौसम में सेहत को फिट रखने के कुछ टिप्स इस प्रकार है,

  • गर्मी के मौसम में नींबू पानी, नारियल पानी, दही और छाछ का सेवन अच्छी मात्रा में करें,
  • बहुत ज्यादा ठंडे पेय पदार्थ पीने से बचें,
  • चाट-पकौड़ी या अन्य तेल व मसालेदार खाद्य पदार्थ खाने से बचें,
  • कैफीन युक्त चीजें और सॉफ्ट ड्रिंक्स का सेवन कम-से-कम करें,
  • घर में हर समय ग्लूकोज, इलेक्ट्रॉल के अलावा पुदीना, आम पना अवश्य रखें,
  • मीठा खाने कीइच्छा हो, तो बाजार की मिठाइयों के बजाय सेब, आंवले या बेल का मुरब्बा, गुलकंद या पेठा खाएं.
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