उसके लिए: अपूर्वा ने प्रणव को क्या जवाब दिया?

वह मुंह फेर कर अपूर्वा के सामने खड़ा था. अपूर्वा लाइबे्ररी में सैल्फ से अपनी पसंद की किताबें छांट रही थी. पैरों की आवाज से वह जान गई थी कि प्रणव है. तिरछी नजर से देख कर भी अपूर्वा ने अनदेखा किया. सपने में यह न सोचा था कि दिलफेंक आशिक किसी दिन इस तरह से आ सकता है. दोनों का यह प्यार परवान तो नहीं चढ़ा, पर दिलफेंकों के लिए जलन का सबब रहा. प्रणव तो अपूर्वा की सीरत और अदाओं पर ही क्या काबिलीयत पर भी फिदा था. रिसर्च पूरी होने तक पहुंचतेपहुंचते एक अपूर्वा ही उस के मन चढ़ी. मन चढ़ने के प्रस्ताव को उस के साथ 2 साल गुजारते भी उगल न सका.

अपूर्वा प्रणव की अच्छी सोच की अपनी सहेलियों के सामने कई बार तारीफ कर चुकी थी. मनचले और मसखरे भी प्रणव को छेड़ते, ‘अपूर्वा तो बनी ही आप के लिए है.’ कुछ मनचले ऐसा कहते, ‘यह किसी और की हो भी कैसे सकती है? यह ‘बुक’ है, तो सिर्फ आप के वास्ते.  कुछ कहते, ‘इसे तो कोई दिल वाला ही प्यार कर सकता है.’

अपूर्वा के सामने आने का फैसला भी प्रणव का एकदम निजी फैसला था. यह सब उस ने अपूर्वा के दिल की टोह लेने के लिए किया था कि वह उसे इस रूप में भी पसंद कर सकती है या नहीं. प्रणव ने बदन पर सफेद कपड़ा पहन रखा था और टांगों पर धोतीनुमा पटका बांधा था. पैरों में एक जोड़ी कपड़े के बूट थे. माथे पर टीका नहीं था. अपूर्वा रोज की तरह लाइब्रेरी में किताबें तलाशने में मगन थी. प्रणव दबे पैर उस के बहुत करीब पहुंचा और धीमे से बोला, ‘‘मिस अपूर्वा, मुझे पहचाना क्या?’’

अपूर्वा थोड़ा तुनकते हुए बोली, ‘‘पहचाना क्यों नहीं…’’ फिर वह मन ही मन बुदबुदाई, ‘इस रूप में जो हो.’

प्रणव ने कनैक्शन की गांठ चढ़ाने के मकसद से फिर पूछा, ‘‘मिस अपूर्वा, मैं ने आप के पिताजी को अपनी कुछ कहानियों की किताबें आप के हाथ भिजवाई थीं. क्या आप ने उन्हें दे दी थीं?’’

‘‘जी हां, दे दी थीं,’’ वह बोली.

‘‘आप के पिताजी ने क्या उन्हें पढ़ा भी था?’’

‘‘जी हां, उन्होंने पढ़ी थीं,’’ अपूर्वा ने छोटा सा जवाब दिया.

‘‘तो क्या आप ने भी उन्हें पढ़ा था?’’

‘‘हां, मैं ने भी वे पढ़ी हैं,’’ किताबें पलटते व छांटते हुए अपूर्वा ने जवाब दिया और एक नजर अपने साथ खड़ी सहेली पर दौड़ाई.

सहेली टीना ने बड़ी मुश्किल से अपनेआप को यह कहते हुए रोका, ‘‘रसिक राज, उन्हें तो मैं ने भी चटकारे लेते गटक लिया था. लिखते तो आप अच्छा हो, यह मानना पड़ेगा. किसी लड़की को सस्ते में पटाने में तो आप माहिर हो. चौतरफा जकड़ रखी है मेरी सहेली अपूर्वा को आप ने अपने प्रेमपाश में.’’ प्रणव ने फिर हिम्मत जुटा कर पूछा, ‘‘मिस अपूर्वा, क्या मैं उन किताबों की कहानियों में औरत पात्रों के मनोविज्ञान पर आप की राय ले सकता हूं? क्या मुझे आज थोड़ा वक्त दे सकती हैं?’’ अपूर्वा इस बार जलेकटे अंदाज में बोली, ‘‘आज तो मेरे पास बिलकुल भी समय नहीं है. हां, कल आप से इस मुद्दे पर बात कर सकती हूं.’’

प्रणव टका सा जवाब पा कर उन्हीं पैरों लाइब्रेरी से बाहर आ गया. अगले कल का बिना इंतजार किए लंबा समय गुजर गया, साल गुजर गए. इस बीच बहुतकुछ बदला. अपूर्वा ने शादी रचा ली. सुनने में आया कि कोई एमबीबीएस डाक्टर था. खुद प्रोफैसर हो गई थी. बस… प्रणव ने सिर्फ शादी न की, बाकी बहुतकुछ किया. नौकरीचाकरी 3-4 साल. संतों का समागम बेहिसाब, महंताई पौने 4 साल.

65 साल का होने पर लकवे ने दायां हिस्सा मार दिया. लिखना भी छूट गया. नहीं छूटा तो अपूर्वा का खयाल. लंगड़ातेलंगड़ाते भाई से टेर छेड़ता है अनेक बार. कहता है, ‘‘भाई साहब, वह थी ही अपूर्वा. जैसा काम, वैसा गुण. पढ़नेलिखने में अव्वल. गायन में निपुण, खेलकूद में अव्वल, एनसीसी की बैस्ट कैडेट, खूबसूरत. सब उस के दीवाने थे. ‘‘वह सच में प्रेम करने के काबिल थी. वह मुझ से 9 साल छोटी थी. मैं तो था अनाड़ी, फिर भी उस ने मुझे पसंद किया.’’

प्रणव का मन आज बदली हुई पोशाक में भी अपूर्वा के लिए तड़प रहा है. भटक रहा है. उसे लगता है कि अपूर्वा आज भी लाइब्रेरी की सैल्फ से किताबें तलाश रही है, छांट रही है. एनसीसी की परेड से लौट रही है. वह उसे चाय पिलाने के लिए कैंटीन में ले आया है. पहली बार पीले फूलदार सूट में देखी थी अपने छोटे भाई के साथ. रिसैप्शन पार्टी में उस ने सुरीला गीत गया था. श्रोता भौंचक्क थे.

प्रणव ने कविता का पाठ किया था. इस के बाद पहली नजर में जो होता है, वह हुआ. कविताकहानियों की पोथियां तो आईं, पर रिसर्च पूरी नहीं हुई. वह अभी भी जारी है. 40-45 सालों के बाद भी ये सारे सीन कल की बात लगते हैं. बारबार दिलोदिमाग पर घूमते हैं. वह कल आज में नहीं बदल सकता, प्रणव यह बात अच्छी तरह जानता है. वह आज सिर्फ अपूर्वा की खैर मांगता है. उस की याद में किस्सेकहानियां गढ़ता है. उस की खुशहाली के गीत रचता है.

डा. प्रत्यूष गुलेरी

मैं गरमी में जब भी मेकअप करती हूं तो कुछ ही घंटों में पिघल जाता है, मुझे क्या करना चाहिए?

सवाल

गरमी का मौसम आ रहा है. मेरी स्किन बहुत ही औयली है. मैं मेकअप किस तरह से करूं कि मेरा मेकअप बहुत देर तक टिके क्योंकि मैं जब भी मेकअप करती हूं कुछ ही घंटों में पिघल जाता है?

जवाब

आप जब भी मेकअप करने लगें उस से पहले कुछ खास तैयारी करने की जरूरत है.

  1. सब से पहले अपनी स्किन को क्लीन कर के टोनर लगाएं. टोनर को एक कौटन पर ले कर स्किन पर थपथपाएं और उस को सूखने दें पोंछें नहीं. इस से आप के पोर्स बंद हो जाएंगे जिस से आप का मेकअप ज्यादा देर तक टिकेगा.
  2. अगर बहुत ही गरमी हो तो एक कौटन के कपड़े में एक बर्फ का टुकड़ा ले कर अपनी स्किन पर फिराएं और उस को अपनेआप सूखने दें.
  3. इस के बाद टोनर का इस्तेमाल करें.
  4. आप के स्किन के पोर्स बंद होने की वजह से मेकअप बहुत घंटे टिक सकेगा.
  5. मेकअप का बेस हमेशा वाटरपू्रफ चुनें. उस के बाद उसे लूज पाउडर से सैट करें. इस से आप का बेस काफी हद तक टिकेगा.
  6. इस के अलावा बाकी के प्रोडक्ट भी वाटरपू्रफ लें जैसेकि आईलाइनर, मसकारा, वाटरपू्रफ यूज करें. लिपस्टिक लौंगलास्टिंग लें, बिंदी स्टीकर वाली लें.
  7. आईशैडो और ब्लशऔन भी पाउडर वाला इस्तेमाल करें. सारा मेकअप करने के बाद मेकअप सीलर से मेकअप को सील कर लें. इस से आप का मेकअप काफी देर तक टिकेगा और आप खूबसूरत बनी रहेंगी.

ऐ दिल है मुश्किल: सोहम के बारे में सोचकर वह क्यों बेचैन हो उठती थी?

देखने सुनने व पढ़ने वालों को तो यही लगेगा कि मैं कोई चरित्रहीन स्त्री हूं पर मुझे समझ नहीं आता कि क्या मैं इन दिनों सचमुच एक चरित्रहीन स्त्री की तरह व्यवहार कर रही हूं. अपने मनोभाव प्रकट करना, किसी को अपने दिल की बात समझाना मेरे लिए बहुत मुश्किल है. वैसे भी, दिल की मुश्किल बातें समझनासमझाना सब के लिए आसान है क्या? मैं रश्मि, एक विवाहित स्त्री, एक युवा बेटी पलाक्षा की मां और एक बेहद अच्छे इंसान अजय की पत्नी, अगर किसी विवाहित परपुरुष में दिलचस्पी ले कर अपने रातदिन का चैन खत्म कर लूं तो क्या कहा जाएगा इसे?

मुझे अजय से कोई शिकायत नहीं, पलाक्षा से भी बहुत प्यार है. फिर, सोहम के लिए मैं इतनी बेचैन क्यों हूं, समझ नहीं आता. उस की एक झलक पाने के लिए अपने फ्लैट के कोनेकोने में भटकती रहती हूं. वह जहांजहां से दिख सकता है वहांवहां मंडराती रहती हूं रातदिन. अगर कोई ध्यान से मेरी गतिविधियों को देखे तो उसे मेरी हालत किसी 18 साल की प्यार में पड़ी चंचल किशोरी की तरह लगेगी. और मैं शक के घेरे में तुरंत आ जाऊंगी. पर उम्र के इस पड़ाव पर जैसी मैं दिखती हूं, मेरे बारे में कोई यह सोच भी नहीं सकता कि क्या अंतर्द्वंद्व मचा रहता है मेरे दिल में.

मैं बिलकुल नहीं चाहती कि मैं किसी परपुरुष की तरफ आकर्षित होऊं. पर क्या करूं, दिल पर कभी किसी का जोर चला है, जो मेरा चलेगा. लेकिन नहीं, यह भी नहीं कह सकते. सोहम का चलता है न अपने दिल पर जोर. मुझ में रुचि रखने के बाद भी वह कितनी मर्यादा, कितनी सीमा में रहता है. उस की पत्नी है,

2 बच्चे हैं, कितना मर्यादित, संतुलित व्यवहार है उस का. अपने प्रति मेरा आकर्षण भलीभांति जान चुका है वह. अपने औफिस के लिए निकलते समय उस के इंतजार में खिड़की में खड़े मुझे देखा है उस ने. फिर जब वह वापस आता है उस ने वहीं खड़े देखा है मुझे.

अपनी बेचैनियों से मैं कितनी थकने लगी हूं? बाहर से सबकुछ शांत लगता है, पर मेरे भीतर ही भीतर भावनाओं का तूफान उठता है. कभीकभी मेरा मन करता है अजय से कहूं, कहीं और फ्लैट ले लें या हम यहां से कहीं और चले जाएं पर यह बात मेरी जबान पर कभी आ ही नहीं पाती. उलटा, ऐसी बातों के छिड़ने पर मेरे मुंह से झट निकलता है कि मैं तो इस फ्लैट में मरते दम तक रहूंगी. कभी मन करता है कि उस के बारे में सोचने से बचने के लिए लंबी छुट्टियों पर कहीं चली जाऊं. पर कोई लंबा प्रोग्राम बनते ही मैं उसे 3 या 4 दिन का कर देती हूं. मैं कहां रह सकती हूं इतने दिन सोहम को बिना देखे. कभी सोचती हूं अपने बैडरूम की खिड़की पर हमेशा परदा खींच कर रखूं ताकि मेरा ध्यान सोहम की तरफ न जाए. पर होता कुछ और ही है. 6 बजे उठते ही आंखें पूरी तरह खुलने से पहले ही मैं अपने बैडरूम की खिड़की का परदा हटा देती हूं, जिस से सोहम अपने बैडरूम में अपनी पत्नी की, बच्चों की स्कूल जाने में, मदद करता दिख जाए.

मैं ने देखा है वह एक नजर मेरी खिड़की पर डालता है, फिर अपने कामों में लग जाता है. हां, बस एक नजर. मैं ने उसे कभी बेचैनी से मेरी ओर देखते नहीं देखा और मैं आंख खुलने से ले कर रात को बैड पर जाने तक हरपल उसी के बारे में सोचती हूं. वह अपने बच्चों को स्कूल बस में बिठाने के लिए निकलता है, फिर 15 मिनट बाद वापस आता है, फिर उस की पत्नी औफिस जाती है. शाम को पहले घर वही आता है. फिर, अपने बच्चों को ले कर पार्क जाता है. 2 साल पहले मेरी बेचैनियों का यह सिलसिला वहीं से तो शुरू हुआ था. एकदूसरे को देखना, फिर हायहैलो, फिर नाम की जानपहचान. बस, फिर इस के आगे कभी कुछ नहीं.

हैरान हूं मैं अपने दिल की हालत पर, क्यों मैं उस के आगेपीछे किसी बहकी सी पागलप्रेमिका की तरह रातदिन घूमती हूं. क्या हो गया है मुझे? सबकुछ तो है मेरे पास. मुझे उस से कुछ भी नहीं चाहिए. फिर यह क्या है जो उस के सिवा कुछ ध्यान नहीं रहता. हर समय वह अपने वजूद के साथ मुझे अपने आसपास महसूस होता है. उस की मर्यादित चालढाल, उस की बोलती सी आंखें, मुझे देख कर उस की रहस्यमयी मुसकराहट सब हर समय मेरे दिल पर छाई रहती हैं. रात में उस के फ्लैट की लाइट बंद होने तक मेरी नजरें वहीं गड़ी रहती हैं. वह गाना है न, ‘तुझे देखदेख कर है जगना, तुझे देख कर है सोना…’ मुझे अपने ऊपर बिलकुल फिट लगता है. पर इस उम्र में, इस स्थिति में सोहम की तरफ मेरा यों खिंचा जाना.

मेरी तबीयत कभीकभी इस बेचैनी से खराब हो जाती है. अजीब सा तनाव रहने लगता है. दिनभर एक अपराधबोध सालता कि एक परपुरुष की तरफ खिंच कर मैं अपना कितना समय खराब करती हूं. मेरे लिए समाज में रहते हुए उस के नियमों की अवहेलना करना संभव नहीं है. मैं अजय की प्रतिष्ठा भी कभी दांव पर नहीं लगाऊंगी.

पहले मुझे घर के कामों से, अपने सामाजिक जीवन से फुरसत नहीं मिलती थी. अब? अब मैं घर से ही नहीं निकलना चाहती. दोस्तों के बुलाने पर न मिलने के बहाने सोचती रहती हूं. पूरा दिन यह अकेलापन अच्छा लगने लगा है. किसी से बात करने की जरूरत ही नहीं लगती. सोहम के औफिस जाने के बाद मैं अपने काम शुरू करती हूं. उस के आने तक फारिग हो कर अपने फ्लैट से उसे देखने के मौके और जगहों पर भटकती रहती हूं. कभीकभी इधरउधर बेवजह कुछ करते रहने से थक कर बिस्तर पर पड़ जाती हूं. पता नहीं, तब कहां से कुछ आंसू पलकों के कोनों से अचानक बह निकलते हैं. जो घाव किसी को दिखाए भी न जा सकें, वे ज्यादा ही कसकते हैं.

बहुत मुश्किल में हूं. बहुतकुछ कर के देख लिया. सोहम से ध्यान नहीं हटा पाती. क्या करूं, कहां चली जाऊं. कहीं जा कर तो और बेचैन रहती हूं, फौरन लौट आती हूं. क्या करूं जो इस दिल को करार आए. अजय और पलाक्षा तो इसे मेरा गिरता स्वास्थ्य और थकान समझ कर रातदिन मेरा ध्यान रख रहे हैं. तब, मैं और अपराधबोध से भर उठती हूं. दिल की बातें इतनी उलझी हुई, इतनी मुश्किल क्यों होती हैं कि कोई इलाज ही नहीं दिखता और वह भी मेरी उम्र में कि जब किसी भी तरह की कोई उम्मीद ही नहीं है. इस दिल को कब और कैसे करार आएगा, इस अतर्द्वंद्व का कोई अंत कब होगा? और क्या अंत होगा? ऐसा क्या होगा जो मेरा ध्यान सोहम की तरफ से हट जाएगा? कहते हैं कि समय हर बात का जवाब है. अगर ऐसा है तो बस, इंतजार है मुझे उस समय का.

दवा जरूरी या दुआ

सरकार को ड्रग व्यापार पर नियंत्रण करना चाहिएमगर वह लगी है धर्म बचाने में. सरकारी मशीनरी को कफ सिरप और आई ड्रौपों से होने वाली मौतों की चिंता नहींएक हिंदू लड़की के धर्म परिवर्तन कर के मुसलिम लड़के से शादी करने पर चिंता होती रहती है.

पहले जांबिया से खबरें आईं कि वहां सैकड़ों बच्चों की मौत हरियाणा की एक कंपनी का कफ सिरप पीने से हुई. फिर उजबेकिस्तान से आईं. अब डेलसम फार्मा के आई ड्रौपों से होने वाले अंधेपन के मामले सामने आ रहे हैं. यह दवा अमेरिका के कईर् शहरों में बिक रही है.

भारतीय फार्मा कंपनियां आजकल बहुत पैसा बना रही हैं. दुनियाभर को सस्तीकौंप्लैक्स दवाएं बेचने में भारत ने एक खास जगह बना ली है. भारत में बनी दवाओं को भारतीयों पर प्रयोग करना बहुत आसान है क्योंकि यहां की जनता वैसे ही भभूतमंत्रोंहवनों में विश्वास करने वाली है और यदाकदा जब लोग कैमिस्ट से किसी रोग की दवा लेते हैं तो होने वाले नुकसान पर सरकारी अस्पताल के डाक्टर चिंता नहीं करते. वे एक और जने की असमय मौत या गंभीर नुकसान को कंधे उचका कर टाल देते हैं.

जो देश आयुर्वेदहोम्योपैथीयूनानीऔर्गेनिकयोगासनों और पूजापाठ को इलाज मानता हो तथा मौत या शारीरिक नुकसान को भगवान का लिखा हुआ मानता है जो होना ही हैवहां किसी ड्रग का ट्रायल तो जरूरी है ही नहीं. यहां दवाएं टिन शेड वाले कारखानों में मैलेकुचैले मजदूरों के हाथों से बनती हैं. हांबाहर के दफ्तरों में सफेद कोट पहने लोग मंडराते दिख जाएंगे. अब पैकिंग भी बढि़या है. सरकारी एजेंसियां सर्टिफिकेट ऐप्लिकेशन पर रखे पैसों के हिसाब से देती हैंदवाओं की क्वालिटी के आधार पर नहीं.

डेलसम फार्मा के बने आई ड्रौपों को लूब्रिकेशन और आंसू रोकने के लिए प्रयोग किया जाता है पर वे बैक्टीरिया वाले आई ड्रौप हैं जो नेजल कैविटी से लंग्स तक बैक्टीरिया को ले जाते हैं और लंग्स में इन्फैक्शन हो जाता है. आंखों की रोशनी अलग चली जाती है.

इस पर न धर्म संसद बैठेगीन भगवाई मोरचा निकलेगा क्योंकि उन्हें तो दानदक्षिणा से मतलब है और वे मौत व बीमारी को भगवान का आदेश मानते हैं. सरकार इस काम और अंधविश्वास को फैलाने में पूरा सहयोग दे रही है. जगहजगह मंदिरघाट बन रहे हैं जिन में बढि़या पत्थर लग रहा है. हरेभरे घास लगे बाग बन रहे हैं. दवा फैक्टरियों की चिंता किसे हैकितने भारतीय इन नकली या खराब दवाओं से मरते हैंइस के तो आंकड़े भी कलैक्ट नहीं हो पाते.

इंस्टेंट ग्लो के लिए अपनाएं ये 10 फेस मास्क

क्या आप भी अपनी रूखी और बेजान त्वचा से परेशान हैं. कई उपाय करने के बावजूद भी किसा तरह का लाभ नहीं मिल रहा है. आपके पास फेशियल, ब्लीच आदि के लिए पार्लर जाने का समय नहीं है, तो अपनाइए ये टाप 10 फेस मास्क. इससे आपकी बेजान स्किन में चमक आ जाएगी और आपको मिलेगा इंस्टेंट ग्लो.

1. गुलाब की कुछ पंखुडियों में 2 टेबलस्पून गाडा दूध मिलाकर बारीक पीस लें. तैयार लेप को दस मिनट के लिए फ्रिज मे रख दें. बाहर निकालकर चेहरे पर लगाएं. 20 मिनट बाद जब लेप सूख जाए तो ठंडे पानी से चेहरा धो लें. गुलाब क्री पंखुडियों से त्वचा की रंगत निखरती हैं.

2. पके हुए केले को छीलकर अराल लें मसल लें. इसमें 3 टेबलस्पून पका हुआ पपीता मसलकर मिलाएं. इसे दो मिनट चम्मच से फेंटें. फिर चेहरे पर अप्लाई करें. 20 – 25 मिनट बाद ठंडे पानी से चेहरा धो लें. इससे स्किन टाइट होती है और नेचुरली ग्लो करती हैं.

3. मिक्सर यें 2 छोटे साइज के स्ट्राबेरी और 1 टेबलस्पून बटर (नमक वाला नहीं) डालकर पीस लें. तैयार पेस्ट चेहरे पर लगाएं. 15 मिनट बाद कुनकुने पानी में भीगे हुए टावल से चेहरा पोंछ लें. स्ट्राबेरी से स्किन टोन निखरता है और बटर चेहरे को माइश्चाराज करता हैं.

4. 2 चम्मच बेसन में 1 चम्मच दूध और 1 चम्मच आलिव आयल मिलाएं. फिर चेहरे को गुलाब जल से धोएं और फेस पैक लगा लें. 20 मिनट बाद कुनकुने पानी से चेहरा धो लें. इससे स्किन ग्लो करेगी और ब्लैक हेड्स की शिकायत भी दूर हो जाएगी.

5. 1 टेबलस्पून दूध में थोडा सा केसर डालकर 6 घंटे के लिए भिगोकर रखें. इसमें 1 टेबलस्पून शहद मिलाएं. जब फेस पैक गाढ़ा हो जाए, तो इसे चेहरे पर लगाएं. 20 मिनट बाद ठंडे पानी से चेहरा धो लें.

6. संतरे के छिलके को धूप में सुखाएं और मिक्सर में पीसकर पाउडर बना लें. अब 1 टेबलस्पून पाउडर में 1 टेबलस्पून दही मिलाकर पेस्ट बना लें और चेहरे पर लगाएं. 20 मिनट बाद जब सूख जाए, तो कुनकुने पानी से धो लें. इससे स्किन को गोल्डन ग्लो मिलेगा.

7. टमाटर को मिक्सर में पीस लें. इसमें आधा टेबलस्पून शक्कर डालकर अच्छी तरह मिलाएं और चेहरे पर अप्लाई करें. 15 मिनट बाद ठंडे पानी से चेहरा धो लें. इससे त्वचा नेचुरली ग्लो करने लगती है.

8. 1 बड़े आकार के एवोकाडो को पीसकर बारीक़ पेस्ट बना लें. इसमें आधा टेबलस्पून दही और नीबू के रस की कुछ बूंदें डालकर अच्छी तरह मिलाएं. तैयार पेस्ट चेहरे पर लगाएं और सूख जाने पर कुनकुने पानी से चेहरा धो लें.

9. सेब को छीलकर काट लें. अब मिक्सर में 1 टेबलस्पून शहद सहित सेब डालकर बारीक पीस लें. इसे चेहरे पर लगाएं और 15 मिनट बाद जब चेहरा सूख जाए, तो ठंडे पानी से धो लें. त्वचा में नई चमक आ जाएगी.

10. 3 टेबलस्पून बेसन में 2 टेबलस्पून दूध की गाढ़ी मलाई और चुटकीभर हल्दी मिलाकर चेहरे पर लगाएं. 30 मिनट बाद जब फेस पैक सूख जाए, तो हाथों को गीला करें और हल्के से चेहरा पोंछते हुए फेस पैक निकालें.

मुसकान : भाग 2- क्यों टूट गए उनके सपने

लेखिका- निर्मला कपिला

राजकुमार को एंबुलेंस में डाला गया तो सभी उन के साथ जाना चाहते थे पर सुनील नहीं माना. सुनील, अनिल और मुसकान साथ गए.

पटियाला पहुंच कर जल्दी ही सारे टेस्ट हो गए. डाक्टर ने रात को ही उन की बाईपास सर्जरी करने को कहा. 2 बोतल खून का भी प्रबंध करना था, जिस के लिए सुनील और अनिल अपना खून का सैंपल मैच करने के लिए दे आए थे. बेशक दोनों डाक्टर थे पर मुसकान बहुत घबराई हुई थी. लोगों को बीमारी में देखना और बात है पर अपनों के लिए जो दर्द, घबराहट होती है, यह मुसकान आज जान पाई.

सुनील उसे ढाढ़स बंधा रहा था. उसे यह सोच कर दुख हो रहा था कि उस के सपनों की राजकुमारी, जिस ने जीवन में दुख का एक क्षण नहीं देखा, आज इतना बड़ा दुख…वह भी उस रात में जिस में इस समय उस की बांहों में लिपटी सुहागरात की सेज पर बैठी होती.

‘‘मुसकान, मैं हूं न तुम्हारे साथ. मेरे होते तुम चिंता क्यों करती हो.’’

‘‘मुझे आप के लिए दुख हो रहा है कि मेरे पापा के कारण आप को अपनी खुशी छोड़नी पड़ी,’’ मुसकान की आंखों में आंसू आ गए.

‘‘पगली, यह हमारे बीच में मेरे-तुम्हारे कहां से आ गया. यह मेरे भी पापा हैं. कल को मुझ पर या घर के किसी दूसरे सदस्य पर कोई मुसीबत आ जाए तो क्या तुम साथ नहीं दोगी?’’

‘‘मेरी तो जान भी हाजिर है.’’

‘‘मुझे जान नहीं, बस, मुसकान चाहिए,’’ कहते हुए सुनील ने उस का हाथ अपने हाथों में ले कर दबाया.

सुनील को डाक्टर ने बुलाया था. अनिल बाजार सामान लेने गया हुआ था. मुसकान पापा के पास बैठ गई. पूरे एक घंटे बाद सुनील आया तो उदास और थकाथका सा था.

‘‘क्या खून दे कर आए हैं?’’ मुसकान घबरा गई.

‘‘हां,’’ जैसे कहीं दूर से उस ने जवाब दिया हो.

‘‘आप थोड़ी देर कमरे में जा कर आराम कर लें, अभी भैया भी आ जाएंगे. मैं पापा के पास बैठती हूं.’’

मुसकान के मन में चिंता होने लगी. सुनील को क्या हो गया. शायद थकावट और परेशानी है और ऊपर से खून भी देना पड़ा. चलो, थोड़ा आराम कर लेंगे तो ठीक हो जाएंगे.

उधर सुनील पर तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा था. किसे बताए, क्या बताए. मुसकान का क्या होगा. फिर डाक्टर परमिंदर सिंह का चेहरा उस की आंखों के सामने घूमने लगा और उन के कहे शब्द दिमाग में गूंजने लगे :

‘‘सुनील बेटा, तुम  मेरे छात्र रह चुके हो, मेरे बेटे जैसे हो. कैसे कहूं, क्या बताऊं मैं 2 घंटे से परेशान हूं.’’

‘‘सर, मैं बहुत स्ट्रांग हूं, कुछ भी सुन सकता हूं, आप निश्ंिचत हो कर बताइए,’’ सुनील सोच भी नहीं सकता था, वह क्या सुनने जा रहा है.

‘‘तुम एच.आई.वी. पौजिटिव हो. जांच के लिए भेजे गए तुम्हारे ब्लड से पता चला है.’’

‘‘क्या? सर, यह कैसे हो सकता है? आप तो मुझे जानते हैं. कितना सादा और संयमित जीवन रहा है मेरा.’’

‘‘बेटा, मैं जानता हूं और तुम डाक्टर हो, जानते हो कि देह व्यापार और नशेबाजों के मुकाबले में डाक्टर को एड्स से अधिक खतरा है. खुदगर्ज, निकम्मे व भ्रष्ट लोगों की वजह से अनजाने में ही मेडिकल स्टाफ इस बीमारी की गिरफ्त में आ जाता है. सिरिंजों, दस्तानों की रिसाइक्ंिलग, हमारी लापरवाही, अस्पतालों में आवश्यक साधनों की कमी जैसे कितने ही कारण हैं. लोग ब्लड डोनेट करते हैं, समाज सेवा के लिए मगर उसी सेट और सूई को दोबारा इस्तेमाल किया जाए तो क्या होगा? शायद वही सूई पहले किसी एड्स के मरीज को लगी हो.’’

‘‘सर, मुझे अपनी चिंता नहीं है. मैं मुसकान से क्या कहूंगा? वह तो जीते जी मर जाएगी,’’ सुनील की आवाज कहीं दूर से आती लगी.

‘‘बेटा, हौसला रखो. अभी किसी से कुछ मत कहो. आज पापा का आपरेशन हो जाने दो. 15 दिन तो अभी यहीं लग जाएंगे. घर जा कर मांबाप की सलाह से अगला कदम उठाना. जीवन को एक चुनौती की तरह लो. सकारात्मक सोच से हर समस्या का हल मिल जाता है. मुसकान से मैं बात करूंगा पर अभी नहीं.’’

‘‘सर, उसे अभी कुछ मत बताइए, मुझे सोचने दीजिए,’’ कह कर सुनील अपने कमरे में आ गया था.

पर वह क्या सोच सकता है? एड्स. क्या मुसकान सुन सकेगी? नहीं, वह सह नहीं सकेगी. मैं उसे तलाक दे दूंगा, कहीं दूर चला जाऊंगा, नहीं…नहीं…वह तो अपनी जान दे देगी…नहीं…इस से अच्छा वह मर जाएगा पर मांबाप सह नहीं पाएंगे. नहीं…विपदा का हल मौत नहीं. सर ने ठीक कहा था कि सब को एक न एक दिन मरना है पर मरने से पहले जीना सीखना चाहिए.

अचानक उसे ध्यान आया, आपरेशन का टाइम होने वाला है. मुसकान परेशान हो रही होगी…कम से कम जब तक पापा ठीक नहीं होते, मैं उस का ध्यान रख सकता हूं…इतने दिन कुछ सोच भी सकूंगा.

वह जल्दी कमरा बंद कर के वार्ड में आ गया.

‘‘अब कैसी तबीयत है?’’ उसे देखते ही मुसकान पूछ बैठी.

‘‘मैं ठीक हूं. मुसकान, तुम थोड़ी स्ट्रांग बनो. मैं तुम्हें परेशान देख कर बीमार हो जाता हूं.’’

12 बजे राजकुमार को आपरेशन के लिए ले गए. वह तीनों आपरेशन थियेटर के बाहर बैठ गए. मुसकान को सुनील की खामोशी खल रही थी पर समय की नजाकत को देखते हुए चुप थी. शायद पापा के कारण ही सुनील परेशान हों.

आपरेशन सफल रहा. अगले दिन घर से भी सब लोग आ गए थे. मां ने दोनों को गेस्ट रूम में आराम करने को भेज दिया.

कमरे में जाते ही सुनील लेट गया.

‘‘मुसकान, तुम भी थोेड़ी देर सो लो, रात भर जागती रही हो. मुझे भी नींद आ रही है,’’ कहते हुए वह मुंह फेर कर लेट गया. मुसकान भी लेट गई.

शादी के बाद पहली बार दोनों अकेले एक ही कमरे में थे. इस घड़ी में सुनील का दिल जैसे अंदर से कोई चीर रहा हो. उस का जी चाह रहा था कि मुसकान को बांहों में भर ले पर नहीं, वह उसे और सपने नहीं दिखाएगा. वह उस की जिंदगी बरबाद नहीं होने देगा.

मुसकान मायूस सी किसी हसरत के इंतजार में लेट गई. कुछ कहना चाह कर भी कह नहीं पा रही थी. सुनील पास हो कर भी दूर क्यों है? शायद कई दिनों से भागदौड़ में ढंग से सो नहीं पाया. पर दिल इस पर यकीन करने को तैयार नहीं था. उस ने सोचा, सुनील थोड़ी देर सो ले तब तक मैं वार्ड में चलती हूं. जैसे ही वह दरवाजा बंद करने लगी कि सुनील उस का नाम ले कर चीख सा पड़ा.

‘‘क्या हुआ,’’ वह घबराई सी आई तो देखा कि सुनील का माथा पसीने से भीगा हुआ था.

‘‘एक गिलास पानी देना.’’

उस ने पानी दिया और उसे बेड पर लिटा दिया.

‘‘कहीं मत जाओ, मुसकान. मैं ने अभीअभी सपना देखा है. एक लालपरी बारबार मुझे दिखाई देती है. मैं उसे छूने के लिए आगे बढ़ता हूं पर छू नहीं पाता, एक पहाड़ आगे आ जाता है. वह उस के पीछे चली जाती है. मैं उस पहाड़ पर चढ़ने की कोशिश करता हूं तो नीचे गिर जाता हूं,’’ इतना कह कर सुनील मुसकान का हाथ जोर से पकड़ लेता है.

‘‘कैसी बहकीबहकी बातें कर रहे हो? सपने भी क्या सच होते हैं? चलो, चुपचाप सो जाओ. तुम्हारी लालपरी तुम्हारे पास बैठी है.’’

वह धीरेधीरे उस के माथे को सहलाने लगी. सुनील ने आंखें बंद कर लीं. थोड़ी देर बाद मुसकान ने सोचा, वह सो गया है. वह चुपके से उठी और वार्ड की तरफ चल पड़ी. वह उसे डिस्टर्ब नहीं करना चाहती थी.

आगे पढ़ें- कुछ देर के लिए वहां…

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एक हसीना एक दीवाना: भाग 2- क्या रंग लाया प्रभात और कामिनी का इश्क ?

कामिनी गांव से लौट कर शहर आ गई. वह रोज कालेज आनेजाने लगी, तो प्रभात पहले की तरह उस से मिलनेजुलने लगा. कामिनी को प्रभात ने यह कह कर यकीन दिला दिया था कि जब वह कहेगी, तभी उस से शादी करेगा.

3 महीने बाद प्रभात को शहर में 3-4 घंटे के लिए एक फ्लैट मिल गया. फ्लैट उस के दोस्त का था. उस दिन उस के घर वाले कहीं बाहर गए हुए थे. दोस्त ने सुबह ही फ्लैट की चाबी प्रभात को दे दी थी. उस दिन प्रभात कालेज के गेट पर समय से पहले ही जा कर खड़ा हो गया. कामिनी आई, तो उसे गेट पर ही रोक लिया. वह बहाने से अपने दोस्त के फ्लैट में ले गया.

प्रभात ने जैसे ही फ्लैट के दरवाजे पर अंदर से सिटकिनी लगाई, कामिनी चौंक गई. वह उस की तरफ घूरते हुए बोली, ‘‘तुम ने दरवाजा बंद क्यों किया?’’ ‘‘मुझे तुम से जो बात करनी है, वह दरवाजा बंद कर के ही हो सकती है. बात यह है कामिनी कि जब तक मैं तुम्हें पा नहीं लूंगा, मुझे चैन नहीं मिलेगा. तुम तो अभी शादी नहीं करना चाहती, इसलिए मैं चाहता हूं कि शादी से पहले तुम मुझ से सुहागरात मना लो. इस में हर्ज भी नहीं है, क्योंकि एक न एक दिन तुम मेरी पत्नी बनोगी ही.’’

प्रभात के चुप होते ही कामिनी बोली, ‘‘तुम पागल हो गए हो क्या? ऐसा करना सही नहीं है. मैं अपना तन शादी के बाद ही पति को सौंपूंगी. इस की कोई गारंटी नहीं है कि मेरी शादी तुम से ही होगी, इसलिए अभी मेरा जिस्म पाने की ख्वाहिश छोड़ दो.’’ ‘‘प्लीज, मान जाओ कामिनी. मैं अब मजबूर हो गया हूं. देखो, तुम्हें अच्छा लगेगा,’’ कहते हुए प्रभात कामिनी के कपड़े उतारने की कोशिश करने लगा.

कामिनी जोर लगा कर उस की पकड़ से छूट गई और बोली, ‘‘मैं तुम्हारा इरादा समझ गई हूं. तुम्हें यह लगता है कि मेरे साथ जोरजबरदस्ती करोगे, तो मजबूर हो कर मैं अपना मकसद भूल जाऊंगी और तुम से शादी कर लूंगी. मगर ऐसा हरगिज नहीं होगा. ‘‘अगर तुम मेरे साथ जबरदस्ती करोगे, तो मैं तुम्हें माफ नहीं करूंगी. मैं तुम्हें पुलिस के हवाले कर दूंगी. उस के बाद तुम्हारा क्या होगा, यह तुम खुद सोच सकते हो. तुम जेल चले जाओगे, तो क्या तुम्हारी जिंदगी बरबाद नहीं हो जाएगी?’’

रेप के खतरे से कामिनी डर गई थी और बचने का तरीका ढूंढ़ने लगी थी. कुछ देर चुप रहने के बाद कामिनी प्रभात को समझाने लगी, ‘‘मेरी मानो तो अभी सब्र से काम लो. 3 महीने बाद हमारे इम्तिहान होंगे. उस के 2-3 महीने बाद रिजल्ट आएगा. फिर हम बैठ कर आपस में बात कर लेंगे.

‘‘मैं जानती हूं कि तुम हर हाल में मुझे पाना चाहते हो. मैं तुम्हारी ख्वाहिश जरूर पूरी करूंगी. मैं तुम्हें निराश नहीं करूंगी. मैं तुम्हें प्यार करती हूं, तो तुम से ही शादी करूंगी न.’’ कामिनी ने प्रभात को तरहतरह से समझाया, तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ. उस दिन उस के साथ सैक्स करने का इरादा छोड़ कर उस ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारी बात मान लेता हूं. रिजल्ट आने तक मैं शादी के लिए तुम्हें परेशान नहीं करूंगा, लेकिन तुम्हें भी मेरी एक बात माननी होगी.’’

‘‘कौन सी बात?’’ कामिनी ने पूछा. ‘‘मेरे पिता से मिल कर तुम्हें यह कहना होगा कि गे्रजुएशन पूरी करने के बाद तुम मुझ से शादी कर लोगी. नौकरी की तलाश नहीं करोगी.’’

कुछ सोच कर कामिनी प्रभात की बात मान गई. 2 दिन बाद प्रभात के साथ कामिनी उस के घर गई. उस के मातापिता से उस ने वह सबकुछ कह दिया, जो प्रभात चाहता था. साथ ही, उस ने उस के पिता से यह भी कहा कि अभी वे उस के घर वालों से न मिलें. रिजल्ट आने के बाद ही मिलें.

प्रभात के मातापिता ने भी कामिनी की बात मान ली. उस के बाद सबकुछ पहले की तरह चलने लगा. इम्तिहान के बाद कामिनी गांव चली गई. उस के बाद प्रभात उस से मिल न सका.

गांव जाते समय कामिनी ने उस से कहा था कि वह उस से मिलने कभी गांव न आए. अगर वह गांव में आएगा. तो उस की बहुत बदनामी होगी. वह उस से फोन पर बात करती रहेगी. रिजल्ट मिलने के एक महीने बाद वह अपने पिता को रिश्ते की बात करने के लिए उस के घर भेज देगी. प्रभात ने उस की बात मान ली. वह उस से मिलने उस के घर कभी नहीं गया.

प्रभात ने सोचा था कि रिजल्ट लेने कामिनी आएगी, तो उसी दिन वह उस से भविष्य की बात कर लेगा. मगर उस का सोचा नहीं हुआ. रिजल्ट लेने कामिनी कालेज नहीं आई. उस का कोई रिश्तेदार आया था और रिजल्ट ले कर चला गया.

प्रभात फर्स्ट डिवीजन में पास हुआ था, जबकि कामिनी सिर्फ पास हुई थी. बधाई देने के लिए प्रभात ने कामिनी को फोन किया, पर उस का फोन स्विच औफ था.

रिजल्ट मिलने के एक दिन पहले तक कामिनी का फोन ठीक था. प्रभात ने उस से बात की थी. अचानक उस का फोन क्यों बंद हो गया, यह वह समझ नहीं पाया. प्रभात कामिनी से तुरंत मिलना चाहता था, मगर वह उस के गांव इसलिए नहीं गया कि उस ने मना कर रखा था. वह उस के साथ वादाखिलाफी नहीं करना चाहता था.

कई दिनों तक प्रभात ने फोन पर कामिनी से बात करने की कोशिश की, लेकिन कामयाबी नहीं मिली. एक महीना बीत गया. वादे के मुताबिक कामिनी ने अपने मातापिता को प्रभात के घर नहीं भेजा, तो एक दिन वह उस के गांव चला गया.

पहली बार जिस औरत के सहयोग से प्रभात कामिनी से मिला था, वह सीधे उसी के घर गया. उस औरत से प्रभात को पता चला कि रिजल्ट मिलने के कुछ दिन बाद कामिनी को मुंबई में नौकरी मिल गई थी. अभी वह मुंबई में है. कामिनी मुंबई में कहां रहती थी, उस औरत को इस की जानकारी नहीं थी.

कामिनी के बिना प्रभात रह नहीं सकता था, इसलिए बेखौफ उस के घर जा कर उस के मातापिता और बहनों से मिला. अपनी और कामिनी की प्रेम कहानी बता कर प्रभात ने उस के पिता से कहा, ‘‘कामिनी को मैं इतना प्यार करता हूं कि अगर उस से मेरी शादी नहीं हुई, तो मैं पागल हो कर मर जाऊंगा. मुंबई में वह कहां रहती है? उस का पता मुझे दीजिए. मैं उस से पूछूंगा कि उस ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?’’

कामिनी का पता देना तो दूर उस के पिता ने दुत्कार कर प्रभात को घर से निकाल दिया. घर आ कर प्रभात ने कामिनी का सारा सच पिता को बता दिया. उस के पिता प्रभात को बरबाद होता नहीं देखना चाहते थे. उन्होंने जल्दी ही उस की शादी करने का फैसला किया. आननफानन उस के लिए लड़की तलाश कर शादी भी पक्की कर दी.

प्रभात के दिलोदिमाग से कामिनी अभी गई नहीं थी. उसे लग रहा था कि अगर वह कामिनी से शादी नहीं करेगा, तो जरूर पागल हो कर रहेगा, इसलिए उस ने मुंबई जा कर कामिनी को ढूंढ़ने की सोची. प्रभात जानता था कि उस ने अपने दिल की बात पिता को बता दी, तो वे खुदकुशी करने की धमकी दे कर शादी करने के लिए मजबूर कर देंगे.

शादी में 2 दिन बच गए, तो किसी को कुछ बताए बिना प्रभात घर से मुंबई चला गया. वहां एक दोस्त के घर में रह कर प्रभात ने नौकरी की तलाश के साथसाथ कामिनी की तलाश भी जारी रखी. 6 महीने बाद प्रभात को एक सरकारी बैंक में नौकरी मिल गई, लेकिन कामिनी का पता नहीं चला.

इसी तरह 3 साल बीत गए. इस बीच उस ने चिट्ठी लिख कर अपने पिता को यह बता दिया था कि वह मुंबई में सहीसलामत है. कामिनी से शादी करने के बाद ही वह घर आएगा. 3 साल बाद अचानक प्रभात का ट्रांसफर कोलकाता हो गया. 2 महीने से वह कोलकाता की एक शाखा में अफसर था और इस बात से बेहद चिंतित था कि अब वह कामिनी की तलाश कैसे करेगा?

आगे पढ़ें- दरवाजा अंदर से बंद करने के बाद…

लेखक- राम महेंद्र राय

इंटिमेट सीन्स करने में सहज नहीं हैं ‘सपनों की छलांग’ फेम मेघा राय

सपने तो हर कोई देखता है, लेकिन उन्हें पूरा करने की लगन हर व्यक्ति में नहीं होती. ऐसी ही कहानी है सोनी टीवी के सीरियल ‘सपनों की छलांग’ के अभिनेत्री राधिका यानि मेघा राय की, जिन्होंने पढाई पूरी कर अपनी लाखों की नौकरी छोड़कर एक्टिंग की दुनिया में कदम रखा.ये तो कहानी है धारावाहिक की, लेकिन रियल लाइफ में भी मेघा ने नौकरी छोड़कर एक्टिंग में कदम रखी है.

