धर्म के आगे चौपट होती शिक्षा

देश में मंदिरों और राजनीति के उद्योग के अलावा अगर कोई उद्योगधंधा फूलफल रहा है तो वह पढ़ाई का. केंद्र व राज्य सरकारों ने पिछले 30-40 सालों में ऊंची जातियों के साथ मिल कर मुफ्त अच्छी सरकारी पढ़ाई को ऐसा चौपट किया है कि आज हर घर की बड़ी आमदनी घर, खाने, कपड़ों, इलाज, सैरसपाटे पर नहीं जाती, इन 3 मदों- मंदिरों, राजनीति और पढ़ाई में जाती है.

मंदिर हर कोने में बन रहे हैं और पैसा पा रहे हैं. पुलिस वाले, सरकारी अफसर हर समय नोटिस या बुलडोजर लिए खड़े हैं. हर कोने में प्राइवेट इंग्लिश मीडियम से टाई लगाए महंगी फीस दे कर अधकचरे लड़केलड़कियां खड़े हैं जो कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे प्राइवेट ऐजुकेशनल इंस्टिट्यूटों में पढ़े हैं. उन का नारा है- आओ, आओ डिगरी ले जाओ, तुरंत डिगरी लो. पढ़ो या न पढ़ो पर हमारी भव्य बिल्डिंग देखो, बाग देखो, बसें देखो, स्वीमिंग पूल देखो और डिगरी ले जाओ.

धर्म के धंधे की तरह इस सरकारी संरक्षण पाए प्राइवेट स्कूलिंग और बिलकुल नियंत्रण बिना चल रहा कोचिंग का धंधा 200 अरब रुपए से कम का नहीं है. किताबों, आनेजाने, कंप्यूटरों और फिर वहां फास्ट फूड जोमैटों का खर्च अलग.

कम से कम आधे ग्रैजुएटों की डिगरी बेकार है, बच्चों के मांबापों को समझाते हैं और वे हिचकिचाते हैं कि अपने बच्चों को इतने महंगे स्कूलों, विश्वविद्यालयों में भेजें या नहीं. अब ये लोग भारी पैसा प्रचार पर खर्चते हैं. सड़कों पर होर्डिंग लगते हैं, अखबारों के पहले पेज लिए जाते हैं, कंसल्टैंटों को मोटी रकम दी जा रही है, स्टूडैंट्स का डाटा तैयार हो रहा है, जो महंगे में बिकता है. सब बेकार की डिगरी देने के लिए.

आधे से तीनचौथाई ग्रैजुएट, इंजीनियर, डाक्टर, एमबीए, विशेषज्ञ अपने सब्जैक्ट की एबीसी नहीं जानते. हां, कुछ अंगरेजी बोल लेते हैं, बढि़या कपड़े पहन लेते हैं, स्कूटी, कार ड्राइव कर लेते हैं. स्टारबक और जोमैटो पर और्डर करना जानते हैं. उस के बाद बेकार मांबाप के पैसे पर आश्रित रहते हैं. लाखों तो यही सोच रहे हैं कि मांबाप के पुराने मकान को बेच कर जो पैसा मिलेगा उस से या तो विदेश चले जाएंगे या फिर देश में ही मौज की जिंदगी जी लेंगे.

हजारों कोचिंग दुकानों और किसी विश्वविद्यालय से जुड़े कालेज या इंस्टिट्यूट की नियमित फैकल्टी नहीं है. एक ही प्रोफैसर 4-4, 5-5 इंस्टिट्यूटों के रोल पर रहता है यानी सप्ताह में 1 दिन आ कर नाम दे कर खानापूर्ति करता है. स्टूडैंट्स को यह पता है क्योेंकि वे तो मौज करने आए हैं और क्लास का न होना पर डिगरी का मिल जाना ही तो उन्हें चाहिए. वे अपना समय आराम से बिता सकते हैं.

जिन्होंने ऐजुकेशन लोन ले रखा है उन्हें भी चिंता नहीं होती क्योंकि गारंटर मांबाप होते हैं जो बैंक का लोन न चुका पाने पर अपने जेवर बेच कर, घर बेच कर चुका देंगे. यह कोई अमेरिका थोड़े ही है जहां राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अरबों डौलर के स्टूडैंट फंड माफ कर दिए. हमारी फक्कड़ सरकार को तो मंदिरों और बुलडोजरों से फुरसत हो तो पढ़ाई पर ध्यान दे.

और झूठों की तरह भाजपा के प्रधानमंत्री ने लाखों नौकरियों को पैदा करने का  झूठ सैकड़ों बार बोला है. 2024 तक चमत्कार की तरह हरेक को घर बैठे अगर नौकरी नहीं मिली तो भी चुनाव जीतने के लिए हिंदूमुसलिम विवाद काफी है.  20-25 हजार रुपये महीने की मासिक इनकम वाले परिवार इन वादों के बल पर 2-2, 3-3 लाख की फीस पहले ही दिन भरते हैं और फिर बाकी साल इस उम्मीद पर जीते हैं कि बच्चे पढ़ कर कमा कर मांबाप का घर भरेंगे. उन्हें क्या मालूम कि इन प्राइवेट स्कूलों, कोचिंग क्लासों और यूनिवर्सिटीज में तो मौजमस्ती, शराब, सैक्स, ड्रग्स की पढ़ाई हो रही है.
सरकार को यह भाता है क्योंकि यही लड़के भगवा पट्टी बांधे हिंदूहिंदू के नारे लगाते हैं और बची शक्ति मंदिरों को देते हैं.

मेंटल डिस्टरबेंस को बढ़ा रहा सोशल मीडिया : भ्रमजाल या मायाजाल

एक दिन सुबहसवेरे मैसेज आया, जिसे देख कर हैरान रह गया और सोच में पड़ गया इन दो शब्दों को ले कर. वे शब्द थे ‘हैप्पी एनिवर्सरी’. उस के आगे लिखा था, ‘तुम मेरी जिंदगी हो…’

भले ही ये शब्द कहने में आसान लगे हों, लेकिन बहुत बोझ से लगे. हैं न…

यह पढ़ते ही पुराने दिनों की यादों में खो गया.

कुछ साल पहले तक ये युगल तनाव भरे माहौल में अपने रिश्ते को बखूबी निभा रहे थे. वैसे, इन का रिश्ता टूटने के कगार पर आ पहुंचा था.

मैसेज पढ़ते ही तुरंत फोन किया और शादी की सालगिरह की बधाई दी. झिझकते हुए उस से उस के पति से बात कराने का अनुरोध किया.

उस समय उस का पति उस के पास ही बैठा था. बातचीत के दौरान सोशल मीडिया पर अपनी भेजी गई तमाम पोस्ट को बड़े ही गर्व से कह रहा था, तभी  यह बातचीत अचानक ही खत्म हो गई.

उस का पति यह जताने में कामयाब हो गया कि इंटरनेट के इस जुनूनी युग वह कहां है. उस शख्स का ऐसा कहना था कि फोन करना और मिलनाजुलना अब पुरानी बातें हो गई हैं. अब केवल औनलाइन के जरीए बात करने में वह काफी सहज है.

सोशल मीडिया के माध्यम से उस महिला ने अपनी भावनाओं को व्यक्त किया. हालांकि उस का पति उस के बगल में बैठ कर सारी बातें भलीभांति सुन रहा था. ऐसा लगा कि शायद अब उन युगल का रिश्ता पहले से ज्यादा मजबूत हुआ है. ऐसा हो भी क्यों न, जब बाहरी दुनिया ने सोशल मीडिया पर शेयर की गई पोस्ट पर लाइक्स की  ज्यादा संख्या से इस की रजामंदी दे दी थी.

बाद में जब अलगअलग जगहों से पता चला कि दंपती के बीच अभी भी सबकुछ ठीक नहीं है यानी तनाव में जी रहे हैं. भले ही वे एक छत के नीचे जरूर हैं, लेकिन अभी भी अलगअलग रह रहे हैं.

सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर निजी जिंदगी को बढ़ाचढ़ा कर पेश करना एक नया ट्रेंड बन गया है, जो वास्तविक और आभासी दुनिया के बीच की खाई को चौड़ा कर रहा है यानी चकाचौंध भरी दुनिया में जीने को विवश कर रहा है, आदी बना रहा है.

आभासी दुनिया में हमारे वजूद के फैलाव ने हमें अपने चारों ओर झूठ का एक ऐसा जाल बुनने के लिए मजबूर किया है, जो वास्तविक दुनिया के साथसाथ भौतिक संपर्क किए जाने पर एक खुला रहस्य बन सकता है और झूठ का महल कभी भी टूट कर बिखर सकता है.

बेशक, सोशल मीडिया पर टूटे रिश्ते और शादियां नए सिरे से दोहराई जा रही हैं, लेकिन यह उन लोगों के लिए टूटे रिश्तों की भावना पैदा करने की कीमत पर किया जा रहा है.

वे दिन गए, जब किसी भी उत्सव को निजी तौर पर पास जा कर, खुशी के पल में शामिल हो कर या एक फोन कर के खुशियों को व्यक्तिगत स्पर्श दिया जाता था. जहां सहानुभूति का एक शब्द जो व्यक्तिगत रूप से व्यक्त किया गया, शोक में डूबे परिवार को अतिरिक्त साहस दे सकता है, आज वहां इंटरनेट के माध्यम से इंस्टेंट मैसेजिंग सर्विस के जरीए संवेदनाओं को पेश किया जाता है.

केवल रिश्ते ही नहीं, बल्कि पारिवारिक यात्राएं भी स्पर्श बिंदुओं को प्रदर्शित करने के लिए की जाती हैं, न कि उन्हें जीवंत करने के लिए. एक विदेशी दौरा केवल फोटो क्लिक करने के लिए लिया जाता है और इसे उन लोगों के लिए प्रलोभन के रूप में शेयर किया जाता है, जो हमेशा घटना के लिए अपनी पसंद दर्ज करने के इच्छुक होते हैं.

ऐसे व्यक्ति के लिए सोशल मीडिया पर ज्यादा लाइक्स मिलने के बाद खुशी और यात्रा के मूल्य को सही ठहराती है.

एक ऐसे देश के नागरिक होने के नाते जो अपने मजबूत धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के लिए जाना जाता है, यह अनिवार्य है कि हम मूल प्रणाली में किसी भी विकृति यानी नकारात्मकता से प्रभावित होने वाले आखिरी व्यक्ति होंगे, लेकिन यह तभी हो सकता है, जब हम अपने मूल सिद्धांतों पर टिके रहें, जो सच पर आधारित है.

सोशल मीडिया भ्रमजाल है, मायाजाल है, इस के चंगुल से छूट कर अपने दोस्तों, रिश्तेदारों, प्रियजनों से खुल कर मिलिए, उन्हें बुलाइए, खुशियां बांटिए. जो आप से जुड़े हैं, उन की मौजूदगी का गर्मजोशी से स्वागत करते हुए मजा लें.

थोड़ा वक्त लगेगा संभलने में, डरें नहीं, लेकिन यही भाव हमें सच्चे दोस्त बनाने में मदद करेगा और हमारे सामाजिक तानेबाने को मजबूती देगा, जो वक्त की जरूरत है.

इस तरह सजाएं डाइनिंग टेबल

आज मुझे अपनी फ्रैंड कुसुम के यहां डिनर पार्टी में जाना है और मैं बहुत ज्यादा खुश हूं क्योंकि इस बहाने सभी दोस्तों से मुलाकात होने जा रही है वरना तो इतनी भागमभाग वाली लाइफ में दोस्तों से मिलने की फुरसत ही कहां मिलती है. मैं उत्साहित इसलिए भी हूं क्योंकि कुसुम इंटीरियर डिजाइनर है और हमेशा उस की सजावट देखने और तारीफ के काबिल होती है.

आइए, जानते हैं कि कुसुम ने किस तरह सजाई थी डिनर पार्टी के लिए खाने की टेबल ताकि जब आप भी अपने दोस्तों को डिनर पर बुलाएं तो सभी कह उठेंगे कि वाह क्या टेबल सजाई है.

खाने की टेबल साफसुथरी तो होनी ही चाहिए, लेकिन आजकल इस की सुंदरता को भी महत्ता दी जाती है, इसलिए कुछ इस तरह सजाएं खाने की टेबल को:

1.सजाएं छोटेछोटे पौधों या फूलों से

अकसर लोग सजाने के लिए आर्टिफिशियल यानी प्राकृतिक फूलों का उपयोग करते हैं, लेकिन यदि आप इन की जगह खुशबू वाले रंगबिरंगे प्राकृतिक फूलों जैसे रंगबिरंगे सेवनवंती, गुलाब, सफेद एवं नारंगी फूलों का इस्तेमाल करेंगी तो आप की टेबल की सुंदरता में चार चांद लग जाएंगे. साथ ही यदि आप जड़ीबूटियों और मसालों से संबंधित छोटेछोटे पौधों से सजाएंगी तो आप की खाने की टेबल मसालों की खुशबू से भी महक उठेगी. यह एक नया तरीका होगा.

2.कैंडल से सजाएं

टेबल के बीच लगाएं फ्रैगरैंस वाली कैंडल ताकि खाने की टेबल ग्लो करे और दोस्तों संग कैंडल लाइट डिनर का मजा ले सकें.

3.लाइट्स का इस्तेमाल

खाने की टेबल के ऊपर एक लैंप लगाएं. उस से टेबल की खूबसूरती और भी बढ़ जाए और टेबल के चारों ओर एक सी लाइट रहे, लेकिन टेबल के ऊपर लाइट लगाते समय इस बात का ध्यान रखें कि लाइट सीधी आंखों पर न आए और बहुत ज्यादा ब्राइट न हो.

4.अलगअलग तरीके से सजाएं

हर बार खाने की टेबल को अलगअलग तरीके से सजाएं क्योंकि हर बार एक तरह से सजावट से बोर हो जाते हैं इसलिए यदि टेबल की सजावट मौसम के अनुकूल, किसी थीम पर आधारित, पारंपरिक चीजों के अनुसार हो तो और बेहतर होगा.

5.पर्सनालाइज्ड सजावट

यदि आप ने किसी खास मेहमान या दोस्त को बुलाया है और आप उसे स्पैशल फील कराना चाहती हैं तो आप उस की पसंद के अनुसार भी टेबल की सजावट कर सकती हैं ताकि वह खुश हो जाए.

6.बहुत ज्यादा सामान से न सजाएं

खाने की टेबल को बहुत ज्यादा सामान से न सजाएं क्योंकि खाने के बरतन रखने के बाद टेबल कंजस्टेड हो जाती है और फिर साफसुथरी नहीं लगती है. इसलिए टेबल पर उतना ही सामान रखें जितना उस की सुंदरता न बिगाड़े.

गर्मी के मौसम में मुझे बहुत पसीना आता है, ऐसे में क्या करूं?

सवाल

गरमियों में मुझे बहुत पसीना आता है और मेरे बाल गिर रहे हैं. मैं अपने बालों को हैल्दी कैसे बनाऊं कोई उपाय बताएं?

जवाब

गरमियों में पसीने से बालों में इन्फैक्शन और डैंड्रफ होने का खतरा रहता है. सफाई न रखने से बालों का गिरना भी शुरू हो जाता है. सब से इंपौर्टैंट है कि आप बालों को साफ रखें. 1 या 2 दिन बाद जब जरूरत हो बालों को जरूर धो लें. बालों को हैल्दी रखने के लिए नियमित मसाज करना जरूरी है. मसाज के लए हेयर टौनिक या हेयर औयल का इस्तेमाल किया जा सकता है.

अगर बाल रूखे हैं तो नरिश करने के लिए और्गन औयल का इस्तेमाल अच्छा रहता है. यह तेल बालों को मजबूत व शाइनी भी बनाता है. प्रोटीन के खाने में प्रोटीन की मात्रा अच्छी बना कर रखना जरूरी है. अंकुरित दालें, दूध, दही, अंडा, मछली, सोयाबीन या चिकन प्रोटीन के बहुत अच्छे सोर्स हैं. इन्हें अपने खाने में शामिल करें.

सप्ताह में 1 बार होममेड पैक का इस्तेमाल करना अच्छा रहता है. इस के लिए रीठा, आंवला शिकाकाई ऐंड मेथीदाना को रात को पानी में भिगो दें और सुबह पीस लें. इस में ऐलोवेरा जैल व अंडा मिला लें और पैक की तरह इस्तेमाल करें.

ये भी पढ़े…

सवाल

मेरी आंखों के आसपास फाइनलाइंस और रिंकल्स दिखने लग गए हैं. मुझे कौन सी ऐंटीऐजिंग क्रीम लगानी चाहिए जिस से कि मैं यंग नजर आऊं?

जवाब

फाइनलाइंस कम करने के लिए आप को कोलोजन क्रीम यूज करने से धीरेधीरे आप की फाइनलाइंस कम होने लग जाएंगी. आप चाहें तो 1 चम्मच औलिव औयल या आमंड औयल में 5 बूंदें औरेंज औयल की डालें और इस से अपनी आंखों के आसपास रोज धीरेधीरे मसाज करें. अपनी डाइट में दूध, दही, खट्टे फल, हरी सब्जियां और अंकुरित दालें जरूर शामिल करें.

खाने में ज्यादा से ज्यादा कलरफुल वैजिटेबल भी शामिल करें क्योंकि कलरफुल फूड्स में ऐंटीऔक्सीडैंट्स होते हैं जो ऐजिंग के साइन्स को कम करते हैं. इस के अलावा 10-12 गिलास पानी जरूर पीएं.

अगर इस सब से फर्क न पड़े तो किसी कौस्मैटिक क्लीनिक में जा कर लेजर ट्रीटमैंट लेने से काफी फर्क पड़ता है.

वैसे अंडर आईज रिंकल्स के लिए कैमिकल पीलिंग भी कराई जा सकती है. फाइनलाइंस को कम करने के लिए बोटोक्स ट्रीटमैंट बहुत कारगर है. आप चाहें तो पीआरपी ट्रीटमैंट से भी फाइनलाइंस को कम करा सकती हैं.

 -समस्याओं के समाधान

ऐल्प्स ब्यूटी क्लीनिक की फाउंडर डाइरैक्टर डा. भारती तनेजा द्वारा

पाठक अपनी समस्याएं इस पते पर भेजें : गृहशोभाई-8रानी झांसी मार्गनई दिल्ली-110055.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या 9650966493 पर भेजें.

सुंदर माझे घर: भाग 1- दीपेश ने कैसे दी पत्नी को श्रद्धांजलि

नीरा को प्रकृति से अत्यंत प्रेम था. यही कारण था कि जब दीपेश ने मकान बनाने का निर्णय लिया तो उस ने साफ शब्दों में कह दिया कि वह फ्लैट नहीं, अपना स्वतंत्र घर चाहती है जिसे वह अपनी इच्छानुसार, वास्तुशास्त्र के नियमों के मुताबिक, बनवा सके. उस में छोटा सा बगीचा हो, तरहतरह के फूल हों. यदि संभव हो तो फल और सब्जियां भी लगाई जा सकें.

यद्यपि दीपेश को वास्तुशास्त्र में विश्वास नहीं था किंतु नीरा का वास्तुशास्त्र में घोर विश्वास था. उस का कहना था कि यदि इस में कोई सचाई न होती तो क्यों बड़ेबड़े लोग अपने घर और दफ्तर को बनवाने में वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन करते या कमी होने पर अच्छेभले घर में तोड़फोड़ कराते.

