धन्यवाद भाग-2: जब प्यार के लिए वंदना ने तोड़ी मर्यादा

लगभग 15 साल बीत गए थे वंदना को दिल्ली छोड़े हुए. वह अब

कानपुर में गंभीर रूप से बीमार पड़ कर जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रही थी. इतने लंबे समय में उस के जीवन में क्याक्या घटा है, इस की कोई जानकारी मेरे पास नहीं थी.

शनिवार को हम दोनों गाड़ी से चल दिए. सारे रास्ते में मैं ने वंदना को याद करते हुए कई बार आंसू बहाए. अपनी सीट पर बैठे हुए जिस अंदाज में राजेश बारबार करवट बदल रहे थे, उस से यह साफ जाहिर हो रहा था कि वे भी कुछ बेचैन हैं. स्टेशन से पहले ही उन्होंने किसी को मोबाइल से कहा, ‘‘5 मिनट में बाहर आते हैं.’’

कानपुर स्टेशन से बाहर आने के बाद जिस बात ने मु?ो बड़ा हैरान

किया, वह थी एक औटोरिकशेवाले का राजेश को सलाम करना और बिना हम से पूछे हमारा बैग उठा कर अपने रिकशा की तरफ बढ़ जाना.

‘‘यह औटो वाला आप को कैसे जानता है,’’ मैं ने अचंभित स्वर में पूछा, तो राजेश गंभीर अंदाज में मेरा चेहरा ध्यान से देखने लगे.

‘‘मेरे सवाल का जवाब दीजिए न?’’ उन्हें हिचकिचाते देख मैं ने उन पर दबाव डाला.

‘‘शालू, तुम वंदना से मिलना चाहती हो न,’’ उन्होंने संजीदा लहजे में मुझ से ये पूछा.

‘‘हम यहां इसीलिए तो आए हैं,’’ उन का सवाल सुन कर मेरे मन में अजीब सी उलझन के भाव उभरे.

‘‘हां, और अब तुम मेरी एक प्रार्थना पर ध्यान दो प्लीज. आगेआगे जो घटेगा, उसे ले

कर तुम्हारे मन में कई तरह की भावनाएं और सवाल उभरेंगे. तुम कृपा कर के उन्हें अपने मन

में ही रखना.’’

‘‘आप ऐसी अजीब सी बंदिश क्यों लगा रहे हैं मुझ पर?’’

‘‘क्योंकि कुछ सवालों के जवाब दिए नहीं जा सकते. शब्दों से मनोभावनाओं को व्यक्त करना हमेशा संभव नहीं होता है. उन्हें व्यक्त करने का प्रयास पीड़ादायक होता है और सुनने वाला कहीं अर्थ का अनर्थ लगा ले, तो स्थिति और बिगड़ जाती है, शालू.’’

‘‘मेरी सम?ा में तो आप की कोई बात नहीं आ रही है,’’ मैं परेशान हो उठी.

‘‘ध्यान रखना कि तुम्हें कोई सवाल नहीं पूछना है मु?ा से,’’ उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और औटो की तरफ चल पड़े.

औटो वाले ने 20 मिनट बाद हमें खन्ना नर्सिंगहोम की ऊंची सी इमारत तक अपनेआप पहुंचा दिया. फिर गेट पर खड़े वाचमैन ने राजेश को परिचित अंदाज में सलाम किया. रिसैप्शनिस्ट भी उन्हें पहचानती थी. उस नर्सिंगहोम के मालिक डाक्टर सुभाष ने मुझे अपना परिचय राजेश के बचपन के दोस्त के रूप में दिया. वहां की सिस्टर और आयाओं की मुसकान साफ दर्शा रही थी कि वे सब राजेश को अच्छी तरह जानतेपहचानते हैं.

मेरी जानकारी में राजेश कभी कानपुर नहीं आए थे, लेकिन इन सब बातों से मेरे लिए यह अंदाजा लगाना कठिन नहीं था कि यहां मुझ से छिपा कर वे आते रहे हैं. उन्हें अपनी कंपनी के काम से अकसर टूर पर जाना पड़ता है. मेरी जानकारी में आए बिना उन का यहां आना कोई मुश्किल काम न था.

‘‘मु?ा से क्यों छिपाते रहे हो आप यहां अपना आना?’’ मैं राजेश से यह सवाल पूछना चाहती थी, पर उन्होंने तो पहले ही कोई सवाल पूछने पर बंदिश लगा दी थी.

मु?ो डाक्टर सुभाष के पास छोड़ कर राजेश बिना कुछ कहे कक्ष से बाहर चले गए. डाक्टर साहब ने मेरे लिए चाय मंगवाई और फिर मुझ से बातें करने लगे.

‘‘राजेश को मैं सालों से जानता हूं, पर वे ऐसा हीरा इंसान हैं, इस का अंदाजा मुझे पिछले

1 साल में ही हुआ, भाभीजी,’’ उन की आंखों

में अपने दोस्त के लिए गहरे सम्मान के भाव मौजूद थे.

मेरी सम?ा में नहीं आया कि वे क्यों राजेश को ‘हीरा’ कह रहे हैं, सो मैं खामोश

रही. वैसे मैं सारे मामले को समझने के लिए बड़ी उत्सुकता से उन के आगे बोलने का इंतजार कर रही थी.

‘‘आजकल कौन किसी के काम आता है, भाभीजी. सचमुच अपना राजेश अनूठा इंसान है. जरूर आप ने ही उसे इतना ज्यादा बदल दिया है,’’ मेरी प्रशंसा कर वे हंस पड़े तो मुझे भी मुसकराना पड़ा.

‘‘राजेश वंदना के इलाज का सारा खर्चा उठा कर बड़ी इंसानियत का काम रह रहा है. मैं भी जितनी रियायत कर सकता हूं, कर रहा हूं, पर फिर भी दवाइयां महंगी होती हैं. आप की सहेली के इलाज पर डेढ़दो लाख का खर्चा तो जरूर हो चुका होगा आप लोगों का. यहां का हर कर्मचारी और डाक्टर राजेश को बड़ी इज्जत की नजरों से देखता है, भाभीजी.’’

यह दर्शाए बिना कि मैं इस सारी जानकारी से अनजान हूं, मैं ने वार्त्तालाप को आगे बढ़ाने के लिए पूछा, ‘‘अब वंदना की तबीयत कैसी है?’’

‘‘ठीक नहीं है, भाभीजी. जो कुछ हो सकता है, हम कर रहे हैं, पर ज्यादा लंबी गाड़ी नहीं खिंचेगी उस की.’’

‘‘ऐसा मत कहिए, प्लीज,’’ मेरी आंखों से आंसू बह चले.

‘‘मैं आप को  झूठी तसल्ली नहीं दूंगा. भाभीजी. अस्थमा ने उस के फेफड़ों को इतना कमजोर कर दिया है कि अब उस का हृदय भी फेल होने लगा है. उस ने बहुत कष्ट भोग लिया है. अब उसे छुटकारा मिल ही जाना चाहिए.’’

‘‘मुझे उस से मिलवा दीजिए, प्लीज.’’

डाक्टर सुभाष के आदेश पर एक वार्डबौय मुझे वंदना के कमरे तक छोड़ गया. मैं अंदर प्रवेश करती उस से पहले ही राजेश बाहर आए.

‘‘जाओ, मिल लो अपनी सहेली से,’’ उन्होंने थके से स्वर में मुझ से कहा और फिर मेरा माथा बड़े भावुक से अंदाज में चूम कर वहां से चले गए.

यह कैसा लोकतंत्र

हमारे नेता एकता का पाठ बहुत पढ़ाते हैं. 4 अप्रैल को नरेंद्र मोदी ने तमिलनाडु के लोगों के काशी समागम आने पर कहा कि इस आयोजन से राष्ट्र की एकता को मजबूती मिलेगी.

सरदार पटेल की मूर्ति पर जा कर मोदी एकता दिवस परेड में शामिल हुए.

रमजान के अवसर पर संदेश देते हुए मोदी ने कहा कि यह पवित्र माह समाज में एकता और सौहार्द में वृद्धि करे.

यह एकता है क्या बला जिस की चर्चा नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में तो करते हैं पर देश में कहीं नहीं दिखती? हर रोज विपक्षी पार्टियों को तोड़ना क्या एकता के सिद्धांत की पूजा करना है?

नेता अगर किसी पार्टी से परेशान हैं, उन के मतभेद हैं तो वे घर जा कर चुपचाप बैठ जाएं पर यदि वे सुग्रीव या विभीषण की तरह अपने राजाओं को धोखा दे कर विरोधी के साथ मिलें तो क्या उसे एकता के सिद्धांत को मजबूत करना कहा जाएगा?

एकता का मतलब असहमत न होना नहीं होता. असहमत होते हुए भी कुल मिला कर एक घर, कंपनी पार्टनरशिप, संस्था, दल या सरकार में साथ रहना ऐक्शन के सिद्धांत को मजबूत करता है पर नाराज हो कर जहां हैं उसे तोड़ देना या अपने से असहमत जने को निकाल देना या फिर दूसरे पक्ष के उस जने को अपने से मिला लेना जो पहले असहमत था, कैसे एकता ला सकता है?

