कहीं मेला कहीं अकेला- संयुक्त परिवार में शादी से क्यों डरती थी तनु?

‘‘यह रिश्ता मुझे हर तरह से ठीक लग रहा है. बस अब तनु आ जाए तो इसे ही फाइनल करेंगे,’’ गिरीश ने अपनी पत्नी सुधा से कहा.

‘‘पहले तनु हां तो करे, परेशान कर रखा है उस ने, अच्छेभले रिश्ते में कमी निकाल देती है…संयुक्त परिवार सुन कर ही भड़क जाती है. अब की बार मैं उस की बिलकुल नहीं सुनूंगी और फिर यह रिश्ता उस की शर्तों पर खरा ही तो उतर रहा है. पता नहीं अचानक क्या जिद चढ़ी है कि बड़े परिवार में विवाह नहीं करेगी, क्या हो गया है इन लड़कियों को,’’ सुधा ने कहा.

‘‘तुम्हें तो पता ही है न, यह सब उस की बैस्ट फ्रैंड रिया का कियाधरा है… ऐसी कहां थी हमारी बेटी पर आजकल के बच्चों पर तो दोस्तों का प्रभाव इतना ज्यादा रहता है कि पूछो मत,’’ गिरीशजी बोले.

दोनों पतिपत्नी चिंतित और गंभीर मुद्रा में बातें कर ही रहे थे कि तनु औफिस से

आ गई. मातापिता का गंभीर चेहरा देख चौंकी, फिर हंसते हुए बोली, ‘‘फिर कोई रिश्ता आ गया क्या?’’

उस के कहने के ढंग पर दोनों को हंसी आ गई. पल भर में माहौल हलकाफुलका हो गया. तीनों ने साथ बैठ कर चाय पी. फिर गिरीश का इशारा पा कर सुधा ने कहा, ‘‘इस रिश्ते में कोई कमी नहीं लग रही है, यहीं लखनऊ में ही लड़के के मातापिता अपने बड़े बेटेबहू के साथ रहते हैं. छोटा बेटा मुंबई में ही कार्यरत है, वह दवा की कंपनी में प्रोडक्ट मैनेजर है.’’

तनु पल भर सोच कर मुसकराती हुई बोली, ‘‘अच्छा, वहां अकेला रहता है?’’

‘‘हां.’’

‘‘फिर यह तो ठीक है. बस, उस के मातापिता बारबार मुंबई न पहुंच जाएं.’’

‘‘क्या बकवास करती हो तनु,’’ सुधा को गुस्सा आ गया, ‘‘उन का बेटा है, क्या वे वहां नहीं जा सकते? कैसी हो गई हो तुम? ये सब क्या सीख लिया है? हम आज भी तरसते हैं कोई बड़ा हमारे सिर पर होता तो कितना अच्छा होता पर सब का साथ सालों पहले छूट गया और एक तुम हो… क्या ससुराल में बस पति से मतलब होता है? बाकी रिश्ते भी होते हैं, उन की भी एक मिठास होती है.’’

‘‘नहीं मां, मुझे घबराहट होती है, रिया बता रही थी…’’

सुधा गुस्से में  खड़ी हो गईं, ‘‘मुझे उस लड़की की कोई बात नहीं सुननी… उस लड़की ने हमारी अच्छीभली बेटी का दिमाग खराब कर दिया है…हमारे परिवार में हम 3 ही हैं. थोड़े दिन पहले तुम जौइंट फैमिली में हर रिश्ते का आनंद उठाना चाहती थी पर इस रिया ने अपनी नैगेटिव बातों से तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया है.’’

तनु को भी गुस्सा आ गया. वह भी पैर पटकती हुई अपने रूम में चली गई.

गिरीश और सुधा सिर पकड़े बैठे रह गए.

तनु की बैस्ट फ्रैंड रिया का विवाह 6 महीने पहले ही दिल्ली में हुआ था. उस की ससुराल में सासससुर और पति अनुज थे, समृद्ध परिवार था. रिया भी अच्छी जौब में थी. तनु से ही रिया के हालचाल मिलते रहते थे. दिन भर दोनों व्हाट्सऐप पर चैट करती थीं. अकसर छुट्टी वाले दिन दोनों की बातें सुधा के कानों में पड़ती थीं तो वे मन ही मन बेचैन हो उठती थीं. उन्होंने अंदाजा लगा लिया था कि रिया सासससुर की, यहां तक कि अनुज की भी कमियां निकाल कर तनु को किस्से सुनाती रहती है. वह तनु की बैस्ट फ्रैंड थी,  जिस के खिलाफ एक शब्द भी सुनना तनु को मंजूर नहीं था. तनु को हर बात सुधा से भी शेयर करने की आदत थी इसलिए वह कई बातें उन्हें खुद ही बताती रहती थी.

कभी तनु कहती, ‘‘आज रिया का मूड खराब है मम्मी, उसे अनुज ने मौर्निंग वाक के लिए उठा दिया, उसे सोना था, बेचारी अपनी मरजी से सो भी नहीं सकती.’’

एक दिन तनु ने बताया, ‘‘रिया की सास हैल्थ पर बहुत ध्यान देती हैं… उसे वही बोरिंग टिफिन खाना पड़ता है.’’

सुधा ने पूछा, ‘‘उस की सास ही टिफिन बनाती हैं?’’

‘‘हां, रिया औफिस जाती है तो वे ही घर का सारा काम देखती हैं. उन के यहां कुक है पर उस की सास अपनी निगरानी में ही सब खाना तैयार करवाती हैं.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है. रिया को खुश होना चाहिए, इस में शिकायत की क्या बात है?’’

क्या खुश होगी बेचारी, उसे वह टिफिन अच्छा नहीं लगता. वह किसी और को खिला देती है. अपने लिए कुछ मनचाहा और्डर करती है बेचारी.

‘‘इस में बेचारी की क्या बात है? उस की सास हैल्दी खाना बनवा कर क्या गलत कर रही है?’’

तनु को गुस्सा आ गया, ‘‘आप उस की परेशानी क्यों नहीं समझतीं?’’

‘‘यह कोई परेशानी नहीं है. बेकार के किस्से सुना कर तुम्हारा टाइम और दिमाग दोनों खराब करती है वह लड़की.’’

2 दिन तो तनु चुप रही, फिर आदतन तीसरे दिन ही शुरू हो गई, ‘‘रिया के सारे रिश्तेदार दिल्ली में ही रहते हैं. कभी किसी के यहां कोई फंक्शन होता है, तो कभी किसी के यहां. पता नहीं  कितने तो रिश्ते के देवर, ननदें हैं, जो छुट्टी वाले दिन टाइमपास के प्रोग्राम बनाते रहते हैं. रिया थक जाती है बेचारी.’’

सुधा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. रिया की बातें सुनसुन कर थक गई थीं. तनु की सोच बिलकुल बदल गई थी. अच्छीखासी स्नेहमयी मानसिकता की जगह नकारात्मकता ने ले ली थी.

कुछ दिन बाद तनु के उसी रिश्ते की बात को आगे बढ़ाया गया. तनु और रजत मिले. दोनों ने एकदूसरे को पसंद किया. सब कुछ सहर्ष तय कर दिया गया. रजत मुंबई में अकेला रह रहा था, इसलिए उस के मातापिता गौतम और राधा को उस के विवाह की जल्दी थी. विवाह अच्छी तरह से संपन्न हो गया था.

रिया भी अनुज के साथ आई थी. वह तनु से कह रही थी, ‘‘तुम्हारी तो मौज हो गई तनु. सब से दूर अकेले पति के साथ रहोगी. काश, मुझे भी यही लाइफ मिलती पर वहां तो मेला ही लगा रहता है.’’

इस बात को सुन कर सुधा को गुस्सा आया था. सब रस्में संपन्न होने के बाद 1 हफ्ते बाद तनु और रजत मुंबई जाने की तैयारी कर रहे थे. तनु के औफिस की ब्रांच मुंबई में भी थी. उस की योग्यता को देखते हुए उस का ट्रांसफर मुंबई ब्रांच में कर दिया गया. रजत के भाई विजय, भाभी रेखा और 3 साल का भतीजा यश और स्नेह लुटाते सासससुर सब के साथ तनु का समय बहुत अच्छा बीता था.

बीचबीच में  रिया भी निर्देश देती रहती थी, ‘‘मुंबई आने के लिए कहने की फौर्मैलिटी में मत पड़ना, नहीं तो वहां सब डट जाएंगे आ कर.’’ भरपूर स्नेह और आशीर्वाद के साथ दोनों परिवार उन्हें एअरपोर्ट तक छोड़ने आए.

तनु ने मुंबई पहुंच कर रजत के साथ नया जीवन शुरू किया. रजत के साथ ने उस का जीवन खुशियों से भर दिया. दोनों सुबह निकलते रात को आते. वीकैंड में ही दोनों को थोड़ी राहत रहती. सुबह लताबाई आ कर घर का सारा काम कर जाती. तनु फटाफट किचन का काम देखते हुए तैयार होती. 2 जनों का काम ज्यादा नहीं था पर रात को लौट कर किचन में घुसना अखर जाता.

रजत ने कई बार कहा भी था, ‘‘डिनर के लिए भी किसी बाई को रख लेते हैं.’’

‘‘पर हमारा कोई आने का टाइम तय नहीं है न और फिर घर की चाबी देना भी सेफ नहीं रहेगा.’’

‘‘चलो, ठीक है, मिल कर कुछ कर लिया करेंगे.’’ तनु की रिया से अब भी लगातार चैट चलती रहती थी. रिया उस के आजाद जीवन पर आंहें भरती थी. 5 महीने बीत रहे थे. रजत को 1 हफ्ते की ट्रैनिंग के लिए सिंगापुर भेजा जा रहा था. उस ने कहा, ‘‘अकेली कैसे रहोगी? लखनऊ से मातापिताजी को बुला लेते हैं…वैसे भी अभी तक घर से कोई नहीं आया.’’

‘‘नहीं, अकेली कहां, रिया का बहुत मन कर रहा है आने का, वह आ जाएगी… मातापिताजी को तुम्हारे लौटने के बाद बुला लेंगे,’’ तनु ने अपनी तरफ से बात टालने की कोशिश की तो रजत मान गया.

तनु ने मौका मिलते ही रिया को फोन किया, ‘‘अपना प्रोग्राम पक्का रखना, कोई बहाना नहीं.’’

‘‘अरे, पक्का है. मैं पहुंच जाऊंगी. मुझे भी इस भीड़ से छुट्टी मिलेगी. तेरे पास शांति से रहूंगी 1 हफ्ता.’’

जिस दिन रजत गया, उसी दिन शाम तक रिया भी मुंबई पहुंच गई. दोनों सहेलियां गले मिलते हुए चहक उठी थीं. बातें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं. देर रात तक रिया के किस्से चलते रहे. सासससुर की बातें, देवरननदों में हंसीमजाक के किस्से, रिश्तेदारों के फंक्शनों के किस्से.

अगले दिन तनु ने छुट्टी ले ली थी. दोनों खूब घूमीं, मूवी देखी, शौपिंग की, रात को ही घर वापस आईं.

रिया ने कहा, ‘‘हाय, ऐसा लग रहा है दूसरी दुनिया में आ गई हूं. तेरे घर में कितनी शांति है तनु, दिल खुश हो गया यहां आ कर.’’

तनु मुसकरा दी, ‘‘अब थक गई हैं, सोती हैं. कल औफिस जाऊंगी, शाम को जल्दी आ जाऊंगी. सुबह मेड आ कर सब काम कर देगी, अपने टिफिन के साथ तेरा खाना भी बना कर रख दूंगी, आराम से उठना कल.’’

अगले दिन सब काम कर के तनु औफिस चली गई. बारह बजे रिया का फोन आया, ‘‘तनु, क्या बताऊं, मजा आ गया अभी सो कर उठी हूं, कितनी शांति है तेरे घर में, कोई आवाज नहीं, कोई शोर नहीं.’’

थोड़ी देर बातें कर रिया ने फोन काट दिया. तनु सुधा को भी रिया के आने का प्रोगाम बता चुकी थी. सुधा ने कहा था, ‘‘कितने अच्छे लोग हैं, बहू को आराम से 1 हफ्ते के लिए फ्रैंड से मिलने भेज रखा है, फिर भी रिया कद्र नहीं करती उन का.’’

रिया ने आराम से फ्रैश हो कर खाना खाया, टीवी देखा, फिर सो गई. शाम को तनु आई तो दोनों ने चाय पीते हुए ढेरों बातें कीं. रिया की बातें खत्म ही नहीं हो रही थीं.

अचानक रिया ने कहा, ‘‘तू भी तो बता कुछ…कुछ किस्से सुना.’’

‘‘बस, किस की बात बताऊं, हम दोनों ही तो हैं यहां, सुबह जा कर रात को आते हैं, पूरा हफ्ता ऐसे ही भागतेदौड़ते बीत जाता है, वीकैंड पर ही आराम मिलता है. घर में तो कोई बात करने के लिए भी नहीं होता.’’

‘‘हां कितनी शांति है यहां. वहां तो घर में घुसते ही सासूमां चाय, नाश्ता, खाने की पूछताछ करने लगी हैं. मैं तो थक गई हूं वहां. आए दिन कुछ न कुछ चलता रहता है.’’

तनु आज अपने ही मनोभावों पर चौंकी. उस ने दिल में एक उदासी सी महसूस की. उस ने रिया की बातें सुनते हुए डिनर तैयार किया, बीचबीच में रिया के पति और उस के सासससुर फोन पर बातें करते रहे थे.

दोनों जब सोने लेटीं तो दोनों के मन में अलगअलग तरह के भाव उत्पन्न हो रहे थे. रिया सोच रही थी वाह, क्या बढि़या लाइफ जी रही है तनु. घर में कितनी शांति है, न कोई शोरआवाज, न किसी की दखलंदाजी कि क्या खाना है, कहां जाना है, अपनी मरजी से कुछ भी करो. वाह, क्या लाइफ है. उधर तनु सोच रही थी रिया इतने दिनों से ससुराल का रोना रो रही है कि काश, वह अकेली रह पाती पर मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा कि अकेले रहने में क्या सुख है? यहां तो हम दोनों के अलावा सुबह बस बाई दिखती है जो मशीन की तरह काम कर के चली जाती है. हमारी चिंता करने वाला तो कोई भी नहीं यहां. मायके में भी हम 3 ही थे, कितना शौक था मुझे संयुक्त परिवार की बहू बन कर हर रिश्ते का आनंद उठाने का. यहां हर वीकैंड में किसी मौल में या कोई मूवी देख कर छुट्टी बिता लेते हैं. घर आते हैं तो थके हुए. कोई भी अपना नहीं दिखता. इस अकेले संसार में ऐसा क्या सुख है, जिस के लिए रिया तरसती रहती है. ऐसे अकेलेपन का क्या फायदा जहां न देवर की हंसीठिठोली हो न ननद की छेड़खानी और न सासससुर की डांट और उन का स्नेह भरा संरक्षण.

दोनों सहेलियां एकदूसरे के जीवन के बारे में सोच रही थीं. पर तनु मन ही मन फैसला कर चुकी थी कि वह कल सुबह ही लखनऊ फोन कर ससुराल से किसी न किसी को आने के लिए जरूर कहेगी. उसे भी जीवन में हर रिश्ते की मिठास को महसूस करना है. अचानक उस की नजर रिया की नजरों से मिली तो दोनों हंस दीं.

रिया ने पूछा, ‘‘क्या सोच रही थी?’’

‘‘तुम्हारे बारे में और तुम?’’

‘‘तुम्हारे बारे में,’’ और फिर दोनों हंस पड़ीं, पर तनु की हंसी में जो रहस्यभरी खनक थी वह रिया की समझ से परे थी.

हैप्पी फैमिली: भाग 1- श्वेता अपनी मां की दूसरी शादी के लिए क्यों तैयार नहीं थी?

‘‘नहीं पापा, आप ऐसा नहीं कर सकते. आप ने मु झ से वादा किया था कि आप मेघा के पापा की तरह मु झे हर्ट करने के लिए नई मम्मी ले कर नहीं आओगे,’’ प्रज्ञा ने नाराज स्वर में कहा.

‘‘बेटा मैं मानता हूं मेघा की नई मम्मी अच्छी नहीं थी पर तेरी नई मम्मी बहुत अच्छी हैं. तु झे इतना प्यार करेंगी जितना तेरी अपनी मां भी नहीं करती होंगी,’’ प्रवीण ने बेटी को सम झाने की कोशिश की.

‘‘मैं यह बात कैसे मान लूं डैड? सारी सौतेली मांएं एक सी होती हैं.’’

‘‘चुप कर प्रज्ञा ऐसे नहीं कहते पता नहीं किस ने तेरे दिमाग में ऐसी बातें भर दी हैं,’’ प्रवीण ने  झल्लाए स्वर में कहा.

‘‘दूसरी बातें छोड़ो पापा, जरा अपनी उम्र तो देखो मेरी सहेलियां क्या कहेंगी जब उन्हें पता चलेगा कि मेरे पापा दूल्हा बन रहे हैं. कितना मजाक उड़ाएंगी वे. मेरा.’’

प्रवीण अभी अपनी बिटिया प्रज्ञा को सम झाने की कोशिश कर ही रहा था कि तब तक श्वेता भी अपनी मां पर बिफर पड़ी, ‘‘मम्मी, आप ने पापा से तलाक लिया, मु झे उन से दूर कर दिया पर मैं ने कुछ भी नहीं कहा क्योंकि मैं आप को दुखी नहीं देख सकती थी. पर आज आप ने मेरे आगे किसी अजनबी को ला कर खड़ा कर दिया और कह रही हो कि ये तुम्हारे पापा हैं. मम्मी आप की यह बात मैं नहीं मान सकती. बोल दीजिए इन से मैं इन्हें कभी भी पापा का दर्जा नहीं दे सकती,’’ कहतेकहते श्वेता रोने लगी तो अमृता ने उसे बांहों में समेट लिया.

श्वेता के आंसू पोंछते हुए अमृता ने कहा, ‘‘नहीं बेटा ऐसे नहीं रोते. ठीक है तू जैसा कहेगी मैं वैसा ही करूंगी.’’

काफी देर तक इस तरह के इमोशनल सीन चलते रहे. प्रवीण और अमृता

इस परिस्थिति के लिए तैयार नहीं थे. दोनों ने एकदूसरे को उदास नजरों से देखा और अपनीअपनी बेटी को संभालने लगे. दोनों लड़कियां इस बात पर भड़की हुई थीं कि उन के पेरैंट्स दूसरी शादी करना चाहते हैं.

38 साल की अमृता और 42 साल के प्रवीण को उन के एक कौमन फ्रैंड ने मिलवाया था. दोनों ही तलाकशुदा थे और दोनों के पास 13-14 साल की

1-1 बेटी थीं. प्रवीण की बेटी प्रज्ञा 8वीं कक्षा में पढ़ती थी जबकि अमृता की बेटी श्वेता 9वीं क्लास में पढ़ रही थी. अमृता और प्रवीण को आपस में मिले करीब 6 महीने हो गए थे. दोनों ने एकदूसरे का साथ ऐंजौय किया था. दोनों को महसूस हुआ था जैसे उन के जीवन में जो कमी है वह पूरी हो गई है. जब अपने रिश्ते को ले कर वे सीरियस हो गए तो उन्होंने तय किया कि वे एकदूसरे को अपनीअपनी बेटी से मिलवाएंगे पर उन्हें कहां पता था कि दोनों बच्चियों का रिएक्शन ऐसा होगा.

किसी तरह खाना खत्म कर दोनों अपनीअपनी बेटी को ले कर घर लौट आए. दोनों के ही चेहरे पर शिकन के भाव थे. अपने रिश्ते को ले कर उन के मन में संशय उभरने लगा था क्योंकि बेटियों की रजामंदी के बगैर उन का यह रिश्ता अधूरा ही रहने वाला था.

रात के 11 बज रहे थे. श्वेता सो चुकी थी, मगर अमृता करवटें बदल रही थी. आज उस की आंखों से नींद रूठ गई थी. उसे अपनी पिछली जिंदगी याद आ रही थी. कितनी तड़प थी उस के मन में. कितनी मजबूरी में उस ने अपने पति को छोड़ा था. यह बात बेटी को कैसे सम झाए. बेटी तो अभी भी पापा के बहुत क्लोज थी.

कुमार के साथ अमृता ने लव कम अरेंज्ड मैरिज की थी. शादी से पहले दोनों ने काफी समय तक डेटिंग करने के बाद शादी का फैसला लिया था. उसे कुमार काफी मैच्योर और सम झदार लगता था. शादी के बाद उस की जिंदगी खुशियों से भर गई थी. कुमार उसे बहुत प्यार करता था. जल्द ही अमृता की गोद में श्वेता आ गई. सब बढि़या चल रहा था. इस बीच कुमार को बिजनैस में बड़ा घाटा हुआ. उस ने स्थिति सुधारने का काफी प्रयास किया मगर सबकुछ बिगड़ता जा रहा था. कुमार काफी परेशान रहने लगा था.

एक दिन कुमार घर आया तो बहुत खुश था. अमृता को बांहों में भर कर बोला, ‘‘यार अमृता अब सबकुछ ठीक हो जाएगा… हमारे अच्छे दिन आने वाले हैं.’’

श्वेता ने कहा, ‘‘ऐसा क्या हो गया? तुम्हें ऐसी कौन सी नागमणि मिल गई?’’

‘‘नागमणि ही सम झो. मु झे मेरे दोस्त ने एक बाबा से मिलवाया है. बहुत पहुंचे हुए स्वामी हैं. बस जरा सी भस्म दे कर सारे कष्ट दूर डालते हैं. मु झे भी भस्म मिल गई है. यह देखो, इसे अपने औफिस के गमले की मिट्टी में डालना है. फिर सब ठीक हो जाएगा.’’

‘‘इतने पढ़ेलिखे हो कर तुम ऐसी बातों में विश्वास करते हो? भला भभूत गमले की मिट्टी में डालने से तुम्हारा बिजनैस कैसे सुधर जाएगा?’’ अमृता ने आश्चर्य से कहा.

‘‘देखो अमृता स्वामीजी की शक्ति पर शक करने की भूल न करना… मु झे उन से मेरे दोस्त ने मिलवाया है. बहुत सिद्ध पुरुष हैं. पता है तुम्हें मेरे दोस्त की बीवी कंसीव नहीं कर पा रही थी. बाबाजी के आशीर्वाद से उस के गर्भ में जुड़वां बच्चे आ गए. सोचो कितनी शक्ति है उन के आशीर्वाद में.’’

‘‘प्लीज कुमार ऐसी अंधविश्वास भरी बातें मेरे आगे मत करो.’’

‘‘बस एक बार तुम उन से मिल तो लो फिर देखना कैसे तुम भी उन की शिष्या बन जाओगी,’’ कुमार ने अमृता को सम झाते हुए कहा.

कुमार के बहुत कहने पर आखिर अमृता को स्वामी के पास जाना पड़ा. शहर से करीब

12 किलोमीटर दूर बहुत बड़े क्षेत्र में स्वामीजी का आश्रम था. आश्रम क्या था एक तरह से बंगला ही था. एक बड़े हौल में एक कोने में नंगे बदन केवल धोती पहने स्वामीजी बैठे थे. सामने सैकड़ों अधीर भक्तों की भीड़ एकटक उन्हें निहार रही थी. स्वामीजी के बारे में यह बात प्रसिद्ध थी कि आंखें बंद कर वे किसी का भी अतीत, वर्तमान और भविष्य बता देते हैं.

कई जानेमाने रईस भक्तों की कृपा से उन की कुटिया बंगले में तबदील हो चुकी थी. स्वामी जी का बड़ा सा कमरा कहिए या शयनकक्ष, एक से बढ़ कर एक लग्जरी आइटम्स से सुसज्जित था. स्वामीजी रात 9 बजे से सुबह 9 बजे तक का समय वहीं बिताते थे. उन की सेवा के लिए कम उम्र की कई शिष्याएं नियुक्त थीं.

अमृता और कुमार जा कर आगे वाली लाइन में बैठ गए. कुमार ने आगे बैठने के लिए बाकायदा ऊंची फीस अदा की थी. 10-15 मिनट बाद ही स्वामीजी ने आंखें खोलीं. उन की नजरें पहले कुमार पर और फिर बगल में बैठी अमृता पर पड़ीं और फिर कुछ देर तक उस के चेहरे पर ही टिकी रह गईं. अमृता को देख कर उन की आंखों में चमक आ गई.

धन्यवाद भाग-3: जब प्यार के लिए वंदना ने तोड़ी मर्यादा

मैं ने वंदना को बड़ी मुश्किल से पहचाना. उस का चेहरा और बदन सूजा सा नजर आ रहा था. उस की सांसें तेज चल रही थीं और उसे तकलीफ पहुंचा रही थीं.

‘‘शालू, तू ने बड़ा अच्छा किया जो मुझ

से मिलने आ गई. बड़ी याद आती थी तू कभीकभी. तुझ से बिना मिले मर जाती, तो मेरा मन बहुत तड़पता,’’ मेरा स्वागत यों तो उस ने मुसकरा कर किया, पर उस की आंखों से आंसू भी बहने लगे थे.

मैं उस के पलंग पर ही बैठ गई. बहुत कुछ कहना चाहती थी, पर मुंह से एक शब्द भी

नहीं निकला, तो उस की छाती पर सिर रख कर एकाएक बिलखने लगी.

‘‘इतनी दूर से यहां क्या सिर्फ रोने आई है, पगली. अरे, कुछ अपनी सुना, कुछ मेरी सुन. ज्यादा वक्त नहीं है हमारे पास गपशप करने का,’’ मुझे शांत करने का यों प्रयास करतेकरते वह खुद भी आंसू बहाए जा रही थी.

‘‘तू कभी मिलने क्यों नहीं आई? अपना ठिकाना क्यों छिपा कर रखा? मैं तेरा दिल्ली

में इलाज कराती, तो तू बड़ी जल्दी ठीक हो जाती, वंदना,’’ मैं ने रोतेरोते उसे अपनी शिकायतें सुना डालीं.

‘‘यह अस्थमा की बीमारी कभी जड़ नहीं छोड़ती है, शालू. तू मेरी छोड़ और अपनी सुना. मैं ने सुना है कि अब तू शांत किस्म की टीचर हो गई है. बच्चों की पिटाई और उन्हें जोर से डाटना बंद कर दिया है तूने,’’ उस ने वार्त्तालाप का विषय बदलने का प्रयास किया.

‘‘किस से सुना है ये सब तुम ने वंदना?’’ मैं ने अपने आंसू पोंछे और उस का हाथ अपने हाथों में ले कर प्यार से सहलाने लगी.

‘‘जीजाजी तुम्हारी और सोनूमोनू की ढेर सारी बातें मुझे हमेशा सुनाते रहते हैं,’’ जवाब देते हुए उस की आंखों में मैं ने बेचैनी के भाव बढ़ते हुए साफसाफ देखे.

‘‘वे यहां कई बार आ चुके हैं?’’

‘‘हां, कई बार. मेरा सारा इलाज वे ही…’’

‘‘क्या तुम्हें पता है कि उन्होंने मु?ो अपने यहां आने की, तुम्हारी बीमारी और इलाज कराने की बातें कभी नहीं बताई हैं?’’

‘‘हां, मुझे पता है.’’

‘‘क्यों किया उन्होंने ऐसा? मैं क्या तुम्हारा इलाज कराने से उन्हें रोक देती? मुझे अंधेरे में क्यों रखा उन्होंने?’’ ये सवाल पूछते हुए मैं बड़ी पीड़ा महसूस कर रही थी.

‘‘तुम्हें कुछ न बताने का फैसला जीजाजी ने मेरी इच्छा के खिलाफ जा कर लिया था, शालू.’’

‘‘पर क्यों किया उन्होंने ऐसा फैसला?’’

‘‘उन का मत था कि तुम शायद उन के ऐक्शन को समझ नहीं पाओगी.’’

‘‘उन का विचार था कि तुम्हारे इलाज कराने के उन के कदम को क्या मैं नहीं समझ पाऊंगी?’’

‘‘हां, और मुझ से बारबार मिलने आने की बात को भी,’’ वंदना का स्वर बेहद धीमा और थका सा हो गया.

कुछ पलों तक सोचविचार करने के बाद मैं ने झटके से पूछा, ‘‘अच्छा, यह तो बताओ कि तुम जीजासाली कब से एकदूसरे से मिल रहे हो?’’

एक गहरी सांस छोड़ कर वंदना ने बताया, ‘‘करीब सालभर पहले वे टूर पर बनारस आए हुए थे. वहां से वे अपने एक सहयोगी के बेटे की शादी में बरात के साथ यहां कानपुर आए थे. यहीं अचानक इसी नर्सिंगहोम के बाहर हमारी मुलाकात हुई थी. वे अपने पुराने दोस्त डाक्टर सुभाष से मिलने आए थे.’’

‘‘और तब से लगातार यहां तुम से मिलने आते रहे हैं?’’

‘‘हां, वे सालभर में 8-10 चक्कर यहां

के लगा ही चुके होंगे. उन का भेजा कोई न

कोई आदमी तो मुझ से मिलने हर महीने जरूर आता है.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘यहां का बिल चुकाने, मुझे जरूरत के रुपए देने. मैं कोई जौब करने में असमर्थ हूं न. मुझ बीमार का बोझ जीजाजी ही उठा रहे हैं शालू.’’

अचानक मेरे दिमाग में बिजली सी कौंधी और एक ही  झटके में सारा माजरा मुझे समझ

आ गया.

‘‘तुम्हारा और तुम्हारे जीजाजी का अफेयर चल रहा है न… मुझ से छिपा कर तुम से मिलने का. तुम्हारी बड़ी आर्थिक सहायता करने का और कोई कारण हो ही नहीं सकता है, वंदना,’’ मारे उत्तेजना के मेरा दिल जोर से धड़कने लगा.

उस ने कोई जवाब नहीं दिया और आंसूभरी आंखों से बस मेरा चेहरा निहारती रही.

‘‘मेरा अंदाजा ठीक है न?’’ मेरी शिकायत से भरी आवाज ऊंची हो उठी. पलभर में मेरी आंखों पर वर्षों से पड़ा परदा उठ गया है. मेरी सब से अच्छी सहेली का मेरे पति के साथ अफेयर तो तब से ही शुरू हो गया होगा जब मैं बीएड करने में व्यस्त थी और तुम मेरे हक पर चुपचाप डाका डाल रही थी. तुम ने शादी क्यों तोड़ी, अब तो यह भी मैं आसानी से समझ सकती हूं. तब कितनी आसानी से तुम दोनों ने मेरी आंखों में धूल झोंकी.’’

‘‘न रो और न गुस्सा कर शालू. तेरे अंदाज ठीक है, पर तेरे हक पर मैं ने कभी डाका नहीं डाला. कभी वैसी भयंकर भूल मैं न कर बैठूं, इसीलिए मैं ने दिल्ली छोड़ दी थी. हमेशा के लिए तुम दोनों की जिंदगियों में से निकलने का फैसला कर लिया था. मुझे गलत मत समझ, प्लीज.

‘‘जीजाजी बड़े अच्छे इंसान हैं. हमारे बीच जीजासाली का हंसीमजाक से भरा रिश्ता पहले अच्छी दोस्ती में बदला और फिर प्रेम में.

‘‘हम दोनों के बीच दुनिया के हर विषय पर खूब बातें होतीं. हम दोनों एकदूसरे के सुखदुख के साथी बन गए थे. हमारे आपसी संबंधों की मिठास और गहराई ऐसी ही थी जैसी जीवनसाथियों के बीच होनी चाहिए.

‘‘फिर मेरा रिश्ता तय हुआ पर मैं ने अपने होने वाले पति की जीजाजी से तुलना करने की भूल कर दी. जीजाजी की तुलना में उस के व्यक्तित्व का आकर्षण कुछ भी न था.

‘‘मैं जीजाजी को दिल में बसा कर कैसे उस की जीवनसंगिनी बनने का ढोंग करती. अत: मैं ने शादी तोड़ना ही बेहतर समझ और तोड़ भी दी.

‘‘जीजाजी मुझे मिल नहीं सकते थे क्योंकि वे तो मेरी बड़ी

बहन के जीवनसाथी थे. तब मैं ने भावुक हो कर उन से खूबसूरत यादों के सहारे अकेले और तुम दोनों से दूर जीने का फैसला किया और दिल्ली छोड़ दी.’’

‘‘मैं तो कभी तुम दोनों से न मिलती पर कुदरत ने सालभर पहले मुझे जीजाजी से अचानक मिला दिया. तब तक अस्थमा ने मेरे स्वास्थ्य का नाश कर दिया था. मां के गुजर जाने के बाद मैं बिलकुल अकेली ही आर्थिक तंगी और जानलेवा बीमारी का सामना कर रही थी.

‘‘जीजाजी के साथ मैं ने उन के प्रेम में

पड़ कर वर्षों पहले अपनी जिंदगी के सब से सुंदर 2 साल गुजारे थे. उन्हें भी वह खूबसूरत समय याद था. मु?ो धन्यवाद देने के लिए उन्होंने सालभर से मेरी सारी जिम्मेदारी उठाने का बोझ अपने ऊपर ले रखा है. मैं बदले में उन्हें हंसीखुशी के बजाय सिर्फ चिंता और परेशानियां ही दे सकती हूं.

‘‘यह सच है कि 15 साल पहले तेरे हिस्से से चुराए समय को जीजाजी के साथ बिता कर मैं ने सारी दुनिया की खुशियां और सुख पाए थे. अब भी तेरे हिस्से का समय ही तो वे मुझे दे कर मेरी देखभाल कर रहे हैं. तेरे इस एहसान को मैं इस जिंदगी में तो कभी नहीं चुका पाऊंगी, शालू. अगर मेरे प्रति तेरे मन में गुस्सा या नफरत हो, तो मुझे माफ कर दे. तुझे पीड़ा दे कर मैं मरना नहीं चाहती हूं,’’ देर तक बोलने के साथसाथ रो भी पड़ने के कारण उस की सांसें बुरी तरह से उखड़ गई थीं.

मैं ने उसे छाती से लगाया और रो पड़ी. मेरे इन आंसुओं के साथ ही मेरे मन में राजेश और उसे ले कर पैदा हुए शिकायत, नाराजगी और गुस्से के भाव जड़ें जमाने से पहले ही बह गए.

बदरंग इश्क: भाग 1- क्यों वंशिका को धोखा दे रहा था सुजीत?

‘‘आज फिर उस का फोन आया था. कह रहा था फिर से शादी कर लेते हैं. मैं अपने बेटे के बिना नहीं रह सकता हूं. तुम भी इतनी कोशिशों के बाद कोई अच्छी नौकरी नहीं ढूंढ़ पाई हो. इस बार पक्का वादा करता हूं, आखिरी सांस तक निभाऊंगा,’’ वंशिका एक सांस में सबकुछ बोल गई. रितु उस के चेहरे के भाव पढ़ने की कोशिश कर रही थी. खूबसूरत चेहरे पर लालिमा आ गई थी.

थोड़ा सा गर्व भी मस्तिष्क पर  झलक रहा था जैसे कहना चाह रहा हो. आखिर मैं ने उसे उस की गलती का एहसास करवा ही दिया है. बेटे के प्रति उस के दिल में भावना जगा ही दी है. हार कर ही सही मैं जीत गई हूं. वंशिका के चेहरे की गरिमा देख कर रितु खुश थी लेकिन दुखी थी उस के साफ दिल से. वंशिका का दिल इतना साफ, इतना कोमल था कि उस की जिंदगी को 25 साल की उम्र में ही अवसाद से भर देने वाले इंसान से भी उसे नफरत नहीं थी.

‘‘किस मिट्टी की बनी हो, वंशिका. उस इंसान ने बिना किसी अपराध के तुम्हारी जिंदगी को कैद बना दिया है. फिर भी उस की बातों पर गौर कर रही हो.’’ वंशिका रितु की बात से सहमत थी, लेकिन सुजीत की बातों पर रितु की तरह शक नहीं कर पा रही थी. ‘‘उस ने खुद ही मु झ से संपर्क किया है. मैं ने तो कब से उस का नंबर ब्लौक कर दिया था, लेकिन उस ने दूसरे नंबर से कौल कर लिया.

फिर अभि के बारे में पता करने से मैं उसे नहीं रोक सकती हूं. कोर्ट का भी यही फैसला था.’’ वंशिका की बात सुन कर रितु सम झ गई कि अभी उस की प्यारी सहेली को फरेब और जिम्मेदारी का फर्क सम झ में नहीं आएगा इसलिए उस ने चले जाना ही बेहतर समझा.

रितु के जाने के बाद वंशिका घर वापस आ गई. अभि सोया हुआ था इसलिए चुपचाप  उस के पास जा कर लेट गई. लेटते ही नींद आ गई. वंशिका की मम्मी ने फोन पर रितु से कब बात कर के उस के जीवन में चल रही मानसिक उठापटक की पूरी जानकारी ले ली उसे पता ही नहीं चला.

अभि स्कूल जाने के लिए मना कर रहा था. अकसर ऐसा ही होता कि जब वंशिका घर में होती तो वह स्कूल जाना ही नहीं चाहता. पूरा दिन मां के साथ ही रहता. उस दिन नानानानी के पास भी नहीं जाता. वंशिका उस की मनोदशा सम झती थी इसलिए कभी उस पर स्कूल जाने का दबाव नहीं डालती थी.

जब कोख में था तब से वंशिका पढ़ाई कर रही थी. इसी साल उस ने पोस्ट ग्रैजुएशन पूरा किया था. नौकरी के लिए तलाश जारी थी. जीवन की कड़वाहट भुलाने का एक यही उपाय था इस समय. शादी के बाद भी लड़की को घर में क्यों बैठा रखा है. पसंद का लड़का मिला था फिर भी क्यों उस के साथ निभा नहीं पाई लाडली. बेटी तो बेटी नाती को भी पास में ही रखा हुआ है.

दबी जबान में यही चर्चा करते थे लोग. वंशिका और उस का परिवार सब सुन कर भी अनसुना करता आ रहा था. अभी तक तो किसी को यह भी नहीं पता था कि वंशिका का तलाक हो चुका है और वह कभी ससुराल नहीं जाएगी. अभि को उसे अकेले ही बड़ा करना है. उस के बेवफा बाप से बहुत बेहतर इंसान बनाना है. अभि और वंशिका आज दोनों घर पर ही रहे.

वंशिका ने भी नौकरी ढूंढ़ने की अपनी मुहिम को अगले हफ्ते पर टाल दिया. बस दिनभर गेम खेलती रही उस के साथ. अगले दिन अभि को खुद ही स्कूल छोड़ कर आई. उस के आने से पहले गरमगरम खाना तैयार कर के रखा. पूरा 1 सप्ताह उस की मरजी से ही बिताया. वंशिका अभि के चेहरे पर इतनी खुशी पहली बार देख रही थी. वंशिका ने अभि की पसंद की मिठाई खरीदी और चहकती हुई घर में दाखिल हुई. ‘‘ऐसे क्या देख रही हो मां.

नौकरी मिल गई है मु झे. ज्यादा बड़ी नहीं पर मिल गई है. खुश होना तो बनता है न? इसलिए मिठाई ले आई. आप और पापा तो मीठा खाते नहीं हो तो अभि के लिए ले आई हूं.’’ ‘‘अभि स्कूल से नहीं आया है अब तक. लाओ मैं रख देती हूं,’’ मां खुश थी. ‘‘बड़े दिनों बाद तुम्हारे चेहरे पर हंसी देख कर मन को शांति मिली. कुदरत तुम्हारी मेहनत सफल करे,’’ मां ने वंशिका के सिर पर हाथ फेर कर उसे गले से लगा लिया. उन की आंखों से टपटप आंसू गिर रहे थे. ‘‘नहीं मां, अब रोने का नहीं हंसने का समय आ चुका है. जो हुआ वह मेरे हिस्से में लिखा था.

अपने पापा और अभि के साथ से मैं उस गलतफहमी से बाहर आ गई हूं अब. मेरे लिए हंस दो मां,’’ वंशिका ने मां के आंसू पोंछते हुए कहा. ‘‘मु झे अपने ऊपर गुस्सा आता है बेटा. तु झे मैं ने ही उस रिश्ते के लिए तैयार किया था. जानती नहीं थी कि जिस पढ़ाई को छुड़वा रही हूं, उसी को फिर से करवाना पड़ेगा और नौकरी के लिए तु झे इतना संघर्ष करना पड़ेगा,’’ मां की आंखें अब भी नम थीं. ‘‘आप ने तो सब अच्छा ही देखा था न. सगी मां हो मेरी, सौतेली नहीं हो.

धोखा तो उन रिश्तेदारों ने दिया जिन्होंने सचाई छिपाई. तुम्हारी गलती नहीं थी मां. फिर कभी अपने मुंह से ऐसी बात मत कहना.’’ वंशिका ने मां की साड़ी के पल्लू से एक बार फिर से मां की आंखों से आंसू पोंछ दिए. पापा का फोन आया कि अभि को स्कूल से ले कर पहले बाजार जाएंगे फिर घर आएंगे. उसे नई साइकिल जो दिलानी थी. मां घर के काम में व्यस्त हो गई और वंशिका अपने कमरे में आ कर लेट गई. फोन देखने का आज मन ही नहीं था.

एक संतुष्टि थी कि व्यस्त रहने का एक बहाना तो मिल ही गया है. फिर भी आंखों में आंसू आ गए. दोनों हाथ मुंह पर रख लिए. जीवन में पिछले कुछ सालों में हुई उठापटक घटनाओं के रूप में पलकों में सिमट गई और फिल्म की तरह दृश्य बदलने लगे… बीए की परीक्षा जैसे ही खत्म हुई मां ने बताया कि उन के एक दूर के रिश्तेदार घर आ रहे हैं. वंशिका ने घर को ठीक किया और ड्राइंगरूम को अच्छे से व्यवस्थित कर दिया. उसे पता ही नहीं था कि उस का उत्साह और रचनात्मकता आधार बन जाएगी उस के जीवन में आने वाली मुसीबतों की.

मेहमान आ कर चले गए. जाने के बाद उन का फोन आया तो मां खुशी से उछल पड़ी और वंशिका को पास में बुला कर दुपट्टे से उस का घूंघट निकाल दिया. वंशिका कुछकुछ सम झी लेकिन दूसरे ही पल घबरा कर दुपट्टा उतर कर फेंक दिया. बोली, ‘‘क्या मां. डरा ही दिया आप ने. बिलकुल मत कहना कि तुम्हारे रिश्तेदारों ने मु झे पसंद कर लिया है.’’ मां के चेहरे पर भेदभरी मुसकान थी. ‘‘मेरी लाड़ो को कोई नापसंद कर सकता है क्या? मेरी परी सभी को पसंद है. ग्रैजुएशन करते ही एक स्थापित परिवार ने हाथ मांग लिया है.’’

सोने के वरक के पीछे छिपा भेड़िया (भाग-3)

‘‘दीदी, क्या हुआ आप को? डाक्टर कह रहे थे कोई गहरा सदमा पहुंचा है आप को?’’ निहारिका परेशानी से पूछ रही थी.

सारिका ने प्यार से उस का हाथ थाम लिया. उस की आंखों से फिर आंसू बहने लगे थे. उस के कारण ही उस की प्यारी छोटी बहन घर के भेडि़ए का निशाना बनी थी. सारिका को रोता देख निहारिका भी उस के कंधे से लग कर रोने लगी. तभी मोहित अंदर आ गए और निहारिका को कंधे से पकड़ कर उठाते हुए पूछने लगे, ‘‘क्या हुआ बच्चे?’’

तभी सारिका ने नफरत के साथ मोहित के हाथ झटक दिए और जलती आंखों से मोहित को देखा. वह उसे उस हिंसक जानवर की तरह लग रहा था, जो अपने शिकार की तरफ घात लगाए बैठा रहता है और अवसर मिलते ही वार कर के अपनी भूख मिटा लेता है. सारिका के इस व्यवहार से मोहित सिर झुकाए बाहर निकल गए और निहारिका हैरानी से सारिका से पूछने लगी, ‘‘दीदी, क्या हो गया? आप ने ऐसा क्यों किया?’’

सारिका शून्य में देख कर बोली, ‘‘शुक्र करो अभी कुछ नहीं हुआ. बस अपना सामान समेट लो, तुम्हें वापस घर जाना है.’’

‘‘पर दीदी, अभी तो आप की तबीयत भी ठीक नहीं है. क्या मुझ से कोई गलती हो गई है?’’ निहारिका ने इतने भोलेपन से पूछा कि सारिका मन ही मन रो उठी. ‘गलती तुम से नहीं मुझ से हुई है, जो एक शैतान को इंसान समझ बैठी.’ पर प्रत्यक्ष में बोली, ‘‘अब मुझे तुम्हारी नहीं किसी बड़े की जरूरत है. अगर कल फिर मेरी तबीयत खराब हो गई तो तुम कैसे संभालोगी?’’ एक बेजान सी मुसकराहट लिए सारिका ने बहन को समझाना चाहा.

‘‘दीदी, आज तो जीजू मुझे घुमाने ले जाएंगे और आइसक्रीम भी खिलाने का प्रोग्राम है,’’ निहारिका बच्चों की तरह ठुनक रही थी.

‘‘नहीं, आज ही चलना है,’’ सारिका सख्ती से बोली और सामान समेटने लगी. फिर पहली बार वह मोहित को बिना बताए मायके आ गई.

उस के आने से सब खुश थे पर अकेले आने के कारण कुछ चिंतित भी. फिर भी सारिका की चुप्पी को बीमारी का कारण जान कर कोई कुछ नहीं बोला.

रात में, अपने कमरे में पहुंचते ही उस के सब्र का बांध फिर से टूट गया. मोहित की बातें उस के मनमस्तिष्क में तूफान उठा रही थीं. यह ऐसा दुख था जिसे वह आसानी से किसी से कह भी नहीं सकती थी. खुद से ही लड़तेलड़ते न जाने कब उस की आंख लग गई पता ही नहीं चला. सुबह उठी तो उस का चेहरा उतरा हुआ था और आंखें सूजी हुई थीं.

मां की अनुभवी आंखें बहुत कुछ समझ रही थीं. उन्होंने सारिका से जानने की कोशिश भी की पर उस ने तबीयत का बहाना बना कर बात टाल दी, तो मां ने फिर कहा, ‘‘बेटा, मोहित आए हैं. बहुत परेशान हैं. तुम उन से कह कर भी नहीं आईं.’’

सारिका का पूरा अस्तित्व जैसे नफरत से भर गया, ‘‘क्या जरूरी है हर सांस उन की मरजी से ली जाए?’’

मां ने गौर से सारिका के चेहरे को देखा, ‘‘मुझे लग रहा है बेटा जैसे कुछ ठीक नहीं है. तुम कुछ अपसैट सी हो. क्या बात है मुझे बताओ?’’

सारिका सिर झुकाए बैठी रही. मां का अपनापन उस की चुप्पी तोड़ने को तैयार था.

‘‘बेटा, अगर मोहित से कुछ नाराजगी है, तो मिलबैठ कर गिलेशिकवे दूर कर लो. मियांबीवी में खटपट तो हो ही जाती है. ऐसे में मायके आ बैठना ठीक नहीं है.’’

‘‘तो क्या मैं कुछ दिन भी मायके में नहीं रह सकती?’’ सारिका की आवाज में तीखापन आ गया था.

‘‘क्यों नहीं रह सकतीं. यह भी तुम्हारा घर है. चाहे जब आओ, पर ऐसे झगड़ा कर के रूठ कर नहीं, राजीखुशी से,’’ मां प्यार से समझा रही थीं.

उन के ममता भरे स्पर्श से सारिका रोने को हो आई, ‘‘नहीं मां, बस मन एकदम से उचट गया. अकेले दिल घबराता है. मोहित बाहर रहते हैं और मेरा अकसर ब्लडप्रैशर लो हो जाता है, जैसे अभी हो गया था. अगर फिर से ऐसा ही हो गया तो मुझे कौन संभालेगा? बस इसीलिए ही. आप पूछ लो मोहित से, हमारा कोई झगड़ा नहीं हुआ?’’ सारिका मां के सीने से लग कर रो दी थी. अब हलकापन महसूस कर रही थी.

‘‘ओहो, इतनी सी बात है. कोई बात नहीं, पहली बार है न इसलिए ऐसा कभीकभी हो जाता है. तुम चिंता न करो, मैं मोहित से बात कर लूंगी. चलो, अब फ्रैश हो कर बाहर आ जाओ.’’

मोहित अकसर उस से मिलने आते थे. लेकिन सारिका दिल की नफरत और चेहरे की उदासीनता को कम नहीं कर पाती थी.

‘‘ओह दीदी, कितनी प्यारी गुडि़या है,’’ प्रसव के बाद जब निहारिका की चहकती आवाज उस के कानों में पड़ी तो उस के अंदर संतोष सा उतर आया. थोड़ी देर बाद वह मासूम आंखें बंद किए उस की बांहों में थी. तभी मोहित ने भी अंदर आ कर मम्मीपापा के पैर छुए तो सारिका ने आंखें बंद कर लीं.

‘‘लीजिए अपनी प्यारी गुडि़या को,’’ निहारिका ने गुडि़या को मोहित की ओर बढ़ाया तो उन्होंने झिझक कर मम्मीपापा को देखा. वे मुसकरा कर बाहर चले गए.

‘‘अब आप हमें नया सूट दिलवाएंगे और आइसक्रीम भी खिलाएंगे,’’ निहारिका मोहित के बहुत करीब खड़ी फरमाइश कर रही थी.

यह देख सारिका के तनबदन में आग लग गई. वह जोर से बोल पड़ी, ‘‘निहारिका, इतनी बड़ी हो गई है तू, अक्ल नाम की चीज नहीं है. दूर हट कर तमीज से बात कर.’’

‘‘तुम्हें क्या हो गया है?’’ मोहित ने धीमे से पूछा.

‘‘जाओ बस, मुझे आराम करना है,’’ रूखाई से कह कर सारिका ने आंखें बंद कर लीं, तो मोहित कुछ पल उसे देखते रहे फिर होंठ भींच कर बाहर निकल आए.

अस्पताल से सारिका मां के घर आ गई थी. 1 महीने बाद जब वह अपने घर वापस गई, तो उस के बदन में खून की जगह नफरत का जहर भर चुका था. अब वह अपने जहर भरे शब्दों का प्रयोग बिना हिचक करती थी. मोहित उस की हालत से दुखी थे. उस को बहुत प्यार करते थे, हर जरूरत का खयाल रखते थे पर सारिका उस दिल का क्या करती जिस में मोहित के लिए कोई नर्म कोना नहीं बचा था. वह उस इंसान को, जो उस का पति था सिर्फ अपनी बेटी की खातिर बरदाश्त कर रही थी

अब मोहित किसी से बात करते तो वह मोहित को कुछ नहीं कहती थी, लेकिन उस औरत को जरूर तीखी बातें सुना देती थी. लड़कियां मोहित की लच्छेदार बातों से प्रभावित हो कर चहकतीं, तो सारिका की तीखी नजरें उन्हें ऐसा एहसास दिलातीं कि वे उस से दोबारा बात करने की हिम्मत न करतीं.

मोहित को वह अपनी चुप्पी से मारती थी. मोहित धीरेधीरे गुमसुम हो रहे थे और वह लड़ाका के रूप में मशहूर हो रही थी. इसी कारण मोहित ने लड़कियों, महिलाओं से घुलनामिलना बंद कर दिया था. पर सारिका जानती थी कि बीमार मस्तिष्क वाला इंसान इतनी आसानी से नहीं सुधर सकता. उसे समय चाहिए.

आज इन लड़कियों की बातें सुन कर उस के जख्म फिर से हरे हो गए थे. पर कोई नहीं जानता था कि शोख हंसतीखिलखिलाती सारिका में यह बदलाव क्यों आया था.

सारिका ने बच्ची का नाम किरण रखा था. उसे यकीन था कि उस की बेटी उस की अंधेरी जिंदगी में उजाले की किरण बन कर आएगी, जो मोहित की काली सोच के अंधेरे को भी मिटाएगी.  मोहित को एहसास दिलाएगी कि लड़कियां सिर्फ मन बहलाने का सामान नहीं होतीं. उन्हें एहसास होगा कि वे भी एक बेटी के पिता हैं, जिसे पुरुष खिलौना समझते हैं. जिन लड़कियों की नादानी और मासूमियत का मोहित ने फायदा उठाया वे भी किसी की बेटियां हैं. फिर शायद वे रिश्तों की, स्त्रीजाति की इज्जत करना सीख जाएंगे.

बेटी का अस्तित्व उन्हें उजली राह दिखाएगा, जिस से सारिका के मन की कड़वाहट भी घुल जाएगी. सारिका को पूरी उम्मीद थी कि एक दिन ऐसा अवश्य होगा.

दूरी: भाग 3- जब बेटी ने किया पिता को अस्वीकार

अकेले नन्ही बच्ची की जिम्मेदारी बिना किसी अच्छी नौकरी के कैसे उठाती? अधूरी सी जिंदगी कैसे जी पाती वह? पर पलक का कहना भी पूरी तरह गलत नहीं. क्या सचमुच वह स्वार्थी नहीं हो गई थी? अपना अधूरापन दूर करने और पुरुष के संबल की चाह में ही तो उस ने प्रकाश का साथ स्वीकारा और इस कोशिश में बच्चे की खुशियों की अनदेखी कर दी. यदि वह मजबूत होती तो प्रकाश की तरफ झुकाव नहीं होता. वह देर तक इसी उधेड़बुन में रही. और आज प्रकाश ने पहली दफा पलक पर हाथ उठाया था. क्या पता अब पलक की प्रतिक्रिया कैसी होगी? कहीं वह सचमुच घर छोड़ कर चली गई तो? जवान लड़की है, कुछ भी हो सकता है उस के साथ. नहींनहीं… उसे पलक को समझना पड़ेगा. पर कैसे? वह समझती कहां है? हालात और बिगड़ते जा रहे थे. क्या करे वह? क्या है समाधान? पूरा दिन उस ने बेचैनी में गुजारा. पलक को फोन किया तो मोबाइल औफ मिला चिंता से उस का सिर दुखने लगा.

शाम को प्रकाश आया तो उदास सा था. मेघा ने

उसे बताया कि पलक अब तक नहीं लौटी है. कहीं कुछ कर न बैठे… कहतेकहते उस की आंखों में आंसू आ गए.

प्रकाश बिना कुछ बोले अपने कमरे में चला गया और दरवाजा बंद कर लिया. मेघा बेटी को फोन करकर परेशान थी. रात 9 बजे पलक लौटी तो मेघा ने दौड़ कर उसे सीने से लगा लिया. पर पलक मेघा को खुद से अलग कर अपने कमरे में बंद हो गई. मेघा का मन कर रहा था चीखचीख कर रोए. इस घुटन भरी जिंदगी से वह आजिज आ गई थी.

सुबह जब प्रकाश औफिस के लिए निकला तो उस के हाथ में सूटकेस था. उस ने मेघा को बताया कि वह औफिशियल टूर पर देहरादून जा रहा है. घर और पलक का खयाल रखना. कह कर मेघा को सीने से लगा लिया. ठीक वैसे ही जैसे मिहिर टूर पर जाते वक्त लगा था. मेघा दूर तक उसे जाते

देखती रही.

तभी पलक भी बिना कुछ कहे कालेज के लिए निकलने

लगी. दादीमां ने उसे प्यार से पकड़ते हुए कहा, ‘‘बेटा, प्लीज शाम को जल्दी घर आ जाना वरना मैं मर जाऊंगी.’’

पलक ने शिकायती लहजे में मां के बेबस चेहरे की तरफ देखा और चुपचाप निकल गई.

दुखी मन से मेघा अपने कमरे में आ गई. अपने बैड पर पत्र रखा देख कर वह चौंकी. पत्र प्रकाश का था. लिखा था,

‘‘डियर मेघा, हमारा रिश्ता बहुत पाकसाफ और खूबसूरत है जिसे कोई और नहीं सम?ा सकता. बेटी भी नहीं. इस बात का दर्द तो हमेशा रहेगा पर बच्चे के भविष्य के लिए हमें इस से भी बड़े दर्द भरे दौर से गुजरना पड़ेगा. दरअसल,

मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से पलक तुम से दूर हो. तुम पहले

एक मां का दायित्व अच्छी तरह निभाओ. पलक की शादी कर लो. फिर हम मिलेंगे. तब तक के लिए मैं तुम से दूर जा रहा हूं क्योंकि

यह दूरी हमारी बच्ची के लिए जरूरी है.’’

मेघा ने कई बार उस खत को पढ़ा. फिर निढाल सी सोफे पर बैठ गई. उसे लगा जैसे वह आज फिर से अधूरी हो गई है. प्रकाश के बगैर वह जीने की कल्पना भी कैसे

कर पाएगी?

प्रकाश ने भी तो कितनी मुश्किल से यह फैसला लिया

होगा. पर उस ने सही ही किया है. हमारे बीच यह दूरी जरूरी है. मेघा खत बंद कर देर तक खामोश बैठी रही. खुद को अधूरा महसूस करने के बावजूद वह दुखी नहीं थी, क्योंकि यह अधूरापन फिलहाल जरूरी था, दायित्वों को पूरा करने के लिए.

अपरिचित-भाग 1: जब छोटी सी गलतफहमी ने तबाह किया अर्चना का जीवन

वादियों की मीठी ठंडक बटोरते बटोरते, धूप और धुंध की आंखमिचौली देखतेदेखते, चीड़ और देवदार के पत्तों के बीच से छन कर आती विशुद्ध हवा को सांसों में भरते हुए कब शिमला पहुंच गए और कब गाड़ी ‘हिमलैंड’ की पार्किंग में जा लगी, अर्चना को पता ही नहीं चला.

रजत महाशय ने तो होटल की सीढि़यां चढ़ते ही घोषणा कर दी, ‘‘गाड़ी चलातेचलाते अपना तो बैंड बज गया भई, अपुन को अब कल सुबह से पहले कोई कहीं चलने के लिए न कहे. आज पूरा रैस्ट.’’

बच्चे राहुल और रिया तो कमरे में पहुंचते ही जूते उतार कर कंबल में दुबक गए और अर्चना बाथरूम में घुस गई.

बढि़या कुनकुने पानी से नहा कर लौटी तो राहुल और रिया गरमागरम कौफी पीते हुए टीवी देख रहे थे और रजत अर्चना और खुद के लिए कौफी तैयार कर रहे थे. अर्चना  को सुनहरे सितारों वाले सुर्ख सलवारसूट में सजे देख कर उन्होंने चुटकी ली, ‘‘ये बिजली कहीं गिरने जा रही है क्या?’’

‘‘हां, जरा, माल रोड का एक चक्कर लगा कर आती हूं.’’

‘‘तुम थकती नहीं यार?’’

‘‘लो, थकना कैसा? बैंड तो आप का बजा. मैं तो आराम फरमाती आई हूं. यों भी रजत, साल भर पत्थरों के पिंजरे में कैद रहने के बाद ये 6-7 दिन मिले हैं मुझे आजादी के, इन में से आधा दिन भी होटल के बंद कमरे में बैठ कर गुजारना मंजूर नहीं मुझे,’’ माथे पर बिंदिया का रतनारी सितारा टांकते हुए अर्चना ने कहा.

‘‘ठीक है, जाओ बेगम, लेकिन अंधेरा होने से पहले लौट आना,’’ रजत ने हिदायत दी और अर्चना खिल उठी. कभीकभी अकेले बिंदास घूमने का भी अपना एक अलग ही मजा होता है.

‘हिमलैंड’ परिसर से निकल कर संकरी घुमावदार सड़क से गुजरते हुए जब अर्चना ने मुख्य सड़क पर कदम रखे तो उसे एक अनोखा एहसास हुआ कि जैसे यह जानीपहचानी पथरीली सड़क उसी के दरसपरस को तरस रही थी. शिमला की मदमस्त फिजाएं और दिलकश मंजर उसे बरस दो बरस से जैसे बरबस यहां खींच कर ले ही आता है.

माल रोड रंगारंग देशीविदेशी पर्यटकों की खुशरंगियों से गुलजार हो रही थी. उन्हीं का एक हिस्सा थी छोटेछोटे कदम रखती हुई अर्चना, जो लिफ्ट की ओर बढ़ी जा रही थी कि अचानक ‘ये शाम मस्तानी, मदहोश किए जाए…’ की नशीलीसुरीली धुन हवाओं में खुशबू की तरह बिखर गई. उस ने मुड़ कर देखा तो लाल पुलोवर और काली जींस में रजत की उम्र का एक ‘डेशिंग मैन’ माउथ औरगेन बजाता हुआ चला आ रहा था. वह जादू जगाने वाली मीठी धुन लिफ्ट तक उस के साथसाथ चलती रही.

अपर माल रोड की ओर जाते हुए एक मोड़ पर अर्चना दो पल सुस्ताने के लिए बैठी तो उस ने देखा कि वह व्यक्ति भी इसी ओर चला आ रहा है. उस के सामने से गुजरते हुए पल भर को ठिठक कर उस ने एक गहरी नजर अर्चना पर डाली. न जाने क्या था उस नजर में कि अर्चना सिहर उठी.

एक भरपूर जवां और रंगीनहसीन शाम माल रोड पर उतरी हुई थी. नएनवेले जोड़े बांहों में बांहें डाले हंसी के मोती बिखेरते घूम रहे थे तो चाबी से चलने वाले खिलौनों से नन्हेमुन्ने बच्चे खरगोश की तरह फुदक रहे थे, जैसे वहां जिंदगी मुसकरा रही थी.

पहाड़ों की खासियत है कि यहां शाम जल्दी उतर आती है और बनी भी देर तक रहती है, इसीलिए शाम की इस गुलाबी उजास में नहाती अर्चना बेफिक्र हो कर चहलकदमी कर रही थी कि अचानक बादल गरजने लगे और शाम की सुनहरी संतरी रंगत में श्याम रंग घुल गया और देखते ही देखते बूंदाबांदी शुरू हो गई.

पहाड़ी मौसम के मिजाज को खूब पहचानती थी अर्चना, इसलिए इस से पहले कि ये बूंदाबांदी हलकी या तेज बारिश में बदले, वह ‘हिमलैंड’ पहुंच जाना चाहती थी, अत: उस ने अविलंब वापसी की राह पकड़ ली. ‘लिफ्ट पर भीड़ होगी,’ यह सोच कर वह शौर्टकट वाले ढलवां रास्ते पर उतर आई.

वह तेजतेज कदम बढ़ाते हुए चली जा रही थी कि उस भीगे मौसम में एक दर्द में डूबी धुन तैर गई, ‘दिल ने फिर याद किया, बर्क सी लहराई है…’ अर्चना का जी धक् से रह गया कि वह माउथ औरगेन वाला भी यहींकहीं मौजूद है. कौन है यह और चाहता क्या है? अर्चना को यह सोच परेशान भी कर रही थी और डरा भी रही थी. सहसा बूंदाबांदी ने हलकी बारिश का रूप धारण कर लिया और अर्चना सबकुछ भूल कर उस ऊबड़खाबड़ सड़क पर सधे हुए कदम रखरख कर आगे बढ़ने लगी.

रिसेप्शन पर चाय का और्डर दे कर अर्चना अपने कमरे में पहुंची. राहुल और रिया सो चुके थे, रजत बाहर के मौसम से बेखबर अपना लैपटौप ले कर बैठे थे. लैपटौप से नजरें उठाए बिना उन्होंने पूछा, ‘‘इतनी जल्दी कैसे आ गईं बेगम?’’ पर अर्चना ठंड से कांप रही थी, इसलिए बिना जवाब दिए कपड़े बदलने बाथरूम में घुस गई.

रात भर अर्चना ठीक से सो नहीं पाई. आंखें बंद करते ही जैसे वह व्यक्ति सामने आ कर खड़ा हो जाता और कानों में ‘शाम मस्तानी…’ और ‘दिल ने फिर याद किया…’ की धुनें गूंजने लगतीं. वह क्यों पीछा कर रहा है उस का? या हो सकता है कि उसे ही कोई गलतफहमी हुई हो… ‘हां, यही होगा,’ सोच कर उसे तनिक सा चैन आया और वह सोने की कोशिश करने लगी.

अगले दिन सुबहसवेरे ही वे लोग नालडेहरा की ओर निकल पड़े. सुबह के दुधिया उजास में ताजेताजे नहाएधोए से खड़े पहाड़ों के दरस ने और प्राणदायिनी ठंडी सुहानी हवाओं के स्पर्श ने अर्चना के चित को हराभरा कर दिया था और कल की शाम उस के जेहन से उतर चुकी थी. वह फिर सोनचिरैया सी चहक रही थी.

हरीभरी घाटियों को झुकझुक कर चूमते हुए धुएं की तरह बादलों और किसी कुशल चित्रकार द्वारा उकेरे गए खूबसूरत चित्रों से अजबगजब नजारों को कैमरे में कैद करने की मंशा से रजत ने एक हेयरपिन मोड़ पर गाड़ी रोक ली. रजत तसवीरें ले रहे थे और अर्चना  राहुलरिया के लिए भुट्टे भुनवा रही थी कि पास से एक सफेद मारुति गुजरी, जिसे ‘वह’ चला रहा था और अकेला था. अर्चना का अच्छाखासा मूड खराब हो गया और उसे पक्का यकीन हो गया कि ‘वह’ उस का पीछा कर रहा है, लेकिन रजत साथ हैं तो डर काहे का, सोच कर उस ने राहत भरी सांस ली.

कान्स में अनुष्का शर्मा ने किया डेब्यू, लोग बोले- नहीं देखी ऐसी हुस्नपरी

बॉलीवुड एक्ट्रेस अनुष्का शर्मा अक्सर अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ में काफी बिजी रहती है. जल्द ही अनुष्का शर्मा झूलन गोस्वामी की बायोपिक फिल्म ‘चकदा एक्सप्रैस’ में नजर आएगी. अभी हाल ही में अनुष्का शर्मा ने 76 वें ‘कान्स फिल्म फेस्टिवल’ में रेड कार्पेट पर डेब्यू किया है. रेड कार्पेट पर अनुष्का शर्मा अपने हुस्न के जलवे दिखाए.

अनुष्का शर्मा ने इंस्टाग्राम पर शेयर की तस्वीरें

अनुष्का शर्मा ने हाल ही में अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर कान्स फिल्म फेस्टिवल की तस्वीरें शेयर की है. बता दें, अनुष्का ने कान्स फिल्म फेस्टिवल के लिए 3डी फूलों से सजा हुआ एक बेज ऑफ-शोल्डर गाउन पहना है, जिसे रिचर्ड क्विन द्वारा बनाया गया है.

इसके साथ ही एक्ट्रेस ने अपने सिग्नेचर स्लीक बन और चोपर्ड के मिनिमल डायमंड ज्वेलरी से अपने लुक को पूरा किया. कान्स 2023 में अनुष्का शर्मा के लुक ने फैशन को एक अलग पहचान दिया है और उन्होंने अपने जलवे से लोगों का दिल जीता है.

इसके साथ ही अनुष्का ने 76वें कान्स फिल्म फेस्टिवल के रेड कार्पेट पर फेमस ब्रांड लोरियल पेरिस को रिप्रेजेंट किया है. उनकी खूबसूरत फोटोज सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं.

 

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फैंस ने जमकर की तरीफ

सोशल मीडिया पर अनुष्का शर्मा की फोटोज तेजी से वायरल हो रही है. इंस्टाग्राम पर लोग अनुष्का शर्मा की इन तस्वीरों पर जमकर कमेंट्स कर रहे हैं. अनुष्का की तस्वीरों पर उनके फैंस काफी कमेंट्स कर रहे है. एक शख्स ने कमेंट करते हुए लिखा है- आप बहुत ही प्यारी लग रही हो. वहीं एक यूजर ने कमेंट करते हुए लिखा है- आप तो हुस्नपरी लग रही हो.

 

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अनुष्का शर्मा की आने वाली फिल्में

अनुष्का शर्मा को आखिरी बार ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई फिल्म ‘कला’ में एक कैमियो रोल में देखा गया था. इसके आलवा अनुष्का जल्द ही ‘चकदा एक्सप्रैस’ में नजर आएगी. इसके साथ ही पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने कुछ बेहतरीन फिल्में पेश की हैं. इनमें वेब सीरीज ‘पाताल लोक’, ‘बुलबुल’ और फिल्म ‘कला’ का नाम शामिल है.

खत्म हुआ इंतज़ार ,अनुज ने अनुपमा को बताया माया का सच

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ शुरुआत से ही टीआरपी की लिस्ट में नंबर वन रहा है. शो में आए दिन नए-नए ट्विस्ट  देखने को मिलते है. आने वाले नए एपिसोड़ में खुलासे होने जा रहे है. इस शनिवार को ‘अनुपामा’ में अनुज कपाड़िया उस सच का खुलासा करेगा, जिसे दर्शक काफी समय से इंतज़ार कर रहे थे.

दरअसल, अनुज कपाड़िया गुरूकुल में अनुपमा से मिलेगा और वहां पर उसे बताएगा कि उस दिन क्या हुआ था जब वह उसके पास आने वाला था. अनुज कपाड़िया उस सच से पर्दाफाश करेगा. इसके साथ ही अनुपमा अनुज का सच सुनकर क्या फैसला लेगी. यह तो पता चल जाएगा.

क्या हुआ था उस दिन अनुज ने बताया सच

अनुज कहेगा कि वह कान्हा जी और अपनी अनु के सामने कभी झूठ नहीं बोल सकता. वह अनूपमा को बताएगा कि- उस दिन जब वह उससे मिलने के लिए आ रहा था, तब वह बहुत खुश था. मैं घर से निकलने ही वाला था कि माया अजीब सी हरकतें करने लगी और उसे रोकने लगी. तब उसने माया को धक्का दिया और दरवाजा तोड़कर वहां से निकल गया, लेकिन फिर रास्ते में उसे एक फोन आया और सब कुछ बदल गया.

इतनी ही नहीं, अनुज आगे बताएगा कि वह फोन छोटी अनु का था. वह जोर-जोर से रो रही थी. यह सुनकर उसने गाड़ी वापस घुमाई और माया के घर पहुंचा. उसने वहां पर देखा कि माया और छोटी खून में लथपथ है. वह उन्हें हॉस्पिटल लेकर गया, तो डॉक्टर ने बताया कि माया के सिर में चोट आई है और उसकी MRI रिपोर्ट भी ठीक नहीं आई. माया अपना मानसिक संतुलन खो रही है और ऐसे में उसके साथ रहना जरूरी है. एक मिनट के लिए उसे अकेला छोड़ना खतरे से खाली नहीं होगा. इस बीच माया को अस्पताल में होश आ गया और वह चीखना चिल्लाना और चीजें फेंकना शुरू कर देती है.

 

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अब अनुपमा लेगी कौन-सा बड़ा फैसला

अनुज के सच खुलासे के बाद अनुपमा को पता चलेगा कि अनुज उसे सब कुछ बताना चाहता था, लेकिन माया की ऐसी हालत उसकी वजह से हुई है. ऐसे में वह उसे अकेला नहीं छोड़ सकता. अनुज का कहना है कि वह जैसी भी है लेकिन छोटी की बायोलॉजिकल मदर है. वह आगे कहता है कि अगर मैं उसे अस्पताल में छोड़ कर आता, तो छोटी को कहां छोड़ कर आता. यह चिंता उसे खाए जा रही थी. इसके बाद अनुज अपनी अनु के पैर पकड़कर उससे माफी भी मांगता है. अब शो में ये देखना होगा कि अनुज के सच खुलासे के बाद अनुपमा क्या फैसला लेगी.

Father’s day 2023: अकेले होने का दर्द- भाग 3

मैं ने कहा, ‘‘आइए आंटी, कहां से आ रही हैं इस समय?’’ ‘‘दिल्ली हाट तक गई थी, थोड़ी देर हो गई. सामने की दुकान से कोई पानी देने तो नहीं आया था?’’ ‘‘नहीं, अच्छा तो आप भीतर तो आइए…मेरे से एक बोतल पानी ले जाइए,’’ कहते हुए मैं वापस खाने की टेबल पर आ गई, ‘‘खाना खाएंगी न आंटी.’’ ‘‘नहीं बेटा, आज मन नहीं है.’’ मैं ने पापा को उन का परिचय कराते हुए कहा, ‘‘पापा, यह मीरा आंटी हैं. सामने के फ्लैट में रहती हैं. बेहद मिलनसार और केयरिंग भी. राहुल को जब भी कुछ नया खाने का मन करता है आंटी बना देती हैं.’’ ‘‘अरे, बस बस,’’ कह कर वह सामने आ कर बैठ गईं. मैं ने उन की तरफ प्लेट सरकाते हुए कहा, ‘‘अच्छा, कुछ तो खा लीजिए. हमारा मन रखने के लिए ही सही,’’ और इसी के साथ उन की प्लेट में मैं ने थोड़े चावल और दाल डाल दी. ‘‘लगता है आप यहां अकेली रहती हैं?’’ पापा ने पूछा. ‘‘हां, पापा,’’ इन के पति आर्मी में हैं. वहां इन को साथ रहने की कोई सुविधा नहीं है,’’ राहुल ने कहा. ‘‘फिर तो आप को बड़ी मुश्किल होती होगी अकेले रहने में?’’ ‘‘नहीं, अब तो आदत सी पड़ गई है,’’ आंटी बेहद उदासीनता से बोलीं, ‘‘बेटीदामाद भी कभीकभी आते रहते हैं, फिर जब कभी मन उचाट हो जाता है मैं उन से स्वयं मिलने चली जाती हूं.’’ ‘‘पापा, इन की बेटीदामाद दोनों डाक्टर हैं और चेन्नई के अपोलो अस्पताल में काम करते हैं,’’ मैं ने कहा. बातों का सिलसिला देर तक यों ही चलता रहा. जातेजाते आंटी बोलीं, ‘‘मैं सामने ही रहती हूं…किसी वस्तु की जरूरत हो तो बिना संकोच बता दीजिएगा.’’

‘‘आंटी, पापा को सुबह इंजेक्शन लगवाना है. किसी को जानती हैं आप, जो यहीं आ कर लगा सके.’’ ‘‘अरे, इंजेक्शन तो मैं ही लगा दूंगी…बेटी ने इतना तो सिखा ही दिया है.’’ ‘‘ठीक है आंटी, मैं सुबह इंजेक्शन भी ले आऊंगी और पट्टी भी,’’ कहते- कहते मैं भी उठ गई. ‘‘हां, बेटा, यह तो मेरा सौभाग्य होगा,’’ कह कर आंटी चली गईं. शाम को मैं आफिस से आई और पापा का हालचाल पूछा. आज वह थोड़ा स्वस्थ लग रहे थे. कहने लगे, ‘‘सुबह इंजेक्शन और डे्रसिंग के बाद थोड़ा रिलैक्स अनुभव कर रहा हूं. फिर शाम को सामने पार्क में भी घूमने गया था.’’ मैं चाहती थी पापा कुछ दिन और यहां रहें. हर रोज कोई न कोई बहाना बना कर वह जतला देते थे कि वह वापस जाना चाहते हैं. यहां रहना उन के सिद्धांतों के खिलाफ है. मेरी शंका जितनी गहरी थी पर समाधान उतना ही कठिन. मैं ने और राहुल ने भरसक प्रयत्न किया कि उन्हें यहीं पास में कोई और मकान ले देते हैं पर वह किसी भी तरह नहीं माने. फिर हम ने उन्हें इस बात के लिए मना लिया कि 1 महीने के बाद दीवाली आ रही है तब तक वह यहीं रहें.

हमारी आशाओं के अनुकूल उन्होंने यह स्वीकार कर लिया था. मुझे थोड़ी सी तसल्ली हो गई. उस दिन मैं और राहुल प्रगति मैदान जाने का मन बना रहे थे, जहां गृहसज्जा के सामान की प्रदर्शनी लगी हुई थी. मैं ने पापा को भी साथ चलने के लिए कहा. उन्होंने यह कह कर मना कर दिया कि मैं वहां जा कर क्या करूंगा. ‘‘पापा, आप साथ चलेंगे तो हमें अच्छा लगेगा. मानसी कई दिनों से माइक्रोवेव लेने का मन बना रही थी. आप रहेंगे तो राय बनी रहेगी,’’ राहुल ने विनती करते हुए कहा. ‘‘तुम्हारा मुझे इतना मान देने के लिए शुक्रिया बेटा…पर जा नहीं पाऊंगा, क्योंकि पार्क में आज इस कालोनी के बुजुर्गों की एक बैठक है.’’ हम दोनों ही वहां चले गए. प्रगति मैदान से आने के बाद जैसे ही हम ने कार पार्क की कि मीरा आंटी के घर से डाक्टर अवस्थी को निकलते देखा. मैं एकदम घबरा गई और तेजी से जा कर पूछा, ‘‘डाक्टर साहब, क्या हुआ मीरा आंटी को? सब ठीक तो है न.’’ ‘‘हां, अब सब ठीक है. उन के घर में किसी की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी.’’ इस से पहले कि मैं कुछ सोच पाती, मीरा आंटी सामने से आती हुई बोलीं, ‘‘तुम्हारे पापा इधर हैं, तुम लोग अंदर आ जाओ.’’ ‘‘क्यों, क्या हुआ उन को?’’ ‘‘दरअसल, तुम्हारे जाने के बाद उन्होंने मेरी घंटी बजा कर कहा था कि उन्हें बहुत घबराहट हो रही है. मैं थोड़ा घबरा गई थी.

मैं उन्हें सहारा दे कर अपने यहां ले आई और डाक्टर को फोन कर दिया. उन का ब्लडप्रैशर बहुत बढ़ा हुआ था. शायद गैस हो रही होगी. अभी उन्हें सोने का इंजेक्शन और कुछ दवाइयां दी हैं,’’ कहते हुए उन्होंने मुझे वह परचा पकड़ा दिया. ‘‘आंटी, बुढ़ापा नहीं, पापा अकेलेपन का शिकार हैं,’’ कहतेकहते मैं पापा के पास ही बैठ गई, ‘‘62 साल की उम्र भी कोई बुढ़ापे की होती है.’’ राहुल जब तक अपने फ्लैट से फ्रेश हो कर आए आंटी ने चाय बना दी. मैं पुन: पापा की इस हालत से चिंतित थी और परेशान भी. वह पूरी रात हम ने उन के पास बैठ कर बिताई. कुछ दिन और बीत गए. पापा अब फिर सामान्य हो गए थे. आंटी का हमारे घर निरंतर आनाजाना बना रहता था. हम पापा में फिर से उत्साह पैदा करने की कोशिश करते रहे. एक पल वह खुश हो जाते और दूसरे ही पल उदास और गंभीर. रविवार को हम सवेरे बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे. बातोंबातों में राहुल ने आंटी का उदाहरण देते हुए कहा कि वह कितने मजे से जिंदगी काट रही हैं.

‘‘सचमुच वह बहुत ही भद्र और मिलनसार महिला हैं. इस उम्र में तो उन के पति को भी रिटायरमेंट ले लेना चाहिए. कब से वह अकेली जिंदगी जी रही हैं और आजकल के हालात देखते हुए एक अकेली औरत…’’ पापा बोले. ‘‘पापा, आप को एक बात बताऊं,’’ राहुल ने सारा संकोच त्याग कर कहा, ‘‘मैं ने पहले दिन आप से झूठ बोला था कि आंटी के पति आर्मी में हैं. दरअसल, उन के पति की मृत्यु 8 साल पहले हो चुकी है. तब उन की बेटी मेडिकल कालिज में पढ़ती थी. बड़ी मुश्किलों से आंटी ने उसे पढ़ाया है. पिछले ही साल उस की शादी की है.’’ ‘‘ओह, यह तो बहुत बुरा हुआ. उन्होंने कभी बताया भी नहीं.’’ ‘‘सभी लोगों को उन्होंने यही बता रखा है जो मैं ने आप को बताया था. एक अकेली औरत का सचमुच अकेला रहना कितना कठिन होता है, यह उन से पूछिए. इसलिए मैं जब भी आंटी को देखती हूं मुझे आप की चिंता होने लगती है. औरत होने के नाते वह तो अपना घर संभाल सकती हैं पर पुरुष नहीं.

उन्हें सचमुच एक सहारे की जरूरत होती है. पापा, आप को लगता है कि आप यों अकेले जीवन बिता पाएंगे…मैं बेटी हूं आप की…मम्मी के बाद आप का ध्यान रखना मेरा फर्ज है…मेरा अधिकार भी है और कर्तव्य भी…मैं जो कह रही हूं आप समझ रहे हैं न पापा…मैं मीरा आंटी की बात कर रही हूं.’’ मैं अपनी बात कह चुकी थी. और अब पापा के चेहरे पर घिर आए भावों को पढ़ने की कोशिश करने लगी. ‘‘मानसी ठीक कह रही है, पापा,’’ राहुल बोले, ‘‘बहुत दिनों तक सोचने के बाद ही डरतेडरते हम ने आप से कहने की हिम्मत जुटाई है. बात अच्छी न लगे तो हमें माफ कर दीजिए.’’ ‘‘बेटे, इस उम्र में शादी. मैं कैसे भूल पाऊंगा तुम्हारी मम्मी को, और फिर लोग क्या सोचेंगे,’’ पापा का स्वर किसी गहरे दुख में डूब गया. ‘‘पापा, लोग बुढ़ापे के लिए तो एकदूसरे का सहारा ढूंढ़ते हैं. इस उम्र में आप को कई बीमारियों ने आ घेरा है, उपेक्षित से हो कर रह गए हैं आप. अब जो हो गया उस पर हमारा जोर तो नहीं है. फिर लोगों से हमें क्या लेनादेना. आप दोनों तैयार हों तो हमें दुनिया से क्या लेना.’’

‘‘मीरा से भी तुम ने बात की है?’’ उन्होंने बेहद संजीदगी से पूछा. ‘‘हां, पापा, हम ने उन्हें भी मुश्किल से मनाया है. यदि आप तैयार हों तो…आप हमारा हमेशा ही भला चाहते रहे हैं. क्या आप चाहते हैं कि हम सदा आप के लिए चिंतित रहें. बहुत सी बातें आप छिपा भी जाते हैं. मैं पहले भी आप से इस बारे में बात करना चाहती थी मगर हर बार संकोच की दीवार सामने आ जाती थी.’’ वह कुछ असहज भी थे और असामान्य भी, किंतु जिस लाड़ भरी निगाहों से उन्होंने मुझे देखा, मुझे लगा मेरी यह हरकत उन्हें अच्छी लगी है. ‘‘पापा, प्लीज,’’ कह कर मैं उन के पास आ कर बैठ गई, ‘‘आप को सुखी देख कर हम लोग कितनी राहत महसूस करेंगे. यह मैं कैसे बताऊं . आप की ऐसी हालत देख कर मेरा जी भर आता है. मैं आप को बहुत प्यार करती हूं पापा,’’ कहतेकहते मैं रो पड़ी. पापा धीरे से मुसकराए. शिष्टाचार के सभी बंधन तोड़ कर मैं उन से लिपट गई. महीनों से खोई हुई उन की हंसी वापस उन के चेहरे पर थी. उन का ठंडा मीठा स्पर्श आज अर्से बाद मुझे मिला था. ‘‘थैंक्स, पापा,’’ कहतेकहते मेरी आवाज आंसुओं के चलते भर्रा गई.

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