अपने कथन की सत्यता सिद्ध करने के लिए नीरा ने विभिन्न अखबारों की कतरनें ला कर उस के सामने रख दी थीं तथा इसी के साथ वास्तुशास्त्र पर लिखी एक पुस्तक को पढ़ कर सुनाने लगी. उस में लिखा था कि भारत में स्थित तिरुपति बालाजी का मंदिर शतप्रतिशत वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन करते हुए बनाया गया है. तभी उसे इतनी प्रसिद्धि मिली है तथा चढ़ावे के द्वारा वहां जितनी आय होती है उतनी शायद किसी अन्य मंदिर में नहीं होती.

हमारा संपूर्ण ब्रह्मांड पंचतत्त्वों से बना है. जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि तथा आकाश के द्वारा हमारा शरीर कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन तथा चरबी जैसे आंतरिक शक्तिवर्धक तत्त्व तथा गरमी, प्रकाश, वायु तथा ध्वनि द्वारा बाहरी शक्ति प्राप्त करता है परंतु जब इन तत्त्वों की समरसता बाधायुक्त हो जाए तो हमारी शक्तियां क्षीण हो जाती हैं. मन की शांति भंग होने के कारण खिंचाव, तनाव तथा अस्वस्थता बढ़ जाती है. तब हमें अपनी आंतरिक और बाहरी शक्तियों को एकाग्र हो कर निर्देशित करना पड़ता है ताकि इन में संतुलन स्थापित हो कर शरीर में स्वस्थता तथा प्रसन्नता और सफलता प्राप्त हो. इन 5 तत्त्वों का संतुलन ही वास्तुशास्त्र है.

दीपेश ने देखा कि नीरा एक पैराग्राफ कहीं से पढ़ रही थी तथा दूसरा कहीं से. जगहजगह उस ने निशान लगा रखे थे. वह आगे और पढ़ना चाह रही थी कि उन्होंने यह कह कर उसे रोक दिया कि घर तुम्हारा है, जैसे चाहे बनवाओ. लेकिन खुद घर बनवाने में काफी परिश्रम एवं धन की जरूरत होगी जबकि उतना ही बड़ा फ्लैट किसी अच्छी कालोनी में उतने ही पैसों में मिल जाएगा.

‘आप श्रम की चिंता मत करो. वह सब मैं कर लूंगी. हां, धन का प्रबंध अवश्य आप को करना है. वैसे, मैं बजट के अंदर ही काम पूरा कराने का प्रयत्न करूंगी, फिर यह भी कोई जरूरी नहीं है कि एकसाथ ही पूरा काम हो, बाद में भी सुविधानुसार दूसरे काम करवाए जा सकते हैं. अब आप ही बताओ, भला फ्लैट में इन सब नियमों का पालन कैसे हो सकता है. सो, मैं छोटा ही सही, लेकिन स्वतंत्र मकान चाहती हूं,’ दीपेश की सहमति पा कर वह गद्गद स्वर में कह उठी थी.

दीपेश ने नीरा की इच्छानुसार प्लौट खरीदा तथा मुहूर्त देख कर मकान बनाने का काम शुरू करवा दिया. मकान का डिजाइन नीरा ने वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन करते हुए अपनी वास्तुकार मित्र से बनवाया था. प्लौट छोटा था, इसलिए सब की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए डुप्लैक्स मकान का निर्माण करवाने की योजना थी. निरीक्षण के लिए उस के साथ कभीकभी दीपेश भी आ जाते थे.

तभी एक दिन सूर्य को डूबते देख कर नीरा भावविभोर हो कर कह उठी थी, ‘लोग तो सूर्यास्त देखने पता नहीं कहांकहां जाते हैं. देखो, कितना मनोहारी दृश्य है. हम यहां एक बरामदा अवश्य निकलवाएंगे जिस से चाय की चुस्कियों के साथ प्रकृति के इस मनोहारी स्वरूप का भी आनंद ले सकें.’

उस समय दीपेश को भी नीरा का स्वतंत्र बंगले का सु झाव अच्छा लगा था.नीरा की सालभर की मेहनत के बाद जब मकान बन कर तैयार हुआ तब सब बेहद खुश थे, खासतौर से, नितिन और रीना. उन को अलगअलग कमरे मिल रहे थे. कहां पर अपना पलंग रखेंगे, कहां उन की पढ़ने की मेज रखी जाएगी, सामान शिफ्ट करने से पहले ही उन की योजना बन गई थी.

अलग से पूजाघर,  दक्षिणपूर्व की ओर रसोईघर तथा अपना बैडरूम दक्षिण दिशा में बनवाया था क्योंकि उस के अनुसार पूर्व दिशा की ओर मुंह कर के पूजा करने में मन को शांति मिलती है. वहीं, उस ओर मुंह कर के खाना बनाने से रसोई में स्वाद बढ़ता है तथा दक्षिण दिशा घर के मालिक के लिए उपयुक्त है क्योंकि इस में रहने वाले का पूरे घर में वर्चस्व रहता है. एक बार फिर मुहूर्त देख कर गृहप्रवेश कर लिया गया था.

सब अतिथियों के विदा होने के बाद रात्रि को सोने से पहले दीपेश ने नीरा का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा था, ‘आज मैं बहुत खुश हूं. तुम्हारी अथक मेहनत के कारण हमारा अपने घर का सपना साकार हो पाया है.’

‘अभी तो सिर्फ ईंटगारे से निर्मित घर ही बना है. अभी मु झे इसे वास्तव में घर बनाना है जिसे देख कर मैं गर्व से कह सकूं, ‘सुंदर मा झे घर,’ मेरा सुंदर घर. जहां प्यार, विश्वास और अपनत्व की सरिता बहती हो, जहां घर का प्रत्येक प्राणी सिर्फ रात बिताने या खाना खाने न आए बल्कि प्यार के अटूट बंधन में बंधा वह शीघ्र काम समाप्त कर के इस घर की छत की छाया के नीचे अपनों के बीच बैठ कर सुकून के पल ढूंढ़े,’ नीरा ने उस की ओर प्यारभरी नजरों से देखते हुए कहा था.

नीरा ने ईंटगारे की बनी उस इमारत को सचमुच घर में बदल दिया. उस के हाथ की बनाई पेंटिंग्स ने घर में उचित स्थानों पर जगह ले ली थी. दीवार के रंग से मेल खाते परदे, वौल हैंगिंग्स, लैंप आदि न केवल घर की मालकिन की रुचि का परिचय दे रहे थे, घर की शोभा को दोगुना भी कर रहे थे.

Father’s day Special: अब तो जी लें

‘‘पापाकी बातों से लग रहा था कि वे बहुत डिप्रैस्ड हैं. मैं चाहता तो बहुत हूं कि उन से मिलने का प्रोग्राम बना लूं, लेकिन नौकरी की बेडि़यों ने ऐसा बांध रखा है कि क्या कहूं?’’ फोन पर अपने पिता से बात करने के बाद मोबाइल डाइनिंग टेबल पर रखते हुए गौरव परेशान सा हो पत्नी शुभांगी और बेटे विदित से कह रहा था.

‘‘मैं ने कल मम्मी को फोन किया था. वे बता रहीं थी कि आजकल पापा बहुत मायूस से रहते हैं. टीवी देखने बैठते हैं तो उन्हें लगता है कि सभी डेली सोप और बाकी कार्यक्रम 60 साल से कम उम्र वाले लोगों के लिए ही हैं… बालकनी में जा कर खडे़ होते हैं तो लगता कि सारी दुनिया चलफिर रही है, केवल वे ही कैदी से अलगथलग हैं… उन्हें लगने लगा है कि दुनिया में उन की जरूरत ही नहीं है अब,’’ शुभांगी भी गौरव की चिंता में सहभागी थी.

‘‘मैं ने आज बात करते हुए उन्हें याद दिलाया कि कितने काम ऐसे हैं जो अब तक अधूरे पड़े हैं और कब से उन को पूरा करना चाह रहे हैं. अब पापा की रिटायरमैंट के बाद क्यों न मम्मीपापा वे सब कर लें, मसलन मम्मी के बांए हाथ में बहुत दिनों से हो रहे दर्द का ढंग से इलाज, पापा का फुल बौडी चैकअप और घर में जमा हो रहे सामान से छांट कर बेकार पड़ी चीजों को फेंकने का काम भी. पापा किसी बात में रुचि ही नहीं ले रहे. बस शिकायत कि तुम लोग इतना कम क्यों आतेजाते हो यहां?’’ गौरव के हृदय की पीड़ा मुख से छलक रही थी.

‘‘मम्मी भी फोन पर अकसर हमारे नहीं जाने की शिकायत करती हैं. कल भी कह रहीं थीं कि जब कोई पड़ोसी मिलता है पूछ ही लेता है कि कई दिनों से बेटेबहू को नहीं देखा,’’ शुभांगी बेबस सी दिख रही थी.

‘‘हमारी प्रौब्लम जब मम्मीपापा ही नहीं समझ पा रहे हैं तो पड़ोसियों से क्या उम्मीद की जाए? एक दिन भी ना जाओ तो खटक जाता है बौस को. तुम भी कितनी छुट्टियां करोगी स्कूल की? फिर विदित की पढ़ाईलिखाई भी है… चलो, कोशिश करते हैं इस इतवार को चलने की,’’ गौरव कुछ सोचता सा बोला.

‘‘दादाजी और दादीजी से मिलने का मेरा भी बहुत मन है, लेकिन इस वीकऐंड पर मैथ्स की ट्यूशन में प्रौब्लम्स पर डिस्कशन होगी. मैं मिस नहीं कर सकता,’’ 12 वर्षीय विदित की भाव भंगिमाएं बता रही थी कि आजकल बच्चे पढ़ाई को ले कर कितने गंभीर हैं.