आज देश एक है, टुकड़ेटुकड़े नहीं हो रहा तो इसलिए कि ऐतिहासिक घटनाएं ऐसी हुईं कि एक भूभाग के लोग एक ही शासन के नीचे आ गए और अब चाहें तो भी वे अलग नहीं हो सकते. हालांकि  हाल ही में सोवियत संघ का विघटन और उस से पहले पाकिस्तान और बंगलादेश का टूटना या यूगोस्लाविया का कई देशों में बंटना हुआ था पर अब जहां भी जिस भूभाग पर लोग एक केंद्रीय शक्ति के अधीन रह रहे हैं, वहां एकता बनी हुई है क्योंकि इसी में आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा है.

एकता के पीछे न कोई धर्म है, न मान्यता, न विश्वास. एकता आज केवल ऐक्सीडैंटों का नतीजा है पर इसे तोड़ना हर देश के लिए संकट देने वाला होगा. यह अफसोस है कि जब देश को एकता का पाठ पढ़ाने वाले नेता ही खुद अपने कामों से धर्म, भाषा, जाति के सवाल इस तरह उठाने लगते हैं कि एकता के तारे टूटते से नजर आने लगें.

आज नेताओं की ओर से भाषणों के अलावा और कोई ऐसा प्रयास नजर नहीं आ रहा कि देश के लोग एक होते नजर आएं. अभी तमिलनाडु में बिहारियों के खिलाफ  झूठे समाचार फैलाए गए तो एकता की दुहाई देने वाली सरकारों ने कुछ नहीं किया. हिंदू राष्ट्र का नारा लगाने वाले इन भगवा स्वामियों को कुछ नहीं कहा जा रहा जो गैरहिंदुओं को अलग मानने की खुली वकालत कर रहे हैं.

जाति और धर्म के नाम पर हो रहे भेदभाव का विरोध करने वालों और उन के उदाहरणों को सामने वालों पर एकता को भंग करने का  झूठा आरोप अवश्य लगाया जा रहा है. एकता का सिद्धांत घरों में चले, पार्टनरशिप धर्मों में चले, कंपनियों में चले, इस ओर कहीं कुछ नहीं किया जा रहा.

हैपेटाइटिस से बचने के लिए क्या-क्या कदम उठाए जा सकते हैं?

सवाल

मेरे पति को हैपेटाइटिस बी हो चुका है. मेरे 2 बच्चे हैं. उन्हें हैपेटाइटिस की चपेट में आने से बचाने के लिए क्याक्या कदम उठाए जा सकते हैं?

जवाब

हैपेटाइटिस वायरस के कारण होने वाला संक्रमण है. हैपेटाइटिस ए और बी के लिए वैक्सीन है. विशेषज्ञ सी, डी और ई के लिए प्रभावी वैक्सीन विकसित कर रहे हैं. वैक्सीन लगवाने के अलावा आप अपने बच्चों को हेपेटाइटिस से बचाने के लिए कुछ बातों का ध्यान भी रखें जैसे साफसफाई का ध्यान रखें. उन्हें हाथ धोने के महत्त्व को समझाएं. उन्हें ताजा और स्वच्छ भोजन तथा साफ पानी पीने की आदत डालें.

सवाल

मैं 46 वर्षीय घरेलू महिला हूं. मेरे भाई को लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत है. मैं उसे अपना लिवर दान करना चाहती हूं. ऐसा करने से मेरे स्वास्थ्य और जीवन पर तो कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा?

 जवाब

लिवर ट्रांसप्लांट के लिए जीवितदाता से लिवर का केवल एक भाग ही लिया जाता है पूरा लिवर नहीं. किसी भी इंसान को जीवित रहने के लिए 25त्न लिवर ही काफी है. हम 75त्न लिवर निकाल सकते हैं. लिवर का जितना भाग निकाला जाता है वह 6 सप्ताह में फिर से विकसित हो कर सामान्य आकार ले लेता है. लिवर दान करने के लिए दाता का शारीरिक और मानसिक रूप से फिट होना बहुत जरूरी है. दाता से लिवर लेने के पहले सारे टैस्ट किए जाते हैं कि लिवर लेने के बाद वह फिर से विकसित होगा या नहीं. सारे टैस्ट पौजिटिव आने के बाद ही दाता से लिवर लिया जाता है.

-डा. संजय गोजा

प्रोग्राम डाइरैक्टर ऐंड क्लीनिकल लीड-लिवर ट्रांसप्लांटएचपीबी सर्जरी ऐंड रोबोटिक लिवर सर्जरीनारायणा हौस्पिटलगुरुग्राम. द्य

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जानिए किस कारण ब्रेस्ट साइज में फर्क आता है

महिलाओं के लिए उनकी बॉडी शेप बहुत अधिक मायने रखती है. ऐसे में उनके ब्रेस्ट उनकी खूबसूरती को और बढ़ा देते हैं. कई महिलाएं होती हैं जिनकी ब्रेस्ट आकर्षक और सुडौल होते हैं उनका फिगर अच्छा माना जाता है. ऐसे में सभी महिलाएं अपने फिगर को मेंटेन करने के लिए ब्रेस्ट साइज का ध्यान रखती है

हर महिला के ब्रेस्ट का आकार, बनावट, रंग या विशेषताएं दूसरी महिलाओं से अलग होता है. दूसरी महिलाओं से आपका ब्रेस्ट साइज का कम या बड़ा होना नॉर्मल हो सकता है लेकिन अगर आपकी दोनों ब्रैस्ट एक दूसरे से अलग हैं तो क्या यह नॉर्मल है.

क्या एक ब्रेस्ट दूसरी ब्रेस्ट से बड़ा हो सकता है.

डॉक्टर रोहन खंडेलवाल ,ब्रेस्ट कैंसर स्पेशलिस्ट, सीके बिरला हॉस्पिटल गुरुग्राम के मुताबिक  एक ब्रेस्ट का आकार दूसरे से अलग हो सकता है और यह सामान्य बात है. अगर यह नॉर्मल है तो कब यह चिंता का विषय बन सकता है और ऐसा होने के क्या कारण हो सकते हैं, इसके बारे में जानना जरूरी है जो इस प्रकार हैं

  1. अनुवांशिकी-  एक ब्रेस्ट का दूसरे से अलग होने का कारण आपके जीन के कारण भी हो सकता है. अगर आपकी मां या दादी के ब्रेस्ट में भी यही समस्या है तो आप भी इस समस्या का सामना कर सकते हैं.

2. वजन के कारण- यह वजन के कारण भी हो सकता है. जब आपका वजन बढ़ता है या घटता है तो आपके पूरे शरीर में फैट का जमा होना या घटना शरीर में समान रूप से नहीं होता. ऐसे ही ब्रेस्ट के साथ भी हो सकता है.

3. अगर आप प्रेग्नेंट है तो आपके ब्रेस्ट में असमानता हो सकती है. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आपका शरीर ब्रेस्टफीडिंग के लिए तैयार हो रहा होता है.

4. मेडिकल कंडीशन- ब्रेस्ट के सामान होने के लिए मेडिकल कंडीशन भी हो सकती है. रीड की वक्रता या आपकी ब्रेस्ट में विकृति शामिल होने के कारण भी ऐसा हो सकता है लेकिन यह कारण काफी कम देखने को मिलता है.

5. ब्रेस्ट साइज और ब्रेस्ट कैंसर- अगर आपको ब्रेस्ट साइंस में बदलाव देखने को मिलता है तो ब्रेस्ट कैंसर भी हो सकता है लेकिन ब्रेस्ट साइज और ब्रेस्ट कैंसर के बीच का संबंध गलत भी माना गया है इसलिए इसे और गहराई तक जानने के लिए इस पर शोध की आवश्यकता है.

कब रखें सावधानी

ब्रेस्ट का असमान होना आम बात हो सकती है लेकिन आप लापरवाही ना बरतें अगर आप अपनी ब्रेस्ट में अचानक बदलाव देखते हैं तो अवश्य ध्यान दें. यह कई बार चिंता का कारण हो सकता है. अगर आपके ब्रेस्ट के आकार में परिवर्तन अन्य लक्षणों के साथ आता है जैसे कि त्वचा का पीछे होना, मोटा होना या ब्रेस्ट के रंग में बदलाव होना. अगर ऐसे कुछ लक्षण दिखाई देते हैं तो डॉक्टर से जरूर परामर्श करें क्योंकि यह लक्षण ट्यूमर से जुड़े हो सकते हैं.

सोने के वरक के पीछे छिपा भेड़िया (भाग-2)

सारिका का दिल धड़क सा उठा. उस ने एकदम से स्वीटी को आवाज दी, तो मोहित ने अचकचा कर उसे एकदम छोड़ दिया. उस 12 साल की कमसिन लड़की को समझ ही नहीं आया कि उस के अंकल को अचानक क्या हुआ.

‘‘तुम्हें दीदी बुला रही हैं,’’ कह कर सारिका ने एक नजर मोहित पर डाली. वे कुछ घबराए से थे, जैसे चोरी करते पकड़े गए हों.

पर खाने के समय सारिका ने ध्यान दिया कि मोहित सामान्य ढंग से ही बात कर रहे थे, जबकि स्वीटी अंकलअंकल कहती उन के आगेपीछे घूम रही थी. मोहित के चेहरे पर कोई भाव नहीं था. सारिका को अपनी सोच पर शर्मिंदगी सी होने लगी थी.

धीरेधीरे मोहित की बातों का जादू सारिका के पूरे परिवार पर चल गया. शब्दों की मिठास और अपनेपन से हर कोई उन से प्रभावित हो उठता. मां तो मोहित पर निछावर थीं. उन्हें लगता था कि उन का दामाद नखरों और अकड़ से दूर बेटे जैसा है और सारिका की बहन निहारिका तो उन के आगेपीछे ही घूमती रहती. मोहित निहारिका के लिए आइसक्रीम, चौकलेट, बर्गर जैसी ढेरों चीजें ले जाते तो वह खिल उठती. दोनों जीजासाली की खूब छेड़छाड़ चलती. सारिका खुश थी कि मोहित उस के परिवार को अपना मानते हैं और खूब घुलमिल गए हैं.

पर कुछ ही समय बीता था कि मोहित की सचाई सारिका के सामने खुलने लगी. वे जबान से जितने मीठे थे, उन की सोच उतनी ही जहरीली थी. औरत उन के लिए ऐसा खिलौना थी, जो मर्दों के खेलने के लिए बनाई गई थी. उन के दिल में रिश्तों की कोई इज्जत नहीं थी. उन की मां की लापरवाही के कारण उन के पिता के मुंह से निकले अपशब्दों ने इस रिश्ते की इज्जत भी खत्म कर दी थी. फिर उन की कोई बहन भी नहीं थी. नौकरों की संगत और आजाद माहौल ने उन की सोच को गलत दिशा दे दी थी.

एक बार किसी गर्भवती स्त्री को देख उन्होंने इतना भद्दा मजाक किया कि सारिका शर्म से गड़ गई. पर उस के बाद तो जैसे मोहित की सारी झिझक खत्म हो गई. वे राह चलती लड़कियों व फिल्मी हीरोइनों पर ऐसीऐसी बातें कहते कि सारिका का खून खौल उठता, उस की नाराजगी देख कर वे बात को मजाक में टाल देते. मोहित को देख कर कोई भी यह अंदाजा नहीं लगा सकता था कि ऊपर से इतना शानदार व्यक्तित्व रखने वाला इंसान अंदर से इतनी घटिया सोच रखने वाला है. लेकिन सारिका जानती थी कि औरतों से बाहरी तौर पर बहुत सलीके से बात करने वाला यह इंसान जब सारिका से बात करने वाली महिलाओं को छिपछिप कर घूरता है, तो उस की निगाहों में क्या होता है.

वह नहीं चाहती कि ऐसी अप्रिय स्थिति कभी भूले से भी किसी के सामने आए. इसीलिए वह महल्लेपड़ोस की औरतों से ज्यादा मतलब नहीं रखना चाहती थी. न खुद किसी के घर जाती थी, न किसी का आना पसंद करती थी और लोग उसे शक्की, घमंडी व बदमिजाज कहने लगे थे.

सारिका मन से तो उदास रहती ही पर कुछ दिनों से उस का तन भी शिथिल सा होने लगा था. आखिर एक दिन चक्कर खा कर गिर ही गई, तो मोहित उसे डाक्टर के पास ले गए. चैकअप के बाद डाक्टर ने खुशखबरी होने की बधाई दी तो मोहित खुश हो गए और उस के नाजनखरे उठाने लगे. यह मत करो, वह मत करना, वजन मत उठाना जैसी ढेरों बातें. कभीकभी सारिका झुंझला भी जाती पर मोहित उस का जरूरत से ज्यादा ही खयाल रखते. लेकिन सारिका के मन में मोहित के लिए जहर भरता जा रहा था, क्योंकि मोहित ने उसे अपने दोस्तों के सामने आने से मना कर रखा था. उन के हिसाब से उन के दोस्त ऐसी स्त्रियों का मजाक बनाते हैं. दूसरों की पत्नियों को ऐसी गंदी नजर से देखने वाले को अब अपनी पत्नी की चिंता सताने लगी थी. पतिपत्नी के रिश्ते का कितना घिनौना रूप था उन के मन में. सारिका का मन कसैला हो उठता था.

पर धीरेधीरे सारिका की तबीयत ज्यादा खराब रहने लगी, तो मोहित ने निहारिका को घर के कामों में मदद के लिए बुला लिया. निहारिका चंचल लड़की थी. घर आते ही उस ने सारे काम संभाल लिए.

सारिका और मोहित दोनों के काम वह पूरे मन से करती थी. उस के आने से सारिका कुछ निश्चिंत सी हो गई थी. निहारिका अकेले में डरती थी इसलिए वह सारिका के पास ही सोती थी. काम कर के थक कर वह ऐसी बेसुध हो कर सोती कि उसे अपना ही होश नहीं रहता था कि उस के कपड़े कैसे अस्तव्यस्त हो रहे हैं. सारिका ही उस की चादर ठीक करती रहती.

मोहित बराबर वाले कमरे में सोते थे पर बाहर निकलने का रास्ता सारिका के कमरे में से ही था, इसलिए सारिका निहारिका का विशेष ध्यान रखती थी.

एक दिन मोहित किसी दोस्त के साथ घर आए और सारिका से बोले, ‘‘निहारिका से कहो चायनाश्ता ले आए. मेरा दोस्त आया है और हां, तुम मत आना.’’

सारिका निहारिका को बुलाने गई, तो देखा वह गहरी नींद में सो रही थी. उसे देख सारिका का स्नेह उमड़ आया. उस ने निहारिका को उठाने का इरादा छोड़ दिया और उसे धीरे से चूम कर रसोई में आ कर चाय बनाने लगी. चाय की ट्रे ले कर वह ड्राइंगरूम का दरवाजा खटखटाने जा ही रही थी कि अंदर से आती आवाज को सुन कर उस के हाथ थम गए.

‘‘हां, साली आई हुई है. इतनी खूबसूरत है कि मैं तो मदहोश होने लगता हूं. कभीकभी इतने करीब होती है कि सांसें रुकने लगती हैं. कयामत है यार वह भी.’’

सारिका के हाथ कांप गए, उस के कानों में धमाके होने लगे. यह आवाज तो वह लाखों में पहचान सकती थी. यह आवाज निहारिका के प्यारे जीजू की थी, जो उन्हें अपने बड़े भाई की तरह मानती थी और मोहित भी उसे बच्ची, गुडि़या कह कर बात करते थे. मोहित की स्त्रीजाति के प्रति घटिया सोच को सारिका समझती थी, लेकिन उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि अपनों के प्रति भी वे ऐसी ही सोच रखते हैं. यह उन की घटिया सोच का हद से गुजरना था.

‘‘क्या वह सच में बहुत हसीन है?’’ दोस्त पूछ रहा था.

‘‘हां, कच्ची कली है,’’ मोहित आह भर रहा था.

‘‘वाह यार, सामने अप्सरा है और तू तरस रहा है,’’ दोस्त बेहूदगी से हंस रहा था.

‘‘नहीं यार, मैं ऐसा कुछ नहीं कर सकता. वैसे भी वह अभी बहुत छोटी है,’’ मोहित जैसे अपनी मजबूरी पर दुखी था.

सारिका के तनमन में जैसे अंगारे सुलग उठे थे. भ्रम के सारे शीशे चूरचूर हो गए थे. वह अपने बैडरूम में आ कर पलंग पर ढह गई. उस की नजर सोती हुई मासूम बहन पर पड़ी, जो शायद सपने में भी रिश्तों के सुनहरे फ्रेम में कैद उस शैतान की असली सूरत कभी नहीं देख सकती थी. सारिका की आंखों से झरझर आंसू बह रहे थे. शर्मिंदगी से सिर झुका था और वे सारी शर्मनाक बातें उस के दिमाग पर हथौड़े की तरह चोट कर रही थीं. उसे अपना होश नहीं रहा.

‘‘क्या हुआ, क्या हुआ? आंखें खोलो,’’ मोहित उस का कंधा पकड़े हुए थे. सारिका ने आंखें खोलीं तो मोहित को देख कर उसे लगा जैसे उस के सामने भेडि़या अपनी लाल जबान बाहर निकाले लार टपकाते हुए खड़ा है. उस के मुंह से जोर की चीख निकली और फिर वह बेहोश हो गई. न जाने कितनी देर में उसे होश आया. निहारिका उस के पास ही बैठी थी. उस की आंखों में आंसू भरे थे. सारिका ने मुश्किल से खुद को संभाला. उस का सिर अभी भी दर्द से फटा जा रहा था.

