फिर वसंत लौट आया: भाग 3- जब टूटा मेघा का भ्रम

तभी अचानक उस की नजर बस के साइड मिरर पर पड़ गई. सांवला सा चेहरा. चेहरे पर उदासी पुती हुई थी. सांवलापन एकाएक उस के पूरे बदन में एक जहर की तरह फैल गया और उस का पूरा बदन गुस्से से सुलगने लगा, ‘‘राइज ऐंड लवली, क्रीम किसलिए चाहिए तुम्हें? गोरा होने के लिए… हुंह… जब कुदरत ने तुम्हें सांवला बना दिया है, तो तुम रोजी की तरह कभी गोरी नहीं हो सकती.

तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं करती?’’ मनोज मेघा की एक छोटी सी डिमांड पर गुस्से से बिफरते हुए बोला था.

‘‘क्या यही कारण है कि तुम रोजी से शादी करना चाहते हो? मेरा रंग खराब है इसलिए?’’ मेघा बोली.

‘‘कारण चाहे जो भी रहा हो, लेकिन मैं रोजी से शादी करूंगा और हर हाल में करूंगा. अब हर चीज का कारण बताना मैं तुम्हें जरूरी नहीं समझता,’’ मनोज पलंग से उतर कर

खिड़की के पास चला गया और नीचे बालकनी

में देखने लगा.

उस दिन के बाद वह वापस कभी मनोज के पास नहीं गई. अपने दोनों बच्चों आदि और अवंतिका के साथ वह अपने पिता के घर पर ही रह रही थी.

इस बीच मेघा ने अपने पिता से निशांत के बारे में बताया था कि वह उस से शादी करना चाहता है. रंजीत बाबू अपनी बेटी की समझदारी के कायल थे. एक गलती उन से अपनी जिंदगी में मनोज जैसे दामाद को पा कर हुई थी. वे अपनी गलती का पश्चात्ताप भी करना चाहते थे.

इस तरह सालभर बीत गया. पतझड़ के बाद फिर से वसंत आया. पेड़ों पर नए पत्ते आए. बाग गुलजार हो गए और मेघा ने निशांत को अपने घर बुलाया और अपने पिताजी से मिलवाया. रंजीत बाबू निशांत की प्रगतिशील सोच से बहुत प्रभावित हुए.

अगले दिन निशांत को खाने पर बुलाया. अजय साहब भी मेघा और निशांत की जोड़ी को देख कर बहुत खुश हुए और दोनों को खूब आशीर्वाद दिया.

आज मेघा आईने के सामने खड़ी हो कर खुद को निहारने लगी. गुलाबी सूट में वह किसी परी से कम नहीं लग रही थी. आंखों में काजल, दोनों हाथों में लाललाल चूडि़यां, पांवों में नए सैंडल. उस ने गालों पर राइज ऐंड ग्लो क्रीम लगाना चाही, लेकिन कुछ सोच कर रुक गई.

निशांत ने तो मुझे ऐसे ही पसंद किया है और वह अपनी नई खरीदी स्कूटी पर सवार हो कर निशांत से  मिलने होटल पहुंच गई.

निशांत आज बड़ी बेसब्री से होटल में मेघा का इंतजार कर रहा था. उस ने एक टेबल मेघा और अपने लिए पहले से ही बुक कर रखी थी. काले कोटपैंट में निशांत भी खूब फब रहा था. मेघा के आते ही उस ने पहले उसे बुके दे कर

उस का स्वागत किया. फिर पूछा, ‘‘क्या फैसला किया तुम ने?’’

मेघा बुके लेते हुए बोली, ‘‘वही जो पहले था. सोच कर बताऊंगी,’’ और हंसने लगी.

आज बहुत दिनों के बाद निशांत ने मेघा के चेहरे पर हंसी देखी थी. वह भी बिना मुसकराए नहीं रह सका.

फिर मेघा बोली, ‘‘मेरे बच्चों को तुम अपना नाम दोगे, आई मीन तुम उन्हें अपनाओगे न? उन की जिम्मेदारी लोगे?’’

‘‘हां, तुम्हारे साथसाथ मैं तुम्हारे बच्चों को भी अपनाऊंगा और तुम्हारी जिम्मेदारी भी उठाऊंगा,’’ निशांत मेघा के हाथ को अपने हाथ में लेते हुए बोला और फिर दोनों खिलखिला कर हंस पड़े.

फिर वसंत लौट आया: भाग 2- जब टूटा मेघा का भ्रम

किसी तरह बस में सवार हुई और किनारे की सीट पर बैठ गई. बस में आनाजाना भी उसे बहुत ही उबाऊ लगता है. पापा अकसर कहते हैं कि बेटा कोई छोटी कार ही ले लो. मेरा रिटायरमैंट का पैसा तो है ही. समय से घर आओगी और दफ्तर भी समय से चली जाओगी.

आजकल जमाना बहुत खराब हो गया है. रात को छोड़ो आजकल दिनदहाड़े हत्या और बलात्कार हो रहे हैं. तुम जब बाहर निकलती हो तो मेरा जी बहुत घबराता है. कल मैं ने अखबार में पढ़ा था कि दिल्ली में एक बुजुर्ग महिला के साथ रेप हो गया है.’’

मगर मेघा बहुत ही स्वाभिमानी है, यह उस के पिता भी बखूबी जानते हैं. वह सबकुछ अपने कमाए पैसों से खरीदती है. घर भी अब उस के पैसों से ही चलता है. किसी प्राइवेट फाइनैंश कंपनी में काम करती है.

वह छेड़छाड़ से भी डरती है. अकेली औरत सब को ‘मुफ्त’ का माल लगती है. कोई हाथ छूने का बहाना ढूंढ़ता है, कोई कमर या कूल्हे का एक दिन बस में किसी ने उस का हाथ पकड़ लिया. खड़े रहने का सहारा ढूंढ़ते हुए. वह सब सम?ाती है. यह और बात है कि कभी किसी से कुछ कहा नहीं.

देशमुख उस दिन फाइल लेने के बहाने उस का हाथ पकड़ना चाहते थे. उस ने तब देशमुख को डपट दिया था, ‘‘आप को शर्म नहीं आती देशमुखजी? आप बालबच्चों वाले आदमी हैं. आप की पत्नी को जब यह सब पता चलेगा तब उस को कैसा लगेगा? मैं आप की बेटी की उम्र की हूं. मुझे घिन आती है आप जैसे लोगों से,’’ और वह फाइल फेंक कर चली गई.

उस दिन के बाद मेघा आज तक देशमुख

के कैबिन में नहीं गई. जब कोई फाइल

देनी होती तो चपरासी के हाथों भिजवाती है. देशमुख और उस के जैसे लोग मेघा को फूटी आंख नहीं सुहाते.

कंडक्टर ने आ कर पूछा, ‘‘टिकट… टिकट… टिकट… लीजिए.’’

मेघा की तंद्रा टूटी. उस ने टिकट लिया और पर्स से पैसे निकाल कर कंडक्टर की ओर बढ़ाए.

किसी को शायद उतरना था. कोई परिवार था. बस वहां काफी देर खड़ी रही.

सामने ढेर सारी सुहागिन औरतें वटवृक्ष

की पूजा कर रही थीं. लालनारंगी साडि़यों में सब कितनी सुंदर लग रही हैं. आपस में बोलतीबतियातीं, हंसीठहाके लगातीं, मांग में केसरिया सिंदूर नाक से ले कर मांग तक भरा हुआ था. कितनी हंसीखुशी से जीवन भरा हुआ है इन का. इस पृथ्वी पर सुख और दुख एक ही साथ पलते हैं. अलगअलग लोग एक ही समय में उस को

जीते हैं.

मेघा का गला रुंध आया था. एक टीस उस के अंदर पैदा होने लगी. उस के अंदर एक घाव है जो रहरह कर टीसता है. ऐसे मौके उसे बेचैनी से भर देते हैं.

मेघा के जीवन में अब तक दुख ही दुख भरे थे, लेकिन उस के जीवन में इधर

2 महीनों से एक सुख का पौधा अंकुराने लगा

था. निशांत से उस की मुलाकात इसी बस में

हुई थी, दफ्तर से लौटते वक्त. वह उस की

बगल में ही किसी बीमा कंपनी में काम करता है. अभी नयानया ही आया है इस शहर में. एकदम नई उम्र का लड़का है निशांत. औफिस से लौटते वक्त उस से इसी बस में रोज मुलाकात होने

लगी थी.

मुलाकातों का यह सिलसिला जब लंबा चला तो एक दिन मोबाइल पर बातचीत भी

होने लगी.

‘‘हाय,’’ मोबाइल पर पहला मैसेज निशांत ने ही किया था.

‘‘हैलो… अब तक सोए नहीं?’’ मेघा ने लिखा.

‘‘नहीं, नींद नहीं आ रही है. कुछ सोच

रहा हूं.’’

‘‘क्या सोच रहे हो?’’ मेघा बोली.

‘‘नहीं, जाने दो तुम बुरा मान जाओगी,’’ निशांत बोला.

‘‘अच्छा, ठीक है, नहीं मानूंगी. अब बोलो भी,’’ मेघा बोली.

‘‘मैं बहुत दिनों से तुम से एक बात कहना चाहता हूं,’’ निशांत बोला.

‘‘बोलो, क्या बोलना चाहते हो?’’ मेघा बोली.

‘‘कैसे कहूं, मुझ से कहा नहीं जा रहा है?’’ निशांत बोला.

‘‘अब कह भी दो. कोई बात कह देने से मन का बोझ हलका हो जाता है,’’ मेघा बोली.

निशांत ने किसी तरह हिम्मत की और अपना मैसेज पूरा किया, ‘‘आई

लव यू… मेघा…’’ लेकिन ऐसा लिखते ही उस का दिल बल्लियों उछलने लगा.

उधर से मेघा का कोई जबाब नहीं मिला.

निशांत परेशान हो गया. वह मेघा के मैसेज का बहुत देर तक इंतजार करता रहा कि उस का कोई जवाब मिले.

इस चक्कर में उसे सारी रात नींद नहीं आई. वह रहरह कर सारी रात मोबाइल चैक करता रहा.

एक दिन बस से लौटते वक्त निशांत मेघा से बोला, ‘‘मुझे सांवला रंग बहुत

पसंद है.’’

‘‘क्यों?’’ उस ने निशांत से ऐसे ही पूछ लिया.

‘‘क्योंकि मुझे बादल बहुत पसंद है. जोकि काले होते हैं. घटाएं भी बहुत पसंद हैं क्योंकि वे स्याह होती हैं और मेघा यानी वर्षा भी मुझे बहुत अच्छी लगती है. ये तीनों स्याह होतेहोते काले

हो जाते हैं. वर्षा के कारण ही इस धरती पर जीवन है, हरियाली है. इसलिए मुझे सांवला रंग बहुत पसंद है.’’

निशांत द्वीअर्थी भाषा में बोल रहा था. जिसे मेघा ने ताड़ लिया था. बोली, ‘‘और क्या पसंद

है तुम्हें?’’

‘‘तुम्हारी आंखों का स्याहपन और कत्थईरंग,’’ निशांत मेघा का हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोला.

मेघा अपना हाथ धीरे से निशांत के हाथ से छुड़ाते हुए बोली, ‘‘इन कत्थई रंग के खूबसूरत आंखों की रूमानियत में मत बहो निशांत. रंग आदमी को हमेशा धोखा दे जाते हैं और आदमी भी समय के साथ रंग बदलने लगता है और बादल और घटाएं धरती के दुख को ही देख कर रोती हैं. जब आसमान से धरती का दुख नहीं देखा जाता तो वह बादल और घटाओं की आड़ ले कर रोता है,’’ और सचमुच मेघा की आंखें भीगने लगी थीं. वह अपनी आंखें पोंछते हुए बोली, ‘‘तुम्हें मालूम है, मैं तलाकशुदा हूं और मेरे 2 बच्चे भी हैं.’’

‘‘हां जानता हूं.’’

‘‘फिर भी तुम मुझ से शादी करोगे?’’ मेघा उसी अंदाज में बोली.

‘‘हां, फिर भी तुम से ही शादी करूंगा. तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. और… और… मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं… आई लव यू मेघा.’’

‘‘और तुम्हारे घर वालों को कोई ऐतराज नहीं है?’’ मेघा बोली.

‘‘मैं बचपन से अनाथ हूं. एक बूढ़ी चाची हैं. उन्होंने ही मुझे पालपोस कर बड़ा किया है. उन्हें मैं ने बताया था. उन्हें कोई ऐतराज नहीं है,’’ निशांत बोला.

‘‘आई लव यू जैसा सस्ता और हलका शब्द प्रेम के लिए मत यूज करो निशांत, प्लीज. मैं सोच कर बताऊंगी… अपने पापा से पूछ कर,’’ मेघा ने टालने की गरज से कहा.

‘‘मुझे इस का बेसब्री से इंतजार रहेगा,’’ निशांत बस से उतरते हुए बोला.

अभी और 30 मिनट लगेंगे औफिस पहुंचने में. उस ने एक बार फिर घड़ी पर नजर डाली. अभी तो 9 ही बजे हैं.

मेरे अपर लिप पर बाल हैं, मैं इन बालों को कैसे रिमूव करूं?

सवाल

मेरे अपर लिप पर एमदम से बहुत सारे बाल आ गए हैं जिस की वजह से मुझे बहुत शर्म आती है. मैं इन्हें कैसे रिमूव करूं?

जवाब

अपर लिप के बाल हटाने के लिए बहुत सारे तरीके हैं. थ्रैडिंग या वैक्सिंग भी की जा सकती है. थ्रैडिंग में बहुत पेन होती है और धीरेधीरे बाल डार्क और थिक भी होने शुरू हो जाते हैं. वैक्सिंग से बाल सौफ्ट तो हो जाते हैं मगर स्किन के बारबार खींचने से रिंकल्स पड़ने शुरू हो जाते हैं. इसलिए इन बालों से हमेशा के लिए छुटकारा पाने के लिए पल्स लाइट या लेजर सब से अच्छा समाधान है.

पल्स लाइट करने में फ्लैश लाइट की जाती है जिस में 2 मिनट लगते हैं. इस तरह से 5-6 सीटिंग में बाल हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं या यों कहें इतने कम और हलके व सौफ्ट हो जाते हैं कि दिखते भी नहीं. अगर हलके हैं

तो ब्लीच किए जा सकते हैं. यह इलाज बिलकुल सेफ है और पेनलैस भी है. 6 महीने के अंदर आप इन बालों से हमेशा के लिए छुटकारा पा लेती हैं.

आप किसी क्लीनिक में जाएं. वहां किसी डाक्टर से बात करें. वह चैक कर के बताएंगे कि आप की प्रौब्लम हारमोनल तो नहीं है. अगर हारमोनल इंबैलेंस है तो उस केलिए कोई दवा भी जरूर दी जाएगी. मगर ध्यान रखें कि जहां भी जाएं वहां हाइजीन का खास खयाल रखा जाता हो.

समस्याओं के समाधान

ऐल्प्स ब्यूटी क्लीनिक की फाउंडर डाइरैक्टर डा. भारती तनेजा द्वारा 

पाठक अपनी समस्याएं इस पते पर भेजें : गृहशोभाई-8, रानी  झांसी मार्गनई दिल्ली-110055.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या 9650966493 पर भेजें.

घर में झटपट से बनाएं ग्रीन स्पैगेटी और वाइट सॉस पास्ता

गर्मियों में बनाएं अपने बच्चों के लिए घर में बनाएं ग्रीन स्पैगेटी और वाइट सॉस पास्ता. एक बार घर में बना के तो देखें ये रेसिपी बच्चे प्लेट साफ कर देंगे. घर में झटपट से बनाएं ग्रीन स्पैगेटी और वाइट सॉस पास्ता

  1. ग्रीन स्पैगेटी

सामग्री

  1.   1 कप पकी स्पैगेटी
  2.   3 बड़े चम्मच धनियापत्ती
  3. 1 हरीमिर्च
  4.   1/4 कप भुनी मूंगफली
  5.   1 कली लहसुन
  6.   1 बड़ा चम्मच औलिव औयल
  7. नमक स्वादानुसार.

विधि

मिक्सी में धनिया, लहसुन, भुनी मूंगफली और मिर्च का दरदरा पेस्ट बनाएं. कड़ाही में तेल गरम कर पेस्ट, नमक और स्पैगेटी मिलाएं और गरमगरम सर्व करें.

2. पास्ता विद व्हाइट सौस वैजिटेबल्स

सामग्री

  1.   1 कप पास्ता
  2.   3 हरे प्याज
  3.   1/2 कप बींस
  4.   1-1 बड़ा चम्मच लाल, पीली व हरी शिमलामिर्च कटी
  5.   2 बड़े चम्मच मटर के दाने
  6. 1 कली लहसुन
  7.   2 बड़े चम्मच फूलगोभी कटी
  8.   1 कप दूध
  9.   2 बड़े चम्मच बटर
  10.   1 बड़ा चम्मच ओट्स आटा
  11. 1/4 छोटा चम्मच कालीमिर्च पाउडर
  12.   2 बड़े चम्मच चीज कसी.

विधि

कड़ाही में मक्खन गरम कर उस में लहसुन और हरा प्याज भूनें. फिर सारी सब्जियां डालें और उन के हलका पकने पर 1 बड़ा चम्मच मक्खन और ओट्स का आटा डाल कर भूनें. इसी में 1 कप दूध डालें. धीरेधीरे चलाते हुए हलका गाढ़ा होने दें. फिर चीज व पका पास्ता डालें. फिर काली मिर्च पाउडर डाल कर गरमगरम सर्व करें.

3.पनीर नूडल्स सूप

सामग्री

  1.   1/2 कप आटा नूडल्स पके
  2.   1-1 बड़ा चम्मच लाल, पीली व हरी शिमलामिर्च कटी
  3.   2 बड़े चम्मच गाजर कटी
  4. 1 हरा प्याज कटा
  5.   2 उबले हुए टमाटरों की प्यूरी
  6.   1 हरीमिर्च कटी
  7.   2 बड़े चम्मच पनीर के बारीक टुकड़े
  8.   1/4 छोटा चम्मच नूडल्स मसाला
  9. 1 कली लहसुन कटी
  10. 1 बड़ा चम्मच मक्खन
  11. नमक स्वादानुसार.

विधि

कड़ाही में मक्खन गरम कर लहसुन, हरा प्याज और शिमला मिर्च भूनें. इस में गाजर और टमाटर की प्यूरी, नमक व हरीमिर्च डालें. नूडल्स मसाला और 11/2 कप पानी डाल कर उबलने दें. फिर पनीर और नूडल्स डालें और गरमगरम सर्व करें.

ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर धोखा या जरूरत

खाने की टेबल पर बैठा जयंत कहीं खोया हुआ था. वह कुछ खा भी नहीं रहा था. तभी उस की वाइफ अपूर्वा ने उसे टोकते हुए कहा, ‘‘आप कहां खोए हुए हैं?’’

‘‘कहीं नहीं,’’ कहते हुए जयंत ने अपूर्वा की बात को टाल दिया.

असल में जयंत रिया के बारे में सोच रहा था. रिया जयंत की गर्लफ्रैंड है. वह 2 सालों से उस के साथ रिलेशनशिप में है. जयंत को हाल ही में बिजनैस में घाटा हुआ है. अब वह सोच रहा है कि वह अपनी शादी और रिलेशनशिप दोनों को कैसे मैनेज करेगा. रिया पूरी तरह जयंत पर निर्भर है. बिजनैस में हुए घाटे की वजह से जयंत अब रिया का खर्चा नहीं उठा पा रहा है. उस ने सोचा कि वह रिया से बात करेगा, लेकिन इस का कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकि वह सोचती है कि औरतों की सभी जरूरतों का ध्यान मर्दों को रखना चाहिए.

रिया की ऐसी सोच ने जयंत को परेशान कर दिया है. अब वह रिया से रिश्ता तोड़ना चाहता है. लेकिन प्रौब्लम यह है कि रिया इस के लिए भी तैयार नहीं है. जयंत बड़ी दुविधा में है कि इस समस्या का छुटकारा कैसे होगा.

न व्यावहारिक न किफायती

ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर न तो व्यावहारिक हैं और न ही किफायती. यह अपने साथ कई खर्चे और प्रौब्लम ले कर आता है. ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर कई तरह के होते हैं. जिन लोगों के पार्टनर इमोशनल नहीं होते, ऐसे लोग अपनी मैरिज से बाहर इमोशन ढूंढ़ते हैं. ये लोग एक ऐसे पार्टनर की खोज में निकलते हैं जिस से ये इमोशनली जुड़ सकें. इस तरह के अफेयर को इमोशनल अफेयर कहते हैं. जो लोग अपनी मैरिड लाइफ से बोर हो चुके होते हैं और अपनी लाइफ में एक स्पार्क चाहते हैं ऐसे लोग वन नाइट स्टैंड का कौन्सैप्ट अपनाते हैं.

इस के अलावा लोग कुछ सैक्स ऐडिक्ट अफेयर भी करते हैं. ऐसा अफेयर वे लोग करते हैं जो सैक्स ऐडिक्ट होते हैं. ऐसे लोगों के लिए सैक्स ही सबकुछ होता है. कुछ लोग लव ऐडिक्ट अफेयर भी करते हैं. ऐसा अफेयर वे लोग करते हैं जो लव ऐडिक्ट होते हैं. इन के लिए लव बहुत इंपौर्टैंट होता है.

सुमित की शादी को 2 साल हो गए है. लेकिन वह अपनी पुरानी गर्लफ्रैंड प्रिया को नहीं भूल पाया है. वह अपनी वाइफ और गर्लफ्रैंड दोनों के साथ रिलेशन रखना चाहता है लेकिन प्रौब्लम यह है कि वह अपनी वाइफ के साथ दिल्ली में रहता है और गर्लफ्रैंड बैंगलुरु में जौब करती है. उस के लिए दोनों रिलेशन को मैनेज करना मुश्किल हो गया है.

वह कहता है कि बारबार बैंगलुरु जाने से उस की बीवी को उस पर शक होने लगा है. अपना ऐक्सपीरियंस बताते हुए वह ऐक्स्ट्रा मैरिड अफेयर से दूर रहने की सलाह देता है. उन का मानना है कि दो रिलेशन एकसाथ चलना आसान नहीं है और इसे ऐंजौय करने के लिए आप के पास बहुत सारा पैसा होना चाहिए. जब सच आता है सामने

शादीशुदा होते हुए अफेयर रखना आसान नहीं है क्योंकि आप अपनी मैरिड लाइफ से छिप कर यह अफेयर कर रहे हैं. ऐसे में कभी भी आप का भांड़ा फूट सकता है. उस वक्त आप इसे कैसे संभालेंगे यह आप को सोचना होगा.

वाणी प्रिया कहती है, ‘‘ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर निभाना आसान नहीं है क्योंकि यह बहुत जोखिम भरा है. साथ ही साथ ये बहुत खर्चीला भी है. इस से न केवल आप की मैरिड लाइफ खतरे में पड़ सकती है बल्कि यह आप का डिवोर्स भी करवा सकता है. लेकिन अगर आप मैरिज और अफेयर दोनों का खर्चा उठा सकते हैं तो बेशक आप ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर रख सकते हैं. अगर आप की मैरिड लाइफ का चार्म खत्म हो गया है तो अपने पार्टनर से इस बारे में खुल कर बात करें.’’

जेब पर भारी

अर्जुन रामपाल और उन की पत्नी मेहर जेसिया का डिवोर्स नहीं हुआ. उस से पहले ही अर्जुन का लिव इन रिलेशनशिप थी. इसी बीच उन की गर्लफ्रैंड प्रैगनैंट हो गई. इस के बाद उन्होंने मेहर को डिवोर्स दे दिया.आज वह अपनी लिव इन पार्टनर से बिना शादी ही अपना रिश्ता निभा रहे हैं. ऐसा वे इसलिए कर पाए क्योंकि वे अमीर हैं, लेकिन अगर आप अमीर नहीं हैं तो ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर आप की जेब पर भारी पड़ेगा.

क्या कहते हैं आंकड़े

आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं की तुलना में पुरुषों के ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर ज्यादा होते हैं. आंकड़ों से पता चलता है कि महिलाओं की संख्या 12% और पुरुषों की संख्या 28% है. सर्वे में 77% वूमन ने माना कि उन की मैरिड लाइफ बेजान होने की वजह से उन्होंने ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर किया. 72% वूमन को ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर करने का कोई पछतावा नहीं है.

इस के अलावा 10 में से 7 वूमन ने माना कि उन के हसबैंड घर के कामों में उन का हाथ नहीं बंटाते इस की वजह से उन्होंने ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर किया. 10 में से 4 वूमन ने माना कि अननोन लोगों के साथ फ्लर्ट करने से हसबैंड के साथ उन की इंटीमेसी बेहतर हुई है.

जिन महिलाओं के पति दूसरे शहर में जौब करते हैं या ज्यादा समय तक घर से दूर रहते हैं उन की महिलाएं ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की ओर जल्दी आकर्षित होती हैं. इसलिए यह जरूरी है कि दूर होते हुए भी अपने रिश्ते में प्यार बनाए रखें.

वहीं अगर पुरुषों की बात करें तो कई बार पत्नी के प्रैगनैंट होने पर पति के ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के चांस बढ़ जाते हैं. इस के अलावा पत्नी से सैक्सुअल डिजायर पूरी न होने की वजह से भी पति अकसर ऐसा कदम उठाते हैं.

दिल्ली की अदिति यादव (बदला हुआ नाम) के लिए प्रौब्लम तब खड़ी हुई जब मयंक को पता चला कि उस का ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर है. उस ने इस के पीछे की वजह जाननी चाही तो उसे पता चला कि वह अदिति को उतना वक्त नहीं दे पाता जितना वह चाहती है. वह कहता है, ‘‘ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के कई कारण हो सकते हैं. जरूरी है कि आप उन कारणों को पहचानें और उन पर काम करें.’’

झारखंड महिला हैल्पलाइन ‘181 अभयम’ ने कुछ आंकड़े पेश किए. इन आंकड़ों में हर घंटे एक ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर से जुड़ा केस रिकौर्ड किया गया. 2018 से 2022 में हैल्पलाइन पर आने वाली शिकायतें बढ़ने लगीं. जहां 2018 में 3,837 शिकायतें आईं थीं वहीं 2022 में 9,382 तक पहुंच गईं. इन आंकड़ों से यह पता चलता है कि बीते 5 सालों में ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर ढाई गुना बढ़े हैं.

वजह कई हैं

ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर करने की लोगों के पास अपनी कई वजहें होती हैं. लेकिन फिजिकल नीड, इमोशनल अटैचमैंट न होना, डोमैस्टिक वायलेंस, कम्युनिकेशन गैप अटैंशन की कमी, अकेलापन, बच्चे की रिस्पौंसिबिलिटी, सैक्सुअल नीड न पूरी होना, कम एज में शादी होना, थौट्स न मिलना, लाइफ की प्रायौरिटी अलगअलग होना, कौमन इंटरैस्ट का न होना, रिलेशन में स्पार्क न होना, अट्रैक्शन की कमी होना, बैड पर खराब परफौर्मैंस होना, कैरियर अचीवमैंट जैसी तमाम वजहों से पार्टनर ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की तरफ बढ़ते हैं. लेकिन इन सब में सब से कौमन ‘फिजिकल नीड’ है.

आसान नहीं यह

ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर न सिर्फ पैसे खर्च कराता है बल्कि इसे ज्यादा दिनों तक छिपाया भी नहीं जा सकता. अफेयर की बात पता चलते ही पार्टनर आप का जीना दूभर कर देता है. ऐसे में अगर आप डिवोर्स के बारे में सोचते हैं तो यह इतना आसान नहीं होगा क्योंकि हमारे देश में डिवोर्स लेना आसान नहीं है.

डिवोर्स होने के बाद आप को फाइनैंशियल क्राइसेस से गुजरना पड़ सकता है. अगर आप अमीर हैं तो ठीक है वरना कई तरह की प्रौब्लम्स आप को झेलनी पड़ सकती हैं.

ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर रखना चाहते हैं तो पार्टनर के रहने की जगह, उस के खर्चे, मैडिकल बिल सब उठाने के लिए तैयार रहना होगा. इस के अलावा ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर एक जोखिमभरा खेल है.

फांस: भाग 3- प्रिंस दोस्ती के आड़ में धोखा क्यों दे रहा है?

लंच के बाद बस वंशिका और प्रिंस ही स्टाफरूम में रह गए थे. वंशिका कौपियां चैक करने में व्यस्त थी. प्रिंस बहुत देर से कोशिश कर रहा था पर उस से लैपटौप पर परीक्षा का पेपर टाइप नहीं हो रहा था. उसे इन सब कामों की आदत नहीं थी.

प्रिंस को पता था वंशिका इन सब कामों में अच्छी है. अचानक प्रिंस बोल उठा, ‘‘वंशिका, तुम इतनी खूबसूरत हो, तुम इस स्कूल में क्या कर रही हो?’’ वंशिका बोली, ‘‘जो तुम कर रहे हो.’’ प्रिंस बोला, ‘‘तुम्हारी मदद के बिना तो मैं वह भी नहीं कर पाऊंगा.’’ वंशिका न चाहते हुए भी प्रिंस की मदद करने के लिए उठ गई.

प्रिंस बात बढ़ाते हुए बोला, ‘‘वंशिका, तुम्हारे कितने बौयफ्रैंड्स हैं?’’ ‘‘क्यों?’’ प्रिंस बोला, ‘‘मुझे भी अर्जी लगानी है.’’ वंशिका थोड़ा खीजते हुए बोली, ‘‘तुम हो तो मेरे फ्रैंड.’’ प्रिंस बोला, ‘‘मुझे तुम्हारा बौयफ्रैंड बनना है.’’ वंशिका कुछ न बोली तो प्रिंस आगे बोला, ‘‘कृतिका और आरोही बहुत अच्छी हैं पर बस मेरी दोस्त है.

तुम से कभी खुल कर बात करने की हिम्मत ही नहीं हुई.’’ वंशिका न चाहते हुए भी अपनी तारीफ सुन कर बर्फ की तरह पिघल गई और प्रिंस के पूरे काम की जिम्मेदारी स्वयं पर ले ली. प्रिंस आगे बोला, ‘‘वंशिका, तुम सोच रही होगी, मैं कामचोर हूं पर दरअसल यह स्कूल की नौकरी मेरी मंजिल नहीं है.

मुझे एडमिनिस्ट्रेशन में जाना है इसलिए मेरा सारा ध्यान उस की परीक्षा की तैयारी में ही रहता है.’’ वंशिका ने भोलेपन से कहा, ‘‘तुम्हारा सारा टाइपिंग का काम अब मैं कर दिया करूंगी. तुम अपना सारा समय ऐग्जाम की तैयारी में लगाओ.’’ वंशिका ने अपनी और प्रिंस के मध्य हुई बात किसी को भी नहीं बताई थी. प्रिंस के जो भी स्कूल के अतिरिक्त कार्य होते थे वह अब त्रिमूर्ति कर देती थी.

मजे की बात यह थी कि तीनों ही यह बात एकदूसरे को भी नहीं बताती थीं. प्रिंस को लग रहा था, घर से अच्छी तैयारी तो वह यहां कर पा रहा है. घर पर पापा के ताने सुनो और मम्मी के काम भी करो.अच्छा किया उस ने यह स्कूल की नौकरी जौइन कर ली है. स्कूल में बस प्रिंस पढ़ाता था बाकी काम वंशिका और आरोही कर देती थीं. खाना भी अधिकतर कृतिका उस के लिए बना देती थी.

8 महीने 8 दिन की तरह बीत गए. प्रिंस का ऐग्जाम बहुत अच्छा गया. उसे पूरी उम्मीद थी कि वह इस बार जरूर सफल होगा. प्रिंस से ज्यादा आरोही, वंशिका और कृतिका को प्रिंस के रिजल्ट की चिंता थी. तीनों ने ही अपने भविष्य के सपने प्रिंस के नाम कर रखे थे.

जैसी प्रिंस को आशा थी वैसा ही हुआ. उस का चयन हो गया. वह बेहद खुश था. उस रात प्रिंस ने आरोही, वंशिका और कृतिका को शानदार दावत दी. तीनों ही डिनर के समय यही सोच रही थी कि प्रिंस जाने से पहले क्या कुछ वादा कर के जाएगा.

कृतिका को लगता था कि प्रिंस उस के अलावा और किसी के भी इतना करीब नहीं होगा. स्कूल का काम तो कोई भी कर सकता है पर देखभाल हर किसी के बस की बात नहीं है. उधर वंशिका को अपनी खूबसूरती पर पूरा विश्वास था तो आरोही को अपने टैलेंट और अल्हड़पन पर भरोसा था.

प्रिंस 2 दिन बाद सारी कागजी काररवाई कर के अपने शहर चला गया. तीनों ही प्रिंस के मैसेज और फोनकौल की प्रतीक्षा करतीं पर वह हमेशा कौन्फ्रैंस कौल या ग्रुप वीडियो कौल करता था, जिस में सब ही बेहद फौर्मल रहते थे.

फोन के बाद तीनों ही अपनेअपने नंबर से प्रिंस को मैसेज करती थीं पर अधिकतर वह रीड कर के मैसेज नहीं करता. उस का एक ही मैसेज होता कि वह अभी बहुत बिजी है. प्रिंस अपनी नई जिंदगी और नई नौकरी में व्यस्त हो गया था.

उसे त्रिमूर्ति की याद आती थी पर समस्या यह थी कि उसे तीनों ही पसंद थीं वह किसी एक का भी दिल नहीं तोड़ सकता था. इसी डर से वह वापस उन से मिलने नहीं आ रहा था. प्रिंस को पता था कि तीनों ही उस से उम्मीद लगाए बैठी हैं.

धीरेधीरे प्रिंस की कौल आनी कम हो गईं पर आरोही, कृतिका और वंशिका के रिश्ते में प्रिंस नाम की फांस इतनी गहरी थी कि अब वह चाह कर भी नहीं निकल पा रही थी. 5 माह बीत गए थे पर उस फांस की टीस बरकरार थी.

तीनों ही अपने को ठगा हुआ महसूस करती थीं. स्कूल में एनुअल फंक्शन की तैयारी जोरों से चल रही थी. तभी बाहर से शोर सुनाई दिया. कृतिका ने देखा कि प्रिंस खड़ा हुआ है, इस से पहले वह कुछ बोलती साथ खड़ी लड़की को देख कर वह रुक गई.

प्रिंस बोला, ‘‘जाह्नवी यह त्रिमूर्ति की एक मूर्ति कृतिका है, जिस ने मेरा बहुत ध्यान रखा और यह मेरी पत्नी जाह्नवी.’’ तब तक आरोही और वंशिका भी आ गई थीं. तीनों की ही आंखों में ढेर सारे प्रश्न थे. प्रिंस ने कहा, ‘‘आज रात तुम सब का डिनर हमारे साथ है.’’

तीनों का मन नहीं था पर फिर भी न जाने क्या सोच कर वे डिनर पर चली गई थीं. आखिर प्रिंस ने ऐसा क्यों किया? क्यों झूठे सपने दिखाए? क्यों तारीफ करी? और सब से महत्त्वपूर्ण बात क्यों उन्होंने एकदूसरे को यह बात नहीं बताई?

रात में डिनर के समय  प्रिंस अपनी पत्नी की तरफ देखते हुए बोला, ‘‘देखो तीनों  ही इतनी सुंदर और अच्छी हैं. तीनों ही मेरी दोस्त, इसलिए मैं किसी का भी दिल नहीं तोड़ सकता था.’’ ‘‘इस त्रिमूर्ति को खंडित करने का अपराध मैं नहीं कर पाया, इसलिए दोस्ती को दोस्ती तक ही सीमित रखा.’’

तीनों मन ही मन सोच रही थीं कि मतलब उन का शक सही था दोस्ती की आड़ में प्रिंस तीनों को बेवकूफ बनाता रहा. प्रिंस तो अपने हिस्से का गिलट बड़ी आसानी से क्लीयर कर के चला गया पर जो फांस आरोही, वंशिका और कृतिका के मन में थी तो वह अब और गहरी हो गई.

कृतिका सोच रही थी कि अगर वे 3 न हो कर 1 होतीं तो आज वह प्रिंस के साथ जरूर होती. आरोही सोच रही थी कि क्यों वंशिका और कृतिका ने प्रिंस से अपनी नजदीकी के बारे में नहीं बताया? वहीं वंशिका को लग रहा था कि अगर वे दोनों वास्तव में उस की सच्ची दोस्त होतीं तो उसे यों अंधेरे में नहीं रखतीं.

9 Tips: औयली स्किन की यों करें केयर

जब स्किन में सेबेसियस ग्लैंड्स (जो त्वचा में तेल का उत्पादन करती हैं) अधिक सक्रिय होती हैं तो हमारी स्किन औयली कहलाती है यानी त्वचा के रोमछिद्रों से अधिक तेल निकलने के कारण स्किन औयली हो जाती है. ऐसी स्किन पर अधिकतर बड़ेबड़े छिद्र (ओपन पोर्स) और दाने होते रहते हैं और यह  बेजान, चिकनी और धब्बेदार लगती है.

बदलता मौसम औयली स्किन का प्रमुख कारण होता है. अत्यधिक नमी की वजह से भी स्किन से पसीना अधिक निकलता है जो उसे औयली बनाता है. इस समस्या से निबटने के लिए त्वचा की सफाई का विशेष ध्यान रखना जरूरी है.

औयली स्किन के संभावित कारण

आनुवंशिकता

औयली स्किन आनुवंशिकता के कारण भी होती है. यदि मातापिता में से किसी की भी स्किन औयली है या परिवार में किसी और की स्किन औयली है तो आप की स्किन के औयली होने की संभावना बढ़ जाती है.

अधिक मेकअप करना

कुछ महिलाएं ओपन पोर्स और दागधब्बों को छिपाने के लिए मेकअप का बहुत इस्तेमाल करती हैं. लेकिन अधिक मेकअप प्रोडक्ट्स यूज करने से त्वचा को नुकसान पहुंचता है. खूबसूरत त्वचा की चाह में कौस्मैटिक्स का अधिक इस्तेमाल बाद में त्वचा को नुकसान पहुंचाता है.

हारमोनल बदलाव

शरीर में होने वाले हारमोनल परिवर्तन भी औयली स्किन के लिए जिम्मेदार होते हैं. महिलाओं में ऐंड्रोजन हारमोन घटताबढ़ता रहता है. यह सेबेसियस ग्लैंड्स को ऐक्टिवेट करता है. हारमोनल असंतुलन पुरुषों में भी टेस्टोस्टेरौन हारमोन को बहुत अधिक सक्रिय कर देता है, जिस के कारण उन की स्किन भी औयली हो सकती है.

औयली त्वचा से बचाव

1.अपने चेहरे को सही तरीके से धोएं

दिन में कम से कम 2 बार चेहरा जरूर धोएं. 1 बार सुबह और 1 बार रात को सोने से पहले. लेकिन इस से ज्यादा नहीं क्योंकि ज्यादा सफाई करने से त्वचा रूखी हो सकती है. गरम या कुनकुने पानी का उपयोग भी त्वचा में रूखापन ला सकता है. स्किन की सफाई करने के लिए सल्फर, सैलिसिलिक ऐसिड या टीट्री औयल युक्त क्लींजर का उपयोग करें.

2.मेकअप सही तरीके से करें

जब आप सुबह मेकअप करें तो सब से पहले तेल नियंत्रित करने के लिए प्राइमर या बेस का उपयोग करें. यह पूरे दिन के लिए त्वचा के अतिरिक्त तेल को अवशोषित कर लेता है और त्वचा को फ्रैश व औयल मुक्त रखता है. अपने चेहरे के टी जोन के सब से ऊपरी हिस्से जैसे माथे और नाक पर अतिरिक्त सीबम को हटाने के लिए पाउडर भी उपयोग कर सकती हैं. ध्यान रखें कि आप के सभी ब्यूटी प्रोडक्ट्स औयल फ्री हों और मुंहासे पैदा करने वाले न हों. क्रीम के बजाय पाउडर ब्लश और आईशैडो का उपयोग करें.

3.सही मौइस्चराइजर का प्रयोग करें

औयली त्वचा को भी मौइस्चराइज करने की आवश्यकता होती है ताकि तैलीय ग्रंथियां अतिरिक्त तेल का उत्पादन न करें. औयल फ्री मौइस्चराइजर और सनस्क्रीन का उपयोग करने की कोशिश करें. लेकिन उस के लिए मेकअप हटाने वाली कोल्ड क्रीम या लोशन का उपयोग न करें क्योंकि वे त्वचा पर चिकनी परत बना सकते हैं.

4.सनस्क्रीन अप्लाई करना न भूलें

हर सुबह चेहरे को साफ करने के बाद सनस्क्रीन लगाना न भूलें. अमेरिकन ऐकैडमी औफ डर्मैटोलौजी ऐसोसिएशन के अनुसार सूर्य से निकलने वाली हानिकारक यूवी रे स्किन को बुरी तरह से डैमेज कर देती हैं. इस के साथ ही यदि स्किन औयली है तो औयल फ्री सनस्क्रीन का इस्तेमाल करें.

5. ऐस्ट्रिंजैंट का उपयोग करें

यदि आप की त्वचा अत्यधिक औयली है तो आप रोमछिद्रों को कसने के लिए ऐस्ट्रिंजैंट का उपयोग कर सकती हैं और अतिरिक्त औयल को हटा सकती हैं पर क्योंकि उस में अल्कोहल का स्तर अधिक होता है इसलिए कईयों की त्वचा इस से सूखने भी लगती है. इस का इस्तेमाल हर दूसरे दिन किया जाना चाहिए. अपने चेहरे को ऐक्सफौलिएट करने के बाद कभी इस का उपयोग न करें.

6.त्वचा को ऐक्सफौलिएट करें

रोमछिद्रों को बढ़ने से रोकने के लिए ऐक्सफौलिएटिंग बहुत अच्छा तरीका है. बहुत सी महिलाएं औयली स्किन के लिए औयल फ्री स्क्रब का उपयोग करती हैं. लेकिन चेहरे पर इसे कोमल हाथों से लगाना चाहिए वरना त्वचा में रूखापन आ सकता है.

7.हफ्ते में 1 बार फेस मास्क लगाएं

त्वचा की गहराई से सफाई करने वाले फेस मास्क में चिकनी मिट्टी होती है जो त्वचा का अतिरिक्त तेल सोख सकती है जिस से कई दिनों तक चेहरे की औयली चमक कम हो जाती है. इसलिए ऐसा मास्क चुनें जिस में शहद या शीया बटर मिक्स हो जो त्वचा को कोमल बनाता है.

अगर आप की स्किन औयली है तो कुछ गलतियों को करने से बचना चाहिए. खासकर गरमियों में क्योंकि ये गलतियां आप के चेहरे से खूबसूरती चुरा सकती हैं.

8.गंदे हाथों से चेहरे को बारबार न छुएं

कई महिलाओं की बारबार चेहरे पर हाथ लगाने की आदत होती है. इस से पिंपल्स होने का डर रहता है. यही नहीं पसीने की वजह से हाथों में कई सारे जर्म्स और बैक्टीरिया चिपके हुए होते हैं जो स्किन को नुकसान पहुंचाते हैं.

ढेर सारे ब्यूटी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल: औयली स्किन को जितना हो सके उतना फ्रैश रखने की कोशिश करें. अधिक प्रोडक्ट्स अप्लाई करने से त्वचा पर पिंपल निकलेंगे. हमेशा स्किन टाइप को ध्यान में रख कर राइट प्रोडक्ट्स का यूज करें. गरमियों में औयली स्किन पर नए प्रोडक्ट्स अप्लाई कर ऐक्सपैरिमैंट करने की गलती न करें.

9.ओवर इटिंग नहीं

सिर्फ बाहर से त्वचा का खयाल रखना जरूरी नहीं बल्कि उसे अंदर से भी हैल्दी बनाने की जरूरत है. औयली, जंक फूड या फिर कोल्ड ड्रिंक जैसी चीजों का सेवन अधिक करने से त्वचा से जुड़ी परेशानियां शुरू हो जाती हैं. इसलिए हमेशा सीमित मात्रा में ही हैल्दी डाइट का सेवन करें. पानी का सेवन जितना ज्यादा करेंगी त्वचा उतना ही परेशानियों से बची रहेगी.

फादर्स डे- वरुण और मेरे बीच कैसे खड़ी हो गई दीवार

मुझे रात को जल्दी सोने की आदत है. बेटेबहू की तरह मैं देररात तक जागना पसंद नहीं करता. शाम का खाना जल्दी खा कर थोड़ी देर टहलने जाना और फिर गहरी नींद का मजा लेने के लिए बिस्तर पर लेट जाना मेरी रोज की दिनचर्या है. इस में मैं थोड़ा सा भी बदलाव नहीं करता.

उस दिन भी मैं अपनी इसी दिनचर्या के अनुसार अपने बिस्तर पर आ कर लेट गया. किंतु जाने क्या हुआ मुझे नींद ही नहीं आ रही थी. बिस्तर पर करवटें बदलतेबदलते जब मैं उकता गया तो सोचा क्यों न कुछ देर पोतापोती के साथ खेल कर मन बहला लूं.

मैं जब पोतापोती के कमरे में पहुंचा तो देखा वे लोग कुछ काम कर रहे थे. पहले तो मुझे लगा कि शायद वे पढ़ाई कर रहे हैं और उन की पढ़ाई में खलल डालना उचित नहीं होगा, मगर फिर ध्यान से देखने पर पता चला कि वे दोनों तो चित्रकारी कर रहे थे. मैं उन के पीछे जा कर खड़ा हो गया और उन की चित्रकारी देखने लगा. जल्द ही उन दोनों को एहसास हो गया कि मैं उन के पीछे खड़ा हूं. उन्होंने आश्चर्य से मेरी तरफ कुछ ऐसे देखा मानो पूछ रहे हों, ‘आप इस समय यहां क्या कर रहे हैं?’

‘‘क्या कर रहे हो बच्चो, किस का चित्र बना रहे हो, जरा मुझे भी तो दिखाओ.’’

आंखों ही आंखों में दोनों में कुछ इशारेबाजी हुई और फिर दोनों लगभग एकसाथ बोले, ‘‘कुछ खास नहीं दादाजी, हमें स्कूल में एक प्रोजैक्ट मिला है, वही कर रहे हैं.’’

‘‘अच्छा. लाओ मुझे दिखाओ, क्या प्रोजैक्ट मिला है. मैं मदद कर देता हूं.’’

‘‘नहींनहीं दादाजी, मुश्किल नहीं है, हम कर लेंगे. वैसे भी थोड़ा सा ही काम बचा है. आप अभी तक सोए नहीं, काफी देर हो गई है?’’ मेरी पोती ने पूछा.

‘‘मैं पानी पीने के लिए उठा था. तुम्हारे कमरे की लाइट जल रही थी, इसलिए तुम से मिलने आ गया.’’

‘‘मैं आप के लिए पानी लाती हूं,’’ पोती ने उठते हुए कहा.

‘‘नहीं, रहने दो, मैं पानी पी चुका हूं.’’

‘‘मैं आप को कमरे तक छोड़ आऊं दादाजी.’’ मेरे पोते ने बड़ी मासूमियत से यह कहा तो मुझे उन दोनों पर बड़ा प्यार आया. मैं उन दोनों के सिर पर हाथ फेर कर अपने कमरे में चला आया. यों तो मेरे पोतापोती बड़े अच्छे बच्चे हैं, दोनों मेरा हमेशा ही आदर करते हैं और मेरी परवा भी, किंतु उन का आज का व्यवहार मेरे प्रति कतई सम्मानजनक नहीं था बल्कि वे दोनों मुझे जल्दी से जल्दी अपने कमरे से बाहर करना चाहते थे.

खैर, मैं वापस अपने कमरे में आ गया. हालांकि बच्चों ने तो छिपाने की पूरी कोशिश की थी पर मुझे पता चल ही गया कि वे दोनों क्या कर रहे थे. वे फादर्स डे के मौके पर अपने पापा के लिए कार्ड बना रहे थे और कहीं मैं उन के इस सरप्राइज के बारे में जान न जाऊं, इसीलिए उन्होंने जल्द से जल्द मुझे अपने कमरे से टालने की कोशिश की.

फादर्स डे पर न जाने क्यों मेरे कदम अपनेआप ही अपनी अलमारी की तरफ उठ गए. मैं ने अलमारी खोली और उस में से एक डब्बा निकाला. यह डब्बा टाई का था. मैं ने डब्बे में से टाई निकाली और उसे प्यार से सहला दिया. यह टाई मेरे बेटे वरुण ने तोहफे में दी थी. वह फादर्स डे के मौके पर इसे मेरे लिए अपनी पहली तनख्वाह से खरीद कर लाया था. हालांकि मुझे इसे कभी पहनने का मौका नहीं मिला, लेकिन यह मेरे दिल के बेहद करीब है. मैं ने इसे संभाल कर रखा है.

सुबह नाश्ते की मेज पर दोनों बच्चों  ने अपने पापा को कार्ड भेंट  किया. मेरा बेटा कार्ड देख कर अपने बच्चों पर निहाल हो गया. उस ने दोनों को अपनी गोद में बैठा लिया और उन्हें अपने हाथों से नाश्ता करवाने लगा. बच्चों द्वारा बनाया गया कार्ड देखने को मुझे भी मिला. उन के द्वारा बनाई गई अपने बेटे की कार्टून जैसी सूरत देख कर मेरे होंठों पर मुसकान आ गई जिसे मैं बहुत कोशिश कर के भी अपने बेटे से छिपा नहीं पाया.

‘‘बच्चों की कोशिश बहुत अच्छी थी. हमें उन का हौसला बढ़ाना चाहिए. प्यार से दिया गया  हर तोहफा अनमोल होता है, हमें यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए. मगर कुछ लोग दूसरों की भावनाओं को समझते ही नहीं या तो तोहफा देने वाले को डांट देते हैं या उस का मजाक उड़ाने लगते हैं,’’ वरुण ने सख्त शब्दों में अपनी नाराजगी व्यक्त की.

उस की यह नाराजगी उस के बच्चों के कार्ड का मजाक उड़ाने के लिए नहीं थी, बल्कि उस की इस नाराजगी की असली वजह वह टाई थी जिसे खरीदने पर मैं ने उसे डांटा था. वह पुराना वाकेआ हम पितापुत्र के बीच आज भी मौजूद है. न उस वाकए को कभी मैं भुला पाया और न ही कभी वो. यह बात उस के दिल में ऐसी घर कर गईर् कि उस के बाद मेरा बेटा मुझ से दूर हो गया.

हालांकि कोई भी यह कह सकता है कि मुझ से तब बहुत बड़ी गलती हो गई. मैं खुद भी कभी इस बात के लिए खुद को माफ नहीं कर सका. सफाई भी क्या दूं, जब यह हुआ उस समय मेरे हालात से वह बिलकुल अनजान तो नहीं था. एक तो उस समय मेरी आर्थिक स्थिति काफी नाजुक थी, उस पर पत्नी का स्वास्थ्य दिनोंदिन बिगड़ता जा रहा था और वह हमारा साथ छोड़ने की तैयारी में थी. ऐसे में इन औपचारिकताओं के लिए जिंदगी में जगह ही कहां थी.

मैं कुछ कहता तो बात और बढ़ती, उस से पहले मेरी बहू सुमी हमेशा की तरह आगे आई, ‘‘अच्छा अब छोड़ो पुरानी बातें और जल्दी से नाश्ता खत्म करो. फिर बाजार भी जाना है. आज बच्चे अपने पापा के लिए दोपहर के खाने में कुछ खास बनाना चाहते हैं.’’ वह बातें करतेकरते सब के लिए नाश्ता भी परोसती जा रही थी. सब पनीरसैंडविच खा रहे थे जबकि मुझे उस ने दूध व कौर्नफ्लैक्स खाने को दिए. यह भेदभाव देख कर मुझे बुरा लगा.

वरुण ने बाजार जाने से मना कर दिया. उसे दफ्तर की कोई जरूरी फाइल देखनी थी. सुमी भी इतवार की सुबह काफी व्यस्त रहती है. सो, बाजार जाने की जिम्मेदारी मैं ने ले ली. सुमी ने सामान की सूची और झोले के साथ यह हिदायत भी दे डाली कि मैं अधिक दूर न जा कर पास की मार्केट से ही सामान ले आऊं.

सुमी की हिदायत के बावजूद मैं दूर  सब्जी मंडी चला गया. शायद  सुबह की खीझ मिटाने और रास्ते में अपने मित्र रामलाल हलवाई की दुकान तक पहुंच कर मेरा सब्र टूट गया और वहां मैं ने डट कर कचौरी व जलेबी का नाश्ता किया. नाश्ता करते समय मैं ने ‘फादर्स डे’ के मौके पर बड़े ही भावपूर्ण तरीके से अपने पिताजी को याद किया और बेटे के लिए उस की सलामती की कामना की.

‘‘बड़ी देर लगा दी पापाजी, कहां चले गए थे?’’ घर पहुंचते ही सुमी ने इस सवाल के साथ मेरा स्वागत किया.

‘‘मैं मंडी चला गया था. वहां सब्जी सस्ती और अच्छी मिलती है न.’’ अपनी इस समझदारी पर दाद मिलने की उम्मीद से मैं ने उस की ओर देखा पर उस ने मेरा दिल तोड़ दिया.

‘‘सब्जी लेने ही गए थे न या फिर कुछ और भी?’’ उस के इस आधेअधूरे सवाल का मतलब मैं बखूबी समझ गया था और जवाब में उसे घूर कर भी देखना चाहता था मगर चोरी पकड़ी जाने के डर से ऐसा कर न सका. थकान का बहाना बना कर मैं अपने कमरे में चला आया.

रसोई में हंगामा सा मचा हुआ था. बच्चे खाना बना रहे थे और उन के मातापिता उन की मदद कर रहे थे. पता नहीं खाना ही बना रहे थे या कोई खेल खेल रहे थे, मुझे समझ नहीं आया. अच्छा ही हुआ जो मैं बाहर से खा कर आ गया, पता नहीं घर में तो आज खाना बनेगा भी या नहीं.

मेज पर खाना लग चुका था. मेरा पोता मुझे बुलाने आया. मेरा पेट जरा भारी सा हो रहा था. इस समय भोजन करने का बिलकुल भी मन नहीं था. पर मना करने का तो सवाल ही नहीं उठता, कमजोरी मेरी ही थी. मैं मन ही मन अपनी मधुमेह आदि बीमारियों को कोसते हुए, जो मुझे अपने बच्चों से झूठ बोलने को मजबूर कर देती हैं, बाहर चला आया.

यों तो आज भी मेरे लिए लौकी की सब्जी और चपाती बनी थी पर शायद आज बच्चों को मुझ पर थोड़ा ज्यादा प्यार आ गया, इसलिए उन्होंने अपने खाने में से भी थोड़ा सा चखने के लिए दे दिया. खाना बेहद स्वादिष्ठ बना था, शायद इसलिए कि उस में बच्चों का प्यार भी मिला था, पर मजा नहीं आ रहा था. इस का कारण भी मैं जानता था.

‘‘क्या बात है पापाजी, आप खाना नहीं खा रहे? अच्छा नहीं लग रहा है क्या?’’ बहू ने मुझे प्लेट में चम्मच घुमाते देख पूछा. वह खोजी नजरों से मुझे देख रही थी. मुझे उस की इस अदा से बड़ा डर लगता है, लगता है मानो अंदर झांक कर सारे राज मालूम कर लेगी.

‘‘नहीं बेटे, ऐसी कोई बात नहीं है. खाना बहुत अच्छा बना है,’’ मैं ने जल्दीजल्दी निवाले निगलते हुए कहा. उस समय मुझे अपनी पोल खुलने से अधिक फिक्र अपने बच्चों की भावनाओं की थी. मैं ने सब के साथ भरपेट भोजन किया और दिल खोल कर भोजन की तारीफ भी की.

शाम को बच्चों का बाहर जाने का प्लान था. जब वे लोग मुझ से इजाजत लेने आए तब मेरे पेट में बहुत तेज दर्द हो रहा था, लेकिन मैं ने उन्हें इस बाबत बताना ठीक नहीं समझा क्योंकि वे लोग अपना प्लान रद्द कर देते. मेरे पोतापोती मुझे बाय कर रहे थे और मैं किसी तरह अपने दर्द को दबाए हुए मुसकराने की कोशिश कर रहा था. सुमी अब भी मेरे लिए खाना बना कर गई थी. मुझे बड़ी खुशी हुई यह देख कर कि वह मेरी हर छोटीबड़ी जरूरत का हर तरह से ध्यान रखती है. मन तो किया कि उस के लिए ही सही, दो निवाले खा लूं, मगर मुझ से नहीं हुआ. हार कर मैं अपने बिस्तर पर पड़ गया.

मैं इतनी तकलीफ में था कि बच्चे कब घर वापस आए, मुझे पता ही नहीं चला. मुझे सोया जान उन्होंने मुझे नहीं जगाया. मैं रातभर दर्द से तड़पता रहा. सुबह खाई कचौरियां मेरे पेट में कुहराम मचाए हुए थीं. ऐसे में ठीक तो यही रहता कि मैं अपने बेटाबहू को जगा देता पर सब थके हुए थे और मुझे उस समय उन्हें परेशान करना ठीक नहीं लगा. मगर परेशान तो वे लोग फिर भी हो गए. मेरी लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें मेरी तकलीफ के बारे में पता चल गया. मेरे वाशरूम से बारबार आती फ्लश की आवाज ने चुगली जो कर दी थी.

वरुण और सुमी मेरे कमरे में चले आए. मेरी हालत देख कर वे घबरा गए. वे तो उसी समय डाक्टर को बुलाना चाहते थे मगर इतनी रात डाक्टर का आना मुश्किल था. सो, खुद ही मेरी तीमारदारी में जुट गए. मुझे उस समय अपने बच्चों पर प्यार आ रहा था और शायद उन्हें गुस्सा, तभी तो वरुण मुझे घूर कर देख रहा था. वरुण के इस तरह घूरने से मुझे डर लगता था. उस के गुस्से से खुद को बचाने के लिए मैं आंखें बंद कर के लेट गया. थोड़ी देर में मुझे दवा के कारण नींद आ गई.

10 बजे के करीब मेरी नींद टूटी. मैं चौंक कर उठ बैठा. सुमी का दफ्तर जाने का समय हो रहा था. आज मैं अपनी आदत के उलट बहुत देर तक सोता रहा. मैं ने उठने की कोशिश की, पर उठ नहीं पाया. बड़ी कमजोरी महसूस हो रही थी. कुछ ही देर में सुमी मुझे देखने आई. मुझे जगा हुआ देख कर वह चाय बना लाई. तब तक वरुण ने मुझे सहारा दे कर बैठा दिया. दोनों को उस समय घर के कपड़ों में देख कर मुझे कुछ आश्चर्य हुआ, ‘‘तुम दोनों अब तक तैयार नहीं हुए. आज औफिस नहीं जाना है क्या?’’

‘‘आप को ऐसी हालत में छोड़ कर औफिस कैसे जाएं. आज हम दोनों ने दफ्तर से छुट्टी ले ली है,’’ वरुण ने जवाब दिया.

‘‘नहीं बेटा, इस की कोई जरूरत नहीं है. मैं अब ठीक महसूस कर रहा हूं. तुम लोग आराम से दफ्तर जाओ,’’ जाने मैं बच्चों से झूठ बोल रहा था या फिर खुद से, मुझे समझ नहीं आया.

‘‘हां, पता है हमें कितना ठीक महसूस कर रहे हैं आप. आप का चेहरा देख कर ही पता चल रहा है. अब आप कुछ नहीं बोलेंगे, सिर्फ आराम करेंगे. आज हम आप को छोड़ कर कहीं नहीं जाएंगे. पूरा दिन आप पर नजर रखेंगे और आप वो करेंगे जो हम कहेंगे. चलिए, लेट जाइए.’’ बहू की यह मीठी झिड़की मुझे अच्छी लगी. इस के बाद दोनों पूरा दिन मेरी इस तरह देखभाल करते रहे जैसे कि मैं एक छोटा बच्चा हूं और वे दोनों मेरे अभिभावक, मैं भी उन की हर आज्ञा का पालन करता रहा.

शाम तक मेरी हालत में काफी सुधार हो चुका था. मैं अपने कमरे में बैठेबैठे बोर हो गया था. सो, उठ कर हौल में चला आया. मुझे देख कर सुमी ने चाय का कप और एक प्लेट में बिस्कुट परोस कर मेरे सामने रख दिए. मुझे बड़ी हसरत से पैस्ट्री और समोसों की ओर ताकते देख उस के होंठों पर शरारती मुसकान आ गई जिसे देख कर मैं शरमा गया.

‘‘कल आप कहां गए थे पापा?’’ वरुण ने मेरी ओर सवाल दागा.

उस के इस सवाल के लिए मैं तैयार नहीं था, इसलिए कुछ पलों के लिए तो हड़बड़ा गया लेकिन फिर विरोध करने वाले अंदाज में बोला. ‘‘तुम्हारी याददाश्त अभी से कमजोर हो गई है क्या? याद नहीं तुम्हें, सब्जी लेने गया था, बहू ने ही तो भेजा था.’’

‘‘मेरी याददाश्त बिलकुल ठीक है. आप की बहू ने तो आप को पास वाली मार्केट भेजा था, पर आप रामलाल चाचा की दुकान पर पहुंच गए. पूछ सकता हूं क्यों?’’

‘‘मैं रामलाल की दुकान पर नहीं, मंडी गया था, अच्छी और सस्ती सब्जी लेने.’’ मैं जानता था अब मेरा झूठ ज्यादा देर तक नहीं चलेगा, पर फिर भी मैं ने एक आखिरी कोशिश की.

‘‘मेरे दोस्त दिनेश ने आप को रामलाल चाचा की दुकान पर देखा था वह भी जलेबी और कचौरी खाते हुए.’’

मेरे बेटे के बिगड़े तेवरों ने मुझे सीधा कर दिया. दिनेश को तो मैं ने भी देखा था उस दिन पर यह नहीं सोचा था कि वह मेरे बेटे से मेरी चुगली कर देगा, चुगलखोर कहीं का. आजकल के लड़कों में बड़ों के लिए आदरसम्मान रहा ही नहीं. मैं ने अपने बेटे की ओर देखा. वह सच सुनने के इंतजार में लगातार मुझे घूर रहा था. अब और किसी झूठ के लिए जगह नहीं थी, बहाने भी लगभग खत्म हो चुके थे. सो, अब सच बोलने में ही भलाई थी.

‘‘कल तुम लोगों को फादर्स डे मनाते देख मेरा भी मन कर गया. मैं वहां फादर्स डे मनाने गया था.’’ मेरा यह मासूमियत भरा जवाब सुन कर मेरी बहू की हंसी छूट गई. जाने उस की हंसी में क्या था कि पहले मैं, फिर मेरा बेटा भी उस के साथ खुल कर हंस दिए. हम हंसे जा रहे थे और दोनों बच्चे हमारी ओर आश्चर्यभरी नजरों से देख रहे थे.

Father’s Day 2023: दूसरा पिता- क्या दूसरे पिता को अपना पाई कल्पना

वह यादों के भंवर में डूबती चली जा रही थी. ‘नहीं, न वह देवदास की पारो है, न चंद्रमुखी. वह तो सिर्फ पद्मा है.’ कितने प्यार से वे उसे पद्म कहते थे. पहली रात उन्होंने पद्म शब्द का मतलब पूछा था.

वह झेंपती हुई बोली थी, ‘कमल’.

‘सचमुच, कमल जैसी ही कोमल और वैसे ही रूपरंग की हो,’ उन्होंने कहा था.

पर फिर पता नहीं क्या हुआ, कमल से वह पंकज रह गई, पंकजा. क्यों हुआ ऐसा उस के साथ? दूसरी औरत जब पराए मर्द पर डोरे डालती है तो वह यह सब क्यों नहीं सोचा करती कि पहली औरत का क्या होगा? उस के बच्चों का क्या होगा? ऐसी औरतें परपीड़ा में क्यों सुख तलाशती हैं?

हजरतगंज के मेफेयर टाकीज में ‘देवदास’ फिल्म लगी थी. बेटी ने जिद कर के उसे भेजा था, ‘क्या मां, आप हर वक्त घर में पड़ी कुछ न कुछ सोचती रहती हैं, घर से बाहर सिर्फ स्कूल की नौकरी पर जाती हैं, बाकी हर वक्त घर में. ऐसे कैसे चलेगा? इस तरह कसेकसे और टूटेटूटे मन से कहीं जिया जा सकता है?’

लेकिन वह तो जैसे जीना ही भूल गई थी, ‘काहे री कमलिनी, क्यों कुम्हलानी, तेरी नाल सरोवर पानी.’ औरत का सरोवर तो आदमी होता है. आदमी गया, कमल सूखा. औरत पुरुषरूपी पानी के साथ बढ़ती जाती है, ऊपर और ऊपर. और जैसे ही पानी घटा, पीछे हटा, वैसे ही बेसहारा हो कर सूखने लगती है, कमलिनी. यही तो हुआ पद्मा के साथ भी. प्रभाकर एक दिन उसे इस तरह बेसहारा छोड़ कर चले जाएंगे, यह तो उस ने सपने में भी नहीं सोचा था. पर ऐसा हुआ.

उस दिन प्रभाकर ने एकदम कह दिया, ‘पद्म, मैं अब और तुम्हारे साथ नहीं रहना चाहता. अगर झगड़ाझंझट करोगी तो ज्यादा घाटे में रहोगी, हार हमेशा औरत की होती है. मुझ से जीतोगी नहीं. इसलिए जो कह रहा हूं, राजीखुशी मान लो. मैं अब मधु के साथ रहना चाहता हूं.’

पति का फैसला सुन कर वह ठगी सी रह गई थी. यह वही मधु थी, जो अकसर उस के घर आयाजाया करती थी. लेकिन उसे क्या पता था, एक दिन वही उस के पति को मोह लेगी. वह भौचक देर तक प्रभाकर की तरफ ताकती रही थी, जैसे उन के कहे वाक्यों पर विश्वास न कर पा रही हो. किसी तरह उस के कंठ से फूटा था, ‘और हमारी बेटी, हमारी कल्पना का क्या होगा?’

‘मेरी नहीं, वह तुम्हारी बेटी है, तुम जानो,’ प्रभाकर जैसे रस्सी तुड़ा कर छूट जाना चाहते थे, ‘स्कूल में नौकरी करती हो, पाल लोगी अपनी बेटी को. इसलिए मुझे उस की बहुत फिक्र नहीं है.’

पद्मा हाथ मलती रह गईर् थी. प्रभाकर उसे छोड़ कर चले गए थे. अगर चाहती तो झगड़ाझंझट करती, घर वालों, रिश्तेदारों को बीच में डालती, पर वह जानती थी, सिवा लोगों की झूठी सहानुभूति के उस के हाथ कुछ नहीं लगेगा.

समझदार होने पर कल्पना ने एक दिन कहा था, ‘मां, आप ने गलती की, इस तरह अपने अधिकार को चुपचाप छोड़ देना कहां की बुद्धिमत्ता है?’

‘बेटी, अधिकार देने वाला कौन होता है?’ उस ने पूछा था, ‘पति ही न, पुरुष ही न? जब वही अधिकार देने से मुकर जाए, तब कैसा अधिकार?’

पद्मा ने बहुत मुश्किल से कल्पना को पढ़ायालिखाया. मैडिकल की तैयारी के लिए लखनऊ में महंगी कोचिंग जौइन कराई. जब वह चुन ली गई और लखनऊ के ही मैडिकल कालेज में प्रवेश मिल गया तो पद्मा बहुत खुश हुई. उस का मन हुआ, उन्नाव जा कर प्रभाकर को यह सब बताए, मधु को जलाए, क्योंकि उस के बच्चे तो अभी तक किसी लायक नहीं हुए थे. वह प्रभाकर से कहना चाहती थी कि वह हारी नहीं. उन्नाव जाने की तैयारी भी की, पर कल्पना ने मना कर दिया, ‘इस से क्या लाभ होगा, मां? जब अब तक आप ने संतोष किया, तो अब तो मैं जल्दी ही बहुतकुछ करने लायक हो जाऊंगी. जाने दीजिए, हम ऐसे ही ठीक हैं.’

पद्मा अकेली हजरतगंज के फुटपाथ पर सोचती चली जा रही थी. जया वहीं से डौलीगंज के लिए तिपहिए पर बैठ कर चली गई थी. उसे मुख्य डाकघर से तिपहिया पकड़ना था.

जया और वह एक ही स्कूल में पढ़ाती थीं. पद्मा अकेली फिल्म देखने नहीं जाना चाहती थी. लड़की की जिद बताई तो जया हंस दी, ‘चलो, मैं चलती हूं तुम्हारे साथ. अपने जमाने की प्रसिद्ध फिल्म है.’

पति के छिनते ही पद्मा की जैसे दुनिया ही छिन गई थी. कछुए की तरह अपने भीतर सिमट कर रह गई थी, अपने घर में, अपने कमरे में.

कल्पना अकसर कहा करती, ‘मां, आप का जी नहीं घबराता इस तरह गुमसुम रहतेरहते?’

वह हंसने का निष्फल प्रयास करती, ‘कहां हूं गुमसुम, खुश तो हूं.’ पर कहां थी, वह खुश? खाली हाथ, रीता जीवन, एक सतत प्यास लिए सूखा रेगिस्तान मन, उड़ती हुई रेत और सुनसान दिशाएं. औरत, पुरुष के बिना अधूरी क्यों रह जाती है?

अपने जीवन से हट कर पद्मा देखी हुई फिल्म के बारे में सोचने लगी…उसे लगा, वह खुद देवदास के किरदार में है, ‘अब तो सिर्फ यही अच्छा लगता है कि कुछ भी अच्छा न लगे,’ ‘यह प्यास बुझती क्यों नहीं’, ‘क्यों पारो की याद सताती है?’, ‘कौन कमबख्त पीता है होश में रहने के लिए? मैं तो पीता हूं जीने के लिए कि कुछ सांसें ले सकूं’, ‘मैं नहीं कर सकता. क्या सभी लोग सभीकुछ करते हैं?’ फिल्म के ऐसे कितने ही वाक्य थे, जो उस के दिलोदिमाग में ज्यों के त्यों खुद से गए थे. क्या हर दुख झेलने वाला व्यक्ति देवदास है? क्या देवदास आज की भी कड़वी सचाई नहीं है?

‘चंद्रमुखी, तुम्हारा यह बाहर का कमरा तो बिलकुल बदल गया.’

क्या जवाब दिया चंद्रमुखी ने, ‘बाहर का ही नहीं, अंदर का भी सब बदल गया है.’

क्या सचमुच वह भी बाहरभीतर से बदल नहीं गई पूरी तरह? चंद्रमुखी ने वेश्या का पेशा छोड़ दिया है. देवदास कहता है, ‘छोड़ तो दिया है, पर औरतों का मन बहुत कमजोर होता है, चंद्रमुखी.’

पद्मा सोचती है, ‘क्या सचमुच औरतों का मन बहुत कमजोर होता है? क्या आदमी का मोह, आदमी की चाह, उसे कभी भी डिगा सकती है? वह कभी भी उस के मोहपाश में बंध कर अपना आगापीछा भुला सकती है?’

अचानक पद्मा हड़बड़ा गई क्योंकि आगे चलता एक व्यक्ति अचानक चकरा कर उस के पास ही फुटपाथ पर गिर पड़ा था. वह कुछ समझ नहीं पाई. बगल के पान वाले की दुकान से पद्मा ने पानी लिया और उस के चेहरे पर छींटे मारे. लोगों की भीड़ जुट गई, ‘कौन है? कहां का है? क्या हुआ?’ जैसे तमाम सवाल थे, जिन के उत्तर उस के पास नहीं थे.

लोगों की सहायता से पद्मा ने उस व्यक्ति को एक तिपहिए पर लदवाया, खुद साथ बैठी और मैडिकल कालेज के आपात विभाग पहुंची.

पद्मा ने तिपहिया चालक की सहायता से उस व्यक्ति को उतारा और आपात विभाग में ले जा कर एक बिस्तर पर लिटा दिया. कल्पना को तलाश करवाया तो वह दौड़ी आई, ‘‘क्या हुआ, मां, कौन है यह?’’

पद्मा क्या जवाब देती, हौले से सारी घटना बता दी.

‘‘तुम भी गजब करती हो, मां. ऐसे ही कोई आदमी गिर पड़ा और तुम ले कर यहां चली आईं. मरने देतीं वहीं.’’

उस ने बेटी को अजीब सी नजरों से देखा कि यह क्या कह रही है? मरने देती? सहायता न करती? यह भी कोई बात हुई? अनजान आदमी है तो क्या हुआ, है तो आदमी ही.

‘‘दूसरे लोग उठाते और किसी अस्पताल ले जाते. या फिर पुलिस उठाती. आप क्यों लफड़े में पड़ीं, मरमरा गया तो जवाब कौन देगा?’’ भुनभुनाती कल्पना डाक्टरों के पास दौड़ी.

डाक्टरों ने कल्पना के कारण उस की अच्छी देखभाल की. 2 घंटे बाद उसे होश आया. दाएं हिस्से में जुंबिश खत्म हो गई थी, लकवे का असर था.

जब उसे ठीक से होश आ गया तो पद्मा को खुशी हुई, एक अच्छा काम करने का आत्मसंतोष. उस ने उस व्यक्ति से पूछा, ‘‘आप कहां रहते हैं?’’

‘‘कहीं नहीं और शायद सब कहीं,’’ वह अजीब तरह से मुसकराया.

‘‘हम लोग आप के घर वालों को खबर करना चाहते थे, पर आप की जेब से कोई अतापता नहीं मिला. सिर्फ रुपए थे पर्स में, ये रहे, गिन लीजिए,’’ पद्मा ने पर्स उस की तरफ बढ़ाया.

कल्पना भी निकट आ कर बैठ गई थी.

‘‘मैडम, जो लोग सड़क पर गिरे आदमी को अस्पताल पहुंचाते हैं, वे उस का पर्स नहीं मारते,’’ वह उसी तरह मुसकराता रहा, ‘‘समझ नहीं पा रहा, आप को धन्यवाद दूं या खुद को कोसूं.’’

‘‘क्यों भला?’’ कल्पना ने पूछा, ‘‘आप के बीवीबच्चे आप की कुशलता सुन कर कितने प्रसन्न होंगे, यह एहसास है आप को?’’

‘‘कोई नहीं है अब हमारा,’’ वह आदमी उदास हो गया, ‘‘2 साल हुए, हत्यारों ने घर में घुस कर मेरी बेटी और पत्नी के साथ बलात्कार किया था. लड़के ने बदमाशों का मुकाबला किया तो उन लोगों ने तीनों की हत्या कर दी.’’

‘‘यह सुन कर वे दोनों सन्न रह गईं.

काफी देर तक खामोशी छाई रही, फिर पद्मा ने पूछा, ‘‘आप कहां रहते हैं?’’

‘‘कहां बताऊं? शायद कहीं नहीं. जिस घर में रहता था, वहां हर वक्त लगता है जैसे मेरी बेटी, पत्नी और

बेटा लहूलुहान लाशों के रूप में पड़े

हैं. इसलिए उस घर से हर वक्त भागा रहता हूं.’’

‘‘यहां लखनऊ में आप कैसे आए थे?’’ कल्पना ने पूछा.

‘‘इलाहाबाद में किताबों का प्रकाशक हूं. स्कूल, कालेजों की पुस्तकें प्रकाशित करता हूं-पाठ्यपुस्तकों से ले कर कहानी, उपन्यास, कविता, नाटक आदि तक,’’ वह बोला, ‘‘यहां इसी सिलसिले में आया था. हजरतगंज के एक

होटल में ठहरा हूं. एक सिनेमाहौल में पुरानी फिल्म ‘देवदास’ लगी है, उसे देखने गया था कि रास्ते में गश खा कर गिर पड़ा.’’

डाक्टरों से बात कर के कल्पना उस व्यक्ति को मां के साथ घर लिवा लाई, ‘‘चलिए, आप यहीं रहिए कुछ दिन,’’ उस ने कहा, ‘‘हम आप का सामान होटल से ले आते हैं. कमरे की चाबी दीजिए और होटल की कोई रसीद हो, तो वह…’’

‘‘रसीद तो कमरे में ही है, चाबी यह रही,’’ उस ने जेब से निकाल कर चाबी दी.

कल्पना ने मां को बताया, ‘‘इन्हें कोई ठंडी चीज मत देना. गरम चाय या कौफी देना.’’

फिर एक पड़ोसी को साथ ले कर कल्पना चली गई.

पद्मा कौफी बना लाई. उस व्यक्ति ने किसी तरह बैठने का प्रयास किया, ‘‘बिलकुल इतनी ही उम्र थी मेरी बेटी की,’’ उस का गला भर्रा गया, आंखों में नमी तिर आई.

‘‘भूल जाइए वह सब, जो हुआ,’’ पद्मा बोली, ‘‘आप अकेले नहीं हैं इस धरती पर जिन्हें दुख झेलना पड़ा, ऐसे तमाम लोग हैं.’’

वह कुछ बोला नहीं, भरीभरी आंखों से पद्मा की तरफ देखता रहा और कौफी के घूंट भरता रहा.

‘‘सच पूछिए तो अब जीने की इच्छा ही नहीं रह गई,’’ वह बोला, ‘‘कोई मतलब नहीं रह गया जीने का. बिना मकसद जिंदगी जीना शायद सब से मुश्किल काम है.’’

‘‘शायद आप ठीक कहते हैं,’’ पद्मा के मुंह से निकल गया, ‘‘मैं ने भी ऐसा ही कुछ अनुभव किया जब कल्पना के पिता ने अचानक एक दिन मुझे छोड़ दिया.’’

‘‘आप जैसी नेक औरत को भी कोई आदमी छोड़ सकता है क्या?’’ उसे विश्वास नहीं हुआ.

‘‘मधु नामक एक लड़की पड़ोस में रहती थी. हमारे घर आतीजाती थी. वे उसी के मोह में फंस गए. कल्पना तब छोटी थी. वे चले गए मुझे छोड़ कर,’’ पता नहीं वह यह सब उस से क्यों कह बैठी.

3-4 दिनों में वह व्यक्ति चलनेफिरने लगा था.

एक सुबह पद्मा ने पूछा, ‘‘अभी तक आप ने अपना नाम नहीं बताया?’’

जवाब कल्पना ने दिया, ‘‘कमलकांत,’’ और होटल की रसीद मां की तरफ बढ़ाई, ‘‘रसीद पर इन का यही नाम लिखा है,’’ वह मुसकरा रही थी.

थोड़ी देर बाद जब वह सूटकेस में अपने कपड़े रखने लगा तो पद्मा ने पूछा, ‘‘कहां जाएंगे अब?’’

‘‘क्या बताऊं?’’ कमलकांत बोला, ‘‘इलाहाबाद ही जाऊंगा. वहां मेरा कुछ काम तो है ही, लोग परेशान हो रहे होंगे.’’

कल्पना ने उस के हाथ से सूटकेस ले लिया, ‘‘आप अभी कहीं नहीं जाएंगे. इतने ठीक नहीं हुए हैं कि कहीं भी जा सकें. दोबारा अटैक हो गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे. यहीं रहिए कुछ दिन और, अपने दफ्तर में फोन कर दीजिए.’’

पद्मा कुछ बोली नहीं. कहना तो वह भी यही सब चाहती थी, पर अच्छा लगा, बेटी ने ही कह दिया. शायद वह समझ गई, पर क्या समझ गई होगी? देर तक चुप बैठी पद्मा सोचती रही. कहां पढ़ा था उस ने यह वाक्य- ‘प्यार जानने, समझने की चीज नहीं होती, उसे तो सिर्फ महसूस किया जाता है.’

‘क्या कमलकांत उसे अच्छे लगने लगे हैं?’ पद्मा ने अपनेआप से पूछा. एक क्षण को वह सकुचाई. फिर झेंप सी महसूस की, ‘नहीं, अब इस उम्र में फिर से कोई नई शुरुआत करना बहुत मुश्किल है. न मन में उत्साह रहा, न इच्छा. प्रभाकर के साथ जुड़ कर देख लिया. क्या मिला उसे? क्या दोबारा वही सब दोहराए? आदमी का क्या भरोसा? क्यों सोच रही है वह यह सब इस आदमी को ले कर? क्या लगता है यह उस का? कोई भी तो नहीं…क्या सचमुच कोई भी नहीं?’ अचानक उस के भीतर से किसी ने पूछा. और वह अपनेआप को भी कोई सचसच जवाब नहीं दे पाई थी. व्यक्ति दूसरे से झूठ बोल सकता है, अपनेआप से कैसे झूठ बोले?

कल्पना कालेज जाती हुई बोली, ‘‘मां, आप अभी एक सप्ताह की और छुट्टी ले लीजिए, इन की देखरेख कीजिए.’’

पद्मा बुत बनी बैठी रही, न हां बोली, न इनकार किया.

उस के जाने के बाद पद्मा ने छुट्टी की अर्जी लिखी और पड़ोस के लड़के को किसी तरह स्कूल जाने को राजी किया. उस के हाथों अर्जी भिजवाई.

शाम को जया आई, ‘‘क्या हुआ, पद्मा?’’ एक अजनबी को घर में देख कर वह भी चकराई.

जवाब देने में वह लड़खड़ा गई, ‘‘क्या बताऊं?’’

जया उसे एकांत में ले गई, ‘‘ये महाशय?’’

सवाल सुन कर पद्मा का चेहरा अपनेआप ही लाल पड़ गया, पलकें झुक गईं.

जया मुसकरा दी, ‘‘तो यह बात है… कल्पना के नए पिता?’’

पद्मा अचकचा गई, ‘‘नहीं रे, पर… शायद…’’

बाद में देर तक पद्मा और जया बातें करती रहीं. अंत में जया ने पूछा, ‘‘कल्पना मान जाएगी?’’

‘‘कह नहीं सकती. मेरी हिम्मत नहीं है, जवान बेटी से यह सब कहने की. अगर तू मदद कर सके तो बता.’’

‘‘कल्पना से कल बात करूंगी,’’ जया बोली, ‘‘और प्रभाकर ने टांग अड़ाई तो…?’’

‘‘इतने सालों से उन्होंने हमारी खबर नहीं ली. मैं नहीं समझती उन्हें कोई एतराज होगा.’’

‘‘सवाल एतराज का नहीं, कानून का है. आदमी अपना अधिकार कभी भी जता सकता है. तुम स्कूल में अध्यापिका हो, बदनामी होगी.’’

‘‘तब से यही सब सोच रही हूं,’’ पद्मा बोली, ‘‘इसीलिए डरती भी हूं. कुछ तय नहीं कर पा रही कि कदम सही होगा या गलत. एक मन कहता है, कदम उठा लूं, जो होगा, देखा जाएगा. दूसरा मन कहता है, मत उठा. लोग क्या कहेंगे. दुनिया क्या कहेगी. समाज में क्या मुंह दिखाऊंगी. यह उम्र बेटी के ब्याह की है और मैं खुद…’’ पद्मा संकोच में चुप रह गई.

‘‘ठीक है, पहले कल्पना का मन जानने दे, तब तुम से बात करती हूं और कमलकांत से भी कहती हूं,’’ जया चली गई.

पद्मा पास की दुकान से घर की जरूरत की चीजें ले कर आई तो देखा, कमलकांत के पास कल्पना बैठी गपशप कर रही है और दोनों बेहद खुश हैं.

‘‘मां, जया मौसी रास्ते में मिली थीं.’’

सुन कर पद्मा घबरा गई. हड़बड़ाई हुई सामान के साथ सीधे घर में भीतर चली गई कि बेटी का सामना कैसे करे?

अचानक कल्पना पीछे से आ कर उस से लिपट गई, ‘‘मां, आप से कितनी बार कहा है, हर वक्त यों मन को कसेकसे मत रहा करिए. कभीकभी मन को ढीला भी छोड़ा जाता है पतंग की डोर की तरह, जिस से पतंग आकाश में और ऊंची उठती जाए.’’

वह कुछ बोली नहीं. सिर झुकाए चुप बैठी रही. कल्पना हंसी, ‘‘मैं बहुत खुश हूं. अच्छा लग रहा है कि आप अपने खोल से बाहर आएंगी, जीवन को फिर से जिएंगी, एक रिश्ते के खत्म हो जाने से जिंदगी खत्म नहीं हो जाती…

‘‘मुझे ये दूसरे पिता बहुत पसंद हैं. सचमुच बहुत भले और सज्जन व्यक्ति हैं. हादसे के शिकार हैं, इसलिए थोड़े अस्तव्यस्त हैं. मुझे विश्वास है, हमारा प्यार मिलेगा तो ये भी फिर से खिल उठेंगे.’’

पता नहीं पद्मा को क्या हुआ, उस ने बेटी को बांहों में भर कर कई बार चूम लिया. उस की आंखों से अश्रुधारा बह रही थी और कल्पना मां का यह नया रूप देख कर चकित थी.

फिर वसंत लौट आया: भाग 1- जब टूटा मेघा का भ्रम

‘‘बेटी मेघा, अजय साहब के लिए चाय ले आओ,’’ रंजीत बाबू ने बैरेक से ही आवाज लगाई.

मेघा किचन से ही आवाज देती हुई बोली, ‘‘हां पापा बस 2 मिनट में लाती हूं.’’

वह थोड़ी ही देर में चाय ले आई. मेघा देखने में बहुत खूबसूरत थी. बैरेक में घुसते ही सब से पहले उस ने अजय साहब को नमस्ते की और फिर चाय के कप मेज पर सजा कर वापस नमकीन लाने किचन में चली गई.

अब बातों का सिलसिला चल पड़ा. अजय साहब अफसोस जताते हुए बोले, ‘‘इतनी सीधीसादी लड़की के साथ ये लोग ऐसा व्यवहार कर रहे हैं. अरे, कम से कम सासससुर को तो बीच में कुछ कहना ही चाहिए था…’’

तभी बीच में रंजीत बाबू ने अजय साहब को टोका, ‘‘अरे, छोडि़ए भी अजय साहब अगर मेघा ने मना न किया होता तो मैं मनोज को छोड़ने वाला नहीं था. मैं अपनी बेटी का मुंह देख कर ही रह गया. मेघा कह रही थी कि जब मनोज ही मेरे साथ नहीं रहना चाहता, तो मैं क्यों जबरदस्ती उन के साथ रहूं. और सासससुर क्या करेंगे? जब मेरा दामाद मनोज ही नालायक निकल गया. हमारे समधि और समधन तो ऐसे सरल हैं कि पूछिए मत. आज भी हमारे संबंध उतने ही प्रगाढ़ हैं जितने पहले हुआ करते थे,’’ रंजीत बाबू मेघा के दिन ही खराब बता कर संतोष कर रहे थे.

‘‘सुबहसुबह मेघा को बहुत आपाधापी रहती है. सुबह सब से पहले नाश्ता तैयार करो. फिर खुद तैयार हो कर पापा का नाश्ता टेबल पर लगाओ. उस के बाद खुद नाश्ता कर के अपना टिफिन पैक करो. उस के बाद बच्चों का टिफिन पैक करो. यह मेघा की पिछले 4-5 सालों से एकजैसी दिनचर्या हो गई है.

चाय और नमकीन दे कर मेघा बाथरूम में गई और जल्दीजल्दी नहा कर औफिस के लिए तैयार हुई. फिर जल्दबाजी में जैसेतैसे नाश्ता किया और अपने पिता रंजीत बाबू से मुखातिब हुई, ‘‘पापा, टेबल पर नाश्ता लगा दिया है… आप नाश्ता कर लीजिएगा वरना ठंडा हो जाएगा.

अब मैं चलती हूं, औफिस के लिए लेट हो रही हूं,’’ मेघा अपने कमरे का दरवाजा बंद करते

हुए बोली.

‘‘ठीक है बेटा,’’ रंजीत बाबू बोले, ‘‘तुम ने अपना टिफिन और छाता ले लिया है न… बाहर बहुत धूप है. छाता ले कर ही निकलना,’’ रंजीत बाबू अखबार साइड में रखते हुए बोले.

‘‘अरे पापा मैं तो छाता भूल ही गई थी. आप ने अच्छा याद दिलाया,’’ कह कर  टेबल के नीचे से छाता निकालने लगी.

मेघा बस लेने के लिए बसस्टौप पर आ कर खड़ी हो गई.

‘‘तुम मु?ो बेवकूफ सम?ाते हो क्या मनोज?’’ मेघा को जब मनोज की दूसरी शादी के बारे में पता चला तो जैसे वह चीख पड़ी थी.

‘‘ऐसा मैं ने कब कहा,’’ मनोज संयत स्वर में बोला.

‘‘ऐसा नहीं है तो फिर कैसा है? एक म्यान में 2 तलवारें नहीं रह सकतीं. यह तो तुम्हें पता ही है ठीक वैसे ही मेरे रहते तुम रोजी के साथ नहीं रह सकते,’’ मेघा सम?ाता करने के लिए तैयार नहीं थी.

‘‘तुम और रोजी दोनों मेरे साथ रहेंगे. मैं तुम्हें अपने घर से भगा थोड़े ही रहा हूं,’’ मनोज सफाई देता हुआ बोला.

‘‘मैं आज की लड़की हूं और स्वाभिमानी भी हूं. मैं अपनी सौत के साथ जिंदगी नहीं बिता सकती. तुम्हें मेरे और रोजी में से किसी एक को चुनना होगा,’’ मेघा अपने आदर्शों से तिल मात्र भी सम?ाता नहीं करना चाहती थी.

मनोज भी सपाट स्वर में बोला, ‘‘तुम्हें

जो अच्छा लगता है करो, लेकिन रोजी मेरे साथ ही रहेगी.’’

‘‘तो मैं किस हैसियत से तुम्हारे घर में रहूं? एक बीवी की हैसियत से या एक रखैल की हैसियत से?’’ मेघा बोली.

‘‘तुम ऐसा क्यों कह रही हो? सारे समाज के सामने हमारी शादी हुई है, फिर तुम मेरी

रखैल कैसे हो गई? तुम्हें इस घर में पहले की तरह ही मानसम्मान मिलेगा,’’ मनोज सफाई देता हुआ बोला.

‘‘मानसम्मान की बात तुम न ही करो तो ज्यादा अच्छा है. तुम पूरीपूरी रात उस रोजी के कमरे में बिताते हो और उस का बिस्तर गरम करते हो. मेरे कमरे में ?ांकने तक नहीं आते और ऊपर से मानसम्मान की बात करते हो. मैं कल पूरी रात बिस्तर पर सिरदर्द और बुखार से तड़पती रही, लेकिन तुम मु?ो देखने तक नहीं आए. क्या यही मानसम्मान तुम मु?ो दे रहे हो? पतिपत्नी का रिश्ता केवल सुख का नहीं होता, बल्कि दुख का भी होता है और समाज. किस समाज की तुम बात करते हो? तुम अगर समाज की जरा भी परवाह करते तो ऐसी गंदी हरकत कभी न करते. छि: एक बीवी के रहते तुम ने दूसरी शादी कर ली.

‘‘तुम ने कभी यह भी न सोचा कि हमारे बच्चे क्या सोचेंगे? उन के संस्कारों पर क्या असर होगा? वे तुम्हारे बारे में क्या सोचेंगे?’’ मेघा आज फैसले के मूड में थी. वह मनोज से यही चाहती थी कि वह आज मेघा या रोजी में से किसी एक को चुनें ताकि मेघा को अपनी जिंदगी की राह चुनने में आसानी हो.

मेघा ने इस दुनिया में बहुत कष्ट सहा था. बचपन में मां गुजर गई. बचपन मां के बिना बिता. पिता ने किसी तरह पालपोस कर उसे बड़ा किया.

‘‘मैं ने कोई ऐसा काम नहीं किया है, जिस से मुझे समाज के सामने शर्मिंदा होना पडे़. बड़ेबड़े राजामहाराजाओं और मुगल बादशाहों की हजारों पटरानियां हुआ करती थीं. उन्होंने कभी इस का विरोध नहीं किया, लेकिन पता नहीं तुम्हें क्यों ऐतराज है मेरे और रोजी के साथ रहने पर?’’ मनोज ने अपने कुतर्क को ढकने के लिए अपना तर्क दिया.

‘‘अपनी नाकामियों और घृणित कारगुजारियों को छिपाने के लिए कम से कम ऐसे कुतर्क तो मत ही गढ़ो मनोज. अगर मैं तुम्हारे तर्क के हिसाब से चलूं तो पुराने मातृसत्तात्मक समाज में स्त्रियां बहू विवाह करती थीं,

‘‘तो क्या मैं भी 10 शादियां कर लूं? नहीं ऐसा आधुनिक समय में नहीं हो सकता. जब मैं ऐसा नहीं कर सकती तो तुम पुराने समय के राजामहाराजाओं और मुगल बादशाहों का उदाहरण क्यों दे रहे हो? आज के समय में हमारा संविधान हमें पहली पत्नी के मर जाने, पत्नी के दुराचारी होने पर ही तलाक के बाद दूसरी शादी की इजाजत देता है और जब तक तलाक न हो जाए तब तक दूसरी शादी अवैध मानी जाती है.’’

‘‘तो क्या तुम मु?ा से तलाक लोगी?’’ मनोज ने खिड़की को घूरते हुए पूछा.

‘‘हां, बिना तलाक के हम दोनों अपनी आने वाली जिंदगी का फैसला नहीं कर सकते. बेहतर होगा हमारा तलाक हो जाए ताकि तुम भी रोजी के साथ अपनी मरजी से अपनी जिंदगी गुजार सको,’’ मेघा निर्णयात्मक लहजे में बोली.

मेघा ने घड़ी पर नजर डाली. उस की 9 बजे वाली आज की बस छूट गई थी. वह

अकसर लेट हो जाती है. वह भी करे तो आखिर क्या करे? बच्चों का टिफिन तैयार करे, उन को स्कूल भेजे, दफ्तर संभाले, घर संभाले. एक अकेली जान आखिर क्याक्या करे? आज से पहले वह कभी इतनी लेट नहीं हुई. आज जरूर बौस से डांट पड़ेगी.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें