Father’s day 2023: जिंदगी फिर मुस्कुराएगी- पिता ने बेटे को कैसे रखा जिंदा

रात के 3 बजे थे. इमरजैंसी में एक नया केस आया था. इमरजैंसी में तैनात डाक्टरों और नर्सों ने मुस्तैदी से बच्चे की जांच की. बिना देरी किए उसे पीडियाट्रिक आई.सी.यू. में ऐडमिट कराने के लिए स्ट्रेचर पर लिटा कर नर्स व वार्ड- बौय तेजी से चल पड़े. पीछेपीछे बच्चे के मातापिता बदहवास से चल रहे थे.

पीडियाट्रिक आई.सी.यू. में भी अफरातफरी मच गई. बच्चे को बैड पर लिटा कर 4-5 डाक्टरों की टीम उस की चिकित्सा में लग गई.

‘‘टैल मी द हिस्ट्री,’’ डा. सिद्धार्थ ने कहा.

‘‘बच्चा 3 साल का है. यूरिनरी इन्फैक्शन हुआ था. डायग्नोसिस में बहुत देर हो गई. बच्चे को बहुत तेज बुखार की शिकायत है. इन्फैक्शन पूरे शरीर में फैल गया है पर इस से महत्त्वपूर्ण यह है कि 8 दिन पहले गिरने के कारण बच्चे को सिर में गहरी चोट लगी थी. ब्लड सर्कुलेशन के साथ इन्फैक्शन दिमाग में चला गया है. कल सुबह इन्फैक्शन के कारण ब्रेन हैमरेज भी हो गया,’’ पीडियाट्रिक्स इमरजैंसी के डा. शांतनु ने संक्षेप में बताया.

‘‘माई गुडनैस,’’ डा. सिद्धार्थ ने कहा, ‘‘मुझे सीटी स्कैन दिखाओ.’’

एक नर्स बच्चे के मातापिता के पास सीटी स्कैन लेने दौड़ी. बच्चे के पिता ने तुरंत सीटी स्कैन और रिपोर्ट नर्स को दे दी और पूछा, ‘‘बच्चा कैसा है सिस्टर. क्या कर रहे हैं अंदर. हम उसे देख सकते हैं क्या?’’

‘‘डाक्टर जांच कर रहे हैं. इलाज चल रहा है. एक बार बच्चे की हालत स्थिर हो जाए फिर आप को बुला लेंगे,’’ कह कर नर्स अंदर चली गई.

बच्चे के मातापिता बेबस से बाहर खड़े रह गए. बच्चे की मां मीनल के तो आंसू नहीं थम रहे थे. बच्चे की चोट वाली जगह से खून की एक लकीर पीछे तक गई थी.

‘‘सर, बच्चे के हाथ में लगा कैनूला ब्लौक हो गया है,’’ नर्स बोली, ‘‘चेंज करना पड़ेगा.’’

‘‘चेंज करो और फौरन आई.वी. ऐंटीबायोटिक और सलाइन शुरू करो. बच्चे का टैंपरेचर अभी कितना है?’’ डा. सिद्धार्थ ने पूछा.

नर्स ने तुरंत थर्मामीटर लगा कर बच्चे का बुखार देखा और कांपते स्वर में बोली, ‘‘सर, 106 से ऊपर है.’’

‘‘दिमाग के इन्फैक्शन में तो यह होना ही था. बच्चे को तुरंत कोल्ड वाटर स्पंज दो. हथेलियों, बगल में, पैर के तलवों और घुटनों के नीचे कोल्ड गौज या कौटन रखो और लगातार उन्हें बदलती रहना. ए.सी. के अलावा एक और पंखा ला कर बच्चे की ओर लगाओ ताकि बुखार आगे न जाने पाए,’’ डा. सिद्धार्थ ने हिदायत दी.

डेढ़ घंटे की जद्दोजहद के बाद कहीं बच्चे का बुखार 103 डिगरी तक आया, तब डा. सिद्धार्थ ने चैन की सांस ली. 2 नर्सों को बच्चों के पास छोड़ कर और इलाज के बारे में समझा कर डा. सिद्धार्थ ने बच्चे के मातापिता को बुला लाने को कहा. पीडियाट्रिक आई.सी.यू. के डाक्टर और नर्सें वापस अपनीअपनी ड्यूटी पर चले गए.

प्रशांत और मीनल दौड़ेदौड़े अंदर आए तो डा. सिद्धार्थ ने कहा, ‘‘हम ने बच्चे का इलाज शुरू कर दिया है. बुखार भी अब कम हो गया है. लेकिन बच्चे के दिमाग में जो इन्फैक्शन हो गया है उस के लिए न्यूरोलौजिस्ट को बुला कर चैकअप करवाना पड़ेगा.’’

‘‘हमारा बच्चा ठीक तो हो जाएगा न?’’ मीनल ने कांपते स्वर में पूछा.

‘‘हम अपनी ओर से पूरी कोशिश करेंगे. कल सुबह डा. बनर्जी दिमाग का उपचार शुरू कर देंगे तो उम्मीद है बुखार कंट्रोल में आ जाएगा. और हां, आप दोनों में से कोई एक ही आई.सी.यू. में बच्चे के पास बैठ सकता है.’’

मीनल ने बच्चे की ओर देख कर उसे पुकारा. थोड़ी देर बाद सोनू ने कमजोर स्वर में ‘हूं’ कहा. बुखार से सोनू बेदम हो रहा था. बीचबीच में अचानक कांप उठता और अजीब से स्वर में कराहने लगता. मीनल बच्चे की यह दशा देख कर रोने लगी.

प्रशांत ने पत्नी के कंधे पर हाथ रख कर उसे तसल्ली दी और अपने आंसू पोंछ कर बोला, ‘‘अपनेआप को संभालो मीनल. हमें उस का पूरा ध्यान रखना है. उसे ठीक करना है. अगर तुम ही टूट जाओगी तो सोनू की देखभाल कौन करेगा?’’

मीनल ने हामी भरते हुए अपने आंसू पोंछे और सोनू का हाथ थाम लिया. सोनू की कमजोर उंगलियों ने मीनल की उंगलियां थाम लीं तो मीनल का दिल भर आया. मस्तिष्क में संक्रमण से सोनू खुल कर रो नहीं पा रहा था और बोल भी नहीं पा रहा था. बस, रहरह कर उस का शरीर कांपता और वह घुटेघुटे स्वर में कराहने लगता.

सोनू का हाथ सहलाते हुए मीनल के सामने बेटे के जन्म से ले कर अब तक की घटनाएं चलचित्र की भांति घूमने लगीं. कितनी खुश थी वह मां बन कर. सोनू के जन्म के बाद उस के पालनपोषण में कब दिन गुजर जाता पता ही नहीं चलता. प्रकृति ने सारे जहां की खुशियां मीनल की झोली में डाल दी थीं. जीवन में खुशियां ही खुशियां थीं. सोनू था भी बहुत प्यारा बच्चा. सारा दिन ‘मांमां’ कहता मीनल का आंचल थामे उस के आगेपीछे घूमता रहता. पर अचानक उन के सुखी संसार में न जाने कहां से दुख के बादल घिर आए.

6 महीने पहले सोनू को बुखार आना शुरू हुआ. प्रशांत उसे डाक्टर के पास ले गया. दवाइयों से 5 दिनों में सोनू ठीक हो गया. मीनल और प्रशांत निश्चिंत हो गए. पर 15 दिन बाद ही सोनू को फिर बुखार आया तो उन्हें चिंता हुई और डाक्टर ने दवा दे कर कहा कि चिंता की कोई बात नहीं है, सभी बच्चों को बदलते मौसम से यह परेशानी हो रही है.

इसी तरह 5 महीने गुजर गए. सोनू को महीने भर तक जब लगातार बुखार के साथ पेट में दर्द, पेशाब में जलन की शिकायत होने लगी तब कसबे के डाक्टर ने उसे बड़े शहर में जा कर चाइल्ड स्पैशलिस्ट को दिखाने को कहा.

मीनल और प्रशांत तुरंत सोनू को शहर ले आए. वहां चाइल्ड स्पैशलिस्ट ने सोनू की खून और यूरिन की सभी जरूरी जांच करवाईं और कल्चर करवाया. कल्चर ड्रग सैंसेटिविटी जांच से पता चला कि अब तक जो ऐंटीबायोटिक सोनू को दी जा रही थीं उन दवाइयों ने सोनू पर कुछ असर ही नहीं किया था और संक्रमण बढ़तेबढ़ते गुर्दों तक फैल गया.

डाक्टर ने उसे तुरंत ऐडमिट कर लिया. 7 दिन तक उसे आई.वी. ऐंटीबायोटिक का कोर्स देने के बाद जब उस का बुखार सामान्य तक आ गया तो उसे जरूरी निर्देश दे कर डिस्चार्ज दे दिया.

मीनल और प्रशांत सोनू को ले कर घर आ गए. 2-3 दिन ठीक रहने के बाद सोनू को फिर से हलकाहलका बुखार रहने लगा. एक दिन घर के सामने पड़ोस के बच्चे खेल रहे थे. सोनू की जिद पर मीनल ने उसे खेलने भेज दिया.

मीनल आंगन में खड़ी हो कर बेटे को देख रही थी कि अचानक एक बच्चे को पकड़ने के लिए दौड़ने की कोशिश करता सोनू लड़खड़ा कर गिर गया. उस का सिर तेजी से एक नुकीले पत्थर से टकराया. खून की धार फूट पड़ी. मीनल घबरा कर जल्दी से उसे डाक्टर के यहां ले कर दौड़ी. डाक्टर ने दवा लगा कर पट्टी बांध दी.

घटना के 5वें दिन अचानक सोनू बेचैन हो कर हाथपैर पटकने लगा, अजीब तरह से कराहने लगा. मीनल ने उस का बदन छुआ तो उसे तेज बुखार था. मीनल ने तुरंत प्रशांत को फोन लगाया. प्रशांत औफिस से उसी समय घर आया और वे सोनू को शहर के चाइल्ड स्पैशलिस्ट के पास ले गए. उन्होंने तुरंत उसे ऐडमिट करवाया. उस का सीटी स्कैन करवाया तो पता चला कि चोट से शरीर में मौजूद संक्रमण मस्तिष्क तक चला गया है और तेज बुखार व संक्रमण के चलते सोनू को ब्रेन हैमरेज हो गया है.

मीनल तो यह सुन कर होश ही खो बैठी. कुछ दिनों तक वे लोग अपने शहर में इलाज कराते रहे लेकिन सोनू की स्थिति में सुधार न होता देख डाक्टर ने प्रशांत से सोनू को दिल्ली ले जाने के लिए कहा. मीनल और प्रशांत तुरंत सोनू को दिल्ली ले आए.

सोनू का हाथ थामे मीनल ने गहरी सांस ली. सोनू अब भी बेचैनी और दर्द से हाथपैर पटक रहा था और एक मां बेबस सी बैठी थी. सच, कुदरत के आगे इंसान कितना लाचार है.

सुबह 8 बजे डा. बनर्जी अपनी टीम सहित सोनू का निरीक्षण करने आ पहुंचे. उन्होंने सोनू को देखा और उस की रिपोर्ट की जांच की. डाक्टर व नर्सों को कुछ नई दवाइयों के बारे में बताया और फिर प्रशांत को बुलवाया.

‘‘देखिए, हम ने मस्तिष्क के संक्रमण के लिए एक नई दवा स्टार्ट कर दी है. जरूरत पड़ी तो एकदो दिन में एक सीटी स्कैन करवा लेंगे,’’ डा. बनर्जी ने प्रशांत और मीनल से कहा.

‘‘सोनू कब तक ठीक हो जाएगा डाक्टर साहब?’’ प्रशांत ने पूछा.

‘‘हम ने मस्तिष्क के संक्रमण के लिए जो नई ऐंटीबायोटिक शुरू की है, 2-3 दिन इस को देखते हैं, क्या असर होता है फिर आगे के इलाज की योजना बनाएंगे,’’ कह कर डा. बनर्जी वहां से दूसरे मरीज के पास चले गए.

अगले 2 दिनों तक सोनू की स्थिति में कोई सुधार नहीं दिखा तो डा. बनर्जी ने फिर से सोनू का सीटी स्कैन करवाया. संक्रमण फैलने की वजह से अब की बार उस के मस्तिष्क के पिछले हिस्से भी क्षतिग्रस्त नजर आए.

दूसरे दिन मीनल और प्रशांत हताश से बैठे थे कि रात में 8 बजे अचानक सोनू तेज आवाज में खींचखींच कर सांस लेने लगा. मीनल उस के सीने पर हाथ फेरने लगी. सिस्टर जल्दी से डाक्टर को बुला लाई. डाक्टर ने सोनू की स्थिति को देखते ही सिस्टर से कहा, ‘‘पेशेंट को तुरंत वैंटीलेटर पर शिफ्ट करना पड़ेगा. सिस्टर, डा. यतिन को फौरन बुलाओ और जब तक यतिन आते हैं तब तक बाकी सब तैयारी हो जानी चाहिए.’’