Summer Special घर पर होटल जैसी बनाएं दही सेव की सब्जी

आज हम बनाने जा रहे है एकदम आसानी से बनने वाली ये फूड रेसिपी , चलिए आज बनाते है दही सेव की सब्जी और चिली न्यूट्रिला

दही सेव की सब्जी

सामग्री

  1. 1 कप दही द्य 1/2 छोटा चम्मच हल्दी
  2. 1/2 छोटा चम्मच देगी मिर्च
  3. 1 हरीमिर्च बारीक कटी
  4. एकचौथाई छोटा चम्मच गरममसाला
  5. 1/2 छोटा चम्मच जीरा  द्य 1/2 छोटा चम्मच राई
  6. थोड़े से करीपत्ते द्य एकचौथाई छोटा चम्मच हींग
  7. एकचौथाई कप मोटे सेव द्य 1 छोटा चम्मच तेल
  8. नमक स्वादानुसार.

विधि

एक पैन में तेल गरम कर जीरा, राई और करीपत्ते डाल कर भूनें. अब हींग मिलाएं और खुशबू आने तक भूनें. फिर सारे मसाले डालें. फेंटा दही डालें और लगातार चलाते हुए 2 मिनट तक पकाएं. सेव मिला कर आंच बंद कर दें. धनियापत्ती से सजा कर गरमगरम परोसें.

अचारी टिंडे

सामग्री

  1.  500 ग्राम टिंडे द्य 1 छोटा चम्मच मेथी दाना
  2. 1 छोटा चम्मच कलौंजी द्य 1 छोटा चम्मच सरसों
  3. 1 छोटा चम्मच जीरा  द्य एकचौथाई चम्मच हींग
  4. 1/2 छोटा चम्मच सौंफ द्य 1/2 छोटा चम्मच हल्दी
  5. 2-3 हरीमिर्चें द्य 1 छोटा चम्मच देगी मिर्च
  6. 3-4 टमाटरों की प्यूरी द्य 2 प्याज की प्यूरी
  7. 1 बड़ा चम्मच साबूत गरममसाला द्य 5-6 कलियां लहसुन
  8. जरूरतानुसार तेल द्य नमक स्वादानुसार.

विधि

टमाटर, प्याज, लहसुन, हरीमिर्च और साबूत मसाले को एक कुकर में डाल 1/2 कप पानी डालें और कुकर का ढक्कन बंद कर के 3-4 सीटियां आने तक पका लें. ठंडा होने पर इसे पीस कर एक ओर रख दें. एक पैन में तेल गरम कर मेथी दाना, सरसों, राई, जीरा, सौंफ  और हींग डाल कर कुछ देर बाद प्याज व टमाटर की प्यूरी डाल अच्छी तरह भूनें. फिर सूखे मसाले मिलाएं और कुछ देर फिर पकाएं. टिंडों को छील कर बीच में आरपार चीरा लगा लें. ग्रेवी पैन के किनारे छोड़ने लगे तो इस में 1/2 कप पानी मिला टिंडे डाल कर कुछ देर ढक कर टिंडों के गलने तक पकाएं.

चिली न्यूट्रिला

सामग्री

  1.  1/2 कप सोयाबीन की बडि़यां
  2. 1 शिमलामिर्च द्य 1 प्याज
  3. 1 छोटा चम्मच अदरकलहसुन व हरीमिर्च का पेस्ट
  4. 1/2 पैकेट चिली पनीर मसाला द्य 1 टमाटर
  5. 1 बड़ा चम्मच तेल द्य 1/2 कप दूध
  6. नमक स्वादानुसार.

विधि

न्यूट्रिला को कुछ देर गरम पानी में भिगोए रखने के बाद अच्छी तरह निचोड़ कर रख लें. एक पैन में तेल गरम कर अदरक पेस्ट डाल कर भूनें. प्याज के मोटे टुकड़े काट कर पैन में डालें. कुछ नर्म होने तक भूनें. टमाटर के मोटे टुकड़े काट कर मिलाएं. जरा सा गलने तक पकाएं. सोया चंक मिला कर कुछ देर भूनें. चिली पनीर मसाला को 1 बड़े चम्मच पानी में मिला कर लगातार चलाते हुए सब्जी में डाल दें. इस में नमक मिलाएं. दूध डाल कर सब्जी को कुछ देर ढक कर पकाएं.

जब बीवी करे बेवफाई,तो कैसे डील करें

ऐक्स्ट्रा मैरिटल डेटिंग ऐप ग्लीडेन के अनुसार, भारत में भी अब लोग खुल कर एडल्ट्री के अवसर ढूंढ़ते हुए उन की साइटों पर आते हैं और ऐसी कई साइटें जिन से आप चाहें तो कोई शादीशुदा या गैर शादीशुदा आदमी औरतों से जुड़ सकता है. बेवफाई न पहले कभी कोई अजूबा थी न आज है. ‘साहब बीवी गुलाम’ जैसी फिल्म में जमींदार घराने मे शादी हुई पत्नी पर बेवफाई का शक करते हुए पति ने उसे मार डाला था जबकि खुद वह दूसरी औरतों के पास खुलेआम जा रहा था.

मल्टीनैशनल कंपनी में काम करने वाला नीरज अपनी पत्नी से परेशान है. उसे लगता है कि शादी के 7 साल बाद उस की पत्नी का किसी औफिस अधिकारी से संबंध है. वह उसे पूछने से भी डरता है क्योंकि उसे पूरी तरह से यकीन नहीं. पत्नी उस से अच्छा कमाती है. कई बार वह मोबाइल की फोन की जांच करने या मैसेज चेक करना चाहता था. किया भी पर उसे पता नहीं चल पाया. करीब 2 साल से यह सब चल रहा है. आजकल वह उस से बातबात पर ?ागड़ता है. सोसायटी के लोग इस का मजा उठाते हैं. कानाफूसी करते हैं. बेटी नीरा उन दोनों की लड़ाई?ागड़े से डर कर पास के कमरे से ?ांकती है. कई बार नीरज उसे छोड़ देना चाहता है पर बेटी और पैसे की बात याद कर चुप रहता है. वह अपनी बात अपने परिवार वालों से कह चुका है. परिवार वाले कहते हैं कि उसे ही सोचना है कि वह क्या करे.

ले डूबता है गुस्सा

इस तरह की समस्या शहरों में आम है. यहां पतिपत्नी सभी काम करते हैं क्योंकि यहां फ्लैट खरीदना और आज की जीवनशैली से तालमेल बैठाना बिना दोनों के काम किए संभव नहीं होता. ऐसे में अगर पत्नी पूरे दिन औफिस में बिताती है और किसी से कुछ संबंध बन भी जाए तो पति का इसे सहन करना नामुमकिन हो जाता है. कई पति तो मारपीट करते हैं कुछ अपने पति की हत्या कर देते हैं. बाद में पता चलता है कि बात उतनी गंभीर नहीं थी जितना कि उन्होंने सोचा था. लेकिन आवेश में आ कर गलत काम हो जाने के बाद फिर से उसे वापस तो नहीं लाया जा सकता. कई बार उलटा होता है और बेवफा पत्नी ही पति की हत्या कर देती है.

गंभीर नतीजे

एक रिपोर्ट के अनुसार लखनऊ क्षेत्र में सितंबर, 2022 में पत्नी ने प्रेमी के साथ मिल कर पति को मार डाला. उस की दुर्घटना हुई यह दिखाने के लिए पहले उस की गला घोंट कर हत्या की गई और फिर शव को गाड़ी से रौंद दिया गया. पुलिस ने खोजबीन कर के पत्नी और उस के प्रेमी को पकड़ लिया.

इसी तरह पिछले दिनों गाजियाबाद में पति ने अपनी पत्नी को प्रेमी के साथ देख लिया तो दोनों ने गला दबा कर पति की हत्या कर दी और शव बोरे में रख कर खेत में फेंक दिया. बाद में दोनों शव मिलने पर जांच करने पर पकड़े गए.

नैतिकता को परख लें

ऐसे में जरूरत होती है कि कुछ कदम उठाने के पहले नैतिकता को परख लें. इस विषय पर एक प्रसिद्ध लेखिका कहती हैं कि कुदरत ने महिला को हमेशा जन्म से ऐसे संस्कार दिए हैं कि उसे हमेशा सहना पड़ता है. इतिहास इस बात का गवाह है कि आज से 40 साल पहले तो महिलाएं इसे सहना शब्द कहती नहीं थी. उसे वे फर्ज मानती थी कि पति का किसी महिला के साथ अगर संबंध हो तो यह उन का अधिकार है और औरतें ऐसे पति को सहना फर्ज मानती थीं.

20 साल पहले से औरतों ने इसे सहना माना है. महिलाएं अगर विवाह के बाद किसी पुरुष से संबंध बनाती भी हैं तो ये जरूरी नहीं कि वह केवल दैहिक सुख ही हो. कई बार परिवार से उपेक्षित हो कर महिलाओं को मानसिक सहयोग की जरूरत होती है जो उन्हें पति से नहीं मिल पाता फलस्वरूप वे बाहर जिस किसी से भी अपनी बात शेयर कर पाती है उसे ही हमदर्द मानती है. कई बार कुछ महिलाएं एक पुरुष से संतुष्टि प्राप्त नहीं कर पातीं इसलिए पराए पुरुष का सहारा लेती हैं. मगर इस का अनुपात बहुत कम है. इन्हें वेश्या की संज्ञा नहीं दी जा सकती.

रिश्ते को निभाना जरूरी

आज नैतिकता के माने बदले हैं. अगर कोई स्त्री बाहर किसी पुरुष से संबंध बनाती भी है तो आखिर क्यों? महिलाएं हमेशा से घर परिवार की जिम्मेदारी लेती आई है किसी रिश्ते को वे सहजता से तोड़ना नहीं चाहतीं. अगर किसी पुरुष को अपनी पत्नी पर शक हो तो वे उसे मारपीट गालीगलौच और जगहंसाई किए बिना, कई ऐसी संस्थाएं हैं जो पुरुषों के लिए काम करती हैं उस में जा सकते हैं.

आमतौर पर अगर कोई पुरुष बाहर किसी महिला से संबंध बनाता है तो उस का ठीकरा भी महिला के सिर ही फोड़ा जाता है. लोग कहते हैं कि उस का पति बाहर क्यों जा रहा है? शायद पत्नी में कोई कमी होगी. पति को कभी धोखेबाज की संज्ञा नहीं दी जाती. उस की फितरत पर

परदा डाल दिया जाता है. भारतीय संस्कृति में एक तरफ तो महिला को देवी की संज्ञा दी जाती है जबकि दूसरी तरफ उसे मानवीय हक तक नहीं दिया जाता.

शांति से समाधान सोचें

यह सच है कि पुरुष कईर् बार पति की सहेलियों से प्रेम कर बैठते हैं. अगर कोई आसपास विधवा है तो उस पर डोरे डालते नजर आते हैं. इस में कोई बुराई किसी को नजर नहीं आती. लेकिन यही काम अगर पत्नी करे तो उसे मारपीट और गालीगलौच के साथ घर से निकाल दिया जाता है या फिर उस की हत्या तक कर दी जाती है.

अगर कोई पत्नी किसी से प्रेम करती है तो पति को चाहिए कि वह शांति से बैठ कर उस समस्या का समाधान सोचे. कुछ बातों की परख किसी निर्णय पर पहुंचने से पहले अवश्य करें. यह ध्यान रखें कि अब कोई क्रिमीनल केस नहीं बनता.

2010 तक इंडियन पीनल कोड की धारा 407 के अनुसार किसी विवाहित से प्रेम करने पर पुरुष पर पति क्रिमिनल केस कर सकता था पर अब सुप्रीम कोर्ट ने एक लैंड मार्क जजमैंट में इसे अंसवैधानिक घोषित कर दिया. एडल्ट्री यानी बेवफाई अब सिर्फ मैट्रिमोनियल औफैंस है और इस के आधार पर तलाक लिया जा सकता है.

धर्म से दूर रहें

पत्नी का किसी के साथ प्रेम संबंध हो जाए तो कोई आफत नहीं है. ऐसे कई पुरुष हैं जो पत्नी के अलावा 2-3 महिलाओं से संबंध रखते हैं. मगर उन्हें कोई कुछ नहीं करता. कुछ धर्म में तो अगर आप की हैसियत है तो आप पत्नी के अलावा 2-3 बीवियां भी रख सकते हैं. ये उन्हें इजाजत है.

अगर आप में संयम है तो हो सकता है कि 2-3 दिन बाद वह फिर अपनी गलती सम?ा घर वापस आ जाए. अगर सहन नहीं होता तो तलाक लें. मुद्दा न बनाएं क्योंकि यह हमेशा से चलता रहा है और चलता रहेगा. सत्य को लोग न तो कभी पहचान पाए हैं और न ही पहचान पाएंगे. समाज और धर्म की आड़ में कभी न जाएं. यह सब निरर्थक है.

दूरी: भाग 2 – जब बेटी ने किया पिता को अस्वीकार

मेघा की आंखों के आगे उस का अतीत तैरने लगा…

कितना हंसताखेलता खुशहाल परिवार था उस का. बहुत गुमान था उसे अपनी कंप्लीट लाइफ पर. जिसे प्यार किया, उस से शादी कर ली. भरापूरा परिवार मिला, गोद में एक नन्ही परी सी बेटी आ गई. घर में धनसंपत्ति की कोई कमी नहीं थी. कंप्लीट हैप्पी फैमिली थी उस की. पर अचानक वक्त ने ऐसी करवट ली कि पल भर में सब कुछ बदल कर रख दिया.

मिहिर एक सड़क हादसे का शिकार हो गए और वह अधूरी सी रह गई. मिहिर का जाना उस के जीवन में अंधेरा कर गया था. उस की आंखों के आंसू सूखते ही नहीं थे. वह ऐसा वक्त था कि साससुर भी उसे हौसला नहीं दे सकते थे, क्योंकि जवान बेटे के गम में वे खुद ही टूट से गए थे. दोनों बीमार भी रहने लगे थे. मेघा को विधवा के रूप में देख कर और भी दर्द बढ़ जाता. पर मेघा को पलक की खातिर मजबूत बनना पड़ा. काफी कोशिश कर के उस ने एक प्राइवेट स्कूल में टीचर की जौब ढूंढ़ ली. 8-9 माह यों ही गुजर गए. वह जी रही थी पर बिना किसी उमंग के. घर वालों ने मेघा की दूसरी शादी करने के बारे में भी सोचा पर मेघा ने साफ इनकार कर दिया.

 

इसी बीच मिहिर का छोटा भाई, प्रकाश, जो होस्टल में रह कर पढ़ रहा था, पढ़ाई खत्म कर घर वापस आ गया. थोड़ी कोशिश से उस की अच्छी नौकरी भी लग गई. वह काफी चुलबुला और खुले दिमाग का था. आते ही वह पूरे घर को संभालने और मिहिर की कमी दूर करने का प्रयास करने लगा. उम्र में छोटा होने के बावजूद वह दिमाग से बेहद सम?ादार और सुलझ हुआइंसान था. काफी हद तक मिहिर जैसा था. शायद यही वजह थी कि मेघा उस की तरफ खिंचाव महसूस करती.

उधर प्रकाश के दिल में भी मेघा के लिए खास स्थान था. वह कोशिश करता कि मिहिर को याद कर मेघा की आंखों में कभी आंसू न आएं. इस लिहाज से वह हमेशा मेघा के आसपास ही रहता और उसे खुश रखने का प्रयास करता. दोनों ही युवा थे. जाहिर है एकदूसरे के प्रति शारीरिक आकर्षण पैदा होने लगा. यहां तक कि प्रकाश मेघा को दिल ही दिल में चाहने भी लगा. पर मेघा मैच्योर थी. वह अपने मन को बांधना जानती थी. वह प्रकाश तो क्या खुद को भी कभी यह एहसास नहीं होने देती कि उन के बीच ऐसा कुछ हो सकता है.

मिहिर की मृत्यु को 1 साल हो गया था. उस की बरसी का दिन था. मेघा को पुरानी बातें याद आ रही थीं. जब रहा नहीं गया तो छत पर जा कर फूटफूट कर रोने लगी. प्रकाश ने उसे छत पर जाते हुए देख लिया था. वह पीछेपीछे वहां आ गया. मेघा को रोता देख कंधे पर सहानुभूति भरा हाथ रखा और ठीक वैसे ही सिर पर हाथ फेरने लगा जैसे मिहिर फेरता था. मेघा भावातिरेक में अचानक प्रकाश के सीने से लग कर फफक पड़ी. प्रकाश ने उसे अपनी बांहों का सहारा दिया. उस एक पल में मेघा को लगा जैसे वह फिर से संपूर्ण हो उठी हो. इस एहसास को महसूस कर वह अंदर तक कांप उठी.

यह सच नहीं हो सकता… फिर ऐसा क्यों लग रहा है जैसे मिहिर ही सामने खड़ा हो? यह सवाल कौंधते ही बेचैन हो कर उस ने प्रकाश की तरफ देखा तो देखती ही रह गई. वही झाल सी गहरी आंखों में तैरता प्यार और विश्वास का समंदर… अपनत्व के हिलोरों में कैद होती सांसें… किसी जादुई एहसास के वशीभूत हो कर वह प्रकाश की बांहों में समा गई.

वह दिन मेघा की जिंदगी को फिर से बदल गया था. अब प्रकाश की ?ि?ाक भी दूर हो गई थी. वह मेघा के प्रति अपने प्रेमभाव को उजागर करने लगा. इस की खबर घर में किसी और को नहीं थी.

फिर दबीदबी सी इस चाहत को हवा तब लगी जब दोनों घर में बिलकुल अकेले थे. दरअसल, सासससुर को अचानक भतीजी को देखने जाना पड़ा जो सीढि़यों से गिर कर घायल हो गई थी और अस्पताल में भरती थी. प्रकाश वैसे तो 2 दिनों के लिए वाराणसी के लिए निकला हुआ था पर किसी कारणवश उसे जल्दी लौटना पड़ा. उस वक्त बेटी स्कूल में थी और घर पर केवल मेघा थी. दोनों ने लाख कोशिश की कि खुद को कमजोर न पड़ने दें पर जज्बातों का ऐसा सैलाब उमड़ा कि दोनों ही उस में बह गए और मर्यादा की सीमारेखा पार कर गए. जब होश आया तो मेघा को बेहद ग्लानि महसूस हुई कि यह उस ने क्या कर दिया. खुद से 10 साल छोटे देवर के साथ कैसा रिश्ता जुड़ गया है? क्या कोई उसे स्वीकार कर पाएगा?

डर और ग्लानि से वह रोने लगी तो एक बार फिर प्रकाश के समझने पर थोड़ी संयत हुई और घर के कामों में लग गई. पर उस के चेहरे पर बिछी बेचैनी की रेखाएं सासूमां से छिपी न रह सकीं. उन के पूछने पर मेघा ने बड़ी कुशलता से बात टाल दी.

धीरेधीरे वक्त गुजरता गया और प्रकाश का हौसला बढ़ता गया. उस ने तय कर लिया कि वह मेघा से शादी करेगा. एकबारगी तो मेघा यह सुन कर विचलित हो गई पर फिर उसे भी यही ठीक लगा. प्रकाश ने घर में जब यह बात कही तो बवंडर सा उठ गया.

सासससुर प्रकाश के लिए लड़की देख रहे थे. वे इस रिश्ते के लिए सहमत न थे. वे तो मेघा को मायके भेजना चाहते थे. पर हां, बच्चे पर हक जरूर जमा रहे थे. उधर मेघा के मायके वाले काफी सम?ादार निकले. उन्हें लगा कि मेघा का देवर से शादी कर लेना आर्थिक दृष्टि से मेघा के पक्ष में रहेगा वरना प्रकाश की कमाई पर तो मेघा का कोई हक नहीं होगा. नई बहू न जाने कैसी हो? वह मेघा को रहने भी दे या नहीं? सासससुर मेघा से नाता तोड़ते देर नहीं लगाएंगे. जबकि प्रकाश से शादी करने पर मेघा घर की इकलौती बहू बन जाएगी. बस उन्होंने जीतोड़ कोशिश कर इस शादी का समर्थन किया. अंतत: शादी हो गई पर बेटी पलक ने प्रकाश को पिता कहने से साफ इनकार कर दिया. वह नए पापा से कटीकटी रहती. बाकी कसर पासपड़ोस वालों और रिश्तेदारों ने पूरी कर दी. यहां तक कि दादादादी भी इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे. उन्होंने बच्ची के मन में नए पापा के लिए नफरत भरी दी. वह कभी भी प्रकाश से सीधे मुंह बात नहीं करती. यदि प्रकाश उस के लिए कुछ ले कर आता तो वह उसे हाथ तक नहीं लगाती. और आज तो जैसे पलक के मन में पल रही नफरत फट पड़ी.

मेघा पलक का यह रौद्र रूप देख कर सोच में पड़ गई थी. उसे सम?ा नहीं आ रहा था कि किसे दोष दे? प्रकाश ने उस का हमेशा साथ दिया. यदि प्रकाश न होता तो शायद वह इतनी अच्छी तरह उसे पाल न पाती. प्रकाश कहीं से भी दोषी नहीं. दोष तो परिस्थितियों का था. मिहिर के बाद कितनी बेबस और तनहा हो गई थी वह.

खेल खेल में- नीरज के प्रति शिखा का आकर्षण देख क्यों परेशान हुई अनिता?

शिखा के पास उस समय नीरज भी खड़ा था जब अनिता ने उस से कहा, ‘‘मैं ने तुम्हारी मम्मी को फोन कर के उन से इजाजत ले ली है.’’

‘‘किस बात की?’’ शिखा ने चौंक कर पूछा.

‘‘आज रात तुम मेरे घर पर रुकोगी.

कल रविवार की शाम मैं तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ आऊंगी.’’

‘‘कोई खास मौका है क्या?’’

‘‘नहीं. बस, बहुत दिनों से किसी के साथ दिल की बातें शेयर नहीं की हैं. तुम्हारे साथ जी भर कर गपशप कर लूंगी, तो मन हलका हो जाएगा. मैं लंच के बाद चली जाऊंगी. तुम शाम को सीधे मेरे घर आ जाना.’’

नीरज ने वार्त्तालाप में हिस्सा लेते हुए कहा, ‘‘अनिता, मैं शिखा को छोड़ दूंगा.’’

‘‘इस बातूनी के चक्कर में फंस कर ज्यादा लेट मत हो जाना,’’ कह कर अनिता अपनी सीट पर चली गई.

औफिस के बंद होने पर शिखा नीरज के साथ उस की मोटरसाइकिल पर अनिता के घर जाने को निकली.

‘‘कल 11 बजे पक्का आ जाना,’’ नीरज ने शिखा को अनिता के घर के बाहर उतारते

हुए कहा.

‘‘ओके,’’ शिखा ने मुसकरा कहा.

अनिता रसोई में व्यस्त थी. शिखा उन किशोर बच्चों राहुल और रिचा के साथ गपशप करने लगी. अनिता के पति दिनेश साहब घर पर उपस्थित नहीं थे. अनिता उसे बाजार ले गई. वहां एक रेडीमेड कपड़ों की दुकान में घुस गई. अनिता और दुकान का मालिक एकदूसरे को नाम ले कर संबोधित कर रहे थे. इस से शिखा ने अंदाजा लगाया कि दोनों पुराने परिचित हैं.

‘‘दीपक, अपनी इस सहेली को मुझे एक बढि़या टीशर्ट गिफ्ट करनी है. टौप क्वालिटी की जल्दी से दिखा दो,’’ अनिता ने मुसकराते हुए दुकान के मालिक को अपनी इच्छा बताई.

 

शिखा गिफ्ट नहीं लेना चाहती थी, पर अनिता ने उस की एक न सुनी. दीपक खुद अनिता को टीशर्ट पसंद कराने के काम में दिलचस्पी ले रहा था. अंतत: उन्होंने एक लाल रंग की टीशर्ट पसंद कर ली.

शिखा के लिए टीशर्ट के अलावा अनिता ने रिचा और राहुल के लिए भी कपड़े खरीदे फिर पति के लिए नीले रंग की कमीज खरीदी.

दुकान से बाहर आते हुए शिखा ने मुड़ कर देखा तो पाया कि दीपक टकटकी बांधे उन दोनों को उदास भाव से देख रहा है. शिखा ने अनिता को छेड़ा, ‘‘मुझे तो दाल में काला नजर आया है, मैडम. क्या यह दीपक साहब आप के कभी प्रेमी रहे हैं?’’

‘‘प्रेमी नहीं, कभी अच्छे दोस्त थे… मेरे भी और मेरे पति के भी. इस विषय पर कभी बाद में विस्तार से बताऊंगी. पतिदेव घर पहुंच चुके होंगे.’’

‘‘अच्छा, यह तो बता दीजिए कि आज क्या खास दिन है?’’

‘‘घर पहुंच कर बताऊंगी,’’ कह कर अनिता ने रिकशा किया और घर आ गईं.

वे घर पहुंचीं तो दिनेश साहब उन्हें ड्राइंगरूम में बैठे मिले. शिखा को देख कर उन के होंठों पर उभरी मुसकान अनिता के हाथ में लिफाफों को देख फौरन गायब हो गई.

‘‘तुम दीपक की दुकान में क्यों घुसीं?’’ कह कर उन्होंने अनिता को आग्नेय दृष्टि से देखा.

‘‘मैं शिखा को अच्छी टीशर्ट खरीदवाना चाहती थी. दीपक की दुकान पर सब से

अच्छा सामान…’’

‘‘मेरे मना करने के बावजूद तुम्हारी हिम्मत कैसे हो गई उस की दुकान में कदम रखने की?’’ पति गुस्से से दहाड़े.

‘‘मुझ से गलती हो गई,’’ अनिता ने मुसकराते हुए अपने हाथ जोड़ दिए, ‘‘आज के दिन तो आप गुस्सा न करो.’’

‘‘आज का दिन मेरी जिंदगी का सब से मनहूस दिन है,’’ कह कर गुस्से से भरे दिनेशजी अपने कमरे में चले गए.

‘‘मैडम, जब आप को मना किया गया था तो आप क्यों गईं दीपक की दुकान पर?’’

आंखों में आंसू भर कर अनिता ने उदास लहजे में जवाब दिया, ‘‘आज मैं तुम्हें 10 साल पुरानी घटना बताती हूं जिस ने मेरे विवाहित जीवन की सुखशांति को नष्ट कर डाला. मैं कुसूरवार न होते हुए भी सजा भुगत रही हूं, शिखा.

‘‘दीपक का घर पास में ही है. खूब आनाजाना था हमारा एकदूसरे के यहां. दिनेश साहब जब टूर पर होते, तब मैं अकसर उन के यहां चली जाती थी.

‘‘दीपक मेरे साथ हंसीमजाक कर लेता था. इस का न कभी दिनेश साहब ने बुरा माना, न दीपक की पत्नी ने, क्योंकि हमारे मन में खोट नहीं था.

‘‘एक शाम जब मैं दीपक के घर पहुंची, तो वह घर में अकेला था. पत्नी अपने दोनों बच्चों को ले कर पड़ोसी के यहां जन्मदिन समारोह में शामिल होने गई थी.’’

 

अपने गालों पर ढलक आए आंसुओं को पोंछने के बाद अनिता ने आगे बताया, ‘‘दीपक अकेले में मजाक करते हुए कभीकभी रोमांटिक हो जाता था. मैं सारी बात को खेल की तरह से लेती क्योंकि मेरे मन में रत्ती भर खोट नहीं था.

‘‘दीपक ने भी कभी सभ्यता और शालीनता की सीमाओं को नहीं तोड़ा था.

‘‘दिनेश साहब टूर पर गए हुए थे. उन्हें अगले दिन लौटना था, पर वे 1 दिन पहले

लौट आए.

‘‘मेरी सास ने जानकारी दी कि मैं दीपक के घर गई हूं. वह तो सारा दिन वहीं पड़ी रहती है. ऐसी झूठी बात कह कर उन्होंने दिनेश साहब के मन में हम दोनों के प्रति शक का बीज बो दिया.

‘‘उस शाम दीपक मुझे पियक्कड़ों की बरात की घटनाएं सुना कर खूब हंसा रहा था. फिर अचानक उस ने मेरी प्रशंसा करनी शुरू कर दी. वह पहले भी ऐसा कर देता था, पर उस शाम खिड़की के पास खड़े दिनेश साहब ने सारी बातें सुन लीं.

‘‘उस शाम से उन्होंने मुझे चरित्रहीन मान लिया और दीपक से सारे संबंध तोड़ लिए. और… और… मैं अपने माथे पर लगे उस झूठे कलंक के धब्बे को आज तक धो नहीं पाई हूं, शिखा.’’

‘‘यह तो गलत बात है, मैडम. दिनेश साहब को आप की बात सुन कर अपने मन से गलतफहमी निकाल देनी चाहिए थी,’’ शिखा ने हमदर्दी जताई.

‘‘वे मुझे माफ करने को तैयार नहीं हैं. वे मेरे बड़े हो रहे बच्चों के सामने कभी भी मुझे चरित्रहीन होने का ताना दे कर बुरी तरह शर्मिंदा कर देते हैं.’’

‘‘यह तो उन की बहुत गलत बात है, मैडम.’’

‘‘मैं खुद को कोसती हूं शिखा कि मुझे खेलखेल में भी दीपक को बढ़ावा नहीं देना  चाहिए था. मेरी उस भूल ने मुझे सदा के लिए अपने पति की नजरों से गिरा दिया है.’’

‘‘जब आप को पता था कि दिनेश साहब बहुत गुस्सा होंगे, तब आप दीपक की दुकान पर क्यों गईं?’’

शिखा के इस सवाल के जवाब में अनिता खामोश रह उस की आंखों में अर्थपूर्ण अंदाज में झांकने लगी.

कुछ पल खामोश रहने के बाद शिखा सोचपूर्ण लहजे में बोली, ‘‘मुझे दिनेश साहब का गुस्सा… उन की नफरत दिखाने के लिए आप जानबूझ कर दीपक की दुकान से खरीदारी कर के लाई हैं न? मेरी आंखें खोलने के लिए आप ने यह सब किया है न?’’

‘‘हां, शिखा,’’ अनिता ने झुक कर शिखा का माथा चूम लिया, ‘‘मैं नहीं चाहती कि तुम नीरज के साथ प्रेम का खतरनाक खेल खेलते हुए मेरी तरह अपने पति की नजरों में हमेशा के लिए गिर जाओ.’’

‘‘मेरे मन में उस के प्रति कोई गलत भाव नहीं है, मैडम.’’

‘‘मैं भी दीपक के लिए ऐसा ही सोचती थी. देखो, तुम्हारा पति भी दिनेश साहब की तरह गलतफहमी का शिकार हो सकता है. तब खेलखेल में तुम भी अपने विवाहित जीवन की खुशियां खो बैठोगी.

‘‘तुम अपने पति से नाराज हो कर मायके में रह रही हो. यों दूर रहने के कारण पति के मन में पत्नी के चरित्र के प्रति शक ज्यादा आसानी से जड़ पकड़ लेता है. पति के प्यार का खतरा उठाने से बेहतर है ससुराल वालों की जलीकटी बातें और गलत व्यवहार सहना. तुम फौरन अपने पति के पास लौट जाओ, शिखा,’’ अत्यधिक भावुक हो जाने से अनिता का गला रुंध गया.

‘‘मैं लौट जाऊंगी,’’ शिखा ने दृढ़ स्वर में अपना फैसला सुनाया.

‘‘तुम्हारा कल नीरज से मिलने का कार्यक्रम है…’’

‘‘हां.’’

‘‘उस का क्या करोगी?’’

शिखा ने पर्स में से अपना मोबाइल निकाल कर उसे बंद कर कहा, ‘‘आज से यह खतरनाक खेल बिलकुल बंद. उस की झूठीसच्ची प्रशंसा अब मुझे गुमराह नहीं कर पाएगी.’’

‘‘मुझे बहुत खुशी है कि जो मैं तुम्हें समझाना चाहती थी, वह तुम ने समझ लिया,’’ अपनी उदासी को छिपा कर अनिता मुसकरा उठी.

‘‘मुझे समझाने के चक्कर में आप तो परेशानी में फंस गईं?’’ शिखा अफसोस से भर उठी.

‘‘लेकिन तुम तो बच गईं. चलो, खाना खाएं.’’

‘‘आप को शादी की सालगिरह की शुभकामनाएं और कामना करती हूं कि दिनेश साहब की गलतफहमी जल्दी दूर हो और आप उन का प्यार फिर से पा जाएं.’’

‘‘थैंक यू,’’ शिखा की नजरों से अपनी आंखों में भर आए आंसुओं को छिपाने के लिए अनिता रसोई की तरफ चल दी.

शिखा का मन उन के प्रति गहरे धन्यवाद व सहानुभूति के भाव से भर उठा था.

Father’s day 2023: ले बाबुल घर आपनो- भाग 3

कुछ दिन तक तो वे समय पर घर पहुंचते रहे थे. लेकिन क्रम टूटते ही घर में तूफान आ जाता था. एक बार तो सीमा ने हद कर दी थी. महाराज के बारबार खाने के लिए बुलाने पर उस ने खाने की मेज ही उलट कर रख दी थी, और चिल्ला कर कहा था,

‘मैं शीला चाची के यहां जा रही हूं. डाक्टर साहब के साथ शतरंज खेलूंगी. पिताजी से कह देना, जिस समय मेरा मन होगा, मैं वापस आऊंगी. मुझे वहां लेने आने की कोई जरूरत नहीं.’ और वह दनदनाती हुई चली गई थी.

जब शंभुजी को पता चला तो वे चाह कर भी उसे लेने नहीं जा सके थे. उन्हें डर था, ‘जिद्दी लड़की है, वहीं कोई नाटक न शुरू कर दे.’

12 बजे के करीब डाक्टर साहब का बेटा दीपक उसे छोड़ने आया था तो वह बिना उन्हें देखे अपने कमरे में चली गई थी. पीछेपीछे भारी कदमों से उन्हें उस के कमरे में जाना पड़ा था, ‘खाना नहीं खाओगी, बेटी?’

‘मैं ने खा लिया है,’ वह लापरवाही से बोली थी.

‘तुम डाक्टर साहब के यहां रात को क्यों गई थी?’ उन्होंने सख्ती से पूछा था.

‘आप भी तो वहां जाते हैं. वे भी हमारे घर आते हैं,’ वह भी सख्त हो गई थी.

‘वे मेरे मित्र हैं, बेटी. तुम समझती क्यों नहीं? तुम अब बड़ी हो गई हो. रात को अकेले तुम्हें…’ आगे वे बात पूरी नहीं कर सके थे.

‘मैं वहां जरूर जाऊंगी. दीपक मुझे घुमाने ले जाता है. मेरा खयाल रखता है. वह भी मेरा दोस्त है. जब आप को फुरसत नहीं मिलती तो मैं अकेली क्या करूं?’

इतना सुनते ही उन का सिर चकराने लग गया था. इन बातों का तो उन्हें पता ही नहीं था. वे तो अपने काम में ही इतने व्यस्त रहते थे कि बाहर क्या हो रहा है, कुछ जानते ही न थे. डाक्टर साहब जरूर उन्हें कभीकभी खींच कर पार्टियों में या क्लब में ले जाते थे.

फिर उन्हें यह भी जानकारी मिली कि, सीमा दीपक के साथ फिल्म देखने भी जाती है तो वे बड़े परेशान हो गए थे. पहले तो उन्हें सीमा पर गुस्सा आया था कि कभी मुझ से पूछती तक नहीं, लेकिन फिर वे स्वयं पर भी नाराज हो उठे थे, उन्होंने ही बेटी से कब, कुछ जानना चाहा था.

सीमा कुछ और सयानी हो गई थी. उन्होंने भी सोचा था, ‘दीपक अच्छा लड़का है. अगर सीमा उसे पसंद करती है तो वे उस की इस खुशी को जरूर पूरा करेंगे. सीमा के सिवा उन का है ही कौन? यह घर, यह कारोबार किसी को तो संभालना ही है. फिर दीपक तो बड़ा ही प्यारा लड़का है.’ और वे निश्ंिचत हो गए थे.

अब वे सीमा से हमेशा दीपक के बारे में पूछा करते थे. वे यह भी देख रहे थे, सीमा धीरेधीरे गंभीर होती जा रही है.

एक दिन बातोंबातों में सीमा ने कहा था, ‘पिताजी, आप क्यों नहीं किसी को अपने विश्वास में ले लेते? उसे सारा काम समझा दीजिए, तो आप का कुछ बोझ तो हलका हो ही जाएगा. आप को कितना काम करना पड़ता है.’

‘हां, बेटा, मैं भी कई दिनों से यही सोच रहा था. पहले तुम्हारे हाथ पीले कर दूं, फिर कारोबार का बोझ भी अपने ऊपर से उतार फेंकूं. अब मैं भी बहुत थक गया हूं, बेटी.’

‘आप एक चैरिटेबल ट्रस्ट क्यों नहीं बना देते? उस से जितना भी लाभ हो, गरीबों की सहायता में लगा दिया जाए. गरीबों के लिए एक अस्पताल बनवा दीजिए. एक स्कूल खुलवा दीजिए. इतने पैसों का आप क्या करेंगे?’

‘बेटी, अपना हक यों बांट देना चाहती हो,’ वे हैरानी से बोले थे.

‘मैं भी इतना पैसा क्या करूंगी. आदमी की जरूरतें तो सीमित होती हैं, और उसी में उसे खुशी होती है. इतना पैसा किस काम का जो किसी दूसरे के काम न आ सके, बैकों में पड़ापड़ा सड़ता रहे. सब बांट दीजिए, पापा.’

‘कैसी बातें करती हो, मैं ने सारी जिंदगी क्या इसी लिए खूनपसीना एक किया है कि मैं कमा कर लोगों में बांटता फिरूं. तुम नहीं जानतीं. मैं ने इसी व्यापार को बढ़ाने की खातिर क्या कुछ खोया है?’

‘मुझे सब पता है, पापा. इसी लिए तो कहती हूं, आप समेटतेसमेटते फिर कुछ न खो बैठें. एक बार बांट कर तो देखिए, आप को कितना सुख मिलता है. जो खुशी दूसरों के लिए कुछ कर के हासिल होती है, वह खुद के लिए समेट कर नहीं होती.’

‘यह तुम क्या कह रही हो?’

‘डाक्टर चाचा भी तो यही कहते हैं, पापा, देखिए न, वे गरीबों का मुफ्त इलाज करते हैं. वे हमेशा यही कहते हैं, बस, जितने की मुझे जरूरत होती है, मैं रख लेता हूं, बाकी दूसरों को दे देता हूं, ताकि मेरे साथसाथ दूसरों का भी काम चलता रहे.’

वे बेटी का मुंह देखते रह गए थे. अच्छा हुआ सीमा ने बात खोल दी, नहीं तो वे कितनी बड़ी गलती कर बैठते. नहीं, नहीं, उन्हें तो ऐसा लड़का चाहिए जो व्यापार को संभाल सके. वे इस तरह अपनी दौलत को कभी नहीं लुटाएंगे. और उन्होंने निश्चय किया था, वे अपनी तरफ से तलाश शुरू कर देंगे. यह काम जल्दी ही करना होगा.

जल्दी काम करने का नतीजा भी सीमा की नजरों से छिपा नहीं रहा. शंभुजी के औफिस की टेबल पर उस ने जब कई लड़कों के फोटो देखे तो वह सबकुछ समझ गई थी. उसी दिन वे कोलकाता जाने वाले थे. सीमा ने सबकुछ देखने के बाद केवल इतना ही कहा था, ‘पापा, आप इतनी जल्दी न करें, तो अच्छा है.’

‘तुम्हें मेरे फैसले पर कोई आपत्ति है.’

‘मेरा अपना भी तो कोई फैसला हो सकता है,’ उस ने दृढ़ता से कहा था.

‘मुझे तुम्हारे फैसले पर आपत्ति नहीं, बेटी. दीपक मुझे भी पसंद है. लेकिन मेरी भी तो कुछ खुशियां हैं, कुछ इच्छाएं हैं. तुम जानती हो, दीपक को शादी के बाद…’

‘आप पहले कोलकाता हो आइए. इस बारे में हम फिर बात करेंगे,’ उस ने उन की बात काट दी थी.

वे निश्ंिचत हो कर चले गए थे, और आज वापस आए थे. लेकिन दरवाजे पर इंतजार करती सीमा कहीं नजर नहीं आ रही थी.

वे तेजी से उस के कमरे में गए, शायद उस ने कोई मैसेज छोड़ा हो लेकिन कहीं कुछ भी नहीं था. सबकुछ व्यवस्थित था. तभी नौकर ने आ कर धीरे से कहा, ‘‘सीमा बिटिया आ गई है.’’

सीमा जब उन के सामने आ कर खड़ी हुई थी तो वे उसे अपलक देखते रह गए थे. इन 6 दिनों में सीमा को क्या हो गया है. लगता है, जैसे इतने दिनों तक सोई ही न हो, ‘‘कहां गई थी, बेटी?’’

‘‘रमेशजी के यहां, मां की तबीयत ठीक नहीं थी. उन्होंने बुलवा भेजा था.’’

‘‘मां…कौन मां?’’ वे हैरान थे.

‘‘रेखा चाची, यानी शरदजी की मां. शरदजी की भी तबीयत ठीक नहीं है. मैं यही बताने आई थी, कहीं आप चिंता न करने लगें. मुझे अभी फिर वापस जाना है. उन की देखभाल करने वाला कोई नहीं. दोनों बीमार हैं. शायद मुझे रात को भी वहीं रहना पड़े.’’

‘‘उन का नौकर उन की…’’ वे बात पूरी नहीं कर सके थे.

‘‘जितनी सेवा कोई अपना कर सकता है, उतनी सेवा क्या नौकर करेगा? मेरा मतलब तो आप समझ गए न, मैं ने कहा था न, पिताजी मेरा भी कोई फैसला हो सकता है.’’

‘‘और डाक्टर का बेटा दीपक?’’ वे हैरान थे.

‘‘वह तो बचपन की पगडंडियों पर लुकाछिपी खेलने वाला दोस्त था, जो जवानी के मोड़ पर आ कर आप की दौलत से भी आंखमिचौली खेलना चाहता था. मुझे जीवनसाथी की जरूरत है, पापा, दौलत पर पहरा देने वाले पहरेदार की नहीं. मैं जानती हूं, आप को मेरी बातों से दुख हो रहा है. लेकिन यह भी तो सोचिए, लड़की के जीवन में एक वह भी समय आता है जब वह बाबुल का घर छोड़ कर पति के घर जाने के लिए आतुर हो जाती है. इसी में उसे जिंदगी का सुख मिलता है. मांबाप की भी तो यही खुशी होती है कि लड़की अपने घर में सुखी रहे. आप शरद को भी बचपन से जानते हैं, आप भी अपना फैसला बदल डालिए, इसी में मेरी खुशी है और आप का सुख,’’ और वह जाने को तैयार हो गई.

‘‘रुक जाओ, बेटी, मुझे तुम्हारा फैसला मंजूर है. तुम ने तो एकसाथ मेरे दोदो बोझ हलके कर दिए हैं. बेटी का बोझ और धन का बोझ. इसे भी अपनी मरजी से ठिकाने लगा देना, बेटी, जिस से कइयों को खुशियां मिलती रहें,’’ कहतेकहते उन की आंखें नम हो गई थीं.

‘‘पापा,’’ वह भाग कर मुद्दत से प्यासे पापा के हृदय से लग कर रो पड़ी थी.

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