असल में मेघा राय एक टीवी एक्ट्रेस, मॉडल और ब्लॉगर हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक ब्यूटी ब्लॉगर के रूप में की थी. मुंबई की मेघा उड़ीसा की है, लेकिन छोटी उम्र में अपने पेरेंट्स के साथ मुंबई शिफ्ट हो गई. शांत और हंसमुख स्वभाव की मेघा एक कंप्यूटर इंजीनियर है और कई सालों तक उन्होंने जॉब भी किया है, पर दिल में कही उन्हें एक्टिंग का शौक था. इसके अलावा वह एक बिग फूडी हैं. उन्हें नए प्रकार का व्यंजन ट्रायकरना पसंद हैं.वह कई ब्रांडस के लिए मॉडल के रूप में काम कर चुकी हैं.मेघा एक पशुप्रेमी हैं. उनके पास एक पालतू बिल्ली भी हैं.मेघा की पसंदिता जगह गोवा हैं.मेघा ने हमेशा नार्थ इंडियन लड़की की भूमिका निभाई है. वर्ष 2019 में वह टेलीविज़न पर सीरियल “दिल ये जिद्दी हैं” से डेब्यू किया है.

मिली प्रेरणा

उन्हें बचपन से ही ब्यूटी और फैशन का काफी शौक था जिसके लिए उन्होंने अपने कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ एक ब्लॉग बनाया, जिसमें वह ब्यूटी और फैशन से संबंधित टिप्स लोगों के साथ शेयर करती थी,उनके इस ब्लॉग को लोगों का काफी सहयोग मिला. मेघा कहती है कि मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं एक्ट्रेस बनूँगी, लेकिन मुझे परफोर्मिंग आर्ट्स से बहुत लगाव था, क्योंकि मैं एक डांसर भी हूँ. एक्टिंग पसंद था, लेकिन कब कैसे करना है, ये पता नहीं था. जॉब में भी मुझे संतुष्टि नहीं मिल रही थी,इसलिए मैंने मन में निश्चय लिया कि मैं जॉब छोड़करअभिनय के क्षेत्र में ट्राई करुँगी.

परिवार का सहयोग

मेघा कहती है कि परिवार को पहले बहुत आश्चर्य हुआ, क्योंकि मैंने परमानेंट जॉब छोड़कर अभिनय करने का मन बनाया था. मैंने उन्हें अपनी बात समझाई और उनसे मैंने दो साल का समय माँगा. कुछ ठीक न होने पर वापस आकर जॉब करने की बात कही. मुझे खुद पर विश्वास था कि मैने जो निर्णय लिया है, वह ठीक है और मुझे वापस लौटने की जरुरत नहीं होगी.

मिला ब्रेक

मेघा का कहना है कि पहला ब्रेक मिलना आसान था, क्योंकि मैंने सोशल मीडिया पर देखा था कि किसी प्रोडक्शन हाउस को फ्रेश फेस चाहिए, उनका कांसेप्ट अच्छा था, मैंने अप्लाई किया और पहले ऑडिशन में मैं चुन ली गई. मैं शुरू में विज्ञापन में काम करना चाहती थी,क्योंकि डेली सोप में समय अधिक देना पड़ता है.

 

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किये संघर्ष

संघर्ष के बारें में मेघा कहती है कि मैंने संघर्ष को कभी फील नहीं किया, क्योंकि मैं अभिनय के इस प्रोसेस को एन्जॉय करती हूँ. मेरे हिसाब से कोई भी सपना आसान नहीं होता, उसमे मेहनत, लगन और धीरज की जरुरत होती है. संघर्ष शुरूआती दिनों में बहुत रहा, लेकिन जो भी मिला मैं उसमे संतुष्ट रही. इसमें उतार-चढ़ाव भी आये, लेकिन अंत में जो भी मिला अच्छा मिला. इस नई धारावाहिक में भी मेरी कैरियर सर सम्बंधित कहानी है, जिसे करने में मुझे अच्छा लग रहा है.

कांसेप्ट है आकर्षक

मेघा का आगे कहना है कि ये झाँसी की कहानी है, जहाँ एक लड़की राधिका जॉइंट फॅमिली में रहती है. उनके बीच में बहुत अधिक प्यार है, उन्होंने बेटे और बेटी में फर्क नहीं किया है. सबको पढाया लिखाया है. परिवार की वित्तीय सहायता भी इस लड़की ने उठाया है, परिवार में इसकी माँ काफी समझदार है और वह बेटी को अच्छा पढ़ा-लिखा कर एक कामकाजी महिला बनाना चाहती है, क्योंकि राधिका पढने-लिखने में काफी तेज है, लेकिन समस्या लड़की होने से है, जो शहर में अकेले नहीं रह सकती, क्योंकि सुरक्षा का सवाल है. राधिका ऐसे में क्या करती है, उसी को दिखाने की कोशिश की गई है. असल में आज के लड़की की चुनौतीपूर्ण कैरियर के बारें में दिखाया गया है, जो हर परिवार में किसी न किसी रूप में है.

जोड़ पाना है आसान

इस चरित्र से मेघा खुद को बहुत रिलेट कर पाती है, क्योंकि राधिका की जर्नी मेघा से थोड़ी मेल खाती है, इतना ही नहीं, इस भूमिका से हर लड़की खुद को जोड़ पाएगी, क्योंकि मुंबई में कई लड़कियां बाहर से आती है, ऐसे में नए शहर में रहना, रूम शेयर करना, जॉब करना आदि सभी चीजे रिलेटेबल है. मेरी ये चौथी शो है, जिसमे मैंने नार्थ इंडियन की भूमिका निभाई है.इसके अलावा मैंने झाँसी की भाषा और कल्चरको समझा है. मैं झाँसी गई भी हूँ.

होती है समस्या

मेघा कहती है कि महिलाओं को आगे बढ़ते हुए मानसिक समस्या से गुजरना पड़ता है और मैंने इसे आज भी आसपास की कुछ महिलाओं में देखा है, इसे उन्हें ही ठीक करना है. लड़कियों को खुद को कम नहीं समझना चाहिए, चीजे बदल रही है, हर महिला कुछ गलत होने पर अपनी आवाज उठा सकती है.कैरियर में आगे बढ़ने के लिए मौज-मस्ती, घर के कम्फर्ट और परिवार का साथ छोड़ना पड़ता है,मैं खुद भी सुबह की गुड मोर्निंग और रात को गुड नाईट कहती हूँ, क्योंकि फ़ोन करने का समय नहीं मिलता. कैरियर के लिए हर किसी को सामंजस्य को बनाए रखने की कला सीखनी चाहिए. समाज और परिवार के दृष्टिकोण को बदलने में टीवी और सोशल मीडिया का  बहुत बड़ा हाथ होता है, क्योंकिसालों तक किसी शो को देखने पर व्यक्ति उससे खुद को जोड़ लेता है.

इंटिमेट सीन्स करने में सहज नहीं

मेघा को हिंदी वेब सीरीज और फिल्मों में काम करने की इच्छा है, पर अभी वह इंटिमेट सीन्स करने में सहज नहीं, वह फॅमिली वेब सीरीज करना चाहती है, जिसे परिवार के सभी साथ बैठकर देख सकें. वह कहती है कि मैं आगे के बारें में अधिक नहीं सोचती और जो जैसे आता है करती जाती हूँ.

गैसलाइट फिल्म रिव्यू: चित्रांगदा सिंह का शानदार अभिनय फिल्म को कितनी सफलता दिलाएगा?

  • रेटिंग: 2 स्टार
  • निर्माता: रमेश तौरानी और आकाशपुरी
  • लेखक: नेहा शर्मा और पवन कृपलानी
  • निर्देशक: पवन कृपलानी
  • कलाकार: सारा अली खान,विक्रांत मैसे,चित्रांगदा सिंह,अक्षय ओबेराय, राहुल देव, शिशिर शर्मा व दीपक कालरा
  • अवधि: लगभग दो घंटे
  • ओटीटी प्लेटफार्म: डिज्नी प्लस हौट स्टार

2011 में प्रदर्शित सेक्स से सराबोर फिल्म ‘‘रागिनी एमएमएस’’ के लेखक पवन कृपलानी ने इस फिल्म की असफलता के बाद अपने नाम में यानी कि अंग्रेजी की स्पेलिंग में ‘डब्लू’ की जगह ‘वी’ कर लिया था. इस बदलाव के बाद वह बतोर सह लेखक व निर्देशक फिल्म ‘‘डर एट द माल’’ लेकर आए. पर इस फिल्म ने बाक्स आफिस पर पानी नही मांगा. तब फिर से नाम पुराने नाम की स्पेलिंग के साथ बतौर लेखक व निर्देशक फिल्म ‘‘फोबिया’’ लेकर आए,जिसमें राधिका आप्टे व सत्यदीप मिश्रा थे. पर यह फिल्म भी नही चली.

तब फिर से नाम में ‘वी’ जोड़कर 2021 में फिल्म ‘‘भूत पोलिस’’ लेकर आए. सैफ अली खान व अर्जुन कपूर के अभिनय से सजी 40 करोड़ की लागत से बनी यह फिल्म ‘‘डिज्नी प्लस हौट स्टार’’ पर आयी थी, जो दर्शकों को पसंद नहीं आयी थी. अब पवन कृपलानी बतौर सह लेखक व निर्देशक मनोवैज्ञानिक रहस्य प्रधान रोमांचक फिल्म ‘‘गैसलाइट’’ लेकर आए हैं.

यह फिल्म 31 मार्च से ‘डिज्नी प्लस हौट स्टार’ पर ही स्ट्रीम हो रही है. इस फिल्म में सारा अली खान के साथ चित्रांगदा सिंह व विक्रांत मैसे हैं. अति कमजोर कथा व पटकथा के चलते यह फिल्म कमजोर फिल्म बनकर रह गयी. फिल्म में मनोविज्ञान,रोमांच या रहस्य का कहीं अता पता नही है. फिल्म शुरू होने के महज 15 मिनट बाद दर्शक समझ जाता है कि असली खलनायक या कातिल कौन है.

इंसान पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालने वाले दो तीन दृष्य हैं,मगर वह भी काफी कमजोर हैं. फिल्मकार को समझना चाहिए कि सिर्फ मोरबी की एक अजीबोगरीब हवेली में जाकर फिल्म को फिल्माने व डरावना माहौल रचने मात्र से फिल्म का रहस्य व रोमांचक पक्ष मजबूत नही होता है.

पवन कृपलानी ने ‘भूत पोलिस’ को सैफ अली खान के साथ बनाया था, जबकि फिल्म ‘‘गैस लाइट’’ को सैफ की बेटी सारा अली खान के साथ बनाया है. इन दोनों फिल्मों का निर्माण रमेश तौरानी ने आकाश पुरी के साथ किया है और दोनो ही फिल्में ‘डिज्नी प्लस हौट स्टार’ पर ही स्ट्रीम हो रही हैं. क्या यह महज संयोग है?

कहानीः

फिल्म ‘‘गैसलाइट’’ की कहानी मोरबी, गुजरात में स्थापित है. जहां राजा रतन सिंह गायकवाड़ (शताफ अहमद फिगार) की हवेली है. फिल्म शुरू होती है राजा रतन सिंह गायकवाड़ (शताफ अहमद फिगार) यानी कि दाता कि बेटी मीशा (सारा अली खान) के लंबे समय बाद घर वापस आने से, जिसने एक दुर्घटना में अपनी मां की मृत्यु के बाद अपने पिता से नाता तोड़ लिया था. उसी त्रासदी ने मीशा को भी अपंग बना दिया था.

वास्तव में रतन सिंह गायकवाड़ (शताफ अहमद फिगार) की रूक्मणी (चित्रांगदा सिंह) के साथ दूसरी शादी ने बाप-बेटी के बीच के अलगाव को और बढ़ा दिया. खैर, दाता के फोन करने के चलते मीशा कई वर्षों बाद घर लौटती है. रूक्मणी के लिए आश्चर्य की बात है कि मीशा ने सोशल मीडिया से वैराग ले रखा है. मीशा की सौतेली माँ रुक्मिणी और यहाँ तक कि उसके पिता भी शायद नहीं जानते कि वह एक वयस्क के रूप में कैसी दिखती है. मीशा घर तो लौट आई है, लेकिन दुख की बात है कि उसके पिता लापता हैं.

रात के अंधेरे में भूतिया आकृतियाँ पर्दे के पीछे नजर आ़ती हैं, एक गैसलाइट लालटेन फर्श पर पलक झपकते ही आ जाती है,जो एकमात्र सबूत है कि कोई वहाँ था. रात में चीजें टकरा जाती हैं. और हर बार जब मीशा (सारा अली खान) हवेली में मौजूद सौतेली मां रूक्मिणी (चित्रांगदा सिंह) के साथ इन भयावह घटनाओं को सामने लाने की कोशिश करती है, तो उसे बताया जाता है कि वह चीजों की कल्पना कर रही है.

यानी कि अपने पिता की गैरहाजिरी में मीशा के साथ होने वाले अजीबोगरीब हादसे उसे इस बात का एहसास दिलाते हैं कि उसके पापा के साथ कुछ गलत हुआ है. लेकिन मीशा के बार बार कहने के बावजूद कोई उसकी बातों पर विश्वास नहीं करता.

वह इस रहस्य की तह तक जाने के लिए अपने पिता के तथा कथित वफादार नौकर कपिल (विक्रांत मैसी) की मदद लेती है. कहानी में एक एंगल मीसा के कजिन राणा जय सिंह (अक्षय ओबेराय) का भी है, जिनकी बाद में हत्या हो जाती है. तो पुलिस इंस्पेक्टर एसपी अशोक तंवर (राहुल देव) भी हैं. कपिल सारे किरदारों को लेकर एक नई कहानी सुनाता है. पर क्या मीसा अपने पिता यानी राजा रतन सिंह गायकवाड से मिल पाएगी? घर वापस लौटी लड़की मीसा है या यह भी कोई चाल है? पारिवारिक और राजा रतन सिंह का वफादार कुत्ता क्या कोई सुराग दे पाएगा?

लेखन व निर्देशनः

एक बार फिर लेखक व निर्देशक बुरी तरह से मात खा गए हैं. पवन कृपलानी ने नेहा शर्मा संग इसकी कथा व पटकथा लिखी है,पर सच यह है कि वह सिर्फ माहौल गढ़ पाए हैं. मनोविज्ञान की उन्हें कोई समझ नही है. रहस्य भी वह ज्यादा देर तक बरकरार नही रख पाते. परिणामतः महज 15 मिनट बाद ही दर्षक की रूचि फिल्म से खत्म हो जाती है. तो इस फिल्म की पहली और सबसे कड़ी कमजोर कड़ी इसका लेखन है. बतौर निर्देशक पवन कृपलानी ने फिल्म का नाम ‘गैसलाइट’ रखकर दर्षकों को उलझाने का ही प्रयास किया है.  जब गांवो में बिजली नही पहुॅची थी. तब रोशनी के लिए लालटेन और अधिक रोशनी के लिए गैसलाइट यानी कि ‘पेट्ोमैक्स’जलाए जाते थे. इस पेट्ोमैक्स के अंदर रिस्कोफिलामेंट यान यानी कि रेशमी धागे व एक खास तरह के केमिकल से बनी हुई गोल गुब्बारे ुनुमा थैली बांधी जाती थी. जो दबाव के साथ आते केरोसीन को जलाकर झक सफेद रोशनी कर देती. तो वहीं ‘गैसलाइट’ का मतलब किसी इंसान को मनौवैज्ञनिक तौर पर इस कदर परेषान कर देना कि वह अपनी बुद्धि ही खो दे.  निर्देशक पवन कृपलानी ने अपनी फिल्म के षुरूआती दृष्य में रात में नदी या समुद्र में चलती नाव पर इसी पेट्ोमैक्स को जलाकर रखा हुआ है. इसके अलावा मीसा को मनोवैज्ञानिक स्तर पर डराने के लिए कुछ दृष्य गढ़े हैं,पर वह डराने की बजाय हंसाते ज्यादा हैं. सौतली मां व बेटी के रिष्ते को भी ठीक से नही रचा गया. फिल्म में कुछ दृष्य अवष्य अच्छे बन पड़े हैं.

अभिनयः

अभिनेता सैफ अली खान की बेटी सारा अली खान ने 2018 में जब फिल्म ‘‘केदारनाथ’’ से अभिनय के क्षेत्र में कदम रखा था,तब उनसे कुछ उम्मीदें जगी थीं. लेकिन उसके बाद ‘सिंबा’,‘लव आजकल’,‘कुली नंबर वन’,‘अतरंगी रे’ सहित हर फिल्म में उन्होेने अपने आपको एक भावहीन अदाकारा के रूप में ही पेश किया है.

सारा अली खान की यह सभी फिल्में असफल रही हैं. मजेदार बात यह है कि सारा अली खान की फिल्में अब सिनेमाघर की बजाय ओटीटी पर ही आ रही हैं.

‘कुली नंबर वन’ और ‘अंतरंगी रे’ के बाद ‘गैस लाइट’ उनकी तीसरी फिल्म है,जो कि ओटीटी पर स्ट्रीम हो रही है. फिल्म ‘गैसलाइट’ में भी वह सपाट चेहरे मे ही नजर आती हैं. इस फिल्म में मीशा के किरदार में वह व्हील चेअर पर है, इसलिए उनके पास अपने अभिनय को दर्शाने के सीमित साधन रह जाते हं. पर वह अपने पिता के गायब होने और उनके साथ जो कुछ हो रहा है, उस बेचैनी को अपने चेहरे के हाव भाव से दिखा सकती थी, जिसमें वह मात खा गयीं.

सौतली मां रूक्मिणी,जिसे वह पसंद नही करती, उसके प्रति गुस्सा भी वह ठीक से व्यक्त नही कर पाती.

कपिल के किरदार में विक्रांत मैसे जैसे बेहतरीन कलाकार हैं. मगर इस फिल्म में वह कुछ नया नही कर पाए. यदि उनकी अब तक की फिल्मों व सीरियलों पर गौर किया जाए तो अहसास होता है कि वह खुद को एक ढर्रे में बांधते जा रहे हैं, जिससे उनके अंदर की अभिनय क्षमता का विकास नही हो पा रहा है. इसके लिए वह स्वयं जिम्मेदार हैं. उन्हे फिल्मों के चयन को लेकर सावधानी बरतनी चाहिए.

रूक्मिणी के किरदार में चित्रांगदा सिंह दर्शक को याद रह जाती हैं. अक्षय ओबेरॉय, राहुल देव और शिशिर शर्मा कमजोर पटकथा के चलते कुछ खास नही कर पाए.

मुसकान : भाग 1- क्यों टूट गए उनके सपने

लेखिका- निर्मला कपिला

आज आसमान से कोई परी उतरती तो वह भी मुसकान को देख कर शरमा जाती, क्योंकि मुसकान आज परियों की रानी लग रही है. नजाकत से धीरेधीरे पांव रखती शादी के मंडप की ओर बढ़ रही मुसकान लाल सुर्ख जरी पर मोतियों से जड़ा लहंगाचोली पहने जेवरों से लदी, चूड़ा, कलीरे और पांव में झांजर डाले हुए है. उस के भाई उस के ऊपर झांवर तान कर चल रहे हैं. झांवर भी गोटे और घुंघरुओं से सजी है. उस का सगा भाई अनिल उस के आगेआगे रास्ते में फूल बिछाते हुए चल रहा है.

शादी के मंडप की शानोशौकत देखते ही बनती है. सामने स्टेज पर सुनील दूल्हा बना बैठा है. वहां मौजूद सभी एकटक मुसकान को आते हुए देख रहे हैं जो अपने को आज दुनिया की सब से खुशनसीब लड़की समझ रही है. आज मुसकान अपने सपनों के राजकुमार की होने जा रही है. सुनील के पिता सुंदरलालजी जिस फैक्टरी में लेखा अधिकारी हैं उसी में मुसकान के पिता राजकुमार सहायक हैं.

दोनों परिवार 20 साल से इकट्ठे रह रहे हैं. दोनों के घरों के बीच में दीवार न होती तो एक ही परिवार था. राजकुमार के 2 बच्चे थे, जबकि सुंदरलाल का इकलौता बेटा सुनील था. यह छोटा सा परिवार हर तरह से खुशहाल था. सुंदरलाल, मुसकान को अपनी बेटी की तरह मानते थे. तीनों बच्चे साथसाथ खेले, बढ़े और पढ़े.

मुसकान, अनिल से 5 वर्ष छोटी थी. सुनील और मुसकान हमउम्र थे. दोनों पढ़ने में होशियार थे. जैसेजैसे बड़े होते गए उन में प्यार बढ़ता गया. मन एक हो गए, सपने एक हो गए और लक्ष्य भी एक, दोनों डाक्टर बनेंगे.

राजकुमार की हैसियत मुसकान को डाक्टरी कराने जितनी नहीं थी मगर सुनील के मांबाप ने मन ही मन मुसकान को अपनी बहू बनाने का निश्चय कर लिया था इसलिए उन्होंने यथासंभव सहायता का आश्वासन दे कर मुसकान को डाक्टर बनाने का फैसला कर लिया था. अनिल भी इंजीनियरिंग कर के नौकरी पर लग गया. वह भी चाहता था कि मुसकान डाक्टर बने.

सुनील को एम.बी.बी.एस. में दाखिला मिल गया. मुसकान अभी 12वीं में थी. जब सुनील पढ़ने के लिए पटियाला चला गया तब दोनों को लगा कि वे एकदूसरे के बिना जी नहीं सकेंगे. मुसकान को लगता कि उस का कुछ कहीं खो गया है पर वह चेहरे पर खुशी का आवरण ओढ़े रही ताकि मन की पीड़ा को कोई दूसरा भांप न ले. दाखिले के 7 दिन बाद सुनील पटियाला से आया तो सीधा मुसकान के पास ही गया.

‘लगता है 7 दिन नहीं सात जन्म बाद मिल रहा हूं. मुसकान, मैं तुम्हें बहुत मिस करता हूं.’

मुसकान कुछ कह न पाई पर उस के आंसू सबकुछ कह गए थे.

‘मुसकान, आंसू कमजोर लोगों की निशानी है. हमें तो स्ट्रांग बनना है, कुछ कर दिखाना है, तभी तो हमारा सपना साकार होगा,’ सुनील ने उसे हौसला दिया.

अब दोनों ही अपना कैरियर बनाने में जुट गए. सुनील जब भी घर आता मुसकान के लिए किताबें, नोट्स ले कर आता. वह चाहता था कि मुसकान को भी उस के ही कालिज में दाखिला मिल जाए. मुसकान उसे पाने के लिए कुछ भी कर सकती थी. सुनील मुसकान की पढ़ाई की इतनी चिंता करता कि फोन पर उसे समझाता रहता कि कौन सा विषय कैसे पढ़ना है, टाइम मैनेज कैसे करना है.

सुनील एक हफ्ते की छुट्टी ले कर घर आया और मुसकान से टेस्ट की तैयारी करवाई. दोनों ने दिनरात एक किया. अगर लक्ष्य अटल हो, प्रयास सबल हो तो विजय निश्चित होती है. मुसकान को भी पटियाला में ही प्रवेश मिल गया. मुसकान को दाखिल करवाने दोनों के ही मांबाप गए थे. वापसी से पहले सुनील की मां ने मुसकान से कहा था, ‘बेटा, हमें उम्मीद है तुम दोनों अपने परिवार की मर्यादा का ध्यान रखोगे तो हम सब तुम्हारे साथ हैं.’

‘मां, जितना प्यार मुझे मेरे मांबाप ने दिया है उस से अधिक आप लोगों ने दिया है. मैं आप से वादा करती हूं कि मेरा जीवन इस परिवार और प्यार के लिए समर्पित है,’ मुसकान मम्मी के गले लग गई.

दोनों ने बड़ी मेहनत की और अपने मांबाप की आशाओं पर फूल चढ़ाए. सुनील ने एम.डी. की और उसे पटियाला में ही नौकरी मिल गई. दोनों के मांबाप चाहते थे अब सुनील व मुसकान की शादी हो जानी चाहिए पर दोनों ने फैसला किया था कि जब मुसकान भी एम.डी. हो जाए उस के बाद ही वे शादी करेंगे.

आज उन की मेहनत और सच्चे प्यार का पुरस्कार शादी के रूप में मिला था. सुनील हाथ में जयमाला लिए मंडप की ओर आती मुसकान को देख रहा था.

मुसकान की विदाई एक तरह से अनोखी ही थी. न किसी के चेहरे पर उदासी न आंखों में आंसू. सभी लोग शादी के मंडप से निकले और गाडि़यों में बैठ कर जहां से चले थे वहीं वापस आ गए. दुलहन के रूप में मुसकान सुनील के घर चली गई. दोनों घरों के बीच एक दीवार ही तो थी. जब सब के दिल एक थे तो मायका क्या और ससुराल क्या.

आज सुनील से भी अपनी खुशी छिपाए नहीं छिप रही थी. आज वह अपनी लाल परी को छुएगा.

‘‘मां, हमें जल्दी फारिग करो, हम थक गए हैं,’’ सुनील बेसब्री से बोला.

‘‘बस, बेटा, 10 मिनट और लगेंगे. मुसकान कपड़े बदल ले.’’

मम्मी मुसकान को एक कमरे में ले गईं और एक बड़ा सा पैकेट दे कर बोलीं, ‘‘बेटा, यह सुनील ने अपनी पसंद से तुम्हारे लिए खरीदा है आज रात के लिए.’’

मम्मी के जाने के बाद मुसकान ने कमरा अंदर से बंद किया और जैसे ही उस ने पैकेट खोला, वह उसे देख कर हैरान रह गई. पैकेट में सुर्ख रंग का जरी, मोतियों की कढ़ाई से कढ़ा  हुआ कुरता, हैवी दुपट्टा पटियाला सलवार, परांदा आदि निकला था. उस ने तो बचपन से ही पैंटजींस पहनी थी. कपड़ों की तरफ दोनों ने पहले कभी ध्यान ही नहीं दिया था. सुनील ने भी कभी उस के कपड़ों पर कोई टिप्पणी नहीं की थी.

वह बड़े सलीके से तैयार हुई. अपने केशों में परांदी, सग्गीफूल लगाया, मैच करती लिपस्टिक लगाई, माथे पर मांग टीका लटक रहा था, फिर दुपट्टा पिनअप कर के जैसे ही शीशे के सामने खड़ी हुई सामने पंजाबी दुलहन के रूप में खुद को देख मुसकान हैरान रह गई. सुनील की पसंद पर उसे नाज हो आया और दिल धड़क उठा रात के उस क्षण के लिए जब उस का राजकुमार उसे अपनी बांहों में भर कर उस की कुंआरी देहगंध से रात को सराबोर करेगा.

किसी ने दरवाजा खटखटाया. मुसकान ने दरवाजा खोला तो सामने मम्मी और मां घबराई सी खड़ी थीं.

‘‘बेटी, तुम्हारे पापा की तबीयत खराब हो गई थी. सुनील और अनिल उन्हें अस्पताल ले कर गए हैं. पर घबराने की बात नहीं है, अभी आते होंगे,’’ कह कर मां और मम्मी दोनों उस के पास बैठ गईं.

मुसकान एकदम घबरा गई. अभी 1 घंटा पहले तो पापा ठीक थे, हंसखेल रहे थे. उस ने जल्दी से मोबाइल उठाया, ‘‘सुनील, कैसे हैं पापा, क्या हुआ उन्हें?’’

‘‘मुसकान, देखो घबराना नहीं,’’ सुनील बोला, ‘‘मेरे होते हुए चिंता मत करो. पापा को हलका हार्ट अटैक पड़ा है. हमें इन्हें ले कर पटियाला जाना होगा. तुम जरूरी सामान और कपड़े ले कर डैडी के साथ यहीं आ जाओ. तुम भी साथ चलोगी. मेरे वाला पैकेट अभी संभाल कर रख लो.’’

‘‘मम्मी, सुनील ने मुझे अस्पताल बुलाया है. पापा को पटियाला ले कर जाना पड़ेगा,’’ और फिर जितनी हसरत से उस ने सुनील वाले कपड़े पहने थे, उतने ही दुखी मन से उन्हें उतार दिया. हलके रंग का सूट पहना और यह सोच कर कि इस लाल सूट को तो वह सुहागरात को ही पहनेगी उसे बड़े प्यार से उसी तरह अलमारी में रख दिया.

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