कुरसी से पीठ टिका आंखें मूंद कर उंगलियां चटकाते हुए गौरव गहन चिंतन में डूब गया. उस के पिता अरुण 3 वर्ष पहले निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए थे. विभिन्न राज्यों में स्थानांतरण और जिम्मेदार पद के कारण अपने कार्यकाल में वे खासे व्यस्त रहते थे. रिटायरमैंट के बाद का खाली जीवन उन्हें रास नहीं आ रहा था. मेरठ में अपने पैतृक मकान को तुड़वा आधुनिक रूप दे कर बनवाए गए मकान में परिवार के नाम पर पत्नी ममता ही थी. बड़ी बेटी पति के साथ आस्ट्रेलिया में रह रही थी, इसलिए अरुण और ममता की सारी आशाएं गौरव पर टिकी रहतीं थीं. उन का सोचना था कि मेरठ से नोएडा इतना दूर भी तो नहीं है कि गौरव का परिवार उन से प्रत्येक सप्ताह मिलने न आ सके. गौरव विवश था, क्योंकि प्रतिस्पर्धा और व्यस्तता के इस युग में समय ही तो नहीं है व्यक्ति के पास.

खाना खा कर विदित अपने कमरे में जा स्टडी टेबल पर पुस्तकों में खो गया. शुभांगी सुबह के नाश्ते की तैयारी करने किचन में चली गई और गौरव भी अपनी सोच से बाहर निकल लैपटौप खोल मेल के जवाब देने लगा. थक कर चूर उन सभी को प्रतिदिन सोने में देर हो जाया करती थी.

नोएडा के थ्री बैड रूम फ्लैट में रहने वाला गौरव एक मल्टीनैशनल कंपनी में मैनेजर के पद पर कार्यरत था. पत्नी शुभांगी वहीं के एक विद्यालय में अध्यापिका थी. गौरव सुबह 8 बजे दफ्तर के लिए घर से निकलता तो रात के 9 बजे से पहले कभी घर वापस नहीं आ पाता था. कभीकभी काम ज्यादा होने से रात के 11 तक बज जाते थे, विदित और शुभांगी सुबह साढे छ: बजे साथसाथ निकलते और एकसाथ ही वापस आ जाते थे. विदित उसी विद्यालय में पढ़ रहा था, शुभांगी जिस में टीचर थी.

सुबह जल्दी उठ कर सब का ब्रैकफास्ट बना, विदित और अपना टिफिन तैयार

करने के बाद कुछ अन्य कार्य निबटा शुभांगी 10 मिनट में तैयार हो स्कूल चली जाती थी. बाद में मेड आ कर गौरव के जाने तक बरतन, सफाई का काम कर दोपहर का खाना बनाती और गौरव का टिफिन लगा देती थी. स्कूल से लौटने पर भी शुभांगी को आराम करने का समय नहीं मिल पाता था. विदित के लिए मेड का बनाया खाना गरम कर उसे ट्यूशन के लिए छोड़ने जाती. लौट कर खाना खा गमलों में पानी देती, आरओ से पानी की बोतलें भर कर रखती और सूखे कपड़े स्टैंड से उतार कर इस्त्री के लिए देने जाती. वहीं से वह विदित को वापस ले कर घर आ जाती थी. अपनी शाम की चाय पीते हुए होमवर्क में विदित की मदद कर वह रात के खाने की तैयारी में जुट जाती. शाम को रसोई संभालने का काम शुभांगी स्वयं ही करती थी. इस के 2 कारण थे. पहला यह कि विदित और गौरव को उस के हाथ का बना खाना ही पसंद था, दूसरा चारों ओर से वह बचत के रास्ते खोजती रहती थी. फ्लैट के लिए गए लोन की कई किश्तें बाकी थीं अभी.

गौरव और शुभांगी का लगभग 12-13 वर्ष पूर्व प्रेमविवाह हुआ था. उस समय शुभांगी दिल्ली के एक स्कूल में पढ़ा रही थी. आईआईएफटी कोलकाता से एमबीए करने के बाद गौरव ने भी कुछ दिन पहले ही दिल्ली की एक कंपनी में नौकरी शुरू की थी. शुभांगी से जब उस की मैट्रो में पहली मुलाकात हुई थी तो दोनों को ही ‘लव ऐट फर्स्ट साइट’ जैसा अनुभव हुआ था. पहली नजर का प्यार जल्द ही परवान चढ़ा और दोनों ने जीवनसाथी बनने का फैसला कर लिया. शुभांगी के परिवार वालों को इस रिश्ते से कोई आपत्ति नहीं थी. ममता ने भी इस विजातीय विवाह की सहज स्वीकृति दे दी थी, लेकिन अरुण इस विवाह के विरुद्ध था. बाद में ममता के समझाने पर उस ने भी विवाह के लिए हामी भर दी थी.

विवाह के बाद कुछ समय तक गौरव शुभांगी के घर

पर रहा. फिर नोएडा की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी से बढि़या औफर मिला तो वहीं किराए का मकान ले लिया. शुभांगी ने भी तब नोएडा के जानेमाने स्कूल में अपनी सीवी भेज दी. उस के अनुभव व योग्यता को देख वहां उस का सिलैक्शन हो गया. विदित भी तब तक ढाई वर्ष का हो गया था. शुभांगी ने उस का ऐडमिशन अपने स्कूल में करवा दिया. कुछ वर्ष किराए के में बिताने के बाद गौरव ने नोएडा में अपना फ्लैट खरीद लिया.

गौरव चाहता था कि अरुण के सेवानिवृत्ति होने पर मम्मीपापा उस की साथ ही रहें. यही सोच कर उस ने बड़ा फ्लैट खरीदा था, लेकिन अरुण मेरठ में बसने का इच्छुक था. गौरव उस समय थोड़ेथोड़े समय अंतराल पर ही मातापिता से मिलने चला जाता था. तब विदित चौथी कक्षा में था. बाद में उस की पढ़ाई का बोझ और बढ़ते ट्यूशन तथा गौरव की प्रमोशन के कारण दफ्तर का काम बढ़ जाने से उन का मेरठ जाना कम हो गया. परिस्थिति को समझे बिना अपने को उपेक्षित मान ममता व अरुण मन ही मन खिन्न रहने लगे.

इन दिनों भी वे बारबार फोन कर गौरव को आने के लिए कह रहे थे. कुछ दिन पहले ही विदेश में रहने वाले अरुण के एक मित्र का निधन हो गया था. उस दोस्त से फोन पर अरुण अकसर बातचीत कर लिया करता था. मित्र की मृत्यु के कारण अरुण अवसाद से घिर गया था. ममता भी इस समाचार से दुखी थी.

अपने मम्मीपापा की उदासी से चिंतित हो गौरव ने 2 दिन के लिए मेरठ जाने का कार्यक्रम बना लिया. शुभांगी और विदित ने स्कूल से छुट्टी ले ली. गौरव के औफिस में यद्यपि शनिवार की छुट्टी रहती थी, किंतु काम की अधिकता के कारण उस दिन औफिस जा कर या घर पर ही काम निबटाना पड़ता था. ‘काम वहीं जा कर पूरा कर लूंगा’ सोच कर उस ने लैपटौप साथ रख लिया.

तीनों मेरठ पहुंचे तो अरुण व ममता के सूने घर में ही नहीं सूने चेहरे पर भी रौनक

आ गई. शुभांगी वहां पहुंच कर चाय पीते ही रसोई में जुट गई. विदित दादाजी को अपने स्कूल और दोस्तों के किस्से सुनाने लगा और गौरव ने औफिस का काम निबटाने के उद्देश्य से लैपटौप औन कर लिया. गौरव को काम करते देख ममता ताना मारते हुए बोली, ‘‘पता है मुझे कि मेरा बेटा बहुत ऊंचे ओहदे पर है, लेकिन ये सब हमें दिखाने से क्या फायदा तुम्हारे पापा के दिन कितनी मुश्किल से बीतते हैं, पता है तुम्हें? न घर पर चैन न बाहर. बस इंतजार करते हैं कि कोई पड़ोसी मिलने आ जाए या फिर दफ्तर से कोई दोस्त फोन कर कहे कि सब बहुत याद कर रहे हैं. अब बताओ ऐसा हुआ है क्या कभी? तुम बंद करो काम और पापा को सारा समय दो आज अपना.’’

अरुण ने ममता की बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘अरे, मैं तो सरकारी महकमे के डायरैक्टर की पोस्ट से रिटायर हुआ हूं. इतना काम तो मैं ने भी नहीं किया कभी, तुम क्या जबरन ओट लेते हो काम अपने ऊपर?’’

‘‘पापा प्राइवेट सैक्टर में कंपीटिशन इतना बढ़ चुका है कि मैं काम सही ढंग से नहीं करूंगा तो मुझे रिप्लेस करने में उन के 2 दिन भी नहीं लगेंगे. चलिए, आप की बात मानते हुए नहीं करूंगा आज काम. लेकिन 1-2 दिन हम लोग आप के पास रह भी जाएंगे तो क्या हो जाएगा? आप लोग ही चलिए न हमारे साथ,’’ गौरव काम बीच में ही छोड़ लैपटौप शटडाउन कर मुसकराता हुआ बोला.

‘‘कहां चलें? तुम्हारे घर? अरे बेटा, वहां भी तुम तीनों रोज अपनेअपने काम पर निकल जाओगे. मैं और ममता फिर अकेले हो जाएंगे. यहां कम से कम पुराने पड़ोसी और यारदोस्त तो हैं. फिर मैं तो दूध, सब्जी लेने जाता हूं तो किसी न किसी से दुआ सलाम हो ही जाती है. असली मुश्किल तो तुम्हारी मम्मी की है. यहां की किट्टी में छोटी उम्र की औरतें ज्यादा आती हैं, ये कहते हैं कि उन के साथ बात करूं तो वही सासननद की शिकायतें ले कर बैठ जाती हैं. फोन पर कितना बतिया लेंगी अपनी हमउम्र सहेलियों के साथ?’’ कह कर अरुण ने ममता की ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा. ममता ने हामी में सिर हिला दिया.

शुभांगी किचन में खड़ी उन की बातें सुन रही थी. बाहर निकल अपनी एक

सहेली की मम्मी के विषय में बताते हुए वह बोली, ‘‘मेरी फ्रैंड शिवानी की मम्मी उस के पापा के दुनिया से चले जाने के बाद बहुत अकेली हो गईं थीं. उन्हें बागवानी का बहुत शौक था. छोटा सा किचन गार्डन भी था उन के आंगन में. वे अकसर फोन पर गार्डनिंग की प्रौब्लम्स, तरहतरह के पौधों और फूलों की देखभाल और खाद वगैरह के बारे में अपने भैया से डिस्कस करती रहती थीं. शिवानी के वे मामा यूनिवर्सिटी के हौर्टिकल्चर डिपार्टमैंट में लेक्चरार थे. उन के कहने पर आंटी ने इस सब्जैक्ट को इंट्रस्टिंग बनाते हुए हाउसवाइव्स के लिए वीडियो बना कर अपने यूट्यूब चैनल पर डालने शुरू कर दिए. यू नो, धीरेधीरे वे इतनी पौपुलर हो गईं कि लोग सजेशंस मांगने लगे. फेसबुक और इंस्टाग्राम पर जब वे अपने सुंदरसुंदर गमलों और क्यारियों की पिक्स डालतीं तो लाइक्स और कमैंट्स की बरसात हो जाती. इस से जिंदगी में उन्हें खुशियां तो मिली हीं, साथ ही वे बिजी भी हो गईं.’’

शुभांगी की बात पूरी होते ही ममता तपाक से बोली, ‘‘मुझे भी कुकिंग का बहुत शौक है. इन का जहां भी ट्रांसफर हुआ, वहां का खाना बनाना सीख लिया था मैं ने. हिमाचल प्रदेश के तुड़किया भात और बबरू, मध्य प्रदेश की भुट्टे की कीस, गोआ के गोइन रैड राइस और फोनना कढ़ी, बंगाल के आलू पोस्तो, पीठा, लूची संग छोलार दाल… और… और… अरे बहुत कुछ है. सुनोगे?’’

‘‘हां… हां…’’ सब सम्मिलित स्वर में बोले.

ममता ने दोगने उत्साह से बोलना शुरू कर दिया, ‘‘जब गौरव के पापा के साथ मैं इंडिया से बाहर गई थी तो…’’

‘‘पर हम तो तब गैस्ट हाउस में ठहरे थे, वहां कैसे सीखा?’’ अरुण ने आश्चर्यचकित हो ममता की बात बीच में ही काट दी.

‘‘आप के काम पर चले जाने के बाद मैं हर रोज गैस्ट हाउस की किचन में पहुंच जाती थी. भाषा तो नहीं जानती थी वहां की, लेकिन खाना बनते देखती रहती थी. फिर इस्तेमाल होने वाली चीजों के नाम इशारे से पूछती तो शेफ भी टूटीफूटी इंग्लिश में बता देते थे.’’

सभी ठहाका लगा कर हंसने लगे. शुभांगी तालियां बाते हुए बोली, ‘‘वाओ मम्मी, क्याक्या सीखा आप ने?’’

‘‘फ्रांस में रंगबिरंगे मैकरोने और जौ के आटे से बनने वाले क्रेप केक… लेबनान में सीखी पीटा ब्रैड बनाने की विधि और चने से बने फलाफल जो उस के अंदर भरे जाते हैं. मुझे बहुत तरह

की सौस और डिप बनानी भी आती हैं, जो आजकल बाजार में तरहतरह के नामों से खूब महंगी बिकती हैं.’’

‘‘दादी, क्या कह रही हो आप, मैं अपने फ्रैंड्स को बताऊंगा न ये बातें तो आप के हाथ की बनी चीजें खाने की जिद करने लगेंगे.’’ विदित के चेहरे पर आश्चर्य और उल्लास के भाव एकसाथ तैरने लगे.

‘‘तो आप ये डिशेस बना कर यूट्यूब पर डालो न. पापा बनाएंगे आप का वीडियो,’’ गौरव चहकते हुए बोला.

‘‘भई इस बहाने हमें भी रोजरोज अच्छा खाना मिला करेगा,’’ अरुण खिलखिला कर हंस दिया.

घर के सभी लोग उत्सव सरीखे वातावरण में भीग रहे थे. अगले दिन विदित दादाजी को

वीडियो बनाना और उसे यूट्यूब पर डालना सिखा रहा था. शुभांगी और ममता तरहतरह के व्यंजनों के विषय में चर्चा कर रहीं थीं. सब को प्रसन्नता पूर्वक अपने कार्यों में व्यस्त देख गौरव को अपने औफिस का काम निबटाने का अवसर मिल गया.

रविवार की शाम को वापसी के लिए रवाना होने से पहले शुभांगी ने 2 टिकट ममता की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मम्मी ये पापा और आप के लिए मौरीशस जाने की टिकट हैं. 15 दिन के लिए आप दोनों घूम कर आइए. ‘वीजा औन एराइवल’ की सुविधा है वहां. यानी मौरीशस पहुंच कर वीजा लेना है आप को. इस के लिए सिर्फ औनलाइन अप्लाई करना होगा. सारी उम्र आप बिजी रहे, कहीं गए भी तो औफिशियल टूर पर, बहुत लोगों के साथ. अब आप दोनों फ्री हैं तो एंजौय कीजिए एक मस्ती भरे ट्रिप में एकदूसरे की कंपनी को. हमें भी खुशी होगी.’’

‘‘अरे लोग क्या कहेंगे इस उम्र में हम ऐसे ट्रिप पर जाएंगे तो?’’ सकुचाते हुए ममता बोली.

शुभांगी ममता के पास जा उस के गले में अपनी बांहें डालती हुई स्नेह से बोली, ‘‘मेरी प्यारी मम्मी, आप और पापा अब तक जिम्मेदारियां निभाते रहे, जिंदगी को आप ने बिताया जरूर है, लेकिन जिया नहीं. कोई कुछ भी कहे उस की बात अनसुनी कर आप को एकदूसरे का हाथ थाम कहना चाहिए कि अब तो जी लें.’’

ममता गदगद हो उठी. इस से पहले कि वह कुछ कहती गौरव अपने बैग से एक कैमरा निकाल अरुण की ओर बढ़ाते हुए बोला, ‘‘पापा, आप के लिए हम ने यह कैमरा खरीदा है. मिररलैस होने के कारण यह हलका भी है और साइज में भी छोटा है, लेकिन पिक्स बहुत सुंदर आती हैं इस से. पापा, मुझे पता है कि आप को फोटोग्राफी का कितना शौक था. मेरे बचपन की कितनी तसवीरें खींची थी आप ने. फिर बिजी होने से या शायद अच्छे कैमरे के अभाव में आप ने इस शौक पर लगाम लगा दिया था, लेकिन आप इसे भूले नहीं थे. मुझे याद है कि जब 2 साल पहले चाचाजी का परिवार यहां घूमने आया था तो उन की कैमरे से खींची हुई तसवीरों को आप कितने ध्यान से देखते थे. आप की आंखों में एक ललक मुझे साफसाफ दिखाई दी थी उस समय. पापा, जिंदगी के उन पलों को अब कस कर पकड़ लीजिए, जो आप को हमेशा लुभाते रहे लेकिन हाथ नहीं आए. मौरीशस जा कर ढेर सारी फोटो खींचिएगा, बेहद सुंदर है मौरीशस.’’

ममता व अरुण की नम आंखों से आंसूओं की बूंदें टपकीं तो मन में पल रही गलतफहमियां उन की साथ ही बह गईं.

शुभांगी को कुछ दिनों बाद ममता का भेजा हुआ एक यूट्यूब लिंक मिला जिस में ममता ने ‘हमस’ नामक डिप को कई प्रकार से बनाना सिखाया था. हमस एक प्रकार की चटनी होती है, जो छोले से बनाई जाती है. ममता ने चुकंदर, शिमलामिर्च, गाजर व मटर का प्रयोग करते हुए चटनी के विभिन्न रूप प्रदर्शित किए थे. वीडियो में ममता ने यह भी बताया कि हमस न केवल खाने में स्वादिष्ठ होती है, वरन इस के नियमित सेवन से वजन पर भी नियंत्रण रखा जा सकता है. प्रोटीन व कैल्सियम से भरपूर यह डिश डायबिटीज के पेशेंट के लिए भी अच्छी होती है. इसे मिडल ईस्ट देशों में बहुत शौक से खाया जाता है.

शुभांगी ने वह लिंक अपनी सहेलियों के साथ शेयर किया. ममता को इतनी अच्छी रैसिपी बनाने के लिए बधाई देते हुए उस ने कहा कि सभी ने मुफ्त कंठ से उस के यूट्यूब चैनल की प्रशंसा की है. सखियां अगले व्यंजन की वीडियो आने की आतुरता से प्रतीक्षा कर रहीं हैं.

मौरीशस से लौटने के बाद अरुण ने अपने खींचे हुए फोटो

व्हाट्सऐप पर भेजे. तसवीरें इतनी जीवंत थीं कि दर्शनीय स्थल आंखों के सामने होने का आभास दे रहीं थीं. अगले दिन ममता ने शुभांगी को फोन पर बताया कि उस का वीडियो देखने के बाद पड़ोस की कुछ महिलाओं ने उस से कुकरी क्लासेज लेने का अनुरोध किया है.

कुछ दिनों बाद गौरव का अरुण का भेजा हुआ एक मेल मिला, जिस में लिखा था कि हिंदी की एक सुप्रसिद्ध पत्रिका में अरुण का लिखा लेख प्रकाशित हुआ है. गौरव ने मेल पढ़ते ही पिता को फोन मिला लिया. अरुण ने बताया कि उसे हिंदी में लिखने की हमेशा से रुचि रही है. अपने कार्यालय की वार्षिक पत्रिका में उस से कहानी या लेख लिखने का अनुरोध किया जाता था, इस के अतिरिक्त प्रत्येक वर्ष औफिस में मनाए जाने वाले हिंदी दिवस में भी वह प्रसन्नतापूर्वक भाग लेता था. अरुण द्वारा भेजे लेख की पीडीएफ फाइल डाउनलोड कर गौरव ने पढ़ा तो अभिभूत हो उठा. उस लेख में अरुण ने रिटायरमैंट फेज को जीवन का स्वर्णिम चरण बताया था और इस समय को बेहतर ढंग से जीने के तरीकों के विषय में लिखा था. लेख उस चर्चा पर आधारित था जो शुभांगी और वह समयसमय पर उन से करते रहते थे. लेख का शीर्षक था ‘अब तो जी लें.’