डा. यतिन ने पहुंचते ही मीनल से कहा, ‘‘आप प्लीज बाहर वेट करिए. हमें सोनू को वैंटीलेटर पर शिफ्ट करना पड़ेगा. बाद में हम आप को बुलवा लेंगे.’’

मीनल चुपचाप बाहर आ गई. उस ने प्रशांत को सबकुछ बताया. दोनों धीरज रख कर बाहर बैठे रहे.

करीब 2 घंटे बाद डा. यतिन ने प्रशांत और मीनल को बुलवाया और बताया, ‘‘सोनू खींचखींच कर सांस ले रहा था. इस का अर्थ है कि उस के दिमाग में ब्रीदिंग कंट्रोल करने वाला भाग डैमेज हो गया है. मस्तिष्क के किसी भी भाग की क्षति स्थायी होती है. आई एम सौरी. देखते हैं,’’ डा. यतिन ने प्रशांत का कंधा थपथपाया और चले गए.

अगले 2 दिनों में डा. बनर्जी ने फिर से सोनू का सीटी स्कैन करवाया और रिपोर्ट देख कर प्रशांत से बोले, ‘‘कल रात में इस का एक और बार ब्रेन हैमरेज हो चुका है. संक्रमण की वजह से मस्तिष्क के ज्यादातर हिस्से क्षतिग्रस्त हो कर काम करना बंद कर चुके हैं. हमें अफसोस है, हम सोनू के लिए कुछ नहीं कर पाए.’’

स्तब्ध सी मीनल धड़ाम से कुरसी पर गिर पड़ी. प्रशांत ने उस के कंधे पर अपना कांपता हुआ हाथ रख दिया. उन के घर का चिराग बस बुझने को ही है और वे नियति के हाथों कितने मजबूर हैं, लाचार हैं.

तीसरे दिन सुबह डा. लतिका ने प्रशांत और मीनल को अपने कैबिन में बुलवाया. डा. लतिका भी डा. यतिन की तरह ही पीडियाट्रिक्स की सीनियर डाक्टर थीं. उन्होंने पहले तो मीनल और प्रशांत को पानी पिलाया और फिर कहना प्रारंभ किया :

‘‘देखिए, आप सोनू की हालत तो जानते ही हैं. संक्रमण की वजह से उस के ब्रेन के ज्यादातर हिस्सों ने काम करना बंद कर दिया था. आज सुबह न्यूरोलौजिस्ट ने उस की जांच की तो पता चला कि उस के पूरे मस्तिष्क की क्रियाशीलता खत्म हो चुकी है. डाक्टरी भाषा में कहें तो सोनू की ब्रेन डैथ हो चुकी है.’’

‘‘नहीं…’’ मीनल चीत्कार कर उठी. प्रशांत भी सुबक उठा. करीब 15 मिनट बाद मीनल और प्रशांत के दुख का ज्वार कुछ कम हुआ तो प्रशांत ने पूछा, ‘‘सोनू की सांस और धड़कन तो चल रही है, डाक्टर.’’

‘‘जी, वह बस वैंटीलेटर (सिस्टोलिक ब्लडप्रैशर) के कारण चल रही है. अगर हम अभी वैंटीलेटर हटा लेते हैं तो उस की सांस और धड़कन बंद हो जाएगी. ब्रेन डैथ के मामले में हम 12 घंटे बाद दोबारा सारी जांच कर के यह तय करते हैं कि कहीं जीवन का लक्षण बाकी है या नहीं. तभी हम वैंटीलेटर हटाते हैं,’’ डा. लतिका ने समझाया, ‘‘लेकिन अगर आप चाहें तो सोनू का दिल हमेशा धड़कता रह सकता है.’’

‘‘जी? वह कैसे?’’ मीनल और प्रशांत ने एकसाथ अचरज से पूछा.

‘‘बात यह है कि हमारे अस्पताल में एकदो मरीज हैं जिन्हें तुरंत हार्ट ट्रांसप्लांट की जरूरत है. यदि आप सोनू का हार्ट डोनेट कर सकें तो उन में से जिस के साथ भी क्रास मैचिंग हो जाए उस में सोनू का हार्ट ट्रांसप्लांट किया जा सकता है. इस तरह से आप के बच्चे के जाने के बाद भी उस का दिल इस दुनिया में धड़कता रहेगा,’’ डा. लतिका ने कहा.

‘‘नहींनहीं. आप यह कैसी बातें कर रही हैं,’’ मीनल तड़प कर बोली, ‘‘आप मेरे सोनू के शरीर से…आप को एक मां के दर्द का जरा सा भी एहसास नहीं है.’’

डा. लतिका ने मीनल के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘मैं भी एक मां हूं, मुझे तुम्हारे दर्द का पूरा एहसास है, मीनल.

‘‘तुम्हारे सोनू की जगह उस दिन मेरा ही बेटा था. हां, मीनल यह घटना 6 साल पहले की है. मेरे 18 बरस के बेटे का जन्मदिवस था. वह अपने दोस्तों के साथ एक रैस्टोरैंट में गया था. लौटते समय उस की बाइक का ऐक्सीडैंट हो गया. सिर में लगी गंभीर चोट की वजह से उस की ब्रेन डैथ हो चुकी थी. मैं उस के दिल की धड़कन को हमेशा के लिए बरकरार रखना चाहती थी पर देश में उस समय हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए मरीज उपलब्ध नहीं था.’’

डा. लतिका ने अपने आंसू पोंछ कर फिर कहना शुरू किया, ‘‘मेरे बेटे की धड़कन तो मैं नहीं बचा पाई लेकिन हम ने उस की दोनों किडनी और आंखें डोनेट कर दीं. आज कहीं न कहीं उस की आंखें यह दुनिया देख रही हैं. उस के गुर्दों ने तब मौत के मुंह में जाते 2 लोगों को बचा लिया था.’’

कुछ देर के मौन के बाद प्रशांत ने हिम्मत कर के पूछा, ‘‘आप हार्ट किस को डोनेट करेंगे?’’

‘‘क्षमा कीजिएगा, कुछ नियमों के कारण हम आप को यह जानकारी तो नहीं दे सकते. यह बात दोनों ही परिवारों से गुप्त रखी जाती है. मुझे भी अपने बेटे के समय ट्रांसप्लांट सर्जन ने यह जानकारी नहीं दी थी. लेकिन ट्रांसप्लांट सफल हुआ है या नहीं, वह सूचना हम आप को अवश्य देंगे,’’ डा. लतिका ने स्पष्ट किया.

प्रशांत और मीनल डा. लतिका से विदा ले कर आई.सी.यू. में आ कर सोनू के पास बैठ गए. वैंटीलेटर के मौनिटर पर सोनू की धड़कनों का रिकौर्ड आ रहा था. उसे देखते ही प्रशांत बिलख कर बोले, ‘‘हां कह दो मीनल. अपने सोनू की धड़कनों के सिलसिले को रुकने मत दो. डाक्टर की बात मान लो.’’

मीनल हैरानी से पति को देख कर बोली, ‘‘तुम भी यही कह रहे हो, प्रशांत? बताओ, मैं कैसे अपने मासूम बच्चे की चीराफाड़ी…’’ आगे के शब्द मीनल के आंसुओं से बह गए.

‘‘जरा सोचो मीनल, कुछ घंटे बाद ब्रेन डैथ कन्फर्म होने के बाद यों भी ये लोग वैंटीलेटर हटा देंगे. तब तो सोनू की सांस और धड़कन सबकुछ खत्म हो जाएगा. हम भी उसे श्मशान ले जा कर जला देंगे. सबकुछ राख हो जाएगा. आज डाक्टर ने हमें कितना बड़ा मौका दिया है कि हम उस की धड़कन को, उस की आंखों की रोशनी को हमेशा के लिए बरकरार रख सकते हैं. हमारा सोनू किसी न किसी रूप में आगे भी जीवित रहेगा.’’

प्रशांत की नजरें अभी भी सोनू की धड़कनों पर थीं.

‘‘मुझे क्या करना है दुनिया से,’’ मीनल बोली, ‘‘मैं अपने मासूम बच्चे के साथ ऐसा नहीं कर सकती.’’

‘‘ऐसा न कहो मीनल,’’ प्रशांत ने उस के कंधे पर हाथ रख कर समझाया, ‘‘डा. लतिका ने कहा न सोनू जल्द ही तुम्हारे पास आ जाएगा. सोनू को बचाने में हम ने कोई कसर बाकी नहीं रखी. परंतु सोनू के जाने के बाद भी उस की धड़कन और आंखों की रोशनी को बरकरार रख कर हमें मानवता की इतनी बड़ी सेवा करने का मौका मिला है.’’

मीनल चुपचाप सुबकती रही. प्रशांत फिर बोले, ‘‘देश और देशवासियों की रक्षा के लिए मांएं अपने जवान बेटों को सीमा पर हंसतेहंसते कुरबान कर देती हैं. क्या उन्हें अपने बेटों को खोने का गम नहीं होता होगा? पर देश, समाज और इंसानियत की रक्षा के लिए वे हंस कर यह दर्द, यह तकलीफ सह लेती हैं. उन का ध्यान करो. अपने बच्चों को खोते समय वे भी तो नहीं जानतीं कि किन लोगों के लिए उन्हें कुरबान कर रही हैं. जिन की रक्षा में उन के बच्चे अपने प्राण गंवाते हैं उन को सैनिकों की मांएं कहां पहचानती हैं.

‘‘तुम भी यह मत सोचो कि सोनू का दिल या आंखें किस में ट्रांसप्लांट होंगी. बस, मानवता के प्रति अपना कर्तव्य समझ कर हां कर दो,’’ प्रशांत ने उस के सिर पर हाथ फेरते हुए उसे समझाने की आखिरी कोशिश की.

मीनल ने अपना हाथ सोनू के सीने पर रखा. उस का दिल अपनी लय में धड़क रहा था. उस की धड़कन महसूस करते ही मीनल फफक पड़ी और रोते हुए बोली, ‘‘आप ठीक कहते हैं. मैं मां हूं. अपने बच्चे की धड़कन को भला कैसे रुकने दे सकती हूं. नहींनहीं, आप डा. लतिका से कह दीजिए कि मेरे सोनू के दिल की धड़कन हमेशा चलती रहेगी. उस की आंखें भी यह दुनिया देखती रहेंगी.’’

मीनल को गले लगाते हुए प्रशांत खुद फफक कर रो दिया.

प्रशांत के फैसले पर उस का हाथ पकड़ कर डा. लतिका ने आंखों में आंसू भर कर रुंधे गले से कहा, ‘‘तुम ने अपने बच्चे को अंधेरे में खो जाने से बचा लिया. तुम नहीं जानती हो कि तुम ने कितना बड़ा काम किया है. मानवता की कितनी बड़ी सेवा की है. कितने घरों के चिराग रोशन कर दिए. मैं तुम्हें दिल से दुआ देती हूं, तुम्हारा सोनू जल्द ही तुम्हारे पास वापस आएगा,’’ डा. लतिका ने मीनल को गले लगा लिया.

अगले दिन प्रशांत और मीनल अपने घर में रिश्तेदारों से घिरे बैठे थे. तभी प्रशांत को डा. लतिका का फोन आया. सोनू का हार्ट उपलब्ध मरीजों में से एक के साथ मैच कर गया तथा उस बच्चे में प्रत्यारोपित कर दिया गया. प्रत्यारोपण सफल रहा है.

इस के एक माह बाद डा. लतिका का फिर से फोन आया. सोनू का हार्ट जिस बच्चे में प्रत्यारोपित किया गया था उस के शरीर ने सोनू के दिल को स्वीकार कर लिया है. बच्चा अब पूरी तरह से स्वस्थ हो कर अपने घर जा रहा है. आप के सोनू का दिल सफलतापूर्वक धड़क रहा है और आगे भी धड़कता रहेगा. सोनू की आंखें भी 2 लोगों को लगाई जा चुकी हैं.

प्रशांत और मीनल ने एकदूसरे की ओर देखा. दोनों के मन ने एक अजीब सा संतोष महसूस किया. उन का सोनू आज भी जीवित है, उन्होंने सोनू को राख बन कर बिखर जाने से बचा लिया. उन का सोनू अमर हो गया.

इतने दिनों की भागादौड़ी और दुख में मीनल ने अपनी ओर ध्यान ही नहीं दिया था. उस का सोनू तो कभी कहीं गया ही नहीं था. वह तो रूप बदल कर पहले से चुपचाप मीनल की कोख में छिप कर बैठा था. डा. लतिका की दुआ सच हुई. जिंदगी फिर मुसकरा रही थी.

यह तो होना ही था: भाग 3- वासना का खेल मोहिनी पर पड़ गया भारी

इसी बीच अनिल औफिस की किसी मीटिंग से फ्री हुआ तो लंचटाइम में मिलने के लिए उस ने कई बार मोहिनी को फोन मिलाया. मोहिनी ने आज अपना फोन पहली बार बंद कर रखा था. अनिल ने सोचा क्या हो गया, आज फोन क्यों बंद है, जा कर देखता हूं.

कालेज में कोमल की तबीयत कुछ ढीली थी. उस ने सोचा मां के पास जा कर आराम करती हूं. वह भी मोहिनी को फोन मिला रही थी. फोन बंद होने पर कोमल को मां की चिंता होने लगी. वह फौरन छुट्टी ले कर मां से मिलने चल दी.

अनिल मोहिनी के घर पहुंचा तो देखा ताला लगा हुआ है. इस समय कहां चली गई, उस ने इधरउधर देखा, कुछ बच्चे खेल रहे थे. उन में से एक बच्चे ने इशारा किया कि आंटी उस घर की तरफ गई हैं, अनिल के मन में पता नहीं क्या आया, वह सुधीर के घर की तरफ चल दिया. कोमल भी पड़ोस में रहने वाली कुसुम आंटी के यह बताने पर कि उन्होंने मोहिनी को सामने वाले सुधीर के घर जाते देखा है. अत: वह भी सुधीर के घर चल दी.

अनिल ने सुधीर की डोरबैल बजाई, अंदर सुधीर और मोहिनी बैड पर एकदूसरे में खोए निर्वस्त्र लेटे थे. डोरबैल बजने पर कोई कूरियर होगा यह सोच कर बस टौवेल लपेट कर गेट खोल दिया. सामने अनिल खड़ा था. सुधीर की अस्तव्यस्त हालत देख अनिल को एक पल में सब सम झ आ गया.

अब तक कोमल भी चुपचाप पीछे आ कर खड़ी हो चुकी थी. सुधीर सकपका गया. वह अनिल से तो कभी नहीं मिला था, लेकिन कोमल से 1-2 बार मिल चुका था. अनिल ने सुधीर को एक तरफ धक्का दे कर अंदर जाते हुए पूछा, ‘‘कहां है मोहिनी?’’

कोमल को धक्का लगा कि अनिल कैसे उस की मां का नाम ले रहा है… क्या हो रहा है यह सब.

इतने में सुधीर चिल्लाया, ‘‘तुम यहां क्या कर रहे हो… जाओ यहां से.’’

‘‘मैं मोहिनी से मिल कर जाऊंगा,’’ कहते हुए अनिल बैडरूम की तरफ बढ़ गया. सुधीर ने पहले जल्दी से अंदर जा कर अपनी पेंट उठाई फिर बाथरूम में पहन कर निकला. तब तक अनिल मोहिनी के सामने पहुंच चुका था.

बैडरूम का दृश्य देख कर कोमल जैसे पत्थर की हो गई. निर्वस्त्र, अपने को चादर से ढकने की कोशिश करते हुए अब मोहिनी को लग रहा था कि काश, धरती फट जाए और वह उस में समा जाए.

कोमल को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. उस की मां इस हालत में और अनिल.

उस ने सुधीर का कौलर पकड़ लिया. दोनों में हाथापाई शुरू हो गई. उमाशंकर और उन का परिवार, कुसुम, बाकी पड़ोसी भी शोर सुन कर वहां पहुंच गए.

किसी को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था और रहीसही कसर अनिल ने गुस्से में चीखते हुए पूरी कर ली. वह कह रहा था, ‘‘कोई सोच भी नहीं सकता कि क्याक्या

खेल खेले हैं तूने, बेशर्म, लालची औरत, अपनी बेटी को भी धोखा दिया है तू ने, अपने दामाद

को भी नहीं छोड़ा तू ने, इतने दिनों से मु झे फंसा रखा था.’’

कोमल को लग रहा था उस के कान के परदे फट जाएंगे. अनिल और सुधीर की आपस की लड़ाई और मोहिनी के बारे में कहे जा रहे सस्ते शब्दों को सुन कर सारी बात उस के सामने साफ हो गई, मारपिटाई बढ़ती देख इतने में किसी पड़ोसी ने पुलिस को खबर कर दी. पुलिस ने आ कर अनिल, सुधीर को जीप में बैठने के लिए कहा. सुधीर ने बड़ी मुश्किल से कपड़े पहनने

की इजाजत मांगी, पुलिस के सिपाही ने अनिल को कौलर पकड़ कर बाहर की तरफ चलने का इशारा किया.

अनिल जातेजाते मोहिनी को गालियां देता रहा. सुधीर भी जाते हुए चिल्ला

रहा था, ‘‘तू वेश्या से भी बदतर है, थू है तु झ पर, गिरी हुई औरत है तू.’’

पड़ोसी भी 1-1 कर कोमल के कंधे पर सांत्वना का हाथ रख कर चले गए, खड़ी रह गई कोमल ने जलती हुई, नफरत भरी आंखों से मोहिनी को देखा और फुफकार उठी, ‘‘आज आप ने मेरा हर रिश्ते से विश्वास उठा दिया. आज से आप का और मेरा कोई रिश्ता नहीं, कभी मेरे सामने मत आना,’’ कह कर कोमल चली गई.

अब मोहिनी शर्मिंदगी और पछतावे में डूब कर घुटनों पर सिर रख कर फूटफूट कर रो रही थी, अपने रूप और यौवन का सहारा ले कर, वासना और लालच का खेलखेल कर

2 पुरुषों से अनैतिक संबंध रख कर उन से फायदा उठाने चली थी… अब बेटी और समाज की नजरों में हमेशा के लिए गिर गई थी… यह तो होना ही था.

अनुपमा की जिंदगी में आया नया मोड़, गुरू मां को देखकर उड़ेंगे अनुज के होश

रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना स्टारर ‘अनुपमा’ धारावाहिक दर्शको के बीच धूम मचा रहा है. अनुपमा शो में आए दिन नए-नए ट्विस्ट और टर्न्स देखने को मिलते है. शो के मेकर्स अनुपमा में तड़का लगाने के लिए रोज नया मसाला लेकर आते है जिसकी वजह से शो नंबर वन पर बना हुआ है. शो में आने वाले इन मोड़ ने दर्शकों को भी बखूबी से बांधा हुआ है. ‘अनुपमा’ के नए एपिसोड में जहां समर और डिंपल की शादी हो रही है तो वहीं अनुज और अनुपमा की जिंदगी में आने वाले बवाल भी कम नहीं हो रहे हैं.

समर और डिंपल की शादी

अनुपमा में देखने को मिलेगा कि समर और डिंपल की शादी धूमधाम से हो रही है. शादी में जहां गठबंधन डॉली करेगी तो वहीं कन्यादान डिंपल की मां करेगी. वहीं अनुपमा भी समर और डिंपल को आशीर्वाद देगी कि अब तुम लोग मैं से हम हो चुके हो तो हमेशा एक साथ रहना और एक-दूजे का साथ देते रहना.

 

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सगी मां से होगा अनुज का सामना

शो में ट्विस्ट और टर्न्स आते ही रहते है ऐसे में एंटरटेंमेंट का डोज यहीं खत्म नहीम होता. अनुपमा के अपकमिंग एपिसोड में देखने को मिलेगा कि समर और डिंपल के फेरे के बाद शो मे गुरु मां की एंट्री होगी. जिसे देखकर अनुपमा खुशी से चिल्ला पड़ेगी. किंतु जब अनुज उन्हें पीछे से मुड़कर देखेगा तो हैरान हो जाएगा. गुरु मां घर में कदम रखेगी तो उनका पैर कील पर पड़ने वाला होता है लेकिन अनुज ये देखकर अपना हाथ रख देगा. गुरु मां लड़खड़ा जाएंगी और सहारे के लिए अनुज पर हाथ रख देंगी. लेकिन दोनों एक-दूजे को हैरानी से देखेंगे.

अनुपमा की जिंदगी में आई मुसीबत

इतना ही नहीं शो में देखने को मिलेगा कि गुरु मां अनुपमा को अमेरिका की अकेडमी की जिम्मेदारी अनुपमा के हाथ में देगी. इस बात से अनुपमा तो खुश हो जाएगी, लेकिन नकुल नाराज होगा. वह रोते हुए अनुपमा से बदला लेने का भी फैसला करेगा.

मुझे बोन डैंसिटी टैस्ट के बारे में जानना चाहती हूं, आखिर ये क्या होता है?

सवाल

मेरे परिवार में औस्टियोपोरोसिस का पारिवारिक इतिहास है. मैं बोन डैंसिटी टैस्ट के बारे में जानना चाहती हूं. यह क्या होता है और इसे कब कराना चाहिए?

जवाब

बोन डैंसिटी टैस्ट में एक विशेष प्रकार के ऐक्सरे जिसे डीएक्सीए (ड्युअल ऐनर्जी ऐक्सरे) कहते हैं के द्वारा स्पाइन, कूल्हों और कलाइयों की स्क्रीनिंग की जाती है. इन भागों की हड्डियों की डैंसिटी माप कर इन की शक्ति का पता लगाया जाता है ताकि हड्डियों के टूटने से पहले ही उन का उपचार किया जा सके. आप 45 साल की उम्र में बोन डैंसिटी टैस्ट करा सकती हैं और इसे हर 5 साल बाद कराएं.

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सवाल

मैं 28 वर्षीय कामकाजी महिला हूं. मैं ने सुना है कि आज के समय में युवावस्था में ही लोगों की हड्डियां कमजोर हो रही हैं. ऐसा क्यों हो रहा है और इस से कैसे बचा जा सकता है?

जवाब

युवाओं में हड्डियों के कमजोर होने का सब से प्रमुख कारण औस्टियोपोरोसिस है. औफिस और घर में घंटों बैठे रहने के कारण शारीरिक सक्रियता में काफी कमी आई है जिस से बोन मास में युवावस्था में ही कमी आने लगती है. गैजेट्स और इलैक्ट्रौनिक उपकरणों के बढ़ते प्रचलन ने युवाओं को चारदीवारी में कैद कर दिया है जिस से प्राकृतिक प्रकाश नहीं मिल पाता और उन में विटामिन डी की कमी हो जाती है. उस से औस्टियोपोरोसिस का खतरा और बढ़ जाता है. जंक फूड्स और फास्ट फूड्स का बढ़ता चलन, अनियमित जीवनशैली, बढ़ता तनाव और नींद की कमी भी हड्डियों को कमजोर बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है. पोषक और संतुलित भोजन का सेवन करें. घर और औफिस की चारदीवारी से निकलें और प्राकृतिक प्रकाश में समय बिताएं. नियमित रूप से वर्कआउट करें. पूरी नींद लें.

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सवाल

मेरे मातापिता दोनों को औस्टियोपोरोसिस है. मैं जानना चाहती हैं कि क्या आनुवंशिक कारक भी औस्टियोपोरोसिस का रिस्क फैक्टर माना जाता है?

अगर मातापिता में से किसी को औस्टियोपोरोसिस है तो उन की संतान में इस के होने की संभावना 70त्न तक बढ़ जाती है. आप के मातापिता दोनों को औस्टियोपोरोसिस है इसलिए आप को सतर्क रहना चाहिए. वैसे भी महिलाओं के औस्टियोपोरोसिस की चपेट में आने की आशंका पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा होती है. विशेष कर छोटे कद की और दुबलीपतली महिलाओं के. औस्टियोपोरोसिस से बचने के लिए अपने खानपान का ध्यान रखें और नियमित रूप से ऐक्सरसाइज करें.

-डा. रमणीक महाजन

सीनियर डाइरैक्टर ऐंड हेडजौइंट रिकंस्ट्रक्शन यूनिट (नी ऐंड हिप),

मैक्स सुपर स्पैश्यलिटी हौस्पिटलसाकेतनई दिल्ली.

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तलाक मिलना इतना पेचीदा क्यों

शादी का रिश्ता सात जन्मों का माना जाता है और इसे तोड़ना एक आफत होती है. एक अदालत के अधिकारियों और वकीलों के मुताबिक यह शायद भारत में अपनी किस्म का पहला ही मामला है जहां दोनों पक्षों में से कोई भी सुनवाई के कौन्फैंसिंग लिए मौजूद नहीं था. काननून कम से कम एक पक्ष को आमतौर पर अदालत में मौजूद रहना पड़ता है, किंतु वीडियो  के माध्यम से अमेरिका में रहने वाले पति और आस्टे्रलिया में रहने वाली पत्नी से सहमति मिलते ही दोनों को ईमेल पर तलाक की कौपी भिजवा दी गई.

पेशे से सौफ्टवेयर इंजीनियर दोनों पति और पत्नी 30 साल के भी नहीं हुए थे, लेकिन उन के बीच विवाद इस कदर था कि तलाक से पहले 6 महीने की अनिवार्यता को देख कर पति ने अमेरिका में नौकरी तलाश ली तो बीवी ने आस्ट्रेलिया में जौब ढूंढ़ी. अब तलाक का मामला कोर्ट में गया तो सुनवाई वाले दिन दोनों पक्षों ने कोर्ट को सूचित किया कि वे नहीं आ सकते. लिहाजा कोर्ट ने वीडियो कौन्फैंसिंग का सहारा लिया.

इस में वक्त के साथ खर्च भी बचा और यह तलाक, तलाक के उन अन्य मामलों में अनोखा था जहां कम से कम 2 लाख रुपए का खर्च आता है. दोनों पक्षों की यात्रा में लगने वाले समय की बचत हुई वह अलग.

आसान नहीं थी डगर तलाक की

आमतौर पर तलाक या अलगाव का फैसला एक दिन या कुछ पलों में लिया जाने वाला फैसला नहीं है. इस की कवायद महीनों से ले कर सालों तक चलती है. इस के चलते अलग होने वाले पतिपत्नी मानसिक, शारीरिक क्लेश तो  झेलते ही हैं आर्थिक दंड भी भुगतते हैं.

शायद इस बात को समझते हुए विदेशों में 2005 में स्पेन की नई सरकार ने एक नया तलाक का कानून बनाया, जिस के चलते तलाक लेना आसान हुआ. हां इस से तलाक के मामलों में वृद्धि तो देखी गई पर पतिपत्नी को जल्दी छुटकारा मिल जाता. इस के पहले की चर्च की मान्यता मानने वाली कंजरवेटिव पार्टी की सरकार में तलाक लेना मुश्किल था क्योंकि कानूनी प्रक्रिया इस की इजाजत नहीं देती थी.

यद्यपि लोगों ने फिर भी रास्ता निकाल लिया था, जिस में जोड़े कानून अलग नहीं होते थे, मगर वे अलग ही रहते थे. इसे स्पेनिश तलाक का तरीका कहा जाता था. इस कानून से पहले स्पेन में तलाक की दर यूरोपीय देशों में सब से कम थी.

हमारे देश में भी तलाक का मुद्दा सामाजिक रूप से चर्चा और विवाद का मुद्दा बना हुआ है. करीब 50 साल पहले यह कोई मुद्दा नहीं था. ऐसा समाज की अच्छाई के कारण था या विकल्पहीनता की स्थिति के कारण यह विश्लेषण करने वाले व्यक्ति के नजरिए के साथ जुड़ा हुआ है.

लेकिन यह सभी के लिए विचारणीय है कि कानून की सख्ती द्वारा या समुदाय के दबाव में लोगों को एकसाथ रहने के लिए मजबूर करना क्यों न्यायोचित्त माना जाए. कोई 2 लोग साथ रहना चाहते हैं या अलग, यह निर्णय उन्हीं दोनों को करना चाहिए क्योंकि वे ही समझ सकते हैं कि उन के लिए क्या ठीक है.

देश में तलाक की स्थिति

तलाक के मुद्दे को इस दृष्टि से भी समझने की जरूरत है कि यह स्वयं एक अधिकार है जिसे आप चाहें तो इस्तेमाल करें या न करें. एक जमाना था जब भारत में तलाक लेना संभव ही न था या यों समझ लें कि संबंध विच्छेद करना पतियों के हाथ में था, जहां पत्नियों का उन के हाल पर छोड़ दिया जाता था. यहां तक कि परित्यक्ता की गलती थी भी या नहीं यह सोचने की जहमत कोई नहीं उठाता था.

बहुत से लोगों को यह जान कर आश्चर्य होगा कि आजादी के बाद 1956 में हिंदू बिल पास होने से पहले हिंदू औरत को यह अधिकार भी नहीं था कि वह अपने अत्याचारी, शराबी, दुष्चरित्र, परस्त्रीगामी पति से तलाक की मांग कर सम्मानपूर्वक अलग हो सके.

इसे संसद में पहली बार जवाहर लाल नेहरू और कानून मंत्री डा. अंबेडकर ने पेश किया था. तब सनातनी हिंदुओं के दबाव में आ कर यह कानून पास नहीं हो सका और फिर बाद में उस का संशोधित और कमजोर रूप जो टुकड़ों में आया कानून बना था अर्थात जो काम पुरुष बिना कानून के करते थे, उसे नागरिक समाज की मर्यादा के अनुरूप स्त्री और पुरुष दोनों को करने का अधिकार मिला.

राजेंद्र प्रसाद जैसे कट्टरपंथी आदमियों को तो पूरे अधिकार देने के पक्षधर थे पर औरतों को तलाककी जगह आत्महत्या करने की व्यवस्था करते थे.

पेचीदगियों का सामना

इस के बाद अन्याय से लड़ने और अपने अधिकारों को पाने की संघर्ष प्रक्रिया में भी बदलाव आया. विवाह टूटने पर कई बार कोई भी प्रमाण न होने पर स्त्रियों को कई बार कानूनी पेचीदगियों का सामना करना पड़ता था. इन्हीं विवादों से चिंतित हो कर उच्च न्यायालय ने पिछले दिनों केंद्र सरकार, राज्य सरकार और केंद्रशासित प्रदेशों को आदेश दिया कि वे सभी जातियों में विवाह का पंजीकरण अनिवार्य करने संबंधी कानून बनाएं.

हालांकि हमारे यहां विवाह एक पारिवारिक मसला समझ जाता है, लेकिन अब समय की मांग है कि हम विवाह पंजीकरण के माने समझे. पंजीकरण जरूरी है. शादी के तुरंत बाद खासतौर पर एनआरआई लड़के से शादी के समय पंजीकरण करवाने के बाद इस की एक प्रति अपने पास रखना जरूरी है क्योंकि धोखाधड़ी के मामले में ऐसे कानूनी दस्तावेज महिला का पक्ष मजबूत बनाते हैं जिस से तलाक की प्रक्रिया जल्दी निबटने की संभावना बनती है.

विवाद के मामले

अक्तूबर, 2006 में घरेलू हिंसा कानून आने के बाद स्त्रियों के प्रति होने वाले अत्याचारों की सुनवाई 498 सेक्शन के तहत होने लगी. जिस के नतीजे में देश के अलगअलग थानों अदालतों में इस के तहत लाखों से अधिक विवाद के मामले दर्ज हुए.

इतना होने के बाद भी कहीं न कहीं कानूनी व्यवस्था ऐसी है जिस से भारत में तलाक लेना आसान बात नहीं होती क्योंकि देश के कानून में न्यायालयों द्वारा इस बात के समुचित आदेश दिए गए हैं कि वे तलाक के प्रकरणों पर अपना निर्णय सुनाने में जल्दीबाजी न करें, इसलिए तलाक के प्रकरणों में सुनाई की तिथियां लंबे अंतराल वाली दी जाती हैं. दोनों पक्षों द्वारा न्यायालय के अनेक चक्कर लगवाए जाते हैं ताकि इस बीच उन में कोई सुलह हो जाए, लेकिन ऐसा कभीकभी ही हो पाता है.

मगर अधिकांश मामलों में ऐसा नहीं होता. प्रेम और सदविश्वास का टूटा धागा प्राय जुड़ नहीं पाता. यदि गांठ गठीले हो कर दबाव और मजबूरी में जुड़ती भी है, तो दोनों पक्ष जीवनपर्यंत विपरीत धु्रव बन कर मजबूरी का जीवन व्यतीत करते देखे गए हैं. अत: दांपत्य की डोर खींच कर टूटने के कगार पर पहुंच जाए तो उसे दांपत्य दुर्घटना मान कर टूट जाने देना चाहिए. अदालतें अब यह बात समझने लगी है. इसलिए वे अपना निर्णय सुनाने में उतनी देर नहीं करतीं, जितनी पहले करती थीं.

आमतौर पर जब विवाह विच्छेद के साथ अन्य मुद्दे जैसे भरणपोषण, बच्चों का संरक्षण, उत्तराधिकार और संपत्ति वितरण जुड़े होते हैं तो अदालतों को निर्णय सुनाने में देर लगती है. यदि कोई स्त्री पति के अत्याचार की शिकायत अपनी याचिका में करती है तो उसे अत्याचार को सिद्ध करने में वक्त लगता है.

हां लेकिन अगर पतिपत्नी को जल्दी तलाक चाहिए तो पतिपत्नी अगर आपसी समझैते पर एकसाथ याचिका दायर करें तो इस से तलाक जल्दी मिल जाता है क्योंकि उन के ज्यादातर  झगड़ों के मुद्दे अदालत में जाने से पहले ही सुलझ चुके होते हैं.

जब एकसाथ रहना मुश्किल हो

आमतौर पर शादी के 1 साल के बाद ही तलाक लेने की सोची जा सकती है क्योंकि कानून 1 साल के अंदर तलाक दिए जाने का प्रावधान नहीं है. फिर भी अगर किसी दंपती में शादी के दो महीने बाद ही खटपट शुरू हो जाए और परिस्थितियां इस तरह असामान्य बन जाएं कि एकसाथ रहना बेहद मुश्किल हो चुका हो तो उन के याचिका दायर करने के बाद हाई कोर्ट यह देखता है कि उन की तलाक प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए या नहीं.

जब प्रेम की डोरी टूट जाए

विवाह के प्रथम चरण यानी बच्चा पैदा करने से पूर्व भी तलाक की सुनवाई शीघ्र होती लेकिन यदि बच्चे हो जाएं तब उन के व्यस्क होने पर, उन के दायित्व निर्वाह के बाद पतिपत्नी यदि तलाक मांगें तो अदालतें तलाक का मामला जल्दी निबटाती हैं. भले ही अभी तलाक की प्रक्रिया भारत में लंबी हो, लेकिन बदलते वक्त के साथ अदालतें भी समझने लगी हैं कि जब प्रेम की डोरी टूट जाए तो रिश्ते को फिर से जोड़ने की जद्दोजहद करने से बेहतर है उसे तोड़ देना.

तलाकों में अब सिल्वर तलाक की संख्या भी बढ़ रही है जिस में पतिपत्नी बच्चों की शादियां करने के बाद अकेले सुख से रहना चाहते हैं चाहे उन को दूसरा साथी मिले या न मिले. अदालतों में 60 से ऊपर के जोड़े भी तलाक के लिए आने लगे हैं जिस का अर्थ है कि जोड़े एकदूसरे को झेल नहीं पा रहे पर बच्चों के कारण दबाव  झेल रहे थे.

जीवन के आखिरी साल अकेले ही सही पर कम से कम सुकून से तो गुजरें, यह भी जरूरी है. इस में झगड़ालू डौमिनेटिंग धर्म को नुकसान होता है पर यह तो उस की अपनी गलती ही होती है.

वैसे भारत में तलाक दर अभी भी 6% के आसपास है जो पुलिस में सब से कम है पर यह मकानों की कमी के कारण ज्यादा है, संस्कृति और परवरिश के कारण कम. तलाक के बाद सब को मकान नहीं मिलता और देश में किराए पर मकान लेना अकेले के लिए मुश्किल है.

अदालतें आमतौर पर विरोधाभासी कन्फ्यूजन पैदा करने वाली बातें करती हैं. उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय कभी तुरंत तलाक दिलवा देते हैं तो कभी महीनों, सालों इंतजार कराते हैं.

सुंदर माझे घर-भाग 2 : दीपेश ने कैसे दी पत्नी को श्रद्धांजलि

नीरा ने न केवल ड्राइंगरूम बल्कि बैडरूम और रसोईघर को भी सामान्य साजसामान की सहायता व अपनी कल्पनाशीलता से आधुनिक रूप दे दिया था, साथ ही, आगे बगीचे में उस ने गुलाब, गुलदाऊदी, गेंदा और रजनीगंधा आदि फूलों के पेड़ व घर के पीछे कुछ फलों के पेड़ और मौसमी सब्जियां भी लगाई थीं. अपने लगाए पेड़पौधों की देखभाल वह नवजात शिशु के समान करती थी. कब किसे कितनी खाद और पानी की जरूरत है, यह जानने के लिए उस ने बागबानी से संबंधित एक पुस्तक भी खरीद ली थी.

दीपेश कभीकभी घर सजानेसंवारने में पत्नी की मेहनत और लगन देख कर हैरान रह जाता था. एक बार वह साड़ी खरीदने के लिए मना कर देती थी लेकिन यदि उसे कोई सजावटी या घर के लिए उपयोगी सामान पसंद आ जाता तो वह उसे खरीदे बिना नहीं रह सकती थी.

नीरा की ‘मा झे सुंदर घर’ की कल्पना साकार हो उठी थी. धीरेधीरे एक वर्ष पूरा होने जा रहा था. वह इस अवसर को कुछ नए अंदाज से मनाना चाहती थी. इसीलिए घर में एक साधारण पार्टी का आयोजन किया गया था. घर को गुब्बारों और रंगबिरंगी पट्टियों से सजाया गया था. काम की हड़बड़ी में ऊपर के कमरे से नीचे उतरते समय नीरा का पैर साड़ी में उल झ गया और वह नीचे गिर गई. सिर में चोट आई थी लेकिन उस ने ध्यान नहीं दिया और पार्टी का मजा किरकिरा न हो जाए, यह सोच कर चुपचाप दर्द को  झेलती रही.

‘आज मैं बहुत थक गई हूं. अब सोना चाहती हूं,’ पार्टी समाप्त होने पर नीरा ने थके स्वर में दीपेश से कहा था.

‘अब आलतूफालतू काम करोगी तो थकोगी ही. भला इतना सब ताम झाम करने की क्या जरूरत थी?’ दीपेश ने सहज स्वर में कहा था. ऊपरी चोट के अभाव के कारण दीपेश ने नीरा के गिरने की घटना को गंभीरता से नहीं लिया था.

जब नीरा सुबह अपने समय पर नहीं उठी तब दीपेश को चिंता हुई. जा कर देखा तो पाया कि वह बेसुध पड़ी थी, चेहरे पर अजीब से भाव थे जैसे रातभर दर्द से तड़पती रही हो. दीपेश ने फौरन डाक्टर को बुला कर दिखाया. डाक्टर ने उसे शीघ्र ही अस्पताल में भरती कराने की सलाह देते हुए कहा कि गिरने के कारण सिर में अंदरूनी चोट आई है. ‘सिर की चोट को कभी भी हलके रूप में नहीं लेना चाहिए. कभीकभी साधारण चोट भी जानलेवा हो जाती है.’

डाक्टर की बात सच साबित हुई. लगभग 5 दिन जिंदगी और मौत के साए में  झूलने के बाद नीरा चिरनिद्रा में सो गई. सभी सगेसंबंधी, अड़ोसीपड़ोसी इस अप्रत्याशित मौत का समाचार सुन कर हक्कबक्के रह गए.

नीरा का अंतिम संस्कार करने के बाद दीपेश ने घर में प्रवेश किया तो उस के कुशल हाथों से सजासंवरा घर उसे मुंह चिढ़ाता प्रतीत हुआ. उस के लगाए पेड़पौधे कुछ ही दिनों में सूख गए थे. दीपेश सम झ नहीं पा रहा था कि वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन करने के बाद भी घर वीरान क्यों हो गया? उन के जीवन में तूफान क्यों आया? उस समय वह नितिन और रीना को अपनी गोद में छिपा कर खूब रोया. तब नन्ही रीना उस के आंसू पोंछती हुई बोली थी, ‘डैडी, ममा नहीं हैं तो क्या हुआ, उन की यादें तो हैं.’’

दीपेश ने बच्चों का मन रखने के लिए आंसू पोंछ डाले थे. लेकिन नीरा का चेहरा उन के हृदय पर ऐसा जम गया था कि उस को निकाल पाना उस के लिए संभव ही नहीं था. वह घर कैसा जहां खुशियां न हों, प्यार न हो, स्वप्न न हों.

दीपेश के मांपिताजी नहीं थे, सो, नीरा की मां ने आ कर उन की बिखरती गृहस्थी को फिर से समेटने का प्रयत्न किया था.

एक दिन सवेरे दीपेश का मन टटोलने के लिए मांजी ने कहा, ‘बेटा, जाने वाले के साथ जाया तो नहीं जा सकता, फिर से घर बसा लो. बच्चों को मां व तुम्हें पत्नी मिल जाएगी. आखिर मैं कब तक साथ रहूंगी.’

‘पापा, आप नई मां ले आइए. हम उन के साथ रहेंगे,’ नन्हे नितिन, जो नानी की बात सुन रहा था, ने भोलेपन से कहा और उस की बात का समर्थन रीना ने भी कर दिया.

दीपेश सोच नहीं पा रहे थे कि बच्चे अपने मन से कह रहे हैं या मांजी ने उन के नन्हे मन में नई मां की चाह भर दी है. वह जानता था कि नीरा की यादों को वह अपने हृदय से कभी हटा नहीं सकता. फिर क्यों दूसरा विवाह कर वह उस लड़की के साथ अन्याय करे जो उस के साथ तरहतरह के स्वप्न संजोए इस घर में प्रवेश करेगी.

2 महीने बाद जाते हुए जब मांजी ने दोबारा दीपेश के सामने अपना सु झाव रखा तो वह एकाएक मना न कर सका. शायद इस की वजह यह थी कि रीना को अपनी नानी के साथ काम करते देख कर उस का मन बेहद आहत हो जाता था. कुछ ही दिनों में रीना बेहद बड़ी लगने लगी थी. उस की चंचलता कहीं खो गईर् थी. यही हाल नितिन का भी था. जो नितिन अपनी मां को इधरउधर दौड़ाए बिना खाना नहीं खाता था वही अब जो भी मिलता, बिना नानुकुर के खा लेता था.

बच्चों का परिवर्तित स्वभाव दीपेश को मन ही मन खाए जा रहा था. सो, मांजी के प्रस्ताव पर जब उन्होंने अपने मन की चिंता बताई तो वे बोली थीं, ‘बेटा, यह सच है कि तुम नीरा को भूल नहीं पाओगे. नीरा तुम्हारी पत्नी थी तो मेरी बेटी भी थी. जाने वाले के साथ जाया तो नहीं जा सकता और न किसी के जाने से जीवन ही समाप्त हो जाता.’

दीपेश को मौन पा कर मांजी फिर बोलीं, ‘तुम कहो तो नंदिता से तुम्हारी बात चलाऊं. तुम तो जानते ही हो, नंदिता नीरा की मौसेरी बहन है. उस के पति का देहांत एक कार दुर्घटना में हो गया था. वह भी तुम्हारे समान ही अकेली है तथा स्त्री होने के साथसाथ एक बेटी अर्चना की मां होने के नाते वह तुम से भी ज्यादा मजबूर और बेसहारा है.’

मांजी की इच्छानुसार दीपेश ने घर बसा लिया था लेकिन फिर भी न जाने क्यों जिस घर पर कभी नीरा का एकाधिकार था उसी घर पर नंदिता का अधिकार होना वह सह नहीं पा रहा था.

नंदिता ने दीपेश को तो स्वीकार कर लिया लेकिन बच्चों को स्वीकार नहीं कर पा रही थी. वैसे, दीपेश भी क्या उस समय अर्चना को पिता का प्यार दे पाए थे. घर में एक अजीब सा असमंजस, अविश्वास की स्थिति पैदा हो गई थी. वह अपनी बच्ची को ले कर ज्यादा ही भावुक हो उठती थी.

नंदिता को लगता था, उस की बेटी को कोई प्यार नहीं करता है. घर में अशांति, अविश्वास, तनाव और खिंचाव देख कर बस एक बात उन के दिमाग को मथती रहती थी कि वास्तुशास्त्र के नियमों का पालन कर बनाया यह घर प्रेम, ममता और अपनत्व का स्रोत क्यों नहीं बन पाया? आंतरिक और बाहरी शक्तियों में समरसता स्थापित क्यों नहीं हो पा रही है? क्यों उन की शक्तियां क्षीण हो रही हैं? उन में क्या कमी है? अपनी आंतरिक और बाहरी शक्तियों को निर्देशित कर उन में संतुलन स्थापित कर क्यों वे न स्वयं खुद रह पा रहे हैं और न दूसरों को खुश रख पा रहे हैं?

नई मां की अपने प्रति बेरुखी देख कर रीना और नितिन अपने में सिमट गए थे. लेकिन बड़ी होती अर्चना ने दिलों की दूरी को पाट दिया था. वह मां के बजाय रीना के हाथ से खाना खाना चाहती, उसी के साथसाथ सोना चाहती, उसी के साथ खेलना चाहती. रीना और नितिन की आंखों में अपने लिए प्यार और सम्मान देख कर नंदिता में भी परिवर्तन आने लगा था. बच्चों के निर्मल स्वभाव ने उस का दिल जीत लिया था या अर्चना को रीना और नितिन के साथ सहज, स्वाभाविक रूप में खेलता देख उस के मन का डर समाप्त हो गया था.

एक बार दीपेश को लगा था कि उन  के घर पर छाई दुखों की छाया हटने लगी है. रीना कालेज में आ गई थी तथा नितिन और अर्चना भी अपनीअपनी कक्षा में प्रथम आ रहे थे. तभी एक दिन नंदिता ऐसी सोई कि फिर उठ ही न सकी. पहले 2 बच्चे थे, अब 3 बच्चों की जिम्मेदारी थी. लेकिन फर्क इतना था कि पहले बच्चे छोटे थे, अब बड़े हो गए थे और अपनी देखभाल स्वयं कर सकते थे व अपना बुराभला सोच और सम झ सकते थे.

रीना ने घर का बोझ उठा लिया. अब दीपेश भी रीना के साथ रसोई तथा अन्य कामों में हाथ बंटाते तथा नितिन और अर्चना को भी अपनाअपना काम करने के लिए प्रेरित करते. घर की गाड़ी एक बार चल निकली थी, लेकिन इस बार के आघात ने उन्हें इतना एहसास करा दिया था कि दुखसुख के बीच में हिम्मत न हारना ही व्यक्ति की सब से बड़ी जीत है. वक्त किसी के लिए नहीं रुकता. जो वक्त के साथ चलता है वही जीवन के संग्राम में विजयी होता है.

इस एहसास और भावना ने दीपेश के अंदर के अवसाद को समाप्त कर दिया था. अब वे औफिस के बाद का सारा समय बच्चों के साथ बिताते या नीरा द्वारा बनाए बगीचे की साजसंभाल करते तथा उस से बचे समय में अपनी भावनाओं को कोरे कागज पर उकेरते. कभी वे गीत बन कर प्रकट होतीं तो कभी कहानी बन कर.

शीघ्र ही उन की रचनाएं प्रतिष्ठित पत्रपत्रिकाओं में स्थान पाने लगी थीं. उन के जीवन को राह मिल गई थी. समय पर बच्चों के विवाह हो गए और वे अपनेअपने घरसंसार में रम गए. उन की लेखनी में अब परिपक्वता आ गई थी.

 

Father’s day 2023: मां के बिना पिता बच्चों को कैसे संभाले

4 दिन पहले तक अभिषेक की जिंदगी में सब कुछ बहुत खूबसूरत था. एक प्यारी सी बीवी थी जो हर वक्त उस का ख्याल रखती थी. दो प्यारेप्यारे बच्चे थे जिन की खिलखिलाहट से सारा घर गुंजायमान रहता था. पर 4 दिन के अंदर जिंदगी ने ऐसा खेल खेला कि उस के घर में सब तरफ सूनापन और उदासी पसर गई. उस की पत्नी को अचानक कोविड हुआ और दोतीन दिनों के अंदर ही वह सब को छोड़ कर चली गई.

वह खुद भी कोरोना पॉजिटिव था. कोरोना से पत्नी की मौत की खबर पा कर ज्यादा लोग तो आ ही नहीं सके. वैसे भी कोरोना की वजह से हालात बहुत खराब थे. केवल उस की मां, सासससुर और बहन समेत कुछ करीबी रिश्तेदार मातम मनाने के लिए आए. बाकी सब तो शाम में ही लौट गए मगर उस की मां और बहन रुक गए. अभिषेक ने खुद को आइसोलेट कर लिया. मां बच्चों को संभालने लगी. बहन को भी 4 -5 दिनों में अपने घर जाना पड़ा.

इधर एकडेढ़ महीने रुक कर मां को भी पिताजी के पास लौटना पड़ा. अभिषेक के पिताजी गांव में व्यवसाय करते थे और ज्यादा दिन अकेले नहीं रह सकते थे. मां के जाने के बाद बच्चों की जिम्मेदारी पूरी तरह अभिषेक पर आ गई. वैसे
गनीमत थी कि फिलहाल उस का वर्क फ्रॉम होम चल रहा था. इसलिए उसे बच्चों को अकेले घर में छोड़ कर ऑफिस जाने की टेंशन नहीं थी. मगर ऑफिस का काम तो पूरा करना ही होता था. उस पर छोटे बच्चों को पूरे दिन संभालना भी आसान नहीं होता. कोरोना की वजह से उस ने मेड को भी छुट्टी दी हुई थी.

जाते वक्त मां ने समझाया था कि वह दूसरी शादी कर ले. मगर अभिषेक दूसरी शादी के पक्ष में नहीं था. वह अपने बच्चों की जिंदगी में सौतेली मां को ले कर आना नहीं चाहता था. अभिषेक ने तय किया कि वह बच्चों को अपने बल पर पालेगा.

इस के लिए उस ने कुछ तैयारियां शुरू की. सब से पहले एक टाइम टेबल बनाया. किन चीजों की कब जरूरत पड़ेगी या बाजार से क्या ला कर रखना है जैसी चीजों की लिस्ट बनाई. बच्चों से अपनी मजबूरी डिस्कस की और समझाया कि उन्हें भी पापा के साथ कॉर्पोरेट करना पड़ेगा. यूट्यूब देख कर खाना बनाना सीखा. फिर क्या था कुछ समय में ही अभिषेक की जिंदगी की गाड़ी पटरी पर आ गई. वह अब अपने बच्चों का पिता होने के साथ साथ प्यारदुलार करने वाली मां भी था, बैठा कर पढ़ाने वाली टीचर भी था, घर का कमाऊ सदस्य भी था और पूरा घर संभालने वाली हाउसवाइफ की भूमिका भी निभा रहा था.

हाल ही में की गई एक स्टडी के मुताबिक़ सिंगल पिता की मदद हर कोई करना चाहता है. यहां तक कि दफ्तर में ऐसे पुरुषों को दूसरों के मुकाबले 21% ज्यादा बोनस मिलता है. अकेले पिताओं के साथ शानदार व्यवहार को फादरहुड बोनस कहा गया. ऐसा भी माना जाता है कि सिंगल पिताओं के पास नौकरी के मौके ज्यादा आते हैं. मगर यह नहीं भूलना चाहिए कि अकेले घरपरिवार और बच्चों के साथ ऑफिस की जिम्मेदारियां उठाना एक पुरुष के लिए बिलकुल भी सहज नहीं.

यह सच है कि आज के समय में पुरुष महिलाओं वाले काम करने में पहले की तरह हिचकिचाते नहीं. जरुरत पड़ने पर बच्चों की नैप्पी बदलने से ले कर उन के लिए टिफ़िन तैयार करने का काम भी बखूबी कर लेते हैं. ऐसा वे पत्नी की
तबियत खराब होने या किसी तरह की परेशानी आने पर उस की मदद के लिए करते हैं. पत्नी के निर्देशों के साथ कभीकभार बच्चे को संभाल लेना आसान है. मगर जब बात आती है एक सिंगल फादर के रूप में बच्चों की पूरी परवरिश करने की तो यह डगर आसान नहीं होती.

दरअसल माताओं को हमेशा से ही बच्चों के ज्यादा करीब समझा जाता है. पत्नी की मौत या तलाक लिए जाने के बाद पुरुष को मॉम्स वाले सारे काम करने होते हैं. बहुत सारे ऐसे काम जो महिलाएं सालों से करती आ रही हैं उन्हें जब
पुरुष करते हैं तो दिक्कत आती ही है. ऊपर से पुरुषों वाले काम करने होते हैं वह अलग. ऐसे में वे इस जिम्मेदारी को कठिनाई से संभालते हैं. बच्चों को मां और पिता दोनों का प्यार देने का प्रयास करते हैं. कुछ ऐसे भी हैं जो अपनी इच्छा से शादी नहीं करते और सिंगल फादर बनते हैं. वैसे देखा जाए तो शादी न करने वालों के देखे पत्नी के मर जाने या कहीं चले जाने के बाद बच्चों को संभालना पड़े तो यह ज्यादा कठिन होता है क्यों कि बच्चों को मां की आदत लग चुकी होती है.

सिंगल फादर कैसे बनें परफेक्ट पापा

सब से जरुरी है अनुशासन

पुरुषों को कठोर ह्रदय का माना जाता है. किसी भी परिवार में पिता सख्ती के लिए और मां प्यार और ममता लुटाने के लिए जानी जाती है. लेकिन जब घर में पुरुष को ही महिला का भी काम करना पड़े तो पुरुष यानी सिंगल फादर को
अपने स्वभाव में भी बदलाव लाना पड़ता है. वह बच्चों को शांति और प्यार से संभालना चाहता है.

सख्ती दिखाने पर बच्चे कहीं दूर न हो जाएं यह सोच कर अक्सर वह बच्चों को कई मामलों में छूट दे देता है और अनुशासन की बात भूल जाता है. इस का नतीजा कई दफा सही नहीं निकलता और बच्चे हाथ से निकलने लगते हैं. इसलिए जरुरी है बैलेंस बना कर रखना. बच्चों को कुछ नियम सिखाएं और उन का पालन भी करवाएं. नियम थोड़े फ्लैक्सिबल हों मगर बच्चों में यह डर बिठाना भी जरुरी है कि अनुशासन तोड़ने पर उन्हें सजा मिल सकती है. जैसे आप बच्चों को टिफिन खत्म कर के आने का नियम बनाइए लेकिन रोज पौष्टिक खाने के बजाए कभीकभी उन की पसंद का चटपटा या जंकफूड भी बना दें ताकि ऐसा न हो कि घर के खाने से बोर हो कर बच्चा बाहर की चीज़ें खाना शुरू कर दे और आप के डर से टिफिन का खाना डस्टबिन में फेंकना शुरू कर दे.

मल्टीटास्कर बनें

आप को भी महिलाओं की तरह मल्टीटास्कर बनना होगा. घर और ऑफिस के कामों में बैलेंस बना कर रखना होगा. भले ही आप बिलकुल परफैक्टली हर काम न निबटा सकें मगर इतना तो कर ही सकते हैं कि सब सामान्य रूप से चलता जाए. आप चाहें तो अपने बॉस से भी इस सन्दर्भ में बात कर सकते हैं. उन्हें दिक्कत बताइए और बात कर के अपने लिए टाइम फ्लेक्सिबल करा सकते हैं.

घर के काम जो रात में निबटाए जा सकते हैं उन्हें कर के रखिए. कामकाजी महिलाएं भी ऐसा ही करती हैं. आप सुबह के टिफिन की तैयारी रात में ही कर के रखिए. इसी तरह बच्चों की स्कूल ड्रेस रात में ही एक जगह पूरी तरह से
तैयार कर के और प्रेस कर के रखिए. यानी आप को प्रीप्लानिंग पर ध्यान देना होगा.

टाइम मैनेजमेंट

सिंगल फादर को टाइम मैनेजमेंट का ख्याल रखना पड़ता है. आप के पास समय की कमी काफी कमी होगी क्योंकि एक साथ बहुत सी भूमिकाएं अदा करनी है. जरुरी है कि हर काम का समय निश्चित कीजिए. ऐसा न हो कि केवल काम ही करते रह जाएं, बीच बीच में रिलैक्स के लिए ब्रेक भी लीजिए. सुबह जल्दी उठा जाए तो हर काम करीने से निबट जाता है. ध्यान रखें औरतें घर में सब से पहले इसी वजह से उठती हैं ताकि बाद में हड़बड़ी न करनी पड़े.

कम्युनिकेशन गैप न आने दें

ज्यादातर घरों में बच्चे पिता से डरते हैं और कम बातें करते हैं. अपनी छोटी बड़ी हर बात वे मां से ही शेयर करते हैं. मगर सिंगल फादर के केस में पिता को ही मां की भूमिका भी निभानी होती है. ध्यान रखें कि अब आप पहले
की तरह सिर्फ जरूरत की बात करने की स्थिति में बिल्कुल नहीं हैं. आप को बच्चों के साथ लगातार संवाद बना कर रखना होगा. ऐसे में जरूरी है कि आप भी उन की मां की तरह गुड लिसनर बनें. प्यार और धैर्य के साथ उन की बातें
सुनें और फिर जवाब भी उतने ही खूबसूरत और कंविंसिंग अंदाज में दें ताकि बच्चे हर बात आप से शेयर करना शुरू कर दें. आप को पिता की जगह उन का दोस्त बनना होगा. फिर देखिएगा कैसे आप का बच्चों के साथ रिश्ता परफेक्ट
हो जाएगा.

मदद लेने से हिचकिचाएं नहीं

किसी से मदद लेना शर्म की बात नहीं. आप को तो गर्व होना चाहिए कि आप 2 लोगों की भूमिका अदा कर रहे हैं. ऐसे में यदि कहीं कोई समस्या आती है तो फोन कर के किसी रिश्तेदार से, आस पड़ोस वालों या दोस्तों से भी सही
जानकारी ले सकते हैं.

बच्चों को प्यार से समझाएं

एक पुरुष के लिए अकेले छोटे बच्चों को संभालना आसान नहीं होता. मगर यदि वह धैर्य रखें और बच्चों को अपने छोटेछोटे काम खुद करने की ट्रेनिंग दे तो धीरेधीरे सब मैनेज हो सकता है. बच्चों के साथ बहुत सब्र रखने की जरूरत
पड़ती है. उन्हें जोर जबरदस्ती या डांट फटकार कर कुछ नहीं सिखाया जा सकता. इस के विपरीत यदि उन्हें प्यार से, खेलखेल में चीज़ें सिखाई जाएं तो वे जल्दी अडॉप्ट कर लेते हैं.

कभी आपा न खोएं

आप यदि अकेले बच्चों और घर के साथ ऑफिस का काम नहीं संभाल पा रहे तो हेल्प के लिए मेड रख लें. यदि आप बच्चों की शरारतों से परेशान है या इस बात से दुखी हैं कि वे आप की कोई हेल्प नहीं करते तो भी आपा खो कर
चीखनेचिल्लाने के बजाय प्यार से उन्हें परिस्थितियों से वाकिफ कराएं और समझाएं कि आप उन का सहयोग क्यों और किस तरह चाहते हैं.

बच्चों से भी घर के कामों में मदद लें

बच्चों को पढ़ाई के साथ छोटेमोटे काम करते रहने की आदत डालें. आप उन्हें सब्जी काटने, घर की डस्टिंग करने, पौधों में पानी डालने, कपड़े तह कर के रखने, अपने कपड़े प्रैस करने, अपने जूते या स्कूल बैग साफ़ करने, चाय कॉफी
बनाने जैसे काम करने को कह सकते हैं. इन्हें वे चाव से करेंगे. अगर कोई काम उन्हें नहीं आता तो आप उन को सिखा भी सकते हैं.

बच्चों का टाइम टेबल बनाएं

बच्चों में कम उम्र से ही एक अनुशासन के साथ चलने की आदत डालें. उन के लिए टाइम टेबल बनाएं और उसी अनुसार उन की दिनचर्या फिक्स करें. निचित समय पर उन्हें पढ़ाने बैठाएं. उन की कॉपियां चेक करें. जो
असाइनमेंट्स मिले हैं उन पर चर्चा करें. अगर उन्हें कहीं दिक्कत आ रही है तो वह हिस्सा समझाएं ताकि पढ़ाई में उन की रूचि बनी रहे. बीचबीच में उन्हें खेलने या रिलैक्स होने का मौका भी दें. कभीकभी खुद भी बच्चों के साथ खेलें ताकि आप का बांड अच्छा बन सके.

अपना भी रखिए ख्याल

कहीं ऐसा न हो कि बच्चों का ख्याल रखतेरखते आप अपने प्रति लापरवाह हो जाएं और अपनी सेहत बिगाड़ लें. यह बिलकुल भी मत भूलिए कि आप का ख्याल रखा जाना भी उतना ही जरूरी है.

याद रखिए सब कुछ मैनेज करते हुए अपनी शारीरिक और मानसिक सेहत का ख्याल आप को खुद ही रखना होगा. अगर आप ही ठीक नहीं होंगे तो उन का ख्याल कौन रखेगा? अच्छे पिता बने रहने के लिए आप को खुद को फिट भी रखना होगा. अपने पूरे दिन में काम की भागदौड़ के बीच आप को एक्सरसाइज और फिटनेस के लिए भी एक समय निश्चित करना होगा. अपने खाने में पौष्टिकता और फिटनेस के लिए आवश्यक चीजें शामिल करनी होंगी.

बॉलीवुड के सिंगल फादर्स 

बॉलीवुड में भी कुछ ऐसे पिता भी है जो बच्चों को मां के न होते हुए बखूबी पाल रहे है और कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने अपनी इच्छा से शादी नहीं की और सिंगल फादर बने.

राहुल देव

फिल्म एक्टर राहुल देव की पत्नी रीना ने कैंसर के कारण 2009 में दम तोड़ दिया. इस के बाद राहुल की जिंदगी में अकेलापन घर करने लगा. राहुल ने अपने बेटे के लिए दूसरी शादी नहीं की. राहुल का सिद्धांत नाम का एक बेटा है. राहुल ने सिंगल रहने का फैसला लिया और बच्चे के साथ जीवन जीने लगे. उस वक्त सिद्धांत 10 साल का था और अब 21 साल का हो चुका है.

राहुल बोस

राहुल बोस काफी चर्चित एक्टर रहे हैं और कई बेहतरीन फिल्मों में अभिनय कर चुके हैं. समाज सेवा करने के लिए भी राहुल को लोगों के बीच जाना जाता है. राहुल बोस ने भी शादी नहीं की है बल्कि 6 बच्चों को गोद लिया है. राहुल
ने अंडमान और निकोबार से 6 बच्चों को गोद लिया और उन्हें अकेले पाल रहे हैं. इस के साथ ही वे प्रोफेशनल लाइफ को भी हैंडल कर रहे हैं.

तुषार कपूर

जानेमाने अभिनेता जितेंद्र के बेटे तुषार कपूर भी बगैर शादी के पिता बने हैं. इन की कहानी भी बेहद दिलचस्प है. तुषार कपूर सरोगेसी के जरिए बेटे के पिता बने है. उन के बेटे का नाम लक्ष्य है जिसे वे बहुत प्यार से अकेले पाल रहे हैं.

करण जौहर

सिंगल फादर की लिस्ट में करण जौहर का नाम भी चर्चित है. करण जौहर बॉलीवुड का काफी जाना माना नाम है. एक सफल फिल्म मेकर होने के साथ ही वह एक बेहतर पिता भी हैं. करण जौहर अपनी ख़ुशी से बिना शादी के दो जुड़वां बच्चों के पिता बने हैं. बेटे का नाम यश है और बेटी का नाम रूही है. अपने दोनों बच्चों के साथ ये जम कर मस्ती करते दिखते हैं. तुषार कपूर की तरह ये भी सरोगेसी के जरिए पिता बने हैं.

कमल हासन

कमल हासन का पत्नी सारिका से पहले ही तलाक हो गया था और श्रुति हासन और अक्षरा हासन अपने पापा के साथ बड़ी हुईं.

संजय दत्त

संजय दत्त की पहली पत्नी ऋचा शर्मा की कैंसर से मृत्यु हो गई थी और वो अपनी बेटी त्रिशाला के सिंगल पैरेंट बने. हालांकि कुछ सालों बाद त्रिशाला की कस्टडी उनकी मौसी को मिल गई लेकिन संजय दत्त अपनी तमाम परेशानियों के बाद भी अपनी जिम्मेदारियों को नहीं भूले.

मेघमल्हार: भाग 1- अभय की शादीशुदा जिंदगी में किसने मचाई खलबली

उस का नाम मेघा न हो कर मल्हार होता तो शायद मेरे जीवन में बादलों की गड़गड़ाहट के बजाय मेघमल्हार की मधुर तरंगें हिलोरें ले रही होतीं. परंतु ऐसा नहीं हुआ था. वह काले घने मेघों की तरह मेरे जीवन में आई थी और कुछ ही पलों में अपनी गड़गड़ाहट से मुझे डराती और मेरे मन के उजालों को निगलती हुई अचानक चली गई.

मेघा मेरे जीवन में तब आई जब मैं अधेड़ावस्था की ओर अग्रसर हो रहा था. मेरी और उस की उम्र में कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं था. मैं 30 के पार था और वह 20-22 के बीच की निहायत खूबसूरत लड़की. वह कुंआरी थी और मैं एक शादीशुदा व्यक्ति. उस से लगभग 10 साल बड़ा, परंतु उस ने मेरी उम्र नहीं, मुझ से प्यार किया था और मुझे इस बात का गर्व था कि एक कमसिन लड़की मेरे प्यार में गिरफ्तार है और वह दिलोजान से मुझ से प्यार करती है और मैं भी उसे उसी शिद्दत से प्यार करता हूं.

मेरे साथ रहते हुए उस ने मुझ से कभी कुछ नहीं मांगा. मैं ही अपनी तरफ से उसे कभी कपड़े, कभी कौस्मैटिक्स या ऐसी ही रोजमर्रा की जरूरत की चीजें खरीद कर दे दिया करता था. हां, रेस्तरां में जा कर पिज्जा, बर्गर खाने का उसे बहुत शौक था. मैं अकसर उसे मैक्डोनल्ड्स या डोमिनोज में ले जाया करता था. उसे मेरे साथ बाहर जानेआने में कोई संकोच नहीं होता था. उस के व्यवहार में एक खिलंदरापन होता था. बाहर भी वह मुझे अपना हमउम्र ही समझती थी और उसी तरह का व्यवहार करती थी. भीड़ के बीच में कभीकभी मुझे लज्जा का अनुभव होता, परंतु उसे कभी नहीं. ग्लानि या लज्जा नाम के शब्द उस के जीवन से गायब थे.

वह असम की रहने वाली थी और अपने मांबाप से दूर मेरे शहर में पढ़ाई के लिए आई थी. होस्टल में न रह कर वह किराए का मकान तलाश कर रही थी और इसी सिलसिले में वह मेरे मकान पर आई थी. अपने घर में मैं अपनी पत्नी और एक छोटे बच्चे के साथ रहता था. उसे किराए पर एक कमरे की आवश्यकता थी. हमारा अपना मकान था, परंतु हम ने कभी किराएदार रखने के बारे में नहीं सोचा था. हमें किराएदार की आवश्यकता भी नहीं थी, परंतु मेघा इतनी प्यारी और मीठीमीठी बातें करने वाली लड़की थी कि कुछ ही पलों में उस ने मेरी पत्नी को मोहित कर लिया और न न करते हुए भी हम ने उसे एक कमरा किराए पर देने के लिए हां कर दी. वह मेरे घर में पेइंगगेस्ट की हैसियत से रहने लगी. एक घर में रहते हुए हमारी बातें होतीं, कभी एकांत में, कभी सब के सामने और पता नहीं वह कौन सा क्षण था, जब उस की भोली सूरत मेरे दिल में समा गई और उस की मीठी बातोें में मुझे रस आने लगा. मैं उस के इर्दगिर्द एक मवाली लड़के की तरह मंडराने लगा. पत्नी को तो आभास नहीं हुआ, परंतु वह मेरे मनोभावों को ताड़ गई कि मैं उसे किस नजर से देख रहा था.

यह सच भी है कि लड़कियां पुरुषों के मनोभाव को बहुत जल्दी पहचान जाती हैं. उस ने एक दिन बेबाकी से पूछा, ‘‘आप मुझे पसंद करते हैं?’’

‘‘हां, क्यों नहीं, तुम एक बहुत प्यारी लड़की हो,’’ मैं ने बिना किसी हिचक के कहा.

‘‘तुम एक पुरुष की दृष्टि से मुझे पसंद करते हो न?’’ उस ने जोर दे कर पूछा.

मैं सकपका गया. उस की आंखों में तेज था. मैं न नहीं कह सका. मेरे मुंह से निकला, ‘‘हां, मैं तुम्हें प्यार करता हूं,’’ मैं सच को कहां तक छिपा सकता था.

‘‘आप का घर बिखर जाएगा,’’ उस ने मुझे सचेत किया. मैं चुप रह गया. वह सच कह रही थी. परंतु प्यार अंधा होता है. मैं उस के प्रति अपने झुकाव को रोक नहीं सका. वह भी अपने को रोकना नहीं चाहती थी. उस के अंदर आग थी और वह उसे बुझाना चाहती थी. वह मुझ से प्यार न करती तो किसी और से कर लेती. लड़कियां जब घर से बाहर कदम रखती हैं तो उन के लिए लड़कों की कोई कमी नहीं होती.

हम दोनों जल्द ही एक अनैतिक संबंध में बंध गए. हमें इस बात की भी कोई परवा नहीं थी कि हम एक ही घर में रह रहे थे, जहां मेरी पत्नी और एक छोटा बच्चा था, परंतु हम सावधानी बरतते थे और अकसर एकांत में मिलने के अवसर ढूंढ़ निकालते थे.

एक दिन वह बोली, ‘‘अभय,’’ अकेले में वह मुझे मेरे नाम से ही बुलाती थी, ‘‘हमारे संबंध ज्यादा दिनों तक किसी की नजरों से छिपे नहीं रह सकते हैं.’’

‘‘तब…?’’ मैं ने इस तरह पूछा जैसे समस्या का उस के पास समाधान था.

‘‘मुझे आप का घर छोड़ना पड़ेगा,’’ उस ने बिना हिचक के कहा.

‘‘तुम मुझे छोड़ कर चली जाओगी?’’ मैं आश्चर्यचकित रह गया.

‘‘नहीं, मैं केवल आप का घर छोड़ूंगी, आप को नहीं… मुझे आप दूसरा घर किराए पर दिलवा दो. हम लोग वहीं मिला करेंगे. हफ्ते में 1 या 2 बार… आपस में सलाह कर के.’’

‘‘मैं शायद इतनी दूरी बरदाश्त न कर सकूं,’’ मेरे दिल के ऊपर जैसे किसी ने एक भारी पत्थर रख दिया था. हवा जैसे थम सी गई थी. सांस रुकने लगी थी. प्यार में ऐसा क्यों होता है कि जब हम मिलते हैं तो हर चीज आसान लगती है और जब बिछड़ते हैं तो हर चीज बेगानी हो जाती है. समय भारी लगने लगता है.

उस का स्वर सधा हुआ था, ‘‘अगर आप चाहते हैं कि हमारे संबंध इसी तरह बरकरार रहें तो इतनी दूरी हमें बरदाश्त करनी ही पड़ेगी. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.’’

वह अपने इरादे पर दृढ़ थी और मैं उस के सामने पिटा हुआ मोहरा…पत्नी को उस ने उलटीसीधी बातों से मना लिया और वह इस प्रकार अपने कालेज के पास एक नए घर में रहने के लिए आ गई. मैं ने अपना परिचय वहां उस के स्थानीय गार्जियन के तौर पर दिया था. इस प्रकार मुझे उस के घर आनेजाने में कोई दिक्कत पेश नहीं आती थी. किसी को शक भी नहीं होता था.

परंतु अलग घर में रहने के कारण मैं मेघा से रोज नहीं मिल पाता था. औफिस की व्यस्तताएं अलग थीं. फिर घर की जिम्मेदारियां थीं. मैं दोनों से विमुख नहीं होना चाहता था, परंतु मेघा का आकर्षण अलग था. मैं उस के हालचाल जानने के बहाने छुट्टी में उस से मिलने चला जाता था. परंतु हर रविवार जाने से पत्नी को शक भी हो सकता था. कई बार तो वह भी साथ चलने को तैयार हो जाती थी. एकाध बार उसे ले कर भी जाना पड़ा था. तब मैं मन मसोस कर रह जाता था.

Father’s Day 2023: परीक्षाफल- क्या चिन्मय ने पूरा किया पिता का सपना

जैसे किसान अपने हरेभरे लहलहाते खेत को देख कर गद्गद हो उठता है उसी प्रकार रत्ना और मानव अपने इकलौते बेटे चिन्मय को देख कर भावविभोर हो उठते थे.

चिन्मय की स्थिति यह थी कि परीक्षा में उस की उत्तर पुस्तिकाओं में एक भी नंबर काटने के लिए उस के परीक्षकों को एड़ीचोटी का जोर लगाना पड़ता था. यही नहीं, राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर की अन्य प्रतिभाखोज परीक्षाओं में भी उस का स्थान सब से ऊपर होता था.

इस तरह की योग्यताओं के साथ जब छोटी कक्षाओं की सीढि़यां चढ़ते हुए चिन्मय 10वीं कक्षा में पहुंचा तो रत्ना और मानव की अभिलाषाओं को भी पंख लग गए. अब उन्हें चिन्मय के कक्षा में प्रथम आने भर से भला कहां संतोष होने वाला था. वे तो सोतेजागते, उठतेबैठते केवल एक ही स्वप्न देखते थे कि उन का चिन्मय पूरे देश में प्रथम आया है. कैमरों के दूधिया प्रकाश में नहाते चिन्मय को देख कर कई बार रत्ना की नींद टूट जाती थी. मानव ने तो ऐसे अवसर पर बोलने के लिए कुछ पंक्तियां भी लिख रखी थीं. रत्ना और मानव उस अद्भुत क्षण की कल्पना कर आनंद सागर में गोते लगाते रहते.

चिन्मय को अपने मातापिता का व्यवहार ठीक से समझ में नहीं आता था. फिर भी वह अपनी सामर्थ्य के अनुसार उन्हें प्रसन्न रखने की कोशिश करता रहता. पर तिमाही परीक्षा में जब चिन्मय के हर विषय में 2-3 नंबर कम आए तो मातापिता दोनों चौकन्ने हो उठे.

‘‘यह क्या किया तुम ने? अंगरेजी में केवल 96 आए हैं? गणित में भी 98? हर विषय में 2-3 नंबर कम हैं,’’ मानव चिन्मय के अंक देखते ही चीखे तो रत्ना दौड़ी चली आई.

‘‘क्या हुआ जी?’’

‘‘होना क्या है? हर विषय में तुम्हारा लाड़ला अंक गंवा कर आया है,’’ मानव ने रिपोर्ट कार्ड रत्ना को थमा दिया.

‘‘मम्मी, मेरे हर विषय में सब से अधिक अंक हैं, फिर भी पापा शोर मचा रहे हैं. मेरे अंगरेजी के अध्यापक कह रहे थे कि उन्होंने 10वीं में आज तक किसी को इतने नंबर नहीं दिए.’’

‘‘उन के कहने से क्या होता है? आजकल बच्चों के अंगरेजी में भी शतप्रतिशत नंबर आते हैं. चलो, अंगरेजी छोड़ो, गणित में 2 नंबर कैसे गंवाए?’’

‘‘मुझे नहीं पता कैसे गंवाए ये अंक, मैं तो दिनरात अंक, पढ़ाई सुनसुन कर परेशान हो गया हूं. अपने मित्रों के साथ मैं पार्क में क्रिकेट खेलने जा रहा हूं,’’ अचानक चिन्मय तीखे स्वर में बोला और बैट उठा कर नौदो ग्यारह हो गया.

मानव कुछ देर तक हतप्रभ से बैठे शून्य में ताकते रह गए. चिन्मय ने इस से पहले कभी पलट कर उन्हें जवाब नहीं दिया था. रत्ना भी बैट ले कर बाहर दौड़ कर जाते हुए चिन्मय को देखती रह गई थी.

‘‘मानव, मुझे लगता है कि कहीं हम चिन्मय पर अनुचित दबाव तो नहीं डाल रहे हैं? सच कहूं तो 96 प्रतिशत अंक भी बुरे नहीं हैं. मेरे तो कभी इतने अंक नहीं आए.’’

‘‘वाह, क्या तुलना की है,’’ मानव बोले, ‘‘तुम्हारे इतने अंक नहीं आए तभी तो तुम घर में बैठ कर चूल्हा फूंक रही हो. वैसे भी इन बातों का क्या मतलब है? मेरे भी कभी 80 प्रतिशत से अधिक अंक नहीं आए, पर वह समय अलग था, परिस्थितियां भिन्न थीं. मैं चाहता हूं कि जो मैं नहीं कर सका वह मेरा बेटा कर दिखाए,’’ मानव ने बात स्पष्ट की.

उधर रत्ना मुंह फुलाए बैठी थी. मानव की बातें उस तक पहुंच कर भी नहीं पहुंच रही थीं.

‘‘अब हमें कुछ ऐसा करना है जिस से चिन्मय का स्तर गिरने न पाए,’’ मानव बहुत जोश में आ गए थे.

‘‘हमें नहीं, केवल तुम्हें करना है, मैं क्या जानूं यह सब? मैं तो बस, चूल्हा फूंकने के लायक हूं,’’ रत्ना रूखे स्वर में बोली.

‘‘ओफ, रत्ना, अब बस भी करो. मेरा वह मतलब नहीं था, और चूल्हा फूंकना क्या साधारण काम है? तुम भोजन न पकाओ तो हम सब भूखे मर जाएं.’’

‘‘ठीक है, बताओ क्या करना है?’’ रत्ना अनमने स्वर में बोली थी.

‘‘मैं सोचता हूं कि हर विषय के लिए एकएक अध्यापक नियुक्त कर दूं जो घर आ कर चिन्मय को पढ़ा सकें. अब हम पूरी तरह से स्कूल पर निर्भर नहीं रह सकते.’’

‘‘क्या कह रहे हो? चिन्मय कभी इस के लिए तैयार नहीं होगा.’’

‘‘चिन्मय क्या जाने अपना भला- बुरा? उस के लिए क्या अच्छा है क्या नहीं, यह निर्णय तो हमें ही करना होगा.’’

‘‘पर इस में तो बड़ा खर्च आएगा.’’

‘‘कोई बात नहीं. हमें रुपएपैसे की नहीं चिन्मय के भविष्य की चिंता करनी है.’’

‘‘जैसा आप ठीक समझें,’’ रत्ना ने हथियार डाल दिए पर चिन्मय ने मानव की योजना सुनी तो घर सिर पर उठा लिया था.

‘‘मुझे किसी विषय में कोई ट्यूशन नहीं चाहिए. मैं 5 अध्यापकों से ट्यूशन पढ़ूंगा तो अपनी पढ़ाई कब करूंगा?’’ उस ने हैरानपरेशान स्वर में पूछा.

‘‘5 नहीं केवल 2. पहला अध्यापक गणित और विज्ञान के लिए होगा और दूसरा अन्य विषयों के लिए,’’ मानव का उत्तर था.

‘‘प्लीज, पापा, मुझे अपने ढंग से परीक्षा की तैयारी करने दीजिए. मेरे मित्रों को जब पता चलेगा कि मुझे 2 अध्यापक घर में पढ़ाने आते हैं तो मेरा उपहास करेंगे. मैं क्या बुद्धू हूं?’’ यह कह कर चिन्मय रो पड़ा था.

पर मानव को न मानना था, न वह माने. थोड़े विरोध के बाद चिन्मय ने इसे अपनी नियति मान कर स्वीकार लिया. स्कूल और ट्यूशन से निबटता चिन्मय अकसर मेज पर ही सिर रख सो जाता.

मानव और रत्ना ने उस के खानेपीने पर भी रोक लगा रखी थी. चिन्मय की पसंद की आइसक्रीम और मिठाइयां तो घर में आनी ही बंद थीं.

समय पंख लगा कर उड़ता रहा और परीक्षा कब सिर पर आ खड़ी हुई, पता ही नहीं चला.

परीक्षा के दिन चिन्मय परीक्षा केंद्र पहुंचा. मित्रों को देखते ही उस के चेहरे पर अनोखी चमक आ गई, पर रत्ना और मानव का बुरा हाल था मानो परीक्षा चिन्मय को नहीं उन्हें ही देनी हो.

परीक्षा समाप्त हुई तो चिन्मय ही नहीं रत्ना और मानव ने भी चैन की सांस ली. अब तो केवल परीक्षाफल की प्रतीक्षा थी.

मानव, रत्ना और चिन्मय हर साल घूमने और छुट्टियां मनाने का कार्यक्रम बनाते थे पर इस वर्ष तो अलग ही बात थी. वे नहीं चाहते थे कि परीक्षाफल आने पर वाहवाही से वंचित रह जाएं.

धु्रव पब्लिक स्कूल की परंपरा के अनुसार परीक्षाफल मिलने का समाचार मिलते ही रत्ना और मानव चिन्मय को साथ ले कर विद्यालय जा पहुंचे थे. उन की उत्सुकता अब अपने चरम पर थी. दिल की धड़कन बढ़ी हुई थी. विद्यालय के मैदान में मेला सा लगा था. कहीं किसी दिशा में फुसफुसाहट होती तो लगता परीक्षाफल आ गया है. कुछ ही देर में प्रधानाचार्या ने इशारे से रत्ना को अंदर आने को कहा तो रत्ना हर्ष से फूली न समाई. इतने अभिभावकों के बीच से केवल उसे ही बुलाने का क्या अर्थ हो सकता है, सिवा इस के कि चिन्मय सदा की तरह प्रथम आया है. वह तो केवल यह जानना चाहती थी कि वह देश में पहले स्थान पर है या नहीं.

उफ, ये मानव भी ऐन वक्त पर चिन्मय को ले कर न जाने कहां चले गए. यही तो समय है जिस की उन्हें प्रतीक्षा थी. रत्ना ने दूर तक दृष्टि दौड़ाई पर मानव और चिन्मय कहीं नजर नहीं आए. रत्ना अकेली ही प्रधानाचार्या के कक्ष में चली गई.

‘‘देखिए रत्नाजी, परीक्षाफल आ गया है. हमारी लिपिक आशा ने इंटरनेट पर देख लिया है, पर बाहर नोटिसबोर्ड पर लगाने में अभी थोड़ा समय लगेगा,’’ प्रधानाचार्या ने बताया.

‘‘आप नोटिसबोर्ड पर कभी भी लगाइए, मुझे तो बस, मेरे चिन्मय के बारे में बता दीजिए.’’

‘‘इसीलिए तो आप को बुलाया है. चिन्मय के परीक्षाफल से मुझे बड़ी निराशा हुई है.’’

‘‘क्या कह रही हैं आप?’’

‘‘मैं ठीक कह रही हूं, रत्नाजी. कहां तो हम चिन्मय के देश भर में प्रथम आने की उम्मीद लगाए बैठे थे और कहां वह विद्यालय में भी प्रथम नहीं आया. वह स्कूल में चौथे स्थान पर है.’’

‘‘मैं नहीं मानती, ऐसा नहीं हो सकता,’’ रत्ना रोंआसी हो कर बोली थी.

‘‘कुछ बुरा नहीं किया है चिन्मय ने, 94 प्रतिशत अंक हैं. किंतु…’’

‘‘अब किंतुपरंतु में क्या रखा है?’’ रत्ना उदास स्वर में बोली और पलट कर देखा तो मानव पीछे खड़े सब सुन रहे थे.

‘‘चिन्मय कहां है?’’ तभी रत्ना चीखी थी.

‘‘कहां है का क्या मतलब है? वह तो मुझ से यह कह कर घर की चाबी ले गया था कि मम्मी ने मंगाई है,’’ मानव बोले.

‘‘क्या? उस ने मांगी और आप ने दे दी?’’ पूछते हुए रत्ना बिलखने लगी थी.

‘‘इस में इतना घबराने और रोने जैसा क्या है, रत्ना? चलो, घर चलते हैं. चाबी ले कर चिन्मय घर ही तो गया होगा,’’ मानव रत्ना के साथ अपने घर की ओर लपके थे. वहां से जाते समय रत्ना ने किसी को यह कहते सुना कि पंकज इस बार विद्यालय में प्रथम आया है और उसी ने चिन्मय को परीक्षाफल के बारे में बताया था, जिसे सुनते ही वह तीर की तरह बाहर निकल गया था.

विद्यालय से घर तक पहुंचने में रत्ना को 5 मिनट लगे थे पर लिफ्ट में अपने फ्लैट की ओर जाते हुए रत्ना को लगा मानो कई युग बीत गए हों.

दरवाजे की घंटी का स्विच दबा कर रत्ना खड़ी रही, पर अंदर से कोई उत्तर नहीं आया.

‘‘पता नहीं क्या बात है…इतनी देर तक घंटी बजने के बाद भी अंदर से कोई आवाज नहीं आ रही है मानव, कहीं चिन्मय ने कुछ कर न लिया हो,’’ रत्ना बदहवास हो उठी थी.

‘‘धीरज रखो, रत्ना,’’ मानव ने रत्ना को धैर्य धारण करने को कहा पर घबराहट में उस के हाथपैर फूल गए थे. तब तक वहां आसपास के फ्लैटों में रहने वालों की भीड़ जमा हो गई थी.

कोई दूसरी राह न देख कर किसी पड़ोसी ने पुलिस को फोन कर दिया. पुलिस अपने साथ फायर ब्रिगेड भी ले आई थी.

बालकनी में सीढ़ी लगा कर खिड़की के रास्ते फायरमैन ने चिन्मय के कमरे में प्रवेश किया तो वह गहरी नींद में सो रहा था. फायरमैन ने अंदर से मुख्यद्वार खोला तो हैरानपरेशान रत्ना ने झिंझोड़कर चिन्मय को जगाया.

‘‘क्या हुआ, बेटा? तू ठीक तो है?’’ रत्ना ने प्रेम से उस के सिर पर हाथ फेरा था.

‘‘मैं ठीक हूं, मम्मी, पर यह सब क्या है?’’ उस ने बालकनी से झांकती सीढ़ी और वहां जमा भीड़ की ओर इशारा किया.

‘‘हमें परेशान कर के तुम खुद चैन की नींद सो रहे थे और अब पूछ रहे हो यह सब क्या है?’’ मानव कुछ नाराज स्वर में बोले थे.

‘‘सौरी पापा, मैं आप की अपेक्षाओं की कसौटी पर खरा नहीं उतर सका.’’

‘‘ऐसा नहीं कहते बेटे, हमें तुम पर गर्व है,’’ रत्ना ने उसे गले से लगा लिया था. मानव की आंखों में भी आंसू झिलमिला रहे थे. कैसा जनून था वह, जिस की चपेट में वे चिन्मय को शायद खो ही बैठते. मानव को लग रहा था कि जीवन कुछ अंकों से नहीं मापा जा सकता, इस का विस्तार तो असीम, अनंत है. उन्मुक्त गगन की सीमा क्या केवल एक परीक्षा की मोहताज है?

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