Father’s day Special: पापा मिल गए

शब्बीर की मौत के बाद दोबारा शादी का जोड़ा पहन कर इकबाल को अपना पति मानने के लिए बानो को दिल पर पत्थर रख कर फैसला करना पड़ा, क्योंकि हालात से समझौता करने के सिवा कोई दूसरा रास्ता भी तो उस के पास नहीं था. अपनी विधवा मां पर फिर से बोझ बन जाने का एहसास बानो को बारबार कचोटता और बच्ची सोफिया के भविष्य का सवाल न होता, तो वह दोबारा शादी की बात सोचती तक नहीं.

‘‘शादी मुबारक हो,’’ कमरे में घुसते ही इकबाल ने कहा.

‘‘आप को भी,’’ सुन कर बानो को शब्बीर की याद आ गई. इकबाल को भी नुसरत की याद आ गई, जो शादी के 6-7 महीने बाद ही चल बसी थी. वह बानो को प्यार से देखते हुए बोला, ‘‘क्या मैं ने अपनी नस्सू को फिर से पा लिया है?’’

तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया.

‘‘क्या बात है?’’ कहते हुए इकबाल ने दरवाजा खोला तो देखा कि सामने उस की साली सलमा रोतीबिलखती सोफिया को लादे खड़ी है.

‘‘आपा के लिए यह कब से परेशान है? चुप होने का नाम ही नहीं लेती. थोड़ी देर के लिए आपा इसे सीने से लगा लेतीं, तो यह सो जाती,’’ सलमा ने डरतेडरते कहा.

‘‘हां… हां… क्यों नहीं,’’ सलमा को अंदर आ जाने का इशारा करते हुए इकबाल ने गुस्से में कहा. रोती हुई सोफिया को बानो की गोद में डाल कर सलमा तेजी से कमरे से बाहर निकल गई. इधर बानो की अजीब दशा हो रही थी. वह कभी सोफिया को चुप कराने की कोशिश करती, तो कभी इकबाल के चेहरे को पढ़ने की कोशिश करती. सोफिया के लिए इकबाल के चेहरे पर गुस्सा साफ झलक रहा था. इस पर बानो मन ही मन सोचने लगी कि सोफिया की भलाई के चक्कर में कहीं वह गलत फैसला तो नहीं कर बैठी?

सुबह विदाई के समय सोफिया ने अपनी अम्मी को एक अजनबी के साथ घर से निकलते देखा, तो झट से इकबाल का हाथ पकड़ लिया और कहने लगी, ‘‘आप कौन हैं? अम्मी को कहां ले जा रहे हैं?’’ सोफिया के बगैर ससुराल में बानो का मन बिलकुल नहीं लग रहा था. अगर हंसतीबोलती थी, तो केवल इकबाल की खातिर. शादी के बाद बानो केवल 2-4 दिन के लिए मायके आई थी. उन दिनों सोफिया इकबाल से बारबार पूछती, ‘‘मेरी अम्मी को आप कहां ले गए थे? कौन हैं आप?’’

‘‘गंदी बात बेटी, ऐसा नहीं बोलते. यह तुम्हारे खोए हुए पापा हैं, जो तुम्हें मिल गए हैं,’’ बानो सोफिया को भरोसा दिलाने की कोशिश करती.

‘‘नहीं, ये पापा नहीं हो सकते. रोजी के पापा उसे बहुत प्यार करते हैं. लेकिन ये तो मुझे पास भी नहीं बुलाते,’’ सोफिया मासूमियत से कहती. सोफिया की इस मासूम नाराजगी पर एक दिन जाने कैसे इकबाल का दिल पसीज उठा. उसे गोद में उठा कर इकबाल ने कहा, ‘‘हां बेटी, मैं ही तुम्हारा पापा हूं.’’ यह सुन कर बानो को लगने लगा कि सोफिया अब बेसहारा नहीं रही. मगर सच तो यह था कि उस का यह भरोसा शक के सिवा कुछ न था.

इस बात का एहसास बानो को उस समय हुआ, जब इकबाल ने सोफिया को अपने साथ न रखने का फैसला सुनाया.

‘‘मैं मानता हूं कि सोफिया तुम्हारी बेटी है. इस से जुड़ी तुम्हारी जो भावनाएं हैं, उन की मैं भी कद्र करता हूं, मगर तुम को मेरी भी तो फिक्र करनी चाहिए. आखिर कैसी बीवी हो तुम?’’ इकबाल ने कहा.

‘‘बस… बस… समझ गई आप को,’’ बानो ने करीब खड़ी सोफिया को जोर से सीने में भींच लिया. इस बार बानो ससुराल गई, तो पूरे 8 महीने बाद मायके लौट कर वापस आई. आने के दोढाई हफ्ते बाद ही उस ने एक फूल जैसे बच्चे को जन्म दिया. इकबाल फूला नहीं समा रहा था. उस के खिलेखिले चेहरे और बच्चे के प्रति प्यार से साफ जाहिर था कि असल में तो वह अब बाप बना है. आसिफ के जन्म के बाद इकबाल सोफिया से और ज्यादा दूर रहने लगा था. इस बात को केवल बानो ही नहीं, बल्कि उस के घर वाले भी महसूस करने लगे थे. इकबाल के रूखे बरताव से परेशान सोफिया एक दिन अम्मी से पूछ बैठी, ‘‘पापा, मुझ से नाराज क्यों रहते हैं? टौफी खरीदने के लिए पैसे भी नहीं देते. रोजी के पापा तो रोज उसे एक सिक्का देते हैं.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है बेटी. पापा तुम से भला नाराज क्यों रहेंगे. वे तुम्हें टौफी के लिए पैसा इसलिए नहीं देते, क्योंकि तुम अभी बहुत छोटी हो. पैसा ले कर बाहर निकलोगी, तो कोई छीन लेगा.

‘‘पापा तुम्हारा पैसा बैंक में जमा कर रहे हैं. बड़ी हो जाओगी, तो सारे पैसे निकाल कर तुम्हें दे देंगे.’’ ‘‘मगर, पापा मुझे प्यार क्यों नहीं करते? केवल आसिफ को ही दुलार करते हैं,’’ सोफिया ने फिर सवाल किया.

‘‘दरअसल, आसिफ अभी बहुत छोटा है. अगर पापा उस का खयाल नहीं रखेंगे, तो वह नाराज हो जाएगा,’’ बानो ने समझाने की कोशिश की. इसी बीच आसिफ रोने लगा, तभी इकबाल आ गया, ‘‘यह सब क्या हो रहा है बानो? बच्चा रो रहा है और तुम इस कमबख्त की आंखों में आंखें डाल कर अपने खो चुके प्यार को ढूंढ़ रही हो.’’ इकबाल के शब्दों ने बानो के दिल को गहरी चोट पहुंचाई.

‘यह क्या हो रहा है?’ घबरा कर उस ने दिल ही दिल में खुद से सवाल किया, ‘मैं ने तो सोफिया के भले के लिए जिंदगी से समझौता किया था, मगर…’ वह सिसक पड़ी. इकबाल ने घर लौटने का फैसला सुनाया, तो बानो डरतेडरते बोली, ‘‘4-5 रोज से आसिफ थोड़ा बुझाबुझा सा लग रहा है. शायद इस की तबीयत ठीक नहीं है. डाक्टर को दिखाने के बाद चलते तो बेहतर होता.’’

इकबाल ने कोई जवाब नहीं दिया. आसिफ को उसी दिन डाक्टर के पास ले जाया गया.

‘‘इस बच्चे को जौंडिस है. तुरंत इमर्जैंसी वार्ड में भरती करना पड़ेगा,’’ डाक्टर ने बच्चे का चैकअप करने के बाद फैसला सुनाया, तो इकबाल माथा पकड़ कर बैठ गया.

‘‘अब क्या होगा?’’ माली तंगी और बच्चे की बीमारी से घबरा कर इकबाल रोने लगा.

‘‘पापा, आप तो कभी नहीं रोते थे. आज क्यों रो रहे हैं?’’ पास खड़ी सोफिया इकबाल की आंखों में आंसू देख कर मचल उठी. डरतेडरते सोफिया बिलकुल पास आ गई और इकबाल की भीगी आंखों को अपनी नाजुक हथेली से पोंछते हुए फिर बोली, ‘‘बोलिए न पापा, आप किसलिए रो रहे हैं? आसिफ को क्या हो गया है? वह दूध क्यों नहीं पी रहा?’’ सोफिया की प्यारी बातों से अचानक पिघल कर इकबाल ने कहा, ‘‘बेटी, आसिफ की तबीयत खराब हो गई है. इलाज के लिए डाक्टर बहुत पैसे मांग रहे हैं.’’ ‘‘कोई बात नहीं पापा. आप ने मेरी टौफी के लिए जो पैसे बैंक में जमा कर रखे हैं, उन्हें निकाल कर जल्दी से डाक्टर अंकल को दे दीजिए. वह आसिफ को ठीक कर देंगे,’’ सोफिया ने मासूमियत से कहा.

इकबाल सोफिया की बात समझ नहीं सका. पूछने के लिए उस ने बानो को बुलाना चाहा, मगर वह कहीं दिखाई नहीं दी. दरअसल, बानो इकबाल को बिना बताए आसिफ को अपनी मां की गोद में डाल कर बैंक से वह पैसा निकालने गई हुई थी, जो शब्बीर ने सोफिया के लिए जमा किए थे.

‘‘इकबाल बाबू, बानो किसी जरूरी काम से बाहर गई है, आती ही होगी. आप आसिफ को तुरंत भरती कर दें. पैसे का इंतजाम हो जाएगा,’’ आसिफ को गोद में चिपकाए बानो की मां ने पास आ कर कहा, तो इकबाल आसिफ को ले कर बोझिल मन से इमर्जैंसी वार्ड की तरफ बढ़ गया. सेहत में काफी सुधार आने के बाद आसिफ को घर ले आया गया.

‘‘यह तुम ने क्या किया बानो? शब्बीर भाई ने सोफिया के लिए कितनी मुश्किल से पैसा जमा किया होगा, मगर…’’ असलियत जानने के बाद इकबाल बानो से बोला.

‘‘सोफिया की बाद में आसिफ की जिंदगी पहले थी,’’ बानो ने कहा.

‘‘तुम कितनी अच्छी हो. वाकई तुम्हें पा कर मैं ने नस्सू को पा लिया है.’’ ‘‘वाकई बेटी, बैंक में अगर तुम्हारी टौफी के पैसे जमा न होते, तो आसिफ को बचाना मुश्किल हो जाता,’’ बानो की तरफ से नजरें घुमा कर सोफिया को प्यार से देखते हुए इकबाल ने कहा. ‘‘मैं कहती थी न कि यही तुम्हारे पापा हैं?’’ बानो ने सोफिया से कहा.

इकबाल ने भी कहा, ‘‘हां बेटी, मैं ही तुम्हारा पापा हूं.’’ सोफिया ने बानो की गोद में खेल रहे आसिफ के सिर को सीने से सटा लिया और इकबाल का हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘मेरे पापा… मेरे अच्छे पापा.’’

Father’s day 2023: पिता बदल गए हैं तो कोई हैरानी नहीं, बदलते वक्त के साथ ही था बदलना

आइंस्टीन की बिग बैंग थ्योरी को लेकर भले संदेह हो कि ब्रह्मांड निरंतर फ़ैल रहा है या नहीं.लेकिन इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं है कि दुनिया हर पल बदल रही है.कारण कुछ भी हो.ऐसे में भले किसी की पहचान हमेशा एक सी कैसे रह सकती है.पिता नाम का,समाज का सबसे महत्वपूर्ण शख्स भी इस बदलाव से अछूता नहीं है तो इसमें किसी आश्चर्य की बात नहीं है.आज जब पिछली सदी के जैसा कुछ नहीं रहा,न खानपान,न पहनावा,शिक्षा,न रोजगार,न संपर्क के साधन तो भला पिता कैसे वैसे के वैसे ही बने रहते,जैसे बीसवीं सदी के मध्यार्ध या उत्तरार्ध में थे.पिता भी बदल गए हैं.क्योंकि अब वो घर में अकेले कमाने वाले शख्स नहीं हैं.क्योंकि अब वो अपने बच्चों से ज्यादा नहीं जानते,ज्यादा स्मार्ट भी नहीं हैं.

यही वजह है कि आज पिता घर की अकेली और निर्णायक आवाज भी नहीं हैं. आज के पिता परिवार की कई आवाजों में से एक हैं और यह भी जरूरी नहीं कि घर में उनकी  आवाज सबसे वजनदार आवाज हो.इसमें कुछ बुरा भी नहीं है और न ही इसके लिए पिताओं के प्रति अतिरिक्त सहानुभूति होनी चाहिए.क्योंकि अकेली निर्णायक आवाज न घर के लिए और न ही समाज के लिए,किसी भी के लिए बहुत अच्छी नहीं होती.अकेली आवाज के हमेशा तानाशाह आवाज में बदल जाने की आशंका रहती है.

बहरहाल पहले के पिता ख़ास होने के भाव से अकड़ में रहते थे, इस कारण वह अपने बच्चों के प्रति अपने प्यार और फिक्रमंदी की भावनाएं भी सार्वजनिक तौरपर प्रदर्शित नहीं कर पाते थे.यहां तक कि पहले पिता सबके सामने अपने बच्चों को अपनी जुबान से प्यार भी नहीं कर पाते थे.वही सामाजिक दबाव, क्या कहेंगे लोग.ढाई-तीन दशक पहले जिनका बचपन गुजरा है,उन्हें मालूम है कि कैसे बचपन में ज्यादातर समय उन्हें अपने पिताओं से नकारात्मक व्यवहार ही मिलता रहा है, लेकिन आज ऐसा नहीं है.आज के पिता बच्चों के साथ किसी हद तक दोस्ताना भाव रखते हैं. आज के पिता में वह दंबगई नहीं है, जो पहले हुआ करती थी? आज के बच्चे अपने पापा  से डरते नहीं है?

क्योंकि तकनीक ने,जीवनशैली ने पारिवारिक ताकत और प्रभाव का विकेंद्रीकरण किया है.पहले की तरह सारी पारिवारिक ताकत और प्रभाव का अब कोई अकेला केंद्र नहीं रहा.इस कारण आज का पिता बदल गया है.यह बदलाव कदम कदम पर दिखता है.आज का पिता घर के काम बिल्कुल न करता या कर पाता हो, ऐसा नहीं है.आज का पिता न सिर्फ घर के कई काम बड़ी सहजता से करता है बल्कि रसोई में भी अब वह अनाड़ी नहीं है.पहले जिन कामों को हम सिर्फ घर की महिलाओं को करते देखते थे, जैसे घर की सफाई, बच्चों को उठाना, स्कूल के लिए तैयार करना, उनके लिए नाश्ता और लंच बनाना आदि, आज ये तमाम काम पिता भी सहजता से करते दिखते हैं.

क्योंकि आज की तारीख में विभिन्न कामों के साथ जुड़ी अनिवार्य लैंगिगकता खत्म हो गई है या धीरे धीरे खत्म हो रही है.हम चाहें तो इसे इस तरह कह सकते हैं कि आज के पिता बहुत कूल हैं, हर काम कर लेते हैं.कई बार तो ऐसा इसलिए भी होता है; क्योंकि पिता एकल पालक होते हैं.आज बहुत नहीं पर काफी पिता ऐसे हैं,जिन्होंने सिंगल पैरेंट के रूप में बच्चा गोद लिया हुआ है.सौतेले पिता भी आज अजूबा नहीं हैं. आज के पिता बड़ी सहजता से अपनी बेटियों के हर काम और हर तरह के संवाद का जरिया बन सकते हैं.हम आमतौर पर ऐसा होने को पश्चिमी संस्कृति का असर मान लेते हैं.लेकिन यह महज पश्चिमी संस्कृति का असर भर नहीं है,यह एक स्वाभाविक बदलाव है.जो दुनिया में हर जगह आधुनिक जीवनशैली और शिक्षा से आया है.

इसके कारण आज के पिता बच्चों के लिए ज्यादा रीचेबल हो गये हैं,बच्चे बड़ी सहजता से उन तक पहुँच रखते हैं,वह पिताओं से हर तरह की बातचीत कर लेते हैं.उनमें एक किस्म का धैर्य आया है.आज के पिता बच्चों के रोल मॉडल हैं या नहीं हैं.ज्यादातर लड़कियां अपने ब्वाॅयफ्रेंड या हसबैंड में पिता की छाया तलाशती हैं.जाहिर है आज का पिता भावनात्मक रूप से ज्यादा सम्पन्न, संयमी, मददगार और केयर करने वाला है.यहां तक कि आज के पिता ने अपने बच्चों और परिवार को अपनी आलोचना की भी भरपूर छूट दी है.नहीं दी तो परिवार द्वारा ले ली गयी है,चाहे उसे पसंद हो या न हो. यही वजह है कि आज परिवार नामक संस्था ज्यादा प्रोग्रेसिव है.

इस सबके पीछे कारण बड़े ठोस हैं.आज का पिता घर का अकेला रोजी रोटी कमाने वाला नहीं रहा.मां भी बड़े पैमाने पर ब्रेड बटर अर्नर है.बच्चे भी पहले के मुकाबले कहीं जल्दी कमाने लगते हैं. इस वजह से घर में अब पिता का पहले के जमाने की तरह का दबदबा नहीं रहा,जब वह परिवार की रोजी रोटी कमाने वाले अकेले शख्स हुआ करते थे.

यूं शुरू हुआ फादर्स डे मनाने का सिलसिला

हर साल जून के तीसरे रविवार को फादर्स डे मनाया जाता है. इसका सबसे पहले विचार एक अमरीकी लड़की सोनोरा स्मार्ट डोड को साल 1909 में आया था.पहला फादर्स डे 19 जून 1910 को वाशिगंटन में मनाया गया. 1966 में अमरीका के राष्ट्रपति लिंडन बेन जॉनसन ने जून के तीसरे रविवार को हर साल फादर्स डे मनाने की औपचारिक घोषणा की. तब से यह न केवल अमरीका में नियमित रूप से मनाया जाता है बल्कि दुनिया के दूसरे देशों में भी इसने धीरे धीरे अपना विस्तार किया है.पिता दिवस के मनाये जाने के इस औपचारिक सिलसिले के बाद से दुनिया में पिता और पितृत्व की भूमिका लगातार चर्चा होती रही है.

Film Review: ताज सीजन 2- सल्तनत के अंदर रिश्तों की बोर करती साजिश

  • रेटिंगः पांच में से दो स्टार
  • निर्माताः अभिमन्यु सिंह और रुपाली कादयान
  • लेखकःसाइमन फैंटुजो, और विलियम बोर्थविक
  • निर्देषकः विभु पुरी
  • कलाकारः नसीरुद्दीन शाह , आशिम गुलाटी , सौरसेनी मैत्रा , शुभम कुमार मेहरा , संध्या मृदुल और जरीना वहाब
  • अवधिः 41 से 52 मिट के आठ एपीसोड, लगभग छह घटे आठ मिनट
  • ओटीटी प्लेटफार्म: जी 5

मुगलिया सल्तनत का इतिहास खून खराबा, कत्लेआम, भीतरी घात, दरबारी साजिश, बादशाह की रानियों, बादशाह के अति करीबी दरबरियों की साजिषो से सना हुआ है. जहां किसी रिष्ते की कोई अहमियत नही. इसी मुगल सल्तनम पर वेब सीरीज बन रही है. जिसका पहला भाग लगभग ढाई माह पहले ‘जी 5’ पर ही ‘‘ताजः द डिवाइडेड बाय ब्लड’’ के नाम से स्ट्रीम हुआ था, जिसका निर्देशन ब्रिटिश निर्देशक रॉन स्कैल्पेलो  ने किया था. अब उसका दूसरा सीजन ‘‘ताजः रेन आफ रिवेंज’ के नाम से दो जून से ‘जी 5’ पर ही स्ट्रीम हो रहा है. जिसके कुल आठ एपीसोड हैं. इस सीजन के निर्देशक विभु पुरी हैं. जोे कि 2015 में प्रदर्षित ‘‘हवाईजादा’’ जैसी असफल फिल्म के निर्देशक के रूप में अपनी पहचान रखते हैं. अब पूरे आठ साल बाद निर्देशन में उतरे हैं. पर उनमें निर्देशकीय प्रतिभा नजर नही आती.

कहानीः

इस दूसरे सीजन की कहानी वहीं से शुरू होती है, जहां पहला सीजन खत्म हुआ था. पहले सीजन में अकबर (नसीरुद्दीन शाह) के तीन बेटों में से एक मुराद (ताहा साहा) को अकबर के करीबी अबुल फजल (पंकज सारस्वत)  ने सांप का जहर देकर मार दिया था. अकबर ने अपने बड़े बेटे सलीम (आशिम गुलाटी) को देश निकाला दे दिया था और सलीम की प्रेमिका अनारकली ( दिति राव हैदरी) को अकबर के तीसरे बेटे दनियाल (शुभम कुमार मेहरा)ने मार दिया था, जबकि  अनाकरली,  दनियाल की सगी मां थी. इस घटनाक्रम के पंदह वर्ष बाद शुरू होती है. अब अकबर के उत्तराधिकारी कट्टर दनियाल (शुभम कुमार मेहरा) है. सलीम के दोनों बेटे खुर्रम और खुसरो युवा हो चुके हैं.

सलीम,  एक फर कोट और चेहरे के बालों की एक गांठ में जुनूनी रूप से अनारकली (अदिति राव हैदरी) की कब्र की तलाश कर रहा है. देखकर तो वह जिप्सी डाकू लगता है, जो कि अरावली की पहाड़ियों से अपने पिता के रक्षकों पर छापा मारकर उनसे धन लूटता आया है. अपने गुरू शेख चिष्ती (धर्मेंद्र) से मिलने के बाद  अकबर,  सलीम से सुलाह के नाम पर उसे अपने दुष्मन मेवाड़ से लड़ने भेजना चाहते हैं, पर सलीम को यह कबूल नही.

उधर अकबर की बेगम बादशाह रूकैय्या(पद्मा दामोदरन) ने सलीम के बेटे खुसरू (जियांश अग्रवाल) को पालते हुए खुसरो के मन में सलीम के प्रति नफरत बढ़ दी है. वह खुसरो को ही मुगल सल्तनत का बादशाह बनाना चाहती है. सलीम का दूसरा बेटा खुर्रम (मितांश लुल्ला) मानता है कि हर सच के दो पहलू होते हैं. उधर सलीम तक महल की खबर पहुंचाने वाली मेहरुनिसा (सौरसेनी मैत्रा) की शादी अबू फजल की सलाह व अकबर के आदेश पर एक वहशी अली कुली (रोहल्ला काजिम) से करा दी जाती है, जिसे कुछ समय बाद कुश्ती के मैदान पर सलीम मौत की नींद सुला देते हैं.

चौथे एपीसोड के अंत में शेख चिष्ती , अकबर बादशाह को  सलाह देते है कि कत्लेआम रोकें और सलीम में तमाम बुराइयां हैं, फिर भी अकबर को चाहिए कि वह सलीम से सुलह कर लें. पांचवंे एपीसोड में सलीम के हाथों दनियाल मारे जाते हैं. अब अकबर बीमार रहने लगते है. जिसके चलते अब अबुल फजल, बेगम बादशाह रूकैया के साथ मिलकर साजिश रचते हैं. रूकैया,  मेहरुनिसा को जेल में डालकर प्रताड़ित करती है.  फिर अबुल फजल एक साजिश रचकर सलीम को मारने इलहाबाद पहुंचते हैं, जहां वह खुद उनके हाथों मारे जाते हैं, जिन पर उन्हे भरोसाथा. यह जानकर बादशाह अकबर,  रूकैया से सारे अधिकार छीन लेते हैं. सातवें एपीसोड मेहरूनिसा,  महारानी  व सलीम की मां जोधा बाई (संध्या मृदल ) व खुर्रम के साथ सलीम के पास सुलह करवाने के लिए पहुॅचती है. इधर अकबर को अपने अंतिम वक्त में अपने पाप याद आते हैं और वह रानी सलीमा (जरीना वहाब) से कबूल करते हंै कि उनके पहले शौहर पैगम खान की हत्या उन्होने की थी. सातवें एपीसोड के अंत में मरने से पहले अकबर सभी लोगो के सामने धीमी आवाज में मेहरूनिसा के पिता को बताते हैं कि उनका उत्तराधिकारी कौन होगा? वह सभी को बताते है कि अकबर ने सलीम का नाम लिया था. इससे खुसरो बगावत करना चाहता है. रूकैया उसे बगावत करने के लिए उकसाती है. खुसरो अपनी सेना के साथ आक्रमण करता है, हारने पर भागकर लाहौर पहंुचता है. इधर मेहरूनिसा और उसकी भतीजी अर्जुमंद को सच पता चल जाता है. पर सलीम तो उसका नाम नूरजहां रखकर बादशाह के अधिकार देकर खुसरो से युद्ध करने लाहौर जाते हैं और बंदी बनाकर लाते हैं. इधर महरूनिसा उर्फ नूरजहां, रूकैया को जेल मंे डालकर प्रताड़ित करती है. तथा सच जानकर खुर्ररम के साथ दरबार से भागी अर्जुमंद को मारने की सुपारी दे दी जाती है. फिर दरबार में सजा के तौर पर खुसरो की दूसरी आंख भी फोड़ देते हैं. पान महल, कष्मीर पहुॅचने पर सलीमा अकबर बादशाह का मरने से पहले लिखा हुआ पत्र पढ़कर चैंक जाती हैं. क्योंकि इस पत्र में लिखा है कि उन्होने अपना उत्तराधिकारी ख्ुार्ररम को चुना है. उधर राज्य के बहार रदी किनारे रह रहे ख्ुार्ररम,  अर्जुमंद को नया नाम मुमताज देते हैं.

लेखन व निर्देशनः

पहले सीजन के मुकाबले दूसरा सीजन गुणवत्ता के स्तर पर कमतर ही हुआ है. इस बार पअकथा में वह कसावट नही है, जो होनी चाहिए थी, जबकि जब दरबार व परिवार के अंदर ही साजिषें रची जा रही हों, तो रोचकता व रोमांच दोनो बढ़ जाना चाहिए, पर ऐसा कुछ भी नही है. . जिन्होने इतिहास पढ़ा है, उन्हे तो इसमें काफी गलतियंा भी नजर आएंगी. पटकथा में झोल ही झोल है. मसलन-अकबर के आदेश के बाद मेहरूनिसा को हरम में भेज दिया गया है. हरम से बाहर आना मुनासिब नही होता. पर वह जगह पहुॅच जाती हैं. फिल्म में किरदारों के पास दाढ़ी बनाने का वक्त नही हे. कहानी 15 साल आगे बढ़ी है, मगर खुर्रम व खुसरु के अलावा किसी भी किरदार पर उम्र का असर नही नजर आता. तो वही बेवजह के सेक्स दृष्य ठॅूंसे गए हैं. बिना व्याह किए सलीम के बच्चे की मां बनने जा रही मेरुनिसा के संग सेक्स दृष्य को विस्तार से फिल्माने की जरुरत निर्देशक को क्यों पड़ी. यह तो वही जाने. युद्ध के दृष्य अप्रभावशाली है. दनियाल, रूकैया, खुसरु, सलीम, अबुल फजल,  मानसिंह, मेहरुनिसा सहित कईयों के साजिश के बीच फंसे अकबर बादशाह. राज्य का खजाना खाली हो रहा है, जबकि तीनो रानियां अपने हरम में धन जमा कर रही हैं. इन सब बातों को लेकर बहुत अच्छे रोचक दृष्य रचे जा सकते थे, पर सब कुछ बहुत नीरस है. कहानी आगरा से बंगाल, कष्मीर, लाहौर, काबुल व दक्षिण तक जाती है, पर हर जगह के किरदारों की बोली में कोई अंतर नजर नही आता. जबकि भारत मेें हर  दस किलोमीटर पर बोली बदल जाती है.

अभिनयः

अकबर के किरदार में एक बार फिर नसिरूद्दीन शाह मात खा गए. बादशाह और पिता के बीच फंसे इंसान की व्यथा, सल्तनत के लिए हो रहे खून खराबा में अपनों को खोने के दर्द को भी वह अपने अभिनय से उकेरने में सफल नही रहे हैं. ऐसा लगता है जैसे कि उन्होने बेमन इस सीरियल में अभिनय किया हो. बीमार बादशाह  के रूप में भी वह कोई प्रभाव नहीं छोड़ते.

सलीम के किरदार में आशिम गुलाटी इस सीजन में कुछ कमजोर नजर आते हैं.

रूकैया के किरदार में पद्मा ठीक ठाक हैं.

मेहरुनिसा के किरदार में सौरसेनी मैत्रा अपना प्रभाव छोड़ती हैं.

दनियाल की भूमिका में शुभम कुमार मेहरा ने पहले से बेहतर काम किया है.

पंकज सारस्वत, जियांश अग्रवाल, मित्तांश लुल्ला, शिल्पा कटारिया सिंह, संध्या मृदुल, राहुल बोस आदि का अभिनय ठीक ठाक है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें